मैं अब परमेश्वर को सीमांकित नहीं करूँगी

21 अप्रैल, 2023

तारा, ताइवान

मैं कम उम्र से ही अपनी माँ के साथ प्रभु यीशु में आस्था रख रही थी और उसके भरपूर अनुग्रह और आशीष का आनंद उठा रही थी। इससे मुझे मानवता के प्रति प्रभु यीशु की दया और प्रेम की गहरी समझ हासिल हुई। प्रभु के अनुग्रह में बढ़ते हुए उसके अनुग्रह के लिए मैं अक्सर उससे याचना करती रहती थी। जब भी मेरे सामने कोई समस्या आती, मैं प्रभु से प्रार्थना करती और पाप करने पर उसके सामने आकर उसे कुबूलती। मैं मानती थी प्रभु दयालु और प्रेममय है, इसलिए वह हमेशा मेरे पापों को क्षमा कर देता।

मई 2019 में एक दिन फेसबुक पर मेरी मुलाकात बहन डायना और बहन वनेसा से हुई। हमने एक साथ बाइबल स्टडी ग्रुप में भाग लिया, उस दौरान बाइबल पर बहन वनेसा की संगति मुझे बहुत अंतर्दृष्टि वाली लगी। सभा के दौरान एक बार बहन वनेसा ने कहा : “प्रभु ने कहा है कि वह अंत के दिनों में फिर से आएगा, तो हम उसका स्वागत कैसे कर सकते हैं? प्रभु यीशु ने कहा था : ‘मेरी भेड़ें मेरा शब्द सुनती हैं(यूहन्ना 10:27)। ‘देख, मैं द्वार पर खड़ा हुआ खटखटाता हूँ; यदि कोई मेरा शब्द सुनकर द्वार खोलेगा, तो मैं उसके पास भीतर आकर उसके साथ भोजन करूँगा और वह मेरे साथ(प्रकाशितवाक्य 3:20)। यह भी कहा है, ‘जिसके कान हों वह सुन ले कि आत्मा कलीसियाओं से क्या कहता है(प्रकाशितवाक्य 2:7)। इन अंशों से हम जान सकते हैं कि जब प्रभु अंत के दिनों में आएगा, तो वह वचन व्यक्त करेगा। प्रभु का स्वागत करने की मुख्य बात परमेश्वर की वाणी को ध्यान से सुनना है और जो परमेश्वर की वाणी सुनकर प्रभु का स्वागत कर सकते हैं, वे बुद्धिमान कुंवारियाँ हैं।” बहन वनेसा की संगति सुनकर मुझे बहुत हैरानी हुई। मैंने ऐसी अंतर्दृष्टि वाली बात कभी नहीं सुनी थी। उसने प्रभु का स्वागत करने की कुंजी पहचान ली थी। मुझे ऐसा एहसास पहले कभी नहीं हुआ था। उसके बाद बहन वनेसा ने हमें एक बहुत ही जीवंत भजन वीडियो दिखाया। वीडियो के अंत में कहा गया था, “सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया,” और मुझे उत्सुकता हुई। सभा समाप्त होते ही मैं झट से ऑनलाइन खोज करने लगी। मुझे बहुत-सी नकारात्मक जानकारी दिखी, तो मैंने और जानकारी के लिए तुरंत बहन डायना से बात की। बहन डायना ने कहा कि प्रभु का स्वागत करना बहुत बड़ी बात है और मुझे प्रोत्साहित किया कि मैं अफवाहों में न बहूँ। उन्होंने सुझाव दिया कि मुझे सबसे पहले अपनी आशंकाओं को दरकिनार कर विनम्रता से यह खोज करनी चाहिए कि क्या यह सत्य मार्ग है। कुछ दिनों बाद बहन डायना ने मुझे एक सभा में भाग लेने बुलाया। मैं उलझन में पड़ गई : मुझे जाना भी चाहिए या नहीं? बाइबल पर बहन वनेसा की संगति अंतर्दृष्टिपरक थी और मैं और अधिक सुनना चाहती थी, लेकिन मुझे चिंता थी कि वह जो प्रचार कर रही है, वह सच्चा मार्ग नहीं है। इस झिझक के चलते मैंने प्रभु से मार्गदर्शन करने की प्रार्थना की। उसके बाद मैं सभा में शामिल हुई।

सभा के दौरान बहन वनेसा मुझसे बड़े जोश में बोली : “प्रभु यीशु लौट आया है, वह देहधारी सर्वशक्तिमान परमेश्वर है। सर्वशक्तिमान परमेश्वर ने अनुग्रह का युग समाप्त कर राज्य का युग आरंभ कर दिया है, लाखों वचन व्यक्त किए हैं और प्रभु यीशु के छुटकारे के कार्य की बुनियाद पर वह परमेश्वर के घर से शुरू करके न्याय का कार्य कर रहा है, ताकि मानवजाति को पूरी तरह शुद्ध कर बचाया जा सके। सर्वशक्तिमान परमेश्वर द्वारा व्यक्त किए गए सभी वचन सत्य हैं, वे परमेश्वर के देहधारण के रहस्य, उसके कार्य के तीन चरणों और बाइबल की आंतरिक कहानी को प्रकट करते हैं। उसके वचन मानवता के पाप का स्रोत भी बताते हैं कि कैसे शैतान मानवजाति को भ्रष्ट करता है, कैसे परमेश्वर मानवजाति को चरणबद्ध तरीके से बचाता है, वे अंत के दिनों में परमेश्वर के न्याय के कार्य का अर्थ भी बताते हैं। सर्वशक्तिमान परमेश्वर ने हमें वह मार्ग भी दिखाया है जिससे विश्वासी उद्धार प्राप्त कर सकते हैं। जैसे, वह बताता है कि हम अपने भ्रष्ट स्वभाव का त्याग करने के लिए उसके वचनों के न्याय का अनुभव कैसे करें, सत्य का अभ्यास कर ईमानदार कैसे बनें, कैसे उसका भय मानकर बुराई से दूर रहें, कैसे उसकी इच्छा का अनुसरण करने वाले इंसान बनें, वगैरह।” उसने यह भी कहा कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों और कार्यों ने प्रभु यीशु की भविष्यवाणी को साकार किया : “मुझे तुम से और भी बहुत-सी बातें कहनी हैं, परन्तु अभी तुम उन्हें सह नहीं सकते। परन्तु जब वह अर्थात् सत्य का आत्मा आएगा, तो तुम्हें सब सत्य का मार्ग बताएगा, क्योंकि वह अपनी ओर से न कहेगा परन्तु जो कुछ सुनेगा वही कहेगा, और आनेवाली बातें तुम्हें बताएगा(यूहन्ना 16:12-13)। “वो जो मुझे नकार देता है, और मेरे वचन नहीं स्वीकारता, उसका भी न्याय करने वाला कोई है : मैंने जो वचन बोले हैं वे ही अंत के दिन उसका न्याय करेंगे(यूहन्ना 12:48)। “क्योंकि वह समय आ चुका है कि परमेश्वर के घर से न्याय शुरू किया जाए(1 पतरस 4:17)। मुझे लगा वनेसा ने जो कहा वह रोशन करने वाला है, पर मेरे मन में अभी भी बहुत-से संदेह थे। मैंने मन में परमेश्वर से प्रार्थना की और परमेश्वर के वचनों पर विचार किया : “धन्य हैं वे, जो मन के दीन हैं, क्योंकि स्वर्ग का राज्य उन्हीं का है(मत्ती 5:3)। मैंने सोचा : “परमेश्वर की वापसी एक बड़ी बात है, मैं आँख मूँदकर किसी नतीजे पर नहीं पहुँच सकती। मुझे विनम्र खोजी बनकर सुनते रहना चाहिए।”

