42. मैं अपने कर्तव्य के साथ सही ढंग से पेश आने में सक्षम हो गया
2024 में, अगुआ ने व्यवस्था की कि मैं अनुभवजन्य गवाही के वीडियो में अभिनय करूँ। मैं परमेश्वर के कार्य के अंतिम चरण में इतना महत्वपूर्ण कर्तव्य निभाने में सक्षम होने पर बहुत खुश था और मैंने परमेश्वर के प्रेम का प्रतिफल चुकाने के लिए अपना कर्तव्य ठीक से निभाने का संकल्प लिया। शुरू में, मैं बस एक अतिरिक्त कलाकार था, लेकिन बाद में मुझे मुख्य किरदार निभाने को भी मिला, मैंने अनुभवजन्य गवाहियाँ साझा कीं। जैसे-जैसे टीम में और अभिनेता शामिल हुए, जिनमें मुझसे ज्यादा खूबियाँ थीं, मैंने पाया कि मैं मुख्य भूमिका कम से कम निभा रहा था। एक अनुभवजन्य गवाही वीडियो ऐसा था जिसमें शुरू में यह तय किया गया था कि मुख्य किरदार मुझे निभाना है, लेकिन बाद में वह भूमिका भाई अल्बर्ट को दे दी गई। उस पल, मुझ पर संकट का एहसास छा गया। मैं जानता था कि मेरा अभिनय कौशल बाकी सब से कमजोर था, और मुझे चिंता थी कि शायद अगुआ धीरे-धीरे मुझे अभिनेता के रूप में इस्तेमाल करना पूरी तरह से बंद कर देगा। तब मैं क्या करूँगा? सब मेरे बारे में क्या सोचेंगे? बाद में, मैंने फिल्मांकन का शेड्यूल कई बार जाँचा और देखा कि उस पटकथा के सामने अभी भी भाई अल्बर्ट का नाम लिखा था। मुझे थोड़ी निराशा हुई, लेकिन यह जल्द ही खत्म हो गई। अक्टूबर में, अगुआ ने मेरे अभिनय कर्तव्यों के अलावा मेरे लिए रसोई में खाना पकाने में मदद करने की व्यवस्था की। उस समय, मैंने सोचा कि यह काफी अच्छी व्यवस्था थी, क्योंकि यह मेरे लिए और अधिक कर्तव्य करने का एक तरीका था। लेकिन जब मैं वास्तव में रसोई में गया, मैंने एप्रन पहना और खाना बनाना शुरू किया तो मुझे अंदर से थोड़ा बुरा लगा। मैंने मन ही मन सोचा, “मैं इन वर्षों में मूल रूप से हर समय अभिनय का कर्तव्य करता रहा हूँ। भले ही मैंने कभी मुख्य भूमिका नहीं निभाई थी, लेकिन मैं बहुत सारी फिल्मों में काम कर चुका था, और मुझे एक अनुभवी अभिनेता माना जा सकता था। मैं जहाँ भी जाता था, भाई-बहन मुझे पहचानते थे। लेकिन अब, मुझे देखो। मैं रसोइया बन गया हूँ। भले ही खाना बनाना भी एक कर्तव्य है, यह बहुत मामूली लगता है। यह ऐसा कुछ नहीं है जिससे किसी को आदर या सम्मान मिले।” बाद में, टीम के कुछ कार्यकर्ताओं को अक्सर काम के लिए बाहर जाना पड़ता था। जब सेट का प्रभारी भाई बाहर होता था, तो अगुआ मुझसे सेट की सजावट करवाता था। जब प्रॉप्स यानी मंच सामग्री की प्रभारी बहन वहाँ नहीं होती थी, तो अगुआ मुझसे प्रॉप्स लगवाता था। मैं और भी हताश महसूस करने लगा। मैंने सोचा, “मुझे बस वहीं भेज दिया जाता है जहाँ कहीं किसी की जरूरत होती है। तो इससे मैं क्या बनकर रह गया हूँ? क्या सब यह सोचने लगेंगे कि मैं बस एक वैकल्पिक व्यक्ति हूँ?”
एक बार, हम अभिनेता एक साथ पेशेवर कौशल सीख रहे थे, एक संवाद के अंश का बारी-बारी से अभ्यास कर रहे थे। मैं वास्तव में घबराया हुआ था, चिंतित था कि कहीं मैं खराब प्रदर्शन न कर दूँ और खुद को ही मूर्ख न बना बैठूँ। आखिरकार, जैसा मुझे डर था, मेरी अदायगी सबसे खराब थी। मैंने मन ही मन शिकायत की, “मेरा कौशल तो शुरू से ही खराब था, और अब मैं पूरा दिन खाना पकाने या सेट सजाने में बिता रहा हूँ और अभ्यास के लिए कोई समय नहीं है। क्या मेरा अभिनय कौशल और भी खराब नहीं होता जाएगा?” अनजाने में ही मैं थोड़ा-बहुत हताश हो गया। हर दोपहर, दूसरे अभिनेता एक साथ नाचने का अभ्यास करते थे। उन सबको इतनी खुशी से नाचते हुए देखकर, जबकि मैं रसोई में खाना पकाने में फँसा रहता था, मुझे और भी ज्यादा घुटन महसूस होती थी। मैं शर्मिंदगी से बचने के लिए बस उनसे कतराना चाहता था। नवंबर में हम एक नए फिल्मांकन स्थल पर चले गए और अगुआ ने मुझसे पहले सेट तैयार करवाया, मुझसे कहा कि अब से मैं टीम के सामान्य मामलों के काम का भी प्रभारी रहूँगा। हर दिन सबको अनुभवजन्य गवाही के वीडियो फिल्माने पर इतनी गहनता से काम करते देखकर, जबकि मैं हमेशा इन छोटे-मोटे कामों में फँसा रहता था, मैंने सोचा, “हर कोई सोचता होगा कि मेरी काबिलियत खराब है और मैं अभिनेता नहीं बन