41. अपने बच्चे की रुचियों और शौकों से कैसे पेश आएँ

वेन नुआन, चीन

बचपन से ही मेरा बेटा काफी कमजोर था और उसका विकास भी धीमा था। हमारा घर स्कूल के पास था, इसलिए मैं उसे दौड़ाने और मजबूत बनाने के लिए अक्सर खेल के मैदान में ले जाती थी। उस समय उस पर एक कोच की नज़र पड़ी। 2020 में मेरे बेटे ने प्राथमिक विद्यालय की तीसरी कक्षा में दाखिला लिया और कोच ने उसे स्कूल की फुटबॉल टीम के लिए चुन लिया। स्कूल के बाद हर दोपहर मेरा बेटा ट्रेनिंग के लिए मैदान में जाता और जब मैंने देखा कि उसके चेहरे पर रंगत आ रही है और उसका शरीर मजबूत हो रहा है, तो मुझे संतोष महसूस हुआ। हर शाम मैं उससे फुटबॉल से जुड़ी बातें सुनती थी। मैदान में अपने बेटे को ट्रेनिंग करते हुए देखने के दौरान मैंने देखा कि कई कोच उस पर खास ध्यान दे रहे थे और उसे अतिरिक्त दाँव-पेंच सिखा रहे थे। कोच मुझसे बहुत विनम्रता से बात करते थे, वे मेरे बेटे की जल्दी समझने की क्षमता, आज्ञाकारिता और सहनशीलता की तारीफ करते थे और वे अक्सर मेरे बेटे को बड़े छात्रों के साथ खेलने देते थे, कहते थे कि वे उसे एक मुख्य खिलाड़ी के रूप में विकसित करना चाहते थे। मुझे बहुत खुशी हुई, मैंने सोचा, “वह वाकई मुझे गौरवान्वित कर रहा है। क्या एक फुटबॉल खिलाड़ी के रूप में उसका सच में कोई भविष्य है?” तब से मैंने अपने बेटे के फुटबॉल के सफर पर पूरा ध्यान देना शुरू कर दिया और अगर मैं अपने कर्तव्यों में बहुत व्यस्त नहीं होती थी तो मैं उसके सारे मैच देखने आती थी, वे चाहे बड़े हों या छोटे। कोच मुझे टीम की किसी भी व्यवस्था के बारे में पहले से बता देते थे और मुझे बहुत गर्व महसूस होता था। मैं दिवास्वप्न देखना शुरू करने से खुद को रोक नहीं पाई, “लगता है कि उसमें सचमुच यह खूबी है। आज के इस बेहद प्रतिस्पर्धी समाज में बिना किसी विशेष कौशल के अपनी जगह बनाना मुश्किल है। मुझे उसे ठीक से विकसित करने और एक स्टार खिलाड़ी बनाने की जरूरत है, फिर जब वह प्रसिद्धि और सफलता हासिल करेगा, तो न केवल वह मुझे गौरवान्वित करेगा, बल्कि मैं भी उसकी दौलत और शोहरत में हिस्सेदार बनूँगी।” 2021 के नए साल के दिन मेरे बेटे की टीम ने जिला चैंपियनशिप जीती। जब उसने चमकती सुनहरी ट्रॉफी को देखा, तो उसने मुझे गले लगाया और खुशी से हँसा। अपनी खुशी में मैं चुपचाप अपने बेटे के फुटबॉल खिलाड़ी के रूप में भविष्य की योजना बना रही थी और मन ही मन सोच रही थी, “अब से मुश्किलों के लिए तैयार हो जाओ। मुझे कठोर होने के लिए दोष मत देना—यह सब तुम्हारी भलाई के लिए है। जब तुम भविष्य में सफल होगे, तब तुम मेरा श्रमसाध्य इरादा समझोगे। यह तो पहले से ही तुम्हारा शौक है और अगर हम तुम्हें ठीक से विकसित नहीं करेंगे तो माता-पिता के तौर पर हम अपनी ज़िम्मेदारी में चूक रहे होंगे।”

इसके बाद मैं अक्सर अपने बेटे को दुनिया भर के स्टार खिलाड़ियों के बेहतरीन प्रदर्शन वाले वीडियो दिखाती थी और मैं उससे कहती थी, “देखो यह स्टार खिलाड़ी कितना प्रभावशाली है? तुम्हें क्या लगता है कि उसकी तरह बनना कैसा लगेगा?” मेरे बेटे को पहले से ही मैच देखना पसंद था और मेरे मार्गदर्शन से वह और भी उत्साही हो गया। अपना होमवर्क पूरा करने के बाद वह स्टार खिलाड़ियों के मैच और इंटरव्यू देखता था। जल्द ही वह विभिन्न देशों के प्रमुख फुटबॉल आयोजनों और सितारों से बहुत परिचित हो गया और वह अक्सर मुझे ये बातें समझाता था। यह देखकर कि मेरा बेटा अब सही रास्ते पर है, मैं उसे थोड़ा और सिखाने लगी, “कोई भी आसानी से सफल नहीं हो सकता। तुम्हें अपने सपने सच करने के लिए मुश्किलें सहनी होंगी।” मेरा बेटा पूरी तरह से सहमत था और उसने शायद ही कभी थकाऊ बुनियादी कौशल अभ्यासों के बारे में शिकायत की। 2021 में पूरी गर्मियों के दौरान मेरा बेटा हर सुबह 5 बजे मैदान में अभ्यास करने जाता था और सुबह 9 बजे से पहले नहीं रुकता था और वह एक भी सत्र नहीं छोड़ता था। एक बार मेरे बेटे को बुखार हो गया था, और उसे इतना कमजोर देखकर मेरा दिल थोड़ा दुख रहा था। लेकिन भविष्य में अपना नाम बनाने में उसकी मदद करने के लिए मैं उसे फिर भी मैदान में ले गई। सप्ताहांत में जब वह ट्रेनिंग के लिए क्लब जाता, तो कभी-कभी वह बहुत थक जाता और एक दिन की छुट्टी लेना चाहता था, लेकिन मैं हमेशा मना कर देती थी। कभी-कभी वह बहुत अनिच्छुक हो जाता था और मैं उसकी मानसिकता बदलने की कोशिश करने के लिए उससे बात करती रहती थी, “तुम्हें लगे रहना होगा ताकि कोच तुम्हारी कड़ी मेहनत देखे। तुम्हारे कौशल में सुधार की जरूरत है ताकि कोच तुम्हें और मैचों में ले जाए। जब तुम मशहूर हो जाओगे, तो एक बेहतर कोच की तुम पर नज़र पड़ेगी और वह तुम्हें और भी बेहतर टीम में ले जाएगा, तब क्या तुम एक स्टार खिलाड़ी बनने के एक कदम और करीब नहीं होओगे?” मेरा बेटा मुझसे बहस नहीं कर पाता था, इसलिए उसे मजबूर होकर ट्रेनिंग करनी पड़ती थी।

