69. “बुढ़ापे में अपनी देखभाल के लिए बच्चे पालो”—क्या यह नजरिया सही है?
जब मैं बच्ची थी तो अक्सर अपने पिता को यह कहते हुए सुनती थी, “तुम्हारे दूसरे चाचा माँ-बाप की सेवा नहीं करते और तुम्हारे दादाजी को सहारा नहीं देते। यह मैं और तुम्हारी माँ थे जिन्होंने तुम्हारे दादाजी को सहारा दिया। बच्चों को पालने का मकसद यही होता है कि वे बुढ़ापे में माँ-बाप की देखभाल करें। भविष्य में, तुम्हें हमारी देखभाल करनी होगी और जीवन के अंत तक हमारा साथ निभाना होगा!” जब मैं बड़ी हुई तो मैंने अपने माता-पिता की मृत्यु तक उनकी देखभाल की। मुझे भी उम्मीद थी कि मेरी बेटी बुढ़ापे में मेरी देखभाल कर सकेगी। जब मेरी बेटी ने बोलना सीखा तो मैंने उससे पूछा, “बड़ी होकर तुम अपने पैसे किस पर खर्च करोगी?” मेरी बेटी ने कहा, “जब मैं बड़ी हो जाऊँगी तो मैं मम्मी और पापा पर खर्च करने के लिए ढेर सारे पैसे कमाऊँगी।” मैंने खुशी से कहा, “मेरी प्यारी बेटी, तुम्हारी माँ ने तुम्हें बेकार ही नहीं पाला है!” मेरी बेटी बहुत होशियार है। वह कोई भी चीज जल्दी सीख लेती है और हमेशा अपनी परीक्षाओं में शीर्ष छात्रों में आती है। मैं बहुत खुश थी और मैंने मन ही मन सोचा, “मेरी बेटी इतनी होशियार है और उसका भविष्य निश्चित रूप से उज्ज्वल होगा। भले ही मेरे पास पैसे न हों, मुझे उसे पढ़ाने के लिए आर्थिक सहारा देना होगा, ताकि कॉलेज से स्नातक होने के बाद उसे अच्छी नौकरी मिल जाए। तब उसे बुढ़ापे में हमारी देखभाल करने में कोई समस्या नहीं होगी।”
अप्रैल 2003 में, मुझे परमेश्वर में विश्वास करने और सुसमाचार का प्रचार करने के लिए गिरफ्तार कर लिया गया और 25 दिनों तक हिरासत में रखा गया। पुलिस द्वारा दोबारा गिरफ्तार किए जाने से बचने के लिए, मैं नवंबर में दूसरी जगह अपने कर्तव्य निभाने के लिए घर से निकल गई। उस समय मैं बहुत उलझन में थी, “मेरी बेटी छह महीने में कॉलेज प्रवेश परीक्षा देगी। अगर मैं इस समय चली गई तो क्या मेरी बेटी की पढ़ाई पर असर पड़ेगा? अगर इससे उसकी कॉलेज प्रवेश परीक्षा पर असर पड़ा और उसके भविष्य में बाधा आती है तो क्या वह मुझसे नफरत करने लगेगी? क्या वह मुझे अपनी माँ मानने से इनकार कर देगी? मेरी केवल एक ही बेटी है और अगर वह मुझे अपनी माँ के रूप में न चाहे तो मैं बुढ़ापे में किस पर निर्भर रहूँगी? लेकिन अगर मैं नहीं जाती और मुझे फिर से गिरफ्तार कर लिया गया तो मेरी बेटी पक्का इसमें फँस जाएगी और उसका भविष्य पूरी तरह बर्बाद हो जाएगा। मुझे सजा भी होगी और तब मैं अपने कर्तव्य नहीं निभा पाऊँगी।” काफी सोच-विचार के बाद, मैंने घर छोड़ने का फैसला किया। चूँकि पुलिस मुझे लगातार ढूँढ़ रही थी, इसलिए मैं घर जाने की हिम्मत नहीं कर पाई।
जैसे-जैसे मेरी उम्र बढ़ती गई, मेरी ऊर्जा और शारीरिक ताकत कम होने लगी थी और मेरा रक्तचाप उच्च रहने लगा था। मेरी आँखों की रोशनी धुंधली हो गई और मुझे टिनिटस और कम सुनाई देने की समस्या हो गई। जब भी मैं कोई शारीरिक काम करती तो मेरा दिल भी जोर से धड़कने लगता, इसलिए मुझे थोड़ी देर लेटकर आराम करना पड़ता था। मैंने मन ही मन सोचा, “क्या अब मैं बूढ़ी हो रही हूँ? बुढ़ापे में मेरी देखभाल कौन करेगा?” इस समय, मुझे अपनी बेटी की बहुत याद आई और मैंने सोचा, “मैं अब भी बुढ़ापे में उस पर निर्भर रहने की उम्मीद कर रही हूँ!” 2021 में, मैं सुसमाचार का प्रचार करने के लिए अपनी बड़ी बहन के घर वापस गई और पता चला कि मेरी बेटी घर से दूर काम कर रही है, और अपनी मौसियों के प्रति भी संतानोचित होना है। मैंने सोचा कि अगर ऐसा है तो वह पक्का मेरे साथ भी अच्छी तरह पेश आएगी, मैं एक दिन अपनी बेटी को देखने का वाकई इंतजार कर रही थी। अगले साल अगस्त के अंत में, मैं घर से दूर सुसमाचार का प्रचार कर रही थी जब मेरी बहन ने पत्र लिखकर बताया कि मेरी बेटी कुछ दिनों के लिए वापस आई है। मैं रातों-रात भागती हुई अपनी बहन के घर गई, लेकिन मेरी बेटी मुझसे मिलना नहीं चाहती थी। मुझे बहुत बुरा लगा, लेकिन मैं अपनी बेटी की भावनाओं को समझ सकती थी। आखिरकार, मैंने सत्रह साल से उसकी देखभाल नहीं की थी, इसलिए उसका गुस्सा होना स्वाभाविक था। बाद में, जब मैंने अपनी बेटी को देखा तो मैं इतनी खुश हुई कि मैं उसे गले लगाना चाहती थी, लेकिन वह मुझसे बहुत दूर बैठ गई और निराशा