सकता, कि मैं विकसित किए जाने लायक नहीं हूँ। यही वजह होगी कि अगुआ मुझसे सामान्य मामलों के ये काम करवा रहा है।” जितना मैंने इसके बारे में सोचा, मुझे उतनी ही शर्मिंदगी महसूस हुई। एक सभा के दौरान, मैं अपना लैपटॉप लेकर अभिनेताओं के दफ्तर में गया और देखा कि हर कोई पहले से बैठा हुआ था। मैंने धीरे से पूछा, “क्या कोई जगह बची है?” एक बहन ने तुरंत जवाब दिया, “अरे, भाई टेरी भी है! हम तो तुम्हारे बारे में बिल्कुल भूल ही गए थे!” मैं जानता था कि उसका कोई गलत मतलब नहीं था, लेकिन मुझे बहुत बुरा लगा। मैंने सोचा, “मैं दिन भर छोटे-मोटे काम करता रहता हूँ। इसमें कोई हैरानी नहीं कि मुझे नजरअंदाज कर दिया जाता है।” यह तब और भी मुश्किल था जब मैंने देखा कि टीम के दो अन्य भाइयों को निर्देशक और टीम अगुआ बना दिया गया था, जबकि मैं पूरा दिन खाना पकाने, साफ-सफाई करने और प्रॉप्स इधर-उधर ले जाने में फँसा रहता था। यह अंतर बहुत ज्यादा साफ था। यहाँ तक कि मेरे मन में अगुआ के प्रति पूर्वाग्रह भी पैदा हो गया। मैंने सोचा, “अगर तुम्हें लगता है कि मैं अभिनेता बनने लायक नहीं हूँ, तो बस ऐसा कह दो। मैं जाकर नए सदस्यों को सींच सकता हूँ! कम से कम यह सुनने में थोड़ा बेहतर लगता है और मुझे यहाँ इतना अनचाहा महसूस करने से बचाएगा।” उसके बाद, मैंने सुबह का स्वर अभ्यास करना बंद कर दिया और अभिनय कौशल सीखने में सारी दिलचस्पी खो दी। मैं अपनी आवाज को सुरक्षित रखने के लिए मसालेदार खाने से परहेज करता था, लेकिन अब मैंने सारी सावधानी ताक पर रख दी और इसे खाना शुरू कर दिया। नतीजतन, आंतरिक गर्मी से मेरे होठों पर छाले हो गए, जिससे फुटेज की गुणवत्ता पर असर पड़ा। शूटिंग से पहले, मैं किरदार की भावनाओं पर विचार करने पर कोई ध्यान नहीं देता था; मैं बस यंत्रवत अपने संवाद याद कर लेता था। नतीजतन, कई बार ऐसा हुआ जब मेरे कम उत्साह ने हमारी प्रगति में देरी की और शूट के नतीजों को प्रभावित किया। उस दौरान, मैं दिन भर बदहवास रहता था। कभी-कभी मुझे लगता था कि अपना कर्तव्य करने का कोई मतलब नहीं है, और यहाँ तक सोचता था, “वैसे भी, इस टीम में मेरी कोई खास जरूरत नहीं है। हर दिन ये छोटे-मोटे काम करने के बजाय हो सकता है मैं पूर्णकालिक कर्तव्य निभाना छोड़ दूँ और बस कोई नौकरी हासिल कर लूँ और साथ में कोई कर्तव्य निभा लूँ।”
एक दिन, प्रॉप्स व्यवस्थित करते समय, मुझे अचानक अपने दिल में बहुत असहजता महसूस हुई। तब जाकर मैंने उस दौरान अपनी दशा पर आत्म-चिंतन करना शुरू किया। उसी समय मुझे परमेश्वर के वचनों का एक अंश मिला जो सीधे मेरी दशा के बारे में बात करता था। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “अधिकतर लोग सत्य को खोजने के बजाय ओछी चालें चलते हैं। वे अपने स्वयं के हितों, अभिमान और दूसरों के मन में अपनी जगह या हैसियत को बहुत अधिक महत्व देते हैं। वे केवल इन्हीं चीजों को बहुमूल्य मानते हैं। वे इन चीजों को मजबूती से पकड़े रहते हैं और इन्हें अपना जीवन मानते हैं—जहाँ तक इस बात का सवाल है कि परमेश्वर इन चीजों को कैसे देखता है और इनके साथ कैसा व्यवहार करता है, वे इसकी परवाह नहीं करते हैं; वे सबसे पहले यह विचार करते हैं कि क्या वे समूह के मुखिया हैं, क्या वे ऐसा स्थान प्राप्त कर सकते हैं जिसमें दूसरे लोग उनका आदर करें और क्या कोई उनकी बात सुनता है या नहीं। वे सबसे पहले उस स्थान पर कब्जा जमाने में लग जाते हैं। लोग जब किसी समूह में होते हैं तो लगभग सभी लोग इस प्रकार के स्थान और इस प्रकार के अवसर की तलाश करते हैं। यदि वे अत्यधिक सक्षम हैं, तो निश्चित रूप से वे शीर्ष स्थान पर कब्जा करने का प्रयास करते हैं। यदि वे बस सामान्य हैं, तो भी वे समूह में एक प्रमुख स्थान बनाए रखने की कोशिश करते हैं। और यदि वे समूह में निचले स्तर पर हैं और उनकी काबिलियत और क्षमता सामान्य है, तो भी वे कोशिश करते हैं कि दूसरे लोग उनका आदर करें; खुद को वे दूसरों को कमतर नहीं समझने दे सकते हैं। इन लोगों का अभिमान और गरिमा ही उनकी अंतिम सीमा है; वे सोचते हैं कि उन्हें इन चीजों को हर हाल में बनाए रखना चाहिए। भले ही वे अपनी