सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया का ऐप

परमेश्वर की आवाज़ सुनें और प्रभु यीशु की वापसी का स्वागत करें!

सत्य को खोजने वाले सभी लोगों का हम से सम्पर्क करने का स्वागत करते हैं

अब मैं ख़राब कार्यक्षमता को बहाना नहीं बनाती

0

लिन रान, हेनान प्रांत

पहले, अपने कर्तव्य का निर्वाह करते समय जब भी मेरे सामने मुश्किलें आती या मुझसे कोई काम बिगड़ जाता, तो मैं सोचती थी कि उसकी वजह मेरी ख़राब कार्यक्षमता है। इसकी वजह से, मैं अक्सर नकारात्मक और निष्क्रिय अवस्था में रहती थी। जो काम मुझे मुश्किल लगते, उन्हें अक्सर दूसरों के मत्थे मढ़ने के लिये मैं अपनी ख़राब कार्यक्षमता का बहाना बनाती। मुझे इसमें गलत कुछ भी नहीं लगता था। मुझे लगता अगर मैं अपनी ख़राब कार्यक्षमता की वजह से किसी से कुछ करने के लिये कह रही हूँ, तो मैं कलीसिया के काम के लिए ही तो ऐसा कर रही हूँ। वैसे भी मैं इस काम को अच्छे से नहीं कर पाती। लेकिन जब मैंने परमेश्वर के वचनों को पढ़ा, तो मेरे ये गलत विचार बदल गये। मुझे एहसास हुआ कि मैं चीज़ों को अपनी धारणाओं और कल्पनाओं के चश्मे से देख रही हूँ। कुछ बातें मैंने अपने भ्रष्ट स्वभाव के बारे में भी सीखीं।

एक दिन, एक अगुवा ने मेरे पास एक दस्तावेज़ भेजा जिस पर तुरंत कार्रवाई करनी थी। मैं जिस बहन के साथ संयुक्त रूप से काम कर रही थी, वह किसी और काम में व्यस्त थी, इसलिये उसने कहा कि इस काम को मैं ही देख लूँ। मैंने फ़ौरन बहाने बनाने शुरू कर दिए: "मेरी कार्यक्षमता बहुत ख़राब है। मैं लेखन और संपादन में अच्छी नहीं हूँ। अगर इस काम को तुम्हीं करो तो अच्छा रहेगा।" इस तरह अगर मुझे कोई काम मुश्किल लगता, तो मैं उसे अपनी साथी के सिर पर डाल देती थी। बाद में, वह मुझसे बोली, "जब से हम लोग मिले हैं, तुम एक ही बात कहती रहती हो कि तुम्हारी कार्यक्षमता ख़राब है। लेकिन तुम्हारे साथ कुछ दिन रहकर, मैंने एक बात पर गौर किया है कि तुम काम में कोई न कोई समस्या ढूँढ़ लेती हो। मुझे नहीं लगता कि तुम्हारी कार्यक्षमता उतनी ख़राब है, लेकिन जब कभी तुम्हें काम करने में मुश्किल आती है, तो तुम यही कहना शुरू कर देती हो कि तुम्हारी कार्यक्षमता ख़राब है। कभी-कभी तो तुम अपना काम दूसरे के सिर पर डाल देती हो। मुझे समझ में नहीं आता कि किस मंशा से तुम हमेशा अपनी ख़राब कार्यक्षमता का ढिंढोरा पीटती रहती हो—मुझे तो लगता है कि तुम वाकई ढोंग कर रह हो!" यह सुनकर मैं अवाक रह गई, मेरे मन में चिढ़-सी पैदा हो गई: "अगर मैं कह रही हूँ कि मेरी कार्यक्षमता ख़राब है, तो मैं सच बोल रही हूँ। तुम्हें तथ्यों का पता नहीं है, तुमने मुझे गलत समझा है।" बाद में, मैंने इस बात पर गहराई से सोचा कि बहन ने ऐसा क्यों कहा। मैं झूठ नहीं कह रही थी कि मेरी कार्यक्षमता ख़राब है—वह मेरी मंशा पर सवाल कैसे उठा सकती है? मैं इस बात को समझ नहीं पा रही थी।

