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सफलता या असफलता उस पथ पर निर्भर होती है जिस पर मनुष्य चलता है

अधिकांश लोग अपनी भविष्य की मंज़िल के लिए, या अल्पकालिक आनन्द के लिए परमेश्वर में विश्वास करते हैं। ऐसे लोग जो किसी व्यवहार से होकर नहीं गुज़रे हैं, उनके लिए परमेश्वर में उनका विश्वास स्वर्ग में प्रवेश करने के लिए, एवं प्रतिफल अर्जित करने के लिए होता है। यह, सिद्ध किए जाने के लिए या परमेश्वर के किसी प्राणी के कर्तव्य को निभाने के लिए नहीं होता है। कहने का तात्पर्य है कि अधिकांश लोग अपनी ज़िम्मेदारियों को निभाने के लिए, या अपने कर्तव्य को पूरा करने के लिए परमेश्वर में विश्वास नहीं करते हैं। अर्थपूर्ण ज़िन्दगियों को जीने के लिए बिरले ही लोग परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, और न ही ऐसे लोग हैं जो विश्वास करते हैं कि चूँकि मनुष्य जीवित है, उसे परमेश्वर से प्रेम करना चाहिए क्योंकि ऐसा करना स्वर्ग की व्यवस्था है और पृथ्वी का सिद्धान्त है, और यह मनुष्य का स्वाभाविक उद्यम है। इस रीति से, यद्यपि विभिन्न लोग अपने स्वयं के लक्ष्यों का अनुसरण करते हैं, फिर भी इसके पीछे उनके अनुसरण एवं उनकी प्रेरणा का उद्देश्य सब एक जैसा है, और तो और, उनमें से अधिकांश लोगों के लिए उनकी आराधना के विषय लगभग एक समान हैं। पिछले कई हज़ार वर्षों से, बहुत से विश्वासी मर चुके हैं, और बहुत से लोग मर कर नया जन्म प्राप्त कर चुके हैं। ये बस एक या दो लोग ही नहीं हैं जो परमेश्वर की खोज करते हैं, न ही एक या दो हज़ार हैं, फिर भी इनमें से अधिकांश लोगों का अनुसरण उनकी स्वयं की संभावनाओं या भविष्य के लिए उनकी महिमामय आशाओं के खातिर होता है। ऐसे लोग जो मसीह के लिए समर्पित हैं वे बिरले हैं। अब भी अनेक भक्त विश्वासी अपने स्वयं के जालों में फंसकर मर चुके हैं, और, इसके अतिरिक्त, उन लोगों की संख्या जिन्होंने सफलता हासिल की है वह अत्यंत कम है। आज के दिन तक, लोग अपनी असफलता के कारण, या सफलता के रहस्य से, अनजान ही हैं। ऐसे लोग जो मसीह को खोजने की धुन में लगे हैं उन्होंने अभी भी त्वरित अन्तःदृष्टि के अपने पल को प्राप्त नहीं किया है, वे इन रहस्यों के तल तक नहीं पहुंच पाए हैं, क्योंकि वे तो कुछ जानते ही नहीं हैं। यद्यपि वे अपने अनुसरण में कष्टसाध्य प्रयास तो करते हैं, फिर भी जिस पथ पर वे चलते हैं वह असफलता का वो पथ है जिस पर उनके पूर्वज चले थे, और यह सफलता का पथ नहीं है। इस रीति से, चाहे वे जिस भी प्रकार से खोज करते हों, क्या वे अंधकार की ओर ले जाने वाले पथ पर नहीं चलते हैं? जो वे अर्जित करते हैं क्या वह कड़वा फल नहीं है? यह कह पाना काफी कठिन है कि ऐसे लोग जो उन लोगों का अनुकरण करते हैं जो बीते समयों में सफल हुए थे, वे अन्ततः सौभाग्य की ओर जाएंगे या आपदा की ओर। तो उन लोगों की सम्भावनाएं कितनी बदतर हैं जो असफल लोगों के पदचिन्हों के पीछे पीछे चलने के द्वारा खोज करते हैं? क्या उनकी असफलता पाने की सम्भावना और भी बड़ी नहीं है? वह पथ जिस पर वे चलते हैं, उसका क्या मूल्य है? क्या वे अपना समय बर्बाद नहीं कर रहे हैं? इस बात से परे कि लोग अपने अनुसरण में सफल होते हैं या असफल, ऐसा होने का, संक्षेप में, एक कारण है, और मामला यह नहीं है कि अपनी इच्छानुसार खोज करने के द्वारा उनकी सफलता या असफलता का निर्धारण किया जाता है।

परमेश्वर में किसी मनुष्य के विश्वास की अत्यंत मूलभूत आवश्यकता यह है कि उसके पास एक सच्चा हृदय हो, और वह स्वयं को पूरी तरह से समर्पित कर दे, एवं सचमुच में आज्ञा का पालन करे। जो चीज़ किसी मनुष्य के लिए सबसे अधिक कठिन है वह है, सच्चे विश्वास के बदले में अपना संपूर्ण जीवन प्रदान करना, जिसके माध्यम से वह सारा सत्य अर्जित कर सकता है, और परमेश्वर के एक जीवधारी के रूप में अपने कर्तव्य को निभा सकता है। इसे ही उन लोगों के द्वारा अर्जित नहीं किया जा सकता है जो असफल होते हैं, और उनके द्वारा इसे अर्जित करना और भी ज़्यादा कठिन है जो मसीह को नहीं ढूंढ सकते हैं। क्योंकि मनुष्य परमेश्वर के प्रति स्वयं को पूरी रीति से समर्पित करने में अच्छा नहीं है; क्योंकि मनुष्य सृष्टिकर्ता के प्रति अपने कर्तव्य को निभाने के लिए तैयार नहीं है, क्योंकि मनुष्य ने सत्य को देखा तो है किन्तु उसे नज़रंदाज़ करता है और अपने स्वयं के पथ पर चलता है, क्योंकि मनुष्य हमेशा उन लोगों के पथ का अनुसरण करने की कोशिश करता है जो असफल हो चुके हैं, क्योंकि मनुष्य हमेशा स्वर्ग की अवहेलना करता है, इस प्रकार, मनुष्य हमेशा असफल हो जाता है, उसे हमेशा शैतान के छल द्वारा ठग लिया जाता है, और वह स्वयं के जाल में फंस जाता है। क्योंकि मनुष्य मसीह को नहीं जानता है, क्योंकि मनुष्य सत्य को समझने एवं अनुभव करने में निपुण नहीं है, क्योंकि मनुष्य पौलुस का अति आराधक है और स्वर्ग का अत्यंत लोभी है, क्योंकि मनुष्य हमेशा मांग करता है कि मसीह उसकी आज्ञा माने और परमेश्वर को आदेश देता रहता है, इस प्रकार ऐसे बड़े शख्स और ऐसे लोग जिन्होंने संसार के उतार-चढ़ाव का अनुभव किया है वे अभी भी नश्वर हैं, और परमेश्वर की ताड़ना के मध्य अब भी मरते हैं। ऐसे लोगों के विषय में मैं केवल इतना कह सकता हूँ कि वे एक दुखद मौत मरते है, और उनका परिणाम—उनकी मृत्यु—औचित्य के बगैर नहीं होती है। क्या उनकी असफलता स्वर्ग की व्यवस्था के लिए कहीं अधिक असहनीय नहीं होती है? सत्य मानव के संसार से आता है, फिर भी वह सत्य जो मनुष्य के मध्य है उसे मसीह के द्वारा पहुंचाया गया है। इसका उद्गम मसीह से होता है, अर्थात्, स्वयं परमेश्वर से, और इसे मनुष्य के द्वारा अर्जित नहीं किया जा सकता है। फिर भी मसीह सिर्फ सत्य ही प्रदान करता है; वह यह निर्णय लेने के लिए नहीं आता है कि मनुष्य सत्य के अपने अनुसरण में सफल होगा या नहीं। इसका अर्थ है कि वास्तव में सत्य में सफलता या असफलता मनुष्य के अनुसरण पर निर्भर करती है। उस सत्य में मनुष्य की सफलता या असफलता का मसीह के साथ कभी कोई वास्ता नहीं होता है, बल्कि इसके बजाय निश्चय ही इसका निर्धारण उसके अनुसरण के द्वारा होता है। मनुष्य की मंज़िल एवं उसकी सफलता या असफलता को परमेश्वर के सिर पर नहीं मढ़ा जा सकता, ताकि स्वयं परमेश्वर से ही इसका बोझ उठवाया जाए, क्योंकि यह स्वयं परमेश्वर का मामला नहीं है, बल्कि यह सीधे तौर पर उस कर्तव्य से सम्बन्धित है जिसे परमेश्वर के जीवधारियों को निभाना चाहिए। अधिकांश लोगों के पास पौलुस एवं पतरस की खोज एवं नियति का थोड़ा सा ज्ञान ज़रूर होता है, फिर भी लोग पतरस एवं पौलुस के परिणाम से ज़्यादा और कुछ नहीं जानते हैं, और वे पतरस की सफलता के पीछे के रहस्य से, और उन कमियों से अनजान हैं जिसके परिणामस्वरूप पौलुस असफल हुआ। और इस प्रकार, यदि तुम लोग उनके अनुसरण के सार के आर-पार देखने में पूरी तरह से असमर्थ हो, तो तुम लोगों में से अधिकांश का अनुसरण अभी भी असफल होगा, और यदि तुम लोगों में से कुछ ही लोग सफल होंगे, तब भी वे पतरस के बराबर नहीं होंगे। यदि तेरे अनुसरण का पथ सही पथ है, तो तेरे पास सफलता की आशा है; यदि जिस पथ पर तूने सत्य का अनुसरण करते हुए कदम रखा है वह ग़लत पथ है, तो तू सर्वदा के लिए सफलता के अयोग्य होगा, और तू भी पौलुस के समान उसी अन्त को प्राप्त करेगा।

