68. मैंने अपने झूठ बोलने का समाधान कैसे किया

शाओकोंग, चीन

दिसंबर 2023 में मेरी जिम्मेदारी कई कलीसियाओं के सिंचन कार्य की थी। उस समय मैं अपने कर्तव्य में बहुत सक्रिय था और नए विश्वासियों की स्थितियों की बुनियादी समझ रखता था। मार्च 2024 तक जिआंगलिन कलीसिया में नए विश्वासियों की संख्या धीरे-धीरे बढ़ने लगी और पर्यवेक्षक ने मुझे इस कलीसिया के सिंचन कार्य की जिम्मेदारी लेने के लिए व्यवस्थित कर दिया। चूँकि यह कलीसिया उन दूसरी कलीसियाओं से कुछ दूर थी, जिनके लिए मैं जिम्मेदार था और पुलिस की अक्सर गिरफ्तारियों की वजह से परिवेश खतरनाक था, पर्यवेक्षक ने मुझे चेताया कि अगर मैं समय पर नवागंतुकों से नहीं मिल पाऊँ तो मुझे सिंचनकर्ताओं को अधिक पत्र लिखने चाहिए ताकि मैं यह समझ सकूँ कि नए विश्वासी कैसा कर रहे हैं। उस समय मैंने बिना किसी झिझक के सहमति दे दी।

कुछ समय बाद पर्यवेक्षक ने पत्र लिखकर नए विश्वासियों की हाल की अवस्थाओं और मुश्किलों के बारे में पूछा, साथ ही यह भी पूछा कि ये नए विश्वासी किस प्रकार के कर्तव्यों के लिए उपयुक्त हैं। ये प्रश्न देखकर मैंने मन ही मन सोचा, “मैंने अभी-अभी जिआंगलिन कलीसिया के सिंचन कार्य की जिम्मेदारी सँभाली है और मुझे नए विश्वासियों की स्थितियों की केवल सामान्य जानकारी है, विस्तृत नहीं। मैंने पर्यवेक्षक से वादा किया था कि मैं नए विश्वासियों की स्थिति पर ध्यान केंद्रित करूँगा, लेकिन अभी तक मैंने वाकई उनका सही ढंग से जायजा नहीं लिया है। अगर मैं सच्चाई से उत्तर दूँ तो पर्यवेक्षक मेरे बारे में क्या सोचेगी? क्या वह सोचेगी कि मैं लापरवाह हो रहा हूँ और वास्तविक कार्य नहीं कर रहा हूँ? क्या वह सोचेगी कि एक अवधि तक सिंचन कार्य करने के बाद भी मैं इन कार्यों से अनजान हूँ और मेरी कार्यक्षमता खराब है? इसलिए क्या वह मुझे नीची नजरों से देखेगी?” यह सोचकर मैं उसे उत्तर नहीं देना चाहता था, लेकिन मैं उत्तर दिए बिना भी नहीं रह सकता था। मैं सचमुच दुविधा में पड़ गया था। अगर जवाब देता तो भी मुश्किल, नहीं देता तो भी। उसी समय मुझे एक विचार आया, “अगर मैं अभी जिआंगलिन कलीसिया के सिंचनकर्ताओं को पत्र लिख दूँ और पर्यवेक्षक को उत्तर देने से पहले चीजें स्पष्ट कर दूँ तो पर्यवेक्षक को यह नहीं लगेगा कि मेरी कार्यक्षमता खराब है, मैं लापरवाह हो रहा हूँ और वास्तविक कार्य नहीं कर रहा हूँ।” इसलिए मैंने जल्दी से जिआंगलिन कलीसिया के सिंचनकर्ताओं को पत्र लिखना शुरू किया। पत्र पूरा करने के बाद भी मुझे बेचैनी महसूस हो रही थी। मैंने मन ही मन सोचा, “अगर सिंचनकर्ताओं ने उत्तर देने में देर की और इंतजार करने की वजह से मैं पर्यवेक्षक को समय पर उत्तर नहीं दे पाया तो क्या पर्यवेक्षक के सामने मेरी छवि खराब हो जाएगी? इस स्थिति में शायद यह उजागर हो जाएगा कि मैंने कार्य का ठीक से जायजा नहीं लिया है। इस तरह न सिर्फ मेरा अभिमान और रुतबा बरकरार नहीं रह पाएगा, बल्कि मैं दुविधा में भी फँस जाऊँगा और अगर पर्यवेक्षक बाद में इसका कारण पूछती है तो मेरे पास अच्छा स्पष्टीकरण नहीं होगा। मुझे पहले पर्यवेक्षक को उत्तर दे देना चाहिए। लेकिन मैं ऐसा क्या कहूँ जिससे पर्यवेक्षक को लगे कि देर से जवाब देने के पीछे कोई जायज वजह है? पर्यवेक्षक ने बहुत सारे प्रश्न पूछे हैं, तो अगर मैं कहूँ कि मैंने इन सभी मुद्दों का जायजा लिया है तो यह संभव नहीं होगा। इसलिए मैं बस इतना कहूँगा कि मैंने एक मुद्दे को नजरअंदाज कर दिया है और मैं इसका जायजा लेने के लिए पत्र लिख रहा हूँ और उत्तर मिलने के बाद मैं समग्र रूप से प्रतिक्रिया दूँगा। इस तरह पर्यवेक्षक के पास मुझे कहने के लिए कुछ नहीं होगा। आखिरकार लोग हर मुद्दे के बारे में विस्तार से नहीं सोचते—एक-दो बातों को छोड़ देना सामान्य है।” इसलिए मैंने पर्यवेक्षक को इस तरह उत्तर दे दिया। कुछ दिनों बाद जिआंगलिन कलीसिया के सिंचनकर्ताओं ने नए विश्वासियों की स्थितियों का विवरण भेजा और मैंने उन बातों को पर्यवेक्षक को बिंदुवार बताया। पर्यवेक्षक ने कुछ नहीं कहा और मुझे राहत महसूस हुई, मैंने सोचा, “शुक्र है मैंने स्थिति की सच्चाई के साथ रिपोर्ट नहीं की; वरना पर्यवेक्षक पक्का मेरी कार्यक्षमता पर सवाल उठाती या वह सोचती कि मैं लापरवाह हो रहा हूँ और वास्तविक कार्य नहीं कर रहा हूँ। अगर ऐसा होता तो मैं उसकी नजर में अपनी अच्छी छवि कायम नहीं रख पाता।”

एक दिन एक सभा के दौरान मैंने परमेश्वर के नवीनतम वचनों में पढ़ा कि जो लोग दानव वर्ग के होते हैं, वे आदतन झूठ बोलने वाले होते हैं। मुझे याद आया कि मैंने पर्यवेक्षक को पत्र में क्या उत्तर दिया था। मैंने स्पष्ट रूप से नए विश्वासियों की स्थिति का जायजा नहीं लिया था, फिर भी मैंने यह दावा किया कि सिर्फ एक मुद्दा छूट गया है। मैं झूठ बोल रहा था और धोखा दे रहा था! मैं खुलकर अपनी कपटपूर्ण अवस्था के बारे में बात करना चाहता था, लेकिन फिर मैंने दोबारा विचार किया, “मैंने पहले झूठ बोलने के लिए बहुत पापड़ बेले थे। क्या यह सब सिर्फ इसलिए नहीं था कि पर्यवेक्षक की नजरों में अपनी अच्छी छवि बनाए रख सकूँ? अगर मैं अब खुलकर बता दूँ तो क्या मेरी पिछली सारी ‘मेहनत’ व्यर्थ नहीं हो जाएगी? इज्जत और रुतबा खोना तो छोड़ ही दें, पर्यवेक्षक मुझे वाकई चालबाज और कपटी भी समझेगी। छोड़ो, अगर मैं कुछ नहीं कहूँगा तो किसी को कुछ पता नहीं चलेगा।” इसलिए मैंने मन की बात नहीं कही। लेकिन सभा के बाद मैंने यह विचार किया कि परमेश्वर ने कहा कि जो लोग आदतन झूठ बोलते हैं, वे अपने निजी हितों को अत्यधिक महत्व देते हैं और जब भी उनके अभिमान और रुतबे का सवाल आता है, वे झूठ बोलने और धोखेबाजी करने में कोई कसर नहीं छोड़ते। मैंने अपना अभिमान और रुतबा बनाए रखने के लिए झूठ बोला था। क्या यह एक दानव जैसा व्यवहार नहीं था? मैं बहुत बेचैन और भयभीत हो गया। इसलिए मैंने इस मामले में अपने पर्यवेक्षक के सामने खुलकर बात की।

इसके बाद मैंने अपनी इस अवस्था के बारे में परमेश्वर के वचन खोजे ताकि मैं प्रवेश कर सकूँ। मैंने परमेश्वर के वचन पढ़े : “धोखेबाज लोगों की मंशाएँ ईमानदार लोगों की तुलना में काफी जटिल होती हैं। वे जो कहते और करते हैं, उसमें बहुत अधिक सोच-विचार होता है। उन्हें प्रसिद्धि, लाभ और रुतबे के साथ-साथ अपनी प्रतिष्ठा और मान-सम्मान पर भी विचार करना होता है और अपने हितों का ध्यान रखना होता है और वे कुछ भी जाहिर नहीं होने दे सकते हैं और दूसरों को अपनी असलियत नहीं जानने दे सकते हैं, इसलिए उन्हें झूठ गढ़ने के लिए अपना सिर खपाना पड़ता है। उनके झूठ बढ़ते जाते हैं, वे जो कुछ भी कहते हैं वह झूठ होता है और वे एक भी ईमानदार शब्द नहीं बोलते हैं। यही नहीं, धोखेबाज लोगों की अत्यधिक असंयमित इच्छाएँ और बहुत-सी अनुचित माँगें होती हैं। जब वे बोलते हैं तो उनकी हमेशा अपनी मंशाएँ होती हैं और अपने लक्ष्य होते हैं। अपने उद्देश्यों को हासिल करने के लिए उन्हें दूसरे लोगों से झूठ बोलने और उन्हें धोखा देने के लिए हर संभव तरीका सोचना पड़ता है और वे जितने अधिक झूठ बोलते हैं, उन्हें छिपाने के लिए उतने ही अधिक झूठों की आवश्यकता होती है, परिणामस्वरूप उनके झूठ बोलने का कोई अंत नहीं होता है। इस प्रकार, एक ईमानदार व्यक्ति की तुलना में एक