एक बार, अपने सहकर्मियों के साथ सभा के दौरान, मैंने दूसरे भाई-बहनों से अपनी इस दुविधा पर चर्चा की। मैंने एक-एक करके उन्हें वे सारे कारण बताए जिनकी वजह से मुझे लगता था कि मेरी कार्यक्षमता ख़राब है: मिसाल के तौर पर, मेरी टाइपिंग धीमी थी, मेरा लिखने का तरीका इतना अच्छा नहीं था। जब मैं अपने साथी के साथ काम करती थी, तो टाइपिंग और संपादन का ज़्यादातर काम वही करती थी, जब वह किसी दस्तावेज़ को पढ़ती थी, तो गलती तुरंत उसकी पकड़ में आ जाती थी, जबकि मेरी गति बहुत धीमी है, वगैरह। मेरीसहभागितासुनकर, हमारे अगुवा भाई लियू बोले, "बहन, क्या इन बातों के आधार पर हम तय करते हैं कि किसी की कार्यक्षमता अच्छी है या ख़राब है? क्या यह सत्य के अनुरूप है? क्या ये परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप है? हम सब जानते हैं कि दुनिया में लोग प्रतिभा और बुद्धि की ज़्यादा ही कद्र करते हैं। जो लोग हाज़िरजवाब होते हैं, अच्छा बोलते हैं, दुनियादारी के मामलों में कुशल होते हैं, वे अच्छी कार्यक्षमता वाले होते हैं, और जो लोग बोलने में अनाड़ी होते हैं, अज्ञानी और कम पढ़े-लिखे होते हैं, उन्हें ख़राब कार्यक्षमता वाला समझा जाता है; अविश्वासीइस चीज़ को इसी तरह से देखते हैं। हम परमेश्वर में विश्वास रखने वालों को चीज़ों को परमेश्वर के वचनों के आधार पर देखना चाहिये। क्या इस मामले में हमने परमेश्वर की इच्छा को जानने का प्रयास किया है? परमेश्वर किस आधार पर तय करता है कि किसी की कार्यक्षमता अच्छी है या ख़राब है? और ये अच्छी और ख़राब कार्यक्षमता क्या होती है?" मैं बस अपना सिर ही हिला रही थी। भाई ली ने सहभागिता जारी रखी: "आइये उपदेश का एक अंश पढ़ें: 'किसी की कार्यक्षमता अच्छी है या ख़राब है, यह इस बात से संबंध रखता है कि वह परमेश्वर के वचनों को कितने अच्छे ढंग से समझता है। अगर उसके समझने की क्षमता अच्छी है, तो इसका मतलब है कि जब वह परमेश्वर के वचनों को पढ़ता है, तो वह शाब्दिक अर्थ को भेद कर, परमेश्वर की इच्छा को ग्रहण कर सकता है, वह परमेश्वर के वचनों से सत्य को प्राप्त कर सकता है, और जान सकता है कि परमेश्वर की इच्छा के अनुसरण को सुनिश्चित करने के लिये कैसे कार्य करना चाहिये। समझदारी की ऐसी क्षमता के होने का अर्थ है कि उस व्यक्ति की कार्यक्षमता अच्छी है। कार्यक्षमता और प्रतिभा दोनों एक ही चीज़ नहीं हैं। यह हाज़िरजवाब और काबिल होने जैसा नहीं है। कुछ लोग देखने में तो बड़े स्मार्ट लगते हैं, लेकिन जब परमेश्वर के वचनों को समझने की बात आती है, तो बड़े अनाड़ी साबित होते हैं। जब अविश्वासी अच्छी कार्यक्षमता की बात करते हैं, तो उसका अर्थ यही होता है, लेकिन ये बातें परमेश्वर के घर में टिक नहीं पातीं। कुछ लोग विश्वविद्यालय के विद्यार्थी या बहुत चतुर होते हैं, लेकिन परमेश्वर के घर में ऐसे लोग एकदम भोंदू सिद्ध होते हैं, ये लोग सत्य में प्रवेश करने लायक बिल्कुल नहीं होते। क्या आप उन्हें अच्छी कार्यक्षमता वाला कह सकते हैं? कुछ लोग ऐसे होते हैं जिनकी पढ़ाई-लिखाई केवल प्राथमिक विद्यालय तक ही सीमित होती है, उनका नौकरी-व्यवसाय भी कोई विशेष नहीं होता, लेकिन फिर भी वे लोग सफलतापूर्वक सत्य का अनुसरण करके, ऐसे इंसान बन जाते हैं जिन्हें परमेश्वर की सराहना प्राप्त होती है। बस ऐसे लोग ही अच्छी कार्यक्षमता वाले होते हैं। केवल शिक्षा का स्तर ही सब-कुछ नहीं होता। बड़ी बात यह है कि क्या लोग आत्मा को समझते हैं' (ऊपर से संगति)। इस सहभागिता से हमने इस बात को समझा है कि किसी की कार्यक्षमता अच्छी है या बुरी है, यह इस बात पर निर्भर है कि परमेश्वर के वचनों को समझने की उसकी योग्यता कितनी है। जब अविश्वासी लोग किसी को प्रतिभाशाली या स्मार्ट कहते हैं तो उनका मतलब ये नहीं होता। अच्छी कार्यक्षमता वाले लोग परमेश्वर के वचनों को पढ़कर परमेश्वर की इच्छा को समझ सकते हैं, वे लोग अभ्यास का मार्ग ढूँढ़कर, सत्य में प्रवेश कर सकते हैं, और परमेश्वर की अपेक्षानुसार अभ्यास कर सकते हैं। जबकि दूसरी ओर, ऐसे लोग भी हैं जो स्मार्ट दिखते हैं, और दुनियादारी के मामलों को संभालने में भी कुशल होते हैं—लेकिन परमेश्वर के वचनों के सत्य का सामना करते ही वे भौंचक्के रह जाते हैं। ऐसे लोगों को अच्छी कार्यक्षमता वाला नहीं कहा जा सकता। यह बिल्कुल वैसे ही है जैसे कोई जानकार और शिक्षित व्यक्ति देखने में तो बड़ा प्रतिभाशाली और अक्लमंद लगता है, लेकिन वह परमेश्वर के वचनों के सत्य को समझने के काबिल नहीं होता। ऐसी बातों पर उनमें से कुछ लोगों का नज़रिया तो बहुत ही बेतुका होता है। इसलिये, ऊँची शिक्षा पा लेना, हाज़िर जवाब और काबिल होना, अच्छी कार्यक्षमता होने का परिचायक नहीं है, न ही ये वे मानक हैं जिनसे किसी की कार्यक्षमता को मापा जाता है। मुख्य बात यह है कि क्या लोग आत्मा को समझते हैं, क्या लोग सत्य को समझने के योग्य हैं। किसी की कार्यक्षमता अच्छी है या बुरी है, इसे मापने के लिये हम अपनी धारणाओं और कल्पनाओं का सहारा नहीं ले सकते!" इतना सुनकर, मुझे अचानक रोशनी दिखाई दी: इन बातों से ज़ाहिर है कि मेरे विचार महज़ मेरी धारणाएँ और कल्पनाएँ हैं—ये सत्य के अनुरूप नहीं हैं।