पतरस ऐसा मनुष्य था जिसे सिद्ध किया गया था। केवल न्याय एवं ताड़ना का अनुभव करने, और इस प्रकार परमेश्वर के शुद्ध प्रेम को प्राप्त करने के बाद ही, उसे पूर्ण रूप से सिद्ध बनाया गया था; वह पथ जिस पर वह चलता था वह सिद्ध किए जाने का पथ था। कहने का तात्पर्य है कि, बिलकुल शुरूआत से ही, वह पथ जिस पर पतरस चलता था वह सही पथ था, और परमेश्वर में विश्वास करने की उसकी प्रेरणा सही थी, और इसलिए वह ऐसा इंसान बन गया जिसे सिद्ध बनाया गया था और उसने एक नए पथ पर कदम रखा जिस पर मनुष्य पहले कभी नहीं चला था। जबकि वह पथ जिस पर पौलुस शुरुआत के समय से ही चला था वह मसीह के विरोध का पथ था, और सिर्फ इसलिए क्योंकि पवित्र आत्मा उसका उपयोग करना चाहता था, और अपने कार्य के लिए उसके सभी वरदानों एवं उसके सभी गुणों का लाभ उठाना चाहता था, किउसने कई दशकों तक मसीह के लिए कार्य किया। वह महज ऐसा व्यक्ति था जिसे पवित्र आत्मा के द्वारा उपयोग किया गया था, और उसे इसलिए उपयोग नहीं किया गया था क्योंकि यीशु ने कृपापूर्वक उसकी मानवता पर दृष्टि डाली थी, किन्तु उसके वरदानों के कारण उसका उपयोग किया था। वह प्रभु के लिए कार्य करने में समर्थ था क्योंकि उसे नीचे गिराया गया था, इसलिए नहीं क्योंकि वह ऐसा करने में प्रसन्न था। वह पवित्र आत्मा के प्रबोधन एवं मार्गदर्शन के कारण ऐसा कार्य करने में समर्थ था, और जो कार्य उसने किया था वह किसी भी मायने में उसके अनुसरण, या उसकी मानवता को नहीं दर्शाता है। पौलुस का कार्य एक सेवक के कार्य को दर्शाता है, कहने का तात्पर्य है कि उसने एक प्रेरित का कार्य किया था। हालाँकि पतरस अलग था: उसने भी कुछ कार्य किये थे, ये पौलुस के कार्य के समान बड़ा नहीं थे लेकिन उसने अपने स्वयं के प्रवेश के अनुसरण के मध्य कार्य किया था, और उसका कार्य पौलुस के कार्य से भिन्न था। पतरस का कार्य परमेश्वर के एक प्राणी के कर्तव्य का निर्वहन था। उसने प्रेरित के किरदार में कार्य नहीं किया था, परन्तु परमेश्वर के प्रेम के उसके अनुसरण के पथक्रम के दौरान कार्य किया था। पौलुस के कार्य के पथक्रम में भी उसका व्यक्तिगत अनुसरण शामिल थाः उसका अनुसरण, भविष्य के लिए उसकी आशाओं और एक अच्छी मंज़िल के लिए उसकी इच्छा, से बढ़कर और किसी चीज़ के लिए नहीं था। उसने अपने कार्य के दौरान शुद्धिकरण को स्वीकार नहीं किया था और न ही उसने काँट-छाँट एवं व्यवहार को स्वीकार किया था। उसका मानना था कि जब तक उसके कार्य परमेश्वर की इच्छा को संतुष्ट करते थे और उसने जो किया था वह परमेश्वर को प्रसन्न करता था, तब तक निश्चित रूप से एक पुरस्कार उसकी प्रतीक्षा कर रहा था। उसके कार्य में कोई व्यक्तिगत अनुभव नहीं थे—यह सब उसके स्वयं के लिए था, और उसे परिवर्तन के अनुसरण के मध्य सम्पन्न नहीं किया गया था। उसके कार्य में हर एक चीज़ एक सौदा थी, इसमें परमेश्वर के प्राणी का कोई भी कर्तव्य या समर्पण शामिल नहीं था। अपने कार्य के पथक्रम के दौरान, पौलुस के पुराने स्वभाव में कोई परिवर्तन नहीं हुआ था। उसका कार्य महज दूसरों की सेवा के लिए था, और उसके स्वभाव में बदलावों को लाने में असमर्थ था। पौलुस ने सिद्ध बनाए जाने या व्यवहार किए जाने के बगैर ही सीधे तौर पर अपने कार्य को सम्पन्न किया था, और उसे पुरस्कार के द्वारा प्रेरित किया गया था। पतरस अलग था: वह ऐसा व्यक्ति था जो काँट-छाँट और व्यवहार से होकर गुज़रा था, और शुद्धिकरण से होकर गुज़रा था। पतरस के कार्य का लक्ष्य एवं प्रेरणा मूलभूत रुप से पौलुस से अलग थी। हालाँकि पतरस ने बडी मात्रा में काम नहीं किया था, फिर भी उसका स्वभाव कई बदलावों से होकर गुज़रा था, और जिसकी उसने खोज की थी, वह सत्य एवं वास्तविक बदलाव था। उसके कार्य को सिर्फ काम के लिहाज से ही सम्पन्न नहीं किया गया था। यद्यपि पौलुस ने बहुत कार्य किया था, फिर भी वह सब पवित्र आत्मा का कार्य था, और हालाँकि पौलुस ने इस कार्य में सहयोग किया था, फिर भी उसने इसका अनुभव नहीं किया। पतरस ने बहुत कम कार्य केवल इसलिए किया क्योंकि पवित्र आत्मा ने उसके माध्यम से अधिक कार्य नहीं किया।

उनके कार्य की मात्रा यह निर्धारित नहीं करती थी कि उन्हें सिद्ध किया गया था या नहीं; एक का अनुसरण ईनामों को प्राप्त करने के लिए था, और दूसरे का परमेश्वर के चरम प्रेम को हासिल करने के लिए, और परमेश्वर के एक प्राणी के रूप में अपने कर्तव्य को निभाने के लिए था, इस हद तक कि वह परमेश्वर की इच्छा को पूरा करने के लिए एक सुन्दर छवि को जी सकता था। बाहरी रूप से वे अलग थे, और उनके सार भी अलग थे। इस आधार पर कि उन्होंने कितना अधिक कार्य किया था, तू यह निर्धारित नहीं कर सकता है कि उनमें से किसे सिद्ध बनाया गया था। पतरस ने ऐसे व्यक्ति की छवि को जीने का प्रयास किया जो परमेश्वर से प्रेम करता है, ऐसा व्यक्ति बनने का प्रयास किया जो परमेश्वर की आज्ञा मानता था, ऐसा व्यक्ति बनने का प्रयास किया जिसने व्यवहार एवं काँट-छाँट को स्वीकार किया था, और ऐसा व्यक्ति बनने का प्रयास किया जिसने परमेश्वर के एक जीवधारी के रूप में अपने कर्तव्य को निभाया था। वह परमेश्वर के प्रति स्वयं को समर्पित करने, स्वयं की सम्पूर्णता को परमेश्वर के हाथों में रखने, और मृत्युपर्यन्त आज्ञा मानने में सक्षम था। उसने ऐसा ही करने का दृढ़ निश्चय किया था, इसके अतिरिक्त, यह वह था जिसे उसने हासिल किया था। उसके अन्त का पौलुस से भिन्न होने का यह मूलभूत कारण है। वह कार्य जिसे पवित्र आत्मा ने पतरस में किया था वह उसे सिद्ध बनाने के लिए था, और वह कार्य जिसे पवित्र आत्मा ने पौलुस में किया था वह उसे उपयोग करने के लिए था। यह इसलिए था क्योंकि अनुसरण के प्रति उनके स्वभाव एवं उनके दृष्टिकोण एक समान नहीं थे। दोनों के पास पवित्र आत्मा का कार्य था। पतरस ने इस कार्य को स्वयं पर लागू किया था, और साथ ही इसे दूसरों को भी प्रदान किया था; जबकि पौलुस ने केवल पवित्र आत्मा के कार्य की सम्पूर्णता को दूसरों को प्रदान किया था, और स्वयं इससे कुछ भी अर्जित नहीं किया। इस रीति से, उसने इतने वर्षों तक पवित्र आत्मा के कार्य का अनुभव किया उसके पश्चात् भी, पौलुस में हुए बदलाव न के बराबर थे। वह अब भी लगभग अपनी स्वाभाविक दशा में ही था, और अब भी पहले का ही पौलुस था। केवल अनेक वर्षों के क्लेश को सहने के बाद, उसने काम कैसे करना है ये सीखा था और सहनशीलता सीखी थी, किन्तु उसका पुराना स्वभाव—उसका अत्यधिक प्रतिस्पर्धात्मक एवं खुदगर्ज़ स्वभाव—अभी भी बना हुआ था। इतने वर्षों तक कार्य करने के बाद भी, वह अपने भ्रष्ट स्वभाव को नहीं जान पाया