बाद में गंभीर महामारी के कारण बड़े पैमाने वाली प्रतियोगिताएँ लगातार दो साल तक रुकी रहीं। मेरे बेटे ने कोई सम्मान नहीं जीता और हम दोनों को अफसोस हुआ, लेकिन मेरे बेटे ने अपनी ट्रेनिंग कभी नहीं रोकी। कड़ाके की ठंड में भी, जब मैदान में कुछ ही लोग होते थे, तब भी वह उनमें दिखाई देता था। लेकिन, मुझे पता ही नहीं चला कि अपने बेटे के साथ मेरा संबंध ठीक कब बदलने लगा। क्योंकि मैं अपने बेटे से नतीजे देखने को उत्सुक थी, घर वापस आने के बाद हर बार जब वह ट्रेनिंग के दिलचस्प पल साझा करना चाहता, मैं अधीरता से उसे बीच में ही टोक देती, “मुझे इन बातों की परवाह नहीं है। मैं तो बस यह जानना चाहती हूँ : क्या तुम जीते? तुमने कितने गोल किए? क्या कोच ने तुम्हारी तारीफ की? क्या तुम अपनी टीम में सबसे मजबूत खिलाड़ी हो?” मेरे सवालों से मेरा बेटा निरुत्तर हो जाता और वह मुझसे पहले जैसा लगाव महसूस नहीं करता था। अगर उसकी टीम जीत जाती तो वह मेरे सामने शेखी बघारता था, लेकिन अगर वह हार जाती थी तो वह ऐसे सिर लटका देता था मानो उसने कुछ गलत कर दिया हो।

2023 में महामारी से जुड़ी पाबंदियाँ हटा दी गईं और विभिन्न प्रतियोगिताएँ तय कार्यक्रम के अनुसार आयोजित की गईं। सप्ताहांत में कोच अक्सर बच्चों को मैचों के लिए दूसरे शहरों में ले जाते थे, और छुट्टियों के दौरान वे बड़ी प्रतियोगिताओं के लिए और दूर के शहरों में जाते थे, यहाँ तक कि वे दूसरे देशों की हमउम्र टीमों के खिलाफ भी खेलते थे। चाहे कितना भी खर्च आए, मैं बढ़-चढ़कर अपने बेटे का नाम लिखवा देती थी, और मैं खुद को दूरदर्शी और एक जिम्मेदार माँ समझती थी। मेरा बेटा जितने ज्यादा पुरस्कार जीतता, मुझे उतना ही ज्यादा गर्व महसूस होता और सभी कोचों, दूसरे माता-पिताओं और अपने दोस्तों और रिश्तेदारों के सामने मेरे मिथ्याभिमान को बहुत संतुष्टि मिलती थी। इस साल मेरे कर्तव्यों ने मुझे बहुत ही व्यस्त रखा, लेकिन ट्रेनिंग में अपने बेटे का साथ देने के लिए मैं अक्सर मैदान के किनारे अपनी कार खड़ी कर देती और उसका इंतजार करते हुए कार में अपने कंप्यूटर पर काम करती थी। चूँकि मुझे अपने बेटे के प्रशिक्षण को देखने के लिए बार-बार गाड़ी से उतरना पड़ता था, मेरे कर्तव्य की कुशलता बहुत कम थी। एक बार मेरे बेटे ने शहर-स्तरीय प्रतियोगिता में भाग लिया और संयोग से उसी समय एक नए सदस्य के साथ संगति भी रखी गई थी। यूँ तो मैं वास्तव में अपने बेटे के मैच में उपस्थित रहना चाहती थी, पर मैं अपने कर्तव्यों की उपेक्षा नहीं कर सकती थी, इसलिए मुझे संगति में जाना पड़ा। लेकिन पूरे रास्ते मेरा मन मैच पर ही लगा हुआ था। मैं सोच रही थी कि क्या मेरा बेटा पूरा मैच खेल पाएगा, या क्या उसकी टीम मैच जीतेगी। जब मैं मेजबान के घर पहुँची, तो मैंने देखा कि नया सदस्य अभी तक नहीं आया था। आम तौर पर मैं चिंतित हो जाती और नए सदस्य से संपर्क करने की कोशिश करती, लेकिन उस दिन मुझे लगा कि यह बहुत अच्छा हुआ कि नया सदस्य नहीं आया, क्योंकि इसका मतलब था कि मैं खेल देखने और अपने बेटे को देखने जा सकती थी। मैंने थोड़ी देर इंतजार किया और चूँकि नया सदस्य अभी भी नहीं आया था, मैं व्यग्र होकर खेल देखने तेजी से निकल पड़ी। मैं ठीक दूसरा हाफ शुरू होते समय वहाँ पहुँची और मैं अपने बेटे की टीम को मैच जीतते देखकर इतनी उत्साहित थी कि मैं नए सदस्य से संपर्क करने के बारे में पूरी तरह से भूल गई।

अक्टूबर 2023 में मेरे बेटे की टीम ने शहर-व्यापी प्रतियोगिता में भाग लिया लेकिन कोई ट्रॉफी नहीं जीती। मैं आग-बबूला हो गई। खास तौर पर जब मैंने अपने बेटे से एक साल छोटी टीम को पुरस्कार जीतते और उन माता-पिता और बच्चों को वीचैट ग्रुप में जश्न मनाते देखा, मैं टूटने की कगार पर पहुँच गई। अतीत में, वे केवल हमसे ईर्ष्या करते थे, लेकिन अब वे वास्तव में जीत गए, जबकि मेरा बेटा खाली हाथ घर आया। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि अपनी शर्मिंदगी का क्या करूँ। घर पहुँचकर मैंने रात का खाना भी नहीं खाया। मैं अपने बेटे पर अपना गुबार निकालती रही, “महामारी ने दो साल तक प्रतियोगिताओं में देरी की, लेकिन मुझे उम्मीद नहीं थी कि इस बार भी तुम्हें कोई नतीजा नहीं मिलेगा। यह सब इसलिए है क्योंकि तुम्हारे कोच ने प्रतियोगिता से पहले तुम सबको ठीक से प्रशिक्षण नहीं दिया। तुम्हारी टीम का एक साथी अहम मौके पर गलती कर बैठा और सबको ले डूबा। और जहाँ तक तुम्हारी बात है, मुझे नहीं लगता कि तुम भी उतने मजबूत थे। अगर तुम होते, तो तुम निश्चित रूप से टीम को अंत तक ले जा सकते थे!” वह मैच हारने के कारण पहले से ही बहुत दुखी था, लेकिन मुझे आपे से बाहर होते देखकर उसने मुझे दिलासा देने की कोशिश की, “माँ, गुस्सा मत हो। हर प्रतियोगिता में हार-जीत तो होती रहती है। हम बस उनकी तरह मजबूत नहीं थे।” अपने बेटे का मासूम चेहरा देखकर, मैं थोड़ी द्रवित हो गई, “यह तो बस एक खेल है; मैं इतना गुस्सा क्यों कर रही हूँ?” मैंने अपने बेटे से प्रोत्साहन के कुछ शब्द कहने के लिए खुद को बाध्य किया। लेकिन अंदर ही अंदर मैं अभी भी परेशान थी और रात 1 बजे तक भी मैं सो नहीं पाई। मुझे लगा कि मेरी दशा ठीक नहीं है, इसलिए मैंने मन ही मन प्रार्थना की, “परमेश्वर, मैं अपनी भावनाओं पर काबू नहीं रख पा रही हूँ। तुम चाहते हो कि हम तुम्हारे वचनों के अनुसार, सत्य को अपनी कसौटी मानकर लोगों और चीजों को देखें और आचरण और कार्य करें। अपने बच्चे को प्रशिक्षित करने के संबंध में मुझे सत्य के किस पहलू में प्रवेश करना चाहिए? कृपया मुझे प्रबुद्ध