5. परमेश्वर के कार्य के प्रत्येक चरण और परमेश्वर के नाम के बीच के संबंध पर वचन

231. अपने समस्त प्रबंधन में परमेश्वर का कार्य पूर्णतः स्पष्ट है : अनुग्रह का युग अनुग्रह का युग है, और अंत के दिन अंत के दिन हैं। प्रत्येक युग के बीच सुस्पष्ट भिन्नताएँ हैं, क्योंकि प्रत्येक युग में परमेश्वर उस कार्य को करता है, जो उस युग का प्रतिनिधि होता है। अंत के दिनों का कार्य किए जाने के लिए, युग का अंत करने के लिए ज्वलन, न्याय, ताड़ना, कोप और विनाश होने आवश्यक हैं। अंत के दिन अंतिम युग को संदर्भित करते हैं। अंतिम युग के दौरान क्या परमेश्वर युग का अंत नहीं करेगा? युग समाप्त करने के लिए परमेश्वर को अपने साथ ताड़ना और न्याय लाने आवश्यक हैं। केवल इसी तरह से वह युग को समाप्त कर सकता है। यीशु ने मनुष्य के लिए प्रयास किया कि वह अस्तित्व में बना रहे, वह जीवित रहे और एक बेहतर तरीके से विद्यमान रह सके। उसने मनुष्य को पाप से बचाने, उसे निरंतर अनैतिकता में गिरते रहने से रोकने और रसातल व नरक में जीने से रोकने का प्रयास किया, और मनुष्य को रसातल व नरक से बचाने में मनुष्य को जीते रहने देने का प्रयास किया। अब अंत के दिन आ गए हैं। परमेश्वर मनुष्य का विनाश कर देगा और मानवजाति को पूरी तरह से नष्ट कर देगा, अर्थात्, वह मानवजाति की विद्रोहशीलता को रूपांतरित कर देगा। इस कारण से, अतीत के दयालु और प्रेममय स्वभाव के साथ परमेश्वर के लिए युग को समाप्त करना या प्रबंधऩ की अपनी छह-हजार-वर्षीय योजना को सफल बनाना असंभव होगा। हर युग में परमेश्वर के स्वभाव का एक विशिष्ट प्रतिनिधित्व होता है, और हर युग में ऐसा कार्य होता है, जिसे परमेश्वर द्वारा किया जाना चाहिए। इसलिए, प्रत्येक युग में स्वयं परमेश्वर द्वारा किए गए कार्य में उसके सच्चे स्वभाव की अभिव्यक्ति शामिल रहती है, और उसका नाम और उसका कार्य दोनों युग के साथ बदल जाते हैं—वे सब नए होते हैं। व्यवस्था के युग के दौरान यहोवा के नाम से मानवजाति का मार्गदर्शन करने का कार्य किया गया था, और पृथ्वी पर कार्य का पहला चरण आरंभ किया गया था। इस चरण के कार्य में मंदिर और वेदी का निर्माण करना, इस्राएल के लोगों का मार्गदर्शन करने के लिए व्यवस्था का उपयोग करना और इस्राएल के लोगों के बीच कार्य करना शामिल था। इस्राएल के लोगों का मार्गदर्शन करके उसने पृथ्वी पर अपने कार्य के लिए एक आधार का इंतजाम किया। इस आधार से उसने अपने कार्य का फैलाव इस्राएल से बाहर किया, जिसका अर्थ है कि इस्राएल से शुरू करके उसने अपने कार्य को बाहर फैलाया, जिससे बाद की पीढ़ियों को धीरे-धीरे पता चला कि यहोवा परमेश्वर था, और कि वह यहोवा ही था, जिसने स्वर्ग और पृथ्वी और सभी चीजों का निर्माण किया, और कि वह यहोवा ही था, जिसने सभी सृजित प्राणियों को बनाया था। उसने इस्राएल के लोगों के माध्यम से अपने कार्य को उनसे परे फैलाया। इस्राएल की भूमि पृथ्वी पर यहोवा के कार्य का पहला पवित्र स्थान थी, और इस्राएल की भूमि पर ही परमेश्वर ने पृथ्वी पर सबसे पहले कार्य किया। वह व्यवस्था के युग का कार्य था। अनुग्रह के युग के दौरान, यीशु परमेश्वर था, जिसने मनुष्य को बचाया। उसके पास जो था और जो वह था, वह अनुग्रह, प्रेमपूर्ण अनुकंपा, दयालुता, संयम, धैर्य, विनम्रता, प्रेम और नरमी था, और उसने जो इतना अधिक कार्य किया, वह मनुष्य के छुटकारे की खातिर किया। उसका स्वभाव दयालुता और प्रेमपूर्ण अनुकंपा का था, और चूँकि वह दयालु और प्रेममय था, इसलिए उसे मनुष्य के लिए सलीब पर चढ़ना पड़ा, यह दिखाने के लिए कि परमेश्वर मनुष्य से उसी प्रकार प्रेम करता है, जैसे वह स्वयं से करता है, यहाँ तक कि उसने स्वयं को अपनी संपूर्णता में बलिदान कर दिया। अनुग्रह के युग के दौरान परमेश्वर का नाम यीशु था, अर्थात्, परमेश्वर ऐसा परमेश्वर था जिसने मनुष्य को बचाया, और वह एक दयालु और प्रेममय परमेश्वर था। परमेश्वर मनुष्य के साथ था। उसका प्रेम, उसकी दया और उसका उद्धार प्रत्येक व्यक्ति के साथ था। केवल यीशु के नाम और उसकी उपस्थिति को स्वीकार करके ही मनुष्य शांति और आनंद प्राप्त करने, उसका आशीष, उसके व्यापक और विपुल अनुग्रह तथा उसका उद्धार प्राप्त करने में समर्थ था। यीशु को सलीब पर चढ़ाने के माध्यम से, उसका अनुसरण करने वाले सभी लोगों को उद्धार प्राप्त हो गया और उनके पाप क्षमा कर दिए गए। अनुग्रह के युग के दौरान परमेश्वर का नाम यीशु था। दूसरे शब्दों में, अनुग्रह के युग का कार्य मुख्यतः यीशु के नाम से किया गया था। अनुग्रह के युग के दौरान परमेश्वर को यीशु कहा गया। उसने पुराने विधान से परे नए कार्य का एक चरण शुरू किया, और उसका कार्य सलीब पर चढ़ाए जाने के साथ समाप्त हो गया। यह उसके कार्य की संपूर्णता थी। इसलिए, व्यवस्था के युग के दौरान परमेश्वर का नाम यहोवा था, और अनुग्रह के युग में यीशु के नाम ने परमेश्वर का प्रतिनिधित्व किया। अंत के दिनों के दौरान उसका नाम सर्वशक्तिमान परमेश्वर—सर्वशक्तिमान है, जो अपने सामर्थ्य का उपयोग मनुष्य का मार्गदर्शन करने, मनुष्य को जीतने, मनुष्य को प्राप्त करने के लिए करते हुए अंततः युग का समापन करता है। हर युग में, कार्य के उसके हर चरण में, परमेश्वर का स्वभाव दिखता है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के कार्य का दर्शन (3)