था, न ही वह अपने पुराने स्वभाव से स्वयं को छुड़ा पाया था, और यह अभी भी उसके कार्य में स्पष्ट रूप से दिखाई देता था। उसमें महज कार्य का अधिक अनुभव था, लेकिन सिर्फ इतना थोड़ा सा अनुभव उसे बदलने में असमर्थ था, और उसके अनुसरण के अस्तित्व एवं महत्व के विषय में उसके दृष्टिकोण को पलट नहीं सकता था। हालाँकि उसने मसीह के लिए कई सालों तक कार्य किया था, और फिर कभी यीशु मसीह को सताया नहीं, फिर भी उसके हृदय में परमेश्वर के विषय में उसके ज्ञान में कोई परिवर्तन नहीं हुआ था। जिसका अर्थ यह है कि उसने स्वयं को परमेश्वर के प्रति समर्पित करने के लिए कार्य नहीं किया था, किन्तु इसके बजाय भविष्य की अपनी नियति के लिए कार्य करने हेतु बाध्य था। क्योंकि, शुरूआत में, उसने मसीह को सताया था, और मसीह के प्रति समर्पित नहीं हुआ था; वह स्वाभाविक रूप से एक विद्रोही था जो जानबूझकर मसीह का विरोध करता था, और ऐसा व्यक्ति था जिसके पास पवित्र आत्मा के कार्य का कोई ज्ञान नहीं था। अपने कार्य के समापन पर, वह अब भी पवित्र आत्मा के कार्य को नहीं जानता था, और पवित्र आत्मा की इच्छा पर जरा सा भी ध्यान न देते हुए मात्र अपने स्वभाव के अनुरूप अपनी इच्छानुसार काम करता था। और इस प्रकार उसका स्वभाव मसीह का बैरी था और उसने सत्य का पालन नहीं किया था। ऐसा कोई व्यक्ति, जिसे पवित्र आत्मा के कार्य के द्वारा छोड़ दिया गया था, जो पवित्र आत्मा के कार्य को नहीं जानता था, और जिसने मसीह का विरोध भी किया था—ऐसे व्यक्ति का उद्धार कैसे किया जा सकता था? मनुष्य का उद्धार किया जा सकता है या नहीं, यह इस बात पर निर्भर नहीं करता कि उसने कितना अधिक कार्य किया है, या वह कितना समर्पण करता है, बल्कि इसके बजाय इस बात से निर्धारित होता है कि वह पवित्र आत्मा के कार्य को जानता है या नहीं, वह सत्य को अमल में ला सकता है या नहीं, अनुसरण (निरन्तर खोज) के प्रति उसके दृष्टिकोण, सत्य की अनुरूपता में हैं या नहीं। हालाँकि जब पतरस ने यीशु के पीछे पीछे चलना शुरू किया उसके पश्चात् प्राकृतिक प्रकाशन घटित हुए थे, फिर भी बिलकुल शुरुआत से ही स्वभाव से वह ऐसा व्यक्ति था जो पवित्र आत्मा के प्रति समर्पित होने और मसीह को खोजने के लिए तैयार था। पवित्र आत्मा के प्रति उसकी आज्ञाकारिता शुद्ध थी: उसने प्रसिद्धि एवं सौभाग्य की खोज नहीं की, बल्कि इसके बजाय सत्य का पालन करने के द्वारा प्रेरित हुआ था। हालाँकि तीन बार पतरस ने यीशु को जानने से इन्कार किया था, और यद्यपि उसने प्रभु यीशु की परीक्षा ली थी, फिर भी ऐसी मामूली मानवीय कमज़ोरी का उसके स्वभाव से कोई सम्बन्ध नहीं था, और यह उसके भविष्य के अनुसरण को प्रभावित नहीं करती थी, और यह भलीभांति यह साबित नहीं कर सकता है कि उसकी परीक्षा एक मसीह-विरोधी का कार्य था। सामान्य मानवीय कमज़ोरी ऐसी चीज़ है जिसे संसार के सभी लोगों के द्वारा साझा किया जाता है—क्या तू पतरस से अपेक्षा करता है कि वह कुछ अलग हो? क्या लोग पतरस के बारे में कुछ विशेष दृष्टिकोण इसलिए नहीं रखते हैं क्योंकि उसने अनेक मूर्खतापूर्ण ग़लतियां की थीं? और क्या लोग पौलुस द्वारा किये गये समस्त कार्य के कारण, और उसके द्वारा लिखी गयी उन सभी पत्रियों के कारण उसकी अत्यंत प्रशंसा नहीं करते हैं? मनुष्य किसी व्यक्ति के सार के आर-पार देखने में सक्षम कैसे हो सकता है? निश्चित रूप से ऐसे लोग जिनके पास सचमुच में समझ है, वे किसी ऐसी महत्वहीन चीज़ को देख सकते हैं?

हालाँकि पतरस के दर्दनाक अनुभवों के कई वर्षों को बाइबिल में दर्ज नहीं किया गया है, फिर भी इससे यह साबित नहीं होता है कि पतरस के पास वास्तविक अनुभव नहीं थे, या उसे सिद्ध नहीं किया गया था। परमेश्वर के कार्य को मनुष्य के द्वारा पूर्ण रूप से कैसे समझा जा सकता है? बाइबिल के अभिलेखों को यीशु के द्वारा व्यक्तिगत रूप से चयनित नहीं किया गया था, बल्कि बाद की पीढ़ियों के द्वारा संकलित किया गया था। इस रीति से, क्या वह सब जिसे बाइबिल में दर्ज किया गया था उन्हें मनुष्य के विचारों के अनुसार चुना नहीं गया था? इसके अतिरिक्त, पतरस एवं पौलुस के अन्त का पत्रियों में खुले तौर पर वर्णन नहीं किया गया है, अतः मनुष्य अपने स्वयं के पूर्वाग्रहों के अनुसार एवं अपनी स्वयं की प्राथमिकताओं के अनुसार पतरस और पौलुस को आंकता है। चूँकि पौलुस ने इतना अधिक कार्य किया था, चूँकि उसके "योगदान" इतने बड़े थे, इसलिए उसने जनसमुदाय के भरोसे को जीत लिया। क्या मनुष्य सिर्फ ऊपरी चीजों पर ही अपना ध्यान केन्द्रित नहीं करता है? मनुष्य किसी व्यक्ति के सार के आर-पार देखने में सक्षम कैसे हो सकता है? कहने कोई आवश्यकता नहीं है कि, चूँकि हज़ारों सालों से पौलुस आराधना का एक विषय रहा है, कौन उसके कार्यों को उतावला होकर इन्कार करने की हिम्मत करेगा? पतरस मात्र एक मछुआरा था, तो उसका योगदान पौलुस के समान महान कैसे हो सकता था? योगदान के आधार पर, पौलुस को पतरस से पहले पुरस्कृत किया जाना चाहिए था, और उसे ऐसा व्यक्ति होना चाहिए था जो परमेश्वर की स्वीकृति को प्राप्त करने के लिए बेहतर योग्यता रखता हो। कौन यह कल्पना कर सकता था कि, पौलुस के प्रति अपने बर्ताव में, परमेश्वर उससे महज उसके वरदानों के जरिए कार्य कराता था, जबकि परमेश्वर ने पतरस को सिद्ध बना दिया। किसी भी हाल में मामला यह नहीं है कि बिलकुल शुरुआत से ही प्रभु यीशु ने पतरस एवं पौलुस के लिए योजनाएं बनायी थीं: इसके बजाय उन्हें उनके अंतर्निहित स्वभाव के अनुसार सिद्ध बनाया गया था या कार्य में लगाया गया था। और इस प्रकार, जो कुछ लोग देखते हैं वे सिर्फ मनुष्य के बाह्य योगदान हैं, जबकि परमेश्वर मनुष्य के सार को देखता है, साथ ही साथ उस पथ को देखता है जिसका अनुसरण मनुष्य शुरुआत से करता है, और उस प्रेरणा को जो मनुष्य के अनुसरण के पीछे होती है। लोग अपनी धारणाओं के अनुसार, और अपने स्वयं के पूर्वाग्रहों के अनुसार किसी मनुष्य को मापते हैं, फिर भी किसी मनुष्य के निर्णायक अन्त को, उसकी बाहरी चीज़ों के अनुसार निर्धारित नहीं किया जाता है। और इसलिए मैं कहता हूँ कि यदि वह पथ जिसे तू शुरुआत से लेता है, सफलता का पथ है और अनुसरण के प्रति तेरा दृष्टिकोण शुरुआत से ही सही है, तो तू पतरस के समान है; यदि वह पथ जिस पर तूने कदम रखा है, असफलता का पथ है, तो चाहे तू कोई भी कीमत चुकाए, तेरा अन्त पौलुस के समान ही होगा। मामला जो भी हो, तेरी मंज़िल, और तू सफल होगा या असफल, दोनों तुम लोगों के समर्पण और तुम्हारे द्वारा चुकायी गयी कीमत के बजाय, इससे निर्धारित होते हैं कि वह पथ जिसका तू अनुसरण करता है वह सही पथ है या नहीं। पतरस एवं पौलूस के सार और वे लक्ष्य जिनका उन्होंने अनुसरण किया, भिन्न थे; मनुष्य इन चीज़ों की खोज करने में असमर्थ है और केवल परमेश्वर ही इन्हें उनकी सम्पूर्णता में जान सकता है। क्योंकि जो कुछ परमेश्वर देखता है वह मनुष्य का सार है, जबकि मनुष्य अपने स्वयं के सार को बिल्कुल नहीं जानता है। मनुष्य, मनुष्य के भीतर के सार, या उसकी वास्तविक कद-काठी को देखने में असमर्थ है, और इस प्रकार वह पौलुस एवं पतरस की सफलता एवं विफलता के कारणों की पहचान करने में असमर्थ है। अधिकांश लोग पतरस के बजाय पौलुस की अत्यंत प्रशंसा इसलिए करते हैं क्योंकि पौलुस को सार्वजनिक कार्य के लिए उपयोग किया गया था, और मनुष्य ऐसे कार्य का एहसास कर सकते हैं, और इस प्रकार लोग पौलुस की "उपलब्धियों" को स्वीकार करते हैं। जबकि पतरस के अनुभव मनुष्य के लिए अदृश्य हैं, और जिसकी वह खोज करता था उसे मनुष्य के द्वारा अर्जित नहीं किया जा सकता है, और इस प्रकार मनुष्य को पतरस में कोई दिलचस्पी नहीं है।