धोखेबाज व्यक्ति का जीवन थकाऊ भी होता है और दुखपूर्ण भी। कुछ लोग अपेक्षाकृत ईमानदार होते हैं। यदि वे सत्य का अनुसरण कर सकते हैं, चाहे उन्होंने कोई भी झूठ बोला हो खुद पर चिंतन कर सकते हैं, चाहे वे किसी भी धोखेबाजी में लिप्त हों वे परमेश्वर के वचनों से तुलनाएँ करके अपना गहन-विश्लेषण कर सकते हैं और खुद को समझ सकते हैं, और बदलने की कोशिश कर सकते हैं तो वे कुछ वर्षों के अनुभव से अपने काफी सारे झूठ बोलने और धोखा देने से छुटकारा पाने में सक्षम होंगे। तब वे ऐसे व्यक्ति बन चुके होंगे जो मूलतः ईमानदार हैं। यदि कोई इस तरह से जीता है तो न केवल उसका दुख काफी कम हो जाता है और वह इतना थका हुआ महसूस नहीं करता; बल्कि यह उसके लिए शांति और खुशी लेकर भी आता है। बहुत-से मामलों में वे प्रसिद्धि, लाभ और रुतबे, और घमंड और अभिमान की बाधाओं से मुक्त हो जाएँगे और स्वाभाविक रूप से एक स्वतंत्र और मुक्त जीवन जिएँगे। लेकिन धोखेबाज लोगों की कथनी-करनी के पीछे हमेशा छिपे हुए मंसूबे होते हैं। वे दूसरों को गुमराह करने और धोखा देने के लिए हर तरह के झूठ गढ़ते हैं और जैसे ही वे उजागर होते हैं, वे अपने झूठ को छिपाने के तरीकों के लिए अपना सिर खपाते हैं। वे हमेशा व्यग्रता की दशा में रहते हैं और इस तरह झूलते रहने से उन्हें लगता है कि उनका जीवन अत्यंत थकाऊ है। उनके सामने आने वाली हर स्थिति में इतने सारे झूठ बोलना उनके लिए काफी थकाऊ होता है और फिर उन झूठों को छिपाना तो और भी अधिक थकाऊ होता है। वे जो कुछ भी कहते हैं उस सबकी मंशा एक उद्देश्य हासिल करने की होती है, इसलिए वे जो कुछ भी कहते हैं उसकी योजना बनाने में बहुत अधिक प्रयास करते हैं। और चूँकि उन्हें डर है कि तुम उनकी असलियत जान लोगे, इसलिए उन्हें अपने झूठ को छिपाने के लिए भी अपना सिर खपाना पड़ता है और तुम्हें बातें समझाते रहना पड़ता है, तुम्हें यह विश्वास दिलाने की कोशिश करनी पड़ती है कि वे झूठ नहीं बोल रहे हैं या तुम्हें धोखा नहीं दे रहे हैं, कि वे अच्छे व्यक्ति हैं। धोखेबाज लोग ऐसी चीजें करने के आदी होते हैं(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, एक ईमानदार व्यक्ति होने का सबसे बुनियादी अभ्यास)। परमेश्वर के वचनों से मैंने समझा कि धोखेबाज लोग मुद्दों पर बहुत जटिल तरीके से विचार करते हैं। वे अपने अभिमान और रुतबे की रक्षा करने का प्रयास करते हैं और नहीं चाहते कि दूसरों को उनकी कोई खामी नजर आए। अगर कोई चीज उनके अभिमान और रुतबे के लिए खतरा बनती है तो वे झूठ बोलने और अपना झूठ छिपाने के लिए अपने दिमाग पर बहुत जोर डालते हैं। जब पर्यवेक्षक ने नवागंतुकों की स्थिति का पता लगाने के लिए पत्र लिखा, मुझे बस यह जवाब देना था कि किन पहलुओं का जायजा लिया गया है और किन का नहीं। जो काम मैंने ठीक से नहीं किए थे, उन्हें मैं बाद में तुरंत सुधार सकता था और सब ठीक हो जाता। यह बहुत ही साधारण मामला था। लेकिन मैंने इसे बहुत जटिल बना दिया। मुझे चिंता थी कि अगर मैंने सच्चाई के साथ जवाब दिया तो इससे मेरे कर्तव्य में मेरी कमियाँ उजागर हो जाएँगी और पर्यवेक्षक मेरी कार्यक्षमता पर शक कर सकती है और मुझे नीची नजरों से देख सकती है। इसलिए मैंने सोचा कि पहले नवागंतुकों की स्थिति के बारे में स्पष्ट तस्वीर हासिल कर लूँ और फिर जवाब दूँ। इस तरह मैं इस तथ्य को छिपा सकता था कि मैं जो जायजा ले रहा था, वह अपर्याप्त था। लेकिन मुझे यह भी चिंता थी कि अगर मैंने जवाब देने से पहले स्थिति को स्पष्ट रूप से समझने तक इंतजार किया तो पर्यवेक्षक सोचेगी कि मैं जवाब देने में टालमटोल कर रहा हूँ, उस स्थिति में