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शुद्ध प्रेम बिना दोष के

I

प्रेम एक शुद्ध भावना है, शुद्ध बिना किसी भी दोष के।

अपने हृदय का प्रयोग करो, प्रेम के लिए,

अनुभूति के लिए और परवाह करने के लिए।

प्रेम नियत नहीं करता, शर्तें, बाधाएँ या दूरी।

अपने हृदय का प्रयोग करो, प्रेम के लिए,

अनुभूति के लिए और परवाह करने के लिए।

यदि तुम प्रेम करते हो, तो धोखा नहीं देते हो,

शिकायत नहीं करते, ना मुँह फेरते हो,

बदले में कुछ पाने की, चाह नहीं रखते हो।

यदि तुम प्रेम करते हो, तो बलिदान करोगे,

मुश्किलों को स्वीकार करोगे और परमेश्वर के साथ एक हो जाओगे,

परमेश्वर के साथ एक हो जाओगे।

प्रेम में दूरी नहीं है और अशुद्ध कुछ भी नहीं।

अपने हृदय का प्रयोग करो, प्रेम के लिए,

अनुभूति के लिए और परवाह करने के लिए।

II

तुम त्याग दोगे अपना यौवन, परिजन और भविष्य जो दिखायी देता,

त्याग दोगे अपना विवाह, परमेश्वर के लिए सब कुछ दे दोगे।

वरना तुम्हारा प्रेम, प्रेम नहीं है,

बल्कि धोखा है, परमेश्वर का विश्वासघात है।

प्रेम में नहीं है संदेह, चालाकी या धोखा।

अपने हृदय का प्रयोग करो, प्रेम के लिए,

अनुभूति के लिए और परवाह करने के लिए।

"वचन देह में प्रकट होता है" से

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केवल परमेश्वर के प्रबंधन के मध्य ही मनुष्य बचाया जा सकता है परमेश्वर सम्पूर्ण मानवजाति के भाग्य का नियन्ता है बुलाए हुए बहुत हैं, परन्तु चुने हुए कुछ ही हैं प्रश्न 26: बाइबल ईसाई धर्म का अधिनियम है और जो लोग प्रभु में विश्वास करते हैं, उन्होंने दो हजार वर्षों से बाइबल के अनुसार ऐसा विश्वास किया हैं। इसके अलावा, धार्मिक दुनिया में अधिकांश लोग मानते हैं कि बाइबल प्रभु का प्रतिनिधित्व करती है, कि प्रभु में विश्वास बाइबल में विश्वास है, और बाइबल में विश्वास प्रभु में विश्वास है, और यदि कोई बाइबल से भटक जाता है तो उसे विश्वासी नहीं कहा जा सकता। कृपया बताओ, क्या मैं पूछ सकता हूँ कि इस तरीके से प्रभु पर विश्वास करना प्रभु की इच्छा के अनुरूप है या नहीं?