2.4. सत्य क्या है यह प्रकट करने पर वचन

152. अंत के दिनों का मसीह जीवन लाता है, और सत्य का स्थायी और शाश्वत मार्ग लाता है। यह सत्य वह मार्ग है, जिसके द्वारा मनुष्य जीवन प्राप्त करता है, और यही एकमात्र मार्ग है जिसके द्वारा मनुष्य परमेश्वर को जानेगा और परमेश्वर द्वारा स्वीकृत किया जाएगा। यदि तुम अंत के दिनों के मसीह द्वारा प्रदान किया गया जीवन का मार्ग नहीं खोजते, तो तुम यीशु की स्वीकृति कभी प्राप्त नहीं करोगे, और स्वर्ग के राज्य के द्वार में प्रवेश करने के योग्य कभी नहीं हो पाओगे, क्योंकि तुम इतिहास की कठपुतली और कैदी दोनों ही हो। जो लोग विनियमों से, शब्दों से और इतिहास की बेड़ियों से नियंत्रित होते हैं, वे न तो कभी जीवन प्राप्त कर पाएँगे और न ही जीवन का अनंत मार्ग प्राप्त कर पाएँगे। ऐसा इसलिए है, क्योंकि वे जो प्राप्त करते हैं वह सिंहासन से प्रवाहित होने वाले जीवन के जल के बजाय बस मैला पानी ही है, जिससे वे हजारों सालों से चिपके हुए हैं। जिन्हें जीवन के जल की आपूर्ति नहीं की जाती, वे हमेशा मुर्दे, शैतान के खिलौने और नरक की संतानें बने रहेंगे। फिर वे कैसे परमेश्वर के दर्शन कर सकते हैं? तुम केवल अतीत को पकड़े रखने की खोज में रहते हो, स्थिर खड़े रहने और चीजों को वैसे ही रखने की कोशिश करते हो और यथास्थिति को बदलने और इतिहास को छोड़ने की खोज में नहीं रहते, इसलिए क्या तुम हमेशा परमेश्वर के विरोधी नहीं होगे? परमेश्वर के कार्य के कदम उमड़ती लहरों और घुमड़ते गर्जनों की तरह जबरदस्त और शक्तिशाली हैं—फिर भी तुम निष्क्रियता से बैठकर तबाही का इंतजार करते हो, उससे चिपके रहते हो जो पुराना है और चीजों के अपनी गोद में आ गिरने की प्रतीक्षा करते हो। इस तरह, तुम्हें मेमने के पदचिह्नों का अनुसरण करने वाला व्यक्ति कैसे माना जा सकता है? यह कैसे दिखा सकता है कि तुम जिस परमेश्वर को थामे हो, वह वही परमेश्वर है जो हमेशा नया है और कभी पुराना नहीं होता? और तुम्हारी पीली पड़ चुकी किताबों के शब्द तुम्हें पार कराकर नए युग में कैसे ले जा सकते हैं? वे परमेश्वर के कार्य के चरणों को खोजने में तुम्हारी अगुआई कैसे कर सकते हैं? और वे तुम्हें ऊपर स्वर्ग में कैसे ले जा सकते हैं? जिन्हें तुम अपने हाथों में थामे हो, वे केवल शब्द हैं, जो तुम्हें केवल अस्थायी सांत्वना दे सकते हैं, वे तुम्हें जीवन देने में सक्षम सत्य नहीं हैं। धर्मशास्त्र के शब्द जिन्हें तुम पढ़ते हो, वे केवल तुम्हारी जिह्वा को समृद्ध कर सकते हैं; वे बुद्धिमानी के शब्द नहीं हैं जो मानव जीवन को जानने में तुम्हारी मदद कर सकते हों, उनके तुम्हें पूर्णता की ओर ले जाने वाला मार्ग होने की बात तो दूर रही। क्या यह विसंगति तुम्हारे लिए चिंतन का कारण नहीं है? क्या यह तुम्हें इसके भीतर समाहित रहस्यों के बारे में अंतर्दृष्टि नहीं देती है? क्या तुम अपने बल पर परमेश्वर से मिलने के लिए अपने आप को स्वर्ग भिजवाने में समर्थ हो? परमेश्वर के आए बिना, क्या तुम परमेश्वर के साथ पारिवारिक आनंद मनाने के लिए अपने आप को स्वर्ग में ले जा सकते हो? क्या तुम अभी भी स्वप्न देख रहे हो? तो मेरा उपदेश यह है कि तुम स्वप्न देखना बंद कर दो और उसकी ओर देखो जो अभी कार्य कर रहा है—देखो कि अब अंत के दिनों में मनुष्य को बचाने का कार्य कौन कर रहा है। यदि तुम ऐसा नहीं करते, तो तुम कभी भी सत्य प्राप्त नहीं करोगे, और न ही कभी जीवन प्राप्त करोगे।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, केवल अंत के दिनों का मसीह ही मनुष्य को अनंत जीवन का मार्ग दे सकता है

