4. देहधारण के रहस्य प्रकट करने पर वचन

187. प्रथम देहधारण मनुष्य को पाप से छुटकारा दिलाने के लिए था, उसे यीशु के दैहिक शरीर के माध्यम से छुटकारा दिलाने के लिए था, अर्थात् यीशु ने मनुष्य को सलीब से बचाया, किंतु शैतानी भ्रष्ट स्वभाव मनुष्य के भीतर अभी भी बचे रह गए। दूसरा देहधारण अब पापबलि के रूप में कार्य करने के लिए नहीं है, अपितु उन लोगों को पूरी तरह से बचाने के लिए है जिन्हें पाप से छुटकारा दिलाया गया था। यह इसलिए किया जाता है ताकि जिनके पापों को क्षमा किया जा चुका है वे अपने पाप से मुक्त और पूरी तरह से शुद्ध हो सकें और स्वभावगत बदलाव हासिल कर सकें और इस प्रकार शैतान के अंधकार के प्रभाव से मुक्त हो जाएँ और परमेश्वर के सिंहासन के सामने लौट आएँ। केवल इसी तरीके से मनुष्य पूरी तरह से पावनीकृत हो सकता है। व्यवस्था के युग का अंत होने के बाद और अनुग्रह के युग के आरंभ से परमेश्वर ने उद्धार-कार्य शुरू किया, जो अंत के दिनों में जारी है, जब परमेश्वर मनुष्य की विद्रोहशीलता के लिए उसके न्याय और ताड़ना का कार्य करता है और इस प्रकार मानवजाति को पूरी तरह से शुद्ध करता है। केवल इसके बाद ही परमेश्वर उद्धार के अपने कार्य का समापन करेगा और विश्राम में प्रवेश करेगा। इसलिए, कार्य के तीन चरणों में परमेश्वर स्वयं मनुष्य के बीच अपना कार्य करने के लिए केवल दो बार देहधारी हुआ है। वह इसलिए, क्योंकि कार्य के तीन चरणों में से केवल एक चरण ही लोगों का जीवन जीने में मार्गदर्शन करने के लिए है, जबकि अन्य दो चरणों में उद्धार का कार्य शामिल है। केवल देहधारी होकर ही परमेश्वर मनुष्य के साथ रह सकता है, संसार के कष्ट का अनुभव कर सकता है और एक सामान्य दैहिक शरीर में रह सकता है। केवल इसी तरह से वह लोगों को उस व्यावहारिक वचन की आपूर्ति कर सकता है जिसकी उन्हें सृजित प्राणी होने के नाते आवश्यकता है। परमेश्वर के देहधारण के माध्यम से ही मनुष्य परमेश्वर से पूर्ण उद्धार प्राप्त करता है, न कि अपनी प्रार्थनाओं के उत्तर में सीधे स्वर्ग से। मनुष्य देह और रक्त से बना है, उसके पास परमेश्वर के आत्मा को देखने का कोई उपाय नहीं है, उसके आत्मा के निकट पहुँचने की तो बात ही छोड़ दो, इसलिए मनुष्य जिसके संपर्क में आ सकता है वह सिर्फ परमेश्वर का देहधारी देह है। केवल इसी तरीके से मनुष्य समस्त वचन और सभी सत्य समझ पाता है और पूर्ण उद्धार प्राप्त कर पाता है। दूसरा देहधारण मनुष्य को उसके पापों से छुटकारा दिलाने और उसे पूरी तरह से शुद्ध करने के लिए पर्याप्त है। इसलिए, दूसरे देहधारण के साथ देह में परमेश्वर का संपूर्ण कार्य समाप्त कर दिया जाएगा और परमेश्वर के देहधारण का महत्व पूरा कर दिया जाएगा। उसके बाद देह में परमेश्वर का कार्य पूरी तरह से समाप्त हो जाएगा। दूसरे देहधारण के बाद वह अपने कार्य के लिए तीसरी बार देहधारी नहीं होगा। क्योंकि उसका संपूर्ण प्रबंधन समाप्त हो गया होगा, अंत के दिनों के देहधारण ने अपने चुने हुए लोगों को पूरी तरह से प्राप्त कर लिया होगा, और अंत के दिनों में मानवजाति को उसकी किस्म के अनुसार छाँट लिया गया होगा। वह अब और उद्धार-कार्य नहीं करेगा, न ही वह कोई कार्य करने के लिए देह में लौटेगा।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, देहधारण का रहस्य (4)

188. यहोवा के कार्य के बाद यीशु मनुष्यों के बीच अपना कार्य करने के लिए देहधारी हो गया। उसका कार्य अलग से किया गया कार्य नहीं था, बल्कि यहोवा के कार्य के आधार पर किया गया था। यह कार्य एक नए युग के लिए था, जिसे परमेश्वर ने व्यवस्था का युग समाप्त करने के बाद किया था। इसी प्रकार, यीशु का कार्य समाप्त हो जाने के बाद परमेश्वर ने अगले युग के लिए अपना कार्य जारी रखा, क्योंकि परमेश्वर का संपूर्ण प्रबंधन सदैव आगे बढ़ रहा है। जब पुराना युग बीत जाता है, तो उसके स्थान पर नया युग आ जाता है, और एक बार जब पुराना कार्य पूरा हो जाता है, तो परमेश्वर के प्रबंधन को जारी रखने के लिए नया कार्य शुरू हो जाता है। यह देहधारण परमेश्वर का दूसरा देहधारण है, जो यीशु का कार्य पूरा होने के बाद हुआ है। निस्संदेह, यह देहधारण स्वतंत्र रूप से घटित नहीं होता; व्यवस्था के युग और अनुग्रह के युग के बाद यह कार्य का तीसरा चरण है। हर बार जब परमेश्वर कार्य का नया चरण आरंभ करता है, तो हमेशा एक नई शुरुआत होती है और वह हमेशा एक नया युग लाता है। इसलिए परमेश्वर के स्वभाव, उसके कार्य करने के तरीके, उसके कार्य के स्थल, और उसके नाम में भी परिवर्तन होते हैं। इसलिए कोई आश्चर्य नहीं कि मनुष्य के लिए नए युग में परमेश्वर के कार्य को स्वीकार करना कठिन होता है। परंतु मनुष्य उसका कितना भी विरोध करे, परमेश्वर सदैव अपना कार्य करता रहता है और सदैव समस्त मानवजाति को आगे ले जाता रहता है। जब यीशु मनुष्य के संसार में आया तो उसने अनुग्रह का युग शुरू किया और व्यवस्था का युग समाप्त किया। अंत के दिनों के दौरान परमेश्वर एक बार फिर देहधारी हुआ और इस देहधारण के साथ उसने अनुग्रह का युग समाप्त किया और राज्य का युग शुरू किया। वे सब जो परमेश्वर के दूसरे देहधारण को स्वीकार करने में सक्षम हैं, राज्य के युग में ले जाए जाएँगे और इसके अलावा वे व्यक्तिगत रूप से परमेश्वर का मार्गदर्शन स्वीकार करने में सक्षम होंगे। यूँ तो यीशु मनुष्यों के बीच आया और उसने बहुत-सा कार्य किया, फिर भी उसने केवल समस्त मानवजाति के छुटकारे का कार्य पूरा किया और मनुष्य की पाप-बलि के रूप में काम किया; उसने मनुष्य को उसके समस्त भ्रष्ट स्वभावों से मुक्त नहीं किया। मनुष्य को शैतान के प्रभाव से पूरी तरह बचाने के लिए केवल यीशु का पाप-बलि बनना और मनुष्य के पापों को वहन करना ही आवश्यक नहीं था, बल्कि मनुष्य को शैतान द्वारा भ्रष्ट किए गए उसके स्वभावों से पूरी तरह छुटकारा दिलाने के लिए परमेश्वर को और भी बड़ा कार्य करना आवश्यक था। और इसलिए मनुष्य के पापों के क्षमा किए जाने के बाद परमेश्वर मनुष्य को नए युग में ले जाने के लिए देह में लौट आया और उसने ताड़ना तथा न्याय का कार्य आरंभ किया। यह कार्य मानवजाति को एक उच्चतर क्षेत्र में ले आया है। वे सब जो परमेश्वर के प्रभुत्व के अधीन समर्पण करेंगे, उच्चतर सत्य का आनंद लेंगे और अधिक बड़े आशीष प्राप्त करेंगे। वे वास्तव में प्रकाश में जिएँगे और सत्य, मार्ग और जीवन प्राप्त करेंगे।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, प्रस्तावना

189. “देहधारण” परमेश्वर का देह में प्रकट होना है; परमेश्वर सृजित मनुष्यों के मध्य देह की छवि में कार्य करता है। इसलिए, चूँकि वह देहधारी परमेश्वर है, तो उसे सबसे पहले देह होना होगा, सामान्य मानवता वाली देह होना होगा; यह सबसे मौलिक पूर्वापेक्षा है। वास्तव में, परमेश्वर के देहधारण का निहितार्थ यह है कि परमेश्वर देह में रहता और कार्य करता है, परमेश्वर अपने सार में देह बन जाता है, वह एक व्यक्ति बन जाता है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर द्वारा धारण किए गए देह का सार

190. देहधारण का अर्थ है कि परमेश्वर का आत्मा देह बन जाता है, अर्थात्, परमेश्वर देह बन जाता है; देह के द्वारा किया जाने वाला कार्य आत्मा का कार्य है, जो देह में साकार होता है, देह द्वारा अभिव्यक्त होता है। परमेश्वर के देह को छोड़कर अन्य कोई भी देहधारी परमेश्वर की सेवकाई को पूरा नहीं कर सकता; अर्थात्, केवल परमेश्वर का देहधारी देह, यह सामान्य मानव दिव्य कार्य को व्यक्त कर सकता है। इसमें कोई मनुष्य उसकी जगह नहीं ले सकता। यदि, परमेश्वर के पहले आगमन के दौरान, उनतीस वर्ष की उम्र से पहले उसमें सामान्य मानवता नहीं होती—यदि जन्म लेते ही वह चिह्न दिखा और चमत्कार कर सकता, बोलना आरंभ करते ही वह स्वर्ग की भाषा बोलने लगता, यदि जन्म से वह सभी सांसारिक मामलों को समझने लगता, हर व्यक्ति के विचारों और जो उसके हृदय में है, उसे देखने लगता—तो ऐसे इंसान को सामान्य मनुष्य नहीं कहा जा सकता था, और ऐसी देह को मानवीय देह नहीं कहा जा सकता था। यदि मसीह के साथ ऐसा ही होता, तो परमेश्वर के देहधारण का कोई अर्थ और सार ही नहीं रह जाता। उसका सामान्य मानवता से युक्त होना इस बात को सिद्ध करता है कि वह शरीर में देहधारी हुआ परमेश्वर है; उसका सामान्य मानव विकास प्रक्रिया से गुज़रना और भी दिखाता है कि वह एक सामान्य देह है; इसमें उसके कार्य को भी जोड़ दें तो यह इस बात को साबित करने के लिए पर्याप्त है कि वह परमेश्वर का वचन है, परमेश्वर का आत्मा है जिसने देहधारण किया है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर द्वारा धारण किए गए देह का सार

191. देहधारी परमेश्वर मसीह कहलाता है और मसीह परमेश्वर के आत्मा द्वारा धारण की गई देह है। यह देह किसी ऐसे मनुष्य से भिन्न है जो देह का है। यह भिन्नता इसलिए है क्योंकि मसीह दैहिक होने के बजाय आत्मा का देहधारण है। उसके पास सामान्य मानवता भी है और पूर्ण दिव्यता भी है। उसकी दिव्यता किसी भी मनुष्य के पास नहीं है। उसकी सामान्य मानवता का उद्देश्य देह में उसकी समस्त सामान्य गतिविधियों को बनाए रखना है, जबकि उसकी दिव्यता स्वयं परमेश्वर के कार्य को कार्यान्वित करती है। चाहे यह उसकी मानवता हो या दिव्यता, दोनों स्वर्गिक परमपिता की इच्छा को समर्पित हैं। मसीह का सार आत्मा, यानी दिव्यता है। इसलिए, उसका सार स्वयं परमेश्वर का है; यह सार उसके स्वयं के कार्य में गड़बड़ी नहीं करेगा और वह कुछ भी ऐसा कतई नहीं कर सकता है, जो उसके अपने ही कार्य को नष्ट करता हो, न ही वह कभी ऐसे वचन कहेगा जो उसकी अपनी इच्छा के विरुद्ध जाते हों। इस प्रकार, देहधारी परमेश्वर कभी भी कोई ऐसा कार्य बिल्कुल नहीं करेगा, जो उसके अपने प्रबंधन में गड़बड़ी करता हो। यह वह बात है, जिसे सभी मनुष्यों को समझना चाहिए। पवित्र आत्मा के कार्य का सार मनुष्य को बचाना और परमेश्वर के अपने प्रबंधन के वास्ते है। इसी प्रकार, मसीह का कार्य भी मनुष्य को बचाना है तथा परमेश्वर की इच्छा के वास्ते है। यह देखते हुए कि परमेश्वर देह बन जाता है, वह अपनी देह में अपने सार को, इस तरह साकार करता है कि उसकी देह उसके कार्य का बीड़ा उठाने के लिए पर्याप्त है। इसलिए देहधारण के समय परमेश्वर के आत्मा का संपूर्ण कार्य मसीह के कार्य द्वारा प्रतिस्थापित कर दिया जाता है और देहधारण के पूरे समय के दौरान संपूर्ण कार्य के केंद्र में मसीह का कार्य होता है। इसे किसी भी अन्य युग के कार्य के साथ मिश्रित नहीं किया जा सकता। और चूँकि परमेश्वर देहधारी हो जाता है, वह अपनी देह की पहचान में कार्य करता है; चूँकि वह देह में आता है, वह अपनी देह में वह कार्य पूरा करता है, जो उसे करना चाहिए। चाहे वह परमेश्वर का आत्मा हो या चाहे वह मसीह हो, दोनों स्वयं परमेश्वर हैं और वह उस कार्य को करता है, जो उसे करना चाहिए और उस सेवकाई को करता है, जो उसे करनी चाहिए।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, स्वर्गिक परमपिता की इच्छा के प्रति समर्पण ही मसीह का सार है

192. जो देहधारी परमेश्वर है उसके पास परमेश्वर का सार है और जो देहधारी परमेश्वर है उसके पास परमेश्वर की अभिव्यक्ति है। चूँकि परमेश्वर देहधारी बना है, इसलिए वह उस कार्य को अपने साथ लाता है जो वह करना चाहता है और चूँकि वह देहधारी परमेश्वर है, इसलिए वह परमेश्वर का स्वरूप व्यक्त करता है और वह मनुष्य के लिए सत्य ला सकता है, उसे जीवन प्रदान कर सकता है और उसे मार्ग दिखा सकता है। जिस देह में परमेश्वर का सार नहीं है, वह निश्चित रूप से देहधारी परमेश्वर नहीं है; इसमें कोई संदेह नहीं। अगर मनुष्य यह जाँच करना चाहता है कि क्या यह परमेश्वर की देहधारी देह है, तो उसे इसका निर्धारण उसके द्वारा व्यक्त स्वभाव और उसके द्वारा बोले गए वचनों से करना चाहिए। अर्थात्, यह निर्धारित करने के लिए कि वह परमेश्वर का देहधारी स्वरूप है या नहीं और वह सच्चा मार्ग है या नहीं, व्यक्ति को उसके सार के आधार पर उसकी परख करनी चाहिए। अतः यह देहधारी परमेश्वर की देह है कि नहीं, यह निर्धारित करने की कुंजी उसके बाहरी स्वरूप के बजाय उसके सार (यानी उसके कार्य, उसके वचनों, उसके स्वभाव और बहुत-से अन्य पहलुओं) में निहित होती है। यदि मनुष्य केवल उसके बाहरी स्वरूप की ही जाँच करता है, और परिणामस्वरूप उसके सार की अनदेखी करता है, तो इससे उसके मूर्ख और अज्ञानी होने का पता चलता है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, प्रस्तावना

193. परमेश्वर के देहधारण का निहितार्थ यह है कि परमेश्वर देह में रहता और कार्य करता है, परमेश्वर अपने सार में देह बन जाता है, वह एक व्यक्ति बन जाता है। उसके देहधारी जीवन और कार्य को दो चरणों में विभाजित किया जा सकता है। पहला वह जीवन है जो वह सेवकाई प्रारम्भ करने से पहले जीता है। वह साधारण मानवीय परिवार में, एकदम सामान्य मानवता में रहता है, मानवीय जीवन की सामान्य नैतिकताओं का पालन और मानवीय जीवन की सामान्य व्यवस्थाओं का पालन करता है, उसकी सामान्य मानवीय आवश्यकताएँ होती हैं (भोजन, कपड़ा, आवास, निद्रा), उसमें सामान्य मानवीय कमजोरियाँ और सामान्य मानवीय भावनाएँ होती हैं। दूसरे शब्दों में, इस पहले चरण में वह सभी सामान्य मानवीय क्रियाकलापों में शामिल होते हुए, बिना दिव्यता के, पूरी तरह से सामान्य मानवता में रहता है। दूसरा चरण वह जीवन है जो वह अपनी सेवकाई को आरंभ करने के बाद जीता है। वह अब भी सामान्य मानव-आवरण के साथ, साधारण मानवता में रहता है, और किसी तरह की अलौकिकता का कोई बाहरी चिह्न नहीं देता। फिर भी वह पूरी तरह से अपनी सेवकाई के लिए ही जीता है, और इस दौरान उसकी सामान्य मानवता पूरी तरह से उसकी दिव्यता के सामान्य कार्य को बनाए रखने के लिए अस्तित्व में रहती है, क्योंकि तब तक उसकी सामान्य मानवता उसकी सेवकाई के कार्य को करने में सक्षम होने की स्थिति तक परिपक्व हो चुकी होती है। तो उसके जीवन का दूसरा चरण सामान्य मानवता में अपनी सेवकाई को करना है, जब यह सामान्य मानवता और पूर्ण दिव्यता दोनों का जीवन होता है। अपने जीवन के प्रथम चरण में वह पूरी तरह से साधारण मानवता का जीवन क्यों जीता है, उसका कारण यह है कि उसकी मानवता अभी तक दिव्य कार्य की समग्रता को सँभालने लायक नहीं हो पायी है, अभी तक वह परिपक्व नहीं हुई है; जब उसकी मानवता परिपक्व हो जाती है—यानी, जब वह उसकी सेवकाई का बीड़ा उठा सकती है—तब ही वह जो सेवकाई उसे करनी चाहिए, उसे करने की शुरुआत कर सकता है। चूँकि वह देह है, उसे विकसित होकर परिपक्व होने की आवश्यकता होती है। इसलिए, उसके जीवन का पहला चरण सामान्य मानवता का जीवन होता है, जबकि दूसरे चरण में, उसकी मानवता उसके कार्य का बीड़ा उठाने और उसकी सेवकाई को करने में सक्षम होती है, और इसलिए अपनी सेवकाई के दौरान देहधारी परमेश्वर जिस जीवन को जीता है वह मानवता और पूर्ण दिव्यता दोनों का जीवन होता है। यदि अपने जन्म के समय से ही परमेश्वर का देहधारी शरीर, औपचारिक रूप से अपनी सेवकाई आरंभ कर देता, और वह जो करता उस सबमें अलौकिक चिह्न और चमत्कार शामिल होते, तो उसमें कोई भी दैहिक सार नहीं होता। इसलिए, उसकी मानवता उसके दैहिक सार के लिए अस्तित्व में रहती है; मानवता के बिना कोई देह नहीं हो सकती है और एक मानवता रहित व्यक्ति मनुष्य नहीं होता है। इस तरह, परमेश्वर की देह की मानवता, परमेश्वर के देहधारण का अंतर्भूत गुण है। यह कहना कि "जब परमेश्वर देहधारी होता है तो उसके पास केवल दिव्यता होती है, कोई मानवता नहीं," ईशनिंदा है, क्योंकि यह वक्तव्य टिक ही नहीं सकता है, और यह देहधारण के सिद्धांत का उल्लंघन करता है। अपनी सेवकाई आरंभ करने के बाद भी, अपना कार्य करते हुए वह बाह्य मानवीय आवरण के साथ ही अपनी दिव्यता में रहता है; बात सिर्फ़ इतनी ही है कि उस समय, उसकी मानवता उसकी दिव्यता को सामान्य देह में कार्य करने देने के एकमात्र प्रयोजन को पूरा करती है। इसलिए कार्य की अभिकर्ता उसकी मानवता में रहने वाली दिव्यता है। कार्य उसकी दिव्यता करती है, न कि उसकी मानवता, मगर यह दिव्यता उसकी मानवता में छिपी रहती है; सार रूप में, उसका कार्य अब भी उसकी संपूर्ण दिव्यता द्वारा ही किया जाता है, न कि उसकी मानवता द्वारा। परन्तु कार्य को करने वाली उसकी देह है। कह सकते हैं कि वह मनुष्य भी है और परमेश्वर भी, क्योंकि परमेश्वर देह में रहने वाला परमेश्वर बन जाता है; उसके पास मानवीय आवरण और मानवीय सार होता है, और उससे भी अधिक उसमें परमेश्वर का सार होता है। चूँकि वह परमेश्वर के सार वाला मनुष्य है, इसलिए वह सभी सृजित मानवों से ऊपर है, ऐसे किसी भी व्यक्ति से ऊपर है जो परमेश्वर का कार्य कर सकता है। तो, उसके समान मानवीय आवरण वाले सभी लोगों में, जिन लोगों में मानवता है, उनमें, एकमात्र वही स्वयं देहधारी परमेश्वर है—अन्य सभी सृजित मानव हैं। यद्यपि उन सभी में मानवता है, किन्तु सृजित मानव में केवल मानवता ही है, जबकि देहधारी परमेश्वर भिन्न है : उसकी देह में न केवल मानवता है, बल्कि सबसे महत्वपूर्ण यह है कि उसमें दिव्यता भी है। उसकी मानवता उसके देह के बाहरी रूप-रंग में और उसके दिन-प्रतिदिन के जीवन में देखी जा सकती है, किन्तु उसकी दिव्यता को देख पाना मुश्किल है। क्योंकि उसकी दिव्यता केवल तभी व्यक्त होती है जब उसमें मानवता होती है, और यह वैसी अलौकिक नहीं होती जैसी लोग कल्पना करते हैं, इसलिए लोगों के लिए इसे देख पाना बहुत कठिन होता है। आज भी, लोगों के लिए इसकी थाह पाना बहुत कठिन है कि देहधारी परमेश्वर का सार आखिर क्या है। मेरे इतने सारे वचन बोलने के बाद भी, मुझे लगता है कि तुम लोगों में से अधिकांश के लिए यह एक रहस्य ही है। वास्तव में, यह मामला बहुत सरल है : चूँकि परमेश्वर देहधारी बन जाता है, उसका सार मानवता और दिव्यता का संयोजन है। यह संयोजन स्वयं परमेश्वर, पृथ्वी पर स्वयं परमेश्वर कहलाता है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर द्वारा धारण किए गए देह का सार