फिर, एक बहन ने परमेश्वर के वचनों के दो अंश खोजे जो उसने मुझे पढ़ने के लिये कहे। परमेश्वर के वचन कहते हैं: "जब कोई व्यक्ति गंभीर, जिम्मेदार, समर्पित, और कड़ी मेहनत करने वाला होता है, तो काम सही तरीके से पूरा किया जाएगा। ...लोगों का सहयोग बहुत ही महत्वपूर्ण है, उनके दिल बहुत ही महत्वपूर्ण हैं, और वे अपने सोच और विचार को किस दिशा में ले जाते हैं, वह भी बहुत महत्वपूर्ण है। जहां तक लोगों के इरादों और कर्तव्यों को पूरा करने में उनके द्वारा किये गये प्रयासों की बात है, परमेश्वर इनकी जाँच करता है और इन्हें देख सकता है। यह बहुत महत्वपूर्ण है कि लोग जो भी करें उसमें वे अपनी पूरी ताकत और दिल लगायें। उनका आपसी सहयोग भी महत्वपूर्ण है। अपने पूरे किये गये कर्तव्य और अपने पिछले कार्यों को लेकर कोई अफ़सोस न रहे इसके लिए प्रयास करना और उस स्थिति में पहुंचना जहां उस पर परमेश्वर का कोई ऋण न रहे—अपनी पूरी ताकत और दिल लगाने का यही अर्थ है" ("मसीह की बातचीतों के अभिलेख" में "अपना कर्तव्‍य करते हुए गैरज़िम्‍मेदार और असावधान होने की समस्‍या का समाधान कैसे करें")। "अगर तुमने सत्य का सामना करने के लिये सही रवैया अपनाया है, तुम्हारे अंदर सत्य को स्वीकार करने की प्रवृत्ति है, और तुम एक विनम्र व्यवहार को अपनाते हो, तो भले ही तुम्हारी क्षमता कम हो, परमेश्वर फिर भी तुम्हें प्रबुद्ध करेंगे और तुम्हें कुछ न कुछ हासिल करने देंगे। अगर तुम्हारे पास अच्छी क्षमता है लेकिन तुम हमेशा अभिमानी बने रहते हो, निरंतर यह सोचते हो कि तुम ही सही हो और हमेशा दूसरों की कही किसी भी बात को स्वीकार करने के लिए अनिच्छुक रहते हो, और हमेशा प्रतिरोध करते हो, तो परमेश्वर तुम्हारे अंदर काम नहीं करेगा। परमेश्वर यही कहेगा कि तुम्हारा स्वभाव बुरा है और तुम कुछ भी पाने के लायक नहीं हो। परमेश्वर उस चीज़ को भी ले लेगा जो कभी तुम्हारे पास था। इसे ही उजागर किया जाना कहते हैं" ("मसीह की बातचीतों के अभिलेख" में "केवल सत्‍य पर अमल कर के ही कोई सामान्‍य मानवता पा सकता है")। बहन ने कहा, "परमेश्वर के वचन बताते हैं कि अपने कर्तव्य का निर्वाह करते समय, हमारा रवैया बहुत महत्वपूर्ण होता है—निर्णायक होता है। अगर हमारी मानसिकता सही है, अगर हम अपने कर्तव्य पालन में अपना पूरा दिल, पूरी ऊर्जा लगा सकते हैं, तो परमेश्वर हमें कर्तव्य पालन के प्रति हमारे रवैये के अनुसार देखेगा, और उसी के मुताबिक हम से पेश आएगा। अगर हमारी कार्यक्षमता ख़राब भी है, तो भी परमेश्वर हमें प्रबुद्ध और हमारा मार्गदर्शन करेगा। अगर हमारी मानसिकता सही नहीं है, अगर हम कोई कीमत चुकाने और परमेश्वर का साथ देने को तैयार नहीं हैं, तो हम न केवल अपने कर्तव्य से कोताही करेंगे, बल्कि परमेश्वर भी हमें नकार देगा। अगर हम अपने आस-पास के भाई-बहनों को परमेश्वर के वचनों के ज़रिये देखें, तो हम पाएँगे कि कुछ की कार्यक्षमता तो साधारण है लेकिन अपने कर्तव्य के प्रति उनमें सही अभिप्रेरणा है; मुश्किलों में वे सत्य को खोजने का दायित्व अपने ऊपर लेते हैं, सिद्धांतों में प्रवेश पर ध्यान देते हैं, और वे अपने कर्तव्य पालन में निरंतर प्रभावी होते जाते हैं। जबकि दूसरी ओर ऐसे भाई-बहन भी होते