जीवन प्रवेश कर्तव्य निभाने से प्रारंभ होता है
बहुत-से ऐसे लोग हैं जिन्हें लगता है कि अपना कर्तव्य निभाने के बाद उनमें बहुत ज्यादा कमियाँ हैं और उनमें सत्य वास्तविकता नहीं है, इसलिए वे हमेशा और अधिक धर्मोपदेश सुनने की माँग करते हैं और अगुआओं और कार्यकर्ताओं से और अधिक सभाएँ आयोजित करने के लिए कहते हैं, मानो इसी से वे जीवन में प्रवेश और विकास कर सकेंगे। यदि उन्हें किसी सभा में भाग लिए बिना या धर्मोपदेश सुने बिना कुछ समय हो जाता है, तो उन्हें लगता है कि उनके दिल पूरी तरह से खाली हैं, मानो उनके अंदर कुछ भी नहीं है। अपने दिलों में उन्हें ऐसा लगता है मानो केवल हर दिन धर्मोपदेश सुनने और सभाओं में भाग लेने से ही उन्हें जीवन प्रवेश मिलेगा या वे आध्यात्मिक परिपक्वता में विकसित हो सकेंगे। वे सोचते हैं कि यदि वे हर दिन धर्मोपदेश नहीं सुनते या सभाओं में भाग नहीं लेते और उसके बजाय केवल अपना कर्तव्य निभाने में व्यस्त रहते हैं, तो उनके जीवन में कोई विकास नहीं होगा। इस तरह की सोच पूरी तरह से गलत है। वास्तव में, परमेश्वर में विश्वास करने वाले के रूप में सत्य समझने और वास्तविकता में प्रवेश करने में सक्षम होना मुख्य रूप से परमेश्वर के वचनों का अनुभव और अभ्यास करने पर निर्भर करता है। विशेष रूप से, यदि व्यक्ति अपने कर्तव्य में सभी चीजों में सत्य सिद्धांतों को खोजता है और सिद्धांतों के अनुसार कार्य करने में सक्षम होता है, तो उसका जीवन सर्वाधिक तेजी से विकसित होगा। अगर तुम कहते हो कि तुम परमेश्वर पर निष्ठापूर्वक विश्वास करते हो, लेकिन अपना कर्तव्य निभाना नहीं चाहते, तो फिर परमेश्वर पर तुम्हारे विश्वास में निष्ठा है ही कहाँ? जो लोग निष्ठापूर्वक अपना कर्तव्य निभाते हैं, वही आस्था रखते हैं। जो आस्था रखते हैं, केवल वही परमेश्वर के लिए अपना पूरा जीवन अर्पित करने का साहस करते हैं और परमेश्वर के लिए खुद को खपाने के लिए सब कुछ त्याग सकते हैं। ऐसे लोग अपना कर्तव्य निभाते हुए पवित्र आत्मा के कार्य का अनुभव करते हैं; वे पवित्र आत्मा से प्रबोधन, मार्गदर्शन और अनुशासन प्राप्त करते हैं। यह सब जीवन अनुभव प्रदान करता है। इसलिए, जीवन प्रवेश औपचारिक रूप से अपना कर्तव्य निभाने से शुरू होता है।
अगर लोग अपना कर्तव्य निभाने को लेकर लापरवाह या हमेशा भ्रमित रहते हैं तो तुम्हें यह किस प्रकार का रवैया लगता है? क्या यह महज बेपरवाह होना नहीं है? क्या अपना कर्तव्य निभाने के प्रति तुम्हारा यही रवैया है? यह काबिलियत की समस्या है या स्वभाव की? तुम सबको यह बात स्पष्ट रूप से समझनी चाहिए। अपना कर्तव्य निभाते समय लोग निपट लापरवाह क्यों होते हैं? परमेश्वर के लिए कार्य करते समय वे समर्पित क्यों नहीं होते हैं? उनमें विवेक या अंतरात्मा होती भी है या नहीं? अगर, तुममें सच में अंतरात्मा और विवेक हो, तो कार्यों को करते समय तुम उनमें थोड़ा ज्यादा मन लगाओगे और थोड़ी अधिक सद्भावना, जिम्मेदारी और सोच-विचार का उपयोग करोगे, और तुम ज्यादा प्रयास कर पाने में सक्षम होगे। जब तुम अधिक प्रयास कर सकते हो तो तुम जो कर्तव्य निभाते हो उसके नतीजे सुधर जाएँगे। तुम्हारे नतीजे बेहतर होंगे और अन्य लोगों और परमेश्वर दोनों को संतुष्ट करेंगे। तुम्हें इसे जी-जान से करना होगा! तुम अपने दिमाग को ताक पर रखकर इस तरह काम नहीं कर सकते कि मानो यह एक आम सांसारिक जगह है और इसमें तुम्हें अपने समय के बदले सिर्फ पैसा कमाना है। अगर तुम्हारा रवैया ऐसा है तो तुम मुसीबत में हो। फिर तुम ठीक से कर्तव्य नहीं निभा पाओगे। यह कैसी मानवता है? क्या अंतरात्मा विहीन लोगों में मानवता होती है? नहीं। अगर तुम कहते हो कि तुममें मानवता है और सत्य को अमल में लाकर अपना कर्तव्य अच्छे से निभाना चाहते हो तो अपने कर्तव्य में और अधिक प्रयास करने और इसमें और ज्यादा रमने की जरूरत है। तुम कहते तो हो कि तुममें अंतरात्मा है लेकिन तुम कभी पूरे दिल से अपना कर्तव्य नहीं निभाते। तो क्या तुम्हारी अंतरात्मा किसी काम की है? तुम्हें अपना दिल सही जगह लगाना चाहिए। इन सारी चीजों के बारे में अक्सर सोचना चाहिए—सारी चीजों को समझना चाहिए। अपना कर्तव्य निभाते समय लापरवाह होना एक बहुत बड़ी निषिद्ध बात है। यदि तुम अपना कर्तव्य निभाते समय हमेशा लापरवाह रहते हो, तो तुम्हारे पास अपना कर्तव्य मानक स्तर पर निभाने का कोई तरीका नहीं है। यदि तुम अपना कर्तव्य लगन से निभाना चाहते हो, तो तुम्हें पहले अपने लापरवाह होने की समस्या को ठीक करना होगा। जैसे ही तुम्हें इसके लक्षण दिखाई दें, तुम्हें स्थिति को सुधारने के लिए कदम उठाने चाहिए। अगर तुम भ्रमित रहते हो, समस्याएँ कभी नहीं देख पाते हो, हमेशा ही चीजों को लापरवाही से करते हो तो तुम्हारे पास अपना कर्तव्य ठीक से निभाने का कोई तरीका नहीं होगा। इसलिए, तुम्हें अपने कर्तव्य में अपना दिल झोंकना होगा। लोगों को अपना कर्तव्य निभाने का अवसर मिलना बहुत कठिन है! जब परमेश्वर उन्हें यह अवसर देता है लेकिन वे इसे लपकते नहीं हैं, तो यह अवसर खो जाता है—और भले ही वे बाद में ऐसा अवसर खोजना चाहें, तो शायद वह दोबारा न मिले। परमेश्वर का कार्य किसी की प्रतीक्षा नहीं करता और न ही अपना कर्तव्य निभाने के अवसर किसी की प्रतीक्षा करते हैं। कुछ लोग कहते हैं, “मैंने पहले अपना कर्तव्य अच्छी तरह से नहीं निभाया, लेकिन मैं इसे अभी भी निभाना चाहता हूँ। मैं अपनी विफलता से उबरकर दोबारा डटूँगा।” इस तरह का संकल्प लेना अच्छी बात है लेकिन तुम्हें इस बारे में स्पष्ट होना चाहिए कि अपना कर्तव्य कैसे अच्छी तरह निभाना है : तुम्हें सत्य के प्रति प्रयास करना चाहिए। जो सत्य को समझते हैं केवल वही अपना कर्तव्य अच्छे से निभा सकते हैं। अगर कोई सत्य को नहीं समझता है, तो उसका श्रम भी मानक स्तर का नहीं होगा। सत्य के बारे में तुम जितने अधिक स्पष्ट होगे, तुम अपने कर्तव्य में उतने ही प्रभावी होगे। यदि तुम इस मामले की असलियत देख सकते हो, तो तुम सत्य के लिए प्रयास करोगे और तुम्हें अपना कर्तव्य अच्छे से निभाने की आशा होगी। वर्तमान में कर्तव्य निभाने के बहुत अवसर नहीं हैं, इसलिए जब भी अवसर मिले तुम्हें उन्हें थामे रहना चाहिए। जब कर्तव्य ठीक सामने हो तभी तुम्हें वास्तविक प्रयास करना चाहिए; तभी तुम्हें परमेश्वर के लिए खुद को अर्पित करना चाहिए और खुद को खपाना चाहिए और तभी तुम्हें कीमत चुकानी चाहिए। कोई भी कसर मत रहने दो, कोई षड्यंत्र मत पालो, कोई गुंजाइश मत छोड़ो या अपने लिए बचने का कोई रास्ता मत रखो। यदि तुम कोई गुंजाइश छोड़ते हो या चालें चलते हो, धूर्त हो या ढीले पड़ते हो तो तुम निश्चित ही खराब तरीके से काम करोगे। मान लो, तुम कहते हो, “किसी ने मुझे धूर्तता करते और आलस्य बरतते हुए नहीं देखा। क्या बात है!” यह किस तरह की सोच है? क्या तुम्हें लगता है कि तुमने लोगों की आँखों में धूल झोंक दी, और परमेश्वर की आँखों में भी? लेकिन वास्तव में, क्या परमेश्वर जानता है कि तुमने क्या किया है? वह जानता है। असल में, जो भी तुम्हारे साथ कुछ समय मेल-जोल करता है वह तुम्हारी भ्रष्टता और घिनौनेपन को जान जाएगा; बस इतना है कि वह शायद ऐसा सीधे तौर पर न कहे : वह तुम्हारे बारे में अपने आकलन को अपने दिल में रखेगा। ऐसे बहुत-से लोग हुए हैं जिन्हें इस कारण बेनकाब कर दिया गया और हटा दिया गया कि अधिकतर लोग उनकी असलियत को देख सकते थे और इसलिए उन लोगों को उनकी असलियत के चलते उजागर किया गया और कलीसिया से बाहर निकाल दिया गया। इसलिए, चाहे लोग सत्य का अनुसरण करें या न करें, उन्हें अपनी भरसक क्षमता के अनुसार अपना कर्तव्य अच्छी तरह से निभाना चाहिए; उन्हें अपने जमीर से चलना चाहिए और कुछ वास्तविक चीजें करनी चाहिए। तुममें कमियाँ हो सकती हैं, लेकिन यदि तुम अपना कर्तव्य निभाने में प्रभावी हो सकते हो, तो तुम्हें