सत्यनिष्ठा खो दें, या परमेश्वर उनसे नाखुश हो और उन्हें स्वीकृति न दे, फिर भी उन्हें अपने अभिमान और रुतबे के लिए संघर्ष करना ही होता है; उन्हें किसी भी कीमत पर अपमान से बचना ही होगा। यह एक शैतानी स्वभाव है। और फिर भी उन्हें इसका एहसास नहीं होता। वे सोचते हैं कि वे अपना बचा-खुचा थोड़ा-सा अभिमान भी नहीं खो सकते। वे नहीं जानते कि जब इन सतही चीजों को पूरी तरह से छोड़ और त्याग दिया जाएगा, केवल तभी वे सच्चे इंसान बनेंगे और जिन चीजों को छोड़ दिया जाना चाहिए उन्हें यदि वे अपने जीवन के रूप में सहेज कर रखते हैं तो उनका जीवन नष्ट हो जाएगा। वे यह जानते ही नहीं हैं कि दाँव पर क्या लगा है। इसलिए वे जो कुछ भी करते हैं, उसमें हमेशा अपने लिए कुछ बचाकर रखते हैं, वे हमेशा अपना अभिमान और रुतबा बचाने के लिए काम करते हैं और वे इन चीजों को सबसे पहले रखते हैं। वे केवल अपने स्वार्थ के लिए बोलते हैं और भ्रामक तर्क देते हैं—वे अपने लिए कुछ भी कर सकते हैं” (वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, भाग तीन)। परमेश्वर के वचन कहते हैं कि चाहे हमारी काबिलियत या प्रतिभा कुछ भी हो, हम सब यह चाहते हैं कि हम लोगों के किसी समूह में कोई पद प्राप्त करें और दूसरों से सम्मान पाएँ। बड़ी क्षमताओं वाले लोग सबसे ऊपर का स्थान पाना चाहते हैं, जबकि किसी विशेष प्रतिभा से रहित और औसत काबिलियत वाले लोग भी चाहते हैं कि उन्हें महत्व और आदर दिया जाए। यह सब शैतानी स्वभावों से प्रेरित होता है। जब अगुआ ने मेरे अभिनेता बनने की व्यवस्था की, तो मैं इस बात से अत्यंत संतुष्ट हुआ कि मैं इतना महत्वपूर्ण कर्तव्य निभा सकता हूँ और मैं बहुत सक्रिय था और जिम्मेदारी की भावना महसूस करता था। लेकिन जब अगुआ ने यह व्यवस्था की कि मैं खाना पकाऊँ या कार्य की जरूरतों के आधार पर सेट सजाने या प्रॉप्स इधर-उधर करने का काम अस्थायी रूप से करूँ तो मुझे लगा कि ये बस छोटे-मोटे काम हैं, और अन्य अभिनेताओं की तुलना में अब मैं टीम का एक जरूरी सदस्य नहीं हूँ। इसलिए, मैं हताशा की भावनाओं में जीता था और लापरवाही से अपना कर्तव्य निभाने लगा, बस खानापूरी करने लगा। मैं पहले से किरदार की भावनाओं पर विचार करने की कोशिश नहीं करता था, बल्कि बस संवाद याद कर लेता था। मुझे यह विचार करने की कोई इच्छा नहीं थी कि शूट के लिए बेहतर परिणाम कैसे हासिल किया जाए। परमेश्वर ने जो किया था, उसके प्रति मैंने बिल्कुल भी समर्पण नहीं दिखाया। मैं टीम में सबसे कम महत्व वाला व्यक्ति बनने को तैयार नहीं था और हमेशा सम्मान और महत्व पाने की कोशिश करता था। मैं नितांत विवेक रहित था! मैं जानता था कि मेरा अभिनय कौशल खराब है और मुझे और अभ्यास करते रहना चाहिए था, लेकिन न केवल मैंने अभ्यास नहीं किया, बल्कि मैंने कोशिश करना ही छोड़ दिया। यहाँ तक कि मैंने अपना कर्तव्य पूर्णकालिक रूप से करना बंद करने पर भी विचार किया। प्रतिष्ठा और रुतबे की मेरी इच्छा वास्तव में बहुत प्रबल थी!
बाद में, मैंने परमेश्वर के और वचन पढ़े और अपने स्वयं के प्रकृति सार की कुछ समझ हासिल की। परमेश्वर कहता है : “मसीह-विरोधियों के लिए रुतबा और प्रतिष्ठा उनका जीवन हैं। चाहे वे कैसे भी जीते हों, चाहे वे किसी भी परिवेश में रहते हों, चाहे वे कोई भी काम करते हों, चाहे वे किसी भी चीज का अनुसरण करते हों, उनके कोई भी लक्ष्य हों, उनके जीवन की कोई भी दिशा हो, यह सब अच्छी प्रतिष्ठा और ऊँचा रुतबा पाने के इर्द-गिर्द घूमता है। और यह लक्ष्य बदलता नहीं है; वे कभी ऐसी चीजों को दरकिनार नहीं कर सकते हैं। यह मसीह-विरोधियों का असली चेहरा और सार है। तुम उन्हें पहाड़ों की गहराई में किसी घने-पुराने जंगल में छोड़ दो, फिर भी वे प्रतिष्ठा और रुतबे के पीछे दौड़ना नहीं छोड़ेंगे। तुम उन्हें लोगों के किसी भी समूह में रख दो, फिर भी वे सिर्फ प्रतिष्ठा और रुतबे के बारे में ही सोचेंगे। यूँ तो मसीह-विरोधी परमेश्वर में विश्वास करते हैं, लेकिन वे प्रतिष्ठा और रुतबे के अनुसरण को परमेश्वर में आस्था के समकक्ष रखते हैं और दोनों चीजों को समान पायदान पर रखते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि जब वे परमेश्वर में आस्था के मार्ग पर चलते हैं तो वे प्रतिष्ठा और रुतबे का अनुसरण भी करते हैं। यह कहा जा सकता है कि मसीह-विरोधियों के दिलों में, परमेश्वर में विश्वास करने में सत्य का अनुसरण ही प्रतिष्ठा और रुतबे का अनुसरण करना है और प्रतिष्ठा और रुतबे का अनुसरण सत्य का अनुसरण करना भी है—प्रतिष्ठा और रुतबा हासिल करना सत्य और जीवन हासिल करना है। अगर उन्हें लगता है कि उन्होंने प्रसिद्धि, लाभ या रुतबा हासिल नहीं किया है, कि कोई उनका आदर नहीं करता, उन्हें उच्च सम्मान नहीं देता है या उनका अनुसरण नहीं करता है तो वे बहुत उदास हो जाते हैं, वे मानते हैं कि परमेश्वर में विश्वास करने की कोई तुक नहीं है, इसका कोई मूल्य नहीं है और वे मन-ही-मन सोचते हैं, ‘क्या मैं परमेश्वर में इस तरह विश्वास कर विफल रहा हूँ? क्या मेरे लिए कोई आशा नहीं है?’ वे अक्सर अपने दिलों में ऐसी चीजों का हिसाब-किताब लगाते हैं। वे यह हिसाब-किताब लगाते हैं कि वे कैसे परमेश्वर के घर में अपने लिए जगह बना सकते हैं, वे कैसे कलीसिया में उच्च प्रतिष्ठा प्राप्त कर सकते हैं, जब वे बात करें तो वे कैसे खुद को सुनने के लिए लोगों को जुटा सकते हैं और जब वे कार्य करें तो कैसे उनसे अपनी प्रशंसा के गीत गवा सकते हैं, वे जहाँ कहीं भी हों वे कैसे अपना अनुसरण करने के लिए लोगों को जुटा सकते हैं और उनके पास कैसे कलीसिया में एक प्रभावी आवाज हो सकती है और उनके पास कैसे शोहरत, लाभ और रुतबा हो सकता है—वे वास्तव में अपने दिलों में ऐसी चीजों पर ध्यान केंद्रित करते हैं। ऐसे लोग इन्हीं चीजों के पीछे भागते हैं” (वचन, खंड 4, मसीह-विरोधियों को उजागर करना, मद नौ (भाग तीन))। परमेश्वर उजागर करता है कि मसीह-विरोधी प्रतिष्ठा और रुतबे को उसी तरह सँजोते हैं जैसे वे अपने जीवन को सँजोते हैं। चाहे वे लोगों के किसी भी समूह में हों, वे हमेशा एक पद सुरक्षित करना चाहते हैं और सम्मान पाना चाहते हैं। एक बार जब वे अपनी प्रतिष्ठा और रुतबा खो देते हैं, तो यह ऐसा होता है मानो उनसे उनका जीवन ही ले लिया गया हो। उन्हें यह भी लग सकता है कि परमेश्वर में विश्वास करने का कोई मतलब नहीं है और वे किसी भी समय परमेश्वर को धोखा देने और छोड़ने में सक्षम हो सकते हैं। क्या मैं बिल्कुल वैसा ही व्यक्ति नहीं था? अतीत में, जब मैं नियमित रूप से अभिनय का कर्तव्य निभा रहा होता था, तो हर कोई मेरा आदर करता था, और दूसरों के साथ रहने पर मुझे श्रेष्ठता का एहसास होता था। जब अगुआ ने यह व्यवस्था की कि मैं अनुभवजन्य गवाही के वीडियो में होऊँ तो मैं बहुत खुश था, यह महसूस करता था कि मुझे बहुत महत्व दिया जा रहा है, और मैं अपने कर्तव्य में ऊर्जा से भरा था। लेकिन जब मुझे खाना पकाने या सेट सजाने का काम सौंपा गया, तो मुझे लगा कि अब मेरा कोई महत्व नहीं है। मैं दिन भर दुखी रहता था और मुझे लगता था कि कुछ भी करने का कोई मतलब नहीं है। परमेश्वर कहता है : “तुम उन्हें पहाड़ों की गहराई में किसी घने-पुराने जंगल में छोड़ दो, फिर भी वे प्रतिष्ठा और रुतबे के पीछे दौड़ना नहीं छोड़ेंगे। तुम उन्हें लोगों के किसी भी समूह में रख दो, फिर भी वे सिर्फ प्रतिष्ठा और रुतबे के बारे में ही सोचेंगे।” ये वचन कितने व्यावहारिक हैं! मेरा प्रतिष्ठा और रुतबे को सँजोना कोई पल भर की बात नहीं थी; यह तो मेरी रग-रग में बसा था। चाहे मैं लोगों के किसी भी समूह में होता था या कुछ भी कर रहा होता था, मेरा पहला विचार हमेशा अपनी प्रतिष्ठा और रुतबा ही होता था। भले ही मैं सर्वश्रेष्ठ नहीं हो सकता था, फिर भी मुझे कम से कम यह महसूस करना था कि मानो मैं मायने रखता हूँ। वरना, मैं बहुत पीड़ा महसूस करता था, मानो जीने की कोई तुक नहीं है। मैं सोचने लगा, मुझे प्रतिष्ठा और रुतबे की इतनी परवाह क्यों थी? ऐसा इसलिए है क्योंकि मैं ऐसे शैतानी जहरों से गहराई से शिक्षित और प्रभावित था कि “आदमी ऊपर की ओर जाने के लिए संघर्ष करता है; पानी नीचे की ओर बहता है” और “लोगों के बीच नायक के समान जियो और मरो तो भूतों के बीच एक बहादुर आत्मा की तरह।” मेरा मानना था कि चाहे मैं लोगों