देहधारण का रहस्य (4)

तुम लोगों को बाइबल और उसके बनने के पीछे की सच्ची कहानी के बारे में जानना चाहिए। यह ज्ञान उन लोगों से संबंध नहीं रखता, जिन्होंने परमेश्वर के नए कार्य को स्वीकार नहीं किया है। वे इसे नहीं जानते। अगर तुम उन्हें सार के ये मामले स्पष्ट रूप से समझा दो, तो वे तुम्हारे सामने बाइबल के प्रति ज्यादा आग्रही नहीं रहेंगे। वे लगातार भविष्यवाणियों में कही गई बातों की जाँच-पड़ताल करते रहते हैं : क्या यह वक्तव्य घटित हो गया है? क्या वह वक्तव्य घटित हो गया है? सुसमाचार की उनकी स्वीकृति बाइबल के अनुसार होती है और वे बाइबल के अनुसार ही सुसमाचार का उपदेश देते हैं। परमेश्वर पर उनका विश्वास बाइबल के वचनों पर टिका है; बाइबल के बिना वे परमेश्वर पर विश्वास नहीं करेंगे। बाइबल की क्षुद्र जाँच करते रहना ही उनके जीने का तरीका है। जब वे दोबारा बाइबल की जाँच-पड़ताल करते हैं और तुमसे व्याख्या करने के लिए कहते हैं, तो तुम कहते हो, “पहले, चलो हम प्रत्येक वक्तव्य को सत्यापित न करें। इसके बजाय, आओ, यह देखें कि पवित्र आत्मा कैसे कार्य करता है। आओ, हम जिस मार्ग पर चलते हैं, उसकी सत्य के साथ तुलना करें, ताकि हम जान सकें कि यह मार्ग वास्तव में पवित्र आत्मा का कार्य है या नहीं, और यह जाँचने के लिए कि क्या इस तरह का मार्ग सही है, पवित्र आत्मा के कार्य का उपयोग करें। जहाँ तक इस वक्तव्य या उस वक्तव्य के भविष्यवाणी के मुताबिक घटित होने की बात है, हम मनुष्यों को उसमें हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। इसके बजाय हमारे लिए यह बेहतर है कि हम पवित्र आत्मा के कार्य और उस नवीनतम कार्य के बारे में बात करें, जिसे परमेश्वर कर रहा है।” बाइबल में की गई भविष्यवाणियाँ परमेश्वर के वे वचन हैं, जो नबियों द्वारा उस समय कहे गए थे और परमेश्वर द्वारा उपयोग किए गए लोगों द्वारा प्रकाशन प्राप्त करके लिखे गए थे; केवल स्वयं परमेश्वर ही उन वचनों की व्याख्या कर सकता है, केवल पवित्र आत्मा ही उन वचनों का अर्थ प्रकाशित कर सकता है और केवल स्वयं परमेश्वर ही सात मुहरों को तोड़कर पुस्तक खोल सकता है। तुम कहते हो, “तुम परमेश्वर नहीं हो और न ही मैं हूँ, इसलिए कौन हलकेपन से परमेश्वर के वचनों की व्याख्या करने का साहस करता है? क्या तुम उन वचनों की व्याख्या करने का साहस करते हो? यहाँ तक कि यदि भविष्यवक्ता यिर्मयाह, यूहन्ना और एलिय्याह भी आ जाते, तो वे भी कोशिश करने और उन वचनों की व्याख्या करने की हिम्मत न करते, क्योंकि वे मेमने नहीं हैं। केवल मेमना ही सात मुहरों को तोड़कर पुस्तक खोल सकता है और कोई भी अन्य उसके वचनों की व्याख्या नहीं कर सकता। मैं परमेश्वर के नाम का अनधिकार उपयोग करने का साहस नहीं करता, परमेश्वर के वचनों की व्याख्या करने का साहस तो बिल्कुल भी नहीं करता। मैं केवल ऐसा व्यक्ति हो सकता हूँ, जो परमेश्वर के प्रति समर्पण करता है। क्या तुम परमेश्वर हो? कोई भी सृजित प्राणी पुस्तक खोलने या उन वचनों की व्याख्या करने का साहस नहीं करता, इसलिए मैं भी उनकी व्याख्या करने का साहस नहीं करता। बेहतर है कि तुम भी उनकी व्याख्या करने का प्रयास न करो। किसी को भी उनकी व्याख्या करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। चलो हम पवित्र आत्मा के कार्य के बारे में बात करें; मनुष्य इतना ही कर सकता है। मुझे यहोवा और यीशु के कार्य का थोड़ा-बहुत ज्ञान है, किंतु चूँकि मुझे इस तरह के कार्य का कोई व्यक्तिगत अनुभव नहीं है, इसलिए मैं उसके बारे में केवल कुछ हद तक ही बात कर सकता हूँ। जहाँ तक यशायाह या यीशु द्वारा अपने समय में बोले गए वचनों के अर्थ की बात है, मैं उनकी कोई व्याख्या नहीं करूँगा। मैं बाइबल का अध्ययन नहीं करता; बल्कि मैं परमेश्वर के वर्तमान कार्य का अनुसरण करता हूँ। तुम बाइबल को छोटी पुस्तक के रूप में देखते हो, लेकिन क्या वह ऐसी चीज नहीं है जिसे केवल मेमना ही खोल सकता है? मेमने के अलावा और कौन उसे खोल सकता है? तुम मेमने नहीं हो और मैं तो स्वयं परमेश्वर होने का दावा करने का साहस बिल्कुल नहीं करता, इसलिए चलो, हम बाइबल का विश्लेषण न करें या उसे क्षुद्र जाँच-पड़ताल का भागी न बनाएँ। पवित्र आत्मा द्वारा किए जाने वाले कार्य, अर्थात् स्वयं परमेश्वर द्वारा किए जाने वाले वर्तमान कार्य की चर्चा करना ज्यादा बेहतर है। चलो देखें, वे कौन-से सिद्धांत हैं जिनके द्वारा परमेश्वर कार्य करता है और उसके कार्य का सार क्या है, और उनके उपयोग द्वारा यह सत्यापन करें कि आज हम जिस मार्ग पर चलते हैं, क्या वह सही है, और इस तरह उसके बारे में निश्चित हो लें।” यदि तुम लोग सुसमाचार का उपदेश देना चाहते हो, विशेष रूप से धार्मिक दुनिया के लोगों को, तो तुम्हें बाइबल को समझना चाहिए और बाइबल के पीछे की वास्तविक कहानी की दृढ समझ प्राप्त करनी चाहिए; अन्यथा तुम सुसमाचार का उपदेश हरगिज नहीं दे पाओगे। जब तुम बड़ी तस्वीर में महारत हासिल कर लोगे और बाइबल के मृत वचनों की क्षुद्र जाँच करना बंद कर दोगे और केवल परमेश्वर के कार्य और जीवन-सत्य के बारे में ही बात करोगे, तब तुम उन्हें प्राप्त करने में समर्थ होगे जो सच्चे हृदय से तलाश करते हैं।

यहोवा का कार्य, उसके द्वारा स्थापित व्यवस्थाएँ, और वे सिद्धांत जिनके द्वारा उसने लोगों के जीवन की अगुआई की थी, उसके द्वारा व्यवस्था के युग में किए गए कार्य की विषयवस्तु, उसके द्वारा अपनी व्यवस्थाओं को लागू करने का महत्व, अनुग्रह के युग के लिए उसके कार्य का महत्व और वह कार्य जो परमेश्वर इस अंतिम चरण में करता है : ये वे चीजें हैं, जो तुम्हें समझनी चाहिए। पहला चरण है व्यवस्था के युग का कार्य, दूसरा चरण है अनुग्रह के युग का कार्य, और तीसरा चरण है अंत के दिनों का कार्य। तुम लोगों को परमेश्वर के कार्य के इन चरणों के बारे में स्पष्ट होना चाहिए। आरंभ से अंत तक कुल तीन चरण हैं। प्रत्येक चरण के कार्य का सार क्या है? छह हजार वर्षीय प्रबंधन-योजना के कार्य में कितने चरण कार्यान्वित किए जाते हैं? ये चरण कैसे कार्यान्वित किए जाते हैं और प्रत्येक चरण को उसके विशेष तरीके से क्यों कार्यान्वित किया जाता है? ये सभी महत्वपूर्ण प्रश्न हैं। प्रत्येक युग के कार्य का प्रातिनिधिक मूल्य है। यहोवा ने क्या कार्य किया? उसने उसे उस विशेष तरीके से क्यों किया? उसे यहोवा क्यों कहा गया? इसके अलावा, अनुग्रह के युग में यीशु ने क्या कार्य किया और उसने उसे किस ढंग से किया? कार्य के प्रत्येक चरण और प्रत्येक युग द्वारा परमेश्वर के स्वभाव के कौन-से पहलू दर्शाए जाते हैं? व्यवस्था के युग में उसके स्वभाव के कौन-से पहलू व्यक्त हुए? और अनुग्रह के युग में कौन-से? और अंत के युग में कौन-से? ये वे अनिवार्य प्रश्न हैं, जिनके बारे में तुम लोगों को स्पष्ट होना चाहिए। परमेश्वर का संपूर्ण स्वभाव छह हजार वर्षीय प्रबंधन-योजना के दौरान प्रकट किया गया है। वह सिर्फ अनुग्रह के युग में प्रकट नहीं किया गया है, न ही सिर्फ व्यवस्था के युग में, सिर्फ अंत के दिनों की इस अवधि में तो बिल्कुल भी नहीं। अंत के दिनों में किया जा रहा कार्य न्याय, कोप और