हैं, जो हमें विशेष रूप से अच्छी कार्यक्षमता वाले दिखते हैं, जिनमें परमेश्वर के वचनों की शुद्ध समझ होती है, लेकिन चूँकि वे दम्भी, और आत्मसंतुष्ट होते हैं, इसलिये वे दूसरों की सलाह को नहीं मानते, जब कभी उन्हें अपने काम में छोटी-मोटी सफलता मिलती है, वे परमेश्वर की महिमा स्वयं ले लेते हैं। अंतत: ऐसे लोग पवित्र आत्मा के कार्य को गँवा देते हैं। कुछ लोग तो कलीसिया के कार्य को ही बाधित कर देते हैं, और गंभीर मामलों में ऐसे लोगों को उनके कर्तव्य निभाने की पात्रता से ही वंचित कर दिया जाता है। कुछ गंभीर मामलों में तो, ऐसे लोगों को कलीसिया निष्कासित कर दिया जाता है। इन तथ्यों से साफ़ ज़ाहिर है कि किसी व्यक्ति की अच्छी या बुरी कार्यक्षमता से यह तय नहीं होता कि उसे परमेश्वर की सराहना प्राप्त होगी या नहीं; महत्वपूर्ण यह है कि वह सत्य का अनुसरण करता है या नहीं।" फिर, भाई-बहन अपने आपको अपनी धारणाओं और कल्पनाओं के अनुसार परिभाषित करने के ख़तरों और नतीजों पर चर्चा करने के लिये, अपने अनुभव बताने। तब मुझे एहसास हुआ कि सत्य को न समझना कितनी बड़ी बेवकूफ़ी है; मैं सत्य की खोज करने के बजाय, अपनी धारणाओं और कल्पनाओं में रहते हुए, ख़ुद को इस हद तक ख़राब कार्यक्षमता वाली बताती रही कि अक्सर अपने मुश्किल काम दूसरों के मत्थे मढ़ती रही। मैंने न तो ख़ुद को सुधारा, न परमेश्वर पर भरोसा किया और न ही इन बाधाओं को पार करने के लिये कोई कीमत चुकाई। इसका नतीजा यह हुआ कि मैं जिन कामों को करने के काबिल थी, उन कामों को भी नहीं कर पाई। मैं न केवल वास्तविक प्रशिक्षण के या सत्य और जीवन में विकास के नाकाबिल थी, बल्कि इसका सीधे असर मेरे काम की प्रभावशीलता पर भी पड़ रहा था। मुझे याद आया कि मैं जिस बहन के साथ काम कर रही थी, वह कितनी जल्दी समस्या का पता लगा लेती थी। हालाँकि यह उसकी सहज कार्यक्षमता का हिस्सा था, लेकिन बड़ी बात यह है कि अपने कर्तव्यनिष्ठ और ज़िम्मेदार रवैये के कारण, वह परमेश्वर पर भरोसा रखकर, आने वाली मुश्किलों का सामने से मुक़ाबला कर पाती थी। तब जाकर उसे पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता और प्रकाशन प्राप्त हुआ था। जबकि मैं, आने वाली समस्याओं से बचने की कोशिश करती थी, और उस फंदे से निकलने के लिये ख़राब कार्यक्षमता का बहाना बनाती थी। मैंने परमेश्वर पर भरोसा नहीं किया और प्रासंगिक सत्य की खोज के द्वारा समस्या को सुलझाने का प्रयास नहीं किया। इसका अर्थ यह है कि मैं पवित्र आत्मा का कार्य प्राप्त नहीं कर पायी थी। इससे मुझे समझ में आया कि परमेश्वर सबके प्रति न्यायसंगत और धार्मिक है। सहभागिता के द्वारा, मैंने यह भी जाना कि परमेश्वर हमसे वही अपेक्षा रखता है, जिसके हम काबिल हैं। वह "सुई का काम तलवार से" नहीं लेता। मुझे स्वयं से उचित ढंग से पेश आना चाहिए, अपनी कार्यक्षमता पर ध्यान देने के बजाय मुझे अपनी सारी ऊर्जा को अपने काम में लगाना चाहिये। मुझे सत्य के सिद्धांतों की खोज और उन पर विचार करना चाहिये, दूसरों के गुणों से सीखना चाहिये, दूसरों की राय लेनी चाहिये, और अपने वास्तविक अभ्यास में उसे शामिल करना चाहिये—इससे समय के साथ, मुझे अवश्य उसका लाभ मिलेगा और मेरा विकास होगा।