मेरी समस्याएँ उजागर हो सकती थीं और एक मेहनती, जिम्मेदार व्यक्ति के रूप में मेरी छवि बर्बाद हो जाती। इसलिए मैंने पर्यवेक्षक से झूठ बोला कि सिर्फ एक ही मुद्दा है जिसका मैंने जायजा नहीं लिया है। उसी समय मैंने नए विश्वासियों के बारे में जानकारी प्राप्त करने के लिए तुरंत सिंचनकर्ताओं को लिखा और फिर मैंने जो जानकारी इकट्ठी की थी, उसकी रिपोर्ट पर्यवेक्षक को की, दिखावा किया ताकि वह सोचे कि मैं असल में वास्तविक कार्य कर रहा था। मैंने अपने अभिमान और रुतबे की रक्षा के लिए वाकई कोई कसर नहीं छोड़ी, चालबाजी और तिकड़मबाजी का सहारा लिया। मैं पूरी तरह से धोखेबाज था! परमेश्वर इंसान के दिल की गहराइयों की पड़ताल करता है। मैं जो कुछ भी करता था, उसे सब पता था। मैं लोगों को धोखा दे सकता था, लेकिन मैं परमेश्वर को धोखा नहीं दे सकता था, क्योंकि वह सब कुछ देखता है। अगर मैंने अभी पश्चात्ताप नहीं किया और खुद को नहीं बदला तो मुझे निश्चित रूप से परमेश्वर द्वारा हटा दिया जाएगा। मुझे तत्काल सत्य का अनुसरण करना था और अपने धोखेबाज स्वभाव को बदलना था।

मैंने बाद में “मैंने ईमानदार होने का आनंद अनुभव किया” शीर्षक वाला एक अनुभवजन्य गवाही वीडियो देखा। उसमें परमेश्वर के वचनों का एक अंश उद्धृत था, जिसने मुझे उस रास्ते के बारे में कुछ समझ दी जिस पर मैं चल रहा था। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “अगर तुम लोग अगुआ या कार्यकर्ता हो, तो क्या तुम परमेश्वर के घर द्वारा अपने काम के बारे में पूछताछ किए जाने और उसका पर्यवेक्षण किए जाने से डरते हो? क्या तुम डरते हो कि परमेश्वर का घर तुम लोगों के कार्य में खामियों और विचलनों का पता लगा लेगा और तुम लोगों की काट-छाँट करेगा? क्या तुम डरते हो कि जब ऊपरवाले को तुम लोगों की वास्तविक काबिलियत और आध्यात्मिक कद का पता चलेगा, तो वह तुम लोगों को अलग तरह से देखेगा और तुम्हें प्रोन्नति के लायक नहीं समझेगा? अगर तुम्हें ये डर हैं, तो यह साबित करता है कि तुम्हारी अभिप्रेरणाएँ कलीसिया के कार्य के लिए नहीं हैं, तुम प्रतिष्ठा और रुतबे के लिए काम कर रहे हो, जिससे साबित होता है कि तुममें मसीह-विरोधी का स्वभाव है। अगर तुममें मसीह-विरोधी का स्वभाव है, तो तुम मसीह-विरोधियों के मार्ग पर चलने और उनके द्वारा गढ़ी गई तमाम बुराइयाँ करने की प्रवृत्ति रखते हो। अगर, तुम्हारे दिल में, परमेश्वर के घर द्वारा तुम्हारे काम की निगरानी करने का डर नहीं है, और तुम बिना कुछ छिपाए ऊपरवाले के सवालों और पूछताछ के वास्तविक उत्तर देने में सक्षम हो, और जितना तुम जानते हो उतना कह सकते हो, तो फिर चाहे तुम जो कहते हो वह सही हो या गलत, चाहे तुम जितनी भी भ्रष्टता प्रकट करो—भले ही तुम एक मसीह-विरोधी का स्वभाव प्रकट करो—तुम्हें बिल्कुल भी एक मसीह-विरोधी के रूप में निरूपित नहीं किया जाएगा। महत्वपूर्ण बात यह है कि क्या तुम मसीह-विरोधी के अपने स्वभाव को जानने में सक्षम हो, और क्या तुम यह समस्या हल करने के लिए सत्य खोजने में सक्षम हो। अगर तुम ऐसे व्यक्ति हो जो सत्य स्वीकारता है, तो मसीह-विरोधी वाला तुम्हारा स्वभाव ठीक किया जा सकता है। अगर तुम अच्छी तरह से जानते हो कि तुममें एक मसीह-विरोधी स्वभाव है और फिर भी उसे हल करने के लिए सत्य नहीं खोजते, अगर तुम सामने आने वाली समस्याओं को छिपाने या उनके बारे में झूठ बोलने की कोशिश करते हो और जिम्मेदारी से जी चुराते हो, और अगर तुम काट-छाँट किए जाने पर सत्य नहीं स्वीकारते, तो यह एक गंभीर समस्या है, और तुम मसीह-विरोधी से अलग नहीं हो। यह जानते हुए भी कि तुम्हारा स्वभाव