ताड़ना को दर्शाता है। अंत के दिनों में किया जा रहा कार्य व्यवस्था के युग के कार्य या अनुग्रह के युग के कार्य का स्थान नहीं ले सकता। किंतु तीनों चरण आपस में जुड़कर एक इकाई बनते हैं और वे सभी एक ही परमेश्वर के कार्य हैं। स्वाभाविक रूप से, इस कार्य का क्रियान्वयन तीन अलग-अलग युगों में विभाजित है। अंत के दिनों में किया जा रहा कार्य हर चीज को समाप्ति की ओर ले जाता है; व्यवस्था के युग में किया गया कार्य आरंभ करने का कार्य था; और अनुग्रह के युग में किया गया कार्य छुटकारे का कार्य था। जहाँ तक इस संपूर्ण छह हजार वर्षीय प्रबंधन-योजना के कार्य के दर्शनों की बात है, कोई भी व्यक्ति उनके बारे में अंर्तदृष्टि या समझ प्राप्त करने में समर्थ नहीं है और ये दर्शन पहेली बने हुए हैं। अंत के दिनों में, राज्य के युग का सूत्रपात करने के लिए केवल वचन का कार्य किया जाता है, परंतु यह सभी युगों का प्रतिनिधि नहीं है। अंत के दिन अंत के दिनों से बढ़कर नहीं हैं और राज्य के युग से बढ़कर नहीं हैं, और वे अनुग्रह के युग या व्यवस्था के युग का प्रतिनिधित्व नहीं करते। बात बस यह है कि अंत के दिनों के दौरान छह हजार वर्षीय प्रबंधन योजना का समस्त कार्य तुम लोगों पर प्रकट किया जा रहा है। यह रहस्य का अनावरण है। यह ऐसा रहस्य है, जिसे कोई मनुष्य अनावृत नहीं कर सकता। चाहे मनुष्य को बाइबल की कितनी भी अधिक समझ क्यों न हो, वह शब्दों से बढ़कर नहीं है, क्योंकि मनुष्य बाइबल के सार को नहीं समझता। बाइबल पढ़ने से मनुष्य कुछ सत्य समझ सकता है, कुछ वचनों की व्याख्या कर सकता है या कुछ प्रसिद्ध अंशों और अध्यायों की गहन जाँच-परख कर सकता है, परंतु वह उन वचनों के भीतर निहित अर्थ खोलने में कभी समर्थ नहीं होगा, क्योंकि मनुष्य सिर्फ मृत वचन ही देखता है, यहोवा और यीशु के कार्य के दृश्य नहीं, और मनुष्य के पास इस कार्य का रहस्य सुलझाने का कोई उपाय नहीं है। इसलिए छह हजार वर्षीय प्रबंधन-योजना का रहस्य सबसे बड़ा रहस्य है, अत्यधिक छिपा हुआ, और मनुष्य के लिए पूर्णतः अथाह। परमेश्वर के इरादों को कोई तब तक सीधे नहीं समझ सकता, जब तक स्वयं परमेश्वर उन्हें मनुष्य को न समझाए और प्रकट करे; अन्यथा ये चीजें मनुष्य के लिए हमेशा पहेली बनी रहेंगी, हमेशा मुहरबंद रहस्य बनी रहेंगी। धार्मिक जगत के लोगों की तो बात छोड़ो; यदि तुम लोगों को भी आज न बताया जाता, तो तुम लोग भी इसे न समझ पाते। छह हजार वर्षों का यह कार्य नबियों की सभी भविष्यवाणियों से अधिक रहस्यमय है। यह दुनिया के सृजन से लेकर अब तक का सबसे बड़ा रहस्य है और समस्त युगों का कोई भी नबी कभी इसकी थाह पाने में सक्षम नहीं हुआ है, क्योंकि यह रहस्य केवल अंतिम युग में ही खोला जा रहा है और पहले कभी प्रकट नहीं किया गया है। यदि तुम लोग इस रहस्य को समझ सकते हो और यदि तुम इसे इसकी समग्रता में समझ-बूझ लेते हो, तो सभी धार्मिक लोग इस रहस्य से जीत लिए जाएँगे। केवल यही सबसे बड़ा दर्शन है; यही है जिसे समझने के लिए मनुष्य सबसे अधिक लालायित रहता है, किंतु यही उसके लिए सबसे अधिक अस्पष्ट भी है। जब तुम लोग अनुग्रह के युग में थे, तो तुम नहीं जानते थे कि यीशु द्वारा किया गया कार्य क्या था या यहोवा ने क्या कार्य किया था। लोगों को समझ में नहीं आता था कि यहोवा ने क्यों व्यवस्थाएँ निर्धारित कीं, उसने क्यों लोगों को व्यवस्थाओं का पालन करने के लिए कहा अथवा मंदिर क्यों बनाने पड़े थे, और लोगों को यह तो बिल्कुल भी समझ में नहीं आया कि क्यों इस्राएलियों को मिस्र से बीहड़ में और फिर कनान में ले जाया गया। ये मामले आज तक प्रकट नहीं किए गए थे।

अंत के दिनों का कार्य तीनों चरणों में से अंतिम चरण है। यह एक अन्य नए युग का कार्य है और संपूर्ण प्रबंधन-कार्य का प्रतिनिधित्व नहीं करता। छह हजार वर्षीय प्रबंधन-योजना कार्य के तीन चरणों में विभाजित है। कोई भी एक चरण अकेला तीनों युगों के कार्य का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता, बल्कि संपूर्ण कार्य के केवल एक भाग का ही प्रतिनिधित्व कर सकता है। यहोवा नाम परमेश्वर के संपूर्ण स्वभाव का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता। यह तथ्य कि उसने व्यवस्था के युग में अपना कार्य किया था, यह प्रमाणित नहीं करता कि परमेश्वर केवल व्यवस्था के अंतर्गत ही परमेश्वर हो सकता है। यहोवा ने मनुष्य से मंदिर और वेदियाँ बनाने के लिए कहते हुए उसके लिए व्यवस्थाएँ निर्धारित कीं और उसे आज्ञाएँ दीं; जो कार्य उसने किया, वह केवल व्यवस्था के युग का प्रतिनिधित्व करता है। उसके द्वारा किया गया यह कार्य यह प्रमाणित नहीं करता कि केवल वही परमेश्वर, परमेश्वर है जो मनुष्य से व्यवस्था बनाए रखने के लिए कहता है या मंदिर में रहने वाला परमेश्वर ही परमेश्वर है या वेदी के सामने खड़ा परमेश्वर ही परमेश्वर है। ऐसा कहना असत्य होगा। व्यवस्था के अंतर्गत किया गया कार्य केवल एक युग का ही प्रतिनिधित्व कर सकता है। इसलिए, यदि परमेश्वर ने केवल व्यवस्था के युग में ही कार्य किया होता तो मनुष्य यह कहते हुए परमेश्वर को परिसीमित कर देता, “मंदिर में रहने वाला परमेश्वर ही परमेश्वर है और परमेश्वर की सेवा करने के लिए हमें याजकों वाले वस्त्र पहनकर मंदिर में प्रवेश करना चाहिए।” यदि अनुग्रह के युग का कार्य कभी न किया जाता और व्यवस्था का युग ही वर्तमान समय तक जारी रहता तो मनुष्य यह नहीं जान पाता कि परमेश्वर दयालु और प्रेमपूर्ण भी है। यदि व्यवस्था के युग में कोई कार्य न किया जाता और केवल अनुग्रह के युग में ही कार्य किया जाता तो मनुष्य बस इतना ही जान पाता कि परमेश्वर सिर्फ मनुष्य को छुटकारा दिलाता है और परमेश्वर मनुष्य के पाप क्षमा करता है। मनुष्य केवल इतना ही जान पाता कि परमेश्वर पवित्र और निर्दोष है और वह मनुष्य के लिए अपना बलिदान देने और सलीब पर चढ़ने में सक्षम है। मनुष्य केवल ये चीजें ही जान पाता और उसे किसी और चीज की समझ न होती। अतः प्रत्येक युग परमेश्वर के स्वभाव के एक भाग का प्रतिनिधित्व करता है। व्यवस्था का युग परमेश्वर के स्वभाव के कुछ पहलू दर्शाता है और ऐसा ही अनुग्रह का युग और यह वर्तमान युग करता है—केवल ये तीनों चरण एक संपूर्ण इकाई में एकीकृत किए जाने पर पर ही परमेश्वर के स्वभाव की संपूर्णता प्रकट कर सकते हैं। इन तीनों चरणों को जान लेने के बाद ही मनुष्य इसे पूरी तरह से समझ सकता है। तीनों चरणों में से एक भी चरण छोड़ा नहीं जा सकता। कार्य के इन तीनों चरणों को जान लेने के बाद ही तुम परमेश्वर के स्वभाव को उसकी संपूर्णता में देखोगे। यह तथ्य कि परमेश्वर ने व्यवस्था के युग में अपना कार्य किया, यह प्रमाणित नहीं करता कि वह केवल व्यवस्था के अंतर्गत ही परमेश्वर है और इस तथ्य का कि उसने छुटकारे का कार्य किया, यह अर्थ नहीं है कि परमेश्वर सदैव मानवजाति को छुटकारा देगा। ये सभी मनुष्यों द्वारा निर्मित परिसीमन हैं। अनुग्रह के युग के समाप्त हो जाने पर तुम यह नहीं कह सकते कि परमेश्वर केवल सलीब का परमेश्वर है और केवल सलीब ही परमेश्वर द्वारा किए जाने वाले उद्धार का प्रतिनिधित्व करता है। ऐसा करना परमेश्वर को