194. देहधारी परमेश्वर की मानवता देह में सामान्य दिव्य कार्य को बनाए रखने के लिए मौजूद रहती है; उसकी सामान्य मानवीय सोच उसकी सामान्य मानवता को बनाए रखती और उसकी समस्त सामान्य दैहिक गतिविधियों को सहारा देती है। ऐसा कहा जा सकता है कि उसकी सामान्य मानवीय सोच देह में परमेश्वर के समस्त कार्य को बनाए रखने के उद्देश्य से विद्यमान रहती है। यदि इस देह में सामान्य मानवीय मन न होता, तो परमेश्वर देह में कार्य न कर पाता और जो उसे देह में करना था, वह कभी नहीं किया जा सकता था। यद्यपि देहधारी परमेश्वर में एक सामान्य मानवीय मन होता है, किन्तु उसके कार्य में मानवीय विचारों की मिलावट नहीं होती; वह सामान्य मन के साथ मानवता में कार्य करता है, मन-युक्त मानवता के होने की पूर्वशर्त के तहत, न कि सामान्य मानवीय विचारों को प्रयोग में लाकर। उसकी देह के विचार कितने भी उत्कृष्ट क्यों न हों, लेकिन उसके कार्य में तर्क या सोच की मिलावट नहीं होती। दूसरे शब्दों में, उसके कार्य की कल्पना उसकी देह के मन के द्वारा नहीं की जाती, बल्कि वह उसकी मानवता में दिव्य कार्य की प्रत्यक्ष अभिव्यक्ति है। उसका समस्त कार्य उसकी वह सेवकाई है जिसे उसे पूरा करना है, उसमें से कुछ भी उसके मस्तिष्क की कल्पना नहीं होता। उदाहरण के लिए, बीमार को चंगा करना, राक्षसों को निकालना, और क्रूसीकरण उसके मानवीय मन की उपज नहीं थे, उन्हें किसी भी मानवीय मन वाले मनुष्य द्वारा नहीं किया जा सकता था। उसी तरह, आज का विजय-कार्य ऐसी सेवकाई है जिसे देहधारी परमेश्वर द्वारा किया जाना चाहिए, किन्तु यह व्यक्ति की इच्छा नहीं है, यह ऐसा कार्य है जो उसकी दिव्यता को करना चाहिए, ऐसा कार्य जिसे करने में कोई भी रक्त-मांस का मानव सक्षम नहीं है। इसलिए देहधारी परमेश्वर में सामान्य मानव मन होना चाहिए, सामान्य मानवता से संपन्न होना चाहिए, क्योंकि उसे अवश्य एक सामान्य मन के साथ मानवता में कार्य करना चाहिए। यही देहधारी परमेश्वर के कार्य का सार है, देहधारी परमेश्वर का वास्तविक सार है।

कार्य आरंभ करने से पहले, यीशु मात्र सामान्य मानवता में रहता था। कोई नहीं कह सकता था कि वह परमेश्वर है, किसी को भी पता नहीं चला कि वह देहधारी परमेश्वर है; लोग उसे बस एक सर्वाधिक साधारण व्यक्ति के रूप में जानते थे। उसकी सामान्य मानवता—जो उतनी साधारण थी जितना कि संभव है—इस बात का प्रमाण थी कि परमेश्वर ने शरीर में देहधारण किया है, और अनुग्रह का युग देहधारी परमेश्वर के कार्य का युग है, न कि आत्मा के कार्य का युग। यह इस बात का प्रमाण था कि परमेश्वर का आत्मा पूरी तरह से देह में साकार हुआ है और परमेश्वर के देहधारण के युग में उसकी देह आत्मा का समस्त कार्य करेगी। सामान्य मानवता वाला मसीह ऐसी देह है जिसमें आत्मा साकार हुआ है, जिसमें सामान्य मानवता है, सामान्य समझ है और मानवीय विचार हैं। “साकार होने” का अर्थ है परमेश्वर का मानव बनना, आत्मा का देह बनना; इसे और स्पष्ट रूप से कहें, तो यह तब होता है जब स्वयं परमेश्वर सामान्य मानवता वाली देह में वास करके उसके माध्यम से अपने दिव्य कार्य को व्यक्त करता है—यही साकार होने या देहधारी होने का अर्थ है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर द्वारा धारण किए गए देह का सार

195. मसीह की मानवता उसकी दिव्यता द्वारा संचालित होती है। यद्यपि वह देह में है, किंतु उसकी मानवता पूर्ण रूप से देह वाले एक मनुष्य के समान नहीं है। उसका अपना अनूठा व्यक्तित्व है और यह भी उसकी दिव्यता द्वारा संचालित होता है। उसकी दिव्यता में कोई निर्बलता नहीं है; मसीह की निर्बलता उसकी मानवता से संबंधित है। एक निश्चित सीमा तक, यह निर्बलता उसकी दिव्यता को विवश करती है, पर इस प्रकार की सीमाएं एक निश्चित दायरे और समय के भीतर होती हैं और असीम नहीं हैं। जब उसकी दिव्यता का कार्य क्रियान्वित करने का समय आता है, तो वह उसकी मानवता की परवाह किए बिना किया जाता है। मसीह की मानवता पूर्णतः उसकी दिव्यता द्वारा निर्देशित होती है। उसके मानवता के साधारण जीवन से अलग, उसकी मानवता के अन्य सभी काम उसकी दिव्यता द्वारा प्रेरित, प्रभावित और निर्देशित होते हैं। यद्यपि मसीह में मानवता है, पर इससे उसकी दिव्यता के कार्य में विघ्न नहीं पड़ता और ऐसा ठीक इसलिए है क्योंकि मसीह की मानवता उसकी दिव्यता द्वारा निर्देशित है; हालाँकि जब सांसारिक आचरण की बात आती है तो उसकी मानवता परिपक्व नहीं है, यह उसकी दिव्यता के सामान्य कार्य को प्रभावित नहीं करता। जब मैं यह कहता हूँ कि उसकी मानवता भ्रष्ट नहीं हुई है, तब मेरा मतलब है कि मसीह की मानवता को तुरंत उसकी दिव्यता द्वारा निर्देशित किया जा सकता है और उसके पास साधारण मनुष्य की तुलना में उच्चतर विवेक है। उसकी मानवता उसके कार्य में दिव्यता द्वारा निर्देशित होने के लिए सबसे अनुकूल है; उसकी मानवता दिव्यता के कार्य को अभिव्यक्त करने में सबसे समर्थ है और साथ ही ऐसे कार्य के प्रति समर्पण करने में सबसे समर्थ है। जब परमेश्वर देह में कार्य करता है, वह कभी उस कर्तव्य की उपेक्षा नहीं करता, जिसे देह में व्यक्ति को निभाना चाहिए; वह सच्चे हृदय से स्वर्ग में परमेश्वर की आराधना करने में सक्षम है। उसमें परमेश्वर का सार है और उसकी पहचान स्वयं परमेश्वर की पहचान है। केवल इतना है कि वह पृथ्वी पर आया है और एक सृजित प्राणी बन गया है, जिसका बाहरी आवरण सृजित प्राणी का है और अब ऐसी मानवता से संपन्न है, जो पहले उसके पास नहीं थी; वह स्वर्ग में परमेश्वर की आराधना करने में सक्षम है; यह स्वयं परमेश्वर का अस्तित्व है तथा मनुष्य उसका अनुकरण नहीं कर सकता। उसकी पहचान स्वयं परमेश्वर है। देह के परिप्रेक्ष्य से वह परमेश्वर की आराधना करता है; इसलिए, ये वचन “मसीह स्वर्ग में परमेश्वर की आराधना करता है” त्रुटिपूर्ण नहीं हैं। वह लोगों से जो माँगता है, वह ठीक-ठीक उसका स्वयं का अस्तित्व है; लोगों से कुछ भी माँगने से पहले वह उसे पहले ही प्राप्त कर चुका होता है। वह कभी भी दूसरों से माँग नहीं करता जबकि वह स्वयं उनसे मुक्त है, क्योंकि इन सबसे उसका अस्तित्व गठित होता है। इस बात की परवाह किए बिना कि वह कैसे अपना कार्य क्रियान्वित करता है, वह इस प्रकार कार्य नहीं करेगा, जिससे परमेश्वर से विद्रोह हो। चाहे वह मनुष्य से कुछ भी माँगे, कोई भी माँग मनुष्य द्वारा प्राप्य से बढ़कर नहीं होती। वह जो कुछ करता है, वह परमेश्वर की इच्छा के अनुसार चलना है और उसके प्रबंधन के वास्ते है। मसीह की दिव्यता सभी लोगों से ऊपर है; इसलिए सभी सृजित प्राणियों में वह सर्वोच्च अधिकारी है। यह अधिकार उसकी दिव्यता है, यानी परमेश्वर का स्वयं का अस्तित्व और स्वभाव उसकी पहचान निर्धारित करता है। इसलिए, चाहे उसकी मानवता कितनी ही सामान्य हो, इससे इनकार नहीं हो सकता कि उसके पास स्वयं परमेश्वर की पहचान है; चाहे वह किसी भी दृष्टिकोण से बोले और किसी भी तरह परमेश्वर की इच्छा के प्रति समर्पण करे, यह नहीं कहा जा सकता है कि वह स्वयं परमेश्वर नहीं है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, स्वर्गिक परमपिता की इच्छा के प्रति समर्पण ही मसीह का सार है

196. देहधारी मनुष्य के पुत्र ने अपनी मानवता के माध्यम से परमेश्वर की दिव्यता को व्यक्त किया, और मानवजाति तक परमेश्वर के इरादों को पहुँचाया। और परमेश्वर के इरादों और स्वभाव की अपनी अभिव्यक्ति के माध्यम से, उसने लोगों के सामने आध्यात्मिक क्षेत्र के उस परमेश्वर को भी प्रकट किया जिसे देखा या छुआ नहीं जा सकता। लोगों ने जिसे देखा वह रूप और छवि वाला, और हाड़-माँस से बना स्वयं परमेश्वर था। इसलिए देहधारी मनुष्य के पुत्र ने स्वयं परमेश्वर की पहचान, दर्जे, छवि और स्वभाव के साथ-साथ, जो उसके पास है और जो वह स्वयं है, जैसी चीजों को मूर्त और मानवीय रूप दिया। भले ही, परमेश्वर की छवि के संदर्भ में, मनुष्य का पुत्र अपने रूप-रंग में कुछ सीमाओं के अधीन था, लेकिन उसका सार और जो उसके पास है और जो वह स्वयं है, वे स्वयं परमेश्वर की पहचान और दर्जे का प्रतिनिधित्व करने में पूरी तरह से सक्षम थे—अभिव्यक्ति के रूप में केवल कुछ भिन्नताएँ थीं। चाहे उसकी मानवता में हो या उसकी दिव्यता में, हम इस बात से इनकार नहीं कर सकते कि मनुष्य के पुत्र ने स्वयं परमेश्वर की पहचान और दर्जे का प्रतिनिधित्व किया। बात बस इतनी है कि इस समय के दौरान, परमेश्वर ने देह के माध्यम से कार्य किया, देह के परिप्रेक्ष्य से बात की, और मनुष्य के पुत्र की पहचान और दर्जे के साथ मानवजाति का सामना किया, जिससे लोगों को मानवजाति के बीच परमेश्वर के व्यावहारिक वचनों और कार्य के संपर्क में आने और उनका अनुभव करने का अवसर मिला। इसने लोगों को विनम्रता के बीच उसकी दिव्यता और उसकी महानता की अंतर्दृष्टि भी दी, साथ ही परमेश्वर की वास्तविकता और व्यावहारिकता की प्रारंभिक समझ और परिभाषा प्राप्त करने की भी अनुमति दी। भले ही प्रभु यीशु का कार्य, कार्य करने के तरीके, और जिस परिप्रेक्ष्य से उसने बात की, वे आध्यात्मिक क्षेत्र में परमेश्वर के सच्चे रूप के मामले से भिन्न थे, लेकिन उसके बारे में हर चीज ने पूर्ण सटीकता के साथ स्वयं परमेश्वर का प्रतिनिधित्व किया, जिसे मानवजाति ने पहले कभी नहीं देखा था—इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता! कहने का तात्पर्य यह है कि परमेश्वर चाहे जिस भी तरीके से प्रकट हो, वह जिस भी परिप्रेक्ष्य से बात करे या वह जिस भी छवि के साथ मानवजाति का सामना करे, परमेश्वर केवल अपना प्रतिनिधित्व करता है; वह किसी भी व्यक्ति का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता, और न ही वह किसी भ्रष्ट मनुष्य का प्रतिनिधित्व कर सकता है। परमेश्वर स्वयं परमेश्वर है। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता।

—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III

197. आज जिस व्यावहारिक परमेश्वर की बात की जाती है, वह मानवता और दिव्यता दोनों में कार्य करता है। व्यावहारिक परमेश्वर के प्रकट होने के माध्यम से उसका सामान्य मानवीय कार्य और जीवन और उसका पूर्ण दिव्यता का कार्य, सभी हासिल किए जाते हैं। उसकी मानवता और दिव्यता संयुक्त रूप से एक हैं, और दोनों का कार्य वचनों के द्वारा पूरा किया जाता है; मानवता में हो या दिव्यता में, वह वचन बोलता है। जब परमेश्वर मानवता में कार्य करता है, तो वह मानव की भाषा बोलता है, ताकि लोग उससे जुड़ सकें और उसके वचनों को अधिक आसानी से समझ सकें। उसके वचन स्पष्ट रूप से बोले जाते हैं और समझने में आसान होते हैं, ऐसे कि वे सभी लोगों को प्रदान किए जा सकें; लोग सुशिक्षित हों या अल्पशिक्षित, वे सब परमेश्वर के वचनों को प्राप्त कर सकते हैं। दिव्यता में परमेश्वर का कार्य भी वचनों के द्वारा ही किया जाता है, लेकिन वह पोषण से भरा होता है, जीवन से भरा होता है, मनुष्य की धारणाओं से दूषित नहीं होता, उसमें मनुष्य की प्राथमिकताएँ शामिल नहीं होतीं, और वह मानवता की सीमाओं के अधीन नहीं होता है, वह सामान्य मानवता की किसी भी बाधा से मुक्त होता है; साथ ही, वह देह में किया जाता है, लेकिन आत्मा की सीधी अभिव्यक्ति होता है। यदि लोग केवल परमेश्वर द्वारा मानवता में किए गए कार्य को ही स्वीकार करते हैं, तो वे अपने आपको एक दायरे में सीमित कर लेंगे, और एक छोटे-से बदलाव के लिए भी उन्हें कई वर्षों की काट-छाँट और अनुशासन की आवश्यकता होगी। हालाँकि पवित्र आत्मा के कार्य या उसकी उपस्थिति के बिना वे हमेशा अपने पुराने रास्ते पर लौट जाएँगे। दिव्यता के कार्य के माध्यम से ही इस दोष और कमी की भरपाई की जाती है और लोगों को पूर्ण बनाया जाता है। सतत काट-छाँट के बजाय, जो चीज़ ज़रूरी है वह है सकारात्मक पोषण, सभी कमियों की भरपाई करने के लिए वचनों का उपयोग करना, लोगों की हर अवस्था प्रकट करने के लिए वचनों का उपयोग करना, उनके जीवन, उनके प्रत्येक कथन, उनके हर कार्य को निर्देशित करने और उनके इरादों और प्रेरणाओं को खोलकर रख देने के लिए वचनों का उपयोग करना। यही है व्यावहारिक परमेश्वर का व्यावहारिक कार्य। इसलिए, व्यावहारिक परमेश्वर के प्रति अपने रवैये में तुम्‍हें उसकी मानवता के सामने समर्पण करना चाहिए, उसे पहचानना और स्वीकार करना चाहिए; सबसे अहम बात यह है कि तुम्हें दिव्यता में उसके कार्य और वचनों को भी स्वीकार करना और उनके प्रति समर्पण करना चाहिए। परमेश्वर के देह में प्रकट होने का अर्थ है कि परमेश्वर के आत्मा के सब कार्य और वचन उसकी सामान्य मानवता, और उसके द्वारा धारित देह के माध्यम से किए जाते हैं। दूसरे शब्दों में, परमेश्वर का आत्मा उसकी मानवता को कार्य करने के लिए निर्देशित करता है और दिव्यता के कार्य को देह में पूरा करता है, और देहधारी परमेश्वर में तुम परमेश्वर के मानवता में किए गए कार्य और पूर्ण दिव्यता में किए गए उसके कार्य, दोनों देख सकते हो। व्यावहारिक परमेश्वर के देह में प्रकट होने का यह वास्तविक अर्थ है। यदि तुम इसे स्पष्ट रूप से देख सकते हो, तो तुम परमेश्वर के सभी विभिन्न भागों को जोड़ पाओगे; तुम उसके दिव्यता में किए गए कार्य को बहुत ज्यादा महत्व देना और मानवता में किए गए उसके कार्य को तुच्छ समझना बंद कर दोगे, तुम चरम सीमाओं पर नहीं जाओगे, न ही कोई गलत रास्ता पकड़ोगे। कुल मिलाकर, व्यावहारिक परमेश्वर का अर्थ यह है कि उसका मानवता और दिव्यता का कार्य, आत्मा के निर्देशानुसार, उसके देह के माध्यम से अभिव्यक्त किया जाता है, ताकि लोग देख सकें कि वह जीवंत और सजीव, वास्तविक और सत्य है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, तुम्हें पता होना चाहिए कि व्यावहारिक परमेश्वर ही स्वयं परमेश्वर है

198. परमेश्वर का आत्मा सभी चीजों पर अधिकार रखता है। परमेश्वर के सार वाली देह भी अधिकार संपन्न है, पर देह में परमेश्वर वह सब कार्य कर सकता है, जो स्वर्गिक पिता की इच्छा के प्रति समर्पित होता है। इसे किसी मनुष्य द्वारा प्राप्त किया या समझा नहीं जा सकता। परमेश्वर स्वयं अधिकार है, पर उसकी देह उसके अधिकार के प्रति समर्पित हो सकती है। “मसीह परमपिता परमेश्वर की इच्छा के प्रति समर्पण करता है” का यही अंतर्निहित अर्थ है। परमेश्वर आत्मा है और उद्धार का कार्य कर सकता है, और वह परमेश्वर भी इसे कर सकता है जो मनुष्य बना है। चाहे जो हो, परमेश्वर स्वयं अपना कार्य करता है; वह न तो गड़बड़ी करता है न विघ्न डालता है, ऐसा कार्य तो नहीं ही करता, जो परस्पर विपरीत हो क्योंकि आत्मा और देह द्वारा किए गए कार्य का सार एक समान है। चाहे आत्मा हो या देह, दोनों एक इच्छा को पूरा करने के लिए कार्य करते हैं और उसी कार्य को प्रबंधित करते हैं। यद्यपि आत्मा और देह की दो भिन्न विशेषताएं हैं, किंतु उनके सार एक ही हैं; दोनों में स्वयं परमेश्वर का सार है और स्वयं परमेश्वर की पहचान है। स्वयं परमेश्वर में विद्रोहीपन के तत्व नहीं होते; उसका सार अच्छा है। वह समस्त सुंदरता और अच्छाई की और साथ ही समस्त प्रेम की अभिव्यक्ति है। यहाँ तक कि देह में भी परमेश्वर ऐसा कुछ नहीं करता जो परमपिता परमेश्वर से विद्रोह का सूचक हो। यहाँ तक कि अपने जीवन का बलिदान करने की क़ीमत पर भी वह ऐसा करने को पूरे मन से तैयार रहेगा और कोई दूसरा मन नहीं बनाएगा। परमेश्वर में आत्मतुष्टि और ख़ुदगर्ज़ी के या दंभ या घमंड के तत्व नहीं हैं; उसमें कुटिलता का कोई तत्व नहीं है। जो कुछ भी परमेश्वर से विद्रोह का सूचक है, वह शैतान से आता है; शैतान समस्त कुरूपता और बुराई का स्रोत है। इसका कारण कि मनुष्य में वही गुण हैं जो शैतान में हैं, यह है कि मनुष्य को शैतान द्वारा भ्रष्ट और संसाधित किया गया है। मसीह को शैतान द्वारा भ्रष्ट नहीं किया गया है, अतः उसके पास केवल परमेश्वर के गुण हैं तथा शैतान का एक भी गुण नहीं है। इस बात की परवाह किए बिना कि कार्य कितना कठिन है या देह कितनी निर्बल, परमेश्वर जब देह में रहता है, कभी भी ऐसा कुछ नहीं करेगा, जिससे स्वयं परमेश्वर के कार्य में गड़बड़ी हो, परमपिता परमेश्वर की इच्छा का त्याग और विद्रोह तो बिल्कुल नहीं करेगा। वह देह की पीड़ा सह लेगा, मगर परमपिता परमेश्वर की इच्छा के विरुद्ध नहीं जाएगा; यह वैसा है, जैसा यीशु ने प्रार्थना में कहा, “पिता, हो सके तो इस कटोरे को मेरे पास से गुजर जाने दो : फिर भी, मेरी इच्छा नहीं बल्कि तुम्हारी इच्छा पूरी हो।” लोग अपने चुनाव करते हैं, किंतु मसीह नहीं करता। यद्यपि उसके पास स्वयं परमेश्वर की पहचान है, फिर भी वह परमपिता परमेश्वर की इच्छा की तलाश करता है और देह के दृष्टिकोण से वह पूरा करता है, जो उसे परमपिता परमेश्वर द्वारा सौंपा गया है। यह कुछ ऐसा है, जो मनुष्य हासिल नहीं कर सकता। जो कुछ शैतान से आता है, उसमें परमेश्वर का सार नहीं हो सकता; उसमें केवल वही सार हो सकता है जो परमेश्वर से विद्रोह और उसका विरोध करे। वह पूर्ण रूप से परमेश्वर के प्रति समर्पण नहीं कर सकता, स्वेच्छा से परमेश्वर की इच्छा के प्रति समर्पण करना तो दूर की बात है। मसीह के अलावा सभी लोग वह कर सकते हैं, जिससे परमेश्वर का विरोध होता हो, और एक भी व्यक्ति परमेश्वर द्वारा सौंपे गए कार्य को सीधे नहीं कर सकता; एक भी परमेश्वर के प्रबंधन को अपने कर्तव्य के रूप में मानने में सक्षम नहीं है। मसीह का सार परमपिता परमेश्वर की इच्छा के प्रति समर्पण करना है; परमेश्वर से विद्रोह शैतान का गुण है। ये दोनों गुण असंगत हैं और कोई भी जिसमें शैतान के गुण हैं, मसीह नहीं कहला सकता। मनुष्य परमेश्वर के बदले उसका कार्य नहीं कर सकता, इसका कारण यह है कि मनुष्य में परमेश्वर का कोई भी सार नहीं है। मनुष्य परमेश्वर के लिए मनुष्य के व्यक्तिगत हितों और भविष्य की संभावनाओं के वास्ते कार्य करता है, किंतु मसीह परमपिता परमेश्वर की इच्छा के अनुसार चलने के लिए कार्य करता है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, स्वर्गिक परमपिता की इच्छा के प्रति समर्पण ही मसीह का सार है

199. यद्यपि देहधारी परमेश्वर का बाहरी रूप-रंग ठीक मनुष्य के रूप-रंग के समान है, और यद्यपि वह मानवीय ज्ञान सीखता है और मानवीय भाषा बोलता है, और कभी-कभी अपने विचार मानवीय पद्धतियों से या मानवीय कहावतों का उद्धरण करके भी व्यक्त करता है, फिर भी, जिस तरीके से वह मनुष्यों को और चीज़ों के सार को देखता है, वह उसके बिल्कुल भी समान नहीं है जैसे भ्रष्ट लोग उन्हें देखते हैं। उसका परिप्रेक्ष्य और वह ऊँचाई, जिस पर वह खड़ा है, किसी भी भ्रष्ट व्यक्ति के द्वारा अप्राप्य है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि परमेश्वर सत्य है, क्योंकि उसके द्वारा धारित देह में भी स्वयं परमेश्वर का सार है, और उसके विचार तथा जो कुछ उसकी मानवता के द्वारा व्यक्त किया जाता है, वे भी सत्य हैं। भ्रष्ट लोगों के लिए, जो कुछ वह देह में व्यक्त करता है, वह सत्य और जीवन के प्रावधान हैं। ये प्रावधान केवल एक व्यक्ति के लिए नहीं, बल्कि पूरी मानवजाति के लिए हैं। किसी भ्रष्ट व्यक्ति के हृदय में केवल वे थोड़े-से लोग ही होते हैं, जो उससे संबद्ध होते हैं। वह केवल उन मुट्ठीभर लोगों की ही परवाह करता है और उन्हीं के बारे में चिंता करता है। जब आपदा आती है, तो वह पहले अपने बच्चों, जीवनसाथी, या माता-पिता के बारे में सोचता है। यहाँ तक कि जो व्यक्ति अधिक “सार्वभौमिक रूप से प्रेमी” होता है, वह भी ज्यादा से ज्यादा किसी रिश्तेदार या अच्छे दोस्त के बारे में सोचेगा, लेकिन क्या वह कभी किसी और के बारे में विचार करेगा? नहीं, कभी नहीं! क्योंकि मनुष्य अंततः मनुष्य हैं, और वे सब कुछ एक मनुष्य की ऊँचाई और परिप्रेक्ष्य से ही देख सकते हैं। किंतु देहधारी परमेश्वर भ्रष्ट व्यक्ति से पूर्णतः अलग है। देहधारी परमेश्वर का देह कितना ही साधारण, कितना ही सामान्य, कितना ही विनम्र क्यों न हो, यहाँ तक कि लोग उसे कितनी ही नीची निगाह से देखते हों, मानवजाति के प्रति उसके विचार और उसका रवैया ऐसी चीज़ें हैं, जो किसी भी मनुष्य में नहीं हैं, जिनका कोई मनुष्य अनुकरण नहीं कर सकता। वह मानवजाति का अवलोकन हमेशा दिव्यता के परिप्रेक्ष्य से, सृष्टिकर्ता के रूप में अपनी स्थिति की ऊँचाई से करेगा। वह मानवजाति को हमेशा परमेश्वर के सार और मानसिकता से देखेगा। वह मानवजाति को एक औसत व्यक्ति की ऊँचाई से, या एक भ्रष्ट व्यक्ति के परिप्रेक्ष्य से बिल्कुल नहीं देखेगा। जब लोग मानवजाति को देखते हैं, तो वे उसे मनुष्य की दृष्टि से देखते हैं और वे अपने पैमाने के रूप में मनुष्य के ज्ञान और मनुष्य के विनियमों और सिद्धांतों जैसी चीज़ों का उपयोग करते हैं। यह वह दायरा है, जिसे लोग अपनी आँखों से देख सकते हैं और वह दायरा है जिसे भ्रष्ट लोग हासिल कर सकते हैं। जब परमेश्वर मानवजाति को देखता है, तो वह दिव्य दृष्टि से देखता है, और पैमाने के रूप में अपने सार और जो उसके पास है और जो वह स्वयं है उसका उपयोग करता है। यह वह दायरा है जिसे लोग नहीं देख सकते, और यहीं पर देहधारी परमेश्वर और भ्रष्ट मनुष्य पूरी तरह से भिन्न हैं। यह भिन्नता मनुष्यों और परमेश्वर के भिन्न-भिन्न सार से निर्धारित होती है—ये भिन्न-भिन्न सार ही उनकी पहचान और स्थिति को और साथ ही उस परिप्रेक्ष्य और ऊँचाई को निर्धारित करते हैं, जिससे वे चीज़ों को देखते हैं।

