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अब जबकि हमारे पाप क्षमा कर दिए गये हैं क्या हम स्वर्गराज्य में प्रवेश कर सकते हैं

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ही जुन, सिचुआन

5 अगस्त, 2018 रविवार। बादल छाये हैं।

आज सभा के बाद, एक भाई मुझे खोजते हुआ आया, उसके चेहरे से चिंता झलक रही थी। उसने कहा कि परमेश्वर को लोगों से अपेक्षा है कि वे पवित्र बनें, लेकिन वह अक्सर अनजाने में पाप कर बैठता है, और यदि वह इस तरह से हमेशा पाप में जियेगा, तो क्या प्रभु के आने पर वह स्वर्ग के राज्य में प्रवेश कर सकेगा? मैंने उससे कहा कि प्रभु यीशु को क्रूस पर चढ़ाया गया था और उन्होंने हमारे सारे पाप अपने ऊपर ले लिए और अपने जीवन से उन पापों की कीमत चुकाई थी। मैंने कहा कि प्रभु यीशु में हमारे विश्वास के कारण हमारे पापों को क्षमा कर दिया गया था, और प्रभु अब हमें पापी के रूप में नहीं देखते हैं, और जब तक हम सब कुछ त्याग सकते हैं और अपने आप को व्यय कर सकते हैं, प्रभु के लिए कड़ी मेहनत कर सकते हैं, और बिल्कुल अंत तक सह सकते हैं, तब तक हम प्रभु के लौटने पर स्वर्ग के राज्य में आरोहित किये जायेंगे। जब उस भाई ने मुझे यह कहते सुना, उसे देख ऐसा लगा, जैसे उसने जो उत्तर चाहा था, वह नहीं मिला, और वह थोड़ा निराश दिखते हुए चला गया। जब मैं उसे जाते हुए देख रहा था, तो मेरे मन में कुछ बहुत ही मिश्रित भाव आए। सच कहूँ तो, क्या मेरी भी चिंताएं वैसी ही नहीं थीं जैसी इस भाई की थीं? यह सोचते हुए कि कैसे मैं कई वर्षों तक प्रभु पर विश्वास करता था लेकिन अक्सर पाप से बंधा हुआ था, और एक ऐसी स्थिति में रह रहा था जहाँ मैं दिन में पाप करता और शाम को उन्हें स्वीकार करता था, मैं भी वैसे जीना नहीं चाहता था। लेकिन मैं वास्तव में पाप पर काबू पाने में सक्षम नहीं था, और इसलिए मैं अक्सर प्रभु से प्रार्थना करता और अपने धर्मग्रंथों के पठन को मजबूत करता था। और फिर भी मैंने कभी अपने पापों की समस्या का समाधान नहीं किया। प्रभु पवित्र है, तो क्या वह मेरे जैसे किसी व्यक्ति की प्रशंसा करेगा, जो इतना पापयुक्त है?