232. “यहोवा” वह नाम है जिसे मैंने इस्राएल में अपने कार्य के दौरान अपनाया था, और इसका अर्थ है इस्राएलियों (परमेश्वर के चुने हुए लोगों) का परमेश्वर, जो मनुष्य के प्रति दया दिखा सकता है, मनुष्य को शाप दे सकता है, और मनुष्य के जीवन का मार्गदर्शन कर सकता है; वह परमेश्वर, जिसके पास बड़ा सामर्थ्य है और जो बुद्धि से भरपूर है। “यीशु” इम्मानुएल है, जिसका अर्थ है वह पाप-बलि, जो प्रेमपूर्ण अनुकंपा से भरा है, दयालुता से भरपूर है, और मनुष्य को छुटकारा दिलाता है। उसने अनुग्रह के युग का कार्य किया, और वह अनुग्रह के युग का प्रतिनिधित्व करता है, और वह प्रबंधन योजना के केवल एक भाग का ही प्रतिनिधित्व कर सकता है। अर्थात्, केवल यहोवा ही इस्राएल के चुने हुए लोगों का परमेश्वर, अब्राहम का परमेश्वर, इसहाक का परमेश्वर, याकूब का परमेश्वर, मूसा का परमेश्वर और इस्राएल के सभी लोगों का परमेश्वर है। और इसलिए, यहूदी लोगों समेत उस समय के सभी इस्राएली यहोवा की आराधना करते थे। वे वेदी पर उसके लिए बलिदान करते थे और याजकीय लबादे पहनकर मंदिर में उसकी सेवा करते थे। वे यहोवा के पुनः प्रकट होने की आशा करते थे। केवल यीशु ही मानवजाति को छुटकारा दिलाने वाला है, और वह वो पाप-बलि है, जिसने मानवजाति को पाप से छुटकारा दिलाया है। कहने का तात्पर्य यह है कि यीशु का नाम अनुग्रह के युग से आया, और अनुग्रह के युग में छुटकारे के कार्य के कारण विद्यमान रहा। यीशु का नाम अनुग्रह के युग के लोगों को पुनर्जन्म दिए जाने और बचाए जाने के लिए अस्तित्व में आया, और वह पूरी मानवजाति के छुटकारे के लिए एक विशेष नाम है। इस प्रकार, “यीशु” नाम छुटकारे के कार्य को दर्शाता है और अनुग्रह के युग का द्योतक है। “यहोवा” नाम इस्राएल के उन लोगों के लिए एक विशेष नाम है, जो व्यवस्था के अधीन जिए थे। प्रत्येक युग में और कार्य के प्रत्येक चरण में मेरा नाम आधारहीन नहीं है, बल्कि प्रातिनिधिक मायने रखता है : प्रत्येक नाम एक युग का प्रतिनिधित्व करता है। “यहोवा” व्यवस्था के युग का प्रतिनिधित्व करता है, और वह सम्मानसूचक शब्द है, जिससे इस्राएल के लोग उस परमेश्वर को पुकारते थे जिसकी वे आराधना करते थे। “यीशु” अनुग्रह के युग का प्रतिनिधित्व करता है और उन सबके परमेश्वर का नाम है, जिन्हें अनुग्रह के युग के दौरान छुटकारा दिया गया था।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, उद्धारकर्ता पहले ही एक “सफेद बादल” पर सवार होकर वापस आ चुका है

233. अनुग्रह का युग यीशु के नाम से शुरू हुआ। जब यीशु ने अपनी सेवकाई आरंभ की, तो पवित्र आत्मा ने यीशु के नाम की गवाही देनी आरंभ कर दी, और यहोवा का नाम बोला जाना अब बंद हो गया; इसके बजाय, पवित्र आत्मा ने मुख्य रूप से यीशु के नाम से नया कार्य आरंभ किया। जो यीशु में विश्वास करते थे, उन लोगों की गवाही यीशु मसीह के लिए दी गई थी, और उन्होंने जो कार्य किया, वह भी यीशु मसीह के लिए था। पुराने विधान के व्यवस्था के युग के समापन का यह अर्थ था कि मुख्य रूप से यहोवा के नाम पर किया गया कार्य समाप्त हो गया है। तब से परमेश्वर का नाम यहोवा नहीं रहा; इसके बजाय उसे यीशु कहा गया, और यहाँ से पवित्र आत्मा ने मुख्य रूप से यीशु के नाम से कार्य करना आरंभ किया। इसलिए तुम अब भी यहोवा के वचनों को खाते और पीते हो, और अभी भी चीजों पर व्यवस्था के युग के कार्य को लागू करते हो—क्या तुम विनियमों को लागू नहीं कर रहे हो? क्या तुम अतीत में नहीं अटक गए हो? अब तुम लोग जानते हो कि अंत के दिन आ चुके हैं। क्या ऐसा हो सकता है कि जब यीशु आए, तो वह अभी भी यीशु कहलाए? यहोवा ने इस्राएलियों से कहा था कि मसीहा आएगा, लेकिन जब वह आया, तो उसे मसीहा नहीं बल्कि यीशु कहा गया। यीशु ने कहा कि वह पुनः आएगा, और वह वैसे ही आएगा जैसे वह गया था। ये यीशु के वचन थे, किंतु क्या तुमने यीशु के जाने के तरीके को देखा था? यीशु एक सफेद बादल पर चढ़कर गया था, किंतु क्या ऐसा हो सकता है कि वह व्यक्तिगत रूप से एक सफेद बादल पर मनुष्य के बीच वापस आएगा? यदि ऐसा होता, तो क्या वह अभी भी यीशु नहीं कहलाता? जब यीशु पुनः आएगा, तब तक युग पहले ही बदल चुका होगा, तो क्या उसे अभी भी यीशु कहा जा सकता है? क्या परमेश्वर को केवल यीशु के नाम से ही जाना जा सकता है? क्या नए युग में उसे नए नाम से नहीं बुलाया जा सकता? क्या एक व्यक्ति की छवि और एक विशेष नाम परमेश्वर का उसकी संपूर्णता में प्रतिनिधित्व कर सकते हैं? प्रत्येक युग में परमेश्वर नया कार्य करता है और उसे एक नए नाम से बुलाया जाता है; वह भिन्न-भिन्न युगों में एक ही कार्य कैसे कर सकता है? वह पुराने से कैसे चिपका रह सकता है? यीशु का नाम छुटकारे