—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III

200. क्या तुम्हारे पास सामाजिक अनुभव है और तुम वास्तव में किस प्रकार अपने परिवार में रहते और उसके भीतर कैसे अनुभव करते हो, इसे तुम्हारी अभिव्यक्ति में देखा जा सकता है, जबकि तुम देहधारी परमेश्वर के कार्य से यह नहीं देख सकते कि उसके पास सामाजिक अनुभव हैं या नहीं। वह मनुष्य के सार को अच्छी तरह से जानता है और सभी प्रकार के लोगों के विभिन्न अभ्यास उजागर कर सकता है। इतना ही नहीं, वह मनुष्यों के भ्रष्ट स्वभाव और विद्रोही व्यवहार भी उजागर कर सकता है। वह दुनिया के लोगों के बीच नहीं रहता, परंतु वह नश्वर लोगों की प्रकृति और दुनिया के लोगों की समस्त भ्रष्टता से अवगत है। यही उसका अस्तित्व है। यद्यपि वह दुनिया के साथ व्यवहार नहीं करता, लेकिन वह दुनिया से निपटने के तमाम नियम जानता है, क्योंकि वह मानवीय प्रकृति को पूरी तरह से समझता है। वह आत्मा के आज के और अतीत के, दोनों कार्यों के बारे में जानता है जिन्हें मनुष्य की आँखें नहीं देख सकतीं और कान नहीं सुन सकते। इसमें बुद्धि शामिल है जो कि सांसारिक आचरण का फलसफा नहीं है और वह चमत्कार है जिनकी थाह पाना मनुष्य के लिए कठिन है। यही उसका अस्तित्व है, लोगों के लिए खुला भी और उनसे छिपा हुआ भी है। वह जो कुछ व्यक्त करता है, वह असाधारण मनुष्य का अस्तित्व नहीं है, बल्कि आत्मा के अंतर्निहित गुण और अस्तित्व हैं। वह दुनिया भर में यात्रा नहीं करता परंतु उसकी हर चीज़ को जानता है। वह “वन-मानुषों” के साथ संपर्क करता है जिनके पास कोई ज्ञान या अंतर्दृष्टि नहीं होती, परंतु वह ऐसे वचन व्यक्त करता है जो ज्ञान से ऊँचे और महान हस्तियों के वचनों से ऊपर होते हैं। वह ऐसे मंदबुद्धि और संवेदनशून्य लोगों के समूह में रहता है जिनमें मानवता नहीं है और जो मानव-जीवन को या मानवता के मानदंडों को नहीं समझते, परंतु वह मानवजाति से सामान्य मानवता का जीवन जीने के लिए कह सकता है, साथ ही वह मानवजाति की नीच और अधम मानवता को उजागर भी करता है। यह सब कुछ उसका अस्तित्व ही है, किसी भी रक्त-माँस के इंसान के अस्तित्व की तुलना में अधिक ऊँचा। उसके लिए यह आवश्यक नहीं है कि वह उस कार्य को करने के लिए जो उसे करने की जरूरत है और भ्रष्ट मानवजाति के सार को पूरी तरह से उजागर करने के लिए जटिल, बोझिल और पतित सामाजिक जीवन का अनुभव करने का अतिरिक्त कदम उठाए। पतित सामाजिक जीवन उसके देह को “विकसित” नहीं कर सकता। उसका कार्य और उसके वचन केवल मनुष्य के विद्रोहीपन को उजागर करते हैं और संसार से निपटने के लिए मनुष्य को अनुभव और सबक प्रदान नहीं करते। जब वह मनुष्य को जीवन की आपूर्ति करता है तो उसे समाज या मनुष्य के परिवार की जाँच-पड़ताल करने की आवश्यकता नहीं होती। मनुष्य को उजागर करना और न्याय करना उसकी देह के अनुभवों की अभिव्यक्ति नहीं है; यह लंबे समय तक मनुष्य के विद्रोहीपन को जानने और मनुष्य की भ्रष्टता से घृणा करने के बाद उसका मनुष्य की अधार्मिकता उजागर करना है। जो भी कार्य वह करता है, वह सब मनुष्य के सामने उसका स्वभाव प्रकट करता है और उसके अस्तित्व को व्यक्त करता है। केवल वही इस कार्य को कर सकता है; इस कार्य को रक्त-माँस का व्यक्ति नहीं कर सकता।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का कार्य

201. मसीह का कार्य तथा अभिव्यक्ति उसके सार को निर्धारित करते हैं। वह अपने सच्चे हृदय से उसे पूर्ण करने में सक्षम है, जो उसे सौंपा गया है। वह सच्चे हृदय से स्वर्ग में परमेश्वर की आराधना करने में सक्षम है और सच्चे हृदय से परमपिता परमेश्वर की इच्छा खोजने में सक्षम है। यह सब उसके सार द्वारा निर्धारित होता है। और इसी प्रकार उसका प्राकृतिक प्रकाशन भी उसके सार द्वारा निर्धारित किया जाता है; इसे मैं उसका “प्राकृतिक प्रकाशन” कहता हूँ क्योंकि उसकी अभिव्यक्ति कोई नकल नहीं है, या मनुष्य द्वारा शिक्षा का परिणाम, या मनुष्य द्वारा कई वर्षों के संवर्धन का परिणाम नहीं है। उसने इसे सीखा या इससे स्वयं को सँवारा नहीं; बल्कि, यह उसमें अंतर्निहित है। मनुष्य उसके कार्य, उसकी अभिव्यक्ति, उसकी मानवता, और सामान्य मानवता के उसके संपूर्ण जीवन से इनकार कर सकता है, किंतु कोई भी इससे इनकार नहीं कर सकता कि वह सच्चे हृदय से स्वर्ग के परमेश्वर की आराधना करता है; कोई इनकार नहीं कर सकता है कि वह स्वर्गिक पिता की इच्छा पूरी करने के लिए आया है, और कोई उस गंभीर इच्छा से इनकार नहीं कर सकता, जिससे वह परमपिता परमेश्वर की खोज करता है। यद्यपि उसकी छवि इंद्रियों के लिए सुखद नहीं, उसके प्रवचन असाधारण प्रभामंडल से संपन्न नहीं हैं और उसका कार्य धरती या आकाश को थर्रा देने वाला नहीं है जैसा मनुष्य कल्पना करता है, वास्तव में वह मसीह है, जो सच्चे हृदय से स्वर्गिक पिता की इच्छा पूरी करता है, पूर्णतः स्वर्गिक पिता के प्रति समर्पण करता है और मृत्यु तक समर्पित रहता है। यह इसलिए क्योंकि उसका सार मसीह का सार है। मनुष्य के लिए इस तथ्य पर विश्वास करना कठिन है किंतु यह एक तथ्य है। जब मसीह की सेवकाई पूर्णतः संपन्न हो गई है, तो मनुष्य उसके कार्य से देखने में सक्षम होगा कि उसका स्वभाव और उसका अस्तित्व स्वर्ग के परमेश्वर के स्वभाव और अस्तित्व का प्रतिनिधित्व करता है। उस समय, उसके संपूर्ण कार्य को सारांशित कर मनुष्य इसकी पुष्टि कर सकता है कि वह वास्तव में वही देह है जिसे वचन धारण करता है और एक देह और रक्त के मनुष्य के देह के समान नहीं है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, स्वर्गिक परमपिता की इच्छा के प्रति समर्पण ही मसीह का सार है

202. देहधारी हुए परमेश्वर को मसीह कहा जाता है, और इसलिए उस मसीह को जो लोगों को सत्य दे सकता है, परमेश्वर कहना थोड़ी-भी अतिशयोक्ति नहीं है। ऐसा इसलिए है क्योंकि उसमें परमेश्वर का सार होता है, और उसमें परमेश्वर का स्वभाव और परमेश्वर के कार्य की बुद्धि होती है, जो मनुष्य के लिए अप्राप्य हैं। जो अपने आप को मसीह कहते हैं, परंतु परमेश्वर का कार्य नहीं कर सकते, वे धोखेबाज हैं। मसीह पृथ्वी पर परमेश्वर की अभिव्यक्ति मात्र नहीं है, बल्कि वह विशेष देह भी है, जिसे धारण करके धरती पर परमेश्वर मनुष्यों के बीच रहकर अपना कार्य करता है और अपना कार्य पूरा करता है। कोई मनुष्य इस देह की जगह नहीं ले सकता, बल्कि यह वह देह है जो पृथ्वी पर परमेश्वर के कार्य का पर्याप्त रूप से बीड़ा उठा सकती है, जो परमेश्वर का स्वभाव व्यक्त कर सकती है, जो पर्याप्त रूप से परमेश्वर का प्रतिनिधित्व कर सकती है, और जो मनुष्य को जीवन प्रदान कर सकती है। मसीह का भेस धारण करने वाले लोगों का देर-सबेर पतन हो जाएगा, क्योंकि हालाँकि वे मसीह होने का दावा करते हैं, किंतु उनमें मसीह के सार का लेशमात्र भी नहीं है। और इसलिए मैं कहता हूँ कि मसीह की प्रामाणिकता मनुष्य द्वारा निर्धारित नहीं की जा सकती, बल्कि स्वयं परमेश्वर द्वारा ही इसका उत्तर दिया और निर्णय लिया जाता है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, केवल अंत के दिनों का मसीह ही मनुष्य को अनंत जीवन का मार्ग दे सकता है

203. परमेश्वर के आत्मा द्वारा धारण की हुई देह परमेश्वर की अपनी देह है। परमेश्वर का आत्मा सर्वोच्च है; वह सर्वशक्तिमान, पवित्र और धार्मिक है। इसी तरह, उसकी देह भी सर्वोच्च, सर्वशक्तिमान, पवित्र और धार्मिक है। इस तरह की देह केवल वह करने में सक्षम है जो मानवजाति के लिए धार्मिक और लाभकारी है, वह जो पवित्र, महिमामय और प्रतापी है; वह ऐसी किसी भी चीज को करने में असमर्थ है जो सत्य का उल्लंघन करती हो, नैतिक न्याय का उल्लंघन करती हो, वह ऐसी किसी चीज को करने में तो और भी समर्थ नहीं है जो परमेश्वर के आत्मा के साथ विश्वासघात कर दे। परमेश्वर का आत्मा पवित्र है और इसलिए उसकी देह शैतान द्वारा भ्रष्ट नहीं की जा सकती; उसकी देह का सार मनुष्य की देह के सार से भिन्न है। क्योंकि यह परमेश्वर नहीं बल्कि मनुष्य है जो शैतान द्वारा भ्रष्ट किया गया है और शैतान का स्वयं परमेश्वर की देह को भ्रष्ट करना संभव नहीं हो सकता। इस प्रकार, इस तथ्य के बावजूद कि मनुष्य और मसीह एक ही स्थान में रहते हैं, वह केवल मनुष्य ही है जिसे शैतान कब्जे में कर सकता है, जिसका वह उपयोग कर सकता है और जिसे शैतान की चालों से नुकसान होता है। इसके विपरीत, मसीह शैतान की भ्रष्टता के प्रति शाश्वत रूप से अभेद्य है, क्योंकि शैतान कभी भी उच्चतम स्थान तक आरोहण करने में सक्षम नहीं होगा और कभी भी परमेश्वर के निकट नहीं पहुँच पाएगा। आज, तुम सभी लोगों को यह समझ लेना चाहिए कि यह केवल शैतान द्वारा भ्रष्ट मानवजाति ही है जो मेरे साथ विश्वासघात करती है। विश्वासघात ऐसा मुद्दा कभी नहीं होगा जिसमें मसीह थोड़ा-भी शामिल हो।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, एक बहुत गंभीर समस्या : विश्वासघात (2)

204. परमेश्वर इसलिए देहधारी हुआ क्योंकि उसके कार्य का लक्ष्य शैतान की आत्मा, या कोई ऐसी चीज नहीं जो देह की न हो, बल्कि मनुष्य है, जो हाड़-माँस का बना है और जिसे शैतान ने भ्रष्ट कर दिया है। चूँकि इंसान की देह को भ्रष्ट कर दिया गया है, इसलिए परमेश्वर ने हाड़-माँस के मनुष्य को अपने कार्य का लक्ष्य बनाया है; इससे भी अधिक, चूँकि मनुष्य भ्रष्टता का लक्ष्य है इसी कारण से परमेश्वर ने उद्धार-कार्य के समस्त चरणों के दौरान मनुष्य को अपने कार्य का एकमात्र लक्ष्य के रूप में चुना है। मनुष्य एक नश्वर प्राणी है, देह और लहू से बना है, और एकमात्र परमेश्वर ही मनुष्य को बचा सकता है। इस प्रकार, परमेश्वर को अपना कार्य करने के लिए देहधारी होना होगा जिसमें मनुष्य के समान ही गुण हों, ताकि उसका कार्य बेहतर प्रभाव पैदा कर सके। परमेश्वर को अपना कार्य करने के लिए इसलिए देह धारण करना होगा क्योंकि मनुष्य हाड़-माँस से बना है और वह न तो पाप पर विजय पा सकता है और न ही स्वयं को शरीर से अलग कर सकता है। हालाँकि देहधारी परमेश्वर का सार और उसकी पहचान, मनुष्य के सार और पहचान से बहुत अधिक भिन्न है, फिर भी उसका रूप-रंग तो मनुष्य के समान ही है; उसका रूप-रंग किसी सामान्य व्यक्ति जैसा है, वह एक सामान्य व्यक्ति की तरह ही जीवन जीता है, देखने वाले उसमें और किसी सामान्य व्यक्ति के बीच भेद नहीं कर सकते। यह सामान्य रूप-रंग और सामान्य मानवता उसके लिए सामान्य मानवता में अपना दिव्य कार्य करने हेतु पर्याप्त हैं। यह देह उसे सामान्य मानवता में अपना कार्य करने और इंसानों के बीच कार्य करने में उसकी सहायता करती है, इससे भी अधिक उसकी सामान्य मानवता इंसानों के बीच उद्धार-कार्य को कार्यान्वित करने में उसकी सहायता करती है। हालाँकि उसकी सामान्य मानवता ने लोगों में काफी कोलाहल मचा दिया है, फिर भी ऐसे कोलाहल ने उसके कार्य के सामान्य प्रभावों पर कोई असर नहीं डाला है। संक्षेप में, उसकी सामान्य देह का कार्य मनुष्य के लिए सर्वाधिक लाभदायक है। हालाँकि अधिकांश लोग उसकी सामान्य मानवता को स्वीकार नहीं कर सकते, तब भी उसका कार्य परिणाम हासिल कर सकता है, और ये परिणाम उसकी सामान्य मानवता के कारण प्राप्त होते हैं। इसमें कोई सन्देह नहीं है। देह में उसके कार्य से, मनुष्य उन धारणाओं की अपेक्षा दस गुना या दर्जनों गुना ज़्यादा चीज़ों को प्राप्त करता है जो मनुष्य के बीच उसकी सामान्य मानवता को लेकर मौजूद हैं, और ऐसी धारणाओं को अंततः उसका कार्य पूरी तरह से निगल जाएगा। और वह प्रभाव जो उसके कार्य ने प्राप्त किया है, यानी उसके बारे में मनुष्य के पास जो ज्ञान है, मनुष्य की धारणाओं से बहुत अधिक बड़ा है। वह देह में जो कार्य करता है उसकी कल्पना करने या उसे मापने का कोई तरीका नहीं है, क्योंकि उसकी देह किसी हाड़-माँस के इंसान की तरह नहीं है; हालाँकि उनका बाहरी रूप एक जैसा है, फिर भी सार एक जैसा नहीं है। उसकी देह परमेश्वर के बारे में लोगों के बीच कई तरह की धारणाओं को जन्म देती है, लेकिन उसकी देह मनुष्य को अधिक ज्ञान भी अर्जित करने दे सकती है, और वह किसी भी ऐसे व्यक्ति पर विजय प्राप्त कर सकती है जिसका बाहरी रूप समान ही है। क्योंकि वह मात्र एक मनुष्य नहीं है, बल्कि मनुष्य जैसे बाहरी रूप वाला परमेश्वर है, कोई भी पूरी तरह से उसकी गहनता से जाँच नहीं कर सकता है और न ही उसे समझ सकता है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, भ्रष्ट मानवजाति को देहधारी परमेश्वर के उद्धार की ज्यादा आवश्यकता है

205. मनुष्य को शैतान ने भ्रष्ट कर दिया है, मनुष्य ही परमेश्वर के जीवधारियों में श्रेष्ठतम है, इसलिए मनुष्य को परमेश्वर के उद्धार की आवश्यकता है। परमेश्वर के उद्धार का लक्ष्य मनुष्य है, शैतान नहीं, और जिसे बचाया जाएगा वह मनुष्य की देह और मनुष्य की आत्मा है, दानव नहीं। शैतान परमेश्वर के विनाश का लक्ष्य है और मनुष्य परमेश्वर के उद्धार का लक्ष्य है। मनुष्य की देह को शैतान के द्वारा भ्रष्ट किया जा चुका है, इसलिए सबसे पहले मनुष्य की देह को ही बचाया जाना चाहिए। मनुष्य की देह को इतना ज्यादा भ्रष्ट किया जा चुका है कि वह परमेश्वर का इस हद तक विरोध करती है कि वह खुले तौर पर परमेश्वर का विरोध कर बैठती है और उसके अस्तित्व को ही नकारती है। यह भ्रष्ट देह बेहद अड़ियल है, देह के भ्रष्ट स्वभाव से निपटने और उसे परिवर्तित करने से ज्यादा कठिन और कुछ भी नहीं। शैतान परेशानियाँ खड़ी करने के लिए मनुष्य की देह में आता है, और परमेश्वर के कार्य में व्यवधान उत्पन्न करने और उसकी योजना को बाधित करने के लिए मनुष्य की देह का उपयोग करता है। इस प्रकार इंसान शैतान बनकर परमेश्वर का शत्रु हो गया है। मनुष्य को बचाने के लिए, पहले उस पर विजय पानी होगी। इसी चुनौती से निपटने के लिए परमेश्वर जो कार्य करने का इरादा रखता है, उसकी खातिर देह में आता है और शैतान के साथ युद्ध करता है। उसका उद्देश्य भ्रष्ट मनुष्य का उद्धार, उस शैतान की पराजय और उसका विनाश है, जो परमेश्वर के विरुद्ध विद्रोह करता है। परमेश्वर मनुष्य पर विजय पाने के अपने कार्य के माध्यम से शैतान को पराजित करता है, और साथ ही भ्रष्ट मनुष्यजाति को भी बचाता है। यह एक ऐसा कार्य है जो एक ही समय में दो लक्ष्यों को प्राप्त करता है। इंसान के साथ बेहतर ढंग से जुड़ने और उस पर विजय पाने के लिए वह देह में रहकर कार्य करता है, देह में रहकर बात करता है और देह में रहकर समस्त कार्यों का बीड़ा उठाता है। अंतिम बार जब परमेश्वर देह धारण करेगा, तो अंत के दिनों के उसके कार्य को देह में पूरा किया जाएगा। वह सभी लोगों को उनके प्रकार के अनुसार छाँटेगा, अपने सम्पूर्ण प्रबंधन को समाप्त करेगा, और साथ ही देह में अपने समस्त कार्यों को भी पूरा करेगा। पृथ्वी पर उसके सभी कार्यों के समाप्त हो जाने के बाद, वह पूरी तरह से विजयी हो जाएगा। देह में कार्य करते हुए, परमेश्वर मनुष्यजाति को पूरी तरह से जीत लेगा और उसे प्राप्त कर लेगा। क्या इसका अर्थ यह नहीं है कि उसका समस्त प्रबंधन समाप्त हो चुका होगा? शैतान को पूरी तरह से हराने और विजयी होने के बाद, जब परमेश्वर देह में अपने कार्य का समापन करेगा, तो शैतान के पास मनुष्य को भ्रष्ट करने का फिर और कोई अवसर नहीं होगा। परमेश्वर के प्रथम देहधारण का कार्य छुटकारा और मनुष्य के पापों को क्षमा करना था। अब यह मनुष्यजाति को जीतने और पूरी तरह से प्राप्त करने का कार्य है, ताकि शैतान के पास अपना कार्य करने का कोई मार्ग न बचा होगा, और वह पूरी तरह से हार चुका होगा, और परमेश्वर पूरी तरह से विजयी हो चुका होगा। यह देह का कार्य है, और स्वयं परमेश्वर द्वारा किया गया कार्य है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, भ्रष्ट मानवजाति को देहधारी परमेश्वर के उद्धार की ज्यादा आवश्यकता है

206. मनुष्य की देह को शैतान के द्वारा भ्रष्ट कर दिया गया है, और इसे अत्यधिक अंधा कर दिया गया है और अत्यधिक नुकसान पहुँचाया गया है। परमेश्वर द्वारा व्यक्तिगत रूप से देहधारी होकर कार्य करने का सबसे मूलभूत कारण यह है कि उसके उद्धार का लक्ष्य मनुष्य है, जो देह से बना है, और इसलिए कि परमेश्वर के कार्य में बाधा डालने के लिए शैतान भी मनुष्य की देह का उपयोग करता है। दरअसल, शैतान के साथ युद्ध इंसान पर विजय पाने का कार्य है, और साथ ही, इंसान परमेश्वर के उद्धार का लक्ष्य भी है। इस प्रकार अपना कार्य करने के लिए परमेश्वर का देहधारी होना अत्यावश्यक है। शैतान ने मनुष्य की देह को भ्रष्ट कर दिया और मनुष्य शैतान का मूर्त रूप बन गया है, परमेश्वर द्वारा हराए जाने का लक्ष्य बन गया है। इसलिए, पृथ्वी पर शैतान से युद्ध करने और मनुष्यजाति को बचाने का कार्य किया जाता है। इसलिए शैतान से युद्ध करने के लिए परमेश्वर का मनुष्य बनना आवश्यक है। यह अत्यंत व्यावहारिकता का कार्य है। जब परमेश्वर देह में कार्य कर रहा होता है, तो वह वास्तव में देह में शैतान से युद्ध कर रहा होता है। जब वह देह में कार्य करता है, तो वह आध्यात्मिक क्षेत्र का अपना कार्य कर रहा होता है, वह आध्यात्मिक क्षेत्र के अपने समस्त कार्य को पृथ्वी पर साकार करता है। जिस पर विजय पाई जाती है वो इंसान है, वह इंसान जो उसके प्रति विद्रोही है, जिसे पराजित किया जाता है वो शैतान का मूर्त रूप है (बेशक, यह भी इंसान ही है), जो उससे शत्रुता रखता है, और अंततः जिसे बचाया जाता है वह भी इंसान ही है। इसलिए, यह परमेश्वर के लिए और भी अधिक आवश्यक हो जाता है कि वह ऐसा इंसान बने जिसका बाहरी आवरण एक सृजित प्राणी का हो, ताकि वह शैतान से असल युद्ध कर सके, उस इंसान पर विजय पाने के लिए जो उसके प्रति विद्रोही है, उसके समान बाहरी आवरण धारण किए हुए है और उस इंसान को बचाने के लिए जिसका बाहरी आवरण उसी के समान है और जिसे शैतान द्वारा नुकसान पहुँचाया गया है। उसका शत्रु मनुष्य है, उसकी विजय का लक्ष्य मनुष्य है, और उसके उद्धार का लक्ष्य भी मनुष्य ही है, जिसे उसने बनाया है। इसलिए उसे मनुष्य बनना ही होगा, और इस तरह, उसका कार्य बहुत आसान हो जाता है—वह शैतान को हराने और मनुष्य को जीतने में समर्थ है, और भी अधिक मानवजाति को बचाने में सक्षम है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, भ्रष्ट मानवजाति को देहधारी परमेश्वर के उद्धार की ज्यादा आवश्यकता है