7 अगस्त, 2018 मंगलवार। बादल छाये हैं।

आज मैं एक छोटी-सी बात पर अपनी पत्नी से झगड़ पड़ा, और अब मुझे खुद पर गुस्सा भी आ रहा है और मैं कष्ट भी महसूस कर रहा हूँ। मैं पुरानी गलतियाँ फिर से कैसे दोहरा रहा हूँ? इस शाम को, प्रभु से प्रार्थना करते हुए मैं रोया और मैंने अपने पाप स्वीकार किये, प्रार्थना कर लेने के बाद भी मुझे कुछ ठीक नहीं लग रहा था। मैंने प्रभु की शिक्षाओं के बारे में सोचा: "तू परमेश्‍वर अपने प्रभु से अपने सारे मन और अपने सारे प्राण और अपनी सारी बुद्धि के साथ प्रेम रख। बड़ी और मुख्य आज्ञा तो यही है। और उसी के समान यह दूसरी भी है कि तू अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम रख" (मत्ती 22:37-39)। ये वचन मुख्य रूप से हमें अपने पूरे दिल और अपनी पूरी आत्मा के साथ परमेश्वर से प्यार करने के लिए कह रहे हैं, दूसरी बात यह है कि हमें दूसरों से अपने समान प्यार करना चाहिये; भाइयों और बहनों को एक-दूसरे को प्रोत्साहित करना चाहिए, एक-दूसरे के प्रति सहनशील और धैर्यवान होना चाहिए और एक-दूसरे को आराम और सांत्वना देना चाहिए। ईसाई होने के नाते हमें ऐसा करना चाहिए, और केवल इस तरह से हम ऐसा जीवन जी सकते हैं जो प्रभु की महिमा करे और उसकी गवाही दे। लेकिन प्रभु में अपनी आस्था के पिछले सालों में, मैं इस एक अपेक्षा तक पर खरा नहीं उतरा: घर पर, कभी-कभार मेरी पत्नी और मैं छोटे-छोटे मामलों पर झगड़ पड़ते हैं; कलीसिया में जब भाई-बहन ऐसी बातें कहते हैं, जिनसे मुझे शर्मिंदा होना पड़ता है, तो मैं उनके खिलाफ पूर्वाग्रह से ग्रस्त होने लगता हूँ, और कभी-कभी उन्हें अनदेखा भी कर देता हूँ। अधिकांश समय, मैं यह कहते हुए प्रार्थना करता हूँ कि मैं प्रभु से प्रेम करना चाहता हूँ, लेकिन जब घर में कोई अप्रिय घटना घटित होती है या कोई दुर्घटना होती है, तब मैं प्रभु को गलत समझता हूँ और उन्हें दोष देता हूँ, यह सोचते हुए कि "मैंने प्रभु के लिए खुद को व्यय किया है, तो वे मेरी रक्षा क्यों नहीं करते?..." ओह, मैं कुछ भी ऐसा नहीं करता जो प्रभु की अपेक्षाओं को पूरा करता हो, न ही यह प्रभु की इच्छा के अनुरूप होता है। हालाँकि मैं अक्सर प्रभु से प्रार्थना करता हूँ, फिर भी मैं अक्सर पाप करता हूँ, चाहे मैं कितना भी चाहूँ, मैं इसे नियंत्रित नहीं कर सकता। मैं अक्सर सोचता हूँ: "हालाँकि मेरे पापों को प्रभु में विश्वास करने के कारण क्षमा कर दिया गया है, फिर भी मैं हमेशा पाप करता हूँ और प्रभु को नाराज करता हूँ। यदि मैं इस रास्ते पर चलता रहा, तो क्या प्रभु के आने पर मैं स्वर्ग के राज्य में प्रवेश कर सकूंगा? मैं पाप करना कैसे बंद कर सकता हूँ?"