के कार्य के वास्ते लिया गया था तो क्या जब वह अंत के दिनों में लौटेगा, तब भी उसे उसी नाम से बुलाया जाएगा? क्या वह अभी भी छुटकारे का कार्य करेगा? ऐसा क्यों है कि यहोवा और यीशु एक ही हैं, फिर भी उन्हें भिन्न-भिन्न युगों में भिन्न-भिन्न नामों से बुलाया जाता है? क्या यह इसलिए नहीं है, क्योंकि उनके कार्य के युग भिन्न-भिन्न हैं? क्या केवल एक नाम परमेश्वर का उसकी संपूर्णता में प्रतिनिधित्व कर सकता है? ऐसा होने पर परमेश्वर को भिन्न युग में भिन्न नाम से ही बुलाया जाना चाहिए और उसे युग को परिवर्तित करने और युग का प्रतिनिधित्व करने के लिए उस नाम का उपयोग करना चाहिए। क्योंकि कोई भी एक नाम पूरी तरह से स्वयं परमेश्वर का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता है और प्रत्येक नाम केवल परमेश्वर के उस स्वभाव का ही प्रतिनिधित्व कर सकता है जो किसी निश्चित युग का निरूपक हो; उसे केवल उसके कार्य का प्रतिनिधित्व ही करना चाहिए। इसलिए समस्त युग का प्रतिनिधित्व करने के लिए परमेश्वर ऐसे किसी भी नाम को चुन सकता है जो उसके स्वभाव के अनुकूल हो। चाहे वह यहोवा का युग हो या यीशु का, प्रत्येक युग का प्रतिनिधित्व एक नाम के द्वारा किया जाता है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के कार्य का दर्शन (3)

234. जब यीशु अपना कार्य करने के लिए आया, तो यह पवित्र आत्मा के निर्देशन के तहत था; उसने उस तरह किया, जिस तरह पवित्र आत्मा चाहता था, न कि पुराने विधान के व्यवस्था के युग के अनुसार या यहोवा के कार्य के अनुसार। यद्यपि यीशु जिस कार्य को करने के लिए आया था, वह यहोवा की व्यवस्थाओं या यहोवा की आज्ञाओं का पालन करना नहीं था, फिर भी उनका स्रोत एक ही था। जो कार्य यीशु ने किया, उसने यीशु के नाम का प्रतिनिधित्व किया, और उसने अनुग्रह के युग का प्रतिनिधित्व किया; जहाँ तक यहोवा द्वारा किए गए कार्य की बात है, उसने यहोवा का प्रतिनिधित्व किया, और उसने व्यवस्था के युग का प्रतिनिधित्व किया। उनका कार्य दो भिन्न-भिन्न युगों में एक ही आत्मा का कार्य था। जो कार्य यीशु ने किया, वह केवल अनुग्रह के युग का प्रतिनिधित्व कर सकता था, और जो कार्य यहोवा ने किया, वह केवल पुराने विधान के व्यवस्था के युग का प्रतिनिधित्व कर सकता था। यहोवा ने केवल इस्राएल और मिस्र के लोगों का, और इस्राएल से परे सभी राष्ट्रों का मार्गदर्शन किया। जब यीशु नए विधान के अनुग्रह के युग में कार्य कर रहा था, तब परमेश्वर ने यीशु के नाम से कार्य किया और युग का मार्गदर्शन किया। ... केवल एक नया युग ही हो सकता था, जब यीशु नया कार्य करने, नए युग का सूत्रपात करने, इस्राएल में पहले किए गए कार्य को भंग करने, और अपना कार्य यहोवा द्वारा इस्राएल में किए गए कार्य के अनुसार या उसके पुराने विनियमों के अनुसार या किन्हीं विनियमों को लागू करने के लिए नहीं, बल्कि उस नए कार्य को करने के लिए आया था, जो उसे करना चाहिए था। स्वयं परमेश्वर युग का सूत्रपात करने के लिए आता है, और स्वयं परमेश्वर युग का अंत करने के लिए आता है। युग का आरंभ और युग का समापन करने का कार्य करने में मनुष्य असमर्थ है। यदि आने के बाद यीशु यहोवा का कार्य समाप्त नहीं करता, तो यह इस बात का सबूत होता कि वह मात्र एक व्यक्ति है और परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करने में असमर्थ है। ठीक इसलिए, क्योंकि यीशु आया और उसने यहोवा के कार्य का समापन किया, यहोवा के कार्य को जारी रखा और, इसके अलावा, उसने अपना स्वयं का कार्य, एक नया कार्य किया, इससे साबित होता है कि यह एक नया युग था, और कि यीशु स्वयं परमेश्वर था। उन्होंने कार्य के स्पष्ट रूप से भिन्न दो चरण पूरे किए। एक चरण मंदिर में कार्यान्वित किया गया, और दूसरा मंदिर के बाहर संचालित किया गया। एक चरण व्यवस्था के अनुसार मनुष्य के जीवन का मार्गदर्शन करना था, और दूसरा, पापबलि चढ़ाना था। कार्य के ये दो चरण स्पष्ट रूप से भिन्न थे; यह नए युग को पुराने से विभाजित करता है, और यह कहना पूर्णतः सही है कि ये दो भिन्न युग हैं! उनके कार्य का स्थान भिन्न था, उनके कार्य की विषय-वस्तु भिन्न थी, और उनके कार्य का उद्देश्य भिन्न था। इस तरह उन्हें दो युगों में विभाजित किया जा सकता है; नए और पुराने विधान नए और पुराने युगों को संदर्भित करते हैं। जब यीशु आया, तो वह मंदिर में नहीं गया, जिससे साबित होता है कि यहोवा का युग समाप्त हो गया था। उसने मंदिर में प्रवेश नहीं किया, क्योंकि मंदिर में यहोवा का कार्य पूरा हो गया था, और उसे फिर से करने की आवश्यकता नहीं थी, और उसे पुनः करना उसे दोहराना होता। केवल मंदिर को छोड़ने, एक नया कार्य शुरू करने और मंदिर के बाहर एक नया मार्ग खोलकर ही वह परमेश्वर के कार्य को उसके शिखर पर पहुँचा सकता था। यदि वह अपना कार्य करने के लिए मंदिर से बाहर नहीं गया होता, तो परमेश्वर का कार्य मंदिर की बुनियाद पर रुक गया होता, और फिर कभी कोई नए परिवर्तन नहीं होते। और इसलिए, जब