उसके बाद बहन वनेसा ने मुझे सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों का एक अंश पढ़ने को कहा : “अंत के दिनों का मसीह जीवन लाता है, और सत्य का स्थायी और शाश्वत मार्ग लाता है। यह सत्य वह मार्ग है, जिसके द्वारा मनुष्य जीवन प्राप्त करता है, और यही एकमात्र मार्ग है जिसके द्वारा मनुष्य परमेश्वर को जानेगा और परमेश्वर द्वारा स्वीकृत किया जाएगा। यदि तुम अंत के दिनों के मसीह द्वारा प्रदान किया गया जीवन का मार्ग नहीं खोजते, तो तुम यीशु की स्वीकृति कभी प्राप्त नहीं करोगे, और स्वर्ग के राज्य के द्वार में प्रवेश करने के योग्य कभी नहीं हो पाओगे, क्योंकि तुम इतिहास की कठपुतली और कैदी दोनों ही हो। जो लोग विनियमों से, शब्दों से और इतिहास की बेड़ियों से नियंत्रित होते हैं, वे न तो कभी जीवन प्राप्त कर पाएँगे और न ही जीवन का अनंत मार्ग प्राप्त कर पाएँगे। ऐसा इसलिए है, क्योंकि वे जो प्राप्त करते हैं वह सिंहासन से प्रवाहित होने वाले जीवन के जल के बजाय बस मैला पानी ही है, जिससे वे हजारों सालों से चिपके हुए हैं। जिन्हें जीवन के जल की आपूर्ति नहीं की जाती, वे हमेशा मुर्दे, शैतान के खिलौने और नरक की संतानें बने रहेंगे। फिर वे कैसे परमेश्वर के दर्शन कर सकते हैं? तुम केवल अतीत को पकड़े रखने की खोज में रहते हो, स्थिर खड़े रहने और चीजों को वैसे ही रखने की कोशिश करते हो और यथास्थिति को बदलने और इतिहास को छोड़ने की खोज में नहीं रहते, इसलिए क्या तुम हमेशा परमेश्वर के विरोधी नहीं होगे? परमेश्वर के कार्य के कदम उमड़ती लहरों और घुमड़ते गर्जनों की तरह जबरदस्त और शक्तिशाली हैं—फिर भी तुम निष्क्रियता से बैठकर तबाही का इंतजार करते हो, उससे चिपके रहते हो जो पुराना है और चीजों के अपनी गोद में आ गिरने की प्रतीक्षा करते हो। इस तरह, तुम्हें मेमने के पदचिह्नों का अनुसरण करने वाला व्यक्ति कैसे माना जा सकता है? यह कैसे दिखा सकता है कि तुम जिस परमेश्वर को थामे हो, वह वही परमेश्वर है जो हमेशा नया है और कभी पुराना नहीं होता? और तुम्हारी पीली पड़ चुकी किताबों के शब्द तुम्हें पार कराकर नए युग में कैसे ले जा सकते हैं? वे परमेश्वर के कार्य के चरणों को खोजने में तुम्हारी अगुआई कैसे कर सकते हैं? और वे तुम्हें ऊपर स्वर्ग में कैसे ले जा सकते हैं? जिन्हें तुम अपने हाथों में थामे हो, वे केवल शब्द हैं, जो तुम्हें केवल अस्थायी सांत्वना दे सकते हैं, तुम्हें जीवन देने में सक्षम सत्य नहीं दे सकते। धर्मशास्त्र के शब्द जिन्हें तुम पढ़ते हो, वे केवल तुम्हारी जिह्वा को समृद्ध कर सकते हैं; वे बुद्धिमानी के शब्द नहीं हैं जो मानव जीवन को जानने में तुम्हारी मदद कर सकते हों, उनके तुम्हें पूर्णता की ओर ले जाने वाला मार्ग होने की बात तो दूर रही। क्या यह विसंगति तुम्हारे लिए चिंतन का कारण नहीं है? क्या यह तुम्हें इसके भीतर समाहित रहस्यों के बारे में अंतर्दृष्टि नहीं देती है? क्या तुम अपने बल पर परमेश्वर से मिलने के लिए अपने आप को स्वर्ग भिजवाने में समर्थ हो? परमेश्वर के आए बिना, क्या तुम परमेश्वर के साथ पारिवारिक आनंद मनाने के लिए अपने आप को स्वर्ग में ले जा सकते हो? क्या तुम अभी भी स्वप्न देख रहे हो? तो मेरा उपदेश यह है कि तुम स्वप्न देखना बंद कर दो और उसकी ओर देखो जो अभी कार्य कर रहा है—देखो कि अब अंत के दिनों में मनुष्य को बचाने का कार्य कौन कर रहा है। यदि तुम ऐसा नहीं करते, तो तुम कभी भी सत्य प्राप्त नहीं करोगे, और न ही कभी जीवन प्राप्त करोगे(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, केवल अंत के दिनों का मसीह ही मनुष्य को अनंत जीवन का मार्ग दे सकता है)। पढ़ते-पढ़ते मुझे लगने लगा कि इन वचनों में कुछ तो अलग है और मेरे मन में इनके प्रति भय पैदा होने लगा : ये वचन बहुत कठोर और चुभने वाले थे—प्रत्येक वचन और वाक्यांश अधिकार और सामर्थ्य से भरपूर था। ऐसा नहीं लगा कि वे वचन किसी इंसान ने बोले हैं। ऐसे तो केवल परमेश्वर ही बोल सकता है। लेकिन फिर यह भी सोचा, “यह सही नहीं है, परमेश्वर तो दयालु और प्रेममय है—उसके वचन तो सांत्वना और कोमलता से भरे होते हैं। लेकिन ये वचन बहुत कठोर हैं, अभिशाप जैसे या मानवजाति की निंदा करने वाले। क्या ये सचमुच परमेश्वर के वचन हैं? उन वचनों का अधिकार देखकर तो यही लगा कि ये परमेश्वर के वचन ही होने चाहिए, है न? लेकिन अगर सर्वशक्तिमान परमेश्वर सच में लौटकर आया प्रभु यीशु है, तो उसे उसी की तरह बोलना चाहिए। उसे मानवजाति के लिए दयालु और प्रेममय होना चाहिए, उसके वचन कोमल और विचारशील होने चाहिए। लेकिन सर्वशक्तिमान परमेश्वर की वाणी तो बहुत कठोर है। क्या वह वाकई लौटकर आया प्रभु यीशु हो सकता है?” मैं बहुत उलझन में थी, मैंने बहन वनेसा को अपनी आशंकाएँ बताईं।

वनेसा ने धैर्य से मेरे साथ संगति करते हुए कहा, “हमने हमेशा माना है कि परमेश्वर दयालु और प्रेममय है, वह हमसे विनम्र और विचारशील तरीके से बात करता है, इसलिए अगर उसके वचन कठोर हैं, तो वे परमेश्वर के वचन नहीं हैं। लेकिन क्या हमने कभी यह सोचा है कि यह विचार सच में तथ्यों और सत्य के अनुरूप है भी या नहीं? दरअसल हर युग में परमेश्वर ने न केवल विचारशील और उत्साहजनक वचन बोले हैं, बल्कि लोगों को डाँटने, न्याय करने और शाप देने वाले कठोर वचन भी कहे हैं। बात सिर्फ इतनी है कि हमने इस पर ध्यान नहीं दिया। आइए देखें कि यह बाइबल में कैसे दर्ज है। यहोवा परमेश्वर ने कहा : ‘उसके पहरुए अंधे हैं, वे सब के सब अज्ञानी हैं, वे सब के सब गूँगे कुत्ते हैं जो भौंक नहीं सकते; वे स्वप्न देखनेवाले और लेटे रहकर सोते रहना चाहते हैं। वे मरभूखे कुत्ते हैं जो कभी तृप्‍त नहीं होते। वे चरवाहे हैं जिन में समझ ही नहीं; उन सभों ने अपने अपने लाभ के लिए अपना अपना मार्ग लिया है(यशायाह 56:10-11)। और प्रभु यीशु ने कहा : ‘हे साँपो, हे करैतों के बच्‍चो, तुम नरक के दण्ड से कैसे बचोगे?