के किसी भी समूह में रहूँ, मुझे महत्व और सम्मान मिलना चाहिए; अपना जीवन बर्बाद न करने का यही एकमात्र तरीका था। मुझे याद है कि जब मैं बच्चा था, तब से ही मैं बहुत प्रतिस्पर्धी था और अपनी इज्जत बचाने की बहुत परवाह करता था, मैं कभी नहीं चाहता था कि मैं जो कुछ भी करूँ उसके लिए मुझे नीची नजर से देखा जाए। जब मैं छोटा था तो मेरा परिवार गरीब था, इसलिए मैंने कठिन परिश्रम कर पढ़ाई की। मैं प्राथमिक स्कूल से लेकर हाई स्कूल तक दस साल कक्षा का अध्यक्ष रहा। घर की दीवारें मेरे विभिन्न पुरस्कार प्रमाण पत्रों से अटी थीं। मेरे शिक्षक, रिश्तेदार और दोस्त सभी मेरी तारीफ करते थे और मेरे सहपाठी मेरा आदर करते थे। मैं उस आभामंडल में जीता था और बहुत गर्व महसूस करता था, हमेशा सिर ऊँचा करके चलता था। लेकिन मेरे कॉलेज की प्रवेश परीक्षा से ठीक पहले, बीमारी के कारण मुझे स्कूल छोड़ना पड़ा। उस समय, मैं इस क्रूर वास्तविकता को स्वीकार नहीं कर पाया। उस बिंदु से, मैं खुद को फिर से सँभाल नहीं पाया और गहरी हताशा में डूब गया। जब मैंने परमेश्वर में विश्वास शुरू किया तो उसके बाद मैं अभी भी दूसरों से सम्मानित होने के पीछे भागता रहा। भले ही मेरी काबिलियत और कौशल औसत थे और मैं महत्वपूर्ण कार्य नहीं सँभाल सकता था, फिर भी मैं ऐसा व्यक्ति बनना चाहता था जिसका महत्व हो और जिसे नीची नजर से न देखा जाए। जब अगुआ मुझे सामान्य मामलों के कार्य सौंपता रहा, तो मेरा मिथ्याभिमान संतुष्ट नहीं हो सका और मैं नकारात्मक दशा में जीता था। मैं असंतुष्ट था और इसे स्वीकार करने को तैयार नहीं था, यहाँ तक कि अगुआ के प्रति पूर्वाग्रह भी रखता था। मैं अपने कर्तव्य में लापरवाह हो गया और यहाँ तक कि अंशकालिक नौकरी करने के बारे में भी सोचने लगा। यह मेरा उस परिवेश से भागना था जिसका इंतजाम परमेश्वर ने किया था और असल में यह परमेश्वर को धोखा देना था। मैंने देखा कि मैं अपना कर्तव्य सत्य का अनुसरण करने और उद्धार पाने के लिए नहीं, बल्कि प्रतिष्ठा और रुतबे का अनुसरण करने के लिए निभा रहा था। मैं एक मसीह-विरोधी के रास्ते पर चल रहा था। अगर मैंने पश्चात्ताप नहीं किया और मैं नहीं बदला, तो देर-सवेर मुझे परमेश्वर द्वारा बेनकाब कर दिया जाएगा और हटा दिया जाएगा। उसके बाद, मैं बार-बार परमेश्वर से प्रार्थना करता था, उससे विनती करता था कि वह मेरी गलत दशा को पूरी तरह परिवर्तित करने में मेरी अगुआई करे।
एक दिन, मैंने परमेश्वर के वचन देखे और उस मार्ग को समझा जिस पर मुझे परमेश्वर में अपने विश्वास में चलना चाहिए ताकि मैं परमेश्वर के इरादों के अनुरूप हो सकूँ। परमेश्वर कहता है : “कुछ लोग केवल शानदार और प्रभावशाली कर्तव्य करने, दूसरों द्वारा आदर पाने और उनसे ईर्ष्या करवाने से ही संतुष्ट हो जाते हैं। क्या ये चीजें किसी काम की हैं? ये चीजें परमेश्वर की स्वीकृति के बराबर नहीं हैं, न ही वे उसकी ओर से पुरस्कार हैं। इसलिए तुम चाहे जो भी कर्तव्य करो, यह केवल अस्थायी है; चिरस्थायी नहीं। कोई व्यक्ति अंततः उद्धार प्राप्त कर सकता है या नहीं, यह इस बात पर निर्भर नहीं करता कि वह कौन-सा कर्तव्य करता है, बल्कि इस बात पर निर्भर करता है कि क्या वह सत्य को समझ और प्राप्त कर सकता है, और अंततः परमेश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण प्राप्त कर सकता है और खुद को उसके आयोजन की दया पर छोड़ सकता है, अब अपने भविष्य और नियति पर विचार नहीं करता और एक मानक स्तर का सृजित प्राणी बन जाता है। परमेश्वर धार्मिक और पवित्र है, वह पूरी मानवजाति को मापने के लिए इस मानक का उपयोग करता है और यह मानक कभी नहीं बदलेगा—तुम्हें यह याद रखना चाहिए। इस मानक को अपने मन में दृढ़ता से रखो और उन अवास्तविक चीजों का अनुसरण करने के लिए सत्य का अनुसरण करने का मार्ग छोड़ने के बारे में कभी मत सोचो। बचाए जाने वाले सभी लोगों के लिए परमेश्वर का अपेक्षित मानक हमेशा अपरिवर्तनीय है। तुम कौन हो, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता, यह वही रहता है। तुम परमेश्वर के अपेक्षित मानक के अनुसार परमेश्वर में विश्वास करके ही उद्धार प्राप्त