यीशु आया तो उसने मंदिर में प्रवेश नहीं किया, और अपना कार्य मंदिर में नहीं किया। उसने अपना कार्य मंदिर से बाहर किया, और शिष्यों की अगुआई करते हुए स्वतंत्र रूप से अपना कार्य किया। अपना कार्य करने के लिए मंदिर से परमेश्वर के प्रस्थान का अर्थ था कि परमेश्वर की एक नई योजना है। उसका कार्य मंदिर के बाहर कार्यान्वित किया जाना था, और इसे नया कार्य होना था, जो अपने कार्यान्वयन के तरीके में अप्रतिबंधित था। जैसे ही यीशु आया, उसने पुराने विधान के युग के दौरान यहोवा के कार्य को समाप्त किया। यद्यपि उन्हें दो भिन्न-भिन्न नामों से बुलाया गया, फिर भी यह एक ही आत्मा था, जिसने कार्य के दोनों चरण संपन्न किए, और जो कार्य किया गया वह सतत था। चूँकि नाम भिन्न था, और कार्य की विषय-वस्तु भिन्न थी, इसलिए युग भिन्न था। जब यहोवा आया, तो वह यहोवा का युग था, और जब यीशु आया, तो वह यीशु का युग था। और इसलिए, हर आगमन के साथ परमेश्वर को एक नाम से बुलाया जाता है, जो एक युग का प्रतिनिधित्व करता है, और वह एक नया मार्ग खोलता है; और हर नए मार्ग के लिए वह एक नया नाम अपनाता है। यह सब दर्शाता है कि परमेश्वर हमेशा नया रहता है और कभी पुराना नहीं पड़ता, और कि उसका कार्य आगे की दिशा में प्रगति करने से कभी नहीं रुकता। इतिहास हमेशा आगे बढ़ रहा है, और परमेश्वर का कार्य हमेशा आगे बढ़ रहा है। उसकी छह-हज़ार-वर्षीय प्रबंधन योजना को अंत तक पहुँचने के लिए उसे आगे की दिशा में प्रगति करते रहना चाहिए। हर दिन उसे नया कार्य करना चाहिए, हर वर्ष उसे नया कार्य करना चाहिए; उसे नए मार्ग खोलने चाहिए, नए युगों का सूत्रपात करना चाहिए, और अधिक नया और अधिक बड़ा कार्य आरंभ करना चाहिए। इन सबके साथ, वह नए नाम और नया कार्य लाता है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के कार्य का दर्शन (3)

235. मान लो, प्रत्येक युग में परमेश्वर का कार्य हमेशा एक जैसा होता, और उसे हमेशा उसी नाम से बुलाया जाता, तो मनुष्य उसे कैसे जान पाता? परमेश्वर को यहोवा कहा जाना चाहिए, और यहोवा कहे जाने वाले परमेश्वर के अलावा, किसी अन्य नाम से पुकारा जाने वाला कोई अन्य परमेश्वर नहीं है। या फिर परमेश्वर केवल यीशु हो सकता है, और यीशु के नाम के अलावा उसे किसी अन्य नाम से नहीं बुलाया जा सकता; यीशु के अलावा, यहोवा परमेश्वर नहीं है, और सर्वशक्तिमान परमेश्वर भी परमेश्वर नहीं है। मनुष्य जो मानता है वह यह है : “यह सत्य है कि परमेश्वर सर्वशक्तिमान है, किंतु परमेश्वर वो परमेश्वर है जो मनुष्य के साथ है। उसे यीशु ही कहा जाना चाहिए, क्योंकि परमेश्वर मनुष्य के साथ है।” इस पर विश्वास करना विनियमों का पालन करना है, और परमेश्वर को एक दायरे में सीमित करना है। इसलिए, हर युग में परमेश्वर जो कार्य करता है, उसे जिस नाम से पुकारा जाता है और जिस छवि को वह अपनाता है—हर चरण में आज तक जो भी कार्य वह करता है—किसी विनियम का पालन नहीं करते और किसी भी सीमा के अधीन नहीं हैं। वह यहोवा है, किंतु वह यीशु भी है और साथ ही मसीहा भी और सर्वशक्तिमान परमेश्वर भी। उसके नाम में अनुरूपी परिवर्तनों के साथ उसका कार्य क्रमिक परिवर्तन से गुजर सकता है। कोई अकेला नाम पूरी तरह से उसका प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता, किंतु वे सभी नाम जिनसे उसे बुलाया जाता है, उसका प्रतिनिधित्व करने में सक्षम हैं और जो कार्य वह हर युग में करता है, वह उसके स्वभाव का प्रतिनिधित्व करता है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के कार्य का दर्शन (3)

236. कुछ लोग कहते हैं कि परमेश्वर का नाम नहीं बदलता, तो फिर यहोवा का नाम यीशु क्यों हो गया? यह भविष्यवाणी की गई थी मसीहा आएगा, तो फिर यीशु नाम का एक व्यक्ति क्यों आ गया? परमेश्वर का नाम क्यों बदल गया? क्या इस तरह का कार्य काफी समय पहले नहीं किया गया था? क्या परमेश्वर आज अधिक नया कार्य न करे? बीते कल का कार्य बदला जा सकता है, और यीशु का कार्य यहोवा के कार्य के बाद आ सकता है। तो क्या यीशु के कार्य के बाद कोई अन्य कार्य नहीं हो सकता? यदि यहोवा का नाम बदल कर यीशु हो सकता है, तो क्या यीशु का नाम भी नहीं बदला जा सकता? इसमें कुछ भी असामान्य नहीं है; बात केवल इतनी-सी है कि लोग बहुत सरल दिमाग के हैं। परमेश्वर हमेशा परमेश्वर ही रहेगा। चाहे उसका काम कैसे भी बदले, चाहे उसका नाम कैसे भी बदल जाए, लेकिन उसका स्वभाव और बुद्धि कभी नहीं बदलेगी। यदि तुम्हें लगता है कि परमेश्वर को केवल यीशु के नाम से ही पुकारा जा सकता है, तो फिर तुम्हारा ज्ञान बहुत सीमित है। क्या तुम यह दावे से कह सकते हो कि परमेश्वर का नाम हमेशा के लिए यीशु रहेगा, परमेश्वर हमेशा यीशु नाम से ही जाना जाएगा, और यह कभी नहीं बदलेगा? क्या तुम दृढ़ता से यह मानने का साहस करते हो कि यह यीशु का ही नाम है जिसने व्यवस्था के युग का समापन किया और वही अंतिम युग का भी समापन करेगा? कौन कह सकता है कि यीशु का अनुग्रह युग का समापन कर सकता है?