पतरस को व्यवहार एवं शुद्धिकरण के माध्यम से सिद्ध किया गया था। उसने कहा था, "मुझे हर समय परमेश्वर की इच्छा को संतुष्ट करना होगा। वह सब जो मैं करता हूँ उसमें मैं केवल परमेश्वर की इच्छा को संतुष्ट करने का प्रयास करता हूँ, और चाहे मुझे ताड़ना मिले, या मेरा न्याय किया जाए, मैं फिर भी ऐसा करके प्रसन्न हूँ।" पतरस ने अपना सब कुछ परमेश्वर को दे दिया एवं उसका काम, उसके वचन, और सम्पूर्ण जीवन परमेश्वर के प्रेम के खातिर थे। वह ऐसा व्यक्ति था जो पवित्रता की खोज करता था और जितना अधिक उसने अनुभव किया, उसके हृदय की गहराई के भीतर परमेश्वर के लिए उसका प्रेम उतना ही बड़ा होता गया। जबकि पौलुस ने सिर्फ बाहरी कार्य किया था और यद्यपि उसने भी कड़ी मेहनत की थी, फिर भी उसका परिश्रम, उसके कार्य को उचित रीति से करने के लिए और ऐसा करते हुए एक पुरस्कार पाने के लिए था। अगर वह जानता कि उसे कोई पुरस्कार नहीं मिलेगा, तो उसने अपने काम को छोड़ दिया होता। जिस चीज़ की पतरस परवाह करता था वह उसके हृदय के भीतर का सच्चा प्रेम था, और उस चीज़ की परवाह करता था जो व्यावहारिक था और जिसे हासिल किया जा सकता था। उसने इस बात की परवाह नहीं की कि उसे पुरस्कार मिलेगा या नहीं, किन्तु इसकी परवाह की कि उसके स्वभाव को बदला जा सकता है या नहीं। पौलुस ने हमेशा और कड़ी मेहनत करने के विषय में परवाह की थी, उसने बाहरी कार्य एवं समर्पण, और उन सिद्धान्तों के विषय में परवाह की थी जिन्हें साधारण लोगों के द्वारा अनुभव नहीं किया गया था। वह अपने भीतर की गहराई में बदलावों और परमेश्वर के सच्चे प्रेम की परवाह नहीं करता था। पतरस के अनुभव परमेश्वर के सच्चे प्रेम एवं सच्चे ज्ञान को हासिल करने के लिए थे। उसके अनुभव परमेश्वर से एक करीबी सम्बन्ध को पाने के लिए थे, और एक व्यावहारिक जीवन को जीने के लिए थे। पौलुस का कार्य यीशु के द्वारा सौंपे गए कार्य के कारण था, और उन चीज़ों को प्राप्त करने के लिए था जिनकी वह लालसा करता था, फिर भी ये चीज़ें उसके स्वयं के एवं परमेश्वर के विषय में उसके ज्ञान से सम्बन्धित नहीं थीं। उसका कार्य मात्र ताड़ना एवं न्याय से बचने के लिए था। जिस चीज़ की पतरस खोज करता था वह शुद्ध प्रेम था, और जिस चीज़ की पौलुस खोज करता था वह धार्मिकता का मुकुट था। पतरस ने पवित्र आत्मा के कार्य के कई वर्षों का अनुभव किया था, और उसके पास मसीह का एक व्यावहारिक ज्ञान, साथ ही साथ स्वयं का गंभीर ज्ञान भी था। और इस प्रकार, परमेश्वर के प्रति उसका प्रेम शुद्ध था। कई वर्षों के शुद्धिकरण ने यीशु एवं जीवन के विषय में उसके ज्ञान को उन्नत किया था, और उसका प्रेम शर्तरहित प्रेम था, और यह स्वतः ही उमड़ने वाला प्रेम था और वह बदले में कुछ नहीं मांगता था, न ही उसने किसी लाभ की आशा की थी। पौलुस ने कई वर्षों तक काम किया, फिर भी उसने मसीह के महान ज्ञान को धारण नहीं किया, और स्वयं के विषय में उसका ज्ञान भी दयनीय रूप से थोड़ा ही था। उसके पास मसीह के लिए कोई प्रेम ही नहीं था, और उसका कार्य और वह पथक्रम जिस पर वह चलता था, वह अंतिम कीर्ति पाने के लिए था। जिस चीज़ की वह खोज करता था वह अति उत्तम मुकुट था, विशुद्ध प्रेम नहीं। वह सक्रिय रूप से नहीं, परन्तु निष्क्रिय रूप से खोज करता था; वह अपने कर्तव्य को नहीं निभा रहा था, परन्तु पवित्र आत्मा के कार्य द्वारा कब्ज़ा किए जाने के पश्चात् उसे अपने अनुसरण में बाध्य होना पड़ा। और इस प्रकार, उसका अनुसरण यह साबित नहीं करता है कि वह परमेश्वर का एक योग्य प्राणी था; वह पतरस था जो परमेश्वर का एक योग्य प्राणी था जिसने अपने कर्तव्य को निभाया था। मनुष्य सोचता है कि वे सभी जो परमेश्वर के प्रति कोई योगदान देते हैं उन्हें पुरस्कार मिलना चाहिए और योगदान जितना अधिक होगा, उतना ही अधिक यह मान लिया जाता है कि उन्हें परमेश्वर का अनुग्रह प्राप्त होना चाहिए। मनुष्य के दृष्टिकोण का सार लेनदेन संबंधी है, और वह परमेश्वर के एक प्राणी के रूप में सक्रियता से अपने दायित्व के निर्वहन का प्रयास नहीं करता है। परमेश्वर के लिए, जितना अधिक लोग परमेश्वर के सच्चे प्रेम और परमेश्वर के प्रति सम्पूर्ण आज्ञाकारिता की खोज करते हैं, जिसका अर्थ परमेश्वर के एक प्राणी के रूप में अपने कर्तव्य को निभाना भी है, उतना ही अधिक वे परमेश्वर की स्वीकृति को पाने के योग्य होते हैं। परमेश्वर का दृष्टिकोण यह मांग करता है कि मनुष्य अपने मूल कर्तव्य एवं हैसियत को पुनः प्राप्त करे। मनुष्य परमेश्वर का एक प्राणी है और इस प्रकार परमेश्वर से कोई मांग करने के द्वारा मनुष्य को अपनी हद पार नहीं करनी चाहिए, और परमेश्वर के एक प्राणी के रूप में अपने कर्तव्य को निभाने से अधिक और कुछ नहीं करना चाहिए। पतरस एवं पौलुस, परमेश्वर के प्राणियों के रूप में अपने कर्तव्य को निभा सकते थे या नहीं इसके अनुसार उनकी नियति को मापा गया था, उनके योगदान के आकार के अनुसार नहीं; जो कुछ उन्होंने शुरुआत से खोजा था उसके अनुसार उनकी नियति को निर्धारित किया गया था, इसके अनुसार नहीं कि उन्होंने कितना अधिक कार्य किया था, या उनके विषय में अन्य लोगों का आंकलन क्या था। और इस प्रकार, परमेश्वर के एक प्राणी के रुप में अपने कर्तव्य को सक्रिय रूप से निभाना ही सफलता का पथ है; परमेश्वर के सच्चे प्रेम के पथ को खोजना ही सबसे सही पथ है; अपने पुराने स्वभाव में बदलावों, और परमेश्वर के शुद्ध प्रेम की खोज करना ही सफलता का पथ है। सफलता के लिए ऐसा पथ ही मूल कर्तव्य की पुनः प्राप्ति का पथ है साथ ही साथ परमेश्वर के किसी प्राणी का मूल रूप भी है। यह पुनः प्राप्ति का पथ है, और साथ ही यह शुरूआत से लेकर समाप्ति तक परमेश्वर के समस्त कार्य का लक्ष्य भी है। यदि मनुष्य का अनुसरण (खोज) व्यक्तिगत फिज़ूल मांगों एवं तर्कहीन लालसाओं से कलंकित हो जाता है, तो वह प्रभाव जिसे हासिल किया जाता है वह मनुष्य के स्वभाव में हुए परिवर्तन नहीं होंगे। यह पुनः प्राप्ति के कार्य से विपरीत है। यह निःसन्देह पवित्र आत्मा के द्वारा किया गया कार्य नहीं है, और इस प्रकार यह साबित करता है कि ऐसे अनुसरण को परमेश्वर के द्वारा स्वीकृति नहीं दी जाती है। ऐसे अनुसरण का क्या महत्व है जिसे परमेश्वर के द्वारा स्वीकृति नहीं दी जाती है?