हाल-फिलहाल में, मैंने कई बार बाइबल पढ़ी, और कई बार पादरियों और एल्डरों को खोजा, लेकिन मुझे संतोषजनक जवाब नहीं मिला। यह मामला सीधे तौर पर इस महत्वपूर्ण मामले से जुड़ा है कि मैं स्वर्ग के राज्य में प्रवेश कर पाऊँगा या नहीं, चाहे जो भी हो मैं इसे यों ही नहीं छोड़ सकता। प्रभु ने कहा: "माँगो, तो तुम्हें दिया जाएगा; ढूँढ़ो तो तुम पाओगे; खटखटाओ, तो तुम्हारे लिये खोला जाएगा" (मत्ती 7:7)। मेरा मानना है कि जब तक मैं दिल से खोजूँगा, प्रभु निश्चय ही मुझे प्रबोधित करेंगे।

12 अगस्त, 2018 रविवार। घटा घिर आई है।

आज सुबह, प्रभु से सच्ची प्रार्थना करने बाद, मैंने बाइबल खोली और अपनी आध्यात्मिक भक्ति आरम्भ की। फिर मैंने प्रकाशितवाक्य में एक पद पढ़ा जिसने मेरे दिल को झकझोर दिया: "परन्तु उसमें कोई अपवित्र वस्तु, या घृणित काम करनेवाला, या झूठ का गढ़नेवाला किसी रीति से प्रवेश न करेगा, पर केवल वे लोग जिनके नाम मेम्ने के जीवन की पुस्तक में लिखे हैं" (प्रकाशितवाक्य 21:27)। बाइबल हमें स्पष्ट रूप से बता रही है कि हममें से जो शुद्ध नहीं किये गये हैं वे उसमें प्रवेश नहीं कर सकते हैं, क्या 'उसमें' का मतलब स्वर्गराज्य से नहीं है? फिर मैंने मत्ती के सुसमाचार में अध्याय 7, पदसंख्या 21 पढ़ा: "जो मुझ से, 'हे प्रभु! हे प्रभु!' कहता है, उनमें से हर एक स्वर्ग के राज्य में प्रवेश न करेगा, परन्तु वही जो मेरे स्वर्गीय पिता की इच्छा पर चलता है।" और युहन्ना 8:34-35 में भी लिखा है: "मैं तुम से सच सच कहता हूँ कि जो कोई पाप करता है वह पाप का दास है। दास सदा घर में नहीं रहता; पुत्र सदा रहता है।" पवित्रशास्त्र के इन पदों पर चिंतन करते हुए, मैंने सोचा, हालाँकि मैंने प्रभु से प्रार्थना की है और प्रभु में अपने विश्वास के में इन सभी सालों में हर दिन बाइबल पढ़ी है, और अक्सर सुसमाचार का प्रसार किया है और काम किया है, चीजों को त्यागा है और प्रभु के लिए अपने आप को व्यय किया, फिर भी मैं जानबूझकर पाप करता हूँ, मैं पाप करता हूँ और फिर उसे स्वीकार करता हूँ, और मैं प्रभु की शिक्षाओं का पालन नहीं कर पाता हूँ या प्रभु की अपेक्षानुसार अभ्यास नहीं कर पाता हूँ। स्पष्ट रूप से मैं ऐसा व्यक्ति नहीं हूँ जो उस पिता की इच्छा को पूरा करता है जो स्वर्ग में है, मैं ऐसा व्यक्ति तो बिल्कुल नहीं हूँ जिसे शुद्ध किया गया है, तो क्या मैं अभी भी स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने में समर्थ होऊंगा? स्वर्ग का राज्य परमेश्वर का राज्य है और परमेश्वर पवित्र है, इसलिए कोई ऐसा व्यक्ति जो गन्दगी में लिपटा है, जो हमेशा पाप करता है; वह स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने और परमेश्वर के साथ रहने के योग्य कैसे हो सकता है? ऐसा लगता है जैसे स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करना उतना सरल नहीं है जितना हमने कल्पना की थी!