153. मेरे वचन सदा अपरिवर्तनीय सत्‍य हैं। मैं मनुष्य के लिए जीवन की आपूर्ति और मानवजाति के लिए एकमात्र मार्गदर्शक हूँ; मेरे वचनों का मूल्य और अर्थ इससे निर्धारित नहीं होता कि क्या उन्हें मानवजाति मानती या स्वीकार करती है, बल्कि स्वयं वचनों के सार से निर्धारित होता है; और भले ही इस पृथ्वी पर एक भी व्यक्ति मेरे वचन न स्वीकार कर सके, तो भी मेरे वचनों के मूल्य और मानवजाति के लिए उनके उपकार का आकलन करना किसी भी मनुष्य के लिए असंभव है। इसलिए मेरे वचनों के खिलाफ विद्रोह करने वाले, उनका खंडन करने वाले या उनका पूरी तरह से तिरस्कार करने वाले बहुत से लोगों से सामना होने पर मेरा रवैया केवल यह रहता है : समय और तथ्यों को मेरी गवाही देने दो और यह साबित करने दो कि मेरे वचन सत्य, मार्ग और जीवन हैं। उन्हें यह साबित करने दो कि जो कुछ मैंने कहा है वह सब सही है और वह ऐसा है जो मनुष्य के पास होना चाहिए और इतना ही नहीं, जो मनुष्य को स्वीकार करना चाहिए। मैं निश्चित करूँगा कि जो लोग मेरा अनुसरण करते हैं वे इस तथ्य को जान लें : जो लोग पूरी तरह से मेरे वचनों को स्वीकार नहीं कर सकते, जो मेरे वचनों का अभ्यास नहीं कर सकते, जो मेरे वचनों में कोई लक्ष्य नहीं खोज सकते और जो मेरे वचनों के माध्यम से उद्धार का अनुग्रह प्राप्त नहीं कर सकते, वे ऐसे लोग हैं जिनकी मेरे वचन निंदा करते हैं; यही नहीं, वे ऐसे लोग हैं जिन्होंने मेरे उद्धार का अनुग्रह गँवा दिया है, और मेरा डंडा उन्हें कभी नहीं छोड़ेगा।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, तुम लोगों को अपने कर्मों पर विचार करना चाहिए

154. स्वयं परमेश्वर ही जीवन और सत्य है और उसका जीवन और सत्य सह-अस्तित्व में हैं। जो लोग सत्य प्राप्त करने में असमर्थ हैं, वे निश्चित ही जीवन प्राप्त नहीं करेंगे। सत्य के मार्गदर्शन, सहारे और पोषण के बिना तुम जो कुछ भी प्राप्त करते हो वह केवल शब्द, धर्म-सिद्धांत और इससे भी अधिक मृत्यु है। परमेश्वर का जीवन सदा विद्यमान है, और उसका सत्य और जीवन साथ-साथ सह-अस्तित्व में हैं। यदि तुम सत्य का स्रोत नहीं पा सकते हो तो तुम जीवन का पोषण प्राप्त नहीं करोगे; यदि तुम जीवन का पोषण प्राप्त नहीं कर सकते हो तो तुम्हारे पास निश्चित ही कोई सत्य नहीं होगा, और कल्पनाओं और धारणाओं के अलावा तुम्हारे संपूर्ण अस्तित्व में तुम्हारी देह—तुम्हारी दुर्गंधित देह—के सिवाय कुछ भी नहीं होगा। यह जान लो कि महज किताबों के शब्द जीवन नहीं हो सकते हैं, इतिहास के अभिलेखों को सत्य के रूप में पूजित नहीं किया जा सकता और अतीत के विनियम परमेश्वर के वर्तमान वचनों का लेखा-जोखा नहीं हो सकते हैं, और परमेश्वर पृथ्वी पर आकर मनुष्य के बीच रहकर जो वचन अभिव्यक्त करता है केवल वही सत्य हैं, जीवन हैं, परमेश्वर के इरादे हैं और उसके कार्य करने का वर्तमान तरीका हैं।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, केवल अंत के दिनों का मसीह ही मनुष्य को अनंत जीवन का मार्ग दे सकता है

155. सत्य जीवन का सर्वाधिक व्यावहारिक सिद्धांत है और मानवजाति के लिए सर्वोच्च जीवन का नीति-वाक्य है। चूँकि यही वह अपेक्षा है जो परमेश्वर मनुष्य से करता है और यही परमेश्वर द्वारा व्यक्तिगत रूप से किया जाने वाला कार्य है, इसलिए इसे “जीवन-सिद्धांत” कहा जाता है। यह किसी चीज से सारांशित किया गया कोई नीति-वाक्य नहीं है, न ही यह किसी महान हस्ती द्वारा कहा गया कोई प्रसिद्ध उद्धरण है। इसके बजाय, यह स्वर्ग और पृथ्वी तथा सभी चीजों के संप्रभु का मानवजाति के लिए कथन है; यह मनुष्य द्वारा किया गया कुछ वचनों का सारांश नहीं है, बल्कि परमेश्वर का अंतर्निहित जीवन है। इसलिए इसे “सर्वोच्च जीवन-सिद्धांत” कहा जाता है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, जो परमेश्वर को और उसके कार्य को जानते हैं, केवल वे ही परमेश्वर को संतुष्ट कर सकते हैं