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, जिन लोगों ने परमेश्वर को अपनी ही धारणाओं में सीमित कर दिया है, वे किस प्रकार उसके प्रकाशनों को प्राप्त कर सकते हैं?

237. क्या यीशु का नाम—“परमेश्वर हमारे साथ”—परमेश्वर के स्वभाव की समग्रता का प्रतिनिधित्व कर सकता है? क्या यह पूरी तरह से परमेश्वर को स्पष्ट कर सकता है? यदि मनुष्य कहता है कि परमेश्वर को केवल यीशु कहा जा सकता है, और उसका कोई अन्य नाम नहीं हो सकता क्योंकि परमेश्वर अपना स्वभाव नहीं बदल सकता, तो ऐसे वचन वास्तव में ईशनिंदा हैं! क्या तुम मानते हो कि यीशु, हमारे साथ परमेश्वर, का नाम अकेले परमेश्वर का उसकी समग्रता में प्रतिनिधित्व कर सकता है? परमेश्वर को कई नामों से बुलाया जा सकता है, किंतु इन नामों में से एक भी ऐसा नहीं है, जो परमेश्वर का सब कुछ समाहित कर सकता हो, एक भी ऐसा नहीं है जो परमेश्वर का पूरी तरह से प्रतिनिधित्व कर सकता हो। और इसलिए, परमेश्वर के कई नाम हैं, किंतु ये कई नाम परमेश्वर के स्वभाव को पूरी तरह से स्पष्ट नहीं कर सकते, क्योंकि परमेश्वर का स्वभाव इतना समृद्ध है कि वह बस मनुष्य के जानने की सीमा से आगे है। मनुष्य की भाषा का उपयोग करके परमेश्वर को पूरी तरह से समाहित करने का मनुष्य के पास कोई तरीका नहीं है। मनुष्य परमेश्वर के स्वभाव के बारे में जो कुछ जानता है, उस सबको समाहित करने के लिए उसके पास सीमित शब्दावली है : महान, कुलीन, अद्भुत, अथाह, सर्वोच्च, पवित्र, धार्मिक, बुद्धिमान इत्यादि। इतनी सीमित शब्दावली उस थोड़े-से का भी वर्णन करने में असमर्थ है, जो मनुष्य ने परमेश्वर के स्वभाव के बारे में देखा है। समय के साथ कई अन्य लोगों ने ऐसे शब्दों को जोड़ा, जिनके बारे में उन्हें लगता था कि वे उनके हृदय के उत्साह का बेहतर ढंग से वर्णन करने में समर्थ हैं : परमेश्वर इतना महान है! परमेश्वर इतना पवित्र है! परमेश्वर इतना प्यारा है! आज, मनुष्य की ऐसी उक्तियाँ अपने चरम पर पहुँच गई हैं, फिर भी मनुष्य अभी भी स्वयं को स्पष्ट रूप से व्यक्त करने में असमर्थ है। और इसलिए, मनुष्य की नज़रों में परमेश्वर के कई नाम हैं, मगर उसका कोई एक नाम नहीं है, और ऐसा इसलिए है क्योंकि परमेश्वर का अस्तित्व इतना प्रचुर है, लेकिन मनुष्य की भाषा इतनी दरिद्र है। कोई एक शब्द या नाम विशेष परमेश्वर का उसकी समग्रता में प्रतिनिधित्व कर ही नहीं सकता, तो क्या तुमको लगता है कि उसका नाम नियत किया जा सकता है? परमेश्वर इतना महान और इतना पवित्र है—क्या तुम उसे हर युग में अपना नाम नहीं बदलने दोगे? इसलिए, हर युग में, जिसमें परमेश्वर व्यक्तिगत रूप से अपना कार्य करता है, वह उस कार्य को समाहित करने के लिए, जिसे करने का वह इरादा रखता है, एक ऐसे नाम का उपयोग करता है, जो उस युग के अनुकूल होता है। वह उस युग के महत्व वाले इस विशेष नाम का उपयोग उस युग के अपने स्वभाव का प्रतिनिधित्व करने के लिए करता है। यह परमेश्वर द्वारा अपने स्वभाव को व्यक्त करने के लिए मनुष्य की भाषा का उपयोग करना है। फिर भी बहुत-से लोग, जिन्हें आध्यात्मिक अनुभव हो चुके हैं और जिन्होंने परमेश्वर को व्यक्तिगत रूप से देखा है, अभी भी महसूस करते हैं कि यह एक विशेष नाम परमेश्वर का उसकी समग्रता में प्रतिनिधित्व करने में असमर्थ है—आह, इसमें कुछ नहीं किया जा सकता—इसलिए मनुष्य अब परमेश्वर को किसी नाम से नहीं बुलाता, बल्कि उसे केवल “परमेश्वर” कहता है। यह ऐसा है, मानो मनुष्य का हृदय प्रेम से भरा हो, लेकिन वह विरोधाभासों से भी घिरा हो, क्योंकि मनुष्य नहीं जानता कि परमेश्वर की व्याख्या कैसे की जाए। परमेश्वर जो है, वह इतना प्रचुर है कि उसके वर्णन का कोई तरीका है ही नहीं। ऐसा कोई अकेला नाम नहीं है, जो परमेश्वर के स्वभाव की समग्रता को धारण कर सकता हो, और ऐसा कोई अकेला नाम नहीं है, जो परमेश्वर के पास है और जो वह स्वयं है उसका वर्णन कर सकता हो। यदि कोई मुझसे पूछे, “तुम ठीक-ठीक किस नाम का उपयोग करते हो?” तो मैं उनसे कहूँगा, “परमेश्वर तो परमेश्वर है!” क्या यह परमेश्वर के लिए सर्वोत्तम नाम नहीं है? क्या यह परमेश्वर के स्वभाव का सर्वोत्तम संपुटीकरण नहीं है? ऐसा होते हुए भी तुम लोग परमेश्वर के नाम की छानबीन में इतना प्रयास क्यों लगाते हो? क्यों खाना और सोना त्यागकर सिर्फ एक नाम के वास्ते अपना दिमाग़ हमेशा चलाना चाहिए? एक दिन आएगा, जब परमेश्वर यहोवा, यीशु या मसीहा नहीं कहलाएगा—वह केवल सृष्टिकर्ता होगा। उस समय वे सभी नाम, जो उसने पृथ्वी पर धारण किए हैं, समाप्त हो जाएँगे, क्योंकि पृथ्वी पर उसका कार्य समाप्त हो गया होगा, जिसके बाद उसका कोई नाम नहीं होगा। जब सभी चीजें सृष्टिकर्ता के प्रभुत्व के अधीन आती हैं, तो उसे किसी अत्यधिक उपयुक्त फिर भी अपूर्ण नाम