हटाया नहीं जाएगा। यदि तुम्हें हमेशा यह लगता है कि तुम ठीक हो, कि तुम्हें निश्चित रूप से हटाया नहीं जाएगा, यदि तुम खुद को जानने के लिए कभी चिंतन या कोशिश नहीं करते हो और तुम अभी भी अपने उचित कामों को अनदेखा करते हो और हमेशा लापरवाह रहते हो, तो जब परमेश्वर के चुने हुए लोग वास्तव में तुम्हारे प्रति अपनी सहनशीलता खो देंगे, वे तुम्हें तुम्हारी असलियत के लिए उजागर कर देंगे, और तुम्हें हटा दिया जाएगा। तब, पछतावों के लिए बहुत देर हो जाएगी, क्योंकि सभी ने तुम्हारी असलियत देख ली होगी, और तुमने अपनी सारी गरिमा और सत्यनिष्ठा खो दी होगी। यदि कोई तुम पर भरोसा नहीं करता है, तो क्या परमेश्वर तुम पर भरोसा करेगा? परमेश्वर मनुष्य के अंतरतम हृदय की पड़ताल करता है : वह ऐसे व्यक्ति पर बिल्कुल भी भरोसा नहीं करेगा। यदि तुम्हारा सामना किसी अविश्वसनीय व्यक्ति से होता है, तो किसी भी परिस्थिति में उसे कोई काम मत सौंपो। यदि तुम किसी व्यक्ति से परिचित नहीं हो और तुमने केवल अन्य लोगों को यह कहते सुना है कि वह चीजों को काफी अच्छी तरह से कर सकता है, लेकिन अपने दिल में तुम शत-प्रतिशत आश्वस्त नहीं हो, तो तुम बस इतना कर सकते हो कि पहले उसे सँभालने के लिए कोई छोटा या साधारण काम दो। जब वह छोटे और साधारण काम करने में सफल हो, तभी तुम्हें उसे महत्वपूर्ण काम सौंपने चाहिए। यदि वह साधारण काम भी बिगाड़ दे, तो यह व्यक्ति भरोसेमंद नहीं है। उसे कुछ नहीं सौंपा जा सकता, चाहे वह कुछ भी हो। यदि तुम्हें कोई ऐसा व्यक्ति दिखे जो दयालु और जिम्मेदार है, जो अपने काम में कभी लापरवाह नहीं होता, जो दूसरों द्वारा सौंपे गए कामों को उतनी ही गंभीरता से लेता है जैसे कि वे उसके अपने हों, जो काम के हर पहलू को करते समय तुम्हें ध्यान में रखता है, तुम्हारी जरूरतों के बारे में सोचता है, चीजों पर पूरी तरह से और व्यापक रूप से विचार करता है और चीजों को बिल्कुल सही तरीके से सँभालता है और तुम्हें अपने काम से विशेष रूप से संतुष्ट कर देता है—तो यह उस तरह का व्यक्ति है जो भरोसेमंद है। भरोसेमंद लोग वे होते हैं जिनमें मानवता होती है, और जिन लोगों में मानवता होती है उनमें जमीर और विवेक होता है, उनके लिए अपना कर्तव्य अच्छी तरह से निभाना बहुत आसान होना चाहिए, क्योंकि वे अपने कर्तव्य के साथ इस तरीके से पेश आते हैं जैसे वह उनके हिस्से में आया है और इसे निभाने के लिए वे इसमें अपना दिल लगाते हैं। जमीर या विवेक के बिना लोग निश्चित रूप से अपना कर्तव्य खराब तरीके से निभाएँगे। वे चाहे कोई भी कर्तव्य करें, जिम्मेदारी से काम नहीं करते। दूसरों को हमेशा उनकी चिंता करनी पड़ती है, उनका पर्यवेक्षण करना पड़ता है और उनके काम के बारे में पूछताछ करनी पड़ती है; यदि नहीं, तो वे अपना कर्तव्य निभाते समय समस्याएँ पैदा कर सकते हैं और कोई काम करते समय कुछ बुरा कर सकते हैं, जो फायदे से कहीं ज्यादा मुसीबत भरा होगा। संक्षेप में, लोगों को अपना कर्तव्य निभाते समय हमेशा अपनी जाँच करनी चाहिए : “क्या मैंने यह कर्तव्य मानक स्तर पर निभाया है? क्या मैंने इसमें अपना दिल लगाया है? क्या मैं लापरवाही की दशा में रहा हूँ?” यदि तुम हमेशा लापरवाह रहते हो तो तुम खतरे में हो। कम से कम इसका मतलब है कि तुम्हारी कोई विश्वसनीयता नहीं है और लोग तुम पर भरोसा नहीं कर सकते। इससे भी गंभीर बात यह है कि यदि तुम अपना कर्तव्य निभाते समय हमेशा लापरवाह रहते हो, और यदि तुम हमेशा परमेश्वर को धोखा देते हो, तो तुम बहुत बड़े खतरे में हो! खुलेआम धोखा देने में शामिल होने के क्या परिणाम होते हैं? हर कोई देख सकता है कि तुम जानबूझकर गलत कर रहे हो। तुम पूरी तरह से अपने भ्रष्ट स्वभावों के अनुसार जी रहे हो, और अपने कर्तव्य में तुम केवल लापरवाही करते हो, और सत्य का बिल्कुल भी अभ्यास नहीं करते—इसका मतलब है कि तुम मानवता से रहित हो! यदि यह तुममें हर समय प्रकट होता है—तुम कोई बड़ी गलती नहीं करते लेकिन छोटी-मोटी गलतियाँ लगातार करते रहते हो, और शुरू से अंत तक अपश्चात्तापपूर्ण रहते हो तो तुम एक बुरे व्यक्ति हो, एक छद्म-विश्वासी हो और तुम्हें बाहर निकाल दिया जाना चाहिए—यह एक गंभीर परिणाम है। तुम्हें एक छद्म-विश्वासी और एक बुरे व्यक्ति के रूप में पूरी तरह से बेनकाब कर दिया जाता है और हटा दिया जाता है।
तुम जो भी कर्तव्य निभाते हो उसमें जीवन प्रवेश शामिल होता है। तुम्हारा कर्तव्य काफी नियमित हो या अनियमित, नीरस हो या जीवंत, तुम्हें हमेशा जीवन प्रवेश हासिल करना ही चाहिए। कुछ लोगों द्वारा किए गए कर्तव्य एकरसता वाले होते हैं; वे हर दिन वही चीज करते रहते हैं। मगर, इनको निभाते समय, ये लोग अपनी जो दशाएँ प्रकट करते हैं वे सब एक-समान नहीं होतीं। कभी-कभार अच्छी मनःस्थिति में होने पर लोग थोड़े ज्यादा चौकस होते हैं और बेहतर काम करते हैं। अन्य समय में, किसी अज्ञात प्रभाव के कारण, उनके शैतानी भ्रष्ट स्वभाव उनमें शरारत पैदा कर देते हैं जिससे उनके विचार अनुचित हो जाते हैं; वे बुरी दशाओं और बुरी मनःस्थितियों में पड़ जाते हैं और अंततः अपने कर्तव्य लापरवाह तरीके से निभाते हैं। लोगों की आंतरिक दशाएँ उनके परिवेश के अनुसार बदलेंगी, लेकिन वे चाहे कैसे भी बदलें, यदि कोई व्यक्ति सत्य समझता है तो वह सिद्धांतों के अनुसार कार्य कर सकता है। अपनी मनःस्थिति के आधार पर काम करना गलत है; यह अपनी प्राथमिकताओं के आधार पर काम करना है। जब तुम अच्छी मनःस्थिति में होते हो, तो तुम जो करते हो उसमें थोड़ा दिल लगा सकते हो और जब तुम बुरी मनःस्थिति में होते हो, तो तुम जो करते हो उसमें अपना दिल नहीं लगाते और लापरवाही से काम करते हो—क्या यह काम करने का सैद्धांतिक तरीका है? क्या यह तरीका तुम्हें अपने कर्तव्य को एक मानक स्तरीय ढंग से निभाने देगा? मनःस्थिति चाहे जैसी हो, लोगों को परमेश्वर के सामने प्रार्थना करना और सत्य की खोज करना आना चाहिए, सिर्फ इसी तरीके से वे अपनी मनःस्थिति द्वारा बाधित होने, और उसके द्वारा इधर-उधर भटकाए जाने से बच सकते हैं। अपना कर्तव्य निभाते समय तुम्हें हमेशा खुद को जाँच कर देखना चाहिए कि क्या तुम सिद्धांत के अनुसार काम कर रहे हो, तुम्हारा कर्तव्य निर्वाह सही स्तर का है या नहीं, कहीं तुम इसे लापरवाह ढंग से तो नहीं कर रहे हो, कहीं तुम बहानेबाज और सुस्त तो नहीं रहे हो, कहीं तुम्हारे रवैये और तुम्हारे सोचने के तरीके में कोई खोट तो नहीं। एक बार तुम्हारे आत्मचिंतन कर लेने और तुम्हारे सामने इन चीजों के स्पष्ट हो जाने से, अपना कर्तव्य निभाने में तुम्हें आसानी होगी। अपना कर्तव्य निभाते समय तुम्हारा किसी भी चीज से सामना हो—काट-छाँट के बाद नकारात्मकता और कमजोरी या बुरी मनःस्थिति में हो—तुम्हें इससे ठीक से पेश आना चाहिए, और तुम्हें साथ ही सत्य को खोजना और परमेश्वर के इरादों को समझना चाहिए। ये काम करने से तुम्हारे पास अभ्यास का एक मार्ग होगा। अगर तुम अपना कर्तव्य निर्वाह बहुत अच्छे ढंग से करना चाहते हो, तो तुम्हें अपनी मनःस्थिति से बिल्कुल प्रभावित नहीं होना चाहिए। तुम चाहे कितने भी नकारात्मक या कमजोर महसूस कर रहे हो, तुम्हें सत्य का अभ्यास करना चाहिए, अपने दायित्व और जिम्मेदारियाँ पूरी करनी चाहिए और अपने हर काम में सिद्धांतों पर कायम रहना चाहिए। यदि तुम ऐसा करते हो, तो न केवल अन्य लोग तुम्हें स्वीकार करेंगे, बल्कि परमेश्वर भी तुम्हें पसंद करेगा। इस प्रकार, तुम एक ऐसे व्यक्ति होगे जो जिम्मेदार है, जो जिम्मेदारी ले सकता है, जो वास्तव में अच्छा है और जो वास्तव में अपने कर्तव्य मानक के अनुरूप निभाता है और तुम पूरी तरह से एक सच्चे इंसान के समान जिओगे। ऐसे लोगों का शुद्धिकरण किया जाता है और वे अपने कर्तव्य निभाते समय वास्तविक बदलाव हासिल करते हैं, वे परमेश्वर की दृष्टि में ईमानदार लोग कहे