156. सत्य मनुष्य के संसार से आता है, किंतु मनुष्य के बीच सत्य मसीह द्वारा लाया जाता है। यह मसीह से, अर्थात् स्वयं परमेश्वर से उत्पन्न होता है और यह कोई ऐसी चीज नहीं है जिसमें मनुष्य समर्थ हो। फिर भी मसीह बस सत्य प्रदान कर रहा है; वह यह तय करने के लिए यहाँ नहीं आया है कि मनुष्य सत्य के अपने अनुसरण में सफल होगा या नहीं। इसलिए सत्य के मामले में मनुष्य सफल होता है या नहीं, यह पूरी तरह उसके अनुसरण पर निर्भर करता है। यह एक ऐसा मामला है जिसका मसीह के साथ कभी कोई लेना-देना नहीं रहा है, बल्कि यह मनुष्य के अनुसरण से निर्धारित होता है। मनुष्य की मंजिल और उसकी सफलता या विफलता, सारी परमेश्वर के मत्थे नहीं मढ़ी जा सकती, ताकि स्वयं परमेश्वर से ही इसका बोझ उठवाया जाए, क्योंकि यह स्वयं परमेश्वर का विषय नहीं है, बल्कि इसका सीधा संबंध उस कर्तव्य से है जो सृजित प्राणियों को निभाना चाहिए।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, सफलता या विफलता उस पथ पर निर्भर होती है जिस पर व्यक्ति चलता है

157. सत्य कोई सूत्र नहीं है, न ही यह कोई निश्चित नियम है। यह मृत नहीं है—यह जीवन है, यह एक जीवित चीज है, और यह वह नियम है जिसका एक सृजित प्राणी को अपने जीवन में पालन करना ही चाहिए और वह नियम है जो किसी इंसान के अस्तित्व के लिए आवश्यक है। यह कुछ ऐसा है जिसे तुम्हें अनुभव के माध्यम से और अधिक समझने-बूझने की कोशिश करनी चाहिए। तुम्हारे अनुभवों की गहराई चाहे कितनी भी हो, तुम कभी भी परमेश्वर के वचन या सत्य के बिना नहीं रह सकते। तुम परमेश्वर के जिस स्वभाव को समझते हो, साथ ही परमेश्वर की जिन चीजों और अस्तित्व को तुम जानते हो, वे सभी उसके वचनों में व्यक्त हैं; वे सत्य से अटूट रूप से जुड़े हुए हैं। परमेश्वर का स्वभाव और जो उसके पास है और जो वह स्वयं है, वे अपने आप में सत्य हैं; सत्य परमेश्वर के स्वभाव और जो उसके पास है और जो वह स्वयं है, उसकी एक प्रामाणिक अभिव्यक्ति है। यह उसे ठोस और स्पष्ट बनाता है जो उसके पास है और जो वह स्वयं है; यह तुम्हें और अधिक सीधे तौर पर बताता है कि परमेश्वर क्या पसंद करता है और क्या नहीं, वह तुमसे क्या करवाना चाहता है और क्या करने की अनुमति नहीं देता, वह किन लोगों से घृणा करता है और किन लोगों से प्रसन्न होता है। परमेश्वर द्वारा व्यक्त किए गए सत्यों के पीछे, लोग उसकी खुशी, क्रोध, दुःख और आनंद के साथ-साथ उसके सार को भी देख सकते हैं—ये उसके स्वभाव के प्रकाशन हैं।

—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III

158. परमेश्वर द्वारा बोले गए वचन बाहरी तौर पर देखने में चाहे सरल हों या गहन, वे सब ऐसे सत्य हैं जो मनुष्य के जीवन प्रवेश के लिए अपरिहार्य हैं; वे जीवनदायी जल के ऐसे स्रोत हैं जो मनुष्य को आत्मा और देह दोनों में जीवित रहने में सक्षम बनाते हैं। वे मनुष्य को जीवित रहने के लिए जरूरी चीजें मुहैया कराते हैं; जैसे कि उसके दैनिक जीवन में स्व-आचरण के नियम और सिद्धांत; उद्धार पाने का अनिवार्य मार्ग और साथ ही उद्धार पाने के लिए लक्ष्य और दिशा; हर वह सत्य जो उसमें परमेश्वर के समक्ष एक सृजित प्राणी के रूप में होना चाहिए; और हर वह सत्य कि मनुष्य परमेश्वर के प्रति कैसे समर्पण करे और कैसे उसकी आराधना करे। वे मनुष्य के जीवित बने रहने की गारंटी हैं, वे मनुष्य की दैनिक रोटी हैं और वे ऐसा मजबूत सहारा भी हैं जो मनुष्य को सशक्त होने और अडिग रहने में सक्षम बनाता है। परमेश्वर के वचन उस सत्य वास्तविकता से संपन्न हैं, जिससे सृजित मानवजाति सामान्य मानवता को जीती है, वे उस सत्य से समृद्ध हैं, जिससे मानवता भ्रष्टता से मुक्त होती है और शैतान के फंदे से निकलती है, वे उस गंभीर और धैर्यपूर्ण शिक्षा, प्रोत्साहन, उत्साहवर्धन और सांत्वना से संपन्न हैं, जो सृष्टिकर्ता सृजित मानवता को देता है। वे ऐसे प्रकाश-स्तंभ हैं जो मनुष्य को सभी सकारात्‍मक चीजों को समझने का मार्गदर्शन और प्रबोधन देते हैं; वे यह सुनिश्चित करने की गारंटी हैं कि मनुष्य वह सब जिएगा और हासिल करेगा जो न्यायसंगत, सुंदर और अच्छा है, वे ऐसे मापदंड हैं जिनसे सभी लोगों, घटनाओं और चीजों को मापा जाता है और वे मार्गदर्शक चिह्न भी हैं जो मनुष्‍य को उद्धार की तरफ और रोशनी के मार्ग पर ले जाते हैं।