207. परमेश्वर द्वारा मनुष्य को बचाने का कार्य सीधे तौर पर आत्मा के माध्यम से और आत्मा की पहचान के साथ नहीं किया जाता, क्योंकि उसके आत्मा को मनुष्य द्वारा न तो छुआ जा सकता है, न देखा जा सकता है और न ही मनुष्य उसके निकट जा सकता है। अगर वह सीधे आत्मा के रूप में मनुष्य को बचाने का प्रयास करता तो मनुष्य उसका उद्धार प्राप्त करने में असमर्थ होता। यदि परमेश्वर एक सृजित मनुष्य का बाहरी रूप धारण न करता तो मनुष्य के लिए इस उद्धार को प्राप्त करने का कोई उपाय न होता। क्योंकि मनुष्य के पास उसके करीब आने का कतई कोई तरीका नहीं है, ठीक वैसे ही जैसे कोई भी यहोवा के बादल के पास नहीं जा पाया था। केवल एक सृजित मनुष्य बनकर, यानी परमेश्वर जो देह बनने वाला है उस देह में अपने वचन को रखकर ही वह व्यक्तिगत रूप से वचन को उन सभी लोगों में सन्निविष्ट कर सकता है जो उसका अनुसरण करते हैं। केवल तभी मनुष्य व्यक्तिगत रूप से उसके वचन को सुन और देख सकता है और उसके वचन को प्राप्त भी कर सकता है और इस तरीके से पूरी तरह बचाया जा सकता है। यदि परमेश्वर देहधारी न बनता तो देह और रक्त से बना कोई भी मनुष्य ऐसा महान उद्धार प्राप्त न कर पाता, न ही एक भी मनुष्य बचाया जाता। यदि परमेश्वर का आत्मा सीधे मानवजाति के बीच कार्य करता तो पूरी मानवजाति मार गिराई जाती या फिर परमेश्वर के संपर्क में आने का कोई उपाय न होने के कारण वह शैतान द्वारा पूरी तरह से बंदी बना ली जाती।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, देहधारण का रहस्य (4)

208. देहधारी परमेश्वर पूरी तरह भ्रष्ट इंसान की आवश्यकताओं के कारण ही देह में आया है। यह परमेश्वर की नहीं, मनुष्य की आवश्यकताओं की वजह से है और परमेश्वर ने जो सारी कीमतें चुकाई हैं और जो सारी पीड़ा सही है वह मानवजाति के लिए हैं न कि स्वयं परमेश्वर के लाभ के लिए। परमेश्वर के लिए कोई नफा, नुकसान या प्रतिफल नहीं है; परमेश्वर जो प्राप्त करता है वह कुछ ऐसा नहीं होता जिसे वह काटता है, बल्कि वह होता है जो मूल रूप से उसका था। वह मानवजाति के लिए जो कुछ करता है और वे सारी कीमतें जो उसने मानवजाति के लिए चुकाई हैं उस सबके पीछे का उद्देश्य यह नहीं है कि वह कोई और अधिक प्रतिफल प्राप्त कर सके, बल्कि यह पूरी तरह मानवजाति के लिए है। यूँ तो देह में परमेश्वर के कार्य से अनेक अकल्पनीय मुश्किलें जुड़ी हैं, लेकिन यह अंततः जो प्रभाव प्राप्त करता है वे उन कार्यों से कहीं बढ़कर होते हैं जिन्हें आत्मा के द्वारा सीधे तौर पर किया जाता है। देह के कार्य में काफी बड़ी तादाद में कठिनाइयाँ होती हैं, देह वही पहचान धारण नहीं कर सकता जो आत्मा की होती है, वह आत्मा की तरह अलौकिक कार्य नहीं कर सकता, उसमें आत्मा के समान अधिकार होने का तो सवाल ही नहीं है। फिर भी इस मामूली देह के द्वारा किए गए कार्य का सार आत्मा के द्वारा सीधे तौर पर किए गए कार्य से कहीं श्रेष्ठतर है और यह स्वयं देह ही है जिसकी आवश्यकता सभी लोगों को है। क्योंकि जिन्हें बचाया जाना है उनके लिए, आत्मा का उपयोगिता मूल्य देह की अपेक्षा कहीं अधिक निम्न है : आत्मा का कार्य संपूर्ण विश्व, सारे पहाड़ों, नदियों, झीलों और महासागरों को समाविष्ट करने में सक्षम है, मगर देह का कार्य और अधिक प्रभावकारी ढंग से प्रत्येक ऐसे व्यक्ति से सम्बन्ध रखता है जिसके साथ वो सम्पर्क में आता है। इसके अलावा, स्पर्शगम्य रूप वाली परमेश्वर की देह को मनुष्य के द्वारा बेहतर ढंग से समझा जा सकता है और उस पर भरोसा किया जा सकता है, और यह परमेश्वर के बारे में मनुष्य के ज्ञान को और गहरा कर सकती है, तथा मनुष्य पर परमेश्वर के व्यावहारिक कर्मों की और अधिक गहन छाप छोड़ सकती है। आत्मा का कार्य रहस्य से ढका हुआ है; इसकी भविष्यवाणी कर पाना नश्वर प्राणियों के लिए कठिन है, उनके लिए उसे देख पाना तो और भी मुश्किल है और इसलिए वे बिना किसी आधार के मात्र चीजों की कल्पना ही कर सकते हैं। लेकिन देह का कार्य सामान्य और व्यावहारिक है, उसके पास प्रचुर बुद्धि है, और एक ऐसी सच्चाई है जिसे नश्वर इंसान की आँखों द्वारा व्यक्तिगत रूप से देखा जा सकता है; इंसान परमेश्वर के कार्य की बुद्धि को व्यक्तिगत रूप से समझ सकता है, उसके लिए उसे अपनी कल्पना के घोड़े दौड़ाने की आवश्यकता नहीं है। यह देहधारी परमेश्वर के कार्य की सटीकता और उसका व्यावहारिक मूल्य है। आत्मा केवल उन्हीं कार्यों को कर सकता है जो मनुष्य के लिए अदृश्य हैं और जिसकी कल्पना करना उसके लिए कठिन है, उदाहरण के लिए आत्मा की प्रबुद्धता, आत्मा का दिल को छू लेना, और आत्मा का मार्गदर्शन, लेकिन समझदार इंसान को वे कोई स्पष्ट अर्थ प्रदान नहीं कर सकते। वे केवल एक चलता-फिरता या एक मोटे तौर पर समान अर्थ प्रदान कर सकते हैं, और शब्दों से कोई निर्देश नहीं दे पाते। जबकि, देह में परमेश्वर का कार्य बहुत भिन्न होता है : इसमें वचनों का सटीक मार्गदर्शन होता है, और स्पष्ट इरादे और स्पष्ट अपेक्षित लक्ष्य जुड़े होते हैं। इसलिए इंसान को अँधेरे में भटकने या अपनी कल्पना का उपयोग करने की कोई आवश्यकता नहीं होती है, और अंदाज़ा लगाने की तो बिल्कुल भी आवश्यकता नहीं होती। देह में किया गया कार्य बहुत स्पष्ट होता है, और उसका कार्य आत्मा के कार्य से काफी ज्यादा भिन्न होता है। आत्मा का कार्य केवल एक सीमित दायरे में ही उपयुक्त होता है, यह देह के कार्य का स्थान नहीं ले सकता। देह के कार्य द्वारा जो सटीक लक्ष्य अपेक्षित हैं, और इस कार्य से मनुष्य ज्ञान का जो व्यावहारिक मूल्य प्राप्त करता है, वह आत्मा के कार्य की सटीकता और व्यावहारिक मूल्य से कहीं ज्यादा है। भ्रष्ट मनुष्यों के लिए, केवल वही कार्य जो अनुसरण के लिए सटीक वचन और स्पष्ट लक्ष्य प्रदान करे, जो दृश्यमान और मूर्त हो, वही सबसे मूल्यवान प्रकार का काम है। केवल यथार्थवादी कार्य और समयोचित मार्गदर्शन ही मनुष्य की अभिरुचियों के लिए उपयुक्त होता है, और केवल व्यावहारिक कार्य ही मनुष्य को उसके भ्रष्ट और पतित स्वभाव से बचा सकता है। इसे केवल देहधारी परमेश्वर हासिल कर सकता है; केवल देहधारी परमेश्वर ही मनुष्य को उसके पुराने भ्रष्ट और पतित स्वभाव से बचा सकता है। यद्यपि आत्मा परमेश्वर का अंतर्निहित सार है, फिर भी इस तरह का कार्य केवल उसकी देह के द्वारा ही किया जा सकता है। यदि आत्मा अकेले ही कार्य करता, तब उसके कार्य का प्रभावी होना संभव नहीं होता—यह एक स्पष्ट सत्‍य है। अधिकांश लोग इस देह के कारण परमेश्वर के शत्रु बन गए हैं, लेकिन जब यह देह अपना कार्य पूरा करेगी, तो जो लोग उसके खिलाफ हैं वे न केवल उसके शत्रु नहीं रहेंगे, बल्कि उसके गवाह बन जाएँगे। वे ऐसे गवाह बन जाएँगे जिन्हें उसके द्वारा जीत लिया गया है, ऐसे गवाह जो उसके अनुरूप हैं और उससे अभिन्न हैं। देह के कार्य का मनुष्य के लिए जो महत्व है वह उसे मनुष्य को ज्ञात करवाएगा और मनुष्य के अस्तित्व के अर्थ के लिए इस देह के महत्व को मनुष्य जानेगा, मनुष्य के जीवन के विकास के संबंध में उसके व्यावहारिक मूल्य को जानेगा, और इससे भी अधिक, यह जानेगा कि यह देह अप्रत्याशित रूप से जीवन का एक जीवंत स्रोत बन जाएगी जिससे अलग होने की बात मानव सहन नहीं कर सकता।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, भ्रष्ट मानवजाति को देहधारी परमेश्वर के उद्धार की ज्यादा आवश्यकता है

209. हालाँकि परमेश्वर की देहधारी देह परमेश्वर की पहचान और दर्जे से बिल्कुल मेल नहीं खाती, और मनुष्य को परमेश्वर के वास्तविक मूल्य से असंगत प्रतीत होती है, फिर भी यह देह, जिसके पास परमेश्वर की अंतर्निहित छवि या परमेश्वर की अंतर्निहित पहचान नहीं है, वह कार्य कर सकती है जिसे परमेश्वर का आत्मा सीधे तौर पर करने में असमर्थ है। ये हैं परमेश्वर के देहधारण के अंतर्निहित मायने और मूल्य, इस महत्व और मूल्य को इंसान न तो समझ पाता है और न ही स्वीकार कर पाता है। यद्यपि सभी लोग परमेश्वर के आत्मा का आदर करते हैं और परमेश्वर की देह का तिरस्कार करते हैं, फिर भी इस बात पर ध्यान न देते हुए कि वे क्या सोचते-समझते हैं, देह के व्यावहारिक मायने और मूल्य आत्मा से बहुत बढ़कर हैं। निस्संदेह, यह केवल भ्रष्ट मनुष्य के संबंध में है। जहाँ तक उन लोगों की बात है जो सत्य खोजते हैं और परमेश्वर के प्रकटन के लिए लालायित रहते हैं, आत्मा का कार्य केवल दिल को छू सकता है या प्रेरणा प्रदान कर सकता है, और आश्चर्य की यह भावना दे सकता है कि यह कार्य अद्भुत, अथाह और अकल्पनीय है और यह भावना प्रदान कर सकता है कि यह महान, उत्कृष्ट और प्रशंसनीय है, फिर भी सबके लिए अप्राप्य और अगम्य भी है। मनुष्य और परमेश्वर का आत्मा एक-दूसरे को केवल दूर से ही देख सकते हैं, मानो उनके बीच बहुत ज्यादा दूरी हो और वे कभी भी एक समान नहीं हो सकते, मानो मनुष्य और परमेश्वर किसी अदृश्य विभाजन रेखा द्वारा अलग कर दिए गए हों। वास्तव में, यह पवित्रात्मा के द्वारा मनुष्य को दिया गया एक मायाजाल है, जो इसलिए है क्योंकि पवित्रात्मा और मनुष्य दोनों एक ही प्रकार के नहीं हैं, दोनों एक ही संसार में कभी साथ नहीं रह सकते और क्योंकि पवित्रात्मा में मनुष्य का कुछ भी नहीं है। इसलिए मनुष्य को आत्मा की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि आत्मा सीधे तौर पर वह कार्य नहीं कर सकता जिसकी मनुष्य को सबसे अधिक आवश्यकता है। देह का कार्य मनुष्य को अनुसरण के लिए व्यावहारिक लक्ष्य, स्पष्ट वचन और यह एहसास देता है कि परमेश्वर व्यावहारिक और सामान्य है, वह विनम्र और साधारण है। भले ही मनुष्य उससे डरता हो, फिर भी अधिकतर लोगों के लिए वह काफी हद तक पहुँच में है। मनुष्य उसका चेहरा देख सकता है, उसकी वाणी सुन सकता है, इंसान को उसे दूर से देखने की आवश्यकता नहीं है। यह देह इंसान को निकट लगती है, दूर या अथाह नहीं, बल्कि दृश्यमान और पहुँच में लगती है, क्योंकि यह देह उसी संसार में है जिसमें मनुष्य है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, भ्रष्ट मानवजाति को देहधारी परमेश्वर के उद्धार की ज्यादा आवश्यकता है

210. अब मनुष्य देखता है कि देहधारी परमेश्वर का कार्य वास्तव में असाधारण है और इसमें ऐसी कई चीजें हैं जिन्हें मनुष्य द्वारा प्राप्त नहीं किया जा सकता, और वे रहस्य और चमत्कार हैं। इसलिए बहुतों ने समर्पण कर दिया है। कुछ लोगों ने अपने जन्म के समय से ही किसी भी मनुष्य के प्रति समर्पण नहीं किया है, फिर भी जब वे आज परमेश्वर के वचनों को देखते हैं, तो वे अनजाने ही पूरी तरह से समर्पण कर देते हैं और वे जाँच करने या कुछ और कहने की हिम्मत नहीं करते। मनुष्य वचन के अधीन गिर गया है और वचन के न्याय के अधीन दंडवत पड़ा है। यदि परमेश्वर का आत्मा मनुष्यों से सीधे बात करता, तो समस्त मानवजाति उस वाणी के प्रति समर्पण कर देती, परमेश्वर द्वारा अपने वचनों से मनुष्य को उजागर करने की जरूरत के बिना ही दंडवत हो जाती, बिल्कुल वैसे ही जैसे पौलुस दमिश्क की राह पर ज्योति के मध्य भूमि पर गिर गया था। यदि परमेश्वर इसी तरीके से काम करता रहता, तो मनुष्य वचन के न्याय के माध्यम से अपनी भ्रष्टता जानने और इसके परिणामस्वरूप उद्धार प्राप्त करने में कभी समर्थ न होता। केवल देह बनकर ही परमेश्वर व्यक्तिगत रूप से अपने वचन हर मनुष्य के कानों तक पहुँचा सकता है, ताकि वे सभी, जिनके पास कान हैं, उसके वचन सुन सकें और वचन के द्वारा उसके न्याय का कार्य स्वीकार कर सकें। यह वह सच्चा परिणाम है जो उसके वचन द्वारा प्राप्त होता है, न कि मनुष्य को भय से अभिभूत करने के लिए आत्मा का प्रकट होना। केवल इस व्यावहारिक और फिर भी असाधारण कार्य के माध्यम से ही मनुष्य के पुराने स्वभाव, जो अनेक वर्षों से उसके भीतर गहराई में छिपे हुए हैं, पूरी तरह से उजागर किए जा सकते हैं, ताकि मनुष्य उन्हें पहचान सके और बदलाव अनुभव कर सके। ये सब चीजें देहधारी परमेश्वर का व्यावहारिक कार्य हैं, जिसमें वह एक पूर्णतः व्यावहारिक तरीके से बोलता और न्याय करता है और फिर वचन के द्वारा मनुष्य पर न्याय के परिणाम प्राप्त करता है। यह देहधारी परमेश्वर का अधिकार और परमेश्वर के देहधारण का महत्व है। यह देहधारी परमेश्वर का अधिकार प्रकट करने, वचन के कार्य द्वारा प्राप्त किए गए परिणाम प्रकट करने और यह प्रकट करने के लिए किया जाता है कि आत्मा देह में आ चुका है और वचन के द्वारा मनुष्य का न्याय करने के माध्यम से अपना अधिकार प्रदर्शित करता है। यद्यपि उसकी देह एक साधारण, सामान्य मानवता का बाहरी आवरण है, किंतु उसके वचनों से प्राप्त परिणाम मनुष्य को दिखाते हैं कि वह अधिकार से परिपूर्ण है, कि वह स्वयं परमेश्वर है और उसके वचन स्वयं परमेश्वर की अभिव्यक्ति हैं। इसके माध्यम से समस्त मानवता को दिखाया जाता है कि वह स्वयं परमेश्वर है, कि वह स्वयं परमेश्वर है जो देहधारी हुआ है, कि कोई भी उसका अपमान नहीं कर सकता, और कि कोई भी उसके वचन के द्वारा किए गए न्याय के परे नहीं हो सकता और अंधकार की कोई भी शक्ति उसके अधिकार पर हावी नहीं हो सकती। उसके प्रति मनुष्य का समर्पण पूरी तरह उस देह के कारण है जिसमें वह देहधारी हुआ है, यह पूरी तरह उसके अधिकार के कारण और वचन द्वारा उसके न्याय के कारण है। उसके देहधारी देह द्वारा लाया गया कार्य ही वह अधिकार है जो उसके पास है। उसके देह धारण करने का कारण यह है कि देह के पास भी अधिकार हो सकता है, और वह मनुष्यों के बीच एक व्यावहारिक तरीके से उस तरह कार्य करने में सक्षम है जो मनुष्यों के लिए दृष्टिगोचर और मूर्त है। यह कार्य उस कार्य से कहीं अधिक व्यावहारिक है जिसे परमेश्वर का आत्मा सीधे तौर पर करता है, वह जिसमें समस्त अधिकार है और इसके परिणाम भी स्पष्ट हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि देहधारी परमेश्वर का देह व्यावहारिक तरीके से बोल और कार्य कर सकता है। उसकी देह का बाहरी आवरण कोई अधिकार नहीं रखता और मनुष्य उसके करीब पहुँच सकता है, जबकि उसका सार अधिकार वहन करता है किंतु उसका अधिकार किसी के लिए भी दृष्टिगोचर नहीं है। जब वह बोलता और कार्य करता है तो मनुष्य उसके अधिकार की मौजूदगी का पता लगाने में असमर्थ होता है; इससे उसे अपना व्यावहारिक कार्य करने में सुविधा होती है। यह समस्त व्यावहारिक कार्य परिणाम प्राप्त कर सकता है। हालाँकि कोई मनुष्य यह एहसास नहीं करता कि परमेश्वर अधिकार रखता है या नहीं देखता कि परमेश्वर के प्रति कोई अपमान नहीं किया जा सकता या परमेश्वर का कोप नहीं देखता, फिर भी वह अपने छिपे हुए अधिकार, अपने छिपे हुए कोप और उन वचनों के माध्यम से, जिन्हें वह खुलकर बोलता है, अपने वचनों के अभीष्ट परिणाम प्राप्त कर लेता है। दूसरे शब्दों में, उसकी आवाज के लहजे, उसकी वाणी की कठोरता और उसके वचनों की समस्त बुद्धि के माध्यम से मनुष्य पूरी तरह से आश्वस्त हो जाता है। इस तरीके से मनुष्य उस देहधारी परमेश्वर के वचन के प्रति समर्पण कर देता है, जिसके पास ऐसा लगता है कि कोई अधिकार नहीं है, जिससे मनुष्य को बचाने का परमेश्वर का लक्ष्य पूरा होता है। यह उसके देहधारण के महत्व का एक और पहलू है : अधिक व्यावहारिक ढंग से बोलना, अपने वचनों की वास्तविकता को मनुष्य में अपने परिणाम प्राप्त करने देना और मनुष्य को परमेश्वर के वचन की शक्ति देखने देना। अतः यदि यह कार्य देहधारण के माध्यम से न किया जाता, तो यह मामूली परिणाम भी प्राप्त न करता और पापी लोगों को पूरी तरह से बचाने में सक्षम न होता। यदि परमेश्वर देहधारी न होता तो वह आत्मा बना रहता जो मनुष्यों के लिए अदृश्य और अगम्य दोनों है। चूँकि मनुष्य देह वाला प्राणी है, इसलिए वह और परमेश्वर दो अलग-अलग दुनिया के हैं और अलग-अलग प्रकृति के हैं। परमेश्वर का आत्मा देह वाले मनुष्य से बेमेल है और उनके बीच संबंध स्थापित किए जाने का कोई उपाय ही नहीं है; दूसरी ओर, मनुष्य आत्मा बनने में अक्षम है। ऐसा होने के कारण, अपना मूल काम करने के लिए परमेश्वर के आत्मा को एक सृजित प्राणी बनना आवश्यक है। परमेश्वर दोनों काम कर सकता है, वह सबसे ऊँचे स्थान पर आरोहण भी कर सकता है और मनुष्यों के बीच कार्य करने और उनके बीच रहने के लिए विनम्र होकर सृजित मनुष्य भी बन सकता है, किंतु मनुष्य सबसे ऊँचे स्थान पर आरोहण नहीं कर सकता और आत्मा नहीं बन सकता और निम्नतम स्थान में तो बिल्कुल भी नहीं उतर सकता। इसीलिए अपना कार्य करने हेतु परमेश्वर का देहधारी होना आवश्यक है। यह ठीक वैसा ही है, जैसे कि प्रथम देहधारण के दौरान, केवल देहधारी परमेश्वर का देह ही सलीब पर चढ़ने के माध्यम से मनुष्य को छुटकारा दिला सकता था, जबकि परमेश्वर के आत्मा के पास मनुष्य के लिए पापबलि के रूप में सलीब पर चढ़ने का कोई उपाय नहीं था। परमेश्वर मनुष्य के लिए एक पापबलि के रूप में कार्य करने के लिए सीधे देहधारी हो सकता था, किंतु मनुष्य परमेश्वर द्वारा अपने लिए तैयार की गई पापबलि लेने के लिए सीधे स्वर्ग में आरोहण नहीं कर सकता था। ऐसा होने के कारण, मनुष्य द्वारा इस उद्धारकारी अनुग्रह को लेने के लिए स्वर्ग में आरोहण करने के बजाय, यही संभव था कि परमेश्वर से कुछ बार स्वर्ग और पृथ्वी के बीच आने-जाने का आग्रह किया जाए, क्योंकि मनुष्य पतित हो चुका था, और इससे भी बढ़कर, वह स्वर्ग में आरोहण नहीं कर सकता था और पापबलि तो बिल्कुल भी प्राप्त नहीं कर सकता था। इसलिए, यीशु के लिए मनुष्यों के बीच आना और व्यक्तिगत रूप से उस कार्य को करना आवश्यक था, जिसे मनुष्य द्वारा पूरा किया ही नहीं जा सकता था। हर बार जब परमेश्वर देहधारी होता है, तब यह परम आवश्यकता के कारण होता है। यदि किसी भी चरण को परमेश्वर के आत्मा द्वारा सीधे संपन्न किया जा सकता, तो वह देहधारी होने के साथ आने वाली शिकायतों और अपमान के लिए स्वयं को प्रस्तुत न करता।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, देहधारण का रहस्य (4)