जा सकते हैं। केवल ईमानदार लोग ही सत्य का अभ्यास करने में डटे रह सकते हैं ताकि वे सिद्धांत के साथ क्रियाकलाप करना हासिल कर सकें और अपने कर्तव्य मानक के अनुरूप निभाने में सक्षम हो सकें। सिद्धांत पर चलकर कर्म करने वाले लोग अच्छी मनोदशा में होने पर अपना कर्तव्य ध्यान से निभाते हैं; वे लापरवाह ढंग से कार्य नहीं करते, वे ढीठ नहीं होते और दूसरे उनके बारे में ऊँचा सोचें इसके लिए दिखावा नहीं करते। बुरी मनःस्थिति में होने पर भी वे अपने रोजमर्रा के काम को उतनी ही ईमानदारी और जिम्मेदारी से पूरा करते हैं और यदि वे किसी कष्टदायक चीज का सामना भी करते हैं जो अपने कर्तव्य निभाते समय उन पर दबाव डालती है या बाधा पहुँचाती है तो भी वे परमेश्वर के सामने अपने दिल को शांत रख पाते हैं और यह कहते हुए प्रार्थना करते हैं, “मेरे सामने चाहे जितनी बड़ी समस्या खड़ी हो जाए—भले ही आसमान फट कर गिर पड़े—जब तक मैं जीवित हूँ, मुझे अपना कर्तव्य पूरा करना होगा। मेरे जीवन का प्रत्येक दिन वह दिन है जब मुझे अच्छी तरह से अपना कर्तव्य निभाना होगा, ताकि मैं परमेश्वर द्वारा मुझे दिए गए इस कर्तव्य और उसके द्वारा मेरे शरीर में प्रवाहित इस साँस के योग्य बना रहूँ। चाहे जितनी भी मुश्किलों में रहूँ, मैं उन सबको परे रख दूँगा क्योंकि अपना कर्तव्य पूरा करना मेरे लिए सबसे अधिक महत्वपूर्ण है!” जो लोग किसी व्यक्ति, घटना, चीज या माहौल से प्रभावित नहीं होते, जो किसी मनःस्थिति या बाहरी स्थिति से बेबस नहीं होते, और जो परमेश्वर द्वारा उन्हें सौंपे गये कर्तव्यों और आदेशों को सबसे आगे रखते हैं—वही परमेश्वर के प्रति निष्ठावान होते हैं और सच्चाई के साथ उसके सामने समर्पण करते हैं। ऐसे लोगों ने जीवन प्रवेश हासिल किया है और सत्य वास्तविकता में प्रवेश किया है। यह सत्य को जीने की सबसे सच्ची और व्यावहारिक अभिव्यक्तियों में से एक है। क्या इस तरह जीना किसी को सुकून दे सकता है? क्या तुम्हें इस बात को लेकर परेशान होने की जरूरत है कि परमेश्वर तुम्हें कैसे देखता है? तुम कैसे कहोगे कि सुकून महसूस करने के लिए तुम्हें कार्य करने की जरूरत है? (अपने कर्तव्य को सर्वोपरि रखो, और खुद को किसी भी व्यक्ति, घटना या चीज से बेबस न होने दो। सिर्फ इसी तरीके से तुम परमेश्वर को निराश करने से बच सकते हो।) बिल्कुल सही, सुकून पाने का यही राज है। क्या तुम सब इस राज को जान चुके हो? अगर तुमसे बात करते हुए किसी व्यक्ति का रवैया बुरा है, और वह तुम्हें किनारे धकेलना चाहता है या तुममें जानबूझकर गलतियाँ ढूँढ़ना चाहता है, तो तुम नाखुश महसूस करोगे, मानो किसी ने तुम्हें चाकू घोंप दिया हो। तुम्हारी भूख और नींद उड़ जाएगी। हर हाल में तुम्हारा मन खट्टा रहेगा, और दिल में काँटे चुभेंगे। इस बिंदु पर तुम क्या करोगे? तुम कह सकते हो, “आज मेरा मन खराब है, इसलिए मैं कुछ दिन अपने कर्तव्य से दूर रहूँगा,” या “मैं अपना कर्तव्य तो निभाऊँगा, लेकिन अगर आधे-अधूरे दिल या बेमन से भी करूँ तो चलेगा। हर किसी की जिंदगी में ऐसा वक्त आता है जब चीजें अपनी इच्छानुसार नहीं होतीं, इसलिए अगर मेरी मनःस्थिति खराब है तो परमेश्वर मुझसे बहुत ज्यादा अपेक्षा नहीं करेगा, है न? मैं आज बस कुछ देर के लिए अपने कर्तव्य से दूर रहूँगा। कोई दिक्कत नहीं, कल अच्छा काम कर लूँगा। परमेश्वर छह हजार वर्षों से अपना काम करता चला आ रहा है, इसलिए अगर मैं एक दिन की देर कर दूँ तो क्या उसे वाकई फर्क पड़ेगा?” किस प्रकार का व्यक्ति छोटी-छोटी चीजों से अपनी मनोदशा खराब होने देता है, और फिर इससे अपने कर्तव्य को लाजिमी तौर पर प्रभावित होने देता है? क्या यह बचकाना, निराशाजनक स्वभाव नहीं है? जब उनके साथ कुछ भी अप्रिय घटता है तो वे गुस्सा हो जाते हैं, पूरी तरह से अविवेकी हो जाते हैं, अपना कर्तव्य नहीं निभाते, संकल्प खो बैठते हैं और अपनी प्रतिज्ञाएँ भूल जाते हैं। यह कैसी समस्या है? क्या यह मनमानी नहीं है? संभव है कुछ लोग आम तौर पर ऐसे पेश न आते हों लेकिन मनःस्थिति खराब होने पर वे अपना काम त्याग देते हैं। ऐसी चीजें अक्सर होती हैं। कुछ लोग ऐसे होते हैं जो मनःस्थिति खराब होने पर कुछ हद तक प्रभावित होते हैं, नतीजतन कर्तव्य निभाने के दौरान उनमें कोई ऊर्जा नहीं रहती और वे कोई उत्साह जुटा पाने में असमर्थ होते हैं। जब ऐसा हो तो क्या करना चाहिए? क्या इन समस्याओं को हल नहीं करना चाहिए? कुछ लोग कहते हैं, “इनका समाधान नहीं हो सकता। अभी के लिए मैं इसे हल नहीं करना चाहता और जैसा चल रहा है, चलने दूँगा। कुछ भी हो, मेरी मनःस्थिति बिगड़ी हुई है और मैं नहीं चाहता कि कोई मुझसे बात करे। बस कुछ देर मुझे मायूस रहने दो।” यद्यपि वे अब भी अपना कर्तव्य निभा रहे होते हैं, लेकिन वे केवल शरीर से मौजूद रहते हैं, मन से नहीं। पता नहीं, उनका दिल कहाँ भटकने चला गया। वे अपने कर्तव्य को लेकर जिम्मेदार नहीं हैं, वे कोई प्रयास नहीं करते, और कमजोर हैं। लेकिन, जब उनकी मनःस्थिति सुधरती है तो उत्साह भी लौट आता है; वे दुबारा कठिनाई और थकान झेलने लायक हो जाते हैं और अपने भोजन को लेकर परेशान नहीं होते। क्या यह सब थोड़ा-सा असामान्य नहीं है? लोग इतनी सारी विभिन्न भावनाओं और परिस्थितियों से प्रभावित क्यों होते हैं? क्या तुमने कभी कारण ढूँढ़े? क्या तुम लोग अक्सर इन चीजों से परेशान नहीं होते? क्या अक्सर इन दशाओं में नहीं फँसते? क्या यही समस्या तुम लोगों की नहीं है? (है।) अगर इन समस्याओं का हल न निकाला गया तो लोग कभी परिपक्व नहीं हो पाएँगे; वे हमेशा बच्चे ही बने रहेंगे। उदाहरण के लिए, अगर कोई व्यक्ति तुम्हारी भावनाओं का ख्याल रखे बिना कुछ ऐसा कहे जो आंशिक या परोक्ष रूप से तुम्हारे बारे में हो, या तुम्हारे बारे में कोई टेढ़ी बात करे, तो तुम थोड़े-से असहज हो जाओगे। यदि तुम किसी से बात करो और वह तुम्हारी बात पर ध्यान न दे, या अपने चेहरे पर अच्छा भाव व्यक्त न करे, तो तुम असहज हो जाओगे। अगर कोई दिन ऐसा बीता जिसमें तुम अपनी इच्छानुसार कर्तव्य न निभा पाए तो भी असहज हो जाओगे। अगर कोई बुरा सपना देखो जो अपशकुन जैसा हो तो भी यही स्थिति होगी। अगर अपने परिवार के बारे में कोई बुरी खबर सुनो तो असहज होकर तुम्हारी मनःस्थिति बिगड़ जाएगी और तुम निराश हो जाओगे। अगर किसी व्यक्ति को अपना कर्तव्य अच्छे से करते देखो, और उसे प्रशंसा मिलने के साथ अगुआ के रूप में पदोन्नति मिल जाए तो इससे भी तुम असहज हो जाओगे और तुम्हारी मनोदशा पर असर पड़ेगा...। तुम्हें प्रभावित करने वाली ये सारी छोटी-बड़ी चीजें तुम्हें नकारात्मकता के चंगुल में फँसा सकती हैं, मायूस कर सकती हैं, और तुम्हारे कर्तव्य निभाने की क्षमता पर असर डाल सकती हैं। इस तरह पेश आने वाले लोगों में क्या समस्या होती है? (उनका स्वभाव अस्थिर होता है।) अस्थिर स्वभाव इसका एक पहलू है। उनकी मानवता अपरिपक्व और बचकानी होती है, और उनमें कोई अंतर्दृष्टि नहीं होती है। जहाँ तक उनके जीवन प्रवेश की बात है, वे हमेशा तमाम तरह के लोगों, घटनाओं और चीजों से बेबस हो जाते हैं, इसलिए उनके लिए सत्य का अभ्यास करना आसान नहीं होता है। अगर वे सत्य का अभ्यास नहीं कर सकते तो वे सत्य वास्तविकता में प्रवेश नहीं कर सकते, और अगर वे सत्य वास्तविकता में प्रवेश नहीं कर सकते तो उनका जीवन प्रवेश भी नहीं होगा। क्या ऐसा ही नहीं होता है? वे लोगों, घटनाओं और चीजों के सामने क्यों बेबस होते हैं? इसका कारण यह है कि वे न तो सत्य समझते हैं, न सत्य-असत्य की पहचान कर पाते हैं और न ही उचित-अनुचित व्यक्ति की। फलस्वरूप वे नहीं जान पाते कि अभ्यास कैसे करना है, न आगे बढ़ पाते हैं, न ही पीछे हट पाते हैं। यह इसका दुष्परिणाम है। ज्यादातर नए विश्वासी इस दशा में होते हैं। जब वे सत्य समझने लगते हैं, चीजों को साफ-साफ देख सकते हैं, और लोगों की पहचान कर