पौलुस के द्वारा किए गए कार्य को मनुष्य के सामने प्रदर्शित किया गया था, किन्तु परमेश्वर के लिए उसका प्रेम कितना शुद्ध था, उसके हृदय की गहराई में परमेश्वर के लिए उसका प्रेम कितना था—इन्हें मनुष्य के द्वारा देखा नहीं जा सकता है। मनुष्य केवल उस कार्य को देख सकता है जिसे उसने किया था, जिससे मनुष्य जान जाता है कि उसे निश्चित रूप से पवित्र आत्मा के द्वारा उपयोग किया गया था, और इस प्रकार मनुष्य सोचता है कि पौलुस पतरस की अपेक्षा बेहतर था, कि उसका कार्य अधिक बड़ा था, क्योंकि वह कलीसियाओं की आपूर्ति करने में सक्षम था। पतरस ने केवल अपने व्यक्तिगत अनुभवों को ही चाहा था और अपने कभी कभार के कार्य के दौरान सिर्फ थोड़े से ही लोगों को अर्जित किया था। उसकी ओर से सिर्फ थोड़ी सी ही ज्ञात पत्रियां हैं, किन्तु कौन जानता है कि उसके हृदय की गहराई में परमेश्वर के लिए उसका प्रेम कितना गहरा था? पौलुस हर वक्त परमेश्वर के लिए काम करता था: जब तक करने के लिए काम था, उसने उसे किया। उसने सोचा कि इस रीति से वह मुकुट को पाने में सक्षम होगा, और परमेश्वर को संतुष्ट कर पायेगा, फिर भी उसने अपने कार्य के माध्यम से स्वयं को बदलने के तरीकों की खोज नहीं की। पतरस के जीवन की जो भी चीज़ परमेश्वर की इच्छा को संतुष्ट नहीं करती थी वह उसे बेचैन कर देती थी। यदि वह परमेश्वर की इच्छा को संतुष्ट नहीं करता था, तो उसे ग्लानि महसूस होती थी, और वह उपयुक्त तरीके की खोज करता जिसके द्वारा वह परमेश्वर के हृदय को संतुष्ट करने के लिए कठिन परिश्रम कर सकता था। यहाँ तक कि अपने जीवन की छोटे से छोटे और अत्यंत महत्वहीन पहलुओं में भी, वह स्वयं से परमेश्वर की इच्छा को संतुष्ट करने की अपेक्षा करता था। अपने पुराने स्वभाव के विषय में भी वह कुछ कम की मांग नहीं करता था, सत्य की गहराई में आगे बढ़ने के लिए स्वयं से अपनी अपेक्षाओं में वह हमेशा से कठोर था। पौलुस केवल ऊपरी प्रतिष्ठा एवं रुतबे की खोज करता था। वह मनुष्य के सामने स्वयं का दिखावा करने की कोशिश करता था, और उसने जीवन प्रवेश में किसी तरह की गहन प्रगति की कोशिश नहीं की। जिसकी वह परवाह करता था वह सिद्धान्त था, वास्तविकता नहीं। कुछ लोग कहते हैं, "पौलुस ने परमेश्वर के लिए इतना अधिक कार्य किया था, तो परमेश्वर के द्वारा उसका स्मरणोत्सव क्यों नहीं मनाया गया? पतरस ने परमेश्वर के लिए सिर्फ थोड़ा सा ही काम किया, और कलीसिया के लिए कोई बड़ा योगदान नहीं दिया, तो उसे क्यों सिद्ध बनाया गया?" पतरस उस हद तक परमेश्वर से प्रेम करता था, जिसकी अपेक्षा परमेश्वर के द्वारा की गई थी; केवल ऐसे लोगों के पास ही गवाही होती है। और पौलुस के विषय में क्या? पौलुस किस हद तक परमेश्वर से प्रेम करता था, क्या तू जानता है? पौलुस का काम किसके लिए था? और पतरस का काम किसके लिए था? पतरस ने अधिक कार्य नहीं किया था, लेकिन क्या तू जानता है कि उसके हृदय की गहराई में क्या था? पौलुस का कार्य कलीसियाओं के प्रयोजन, एवं कलीसियाओं की सहायता से सम्बन्धित था। जो कुछ पतरस ने अनुभव किया था वे उसके जीवन स्वभाव में हुए परिवर्तन थे; उसने परमेश्वर के प्रेम का अनुभव किया था। अब जबकि तू उनके सार के अन्तर को जानता है, तो तू देख सकता है कि कौन, अन्ततः, सचमुच में परमेश्वर पर विश्वास करता था, और कौन वाकई में परमेश्वर पर विश्वास नहीं करता था। उनमें से एक सच्चाई से परमेश्वर से प्रेम करता था, और दूसरा सच्चाई से परमेश्वर से प्रेम नहीं करता था; एक अपने स्वभाव में परिवर्तनों से होकर गुज़रा था, और दूसरा नहीं; एक ने विनम्रतापूर्वक सेवा की थी, और लोगों का उस पर आसानी से ध्यान नहीं जाता था; और दूसरे की लोगों ने अत्यंत प्रशंसा की थी, और वह बड़े शख्सियत का था; एक पवित्रता की खोज करता था, और दूसरा नहीं, और वैसे तो वह अशुद्ध नहीं था, फिर भी वह शुद्ध प्रेम को धारण किए हुए नहीं था; एक सच्ची मानवता को धारण किए हुए था, और दूसरा नहीं; एक परमेश्वर के एक प्राणी के एहसास को धारण किए हुए था, और दूसरा नहीं। पतरस एवं पौलुस के सार में भिन्नताएं इस प्रकार की हैं। वह पथ जिस पर पतरस चला था वह सफलता का पथ था, जो सामान्य मानवता की पुनः प्राप्ति एवं परमेश्वर के प्राणी के कर्तव्य को हासिल करने का भी पथ है। पतरस उन सभी का प्रतिनिधित्व करता है जो सफल हैं। वह पथ जिस पर पौलुस चला, वह असफलता का पथ है और पौलुस उन सभी लोगों का प्रतिनिधित्व करता है जो ऊपरी तौर पर स्वयं को समर्पित एवं खर्च करते हैं, और विशुद्ध रूप से परमेश्वर से प्रेम नहीं करते हैं। पौलुस उन सभी लोगों का प्रतिनिधित्व करता है जो सत्य धारण नहीं करते हैं। परमेश्वर पर अपने विश्वास में, पतरस ने हर एक बात में परमेश्वर को संतुष्ट करने का प्रयास किया था और उन सब में जो परमेश्वर से आया था, उसमें उसने आज्ञा मानने का प्रयास किया। बिना ज़रा सी भी शिकायत के, वह ताड़ना एवं न्याय, साथ ही साथ शुद्धिकरण, क्लेश एवं अपने जीवन में मौजूद कमी को स्वीकार कर सकता था, उसमें से कुछ भी परमेश्वर के प्रति उसके प्रेम को पलट नहीं सकता था। क्या यह परमेश्वर का चरम प्रेम नहीं है? क्या यह परमेश्वर के एक प्राणी के कर्तव्य की परिपूर्णता नहीं है? चाहे ताड़ना हो, न्याय हो, या क्लेश—तू मृत्यु तक आज्ञाकारिता हासिल करने में सदैव सक्षम हो, यह वह चीज़ है जिसे परमेश्वर के एक प्राणी के द्वारा हासिल किया जाना चाहिए, यह परमेश्वर के प्रेम की शुद्धता है। यदि मनुष्य इतना कुछ हासिल कर सकता है, तो वह परमेश्वर का एक योग्य प्राणी है, तथा ऐसा और कुछ नहीं है जो सृष्टिकर्ता की इच्छा को बेहतर ढंग से संतुष्ट कर सकता है। कल्पना कर कि तू परमेश्वर के लिए काम कर सकता है, फिर भी तू परमेश्वर की आज्ञा नहीं मानता है, और सच्चाई से परमेश्वर से प्रेम करने में असमर्थ है। इस रीति से, तूने न केवल परमेश्वर के एक प्राणी के अपने कर्तव्य को नहीं निभाया होगा, बल्कि तू परमेश्वर के द्वारा निन्दित भी किया जाएगा, क्योंकि तू ऐसा व्यक्ति है जो सत्य धारण नहीं करता है, जो परमेश्वर की आज्ञा का पालन करने में असमर्थ है, और जो परमेश्वर के प्रति अनाज्ञाकारी है। तू केवल परमेश्वर के लिए कार्य करने के विषय में परवाह करता है, और सत्य को अभ्यास में लाने, या स्वयं को जानने की परवाह नहीं करता है। तू सृष्टिकर्ता को समझता एवं जानता नहीं है, और सृष्टिकर्ता से प्रेम या उसकी आज्ञा का पालन नहीं करता है। तू ऐसा व्यक्ति है जो स्वाभाविक रूप से परमेश्वर के प्रति अनाज्ञाकारी है, और इसलिए ऐसे लोग सृष्टिकर्ता के प्रिय नहीं है।