13 अगस्त, 2018 सोमवार। बादल छंट रहे हैं।

आज, मैं भाई झेंग से टकरा गया, जिसे मैंने बहुत दिनों से नहीं देखा था, और मैं उसे देखकर बहुत खुश था। बातचीत करते हुए, मैंने उस चीज़ का उल्लेख किया जो मुझे काफी समय से हैरान कर रही थी। जब मैंने उन्हें इसके बारे में बताया, तो भाई झेंग ने मुझे यह कहते हुए संगति प्रदान की, "जब प्रभु यीशु को क्रूस पर चढ़ाया गया, तब मनुष्य के पापों को क्षमा कर दिया गया था, और जब हम प्रभु में विश्वास करते हैं, तो हमारे पाप क्षमा हो जाते हैं और हम बचाये जाते हैं लेकिन वास्तव में यह कहने का क्या मतलब है कि हमारे पाप क्षमा किए गये हैं? अगर हम इस मुद्दे को समझ सकें, तो हमें पता चल जायेगा कि क्यों हम प्रभु में विश्वास करने और अपने पापों के क्षमा किये जाने के बाद भी पाप करते हैं। जब इसकी बात आती है कि हम स्वर्गराज्य में प्रवेश कर पाएंगे या नहीं, तो हमें सबसे पहले प्रभु यीशु के प्रकटन और कार्य की पृष्ठभूमि पर एक नज़र डालनी होगी। व्यवस्था के युग के अंत में, मनुष्य शैतान के द्वारा अधिकाधिक भ्रष्ट किया जा रहा था और अधिकाधिक पाप कर रहा था, इस हद तक कि अब कोई पापबलि नहीं बची थी जिसे चढ़ा कर वह अपने पापों का पर्याप्त रूप से प्रायश्चित कर सके; और लोगों के सामने, उस समय की व्यवस्था के अनुसार दोषी ठहराए जाने और मृत्युदंड का खतरा था। इस पृष्ठभूमि में, परमेश्वर प्रभु यीशु के रूप में देह बन गए और मनुष्य के लिए पापबलि के रूप में क्रूस पर चढ़ाये गये, और इस प्रकार मनुष्य के पापों को हमेशा हमेशा के लिए माफ कर दिया गया। तत्पश्चात, जब तक लोग प्रभु के नाम पर प्रार्थना करते, पापस्वीकार और पश्चाताप करते थे, तब तक उनके पाप क्षमा कर दिए जाते थे, और वे अब और व्यवस्था की निंदा और दंड के अधीन नहीं थे। परमेश्वर अब से मनुष्य को पापी के रूप में नहीं देखते थे, लोग सीधे परमेश्वर से प्रार्थना कर सकते थे और उन्हें पुकार सकते थे, और परमेश्वर की प्रचुर कृपा और उनके सत्य के प्रावधान का आनंद ले सकते थे। इससे यह देखा जा सकता है कि हमारे पापों को प्रभु में हमारे विश्वास के कारण क्षमा कर दिया गया था, और 'हमारे पापों को क्षमा कर दिया गया' का अर्थ केवल यह है कि परमेश्वर ने अपनी व्यवस्थाओं और आदेशों के उल्लंघन और उनके वचन के खिलाफ जाने के कारण हमारे जो पाप थे उन्हें क्षमा कर दिया है। कहने का तात्पर्य यह है कि, परमेश्वर के नियमों का उल्लंघन करने और अपमानित करने के हमारे पाप कर्मों को प्रभु याद नहीं रखेंगे। लेकिन हमारा शैतानी स्वभाव और पापी प्रकृति, जो हमारे पाप के कारण हैं, परमेश्वर द्वारा क्षमा नहीं किये गए हैं, और हमारी परमेश्वर-विरोधी पापमय प्रकृति और शैतानी स्वभाव के अस्तित्व में बने रहने के कारण ही, हम अभी भी पाप करने में सक्षम हैं। इसलिए यह देखा जा सकता है कि हमारी पापी प्रकृति कुछ ऐसी है जो परमेश्वर की सबसे अधिक अवहेलना करती है और सत्य के विरोध में है, और यदि हम अपनी पापी प्रकृति का समाधान नहीं करते हैं, तो मनुष्य के पापों की समस्या को हल करना असंभव होगा, और हम व्यवस्था का उल्लंघन करने से भी बदतर पाप कर सकते हैं, और स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करना पूरी तरह असम्भव होगा। बाइबल स्पष्ट रूप से बताती है: 'पर जैसा तुम्हारा बुलानेवाला पवित्र है, वैसे ही तुम भी अपने सारे चालचलन में पवित्र बनो। क्योंकि लिखा है, पवित्र बनो, क्योंकि मैं पवित्र हूँ' (1 पतरस 1:15-16)। 'क्योंकि सच्‍चाई की पहिचान प्राप्‍त करने के बाद यदि हम जान बूझकर पाप करते रहें, तो पापों के लिये फिर कोई बलिदान बाकी नहीं। हाँ, दण्ड का एक भयानक बाट जोहना और आग का ज्वलन बाकी है जो विरोधियों को भस्म कर देगा' (इब्रानियों 10:26-27)। 'क्योंकि पाप की मजदूरी तो मृत्यु है' (रोमियों 6:23)। इन पदों से मैंने जाना कि अगर हमारी पापी प्रकृति बिना समाधान के बनी रहती है और हम अभी भी उसी स्थिति में रहते हैं जहाँ हम दिन में पाप करते और शाम में उसे स्वीकार करते हैं, तो भले ही हम अंत तक प्रभु में विश्वास क्यों करें, फिर भी हमारा पतन हो जायेगा, क्योंकि परमेश्वर पवित्र है, गंदी और भ्रष्ट मानवजाति परमेश्वर के आशीष और वादे को पाने योग्य नहीं है और वह परमेश्वर के राज्य में प्रवेश करने में असमर्थ होगी।"