सकते हैं तो उनकी यह समस्या सहज रूप से दूर हो जाएगी। लेकिन जो सत्य से प्रेम नहीं करते, वे समस्या आने पर सत्य नहीं खोजते हैं। ऐसा व्यक्ति कभी भी तमाम तरह के लोगों, घटनाओं और चीजों से होने वाली बेबसी को दूर नहीं कर पाएगा। लोगों, घटनाओं और चीजों के सामने बेबस होने वाले लोगों में किस प्रकार की दशाएँ दिखती हैं? वे आसानी से नकारात्मक हो जाते हैं, और असफल होने या कठिनाइयाँ सामने आने पर लड़खड़ा जाते हैं। इन चीजों से उनकी मनःस्थिति और अपना कर्तव्य निभाने की क्षमता पर असर पड़ता है। जो लोग सत्य नहीं समझते हैं, वे तमाम तरह के लोगों, घटनाओं और चीजों के सामने आसानी से बेबस हो जाते हैं। उनका जीवन प्रवेश बहुत धीमा हो जाता है, और वे चाहे जितने सालों से विश्वासी रहे हों, वे कोई स्पष्ट प्रगति नहीं कर पाते हैं। उनमें कोई बदलाव नहीं आता है और वे कमोबेश अविश्वासियों जैसे ही हैं। यह सब सत्य न खोजने का नतीजा है। कारण यही है। संक्षेप में, परमेश्वर पर विश्वास करते हुए तुम्हें चाहे जितने साल हो चुके हों, तुम चाहे जितनी काबिलियत या जितनी उम्र के हो, जब तक सत्य से प्रेम नहीं करते या सभी चीजों में सत्य नहीं खोजते, तब तक तुम तमाम लोगों, घटनाओं और चीजों से आसानी से बेबस होते रहोगे। तुम न तो उचित तरीके से कार्य करना सीख पाओगे, न ही यह जान पाओगे कि सत्य का अभ्यास कैसे करें या सिद्धांतों के अनुसार कैसे रहें। यदि तुम मनुष्यों की धारणाओं के अनुसार कार्य करते भी हो और बुरे काम नहीं करते, तब भी तुम यह नहीं जान पाओगे कि तुम परमेश्वर के इरादों के अनुरूप चल रहे हो या नहीं। ऐसा व्यक्ति चाहे जितने साल से विश्वासी हो, वह अपनी अनुभवजन्य गवाही के बारे में बात नहीं कर पाएगा, क्योंकि वह न तो यह समझता है कि परमेश्वर के कार्य का अनुभव कैसे किया जाए, न ही लेशमात्र सत्य समझता है। जो लोग सत्य का अनुसरण नहीं करते वे ऐसे ही होते हैं; वे चाहे जितने अरसे से परमेश्वर में विश्वास कर रहे हों, उनके पास बताने लायक कोई गवाही नहीं होती है। उनका आध्यात्मिक कद बहुत छोटा होता है, और उनके पास सत्य वास्तविकता नहीं होती।
इस समय लोग अपना कर्तव्य निभाने में सक्रिय हैं। उनमें अपना कर्तव्य निभाने, परमेश्वर के लिए खुद को खपाने और उसके लिए चीजों का परित्याग करने और खुद को अर्पित करने का दृढ़ निश्चय भी है। कुछ ऐसे लोग भी हैं जिन्होंने अपना संपूर्ण जीवन परमेश्वर को अर्पित करने और खुद को उसके लिए खपा देने की कई बार शपथ ली है। उनमें ये सारी चीजें हैं मगर उन्होंने जीवन प्रवेश नहीं किया है। अगर किसी व्यक्ति का जीवन प्रवेश नहीं हुआ है तो फिर तमाम तरह के जटिल लोगों, घटनाओं और चीजों के साथ उसके लिए अपने आप को टिकाए रख पाना या समस्या से निपटना काफी कठिन होगा। न तो वे कोई दिशा पा सकते हैं, न ही कोई रास्ता, उन्हें अक्सर लगता है कि वे अपनी नकारात्मक दशा से नहीं निकल सकते हैं। वे हर तरह के लोगों, घटनाओं और चीजों में उलझकर इनसे बेबस, नियंत्रित और बंधे होते हैं, और अभ्यास का सबसे सही तरीका नहीं जानते हैं। अब मैं तुम लोगों को अभ्यास का एक सिद्धांत बताता हूँ : तुम्हारे साथ चाहे जो भी घटित हो, चाहे यह कोई परीक्षा हो या परीक्षण, चाहे तुम्हारी काट-छाँट हो रही हो, लोग तुम्हारे साथ चाहे जैसे पेश आएँ, तुम्हें पहले इन चीजों को परे रखना चाहिए और परमेश्वर के सामने आना चाहिए, गंभीरतापूर्वक प्रार्थना करनी चाहिए और सत्य खोजना चाहिए ताकि तुम अपनी दशा को ठीक कर सको। पहले यही करना चाहिए। तुम्हें कहना चाहिए, “यह मामला चाहे जितना बड़ा हो, चाहे आसमान टूट पड़े, मुझे अपना कर्तव्य अच्छे से निभाना है। जब तक मेरी साँस चल रही है, मैं अपना कर्तव्य नहीं छोड़ूँगा।” तो फिर तुम अपना कर्तव्य अच्छी तरह कैसे निभाते हो? तुम खानापूरी नहीं कर सकते या शरीर से हाजिर होकर लेकिन मन भटकाकर नहीं रह सकते हो—तुम्हें अपने कर्तव्य में दिल और मन लगाना होगा। तुम्हारे सिर पर चाहे जितने बड़े मामले हों, पहले उन्हें परे रखकर परमेश्वर के पास आकर यह जानना होगा कि अपना कर्तव्य कैसे अच्छी तरह निभाएँ ताकि यह परमेश्वर को संतुष्ट करे। यह सोचने की कोशिश करनी चाहिए, “आज मेरा सामना इस चीज से हुआ, मैं अपना कर्तव्य अच्छी तरह कैसे करूँगा? पहले मैंने लापरवाही से काम किया, इसलिए आज मुझे अपना तरीका बदलना होगा और कर्तव्य अच्छे से पूरा करने में जुटना होगा, ताकि मेरे कर्तव्य का प्रदर्शन त्रुटिहीन हो। महत्वपूर्ण यह है कि मैं परमेश्वर को निराश न करूँ। मुझे उसके दिल को सहज रखना है, ताकि जब वह मुझे अपना कर्तव्य निभाते देखे तो जाने कि मैं आज्ञाकारी और विनम्र ही नहीं, बल्कि समर्पित भी हूँ।” अगर तुम इसे अभ्यास में लाते हो और इस दिशा में प्रयास करते हो तो अपना कर्तव्य निभाने में तुम्हें कोई देर नहीं करा सकता है, या तुम्हारे कर्तव्य के कारगर होने पर असर नहीं डाल सकता है। जैसे-जैसे तुम निरंतर प्रार्थना कर सत्य खोजते रहोगे और परमेश्वर के वचन समझने की कोशिश करते रहोगे तो देह के भावनात्मक मामलों को आसानी से समझने और हल करने में भी सक्षम हो जाओगे; लेकिन कोई व्यक्ति ऐसा तभी कर पाएगा, जब वह सत्य को स्वीकार ले। अगर सत्य समझ लोगे, तो कोई भी समस्या हल हो सकती है। तुम्हारी उदासी, निराशा, चिंताएँ-शंकाएँ और दिल में बैठी नकारात्मकता सबकी सब पूरी तरह दूर की जा सकती हैं। तब तुम्हारी मनःस्थिति धीरे-धीरे सुधरने लगेगी और तुम पूरी तरह मुक्त हो जाओगे। यदि तुम्हारे सामने वास्तविक मुश्किलें हैं, तो सत्य खोजना और समर्पण करना सीखना चाहिए। जब किसी व्यक्ति का इस प्रकार की चीजों से पाला पड़ता है तो यह उसके आध्यात्मिक कद की परख होती है और इससे पता चलता है कि वह कौन है, ताकि यह दिख सके कि वह सत्य को अभ्यास में ला सकता है या नहीं।
अपना कर्तव्य उस ढंग से निभाने के लिए जो कि मानक के अनुरूप हो, पहले तुममें उचित मानसिकता होनी चाहिए। जब भ्रष्ट स्वभाव प्रकट हो तो तुम्हें अपनी दशा भी सुधारनी होगी। जब तुम अपने कर्तव्य के प्रति सही ढंग से पेश आने में सक्षम होते हो, जब तमाम तरह के लोगों, घटनाओं और चीजों से होने वाली बेबसी और उनके प्रभावों से मुक्त हो चुके हो, जब खुद को पूरी तरह से परमेश्वर को समर्पित कर सकते हो, तब तुम अपना कर्तव्य ठीक से निभाने में सक्षम होगे। ऐसा करने का राज यही है कि अपने कर्तव्य और जिम्मेदारियों को सर्वोपरि रखो। अपना कर्तव्य निभाने की प्रक्रिया में तुम्हें हमेशा अपनी जाँच करनी चाहिए : “क्या अपना कर्तव्य निभाने के प्रति मेरा रवैया लापरवाही भरा है? कौन-सी चीजें मेरा कर्तव्य निभाने में बाधा डालती हैं और मुझे लापरवाह बनाती हैं? क्या मैं अपना कर्तव्य पूरे दिल और ताकत से निभा रहा हूँ? यदि मैं इस तरह से कार्य करूँगा तो क्या परमेश्वर मुझ पर भरोसा करेगा? क्या मेरे पास परमेश्वर के प्रति समर्पण करने वाला दिल है? क्या मेरा इस तरह से अपना कर्तव्य निभाना सिद्धांतों के अनुरूप है? क्या यह सर्वोत्तम परिणाम प्राप्त कर सकता है?” तुम्हें अक्सर इन सवालों पर चिंतन करना चाहिए। जब तुम्हें समस्याएँ दिखाई दें तो सक्रिय होकर सत्य खोजना चाहिए और इन्हें हल करने के लिए परमेश्वर के प्रासंगिक वचन तलाशने चाहिए। इस तरह तुम अपना कर्तव्य ठीक से निभाने में सक्षम होगे और तुम्हारे दिल को शांति और खुशी मिलेगी। जब तुम अपना कर्तव्य निभाते हो तब यदि समस्याएँ अक्सर उत्पन्न होती हैं, तो इस समस्या की जड़ कहाँ है? समस्या तुम्हारे दिल के साथ है; यह भ्रष्ट स्वभावों के होने का मामला है। जब किसी व्यक्ति का भ्रष्ट स्वभाव प्रकट हो जाता है, तो उसके हृदय में समस्याएँ होंगी और उसकी दशा असामान्य रहेगी, जिसका सीधा असर इस बात पर पड़ेगा कि वह अपना कर्तव्य कैसे निभाता है। जो समस्याएँ व्यक्ति के कर्तव्य पर असर डालती हैं वे समस्याएँ बड़ी, गंभीर होती हैं; वे परमेश्वर के साथ व्यक्ति के संबंध को सीधे प्रभावित कर सकती हैं। उदाहरण के लिए, जब कुछ लोगों के परिवारों पर विपदा आती है तो वे परमेश्वर को लेकर धारणाएँ और गलतफहमियाँ विकसित कर लेते हैं। कुछ लोग जब अपने कर्तव्य में थोड़ी-बहुत कठिनाई झेलते हैं और इसे कोई देखता नहीं या इसके लिए कोई उनकी प्रशंसा नहीं करता तो वे नकारात्मक हो जाते हैं। कुछ लोग अपना कर्तव्य ठीक से नहीं निभाते, हमेशा अनमने बने रहते हैं, और जब उनकी काट-छाँट की जाती है तो वे परमेश्वर के विरुद्ध शिकायत करने लगते हैं। कुछ लोग अपना कर्तव्य निभाने के इसलिए अनिच्छुक होते हैं क्योंकि वे हमेशा बचने का रास्ता ढूँढ़ने में लगे रहते हैं। ये सारी समस्याएँ परमेश्वर के साथ सामान्य संबंध पर सीधा असर डालती हैं। ये सब भ्रष्ट स्वभावों की समस्याएँ हैं। ये सब इस तथ्य से उत्पन्न होती हैं कि लोग परमेश्वर या उसके कार्य को नहीं जानते और हमेशा अपने रुतबे और प्रतिष्ठा, अपनी संभावनाओं और नियति और अपने दैहिक हितों के लिए योजना बनाते हैं और उन्हीं पर विचार करते हैं, जो उन्हें परमेश्वर के इरादों के प्रति विचारशील होने और परमेश्वर की व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करने से रोकता है जिससे सभी प्रकार की नकारात्मक भावनाएँ पैदा हो जाती हैं। जो लोग सत्य का अनुसरण नहीं करते, वे ऐसे ही होते हैं। जब उन्हें कुछ कठिन स्थितियों का सामना करना पड़ता है, तो वे नकारात्मक और कमजोर हो जाते हैं; जब उनका सामना ऐसी चीजों से होता है जो उनके मन-मुताबिक नहीं होतीं, तो वे अपनी हताशा अपने कर्तव्य पर निकालते हैं। अपना कर्तव्य निभाते समय वे लगातार नकारात्मक हो जाते हैं, ढिलाई बरतते हैं और लापरवाही से काम करते हैं; वे परमेश्वर के खिलाफ विद्रोह और उसका प्रतिरोध करते रहते हैं और यहाँ तक कि परमेश्वर को धोखा देते हुए अपना काम छोड़ देना चाहते हैं। ये सभी वे विभिन्न परिणाम हैं जो तब उत्पन्न होते हैं जब व्यक्ति अपने भ्रष्ट स्वभावों से बेबस होता है। जो व्यक्ति सत्य से प्रेम करता है, वह अपना जीवन, अपनी संभावनाएँ और नियति अलग रखने में सक्षम होता है और वह केवल सत्य का अनुसरण करना और उसे प्राप्त करना चाहता है। वह सोचता है कि पर्याप्त समय नहीं है, वह डरता है कि वह अपना कर्तव्य अच्छी तरह से निभाने में विफल रहेगा और पूर्ण नहीं बनाया जाएगा, इसलिए वह सब-कुछ त्यागने और परमेश्वर के लिए खुद को खपाने में सक्षम होता है। उसकी मानसिकता केवल परमेश्वर पर ध्यान केंद्रित करने और परमेश्वर के प्रति समर्पण करने की होती है। ऐसी कोई कठिनाई नहीं है जो उन्हें डगमगा सके और यदि वे नकारात्मक या कमजोर महसूस करते हैं, तो वे परमेश्वर के वचनों के कुछ अंश पढ़कर स्वाभाविक रूप से इसे हल कर लेते हैं। जो लोग सत्य का अनुसरण नहीं करते, वे बहुत परेशानी पैदा करने वाले होते हैं; सत्य पर चाहे कैसे भी संगति की जाए, यह उनकी समस्याएँ पूरी तरह से हल नहीं कर सकता। भले ही वे क्षण भर के लिए मान भी जाएँ और सत्य स्वीकार करने में सक्षम हो जाएँ तो भी, वे बाद में इससे मुकर जाएँगे, इसलिए इस तरह के व्यक्ति को सँभालना बहुत मुश्किल है। ऐसा नहीं है कि वे सत्य का एक कण भी नहीं समझते; बात यह है कि वे अपने दिलों में सत्य को सँजोते या स्वीकार नहीं करते। परिणामस्वरूप, वे कभी अपनी इच्छा अलग रखने या अपने व्यक्तिगत हितों, अपनी संभावनाओं और भाग्य और अपने परिणाम और मंजिल को छोड़ने में सक्षम नहीं होते। उनके दिल हमेशा इन चीजों से बाधित और बेबस रहते हैं जिससे वे अपना कर्तव्य अच्छी तरह से निभाने में असमर्थ हो जाते हैं। यदि कोई व्यक्ति सत्य स्वीकार करने में सक्षम है, तो एक बार जब वह इसे समझ लेता है तो भ्रष्ट स्वभावों से संबंधित सभी चीजें स्वाभाविक रूप से गायब हो जाएँगी और उसके पास जीवन प्रवेश और आध्यात्मिक कद होगा; वह अब एक अज्ञानी बच्चा नहीं रहेगा। जब व्यक्ति के पास आध्यात्मिक कद होता है, तब वह चीजों की असलियत जानने में अधिक से अधिक सक्षम होगा, तमाम तरह के लोगों का भेद पहचानने में अधिक से अधिक सक्षम होगा और किसी भी व्यक्ति, घटना या चीज से बेबस नहीं होगा। कोई कुछ भी कहे या करे, वह प्रभावित नहीं होगा। वह शैतान की बुरी शक्तियों के दखल या झूठे अगुआओं और मसीह-विरोधियों के गुमराह करने और बाधाएँ डालने से प्रभावित नहीं होगा। यदि ऐसा होता है तो क्या धीरे-धीरे उस व्यक्ति का आध्यात्मिक कद बढ़ता नहीं जाएगा? कोई व्यक्ति जितना अधिक सत्य समझता है, वह उतना ही अधिक आत्म-चिंतन करेगा और खुद को जानेगा, वह उतना ही अधिक अपने भ्रष्ट स्वभावों के कारण होने वाले नुकसान का पता लगाने में सक्षम होगा, वह उतना ही अधिक सत्य का अभ्यास करने का मार्ग खोजने में सक्षम होगा और सत्य वास्तविकता में उसका प्रवेश उतना ही शीघ्र होगा; साथ ही, वह अपना कर्तव्य उस ढंग से निभाने में भी सक्षम होगा जो मानक के अनुरूप हो। जब तुम जीवन प्रवेश कर लोगे और तुम्हारे जीवन में धीरे-धीरे प्रगति होने लगेगी तो तुम्हारी दशा ज्यादा से ज्यादा सामान्य होने लगेगी। जो लोग, घटनाएँ और चीजें कभी तुम्हें बाधित और बेबस करती थीं, वे तुम्हारे लिए समस्या नहीं रहेंगी। अपना कर्तव्य निभाने में अब तुम्हें कोई कठिनाई नहीं होगी और परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध अधिक से अधिक सामान्य होता जाएगा। जब तुम यह जान जाओगे कि परमेश्वर पर कैसे भरोसा करना है, जब तुम यह जान लोगे कि परमेश्वर के इरादे कैसे खोजने हैं, जब तुम जान जाओगे कि तुम्हारा स्थान क्या है, जब तुम जान जाओगे कि तुम्हें क्या करना है और क्या नहीं करना है, कौन-से मामलों की जिम्मेदारी लेने की जरूरत है और कौन-से मामलों की नहीं, तो क्या तुम्हारी दशा ज्यादा से ज्यादा सामान्य नहीं होती जाएगी? इस तरह जीवन जीना तुम्हें थकाएगा नहीं, क्या थकाएगा? तुम न केवल थकोगे नहीं, बल्कि तुम खास तौर पर अधिक चैन और खुशी महसूस करोगे। क्या इसके परिणामस्वरूप तुम्हारा हृदय उज्ज्वल नहीं हो जाएगा? तुम्हारी मानसिकता सामान्य हो जाएगी, तुम्हारी आत्मा मुक्त हो जाएगी, तुम भ्रष्ट स्वभावों को कम प्रकट करोगे और तुम परमेश्वर के प्रति अधिक समर्पण करोगे। इस तरह, तुम लगातार परमेश्वर की उपस्थिति में रहने में सक्षम होगे और तुम सामान्य मानवता को जिओगे। जब लोग तुम्हारा बर्ताव देखेंगे, तो वे महसूस करेंगे कि तुममें एक बहुत बड़ा बदलाव आया है। वे तुम्हारे साथ संगति करने के इच्छुक होंगे, तुम्हारी संगति सुनते समय अपने दिलों में शांति और आनंद महसूस करेंगे और उससे लाभ भी उठाएँगे। जैसे-जैसे तुम्हारा आध्यात्मिक कद बढ़ेगा, तुम्हारी वाणी और कार्य अधिक नपे-तुले और सिद्धांतयुक्त हो जाएँगे। जब तुम देखोगे कि कोई व्यक्ति नकारात्मक और कमजोर है, तो तुम उसे कुछ सच्ची मदद देने में सक्षम होगे। तुम न केवल लोगों की समस्याएँ हल करने में सक्षम होगे, बल्कि तुम उन्हें बेबस करने या उन्हें उपदेश देने से बचने में भी सक्षम होगे और इसके बजाय अपने व्यावहारिक अनुभवों का उपयोग दूसरों की मदद करने के लिए करोगे जिससे उन्हें कुछ लाभ मिलेगा। इस तरह तुम परमेश्वर के घर में सिर्फ परिश्रम नहीं कर रहे होगे, बल्कि तुम ऐसे उपयोगी व्यक्ति भी बन जाओगे जो अपने कंधों पर बोझ लेने और परमेश्वर के घर में बहुत सार्थक कार्य करने में सक्षम है। क्या परमेश्वर ऐसे ही व्यक्ति को पसंद नहीं करता? अगर तुम ऐसे व्यक्ति हो जिसे परमेश्वर पसंद करता है, तो क्या सब लोग भी तुम्हें पसंद नहीं करेंगे? (बिल्कुल चाहेंगे।) परमेश्वर इस प्रकार के व्यक्ति से क्यों प्रसन्न होता है? क्योंकि वे उसके सामने वास्तविक चीजें करने में सक्षम होते हैं, खोखले और आलंकारिक शब्दों का इस्तेमाल नहीं करते और वास्तविक चीजें करते हैं। वे अपने सच्चे अनुभवों के बारे में बताकर