211. मनुष्य की देह की भ्रष्टता का न्याय करने के लिए देह में प्रकट परमेश्वर से अधिक उपयुक्त और कोई योग्य नहीं है। यदि न्याय सीधे तौर पर परमेश्वर के आत्मा के द्वारा किया जाए, तो यह सर्वव्यापी नहीं होता, और तो और मनुष्य के लिए इसे स्वीकार करना कठिन होता, क्योंकि आत्मा मनुष्य के रूबरू आने में असमर्थ है। इस बिंदु के प्रकाश में, प्रभाव तत्काल नहीं होंगे, मनुष्य का परमेश्वर के उस स्वभाव को अधिक स्पष्टता से देखना तो और भी दूर की बात है जो अपमान बर्दाश्त नहीं करता है। यदि देह में प्रकट परमेश्वर मनुष्यजाति की भ्रष्टता का न्याय करे तभी शैतान को पूरी तरह से हराया जा सकता है। देह में प्रकट परमेश्वर भी सामान्य मानवता वाला व्यक्ति है, फिर भी वह सीधे तौर पर मनुष्य की अधार्मिकता का न्याय कर सकता है; यही उसकी जन्मजात पवित्रता, और उसके अनुपम होने का चिन्ह है। केवल परमेश्वर ही मनुष्य का न्याय करने के योग्य है, और उसका न्याय करने की स्थिति में है, क्योंकि वह सत्य और धार्मिकता को धारण किए हुए है, और इस प्रकार वह मनुष्य का न्याय करने में समर्थ है। जो सत्य और धार्मिकता से रहित हैं वे दूसरों का न्याय करने लायक नहीं हैं। यदि इस कार्य को परमेश्वर के आत्मा द्वारा किया जाता, तो इसका अर्थ शैतान पर विजय नहीं होता। आत्मा अंतर्निहित रूप से ही नश्वर प्राणियों की तुलना में अधिक उत्कृष्ट है, और परमेश्वर का आत्मा अंतर्निहित रूप से पवित्र है, और देह पर विजय प्राप्त किए हुए है। यदि आत्मा ने इस कार्य को सीधे तौर पर किया होता, तो वह मनुष्य के पूरे विद्रोहीपन का न्याय नहीं कर पाता, और उसकी सारी अधार्मिकता को प्रकट नहीं कर पाता। क्योंकि न्याय के कार्य को परमेश्वर के बारे में मनुष्य की धारणाओं के माध्यम से भी कार्यान्वित किया जाता है, और मनुष्य के अंदर कभी भी आत्मा के बारे में कोई धारणाएँ नहीं रही हैं, इसलिए आत्मा मनुष्य की अधार्मिकता को बेहतर तरीके से प्रकट करने में असमर्थ है, वह ऐसी अधार्मिकता को पूरी तरह से उजागर करने में तो बिल्कुल भी समर्थ नहीं है। देहधारी परमेश्वर उन सब लोगों का शत्रु है जो उसे नहीं जानते। उसके बारे में मनुष्य की धारणाओं और उसके विरोध का न्याय करके, वह मनुष्यजाति के सारे विद्रोहीपन को उजागर करता है। देह में उसके कार्य के प्रभाव आत्मा के कार्य की तुलना में अधिक स्पष्ट होते हैं। इसलिए, संपूर्ण मनुष्यजाति के न्याय को आत्मा के द्वारा सीधे तौर पर सम्पन्न नहीं किया जाता, बल्कि यह देहधारी परमेश्वर का कार्य है। देहधारी परमेश्वर को मनुष्य देख और छू सकता है, और देहधारी परमेश्वर मनुष्य पर पूरी तरह से विजय पा सकता है। मनुष्य उसका विरोध करने से उसके प्रति समर्पण करने की ओर, उसका उत्पीड़न करने से उसे स्वीकार करने की ओर, उसके बारे में धारणा रखने से उसे जानने की ओर, और उसे अस्वीकार करने से उसे प्रेम करने की ओर—ये हैं देहधारी परमेश्वर के कार्य के प्रभाव। मनुष्य को परमेश्वर के न्याय की स्वीकृति से ही बचाया जाता है, वह परमेश्वर के बोले गए वचनों से ही धीरे-धीरे उसे जानने लगता है, परमेश्वर के प्रति उसके विरोध के दौरान परमेश्वर द्वारा मनुष्य पर विजय पायी जाती है, और परमेश्वर की ताड़ना की स्वीकृति के दौरान वह उससे जीवन की आपूर्ति प्राप्त करता है। यह समस्त कार्य देहधारी परमेश्वर के कार्य हैं, यह आत्मा के रूप में परमेश्वर के कार्य नहीं हैं।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, भ्रष्ट मानवजाति को देहधारी परमेश्वर के उद्धार की ज्यादा आवश्यकता है

212. जब परमेश्वर अभी तक देहधारी नहीं हुआ था, तब लोग उसका कहा अधिक नहीं समझते थे, क्योंकि उसके वचन पूर्ण दिव्यता से आते थे। उसके कथन का परिप्रेक्ष्य और संदर्भ मानवजाति के लिए अदृश्य और अगम्य थे; वह आध्यात्मिक क्षेत्र से व्यक्त होता था, जिसे लोग देख नहीं सकते थे, और जिससे वे लोग जो देह में जीते थे, नहीं गुजर सकते थे। परंतु देहधारी होने के बाद परमेश्वर ने मानवजाति से मानवीय परिप्रेक्ष्य से बात की, और वह आध्यात्मिक क्षेत्र के दायरे से बाहर आया और उसे पार कर गया। वह अपना दिव्य स्वभाव और इरादे और साथ ही अपना रवैया उन चीज़ों के माध्यम से व्यक्त कर सकता था जिनकी मनुष्य अपनी धारणाओं में कल्पना कर सकते थे, जिन्हें उन्होंने अपने जीवन में देखा था और जो उनके सामने आई थीं, और ऐसी पद्धतियों के उपयोग द्वारा जिन्हें मनुष्य स्वीकार कर सकते थे, और ऐसी भाषा में जिसे वे समझ सकते थे, और ऐसे ज्ञान के साथ, जिसे उन्होंने समझा था, ताकि मानवजाति अपनी क्षमता के दायरे के भीतर और अपनी योग्यता की सीमा तक परमेश्वर को समझ और जान सके, और उसकी इच्छाओं और अपेक्षित मानकों को समझ सके। यह मानवता में परमेश्वर के कार्य की पद्धति और सिद्धांत था। यद्यपि देह में कार्य करने के परमेश्वर के तरीके और सिद्धांत मुख्यतः मानवता के द्वारा या उसके माध्यम से प्राप्त किए गए थे, फिर भी इसने ऐसे परिणाम प्राप्त किए, जिन्हें सीधे दिव्यता में कार्य करने से प्राप्त नहीं किया जा सकता था। मानवता में परमेश्वर का कार्य ज़्यादा ठोस, प्रामाणिक और लक्ष्यित था, उसकी पद्धतियाँ कहीं ज़्यादा लचीली थीं, तथा आकार में वह व्यवस्था के युग से आगे निकल गया।

—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III

213. परमेश्वर का देह में आगमन मुख्यतः मनुष्य को परमेश्वर के व्यावहारिक कर्मों को देखने में सक्षम बनाने और निराकार आत्मा को देह में साकार रूप प्रदान करने के लिए है ताकि लोग उसे देख और स्पर्श कर सकें। केवल इसी तरह से, जिन्हें उसके द्वारा पूर्ण बनाया जाता है, वे उसे जी पाएँगे जिसे वह स्वयं जीता है, उसके द्वारा प्राप्त किए जाएँगे और वे उसके इरादों के अनुरूप होंगे। यदि परमेश्वर केवल स्वर्ग में ही बोलता, और वास्तव में पृथ्वी पर न आया होता, तो लोग अब भी परमेश्वर को जानने में असमर्थ होते; वे केवल खोखले सिद्धांत का उपयोग करते हुए परमेश्वर के कर्मों का उपदेश ही दे पाते, और उनके पास परमेश्वर के वचन वास्तविकता के रूप में नहीं होते। परमेश्वर का पृथ्वी पर आने का उद्देश्य मुख्यतः स्वयं को उन लोगों के लिए एक प्रतिमान और मॉडल के रूप में स्थापित करना है जिन्हें उसे प्राप्त करना है; केवल इसी प्रकार लोग वास्तव में परमेश्वर को जान सकते हैं, स्पर्श कर सकते हैं और देख सकते हैं, और केवल तभी वे सच में परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जा सकते हैं।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, तुम्हें पता होना चाहिए कि व्यावहारिक परमेश्वर ही स्वयं परमेश्वर है

214. केवल जब परमेश्वर अपने आपको एक निश्चित बिंदु तक विनम्र कर लेता है, अर्थात्, केवल जब परमेश्वर देह धारण करता है, तभी मनुष्य उसका अंतरंग और विश्वासपात्र बन सकता है। परमेश्वर आत्मा है, वह इतना महान और ऊँचा है और इतना अथाह है—लोग कैसे उसके अंतरंग होने के योग्य हैं? केवल जब परमेश्वर का आत्मा देह में अवरोहण करता है, और मनुष्य के जैसे बाह्य स्वरूप वाला सृजित प्राणी बनता है, तभी लोग उसके इरादों को समझ सकते हैं और व्यावहारिक रूप से उसके द्वारा प्राप्त किए जा सकते हैं। वह देह में बोलता और कार्य करता है, मानवजाति की खुशियों, दुःखों और क्लेशों में सहभागी होता है, उसी संसार में रहता है जिसमें मानवजाति रहती है, मनुष्यों की रक्षा करता है, उनका मार्गदर्शन करता है और उन्हें शुद्ध होने और अपना उद्धार और आशीष प्राप्त करने में सक्षम बनाता है। इन चीज़ों को प्राप्त कर चुकने और वास्तव में परमेश्वर के इरादे समझ चुकने के बाद ही लोग परमेश्वर के अंतरंग बन सकते हैं। केवल यही व्यावहारिक है। यदि परमेश्वर लोगों के लिए अदृश्य और अमूर्त होता, तो फिर वे उसके अंतरंग कैसे हो सकते थे? क्या यह खोखला सिद्धांत नहीं है?

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, जो परमेश्वर को और उसके कार्य को जानते हैं, केवल वे ही परमेश्वर को संतुष्ट कर सकते हैं

215. जहाँ तक उन लोगों की बात है जो देह में जीते हैं, स्वभावगत बदलाव का अनुसरण करने के लिए लक्ष्यों की आवश्यकता होती है और परमेश्वर को जानने का अनुसरण करने के लिए परमेश्वर के व्यावहारिक कर्मों और वास्तविक चेहरे को देखने की जरूरत होती है। दोनों को सिर्फ परमेश्वर की देहधारी देह से ही प्राप्त किया जा सकता है, दोनों को सिर्फ सामान्य और व्यावहारिक देह से ही पूरा किया जा सकता है। इसीलिए देहधारण आवश्यक है—पूरी भ्रष्ट मानवजाति को इसकी आवश्यकता है। चूँकि लोगों से अपेक्षा की जाती है कि वे परमेश्वर को जानें, इसलिए अज्ञात और अलौकिक परमेश्वरों की छवियों को उनके दिलों से दूर हटाया जाना चाहिए, और चूँकि उनसे अपने भ्रष्ट स्वभाव छोड़ने की माँग की जाती है, इसलिए उन्हें पहले अपने भ्रष्ट स्वभावों को जानना चाहिए। यदि लोगों के दिलों से अज्ञात परमेश्वरों की छवियों को हटाने का कार्य केवल मनुष्य करे, तो वह वांछित प्रभाव प्राप्त करने में असफल हो जाएगा। लोगों के दिलों से अस्पष्ट परमेश्वर की छवियों को केवल वचनों से उजागर किया, उतार फेंका या पूरी तरह से निकाला नहीं जा सकता। ऐसा करने से, अंततः इन गहरी समाई चीजों को लोगों के दिलों से हटाना तब भी संभव नहीं होगा। केवल इन अज्ञात और अलौकिक चीजों की जगह व्यावहारिक परमेश्वर और परमेश्वर की अंतर्निहित छवि को रखकर और लोगों को धीरे-धीरे इन्हें ज्ञात करवाकर ही वांछित प्रभाव प्राप्त किया जा सकता है। मनुष्य को एहसास होता है कि जिस परमेश्वर का वह पहले से अनुसरण करता रहा है वह अज्ञात और अलौकिक है। आत्मा की प्रत्यक्ष अगुवाई इस प्रभाव को प्राप्त नहीं कर सकती, किसी व्यक्ति विशेष की शिक्षाएँ तो बिल्कुल नहीं बल्कि देहधारी परमेश्वर ही ऐसा कर सकता है। ठीक इस कारण कि देहधारी परमेश्वर की सामान्यता और व्यावहारिकता मनुष्य की कल्पनाओं के अस्पष्ट एवं अलौकिक परमेश्वरों से विपरीत हैं, जब देहधारी परमेश्वर आधिकारिक रूप से अपना कार्य करता है तो मनुष्य की सभी धारणाएँ उजागर कर दी जाती हैं। मनुष्य की मूल धारणाएँ तो तभी उजागर हो सकती हैं जब उनकी देहधारी परमेश्वर से तुलना की जाये। देहधारी परमेश्वर से तुलना के बिना, मनुष्य की धारणाओं को उजागर नहीं किया जा सकता; दूसरे शब्दों में, व्यावहारिकता की विषमता के बिना अस्पष्ट चीज़ों को उजागर नहीं किया जा सकता। इस कार्य को करने के लिए कोई भी वचनों का उपयोग करने में सक्षम नहीं है, और कोई भी वचनों का उपयोग करके इस कार्य को स्पष्टता से व्यक्त करने में सक्षम नहीं है। स्वयं परमेश्वर ही अपना कार्य कर सकता है, अन्य कोई उसकी ओर से इस कार्य को नहीं कर सकता। मनुष्य की भाषा कितनी भी समृद्ध क्यों न हो, वह परमेश्वर की व्यावहारिकता और सामान्यता को स्पष्टता से व्यक्त करने में असमर्थ है। यदि परमेश्वर व्यक्तिगत रूप से मनुष्य के बीच कार्य करे और अपनी छवि और अपने स्वरूप को पूरी तरह से प्रकट करे, तभी मनुष्य अधिक व्यावहारिकता से परमेश्वर को जान सकता है और अधिक स्पष्टता से देख सकता है। इस प्रभाव को कोई हाड़-माँस का इंसान प्राप्त नहीं कर सकता। निस्संदेह, परमेश्वर का आत्मा भी इस प्रभाव को प्राप्त करने में असमर्थ है। परमेश्वर भ्रष्ट मनुष्य को शैतान के प्रभाव से बचा सकता है, परन्तु इस कार्य को सीधे तौर पर परमेश्वर के आत्मा के द्वारा सम्पन्न नहीं किया जा सकता; इसे केवल उस देह के द्वारा सम्पन्न किया जा सकता है जिसे परमेश्वर का आत्मा पहनता है, अर्थात् देहधारी परमेश्वर के देह द्वारा सम्पन्न किया जा सकता है। यह देह मनुष्य भी है और परमेश्वर भी, यह देह सामान्य मानवता धारण किए हुए एक व्यक्ति है और पूरी दिव्यता धारण किए हुए परमेश्वर भी है। और इसलिए, हालाँकि यह देह परमेश्वर का आत्मा नहीं है, और आत्मा से अत्यधिक भिन्न है, फिर भी वह स्वयं देहधारी परमेश्वर है जो मनुष्य को बचाता है, जो आत्मा है और देह भी है। उसे किसी भी नाम से पुकारो, आखिर वह स्वयं परमेश्वर ही है जो मनुष्यजाति को बचाता है। क्योंकि परमेश्वर का आत्मा देह से अविभाज्य है, और देह का कार्य भी परमेश्वर के आत्मा का कार्य है; अंतर बस इतना ही है कि इस कार्य को आत्मा की पहचान का उपयोग करके नहीं किया जाता, बल्कि देह की पहचान का उपयोग करके किया जाता है। सीधे तौर पर आत्मा द्वारा किए जाने वाले कार्य में देहधारण की आवश्यकता नहीं होती, और जिस कार्य को करने के लिए देह की आवश्यकता होती है उसे आत्मा द्वारा सीधे तौर पर नहीं किया जा सकता, उसे केवल देहधारी परमेश्वर द्वारा ही किया जा सकता है। इस कार्य के लिए इसी की आवश्यकता होती है, और भ्रष्ट इंसान को भी इसी की आवश्यकता है। परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों में, आत्मा द्वारा केवल एक ही चरण सीधे तौर पर सम्पन्न किया गया था, और शेष दो चरणों को देहधारी परमेश्वर द्वारा सम्पन्न किया जाता है, न कि सीधे आत्मा द्वारा। आत्मा द्वारा व्यवस्था के युग में किए गए कार्य में मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव को परिवर्तित करना शामिल नहीं था, और न ही इसका परमेश्वर के बारे में मनुष्य के ज्ञान से कोई सम्बन्ध था। हालाँकि, अनुग्रह के युग में और राज्य के युग में परमेश्वर की देह के कार्य में, मनुष्य का भ्रष्ट स्वभाव और परमेश्वर के बारे में उसका ज्ञान शामिल है, और उद्धार के कार्य का एक महत्वपूर्ण और निर्णायक हिस्सा है। इसलिए, भ्रष्ट मनुष्यजाति को देहधारी परमेश्वर के उद्धार और प्रत्यक्ष कार्य की कहीं अधिक आवश्यकता है। मनुष्य को इस बात की आवश्यकता है कि देहधारी परमेश्वर उसकी चरवाही करे, उसे समर्थन दे, उसका सिंचन और पोषण करे, उसका न्याय करे, उसे ताड़ना दे। उसे देहधारी परमेश्वर से और अधिक अनुग्रह तथा बड़े छुटकारे की आवश्यकता है। केवल देहधारी परमेश्वर ही मनुष्य का विश्वासपात्र, उसका चरवाहा, उसकी हर वक्त मौजूद सहायता बन सकता है, और यह सब वर्तमान और अतीत दोनों के ही देहधारण की आवश्यकताएँ हैं।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, भ्रष्ट मानवजाति को देहधारी परमेश्वर के उद्धार की ज्यादा आवश्यकता है

216. परमेश्वर मनुष्यों के बीच अपना कार्य करने, मनुष्य पर स्वयं को व्यक्तिगत रूप से प्रकट करने और उसे स्वयं को देखने देने के लिए पृथ्वी पर आया है; क्या यह कोई साधारण मामला है? यह वास्तव में सरल नहीं है! यह ऐसा नहीं है, जैसा कि मनुष्य कल्पना करता है : कि परमेश्वर आ गया है, इसलिए मनुष्य उसकी ओर देख सकता है, ताकि मनुष्य समझ सके कि परमेश्वर व्यावहारिक है और अस्पष्ट या खोखला नहीं है, और कि परमेश्वर उच्च है किंतु विनम्र भी है। क्या यह इतना सरल हो सकता है? यह ठीक इसलिए है, क्योंकि शैतान ने मनुष्य की देह को भ्रष्ट कर दिया है और मनुष्य ही वह प्राणी है जिसे परमेश्वर बचाना चाहता है, यही कारण है कि परमेश्वर को शैतान के साथ युद्ध करने और व्यक्तिगत रूप से मनुष्य की चरवाही करने के लिए देह धारण करनी चाहिए। केवल यही उसके कार्य के लिए लाभदायक है। परमेश्वर की दो देह शैतान को हराने के लिए और मनुष्य को बेहतर ढंग से बचाने के लिए भी अस्तित्व में रही हैं। ऐसा इसलिए है, क्योंकि जो शैतान के साथ युद्ध कर रहा है, वह केवल परमेश्वर ही हो सकता है, चाहे वह परमेश्वर का आत्मा हो या परमेश्वर का देह। संक्षेप में, शैतान के साथ युद्ध करने वाले स्वर्गदूत नहीं हो सकते, और वह मनुष्य तो बिल्कुल नहीं हो सकता, जिसे शैतान द्वारा भ्रष्ट किया जा चुका है। यह युद्ध लड़ने में स्वर्गदूत निर्बल हैं, और मनुष्य के इसमें शामिल होने की आशा और भी कम है। इसलिए यदि परमेश्वर मनुष्य के जीवन में कार्य करना चाहता है, यदि वह मनुष्य को बचाने के लिए व्यक्तिगत रूप से पृथ्वी पर आना चाहता है, तो उसे व्यक्तिगत रूप से देह धारण करना होगा—अर्थात् उसे व्यक्तिगत रूप से देह धारण करना होगा, और अपनी अंतर्निहित पहचान तथा उस कार्य के साथ, जिसे उसे अवश्य करना चाहिए, मनुष्य के बीच आना होगा और व्यक्तिगत रूप से मनुष्य को बचाना होगा। अन्यथा, यदि वह परमेश्वर का आत्मा या मनुष्य होता, जो यह कार्य करता, तो इस युद्ध से कभी कुछ न निकलता, और यह कभी समाप्त न होता। जब परमेश्वर मनुष्य के बीच व्यक्तिगत रूप से शैतान के साथ युद्ध करने के लिए देहधारी होता है, केवल तभी मनुष्य के पास उद्धार का एक अवसर होता है। इसके अतिरिक्त, शैतान इसके परिणाम स्वरूप शर्मिंदा होता है और उसके पास लाभ उठाने के लिए कोई अवसर नहीं होता है या कार्यान्वित करने के लिए कोई साजिश नहीं बचती है। देहधारी परमेश्वर द्वारा किया जाने वाला कार्य परमेश्वर के आत्मा के द्वारा अप्राप्य है, और परमेश्वर की ओर से किसी माँस और रक्त वाले मनुष्य द्वारा उसे किया जाना तो और भी अधिक असंभव है, क्योंकि जो कार्य वह करता है, वह मनुष्य के जीवन के वास्ते और मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव को बदलने के लिए है। यदि मनुष्य इस युद्ध में भाग लेता, तो वह अपने हथियार डाल देता, वह पूरी तरह से अपमानित होकर भाग जाता और उसकी दुर्गति हो जाती; वह मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव को बदलने में एकदम असमर्थ रहता। वह सलीब से मनुष्य को बचाने या संपूर्ण विद्रोही मानव-जाति पर विजय प्राप्त करने में असमर्थ होता, केवल थोड़ा-सा पुराना कार्य करने में सक्षम होता जो सिद्धांतों से परे नहीं जाता, या कोई और कार्य, जिसका शैतान की पराजय से कोई संबंध नहीं है। तो परेशान क्यों हुआ जाए? वह मनुष्य को प्राप्त नहीं कर पाता और शैतान को पराजित करने का काम तो बिल्कुल नहीं कर पाता, तो इसका क्या मतलब होता? और इसलिए, शैतान के साथ युद्ध केवल स्वयं परमेश्वर द्वारा ही किया जा सकता है, और इसे मनुष्य द्वारा किया जाना पूरी तरह से असंभव होगा। मनुष्य का कर्तव्य समर्पण और अनुसरण करना है, क्योंकि मनुष्य स्वर्ग और धरती के सृजन के समान कार्य करने में पूरी तरह से असमर्थ है, वह शैतान के साथ युद्ध करने का कार्य तो बिल्कुल नहीं कर सकता है। मनुष्य केवल स्वयं परमेश्वर की अगुआई के तहत ही सृष्टिकर्ता को संतुष्ट कर सकता है, जिसके माध्यम से शैतान पराजित होता है; केवल यही वह एकमात्र कार्य है जो मनुष्य कर सकता है। और इसलिए, हर बार जब एक नया युद्ध आरंभ होता है, अर्थात् हर बार जब एक नए युग का कार्य शुरू होता है, तो इस कार्य को स्वयं परमेश्वर द्वारा व्यक्तिगत रूप से किया जाता है, जिसके माध्यम से वह संपूर्ण युग की अगुआई करता है और संपूर्ण मानव-जाति के लिए एक नया मार्ग खोलता है। प्रत्येक नए युग की भोर शैतान के साथ युद्ध में एक नई शुरुआत है, जिसके माध्यम से मनुष्य एक अधिक नए, अधिक सुंदर क्षेत्र और एक नए युग में प्रवेश करता है, जिसकी अगुआई परमेश्वर द्वारा व्यक्तिगत रूप से की जाती है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, मनुष्य के सामान्य जीवन को बहाल करना और उसे एक अद्भुत मंजिल पर ले जाना