परिसीमित करना होगा। वर्तमान चरण में परमेश्वर मुख्य रूप से वचन का कार्य कर रहा है, परंतु इससे तुम यह नहीं कह सकते कि परमेश्वर मनुष्य के प्रति कभी दयालु नहीं रहा है और वह बस ताड़ना और न्याय लाया है। अंत के दिनों का कार्य यहोवा और यीशु के कार्य को और उन सभी रहस्यों को प्रकट करता है, जिन्हें मनुष्य ने नहीं समझा था, इस तरह यह मानवजाति की मंजिलों और परिणामों को प्रकट करता है और मानवजाति के बीच उद्धार के समस्त कार्य को समाप्त करता है। अंत के दिनों में कार्य का यह चरण सभी चीजों को समाप्ति की ओर ले जाता है। मनुष्य द्वारा समझे न गए सभी रहस्यों को प्रकट किया ही जाना चाहिए, ताकि मनुष्य उनकी असलियत जान सके और उसके हृदय में उन सबकी समझ उत्पन्न हो सके। केवल तभी लोगों को उनकी किस्म के अनुसार छाँटा जा सकता है। केवल छह हजार वर्षीय प्रबंधन-योजना पूर्ण होने के बाद ही मनुष्य परमेश्वर का स्वभाव उसकी संपूर्णता में समझ पाएगा, क्योंकि तब उसका प्रबंधन समाप्त हो चुका होगा। अब जबकि तुम लोगों ने अंतिम युग में परमेश्वर के कार्य का अनुभव कर लिया है, तो परमेश्वर का स्वभाव असल में क्या है? क्या तुम यह कहने का साहस कर सकते हो कि परमेश्वर वह परमेश्वर है, जो केवल वचन बोलता है, और कुछ नहीं करता? तुम परमेश्वर को इस तरह परिसीमित करने का साहस नहीं करोगे। कुछ लोग कहेंगे कि परमेश्वर वह परमेश्वर है जो रहस्य खोलता है, कि परमेश्वर मेमना है और वह है जो सात मुहरों को तोड़ता है। किंतु कोई भी परमेश्वर को इस प्रकार परिसीमित करने का साहस नहीं करता। अन्य लोग कह सकते हैं कि परमेश्वर देहधारी है, किंतु यह भी सही नहीं होगा। कुछ अन्य लोग कह सकते हैं कि देहधारी परमेश्वर केवल वचन बोलता है और चिह्न और चमत्कार नहीं दिखाता, लेकिन इस तरह से कहने का साहस तो तुम बिल्कुल नहीं करोगे, क्योंकि यीशु देह बना था और उसने चिह्न और चमत्कार दिखाए थे, इसलिए तुम परमेश्वर को इतने हलके ढंग से परिभाषित करने का साहस नहीं करोगे। छह हजार वर्षीय प्रबंधन-योजना के दौरान किया गया समस्त कार्य अब समाप्ति पर आ गया है। यह समस्त कार्य मनुष्यों पर प्रकट किए जाने और मनुष्यों के बीच संपन्न किए जाने के बाद ही मानवजाति परमेश्वर के संपूर्ण स्वभाव और स्वरूप को जानेगी। जब इस चरण का कार्य पूरी तरह से संपन्न कर लिया जाएगा तो मनुष्य द्वारा नहीं समझे गए सभी रहस्यों को प्रकट कर दिया गया होगा, पहले नहीं समझे गए सभी सत्यों को स्पष्ट कर दिया गया होगा और मानवजाति को उसके भविष्य के मार्ग और मंजिल के बारे में बता दिया गया होगा। यह संपूर्ण कार्य वर्तमान चरण में किया जाना है। यद्यपि आज मनुष्य जिस मार्ग पर चलता है, वह सलीब का मार्ग और दुःख का मार्ग भी है, फिर भी आज का मनुष्य जो अभ्यास करता है और जो वह खाता-पीता है और जिसका आनंद लेता है, वह व्यवस्था और अनुग्रह के युग के मनुष्य से बहुत भिन्न है। आज मनुष्य से जो माँग की जाती है, वह अतीत की माँग से भिन्न है और व्यवस्था के युग में मनुष्य से की गई माँग से तो वह और भी अधिक भिन्न है। भला व्यवस्था के अंतर्गत मनुष्य से क्या माँग की गई थी, जब परमेश्वर इस्राएल में अपना कार्य कर रहा था? वह इससे बढ़कर कुछ नहीं थी कि मनुष्य को सब्त और यहोवा की व्यवस्थाओं का पालन करना चाहिए। किसी को भी सब्त के दिन काम नहीं करना था या यहोवा की व्यवस्थाओं का उल्लंघन नहीं करना था। परंतु अब ऐसा नहीं है। सब्त के दिन मनुष्य हमेशा की तरह काम करते हैं, इकट्ठे होते हैं और प्रार्थना करते हैं और उन पर कोई प्रतिबंध नहीं लगाए जाते। अनुग्रह के युग में लोगों को बपतिस्मा लेना पड़ता था और फिर उनसे उपवास करने, रोटी तोड़ने, दाखमधु पीने, अपने सिर ढकने और दूसरों के पाँव धोने के लिए कहा जाता था। अब ये विनियम समाप्त कर दिए गए हैं, किंतु मनुष्य से और भी बड़ी माँगें की जाती हैं, क्योंकि परमेश्वर का कार्य लगातार अधिक गहरा होता जाता है और मनुष्य का प्रवेश पहले से कहीं अधिक ऊँचा हो गया है। अतीत में यीशु मनुष्य के ऊपर हाथ रखता था और प्रार्थना करता था, परंतु अब जबकि सब कुछ कहा जा चुका है तो मनुष्य के ऊपर हाथ रखने का क्या उपयोग है? वचन अकेले ही परिणाम प्राप्त कर सकते हैं। जब अतीत में वह अपना हाथ मनुष्य के ऊपर रखता था तो यह मनुष्य को आशीष देने और चंगा करने के लिए होता था। उस समय पवित्र आत्मा इसी तरह से कार्य करता था, परंतु अब ऐसा नहीं है। अब पवित्र आत्मा कार्य करने और नतीजे पाने के लिए वचनों का उपयोग करता है। उसके वचन तुम लोगों पर स्पष्ट कर दिए गए हैं और तुम्हें उन्हें ठीक वैसे ही अभ्यास में लाना चाहिए, जैसे तुम्हें बताया गया है। उसके वचन उसके इरादे हैं; वे वह कार्य है, जिसे वह करना चाहता है। उसके वचनों के माध्यम से तुम उसके इरादे और वह चीज समझ जाओगे, जिसे प्राप्त करने के लिए वह तुमसे कहता है और तुम अपने ऊपर हाथ रखे जाने की आवश्यकता के बिना ही सीधे उसके वचनों को अभ्यास में ला सकते हो। कुछ लोग कह सकते हैं, “मुझ पर अपना हाथ रख! मुझ पर अपना हाथ रख, ताकि मैं तेरे आशीष प्राप्त कर सकूँ और तेरा हिस्सा बन सकूँ।” यह अतीत का एक पुराना अभ्यास है, जो अब अप्रचलित हो चुका है, क्योंकि युग बदल चुका है। पवित्र आत्मा युग के अनुसार कार्य करता है, मनमाने ढंग से नहीं और न ही विनियमों को लागू करके। युग बदल चुका है और नया युग अनिवार्य रूप से अपने साथ नया काम लेकर आता है। यह कार्य के प्रत्येक चरण के बारे में सच है, इसलिए उसका कार्य कभी दोहराया नहीं जाता। अनुग्रह के युग में यीशु ने इस तरह का बहुत-सा कार्य किया, जैसे कि बीमारी को चंगा करना, दुष्टात्माओं को निकालना, मनुष्य के लिए प्रार्थना करने हेतु उस पर अपने हाथ रखना और मनुष्य को आशीष देना। किंतु आज दोबारा ऐसा करना निरर्थक होगा। पवित्र आत्मा ने उस समय उस तरह से कार्य किया, क्योंकि वह अनुग्रह का युग था और मनुष्य के आनंद लेने के लिए पर्याप्त अनुग्रह था। उससे किसी तरह के भुगतान की माँग नहीं की गई और जब तक वह विश्वास करता रहा, उसे अनुग्रह मिलता रहा। सबके साथ बहुत अनुग्रहपूर्ण व्यवहार किया जाता था। अब युग बदल चुका है और परमेश्वर का कार्य आगे बढ़ चुका है; मनुष्य की विद्रोहशीलता और उसके भीतर की अशुद्ध चीजें ताड़ना और न्याय के माध्यम से दूर की जाएँगी। चूँकि वह छुटकारे का चरण था, इसलिए मनुष्य के आनंद के लिए उस पर पर्याप्त अनुग्रह प्रदर्शित करते हुए परमेश्वर का उस तरह से कार्य करना उचित था, ताकि मनुष्य को पापों से छुटकारा दिलाया जा सके। अपने अनुग्रह के माध्यम से उसने मनुष्य के पाप क्षमा किए। यह वर्तमान चरण ताड़ना, न्याय, वचनों के प्रहार और साथ ही अनुशासन तथा वचनों के प्रकाशन के माध्यम से मनुष्य के भीतर की अधार्मिक चीजें उजागर करने के लिए है, ताकि बाद में मानवजाति को बचाया जा सके। यह कार्य छुटकारे के कार्य से कहीं अधिक गहरा है। अनुग्रह के युग में मनुष्य के आनंद के लिए अनुग्रह पर्याप्त था; अब चूँकि मनुष्य पहले ही इस अनुग्रह का अनुभव कर चुका है, इसलिए उसे अब और उसका आनंद नहीं उठाना है। इस कार्य का समय अब बीत चुका है और इसे अब और नहीं किया जाना है। अब मनुष्य को वचन के न्याय के माध्यम से बचाया जाना है। मनुष्य का न्याय, उसकी ताड़ना और उसका शोधन किए जाने के पश्चात् इनके द्वारा उसका स्वभाव बदल जाता है। क्या यह सब मेरे द्वारा बोले गए वचनों के कारण नहीं है? कार्य का प्रत्येक चरण समूची मानवजाति की प्रगति और युग के अनुसार किया जाता है। समस्त कार्य महत्वपूर्ण है और यह सब अंतिम उद्धार के लिए किया जाता है, ताकि मानवजाति को भविष्य में एक अच्छी मंजिल मिल सके और अंत में लोगों को उनकी किस्म के अनुसार छाँटा जा सके।