(मत्ती 23:33)। ‘पवित्र वस्तु कुत्तों को न दो, और अपने मोती सूअरों के आगे मत डालो; ऐसा न हो कि वे उन्हें पाँवों तले रौंदें और पलटकर तुम को फाड़ डालें(मत्ती 7:6)। ऐसे और भी बहुत-से पद हैं। इन पदों से हम जान सकते हैं कि व्यवस्था के युग और अनुग्रह के युग में परमेश्वर लोगों को डाँटता था, उनकी निंदा कर उन्हें शाप देता था। हालाँकि उसके वचन कठोर लगते थे और चुभने वाले होते थे, लेकिन वे एकदम सच्चे थे। वे लोगों के परमेश्वर-विरोधी और परमेश्वर-विद्रोही सार को उजागर करते थे। वास्तव में परमेश्वर के वचन चाहे कोमल हों या कठोर, वे सभी परमेश्वर के स्वभाव की अभिव्यक्तियाँ हैं। लेकिन अगर हम परमेश्वर के स्वभाव को नहीं समझेंगे, तो हम समझे बिना उसे केवल दयालु और कृपालु के रूप में ही सीमित करने में प्रवृत्त हो जाएँगे; हम उसके गंभीर वचनों पर निश्चित धारणाएँ बना लेंगे, यह सोचकर कि परमेश्वर केवल कोमलता से ही बोलता है, उसे कठोर स्वर में नहीं बोलना चाहिए, अन्यथा ऐसे वचन परमेश्वर के नहीं हो सकते। उसके कोमल या कठोर वचनों के आधार पर कोई राय बना लेना गलत है, यह हमारी अपनी धारणाओं और कल्पनाओं का परिणाम होता है। जैसे, अगर हमारे माता-पिता हमसे मधुरता से बोलें तब तो वे हमारे माता-पिता हैं, लेकिन अगर हम कोई गलत काम करें और वे हमारे साथ कठोरता से पेश आएँ या हमें फटकारें, तब हम उन्हें अपने माता-पिता न मानें, तो क्या यह बेवकूफी नहीं होगी?” बहन की संगति सुनकर मैं इस मामले को साफ तौर पर समझ गई। मुझे लगा : “यह बात सही है, हमारे माता-पिता हमसे नरमी से बोलें या कठोरता से, क्या वे हमेशा ही हमारे माता-पिता नहीं रहेंगे? यहोवा परमेश्वर और प्रभु यीशु सबने कठोर वचन बोले हैं, यह बात मुझे पहले क्यों नहीं समझ में आई? मुझे लगता है, नरमी और कठोरता के आधार पर यह तय करना गलत है कि ये परमेश्वर के वचन हैं या नहीं।” इसका एहसास होने के बाद मैंने उतना प्रतिरोधी महसूस नहीं किया। लेकिन जब भी मैं सर्वशक्तिमान परमेश्वर के मानवजाति को उजागर और उसका न्याय करने वाले वचनों के अंश पढ़ती हूँ, तो मुझे लगता है कि वे चुभने वाले हैं, मानो मेरी निंदा की गई हो। मैं असमंजस में पड़ जाती हूँ : प्रभु यीशु दयालु और प्रेममय है, तो फिर सर्वशक्तिमान परमेश्वर इतना कठोर क्यों है?

एक बार सभा में मैंने बहन सुसी से प्रश्न पूछा, “मैं सर्वशक्तिमान परमेश्वर और प्रभु यीशु को एक ही परमेश्वर के रूप में नहीं देख पाती—उनका स्वभाव एकदम अलग है। जब मैं प्रभु यीशु की कल्पना करती हूँ, तो मुझे लगता है कि परमेश्वर बहुत दयालु और प्रेममय है, लेकिन सर्वशक्तिमान परमेश्वर बहुत कठोर लगता है, उसके ज्यादातर वचन लोगों को उजागर करने और उनका गहन-विश्लेषण करने वाले होते हैं। सर्वशक्तिमान परमेश्वर और प्रभु यीशु इतने अलग क्यों हैं?” बहन ने यह कहते हुए संगति की, “लोगों में अक्सर यह भ्रम होता है, इसकी वजह है कि वे परमेश्वर का स्वभाव नहीं समझते। आइए परमेश्वर के पिछले कार्य पर एक नजर डालें। जब हमें परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव की कुछ समझ आएगी तो इस समस्या का समाधान अपने आप हो जाएगा। हम सब जानते हैं कि जब परमेश्वर को सदोम और नीनवे के लोगों के कुकर्मों का पता चला तो उसके स्वभाव में क्रोध पैदा हो गया और उसने इन दोनों नगरों को नष्ट करने का निश्चय कर लिया। उन्हें नष्ट करने से पहले परमेश्वर ने दो स्वर्गदूतों को सदोम भेजा, वहाँ केवल लूत ने उनकी मेजबानी की। बाकी लोगों ने उनका स्वागत करने के बजाय उन्हें मारना चाहा। परमेश्वर उन लोगों के कुकर्म देखकर क्रोधित हो गया। जब स्वर्गदूतों ने लूत और उसके परिवार को बचा लिया, तो परमेश्वर ने आकाश से आग बरसाकर नगर के सब लोगों, मवेशियों और वनस्पतियों को मिटा दिया। अब नीनवे को देखते हैं। परमेश्वर ने इस नगर को भी नष्ट करने की योजना बनाई, उसने योना को अपना संदेश देने के लिए भेजा : ‘अब से चालीस दिन के बीतने पर नीनवे उलट दिया जाएगा(योना 3:4)। जब नीनवे के राजा ने यह समाचार सुना, तो उसने नगर के लोगों को प्रेरित किया कि वे टाट पहनें, राख में बैठें, उपवास करें, प्रार्थना करें, अपनी बुराइयों को त्यागें और परमेश्वर के सामने प्रायश्चित्त करें। यह देखकर परमेश्वर ने अपना कोप वापस ले लिया और दया करके उन्हें विनाश से बचा लिया। नीनवे और सदोम के प्रति परमेश्वर के भिन्न दृष्टिकोण से हम जान सकते हैं कि परमेश्वर का स्वभाव सच्चा और स्पष्ट होता है। वह न केवल प्रेममय और दयालु है, बल्कि प्रतापी और क्रोधी भी है। जब लोग पाप करते हैं, तो परमेश्वर उन्हें पश्चात्ताप करने का मौका देकर अपना प्रेममय और दयालु स्वभाव दिखाता है। जब लोग जिद्दी बनकर प्रायश्चित्त नहीं करना चाहते, जब वे हठपूर्वक परमेश्वर का विरोध करते और उसके विरुद्ध आवाज उठाते हैं, तो परमेश्वर अपना धार्मिक और प्रतापी स्वभाव दिखाते हुए उन पर क्रोध प्रकट करता है। इससे हम समझ सकते हैं कि परमेश्वर का धार्मिक स्वभाव न केवल प्रेमपूर्ण और दयालु है, बल्कि प्रतापी और क्रोधी भी है। परमेश्वर के अंतर्निहित स्वभाव में ये दोनों पहलू मौजूद हैं। आइए अब अनुग्रह के युग पर विचार करें जिसमें प्रभु यीशु ने अपना कार्य किया। जब लोग पाप करके प्रभु के पास आकर कबूलते और पश्चात्ताप करते हैं, तो वह उन्हें उनके पापों से मुक्त कर भरपूर अनुग्रह प्रदान