दूसरे लोगों की मदद और अगुआई करने में सक्षम होते हैं; वे कोई भी समस्या हल करने में दूसरों की मदद करने में सक्षम होते हैं और जब कलीसिया के कार्य में परेशानियाँ आती हैं तो वे सक्रिय रूप से समस्या सुलझाकर आगे का रास्ता दिखा सकते हैं। इसे ही निष्ठापूर्वक अपना कर्तव्य निभाना कहते हैं। वे अपने भाई-बहनों की समस्या हल करने में मदद करते हैं, जो उनके जीवन प्रवेश को साबित करता है। वे इतने ज्यादा व्यावहारिक कार्य कर सकते हैं, इससे साबित होता है कि वे सत्य का अभ्यास करते हैं और परमेश्वर की उपस्थिति में रहते हैं। चूँकि उनके पास सत्य वास्तविकता होती है, इसलिए वे दूसरों को भी सत्य वास्तविकता में प्रवेश करने की राह दिखा पाते हैं। यदि तुम्हारे पास सत्य वास्तविकता या सच्चे अनुभव न हों तो क्या तुम दूसरों को परमेश्वर की उपस्थिति में ला सकते हो? यदि तुम खुद परमेश्वर की उपस्थिति में नहीं रहते तो दूसरों को भी उसकी उपस्थिति में नहीं ला सकते। यदि तुम सत्य सिद्धांतों की बिल्कुल भी खोज किए बिना अपना कर्तव्य निभाने भर के लिए केवल श्रम करते हो और परमेश्वर को संतुष्ट करने के इच्छुक नहीं हो तो फिर तुम परमेश्वर की उपस्थिति में नहीं रह रहे हो। जो परमेश्वर की उपस्थिति में नहीं रहते, क्या वे उसकी जाँच-पड़ताल को स्वीकार कर पाते हैं? क्या वे परमेश्वर की परीक्षा का सामना कर पाते हैं? क्या वे परीक्षणों के बीच दृढ़ता से खड़े रह पाते हैं? (नहीं, वे ऐसा नहीं कर पाते।) क्या इस प्रकार का व्यक्ति परमेश्वर के लिए गवाही दे सकता है? क्या ऐसे लोग उसकी गवाही दे सकते हैं? (नहीं, वे नहीं दे सकते।) किस प्रकार का व्यक्ति परमेश्वर की गवाही नहीं दे पाता? क्या ये ऐसे लोग हैं जो परमेश्वर में सच्चा विश्वास रखते हैं? कम-से-कम अभी तक तो उन्होंने परमेश्वर के वचनों की सत्य वास्तविकता में प्रवेश नहीं किया है, और वे अभी परमेश्वर के वचनों के बाहर ही हैं। जो व्यक्ति जीवन प्रवेश के बिना कई वर्षों से परमेश्वर पर विश्वास करता रहा हो, जो व्यक्ति अनुभवजन्य गवाही के बारे में न बता सकता हो, परमेश्वर की गवाही देना तो दूर की बात है, जो सुसमाचार का प्रचार करके किन्हीं अच्छे लोगों को प्राप्त न कर सकता हो—वह परमेश्वर का गवाह कहलाने लायक नहीं है। इसलिए जिस व्यक्ति का आध्यात्मिक कद अपरिपक्व है और जिसके पास जीवन प्रवेश नहीं है, वह कभी परमेश्वर की गवाही नहीं दे सकता। यहाँ निहितार्थ यह है कि इस किस्म का व्यक्ति परमेश्वर की उपस्थिति में नहीं जीता। अगर तुम परमेश्वर की उपस्थिति में नहीं जीते हो, तुमने जीवन प्रवेश नहीं किया है, परमेश्वर की गवाही नहीं दी है, तो क्या वह तुम्हें अपने अनुयायियों में से एक के रूप में स्वीकार करेगा? नहीं करेगा। परमेश्वर ने तुम्हें अपना कर्तव्य निभाने का एक अवसर दिया है और तुम इसके लिए तैयार भी हो, लेकिन तुम्हारी अभिव्यक्तियों के जरिये उसने देखा है कि इतने लंबे समय तक उसमें विश्वास करने के बावजूद तुम उसकी गवाही नहीं दे सकते। न केवल तुम्हारे पास सच्चा अनुभवजन्य ज्ञान नहीं है, बल्कि तुम जीते भी अपनी धारणाओं और कल्पनाओं के अनुसार हो; तुममें सत्य वास्तविकता बिल्कुल नहीं है और तुम बस परमेश्वर की उपस्थिति में नहीं रहते। अगर वह तुम्हारा परीक्षण करता है तो तुम इसे बर्दाश्त नहीं कर पाते; अगर वह तुम्हारी काट-छाँट करता है तो तुम इसे सह नहीं पाते; अगर वह तुम्हारा न्याय करता है और तुम्हें ताड़ना देता है, तो तुम अपना काम छोड़ देते हो और रूठ जाते हो, और वह सोचेगा : “यह व्यक्ति भालू जैसा है जिसे छेड़ा नहीं जान चाहिए! मैं जहाँ कहीं अपना कार्य करने या बोलने जाता हूँ, ऐसा व्यक्ति मेरा अनुसरण करने और मेरे साथ रहने लायक नहीं है।” मैं ऐसा क्यों कहता हूँ? क्योंकि ऐसा व्यक्ति सत्य को नहीं समझता, उसके पास शुद्ध समझ नहीं है, उसके पास सच्चे अनुभव नहीं हैं, और वह परमेश्वर के इरादों को भी नहीं समझता। अगर वह परमेश्वर के इरादों को नहीं समझता, तो क्या वह उसके अनुरूप हो सकता है? अगर वह परमेश्वर के इरादों को नहीं समझता तो क्या वह इन्हें बूझ सकता है? क्या वह सत्य को स्वीकार सकता है? कहना मुश्किल है, और ये सभी अज्ञात राशियाँ हैं। लिहाजा अगर ऐसा व्यक्ति परमेश्वर के साथ हो तो उसे उसके बारे में हर बात में संदेह होंगे और वह उसे नहीं समझेगा, जिससे परमेश्वर के प्रति हर मोड़ पर तमाम तरह की गलतफहमियाँ और शिकायतें तथा आलोचनाएँ पैदा होंगी। अंत में यह विश्वासघात को जन्म देगा। क्या परमेश्वर किसी ऐसे व्यक्ति को चाहेगा जो उससे विश्वासघात करे? क्या परमेश्वर उसे अपना अनुयायी बनने दे सकता है? नहीं, वह ऐसा नहीं कर सकता। यदि तुम चाहते हो कि परमेश्वर तुम्हें अपने अनुयायियों में से एक के रूप में पहचाने, तो सबसे पहले तुम्हें जीवन प्रवेश पर ध्यान केंद्रित करना होगा—इसका अर्थ है खुद को जानने से शुरुआत करना। व्यक्ति खुद को जितना अधिक जानता है, उतना ही अधिक वह अपनी भ्रष्टता के सार और वास्तविकता की असलियत जानने में सक्षम होगा और उतना ही अधिक वह अपने भीतर सत्य का अनुसरण करने के लिए तरसेगा; अपना कर्तव्य निभाने में वह सत्य खोजने, सत्य का अभ्यास करने और अपने भ्रष्ट स्वभाव त्यागने को विशेष महत्व देगा जिससे वह अपना कर्तव्य कायम रखने और परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुसार अपना कर्तव्य पूरा करने में सक्षम हो जाएगा। यह तुम्हारी सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। जीवन प्रवेश पर ध्यान केंद्रित करने का उद्देश्य अपना कर्तव्य अच्छे से निभाना है; मूल रूप से इसका निचोड़ तुम्हारा कर्तव्य निभाना है। जीवन प्रवेश का अनुसरण तुम्हें अपना कर्तव्य निभाने के साथ शुरू करना चाहिए और जीवन प्रवेश के जरिये तुम्हें बूंद-बूंद करके सत्य समझना और पाना चाहिए, ताकि तुम एक ऐसे मुकाम पर पहुँच जाओ जहाँ तुम्हारा आध्यात्मिक कद हो, जहाँ तुम्हारा जीवन धीरे-धीरे बढ़ता रहे और तुम्हें सत्य के व्यावहारिक अनुभव प्राप्त हों। तब तुम्हें अभ्यास के सभी प्रकार के सिद्धांतों में महारत हासिल कर लेनी चाहिए, ताकि तुम किसी भी व्यक्ति, घटना या चीज से बेबस या बाधित हुए बिना अपना कर्तव्य निभा पाओ। इस तरह तुम हौले-हौले परमेश्वर की उपस्थिति में रहने लगोगे। तुम किसी भी तरह के व्यक्ति, घटना या वस्तु से बाधित नहीं होओगे और तुम्हें सत्य का अनुभव होगा। जैसे-जैसे तुम्हारा अनुभव और अधिक प्रचुर होता जाएगा, वैसे-वैसे तुम परमेश्वर की गवाही देने में और अधिक सक्षम होते जाओगे और जैसे-जैसे तुम परमेश्वर की गवाही देने में अधिक सक्षम होओगे, वैसे-वैसे तुम धीरे-धीरे उपयोगी व्यक्ति बनते जाओगे। उपयोगी व्यक्ति बनने पर तुम परमेश्वर के घर में उस ढंग से अपना कर्तव्य निभा पाओगे जो मानक के अनुरूप होगा, तुम एक सृजित प्राणी के रूप में सही तरीके से अपना स्थान ग्रहण करने और परमेश्वर की व्यवस्थाओं और आयोजनों के प्रति समर्पण करने में सक्षम रहोगे, और तुम दृढ़ता से खड़े रह सकोगे। इस प्रकार का व्यक्ति ही मानक स्तर का सृजित प्राणी और ऐसा व्यक्ति होता है जो परमेश्वर की स्वीकृति पाता है। तब तुम उन सब चीजों के योग्य बनोगे जो परमेश्वर ने तुम्हें प्रदान की हैं।