अंत के दिनों का कार्य वचन बोलना है। वचनों के माध्यम से मनुष्य में बड़े परिवर्तन किए जा सकते हैं। इन वचनों को स्वीकार करने से इन लोगों में अब जो परिवर्तन हुए हैं, वे उन परिवर्तनों से बहुत अधिक बड़े हैं, जो चिह्न और चमत्कार स्वीकार करने से अनुग्रह के युग में लोगों में हुए थे। क्योंकि अनुग्रह के युग में हाथ रखकर और प्रार्थना करके दुष्टात्माओं को मनुष्य से निकाला जाता था, परंतु मनुष्य के भीतर भ्रष्ट स्वभाव तब भी बने रहते थे। मनुष्य को उसकी बीमारी से चंगा कर दिया जाता था और उसके पाप क्षमा कर दिए जाते थे, किंतु जहाँ तक यह प्रश्न है कि मनुष्य अपने भीतर के शैतानी भ्रष्ट स्वभावों को कैसे छोड़ सकता है, तो उस पर अभी यह कार्य किया जाना बाकी था। मनुष्य को सिर्फ उसकी आस्था के कारण बचाया गया था और उसके पाप क्षमा किए गए थे, किंतु मनुष्य की पापी प्रकृति नहीं मिटाई गई थी और वह अब भी उसके भीतर बनी हुई थी। मनुष्य के पाप परमेश्वर के देहधारण के माध्यम से क्षमा कर दिए गए थे, परंतु इसका अर्थ यह नहीं था कि मनुष्य के भीतर अब पाप नहीं रहा था। मनुष्य के पाप पाप-बलि के माध्यम से क्षमा किए जा सकते थे, लेकिन जहाँ तक यह बात है कि मनुष्य को अब पाप न करने वाला कैसे बनाया जा सकता है, उसके भ्रष्ट स्वभावों और पापी प्रकृति को पूरी तरह से कैसे दूर किया जा सकता है और उसके जीवन स्वभाव को कुछ हद तक कैसे बदला जा सकता है, उसके पास इस समस्या को हल करने का कोई तरीका नहीं है। मनुष्य के पाप क्षमा कर दिए गए हैं और यह परमेश्वर के सलीब पर चढ़ने के कार्य के कारण है, लेकिन मनुष्य अभी भी अपने पुराने शैतानी भ्रष्ट स्वभावों में ही जी रहा है। ऐसे में मनुष्य को उसके शैतानी भ्रष्ट स्वभावों से पूरी तरह से बचाया जाना चाहिए, उसकी पापी प्रकृति पूरी तरह से दूर की जानी चाहिए, ताकि वह फिर कभी विकसित न हो, और उसके स्वभाव में रूपांतरण होना चाहिए। इसके लिए आवश्यक है कि मनुष्य जीवन में संवृद्धि के मार्ग को समझे, जीवन का तरीका समझे और अपने स्वभाव को बदलने का तरीका समझे। साथ ही, इसके लिए मनुष्य को इस मार्ग के अनुसार अभ्यास करने की आवश्यकता है, ताकि धीरे-धीरे उसका स्वभाव बदल सके और वह रोशनी की चमक में जी सके, ताकि वह जो कुछ भी करे वह परमेश्वर के इरादों के अनुसार हो, ताकि वह अपने शैतानी भ्रष्ट स्वभावों को छोड़ सके और शैतान के अंधकार के प्रभाव से आजाद हो सके और परिणामस्वरूप पाप से पूरी तरह उबर सके। केवल तभी मनुष्य ने पूर्ण उद्धार प्राप्त किया होगा। जिस समय यीशु अपना कार्य कर रहा था, तब भी उसके बारे में मनुष्य का ज्ञान धुँधला और अस्पष्ट था। मनुष्य ने हमेशा उसे दाऊद का वंशज माना और कहा कि वह एक महान नबी है, उदार प्रभु है जिसने मनुष्य को उसके पापों से छुटकारा दिलाया। कुछ लोग अपनी आस्था के बल पर उसके वस्त्र के किनारे को छूकर ही चंगे हो गए; अंधे देख सके, यहाँ तक कि मृतक जीवित किए जा सके। किंतु मनुष्य अपने भीतर गहराई से जड़ जमाए हुए शैतानी भ्रष्ट स्वभावों का पता लगाने में असमर्थ रहा, न ही वह यह जानता था कि उन्हें कैसे त्यागा जाए। मनुष्य ने बहुत अनुग्रह प्राप्त किया, जैसे देह की शांति और खुशी, एक व्यक्ति की आस्था से पूरे परिवार को आशीष मिलना, बीमारी से चंगाई, इत्यादि। शेष मनुष्य के अच्छे कर्म और उसका धर्मात्मा जैसा रूप था; यदि कोई इनके आधार पर जी सकता था तो उसे एक मानक-अनुरूप विश्वासी माना जाता था। केवल इसी तरह के विश्वासी मृत्यु के बाद स्वर्ग में प्रवेश कर सकते थे, जिसका अर्थ था कि उन्हें बचा लिया गया। परंतु अपने जीवन-काल में इन लोगों ने जीवन के मार्ग को बिल्कुल नहीं समझा था। उन्होंने सिर्फ इतना किया कि अपना स्वभाव बदलने के किसी मार्ग को अपनाए बिना बस एक निरंतर चक्र में पाप किए और उन्हें स्वीकार कर लिया : अनुग्रह के युग में मनुष्य की स्थिति ऐसी थी। क्या मनुष्य ने पूर्ण उद्धार पा लिया है? नहीं! इसलिए, उस चरण का कार्य पूरा हो जाने के बाद भी न्याय और ताड़ना का कार्य बाकी रह गया था। यह चरण वचन के माध्यम से मनुष्य को शुद्ध करने और इस प्रकार उसे अनुसरण हेतु एक मार्ग प्रदान करने के लिए है। यह चरण फलदायक या अर्थपूर्ण न होता, यदि यह दुष्टात्माओं को निकालने के साथ जारी रहता, क्योंकि यह मनुष्य की पापपूर्ण प्रकृति मिटाने में असफल रहता और मनुष्य अपने पापों की क्षमा पर ही रुक जाता। पापबलि के माध्यम से मनुष्य के पाप क्षमा किए गए हैं, क्योंकि सलीब पर चढ़ने का कार्य पहले ही समाप्त हो चुका है और परमेश्वर ने शैतान को जीत लिया है। किंतु मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव अभी भी उसके भीतर बने रहने के कारण वह अभी भी पाप कर सकता है और परमेश्वर का प्रतिरोध कर सकता है, और परमेश्वर ने मानवजाति को प्राप्त नहीं किया है। इसीलिए कार्य के इस चरण में परमेश्वर वचन का उपयोग करके मनुष्य के भ्रष्ट स्वभावों को उजागर करता है और उसे उचित मार्ग के अनुसार अभ्यास करने के लिए प्रेरित करता है। इस चरण का कार्य पिछले चरण से अधिक अर्थपूर्ण और साथ ही अधिक फलदायक भी है, क्योंकि अब वचन ही है जो सीधे तौर पर मनुष्य के जीवन का पोषण करता है और मनुष्य के स्वभाव को पूरी तरह से नया होने में सक्षम बनाता है; कार्य का यह चरण कहीं अधिक संपूर्ण है। इसलिए, अंत के दिनों में देहधारण ने परमेश्वर के देहधारण के महत्व को पूर्ण किया है और मनुष्य के उद्धार के लिए परमेश्वर की प्रबंधन-योजना का पूर्णतः समापन किया है।