कुछ लोग कहते हैं, "पौलुस ने अत्यधिक मात्रा में काम किया था, और उसने कलीसियाओं के लिए बड़े बोझ को अपने कंधों पर उठाया था और उनके लिए इतना अधिक योगदान दिया था। पौलुस की तेरह पत्रियों ने दो हज़ार वर्षों के अनुग्रह के युग को बनाए रखा था, और उससे आगे केवल चारों सुसमाचार ही हैं। कौन उसके साथ तुलना कर सकता है? कोई भी यूहन्ना के प्रकाशितवाक्य के गूढ़ अर्थ को समझ नहीं सकता है, जबकि पौलुस की पत्रियां जीवन प्रदान करती हैं, और वह कार्य जो उसने किया था वह कलीसियाओं के हित के लिए था। और कौन ऐसी चीज़ों को हासिल कर सकता था? और पतरस ने क्या काम किया था?" जब मनुष्य अन्य लोगों को मापता है, तो यह उनके योगदान के अनुसार होता है। जब परमेश्वर मनुष्य को मापता है, तो यह मनुष्य के स्वभाव के अनुसार होता है। उन लोगों के मध्य जो जीवन की तलाश करते हैं, पौलुस ऐसा व्यक्ति था जो अपने स्वयं के सार को नहीं जानता था। वह किसी भी हाल में विनम्र और आज्ञाकारी नहीं था, न ही वह अपने सार से परिचित था, जो कि परमेश्वर के विरूद्ध था। और इस प्रकार, वह ऐसा व्यक्ति था जो विस्तृत अनुभवों से होकर नहीं गुज़रा था, और ऐसा व्यक्ति था जो सत्य को अभ्यास में नहीं लाता था। पतरस अलग था। वह परमेश्वर के एक जीव के रूप में अपनी अपूर्णताओं, कमज़ोरियों, एवं अपने भ्रष्ट स्वभाव को जानता था, और इस प्रकार उसके पास अभ्यास का एक मार्ग था जिसके माध्यम वह से अपने स्वभाव को बदल सके; वह उनमें से एक नहीं था जिसके पास केवल सिद्धान्त ही था किन्तु जो कोई वास्तविकता धारण नहीं करता था। ऐसे लोग जो परिवर्तित होते हैं वे नए लोग हैं जिन्हें बचाया गया है, वे ऐसे लोग हैं जो सत्य का अनुसरण करने के योग्य थे। ऐसे लोग जो नहीं बदलते हैं वे उनसे सम्बन्धित हैं जो स्वभाविक रूप से गुज़रे ज़माने की बेकार चीज़ें हैं; वे ऐसे लोग हैं जिन्हें बचाया नहीं गया है, अर्थात्, ऐसे लोग जिनसे परमेश्वर के द्वारा घृणा की गई है और जिन्हें ठुकरा दिया गया है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि उनका कार्य कितना बड़ा है; परमेश्वर के द्वारा उनका स्मरणोत्सव नहीं मनाया जाएगा। जब तू इसकी तुलना अपने स्वयं के अनुसरण से करता है, तो यह स्वतः ही प्रमाणित होना चाहिए कि तू अन्ततः पतरस के समान व्यक्ति है या पौलुस के समान। यदि जो कुछ तू खोजता है उसमें अभी भी कोई सत्य नहीं है, और यदि तू आज भी पौलुस के समान अभिमानी और गुस्ताख है, और अभी भी उसके समान चतुराई से बोलते हुए स्वयं की ख्याति को बढ़ाने वाला व्यक्ति है, तो तू बिना किसी सन्देह के एक पतित व्यक्ति है जो असफल होता है। यदि तू पतरस के समान कोशिश करता है, यदि तू अभ्यास एवं सच्चे बदलावों को खोजता है, और अभिमानी या हठी नहीं है, किन्तु अपने कर्तव्य को निभाने का प्रयास करता है, तो तू परमेश्वर का ऐसा प्राणी होगा जो विजय हासिल कर सकता है। पौलुस अपने स्वयं के सार एवं भ्रष्टता को नहीं जानता था, और वह अपने स्वयं की अनाज्ञाकारिता को तो बिलकुल भी नहीं जानता था। उसने कभी मसीह के विषय में अपनी निन्दनीय अवज्ञा का उल्लेख नहीं किया, न ही वह बहुत अधिक खेदपूर्ण था। उसने केवल एक संक्षिप्त व्याख्या प्रस्तुत की थी, और, अपने हृदय की गहराई में, वह परमेश्वर के प्रति पूर्ण रूप से समर्पित नहीं था। हालाँकि वह दमिश्क के मार्ग में गिर गया था, फिर भी उसने अपने भीतर गहराई से झांक कर नहीं देखा था। वह महज लगातार काम करके संतुष्ट था, और उसने अपने आप को जानने और अपने पुराने स्वभाव को बदलने को सबसे महत्वपूर्ण विषय नहीं माना था। वह महज सत्य बोल कर, एवं अपने स्वयं के विवेक का मरहम के रूप में उपयोग करते हुए दूसरों की आपूर्ति कर, और अपने बीते पापों के लिए स्वयं को सांत्वना देने और स्वयं को माफ करने के लिए यीशु के चेलों को और न सता कर संतुष्ट था। वह लक्ष्य जिसका उसने अनुसरण किया था वह भविष्य के मुकुट एवं क्षणिक कार्य से अधिक और कुछ नहीं था, वह लक्ष्य जिसका उसने अनुसरण किया था वह प्रचुर अनुग्रह था। उसने पर्याप्त सत्य की खोज नहीं की थी, न ही उसने यह कोशिश की कि उस सत्य की और अधिक गहराई में प्रवेश करे जिसे उसने पहले नहीं समझा था। और इस प्रकार स्वयं के विषय में उसके ज्ञान को झूठा कहा जा सकता है, और उसने ताड़ना एवं न्याय को स्वीकार नहीं किया था। वह कार्य करने में सक्षम था इसका अर्थ यह नहीं है कि उसने अपने खुद के स्वभाव या सार के ज्ञान को धारण किया था; उसका ध्यान केवल बाहरी अभ्यास पर था। इसके अतिरिक्त, जिसके लिए उसने कठिन परिश्रम किया था वह बदलाव नहीं, बल्कि ज्ञान था। उसका कार्य पूरी तरह से दमिश्क के मार्ग पर यीशु के प्रकटन का परिणाम था। यह कोई ऐसी चीज़ नहीं थी जिसे उसने मूल रूप से करने का दृढ़ निश्चय किया था, न ही यह ऐसा कार्य था जो उसके द्वारा अपने पुराने स्वभाव की काँट छाँट को स्वीकार करने के बाद हुआ था। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि उसने किस प्रकार कार्य किया था; उसका पुराना स्वभाव नहीं बदला था, और इस प्रकार उसके कार्य ने उसके अतीत के पापों का प्रायश्चित नहीं किया था परन्तु मात्र उस समय की कलीसियाओं के मध्य एक निश्चित भूमिका निभाई थी। ऐसे किसी व्यक्ति के लिए, जिसका पुराना स्वभाव नहीं बदला था—अर्थात, जिसने उद्धार प्राप्त नहीं किया था, तथा सत्य से और भी अधिक विहीन था—वह उन लोगों में से एक बनने में बिलकुल असमर्थ था जिन्हें प्रभु यीशु के द्वारा स्वीकार किया गया था। वह कोई ऐसा व्यक्ति नहीं था जो यीशु मसीह के लिए प्रेम एवं आदर से भरा हुआ था, न ही वह ऐसा व्यक्ति था जो सत्य की खोज करने में कुशल था, और वह ऐसा व्यक्ति तो बिलकुल भी नहीं था जो देहधारण के रहस्य की खोज करता था। वह महज ऐसा व्यक्ति था जो मिथ्या वाद-विवाद में कुशल था, और जो किसी ऐसे व्यक्ति के प्रति समर्पित नहीं होता था जो उससे अधिक ऊँचे होते थे या जो सत्य को धारण किए हुए थे। वह ऐसे लोगों या सत्यों से ईर्ष्या करता था जो उसके विपरीत थे, या उसके प्रति शत्रुतापूर्ण थे, वह उन प्रतिभावान लोगों को प्राथमिकता देता था जो शानदार छवि प्रस्तुत करते थे और गहन ज्ञान धारण करते थे। वह गरीब लोगों से बातचीत करना पसंद नहीं करता था जो सही राह की खोज करते थे तथा किसी और चीज़ की नहीं सिर्फ सत्य की परवाह करते थे, और इसके बजाय उसने धार्मिक संगठनों के वरिष्ठ सुप्रसिद्ध व्यक्तियों से सम्बन्ध रखा जो केवल सिद्धान्तों की ही बात करते थे, और जो प्रचुर ज्ञान धारण किए हुए थे। उसके पास पवित्र आत्मा के नए कार्य का कोई प्रेम नहीं था, और उसने पवित्र आत्मा के नए कार्य की गतिशीलता की परवाह नहीं की। इसके बजाय, उसने उन रीति विधियों एवं सिद्धान्तों की तरफदारी की थी जो सामान्य सत्य से कहीं ऊँचे थे। अपने सहज सार और अपनी खोज की सम्पूर्णता में, वह इस योग्य नहीं है कि उसे एक सत्य का अनुसरण करने वाला ईसाई कहा जाए, परमेश्वर के घराने में एक वफादार सेवक तो बिलकुल नहीं कहा जा सकता, क्योंकि उसका पाखंड बहुत अधिक था और उसकी अनाज्ञाकारिता बहुत ही बड़ी थी। हालाँकि वह प्रभु यीशु के एक सेवक के रूप में जाना जाता है, फिर भी वह स्वर्ग के राज्य के फाटक में प्रवेश करने लायक बिलकुल भी नहीं था, क्योंकि शुरूआत से लेकर अन्त तक उसके कार्य को धार्मिक नहीं कहा जा सकता है। उसे महज किसी ऐसे मनुष्य के रूप में देखा जा सकता है जो पांखडी था, जिसने अधर्म किया था और फिर भी जिसने मसीह के लिए कार्य किया था। हालाँकि उसे दुष्ट नहीं कहा जा सकता है, फिर भी उसे उचित रीति से ऐसा मनुष्य कहा जा सकता है जिसने अधर्म किया था। उसने काफी कार्य किया था, फिर भी उसे उसके द्वारा किये गये कार्य की मात्रा के आधार पर मापा नहीं जाना चाहिए, किन्तु केवल उसकी गुणवत्ता एवं सार के आधार पर मापा जाना चाहिए। केवल इसी रीति से इस मामले की तह तक पहुंचना संभव है। वह हमेशा मानता था: मैं कार्य करने में सक्षम हूँ, मैं अधिकांश लोगों से बेहतर हूँ; मैं प्रभु के बोझ के प्रति अन्य लोगों की अपेक्षा अधिक विचारशील हूँ, और जितनी गहराई से मैं पश्चाताप करता हूँ वैसे कोई नहीं करता है, क्योंकि मुझ पर बड़ी ज्योति चमकी थी, और मैंने बड़ी ज्योति देखी है, और इस प्रकार मेरा पश्चाताप किसी अन्य की अपेक्षा अधिक गहरा है। उस समय, उसने अपने