की क्या आवश्यकता है? क्या तुम अभी भी परमेश्वर के नाम की छानबीन कर रहे हो? क्या तुम अभी भी कहने का साहस करते हो कि परमेश्वर को केवल यहोवा ही कहा जा सकता है? क्या तुम अभी भी कहने का साहस करते हो कि परमेश्वर को केवल यीशु कहा जा सकता है? क्या तुम परमेश्वर के विरुद्ध ईशनिंदा का पाप सहन करने में समर्थ हो? तुम्हें पता होना चाहिए कि मूल रूप से परमेश्वर का कोई नाम नहीं था। उसने केवल एक या दो या कई नाम धारण किए, क्योंकि उसके पास करने के लिए कार्य था और उसे मानवजाति का प्रबंधन करना था। चाहे उसे किसी भी नाम से बुलाया जाए—क्या उसने स्वयं उसे स्वतंत्र रूप से नहीं चुना? क्या इसे निर्धारित करने के लिए उसे तुम्हारी—एक सृजित प्राणी की—आवश्यकता होगी? जिस नाम से परमेश्वर को बुलाया जाता है, वह ऐसा नाम है जो मनुष्य के समझने की क्षमता के अनुरूप होता है, मानवजाति की भाषा के अनुसार होता है, किंतु यह नाम कुछ ऐसा नहीं है, जिसे मनुष्य सारांशित कर सकता हो। तुम केवल इतना ही कह सकते हो कि स्वर्ग में एक परमेश्वर है, कि वह परमेश्वर कहलाता है, कि वह महान सामर्थ्य वाला स्वयं परमेश्वर है, जो इतना बुद्धिमान, इतना उत्कृष्ट, इतना अद्भुत, इतना रहस्यमय, इतना सर्वशक्तिमान है, और फिर तुम इससे अधिक कुछ नहीं कह सकते; तुम बस इतना जरा-सा ही जान सकते हो। ऐसा होने पर, क्या मात्र यीशु का नाम ही स्वयं परमेश्वर का प्रतिनिधित्व कर सकता है? जब अंत के दिन आते हैं, भले ही यह अभी भी परमेश्वर ही है जो अपना कार्य करता है, फिर भी उसके नाम को बदलना ही है, क्योंकि यह एक भिन्न युग है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के कार्य का दर्शन (3)

238. हर बार जब परमेश्वर पृथ्वी पर आता है, तो वह अपना नाम, अपना लिंग, अपनी छवि और अपना कार्य बदल देता है; वह अपने कार्य को दोहराता नहीं है। वह ऐसा परमेश्वर है, जो हमेशा नया रहता है और कभी पुराना नहीं पड़ता। जब वह पहले आया, तो उसे यीशु कहा गया; जब वह इस बार फिर से आता है, तो क्या उसे अभी भी यीशु कहा जा सकता है? जब वह पहले आया, तो वह पुरुष था; क्या वह इस बार फिर से पुरुष हो सकता है? जब वह अनुग्रह के युग के दौरान आया था, तो उसका कार्य सलीब पर चढ़ाया जाना था; जब वह फिर से आता है, तो क्या तब भी वह मानवजाति को पाप से छुटकारा दिला सकता है? क्या उसे फिर से सलीब पर चढ़ाया जा सकता है? क्या वह उसके कार्य की पुनरावृत्ति नहीं होगी? क्या तुम्हें नहीं पता था कि परमेश्वर हमेशा नया रहता है और कभी पुराना नहीं पड़ता? ऐसे लोग हैं, जो कहते हैं कि परमेश्वर सदैव अपरिवर्तनीय है। यह सही है, किंतु इसका अर्थ यह है कि परमेश्वर का स्वभाव और सार अपरिवर्तनीय हैं। उसके नाम और कार्य में परिवर्तन से यह साबित नहीं होता कि उसका सार बदल गया है; दूसरे शब्दों में, परमेश्वर हमेशा परमेश्वर रहेगा, और यह तथ्य कभी नहीं बदलेगा। यदि तुम कहते हो कि परमेश्वर का कार्य अपरिवर्तनशील है, तो क्या यह संभव होगा कि उसकी छह-हजार-वर्षीय प्रबंधन योजना समाप्त हो जाए? तुम केवल यह जानते हो कि परमेश्वर हमेशा अपरिवर्तनशील है, किंतु क्या तुम यह जानते हो कि परमेश्वर हमेशा नया रहता है और कभी पुराना नहीं पड़ता? यदि परमेश्वर का कार्य कभी नहीं बदला, तो क्या वह मानवजाति की आज के दिन तक अगुआई कर सकता था? यदि परमेश्वर हमेशा अपरिवर्तनीय होता, तो उसने पहले ही दो युगों का कार्य क्यों किया? उसका कार्य कभी आगे बढ़ने से नहीं रुकता, जिसका अर्थ है कि उसका स्वभाव मनुष्य के सामने धीरे-धीरे प्रकट होता है, और जो कुछ प्रकट होता है, वह उसका अंतर्निहित स्वभाव है। आरंभ में, परमेश्वर का स्वभाव मनुष्य से छिपा हुआ था, उसने कभी भी खुलकर मनुष्य के सामने अपना स्वभाव प्रकट नहीं किया था, और मनुष्य को बस उसका कोई ज्ञान नहीं था। इस वजह से, वह धीरे-धीरे मनुष्य के सामने अपने स्वभाव को प्रकट करने हेतु अपने कार्य का उपयोग करता है, किंतु इस तरह कार्य करने का यह अर्थ नहीं है कि परमेश्वर का स्वभाव हर युग में बदलता है। ऐसा नहीं है कि परमेश्वर के इरादे हमेशा बदलने से उसका स्वभाव लगातार बदल रहा है। बल्कि, उसके कार्य के युग भिन्न-भिन्न हैं, इसलिए परमेश्वर अपने अंतर्निहित स्वभाव को समग्रता में लेता है और इसे क्रमशः मनुष्य के सामने प्रकट करता है, ताकि मनुष्य उसे जानने में समर्थ हो जाए। किंतु यह किसी भी भाँति इस बात का साक्ष्य नहीं है कि परमेश्वर का मूलतः कोई विशेष स्वभाव नहीं है और युगों के गुज़रने के साथ उसका स्वभाव धीरे-धीरे बदल गया है—इस प्रकार की समझ भ्रामक होगी। परमेश्वर मनुष्य पर अपना अंतर्निहित और विशेष स्वभाव—वह जो है—उसे प्रकट करता है और वह ऐसा युगों के गुज़रने के अनुसार करता है; किसी एक युग का कार्य परमेश्वर के