उसके बाद, मेरे कानों में बहन द्वारा की गई मेरी आलोचना गूँजती रही: "मुझे समझ में नहीं आता कि किस मंशा से तुम हमेशा अपनी ख़राब कार्यक्षमता का ढिंढोरा पीटती रहती हो।" वह सही कह रही थी—मैं तुरंत कह देती थी कि मेरी कार्यक्षमता ख़राब है। वे कौन-सी अभिप्रेरणाएँ और भ्रष्ट स्वभाव था जो मुझे गुप्त रूप से नियंत्रित कर रहे थे?

एक दिन, मैंने एक सहभागिता के ये वचन पढ़े: "जो लोग दूसरों से हमेशा यह कहते हैं कि वे भ्रष्ट हैं, वे अज्ञानी और मूर्ख हैं, निर्दयी हैं और मंदबुद्धि हैं, ख़राब कार्यक्षमता के हैं—वे अपने दिल में छिपी वास्तविक अभिप्रेरणाओं और कपट की बात नहीं करते; वे इन दुष्ट अभिप्रेरणाओं को छिपा लेते हैं, वे अपनी भ्रष्टता, बेवकूफ़ी और अज्ञानता को एक प्रतिरोधक, एक ढाल की तरह इस्तेमाल करते हैं। इनसे ज़्यादा चालाक और कोई नहीं होता, इनसे बेहतर बहानेबाज़ और दूसरों के सामने नाटक करके उन्हें ये यकीन दिलाने वाला और कोई नहीं होता कि यह व्यक्ति अच्छा है, यह ख़ुद को जानता है, विनम्र है, निष्कपट और खुले दिल का है। यह नाटक और प्रदर्शन दूसरों के लिये होता है; जबकि सच्चाई यह है कि ऐसे लोग विश्वासघाती और कुटिल पाखण्डी होते हैं ..." (ऊपर से संगति)। यह पढ़ने के बाद, मुझे एहसास हुआ कि दरअसल अपनी ख़राब कार्यक्षमता का ढिंढोरा पीटने की वजह मेरी कपटी प्रकृति, और दुष्ट अभिप्रेरणाएँ थीं जो मेरे अंदर ही छिपी हुई थीं। मिसाल के तौर पर, जब कोई ऐसा काम आता था, जो मैंने पहले कभी नहीं किया था, तो मैं पहला काम यह करती थी कि मैं भाई-बहनों को अपनी ख़राब कार्यक्षमता के बारे में बता देती थी, क्योंकि मुझे डर रहता था कि अगर मैंने काम को अच्छे ढंग से नहीं किया तो मैं उनकी नज़र में गिर जाऊँगी। मैं ऐसा अपने मान-सम्मान और पद-प्रतिष्ठा के लिये करती थी। इसका आशय होता था कि अगर मुझसे यह काम ठीक से नहीं हुआ, तो यह मेरी गलती नहीं है; ऐसा नहीं है कि इस काम में मैंने अपनी सारी ऊर्जा नहीं लगाई, बल्कि यह काम मेरी कार्यक्षमता से परे है। जब कभी मुझे अपने काम में कोई मुश्किल आती थी, तो मैं उसका सामना करने के लिए, तकलीफ़ उठाने या कोई कीमत चुकाने को तैयार नहीं होती थी। मैं ज़िम्मेदारी लेने से भी डरती थी। इसलिये मैं काम को किसी और के सिर मढ़ने के लिये अपनी ख़राब कार्यक्षमता का बहाना बनाती थी, ताकि लोगों को लगे कि मैं विवेकपूर्ण हूँऔर खुद को जानती हूँ। करीब-करीब हर बार परेशानी आने पर, जब कोई कीमत चुकानी होती, या ज़िम्मेदारी लेनी होती, तो मैं पीछे हट जाती थी। दरअसल, मैं आपसी संबंधों के इस शैतानी फ़लसफ़े के अनुसार जीती थी कि "अपने बचाव के लिये चुप रहो, बस आरोप से बचने की कोशिश करो।" यह बात मुझे काफी ज़ोरदार लगी—ज़िम्मेदारी से बचने के लिये अपने छल का इस्तेमाल करना—जबकि सच्चाई यह है कि इस चक्कर में मैंने सत्य को समझने के बहुत से अवसर गँवा दिए थे। दरअसल, परमेश्वर हर इंसान को जो कार्यक्षमता देता है, वह उस प्रयोजन विशेष के लिये उपयुक्त होती है; फिर भी पवित्र आत्मा के कार्य को हासिल करने और अपनी कार्यक्षमता को बढ़ाने के लिये, मैंने पूरे दिलो-जान से परमेश्वर के साथ उस काम के आधार पर सहयोग नहीं किया जिसे मैं करने के काबिल थी; बल्कि, हमेशा सत्य के अभ्यास से बचने, और परमेश्वर से छल-कपट करने के लिये मैं अपनी ख़राब कार्यक्षमता का बहाना बनाती थी। क्या यह चालाकी और दुष्टता नहीं है? इस तरह से मुझे परमेश्वर का मार्गदर्शन कैसे मिल सकता था?