हृदय में ऐसा ही सोचा था। अपने कार्य के अन्त में, पौलुस ने कहा: "मैं लड़ाई लड़ चुका हूँ, मैंने अपनी दौड़ पूरी कर ली है, और मेरे लिए धर्म का मुकुट रखा हुआ है।" उसकी लड़ाई, कार्य और पथक्रम पूरी तरह से धार्मिकता के मुकुट के लिए था, और वह सक्रिय रूप से आगे नहीं बढ़ा था; हालाँकि वह अपने कार्य में लापरवाह नहीं था, फिर भी यह कहा जा सकता है कि उसका कार्य महज उसकी ग़लतियों की भरपाई करने के लिए, और स्वयं के विवेक के आरोपों की भरपाई करने के लिए था। वह केवल जितनी जल्दी हो सके उतनी जल्दी अपने कार्य को पूरा करने, अपनी दौड़ को समाप्त करने, और अपनी लड़ाई को लड़ लेने की आशा करता था, ताकि वह बहुत जल्द ही अपने बहुप्रतीक्षित धार्मिकता के मुकुट को प्राप्त कर सके। जिस चीज़ की वह लालसा करता था वह अपने अनुभवों एवं सच्चे ज्ञान के साथ प्रभु यीशु से मुलाकात करना नहीं, बल्कि जितनी जल्दी हो सके उतनी जल्दी अपने कार्य को समाप्त करना था, जिससे वह प्रभु यीशु से मिलने पर उन पुरस्कारों को प्राप्त कर सके जिन्हें उसके कार्य ने उसके लिए अर्जित किया था। उसने स्वयं को राहत देने के लिए, एवं भविष्य के मुकुट के बदले में एक सौदा करने के लिए अपने कार्य का उपयोग किया था। जिस चीज़ की उसने खोज की थी वह सत्य या परमेश्वर नहीं था, परन्तु केवल मुकुट ही था। ऐसा अनुसरण किस प्रकार मानक स्तर का हो सकता है? उसकी प्रेरणा, कार्य, वह मूल्य जो उसने चुकाया, और उसकी समस्त कोशिशें—उसकी अद्भुत कल्पनाएं उन सब में व्याप्त थीं, और उसने पूरी तरह से अपनी स्वयं की इच्छाओं के अनुसार कार्य किया था। उसके कार्य की सम्पूर्णता में, उस कीमत में ज़रा सी भी स्वेच्छा नहीं थी जो उसने चुकाई थी; वह महज एक सौदे में संलग्न हो रहा था। उसके प्रयास उसके कर्तव्य को निभाने के लिए स्वेच्छा से नहीं किए गए थे, परन्तु सौदे के उद्देश्य को हासिल करने के लिए इच्छापूर्वक किए गए थे। क्या ऐसे प्रयासों का कोई मूल्य है? कौन ऐसे अशुद्ध प्रयासों की प्रशंसा करेगा? किसे ऐसे प्रयासों में रुचि है? उसका कार्य भविष्य के स्वप्नों से भरा हुआ था, अद्भुत योजनाओं से भरा हुआ था, और उसमें कोई ऐसा पथ शामिल नहीं था जिसके द्वारा मानव के स्वभाव को बदला जाए। उसका अत्यधिक परोपकार एक ढोंग था; उसका कार्य जीवन प्रदान नहीं करता था, परन्तु सभ्यता का झूठा दिखावा था; यह सौदा करना था। ऐसा कार्य किस प्रकार अपने मूल कर्तव्य की पुनः प्राप्ति के पथ पर मनुष्य की अगुवाई कर सकता है?

वह सब जिसकी पतरस खोज करता था वह परमेश्वर के हृदय के अनुसार था। उसने परमेश्वर की इच्छा को पूरा करने की कोशिश की थी, और क्लेश एवं प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद भी वह परमेश्वर की इच्छा को पूरा करने के लिए तैयार था। परमेश्वर में किसी विश्वासी के द्वारा इससे बड़ा अनुसरण नहीं हो सकता है। जो कुछ पौलुस खोजता था उसे उसके स्वयं के शरीर, उसकी स्वयं की धारणाओं, और उसकी स्वयं की योजनाओं एवं युक्तियों के द्वारा कलंकित किया गया था। वह किसी भी मायने में परमेश्वर का एक योग्य प्राणी नहीं था, वह कोई ऐसा व्यक्ति नहीं था जिसने परमेश्वर की इच्छा को पूर्ण करने की कोशिश की थी। परतस ने परमेश्वर के आयोजनों के प्रति समर्पित होने की कोशिश की थी, और हालाँकि जो कार्य उसने किया वह कार्य बड़ा नहीं था, फिर भी उसके अनुसरण के पीछे की प्रेरणा एवं वह पथ जिस पर वह चला था, वे सही थे; हालाँकि वह अनेक लोगों को पाने में सक्षम नहीं था, फिर भी वह सत्य के मार्ग का अनुसरण करने में सक्षम था। इस कारण से ऐसा कहा जा सकता है कि वह परमेश्वर का एक योग्य प्राणी था। आज, भले ही तू एक कार्यकर्ता नहीं हैं, फिर भी तुझे परमेश्वर के प्राणी के कर्तव्य को निभाने में सक्षम होना चाहिए, और परमेश्वर के सभी आयोजनों के प्रति समर्पित होने की कोशिश करनी चाहिए। परमेश्वर जो कुछ भी कहे तुझे उसका पालन करने, और सभी प्रकार के क्लेशों एवं परिष्करणों का अनुभव करने में सक्षम होना चाहिए, और हालाँकि तू कमज़ोर है, फिर भी तुझे अपने हृदय में परमेश्वर से प्रेम करने में सक्षम होना चाहिए। ऐसे लोग जो अपने स्वयं के जीवन की ज़िम्मेदारी लेते हैं वे परमेश्वर के प्राणी के कर्तव्य को निभाने के लिए तैयार हैं, और अनुसरण के प्रति ऐसे लोगों का दृष्टिकोण ही सही दृष्टिकोण है। ये ऐसे लोग हैं जिनकी परमेश्वर को ज़रूरत है। यदि तूने अधिक कार्य किया होता, और दूसरों ने तेरी शिक्षाओं को पाया होता, परन्तु तू स्वयं न बदलता, और कोई गवाही नहीं देता, या तेरे पास कोई सच्चा अनुभव नहीं होता, कुछ इस तरह कि तेरे जीवन के अन्त में, जो कुछ तूने किया है उसमें से कुछ भी गवाही नहीं देता है, तो क्या तू ऐसा इंसान है जो बदल चुका है? क्या तू ऐसा व्यक्ति है जो सत्य का अनुसरण करता है? उस समय, पवित्र आत्मा ने तेरा उपयोग किया था, परन्तु जब उसने तेरा उपयोग किया था, तो उसने तेरे उस भाग का उपयोग किया जो कार्य कर सकता था, और उसने तेरे उस भाग का उपयोग नहीं किया जो कार्य नहीं कर सकता। यदि तूने बदलने की कोशिश की होती, तो तुझे उपयोग किए जाने की प्रक्रिया के दौरान धीरे-धीरे पूर्ण बनाया गया होता। फिर भी पवित्र आत्मा इस बात की कोई ज़िम्मेदारी नहीं लेता कि अन्ततः तुझे हासिल किया जाएगा या नहीं, यह तेरे अनुसरण के तरीके पर निर्भर करता है। यदि तेरे व्यक्तिगत स्वभाव में कोई परिवर्तन नहीं है, तो यह इसलिए है क्योंकि अनुसरण के प्रति तेरा दृष्टिकोण ग़लत है। यदि तुझे कोई पुरस्कार नहीं दिया जाता, तो यह तेरी स्वयं की समस्या है, क्योंकि तूने स्वयं ही सत्य को अभ्यास में नहीं लाया है, और परमेश्वर की इच्छा को पूरा करने में असमर्थ है। और इस प्रकार, तेरे व्यक्तिगत अनुभवों से बढ़कर कुछ भी अधिक महत्वपूर्ण नहीं है, और तेरे व्यक्तिगत प्रवेश की अपेक्षा कुछ भी अधिक जरूरी नहीं है! अंत में कुछ लोग यह कहेंगे, "मैंने तेरे लिए इतना अधिक कार्य किया है, भले ही गुणगान करने योग्य उपलब्धियां शायद न हों, फिर भी मैं अपने प्रयासों में परिश्रमी रहा हूँ। क्या तू मुझे यों ही स्वर्ग में प्रवेश करने नहीं दे सकता है ताकि मैं जीवन के फल को खाऊं?" तुझे जानना होगा कि मैं किस प्रकार के लोगों की इच्छा करता हूँ; ऐसे लोग जो अशुद्ध हैं उन्हें राज्य में प्रवेश करने की अनुमति नहीं है, ऐसे लोग जो अशुद्ध हैं उन्हें पवित्र भूमि को गंदा करने की अनुमति नहीं है। भले ही तूने अधिक कार्य किया हो, और कई सालों तक कार्य किया हो, फिर भी अन्त में तू दुखदाई रूप से मैला है—यह स्वर्ग की व्यवस्था के लिए असहनीय है कि तू मेरे राज्य में प्रवेश करने की कामना करता है! संसार की स्थापना से लेकर आज तक, मैंने कभी भी उन लोगों को अपने राज्य में आसान प्रवेश नहीं दिया है जो अनुग्रह पाने के लिए मेरी खुशामद करते हैं। यह स्वर्गीय नियम है, और इसे कोई तोड़ नहीं सकता है! तुझे जीवन की खोज करनी ही होगी। आज, जिन्हें पूर्ण बनाया जाएगा वे पतरस के ही समान लोग हैं: वे ऐसे लोग हैं जो अपने स्वयं के स्वभाव में परिवर्तनों की तलाश करते हैं, और वे परमेश्वर के लिए गवाही देने, और परमेश्वर के प्राणी के रुप में अपने कर्तव्य को निभाने के लिए तैयार हैं। केवल ऐसे ही लोगों को सिद्ध बनाया जाएगा। यदि तू केवल पुरस्कार चाहता है, और अपने स्वयं के जीवन स्वभाव को परिवर्तित करने की कोशिश नहीं करता है, तो तेरे सारे प्रयास व्यर्थ होंगे—और यह एक अटल सत्य है!