समग्र स्वभाव को व्यक्त नहीं कर सकता। और इसलिए, “परमेश्वर हमेशा नया रहता है और कभी पुराना नहीं पड़ता” वचन उसके कार्य को संदर्भित करते हैं, और “परमेश्वर सदैव अपरिवर्तनीय है” ये वचन उसे संदर्भित करते हैं, जो अंतर्निहित रूप से परमेश्वर के पास है और जो वह है। इसके बावज़ूद, तुम छह-हज़ार-वर्ष के कार्य को एक बिंदु तक सीमित नहीं रख सकते, या उसे केवल मृत शब्दों के साथ सीमित नहीं कर सकते। मनुष्य की अज्ञानता ऐसी ही है। परमेश्वर इतना सरल नहीं है, जितना मनुष्य कल्पना करता है, और उसका कार्य किसी एक युग में रुका नहीं रह सकता। उदाहरण के लिए, यहोवा हमेशा परमेश्वर का नाम नहीं हो सकता; परमेश्वर यीशु के नाम से भी अपना कार्य कर सकता है। यह इस बात का संकेत है कि परमेश्वर का कार्य हमेशा आगे की ओर प्रगति कर रहा है।

परमेश्वर हमेशा परमेश्वर है, और वह कभी शैतान नहीं बनेगा; शैतान हमेशा शैतान है, और वह कभी परमेश्वर नहीं बनेगा। परमेश्वर की बुद्धि, परमेश्वर की चमत्कारिकता, परमेश्वर की धार्मिकता और परमेश्वर का प्रताप कभी नहीं बदलेंगे। उसका सार और उसके पास जो है और जो स्वयं है वह कभी नहीं बदलेगा। किंतु जहाँ तक उसके कार्य की बात है, वह हमेशा आगे बढ़ रहा है, हमेशा गहरा होता जा रहा है, क्योंकि वह हमेशा नया रहता है और कभी पुराना नहीं पड़ता। हर युग में परमेश्वर एक नया नाम अपनाता है, हर युग में वह नया कार्य करता है, और हर युग में वह अपने सृजित प्राणियों को अपने नए इरादे और नया स्वभाव देखने देता है। यदि नए युग में लोग परमेश्वर के नए स्वभाव की अभिव्यक्ति देखने में असफल रहे, तो क्या वे उसे हमेशा के लिए सलीब पर नहीं टाँग देंगे? और ऐसा करके, क्या वे परमेश्वर को सीमित नहीं करेंगे?

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के कार्य का दर्शन (3)

239. यदि मनुष्य अब भी अंत के दिनों के दौरान उद्धारकर्ता यीशु के आगमन की अभिलाषा करता है, और उसके अब भी उसी छवि में आने की अपेक्षा करता है जो उसने यहूदिया में अपनाई थी, तो छह हज़ार सालों की संपूर्ण प्रबंधन योजना छुटकारे के युग में रुक गई होती, और आगे प्रगति न कर पाती। इतना ही नहीं, अंत के दिनों का आगमन कभी न होता, और युग का समापन कभी न किया जाता। ऐसा इसलिए है, क्योंकि उद्धारकर्ता यीशु सिर्फ मानवजाति के छुटकारे और उद्धार के लिए है। “यीशु” नाम मैंने अनुग्रह के युग के सभी पापियों की खातिर अपनाया था, और यह वह नाम नहीं है जिसके द्वारा मैं पूरी मानवजाति को समापन पर ले जाऊँगा। यद्यपि यहोवा, यीशु और मसीहा सभी मेरे आत्मा का प्रतिनिधित्व करते हैं, किंतु ये नाम केवल मेरी प्रबंधन योजना के विभिन्न युगों के द्योतक हैं, और मेरी संपूर्णता में मेरा प्रतिनिधित्व नहीं करते। पृथ्वी पर लोग मुझे जिन नामों से पुकारते हैं, वे मेरे संपूर्ण स्वभाव और स्वरूप का पूर्ण वर्णन नहीं कर सकते। वे मात्र अलग-अलग नाम हैं, जिनके द्वारा मुझे विभिन्न युगों के दौरान पुकारा जाता है। और इसलिए, जब अंतिम युग—आखिरी युग—का आगमन होता है, तो मेरा नाम पुनः बदल जाएगा। मुझे यहोवा या यीशु नहीं कहा जाएगा, मसीहा तो कदापि नहीं—मुझे स्वयं सामर्थ्यवान और सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहा जाएगा, और इस नाम के तहत ही मैं समस्त युग का समापन करूँगा। एक समय मैं यहोवा के नाम से पुकारा जाता था, एक समय मुझे लोग मसीहा के रूप में भी जानते थे और एक समय लोग मुझे प्यार और सम्मान से उद्धारकर्ता यीशु भी कहते थे। आज मैं वह यहोवा या यीशु नहीं हूँ, जिसे लोग अतीत में जानते थे। बल्कि मैं वह परमेश्वर हूँ जो अंत के दिनों में वापस आया है, वह परमेश्वर जो युग का समापन करेगा; मैं स्वयं परमेश्वर हूँ, जो अपने संपूर्ण स्वभाव से भरा है और अधिकार, आदर और महिमा से भरा, पृथ्वी के छोर से उदित होता है। लोग कभी मेरे संपर्क में नहीं रहे हैं, उन्होंने मुझे कभी जाना नहीं है और वे मेरे स्वभाव से हमेशा अनभिज्ञ रहे हैं। संसार की रचना के समय से लेकर आज तक एक भी मनुष्य ने मुझे नहीं देखा है। यह वह परमेश्वर है जो अंत के दिनों के दौरान लोगों पर प्रकट होता है, किंतु उनके बीच छिपा हुआ है। वह सामर्थ्य से भरपूर और अधिकार से लबालब भरा हुआ, दहकते हुए सूर्य और धधकती हुई आग के समान, सच्चे और वास्तविक रूप में, लोगों के बीच निवास करता है। ऐसा एक भी व्यक्ति या चीज नहीं है जिसका मेरे वचनों द्वारा न्याय नहीं किया जाएगा, और ऐसा एक भी व्यक्ति या चीज नहीं है जिसे जलती आग के माध्यम से शुद्ध नहीं किया जाएगा। अंततः मेरे वचनों के कारण तमाम देश धन्य हो जाएँगे और मेरे वचनों के कारण टुकड़े-टुकड़े भी कर दिए जाएँगे। इस तरह अंत के दिनों में सभी लोग देखेंगे कि मैं ही वह उद्धारकर्ता हूँ जो वापस लौट आया