से मेरा दिल ठंडा पड़ गया। थोड़ी देर बाद, मैंने उससे कहा, “मैं इन सभी वर्षों में तुम्हारी चिंता करती रही हूँ। मुझे डर था कि पुलिस मुझे गिरफ्तार कर लेगी और तुम इसमें फँस जाओगी, इसलिए मैं घर जाने की हिम्मत नहीं कर पाई। तुमने इन सभी वर्षों में बहुत कष्ट सहे हैं।” उसने कड़वाहट से कहा, “मैंने कष्ट नहीं सहे। मैं अब बालिग हूँ। मैं कष्ट नहीं सह रही हूँ!” यह कहकर उसने मुँह मोड़ लिया और आधे घंटे से भी कम समय रुककर चली गई। मैं पूरी तरह निराश हो गई, “मैंने तुम्हें पालने के लिए बहुत मेहनत की और तुम्हारी बहुत देखभाल की। तुम्हारे स्कूल जाने के बाद, तुम एक हुनर सीख सको और तुम्हारा अच्छा भविष्य हो इसके लिए मैंने हमारे परिवार के पास बचे आखिरी तीन हजार युआन तुम्हारे लिए इलेक्ट्रॉनिक कीबोर्ड खरीदने में खर्च दिए। मैंने तुम्हारे लिए अपना खून-पसीना एक कर दिया, लेकिन अब तुमने मुझे ठुकरा दिया है? मैंने वास्तव में तुम्हें व्यर्थ ही पाला!” मैंने सोचा, “मेरा घरेलू पंजीकरण चीनी कम्युनिस्ट सरकार द्वारा रद्द कर दिया गया है, मेरे पति ने मुझे तलाक दे दिया है और मेरी बेटी ने मुझे अपनाने से इनकार कर दिया है। मैं अब साठ साल की हूँ और मेरी सेहत हर साल खराब होती जा रही है। जब मैं बूढ़ी हो जाऊँगी तो मैं क्या करूँगी? बीमार पड़ने पर मेरी देखभाल कौन करेगा? बुढ़ापे में मेरी देखभाल कौन करेगा और मुझे अंतिम विदाई कौन देगा?” रात में, मैं बिस्तर पर करवटें बदलती रही, मुझे नींद नहीं आ रही थी। जब मैंने सोचा कि कैसे मेरी बेटी ने मुझे “माँ” तक नहीं कहा तो मुझे एहसास हुआ कि बुढ़ापे में देखभाल के लिए उस पर निर्भर रहने की कोई उम्मीद नहीं है। मुझे इतना बुरा लगा जैसे मेरा दिल कुचला जा रहा हो। उन दिनों मैं बहुत बदहवास सी हो गई थी, मुझमें अपना कर्तव्य करने की प्रेरणा नहीं थी और सुसमाचार का प्रचार करते समय मैं बस बेमन से काम कर रही थी।
फरवरी 2023 में, मैंने सुना कि बहन सन जिंग बीमार पड़ गई थी, लेकिन उसके पति ने बहुत सावधानी और ध्यान से उसकी देखभाल की थी। मैंने मन ही मन सोचा, “जब मेरी बहन बीमार होती है तो उसका पति उसकी देखभाल करता है। अगर मैं बीमार हो जाऊँ तो मुझे क्या करना चाहिए? मेरी बेटी ने मुझे ठुकरा दिया है, अगर मैं हिलने-डुलने में असमर्थ हो गई तो मेरी कलीसियाई बहनों के लिए मेरी देखभाल करना कितनी शर्मिंदगी की बात होगी। मैं अपने भाई-बहनों पर बोझ नहीं बन सकती! इसके अलावा, मैं अकेली रहती हूँ, अगर मुझे कुछ हो गया तो किसी को पता भी नहीं चलेगा। क्या होगा अगर मैं समय पर अस्पताल नहीं पहुँच पाई और घर पर ही मर गई?” बुढ़ापे में देखभाल करने और अंतिम विदाई देने वाला कोई न होने के बारे में झुंझलाने और चिंता करने से मैं खुद को न रोक सकी। एक दिन अपनी भक्ति के दौरान, मैंने परमेश्वर के वचन पढ़े और अपनी दशा के बारे में कुछ समझ हासिल की। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “एक माता-पिता के रूप में, क्या अपने बच्चों पर थोड़ी उम्मीद रखना, यह आशा करना कि वे बड़े होने पर तुम्हारे प्रति कर्तव्यपरायण होंगे और तुम्हारा सहारा बन सकेंगे, एक गलती है? यह कोई गलती नहीं है और यह बहुत ज्यादा अपेक्षा करना भी नहीं है। तो यहाँ समस्या क्या है? यह महिला लगातार एक अच्छा जीवन जीने के लिए अपने बच्चों का सहारा लेना चाहती थी, अपने जीवन के उत्तरार्ध के लिए उन पर निर्भर रहना चाहती थी और वह हमेशा उनसे सुख पाने की उम्मीद करती थी। यहाँ कौन-सा गलत दृष्टिकोण काम कर रहा है? उसके मन में यह विचार क्यों आया? उसके इस दृष्टिकोण का स्रोत क्या था? लोग हमेशा एक निश्चित जीवन-शैली और एक निश्चित जीवन-स्तर के लिए बड़ी-बड़ी उम्मीदें पालते हैं। कहने का मतलब यह है कि इससे पहले कि लोग यह जानें कि परमेश्वर ने उनके जीवन को कैसे पूर्वनियत किया है या उनकी नियति क्या है, वे पहले से ही अपने जीवन-स्तर की योजना बना लेते हैं : उन्हें खुश रहना चाहिए, जीवन भर शांति और आनंद का अनुभव करना चाहिए, अमीर और प्रतिष्ठित होना चाहिए और उनके पास ऐसे लोग होने चाहिए जो उनकी मदद कर सकें और जिन पर वे निर्भर रह सकें। उन्होंने पहले से ही अपने जीवन का मार्ग, अपने जीवन के लक्ष्य, अपने जीवन का अंतिम पड़ाव और ऐसी अन्य सभी चीजों की योजना बना ली है। ... यह देखते हुए