217. मैं ऐसा क्यों कहता हूँ कि देहधारण का अर्थ यीशु के कार्य में पूर्ण नहीं हुआ था? क्योंकि वचन पूरी तरह से देह नहीं बना था। यीशु ने जो किया वह देह में परमेश्वर के कार्य का केवल एक अंश ही था; उसने केवल छुटकारे का कार्य किया और मनुष्य को पूरी तरह से प्राप्त करने का कार्य नहीं किया। इसी कारण से परमेश्वर एक बार पुनः अंत के दिनों में देह बना है। कार्य का यह चरण भी एक साधारण देह में किया जाता है; यह एक सर्वथा सामान्य मानव द्वारा किया जाता है, जिसकी मानवता अंश मात्र भी अलौकिक नहीं होती। दूसरे शब्दों में, परमेश्वर पूरी तरह से इंसान बन गया है; और वह ऐसा व्यक्ति है जिसकी पहचान परमेश्वर की है, जो एक पूर्ण मानव है, जो एक पूर्ण देह है, जो कार्य को कर रहा है। मानवीय आँखों के लिए, वह केवल एक देह है जो बिल्कुल भी अति-असाधारण नहीं है, एक अति साधारण व्यक्ति जो स्वर्ग की भाषा बोल सकता है, जो कोई भी चिह्न और चमत्कार नहीं दिखाता है, वृहद सभाकक्षों में धर्म के पीछे की असली कहानी को उजागर करना तो दूर की बात है। लोगों को दूसरी देहधारी देह का कार्य पहले वाले से एकदम अलग प्रतीत होता है, और दोनों में कुछ भी समान नहीं दिखता—इस बार पहले वाले के कार्य का थोड़ा-भी अंश नहीं देखा जा सकता। यद्यपि दूसरे देहधारण की देह का कार्य पहले वाले से भिन्न है, लेकिन इससे यह सिद्ध नहीं होता कि उनका स्रोत एक ही नहीं है। उनका स्रोत एक ही है या नहीं, यह दोनों देहों के द्वारा किए गए कार्य की प्रकृति पर निर्भर करता है, न कि उनके बाहरी आवरण पर। अपने कार्य के तीन चरणों के दौरान, परमेश्वर ने दो बार देहधारण किया है, और दोनों बार देहधारी परमेश्वर के कार्य ने एक नए युग का शुभारंभ किया है, एक नए कार्य का सूत्रपात किया है; दोनों देहधारण एक-दूसरे के पूरक हैं। मानवीय आँखों के लिए यह बताना असंभव है कि दोनों देह वास्तव में एक ही स्रोत से आते हैं। बेशक यह मानवीय आँखों या मानवीय मन की क्षमता से बाहर है। किन्तु अपने सार में वे एक ही हैं, क्योंकि उनका कार्य एक ही आत्मा से उत्पन्न होता है। दोनों देहधारी देह एक ही स्रोत से उत्पन्न होते हैं या नहीं, इस बात को उस युग और उस स्थान से जिसमें वे पैदा हुए थे, या ऐसे ही अन्य कारकों से नहीं, बल्कि उनके द्वारा किए गए दिव्य कार्य से तय किया जा सकता है। दूसरी देहधारी देह ऐसा कोई भी कार्य नहीं करती जिसे यीशु कर चुका है, क्योंकि परमेश्वर का कार्य किसी परंपरा का पालन नहीं करता, बल्कि हर बार वह एक नया मार्ग खोलता है। दूसरी देहधारी देह का लक्ष्य, लोगों के मन पर पहली देह के प्रभाव को गहरा या दृढ़ करना नहीं है, बल्कि इसे पूरक करना और उनके मन में पहली देह की छवि को सुधारना है, परमेश्वर के बारे में मनुष्य के ज्ञान को गहरा करना है, उन सभी विनियमों को तोड़ना है जो लोगों के हृदय में विद्यमान हैं, और उनके हृदय से परमेश्वर की भ्रामक छवि को मिटाना है। ऐसा कहा जा सकता है कि परमेश्वर के अपने कार्य का कोई भी अकेला चरण मनुष्य को उसके बारे में पूरा ज्ञान नहीं दे सकता; प्रत्येक चरण केवल एक भाग का ज्ञान देता है, न कि संपूर्ण का। यद्यपि परमेश्वर ने अपने स्वभाव को पूरी तरह से व्यक्त कर दिया है, किन्तु मनुष्य की सीमित बोध क्षमता की वजह से, परमेश्वर के बारे में उसका ज्ञान अभी भी अपूर्ण है। मानव भाषा का उपयोग करके, परमेश्वर के स्वभाव की समग्रता को पूरी तरह समझाना असंभव है। तो फिर परमेश्वर के कार्य के एक चरण का परमेश्वर को पूरी तरह से व्यक्त करना और भी कितना असंभव होगा? वह देह में अपनी सामान्य मानवता की आड़ में कार्य करता है, उसे केवल उसकी दिव्यता की अभिव्यक्तियों से ही जाना जा सकता है, न कि उसके दैहिक आवरण से। परमेश्वर मनुष्य को अपने विभिन्न कार्यों के माध्यम से स्वयं को जानने देने के लिए देह में आता है। उसके कार्य के कोई भी दो चरण एक जैसे नहीं होते। केवल इसी प्रकार से मनुष्य, देह में परमेश्वर के कार्य का पूर्ण ज्ञान प्राप्त कर सकता है और इसे एक निश्चित दायरे तक सीमित नहीं कर सकता। यद्यपि दोनों देहधारणों के कार्य भिन्न हैं, किन्तु देह का सार, और उनके कार्यों का स्रोत समान है; बात केवल इतनी ही है कि उनका अस्तित्व कार्य के दो विभिन्न चरणों को करने के लिए है, और वे दो अलग-अलग युग में आते हैं। कुछ भी हो, परमेश्वर की देहधारी देहें एक ही सार और एक ही स्रोत को साझा करती हैं—यह कुछ ऐसा है जिसे कोई नकार नहीं सकता।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर द्वारा धारण किए गए देह का सार

218. अपने पहले देहधारण में परमेश्वर ने देहधारण के कार्य को पूरा नहीं किया; उसने उस कार्य के पहले चरण को ही पूरा किया जिसे करना देह में रह रहे परमेश्वर से अपेक्षित था। इसलिए देहधारण के कार्य को पूरा करने के लिए परमेश्वर एक बार फिर देह में वापस आया है, और देह की समस्त सामान्यता और व्यावहारिकता को जी रहा है, अर्थात् उस देह में परमेश्वर के वचन को प्रकट कर रहा है जो उतनी सामान्य और साधारण है जितना संभव है, इस प्रकार उस कार्य का समापन कर रहा है जिसे देह में पूरा होना बाकी है। दूसरी देहधारी देह का सार पहले वाली के ही समान है, लेकिन यह पहली से और भी अधिक व्यावहारिक है, और भी अधिक सामान्य है। परिणामस्वरूप, दूसरी देहधारी देह पहले देहधारण से भी अधिक पीड़ा सहती है, किन्तु यह पीड़ा देह में उसकी सेवकाई का परिणाम है, जो कि एक भ्रष्ट मानव की पीड़ा से भिन्न है। यह भी उसकी देह की सामान्यता और व्यावहारिकता से उत्पन्न होती है। क्योंकि वह अपनी सेवकाई का कार्य उस देह में करता है जो सर्वाधिक सामान्यता और व्यावहारिकता वाली है, इसलिए उसकी देह को अत्यधिक कष्ट सहना होगा। उसकी देह जितनी अधिक सामान्य और व्यावहारिक होगी, उतना ही अधिक वह अपनी सेवकाई में कष्ट उठाएगा। परमेश्वर का कार्य एक बहुत ही आम देह में अभिव्यक्त होता है, जो बिल्कुल अलौकिकता से रहित है। चूँकि उसकी देह सामान्य है और उसे मनुष्य को बचाने के कार्य का दायित्व भी लेना है, इसलिए वह अलौकिक देह की अपेक्षा और भी अधिक पीड़ा भुगतता है—और ये सारी पीड़ा उसकी देह की व्यावहारिकता और सामान्यता से उत्पन्न होती है। सेवकाई का कार्य करते समय जिस पीड़ा से दोनों देहधारी देह गुजरी हैं, उससे देहधारी देह के सार को देखा जा सकता है। देह जितनी अधिक सामान्य होगी, उसे कार्य करते समय उतना ही अधिक कष्ट सहना होगा; कार्य करने वाली देह जितनी अधिक व्यावहारिक होती है, लोगों की धारणाएँ उतनी ही अधिक मजबूत होती जाती हैं, और वह उतने ही जोखिम उठाता है। फिर भी, देह जितनी अधिक व्यावहारिक होती है, और उसमें सामान्य मानव की जितनी अधिक आवश्यकताएँ और पूर्ण विवेक होता है, वह उतना ही अधिक परमेश्वर के कार्य का देह में बीड़ा उठाने में सक्षम होती है। यीशु को देह के जरिए सलीब पर चढ़ाया गया था और वह देह के जरिए पापबलि बना, यानी उसने सामान्य मानवता वाली देह के जरिए ही शैतान को हराया और सलीब से मनुष्य को पूरी तरह से बचाया था। पूर्ण देह के जरिए ही दूसरा देहधारी परमेश्वर विजय का कार्य करता है और शैतान को हराता है। केवल ऐसी देह जो पूरी तरह से सामान्य और व्यावहारिक है, अपने पूर्ण अर्थ में विजय का कार्य कर सकती और एक सशक्त गवाही दे सकती है। अर्थात् देह में रह रहे परमेश्वर की व्यावहारिकता और सामान्यता के माध्यम से मानव पर विजय पाने में सफलता मिलती है, न कि अलौकिक चमत्कारों और प्रकाशनों के माध्यम से। यह देहधारी परमेश्वर बोलकर सेवकाई करता है और बोलकर ही वह मनुष्य को जीतता और पूर्ण बनाता है; दूसरे शब्दों में, देह में साकार हुए आत्मा का कार्य बोलना है और देह का कार्य बोलना है, और इसके फलस्वरूप मनुष्य को पूरी तरह से जीतने, प्रकाशित करने, पूर्ण बनाने और निकाल देने का उद्देश्य पूरा करना है। इसलिए विजय के कार्य में देह में परमेश्वर का कार्य पूरी तरह से सम्पन्न होगा। मनुष्य के पापों के लिए प्रायश्चित का कार्य जो पहली बार किया गया था, वह देहधारण के कार्य का आरंभ मात्र था; विजय का कार्य करने वाली देह ही देहधारण के समस्त कार्य को पूरा करती है। लिंग रूप में, एक पुरुष है और दूसरा महिला; यह परमेश्वर के देहधारण की महत्ता को पूर्णता देकर, परमेश्वर के बारे में मनुष्य की धारणाओं को दूर करता है : परमेश्वर पुरुष और महिला दोनों बन सकता है, सार रूप में देहधारी परमेश्वर स्त्रीलिंग या पुल्लिंग नहीं है। उसने पुरुष और महिला दोनों को बनाया है, और उसके लिए कोई लिंगभेद नहीं है। कार्य के इस चरण में, परमेश्वर चिह्न और चमत्कार नहीं दिखाता, ताकि कार्य वचनों के माध्यम से अपने परिणाम प्राप्त करे। इसके अलावा, क्योंकि देहधारी परमेश्वर का इस बार का कार्य बीमार को चंगा करना और राक्षसों को बाहर निकालना नहीं है, बल्कि बोलकर मनुष्य को जीतना है, जिसका अर्थ है कि परमेश्वर के इस देहधारण की स्वाभाविक क्षमताएँ वचन बोलना और मनुष्य को जीतना हैं, न कि बीमार को चंगा करना और राक्षसों को बाहर निकालना। सामान्य मानवता में उसका कार्य चिह्न दिखाना नहीं है, बीमार को चंगा करना और राक्षसों को बाहर निकालना नहीं है, बल्कि बोलना है, और इसलिए दूसरी देहधारी देह लोगों को पहले वाले की तुलना में अधिक सामान्य लगती है। लोग जैसे देखते हैं, परमेश्वर ने वास्तव में देह धारण किया है। हालाँकि, यह देहधारी परमेश्वर यीशु के देहधारण से भिन्न है, हालाँकि दोनों ही परमेश्वर के देहधारण हैं, फिर भी वे पूरी तरह से एक नहीं हैं। यीशु में सामान्य और साधारण मानवता थी, लेकिन उसमें अनेक चिह्न और चमत्कार दिखाने की शक्ति थी। जबकि इस देहधारी परमेश्वर में मानवीय आँखों को न तो कोई चिह्न दिखाई देगा, और न कोई चमत्कार, न तो बीमार चंगे होते हुए दिखाई देंगे, न ही दुष्टात्माएँ बाहर निकाली जाती हुई दिखाई देंगी, न तो समुद्र पर चलना दिखाई देगा, न ही चालीस दिन तक उपवास रखना दिखाई देगा...। वह उसी कार्य को नहीं करता जो यीशु ने किया, इसलिए नहीं कि उसकी देह सार रूप में यीशु से भिन्न है, बल्कि इसलिए कि बीमार को चंगा करना और राक्षसों को निकालना उसकी सेवकाई नहीं है। वह अपने ही कार्य को ध्वस्त नहीं करता, अपने ही कार्य में विघ्न नहीं डालता। चूँकि वह मनुष्य को अपने व्यावहारिक वचनों से जीतता है, इसलिए उसे चिह्नों से वश में करने की आवश्यकता नहीं है, और इसलिए यह चरण देहधारण के कार्य को पूरा करने के लिए है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर द्वारा धारण किए गए देह का सार

219. परमेश्वर द्वारा किए गए कार्य के प्रत्येक चरण के अपने व्यावहारिक मायने हैं। जब यीशु का आगमन हुआ, तो वह पुरुष रूप में आया, लेकिन इस बार के आगमन में परमेश्वर, स्त्री रूप में आता है। इससे तुम देख सकते हो कि परमेश्वर द्वारा पुरुष और स्त्री, दोनों का ही सृजन उसके कार्य के काम आ सकता है, वह कोई लिंग-भेद नहीं करता। जब उसका आत्मा आता है, तो वह इच्छानुसार किसी भी देह को धारण कर सकता है और वही देह उसका प्रतिनिधित्व करती है; चाहे पुरुष हो या स्त्री जब तक यह उसका देहधारी शरीर है, यह परमेश्वर का प्रतिनिधित्व कर सकता है। यदि यीशु जब आया तब वह स्त्री के रूप में प्रकट होता, यानी अगर पवित्र आत्मा द्वारा लड़के के बजाय लड़की गर्भ में आई होती तो भी कार्य का वह चरण उसी तरह से पूरा किया गया होता। और यदि ऐसा होता, तो कार्य का वर्तमान चरण पुरुष के द्वारा किया जाता, लेकिन कार्य उसी तरह से पूरा किया जाता। प्रत्येक चरण में किए गए कार्य का अपना अर्थ है; कार्य का कोई भी चरण दूसरे चरण को दोहराता नहीं है, लेकिन वे एक-दूसरे का विरोध भी नहीं करते हैं। उस समय जब यीशु कार्य कर रहा था, तो उसे इकलौता पुत्र कहा गया, और “पुत्र” का अर्थ है पुरुष लिंग। तो फिर इस चरण में इकलौते पुत्र का उल्लेख क्यों नहीं किया जाता है? क्योंकि कार्य की आवश्यकताओं ने लिंग में बदलाव को आवश्यक बना दिया जो यीशु के लिंग से भिन्न हो। परमेश्वर लिंग को लेकर कोई अंतर नहीं करता। वह अपनी इच्छा के अनुसार कार्य करता है, और अपने कार्य को करते समय उस पर किसी तरह की कोई बाधा भी नहीं होती है, बल्कि वह विशेष रूप से स्वतंत्र होता है, परन्तु कार्य के प्रत्येक चरण के अपने ही व्यावहारिक मायने होते हैं।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, दो देहधारण पूरा करते हैं देहधारण के मायने

220. कार्य का जो चरण यीशु ने संपन्न किया, उसने केवल “वचन परमेश्वर के साथ था” का सार ही पूरा किया : परमेश्वर का सत्य परमेश्वर के साथ था, और परमेश्वर का आत्मा देह के साथ था और उस देह से अभिन्न था। अर्थात, देहधारी परमेश्वर का देह परमेश्वर के आत्मा के साथ था, जो इस बात का अधिक बड़ा प्रमाण है कि देहधारी यीशु परमेश्वर का प्रथम देहधारण था। कार्य का यह चरण सटीक रूप से “वचन देहधारी हुआ है” के आंतरिक अर्थ को पूरा करता है, “वचन परमेश्वर के साथ था, और वचन परमेश्वर था,” को और गहन अर्थ देता है और तुम्हें इन वचनों पर दृढ़ता से विश्वास कराता है कि “आरंभ में वचन था।” कहने का अर्थ है कि सृष्टि के निर्माण के समय परमेश्वर वचनों से संपन्न था, उसके वचन उसके साथ थे और उससे अभिन्न थे, और अंतिम युग में वह अपने वचनों का सामर्थ्य और अधिकार और भी अधिक प्रकट करता है, और मनुष्य को अपना सारा मार्ग देखने—अपने सभी वचन सुनने देता है। ऐसा है अंतिम युग का कार्य। तुम्हें इन चीजों को हर पहलू से जान लेना चाहिए। यह देह को जानने का प्रश्न नहीं है, बल्कि इस बात का है कि तुम देह और वचन को और देह और मार्ग को कैसे समझते हो। यही वह गवाही है, जो तुम्हें देनी चाहिए, जिसे हर किसी को जानना चाहिए। चूँकि यह दूसरे देहधारण का कार्य है—और यह आख़िरी बार है जब परमेश्वर देहधारी होता है; दूसरे शब्दों में, यह देहधारण के महत्व को पूरा कर देता है, देह में परमेश्वर के समस्त कार्य को पूरी तरह से कार्यान्वित और प्रकट करता है, और परमेश्वर के देह में होने के युग का अंत करता है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, अभ्यास (4)

221. परमेश्वर पृथ्वी पर मुख्य रूप से “वचन देहधारी हुआ” के तथ्य को पूर्ण करने आया है, जिसका अर्थ है कि वह इसलिए आया है, ताकि उसके वचन देह से निर्गत हों (पुराने नियम में मूसा के समय की तरह नहीं, जब परमेश्वर की वाणी सीधे स्वर्ग से निर्गत होती थी)। इसके बाद उसके सारे वचन सहस्राब्दि राज्य के युग के दौरान पूर्ण होंगे, वे मनुष्यों की नजरों के सामने दिखाई देने वाले तथ्य बन जाएँगे और उनमें लेशमात्र भी अंतर के बिना लोग उन्हें अपनी आँखों से देखेंगे। यही परमेश्वर के देहधारण की बहुत बड़ी सार्थकता है। कहने का अर्थ है कि आत्मा का कार्य देह के माध्यम से और वचनों के माध्यम से पूर्ण होता है। यही “वचन देहधारी हुआ” और “वचन का देह में प्रकट होना” का सही अर्थ है। केवल परमेश्वर ही आत्मा के इरादों को व्यक्त कर सकता है और केवल देहधारी परमेश्वर ही आत्मा की ओर से बोल सकता है; परमेश्वर के वचन देहधारी परमेश्वर में अभिव्यक्त होते हैं और अन्य सभी उनके द्वारा मार्गदर्शित होते हैं। कोई भी इससे बाहर नहीं हो सकता है, सभी इसके दायरे के भीतर मौजूद हैं। केवल इन कथनों से ही लोग जागरूक हो सकते हैं; इनके बिना अगर लोग यह सोचते हैं कि वे कथनों को स्वर्ग से प्राप्त कर सकते हैं तो वे सपना देख रहे हैं। देहधारी परमेश्वर की देह में इस तरह का अधिकार प्रदर्शित होता है, जिससे सभी लोग उस पर पूरी आस्था के साथ विश्वास करते हैं। यहाँ तक कि सर्वाधिक सम्मानित विशेषज्ञ और धार्मिक पादरी भी इन वचनों को नहीं बोल सकते। उन सबको इनके नीचे आत्मसमर्पण करना चाहिए, और अन्य कोई भी दूसरी शुरुआत करने में सक्षम नहीं होगा। परमेश्वर ब्रह्मांड को जीतने के लिए वचनों का उपयोग करेगा। वह ऐसा अपने देहधारी शरीर के द्वारा नहीं, बल्कि संपूर्ण ब्रह्मांड के सभी लोगों को जीतने के लिए देहधारी हुए परमेश्वर के मुँह से कथनों के उपयोग द्वारा करेगा; केवल यही है देह बनने का तरीका और केवल यही है वचन का देह में प्रकट होना। शायद लोगों को ऐसा प्रतीत होता है कि मानो परमेश्वर ने कोई महान कार्य नहीं किया है—किंतु जब परमेश्वर अपने वचन कहेगा तो वे पूरी तरह आश्वस्त और स्तब्ध हो जाएँगे। बिना तथ्यों के, लोग चीखते और चिल्लाते हैं; परमेश्वर के वचनों से वे शांत हो जाते हैं। परमेश्वर इस तथ्य को निश्चित रूप से पूरा करेगा, क्योंकि यह परमेश्वर की लंबे समय से स्थापित योजना है : पृथ्वी पर वचन के आगमन के तथ्य का पूर्ण होना।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, सहस्राब्दि राज्य आ चुका है