है, और मैं ही वह सर्वशक्तिमान परमेश्वर हूँ जो समस्त मानवजाति को जीतता है। और सभी देखेंगे कि मैं एक बार मनुष्य के लिए पाप-बलि था, किंतु अंत के दिनों में मैं धधकते सूर्य की ज्वाला बन गया हूँ जो सभी चीजों को जला देती है, और साथ ही मैं धार्मिकता का सूर्य बन गया हूँ जो सभी चीजों को प्रकट कर देता है। यह मेरा अंत के दिनों का कार्य है। मैं इस नाम को अपनाता हूँ और यह स्वभाव धारण करता हूँ ताकि सभी लोग देख सकें कि मैं धार्मिक परमेश्वर हूँ, दहकता हुआ सूर्य हूँ और धधकती हुई ज्वाला हूँ, और ताकि सभी मेरी, एक सच्चे परमेश्वर की आराधना कर सकें, और ताकि वे मेरे असली चेहरे को देख सकें : मैं केवल इस्राएलियों का परमेश्वर नहीं हूँ, और मैं केवल छुटकारा दिलाने वाला नहीं हूँ; बल्कि मैं समस्त आकाश, पृथ्वी और महासागरों के सारे प्राणियों का परमेश्वर हूँ।

यदि अंत के दिनों के दौरान उद्धारकर्ता का आगमन होता और उसे तब भी यीशु कहकर पुकारा जाता, और उसने दोबारा यहूदिया में जन्म लिया होता और वहीं अपना काम किया होता, तो इससे यह प्रमाणित होता कि मैंने केवल इस्राएल के लोगों की ही रचना की थी और केवल इस्राएल के लोगों को ही छुटकारा दिलाया था, और अन्य जातियों से मेरा कोई वास्ता नहीं है। क्या यह मेरे इन वचनों का खंडन न करता कि “मैं वह प्रभु हूँ जिसने आकाश, पृथ्वी और सभी वस्तुओं को बनाया है?” मैंने यहूदिया को छोड़ दिया और अन्य जातियों के बीच कार्य करता हूँ, क्योंकि मैं मात्र इस्राएल के लोगों का ही परमेश्वर नहीं हूँ, बल्कि सभी सृजित प्राणियों का परमेश्वर हूँ। मैं अंत के दिनों के दौरान अन्य जातियों के बीच प्रकट होता हूँ, क्योंकि मैं केवल इस्राएल के लोगों का परमेश्वर यहोवा नहीं हूँ, बल्कि, इससे भी बढ़कर, अन्य-जाति राष्ट्रों में भी मेरे चुने हुए सभी लोगों का सृष्टिकर्ता मैं ही हूँ। मैंने न केवल इस्राएल, मिस्र और लेबनान की रचना की, बल्कि इस्राएल से बाहर के सभी अन्य जाति के राष्ट्रों की भी रचना की। इस कारण, मैं सभी सृजित प्राणियों का प्रभु हूँ। मैंने इस्राएल का मात्र अपने कार्य के आरंभिक बिंदु के रूप में इस्तेमाल किया था, मैंने यहूदिया और गलील को छुटकारे के अपने कार्य के महत्वपूर्ण केंद्रों के रूप में इस्तेमाल किया था, और अब मैं एक अन्य जाति राष्ट्र को ऐसे आधार के रूप में इस्तेमाल करता हूँ, जहाँ से मैं पूरे युग का समापन करूँगा। मैंने कार्य के दो चरण इस्राएल में पूरे किए थे (ये दो चरण हैं व्यवस्था का युग और अनुग्रह का युग), और मैं कार्य के आगे के दो चरण (अनुग्रह का युग और राज्य का युग) इस्राएल के बाहर तमाम देशों में करता आ रहा हूँ। अन्य जाति के राष्ट्रों के बीच मैं विजय का कार्य करूँगा और इस तरह युग का समापन करूँगा। यदि मनुष्य मुझे हमेशा यीशु मसीह कहता है, किंतु यह नहीं जानता कि मैंने अंत के दिनों के दौरान एक नए युग की शुरुआत कर दी है और एक नया कार्य प्रारंभ कर दिया है, और यदि मनुष्य हमेशा मूर्खतापूर्ण ढंग से उद्धारकर्ता यीशु के आगमन का इंतज़ार करता रहता है, तो मैं कहूँगा कि ऐसे लोग वे हैं जो मुझ पर विश्वास नहीं करते; वे वो लोग हैं जो मुझे नहीं जानते, जो विश्वासी होने का दिखावा करते हैं। क्या ऐसे लोग उद्धारकर्ता यीशु का स्वर्ग से आगमन देख सकते हैं? वे मेरे आगमन का इंतज़ार नहीं करते, बल्कि यहूदियों के राजा के आगमन का इंतज़ार करते हैं। वे मेरे द्वारा इस पुराने गंदे संसार के विनाश की लालसा नहीं करते, बल्कि इसके बजाय यीशु के द्वितीय आगमन की लालसा करते हैं, जिसके पश्चात् उन्हें छुटकारा दिया जाएगा—वे यीशु द्वारा एक बार फिर से पूरी मानवजाति को इस अशुद्ध और अधार्मिक भूमि से छुटकारा दिलाए जाने की प्रतीक्षा करते हैं। ऐसे लोग अंत के दिनों के दौरान मेरे कार्य को पूरा करने वाले कैसे बन सकते हैं? मनुष्य की कामनाएँ मेरी इच्छाएँ पूरी करने या मेरा कार्य पूरा करने में अक्षम हैं, क्योंकि मनुष्य केवल उस कार्य की प्रशंसा करता है और उस कार्य से प्यार करता है, जिसे मैंने पहले किया है, और उसे कोई अंदाजा नहीं है कि मैं स्वयं परमेश्वर हूँ जो हमेशा नया रहता है और कभी पुराना नहीं होता, और केवल इतना जानता है कि मैं यहोवा और यीशु हूँ, बगैर किसी आभास के कि मैं ही अंत के दिनों का वह परमेश्वर हूँ, जो मानवजाति का समापन करेगा। वह सब, जिसके लिए मनुष्य तरसता है और जो वह जानता है, उसकी अपनी धारणाओं से आता है, जो मात्र वह है जिसे वह अपनी आँखों से देख सकता है। वह उस कार्य के अनुरूप नहीं है, जो मैं करता हूँ, बल्कि उससे असंगत है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, उद्धारकर्ता पहले ही एक “सफेद बादल” पर सवार होकर वापस आ चुका है

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