कि उसकी लगातार यह इच्छा और ये योजनाएँ थीं, क्या उसके दिल में परमेश्वर था? (नहीं।) तो एक निश्चित अर्थ में, उसके सभी संघर्षों से उत्पन्न पीड़ा का कारण क्या था? (यह उसकी इच्छा के कारण हुआ था।) यह सच है। और उसकी इच्छा कैसे उत्पन्न हुई? (परमेश्वर की संप्रभुता या उसके आयोजनों और व्यवस्थाओं में विश्वास न रखने के कारण।) सही है। वह नहीं समझती थी कि लोगों की नियति का स्रोत क्या है, न ही वह यह समझती थी कि परमेश्वर की संप्रभुता कैसे कार्य करती है। यही समस्या की जड़ है” (वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, अपनी धारणाओं का समाधान करके ही व्यक्ति परमेश्वर पर विश्वास के सही मार्ग पर चल सकता है (2))। परमेश्वर ने जो उजागर किया वह बिल्कुल मेरी ही दशा थी। जब मैं अपना कर्तव्य निभाने के लिए घर से निकली थी, तब मैं चालीस से थोड़ी ही ज्यादा की थी और क्योंकि उस समय मैं जवान और मजबूत थी, इसलिए मैंने यह नहीं सोचा कि बूढ़ी होने पर मैं क्या करूँगी। अब जब मेरी उम्र बढ़ रही है, मेरी सेहत साल-दर-साल खराब हो रही है और भविष्य को लेकर बहुत सारी चिंताएँ उभर आई हैं। मुझे चिंता थी कि अगर मैं बीमार पड़ गई और अपनी देखभाल नहीं कर सकी तो मेरी देखभाल करने वाला कोई नहीं होगा—मैं क्या करूँगी? घर से दूर रहने के दौरान मेरा घरेलू पंजीकरण रद्द कर दिया गया था और मेरे पति ने मुझे तलाक दे दिया था। पहले तो मैंने सोचा था कि चूँकि मेरी बेटी अपनी मौसियों का बहुत खयाल रखती है, इसलिए वह निश्चित रूप से मेरे साथ भी दयालु रहेगी। लेकिन मुझे उम्मीद नहीं थी कि मेरी बेटी मुझे ठुकरा देगी और बुढ़ापे में मेरी देखभाल करने की कोई उम्मीद नहीं बचेगी। मैंने देखा कि मैं अपनी बेटी पर निर्भर नहीं रह सकती, इसलिए मुझे चिंता हुई कि अगर मैं भविष्य में बीमार पड़ गई तो मेरी देखभाल करने वाला कोई नहीं होगा और मैं घर पर ही मर जाऊँगी और कोई ध्यान भी नहीं देगा। विशेष रूप से, जब मैंने सुना कि सन जिंग बीमार है और उसका पति उसकी देखभाल कर रहा है, तो मुझे और भी अकेला और दयनीय महसूस हुआ और जब मैंने सोचा कि भविष्य में मेरे जीवन में ऐसा कोई नहीं है जिस पर मैं भरोसा कर सकूँ तो मुझे दुख हुआ। मैं कहती थी कि परमेश्वर हर चीज पर संप्रभु है, लेकिन वास्तव में, मुझे परमेश्वर की संप्रभुता की कोई समझ नहीं थी और मेरे दिल में परमेश्वर के लिए कोई जगह नहीं थी। मैं हमेशा यही सोचती रहती थी कि अपने लिए कोई रास्ता कैसे निकालूँ और अपनी बेटी को अपना सहारा तक मानती थी। परमेश्वर में मेरी कोई आस्था नहीं थी। अगर मैंने इसका समाधान नहीं किया तो यह दशा बहुत खतरनाक होगी।
बाद में, मैंने विचार किया, “मुझे इस बात की इतनी परवाह क्यों है कि बुढ़ापे में मेरी देखभाल करने वाला कोई हो और मेरे मरने के समय कोई मेरे साथ हो? समस्या क्या है?” मैंने परमेश्वर के वचन पढ़े : “कुछ लोग एक सड़ी-गली और पुरानी धारणा से चिपके रहते हैं, कहते हैं, ‘वास्तव में इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि लोगों के बच्चे बुढ़ापे में उनके प्रति संतानोचित हों और उनकी देखभाल करें या नहीं, लेकिन कम से कम, जब वे मरें तो शोक-संस्कार शुरू करने के लिए कोई होना चाहिए ताकि यह दूसरों को मर्यादित लगे। अन्यथा, यदि वे घर पर मर जाएँ और किसी को पता न चले, तो लोग हँसेंगे और यह बहुत ही दयनीय होगा!’ तो क्या हुआ अगर किसी को पता नहीं चलता? जब कोई व्यक्ति मर जाता है तो उसे और कुछ भी पता नहीं चलता है। जब उसका शरीर मर जाता है, तो उसकी आत्मा तुरंत इसे छोड़ देती है। मृत्यु के बाद शरीर चाहे जहाँ भी हो, या जैसा भी दिखे, वह तो मृत ही रहेगा ना? भले ही इसे शानदार अंत्येष्टि के लिए ताबूत में ले जाया जाए, जमीन में पहुँचकर शव तो सड़ेगा ही, है कि नहीं? लोग सोचते हैं, ‘तुम्हें ताबूत में रखने के लिए बच्चों का तुम्हारे साथ होना, तुम्हें कफन पहनाना, तुम्हारा मेकअप करना और शानदार अंत्येष्टि की व्यवस्था करना एक गौरवशाली बात है। अगर तुम मर जाओ और कोई तुम्हारी अंत्येष्टि या तुम्हें एक उचित अंतिम विदाई की व्यवस्था न करे तो यूँ लगेगा मानो तुम्हारे संपूर्ण जीवन का उचित समापन नहीं हुआ है।’ क्या यह विचार सही है? (नहीं, यह सही नहीं है।) आजकल, युवा लोग इन बातों पर ज्यादा ध्यान नहीं देते हैं, लेकिन दूर-दराज के इलाकों में अभी भी ऐसे लोग और कम समझ वाले बुजुर्ग लोग हैं जो मानते हैं कि बच्चों को बुढ़ापे में अपने माता-पिता की देखभाल करनी चाहिए और उनके मरने पर उन्हें उचित विदाई देनी चाहिए। यह विचार और दृष्टिकोण उनके दिलों में गहराई से बैठा हुआ है, और चाहे तुम सत्य के बारे में कैसे भी संगति करो, वे इसे स्वीकार नहीं करते—इसका अंतिम परिणाम क्या है? परिणाम यह है कि वे इससे बहुत अधिक नुकसान उठाते हैं। यह रसौली लंबे समय से उनके अंदर छिपी हुई है, और यह उन्हें विषाक्त कर देगी। जब वे इसे निकाल देंगे और हटा देंगे, तो वे इससे अब विषाक्त नहीं होंगे, और उनका जीवन मुक्त हो जाएगा। कोई भी गलत क्रियाकलाप बेहूदे विचारों और दृष्टिकोणों के मार्गदर्शन से होता है। उदाहरण के लिए, ऐसे लोग हैं जो मरने के बाद अपने घर में सड़ने से डरते हैं, इसलिए वे हमेशा सोचते रहते हैं, ‘मुझे एक बेटा पालना है। जब मेरा बेटा बड़ा हो जाएगा, तो मैं उसे बहुत दूर नहीं जाने दे सकता। क्या होगा अगर मैं मरूँ तो वह मेरे पास न हो? बुढ़ापे में मेरी देखभाल करने वाला या मेरे मरने पर मुझे उचित विदाई देने वाला कोई न होना मेरे जीवन के सबसे बड़े पछतावों में से एक होगा! अगर मेरे लिए यह करने वाला कोई हुआ, तो मेरा जीवन व्यर्थ नहीं जाएगा। यह एक आदर्श जीवन होगा। चाहे कुछ भी हो, मैं हँसी का पात्र नहीं बन सकता हूँ।’ क्या यह सोचने का एक सड़ा-गला तरीका नहीं है? (हाँ, है।) यह बासी और पतित है, भौतिक शरीर को बहुत अधिक महत्व देता है! वास्तव में, भौतिक शरीर बेकार है : जन्म, बुढ़ापा, बीमारी और मृत्यु का अनुभव करने के बाद कुछ भी नहीं बचता है। केवल यदि तुमने जीवित रहते हुए सत्य प्राप्त कर लिया है और उद्धार पा लिया है, तभी तुम हमेशा के लिए जी सकते हो। अगर तुमने सत्य प्राप्त नहीं किया है, तो तुम्हारे शरीर के मर जाने और नष्ट हो जाने के बाद कुछ भी नहीं बचेगा; तुम्हारे बच्चे तुम्हारे प्रति चाहे जितने भी संतानोचित निष्ठा रखते हों, तुम इसका आनंद नहीं ले पाओगे। जब कोई व्यक्ति मर जाता है और उसके बच्चे उसके शव को ताबूत में रख कर दफना देते हैं, तो क्या वह बूढ़ा शव कुछ महसूस कर सकेगा? क्या यह कोई चीज महसूस कर सकता है? (नहीं, यह ऐसा नहीं कर सकता है।) उसमें लेश मात्र भी अनुभूति नहीं होती। लेकिन जीवन में, लोग इस मामले को बहुत महत्त्व देते हैं, अपने बच्चों से इस अर्थ में बहुत-सी माँगें करते हैं कि क्या वे उन्हें उचित विदाई दे सकेंगे—जोकि मूर्खता है, है कि नहीं? ... यदि तुम सत्य का अनुसरण करते हो, तो माता-पिता के रूप में, तुम्हें सबसे पहले उन पारंपरिक, सड़े-गले, और पतित विचारों और दृष्टिकोणों को छोड़ देना चाहिए जो इस बारे में हैं कि बच्चे संतानोचित हैं या नहीं, बुढ़ापे में तुम्हारी देखभाल करते हैं या नहीं, और तुम्हारे मरने पर तुम्हें उचित विदाई देते हैं या नहीं, और इस मामले को सही ढंग से अपनाना चाहिए। यदि तुम्हारे बच्चे वास्तव में तुम्हारे प्रति संतानोचित हैं, तो इसे ठीक से स्वीकार करो। लेकिन यदि तुम्हारे बच्चों के पास तुम्हारे प्रति संतानोचित होने की स्थितियाँ या ऊर्जा नहीं है या वे तुम्हारे प्रति संतानोचित होने की नहीं सोचते हैं और वे तुम्हारे बुढ़ापे में तुम्हारे पास रहकर तुम्हारी देखभाल नहीं कर सकते या तुम्हारे मरने पर तुम्हें उचित विदाई नहीं दे सकते हैं, तो तुम्हें इसकी माँग करने या दुखी महसूस करने की आवश्यकता नहीं है। सब कुछ परमेश्वर के हाथों में है। जन्म का अपना समय होता है, मृत्यु का अपना स्थान होता है; लोग कहाँ जन्म लेंगे और कहाँ उनकी मृत्यु होगी, यह परमेश्वर द्वारा नियत है” (वचन, खंड 6, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण कैसे करें (19))। परमेश्वर के वचनों ने जो उजागर किया, वह बिल्कुल मेरी ही दशा थी। मुझे हमेशा चिंता रहती थी कि बूढ़ी होने पर मेरी देखभाल करने वाला कोई नहीं होगा या मेरे मरने के समय कोई नहीं होगा, अगर मैं मर गई और किसी को पता नहीं चला और मेरा शरीर घर पर ही सड़ता रहा, तो क्या होगा। यह सोचकर मैं नकारात्मक और कमजोर हो गई और दुख और चिंता में जीने लगी। वास्तव में, मेरे जन्म का समय, मेरी मृत्यु का समय और मेरी मृत्यु का स्थान, सब परमेश्वर द्वारा पूर्वनियत किया गया है। मेरे जीवन के अंत