अभी, मेरा दिल थोड़ा उजला महसूस कर रहा है, और मैं समझता हूँ कि हमारे पापों को क्षमा करने का मतलब केवल यह है कि प्रभु ने हमारे परमेश्वर के नियमों का उल्लंघन करने के पाप कर्मों को क्षमा किया है। लेकिन हमने अभी तक अपने परमेश्वर की अवहेलना करने वाले पापी स्वभाव का समाधान नहीं किया है, इसलिए कोई आश्चर्य नहीं कि चाहे मैं कितना भी चाहूँ, मैं इसे तब तक हल नहीं कर सकता, जब तक मैं, दिन में पाप करने और शाम को स्वीकार करने की स्थिति में जीता हूँ! परमेश्वर का धन्यवाद! आज मुझे जो संगति मिली है, वह वास्तव में बहुत स्पष्ट है, और मुझे लगता है जैसे बादल छंट गए हैं और मैं आखिरकार नीला आकाश देख पा रहा हूँ। जब मैं जा रहा था, तब भाई झेंग ने मुझे एक किताब दी और कहा कि उन्हें उनकी सारी समझ इस किताब को पढ़ने से मिली है, और मुझे खुशी महसूस हुई।

15 अगस्त, 2018 बुधवार। एक खिला दिन।

परमेश्वर के प्रेम के कारण, पिछले कुछ दिनों से मैं बहुत अच्छा महसूस कर रहा हूँ। जो किताब मुझे भाई झेंग ने दी थी, उससे मैं ऐसे बहुत से सत्य समझ पाया हूँ जिन्हें मैं पहले नहीं समझता था, और इसने मेरे कई सालों के भ्रम और उलझन को मिटा दिया है। मैंने किताब में पढ़ा: "क्योंकि, अनुग्रह के युग में, हाथ रखने और प्रार्थना करने के साथ ही दुष्टात्माएँ मनुष्य से निकल जाती थी, परन्तु मनुष्य के भीतर का भ्रष्ट स्वभाव तब भी बना रहता था। मनुष्य को उसकी बीमारी से चंगा किया गया था और उसके पापों को क्षमा किया गया था, परन्तु बस वह कार्य, कि किस प्रकार मनुष्य के भीतर से उन शैतानी स्वभावों को निकला जा सकता है, उसमें नहीं किया गया था। मनुष्य को केवल उसके विश्वास के कारण ही बचाया गया था और उसके पापों को क्षमा किया गया था, परन्तु उसका पापी स्वभाव उसमें से निकाला नहीं गया था और वह तब भी उसके अंदर बना रहा था। मनुष्य के पापों को देहधारी परमेश्वर के द्वारा क्षमा किया गया था, परन्तु इसका अर्थ यह नहीं है कि मनुष्य के भीतर कोई पाप नहीं है। पाप बलि के माध्यम से मनुष्य के पापों को क्षमा किया जा सकता है, परन्तु मनुष्य इस मसले को हल करने में असमर्थ रहा है कि वह कैसे आगे और पाप नहीं कर सकता है और कैसे उसके पापी स्वभाव को पूरी तरह से दूर किया जा सकता है और उसे रूपान्तरित किया जा सकता है" ("देहधारण का रहस्य (4)")। "तुम सिर्फ यह जानते हो कि यीशु अन्तिम दिनों के दौरान आयेगा, परन्तु वास्तव में वह कैसे आयेगा? तुम जैसा पापी, जिसे बस अभी अभी छुड़ाया गया है, और परिवर्तित नहीं किया गया है, या परमेश्वर के द्वारा सिद् नहीं किया गया है, क्या तुम परमेश्वर के हृदय के अनुसार हो सकते हो? तुम्हारे लिए, तुम जो अभी भी पुराने मनुष्यत्व के हो, यह सत्य है कि तुम्हें यीशु के द्वारा बचाया गया था, और यह कि परमेश्वर के उद्धार के कारण तुम्हें एक पापी के रूप में नहीं गिना जाता है, परन्तु इससे यह साबित नहीं होता है कि तुम पापपूर्ण नहीं हो, और अशुद्ध नहीं हो। यदि तुमने अपने आपको नहीं बदला है तो तुम संत के समान कैसे हो सकते हो? भीतर से, तुम अशुद्धता के द्वारा घिरे हुए हो, स्वार्थी एवं कुटिल हो, फिर भी तुम चाहते हो कि यीशु के साथ आओ—तुम्हें बहुत ही भाग्यशाली होना चाहिए! तुम परमेश्वर के प्रति अपने विश्वास में एक चरण में चूक गए हो: तुम्हें महज छुड़ाया गया है, परन्तु परिवर्तित नहीं किया गया है। तुम्हें परमेश्वर के हृदय के अनुसार होने के लिए, परमेश्वर को व्यक्तिगत रूप से तुम्हें बदलने एवं शुद्ध करने के कार्य को करना होगा; यदि तुम्हें सिर्फ छुड़ाया गया है, तो तुम शुद्धता को हासिल करने में असमर्थ होगे। इस रीति से तुम परमेश्वर की अच्छी आशिषों में भागी होने के लिए अयोग्य होगे, क्योंकि तुमने मनुष्य का प्रबंध करने के परमेश्वर के कार्य के एक चरण को पाने का ससुअवसर खो दिया है, जो बदलने एवं सिद्ध करने का मुख्य चरण है। और इस प्रकार तुम, एक पापी जिसे बस अभी अभी छुड़ाया गया है, परमेश्वर की विरासत को सीधे तौर पर उत्तराधिकार के रूप में पाने में असमर्थ हैं" ("पद नामों एवं पहचान के सम्बन्ध में")।