कर सकते हो। यदि तुम कोई दूसरा मार्ग खोजते हो और अज्ञात चीजों का अनुसरण करते हो, यह कल्पना करते हो कि तुम भाग्य से सफल हो जाओगे, तो तुम एक ऐसे व्यक्ति हो जो परमेश्वर का प्रतिरोध और उसके साथ विश्वासघात करता है, और तुम्हें निश्चित रूप से परमेश्वर द्वारा शाप और दंड दिया जाएगा” (वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, भाग तीन)। “परमेश्वर यह नहीं देखता कि तुम उसके सामने क्या कहते हो या क्या वादा करते हो; वह यह देखता है कि तुम जो करते हो क्या उसमें सत्य वास्तविकता है। परमेश्वर यह नहीं देखता कि तुम्हारे वचन कितने ऊँचे, गहरे या भव्य हैं। भले ही तुम कोई छोटा-सा काम करो, यदि परमेश्वर तुम्हारे हर कदम में तुम्हारा सच्चा दिल देखता है तो वह कहेगा, ‘यह व्यक्ति मुझ पर सच्चे दिल से विश्वास करता है। उसने कभी बड़े-बड़े दावे नहीं किए। वह अपनी उचित स्थिति में रहता है। यूँ तो उसने परमेश्वर के घर में कोई बड़ा योगदान नहीं दिया है और उसकी काबिलियत खराब है, लेकिन वह जो कुछ भी करता है उसमें बहुत जमीन से जुड़ा होता है और उसमें सच्चा दिल होता है।’ इस ‘सच्चे दिल’ में क्या शामिल है? इसमें परमेश्वर का भय और उसके प्रति समर्पण, साथ ही सच्ची आस्था और प्रेम शामिल है—इसके भीतर वह सब कुछ है जो परमेश्वर देखना चाहता है। इस तरह का व्यक्ति जरूरी नहीं कि कोई ऐसा हो जिसे दूसरे बहुत सम्मान देते हों; वह कोई ऐसा व्यक्ति हो सकता है जो मेजबानी का कर्तव्य निभाता है या जो एक साधारण कर्तव्य करता है। वह दूसरों के लिए अनुल्लेखनीय हो सकता है, उसने कोई महान उपलब्धि हासिल नहीं की हो सकती है और उसमें ऐसा कुछ भी नहीं हो सकता जिससे दूसरे उसका आदर करें, उसे सराहें या उसकी जैसी उपलब्धियाँ पाने की इच्छा करें—वह बस एक साधारण व्यक्ति हो सकता है। और फिर भी उसमें वह सब कुछ है जिसकी माँग परमेश्वर करता है, वह इसे जी सकता है और वह इसे परमेश्वर को अर्पित कर सकता है। यह परमेश्वर को संतुष्ट करता है और वह और कुछ नहीं चाहता है” (वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, भाग तीन)। ये दो अंश पढ़ने के बाद मेरा दिल कहीं अधिक रोशन महसूस करने लगा। अपने कर्तव्य में तुम्हें दूसरों का सम्मान मिलता है या नहीं, यह महत्वपूर्ण नहीं है; यह तुम्हारे अंतिम परिणाम और गंतव्य को निर्धारित नहीं करता है। अपना कर्तव्य करना बस वह मार्ग है जिसके माध्यम से हम सत्य का अनुसरण करते हैं और उसे पाते हैं। परमेश्वर को हमसे बड़ी चीजें करवाने की जरूरत नहीं है, न ही वह हमसे उच्च पद पाने की अपेक्षा करता है। परमेश्वर आशा करता है कि हम अपनी उचित जगह के अनुसार आचरण कर सकें, अपने कर्तव्य व्यावहारिक रूप से निभा सकें, उसके वचनों का अभ्यास कर सकें और उसके प्रति सच्चा समर्पण दिखा सकें। मुझे यह भी एहसास हुआ कि चूंकि मेरा अभिनय कौशल बस औसत था, इसलिए बेहतर कौशल वाले भाई-बहनों को अनुभवजन्य गवाही के वीडियो में अभिनय करने देने से बेहतर नतीजे मिलेंगे, जो सुसमाचार कार्य के लिए फायदेमंद है। इसके अलावा, मैंने पहले नवीनीकरण का काम किया था, इसलिए सेट सजाने में सहायता के लिए अगुआ ने मेरे लिए जो व्यवस्था की, वह मेरे कौशल पर आधारित थी और वास्तव में काफी उचित थी। कलीसिया के पास ऐसे सिद्धांत होते हैं कि वह कैसे प्रत्येक व्यक्ति के कर्तव्य की व्यवस्था करे, लेकिन मैं प्रतिष्ठा और रुतबे का अनुसरण करने और लोगों से अपना सम्मान करवाने पर तुला हुआ था, हमेशा अपनी अनुचित माँगें मन में पाले रहता था। मैं नितांत विवेक रहित था! सच तो यह है कि भले ही अगुआ ने मुझे जो काम सौंपे थे, वे सारे मामूली छोटे-मोटे काम थे, फिर भी वे वही कर्तव्य थे जो मुझे करने चाहिए थे, और मुझे उन्हें ध्यान से करना चाहिए था। यही नहीं, चाहे तुम कोई भी कर्तव्य निभाते हो, फिर भी ऐसे सत्य सिद्धांत होते हैं जिनका अभ्यास किया जाना चाहिए और जिनमें प्रवेश किया जाना चाहिए। अगर मैंने अपनी पूरी क्षमता से समर्पण और सहयोग किया होता, तो न केवल मैं कलीसिया के कार्य में योगदान दे सकता था, बल्कि मेरे पास सत्य खोजने और समझने के और अधिक अवसर होते। उदाहरण