222. देहधारी बना परमेश्वर स्वयं को सभी सृजित प्राणियों के सामने प्रकट करने के बजाय लोगों के उस एक हिस्से के सामने प्रकट करता है जो उस अवधि के दौरान उसका अनुसरण करते हैं, जब वह व्यक्तिगत रूप से अपना कार्य करता है। वह केवल अपने कार्य के एक चरण को पूरा करने के लिए देहधारी बना, मनुष्य को अपनी छवि दिखाने के लिए नहीं। लेकिन उसका कार्य स्वयं उसके द्वारा ही किया जाना चाहिए, इसलिए उसका देह में ऐसा करना आवश्यक है। जब यह कार्य पूरा हो जाएगा, तो वह मनुष्य की दुनिया से चला जाएगा; वह लंबी अवधि तक मानव-जाति के बीच नहीं रह सकता, वरना इससे आगामी कार्य में बाधा आ जाएगी। जो कुछ वह असंख्य लोगों पर प्रकट करता है, वह केवल उसका धार्मिक स्वभाव और उसके समस्त कर्म हैं, अपने दो देहधारणों की छवि नहीं, क्योंकि परमेश्वर की छवि केवल उसके स्वभाव के माध्यम से ही प्रकट की जा सकती है और इसे उसके देहधारी शरीर की छवि से बदला नहीं जा सकता है। उसके देह की छवि केवल सीमित लोगों को प्रकट की जाती है, केवल उन लोगों को जो तब उसका अनुसरण करते हैं जब वह देह में कार्य करता है। इसीलिए जो कार्य अब किया जा रहा है, वह इस तरह गुप्त रूप से किया जा रहा है। उदाहरण के लिए, यीशु ने जब अपना कार्य किया, तो उसने स्वयं को केवल यहूदियों के सामने प्रकट किया और अपने आप को कभी भी किसी दूसरे देश को सार्वजनिक रूप से नहीं दिखाया। इस प्रकार, जब एक बार उसने अपना कार्य समाप्त कर लिया, तो वह तुरंत ही मनुष्यों की दुनिया से चला गया और रुका नहीं; उसके बाद वह, मनुष्य की यह छवि, वो नहीं था जो स्वयं को मनुष्य को प्रकट कर रहा था, बल्कि वह पवित्र आत्मा था, जिसने सीधे तौर पर कार्य किया। एक बार जब देहधारी बने परमेश्वर का कार्य पूरी तरह से समाप्त हो जाता है, तो वह नश्वर संसार से चला जाएगा, और फिर कभी उस तरह का कार्य नहीं करेगा, जो उसने तब किया था, जब वह देह में था। इसके बाद का समस्त कार्य पवित्र आत्मा द्वारा सीधे तौर पर किया जाएगा। इस अवधि के दौरान मनुष्य शायद ही उसके दैहिक शरीर की छवि देख पाएगा; वह स्वयं को बिल्कुल भी मनुष्य को प्रकट नहीं करेगा, बल्कि हमेशा छिपा रहेगा। देहधारी बने परमेश्वर के कार्य के लिए समय सीमित होता है। वह एक विशेष युग, अवधि, देश और विशेष लोगों के बीच किया जाता है। वह कार्य केवल परमेश्वर के देहधारण की अवधि के दौरान के कार्य का प्रतिनिधित्व करता है। यह एक युग का प्रतिनिधि है, और यह एक युग-विशेष में परमेश्वर के आत्मा के कार्य का प्रतिनिधित्व करता है, परमेश्वर के आत्मा के कार्य की संपूर्णता का नहीं। इसलिए, देहधारी बने परमेश्वर की छवि असंख्य लोगों के सामने प्रकट नहीं होगी। असंख्य लोगों के सामने जो चीज प्रकट होती है वह है परमेश्वर की धार्मिकता और अपनी संपूर्णता में उसका स्वभाव, न कि उसकी उस समय की छवि जब वह दो बार देहधारी बना। यह न तो एकल छवि है जो मनुष्य को प्रकट होती है, और न ही दो संयुक्त छवियाँ हैं। इसलिए, यह अनिवार्य है कि देहधारी परमेश्वर का देह उस कार्य की समाप्ति पर पृथ्वी से चला जाए, जिसे करना उसके लिए आवश्यक है, क्योंकि वह केवल उस कार्य को पूरा करने आता है जो उसे करना चाहिए, न कि लोगों को अपनी छवि प्रकट करने आता है। यद्यपि देहधारण की सार्थकता परमेश्वर द्वारा पहले ही दो बार देहधारण करके पूरी की जा चुकी है, फिर भी वह किसी ऐसे देश पर अपने आपको खुलकर प्रकट नहीं करेगा जिसने उसे पहले कभी नहीं देखा है। यीशु फिर कभी स्वयं को धार्मिकता के सूर्य के रूप में यहूदियों के सामने प्रकट नहीं करेगा, न ही वह जैतून के पहाड़ के शिखर पर खड़ा होगा और असंख्य लोगों के सामने खुद को प्रकट करेगा; यहूदियों ने जो कुछ भी देखा है वह सब यहूदिया में अपने समय के दौरान की यीशु की तसवीर है। ऐसा इसलिए है क्योंकि अपने देहधारण में यीशु का कार्य दो हजार वर्ष पहले समाप्त हो गया; वह किसी यहूदी की छवि में वापस यहूदिया नहीं आएगा, एक यहूदी की छवि में अपने आप को किसी भी अन्य-जाति राष्ट्र के सामने प्रकट करने की बात तो और भी दूर रही, क्योंकि यीशु की देहधारी छवि केवल एक यहूदी की छवि है, मनुष्य के उस पुत्र की छवि नहीं है जिसे यूहन्ना ने देखा था। भले ही यीशु ने अपने अनुयायियों से वादा किया था कि वह फिर आएगा, फिर भी वह अन्य-जाति राष्ट्रों के सब लोगों के समक्ष स्वयं को यहूदी की छवि में प्रकट नहीं करेगा। तुम लोगों को यह जानना चाहिए कि परमेश्वर के देहधारी होने का कार्य एक युग का सूत्रपात करना है। यह कार्य कुछ वर्षों की अवधि तक सीमित है और वह परमेश्वर के आत्मा का समस्त कार्य पूरा नहीं कर सकता है, वैसे ही जैसे, एक यहूदी के रूप में यीशु की छवि केवल परमेश्वर की उस छवि का प्रतिनिधित्व कर सकती है, जब उसने यहूदिया में कार्य किया था, और वह केवल सलीब पर चढ़ने का कार्य ही कर सकता था। जिस अवधि के दौरान यीशु देहधारी था, वह युग का अंत करने या मानवजाति को नष्ट करने का कार्य नहीं कर सकता था। इसलिए, जब उसे सलीब पर चढ़ा दिया गया, और उसने अपना कार्य समाप्त कर लिया, तब वह उच्चतम ऊँचाई पर चढ़ गया और उसने हमेशा के लिए स्वयं को मनुष्य से छिपा लिया। तब से, अन्य-जाति राष्ट्रों के वे वफादार विश्वासी प्रभु यीशु के प्रकटीकरण को देखने में असमर्थ हो गए, वे केवल उसके चित्र को देखने में ही समर्थ रहे, जिसे उन्होंने दीवार पर चिपकाया था। लेकिन यह चित्र तो मनुष्य का बनाया हुआ चित्र है, न कि परमेश्वर की वह छवि है जैसी वह स्वयं को मनुष्य के सामने प्रकट करता है। परमेश्वर खुद को अपने दो देहधारणों की छवि में असंख्य लोगों के सामने खुलकर प्रकट नहीं करेगा। जो कार्य वह मनुष्यों के बीच करता है, वह इसलिए करता है ताकि वे उसके स्वभाव को समझ सकें। मनुष्य को इस सबका खुलासा भिन्न-भिन्न युगों के कार्य के माध्यम से होता है; यह उस स्वभाव के माध्यम से, जो उसने ज्ञात करवाया है और उस कार्य के माध्यम से, जो उसने किया है, संपन्न किया जाता है, यीशु की अभिव्यक्ति के माध्यम से नहीं। अर्थात्, मनुष्य को परमेश्वर की छवि देहधारी छवि के माध्यम से ज्ञात नहीं करवाई जाती है, बल्कि उस देहधारी परमेश्वर के द्वारा किए गए कार्य के माध्यम से ज्ञात करवाई जाती है जिसके पास छवि और आकार दोनों हैं; और उसके कार्य के माध्यम से उसकी छवि का खुलासा होता है और उसका स्वभाव ज्ञात करवाया जाता है। यही उस कार्य की सार्थकता है जिसे वह देह में करना चाहता है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, देहधारण का रहस्य (2)

223. परमेश्वर पूरे ब्रह्मांड और ऊपर के राज्य में महानतम है, तो क्या वह देह की छवि का उपयोग करके स्वयं को पूरी तरह से समझा सकता है? परमेश्वर अपने कार्य के एक चरण को करने के लिए देह के वस्त्र पहनता है। देह की इस छवि का कोई विशेष अर्थ नहीं है, यह युगों के गुज़रने से कोई संबंध नहीं रखती, और न ही इसका परमेश्वर के स्वभाव से कुछ लेना-देना है। यीशु ने अपनी छवि को क्यों नहीं बना रहने दिया? क्यों उसने मनुष्य को अपनी छवि चित्रित नहीं करने दी, ताकि उसे बाद की पीढ़ियों को सौंपा जा सकता? क्यों उसने लोगों को यह स्वीकार नहीं करने दिया कि उसकी छवि परमेश्वर की छवि है? यद्यपि मनुष्य की छवि परमेश्वर की छवि में बनाई गई थी, किंतु फिर भी क्या मनुष्य की छवि के लिए परमेश्वर की उत्कृष्ट छवि का प्रतिनिधित्व करना संभव रहा होता? जब परमेश्वर देहधारी होता है, तो वह स्वर्ग से मात्र एक विशेष देह में अवरोहण करता है। यह उसका आत्मा है, जो देह में अवरोहण करता है, जिसके माध्यम से वह आत्मा का कार्य करता है। यह आत्मा ही है जो देह में व्यक्त होता है, और यह आत्मा ही है जो देह में अपना कार्य करता है। देह में किया गया कार्य पूरी तरह से आत्मा का प्रतिनिधित्व करता है, और देह कार्य के वास्ते होता है, किंतु इसका यह अर्थ नहीं है कि देह की छवि स्वयं परमेश्वर की वास्तविक छवि का स्थानापन्न होती है; परमेश्वर के देहधारी होने का उद्देश्य और अर्थ यह नहीं है। वह केवल इसलिए देहधारी बनता है, ताकि आत्मा को रहने के लिए ऐसी जगह मिल सके, जो उसकी कार्य-प्रणाली के लिए उपयुक्त हो, ताकि वह देह में अपने कार्य को संपन्न कर सके, और ताकि लोग उसके कर्म देख सकें, उसका स्वभाव समझ सकें, उसके वचन सुन सकें, और उसके कार्य का चमत्कार जान सकें। उसका नाम उसके स्वभाव का प्रतिनिधित्व करता है, उसका कार्य उसकी पहचान का प्रतिनिधित्व करता है, किंतु उसने कभी नहीं कहा है कि देह में उसका रूप उसकी छवि का प्रतिनिधित्व करता है; यह केवल मनुष्य की एक धारणा है। और इसलिए, परमेश्वर के देहधारण के मुख्य पहलू उसका नाम, उसका कार्य, उसका स्वभाव और उसका लिंग हैं। इस युग में उसके प्रबंधन का प्रतिनिधित्व करने के लिए इनका उपयोग किया जाता है। केवल उस समय के उसके कार्य के वास्ते होने से, देह में उसके रूप का उसके प्रबंधन से कोई संबंध नहीं है। फिर भी, देहधारी परमेश्वर के लिए कोई विशेष रूप नहीं रखना असंभव है, और इसलिए वह अपना रूप निश्चित करने के लिए उपयुक्त परिवार चुनता है। यदि परमेश्वर के रूप का प्रातिनिधिक अर्थ होता, तो उसके चेहरे जैसी सामान्य विशेषताओं से संपन्न सभी व्यक्ति भी परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करते। क्या यह एक गंभीर त्रुटि नहीं होती? यीशु का चित्र मनुष्य द्वारा चित्रित किया गया था, ताकि मनुष्य उसकी आराधना कर सके। उस समय पवित्रात्मा ने कोई विशेष निर्देश नहीं दिए, और इसलिए मनुष्य ने आज तक उस कल्पित चित्र को आगे बढ़ाया। वास्तव में, परमेश्वर के मूल इरादे के अनुसार, मनुष्य को ऐसा नहीं करना चाहिए था। यह केवल मनुष्य का उत्साह है, जिसके कारण आज तक यीशु का चित्र बचा रहा है। परमेश्वर आत्मा है, और उसकी सटीक छवि सारांशित करने में मनुष्य कभी सक्षम नहीं होगा। उसकी छवि का केवल उसके स्वभाव द्वारा ही प्रतिनिधित्व किया जा सकता है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के कार्य का दर्शन (3)

224. परमेश्वर इस आशय से देह धारण नहीं करता कि मनुष्य उसे जाने, या देहधारी परमेश्वर की देह और मनुष्य की देह के अंतर पहचाने; न ही वह मनुष्य के विवेक की शक्तियों को प्रशिक्षित करने के लिए देह बनता है, और इस अभिप्राय से तो बिल्कुल नहीं बनता कि मनुष्य परमेश्वर द्वारा धारित देह की आराधना करे, जिससे वह बड़ी महिमा प्राप्त करता है। इसमें से कोई भी परमेश्वर के देह बनने का उद्देश्य नहीं है। न ही परमेश्वर मनुष्य की निंदा करने के लिए देह धारण करता है, न ही जानबूझकर मनुष्य को उजागर करने के लिए, और न ही उसके लिए चीज़ों को कठिन बनाने के लिए। इनमें से कोई भी परमेश्वर का इरादा नहीं है। हर बार जब परमेश्वर देह बनता है, तो यह कार्य का एक अपरिहार्य रूप होता है। वह अपने महत्तर कार्य और महत्तर प्रबंधन की खातिर ऐसा करता है—यह वैसा नहीं है जैसा कि मनुष्य कल्पना करता है। परमेश्वर पृथ्वी पर केवल अपने कार्य की अपेक्षाओं और जैसी आवश्यकता है उसके अनुसार आता है। वह पृथ्वी पर मात्र इधर-उधर देखने के इरादे से नहीं आता, बल्कि उस कार्य को करने लिए आता है जो उसे करना चाहिए। अन्यथा वह इतना भारी बोझ क्यों उठाएगा और इस कार्य को करने के लिए इतना बड़ा जोखिम क्यों लेगा? परमेश्वर केवल तभी देह बनता है, जब उसे बनना होता है, और वह हमेशा एक विशिष्ट अर्थ के साथ देह बनता है। यदि यह सिर्फ इसलिए होता कि मनुष्य उसे देखे और अपने अनुभव का क्षितिज व्यापक करे, तो वह निश्चित ही इतने हल्केपन से लोगों के बीच कभी नहीं आता। वह पृथ्वी पर अपने प्रबंधन और अपने महत्तर कार्य के लिए, और इस उद्देश्य से आता है, कि अधिक लोगों को प्राप्त कर सके। वह युग का प्रतिनिधित्व करने के लिए आता है, वह शैतान को पराजित करने के लिए आता है, और वह शैतान को पराजित करने के लिए देहधारण करता है। इसके अतिरिक्त, वह जीवन जीने में समस्त मानवजाति का मार्गदर्शन करने के लिए आता है। यह सब उसके प्रबंधन से संबंध रखता है, और यह पूरे ब्रह्मांड के कार्य से संबंध रखता है। यदि परमेश्वर मनुष्य को मात्र अपनी देह को जानने देने और मनुष्य की आँखें खोलने के लिए देह बनता, तो वह हर देश की यात्रा क्यों न करता? क्या यह अत्यधिक आसान न होता? परंतु उसने ऐसा नहीं किया, इसके बजाय वह रहने और उस कार्य को आरंभ करने के लिए, जो उसे करना चाहिए, एक उपयुक्त स्थान चुनता है। बस यह अकेला देह ही काफी अर्थपूर्ण है। वह संपूर्ण युग का प्रतिनिधित्व करता है, और संपूर्ण युग का कार्य भी करता है; वह पुराने युग का समापन और नए युग का सूत्रपात दोनों करता है। यह सब एक महत्वपूर्ण मामला है, जो परमेश्वर के प्रबंधन से संबंधित है, और यह सब कार्य के उस एक चरण के मायने हैं, जिसे संपन्न करने परमेश्वर पृथ्वी पर आता है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, देहधारण का रहस्य (3)

225. यद्यपि पृथ्वी पर मसीह, स्वयं परमेश्वर के स्थान पर कार्य करने में समर्थ है, पर वह सभी लोगों को देह में अपनी छवि दिखाने के आशय से नहीं आता। वह सब लोगों को अपना दर्शन कराने नहीं आता; वह मनुष्य को अपने हाथ की अगुआई में चलने की अनुमति देने आता है, और इस प्रकार मनुष्य नए युग में प्रवेश करता है। मसीह की देह का काम स्वयं परमेश्वर के कार्य के लिए है, यानी देह में परमेश्वर के कार्य के लिए है, और अपनी देह के सार को पूर्णतः मनुष्य को समझाने में समर्थ करने के लिए नहीं है। चाहे वह जैसे भी कार्य करे, वह कुछ ऐसा नहीं करता, जो देह के लिए प्राप्य से परे हो। चाहे वह जैसे कार्य करे, वह ऐसा देह में होकर सामान्य मानवता के साथ करता है और वह मनुष्य के सामने परमेश्वर की वास्तविक मुखाकृति पूर्ण रूप से प्रकट नहीं करता। इसके अतिरिक्त, देह में उसका कार्य इतना अलौकिक या अपरिमेय कभी नहीं होता है, जैसा मनुष्य समझता है। यद्यपि मसीह देह में स्वयं परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करता है और व्यक्तिगत रूप से वह कार्य करता है, जिसे स्वयं परमेश्वर को करना चाहिए, वह स्वर्ग में परमेश्वर के अस्तित्व को नहीं नकारता, न ही वह अपने स्वयं के कर्मों की बड़े धूमधाम से घोषणा करता है। इसके बजाय, वह विनम्रतापूर्वक अपनी देह के भीतर छिपा रहता है। मसीह के अलावा, जो मसीह होने का झूठा दावा करते हैं, उनमें उसकी विशेषताएं नहीं हैं। अभिमानी और अपनी बड़ाई के स्वभाव वाले उन झूठे मसीहों से तुलना में यह स्पष्ट हो जाता है कि वास्तव में किस प्रकार की देह में मसीह है। जितने वे झूठे होते हैं, उतना ही अधिक इस प्रकार के झूठे मसीह दिखावा करते हैं और उतना ही लोगों को गुमराह करने के लिए वे ऐसे संकेत और चमत्कार करने में समर्थ होते हैं। झूठे मसीहों में परमेश्वर के गुण नहीं होते; मसीह पर झूठे मसीहों से संबंधित किसी भी तत्व का दाग़ नहीं लगता। परमेश्वर केवल देह का कार्य पूर्ण करने के लिए देहधारी बनता है, न कि महज़ मनुष्य को उसे देखने की अनुमति देने के लिए। इसके बजाय, वह अपने कार्य से अपनी पहचान की पुष्टि होने देता है और जो वह प्रकट करता है, उसे अपना सार प्रमाणित करने देता है। उसका सार निराधार नहीं है; उसकी पहचान उसके हाथ द्वारा छीनी नहीं गई थी; यह उसके कार्य और उसके सार से निर्धारित होती है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, स्वर्गिक परमपिता की इच्छा के प्रति समर्पण ही मसीह का सार है

226. देह में उसके कार्य की सबसे बड़ी ताकत यह है कि वह उन लोगों के लिए सटीक वचन, प्रोत्साहन और मनुष्यजाति के लिए अपने सटीक इरादों को उन लोगों के लिए छोड़ सकता है जो उसका अनुसरण करते हैं, ताकि बाद में उसके अनुयायी देह में किए गए उसके समस्त कार्य और संपूर्ण मनुष्यजाति के लिए उसके इरादों को अत्यधिक सटीकता से, और अधिक व्यावहारिक शब्दों में उन लोगों तक पहुँचा सकें जो इस मार्ग को स्वीकार करते हैं। केवल मनुष्यों के बीच कार्य करता हुआ देहधारी परमेश्वर ही सही अर्थों में परमेश्वर के मनुष्य के साथ रहने और उसके साथ जीने को यथार्थ बनाता है और परमेश्वर के चेहरे को देखने, परमेश्वर के कार्य को देखने, और परमेश्वर के व्यक्तिगत वचन को सुनने की मनुष्य की इच्छा को पूरा करता है। देहधारी परमेश्वर उस युग का अंत करता है जब सिर्फ यहोवा की पीठ ही मनुष्यजाति को दिखाई देती थी, और साथ ही वह अज्ञात परमेश्वरों में मनुष्यजाति के विश्वास करने के युग को भी समाप्त करता है। विशेष रूप से, परमेश्वर के अंतिम देहधारण का कार्य संपूर्ण मनुष्यजाति को एक ऐसे युग में लाता है जो अधिक वास्तविक, अधिक व्यावहारिक, और अधिक सुंदर है। यह काम न केवल व्यवस्था और विनियमों के युग का ही अंत करता है, बल्कि अधिक महत्वपूर्ण यह है कि वह मनुष्यजाति पर ऐसे परमेश्वर को प्रकट करता है जो व्यावहारिक और सामान्य है, जो धार्मिक और पवित्र है, जो प्रबंधन योजना के कार्य का खुलासा करता है और मनुष्यजाति के रहस्यों और मंज़िल को प्रदर्शित करता है, जिसने मनुष्यजाति का सृजन किया और प्रबंधन कार्य को अंजाम तक पहुँचाता है, और जिसने हज़ारों वर्षों तक खुद को छिपा कर रखा है। यह काम अस्पष्टता के युग का पूर्णतः अंत करता है, यह उस युग का समापन करता है जिसमें संपूर्ण मनुष्यजाति परमेश्वर का चेहरा खोजना तो चाहती थी मगर खोज नहीं पायी, यह उस युग का अंत करता है जिसमें संपूर्ण मनुष्यजाति शैतान की सेवा करती थी, और यह संपूर्ण मनुष्यजाति की एक पूर्णतया नए युग में अगुवाई करता है। यह सब परमेश्वर के आत्मा के बजाए देह में प्रकट परमेश्वर के कार्य का परिणाम है। केवल जब परमेश्वर अपने देह में कार्य करता है, तभी जो लोग उसका अनुसरण करते हैं, वे अब और उन चीजों को खोजते और टटोलते नहीं हैं जो विद्यमान और अविद्यमान दोनों प्रतीत होती हैं, और अज्ञात परमेश्वरों के इरादों का अंदाजा लगाना बंद कर देते हैं। जब परमेश्वर देह में अपने कार्य को फैलाता है, तो जो लोग उसका अनुसरण करते हैं वे उसके द्वारा देह में किए गए कार्य को सभी धर्मों और पंथों में आगे बढ़ाएँगे, और वे उसके सभी वचनों को संपूर्ण मनुष्यजाति के कानों तक प्रसार करेंगे। उसके सुसमाचार को प्राप्त करने वाले जो सुनेंगे, वे उसके कार्य के तथ्य होंगे, और ऐसी चीजें होंगी जो मनुष्य के द्वारा व्यक्तिगत रूप से देखी और सुनी गई होंगी—ये तथ्य होंगे, अफवाह नहीं। ये तथ्य ऐसे प्रमाण हैं जिनसे वह कार्य को फैलाता है, और वे ऐसे साधन भी हैं जिन्हें वह कार्य को फैलाने में उपयोग करता है। बिना तथ्यों के उसका सुसमाचार सभी देशों और सभी स्थानों तक नहीं फैलेगा; बिना तथ्यों के केवल मनुष्यों की कल्पनाओं के सहारे, वह कभी भी संपूर्ण ब्रह्मांड पर विजय पाने का कार्य नहीं कर सकेगा। आत्मा मनुष्य के लिए अस्पृश्य और अदृश्य है, और आत्मा का कार्य मनुष्य के लिए परमेश्वर के कार्य के और प्रमाण या और तथ्यों को छोड़ने में असमर्थ है। मनुष्य परमेश्वर के असली चेहरे को कभी नहीं देखेगा, वह हमेशा ऐसे अज्ञात परमेश्वर में विश्वास करेगा जिसका कोई अस्तित्व ही नहीं है। मनुष्य कभी भी परमेश्वर के मुख को नहीं देखेगा, न ही मनुष्य परमेश्वर के द्वारा व्यक्तिगत रूप से बोले गए वचनों को कभी सुन पाएगा। आखिर, मनुष्य की कल्पनाएँ खोखली होती हैं, वे परमेश्वर के असली चेहरे का स्थान कभी नहीं ले सकतीं; मनुष्य परमेश्वर के अंतर्निहित स्वभाव, और स्वयं परमेश्वर के कार्य का अभिनय नहीं कर सकता। स्वर्ग के अदृश्य परमेश्वर और उसके कार्य को केवल परमेश्वर के व्यक्तिगत रूप से अपना कार्य करने के लिए देह धारण करने और मनुष्य के बीच आने के द्वारा ही पृथ्वी पर लाया जा सकता है जो मनुष्यों के बीच व्यक्तिगत रूप से अपना कार्य करता है। परमेश्वर के लिए मनुष्य के सामने प्रकट होने का और मनुष्य के लिए परमेश्वर को देखने और परमेश्वर के असली चेहरे को जानने का यही सबसे आदर्श तरीका है। इसे गैर-देहधारी परमेश्वर संपन्न नहीं कर सकता। इस चरण तक अपने कार्य को कार्यान्वित कर लेने के बाद, परमेश्वर के कार्य ने पहले ही इष्टतम प्रभाव प्राप्त कर लिया है, और पूरी तरह सफल रहा है। देह में परमेश्वर के व्यक्तिगत कार्य ने पहले ही उसके संपूर्ण प्रबंधन कार्य को नब्बे प्रतिशत पूरा कर लिया है। यह देह उसके समस्त कार्य को एक बेहतर शुरूआत की ओर ले गई है और इस देह ने उसके समस्त कार्य को एक समापन पर ला दिया है, उसके समस्त कार्य की घोषणा कर दी है, और इस समस्त कार्य को अंतिम बार पूरी तरह पूर्ण कर दिया है। इसके बाद, परमेश्वर के कार्य के चौथे चरण को करने के लिए अन्य कोई देहधारी परमेश्वर नहीं होगा, और परमेश्वर के तीसरे देहधारण का कभी कोई चमत्कारी कार्य नहीं होगा।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, भ्रष्ट मानवजाति को देहधारी परमेश्वर के उद्धार की ज्यादा आवश्यकता है