—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, प्रस्तावना

159. परमेश्वर के वचन को हरगिज मनुष्य का वचन नहीं ठहराया जा सकता और मनुष्य के वचन को तो परमेश्वर का वचन हरगिज नहीं ठहराया जा सकता। परमेश्वर द्वारा इस्तेमाल किया गया व्यक्ति देहधारी परमेश्वर नहीं है और देहधारी परमेश्वर एक ऐसा व्यक्ति नहीं है जिसे परमेश्वर द्वारा इस्तेमाल किया गया है। इसमें एक मूलभूत अंतर है। शायद ये वचन पढ़ने के बाद तुम इन्हें परमेश्वर के वचन नहीं मानते, बल्कि केवल उस प्रबुद्धता के रूप में मानते हो जो किसी व्यक्ति ने हासिल की है। उस स्थिति में तुम बहुत अज्ञानी हो। परमेश्वर के वचन मनुष्य द्वारा हासिल प्रबोधन के समान कैसे हो सकते हैं? देहधारी परमेश्वर के वचन एक नया युग आरंभ करते हैं, समस्त मानवजाति का मार्गदर्शन करते हैं, रहस्य प्रकट करते हैं और मनुष्य को वह दिशा दिखाते हैं जो उसे नए युग में ग्रहण करनी है। मनुष्य जो प्रबुद्धता हासिल करता है, वह केवल कुछ साधारण अभ्यास या ज्ञान मात्र है। यह एक नए युग में समस्त मानवजाति को नहीं ले जा सकता या स्वयं परमेश्वर के रहस्य प्रकट नहीं कर सकता। आखिरकार, परमेश्वर परमेश्वर है और मनुष्य मनुष्य है। परमेश्वर में परमेश्वर का सार होता है और मनुष्य में मनुष्य का सार। यदि मनुष्य परमेश्वर द्वारा कहे गए वचनों को पवित्र आत्मा का साधारण प्रबोधन मानता है और प्रेरितों और नबियों के वचनों को परमेश्वर द्वारा व्यक्तिगत रूप से कहे गए वचन मानता है तो यह मनुष्य की गलती होगी।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, प्रस्तावना

160. सत्य स्वयं परमेश्वर का जीवन है; यह उसके स्वभाव, सार और जो परमेश्वर के पास है और जो वह स्वयं है, का प्रतिनिधित्व करता है। अगर तुम कहते हो कि कुछ अनुभवजन्य ज्ञान होने से तुमने सत्य पा लिया है, तो क्या तुमने पवित्रता प्राप्त कर ली है? तुम अभी भी भ्रष्टता प्रकट क्यों करते हो? तुम विभिन्न प्रकार के लोगों के बीच अंतर क्यों नहीं कर पाते? तुम परमेश्वर की गवाही क्यों नहीं दे पाते? अगर तुम कुछ सत्य समझते भी हो, तो भी क्या तुम परमेश्वर का प्रतिनिधित्व कर सकते हो? क्या तुम परमेश्वर के स्वभाव को जी सकते हो? तुम्हारे पास एक सत्य के किसी निश्चित पहलू के बारे में कुछ अनुभवजन्य ज्ञान हो सकता है, और तुम अपने भाषण में उस पर थोड़ा प्रकाश डालने में सक्षम हो सकते हो, लेकिन तुम लोगों को जो प्रदान कर सकते हो, वह बेहद सीमित है और लंबे समय तक नहीं टिक सकता। ऐसा इसलिए है, क्योंकि तुम्हारी समझ और तुम्हारे द्वारा प्राप्त किया गया प्रकाश सत्य के सार का प्रतिनिधित्व नहीं करते, और वे सत्य की संपूर्णता का प्रतिनिधित्व भी नहीं करते। वे सत्य के केवल एक पक्ष या एक छोटे-से पहलू का प्रतिनिधित्व करते हैं, वे केवल एक स्तर हैं जिसे मनुष्य द्वारा प्राप्त किया जा सकता है और जो अभी भी सत्य के सार से दूर है। यह थोड़ा-सा प्रकाश, प्रबुद्धता, अनुभवजन्य ज्ञान कभी सत्य का स्थान नहीं ले सकता। भले ही सभी लोगों ने सत्य का अनुभव कर कुछ परिणाम प्राप्त किए हों और उनके समस्त अनुभवजन्य ज्ञान को एक साथ रख दिया जाए, फिर भी वह उस सत्य की एक भी पंक्ति की संपूर्णता और सार तक नहीं पहुँच पाएगा। अतीत में कहा गया है, “मैं इसे मानव-संसार के लिए एक सूक्ति के साथ सारांशित करता हूँ : मनुष्यों में, कोई भी ऐसा नहीं है जो मुझे प्रेम करता है।” यह वाक्य सत्य, जीवन का सच्चा सार, सबसे गहन चीज, और स्वयं परमेश्वर की अभिव्यक्ति है। तुम अनुभवों से गुजरते हो और तीन वर्षों के अनुभव के बाद तुम्हें थोड़ी सतही समझ हो सकती है, और सात-आठ वर्षों के बाद तुम्हें थोड़ी और समझ हो सकती है, लेकिन यह समझ कभी सत्य की इस पंक्ति की जगह नहीं ले सकती। दो साल के बाद किसी और को थोड़ी समझ हो सकती है या दस साल बाद कुछ अधिक समझ हो सकती है या एक जीवनकाल के बाद अपेक्षाकृत ऊँची समझ हो सकती है, लेकिन तुम दोनों की साझा समझ सत्य की इस पँक्ति का स्थान नहीं ले सकती है। तुम दोनों के पास कितनी भी अंतर्दृष्टि, प्रकाश, अनुभव या ज्ञान हो, वे सत्य की इस पंक्ति की जगह कभी नहीं ले सकते। कहने का तात्पर्य यह है कि मानव-जीवन हमेशा मानव-जीवन होता है, और तुम्हारा ज्ञान कैसे भी सत्य, परमेश्वर के इरादों या परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुरूप हो, वह सत्य का स्थान कभी नहीं ले सकता। लोगों के पास सत्य है, यह कहने का अर्थ यह होता है कि लोग वास्तव में सत्य को समझते हैं, परमेश्वर के वचनों की कुछ वास्तविकताओं को जीते हैं, परमेश्वर के बारे में कुछ वास्तविक ज्ञान रखते हैं, और परमेश्वर का उत्कर्ष कर उसकी गवाही दे सकते हैं। लेकिन यह नहीं कहा जा सकता कि लोगों के पास पहले से ही सत्य है, क्योंकि सत्य बहुत गहन है। परमेश्वर के वचनों की सिर्फ एक पंक्ति का अनुभव करने में भी लोगों का पूरा जीवन लग सकता है, और कई जन्मों या हजारों वर्षों के अनुभव के बाद भी परमेश्वर के वचनों की एक भी पंक्ति का पूरी तरह से अनुभव नहीं किया जा सकता। यह स्पष्ट है कि सत्य को समझने और परमेश्वर को जानने की प्रक्रिया वास्तव में अंतहीन है, और इस बात की एक सीमा है कि लोग जीवन भर के अनुभव में कितना सत्य समझ सकते हैं। परमेश्वर के वचनों का शाब्दिक अर्थ समझते ही कुछ लोग कहते हैं कि सत्य उनके हाथ आ गया है। क्या यह बकवास नहीं है?