परमेश्वर के वचन कहते हैं, "मैं उन लोगों की बहुत अधिक सराहना करता हूँ जो दूसरों के बारे में संदेह को आश्रय नहीं देते हैं और उन्हें भी बहुत पसंद करता हूँ जो सहजता से सत्य को स्वीकार करते हैं; इन दो तरह के मनुष्यों के लिए मैं बहुत अधिक परवाह दिखाता हूँ, क्योंकि मेरी दृष्टि में वे ईमानदार मनुष्य हैं" ("वचन देह में प्रकट होता है" में "पृथ्वी के परमेश्वर को कैसे जानें")। "दूसरी पंक्ति में, 'भले ही मेरी क्षमता कम है, मेरे पास एक ईमानदार हृदय है।' जब ज़्यादातर लोग इस पंक्ति को सुनते हैं, तो वे अच्छा महसूस करते हैं, है ना? इस बात में लोगों से परमेश्वर की अपेक्षाएं शामिल हैं। कौन सी अपेक्षाएं? अगर लोगों में क्षमता की कमी है, तो दुनिया यहीं खत्म नहीं हो जाती, लेकिन उनके पास एक ईमानदार हृदय होना चाहिये, और इस तरह, वे परमेश्वर की प्रशंसा पाने में सक्षम होंगे। इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि तुम्हारी स्थिति कैसी है, तुम्हें एक ईमानदार व्यक्ति होना चाहिये, ईमानदारी से बोलना चाहिए, ईमानदारी से काम करना चाहिये, अपने पूरे दिलो-दिमाग से अपना कर्तव्य पूरा करने में सक्षम होना चाहिये, और भरोसेमंद होना चाहिए, तुम्हें अपने काम से जी नहीं चुराना चाहिये, कपटी या धोखेबाज नहीं होना चाहिये, मक्कार नहीं होना चाहिये, दूसरों को चकमा देने की कोशिश नहीं करनी चाहिये, या घुमा-घुमा कर बात नहीं करनी चाहिये; तुम्हें सत्य से प्रेम करने वाला और उसकी खोज करने वाला व्यक्ति बनना चाहिये। ...तुम कहते हो, 'मेरी क्षमता कम है, लेकिन मेरे पास एक ईमानदार हृदय है।' लेकिन, जब तुम्हें कोई कर्तव्य पूरा करने के लिए दिया जाता है, तो तुम इस बात से डरते हो कि यह थकाने वाला हो सकता है या तुम इसे अच्छी तरह से पूरा नहीं कर सकते हो, और इसलिये तुम इससे बच निकलने के लिये बहाने बनाते हो। क्या यह एक ईमानदार व्यक्ति की अभिव्यक्ति है? बिल्कुल भी ऐसा नहीं है। एक ईमानदार व्यक्ति को कैसे व्यवहार करना चाहिये? उन्हें अपने कर्तव्य को स्वीकार करना चाहिये और उसका पालन करना चाहिये, और फिर अपनी सर्वोत्तम क्षमता के अनुसार उसे पूरा करने में पूरी तरह से समर्पित होना चाहिये, परमेश्वर की इच्छा को संतुष्ट करने का प्रयास करना चाहिये। ऐसा क्यों करना चाहिये? इस अभिव्यक्ति के कई पहलू हैं। एक पहलू यह है कि तुम्हें अपने कर्तव्य को ईमानदार, निष्कपट हृदय से स्वीकार करना चाहिये, तुम्हें किसी और चीज़ के बारे में नहीं सोचना चाहिये, और तुम्हें दुविधा में नहीं होना चाहिये, अपने खुद के हित के लिये साजिश नहीं करना चाहिये—यही ईमानदारी की अभिव्यक्ति है। दूसरा पहलू यह है कि तुम्हें अपनी पूरी क्षमता और अपने पूरे हृदय का इस्तेमाल करना चाहिये, और यह कहना चाहिये, 'मैं अपना सब कुछ परमेश्वर के सामने प्रकट कर दूंगा। यह वो सब कुछ है जो मैं कर सकता हूँ; मैं इन सबका इस्तेमाल करूंगा, और मैं यह सब पूरी तरह से परमेश्वर को समर्पित कर दूंगा।' तुम अपना सब कुछ और जो कुछ भी तुम कर सकते हो, उसे समर्पित कर देते हो—यह ईमानदारी की एक अभिव्यक्ति है" ("मसीह की बातचीतों के अभिलेख" में "एक ईमानदार इंसान होकर ही कोई व्यक्ति सच में खुश हो सकता है")। परमेश्वर के वचनों ने मुझे अभ्यास का मार्ग दिया: परमेश्वर लोगों की अच्छी या ख़राब कार्यक्षमता की परवाह नहीं करता; मुख्य यह है कि उनका दिल ईमानदार है या नहीं, वे सत्य को स्वीकार करके उसे अमल में ला सकते हैं या नहीं। हालाँकि मेरी कार्यक्षमता ख़राब है, सत्य को मैं थोड़ी धीमी गति से समझती हूँ, कभी-कभी मैं सिद्धांत का अनुसरण करती हूँ, अगर मेरा हृदय ईमानदार है, अगर अपनी भ्रष्टता को दूर करने के लिये, अपने कर्तव्य के निर्वहन के दौरान, मैं निरंतर सत्य का अनुसरण करती हूँ, अगर मैं परमेश्वर की अपेक्षा के अनुसार काम करने के लिए अपनी पूरी ताकत लगा सकूँ, तो मुझे परमेश्वर का मार्गदर्शन और आशीष प्राप्त होंगे, फिर धीरे-धीरे मैं सत्य को समझ पाऊँगी। सत्य में प्रवेश करते हुए, मैं अपनी ख़राब कार्यक्षमता से जुड़ी कमियों को दूर कर पाऊँगी, और इस तरह मैं चीज़ों को और बेहतर ढंग से समझने और देखने लगूँगी। परमेश्वर की इच्छा को समझने के बाद, और बेहतर ढंग से काम करने के लिये, मैं परमेश्वर पर भरोसा करने लगी। जिन चीज़ों को मैं साफ़ तौर पर जानती या समझती नहीं थी, उन्हें मैं दूसरों पर डालने के बजाय, ख़ुद ही जानने-समझने का भरपूर प्रयास करती थी। परमेश्वर का धन्यवाद! परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुसार अभ्यास करने पर, अब मैं भी लेख में आनी वाली समस्याओं को समझने लगी थी—हालाँकि ऐसे अवसर भी आते थे, जब कुछ मसले थोड़े ज़्यादा जटिल होते थे और मुझे समझ में नहीं आते थे, लेकिन भाई-बहनों के साथ सत्य के सिद्धांतों की खोज करके, वे भी धीरे-धीरे मुझे समझ में आने लगते थे। अपने कर्तव्य का निर्वाह करते समय, अब मैं ज़्यादा स्वतंत्र और हल्का महसूस करती थी।