इन वचनों को पढ़कर और फिर भाई झेंग ने जो मुझे बताया था उसके बारे में सोचकर, अचानक मेरे लिए सब कुछ स्पष्ट हो गया। मुझे यह पता चल गया कि प्रभु यीशु ने केवल मानवजाति के छुटकारे का कार्य किया, इस प्रकार हमारे पापों को क्षमा किये जाने और हमें हमारे विश्वास के माध्यम से बचाए जाने योग्य बनाया; उन्होंने मनुष्य को पूरी तरह से शुद्ध करने और बदलने का काम नहीं किया था। यद्यपि प्रभु ने हमारे पापों को क्षमा कर दिया, लेकिन उन्होंने हमें हमारी शैतानी प्रकृति से मुक्त नहीं किया, और हमारे भीतर अहंकार, स्वार्थ, धोखा और दुष्टता जैसे भ्रष्ट स्वभाव का अस्तित्व बना रहा। ये चीजें पाप की तुलना में अधिक गहरी और अधिक अड़ियल हैं, और जब तक यह परमेश्वर-विरोधी शैतानी प्रकृति और इन भ्रष्ट स्वभावों को हल नहीं किया जाता है, हम अनजाने में पाप करते रहेंगे और परमेश्वर की अवहेलना करते रहेंगे। इससे मैं सोचने पर मजबूर हो गया कि कैसे हम हमेशा पाप में जिए हैं। उदाहरण के लिए, दूसरों के साथ हम अपने व्यवहार में, हमेशा उनका लाभ उठाना चाहते हैं और स्वयं कुछ भी नहीं खोना चाहते हैं; जब हम दूसरों को देखते हैं जो हमसे बेहतर हैं, हम अक्सर ईर्ष्या और अवज्ञा के भ्रष्ट स्वभावों को व्यक्त करते हैं; जब कोई हमें अप्रसन्न करता है, तो हम कुछ नहीं कहते हैं, लेकिन हमारा हृदय उनके लिए घृणा से भर जाता है; जब परमेश्वर हम पर अनुग्रह बरसाता है, तो हमें खुशी होती है, लेकिन जब वह हमें अनुगृहीत नहीं करता है तो हम उसे दोष देते हैं, इस हद तक कि जब प्राकृतिक आपदाएं या मानव निर्मित विपत्तियाँ हमला करती हैं, तो परमेश्वर के बारे में हमारे भीतर अवधारणाएँ पैदा होती हैं, और गंभीर मामलों में, हम परमेश्वर को नकार सकते हैं और उन्हें धोखा भी दे सकते हैं… हर दिन, हम पाप करने, उसे स्वीकारने और फिर से पाप करने के इस क्रूर चक्र में जीते हैं, जैसे प्रेरित पौलुस ने कहा: "क्योंकि मैं जानता हूँ कि मुझ में अर्थात् मेरे शरीर में कोई अच्छी वस्तु वास नहीं करती। इच्छा तो मुझ में है, परन्तु भले काम मुझ से बन नहीं पड़ते" (रोमियों 7:18)। यदि परमेश्वर मनुष्य को शुद्ध करने और बदलने का कार्य करने के लिए स्वयं नहीं आते, तो हममें से कोई भी पाप के बंधन और बाधाओं को दूर करने में सक्षम नहीं होता, हम पाप द्वारा परास्त कर दिये जाते, हम दुनिया की बुरी प्रवृत्तियों में फँस जाते, पाप के सुख का लालच करते, और हम जो कुछ भी जीते उसमें सामान्य मानवता का ज़रा-सा भी अंश नहीं होता। यहां तक कि जो अपने जीवन-भर परमेश्वर में विश्वास करते हैं, या वे धर्मगुरु जो बाइबल को अच्छी तरह से जानते हैं और जिनके पास सर्वज्ञान से पूर्ण दिमाग है, वे लोग भी पवित्रशास्त्र की बात आने पर इस तरह के होते हैं—उनमें से कोई भी पाप के बंधन को नहीं तोड़ सकता। इसलिए, भले ही हम अपने पापों को हजार गुना, दस हजार गुना माफ करवा सकते, तो भी हम स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने के योग्य नहीं होंगे।

प्रभु का धन्यवाद! ये वचन बहुत बहुमूल्य हैं, और इन्होंने उस समस्या का समाधान कर दिया है जिसने मुझे काफी समय से परेशान कर रखा था। तो वास्तव में हम पाप से छुटकारा कैसे पा सकते हैं? क्या इस किताब में ऐसा करने का तरीका होगा? मुझे पढ़ते रहना चाहिए...

16 अगस्त, 2018 बुधवार। बादल छंट गये, धूप खिल गयी।

दोपहर में, घने बादलों को चीरते हुए सूरज चमकने में कामयाब रहा। मैं अपने पुस्तकालय में बैठा किताब पढ़ना जारी रखे हुए हूँ।