—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, भाग तीन

161. जब लोगों के सत्य समझने और इसे अपने जीवन के रूप में रखने की बात करते हैं, तो इस संदर्भ में “जीवन” का क्या अर्थ है? इसका अर्थ है कि उनके हृदय में सत्य का ही शासन है, इसका तात्पर्य है कि वे परमेश्वर के वचनों के अनुसार जीवनयापन करते हैं और इसका अर्थ है कि उन्हें परमेश्वर के वचनों का सच्चा ज्ञान है और सत्य की वास्तविक समझ है। जब लोगों के अंदर यह नया जीवन होता है, तो यह पूरी तरह से परमेश्वर के वचनों के अभ्यास और अनुभव से हासिल होता है, यह परमेश्वर के वचनों के सत्य की बुनियाद पर बना होता है और इसे सत्य के दायरे में रहते हुए हासिल किया जाता है; लोगों के जीवन में जो कुछ भी होता है, वह उनका सत्य का ज्ञान और अनुभव होता है। यही वह दायरा है जिसके भीतर यह आता है; जीवन प्राप्त करने का अर्थ है सत्य प्राप्त करना। परमेश्वर के वचनों के सत्य के अनुसार जी पाने का मतलब यह नहीं है कि सत्य का जीवन लोगों के अंदर है, न ही यह है कि अगर उनमें सत्य अपने जीवन के रूप में है तो वे सत्य बन जाते हैं और उनका आंतरिक जीवन सत्य का जीवन बन जाता है; यह तो छोड़ ही दो कि वे सत्य और जीवन हैं। आखिरकार, उनका जीवन इंसान का जीवन ही है। कहने का मतलब है कि अगर तुम परमेश्वर के वचनों के अनुसार जी सको और सत्य का ज्ञान रख सको, अगर यह ज्ञान तुम्हारे अंदर जड़ जमा सके और तुम्हारा जीवन बन जाए और अनुभव से जो सत्य तुमने पाया है, वह तुम्हारे अस्तित्व की नींव बन जाए, अगर तुम परमेश्वर के इन वचनों के अनुसार जिओ, तो तुम्हें कोई भी नहीं बदल सकता, शैतान तुम्हें गुमराह या भ्रष्ट नहीं कर सकता, तब तुम सत्य और जीवन पा लोगे। यानी तुम्हारे जीवन में केवल सत्य होगा, सत्य की तुम्हारी समझ होगी और अनुभव होगा; तुम चाहे कुछ भी करो, तुम इन्हीं सत्यों के अनुसार जिओगे, तुम उनके दायरे से बाहर नहीं जाओगे। तब तुम्हारे पास सत्य वास्तविकता होगी और अंत में परमेश्वर अपने कार्य के माध्यम से ऐसे ही लोगों को प्राप्त करना चाहता है। लेकिन लोग चाहे जितने भी सत्य समझ लें, उनका सार तो फिर भी मानवता का सार ही होता है, इसकी तुलना परमेश्वर के सार से बिल्कुल नहीं की जा सकती। ऐसा इसलिए है, क्योंकि वे कभी संपूर्ण सत्य का अनुभव नहीं कर सकते, और उनके लिए सत्य को पूरी तरह से जी पाना असंभव है, वे केवल उसी बेहद सीमित सत्य को ही जी सकते हैं जो मनुष्यों के लिए प्राप्य है। तो, फिर वे परमेश्वर कैसे बन सकते हैं? ... अगर तुम्हें परमेश्वर के वचनों का थोड़ा-बहुत अनुभव है, और तुम सत्य के सच्चे अनुभवजन्य ज्ञान के अनुसार जी रहे हो, तब परमेश्वर के वचन धीरे-धीरे तुम्हारा जीवन बन जाते हैं। फिर भी, तुम यह नहीं कह सकते कि सत्य तुम्हारा जीवन है या तुम जो व्यक्त करते हो, वह सत्य है; अगर तुम्हारा यह विचार है, तो तुम गलत हो। यदि तुम्हारे पास केवल सत्य के किसी एक खास पहलू के अनुसार कुछ अनुभव है, तो क्या यह इस बात का प्रतिनिधित्व कर सकता है कि तुम्हारे पास सत्य है? क्या इसे सत्य प्राप्त करना कहा जा सकता है? क्या तुम सत्य की पूरी व्याख्या कर सकते हो? क्या तुम सत्य से परमेश्वर के स्वभाव का और जो परमेश्वर के पास है और जो वह स्वयं है, उसका पता लगा सकते हो? अगर ये परिणाम नहीं प्राप्त किए जाते, तो इससे साबित होता है कि केवल सत्य के किसी पहलू का अनुभव पा लेने को वास्तव में सत्य की समझ हासिल कर लेना या परमेश्वर को जान लेना नहीं माना जा सकता, इसे सत्य प्राप्त कर लेना तो बिल्कुल नहीं कहा जा सकता। प्रत्येक व्यक्ति को सत्य के सिर्फ एक पहलू और दायरे का ही अनुभव होता है; वे इसे उसके सीमित दायरे में अनुभव करते हैं और सत्य के अनगिनत पहलुओं को नहीं छू पाते। क्या लोग सत्य के मूल अर्थ को जी सकते हैं? तुम्हारा ज़रा-सा अनुभव किसके बराबर है? समुद्र तट पर रेत के एक कण के बराबर; महासागर में पानी की एक बूँद के बराबर। इसलिए, भले ही तुम्हारे अनुभव से प्राप्त समझ और अनुभूतियां कितनी भी अनमोल हों, फिर भी उन्हें सत्य नहीं माना जा सकता। उन्हें केवल सत्य के अनुरूप ही माना जा सकता है।