सत्य वास्तविकता में प्रवेश करने की कुंजी क्या है? तुम्हें सत्य का अभ्यास करना सीखना होगा, ताकि तुम मामले सिद्धांतपूर्ण ढंग से सँभाल सको। क्या हमेशा कसमें खाने और अपना संकल्प व्यक्त करने का कोई फायदा है? यदि तुम हमेशा कसमें खाकर अपना संकल्प व्यक्त करते रहते हो, फिर भी सत्य का अभ्यास नहीं कर पाते, तो यह बिल्कुल फिजूल है। सबसे अहम, सबसे वास्तविक चीज अपना कर्तव्य निभाने की प्रक्रिया में जीवन प्रवेश हासिल करना, सत्य की खोज के जरिये कर्तव्य निभाने में सामने आने वाली विभिन्न समस्याएँ हल करना और अपने कर्तव्य के प्रति अपने विभिन्न गलत रवैयों को उलटना है। जीवन प्रवेश होने का अर्थ क्या है? जीवन प्रवेश होने का अर्थ है कि तुम्हारे पास सत्य का अनुभव और ज्ञान है, और तुम उसका सटीक अभ्यास करने में सक्षम हो। क्या तुम सब लोगों ने अभी जीवन प्रवेश कर लिया है? क्या तुम परमेश्वर की गवाही देने में सक्षम हो? क्या ऐसा नहीं है कि ज्यादातर समय तुम केवल कुछ शब्द और धर्म-सिद्धांत ही बोल पाते हो और सत्य का तुम्हारा ज्ञान धर्म-सिद्धांत के स्तर पर ही रुक जाता है और तुम्हें सत्य का कोई सच्चा ज्ञान या अनुभव नहीं है? यदि तुम सत्य का सच्चा अनुभव और ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकते, तो तुम परमेश्वर की गवाही देने में विफल रहते हो। ज्यादातर समय तुम्हारे पास बस कुछ भावना-आधारित ज्ञान होता है, तुम्हें लगता है कि जब परमेश्वर किसी बात को एक तरीके से कहता है तो वह सत्य होता है और जब वह उसे दूसरे तरीके से कहता है तो वह भी सत्य ही होता है—तुम्हें लगता है कि परमेश्वर के सभी वचन सत्य हैं और तुम उन्हें आमीन कहते हो और उन्हें सही मानते हो। लेकिन तुम उन्हें खुद से जोड़ नहीं सकते। जब तुम चीजें करते हो तब तुम अभी भी भ्रमित रहते हो और तुम नहीं जानते कि अपनी समस्याएँ हल करने के लिए तुम्हें किन सत्यों का उपयोग करना चाहिए, न ही तुम जानते हो कि कार्य करने का कौन-सा तरीका सत्य का अभ्यास करना होगा। क्या तुम लोगों में से ज्यादातर इसी प्रकार की दशा में नहीं हैं? यद्यपि तुम बहुत सारे शब्द और धर्म-सिद्धांत कह सकते हो, लेकिन तुम उन्हें अपने वास्तविक जीवन में लागू नहीं कर सकते। तुम अब भी नहीं जानते कि सत्य का अभ्यास कैसे करना है, न ही तुम यह जानते हो कि अपने वास्तविक जीवन में परमेश्वर के वचन कैसे लागू करने हैं और तुम्हारे साथ चाहे जो भी घटित होता हो, तुम अपनी समस्याएँ हल करने के लिए सत्य खोजना नहीं जानते। ऐसा इसलिए है क्योंकि लोगों का जीवन प्रवेश बहुत उथला है और उनका आध्यात्मिक कद बहुत छोटा है। जब तुम यह जानते हो कि अपने वास्तविक जीवन में परमेश्वर के वचनों का अनुभव, अभ्यास और उन्हें लागू कैसे करना है और जब तुम यह जानते हो कि अपने साथ कुछ घटित होने के बाद समस्याएँ हल करने के लिए सत्य कैसे खोजना है, तो तुम लोगों का जीवन विकसित होगा। सत्य के अभ्यास के तरीके को जानना यह संकेत है कि तुम्हारे जीवन का विकास हो रहा है। किसी दिन जब तुम सत्य के साथ समस्याएँ हल करने में सक्षम हो जाओगे, जब तुम्हें परमेश्वर का कुछ ज्ञान हो जाएगा, जब तुम परमेश्वर के बारे में अपना सच्चा ज्ञान साझा करके उसके कार्य, उसके पवित्र और धार्मिक स्वभाव, और उसकी सर्वशक्तिमत्ता और बुद्धि की गवाही दे सकोगे, तब तुम सचमुच परमेश्वर की गवाही देने में सक्षम होगे और तुम परमेश्वर के काम आने योग्य हो जाओगे। यदि तुम्हें लगता है कि तुम काफी कुछ समझते हो और धर्म-सिद्धांत के बारे में लगातार बात कर सकते हो, लेकिन तुम अपनी समस्याओं से जुड़ी कोई भी चीज हल नहीं कर सकते और यह भी नहीं जानते कि उन्हें हल करने के लिए सत्य कैसे खोजना है, तो यह साबित करता है कि तुम जो समझते हो वह सत्य नहीं है, बल्कि शब्द और धर्म-सिद्धांत हैं। अगर दूसरे लोग तुम्हारे द्वारा कहे गए कुछ धर्म-सिद्धांत समझ भी लें, वे उनमें से कुछ आत्मिक उन्नयन पा भी लें और तुम्हारे द्वारा कहे गए धर्म-सिद्धांत कुछ परिणाम हासिल कर भी लें तो भी, तुम बस चीजों को पूरी तरह से समझाने में सक्षम नहीं होते, न ही तुम समस्याओं को पूरी तरह से हल कर सकते हो। यह साबित करता है कि तुम जो धर्म-सिद्धांत कहते हो वे केवल शाब्दिक रूप में ही संप्रेषित होते हैं; वे अधिक से अधिक भावना-आधारित ज्ञान के अंश हैं जो अभी तक तार्किक ज्ञान के स्तर तक नहीं पहुँचे हैं; यह नहीं कहा जा सकता कि वे सत्य वास्तविकता हैं, यह तो बिल्कुल भी नहीं कहा जा सकता कि तुमने सत्य वास्तविकता में प्रवेश कर लिया है। अब, तुम शब्दों और धर्म-सिद्धांतों को कहने की इस समस्या को कैसे हल करते हो? इसके लिए सत्य समझने में मेहनत करने की आवश्यकता है। जब तुम सत्य समझोगे, तभी तुम आत्म-चिंतन करोगे, अपने द्वारा प्रकट किए गए भ्रष्ट स्वभाव पहचानने में सक्षम होगे और अपनी समस्याओं की जड़ खोजने में सक्षम होगे। फिर तुम्हें सत्य खोजना चाहिए और स्वयं द्वारा प्रकट किए गए भ्रष्ट स्वभाव पूरी तरह से हल करने के लिए परमेश्वर के वचनों का उपयोग करना चाहिए। तुम्हारे भीतर जो प्रकट होता है, वह चाहे अहंकार और आत्मतुष्टता हो या कुटिलता और धोखेबाजी, या चाहे वह स्वार्थपरता और नीचता हो या अनमनापन और परमेश्वर को धोखा देना, तुम्हें इन भ्रष्ट स्वभावों पर तब तक चिंतन करना होगा जब तक तुम उन्हें स्पष्ट रूप से न देख लो। इस तरह तुम जान लोगे कि अपना कर्तव्य निभाते समय कौन-सी समस्याएँ मौजूद हैं और तुम उद्धार पाने से कितनी दूर हो। जब तुम अपने भ्रष्ट स्वभाव अच्छी तरह देख सकोगे, तभी तुम यह जान पाओगे कि अपना कर्तव्य निभाने में कठिनाइयाँ और बाधाएँ कहाँ हैं। तभी तुम समस्याओं को उनके स्रोत पर ही हल कर पाओगे। उदाहरण के लिए, मान लो तुम अपना कर्तव्य निभाने में जिम्मेदारी नहीं लेते, इसके बजाय हमेशा लापरवाही से काम करते हो, जिससे काम में नुकसान होता है, लेकिन तुम अपने गौरव की परवाह करते हो, इसलिए तुम अपनी अवस्था और कठिनाइयों के बारे में खुलकर संगति करने और उनका गहन विश्लेषण करने और उन्हें जानने का अभ्यास करने के लिए तैयार नहीं होते, इसके बजाय हमेशा अनमने ढंग से चीजों से निपटने के बहाने ढूँढ़ते रहते हो। तुम्हें यह समस्या कैसे हल करनी चाहिए? तुम्हें यह कहते हुए परमेश्वर से प्रार्थना और आत्मचिंतन करना चाहिए : “परमेश्वर, मैं अपने गौरव की रक्षा करने के लिए ऐसी चीजें कहना चाहता हूँ। यह मेरा भ्रष्ट स्वभाव बोल रहा है। मुझे ऐसा नहीं कहना चाहिए। मुझे खुद को खुलकर उघाड़ना चाहिए, और अपने दिल के सच्चे उद्गार प्रकट करने चाहिए। मैं अपने मिथ्या अभिमान को बचाने के बजाय शर्म और बदनामी सहने को तैयार हूँ। मैं सिर्फ परमेश्वर को संतुष्ट करना चाहता हूँ।” इस तरह अपने खिलाफ विद्रोह करके और अपने दिल के सच्चे उद्गार व्यक्त कर तुम ईमानदार व्यक्ति बनने का अभ्यास कर रहे हो, और यही नहीं, तुम अपनी इच्छा के अनुसार क्रियाकलाप नहीं कर रहे हो, न ही अपना गौरव बचाने की कोशिश कर रहे हो। तुम परमेश्वर के वचनों को अभ्यास में लाने, परमेश्वर की इच्छाओं के अनुसार सत्य का अभ्यास करने, मन लगाकर अपना कर्तव्य पूरे करने और अपनी जिम्मेदारियाँ पूरी करने में सक्षम हो। इस प्रकार, तुम न केवल सत्य को अभ्यास में ला रहे हो और अपना कर्तव्य पूरा कर रहे हो, बल्कि तुम परमेश्वर के घर के हित भी कायम रख रहे हो जिससे परमेश्वर का हृदय संतुष्ट होता है। इस तरह से जीना खुला और ईमानदार है और तुम्हारे विचारों और भावों के साथ-साथ तुम्हारे क्रियाकलाप और कर्म लोगों और परमेश्वर के सामने लाए जा सकते हैं। यह कितना अद्भुत है! इस तरह अभ्यास करना थोड़ा मुश्किल है और तुम्हें कई बार विफलता का सामना करना पड़ सकता है, लेकिन यदि तुम इस दिशा में अभ्यास और प्रयास करते हो, तो तुम निश्चित रूप से सफल होगे। और तुम्हारे लिए सफल होने का क्या अर्थ है? इसका अर्थ है कि जब तुम सत्य का अभ्यास करते हो, तो तुम वह कदम उठाने में सक्षम हो जाते हो जो तुम्हें शैतान के बंधनों से मुक्त करता है, एक ऐसा कदम जो तुम्हें अपने खिलाफ विद्रोह करने देता है। इसका अर्थ है कि तुम मिथ्या अभिमान और गौरव एक तरफ रखने, अपने लाभ की खोज बंद करने और स्वार्थपूर्ण और नीचतापूर्ण चीजें न करने में सक्षम हो। जब तुम इसे अभ्यास में लाते हो, तो तुम लोगों को यह दिखाते हो कि तुम ऐसे व्यक्ति हो, जो सत्य से प्रेम करता है, जिसमें सत्य वास्तविकता है, जो न्याय और प्रकाश की कामना करता