के लिए, सेट सजाने में तुम्हें यह विचार करना होता है कि सामग्री कैसे बचाई जाए और दृश्यों को अधिक आकर्षक बनाने के लिए कैमरा और लाइटिंग विभागों के साथ कैसे सामंजस्यपूर्ण ढंग से सहयोग किया जाए। सामान्य मामलों के कर्तव्य में सभी प्रकार की आपूर्ति का उचित प्रबंधन और उचित उपयोग शामिल होता है; खाना बनाते समय, तुम्हें यह विचार करना होगा कि भोजन को पौष्टिक, स्वच्छ और स्वास्थ्यवर्धक कैसे बनाया जाए। हर कर्तव्य में बहुत से अलग-अलग पहलुओं के सिद्धांत शामिल होते हैं और इसे मानक स्तर पर अच्छे ढंग से निभाना आसान नहीं है। पहले, प्रतिष्ठा और रुतबे का अनुसरण करके, मैं गलत रास्ते पर चल रहा था। न केवल मेरे अपने जीवन प्रवेश को नुकसान हुआ, बल्कि इसका मेरे कर्तव्य पर भी कुछ नकारात्मक प्रभाव पड़ा। अब, मुझे अपना कर्तव्य निभाने के अवसर को संजोना चाहिए और अपना कर्तव्य निभाते समय अपने जीवन प्रवेश पर, सत्य खोजने और सिद्धांतों के अनुसार कार्य करने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। बाद में, कुछ ऐसा हुआ जिसने मुझे वास्तव में झकझोर दिया। एक अभिनेता को उसके गंभीर भ्रष्ट स्वभावों के कारण बर्खास्त कर दिया गया : वह दूसरों के सुझाव स्वीकार नहीं करता था, भाई-बहनों के साथ सामंजस्यपूर्ण ढंग से सहयोग नहीं कर सकता था और बार-बार की संगतियों के बावजूद उसने चीजों को पूरी तरह परिवर्तित करने से इनकार कर दिया, जिससे उसके कर्तव्य के परिणामों पर असर पड़ा। इसने मुझे गहराई से सोचने पर मजबूर कर दिया। इस अभिनेता के कौशल काफी अच्छे थे, लेकिन उसमें गंभीर भ्रष्ट स्वभाव थे और वह उनका समाधान करने के लिए कभी भी सत्य नहीं खोजता था; अंत में, उसे बर्खास्त कर दिया गया। मैंने देखा कि आप अपने कर्तव्य में किस मार्ग पर चलते हैं, यह बेहद अहम है। अगर तुम सत्य का अनुसरण नहीं करते हो, तो चाहे तुम्हारा पद कितना भी ऊँचा हो या तुम्हें कितना भी सम्मान मिले, तुम अंततः असफल रहोगे। मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की, “हे परमेश्वर! मैं पश्चात्ताप करने को तैयार हूँ। मैं अब प्रतिष्ठा और रुतबे का अनुसरण नहीं करना चाहता। मैं तेरे आयोजनों और तेरी व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करने को तैयार हूँ।”
कुछ समय बाद, अगुआ ने मुझसे पूछा कि क्या मैं रसोई में पूर्णकालिक रूप से खाना पकाने का कार्य करने के लिए इच्छुक होऊँगा। मैंने मन ही मन सोचा, “पहले, मैं बस अस्थायी रूप से मदद कर रहा था। अगर मैं सहमत हो जाता हूँ, तो मैं लंबे समय तक खाना पकाऊँगा। क्या इसका मतलब यह नहीं होगा कि मुझे फिर कभी अभिनेता बनने का मौका नहीं मिलेगा? सब मेरे बारे में क्या सोचेंगे? क्या वे सोचेंगे कि मुझे इसलिए हटा दिया गया क्योंकि मेरे कौशल अच्छे नहीं थे?” मैं उलझन में था, लेकिन फिर मुझे एहसास हुआ कि यह परमेश्वर का मेरी परीक्षा लेना है, यह देखने के लिए कि क्या मैं समर्पण कर सकता हूँ। इसलिए, मैंने कर्तव्य स्वीकार कर लिया। बाद में, अगुआ ने मुझसे तीनों कर्तव्यों—अभिनय, खाना पकाना और सामान्य मामलों—में संतुलन साधने को कहा, उनकी तात्कालिकता और महत्व के अनुसार लचीले ढंग से उनमें तालमेल बैठाने को कहा। उन दिनों, मैं अक्सर परमेश्वर के वचनों के एक अंश के बारे में सोचता था : “एक सृजित प्राणी के रूप में तुम्हारी भूमिका क्या है? इसका संबंध तुम्हारे अभ्यास और कर्तव्य से है। तुम एक सृजित प्राणी हो और अगर परमेश्वर ने तुम्हें गाने का गुण दिया है और परमेश्वर का घर तुम्हारे लिए गाने की व्यवस्था करता है तो तुम्हें अच्छे से गाना है। अगर तुम्हारे पास सुसमाचार के प्रचार का गुण है, और परमेश्वर का घर तुम्हारे लिए सुसमाचार के प्रचार की व्यवस्था करता है, तो तुम्हें यह अच्छे से करना चाहिए। अगर परमेश्वर के चुने हुए लोग तुम्हें अपना अगुआ चुनते हैं, तो तुम्हें अगुआई का आदेश स्वीकार करना चाहिए और परमेश्वर के चुने हुए लोगों की इस तरह अगुआई करनी चाहिए कि वे परमेश्वर के वचनों को खाएँ और पिएँ, सत्य पर संगति करें और वास्तविकता में प्रवेश करें। ऐसा करके तुमने अपना कर्तव्य अच्छी तरह से