परमेश्वर द्वारा मनुष्य को बचाने का कार्य सीधे तौर पर आत्मा के माध्यम से और आत्मा की पहचान के साथ नहीं किया जाता, क्योंकि उसके आत्मा को मनुष्य द्वारा न तो छुआ जा सकता है, न देखा जा सकता है और न ही मनुष्य उसके निकट जा सकता है। अगर वह सीधे आत्मा के रूप में मनुष्य को बचाने का प्रयास करता तो मनुष्य उसका उद्धार प्राप्त करने में असमर्थ होता। यदि परमेश्वर एक सृजित मनुष्य का बाहरी रूप धारण न करता तो मनुष्य के लिए इस उद्धार को प्राप्त करने का कोई उपाय न होता। क्योंकि मनुष्य के पास उस तक पहुँचने का कतई कोई तरीका नहीं है, ठीक वैसे ही जैसे कोई भी यहोवा के बादल के पास नहीं जा पाया था। केवल एक सृजित मनुष्य बनकर, यानी परमेश्वर जो देह बनने वाला है उस देह में अपने वचन को रखकर ही वह व्यक्तिगत रूप से वचन को उन सभी लोगों में सन्निविष्ट कर सकता है जो उसका अनुसरण करते हैं। केवल तभी मनुष्य व्यक्तिगत रूप से उसके वचन को सुन और देख सकता है और उसके वचन को प्राप्त भी कर सकता है और इस तरीके से पूरी तरह बचाया जा सकता है। यदि परमेश्वर देहधारी न बनता तो देह और रक्त से बना कोई भी मनुष्य ऐसा महान उद्धार प्राप्त न कर पाता, न ही एक भी मनुष्य बचाया जाता। यदि परमेश्वर का आत्मा सीधे मानवजाति के बीच कार्य करता तो पूरी मानवजाति मारी जाती या फिर परमेश्वर के संपर्क में आने का कोई उपाय न होने के कारण वह शैतान द्वारा पूरी तरह से बंदी बना ली जाती। प्रथम देहधारण मनुष्य को पाप से छुटकारा दिलाने के लिए था, उसे यीशु के दैहिक शरीर के माध्यम से छुटकारा दिलाने के लिए था, अर्थात् यीशु ने मनुष्य को सलीब से बचाया, किंतु शैतानी भ्रष्ट स्वभाव मनुष्य के भीतर अभी भी बचे रह गए। दूसरा देहधारण अब पापबलि के रूप में कार्य करने के लिए नहीं है, अपितु उन लोगों को पूरी तरह से बचाने के लिए है जिन्हें पाप से छुटकारा दिलाया गया था। यह इसलिए किया जाता है ताकि जिनके पापों को क्षमा किया जा चुका है वे अपने पाप से मुक्त और पूरी तरह से शुद्ध हो सकें और स्वभावगत बदलाव हासिल कर सकें और इस प्रकार शैतान के अंधकार के प्रभाव से मुक्त हो जाएँ और परमेश्वर के सिंहासन के सामने लौट आएँ। केवल इसी तरीके से मनुष्य पूरी तरह से पवित्र हो सकता है। व्यवस्था के युग का अंत होने के बाद और अनुग्रह के युग के आरंभ से परमेश्वर ने उद्धार का कार्य शुरू किया, जो अंत के दिनों में जारी है, जब परमेश्वर मनुष्य की विद्रोहशीलता के लिए उसके न्याय और ताड़ना का कार्य करता है और इस प्रकार मानवजाति को पूरी तरह से शुद्ध करता है। केवल इसके बाद ही परमेश्वर उद्धार के अपने कार्य का समापन करेगा और विश्राम में प्रवेश करेगा। इसलिए, कार्य के तीन चरणों में परमेश्वर स्वयं मनुष्य के बीच अपना कार्य करने के लिए केवल दो बार देह बना है। वह इसलिए, क्योंकि कार्य के तीन चरणों में से केवल एक चरण ही लोगों का जीवन जीने में मार्गदर्शन करने के लिए है, जबकि अन्य दो चरणों में उद्धार का कार्य शामिल है। केवल देह बनकर ही परमेश्वर मनुष्य के साथ रह सकता है, संसार के कष्ट का अनुभव कर सकता है और एक सामान्य दैहिक शरीर में रह सकता है। केवल इसी तरह से वह लोगों को उस व्यावहारिक वचन की आपूर्ति कर सकता है जिसकी उन्हें सृजित प्राणी होने के नाते आवश्यकता है। परमेश्वर के देहधारण के माध्यम से ही मनुष्य परमेश्वर से पूर्ण उद्धार प्राप्त करता है, न कि अपनी प्रार्थनाओं के उत्तर में सीधे स्वर्ग से। मनुष्य देह और रक्त से बना है, उसके पास परमेश्वर के आत्मा को देखने का कोई उपाय नहीं है, उसके आत्मा के निकट पहुँचने की तो बात ही छोड़ दो, इसलिए मनुष्य जिसके संपर्क में आ सकता है वह सिर्फ परमेश्वर का देहधारी देह है। केवल इसी तरीके से मनुष्य समस्त वचन और सभी सत्य समझ पाता है और पूर्ण उद्धार प्राप्त कर पाता है। दूसरा देहधारण मनुष्य को उसके पापों से छुटकारा दिलाने और उसे पूरी तरह से शुद्ध करने के लिए पर्याप्त है। इसलिए, दूसरे देहधारण के साथ देह में परमेश्वर का संपूर्ण कार्य समाप्त कर दिया जाएगा और परमेश्वर के देहधारण का महत्व पूरा कर दिया जाएगा। उसके बाद देह में परमेश्वर का कार्य पूरी तरह से समाप्त हो जाएगा। दूसरे देहधारण के बाद वह अपने कार्य के लिए तीसरी बार देह नहीं बनेगा। क्योंकि उसका संपूर्ण प्रबंधन समाप्त हो गया होगा, अंत के दिनों के देहधारण ने अपने चुने हुए लोगों को पूरी तरह से प्राप्त कर लिया होगा, और अंत के दिनों में मानवजाति को उसकी किस्म के अनुसार छाँट लिया गया होगा। वह अब और उद्धार का कार्य नहीं करेगा, न ही वह कोई कार्य करने के लिए देह में लौटेगा। अंत के दिनों के कार्य में वचनों की शक्ति चिह्नों और चमत्कारों के प्रदर्शन की शक्ति से कहीं अधिक है और वचन का अधिकार चिह्नों और चमत्कारों के अधिकार से कहीं बढ़कर है। वचन मनुष्य के हृदय में गहरे दबे सभी भ्रष्ट स्वभावों को उजागर कर देता है। तुम्हारे पास उन्हें खुद खोजने का कोई उपाय नहीं है। जब उन्हें वचन के माध्यम से उजागर किया जाता है, तो तुम स्वाभाविक रूप से उन्हें खोज लोगे; तुम्हें उन्हें अपनी स्वीकृति देनी होगी और तुम पूरी तरह से आश्वस्त हो जाओगे। क्या यह वचन का अधिकार नहीं है? यह आज वचन के कार्य द्वारा प्राप्त किया जाने वाला परिणाम है। इसलिए, बीमारी की चंगाई और दुष्टात्माओं को निकालने से मनुष्य को उसके पापों से पूरी तरह से नहीं बचाया जा सकता, न ही चिह्नों और चमत्कारों के प्रदर्शन से उसे पूरी तरह से पूर्ण बनाया जा सकता है। चंगाई करने और दुष्टात्माओं को निकालने का अधिकार मनुष्य को केवल अनुग्रह प्रदान करता है, किंतु मनुष्य की देह अभी भी शैतान की है और भ्रष्ट शैतानी स्वभाव अभी भी मनुष्य के भीतर बने हुए हैं। दूसरे शब्दों में, जिस मनुष्य को शुद्ध नहीं किया गया है, वह अभी भी पाप और गंदगी का है। केवल वचन के माध्यम से शुद्ध किए जाने के बाद ही मनुष्य परमेश्वर द्वारा प्राप्त किया जा सकता है और पवित्र बन सकता है। जब मनुष्य के भीतर से दुष्टात्माओं को निकाला गया और उसे छुटकारा दिलाया गया, तो इसका अर्थ केवल इतना था कि उसे शैतान के हाथ से छीनकर परमेश्वर को लौटा दिया गया है। किंतु मनुष्य अभी तक परमेश्वर द्वारा शुद्ध नहीं किया गया या बदला नहीं गया है और वह भ्रष्ट बना हुआ है। मनुष्य के भीतर अब भी गंदगी, प्रतिरोध और विद्रोहशीलता मौजूद है; मनुष्य केवल परमेश्वर के छुटकारे के माध्यम से ही उसके पास लौटा है, किंतु उसे परमेश्वर का जरा-सा भी ज्ञान नहीं है और वह अभी भी परमेश्वर का प्रतिरोध करने और उसके साथ विश्वासघात करने में सक्षम है। मनुष्य को छुटकारा दिलाए जाने से पहले उसके अंदर शैतान के बहुत-से जहर पहले ही डाल दिए गए थे और हजारों वर्षों तक शैतान द्वारा भ्रष्ट किए जाने के बाद उसके भीतर एक ऐसी प्रकृति है जो परमेश्वर का प्रतिरोध करती है। इसलिए जब मनुष्य को छुटकारा दिलाया गया तो यह छुटकारे के मामले से बढ़कर कुछ नहीं था। यानी मनुष्य को एक ऊँची कीमत पर वापस खरीदा गया, किंतु उसके भीतर की विषैली प्रकृति नहीं हटाई गई। मनुष्य, जो इतना गंदा है, को परमेश्वर की सेवा करने योग्य होने से पहले परिवर्तन से होकर गुजरना चाहिए। न्याय और ताड़ना के इस कार्य के माध्यम से मनुष्य अपने भीतर के गंदे और भ्रष्ट सार को पूरी तरह जान जाएगा और वह पूरी तरह बदल पाएगा और शुद्ध हो पाएगा। केवल इसी तरीके से मनुष्य परमेश्वर के सिंहासन के सामने लौटने योग्य हो सकता है। सारा वर्तमान कार्य इसलिए किया जाता है ताकि मनुष्य को शुद्ध किया और बदला जा सके; ऐसा इसलिए है ताकि वचन के न्याय और ताड़ना के माध्यम से और शोधन के जरिये मनुष्य अपनी भ्रष्टता छोड़ सके और शुद्ध किया जा सके। इस चरण के कार्य को उद्धार का कार्य मानने के बजाय यह कहना कहीं अधिक उचित होगा कि यह शुद्धिकरण का कार्य है। वास्तव में यह चरण विजय के कार्य का चरण भी है और साथ ही उद्धार के कार्य का दूसरा चरण भी है। वचन द्वारा न्याय और ताड़ना के माध्यम से ही मनुष्य परमेश्वर द्वारा प्राप्त किया जाता है, और वचन द्वारा शोधन, न्याय और उजागर किए जाने से ही मनुष्य के हृदय के भीतर की सभी अशुद्धताएँ, धारणाएँ, मंशाएँ और व्यक्तिगत आशाएँ पूरी तरह से प्रकट होती हैं। हालाँकि मनुष्य को छुटकारा दिलाया जा चुका है और उसके पाप क्षमा किए जा चुके हैं, फिर भी इसे केवल इस तरह समझा जा सकता है कि परमेश्वर मनुष्य के अपराधों का स्मरण नहीं करता और उसके साथ उसके अपराधों के अनुसार व्यवहार नहीं करता। लेकिन मनुष्य पाप से मुक्त हुए बिना देह में रहता है और केवल पाप करता रह सकता है और निरंतर अपने शैतानी भ्रष्ट स्वभाव प्रकट करता रह सकता है। यही वह जीवन है जो मनुष्य जीता है, पाप करने और क्षमा किए जाने का एक अंतहीन चक्र। अधिकतर लोग दिन में पाप करते हैं और शाम को उन्हें स्वीकार करते हैं। और इसलिए, हालाँकि पाप-बलि मनुष्य के लिए हमेशा के लिए प्रभावी है, फिर भी यह मनुष्य को पाप से नहीं बचा सकती। उद्धार का केवल आधा कार्य पूरा हुआ है, क्योंकि मनुष्य में अभी भी भ्रष्ट स्वभाव हैं। उदाहरण के लिए, जब लोगों को पता चला कि वे मोआब के वंशज हैं तो उन्होंने शिकायत की, जीवन का अनुसरण करना छोड़ दिया और पूरी तरह से नकारात्मक हो गए। क्या यह इस बात को नहीं दर्शाता कि मनुष्य अभी भी परमेश्वर के प्रभुत्व के अधीन पूरी तरह समर्पण करने में असमर्थ है? क्या ठीक यही मनुष्य के शैतानी भ्रष्ट स्वभाव नहीं हैं? जब तुम्हें ताड़ना का भागी नहीं बनाया गया था, तो तुमने अपने हाथ बाकी सबके हाथों से ऊँचे उठाए थे, यहाँ तक कि यीशु के हाथों से भी ऊँचे। और तुमने ऊँची आवाज में पुकारा था : “परमेश्वर के प्रिय पुत्र बनो! परमेश्वर के अंतरंग बनो! हम मर जाएँगे, पर शैतान के आगे नहीं झुकेंगे! बूढ़े शैतान के विरुद्ध विद्रोह करो! बड़े लाल अजगर के विरुद्ध विद्रोह करो! बड़ा लाल अजगर सदा-सदा के लिए सत्ता से गिर जाए! परमेश्वर हमें पूरा करे!” तुमने बाकी सबसे ऊँचा पुकारा था। किंतु फिर ताड़ना का समय आया और एक बार फिर तुम्हारे भ्रष्ट स्वभाव प्रकट किए गए। तुम्हारी पुकार बंद हो गई और तुम अपना संकल्प खो बैठे। यही मनुष्य की भ्रष्टता है; यह एक ऐसी चीज है जो पाप से ज्यादा गहरी है, जो शैतान द्वारा रोपी जाती है और मनुष्य के भीतर गहराई से जड़ जमाए हुए है। मनुष्य के लिए अपने पापों से अवगत होना आसान नहीं है और उसके पास अपनी गहरे जमी हुई प्रकृति को पहचानने का कोई उपाय नहीं है। यह परिणाम केवल वचनों के न्याय के जरिये प्राप्त किया जा सकता है। केवल इसी प्रकार मनुष्य इस बिंदु से आगे धीरे-धीरे बदल सकता है। मनुष्य अतीत में इस प्रकार इसलिए चिल्लाता था, क्योंकि मनुष्य को अपने अंतर्निहित भ्रष्ट स्वभावों की कोई समझ नहीं थी। मनुष्य के भीतर ये अशुद्धियाँ मौजूद हैं। न्याय और ताड़ना की एक लंबी अवधि के दौरान मनुष्य तनाव के माहौल में जिया। क्या यह सब वचन के माध्यम से प्राप्त नहीं किया गया? क्या सेवाकर्ताओं के परीक्षण से पहले तुमने भी बहुत ऊँची आवाज में नहीं पुकारा था? “हम राज्य में प्रवेश कर गए हैं! वे सभी जो इस नाम को स्वीकार करते हैं, राज्य में प्रवेश कर गए हैं! सभी परमेश्वर का हिस्सा बन गए हैं!” जब सेवाकर्ताओं का परीक्षण आया, तो तुमने पुकारना बंद कर दिया। बिल्कुल शुरुआत में सभी ने पुकारा, “परमेश्वर! तुम मुझे जहाँ कहीँ भी रखो, मैं तुम्हारे आयोजनों के प्रति समर्पण करूँगा।” पमेश्वर के ये वचन पढ़कर, कि “मेरा पौलुस कौन बनेगा?” लोगों ने कहा, “मैं तैयार हूँ!” फिर उन्होंने इन वचनों को देखा, “अय्यूब की आस्था कैसी थी?” और कहा, “मैं अय्यूब जैसी आस्था रखने के लिए तैयार हूँ। परमेश्वर, कृपया मेरी परीक्षा लो!” जब सेवाकर्ताओं का परीक्षण आया, तो वे तुरंत ढह गए और फिर मुश्किल से ही खड़े हो सके। इसके बाद थोड़ी-थोड़ी करके मनुष्य के दिलों की अशुद्धियाँ धीरे-धीरे घट गईं। क्या यह वचन के माध्यम से हासिल नहीं किया गया? इसलिए, आज तुम लोगों ने जो कुछ अनुभव किया है, वे वचन के माध्यम से हासिल किए गए परिणाम हैं, जो यीशु द्वारा चिह्न और चमत्कार दिखाकर हासिल किए गए परिणामों से भी बड़े हैं। तुम परमेश्वर की जो महिमा और स्वयं परमेश्वर का जो अधिकार देखते हो, वे मात्र सलीब पर चढ़ने, बीमारी को चंगा करने और दुष्टात्माओं को बाहर निकालने के माध्यम से नहीं देखे जाते, बल्कि उनसे भी बढ़कर उसके वचन के न्याय के माध्यम से देखे जाते हैं। यह तुम्हें दर्शाता है कि परमेश्वर के अधिकार और सामर्थ्य में केवल चिह्न दिखाना, बीमारी को चंगा करना और दुष्टात्माओं को बाहर निकालना ही शामिल नहीं है, बल्कि परमेश्वर के वचन का न्याय परमेश्वर के अधिकार का प्रतिनिधित्व करने और उसकी सर्वशक्तिमत्ता प्रकट करने में अधिक सक्षम है।

मनुष्य ने अब जो कुछ हासिल किया है—अपना वर्तमान आध्यात्मिक कद, ज्ञान, प्रेम, वफादारी, समर्पण और अंतर्दृष्टि—ये वे परिणाम हैं, जो वचन के न्याय के माध्यम से प्राप्त किए गए हैं। तुम जो वफादारी रखने और आज तक खड़े रहने में समर्थ हो, यह वचन के माध्यम से प्राप्त किया गया है। अब मनुष्य देखता है कि देहधारी परमेश्वर का कार्य वास्तव में असाधारण है और इसमें बहुत-कुछ ऐसा है जिसे मनुष्य द्वारा प्राप्त नहीं किया जा सकता, और वे रहस्य और चमत्कार हैं। इसलिए बहुतों ने समर्पण कर दिया है। कुछ लोगों ने अपने जन्म के समय से ही किसी भी मनुष्य के प्रति समर्पण नहीं किया है, फिर भी जब वे आज परमेश्वर के वचनों को देखते हैं, तो वे अनजाने ही पूरी तरह से समर्पण कर देते हैं और वे जाँच करने या कुछ और कहने का उपक्रम नहीं करते। मनुष्य वचन के अधीन गिर गया है और वचन के न्याय के अधीन दंडवत् पड़ा है। यदि परमेश्वर का आत्मा मनुष्यों से सीधे बात करता, तो समस्त मानवजाति उस वाणी के प्रति समर्पण कर देती, परमेश्वर द्वारा अपने वचनों से मनुष्य को उजागर करने की जरूरत के बिना ही दंडवत् हो जाती, बिल्कुल वैसे ही जैसे पौलुस दमिश्क की राह पर ज्योति के मध्य भूमि पर गिर गया था। यदि परमेश्वर इसी तरीके से काम करता रहता, तो मनुष्य वचन के न्याय के माध्यम से अपनी भ्रष्टता जानने और इसके परिणामस्वरूप उद्धार प्राप्त करने में कभी समर्थ न होता। केवल देह बनकर ही परमेश्वर व्यक्तिगत रूप से अपने वचन हर मनुष्य के कानों तक पहुँचा सकता है, ताकि वे सभी, जिनके पास कान हैं, उसके वचन सुन सकें और वचन के द्वारा उसके न्याय का कार्य स्वीकार कर सकें। यह वह सच्चा परिणाम है जो उसके वचन द्वारा प्राप्त होता है, न कि मनुष्य को भय से अभिभूत करने के लिए आत्मा का प्रकट होना। केवल इस व्यावहारिक और फिर भी असाधारण कार्य के माध्यम से ही मनुष्य के पुराने स्वभाव, जो अनेक वर्षों से उसके भीतर गहराई में छिपे हुए हैं, पूरी तरह से उजागर किए जा सकते हैं, ताकि मनुष्य स्वयं को पहचान सके और बदलाव अनुभव कर सके। ये सब चीजें देहधारी परमेश्वर का व्यावहारिक कार्य हैं, जिसमें वह एक पूर्णतः व्यावहारिक तरीके से बोलता और न्याय करता है और फिर वचन के द्वारा मनुष्य पर न्याय के परिणाम प्राप्त करता है। यह देहधारी परमेश्वर का अधिकार और परमेश्वर के देहधारण का महत्व है। यह देहधारी परमेश्वर का अधिकार प्रकट करने, वचन के कार्य द्वारा प्राप्त किए गए परिणाम प्रकट करने और यह प्रकट करने के लिए किया जाता है कि आत्मा देह में आ चुका है और वचन के द्वारा