—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, भाग तीन

162. परमेश्वर स्वयं सत्य है, उसके पास समस्त सत्य हैं। परमेश्वर सत्य का स्रोत है। प्रत्येक सकारात्मक वस्तु और प्रत्येक सत्य परमेश्वर से आता है। वह समस्त चीजों और घटनाओं के औचित्य एवं अनौचित्य के विषय में न्याय कर सकता है; वह उन चीजों का न्याय कर सकता है जो घट चुकी हैं, वे चीजें जो अब घटित हो रही हैं और भावी चीजें जो कि मनुष्य के लिए अभी अज्ञात हैं। परमेश्वर सभी चीजों के औचित्य एवं अनौचित्य के विषय में न्याय करने वाला एकमात्र न्यायाधीश है, और इसका तात्पर्य यह है कि सभी चीजों के औचित्य एवं अनौचित्य के विषय में केवल परमेश्वर द्वारा ही निर्णय किया जा सकता है। वह सभी चीजों की कसौटी जानता है। वह किसी भी समय और स्थान पर सत्य को व्यक्त कर सकता है। परमेश्वर सत्य का प्रतिरूप है, जिसका आशय यह है कि वह स्वयं सत्य के सार से युक्त है। भले ही मनुष्य अनेक सत्य समझता हो और परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाया गया हो, फिर भी क्या उसका सत्य के मूर्त रूप से कुछ लेना-देना होगा? नहीं। यह सुनिश्चित है। जब मनुष्य को पूर्ण बनाया जाता है, तब परमेश्वर के वर्तमान कार्य और परमेश्वर द्वारा मनुष्य से अपेक्षित विभिन्न मानकों के बारे में उसके पास सटीक निर्णय और अभ्यास के तरीके होंगे और वह परमेश्वर के इरादे पूरी तरह से समझ सकेगा। वह इसमें अंतर कर सकता है कि कौन-सी चीज परमेश्वर से आती है और कौन-सी मनुष्य से, कि क्या सही है और क्या गलत है। पर फिर भी कुछ चीजें ऐसी होती हैं जो मनुष्य की पहुँच से दूर और अस्पष्ट रहती हैं, ऐसी चीजें जिन्हें वह परमेश्वर द्वारा बताए जाने के बाद ही जान सकता है। क्या मनुष्य ऐसी चीजों को जान सकता है या उनके बारे में भविष्यवाणी कर सकता है जो अभी अज्ञात हैं, ऐसी चीजें जो परमेश्वर ने उसे अभी नहीं बताई हैं? बिल्कुल नहीं। इसके अतिरिक्त, यदि मनुष्य परमेश्वर से सत्य प्राप्त कर भी ले और उसके पास सत्य वास्तविकता हो और उसे बहुत-से सत्यों के सार का ज्ञान हो, और उसके पास गलत सही को पहचानने की क्षमता हो, तो क्या उसमें सभी चीजों पर नियंत्रण व शासन करने की क्षमता होगी? उसमें यह क्षमता नहीं होगी। परमेश्वर और मनुष्य में यही अंतर है। सृजित प्राणी केवल सत्य के स्रोत से ही सत्य प्राप्त कर सकते हैं। क्या वे मनुष्य से सत्य प्राप्त कर सकते हैं? क्या मनुष्य सत्य है? क्या मनुष्य सत्य प्रदान कर सकता है? वह ऐसा नहीं कर सकता और बस यहीं पर अंतर है। तुम केवल सत्य ग्रहण कर सकते हो, इसे प्रदान नहीं कर सकते—तब क्या तुम्हें ऐसा व्यक्ति कहा जा सकता है जिसके पास सत्य है? क्या तुम्हें सत्य का प्रतिरूप कहा जा सकता है? बिल्कुल नहीं। सत्य का प्रतिरूप होने का वास्तव में क्या सार है? यह सत्य प्रदान करने वाला स्रोत है, सभी चीजों पर शासन और प्रभुता का स्रोत, और इसके अलावा यह वह एकमात्र कसौटी और मानक है जिसके अनुसार सभी चीजों और घटनाओं का आकलन किया जाता है। यही सत्य का प्रतिरूप है।