करता है। इसलिए बहुत-से लोग मानते हैं कि प्रभु का स्वभाव केवल प्रेमपूर्ण और दयालु है, वह क्रोधित होकर शाप नहीं देता। जबकि ये लोगों की धारणाएँ और कल्पनाएँ मात्र हैं। जहाँ तक फरीसियों का सवाल है, वे प्रभु की निंदा और प्रतिरोध करते थे, यहाँ तक कि उसके खिलाफ खुलकर शोर मचाते थे, उस समय प्रभु यीशु क्रोध से भर गया था। उसने निंदा कर उन्हें शाप दिया और उन पर सात विपत्तियों का ऐलान किया। उनके प्रति उसने जरा भी दया नहीं दिखाई। सृष्टि के समय से लेकर आज तक परमेश्वर ने हमेशा मानवजाति के प्रति अपना धार्मिक स्वभाव व्यक्त किया है। परमेश्वर प्रेममय और दयालु है, लेकिन वह प्रतापी, क्रोधी, शाप देने वाला और दंड देने वाला भी है। जैसा कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : ‘परमेश्वर की दया और सहिष्णुता तो सचमुच हैं ही, किंतु जब वह अपने कोप का बाँध खोलता है तब परमेश्वर की पवित्रता और धार्मिकता मनुष्य को परमेश्वर का वह पहलू भी दिखाती है जो कोई अपमान सहन नहीं करता। जब मनुष्य परमेश्वर के आदेशों का पालन करने में पूर्णतः सक्षम होता है और परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुसार कार्य करता है, तब परमेश्वर मनुष्य के प्रति दया से भरपूर होता है; लेकिन जब मनुष्य भ्रष्टता से भरा होता है और उसके प्रति वैर-भाव और शत्रुता से लबालब भर जाता है, तब परमेश्वर अत्यधिक कोप में होता है। वह किस हद तक कोप में होता है? उसका कोप तब तक बना रहेगा जब तक उसे मनुष्य का प्रतिरोध और दुष्ट कर्म दिखने बंद नहीं होते, जब तक वे उसकी नजरों के सामने अब और नहीं होते हैं। तब कहीं जाकर परमेश्वर का कोप गायब होगा। ... वह उन चीजों के प्रति सहिष्णु और दयालु है जो कृपालु, सुंदर और भली हैं; जो चीजें बुरी, पापमय और दुष्ट हैं, उनके प्रति वह प्रचंड रूप से कोपपूर्ण है, इतना कि उसका कोप रुकता नहीं है। ये परमेश्वर के स्वभाव के दो प्राथमिक पहलू हैं जो सबसे महत्वपूर्ण, सबसे प्रमुख हैं और इससे भी बढ़कर, इन्हें परमेश्वर ने आरंभ से लेकर अंत तक प्रकट किया है : प्रचुर दया और प्रचंड कोप(वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II)। परमेश्वर के वचनों से हम जान सकते हैं कि प्रचुर दया और प्रचंड कोप परमेश्वर के स्वभाव के दो पहलू हैं, जिन्हें वह लगातार मानवजाति पर जाहिर करता है। उसके स्वभाव के इन दो पहलुओं में परस्पर कोई विरोधाभास नहीं है। ये सभी उसके अंतर्निहित स्वभाव का हिस्सा हैं। पहले हमने परमेश्वर का केवल अनुग्रह ही अनुभव किया है, इसलिए यह मानकर कि वह केवल अत्यंत दयालु है और प्रचंड क्रोध प्रकट नहीं करता, हमें उसे सीमांकित नहीं करना चाहिए। इस तरह की समझ बहुत एकतरफा होती है।” यह सुनकर मुझे एहसास हुआ कि परमेश्वर न केवल प्रेमपूर्ण और दयालु हैं, बल्कि वह प्रतापी, क्रोधी और शाप देने वाला भी है। ये सभी परमेश्वर के अंतर्निहित स्वभाव के पहलू हैं। चूँकि मुझे परमेश्वर के स्वभाव की पूरी समझ नहीं थी, इसलिए मुझे यह एकतरफा विश्वास था कि परमेश्वर केवल दयालु और प्रेममय है। दरअसल मेरी ये धारणाएँ और कल्पनाएँ वास्तविकता के अनुरूप नहीं थीं। लगा, अपनी समझ को गहराई देने के लिए मुझे और अधिक संगति सुननी चाहिए।

सुसी ने यह भी कहा कि परमेश्वर प्रत्येक युग में जो स्वभाव प्रकट करता है, वह उसके उद्धार कार्य की आवश्यकताओं और भ्रष्ट मानवजाति की जरूरतों के अनुसार होता है। फिर हमने इस बारे में सत्य की साफ समझ पाने के लिए सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों के दो अंश पढ़े। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “यीशु ने जो कार्य किया, वह उस युग में मनुष्य की आवश्यकताओं के अनुसार था। उसका कार्य मानवजाति को छुटकारा दिलाना, उसे उसके पापों के लिए क्षमा करना था, और इसलिए उसका स्वभाव पूरी तरह से विनम्रता, धैर्य, प्रेम, धर्मपरायणता, सहनशीलता, दया और करुणामय प्यार से भरा था। वह मानवजाति के लिए भरपूर अनुग्रह और आशीष लाया, वह वे सभी चीजें लाया जिनका लोग संभवतः आनंद ले सकते थे। उसने उनके आनंद के लिए ये चीजें दीं : शांति और प्रसन्नता, अपनी सहनशीलता और प्रेम, अपनी दया और अपना करुणामय प्यार। उस समय लोग आनंद की वस्तुओं की जिस प्रचुरता का सामना कर रहे थे—उनके हृदय में शांति और सुरक्षा की भावना, उनकी आत्माओं में आश्वासन की भावना, और उद्धारकर्ता यीशु पर उनकी निर्भरता—इन सबका कारण वह युग था जिसमें वे रहते थे(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, छुटकारे के युग के कार्य की वास्तविक कहानी)। “युग का समापन करने के अपने अंतिम कार्य में परमेश्वर का स्वभाव ताड़ना और न्याय का है, जिसमें वह वो सब प्रकट करता है जो अधार्मिक है, ताकि वह अनगिनत लोगों का सरेआम न्याय कर सके और उन लोगों को पूर्ण बना सके जो सच्चे दिल से उससे प्रेम करते हैं। केवल इस तरह का स्वभाव ही युग का समापन कर सकता है। अंत के दिन पहले ही आ चुके हैं। सभी चीजें अपनी किस्म के अनुसार छाँटी जाती हैं और अपनी विभिन्न खूबियों के आधार पर विभिन्न श्रेणियों में विभाजित की जाती हैं। ठीक यही वह समय है जब परमेश्वर लोगों के परिणाम और गंतव्य प्रकट करता है। यदि लोग ताड़ना और न्याय का अनुभव न करें तो उनके विद्रोहीपन और अधार्मिकता को उजागर नहीं किया जा सकता है। केवल ताड़ना और न्याय के माध्यम से ही सभी चीजों का परिणाम प्रकट किया जा सकता है। लोग केवल तभी अपने वास्तविक रंग दिखाते हैं जब उन्हें ताड़ना दी जाती है और उनका न्याय किया जाता है। बुरे को बुरे के साथ रखा जाएगा, भले को भले के साथ, और