करो और मार्गदर्शन दो।” प्रार्थना करने के बाद मुझे यह याद आया कि कैसे परमेश्वर ने हमें बताया था कि माता-पिता को अपने बच्चों के प्रति कौन-सी जिम्मेदारियाँ पूरी करनी चाहिए, साथ ही मुझे परमेश्वर के वचनों का एक अंश याद आया : “एक तरह से अपनी जिम्मेदारियों को पूरा करने का मतलब है अपने बच्चों के जीवन की देखभाल करना, वहीं दूसरी तरह से इसका मतलब है अपने बच्चों के विचारों को मार्गदर्शन देना और सुधारना और उन्हें उनके विचारों और दृष्टिकोणों के बारे में सही मार्गदर्शन देना(वचन, खंड 6, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण कैसे करें (18))। परमेश्वर कहता है कि जब हमारे छोटे बच्चों के मन में चरम विचार या दृष्टिकोण हों, माता-पिता के रूप में, हमें उनके विचारों के संबंध में तुरंत उन्हें सलाह देनी चाहिए। यह माता-पिता होने की ज़िम्मेदारी है। उस दिन मेरा बेटा प्रतियोगिता हार गया था, और जब वह घर आया तो यही वह समय होना चाहिए था कि जब वह अपनी भावनाएँ व्यक्त करे और अपने विचार बताए। मुझे उसके विचार सुनने चाहिए थे, उसे सलाह देनी चाहिए थी और उसके गलत दृष्टिकोणों को सुधारने में उसकी मदद करनी चाहिए थी। न सिर्फ मैंने उसे बिल्कुल भी सलाह नहीं दी, बल्कि उसके लिए चीजें और बिगाड़ दीं। मुझमें विवेक की कितनी कमी थी! मैं एक माँ के रूप में मानक स्तर की नहीं थी। मैं कितनी बुरी थी! ये बातें सोचते-सोचते मैं धीरे-धीरे शांत हो गई, और मैंने प्रतियोगिता के नतीजे के बारे में सोचना बंद कर दिया।

बाद में, मैंने इस पर चिंतन किया कि मैं क्यों अपने बच्चे से इतनी सारी माँगें थोपती थी। मैंने परमेश्वर के वचन पढ़े : “माता-पिता की व्यक्तिपरक चेतना के भीतर, उनके पास अपने बच्चों के भविष्य के बारे में सभी प्रकार की धारणाएँ, योजनाएँ और निर्धारण होते हैं, नतीजतन, वे इन उम्मीदों को विकसित करते हैं। इन उम्मीदों से संचालित होकर, माता-पिता अपने बच्चों से अभिनय, नृत्य, चित्रकला और इसी तरह के विभिन्न कौशल सीखने की अपेक्षा करते हैं, यह सोचते हुए कि जब बच्चे प्रतिभाशाली व्यक्ति बन जाएँगे, तब उनके लिए दूसरों के अधीन रहने के बजाय उनसे ऊपर उठना, निम्न-स्तरीय अधीनस्थों के बजाय उच्च-रैंकिंग अधिकारी बनना, प्रबंधक, कार्यकारी और सीईओ बनना, फॉर्च्यून ग्लोबल 500 कंपनियों में काम करना वगैरह आसान हो जाएगा। ये सभी माँ-बाप के व्यक्तिपरक विचार हैं। ... माँ-बाप की ये अपेक्षाएँ किस चीज पर आधारित हैं? वे कहाँ से आती हैं? वे समाज और संसार से आती हैं। माँ-बाप की इन सभी अपेक्षाओं का उद्देश्य बच्चों को सक्षम बनाना है कि वे इस संसार और समाज के अनुकूल हो सकें, संसार और समाज द्वारा छाँटकर निकाले जाने से बच सकेन और समाज में अपना पैर जमाते हुए एक सुरक्षित नौकरी, एक स्थिर परिवार और एक स्थिर भविष्य पा सकें; इसलिए, माँ-बाप अपने बच्चों से विभिन्न व्यक्तिपरक अपेक्षाएँ रखते हैं। उदाहरण के लिए, अभी कंप्यूटर इंजीनियर बनना काफी लोकप्रिय है। कुछ लोग कहते हैं : ‘मेरे बेटे को भविष्य में एक कंप्यूटर इंजीनियर बनना ही चाहिए। इस क्षेत्र में काम करने वाले लोग बहुत पैसा कमा सकते हैं और इससे उनके माता-पिता को भी सम्मान मिलता है!’ जब बच्चों को समाज या काम की पूरी समझ नहीं होती, तो माता-पिता आगे बढ़कर उनके लिए करियर चुनते हैं या भविष्य की योजना बनाते हैं। क्या यह गलत नहीं है? (गलत है।) ये माता-पिता अपनी पसंद और इच्छाओं के अनुसार पूरी तरह से अपने बच्चों पर उम्मीदें थोप रहे हैं। क्या यह व्यक्तिपरक नहीं है? (हाँ।) इसे व्यक्तिपरक कहना तो फिर भी अच्छा है—यह वास्तव में क्या है? इस व्यक्तिपरकता की एक और व्याख्या क्या है? क्या यह स्वार्थ नहीं है? क्या यह जबरदस्ती नहीं है? (हाँ।) तुम्हें एक निश्चित पेशा पसंद है, तुम एक अधिकारी बनना चाहोगे, अमीर बनना चाहोगे, समाज में प्रतिष्ठित और सफल होना चाहोगे, इसलिए तुम अपने बच्चों को भी ऐसा व्यक्ति बनाना और ऐसे रास्ते पर चलाना चाहते हो। लेकिन यह कहना मुश्किल है कि क्या वे भविष्य में वह काम कर पाएँगे या क्या वह काम वास्तव में उनके लिए उपयुक्त है। और फिर, उनकी नियति वास्तव में क्या है? परमेश्वर उन पर कैसे संप्रभु होगा और उनके लिए व्यवस्थाएँ कैसे करेगा? क्या तुम ये बातें जानते हो? कुछ लोग कहते हैं : ‘मुझे उन बातों की परवाह नहीं है। जब तक यह कुछ ऐसा है जो माता या पिता के रूप में मुझे पसंद है, तो यह ठीक है। चूँकि मुझे यह पसंद है, मैं उनसे इस तरह की अपेक्षाएँ रखता हूँ।’ क्या यह बहुत स्वार्थी होना नहीं है? (हाँ।) अच्छे से कहें तो यह बहुत व्यक्तिपरक है, यह केवल खुद की सुनना है, लेकिन यह वास्तव में क्या है? यह बहुत स्वार्थी होना है!(वचन, खंड 6, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण कैसे करें (18))। परमेश्वर के वचनों से मैंने देखा कि माता-पिता अपनी पसंद और समाज की अपनी समझ के आधार पर अपने बच्चों से तरह-तरह की माँगें करते हैं और फिर उनसे इन माँगों के पीछे भागने और इन्हें पूरा करने के लिए कहते हैं। मैंने इसकी रोशनी में खुद को देखा और पाया कि मुझे ऊँचा सम्मान पाना पसंद था और मैं गुमनाम नहीं रहना चाहती थी, इसलिए मैंने उम्मीद की कि मेरा बेटा भी उसी चीज के पीछे भागे। मैंने देखा कि सामाजिक प्रतिस्पर्धा का दबाव बहुत बड़ा है और मेरे बेटे में संयोग से खेल की प्रतिभा है, इसलिए मुझे उम्मीद थी कि वह फुटबॉल के जरिए अपने साथियों के बीच अलग दिखेगा, आखिरकार एक सेलिब्रिटी बनेगा, खूब पैसा कमाएगा और एक बेहतर जीवन जिएगा। इस तरह मुझे भी उसकी सफलता से फायदा होता। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए मैंने अपने बेटे को फुटबॉल खेलने की खुशी से वंचित रखा और अपनी इच्छा के अनुसार मैंने उसे एक स्टार खिलाड़ी बनने की आकांक्षा के पीछे भागने के लिए मजबूर किया। भीषण गर्मी या ठंड की परवाह किए बिना और चाहे वह शारीरिक रूप से इसे सह सकता था या नहीं, मैंने उसे ट्रेनिंग करते रहने के लिए मजबूर किया। धीरे-धीरे मेरा बेटा जीत-हार और सम्मान पर बहुत ज्यादा ध्यान देने लगा, और वह अपनी उपलब्धियों के कारण घमंडी और आत्म-संतुष्ट भी हो गया। सतह पर तो ऐसा लगता था कि मैं यह सब अपने बेटे की भलाई के लिए कर रही हूँ, लेकिन असल में मैं फुटबॉल में उसकी सफलता का इस्तेमाल अपनी स्वार्थी इच्छाओं को पूरा करने और प्रशंसा पाने व धन-दौलत का आनंद लेने की अपनी इच्छा पूरी करने के लिए करना चाहती थी। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि मेरे बेटे से मेरी उम्मीदें और माँगें पूरी तरह से मेरी अपनी व्यक्तिपरक इच्छाओं से प्रेरित थीं। मेरा बेटा अभी भी छोटा था और मशहूर होने या बहुत पैसा कमाने के विचार को समझता भी नहीं था, लेकिन मैंने ये चीजें उस पर थोप दीं और उसे मजबूर किया कि वह मेरी योजना पर चले। मैं इतनी स्वार्थी थी! मेरा बेटा क्या नौकरी करता है और वह भविष्य में किस तरह का इंसान बनता है, यह सब परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्थाओं के अधीन है। अपनी इच्छा के अनुसार अपने बेटे के जीवन की योजना बनाकर, क्या मैं परमेश्वर की संप्रभुता से मुक्त होने की कोशिश नहीं कर रही थी?

बाद में मैंने खोजा, “मैं हमेशा अपने बेटे से अपनी माँगें पूरी करने की उम्मीद क्यों करती हूँ?” जब मैंने परमेश्वर के वचन पढ़े तो मेरा दिल थोड़ा-सा और रोशन हो गया। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “वास्तव में, मनुष्य की आकांक्षाएँ चाहे कितनी भी बड़ी क्यों न हों, उसकी इच्छाएँ चाहे कितनी भी यथार्थपरक क्यों न हों या वे कितनी भी उचित क्यों न हों, वह सब जो मनुष्य हासिल करना चाहता है और वह सब जो मनुष्य खोजता है, वह अटूट रूप से दो शब्दों से जुड़ा है। ये दो शब्द हर व्यक्ति के लिए उसके संपूर्ण जीवन में अत्यंत महत्वपूर्ण हैं, और ये ऐसी चीजें हैं जिन्हें शैतान मनुष्य के भीतर बैठाना चाहता है। वे दो शब्द कौन-से हैं? वे हैं ‘प्रसिद्धि’ और ‘लाभ।’ शैतान एक बहुत ही सौम्य तरीका चुनता है, एक ऐसा तरीका जो मनुष्य की धारणाओं के बहुत ही अनुरूप है और जो बहुत आक्रामक नहीं है, ताकि वह लोगों से अनजाने में ही जीवित रहने के अपने साधन और नियम स्वीकार करवा ले, जीवन लक्ष्य और जीवन की दिशाएँ विकसित करवा ले और जीवन की आकांक्षाएँ रखवाने लगे। अपने जीवन की आकांक्षाओं के बारे में लोगों के वर्णन कितने ही आडंबरपूर्ण क्यों न लगते हों, ये आकांक्षाएँ हमेशा ‘प्रसिद्धि’ और ‘लाभ’ के इर्द-गिर्द घूमती हैं। कोई भी महान या प्रसिद्ध व्यक्ति—या वास्तव में कोई भी व्यक्ति—जीवन भर जिन सारी चीजों का पीछा करता है वे केवल इन दो शब्दों से जुड़ी होती हैं : ‘प्रसिद्धि’ और ‘लाभ।’ लोगों को लगता है कि एक बार उनके पास प्रसिद्धि और लाभ आ जाए तो उनके पास ऊँचे रुतबे और अपार धन-संपत्ति का आनंद लेने और जीवन का आनंद लेने के लिए पूँजी आ जाती है। उन्हें लगता है कि एक बार उनके पास प्रसिद्धि और लाभ आ जाए तो उनके पास वह पूँजी होती है जिसका इस्तेमाल वे सुख खोजने और देह के उच्छृंखल आनंद में लिप्त रहने के लिए कर सकते हैं। लोग जिस प्रसिद्धि और लाभ की कामना करते हैं उसकी खातिर वे खुशी से और अनजाने में, अपने शरीर, दिल और यहाँ तक कि अपनी संभावनाओं और नियतियों समेत वह सब जो उनके पास है, शैतान को सौंप देते हैं। वे ऐसा बिना किसी हिचकिचाहट के करते हैं, बिना एक पल के संदेह के करते हैं और उनके पास कभी जो कुछ था उसे वापस लेने की जागरूकता के बिना करते हैं। लोग जब इस प्रकार खुद को शैतान को सौंप देते हैं और उसके प्रति वफादार हो जाते हैं तो क्या वे खुद पर कोई नियंत्रण बनाए रख सकते हैं? कदापि नहीं। वे पूरी तरह से और शत-प्रतिशत शैतान से नियंत्रित होते हैं। वे पूरी तरह से और सर्वथा इस दलदल में धँस जाते हैं और अपने आप को मुक्त कराने में असमर्थ रहते हैं। जब कोई प्रसिद्धि और लाभ की दलदल में फँस जाता है तो फिर वह कभी उसे नहीं खोजता जो उजला है, जो न्यायोचित है या वे चीजें नहीं खोजता जो खूबसूरत और अच्छी हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि लोगों के लिए प्रसिद्धि और लाभ का प्रलोभन बहुत बड़ा होता है और ये ऐसी चीजें हैं जिनका अनुसरण लोग अंतहीन ढंग से अपने पूरे जीवन भर और यहाँ तक कि अनंत काल तक कर सकते हैं। क्या यह असली स्थिति नहीं है?(वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI)। जब मैंने परमेश्वर के वचन पढ़े, मैं समझ गई कि अपने बच्चे से मेरी ऐसी उम्मीदों की वजह यह थी कि मैंने प्रसिद्धि और लाभ के अनुसरण को अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया था। बचपन से ही मैंने इन शैतानी कहावतों को जीने के सिद्धांत मान लिया था : “आदमी ऊपर की ओर जाने के लिए संघर्ष करता है; पानी नीचे की ओर बहता है,” “भीड़ से ऊपर उठो और अपने पूर्वजों का नाम करो,” और “सबसे महान इंसान बनने के लिए व्यक्ति को सबसे बड़ी कठिनाइयाँ सहनी होंगी।” मैं अपना पूरा ध्यान पढ़ाई और परीक्षाएँ उत्तीर्ण करने पर लगाती थी। हर बार जब मैं कोई लक्ष्य हासिल करती और दूसरे मेरी तारीफ करते, तो मेरी उपलब्धियों के कारण मेरे माता-पिता से भी रिश्तेदार, दोस्त और पड़ोसी ईर्ष्या करने लगते थे और मुझे लगता था कि मैंने चाहे कितना भी कष्ट सहा हो, यह सार्थक था। काम शुरू करने के बाद तरक्की पाने, वेतन बढ़वाने और सबसे अलग दिखने के लिए मेरे पास अपने वरिष्ठों की चापलूसी करने के अलावा कोई विकल्प नहीं था। मैं अपने सहकर्मियों से निपटते समय एक आवरण ओढ़े रहती थी और मैं ऐसी चीजें कहती थी जो मेरी सच्ची भावनाओं के खिलाफ होती थीं। मेरा परिवार यह देखकर बहुत खुश था कि मैं बड़े शहर में काम कर रही थी और हर महीने घर पैसे भेज रही थी, और मुझे भी बहुत गर्व महसूस होता था। लेकिन असल में, मैं जिस तरह का जीवन जी रही थी, उससे बहुत पहले ही तंग आ चुकी थी। प्रसिद्धि और लाभ की दुनिया में मैंने अपनी सत्यनिष्ठा और गरिमा खो दी, मैं अंदर से एकाकी और खाली महसूस करती थी और मेरे पास कोई ऐसा नहीं था जिसके साथ मैं अपनी सच्ची भावनाएँ साझा कर सकूँ। जब मैंने इस्तीफा दे दिया तो उसके बाद मैं बहुत सारे सालों तक उस समय के बारे में सोचना नहीं चाहती थी। सर्वशक्तिमान परमेश्वर का अंत के दिनों का कार्य स्वीकार करने के बाद मैं कलीसिया में अपना कर्तव्य निभाने लगी, जिसने मुझे अपने दिल में शांति और सहजता महसूस होने दी और मुझे प्रसिद्धि और लाभ के लिए होड़ की झगड़ालू और कपटी दुनिया से दूर रहने दिया। मुझे लगता था कि मैं प्रसिद्धि और लाभ के अनुसरण को पहले ही छोड़ चुकी हूँ, लेकिन अप्रत्याशित रूप से, जब मेरे बच्चे के फुटबॉल खेलने की बात आई, तो मैंने फिर से प्रसिद्धि और लाभ का अनुसरण शुरू कर दिया। मैं अपने बच्चे को एक स्टार खिलाड़ी के रूप में विकसित करना चाहती थी ताकि मैं भी गौरव का आनंद ले सकूँ। मेरी आशा का सार यह था कि मैं चाहती थी कि मेरा बच्चा भी मेरी तरह प्रसिद्धि, लाभ और रुतबे का अनुसरण करे। मैदान में मेरा बच्चा अपने विरोधियों से स्पर्धा कर रहा था; मैदान के बाहर मैं दूसरे माता-पिताओं से स्पर्धा कर रही थी। हम यह देखने के लिए मुकाबला कर रहे थे कि कौन अपने बच्चे को बेहतर ढंग से विकसित कर सकता है और किसका बच्चा उन्हें ज्यादा गौरव दिला सकता है। मैंने यह भी कल्पना की कि मेरे बेटे के मशहूर होने के बाद मैं उसके साथ धन, रुतबा और गौरव का आनंद ले सकती हूँ। मैंने देखा कि मैं जिस लक्ष्य का पीछा कर रही थी, वह बिल्कुल भी नहीं बदला था। अपने बेटे के साथ मैचों में जाने के वर्षों के दौरान मैंने देखा कि प्रतिस्पर्धी खेल पूरी तरह से प्रसिद्धि और लाभ के बारे में हैं। भले ही प्रतिभाशाली खिलाड़ी प्रयास से अच्छे नतीजे हासिल कर लें, इस प्रक्रिया में वे जो मानसिक और शारीरिक कष्ट सहते हैं वह एक ऐसी चीज है जिसे आम लोग सहन नहीं कर सकते हैं। इसके अलावा ये क्षणिक उपलब्धियाँ तेजी से फीकी पड़ जाती हैं और कोई मायने नहीं रखती हैं। यहाँ तक कि वे स्टार खिलाड़ी भी, जिनके पास प्रसिद्धि और लाभ दोनों हैं, बुढ़ापे, बीमारी और मृत्यु से नहीं बच सकते, और जीवन में कठिनाइयों का सामना करते हैं। प्रसिद्धि और लाभ बुढ़ापे या बीमारी को नहीं रोक सकते, न ही वे किसी व्यक्ति के जीवन को बढ़ा सकते हैं। भले ही मैंने अपने बेटे को एक स्टार खिलाड़ी के रूप में विकसित कर लिया, तो भी इसकी क्या तुक होगी? क्या तब भी वह मेरी तरह शैतान की यंत्रणा नहीं सह रहा होगा? तब जाकर मैंने यह देखा कि अपने बच्चे को प्रसिद्धि और लाभ के अनुसरण के रास्ते पर ले जाना उसे आग के गड्ढे में धकेलने जैसा था। मेरा बेटा साफ तौर पर बस एक साधारण बच्चा था जिसे फुटबॉल खेलना पसंद था और मैं ही थी जो प्रसिद्धि और लाभ से अंधी हो गई थी। मैंने खुद ही अपने बेटे पर प्रसिद्धि और लाभ की बेड़ियाँ डाल दीं।

बाद में परमेश्वर के वचनों को खाने और पीने से मैं इस मसले को और स्पष्ट रूप से देख पाई। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “अगर माँ-बाप अपनी जिम्मेदारियाँ पूरी करना चाहते हैं तो उन्हें अपने बच्चों के व्यक्तित्व, स्वभाव, रुचियों, काबिलियत और उनकी मानवता की जरूरतों को समझने की कोशिश करनी चाहिए, न कि उन्हें प्रसिद्धि, लाभ और धन के अपने अनुसरणों को अपने बच्चों के लिए अपेक्षाओं में तब्दील करना चाहिए, उन्हें प्रसिद्धि, लाभ और संसार की ये चीजें अपने बच्चों पर नहीं थोपनी चाहिए। माँ-बाप इन चीजों को ‘अपने बच्चों से की जाने वाली अपेक्षाएँ’ जैसे मधुर नाम से बुलाते हैं, मगर वास्तव में ऐसा कुछ भी नहीं है। यह स्पष्ट है कि वे अपने बच्चों को आग के कुंड में धकेलने की कोशिश कर रहे हैं और दानवों के हाथों में सौंप देना चाहते हैं(वचन, खंड 6, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण कैसे करें (18))। “भविष्य में उनके बच्चे जो मार्ग अपनाएँगे या जो करियर अपनाएँगे, उस संबंध में माता-पिता को अपने बच्चों में ऐसी बातें नहीं डालनी चाहिए जैसे, ‘उस पियानोवादक, फलाँ-फलाँ को देखो। उसने चार या पाँच साल की उम्र में पियानो बजाना शुरू कर दिया था। उसने कभी खेलने में समय बर्बाद नहीं किया, कोई दोस्त नहीं बनाया, बस हर दिन पियानो का अभ्यास किया और पियानो की कक्षाओं में गया। उसने विभिन्न शिक्षकों से भी सलाह ली और विभिन्न पियानो प्रतियोगिताओं में भाग लिया। देखो अब वह कितना प्रसिद्ध व्यक्ति है, अच्छा खाता-पहनता है, एक विशिष्टता के प्रभामंडल से घिरा हुआ है और जहाँ भी जाता है सम्मान प्राप्त करता है।’ क्या यह उस तरह की शिक्षा है जो एक बच्चे के मन के स्वस्थ विकास को बढ़ावा देती है? (नहीं, यह नहीं है।) तो फिर, यह किस तरह की शिक्षा है? यह एक शैतानी शिक्षा है। इस प्रकार की शिक्षा किसी भी बाल मन के लिए हानिकारक है। यह उन्हें प्रसिद्धि के लिए आकांक्षा करने, विशिष्टता के विभिन्न प्रभामंडलों और प्रतिष्ठा, रुतबे और सुख के लिए ललचाने को प्रोत्साहित करती है। यह उनसे छोटी उम्र से ही इन चीजों के लिए लालसा रखवाती और इनका अनुसरण करवाती है, यह उन्हें व्याकुलता, तीव्र आशंका और चिंता में झोंक देती है, और यहाँ तक कि इन्हें पाने के लिए हर तरह की कीमत चुकाने का कारण बनती है, अपना स्कूली कार्य करने और विभिन्न कौशल सीखने के लिए सुबह जल्दी उठने और देर रात तक जागते रहने को मजबूर करती है, जिससे वे बचपन के वर्ष गँवा देते हैं, और इन चीजों के लिए उन बेशकीमती वर्षों का सौदा कर देते हैं(वचन, खंड 6, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण कैसे करें (19))। परमेश्वर के वचनों से मैंने देखा कि माता-पिता प्रसिद्धि और लाभ के अपने अनुसरण को अपने बच्चों पर थोप देते हैं और यह बच्चों के लालन-पालन और शिक्षा की पूरी प्रक्रिया के दौरान मौजूद रहता है। यह बच्चों के शरीर और मन को नुकसान पहुँचाता है और असल में, उन्हें दानव की बाहों में धकेलता है। मैंने सोचा कि कैसे मेरा बेटा एक बेफ़िक्र बचपन जी रहा था, लेकिन मैंने उसे लगभग छह या सात साल की उम्र से ही एक स्टार खिलाड़ी बनने और प्रसिद्धि और दौलत का पीछा करने के लिए मजबूर किया। ये बातें उसकी उम्र में मानसिक रूप से सहन करने की उसकी क्षमता से परे थीं। लेकिन मैंने फिर भी जबरदस्ती ये विचार उसके मन में डाले और उससे माँग की कि वह प्रशिक्षण जारी रखे, भले ही वह थका हुआ या बीमार हो। फुटबॉल मेरे बेटे के लिए सिर्फ एक रुचि या शौक से कहीं ज्यादा बन गया था और उस पर मेरी तरफ से बहुत ज्यादा दबाव डाला गया था। मैंने अपने बच्चे को जीत-हार, सफलता-असफलता की परवाह करने के लिए मजबूर किया, उसे अपने साथियों से मुकाबला करने के लिए मजबूर किया, और मैंने उसे कड़ी ट्रेनिंग करने के लिए मजबूर किया ताकि और कोच उस पर ध्यान दें। इस समय तक मेरा बेटा जब भी कोई खेल जीतता या कोई सम्मान पाता तो वह अहंकारी और असहनीय रूप से ढीठ बन जाता और जब दूसरे बेहतर प्रदर्शन करते और उन पर ध्यान दिया जाता तो वह हतोत्साहित और ईर्ष्यालु हो जाता। मेरे बेटे ने वह मासूमियत खो दी जो उसकी उम्र में होनी चाहिए थी, और यह सब मेरी अपनी इच्छाओं को उस पर थोपने का परिणाम था। बहुत सारे वर्षों तक परमेश्वर में विश्वास करने के बाद भी मैं प्रसिद्धि और लाभ से लोगों को होने वाले नुकसान को नहीं देख सकी। मैंने तो अपने बच्चे को भी प्रसिद्धि और लाभ का अनुसरण करना सिखाया, और इस प्रक्रिया में अपने कर्तव्यों में देरी की। मैंने अपने उचित कार्य की वास्तव में अनदेखी की थी! मुझे बहुत पछतावा हुआ और मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की, “परमेश्वर, मैं सत्य को नहीं समझती हूँ। मैं एक माँ के रूप में मानक स्तर की भी नहीं हूँ। मुझे अपने बच्चे को कैसे शिक्षित करना चाहिए और मुझे उसकी रुचियों और शौकों से कैसे पेश आना चाहिए? कृपया मुझे प्रबुद्ध करो और मार्गदर्शन दो।”

बाद में मुझे परमेश्वर के वचनों में अभ्यास का मार्ग मिला। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “जब माँ-बाप अपने बच्चों पर तमाम तरह की अपेक्षाएँ और माँगें थोपते हैं तो वे उन पर बहुत ही ज्यादा अतिरिक्त दबाव डाल देते हैं—यह उनके द्वारा अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन नहीं है। तो वे कौन-सी जिम्मेदारियाँ हैं जो माता-पिता को निभानी चाहिए? उन्हें कम से कम अपने बच्चों को ऐसे ईमानदार लोग होना सिखाना चाहिए जो सत्य बोलते हों और ईमानदार ढंग से चीजें करते हों और उन्हें दयालु होना और खराब चीजें न करना सिखाना चाहिए, उन्हें एक सकारात्मक दिशा में मार्गदर्शन देना चाहिए। ये उनकी सबसे बुनियादी जिम्मेदारियाँ हैं। इसके अलावा उन्हें अपने बच्चों की काबिलियत और परिस्थितियों के अनुसार उनका मार्गदर्शन व्यावहारिक ज्ञान, कौशल आदि के अध्ययन में करना चाहिए। अगर माता-पिता परमेश्वर में विश्वास रखते हैं और सत्य को समझते हैं तो उन्हें अपने बच्चों से परमेश्वर के वचन पढ़वाने चाहिए और सत्य स्वीकार कराना चाहिए ताकि वे सृष्टिकर्ता को जान सकें और यह समझ सकें कि लोग परमेश्वर द्वारा रचे गए हैं और परमेश्वर इस ब्रह्मांड में विद्यमान है; उन्हें परमेश्वर से प्रार्थना करने और परमेश्वर के वचन खाने-पीने में अपने बच्चों का मार्गदर्शन करना चाहिए ताकि वे कुछ सत्यों को समझ सकें, ताकि जब वे बड़े हों तो वे परमेश्वर में विश्वास कर लें, परमेश्वर का अनुसरण करें और एक सृजित प्राणी के रूप में अपना कर्तव्य निभा सकें, न कि सांसारिक प्रवृत्तियों का पीछा करें, विभिन्न जटिल अंतरवैयक्तिक संबंधों में फँस जाएँ और इस संसार की विभिन्न बुरी प्रवृत्तियों द्वारा बहकाए जाएँ, भ्रष्ट और नष्ट किए जाएँ। वास्तव में यही वे जिम्मेदारियाँ हैं जो माता-पिता को पूरी करनी चाहिए। माता-पिता के रूप में उन्हें ये जिम्मेदारियाँ निभानी चाहिए कि वे अपने बच्चों के बालिग होने से पहले उन्हें सकारात्मक मार्गदर्शन और उपयुक्त सहायता प्रदान करें, साथ ही उनके दैनिक जीवन की आवश्यकताओं के संबंध में उनकी शारीरिक देखभाल भी समय पर करें। अगर बच्चे बीमार हो जाते हैं तो उनके माता-पिता को जरूरत के अनुसार उनका इलाज करवाना चाहिए; यह सोचकर कि बच्चों के स्कूली कार्य में देरी होगी, उन्हें बच्चों को स्कूल नहीं भेजते रहने चाहिए और इलाज टालते नहीं रहना चाहिए। जब बच्चों को स्वास्थ्य लाभ करने की जरूरत हो तो उन्हें स्वास्थ्य लाभ करने देना चाहिए और जब उन्हें आराम की जरूरत हो तो उन्हें आराम करने देना चाहिए। अपने बच्चों का स्वास्थ्य सुनिश्चित करना अनिवार्य है; यदि बच्चे स्कूली कार्य में पीछे रह जाते हैं तो माता-पिता इसकी भरपाई का उपाय बाद में कर सकते हैं। ये वे जिम्मेदारियाँ हैं जो माता-पिता को अच्छे से निभानी चाहिए। एक ओर उन्हें ठोस ज्ञान प्राप्त करने में अपने बच्चों की जरूर मदद करनी चाहिए; दूसरी ओर उन्हें अपने बच्चों का मार्गदर्शन और उन्हें शिक्षित जरूर करना चाहिए ताकि वे सही मार्ग पर चलें और उन्हें उनका मानसिक स्वास्थ्य सुनिश्चित करना चाहिए ताकि वे समाज की अस्वस्थ प्रवृत्तियों और बुरी प्रथाओं से प्रभावित न हों। साथ ही उन्हें यह भी जरूर सुनिश्चित करना चाहिए कि उनके बच्चे उचित रूप से व्यायाम करें ताकि उनका शारीरिक स्वास्थ्य बना रहे। यही वे चीजें हैं जो माता-पिता को करनी चाहिए, बजाय इसके कि वे अपने बच्चों पर जबरन कोई अव्यावहारिक अपेक्षाएँ या माँगें थोपें। जब यह बात आती है कि बच्चों को अपनी आत्मा के लिए भी और अपने शारीरिक जीवन में भी किन चीजों की जरूरत है तो माता-पिता को अपनी जिम्मेदारियाँ पूरी करनी चाहिए। उन्हें अपने बच्चों को कुछ सामान्य जानकारी भी देनी चाहिए, जैसे उन्हें ठंडा नहीं, गरम आहार लेना चाहिए, जब मौसम सर्द हो तो उन्हें गरम कपड़े पहनने चाहिए ताकि सर्दी-जुकाम न हो और उन्हें अपनी सेहत की देखभाल करना सिखाना चाहिए। इसके अलावा, जब बच्चों के मन में भविष्य को लेकर कुछ बचकाने, अपरिपक्व ख्याल आते हैं या कोई अतिवादी विचार उत्पन्न होता है तो यह पता चलते ही माता-पिता को उन्हें तुरंत सही मार्गदर्शन देना चाहिए, इन बचकानी फंतासियों और अतिवादी चीजों को दुरुस्त करना चाहिए ताकि उनके बच्चे जीवन में सही मार्ग पर चल सकें। यह अपनी जिम्मेदारियाँ पूरी करना है। एक तरह से अपनी जिम्मेदारियों को पूरा करने का मतलब है अपने बच्चों के जीवन की देखभाल करना, वहीं दूसरी तरह से इसका मतलब है अपने बच्चों के विचारों को मार्गदर्शन देना और सुधारना और उन्हें उनके विचारों और दृष्टिकोणों के बारे में सही मार्गदर्शन देना(वचन, खंड 6, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण कैसे करें (18))। परमेश्वर के वचनों से मैंने देखा कि माता-पिता की अपने छोटे बच्चों के प्रति ज़िम्मेदारी में एक तरफ तो उनकी शारीरिक ज़रूरतों का ख्याल रखना और यह सुनिश्चित करना शामिल है कि वे स्वस्थ रूप से बड़े हों, और दूसरी तरफ बच्चों से अधिक संवाद करना, समय पर उन्हें परामर्श देना और उनके मनोवैज्ञानिक मसलों को हल करना शामिल है। इससे भी बेहतर है अपने बच्चों को परमेश्वर के सामने लाना। लोगों को सच में परमेश्वर के वचनों की ही ज़रूरत है। वह हमें व्यावहारिक रूप से सिखाता है कि हम कैसे आचरण करें और अपने बच्चों से कैसे पेश आएँ। मैं इतने सालों से माँ थी, और मुझे पता ही नहीं था कि अपने बच्चे के लिए सबसे अच्छा करने का असली मतलब क्या है। इस बिंदु पर, मुझे एहसास हुआ कि परमेश्वर के वचनों के अनुसार चलकर ही मैं वास्तव में एक अभिभावक के रूप में अपनी जिम्मेदारियाँ पूरी कर सकती हूँ, और इससे मेरा बच्चा भी स्वस्थ रूप से बड़ा हो सकता है। इन बातों का एहसास होने पर, मैंने अपने बच्चे को प्रशिक्षण और विभिन्न प्रतियोगिताओं में भाग लेने के लिए मजबूर करना बंद कर दिया, बल्कि मैंने उसकी इच्छाओं का सम्मान किया। साथ ही, मैंने उससे बात करते हुए कहा, “हम तुम्हें एक स्टार खिलाड़ी बनाने की कोशिश नहीं करेंगे। चूँकि तुम्हें फुटबॉल खेलना पसंद है, तो बस खेलने का मज़ा लेने पर ध्यान दो।” यह सुनकर वह हैरान भी हुआ और खुश भी। मैंने भी खुद को काफी अधिक सहज स्थिति में महसूस किया। उसके बाद, जब मेरा बेटा प्रशिक्षण या प्रतियोगिताओं में जाता, तो मैं उसे सब कुछ खुद ही सँभालने देती थी। मैं अपने