परमेश्वर ने मेरे लिये जिस परिवेश को बनाया था, उसके ज़रिये मुझे अपनी भ्रष्टता और कमियों का कुछ एहसास हुआ, मैं इस बात के प्रति जागरुक हुई कि अपनी कार्यक्षमता के साथ समस्याओं का सामना किस ढंग से करना है। पहले कर्तव्य का निर्वाह करते समय, मैं सत्य की खोज पर ध्यान नहीं देती थी, न ही मैं अपने भ्रष्ट स्वभाव को दूर करने की कोशिश करती थी। मैं हर बात को केवल अपनी धारणाओं और कल्पनाओं के चश्मे से ही देखती थी, इससे मैं चीज़ों से कटने लगी, और यह कहकर मैंने दायित्वों से बचना शुरू कर दिया कि यह काम मेरी कार्यक्षमता से बाहर है। मेरा कर्तव्य-निर्वहन पूरी तरह से लापरवाही से भरा था। मैं कलीसिया के काम को अटकाने लगी और इसका नुकसान मुझे अपने जीवन में भी उठाना पड़ा। अब मैं समझ गई हूँ कि परमेश्वर ने हर इंसान की कार्यक्षमता को पहले से निर्धारित कर दिया है और यह परमेश्वर के गौरवशाली इरादों का एक हिस्सा है। मेरी कार्यक्षमता अच्छी है या ख़राब है, मेरे लिये यह बेबसी या लाचारी नहीं बननी चाहिये। भविष्य में, मैं हर चीज़ में सत्य की खोज करूँगी, सिद्धांतों के अनुसार आचरण करूँगी, और परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिये एक ईमानदार इंसान बनूँगी।