मसीह-विरोधी है, तुम उसका सामना करने की हिम्मत क्यों नहीं करते? तुम उससे खुलकर क्यों नहीं निपट पाते, ‘अगर ऊपरवाला मेरे काम के बारे में पूछताछ करता है, तो मैं वह सब बताऊँगा जो मैं जानता हूँ, और भले ही मेरे द्वारा किए गए बुरे काम प्रकाश में आ जाएँ, और पता चलने पर ऊपरवाला अब मेरा उपयोग न करे, और मेरा रुतबा खो जाए, मैं फिर भी स्पष्ट रूप से वही कहूँगा जो मुझे कहना है’? परमेश्वर के घर द्वारा तुम्हारे काम का पर्यवेक्षण और उसके बारे में पूछताछ किए जाने का तुम्हारा डर यह साबित करता है कि तुम सत्य से ज्यादा अपने रुतबे को सँजोते हो। क्या यह मसीह-विरोधी वाला स्वभाव नहीं है? रुतबे को सबसे अधिक सँजोना मसीह-विरोधी का स्वभाव है(वचन, खंड 4, मसीह-विरोधियों को उजागर करना, मद आठ : वे दूसरों से केवल अपने प्रति समर्पण करवाएँगे, सत्य या परमेश्वर के प्रति नहीं (भाग दो))। परमेश्वर के वचनों से मुझे यह समझ में आया कि जब अगुआ और कार्यकर्ता कार्य के बारे में पूछताछ और पर्यवेक्षण करते हैं तो मामलों की सच्चाई से रिपोर्ट करने की हिम्मत न करने और यहाँ तक कि प्रतिष्ठा और रुतबे की खातिर सच्चाई को छिपाने का मतलब है कि तुम मसीह-विरोधियों के स्वभाव वाले व्यक्ति हो और मसीह-विरोधियों के मार्ग पर चलते हो। इसकी तुलना अपनी अवस्था से करूँ तो जब पर्यवेक्षक ने उन नए विश्वासियों के बारे में पूछा जिनके लिए मैं जिम्मेदार था, बहुत-से ऐसे मुद्दे थे जिनकी मुझे स्पष्ट समझ नहीं थी, लेकिन मुझे डर था कि अगर मैंने सच्चाई से रिपोर्ट की और पर्यवेक्षक ने देखा कि मैंने मामलों का ठीक से जायजा नहीं लिया है तो वह सोचेगी कि मैं लापरवाह हो रहा हूँ या यहाँ तक कि मेरी कार्यक्षमता पर भी सवाल उठाएगी, जिससे उसके मन में मेरी अच्छी छवि पर असर पड़ेगा। इसलिए मैंने झूठ बोला और धोखेबाजी का सहारा लिया। क्या मेरा दुष्ट और धोखेबाज स्वभाव मसीह-विरोधी के स्वभाव जैसा ही नहीं था? असल में पर्यवेक्षक द्वारा काम का जायजा लेना एक तरह से मुझे यह याद दिलाना था कि सिंचन कार्य का ठीक से जायजा लेकर उसे कार्यान्वित किया गया है या नहीं, ताकि अगर इसे ठीक से कार्यान्वित नहीं किया गया हो तो मैं तुरंत ऐसा कर सकूँ, इस प्रकार क्षणिक चूक के कारण सिंचन कार्य की प्रगति में देरी से बच सकूँ। यह मुझे याद दिलाने और मेरी मदद करने के लिए था। इतना ही नहीं, नए विश्वासियों की स्थिति के बारे में पर्यवेक्षक की पूछताछ में अगर उसे सिंचन कार्य में विचलनों या समस्याओं का पता चलता, तो इनके बारे में तुरंत संगति की जा सकती थी और उन्हें दूर किया जा सकता था। वह ऐसा करके कलीसिया के हितों की रक्षा कर रही थी। मुझे ईमानदारी से रिपोर्ट करनी चाहिए थी, जितना मैं जानता था उतना ही बताना चाहिए था और जहाँ तक उन बातों का सवाल है जिनका मैंने ठीक से जायजा नहीं लिया तो ठीक होता अगर मैं उन्हें कार्यान्वित करने और उनका जायजा लेने में जल्दी कर देता। लेकिन इसके बजाय मैंने अपनी प्रतिष्ठा और रुतबे को बहुत अधिक महत्व दिया और जब पर्यवेक्षक के पर्यवेक्षण का सामना करना पड़ा तो मैंने यह स्वीकार करने की हिम्मत नहीं की कि मैंने अपना कार्य अच्छी तरह से नहीं किया था। मैंने झूठ तक बोला और पर्यवेक्षक को धोखा दिया। इससे ऐसे विचलन आ सकते थे जिन्हें समय पर नहीं सुधारा जा सकता था, जिससे नए विश्वासियों के जीवन प्रवेश में देरी होती। मैंने प्रतिष्ठा और रुतबे को सबसे ऊपर रखा। अपने कर्तव्य में मैं हमेशा अपनी प्रतिष्ठा और रुतबे की रक्षा करने की कोशिश कर रहा था, साजिशें रचता रहा और तिकड़मबाजी करता रहा। मैं परमेश्वर के लिए कितना घृणित था!