निभा लिया होगा। परमेश्वर मनुष्य को जो आदेश देता है वह अत्यंत महत्वपूर्ण और अर्थपूर्ण होता है! तो तुम्हें इस आदेश की जिम्मेदारी किस तरह संभालनी चाहिए और अपनी भूमिका कैसे निभानी चाहिए? ऐसा कहा जा सकता है कि यह तुम्हारे सामने आने वाली सबसे बड़ी समस्याओं में से एक है, यह एक महत्वपूर्ण क्षण है जो यह तय करता है कि क्या तुम सत्य को पा सकते हो और परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जा सकते हो। तुम्हें एक चुनाव करना होगा” (वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, केवल सत्य समझकर ही व्यक्ति परमेश्वर के कर्मों को जान सकता है)। परमेश्वर के वचनों से मैं समझ गया कि परमेश्वर के घर में हम चाहे जो भी कर्तव्य निभाएँ, अंतर केवल कार्य और पद में है। कर्तव्य चाहे जो भी हो, सृजित प्राणियों के रूप में हमारी पहचान और सार नहीं बदलता है। जब नए लोगों को सींचने के लिए मेरी जरूरत होगी, तो मैं सिंचनकर्मी बनूँगा। जब अभिनय के लिए मेरी जरूरत होगी, तो मैं अभिनेता बनूँगा। जब सेट सजाने के लिए मेरी जरूरत होगी, तो मैं सेट ड्रेसर बनूँगा। जब खाना पकाने के लिए मेरी जरूरत होगी, तो मैं एक सहायक कार्यकर्ता बनूँगा। चाहे मेरा कर्तव्य कैसे भी बदले, मैं फिर भी बस एक सृजित प्राणी हूँ। मुझे जो करना चाहिए वह है स्वीकार करना और समर्पण करना, और अपने पूरे दिल और ताकत से अपना कर्तव्य अच्छे ढंग से निभाना। इसके अलावा, जब मैं इन छोटे-मोटे कामों को सँभालता हूँ, तो मेरे भाई-बहनों के पास अपने कर्तव्यों के लिए अधिक ऊर्जा और समय होगा। क्या यह भी मेरा अपनी भूमिका निभाना नहीं है? इसलिए मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की, “हे परमेश्वर! मैं अपनी प्रतिष्ठा और रुतबा छोड़ने और दूसरों से सम्मान चाहना बंद करने के लिए तैयार हूँ। मैं चाहे जो भी कर्तव्य करूँ, मैं समर्पण करने को तैयार हूँ।” तब से, अपना कर्तव्य करते समय, मैंने इस बात की परवाह नहीं की कि दूसरे मेरे बारे में क्या सोचते हैं। बल्कि मैंने अपना दिल हर दिन उन परिवेशों का अनुभव करने में लगाया जिनका इंतजाम परमेश्वर मेरे लिए करता है और मैंने अपने सबक सीखने पर ध्यान केंद्रित किया, मैं इस बात पर चिंतन करता था कि मैंने अपने कर्तव्य में कौन से भ्रष्ट स्वभाव प्रकट किए। कभी-कभी, जब मैं खुद को अनजाने में झूठ बोलते हुए पाता था, तो मैं परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुसार एक ईमानदार व्यक्ति बनने के लिए खुद को प्रशिक्षित करता था। कभी-कभी, जब मैं देखता था कि मैं हमेशा चाहता हूँ कि दूसरे मेरी बात सुनें और मैं उनके सुझावों को स्वीकार नहीं कर पाता था, तो मैं अपने अहंकारी स्वभाव पर चिंतन करता था और उसे जानने की कोशिश करता था। सामान्य मामलों के कर्तव्य में अनेक तुच्छ काम शामिल होते हैं, इसलिए मैं इस बारे में सोचता कि अपने समय का उचित रूप से प्रबंधन कैसे करूँ ताकि मैं उन सबको सँभाल सकूँ। कुछ समय तक खुद को खाना पकाने के लिए प्रशिक्षित करने के बाद, मुझे एहसास हुआ कि मैंने कुछ बुनियादी पाक कौशल में महारत हासिल कर ली है। जब मैंने देखा कि रसोई के कुछ बर्तन बहुत अच्छे से काम नहीं कर रहे थे, तो मैंने उन्हें बेहतर बनाने के लिए कुछ छोटे-मोटे बदलाव किए, और सबने कहा कि वे बहुत बेहतर काम कर रहे थे। बाद में, जब कोई पटकथा मेरे लिए उपयुक्त होती थी, तो निर्देशक मुझसे मुख्य किरदार की भूमिका भी निभवाता था, मुझे प्रशिक्षण के अवसर देता था। मैं अपने दिल में परमेश्वर का बहुत कृतज्ञ था। जब मैंने अपनी मानसिकता पूरी तरह बदल दी और मैं हर मामले के साथ इस नए रवैये से निपटता था तो अब मैं अपने बारे में दूसरों की राय पर विचार नहीं करता था। इसके बजाय, मैं हर काम को तहेदिल से एक जिम्मेदारी के रूप में स्वीकार करता था। इस तरह अभ्यास करने से, मैंने महसूस किया कि मेरा दिल परमेश्वर के और निकट आ गया है। मैंने अपने जीवन प्रवेश और अपने पेशेवर कौशल दोनों में कुछ लाभ पाए, और मैंने अपने दिल में शांति और आनंद की एक विशेष भावना महसूस की। परमेश्वर का धन्यवाद! यह सब परमेश्वर का अनुग्रह और आशीष है!