मैं प्रभु के प्रबोधन और मार्गदर्शन का धन्यवाद देता हूँ! इस किताब में, मुझे पाप के बन्धनों को तोड़ फेंकने का उपाय मिल गया है: "परमेश्वर के सलीब पर चढ़ने के कार्य की वजह से मनुष्य के पापों को क्षमा किया गया था, परन्तु मनुष्य पुराने, भ्रष्ट शैतानी स्वभाव में जीवन बिताता रहा। वैसे तो, मनुष्य को भ्रष्ट शैतानी स्वभाव से अवश्य पूरी तरह से बचाया जाना चाहिए ताकि मनुष्य का पापी स्वभाव पूरी तरह से दूर किया जाए और फिर कभी विकसित न हो, इस प्रकार मनुष्य के स्वभाव को बदले जाने की अनुमति दी जाए। इसके लिए मनुष्य से अपेक्षा की जाती है कि वह जीवन में उन्नति के पथ को, जीवन के मार्ग को, और अपने स्वभाव को परिवर्तित करने के मार्ग को समझे। साथ ही इसके लिए मनुष्य को इस मार्ग के अनुरूप कार्य करने की आवश्यकता है ताकि मनुष्य के स्वभाव को धीरे-धीरे बदला जा सके और वह प्रकाश की चमक में जीवन जी सके, और यह कि वह परमेश्वर की इच्छा के अनुसार सभी चीज़ों को कर सके, और भ्रष्ट शैतानी स्वभाव को दूर कर सके, और शैतान के अंधकार के प्रभाव को तोड़कर आज़ाद हो सके, उसके परिणामस्वरूप पाप से पूरी तरह से ऊपर उठ सके। केवल तभी मनुष्य पूर्ण उद्धार प्राप्त करेगा" ("देहधारण का रहस्य (4)")। "शैतान के प्रभाव से मनुष्य को पूरी तरह बचाने के लिये यीशु को न केवल पाप-बलि के रूप में मनुष्यों के पापों को लेना आवश्यक था, बल्कि मनुष्य को उसके स्वभाव, जिसे शैतान द्वारा भ्रष्ट कर दिया गया था, से पूरी तरह मुक्त करने के लिए परमेश्वर को और भी बड़े कार्य करने की आवश्यकता थी। और इसलिए, मनुष्य को उसके पापों के लिए क्षमा कर दिए जाने के बाद, एक नये युग में मनुष्य की अगुवाई करने के लिए परमेश्वर वापस देह में लौटा, और उसने ताड़ना एवं न्याय के कार्य को आरंभ किया, और इस कार्य ने मनुष्य को एक उच्चतर क्षेत्र में पहुँचा दिया। वे सब जो परमेश्वर के प्रभुत्व के अधीन समर्पण करेंगे उच्चतर सत्य का आनंद लेंगे और अधिक बड़ी आशीषें प्राप्त करेंगे। वे वास्तव में ज्योति में निवास करेंगे, और सत्य, मार्ग और जीवन को प्राप्त करेंगे" ("केवल वह जो परमेश्वर के कार्य को अनुभव करता है वही परमेवर में सच में विश्वास करता है")।