एक दिन मैंने परमेश्वर के वचनों का एक अंश पढ़ा और मुझे इस बात की अधिक स्पष्ट समझ मिली कि परमेश्वर किस तरह के लोगों को स्वीकृति देता है और किस तरह के लोगों से घृणा करता है। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “परमेश्वर का लोगों से ईमानदार बनने की माँग करना यह साबित करता है कि वह धोखेबाज लोगों से सचमुच अत्यधिक घृणा करता है और उन्हें नापसंद करता है। धोखेबाज लोगों के प्रति परमेश्वर की नापसंदगी उनके काम करने के तरीके, उनके स्वभावों और साथ ही उनकी मंशाओं और उनकी धोखेबाजी के साधनों के प्रति नापसंदगी है; परमेश्वर को ये सब चीजें नापसंद हैं। यदि धोखेबाज लोग सत्य स्वीकार कर पाते हैं, अपने धोखेबाज स्वभाव को मान पाते हैं और ईमानदार लोग बनने के लिए परमेश्वर का उद्धार स्वीकार करने और सत्य का अभ्यास करने को तैयार होते हैं तो उनके पास भी बचाए जाने की उम्मीद होती है, क्योंकि परमेश्वर किसी के प्रति पक्षपात नहीं करता है और न ही सत्य ऐसा करता है। और इसलिए, यदि हम परमेश्वर को प्रसन्न रखने वाले लोग बनना चाहते हैं तो हमें सबसे पहले अपने स्व-आचरण के सिद्धांतों को बदलना होगा, शैतानी फलसफों के अनुसार जीना बंद करना होगा, अपना जीवन जीने के लिए झूठ बोलने और धोखा देने पर निर्भर रहना बंद करना होगा और हमें अपने सारे झूठ छोड़ने होंगे और ईमानदार लोग बनने की कोशिश करनी होगी। तब हमारे प्रति परमेश्वर का दृष्टिकोण बदलेगा। पहले लोग दूसरों के बीच रहते हुए हमेशा झूठ, धोखेबाजी और ढोंग पर निर्भर रहते थे और शैतानी फलसफों को अपने अस्तित्व का आधार, अपना जीवन और अपनी नींव मानकर आचरण करते थे। इससे परमेश्वर को घृणा थी। गैर-विश्वासियों के बीच यदि तुम ईमानदार व्यक्ति बनने की कोशिश करते हो और सच बोलते हो, तो तुम्हें बदनाम किया जाएगा, तुम्हारी आलोचना की जाएगी और तुम्हें ठुकरा दिया जाएगा। इसलिए तुम सांसारिक प्रवृत्तियों का अनुसरण करते हो और शैतानी फलसफों के अनुसार जीते हो; तुम झूठ बोलने में अधिकाधिक कुशल होते जाते हो और अधिक से अधिक धोखेबाज होते जाते हो। तुम अपने लक्ष्य पूरे करने के लिए धूर्त साधनों का उपयोग भी करते हो और इस प्रकार अपनी सुरक्षा करते हो। तुम शैतान की दुनिया में अधिकाधिक समृद्ध होते चले जाते हो और परिणामस्वरूप तुम पाप में अधिक से अधिक गहरे गिरते जाते हो और उसमें से खुद को निकाल नहीं सकते हो। परमेश्वर के घर में चीजें ठीक इसके विपरीत होती हैं। तुम झूठ बोलने और धोखेबाज होने में जितना अधिक कुशल होते हो, परमेश्वर के चुने हुए लोग तुमसे उतने ही अधिक विमुख होंगे और तुम्हें ठुकरा देंगे। यदि तुम पश्चात्ताप करने से इनकार कर देते हो, अब भी शैतानी फलसफों और तर्क से चिपके रहते हो, छद्मवेश धारण करने और मुखौटे पहनने के लिए साजिशों, चालों और परिष्कृत तरकीबों का भी इस्तेमाल करते हो तो बहुत संभव है कि तुम बेनकाब कर दिए जाओगे और हटा दिए जाओगे। ऐसा इसलिए है क्योंकि परमेश्वर धोखेबाज लोगों से अत्यधिक घृणा करता है। परमेश्वर के घर में केवल ईमानदार लोग फल-फूल सकते हैं और सभी धोखेबाज लोगों को अंततः ठुकरा और हटा दिया जाएगा। यह सब परमेश्वर ने बहुत पहले पूर्वनियत कर दिया है। केवल ईमानदार लोग स्वर्ग के राज्य में शामिल हो सकते हैं। यदि तुम ईमानदार व्यक्ति बनने की कोशिश नहीं करोगे, सत्य का अनुसरण करने की दिशा में अनुभव प्राप्त नहीं करोगे और अभ्यास नहीं करोगे, यदि अपनी कुरूपता उजागर नहीं करोगे और यदि खुद को खोलकर पेश नहीं करोगे, तो तुम कभी भी पवित्र आत्मा का कार्य और परमेश्वर की स्वीकृति प्राप्त नहीं कर पाओगे(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, एक ईमानदार व्यक्ति होने का सबसे बुनियादी अभ्यास)। परमेश्वर ईमानदार लोगों को पसंद करता है और धोखेबाज लोगों से घृणा करता है, क्योंकि धोखेबाज लोग चाहे किसी भी स्थिति का सामना करें, हमेशा झूठ बोलते और धोखाबाजी करते हैं और अपने अस्तित्व की नींव के रूप में शैतानी फलसफों को अपनाते हैं और सत्य का बिल्कुल भी अभ्यास नहीं करते। अपनी धोखेबाजी की जड़ पर चिंतन करते हुए मैंने देखा कि मैं इन कहावतों के अनुसार जीता था, “हर व्यक्ति अपनी सोचे बाकियों को शैतान ले जाए,” “जैसे पेड़ को उसकी छाल की जरूरत है वैसे ही लोगों को आत्मसम्मान की जरूरत है,” और “एक व्यक्‍ति जहाँ रहता है वहाँ अपना नाम छोड़ता