कर्तव्यों पर ध्यान केंद्रित करने के लिए शांत हो गई और उन बातों की चिंता करना बंद कर दिया। मई 2024 में, जब प्राथमिक विद्यालय का ग्रेजुएशन नज़दीक आ रहा था, मेरे बेटे का एक मैच था। यह देखकर कि प्रतिस्पर्धी टीमें मजबूत थीं, मुझे कड़ी प्रतिस्पर्धा की चिंता हुई, इसलिए मैंने उसे भाग न लेने का सुझाव दिया। लेकिन मेरे बेटे ने जाने की ज़िद की। नतीजतन, उसके टीम के साथियों की गलतियों के कारण उनकी टीम ने दो गोल खा लिए, और अंतिम पेनल्टी शूटआउट में, घबराहट के कारण मेरे बेटे से भी एक गोल छूट गया। वह थोड़ा परेशान था और उसे पछतावा हो रहा था, लेकिन मैंने उसे धैर्यपूर्वक सलाह दी और प्रोत्साहित किया कि वह इस मामले का सामना शांत होकर करे। यह सुनने के बाद मेरे बेटे को बहुत राहत महसूस हुई। आम तौर पर, मैं अपने बेटे को परमेश्वर के कार्य की गवाही भी देती थी। मैंने उससे इस बारे में बात की कि कैसे इंसान को परमेश्वर ने बनाया और कैसे शैतान लोगों को भ्रष्ट करता है। मेरे बेटे को बहुत दिलचस्पी हुई और वह समझ पा रहा था। मैं अक्सर अपने बच्चे को सिखाती थी कि वह कठिनाइयों का सामना करते समय परमेश्वर पर निर्भर रहे और अपने शब्दों और कार्यों में ईमानदार रहे, और झूठ न बोले, धोखा न दे, या बुरे काम न करे।

प्रसिद्धि और लाभ की इच्छा अभी भी कभी-कभी मेरे दिल में उठती थी, और खासकर जब मैं देखती थी कि दूसरों के बच्चे कुछ रुचियों या शौकों में सफलता हासिल कर रहे हैं, मैं खुद को बेचैन पाती थी। लेकिन अब मैं अपनी इच्छाएँ अपने बच्चे पर नहीं थोपती थी। एक शाम मुझे परमेश्वर के वचनों का एक अंश मिला। यह कुछ ऐसा था जिसकी मेरे बेटे और मुझे दोनों को जरूरत थी, इसलिए मैंने उसे अपने साथ इस अंश को पढ़ने के लिए बुलाया। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “परमेश्वर द्वारा तुम्हें कोई विशेष रुचि, शौक या खूबी दिए जाने का यह मतलब नहीं है कि परमेश्वर को तुमसे तुम्हारी रुचि, शौक या खूबी से संबंधित कोई कर्तव्य या कार्य करवाना ही पड़ेगा। कुछ लोग कहते हैं, ‘चूँकि मुझे इस क्षेत्र में कोई कर्तव्य करने या इससे संबंधित कार्य करने के लिए नहीं कहा गया है, तो फिर मुझे ऐसी रुचि, शौक या खूबी क्यों दी गई?’ परमेश्वर ने ज्यादातर लोगों को हर व्यक्ति की विभिन्न स्थितियों के आधार पर कुछ रुचियाँ और शौक दिए हैं। यकीनन ऐसी बहुत-सी चीजें हैं जिन्हें ध्यान में रखा जाता है : एक बात तो यह है कि यह लोगों की आजीविका और उत्तरजीविता के लिए है; दूसरी बात यह है कि यह लोगों के जीवन को समृद्ध बनाने के लिए है। कभी-कभी व्यक्ति के जीवन में कुछ विशेष रुचियाँ और शौक जरूरी होते हैं, वे चाहे मनोरंजन और मनबहलाव के लिए हों या इसलिए हों ताकि वह कुछ उचित काम कर सके जिससे उसका मानव जीवन सार्थक हो जाए। यकीनन इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि इसे किस पहलू से देखा जाता है, परमेश्वर द्वारा दिए जाने के पीछे कोई कारण होता है और नहीं देने के लिए भी परमेश्वर के अपने कारण और आधार होते हैं। हो सकता है कि तुम्हारे मानव जीवन या तुम्हारी उत्तरजीविता के लिए यह जरूरी न हो कि परमेश्वर तुम्हें रुचियाँ, शौक और खूबियाँ दे, और तुम दूसरे साधनों से अपनी आजीविका बनाए रख सकते हो या अपने मानव जीवन को समृद्ध और सार्थक बना सकते हो। संक्षेप में, चाहे परमेश्वर ने लोगों को रुचियाँ, शौक और खूबियाँ दी हों या न दी हों, यह खुद लोगों के साथ कोई मुद्दा नहीं है। अगर किसी व्यक्ति के पास खूबियाँ न भी हो, तो भी यह उसकी मानवता का दोष नहीं है। लोगों को इसे सही ढंग से समझना चाहिए और इससे सही ढंग से पेश आना चाहिए। अगर व्यक्ति के पास कुछ विशेष रुचियाँ, शौक और खूबियाँ हैं तो उसे उन्हें सँजोना चाहिए और उनका सही ढंग से उपयोग करना चाहिए; अगर उसके पास ये नहीं हैं तो उसे शिकायत नहीं करनी चाहिए(वचन, खंड 7, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण कैसे करें (12))। मैंने परमेश्वर के वचनों से देखा कि परमेश्वर लोगों को रुचियाँ और शौक देता है, ताकि एक तरफ तो वे मानव जीवन को समृद्ध करें और दूसरी तरफ वे लोगों को उनके ज़रिए अपनी रोज़ी-रोटी कमाने का मौका दें। लेकिन कोई आखिर में अपनी रुचि या शौक से जुड़े क्षेत्र में काम कर पाएगा या नहीं, यह परमेश्वर की पूर्वनियति पर निर्भर करता है। मैंने अपने बेटे के साथ अपनी इस समझ पर संगति की कि रुचियों और शौकों से कैसे पेश आना चाहिए। मेरे बेटे ने कहा, “परमेश्वर का धन्यवाद कि उसने मुझे फुटबॉल खेलना पसंद करने दिया। इससे मुझे बहुत खुशी मिली है, लेकिन क्या मैं भविष्य में फुटबॉल से जुड़ी किसी नौकरी में काम कर पाऊँगा या अपनी आजीविका कैसे कमाऊँगा, यह परमेश्वर के विधानों पर ही निर्भर करता है।” मैंने कहा, “तुम्हारी बात सही है। केवल परमेश्वर के वचन ही सत्य हैं और हमें इस मामले को इसी तरह समझना चाहिए।” मुझे लगता है कि परमेश्वर में विश्वास करना कितना अद्भुत है। परमेश्वर के वचन सत्य हैं और वे हमें सभी चीजों में अभ्यास के सिद्धांत प्रदान करते हैं, हमें अनुसरण करने का मार्ग देते हैं और हमारे दिलों को स्वतंत्रता और मुक्ति भी प्रदान करते हैं।

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