पतरस एवं पौलुस के सार में अन्तर से तुझे समझना चाहिए कि वे सभी लोग जो जीवन का अनुसरण नहीं करते हैं वे व्यर्थ में परिश्रम करते हैं! तू परमेश्वर में विश्वास करता है और परमेश्वर का अनुसरण करता है, और इस प्रकार तुझे अपने ह्रदय में परमेश्वर से प्रेम करना होगा। तुझे अपने भ्रष्ट स्वभाव को दूर फेंकना होगा, परमेश्वर की इच्छा को पूरा करने का प्रयास करना होगा, और परमेश्वर के एक प्राणी के कर्तव्य को निभाना होगा। चूँकि तू परमेश्वर पर विश्वास करता है और परमेश्वर का अनुसरण करता है, तुझे हर एक चीज़ को उसके लिए अर्पण करना चाहिए, और व्यक्तिगत चुनाव या मांग नहीं करनी चाहिए, और तुझे परमेश्वर की इच्छा की पूर्ति को हासिल करना चाहिए। चूँकि तुझे सृजा गया था, तो तुझे उस प्रभु की आज्ञा का पालन करना चाहिए जिसने तुझे सृजा था, क्योंकि तू स्वाभाविक रूप से स्वयं के ऊपर प्रभुता नहीं रखता है, और तेरे पास अपनी नियति को नियन्त्रित करने की योग्यता नहीं है। चूँकि तू ऐसा व्यक्ति है जो परमेश्वर में विश्वास करता है, तो तुझे पवित्रता एवं बदलाव की खोज करनी चाहिए। चूँकि तू परमेश्वर का एक प्राणी है, तो तुझे अपने कर्तव्य से चिपके रहना चाहिए, और अपने स्थान को बनाए रखना चाहिए, और तुझे अपने कर्तव्य की हद को पार नहीं करना होगा। यह तुझे विवश करने के लिए नहीं है, या सिद्धान्तों के माध्यम से तुझे दबाने के लिए नहीं है, परन्तु ऐसा पथ है जिसके माध्यम से तू अपने कर्तव्य को निभा सकता है, और जिसे हासिल किया जा सकता है—और हासिल किया जाना चाहिए—उन सभी लोगों के द्वारा जो धार्मिकता को अंजाम देते हैं। यदि तू पतरस एवं पौलुस के सार की तुलना करे, तो तू जान जाएगा कि तुझे किस प्रकार खोज करनी चाहिए। जिन पथों पर पतरस एवं पौलुस चले थे उनमें से एक पथ है सिद्ध बनाए जाने का पथ, और दूसरा पथ है निष्कासन का पथ; पतरस एवं पौलुस दो विभिन्न पथों का प्रतिनिधित्व करते हैं। हालाँकि प्रत्येक ने पवित्र आत्मा के कार्य को प्राप्त किया था, और प्रत्येक ने पवित्र आत्मा के प्रबोधन एवं प्रकाशन को हासिल किया था, और प्रत्येक ने उसे स्वीकार किया जिसे प्रभु यीशु के द्वारा उन्हें सौंपा गया था, फिर भी वह फल जो प्रत्येक में उत्पन्न हुआ था वह एक समान नहीं था: एक ने सचमुच में फल उत्पन्न किया था, और दूसरे ने नहीं। उनके सार से, उस कार्य से जो उन्होंने किया था, उससे जिसे उनके द्वारा बाह्य रूप से अभिव्यक्त किया गया था और उनके निर्णायक अन्त से, तुझे यह समझना चाहिए कि तुझे कौन सा पथ लेना चाहिए, चलने के लिए तुझे किस पथ का चयन करना चाहिए। वे स्पष्ट रूप से दो भिन्न भिन्न पथों पर चले थे। पौलुस एवं पतरस, दोनों अपने अपने पथ के सारतत्व थे और इस प्रकार बिलकुल प्रारम्भ से ही इन दो पथों का प्रतीक होने के लिए उन्हें मिसाल बनाया गया था। पौलुस के अनुभवों के मुख्य बिन्दु क्या हैं, और वह इसे क्यों पूरा नहीं कर पाया था? पतरस के अनुभवों के मुख्य बिन्दु क्या हैं, और उसने किस प्रकार सिद्ध बनाए जाने का अनुभव किया था? यदि तू तुलना करे कि उन दोनों ने किसके विषय में चिंता की, तो तू जान जाएगा कि परमेश्वर को सटीक रूप से किस किस्म के व्यक्ति की ज़रूरत है, परमेश्वर की इच्छा क्या है, परमेश्वर का स्वभाव क्या है, किस किस्म के व्यक्ति को अन्ततः सिद्ध बनाया जाएगा, और साथ ही किस किस्म के व्यक्ति को सिद्ध नहीं बनाया जाएगा, उन लोगों का स्वभाव कैसा है जिन्हें सिद्ध बनाया जाएगा, और उन लोगों का स्वभाव कैसा है जिन्हें सिद्ध नहीं बनाया जाएगा—सार के इन मामलों को पतरस एवं पौलुस के अनुभवों में देखा जा सकता है। परमेश्वर ने सभी चीज़ों की सृष्टि की थी, और इस प्रकार वह समूची सृष्टि को अपने प्रभुत्व के अधीन लाता है, और अपने प्रभुत्व के प्रति समर्पित करवाता है; वह सभी चीज़ों को आदेश देगा, ताकि सभी चीज़ें उसके हाथों में हों। परमेश्वर की सारी सृष्टि, जिसमें जानवर, पेड़-पौधे, मानवजाति, पहाड़ एवं नदियां, और झीलें शामिल हैं—सभी को उसके प्रभुत्व के अधीन आना होगा। आकाश एवं धरती की सभी चीज़ों को उसके प्रभुत्व के अधीन आना होगा। उनके पास कोई विकल्प नहीं हो सकता है, और उन सब को उसी के आयोजनों के अधीन होना होगा। इसकी आज्ञा परमेश्वर ने दी थी, और यह परमेश्वर का अधिकार है। परमेश्वर सभी चीज़ों को आज्ञा देता है, और प्रत्येक को उसके किस्म के अनुसार वर्गीकृत करके सभी चीजों की पद देता और नियम से लगाता है, और परमेश्वर की इच्छा के अनुसार सभी चीज़ों को उनके पद आवंटित होते हैं। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि कोई चीज़ कितनी बड़ी है, यह परमेश्वर से बढ़कर नहीं हो सकती है, और सभी चीज़ें मानवजाति की सेवा करती हैं जिसे परमेश्वर के द्वारा सृजा गया था, और कोई भी चीज़ परमेश्वर की अनाज्ञाकारिता करने की हिम्मत नहीं करती है या परमेश्वर से कोई मांग नहीं करती है। और इस प्रकार मनुष्य को, परमेश्वर के एक प्राणी के रूप में, मनुष्य के कर्तव्य को निभाना ही होगा। इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि वह सभी चीज़ों का प्रभु है या देख-रेख करने वाला, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि मनुष्य का रुतबा सभी चीज़ों के मध्य कितना ऊँचा है, वह फिर भी परमेश्वर के प्रभुत्व के अधीन सिर्फ एक छोटा सा मानव है, और वह एक तुच्छ मानव, और परमेश्वर के एक जीवधारी से अधिक और कुछ नहीं है, और वह कभी भी परमेश्वर से ऊपर नहीं होगा। परमेश्वर के एक प्राणी के रूप में, मनुष्य को परमेश्वर के एक प्राणी के अपने कर्तव्य को निभाने की कोशिश करनी चाहिए, और अन्य चुनाव किए बिना परमेश्वर से प्रेम करने की कोशिश करनी चाहिए, क्योंकि परमेश्वर मनुष्य के प्रेम के योग्य है। ऐसे लोग जो परमेश्वर से प्रेम करने की कोशिश करते हैं उन्हें कोई व्यक्तिगत लाभ पाने या उस चीज़ की खोज नहीं करनी चाहिए जिसकी वे व्यक्तिगत रूप से अभिलाषा करते हैं; यह अनुसरण का सबसे सही माध्यम है। यदि जिसकी तू खोज करता है वह सत्य है, जिसका तू अभ्यास करता है वह सत्य है, और जो कुछ तू अर्जित करता है वह तेरे स्वभाव में हुआ परिवर्तन है, तो वह पथ जिस पर तूने कदम रखा है वह सही पथ है। यदि जिसे तू खोजता है वह देह की आशीषें हैं, और जिसे तू अभ्यास में लाता है वह तेरी स्वयं की धारणाओं की सच्चाई है, और यदि तेरे स्वभाव में कोई परिवर्तन नहीं होता है, और तू देहधारी परमेश्वर के प्रति बिलकुल भी आज्ञाकारी नहीं है, और तू अभी भी अस्पष्टता में रह रहा है, तो जिसकी भी तू खोज कर रहा है वह निश्चय ही तुझे नरक ले जाएगा, क्योंकि वह पथ जिस पर तू चलता है वह असफलता का पथ है। तुझे सिद्ध बनाया जाएगा या निष्कासित किया जाएगा यह तेरे स्वयं के अनुसरण पर निर्भर होता है, अर्थात सफलता या असफलता उस पथ पर निर्भर होती है जिस पर मनुष्य चलता है।

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