है, जैसे कि एक हंस जहाँ कहीं उड़ता है आवाज करता जाता है।” मैं इन शैतानी जहरों के सहारे जीता था, अपने अभिमान, रुतबे और निजी हितों को बहुत महत्व देता था। मैंने चाहे किसी भी चीज का सामना किया हो, एक बार जब मेरा अभिमान और रुतबा दाँव पर लग जाता, मैं अपने दिमाग पर जोर डालता और सच्चाई को छिपाने के लिए जो कुछ भी करना पड़ता, वह करता। ऐसा करने के बाद मैं यह भी सोचता कि होशियार लोग ऐसे ही काम करते हैं, सिर्फ मूर्ख और बेवकूफ लोग ही सच बोलते हैं। मुझे याद है जब मैं स्कूल में था, एक बार मैंने होमवर्क में गड़बड़ कर दी और एक हिस्सा अधूरा छोड़ दिया। मुझे शिक्षक की नजरों में एक अच्छे छात्र के रूप में अपनी छवि खराब होने की चिंता थी, इसलिए मैंने शिक्षक से झूठ बोला, कहा कि मैं अपना होमवर्क घर पर भूल आया हूँ और फिर लंचटाइम में घर गया ताकि उसे जल्दी से पूरा कर सकूँ और दोपहर को मैंने उसे जमा कर दिया। अपनी इज्जत बचाने और रुतबा बनाए रखने के लिए मैंने और अधिक झूठ बोला और चालबाज़ी की और यह मेरे लिए बहुत स्वाभाविक बात हो गई। परमेश्वर को पाने के बाद भी मैं शैतानी विचारों और दृष्टिकोणों के अनुसार जी रहा था। पर्यवेक्षक की नजरों में अपनी छवि कायम रखने और अपनी समस्याओं और कमियों को छिपाने के लिए मैंने सच्चाई को छिपाने की खातिर चालबाजी और धोखेबाजी का सहारा लिया। यहाँ तक कि जब मुझे बाद में एहसास हुआ कि मुझे एक ईमानदार व्यक्ति होना चाहिए और खुलकर संगति करनी चाहिए, मुझे चिंता हुई कि अगर मैं खुलकर बोलूँगा तो मेरे पिछले सारे प्रयास व्यर्थ हो जाएँगे और पर्यवेक्षक मुझे पूरी तरह से तिकड़मबाज और धोखेबाज समझेगी। इसलिए मैं ईमानदारी से नहीं बोलना चाहता था। परमेश्वर ईमानदार लोगों को पसंद करता है, क्योंकि उनमें समस्याओं का सामना करने पर जिम्मेदारी लेने का साहस होता है, जब उनकी कमियाँ प्रकट होती हैं तो उनमें उनका सामना करने का साहस होता है, और बाद में वे सत्य की खोज कर इन बातों का समाधान कर सकते हैं। जब ऐसे लोग अपने कर्तव्य निभाते हैं, सिद्धांतों पर उनकी पकड़ उतनी ही अच्छी होती जाती है और उनके नतीजे उतने ही बेहतर हो जाते हैं। लेकिन मैंने इनमें से कोई भी व्यवहार नहीं दिखाया। मैंने हमेशा अपनी खामियों को छिपाने और ढकने की कोशिश की और यहाँ तक कि मैंने अपने भाई-बहनों को भी धोखा देने की कोशिश की। मैंने जिस तरह का जीवन जिया उसमें एक ईमानदार व्यक्ति की कोई भी झलक कैसे हो सकती थी? वह शैतान की एक कुटिल और धोखेबाज छवि थी। अगर मैं पश्चात्ताप न करता तो निश्चित रूप से परमेश्वर द्वारा ठुकरा दिया जाता और उद्धार का अपना मौका खो देता।

बाद में मैंने परमेश्वर के वचनों के दो अंश पढ़े और मुझे अभ्यास का एक मार्ग मिला। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “लोग सोचते हैं कि यदि उनके निजी हित नहीं हैं या यदि वे उन्हें खो देते हैं, तो वे जीवित नहीं रह पाएँगे, मानो उनका अस्तित्व उनके अपने निजी हितों पर निर्भर करता हो। इसलिए अधिकांश लोग अपने निजी हितों के अलावा और कुछ नहीं देख पाते। वे अपने हितों को सबसे ऊपर देखते हैं और केवल अपने निजी हितों के लिए जीते हैं। वे तब तक एक उँगली भी नहीं हिलाते जब तक कि उसमें उनके अपने हित न जुड़े हों और उनसे अपने निजी हितों को छोड़ने के लिए कहना उनकी जान देने के लिए कहने जैसा है। तो लोग अपने हितों को छोड़ने में कैसे सक्षम हो सकते हैं? उन्हें सत्य को स्वीकार करना ही चाहिए। केवल जब वे सत्य को समझते हैं तभी वे अपने हितों के सार की असलियत जान सकते हैं और स्पष्ट रूप से पहचान सकते हैं कि अपने निजी हितों का पीछा करना सत्य का अनुसरण करने के विपरीत है, यह कभी भी किसी को सत्य और जीवन प्राप्त करने या उद्धार पाने में सक्षम नहीं बना सकता; केवल तभी वे अपने हितों को त्यागना और उनके खिलाफ विद्रोह करना सीख सकते हैं और जो कुछ भी उन्हें प्रिय है उसे छोड़ने में सक्षम हो सकते हैं। और जब तुम जो तुम्हें प्रिय है उसे छोड़ देते हो और अपने निजी हितों को त्याग देते हो, तो तुम अपने दिल में अधिक सुकून और अधिक शांति महसूस करोगे और ऐसा करने में तुम देह पर विजय पा चुके होगे(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, अपने स्‍वभाव का ज्ञान उसमें बदलाव की बुनियाद है)। “ईमानदार व्यक्ति होने के लिए तुम्हें पहले अपना दिल खोलकर