मनुष्य का न्याय करने के माध्यम से अपना अधिकार प्रदर्शित करता है। यद्यपि उसका देह एक साधारण, सामान्य मानवता का बाहरी रूप है, किंतु उसके वचनों से प्राप्त परिणाम मनुष्य को दिखाते हैं कि वह अधिकार से परिपूर्ण है, कि वह स्वयं परमेश्वर है और उसके वचन स्वयं परमेश्वर की अभिव्यक्ति हैं। इसके माध्यम से समस्त मानवता को दिखाया जाता है कि वह स्वयं परमेश्वर है, कि वह स्वयं परमेश्वर है जो देह बना है, कि कोई भी उसके प्रति अपराध नहीं कर सकता, और कि कोई भी उसके वचन के द्वारा किए गए न्याय के परे नहीं हो सकता और अंधकार की कोई भी शक्ति उसके अधिकार पर हावी नहीं हो सकती। उसके प्रति मनुष्य का समर्पण पूरी तरह उसके वचन के देह बनने के कारण है, यह पूरी तरह उसके अधिकार के कारण और वचन द्वारा उसके न्याय के कारण है। उसके देहधारी देह द्वारा लाया गया कार्य ही वह अधिकार है जो उसके पास है। उसके देह धारण करने का कारण यह है कि देह के पास भी अधिकार हो सकता है, और वह मनुष्यों के बीच एक व्यावहारिक तरीके से उस तरह कार्य करने में सक्षम है जो मनुष्यों के लिए दृष्टिगोचर और मूर्त है। यह कार्य परमेश्वर के आत्मा द्वारा सीधे तौर पर किए जाने वाले कार्य से कहीं अधिक व्यावहारिक है, जिसमें समस्त अधिकार है और इसके परिणाम भी स्पष्ट हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि देहधारी परमेश्वर का देह व्यावहारिक तरीके से बोल और कार्य कर सकता है। उसके देह का बाहरी रूप कोई अधिकार नहीं रखता और मनुष्य उस तक पहुँच सकता है, जबकि उसका सार अधिकार वहन करता है किंतु उसका अधिकार किसी के लिए भी दृष्टिगोचर नहीं है। जब वह बोलता और कार्य करता है तो मनुष्य उसके अधिकार की मौजूदगी का पता लगाने में असमर्थ होता है; इससे उसे अपना व्यावहारिक कार्य करने में सुविधा होती है। यह समस्त व्यावहारिक कार्य परिणाम प्राप्त कर सकता है। हालाँकि कोई मनुष्य यह एहसास नहीं करता कि परमेश्वर अधिकार रखता है या नहीं देखता कि परमेश्वर के प्रति कोई अपराध नहीं किया जा सकता या परमेश्वर का कोप नहीं देखता, फिर भी वह अपने छिपे हुए अधिकार, अपने छिपे हुए कोप और उन वचनों के माध्यम से, जिन्हें वह खुलकर बोलता है, अपने वचनों के अभीष्ट परिणाम प्राप्त कर लेता है। दूसरे शब्दों में, उसकी आवाज के लहजे, उसकी वाणी की कठोरता और उसके वचनों की समस्त बुद्धि के माध्यम से मनुष्य पूरी तरह से आश्वस्त हो जाता है। इस तरीके से मनुष्य उस देहधारी परमेश्वर के वचन के प्रति समर्पण कर देता है, जिसके पास ऐसा लगता है कि कोई अधिकार नहीं है, जिससे मनुष्य को बचाने का परमेश्वर का लक्ष्य पूरा होता है। यह उसके देहधारण के महत्व का एक और पहलू है : अधिक व्यावहारिक ढंग से बोलना, अपने वचनों की वास्तविकता को मनुष्य में अपने परिणाम प्राप्त करने देना और मनुष्य को परमेश्वर के वचन की शक्ति देखने देना। अतः यदि यह कार्य देहधारण के माध्यम से न किया जाता, तो यह मामूली परिणाम भी प्राप्त न करता और पापी लोगों को पूरी तरह से बचाने में सक्षम न होता। यदि परमेश्वर देह न बना होता, तो वह आत्मा बना रहता जो मनुष्यों के लिए अदृश्य और अगम्य दोनों है। चूँकि मनुष्य देह वाला प्राणी है, इसलिए वह और परमेश्वर दो अलग-अलग दुनिया के हैं और अलग-अलग प्रकृति के हैं। परमेश्वर का आत्मा देह वाले मनुष्य से बेमेल है और उनके बीच संबंध स्थापित किए जाने का कोई उपाय ही नहीं है; दूसरी ओर, मनुष्य आत्मा बनने में अक्षम है। ऐसा होने के कारण, अपना मूल काम करने के लिए परमेश्वर के आत्मा को एक सृजित प्राणी बनना आवश्यक है। परमेश्वर दोनों काम कर सकता है, वह सबसे ऊँचे स्थान पर आरोहण भी कर सकता है और मनुष्यों के बीच कार्य करने और उनके बीच रहने के लिए विनम्र होकर सृजित मनुष्य भी बन सकता है, किंतु मनुष्य सबसे ऊँचे स्थान पर आरोहण नहीं कर सकता और आत्मा नहीं बन सकता और निम्नतम स्थान में तो बिल्कुल भी नहीं उतर सकता। इसीलिए अपना कार्य करने हेतु परमेश्वर का देह बनना आवश्यक है। यह ठीक वैसा ही है, जैसे कि प्रथम देहधारण के दौरान, केवल देहधारी परमेश्वर का देह ही सलीब पर चढ़ने के माध्यम से मनुष्य को छुटकारा दिला सकता था, जबकि परमेश्वर के आत्मा के पास मनुष्य के लिए पापबलि के रूप में सलीब पर चढ़ने का कोई उपाय नहीं था। परमेश्वर मनुष्य के लिए एक पापबलि के रूप में कार्य करने के लिए सीधे देह बन सकता था, किंतु मनुष्य परमेश्वर द्वारा अपने लिए तैयार की गई पापबलि लेने के लिए सीधे स्वर्ग में आरोहण नहीं कर सकता था। ऐसा होने के कारण, मनुष्य द्वारा इस उद्धार को लेने के लिए स्वर्ग में आरोहण करने के बजाय, यही संभव था कि परमेश्वर से कुछ बार स्वर्ग और पृथ्वी के बीच आने-जाने का आग्रह किया जाए, क्योंकि मनुष्य पतित हो चुका था, और इससे भी बढ़कर, वह स्वर्ग में आरोहण नहीं कर सकता था और पापबलि तो बिल्कुल भी प्राप्त नहीं कर सकता था। इसलिए, यीशु के लिए मनुष्यों के बीच आना और व्यक्तिगत रूप से उस कार्य को करना आवश्यक था, जिसे मनुष्य द्वारा पूरा किया ही नहीं जा सकता था। हर बार जब परमेश्वर देह बनता है, तब यह परम आवश्यकता के कारण होता है। यदि किसी भी चरण को परमेश्वर के आत्मा द्वारा सीधे संपन्न किया जा सकता, तो वह देहधारी होने के साथ आने वाली शिकायतों और अपमान के लिए स्वयं को प्रस्तुत न करता।

कार्य के इस अंतिम चरण में परिणाम वचन के माध्यम से प्राप्त किए जाते है। वचन के माध्यम से मनुष्य अनेक रहस्यों और पिछली पीढ़ियों के दौरान किए गए परमेश्वर के कार्य को समझ जाता है; वचन के माध्यम से मनुष्य पवित्र आत्मा द्वारा प्रबुद्ध किया जाता है; वचन के माध्यम से मनुष्य पिछली पीढ़ियों के द्वारा कभी न सुलझाए गए रहस्यों को, और साथ ही अतीत के समयों के नबियों और प्रेरितों के कार्य को और उनके कार्य करने के सिद्धांतों को समझ जाता है; वचन के माध्यम से मनुष्य स्वयं परमेश्वर के स्वभाव को भी समझ जाता है, वह मनुष्य की विद्रोहशीलता और प्रतिरोध को जान जाता है और वह अपने सार को भी जान जाता है। कार्य के इन चरणों और बोले गए सभी वचनों के माध्यम से मनुष्य आत्मा के कार्य को, देहधारी परमेश्वर द्वारा किए जाने वाले कार्य को, और इससे भी बढ़कर, उसके संपूर्ण स्वभाव को जान जाता है। छह हजार वर्षों से अधिक की परमेश्वर की प्रबंधन-योजना का तुम्हारा ज्ञान भी वचन के माध्यम से ही प्राप्त किया गया। क्या तुम्हारी पुरानी धारणाओं का ज्ञान और उन्हें अलग रखने में तुम्हारी सफलता भी वचन के माध्यम से प्राप्त नहीं की गई? पिछले चरण में यीशु ने चिह्न और चमत्कार दिखाए थे, किंतु इस चरण में कोई चिह्न और चमत्कार नहीं है। क्या तुम्हारी यह समझ भी, कि परमेश्वर चिह्न और चमत्कार क्यों नहीं दिखाता, वचन के माध्यम से ही प्राप्त नहीं की गई? इसलिए, इस चरण में बोले गए वचन पिछली पीढ़ियों के प्रेरितों और नबियों द्वारा किए गए कार्यों से बढ़कर हैं। यहाँ तक कि नबियों द्वारा की गई भविष्यवाणियाँ भी ऐसे परिणाम प्राप्त नहीं कर सकती थीं। नबियों ने केवल भविष्यवाणियाँ की थीं, उन्होंने यह कहा था कि भविष्य में क्या होगा, किंतु उस कार्य के बारे