सभी लोगों को उनकी किस्म के अनुसार छाँटा जाएगा। ताड़ना और न्याय के माध्यम से सभी चीजों के परिणाम प्रकट किए जाएँगे ताकि बुरे को दंडित किया जा सके और अच्छे को पुरस्कृत किया जा सके, और अनगिनत लोग परमेश्वर के प्रभुत्व के सामने आत्मसमर्पण कर लें। यह समस्त कार्य धार्मिक ताड़ना और न्याय के माध्यम से पूरा करना होगा। चूँकि लोगों की भ्रष्टता अपने शिखर पर पहुँच गई है और उनका विद्रोहीपन अत्यंत गंभीर है, इसलिए केवल परमेश्वर का धार्मिक स्वभाव ही, जो मुख्यतः ताड़ना और न्याय से युक्त है और अंत के दिनों में प्रकट होता है, लोगों को पूरी तरह से परिवर्तित कर सकता है और उन्हें पूर्ण कर सकता है, बुराई को उजागर कर सकता है, और इस तरह सभी अधार्मिकों को गंभीर रूप से दंडित किया जाएगा। इसलिए इस तरह के स्वभाव में युग का महत्व निहित है। प्रत्येक नए युग के कार्य की खातिर परमेश्वर के स्वभाव का प्रकटन और खुलासा होता है। ऐसा नहीं है कि परमेश्वर अपने स्वभाव को मनमाने और निरर्थक ढंग से प्रकट करता है। मान लो कि लोगों के परिणामों के प्रकट होने के अंत के दिनों में अगर परमेश्वर अभी भी लोगों पर असीम दया और करुणा बरसाता रहता और उनसे प्रेम करता रहता, उन्हें धार्मिक न्याय के अधीन करने के बजाय उनके प्रति सहिष्णुता, धैर्य और क्षमा दर्शाता रहता और उन्हें माफ करता रहता, चाहे उनके पाप कितने भी गंभीर क्यों न हों, उन्हें रत्ती भर भी धार्मिक न्याय के अधीन न करता, तो फिर परमेश्वर के समस्त प्रबंधन का समापन कब होता? कब इस तरह का कोई स्वभाव सही मंजिल की ओर मानवजाति की अगुआई करने में सक्षम होगा? उदाहरण के लिए, किसी ऐसे न्यायाधीश को लो जो लोगों के प्रति हमेशा प्रेममय है, एक दयालु चेहरे और सौम्य हृदय वाला प्रेममय न्यायाधीश। लोगों ने चाहे जो भी अपराध किए हों वह उनसे प्यार करता है, और वे चाहे जो भी हों वह उनके प्रति प्रेममय और सहिष्णु रहता है। ऐसी स्थिति में वह कब न्यायोचित निर्णय पर पहुँचने में सक्षम होगा? अंत के दिनों के दौरान केवल धार्मिक न्याय ही लोगों को उनकी किस्म के अनुसार छाँट सकता है और उन्हें एक नए क्षेत्र में ला सकता है। इस तरह से परमेश्वर के न्याय और ताड़ना के धार्मिक स्वभाव के माध्यम से समस्त युग का अंत किया जाता है(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के कार्य का दर्शन (3))

जब हमने परमेश्वर के वचन पढ़ लिए, तो सुसी ने संगति करते हुए कहा, “व्यवस्था के युग में यहोवा परमेश्वर ने ऐसे स्वभाव को प्रकट किया जो मुख्यतः अभिशाप, दाहकता और क्रोध से परिपूर्ण था। उस दौरान लोगों में समझ की भारी कमी थी। उन्हें पता ही नहीं था कि पाप क्या होता है, उन्हें कैसे जीना चाहिए या परमेश्वर की आराधना कैसे करनी चाहिए, तो उस समय की उनकी जरूरतों के अनुसार परमेश्वर ने लोगों के मार्गदर्शन के लिए व्यवस्थाएँ और आज्ञाएँ जारी कीं। परमेश्वर की व्यवस्थाओं का पालन करने वालों को उसकी दया प्राप्त हुई, लेकिन जिन्होंने व्यवस्था का उल्लंघन किया, वे दंडित किए गए और परमेश्वर की स्वर्गिक आग में झुलस गए या पत्थरों से मार डाले गए। लेकिन व्यवस्था के युग के अंत में लोग ज्यादा भ्रष्ट होते गए, न चाहते हुए भी अक्सर पाप और व्यवस्था का उल्लंघन करने लगे, अगर उनके कार्यों को उस समय की व्यवस्था के अनुसार आंका जाता, तो उन सभी को मौत के घाट उतार दिया गया होता। फिर अनुग्रह के युग में परमेश्वर ने स्वयं मानवजाति को उनकी आवश्यकताओं के अनुसार छुटकारा दिलाने के लिए देहधारी होकर अपना स्वभाव दिखाया जो मुख्य रूप से दया और प्रेम का है और लोगों को भरपूर अनुग्रह प्रदान किया। वह उनके साथ असीम दया और प्रेम से पेश आता था, उनके पाप सहन और क्षमा करता था और अंततः सभी लोगों को उनके पापों से छुटकारा दिलाते हुए पाप-बलि के रूप में सूली पर चढ़ गया। उसने व्यवस्था द्वारा उनकी सजा माफ कर दी और जीवित रहने दिया। अनुग्रह के युग में अगर परमेश्वर अपने स्वभाव को मुख्य रूप से शाप, दाहकता और क्रोध के रूप में व्यक्त करना जारी रखता, तो लोगों के पाप कभी क्षमा नहीं होते, व्यवस्था के तहत लोगों को कभी छुटकारा न मिलता, मानवजाति एकदम शून्य हो जाती और वह वहाँ न होती जहाँ आज है। इसलिए परमेश्वर ने अनुग्रह के युग में अपना स्वभाव व्यक्त किया जो मुख्यतः दया और प्रेम का है। अगर लोग परमेश्वर के सामने आकर उसका छुटकारा स्वीकारते हैं, अपने पाप कबूलकर प्रायश्चित्त करते हैं, तो वह उनके पाप क्षमा कर देता है। अंत के दिनों में लोग बहुत ज्यादा भ्रष्ट हो गए हैं। प्रभु यीशु के हाथों छुटकारा पाने और पाप क्षमा किए जाने के बावजूद अहंकार, कपट, बुराई, हठधर्मिता और क्रूरता जैसी हमारी पापी प्रकृति अभी भी हमारे भीतर गहराई से जड़ें जमाए हुए है। हमारा शैतानी स्वभाव अभी भी पूरी तरह से जड़ से उखाड़ा नहीं गया है, इसलिए हम अभी भी अक्सर झूठ बोलते हैं, पाप करते हैं, परमेश्वर से विद्रोह करते हैं और उसका विरोध करते हैं। हम अभी भी परमेश्वर के राज्य में प्रवेश करने योग्य नहीं हैं। मानवजाति को बचाने और हमें पाप से पूरी तरह मुक्त करने के लिए परमेश्वर ने फिर से देहधारण किया है, वह प्रभु यीशु के कार्य की नींव पर अपने वचनों से न्याय और शुद्धिकरण का कार्य कर रहा है ताकि वह हमारे शैतानी स्वभावों को समूल नष्ट कर दे, हमें पाप से शुद्ध कर दे और हमें परमेश्वर के प्रति सच्चे ढंग से समर्पण करने दे और उसका भय मानने दे, और अंततः हमें अपने राज्य में ले जा सके। अपने कार्य की जरूरतों के कारण परमेश्वर अब अपना दयालु और प्रेममय स्वभाव व्यक्त नहीं करता, बल्कि इंसान