है। यह वह नतीजा है जो तुम सत्य का अभ्यास कर हासिल करते हो। साथ ही, तुम शैतान को शर्मिंदा भी करते हो। शैतान ने तुम्हें भ्रष्ट कर दिया, तुम्हें स्वार्थी बना दिया और तुम्हें अपने हितों की रक्षा करने और अपने गौरव के बारे में सोचने पर मजबूर कर दिया। लेकिन अब शैतान की ये चीजें तुम्हें बाँध नहीं सकतीं, तुम उनसे मुक्त हो गए हो, तुम अब मिथ्या अभिमान, गौरव या अपने व्यक्तिगत हितों से नियंत्रित नहीं होते और तुम सत्य का अभ्यास करते हो, इसलिए शैतान पूरी तरह से अपमानित होता है और वह कुछ नहीं कर सकता। जब शैतान तुम्हें नियंत्रित नहीं कर सकता, तब क्या तुम विजयी नहीं होते? जब तुम विजयी होते हो, तब क्या तुम परमेश्वर के लिए अपनी गवाही में दृढ़ नहीं रहते? क्या तुम एक अच्छी लड़ाई नहीं लड़ते? जब तुम एक अच्छी लड़ाई लड़ते हो, तो तुम्हारे दिल में शांति, आनंद और राहत की भावना होती है। यदि तुम अपने हृदय में प्रायः दोषारोपण की भावना के साथ जीते हो, बेचैन महसूस करते हो, तुममें कोई शांति या आनंद नहीं है, और यदि तुम अक्सर सभी प्रकार की चीजों के बारे में चिंतित और परेशान रहते हो, तो यह क्या दर्शाता है? बस यही कि तुम सत्य का अभ्यास नहीं करते हो और तुम परमेश्वर के लिए अपनी गवाही में अडिग नहीं रहते हो। जब तुम शैतानी स्वभावों के बीच जीते हो, तो तुम अपनी इच्छा के अनुसार कार्य करते हो, सत्य का अभ्यास करना नापसंद करते हो और यहाँ तक कि सत्य के साथ विश्वासघात करते हो, अपने लक्ष्य प्राप्त करने के लिए किसी भी साधन का सहारा लेते हो। तुम केवल अपने मिथ्याभिमान, मान-सम्मान, प्रतिष्ठा, रुतबे और हितों की रक्षा करते हो। क्या यह स्वार्थी और नीच होना नहीं है? जब तुम हमेशा अपने लिए और अपने हितों के लिए जीते हो, तो जीवन अत्यंत पीड़ादायक हो जाता है। तुम्हारे पास बहुत सारी स्वार्थी इच्छाएँ, उलझनें, बंधन, आशंकाएँ और परेशानियाँ होती हैं; तुममें जरा भी शांति या आनंद नहीं होता। भ्रष्ट देह के लिए जीना चरम पीड़ा सहने के सिवा और कुछ नहीं है। जो सत्य का अनुसरण करते हैं वे भिन्न होते हैं। वे सत्य को जितना अधिक समझते हैं, उतने ही अधिक मुक्त और स्वतंत्र होते हैं; वे सत्य का जितना अधिक अभ्यास करते हैं, उन्हें उतनी ही अधिक शांति और आनंद मिलता है। जब वे सत्य को प्राप्त कर लेते हैं, तो वे पूरी तरह से रोशनी में रहेंगे और परमेश्वर के आशीषों का आनंद लेंगे, पीड़ा से मुक्त होंगे।
अभी तुम सब लोग आम तौर पर किस दशा में जी रहे हो? अधिकांश समय सकारात्मक दशा में रहते हो या नकारात्मक दशा में? (हम अधिकांश समय नकारात्मक दशा में रहते हैं।) हमेशा नकारात्मक दशा में रहने वाले किसी व्यक्ति के लिए अपना कर्तव्य त्यागे बिना अपने कर्तव्य निभाने में जुटे रहना कोई साधारण बात नहीं है! तुम सभी लोग अक्सर नकारात्मक रहते हो और इसका हल नहीं जानते हो। कभी-कभी तुम्हें अपनी नकारात्मक दशाओं के हल के लिए अत्यधिक प्रयास करने पड़ते हैं, और जब तुम्हारे मुताबिक बात नहीं बनती तो तुम फिर से नकारात्मक हो जाते हो। तुम हमेशा अपनी नकारात्मकता में ही लोटते रहते हो, चाह कर भी खड़े नहीं हो पाते हो; कोई भी कर्तव्य ठीक से नहीं निभा सकते, और तुम इतने अक्षम होते हो कि तुम्हारी कोई मदद नहीं कर सकता है। क्या इस तरह जीना थकाऊ नहीं है? (बिल्कुल है।) तो फिर तुम नकारात्मकता की समस्या से पूरी तरह कैसे निपटते हो? तुम्हें कुछ-कुछ सत्य अवश्य समझना होगा। तुम जितना भी धर्म-सिद्धांत बघारो, उससे तुम्हारी समस्या हल नहीं होने वाली। जब एक बार कोई व्यक्ति सचमुच सत्य समझ लेता है, अपने सामने आने वाली नकारात्मकता या किसी भी समस्या को हल करने में सक्षम हो जाता है तो फिर उसके लिए अपना कर्तव्य निभाना उतना थकाऊ नहीं रहता। केवल सत्य हासिल करके ही कोई स्वतंत्र और मुक्त हो सकता है। इस समय तुम सब लोगों में एक ही सबसे बड़ी कमी सत्य की है, लेकिन सत्य रातो-रात हासिल नहीं हो जाता। इसके लिए तुम्हें परमेश्वर के कार्य का सच्चा ज्ञान होना चाहिए और लोगों के भ्रष्ट स्वभाव को साफ-साफ देखने लायक होना चाहिए। इसमें समय लगता है, और इसे समझने के लिए तुम्हें सत्य खोजना होगा। तुम सब लोगों को भ्रष्ट स्वभाव के साथ जीने की पीड़ा का एहसास है और तुम्हें इसका गहरा प्रत्यक्ष अनुभव है। जब तुम सत्य का अभ्यास करने और सत्य सिद्धांतों का पालन करने में सक्षम होकर सत्य को समझ लेते हो तो उससे जो शांति और खुशी मिलती है, क्या तुम लोगों ने उसे अनुभव किया है? क्या तुम्हारे पास ऐसे कई अनुभव हैं? अगर वास्तव में ऐसे अनुभव भरपूर मात्रा में हैं तो इसका मतलब है कि तुम्हारे पास सत्य वास्तविकता पूरी तरह है। तुम्हें रोशनी में और परमेश्वर की उपस्थिति में रहने का एहसास होगा। अगर तुम कभी-कभी परमेश्वर के प्रबोधन का थोड़ा-सा भी आनंद पा लेते हो तो तुम्हें बहुत खुशी होगी। यदि तुम लोगों पर भरोसा करने के बजाय कभी-कभी परमेश्वर पर भरोसा करते हो और परमेश्वर तुम्हें थोड़ी-सी भी रोशनी देता है, तुम्हें आगे का वह रास्ता दिखाता है जिसके बारे में तुमने सोचा भी नहीं था और मामले का निपटान हो जाता है तो तुम्हें बहुत खुशी होगी। बार-बार ये छोटे-छोटे अनुभव होना काफी नहीं है; तुम्हें अब भी सत्य की दिशा में जुटे रहना होगा। एक ओर तुम लोगों को दर्शनों के सत्य को समझना होगा, परमेश्वर के कार्य की पूर्ण रूप से स्पष्ट समझ हासिल करनी होगी, और परमेश्वर के स्वभाव का सच्चा ज्ञान लेना होगा। इस तरह अपना कर्तव्य निभाने के दौरान जब तुम्हारा दोबारा समस्याओं से सामना होगा तो कम से कम न तो धारणाएँ पनपेंगी, न ही विद्रोह का भाव उत्पन्न होगा। यह चीजों का एक पहलू है। इसके अतिरिक्त तुम्हें जीवन प्रवेश की दिशा में प्रयास करने होंगे। उन सत्यों को संक्षेपित करना होगा, जिनका अभ्यास और जिनमें प्रवेश करना है, जैसे स्वयं को जानना, ईमानदार व्यक्ति बनना, परमेश्वर के प्रति समर्पण सीखना, परमेश्वर पर कैसे भरोसा करना है, अपना कर्तव्य समर्पित होकर कैसे निभाना है, तमाम तरह के लोगों में भेद पहचानना कैसे सीखना है, शैतान के साथ कैसा सलूक करना है, तुम्हारी बुद्धि कैसी होनी चाहिए, आदि-आदि। सत्य के इन विभिन्न पहलुओं का अनुभव और इनमें प्रवेश करके ही तुम परमेश्वर का भय मानोगे और बुराई से दूर रहोगे, और पूर्ण व्यक्ति बनोगे। तो सत्य वास्तविकता के कितने पहलुओं में तुम लोगों ने अभी तक प्रवेश किया है? सत्य वास्तविकता के किन पहलुओं में तुमने अभी तक प्रवेश नहीं किया है? तुम्हें अपने मन में इसका हिसाब रखना होगा। जब तुम अभ्यास से संबंधित कई पहलुओं में प्रवेश कर लोगे तो तुम्हारा जीवन पहले ही प्रगति कर चुका होगा, और तुममें सचमुच आध्यात्मिक कद होगा। जब तुम लोगों का आध्यात्मिक कद किसी निश्चित स्तर तक बढ़ जाएगा तब तुम परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने के मार्ग में प्रवेश कर सकोगे, और तुम्हें सच्चा आध्यात्मिक कद हासिल होगा। यह ऐसा मामला नहीं है जिसमें हड़बड़ी की जाए—एक ही कौर में हाथी को नहीं निगला जा सकता। अभी तुम्हारी ऐसी कौन-सी चीज है जिसे हल करना सबसे आवश्यक और महत्वपूर्ण है? वह यही है कि तुम्हें अपना कर्तव्य ठीक से निभाना है, और कर्तव्य निभाते हुए जीवन प्रवेश करना है। यही महत्वपूर्ण है। प्रयास बढ़ाने भर से बात नहीं बनेगी—तुम्हें इसमें अपना दिल भी झोंकना होगा। परमेश्वर यह नहीं चाहता कि एक सृजित प्राणी के रूप में कर्तव्य निभाते हुए तुम अपना श्रम बेचो, बल्कि वह यह चाहता है कि तुम उसे अपनी ईमानदारी अर्पित करो। अपना कर्तव्य निभाते हुए तुम्हें जीवन प्रवेश करना ही चाहिए। जब तुम जीवन प्रवेश कर लोगे, तभी तुम्हारे पास जीवन होगा, जब तुम्हारे पास जीवन होगा, तभी तुम बढ़ सकते हो, और जिनके पास जीवन होता है, सिर्फ उन्हीं के पास सत्य होता है।
10 अगस्त 2015