227. हालाँकि यह देह सामान्य और व्यावहारिक है, फिर भी यह मामूली देह नहीं है : यह ऐसी देह नहीं है जिसके पास केवल मानवता है, बल्कि ऐसी देह है जिसके पास मानवता और दिव्यता दोनों है। यही उसमें और मनुष्य में अन्तर है, और यही परमेश्वर की पहचान का चिह्न है। ऐसी ही देह से वह अपेक्षित कार्य कर सकता है, देह में परमेश्वर की सेवकाई को पूरा कर सकता है, और मनुष्यों के बीच में अपने कार्य को पूर्ण कर सकता है। यदि यह ऐसा नहीं होता, तो मनुष्यों के बीच उसका कार्य हमेशा खाली और त्रुटिपूर्ण होता। यद्यपि परमेश्वर शैतान की आत्मा के साथ युद्ध कर सकता है और विजयी हो सकता है, फिर भी भ्रष्ट हो चुके मनुष्य की पुरानी प्रकृति का समाधान कभी नहीं किया जा सकता, ऐसे लोग जो परमेश्वर के प्रति विद्रोही हैं और उसका विरोध करते हैं, वे कभी भी उसके प्रभुत्व में नहीं आ सकते, यानी वह कभी भी मनुष्यजाति को जीत नहीं सकता और संपूर्ण मानवजाति को प्राप्त नहीं कर सकता। यदि पृथ्वी पर उसके कार्य का समाधान न हो, तो उसका प्रबन्धन कभी समाप्त नहीं होगा, और संपूर्ण मनुष्यजाति विश्राम में प्रवेश नहीं कर पाएगी। यदि परमेश्वर अपने सभी सृजित प्राणियों के साथ विश्राम में प्रवेश नहीं कर सके तो ऐसे प्रबंधन-कार्य का कभी भी कोई परिणाम नहीं होगा, और फलस्वरूप परमेश्वर की महिमा विलुप्त हो जाएगी। यद्यपि उसकी देह के पास कोई अधिकार नहीं है, फिर भी उसका कार्य अपना प्रभाव प्राप्त कर लेगा। यह उसके कार्य की अनिवार्य दिशा है। उसकी देह में अधिकार हो या न हो, अगर वह स्वयं परमेश्वर का कार्य कर पाता है, तो वह स्वयं परमेश्वर है। यह देह कितना भी सामान्य और साधारण क्यों न हो, वह वो कार्य कर सकता है जिसे उसे करना चाहिए, क्योंकि यह देह परमेश्वर है, मात्र मनुष्य नहीं है। यह देह उस कार्य को कर सकती है जिसे मनुष्य नहीं कर सकता, इसका कारण यह है कि उसका आंतरिक सार किसी इंसान के सार से अलग है, और उसके द्वारा इंसान को बचा पाने का कारण यह है कि उसकी पहचान किसी भी इंसान की पहचान से अलग है। यह देह मानवजाति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि वह इंसान है और उससे भी बढ़कर वह परमेश्वर है, क्योंकि वह उस कार्य को कर सकता है जिसे कोई देह का साधारण इंसान नहीं कर सकता है, क्योंकि वह भ्रष्ट इंसान को बचा सकता है, जो उसके साथ पृथ्वी पर रहता है। हालाँकि वह भी इंसान है, फिर भी देहधारी परमेश्वर किसी भी मूल्यवान व्यक्ति की तुलना में मानवजाति के लिए अधिक महत्वपूर्ण है, क्योंकि वह उस कार्य को कर सकता है जो परमेश्वर के आत्मा के द्वारा नहीं किया जा सकता, वह स्वयं परमेश्वर की गवाही देने के लिए परमेश्वर के आत्मा की तुलना में अधिक सक्षम है, और मानवजाति को पूरी तरह से प्राप्त करने के लिए परमेश्वर के आत्मा की तुलना में अधिक समर्थ है। नतीजतन, यूँ तो यह देह सामान्य और साधारण है, फिर भी मानवजाति के प्रति उसके योगदान और मानवजाति के अस्तित्व के लिए उसके महत्व के संदर्भ में वह अत्यंत अनमोल है और कोई भी इंसान इस देह के वास्तविक मूल्य तथा महत्व को नहीं माप सकता है। यूँ तो यह देह शैतान को सीधे नष्ट नहीं कर सकती है, फिर भी देहधारी परमेश्वर मानवजाति को जीतने और शैतान को हराने के लिए अपने कार्य का उपयोग कर सकता है, शैतान को पूरी तरह से अपने प्रभुत्व के अधीन कर सकता है। चूँकि परमेश्वर देहधारी हुआ है, इसलिए वह शैतान को हरा सकता है और मानवजाति को बचाने में सक्षम है। वह शैतान को सीधे नष्ट नहीं करता है, बल्कि उस मानवजाति को जीतने का कार्य करने के लिए देहधारी हो जाता है जिसे शैतान द्वारा भ्रष्ट किया गया है। इस तरह से, वह अपने सृजित प्राणियों के बीच बेहतर ढंग से स्वयं की गवाही दे सकता है और वह भ्रष्ट हुए इंसान को बेहतर ढंग से बचा सकता है। परमेश्वर के आत्मा के द्वारा शैतान के प्रत्यक्ष विनाश की तुलना में देहधारी परमेश्वर के द्वारा शैतान की पराजय अधिक बड़ी गवाही देती है और ज्यादा आश्वस्त करने वाली है। देहधारी परमेश्वर सृष्टिकर्ता को जानने में मनुष्य के लिए अधिक सहायक है और अपने सृजित प्राणियों के बीच स्वयं की बेहतर ढंग से गवाही दे सकता है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, भ्रष्ट मानवजाति को देहधारी परमेश्वर के उद्धार की ज्यादा आवश्यकता है

228. इस बार परमेश्वर कार्य करने के लिए आध्यात्मिक देह में नहीं, बल्कि बहुत ही साधारण शरीर में आया है। इसके अलावा, यह परमेश्वर के दूसरे देहधारण का शरीर है और यह वह शरीर भी है, जिसके द्वारा वह देह में लौटकर आया है। यह एक बहुत साधारण देह है। उस पर नजर डालकर तुम ऐसा कुछ भी नहीं देख सकते हो जो उसे दूसरों से भिन्न दिखाता हो, लेकिन तुम उससे अब तक अनसुने सत्य प्राप्त कर सकते हो। महज यह तुच्छ देह परमेश्वर के सत्य के समस्त वचनों का मूर्त रूप है, अंत के दिनों में परमेश्वर के कार्य की वाहक है और मनुष्य के समझने के लिए परमेश्वर के संपूर्ण स्वभाव की अभिव्यक्ति है। क्या तुम स्वर्ग के परमेश्वर को देखने की प्रबल अभिलाषा नहीं करते? क्या तुम स्वर्ग के परमेश्वर को समझने की प्रबल अभिलाषा नहीं करते? क्या तुम मानवजाति का गंतव्य देखने की प्रबल अभिलाषा नहीं करते? वह तुम्हें ये सभी रहस्य बताएगा—वे रहस्य जो कोई मनुष्य तुम्हें कभी नहीं बता पाया है—और वह तुम्हें वे सत्य भी बताएगा जिन्हें तुम नहीं समझते। वह राज्य में जाने का तुम्हारा द्वार है, और नए युग में जाने के लिए तुम्हारा मार्गदर्शक है। यह साधारण देह कई रहस्यों को समेटे हुए है जिनकी थाह मनुष्य नहीं ले सकता है। उसके कर्म तुम्हारे लिए गूढ़ हैं, लेकिन उसके द्वारा किए जाने वाले कार्य का संपूर्ण लक्ष्य तुम्हें यह सब देखने की क्षमता देने के लिए पर्याप्त है कि वह कोई साधारण देह नहीं है, जैसा कि लोग मानते हैं, क्योंकि वह अंत के दिनों के परमेश्वर के इरादों और अंत के दिनों में मानवजाति के प्रति परमेश्वर की परवाह का प्रतिनिधित्व करता है। यद्यपि तुम उसके द्वारा बोले गए उन वचनों को नहीं सुन सकते जो आकाश और पृथ्वी को कँपाते-से लगते हैं, यद्यपि तुम उसकी आँखें आग की लपटों जैसी नहीं देख सकते, और यद्यपि तुम उसके लौह-दंड का अनुशासन नहीं पा सकते, फिर भी तुम उसके वचनों से यह सुन सकते हो कि परमेश्वर क्रोधित हो रहा है और यह जान सकते हो कि परमेश्वर मानवजाति पर दया दिखा रहा है, और तुम परमेश्वर का धार्मिक स्वभाव और उसकी बुद्धि देख सकते हो, और उससे भी अधिक, समस्त मानवजाति के लिए परमेश्वर की परवाह को समझ सकते हो। अंत के दिनों में परमेश्वर का कार्य मनुष्य को स्वर्ग के परमेश्वर का पृथ्वी पर मनुष्य के बीच रहना दिखाना है और परमेश्वर को जानने, उसके प्रति समर्पण करने, उसका भय मानने और उससे प्रेम करने में सक्षम बनाना है। यही कारण है कि वह दूसरी बार देह में लौटा है। यूँ तो आज मनुष्य जो देखता है वह एक ऐसा परमेश्वर है जो बिल्कुल मनुष्य के ही समान है, एक नाक और दो आँखों वाला परमेश्वर और एक बहुत ही साधारण परमेश्वर, लेकिन अंत में परमेश्वर तुम लोगों को दिखाएगा कि अगर यह व्यक्ति न हो, तो आकाश और धरती में जबरदस्त बदलाव आएँगे; अगर यह व्यक्ति न हो तो आकाश धुँधला जाएगा, पृथ्वी पर उथल-पुथल मच जाएगी और समस्त मानवजाति अकाल और महामारियों के बीच जिएगी। वह तुम लोगों को दिखाएगा कि यदि अंत के दिनों का देहधारी परमेश्वर तुम लोगों को बचाने के लिए न आता तो परमेश्वर समस्त मानवजाति को बहुत पहले ही नरक में नष्ट कर चुका होता; यदि यह देह न होती तो तुम लोग सदैव महापापी होते और तुम हमेशा के लिए लाश होते। तुम लोगों को जानना चाहिए कि यदि यह देह न होती तो समस्त मानवजाति के लिए एक महा आपदा से बचना असंभव होता, और उसके लिए अंत के दिनों में परमेश्वर द्वारा मानवजाति को दिए जाने वाले और भी कठोर दंड से बच पाना असंभव होता। यदि इस साधारण देह का जन्म न हुआ होता तो तुम सबकी ऐसी हालत होती कि तुम लोग जीवन की भीख माँगते लेकिन जी न पाते और मरने की भीख माँगते लेकिन मर न पाते; यदि यह देह न होती तो तुम लोग सत्य प्राप्त न कर पाते और आज परमेश्वर के सिंहासन के सामने न आ पाते, बल्कि अपने जघन्य पापों के लिए परमेश्वर द्वारा दंडित किए जाते। क्या तुम लोग जानते थे कि यदि परमेश्वर देह में लौटा न होता तो किसी के पास भी उद्धार का अवसर न होता; और यदि इस देह का आगमन न होता तो परमेश्वर ने बहुत पहले ही पुराने युग को समाप्त कर दिया होता? ऐसा होने से क्या तुम लोग अभी भी परमेश्वर के दूसरे देहधारण को नकारोगे? चूँकि तुम लोग इस साधारण व्यक्ति से इतने बड़े लाभ प्राप्त कर सकते हो तो तुम उसे प्रसन्नतापूर्वक स्वीकार क्यों नहीं करोगे?

परमेश्वर का कार्य ऐसा है, जिसे तुम समझ नहीं सकते। यदि तुम न तो पूरी तरह से यह समझ सकते हो कि तुम्हारा चुनाव सही है या नहीं, और न ही तुम यह जान सकते हो कि परमेश्वर का कार्य सफल हो सकता है या नहीं, तो तुम अपनी किस्मत क्यों नहीं आजमाते और क्यों नहीं यह देखते कि क्या यह साधारण व्यक्ति तुम्हारी बड़ी मदद कर सकता है और क्या परमेश्वर ने वास्तव में महान काम किया है? लेकिन मैं तुम्हें बता दूँ कि नूह के दिनों में मनुष्य इस हद तक खाने-पीने और शादी-ब्याह करने में लीन रहते थे कि परमेश्वर के लिए यह सब देखना असहनीय हो गया था, इसलिए उसने समस्त मानवजाति के विनाश के लिए एक बड़ी बाढ़ भेजी और बस आठ सदस्यों वाले नूह के परिवार और सभी प्रकार के पशु-पक्षियों को बचाया। लेकिन अंत के दिनों में परमेश्वर द्वारा बचाए गए लोग वे हैं, जो अंत तक उसके वफादार रहे हैं। यद्यपि दोनों युग अत्यधिक भ्रष्टाचार के युग हैं जो परमेश्वर के लिए असहनीय हैं और दोनों युगों में मानवजाति बहुत भ्रष्ट हो चुकी है और उसने परमेश्वर को अपना प्रभु मानने से इनकार कर दिया है, फिर भी परमेश्वर ने नूह के समय के लोगों को ही नष्ट किया। दोनों युगों में मानवजाति परमेश्वर को बहुत कष्ट देती है, फिर भी परमेश्वर ने अब तक अंत के दिनों के लोगों के प्रति धीरज रखा है। ऐसा क्यों है? क्या तुम लोगों ने कभी सोचा नहीं कि ऐसा क्यों है? यदि तुम लोग सचमुच नहीं जानते, तो चलो, मैं तुम्हें बता देता हूँ। अंत के दिनों में परमेश्वर द्वारा लोगों को अनुग्रह प्रदान कर पाने का कारण यह नहीं है कि वे नूह के समय के लोगों की तुलना में कम भ्रष्ट हैं या उनमें परमेश्वर के सामने पश्चात्ताप का इरादा है और यह कारण तो बिल्कुल नहीं है कि अंत के दिनों में तकनीक इतनी उन्नत हो गई है कि परमेश्वर लोगों को नष्ट नहीं कर सकता। बल्कि इसका कारण यह है कि अंत के दिनों में परमेश्वर को लोगों के एक समूह में कार्य करना है और परमेश्वर यह कार्य अपने देहधारण में स्वयं करने का इरादा रखता है। इतना ही नहीं, परमेश्वर इस समूह के एक भाग को अपने उद्धार का पात्र चुनना चाहता है और अपनी प्रबंधन योजना का परिणाम बनाने का इरादा रखता है, और इन लोगों को अगले युग में लाने का इरादा है। इसलिए किसी भी हालत में परमेश्वर ने जो कीमत चुकाई है, वह पूरी तरह से अंत के दिनों में उसके द्वारा देह धारण वाले कार्य की तैयारी में है। यह तथ्य कि तुम लोग आज तक पहुँच गए हो, इसी देह के कारण है। चूँकि परमेश्वर देह में जीता है, इसीलिए तुम लोगों के पास जीवित रहने का मौका है। ये सारे आशीष इसी साधारण व्यक्ति के कारण मिले हैं। इतना ही नहीं, बल्कि अंत में अनेक राष्ट्र इस साधारण व्यक्ति की उपासना करेंगे और साथ ही इस मामूली व्यक्ति को धन्यवाद देंगे और उसके प्रति समर्पण करेंगे, क्योंकि उसके द्वारा लाए गए सत्य, जीवन और मार्ग ने ही समस्त मानवजाति को बचाया है, मनुष्य और परमेश्वर के बीच के संघर्ष को शांत किया है, उनके बीच की दूरी कम की है, और परमेश्वर के विचारों और मनुष्य के बीच संबंध स्थापित किया है। इसी ने परमेश्वर के लिए और अधिक महिमा हासिल की है। क्या ऐसा साधारण व्यक्ति तुम्हारे विश्वास और श्रद्धा के योग्य नहीं है? क्या यह साधारण देह मसीह कहलाने के योग्य नहीं है? क्या ऐसा साधारण व्यक्ति मनुष्य के बीच परमेश्वर की अभिव्यक्ति नहीं बन सकता? क्या ऐसा व्यक्ति, जिसने मानवजाति को आपदा से बचाया है, तुम लोगों के प्रेम और उसे थामे रखने की तुम्हारी इच्छा का अधिकारी नहीं है? यदि तुम लोग उसके मुख से व्यक्त सत्य को नकारते हो, और अपने बीच उसके अस्तित्व से घृणा करते हो, तो अंत में तुम लोगों का क्या होगा?

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, क्या तुम जानते थे? परमेश्वर ने मनुष्यों के बीच एक महान काम किया है

229. अंत के दिनों में परमेश्वर का सारा कार्य इस साधारण व्यक्ति के माध्यम से किया जाता है। वह तुम्हें सब-कुछ प्रदान करेगा और इतना ही नहीं, वह तुमसे संबंधित हर चीज तय करने में सक्षम है। क्या ऐसा व्यक्ति वैसा हो सकता है जैसा तुम लोग मानते हो : एक ऐसा व्यक्ति जो इतना सरल है कि उल्लेख करने योग्य नहीं है? क्या उसका सत्य तुम लोगों को पूरी तरह से कायल करने के लिए पर्याप्त नहीं है? क्या अपनी आँखों से उसके कर्म देखकर भी तुम लोग कायल नहीं होते? या फिर जिस मार्ग पर वह लोगों को ले जाता है वह मार्ग तुम लोगों के लिए चलने के लायक नहीं है? आखिरकार वह क्या चीज है जिसके कारण तुम लोग उससे अरुचि महसूस करते हो, उसे अस्वीकार करते हो और उससे दूर रहते हो? यही वह व्यक्ति है जो सत्य व्यक्त करता है, यही वह व्यक्ति है जो सत्य प्रदान करता है और यही वह व्यक्ति है जो तुम लोगों को अनुसरण करने के लिए मार्ग प्रदान करता है। क्या तुम लोग अभी भी इन सत्यों के भीतर परमेश्वर के कार्य के निशान खोज पाने में असमर्थ हो? यीशु के कार्य के बिना मानवजाति सूली से नहीं उतर सकती थी, लेकिन आज के देहधारी परमेश्वर के बिना सूली से उतरे लोग कभी परमेश्वर का अनुमोदन नहीं पा सकते या नए युग में प्रवेश नहीं कर सकते। इस साधारण व्यक्ति के आगमन के बिना तुम लोगों को कभी परमेश्वर के सच्चे मुखमंडल का दर्शन करने का अवसर नहीं मिलता, न ही तुम इसके योग्य होते, क्योंकि तुम सब ऐसे हो जिन्हें बहुत पहले ही नष्ट कर दिया जाना चाहिए था। परमेश्वर के द्वितीय देहधारण के आगमन के कारण परमेश्वर ने तुम लोगों को क्षमा कर दिया है और तुम लोगों पर दया दिखाई है। खैर अंत में मुझे तुम लोगों को जिन वचनों के साथ छोड़ना होगा, वे अभी भी यही हैं : यह साधारण व्यक्ति, जो देहधारी परमेश्वर है, तुम लोगों के लिए बड़े महत्व का है। यह वह महान काम है जिसे परमेश्वर ने मनुष्यों के बीच पहले ही कर दिया है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, क्या तुम जानते थे? परमेश्वर ने मनुष्यों के बीच एक महान काम किया है

230. जो लोग मसीह द्वारा बोले गए सत्य पर भरोसा किए बिना जीवन प्राप्त करना चाहते हैं, वे पृथ्वी पर सबसे बेतुके लोग हैं, और जो मसीह द्वारा लाए गए जीवन के मार्ग को स्वीकार नहीं करते, वे कोरी कल्पना में खोए हैं। और इसलिए मैं कहता हूँ कि जो लोग अंत के दिनों के मसीह को स्वीकार नहीं करते, उनसे परमेश्वर हमेशा घृणा करेगा। अंत के दिनों में मसीह राज्य के लिए मनुष्य का प्रवेशद्वार है और ऐसा कोई नहीं है जो उसे लाँघकर निकल सके। मसीह के माध्यम के अलावा किसी भी दूसरे तरीके से किसी को भी परमेश्वर द्वारा पूर्ण नहीं बनाया जा सकता। तुम परमेश्वर में विश्वास करते हो, इसलिए तुम्हें उसके वचन स्वीकारने चाहिए और उसके वचन के प्रति समर्पण करना चाहिए। सत्य और जीवन के प्रावधान को स्वीकारने में असमर्थ रहते हुए केवल आशीष प्राप्त करने की मत सोचो। मसीह अंत के दिनों में इसलिए आया है ताकि वह उन सबको जीवन प्रदान कर सके जो उसमें ईमानदारी से विश्वास रखते हैं। यह कार्य पुराने युग को समाप्त करने और नए युग में प्रवेश करने के लिए है, और यह कार्य वह मार्ग है जिसे नए युग में प्रवेश करने वाले सभी लोगों को अपनाना ही चाहिए। यदि तुम मसीह को नहीं स्वीकारते और यही नहीं, उसकी भर्त्सना, ईशनिंदा या उसका उत्पीड़न करते हो, तो तुम्हें अनंतकाल तक जलाया जाना तय है और तुम परमेश्वर के राज्य में कभी प्रवेश नहीं करोगे। ऐसा इसलिए क्योंकि यह मसीह स्वयं पवित्र आत्मा की अभिव्यक्ति है, परमेश्वर की अभिव्यक्ति है, वह है जिसे परमेश्वर ने अपना कार्य पृथ्वी पर करने के लिए सौंपा है, और इसलिए मैं कहता हूँ कि यदि तुम वह सब स्वीकार नहीं करते जो अंत के दिनों के मसीह द्वारा किया जाता है, तो तुम पवित्र आत्मा की ईशनिंदा करते हो। पवित्र आत्मा की ईशनिंदा करने वाले जिस प्रतिफल के पात्र हैं, वह सभी को स्वतः स्पष्ट है। मैं तुम्हें यह भी बताता हूँ : अगर तुम अंत के दिनों के मसीह का प्रतिरोध करते हो, अगर तुम अंत के दिनों के मसीह को नकारते हो तो कोई भी अन्य तुम्हारे बदले में इसका अंजाम नहीं भुगत सकता है। इतना ही नहीं, उस बिंदु के बाद तुम्हें परमेश्वर की स्वीकृति प्राप्त करने का अवसर कभी नहीं मिलेगा; यदि तुम अपने तौर-तरीके सुधारना भी चाहो, तब भी तुम दोबारा कभी परमेश्वर का चेहरा नहीं देख पाओगे। ऐसा इसलिए क्योंकि तुम जिसका प्रतिरोध कर रहे हो वह मानव नहीं है, तुम जिसे अस्वीकार कर रहे हो वह कोई तुच्छ व्यक्ति नहीं है, बल्कि मसीह है। क्या तुम जानते हो कि इसके क्या दुष्परिणाम हैं? तुम कोई छोटी-मोटी गलती नहीं कर रहे हो, बल्कि एक जघन्य पाप कर रहे हो। और इसलिए मैं हर व्यक्ति को सलाह देता हूँ कि सत्य के सामने अपने नुकीले दाँत और पंजे मत दिखाओ या मनमानी टिप्पणियाँ मत करो, क्योंकि केवल सत्य ही तुम्हें जीवन दिला सकता है, और सत्य के अलावा कुछ भी तुम्हें पुनः जन्म लेने या दोबारा परमेश्वर का चेहरा देखने में सक्षम नहीं बना सकता।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, केवल अंत के दिनों का मसीह ही मनुष्य को अनंत जीवन का मार्ग दे सकता है

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परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?

परमेश्वर का प्रकटन और कार्य परमेश्वर को जानने के बारे में अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन मसीह-विरोधियों को उजागर करना अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ सत्य के अनुसरण के बारे में सत्य के अनुसरण के बारे में न्याय परमेश्वर के घर से शुरू होता है अंत के दिनों के मसीह, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अत्यावश्यक वचन परमेश्वर के दैनिक वचन सत्य वास्तविकताएं जिनमें परमेश्वर के विश्वासियों को जरूर प्रवेश करना चाहिए मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ राज्य का सुसमाचार फ़ैलाने के लिए दिशानिर्देश परमेश्वर की भेड़ें परमेश्वर की आवाज को सुनती हैं परमेश्वर की आवाज़ सुनो परमेश्वर के प्रकटन को देखो राज्य के सुसमाचार पर अत्यावश्यक प्रश्न और उत्तर मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 1) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 2) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 3) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 4) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 5) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 6) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 7) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 8) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 9) मैं वापस सर्वशक्तिमान परमेश्वर के पास कैसे गया

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