में मेरी बेटी वहाँ आ पाएगी या नहीं, यह परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्था पर निर्भर करता है। मैं चिंता और दुख में इसलिए जी रही थी क्योंकि मैं अपनी देह को बहुत अधिक सँजोती थी और मैं गहराई से यह नहीं समझ पा रही थी कि देह के मरने का वास्तव में क्या अर्थ है। परमेश्वर कहता है : “वास्तव में, भौतिक शरीर बेकार है : जन्म, बुढ़ापा, बीमारी और मृत्यु का अनुभव करने के बाद कुछ भी नहीं बचता है।” जब देह मर जाती है तो उसमें कोई चेतना नहीं होती। भले ही कोई तुम्हें अंतिम विदाई दे और ताबूत में दफना दे, तब भी क्या तुम्हारी देह सड़ेगी नहीं? तो क्या हुआ अगर तुम्हारे बच्चे तुम्हें कब्र तक अंतिम विदाई देने के लिए वहाँ मौजूद हों? क्या तुम्हें इसका पता चलेगा? फिर भी मैं इस मामले को बहुत महत्वपूर्ण मानती थी। क्या यह बहुत मूर्खतापूर्ण नहीं था? वास्तव में, यदि लोग सत्य प्राप्त नहीं करते हैं तो भले ही उनका अंतिम संस्कार भव्य हो, उनकी आत्मा को बचाया नहीं जा सकता और वे नरक में भी जाएँगे। परमेश्वर कहता है : “केवल यदि तुमने जीवित रहते हुए सत्य प्राप्त कर लिया है और उद्धार पा लिया है, तभी तुम हमेशा के लिए जी सकते हो।” केवल सत्य प्राप्त करके, अपने शैतानी भ्रष्ट स्वभावों को त्यागकर और एक सृजित प्राणी के कर्तव्यों को अच्छी तरह से निभाकर ही हम अनंत जीवन पा सकते हैं और उद्धार प्राप्त कर सकते हैं और परमेश्वर द्वारा एक अद्भुत गंतव्य तक ले जाए जा सकते हैं।
मैंने परमेश्वर के वचनों का एक और अंश पढ़ा और परमेश्वर की संप्रभुता के बारे में कुछ समझ हासिल की। मेरा दुख और चिंता भी कुछ हद तक दूर हो गई। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “माता-पिता और उनके बच्चों के बीच कितना जुड़ाव है, वे अपने बच्चों से कितना प्रतिफल प्राप्त कर सकते हैं, क्या वे अपनी वृद्धावस्था में अपनी देखभाल के लिए अपने बच्चों पर निर्भर रह सकते हैं—सादे शब्दों में कहें तो यह सब परमेश्वर द्वारा पूर्वनिर्धारित और पूर्वनियत है। ऐसा नहीं है कि सब कुछ ठीक वैसा ही होता है जैसा लोग अपने दिमाग में चाहते हैं। बेशक, हर कोई चीजों की बहुत अच्छी कल्पना करता है और अपने बच्चों से कुछ लाभ प्राप्त करना चाहता है। लेकिन तुमने कभी यह क्यों नहीं सोचा कि क्या यह तुम्हारी नियति में लिखा है? तुम्हारा अपने बच्चों के साथ का बंधन कब तक चलेगा, यह अहम है। क्या इस जीवन में तुम जो भी काम करोगे उसका संबंध तुम्हारे बच्चों से होगा, क्या जब तुम किसी बड़ी घटना का अनुभव करोगे तो तुम्हारे बच्चे उसमें शामिल लोगों में से होंगे—यह सब परमेश्वर की पूर्वनियति पर निर्भर करता है। परमेश्वर की पूर्वनियति के बिना, तुम चाहे कितनी भी मेहनत करो, उसका कोई फायदा नहीं होगा। जब तुम अपने बच्चों को बालिग होने तक पाल लोगे, तो तुम्हारी ज़िम्मेदारी पूरी हो चुकी होगी और तुम्हारे बच्चे स्वाभाविक रूप से उस समय चले जाएँगे जब उन्हें जाना चाहिए। यह कुछ ऐसा है जिसकी असलियत लोगों को देख पाने की जरूरत है। यदि तुम इस मामले की असलियत नहीं देख सकते हो तो तुम्हारे पास हमेशा व्यक्तिगत इच्छाएँ होंगी और हमेशा व्यक्तिगत माँगें होंगी, और तुम अपने उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए विभिन्न प्रकार के विचारों और दृष्टिकोणों को स्वीकार करोगे। अंत में क्या होगा? तुम केवल अपनी मृत्युशय्या पर जागोगे, और महसूस करोगे कि तुमने अपने जीवनकाल में बहुत-सी मूर्खतापूर्ण चीजें की हैं, और तुमने केवल धारणाओं और कल्पनाओं के सहारे कार्य किया है, और तुम बहुत ही मूर्ख और अज्ञानी रहे हो; यह बस वास्तविक स्थिति या परमेश्वर की पूर्वनियतियों के अनुरूप नहीं है” (वचन, खंड 6, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण कैसे करें (19))। परमेश्वर के वचन बहुत स्पष्ट हैं। क्या मेरी बेटी संतानोचित है, क्या वह बुढ़ापे में मेरी देखभाल कर सकती है और अंत में मेरे साथ रह सकती है, यह इस पर निर्भर करता है कि मेरा भाग्य वैसा है या नहीं। यदि परमेश्वर ने मेरी बेटी के लिए ऐसा करना पहले से नियत नहीं किया है तो चाहे मेरी कल्पनाएँ कितनी भी बढ़िया क्यों न हों, सब व्यर्थ होगा। भले ही मेरी बेटी ने ऐसा करने का वादा किया हो, चूँकि वह हजारों मील दूर काम करती है और रहती है, तो