जब मैंने इन दो अंशों को पढ़ा, तो मुझे अचानक प्रकाश दिखा: स्थिति यह है कि, अगर हम अपने शैतानी और भ्रष्ट स्वभावों के बंधन और बाधाओं को दूर करना चाहते हैं, तो हमें अंत के दिनों में परमेश्वर के न्याय के कार्य को स्वीकार करना होगा, फिर हमारे भ्रष्ट स्वभावों को बदला और शुद्ध किया जा सकता है, उसके बाद ही हम परमेश्वर के चेहरे को देखने, परमेश्वर के पूर्ण उद्धार को प्राप्त करने, और हमेशा के लिए परमेश्वर के राज्य में रहने के योग्य होंगे। मैं प्रभु यीशु ने जो कुछ कहा था, उसके बारे में सोचे बिना न रह सका: "मुझे तुम से और भी बहुत सी बातें कहनी हैं, परन्तु अभी तुम उन्हें सह नहीं सकते। परन्तु जब वह अर्थात् सत्य का आत्मा आएगा, तो तुम्हें सब सत्य का मार्ग बताएगा, क्योंकि वह अपनी ओर से न कहेगा परन्तु जो कुछ सुनेगा वही कहेगा, और आनेवाली बातें तुम्हें बताएगा" (यूहन्ना 16:12-13)। और बाइबल की ये भविष्यवाणियाँ भी दिमाग में आईं: "क्योंकि वह समय आ पहुँचा है कि पहले परमेश्‍वर के लोगों का न्याय किया जाए"(1 पतरस 4:17)। "जिनकी रक्षा परमेश्‍वर की सामर्थ्य से विश्‍वास के द्वारा उस उद्धार के लिये, जो आनेवाले समय में प्रगट होनेवाली है, की जाती है" (1 पतरस 1:5)। सच यह है कि, प्रभु यीशु ने बहुत पहले भविष्यवाणी की थी कि वह अंत के दिनों में फिर से आएंगे, हमारे भ्रष्ट स्वभावों को पूरी तरह से शुद्ध करने और बदलने के लिए अपने न्याय का कार्य करेंगे, और हमें सभी सत्य प्राप्त करने और परमेश्वर की पूर्ण मुक्ति प्राप्त करने देंगे। लेकिन मैं कितना अज्ञानी और अंधा था; मैंने प्रभु के वचनों के भीतर उनकी इच्छा पर चिंतन करने या उसकी तलाश करने का प्रयास नहीं किया, बल्कि मैं अपनी धारणाओं और कल्पनाओं से यह विश्वास करते हुए चिपका रहा कि, प्रभु यीशु ने हमारे पापों को अपने ऊपर ले लिया था, हमारे पापों को पहले ही क्षमा कर दिया गया था, और जब तक हम प्रभु की आज्ञा का पालन करने के लिए सब कुछ त्याग देते हैं, तब तक हम स्वर्ग के राज्य में प्रवेश कर सकेंगे। अब ऐसा लगता है कि यदि हमारी पाप करने की समस्या का समाधान नहीं होता है, तो गन्दगी और भ्रष्टाचार से भरे अपने देह के साथ हम अंततः स्वर्गराज्य में प्रवेश करने में असमर्थ होंगे, जैसा कि इस किताब में कहा गया है: "तुझे जानना होगा कि मैं किस प्रकार के लोगों की इच्छा करता हूँ; ऐसे लोग जो अशुद्ध हैं उन्हें राज्य में प्रवेश करने की अनुमति नहीं दी गई है, ऐसे लोग जो अशुद्ध हैं उन्हें पवित्र भूमि को गंदा करने की अनुमति नहीं दी गई है। हालाँकि तूने शायद अधिक कार्य किया है, और कई सालों तक कार्य किया है, फिर भी अन्त में तू दुखदाई रूप से मैला है—यह स्वर्ग की व्यवस्था के लिए असहनीय है कि तू मेरे राज्य में प्रवेश करने की कामना करता है! संसार की नींव से लेकर आज तक, मैं ने कभी भी उन लोगों को अपने राज्य के लिए आसान मार्ग का प्रस्ताव नहीं दिया है जो अनुग्रह पाने के लिए मेरी खुशामद करते हैं। यह स्वर्गीय नियम है, और इसे कोई तोड़ नहीं सकता है!" ("सफलता या असफलता उस पथ पर निर्भर होती है जिस पर मनुष्य चलता है")।

ये वचन अधिकार और सामर्थ्य रखते हैं, और मैं समझता हूँ कि परमेश्वर दयालु और प्रेम करने वाले हैं, लेकिन वे स्वयं धर्मी और पवित्र परमेश्वर भी हैं। परमेश्वर गंदे, भ्रष्ट इन्सान को अपने राज्य में प्रवेश करने की अनुमति नहीं देते हैं, और यदि हमारी पापी प्रकृति को शुद्ध और बदला नहीं जाता है, तो भले ही हमारे पापों को माफ कर दिया गया हो, और बाहर से हम कुछ भले काम करते दिखाई देते हों, हम सब कुछ त्याग देते हों, अपने आप को व्यय करते हों और प्रभु के लिए काम करते हों, फिर भी स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने का हमारा सपना हमेशा के लिए सिर्फ एक सपना ही रहेगा!

बादल सच में छंट गये हैं और मुझे अब सूरज की रोशनी दिखाई दे रही है! अंतत: अब मुझे पता चल चुका है कि हममें से जिन लोगों ने प्रभु के उद्धार को प्राप्त किया है, उन्होंने केवल अपने पापों की क्षमा पाई है और उन्हें छुटकारा दिलाया गया है, लेकिन हमने खुद को पाप से मुक्त नहीं किया है। हमें अंत के दिनों में भी परमेश्वर के न्याय के कार्य को स्वीकार करना चाहिए और शुद्ध होना चाहिए, उसके बाद ही हम स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने और अनन्त जीवन प्राप्त करने के योग्य होंगे। यह उस भविष्यवाणी को पूरा करता है जो प्रकाशितवाक्य की पुस्तक में की गई थी: "परन्तु उसमें कोई अपवित्र वस्तु, या घृणित काम करनेवाला, या झूठ का गढ़नेवाला किसी रीति से प्रवेश न करेगा, पर केवल वे लोग जिनके नाम मेम्ने के जीवन की पुस्तक में लिखे हैं" (प्रकाशितवाक्य 21:27)। प्रभु का धन्यवाद, आखिरकार मुझे पता चल गया कि पाप से छुटकारा कैसे पाना है!

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