में नहीं कहा था जिसे परमेश्वर उस समय करना चाहता था। न ही उन्होंने मनुष्यों के जीवन में उनका मार्गदर्शन करने के लिए या उन्हें सत्य प्रदान करने के लिए या उन पर रहस्य प्रकट करने के लिए बोला था, और उन्हें जीवन प्रदान करने के लिए तो बिल्कुल भी नहीं बोला था। इस चरण में बोले गए वचनों में भविष्यवाणी और सत्य है, किंतु वे मुख्य रूप से मनुष्य को जीवन प्रदान करने का काम करते हैं। वर्तमान समय में वचन नबियों की भविष्यवाणियों से भिन्न हैं। यह कार्य का एक चरण है और यह मनुष्य के जीवन के लिए, मनुष्य का जीवन-स्वभाव बदलने के लिए किया जाता है, न कि भविष्यवाणियाँ करने के लिए। प्रथम चरण यहोवा का कार्य था : उसका कार्य पृथ्वी पर मनुष्य के लिए परमेश्वर की आराधना करने हेतु एक मार्ग तैयार करना था। यह आरंभ करने का कार्य था और इसका उद्देश्य कार्य के लिए पृथ्वी पर एक मूल स्थान खोजना था। उस समय यहोवा ने इस्राएलियों को सब्त का पालन करना, अपने माता-पिता का आदर करना और एक-दूसरे के साथ शांतिपूर्वक रहना सिखाया। इसका कारण यह था कि उस समय के लोग नहीं समझते थे कि मनुष्य किस चीज से बना है, न ही वे यह समझते थे कि पृथ्वी पर किस प्रकार रहना है। कार्य के प्रथम चरण में उसके लिए मनुष्यों के जीवन में उनकी अगुआई करना आवश्यक था। यहोवा ने जो कुछ उनसे कहा, वह सब मनुष्यों को पहले ज्ञात नहीं था या उनके पास नहीं था। उस समय परमेश्वर ने भविष्यवाणियाँ करने के लिए अनेक नबियों को खड़ा किया और उन सबने यहोवा की अगुआई में ऐसा किया। यह परमेश्वर के कार्य की मात्र एक मद थी। प्रथम चरण में परमेश्वर देह नहीं बना, इसलिए उसने सभी जन-जातियों और राष्ट्रों को नबियों के माध्यम से निर्देश दिए। जब यीशु ने अपने समय में कार्य किया, तब वह उतना नहीं बोला, जितना कि वर्तमान समय में। अंत के दिनों में वचन के कार्य का यह चरण पिछले युगों और पीढ़ियों में कभी कार्यान्वित नहीं किया गया। यद्यपि यशायाह, दानिय्येल और यूहन्ना ने कई भविष्यवाणियाँ कीं, किंतु उनकी भविष्यवाणियाँ अब बोले जा रहे वचनों से बिल्कुल अलग हैं। उन्होंने जो कहा, वे केवल भविष्यवाणियाँ थीं, किंतु अब बोले जा रहे वचन भविष्यवाणियाँ नहीं हैं। यदि मैं आज जो कुछ कह रहा हूँ, उसे भविष्यवाणियों में बदल दूँ, तो क्या तुम लोग समझ पाने में सक्षम होगे? मान लो, जो कुछ मैंने कहा, वह उन मामलों के बारे में हो, जो मेरे जाने के बाद होंगे, तो तुम समझ कैसे प्राप्त कर सकोगे? वचन का कार्य यीशु के समय में या व्यवस्था के युग में कभी नहीं किया गया। शायद कुछ लोग कहेंगे, “क्या यहोवा ने भी अपने कार्य के समय में वचन नहीं बोले थे? क्या यीशु ने भी उस समय, जब वह कार्य कर रहा था, बीमारी की चंगाई करने, दुष्टात्माओं को निकालने और चिह्न एवं चमत्कार दिखाने के अतिरिक्त वचन नहीं बोले थे?” जो बातें बोली गईं, उनमें अंतर है। यहोवा द्वारा बोले गए वचनों का सार क्या था? वह केवल पृथ्वी पर मनुष्यों को जीवन जीने में उनका मार्गदर्शन कर रहा था, जिसने जीवन के आध्यात्मिक मामलों को नहीं छुआ था। ऐसा क्यों कहा जाता है कि जब यहोवा बोला, तो वह सभी स्थानों के लोगों को निर्देश देने के लिए था? “निर्देश” शब्द का अर्थ है स्पष्ट रूप से बताना और सीधे आदेश देना। उसने मनुष्य को जीवन की आपूर्ति नहीं की, बल्कि उसने बस मनुष्य का हाथ पकड़ा और बहुत ज्यादा दृष्टांतों का सहारा लिए बिना उसे अपना भय मानना सिखाया। इस्राएल में यहोवा ने जो कार्य किया, वह मनुष्य की काट-छाँट करना या उसे अनुशासित करना या न्याय और ताड़ना प्रदान करना नहीं था, बल्कि उसका मार्गदर्शन करना था। यहोवा ने मूसा को आदेश दिया कि वह उसके लोगों से कहे कि वे जंगल में मन्ना इकट्ठा करें। प्रतिदिन सूर्योदय से पहले उन्हें केवल इतना मन्ना इकट्ठा करना था, जो उनके उस दिन के खाने के लिए पर्याप्त हो। मन्ना अगले दिन तक नहीं रखा जा सकता था, क्योंकि तब उसमें फफूँद लग जाती। उसने लोगों को भाषण नहीं दिया या उनकी प्रकृति उजागर नहीं की, न ही उसने उनके मत और विचार उजागर किए। उसने लोगों को बदला नहीं, बल्कि जीवन जीने में उनका मार्गदर्शन किया। उस समय के लोग बच्चों के समान थे, जो कुछ नहीं समझते थे और केवल कुछ मूलभूत यांत्रिक गतिविधियाँ करने में ही सक्षम थे, इसलिए यहोवा ने केवल जनसाधारण का मार्गदर्शन करने के लिए व्यवस्थाएँ लागू की थीं।

सुसमाचार का कार्य फैलाने के लिए, ताकि सच्चे हृदय से खोजने वाले सभी लोग आज किए जा रहे कार्य का ज्ञान प्राप्त कर सकें और पूरी तरह से आश्वस्त हो सकें, तुम्हें प्रत्येक चरण में किए गए कार्य की असली कहानी, उसके सार और महत्व की स्पष्ट समझ प्राप्त करनी चाहिए। ऐसा करो कि तुम्हारी संगति सुनकर अन्य लोग यहोवा के कार्य, यीशु के कार्य और इससे भी बढ़कर, परमेश्वर के आज के समस्त कार्य को और साथ ही कार्य के तीनों चरणों के बीच के संबंध और अंतर समझ जाएँ। ऐसा करो कि इसे सुनने के बाद अन्य लोग देख लें कि तीनों चरण एक-दूसरे को बाधित नहीं करते, बल्कि वे सब एक ही आत्मा के कार्य हैं और यद्यपि वे अलग-अलग युग में कार्य करते हैं, उनके द्वारा किए गए कार्य की विषयवस्तु अलग है और उनके द्वारा बोले गए वचन अलग हैं, फिर भी जिन सिद्धांतों से वे कार्य करते हैं, वे एक-समान हैं। ये चीजें वे सबसे बड़े दर्शन हैं, जिन्हें परमेश्वर का अनुसरण करने वाले सभी लोगों को समझना चाहिए।

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परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?

परमेश्वर का प्रकटन और कार्य परमेश्वर को जानने के बारे में अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन मसीह-विरोधियों को उजागर करना अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ सत्य के अनुसरण के बारे में सत्य के अनुसरण के बारे में न्याय परमेश्वर के घर से शुरू होता है अंत के दिनों के मसीह, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अत्यावश्यक वचन परमेश्वर के दैनिक वचन सत्य वास्तविकताएं जिनमें परमेश्वर के विश्वासियों को जरूर प्रवेश करना चाहिए मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ राज्य का सुसमाचार फ़ैलाने के लिए दिशानिर्देश परमेश्वर की भेड़ें परमेश्वर की आवाज को सुनती हैं परमेश्वर की आवाज़ सुनो परमेश्वर के प्रकटन को देखो राज्य के सुसमाचार पर अत्यावश्यक प्रश्न और उत्तर मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 1) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 2) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 3) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 4) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 5) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 6) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 7) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 8) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 9) मैं वापस सर्वशक्तिमान परमेश्वर के पास कैसे गया

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