—वचन, खंड 4, मसीह-विरोधियों को उजागर करना, मद आठ : वे दूसरों से केवल अपने प्रति समर्पण करवाएँगे, सत्य या परमेश्वर के प्रति नहीं (भाग तीन)

163. सत्य सभी सकारात्मक चीजों की वास्तविकता है। यह व्यक्ति का जीवन और उसके चलने की दिशा हो सकता है; यह व्यक्ति को अपने भ्रष्ट स्वभाव छोड़ने, परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने, परमेश्वर के प्रति समर्पण करने वाला इंसान बनने और एक सृजित प्राणी के रूप में मानक स्तर का व्यक्ति बनने और एक ऐसा इंसान बनने में सक्षम बना सकता है जिससे परमेश्वर प्रेम करता है और जिसे स्वीकार्य पाता है। सत्य की बहुमूल्यता को देखते हुए परमेश्वर के वचनों और सत्य के प्रति किसी व्यक्ति का क्या रवैया और परिप्रेक्ष्य होना चाहिए? यह बिल्कुल स्पष्ट है : उसके वचन उन लोगों के लिए जीवनशक्ति होते हैं जो सचमुच परमेश्वर में विश्वास रखते हैं और जो परमेश्वर का भय मानने वाला दिल रखते हैं। लोगों को परमेश्वर के वचन सँजोकर रखने चाहिए, उन्हें खाना और पीना चाहिए, उनका आनंद लेना चाहिए और उन्हें अपने जीवन के रूप में, उस दिशा के रूप में जिसमें वे चलते हैं और उसके लिए सहज रूप से उपलब्ध सहायता और पोषण के रूप में स्वीकार करना चाहिए; लोगों को सत्य के कथनों और अपेक्षाओं के अनुसार अभ्यास और अनुभव करना चाहिए, और सत्य प्रदत्त विभिन्न अपेक्षा और सिद्धांत के प्रति समर्पण करना चाहिए। केवल इसी प्रकार व्यक्ति जीवन हासिल कर सकता है। सत्य का अनुसरण मुख्य रूप से परमेश्वर के वचनों का अभ्यास और अनुभव है, बजाय इसके कि उसकी पड़ताल, विश्लेषण, उस पर अटकलबाजी और संदेह किया जाए। चूँकि सत्य लोगों के लिए सहज उपलब्ध सहायता और पोषण है और यह उनका जीवन बन सकता है, इसलिए उन्हें सत्य को सबसे अनमोल मानना चाहिए। ऐसा इसलिए है कि उन्हें जीने के लिए, परमेश्वर की अपेक्षाओं को पूरा करने के लिए, उसका भय मानने और बुराई से दूर रहने के लिए और अपने दैनिक जीवन में अभ्यास का मार्ग खोजने और अभ्यास के सिद्धांत हृदयंगम करने के लिए सत्य पर निर्भर रहना चाहिए, जिससे वे परमेश्वर के प्रति समर्पण प्राप्त कर सकें। लोगों को सत्य पर भी निर्भर रहना चाहिए ताकि वे अपने भ्रष्ट स्वभाव त्याग सकें, ऐसे व्यक्ति बन सकें जिन्हें बचाया गया हो और जो मानक स्तर के सृजित प्राणी हों।

—वचन, खंड 4, मसीह-विरोधियों को उजागर करना, मद दस : वे सत्य का तिरस्कार करते हैं, सिद्धांतों की खुलेआम धज्जियाँ उड़ाते हैं और परमेश्वर के घर की व्यवस्थाओं की उपेक्षा करते हैं (भाग सात)