के भ्रष्ट स्वभाव का न्याय करने और उसे उजागर करने के लिए अपना धार्मिक, प्रतापी और क्रोधी स्वभाव प्रकट करता है। ऐसा करके ही वह मानवता को रूपांतरित और शुद्ध कर सकता है। हालाँकि हर युग में परमेश्वर जो स्वभाव मुख्य रूप से प्रकट करता है वह भिन्न होता है, लेकिन परमेश्वर का सार कभी नहीं बदलता। परमेश्वर अपने कार्य और भ्रष्ट मानवता की जरूरतों के अनुसार कार्य करता है और अपना स्वभाव व्यक्त करता है, ताकि लोग परमेश्वर को बेहतर ढंग से समझ और जान सकें, उसे और उसके स्वभाव को सीमांकित न करें। सर्वशक्तिमान परमेश्वर और प्रभु यीशु अलग-अलग स्वभाव व्यक्त करते हैं, इस वजह से हमें उन्हें अलग नहीं समझना चाहिए।” सुसी की संगति सुनकर ही मुझे एहसास हुआ कि परमेश्वर अपने उद्धार कार्य की आवश्यकताओं और भ्रष्ट मानवता की जरूरतों के आधार पर तय करता है कि उसे हर युग में कैसा स्वभाव प्रकट करना है। अंत के दिनों में अपने न्याय के कार्य में सर्वशक्तिमान परमेश्वर अपना धार्मिक और प्रतापी स्वभाव प्रकट करता है ताकि मानवजाति को शुद्ध कर बचाया जा सके—भले ही वह प्रभु यीशु से अलग स्वभाव व्यक्त करता हो, उसका प्रकटन भ्रष्ट मानवता की जरूरतों को पूरा करने के लिए ही होता है। सर्वशक्तिमान परमेश्वर और प्रभु यीशु दोनों एक ही परमेश्वर हैं। सुसी की संगति बहुत स्पष्ट थी जिसने मेरी सारी उलझनें दूर कर दीं।

अगली सभा में बहन वनेसा ने मुझे सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों का एक और अंश पढ़कर सुनाया : “परमेश्वर द्वारा मनुष्य की पूर्णता किन साधनों से संपन्न होती है? वह परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव के माध्यम से संपन्न होती है। परमेश्वर के स्वभाव में मुख्यतः धार्मिकता, कोप, प्रताप, न्याय और शाप शामिल हैं और वह मनुष्य को मुख्य रूप से अपने न्याय के माध्यम से पूर्ण बनाता है। कुछ लोग समझते नहीं हैं और पूछते हैं, ऐसा क्यों है कि परमेश्वर केवल न्याय और शाप के जरिए ही मनुष्य को पूर्ण बनाता है। वे कहते हैं, ‘यदि परमेश्वर मनुष्य को शाप दे तो क्या वह मर नहीं जाएगा? यदि परमेश्वर को मनुष्य का न्याय करना पड़े तो क्या मनुष्य को दोषी नहीं ठहराया जाएगा? तो फिर भी वह पूर्ण कैसे बनाया जा सकता है?’ ऐसे शब्द उन लोगों के होते हैं जो परमेश्वर के कार्य को नहीं जानते। परमेश्वर जिस चीज को शाप देता है वह है मनुष्य की विद्रोहशीलता और वह जिस चीज का न्याय करता है वे हैं मनुष्य के पाप। यूँ तो वह कठोरतापूर्वक बोलता है और मनुष्य की भावनाओं का बिल्कुल भी लिहाज नहीं करता है और वह सब उजागर करता है जो मनुष्य के भीतर होता है, कुछ कठोर वचनों के जरिए वह सब उजागर करता है जो मनुष्य के भीतर सारभूत है, ऐसे न्याय के जरिए वह मनुष्य को देह के सार का गहन ज्ञान प्रदान करता है और इस प्रकार मनुष्य परमेश्वर के समक्ष समर्पण कर देता है। मनुष्य की देह पाप की है और शैतान की है, यह विद्रोही है और यह परमेश्वर की ताड़ना की वस्तु है। इसलिए मनुष्य को खुद को जानने देने के लिए उस पर परमेश्वर के न्याय के वचन पड़ने ही चाहिए और हर प्रकार के शोधन का प्रयोग किया जाना चाहिए; तभी परमेश्वर का कार्य प्रभावी हो सकता है(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, पीड़ादायक परीक्षणों के अनुभव से ही तुम परमेश्वर की मनोहरता को जान सकते हो)। परमेश्वर के वचन पढ़कर बहन वनेसा ने अपनी संगति में कहा, “अंत के दिनों में परमेश्वर का न्याय और शुद्धिकरण का कार्य मानवजाति के उद्धार में कार्य का अंतिम चरण है और यह उसकी 6,000 साल की प्रबंधन योजना का अंतिम छोर है। अपना धार्मिक और प्रतापी स्वभाव व्यक्त करते हुए वह पूरे युग को समाप्त कर रहा है और हर एक को उसकी किस्म के अनुसार अच्छे और बुरे में छाँट रहा है। अगर परमेश्वर केवल दयालु और प्रेममय स्वभाव ही व्यक्त करे, हमेशा सहनशील, सहिष्णु और हमारे प्रति क्षमाशील बना रहे, तो फिर हम कितने भी पाप करें, हम अपने पापों से कभी मुक्त नहीं हो पाएँगे और हमेशा के लिए शैतान की ताकत के अधीन रहकर तबाह होते रहेंगे। फिर कभी भी परमेश्वर का उद्धार कार्य पूरा नहीं हो पाएगा और न ही कभी अच्छे-बुरे में ठीक से भेद हो पाएगा। इसलिए अंत के दिनों में परमेश्वर अपने कार्य में धार्मिक, प्रतापी और क्रोधी स्वभाव व्यक्त करता है और अपने कठोर शब्दों से लोगों की शैतानी प्रकृति को उजागर करता है। सत्य से प्रेम करने वाले खुद को जानकर परमेश्वर के वचनों का न्याय और ताड़ना स्वीकार लेते हैं और परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव को समझ लेते हैं जो अपराध सहन नहीं करता, इस प्रकार उनके हृदय में परमेश्वर का भय पैदा होता है और वे बुराई से दूर रहते हैं, जिससे उनके स्वभाव में बदलाव आता है। जो सत्य से विमुख होते हैं, परमेश्वर के न्याय और ताड़ना को नकार देते हैं, उन्हें परमेश्वर बेनकाब कर हटा देता है। इस तरह सबको उनकी किस्म के अनुसार छाँटा जाता है।” मुझे एहसास हुआ, अगर सर्वशक्तिमान परमेश्वर अंत के दिनों में अपना न्याय कार्य ठीक उसी तरह करे जैसे प्रभु यीशु ने छुटकारे का कार्य किया था, अगर वह केवल लोगों पर दया, प्रेम दिखाए और कठोरता दिखाए बिना उनका न्याय करे, तो वह हर एक को उसकी किस्म के अनुसार नहीं छाँट पाएगा, फिर हमारी पापी और परमेश्वर-विरोधी प्रकृति कभी दूर नहीं होगी, तब न तो हम कभी बचाए जा सकेंगे और न ही परमेश्वर के राज्य में प्रवेश कर पाएँगे। तो अंत के दिनों में परमेश्वर के धार्मिकता, प्रताप, न्याय और ताड़ना से निरूपित स्वभाव को व्यक्त करना बेहद सार्थक है!