जब मैं बीमार पड़ूँगी और मरूँगी तो शायद वह मेरे पास आ ही न पाए। मैं इसकी असलियत नहीं जान पा रही थी और दुख में जी रही थी क्योंकि मेरी बेटी ने मुझे नजरअंदाज कर दिया था और इस बात की कोई उम्मीद नहीं थी कि वह बुढ़ापे में मेरी देखभाल करेगी और मेरे अंतिम क्षणों में मेरे साथ होगी। मैं खुद को मूर्ख बनाती रही थी और अपना समय बकवास पर बर्बाद कर रही थी। मुझे याद आया कि हमारे पड़ोस के गाँव में एक बूढ़ी औरत थी। जब वह अस्सी साल के ऊपर हो गई थी तो वह अपनी देखभाल नहीं कर सकती थी, लेकिन उसके तीन बेटों में से किसी ने भी उसकी देखभाल नहीं की। वह बूढ़ी औरत भूख से मर गई और उसे अंतिम विदाई देने के लिए कोई भी नहीं था। मैंने एक बड़ी बहन के बारे में भी सोचा जिसकी बेटी विदेश में रहने चली गई और कभी वापस नहीं आई। अब वह बड़ी बहन और उसका पति दोनों सत्तर साल के ऊपर हैं। जब भी वे बीमार पड़ते हैं तो उनका भतीजा उन्हें जाँच के लिए अस्पताल ले जाता है और वे अब भी बहुत अच्छा जीवन जी रहे हैं। प्रत्येक व्यक्ति का जीवन परमेश्वर द्वारा पूर्वनियत और व्यवस्थित होता है। मुझे अपने से जुड़ी हर चीज परमेश्वर को सौंपनी चाहिए और उसके आयोजनों के प्रति समर्पित होना चाहिए। मुझे अब अपने बुढ़ापे की चिंता नहीं करनी चाहिए।
मैंने खोजना जारी रखा और परमेश्वर के और वचन पढ़े : “बच्चों को पालना एक मानवीय सहजप्रवृत्ति है और यह मनुष्यों की एक जिम्मेदारी और दायित्व भी है। माता-पिता को अपने बच्चों से यह अपेक्षा नहीं करनी चाहिए कि वे उनके प्रति संतानोचित हों, न ही उन्हें केवल इसलिए बच्चे पैदा करने चाहिए ताकि बुढ़ापे में उनका कोई सहारा हो। लोगों का बच्चों को पालने का लक्ष्य ही अनुचित है, इसलिए जब उनके बच्चे असंतानोचित होते हैं, तो वे ऐसी हास्यास्पद बातें कहेंगे जैसे, ‘चाहे कुछ भी करो, बच्चे मत पालो।’ चूँकि लक्ष्य अशुद्ध है, इसलिए जो विचार और दृष्टिकोण वे विकसित करते हैं वे भी गलत होते हैं। इसलिए क्या उन्हें दुरुस्त करने और त्याग देने की जरूरत नहीं है? (हाँ।) व्यक्ति को उन्हें कैसे दुरुस्त करना और त्याग देना चाहिए? किस प्रकार का लक्ष्य शुद्ध होता है? कैसा विचार और नजरिया सही होता है? दूसरे शब्दों में, बच्चों से अपने रिश्ते को किस तरह सँभालना सही है? पहली बात तो यह है कि बच्चों को पाल-पोसकर बड़ा करने का विकल्प तुमने खुद चुना है : तुम स्वेच्छा से उन्हें इस दुनिया में लाए और तुमने स्वेच्छा से उन्हें पाल-पोसकर बड़ा किया, उन्होंने जन्म लेने में कोई पहल नहीं की थी। परमेश्वर द्वारा मनुष्य को दी गई संतान को जन्म देने की जिम्मेदारी के अलावा, और परमेश्वर द्वारा नियत किए जाने के अलावा, जो लोग माता-पिता हैं उनका व्यक्तिपरक कारण और आरंभ बिंदु यह है कि वे अपने बच्चों को जन्म देने के इच्छुक होते हैं। चूँकि तुम बच्चे पैदा करने के इच्छुक हो, तो तुम्हें उन्हें वयस्क होने तक पालना-पोसना चाहिए, उन्हें स्वतंत्र रूप से जीने में सक्षम बनाना चाहिए। तुम उन्हें पालकर पहले ही बहुत कुछ हासिल कर चुके हो और बहुत लाभ उठा चुके हो। सबसे पहले, तुमने अपने बच्चों के साथ रहने का एक आनंदमय समय बिताया है और तुमने उन्हें पालने की प्रक्रिया का भी आनंद लिया है। यूँ तो इस प्रक्रिया में अपने सुख और कष्ट रहे हैं, लेकिन तुमने अधिकांशतः अपने बच्चों के साथ रहने और उनके द्वारा साथ दिए जाने की खुशी का अनुभव किया है। यह भी जीवन का अनुभव करने की एक प्रक्रिया है। तुमने इन चीजों का आनंद लिया है, और तुम अपने बच्चों से पहले ही बहुत कुछ हासिल कर चुके हो, क्या यह सही नहीं है? बच्चे अपने माता-पिता के लिए खुशी और साथ लेकर आते हैं, और माता-पिता अपने बच्चों को पालने में जो कीमत चुकाते हैं और जो समय और ऊर्जा खपाते हैं, उसके माध्यम से वे इन छोटी-सी जानों को धीरे-धीरे वयस्क होते हुए देखते हैं। नासमझ नन्हें जीवनों के रूप में शुरू होकर जो कतई कुछ भी नहीं जानते, उनके बच्चे धीरे-धीरे सोचना सीखते हैं, बोलना सीखते हैं, शब्दों को जोड़ने की क्षमता, विभिन्न प्रकार के ज्ञान को सीखने और उनमें अंतर करने की क्षमता, और उनके साथ बातचीत और संवाद करने और मामलों को बराबरी के रुख से देखने की क्षमता प्राप्त करते हैं। माता-पिता के लिए, इस प्रक्रिया से गुजरना सबसे खुशी की बात है, और