सम्बंधित मीडिया

  • मैंने परमेश्वर के उद्धार का अनुभव किया

    चेंग हाओ, योंगझाऊ शहर, हुनान प्रांत मेरी पत्नी और मैं कलीसिया में सुसमाचार के प्रचार का कर्तव्य निभाते हैं। कुछ समय पहले, मेरी पत्नी को एक सुसमाचार स…

  • परमेश्वर की सेवा करते समय नई चालाकियाँ मत ढूँढो

    हेयी झुआंघे सिटी, लिआओनिंग प्रांत मुझे अभी-अभी कलीसिया के अगुआ का उत्तरदायित्व लेने के लिए चुना गया था। लेकिन कुछ अवधि तक की कठिन मेहनत के बाद, न केव…

  • एक ईमानदार व्यक्ति होना आसान नहीं है

    सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अंत के समय के कार्य को स्वीकार करने के बाद, परमेश्वर के वचनों को पढ़ने और उपदेशों को सुनने के माध्यम से, मुझे अपने विश्वास में एक ईमानदार व्यक्ति होने का महत्व समझ में आया, और मैं जान पाई कि केवल एक ईमानदार व्यक्ति बनकर ही कोई परमेश्वर का उद्धार पा सकता है। इसलिए मैंने वास्तविक जीवन में एक ईमानदार व्यक्ति बनने का अभ्यास करना शुरू किया। कुछ समय के बाद, मैंने पाया कि मुझे इसमें कुछ प्रवेश मिला है।

  • अंततः मैं एक मनुष्य की तरह थोड़ा जीवन व्यतीत करता हूँ

    ज़ियांग वांग सिचुआन प्रांत मैं हर बार अपने हृदय की गहराई से ताड़ना महसूस करता हूँ, जब भी मैं देखता हूँ कि परमेश्वर के वचन कहते हैं कि: "क्रूर, निर्…