बाद में हमने सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों के दो अंश पढ़े, जिनसे मुझे सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अंत के दिनों के कार्य और उसके द्वारा व्यक्त स्वभाव की और ज्यादा समझ हासिल हुई। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “आज परमेश्वर तुम लोगों का न्याय करता है, तुम लोगों को ताड़ना देता है और तुम्हें दोषी ठहराता है, लेकिन तुम्हें यह जानना चाहिए कि तुम्हें दोषी इसलिए ठहराया जाता है, ताकि तुम स्वयं को जान सको। वह दोषी ठहराता है, शाप देता है, न्याय करता और ताड़ना देता है, ताकि तुम स्वयं को जान सको, ताकि तुम्हारे स्वभाव में परिवर्तन हो सके और उससे भी बढ़कर तुम अपनी कीमत जान सको और यह देख सको कि परमेश्वर के सभी कार्य धार्मिक और उसके स्वभाव और उसके कार्य की आवश्यकताओं के अनुसार हैं और वह मनुष्य के उद्धार के लिए अपनी योजना के अनुसार कार्य करता है और यह कि वह धार्मिक परमेश्वर है, जो मनुष्य को प्यार करता है और उसे बचाता है और जो उसका न्याय करता है और उसे ताड़ना भी देता है। ... परमेश्वर लोगों को मार गिराने या नष्ट करने के लिए नहीं, बल्कि उनका न्याय करने, उन्हें शाप देने, ताड़ना देने और बचाने के लिए आया है(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, तुम्हें सामाजिक प्रतिष्ठा के आशीष को परे रखना चाहिए और मनुष्य का उद्धार लाने का परमेश्वर का इरादा समझना चाहिए)। “यद्यपि मेरे वचन कठोर हैं, किंतु वे सब मनुष्य के लिए उद्धार हैं, क्योंकि मैं केवल वचन बोल रहा हूँ, मनुष्य की देह को दंडित नहीं कर रहा हूँ। इन वचनों के कारण मनुष्य प्रकाश में रह पाता है, यह जान पाता है कि प्रकाश मौजूद है, यह जान पाता है कि प्रकाश अनमोल है, और, इससे भी बढ़कर, यह जान पाता है कि ये वचन उसके लिए कितने फायदेमंद हैं, साथ ही यह भी जान पाता है कि परमेश्वर उद्धार है। यद्यपि मैंने ताड़ना और न्याय के बहुत-से वचन कहे हैं, लेकिन कुछ भी वास्तव में तुम लोगों पर नहीं आया है। मैं सटीक रूप से अपना काम करने और अपने वचन बोलने के लिए आया हूँ, और भले ही मेरे वचन कड़े हैं, लेकिन वे तुम्हारी भ्रष्टता और विद्रोहशीलता का न्याय करने के लिए बोले जाते हैं। मेरे ऐसा करने का उद्देश्य मनुष्य को शैतान की सत्ता से बचाना है। मेरा उद्देश्य अपने वचनों का उपयोग कर मनुष्य को बचाना है; यह अपने वचनों से मनुष्य को नुकसान पहुँचाना नहीं है। मेरे वचन कठोर इसलिए हैं, ताकि मेरे कार्य में परिणाम प्राप्त हो सकें। केवल ऐसे कार्य से ही मनुष्य खुद को जान सकता है और अपने विद्रोही स्वभाव से दूर हो सकता है(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, तुम्हें सामाजिक प्रतिष्ठा के आशीष को परे रखना चाहिए और मनुष्य का उद्धार लाने का परमेश्वर का इरादा समझना चाहिए)। बहन वनेसा ने संगति करते हुए कहा, “परमेश्वर के वचनों से हम जान सकते हैं कि अंत के दिनों में परमेश्वर अपने वचनों से लोगों का न्याय और शुद्धिकरण करता है। उसके वचन कितने भी कठोर और कटु हों, उनका उद्देश्य यही होता है कि हम अपनी भ्रष्टता की सच्चाई को पहचान लें, शैतान के अंधकारमय प्रभाव से मुक्त हों और परमेश्वर का उद्धार प्राप्त करें। हम सब जानते हैं कि परमेश्वर का स्वभाव धार्मिक और पवित्र है, जबकि शैतान के हाथों बुरी तरह से भ्रष्ट हुए हम इंसान, दुष्ट सांसारिक प्रवृत्तियों के पीछे भागते हैं, धन-दौलत और लाभ के लिए आपस में लड़ते हैं और एक-दूसरे के खिलाफ साजिश रचते हैं, हममें एक सच्चे इंसान की थोड़ी-सी भी झलक नहीं होती। यहाँ तक कि प्रभु के विश्वासी भी उसकी अपेक्षाओं के अनुसार अभ्यास नहीं कर पाते, बल्कि उससे अनुग्रह और आशीष ही माँगते रहते हैं। वे जो भी योगदान करते हैं वह सिर्फ स्वर्ग में प्रवेश करने और अनंत जीवन पाने के लिए होता है, न कि इसलिए कि वे प्रभु से प्रेम करते हैं और उसे संतुष्ट करना चाहते हैं। यह सब केवल अपना नीच मकसद पूरा करने की खातिर प्रभु का इस्तेमाल करने के लिए होता है। कुछ धार्मिक अगुआ विनम्र, धैर्यवान और परमेश्वर के उत्साही सेवक दिखते हैं, लेकिन लोगों से प्रशंसा और सम्मान पाने के लिए वे अपने उपदेशों में अक्सर अपना उत्कर्ष करते और अपनी ही गवाही देते हैं। जब परमेश्वर कार्य करने के लिए देहधारण कर वापस प्रकट हुआ, तो किसी ने उसका स्वागत नहीं किया, उसकी वापसी की निंदा और विरोध करने के लिए धार्मिक जगत ने नास्तिक सरकार के साथ मिलकर सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया को बदनाम किया और लोगों को सच्चे मार्ग की जाँच करने से रोकने के लिए जानबूझकर अफवाहें गढ़ीं। यानी पूरी मानवजाति परमेश्वर की निंदा और विरोध कर रही है और उसके आगमन को नकार रही है। जैसा कि बाइबल कहती है : ‘सारा संसार उस दुष्ट के वश में पड़ा है(1 यूहन्ना 5:19)। भ्रष्ट मानवजाति हर तरह से परमेश्वर का विरोध करती है। सभी लोग शैतान और जहरीले सांपों की तरह हैं। परमेश्वर जब मानवजाति की भ्रष्टता की वास्तविकता को उजागर करने के लिए कठोर वचन व्यक्त करता है, तो सिर्फ सत्य से प्रेम करने वाले ही अपना परमेश्वर-विरोधी और उससे दगा करने वाला शैतानी स्वभाव पहचान पाते हैं और समझ पाते हैं कि अपनी आस्था में वे परमेश्वर को जानना नहीं चाहते, उनका मकसद सिर्फ परमेश्वर का आशीष पाना और उससे सौदेबाजी करना होता है। वे शैतान के हाथों अपनी भयंकर भ्रष्टता की कड़वी सच्चाई को स्पष्ट रूप से देखकर ईमानदारी से परमेश्वर के सामने पश्चात्ताप करते हैं, उसकी अपेक्षाओं के अनुसार आचरण करने का संकल्प लेते हैं और अंततः कुछ मानव की समानता प्राप्त कर पाते हैं। इससे हम जान सकते हैं कि परमेश्वर के वचन चाहे कितने भी कठोर और कटु हों, वे सभी हमारी भ्रष्टता की सच्चाई को उजागर करते हैं, और ये सब हमारी सुन्न आत्माओं को पुनर्जीवित करने, हमें अपने भ्रष्ट सार को पहचानने, पाप की बेड़ियों से पूरी तरह मुक्त होने और शुद्ध होने में हमारी मदद करने के लिए हैं। परमेश्वर के उजागर करने और न्याय के कठोर वचन हमें स्वयं को जानने और बचाए जाने के लिए बहुत फायदेमंद हैं!” बहन वनेसा की संगति सुनकर अंततः मुझे एहसास हुआ कि परमेश्वर ने अंत के दिनों में हमारे असली स्वरूप को उजागर करने के लिए इतने कठोर वचन व्यक्त किए हैं। यह उसका उद्धार है, निंदा नहीं। मुझे ख्याल आया कि कैसे मैं परमेश्वर में केवल आशीष और अनुग्रह पाने के लिए विश्वास करती थी, यहाँ तक कि परमेश्वर को दयालु और प्रेममय के रूप में सीमित करती थी और जब वह कठोर ढंग से बोलता था तो उसे मानना नहीं चाहती थी। मैं बहुत विवेकशून्य थी! तब से मैं परमेश्वर के कठोर और न्याय करने वाले वचनों को स्वीकारने लगी और मेरे मन में सर्वशक्तिमान परमेश्वर के और वचन पढ़ने की इच्छा भी जाग उठी। मुझे यकीन हो गया कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर ही लौटकर आया प्रभु यीशु है।

सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अंत के दिनों के कार्य के सत्य होने की पुष्टि के बाद मैं पूरे जोश से सभाओं में भाग लेने लगी और हर दिन सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन पढ़ने लगी। एक दिन मैंने परमेश्वर के वचनों का यह अंश देखा : “यदि लोग अनुग्रह के युग में अटके रहेंगे, तो वे कभी भी अपने भ्रष्ट स्वभाव से छुटकारा नहीं पाएँगे, परमेश्वर के अंतर्निहित स्वभाव को जानने की बात तो दूर है! यदि लोग सदैव अनुग्रह की प्रचुरता में रहते हैं, परंतु उनके पास जीवन का वह मार्ग नहीं है, जो उन्हें परमेश्वर को जानने और उसे संतुष्ट करने में समर्थ बनाता है, तो वे परमेश्वर पर अपने विश्वास में उसे वास्तव में कभी भी प्राप्त नहीं करेंगे। इस प्रकार का विश्वास वास्तव में दयनीय है। जब तुम इस पुस्तक को पूरा पढ़ लोगे, जब तुम राज्य के युग में देहधारी परमेश्वर के कार्य के प्रत्येक चरण का अनुभव कर लोगे, तब तुम महसूस करोगे कि अनेक वर्षों की तुम्हारी आशाएँ अंततः साकार हो गई हैं। तुम महसूस करोगे कि केवल अब तुमने परमेश्वर को वास्तव में आमने-सामने देखा है; केवल अब तुमने परमेश्वर के चेहरे को निहारा है, उसके व्यक्तिगत कथन सुने हैं, उसके कार्य की बुद्धिमत्ता को समझा है, और वास्तव में महसूस किया है कितना व्यावहारिक और सर्वशक्तिमान है वह। तुम महसूस करोगे कि तुमने ऐसी बहुत-सी चीजें पाई हैं, जिन्हें अतीत में लोगों ने न कभी देखा था, न ही प्राप्त किया था। इस समय, तुम स्पष्ट रूप से जान लोगे कि परमेश्वर पर विश्वास करना क्या होता है, और परमेश्वर के इरादों के अनुरूप होना क्या होता है। निस्संदेह, यदि तुम अतीत के विचारों से चिपके रहते हो, और परमेश्वर के दूसरे देहधारण के तथ्य को अस्वीकार या उससे इनकार करते हो, तो तुम खाली हाथ रहोगे और कुछ नहीं पाओगे, और अंततः परमेश्वर का विरोध करने के दोषी ठहराए जाओगे। वे जो सत्य के प्रति समर्पण करते हैं और परमेश्वर के कार्य के प्रति समर्पण करते हैं, उनका दूसरे देहधारी परमेश्वर—सर्वशक्तिमान—के नाम पर दावा किया जाएगा। वे परमेश्वर का व्यक्तिगत मार्गदर्शन स्वीकार करने में सक्षम होंगे, वे अधिक और उच्चतर सत्य और वास्तविक जीवन प्राप्त करेंगे। वे उस दर्शन को निहारेंगे, जिसे अतीत के लोगों द्वारा पहले कभी नहीं देखा गया था : ‘तब मैं ने उसे, जो मुझ से बोल रहा था, देखने के लिए अपना मुँह फेरा; और पीछे घूमकर मैं ने सोने की सात दीवटें देखीं, और उन दीवटों के बीच में मनुष्य के पुत्र सदृश एक पुरुष को देखा, जो पाँवों तक का वस्त्र पहिने, और छाती पर सोने का पटुका बाँधे हुए था। उसके सिर और बाल श्‍वेत ऊन वरन् पाले के समान उज्ज्वल थे, और उसकी आँखें आग की ज्वाला के समान थीं। उसके पाँव उत्तम पीतल के समान थे जो मानो भट्ठी में तपाया गया हो, और उसका शब्द बहुत जल के शब्द के समान था। वह अपने दाहिने हाथ में सात तारे लिए हुए था, और उसके मुख से तेज दोधारी तलवार निकलती थी। उसका मुँह ऐसा प्रज्‍वलित था, जैसा सूर्य कड़ी धूप के समय चमकता है’ (प्रकाशितवाक्य 1:12-16)। यह दर्शन परमेश्वर के संपूर्ण स्वभाव की अभिव्यक्ति है, और उसके संपूर्ण स्वभाव की यह अभिव्यक्ति वर्तमान देहधारण में परमेश्वर के कार्य की अभिव्यक्ति भी है। ताड़ना और न्याय की निरंतर धारा में, मनुष्य का पुत्र कथनों के माध्यम से अपने अंतर्निहित स्वभाव को अभिव्यक्त करता है, और उन सबको जो उसकी ताड़ना और न्याय स्वीकार करते हैं, मनुष्य के पुत्र के वास्तविक चेहरे को निहारने की अनुमति देता है, जो यूहन्ना द्वारा देखे गए मनुष्य के पुत्र के चेहरे का ईमानदार चित्रण है। (निस्संदेह, यह सब उनके लिए अदृश्य होगा, जो राज्य के युग में परमेश्वर के कार्यों को स्वीकार नहीं करते।) परमेश्वर का वास्तविक चेहरा मनुष्य की भाषा के इस्तेमाल द्वारा पूर्णतः व्यक्त नहीं किया जा सकता, और इसलिए परमेश्वर उन साधनों का इस्तेमाल करता है, जिनके द्वारा वह मनुष्य को अपना वास्तविक चेहरा दिखाने के लिए अपने अंर्तनिहित स्वभाव को अभिव्यक्त करने की विधि का उपयोग करता है(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, प्रस्तावना)। परमेश्वर के वचनों से मुझे एहसास हुआ कि प्रकाशितवाक्य में यूहन्ना को जो दर्शन मिला, वह परमेश्वर के संपूर्ण स्वभाव की अभिव्यक्ति है और यह पूर्वाभास देता है कि कैसे अंत के दिनों में सर्वशक्तिमान परमेश्वर के न्याय के वचन आग की लपटों या धारदार तलवार की तरह हैं और परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव से भरे हैं। जो लोग अंत के दिनों में सर्वशक्तिमान परमेश्वर का कार्य स्वीकार करते हैं वे ही वास्तव में परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव को समझ सकते हैं और उसके उस श्रमसाध्य इरादे को महसूस कर सकते हैं जो मानवजाति का न्याय करने और इसे बचाने के लिए उसके अपने वचनों का उपयोग करने में निहित होता है। मैंने हृदय से परमेश्वर का आभार माना, उसकी स्तुति की और सच्चे मन से प्रार्थना की, “हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर! तुम्हारे वचनों के प्रकाशन और न्याय से मैंने जान लिया है कि तुम न केवल प्रेममय और दयालु हो, बल्कि प्रतापी और क्रोधी भी हो। ये सब तुम्हारे निहित धार्मिक स्वभाव के पहलू हैं। हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर! तुम्हारे वचन वाकई अनमोल हैं। मैं अपने आपको जानने के लिए तुम्हारे वचनों के न्याय और ताड़ना को स्वीकार करना अपने लिए अत्यंत आवश्यक समझती हूँ। अब से मैं तुम्हारे वचनों को कर्मठता से खाऊँगी और पियूँगी, तुम्हारे वचनों के न्याय और ताड़ना को स्वीकार कर सत्य की खोज के मार्ग पर चलूँगी!”

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