इसे किसी अन्य घटना या व्यक्ति द्वारा प्रतिस्थापित नहीं किया जा सकता है। माता-पिता अपने बच्चों को पालने की प्रक्रिया में उनसे पहले ही बहुत आनंद और समझ प्राप्त कर चुके हैं, जो उनके लिए एक बड़ी सांत्वना और लाभ है। जहाँ तक इस बात का सवाल है कि तुम्हारे बच्चे तुम्हारे प्रति संतानोचित होंगे या नहीं, क्या तुम किसी भी चीज के लिए उन पर निर्भर रह सकते हो, और तुम उनसे क्या प्राप्त कर सकते हो, ये चीजें इस बात पर निर्भर करती हैं कि क्या तुम लोगों का एक साथ रहना किस्मत में है, और यह परमेश्वर के पूर्वनियत करने पर निर्भर करता है। दूसरी ओर, तुम्हारे बच्चे किस तरह के माहौल में रहते हैं, उनकी रहन-सहन की स्थितियाँ, क्या उनके पास तुम्हारी देखभाल करने की स्थितियाँ हैं, क्या वे आर्थिक रूप से संपन्न हैं और क्या वे तुम्हें भौतिक आनंद और सहायता प्रदान कर सकते हैं, ये भी परमेश्वर के पूर्वनियत करने पर निर्भर करते हैं। इसके अलावा, माता-पिता के रूप में, क्या तुम उन भौतिक चीजों, धन या भावनात्मक सांत्वना का आनंद ले सकते हो जो तुम्हारे बच्चे तुम्हें देते हैं, यह भी परमेश्वर के पूर्वनियत करने पर निर्भर करता है” (वचन, खंड 6, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण कैसे करें (19))। “चलो, अभी के लिए बच्चों के नजरिये से बोलना छोड़कर सिर्फ माता-पिता के नजरिये से बोलें। माता-पिता को यह माँग नहीं करनी चाहिए कि उनके बच्चे संतानोचित हों और उनके बाद के वर्षों में उनकी देखभाल करें और उन्हें सहारा दें—इसकी कोई जरूरत नहीं है। एक ओर यह वह रवैया है जो माता-पिता को अपने बच्चों के प्रति रखना चाहिए, और दूसरी ओर, यह वह आत्म-सम्मान है जो माता-पिता में होना चाहिए। बेशक, एक और भी महत्वपूर्ण पहलू है : यह वह सिद्धांत है जिसका पालन उन सृजित प्राणियों को जो माता-पिता हैं, अपने बच्चों के साथ पेश आने में करना चाहिए। अगर तुम्हारे बच्चे संतानोचित निष्ठा रखते हों और तुम्हारी देखभाल करने के इच्छुक हों, तो तुम्हें उन्हें मना करने की जरूरत नहीं है; अगर वे ऐसा करने के अनिच्छुक हों, तो तुम्हें दिन भर शिकायत करने और आहें भरने की जरूरत नहीं है, अपने दिल में असहज और नाराज महसूस नहीं करना चाहिए या अपने बच्चों के खिलाफ दुर्भावना नहीं रखनी चाहिए। तुम्हें अपने जीवन और जीवित रहने की जिम्मेदारी और बोझ यथासंभव खुद उठाना चाहिए और इसे दूसरों पर, खासकर अपने बच्चों पर नहीं डालना चाहिए। तुम्हें अपने बच्चों के सानिध्य या सहायता के बगैर वाले जीवन का सामना सक्रियता और सही ढंग से करना चाहिए, और अपने बच्चों से दूर होने पर भी तुम्हें जीवन में आई तमाम चीजों का अपने आप सामना करने में अब भी समर्थ होना चाहिए” (वचन, खंड 6, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण कैसे करें (19))। परमेश्वर के वचन बहुत स्पष्ट हैं। माता-पिता द्वारा अपने बच्चों को पालना एक मानवीय प्रवृत्ति और एक मानवीय जिम्मेदारी और दायित्व है। माता-पिता अपने बच्चों को जन्म देना चुनते हैं और उन्हें पालने में चाहे कितना भी कष्ट उठाना पड़े या कितनी भी कीमत चुकानी पड़े, यह वही है जो उन्हें करना चाहिए। हालाँकि, मैं इस पारंपरिक धारणा से प्रभावित थी कि “बुढ़ापे में अपनी देखभाल के लिए बच्चे पालो” और मैंने माँग की कि मेरी बेटी बुढ़ापे में मेरी देखभाल करे और मेरे मरने के समय मेरे पास रहे। मेरा मानना था कि जब वह छोटी थी तो मैंने उसे पाला, इसलिए यह पूरी तरह से स्वाभाविक और उचित है कि जब मैं बूढ़ी हो जाऊँ तो वह मेरी देखभाल करे। यह नजरिया सत्य के अनुरूप नहीं है। अपनी बेटी को पालना मेरी जिम्मेदारी और दायित्व था। यह बस वही है जो मुझे करना चाहिए था। लेकिन, मैंने अपनी बेटी को पालने के लिए चुकाई गई कीमत का इस्तेमाल सौदेबाजी के लिए किया ताकि वह बुढ़ापे में मेरी देखभाल करे। जब मेरी इच्छाएँ पूरी नहीं हुईं तो मैं गुस्सा हो गई और परेशान हो गई। मैं वास्तव में बहुत स्वार्थी और नीच थी! दरअसल, भले ही हम माँ और बेटी हैं, परमेश्वर के सामने हम दोनों सृजित प्राणी हैं और हमारा दर्जा समान है। मेरी बेटी मेरी गुलाम नहीं है और मेरा उससे यह अपेक्षा करना अनुचित था कि वह बुढ़ापे में मेरी देखभाल करे। अपनी बेटी को पालने से मुझे जो मिलना चाहिए था, वह मुझे पहले ही मिल चुका