रखना चाहिए ताकि सभी उसके भीतर झाँक सकें, तुम्हारी सोच और तुम्हारा असली चेहरा देख सकें। तुम्हें भेस बदलने की कोशिश नहीं करनी चाहिए, या खुद को छिपाना नहीं चाहिए। तभी दूसरे तुम पर भरोसा करेंगे, और तुम्हें ईमानदार व्यक्ति मानेंगे। यह सबसे बुनियादी अभ्यास है, और ईमानदार व्यक्ति बनने की पहली शर्त है। ... एक ईमानदार व्यक्ति होने का अर्थ यह है कि चाहे तुम परमेश्वर के सामने हो या दूसरे लोगों के सामने, तुम अपनी आंतरिक दशा और अपने दिल की बातों को लेकर शुद्ध और सरल तरीके से खुल सकते हो। क्या यह करना आसान है? इसके लिए कुछ समय तक प्रशिक्षण की आवश्यकता होती है, साथ ही बार-बार प्रार्थना करने और परमेश्वर पर निर्भर रहने की भी। तुम्हें सभी मामलों में अपने दिल की बातों को सरल और खुले तौर पर बोलने के लिए खुद को अभ्यस्त अवश्य करना चाहिए। इस तरह के प्रशिक्षण से तुम प्रगति कर सकते हो(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, एक ईमानदार व्यक्ति होने का सबसे बुनियादी अभ्यास)। परमेश्वर के वचनों ने अभ्यास का मार्ग स्पष्ट कर दिया। धोखेबाज अवस्था का समाधान करने के लिए व्यक्ति को निजी हितों को त्यागना होगा, अपने अभिमान या रुतबे पर विचार नहीं करना होगा और सभी बातों में परमेश्वर के सामने खुलकर बोलना होगा। अपने कर्तव्यों में मुझे किसी भी मुद्दे या व्यक्तिगत कमियों की तुरंत रिपोर्ट करनी चाहिए और मुझे परमेश्वर के घर के हितों को प्राथमिकता देनी चाहिए। यहाँ तक कि अगर सच बोलने से भाई-बहन मेरे कर्तव्यों में मेरे मुद्दों और कमियों को देखें और फिर मुझे नीची नजरों से देखें, तब भी मुझे इसे सही तरीके से लेना चाहिए। इसलिए मैंने पक्का निर्णय लिया कि चाहे मेरे भाई-बहन मुझे कैसे भी देखें, मुझे उनके सामने खुलकर बोलना और स्वयं को प्रकट करना है और एक ईमानदार व्यक्ति बनना है।

एक सभा के दौरान मेरी जिम्मेदारी वाले एक नए विश्वासी शिआओ या ने मुझसे सुसमाचार का प्रचार करने के बारे में एक सवाल पूछा और उस समय मैंने संक्षेप में थोड़ी संगति की। लेकिन बाद में मैंने पाया कि मेरी संगति में विचलन थे और इससे शिआओ या के मुद्दे का बिल्कुल भी समाधान नहीं हो सका। बाद में पर्यवेक्षक ने पत्र लिखकर मुझसे पूछा कि मैंने शिआओ या की समस्याओं और कठिनाइयों को कैसे हल किया था, मैंने मन में सोचा, “अगर मैं सच्चाई से लिखता हूँ तो पर्यवेक्षक निश्चित रूप से सोचेगी कि एक सिंचनकर्ता के रूप में मैं इतने छोटे से मुद्दे पर भी स्पष्ट रूप से संगति नहीं कर सकता और यह कि मैं वास्तविक कार्य नहीं कर सकता। शायद मैं इसे बस सरसरी तौर पर बता दूँगा और जो वाकई हुआ उसे नहीं लिखूँगा।” जब मैंने इस पर विचार किया तो मुझे एहसास हुआ कि मैं अभी भी धोखा कर रहा हूँ। परमेश्वर ईमानदार लोगों को पसंद करता है, इसलिए मुझे ईमानदार व्यक्ति होना चाहिए और सत्य बोलना चाहिए। अंत में मैंने इसे सच्चाई से लिखा। और जब मैंने ऐसा किया तो मेरे दिल का बोझ आखिरकार हट गया और मुझे बहुत राहत महसूस हुई। बाद में मैंने सही समय पर शिआओ या के साथ संगति की और अपने विचलनों को ठीक किया। बाद में जब मैंने जीवन में भाई-बहनों के साथ बातचीत की और अपने कर्तव्य किए, मैंने एक ईमानदार व्यक्ति होने का अभ्यास किया और भले ही कभी-कभी जब मेरे हित शामिल होते थे, मैं धोखेबाजी से पेश आने के लिए लालायित होता था, मैंने परमेश्वर के वचनों के मार्गदर्शन में भाई-बहनों के साथ सत्य बोलने का चुनाव किया। जब भी मैंने अपने सहभागी भाई-बहनों या पर्यवेक्षक को सच्चाई से रिपोर्ट की, उन्होंने कभी भी खराब प्रदर्शन के लिए मेरी आलोचना नहीं की। इसके विपरीत उन्होंने मुझे याद दिलाया और मेरी मदद की और मेरे साथ सत्य सिद्धांतों पर संगति की। अपने दिल में मैंने सहज और मुक्त महसूस किया और मैं पहले की तरह थका हुआ नहीं था। परमेश्वर के वचनों ने मुझे अपने धोखेबाज स्वभाव को पहचानने में मदद की और यह एहसास दिलाया कि परमेश्वर के वचनों के अनुसार अभ्यास करना, सच और खुलकर बोलने की हिम्मत करना कोई शर्मनाक बात नहीं है। मैंने महसूस किया कि मैं जितना अधिक खुलकर बोलता हूँ, उतना ही अधिक मैं सहज और मुक्त महसूस करता हूँ। परमेश्वर की अगुआई और मार्गदर्शन के लिए उसका धन्यवाद, जिनकी बदौलत मैं ये लाभ हासिल कर पाया हूँ।

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