164. सत्य की अपनी अभिव्यक्ति में परमेश्वर अपने स्वभाव और सार को व्यक्त करता है; सत्य की उसकी अभिव्यक्ति लोगों द्वारा विश्वास की जाने वाली उन विभिन्न सकारात्मक चीजों और वक्तव्यों पर आधारित नहीं है जिन्हें मानवजाति सारांशित करती है। परमेश्वर के वचन परमेश्वर के वचन हैं; परमेश्वर के वचन सत्य हैं। वे एकमात्र नींव और विधान हैं जिनसे मानवजाति का अस्तित्व है। इंसान से उत्पन्न होने वाली सभी तथाकथित मान्यताएँ गलत, बेतुकी और परमेश्वर द्वारा निंदनीय हैं। उन्हें परमेश्वर की मान्यता नहीं मिलती है और वे उसके कथनों का मूल या आधार तो और भी नहीं हैं। परमेश्वर अपने वचनों के माध्यम से अपने स्वभाव और अपने सार को व्यक्त करता है। परमेश्वर द्वारा व्यक्त सभी वचन सत्य हैं, क्योंकि उसमें परमेश्वर का सार है और वह सभी सकारात्मक चीजों की वास्तविकता है। यह भ्रष्ट मानवजाति परमेश्वर के वचनों को चाहे कैसे भी प्रस्तुत या परिभाषित करे या उन्हें कैसे भी देखे या समझे, परमेश्वर के वचन शाश्वत रूप से सत्य हैं और यह एक ऐसा तथ्य है जो कभी नहीं बदलता। परमेश्वर ने चाहे कितने भी वचन बोले हों और यह भ्रष्ट, दुष्ट मानवजाति चाहे उनकी कैसे भी निंदा करे, उन्हें कैसे भी अस्वीकार करे, एक तथ्य ऐसा है जो हमेशा अपरिवर्तनीय रहता है : परमेश्वर के वचन सदा सत्य होंगे। मनुष्य इसे कभी नहीं बदल सकता। अंत में समस्त मानवजाति यह मानेगी कि परमेश्वर के वचन सत्य हैं और मानवजाति की सम्मानजनक पारंपरिक संस्कृति हो या वैज्ञानिक ज्ञान, ये कभी सकारात्मक चीजें नहीं बन सकते हैं और ये कभी सत्य नहीं बन सकते हैं। यह अटल है। मानवजाति की पारंपरिक संस्कृति और अपना अस्तित्व बचाने के तरीके समय बीतने के साथ या समय के लंबे अंतरालों के बाद सत्य नहीं बन जाएँगे, न ही परमेश्वर के वचन मानवजाति की निंदा या विस्मृति के कारण मनुष्य के शब्द बन जाएँगे। सत्य हमेशा सत्य रहेगा; यह सार कभी नहीं बदलेगा। यहाँ कौन-सा तथ्य मौजूद है? यह कि मानवजाति द्वारा सारांशित इन सामान्य कहावतों का स्रोत शैतान और मानवीय कल्पनाएँ और धारणाएँ हैं, वे मनुष्य की उग्रता और उसके भ्रष्ट स्वभाव से उत्पन्न होती हैं और उनका सकारात्मक चीजों से कोई लेना-देना नहीं है। दूसरी ओर, परमेश्वर के वचन परमेश्वर के सार और पहचान की अभिव्यक्ति हैं। वह इन वचनों को किस कारण से व्यक्त करता है? मैं क्यों कहता हूँ कि वे सत्य हैं? इसका कारण यह है कि परमेश्वर समस्त चीजों के सारे विधानों, नियमों, जड़ों, सारतत्वों, वास्तविकताओं और रहस्यों का संप्रभु है और इन्हें अपने हाथों में रखता है। इसलिए सिर्फ परमेश्वर ही सभी चीजों के नियमों, वास्तविकताओं, तथ्यों और रहस्यों को जानता है। परमेश्वर सभी चीजों के मूल को जानता है और परमेश्वर जानता है कि वास्तव में सभी चीजों की जड़ क्या है। परमेश्वर के वचनों में दी गई सभी चीजों की परिभाषाएँ ही सर्वाधिक सटीक हैं और परमेश्वर के वचन ही मनुष्यों के जीवन के लिए मानक और सिद्धांत हैं और ये वे सत्य और मानदंड हैं जिनके सहारे मनुष्य जी सकते हैं।

—वचन, खंड 4, मसीह-विरोधियों को उजागर करना, मद नौ (भाग एक)

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परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?

परमेश्वर का प्रकटन और कार्य परमेश्वर को जानने के बारे में अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन मसीह-विरोधियों को उजागर करना अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ सत्य के अनुसरण के बारे में सत्य के अनुसरण के बारे में न्याय परमेश्वर के घर से शुरू होता है अंत के दिनों के मसीह, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अत्यावश्यक वचन परमेश्वर के दैनिक वचन सत्य वास्तविकताएं जिनमें परमेश्वर के विश्वासियों को जरूर प्रवेश करना चाहिए मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ राज्य का सुसमाचार फ़ैलाने के लिए दिशानिर्देश परमेश्वर की भेड़ें परमेश्वर की आवाज को सुनती हैं परमेश्वर की आवाज़ सुनो परमेश्वर के प्रकटन को देखो राज्य के सुसमाचार पर अत्यावश्यक प्रश्न और उत्तर मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 1) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 2) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 3) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 4) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 5) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 6) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 7) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 8) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 9) मैं वापस सर्वशक्तिमान परमेश्वर के पास कैसे गया

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