है। मेरी बेटी के जन्म लेने से लेकर उसके हमें माँ और पिताजी बुला सकने तक और फिर उसके बड़े होकर बालिग होने तक, वह हमारे परिवार में बहुत खुशियाँ लाई। अपनी बेटी को पालने की प्रक्रिया में, मेरी सोच परिपक्व हुई और मुझे जीवन का बहुत अनुभव मिला। ये बेटी को पालने के पुरस्कार हैं। अगर मेरी बेटी भविष्य में मेरी देखभाल नहीं करना चाहती तो मैं नाराज नहीं हो सकती। मुझे अपनी क्षमता के अनुसार अपने जीवन की जिम्मेदारी खुद लेनी होगी और अपनी बेटी पर निर्भर नहीं रहना होगा, इसके बजाय परमेश्वर के आयोजन और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करना होगा। जब मैंने यह समझा तो मुझे बहुत राहत महसूस हुई।
बाद में, मैंने परमेश्वर के वचनों का एक अंश पढ़ा, जिसने मेरे दिल को रोशन कर दिया और मुझे अनुसरण के लिए एक रास्ता दिया। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “जब तुम सबसे अधिक पीड़ा और उदासी महसूस करते हो तो तुम्हारे दिल को वास्तव में दिलासा कौन दे सकता है? वास्तव में तुम्हारे कष्ट कौन दूर कर सकता है? (परमेश्वर कर सकता है।) परमेश्वर ही वास्तव में लोगों के कष्ट दूर कर सकता है। यदि तुम बीमार हो और तुम्हारे बच्चे तुम्हारे पास हैं, तुम्हारी सेवा और सुश्रूषा कर रहे हैं तो तुम्हें काफी खुशी होगी, लेकिन समय बीतने के साथ तुम्हारे बच्चे तुमसे तंग हो जाएंगे और कोई भी तुम्हारी सुश्रूषा नहीं करना चाहेगा। ऐसे समय तुम वास्तव में अकेलापन महसूस करोगे! तुम यह सोचते हो कि अपने पास तुम्हारा कोई साथी नहीं है, लेकिन क्या यह सच है? वास्तव में यह सच नहीं है, क्योंकि परमेश्वर सदैव तुम्हारे साथ है! परमेश्वर लोगों को नहीं छोड़ता। एक वही ऐसा है जिस पर वे हर समय निर्भर रह सकते हैं और जिसकी हर समय शरण ले सकते हैं और जो उनका एकमात्र विश्वासपात्र है। इसलिए तुम पर चाहे जो भी कठिनाइयाँ और कष्ट आएँ, तुम्हें चाहे जो भी चीजें अन्याय महसूस कराएँ और चाहे जो भी मामले तुम्हें नकारात्मक और कमजोर बनाएँ, तुम्हें तुरंत परमेश्वर के सामने आना चाहिए और प्रार्थना करनी चाहिए और उसके वचन तुम्हें दिलासा देंगे और तुम्हारी कठिनाइयों और सारी विभिन्न दिक्कतों को दूर करेंगे। इस तरह के परिवेश में तुम्हारा अकेलापन परमेश्वर के वचनों का अनुभव करने और सत्य हासिल करने के लिए बुनियादी शर्त बन जाएगा” (वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, भाग तीन)। परमेश्वर हर समय मानवजाति का सहारा है। जब हम दर्द में होते हैं, कमजोर होते हैं या कठिनाइयों और कष्टों का सामना करते हैं तो वह परमेश्वर ही है जो हमेशा हमारे साथ होता है। परमेश्वर हमें प्रबुद्ध करने और हमारी अगुआई करने और हमारी समस्याएँ हल करने के लिए वचनों का उपयोग करता है, कठिन समय से निकलने में हमारी मदद करता है। मुझे बचपन से ही चक्कर आने की बीमारी थी और इस बीमारी ने मुझे 30 से अधिक वर्षों तक सताया। हर बार जब मैं बीमार पड़ती तो मुझे दो दिनों तक लेटे रहना पड़ता था। भले ही मेरी बेटी मेरे प्रति संतानोचित होती तो भी वह केवल खाने-पीने में मेरी मदद कर पाती; वह मेरे दर्द को दूर नहीं कर पाती और मेरी ओर से कष्ट सहने में तो और भी कम सक्षम होती। जब मैंने परमेश्वर पर विश्वास करना शुरू किया तो मेरी बीमारी अनजाने में ही ठीक हो गई और मुझे अब बीमारी से कोई कष्ट नहीं होता। वह परमेश्वर ही था जिसने मेरी बीमारी दूर की। मैं लगभग 20 वर्षों से अपना कर्तव्य निभाने के लिए घर से दूर हूँ और मैं हमेशा स्वस्थ रही हूँ। 2022 में, जब महामारी गंभीर थी और बहुत से लोग संक्रमित थे, तब भी मुझे कोविड नहीं हुआ। मुझे अभी कोई गंभीर बीमारी नहीं है, हालाँकि मुझे समय-समय पर कुछ आम बीमारियाँ होती रहती हैं, लेकिन मैं कुछ घरेलू उपचारों का उपयोग करके ही ठीक हो जाती हूँ। मैंने अनुभव किया कि परमेश्वर इन सभी वर्षों में कैसे मेरी रक्षा करता रहा है और कैसे केवल परमेश्वर ही मेरा सहारा है। जब मैंने यह समझा तो मैं बुढ़ापे में मेरी देखभाल करने और मुझे अंतिम विदाई देने वाला कोई न होने के बारे में अब दुखी और चिंतित नहीं थी और मेरा दिल बहुत अधिक मुक्त हो गया था। मैंने खुद को सुसमाचार का प्रचार करने के लिए समर्पित कर दिया और धीरे-धीरे कुछ परिणाम हासिल किए। परमेश्वर की अगुआई के लिए उसका धन्यवाद!