13.2. मनुष्य के प्रति परमेश्वर के उपदेशों और सांत्वना
623. आज परमेश्वर तुम लोगों का न्याय करता है, तुम लोगों को ताड़ना देता है और तुम्हें दोषी ठहराता है, लेकिन तुम्हें यह जानना चाहिए कि तुम्हें दोषी इसलिए ठहराया जाता है, ताकि तुम स्वयं को जान सको। वह दोषी ठहराता है, शाप देता है, न्याय करता और ताड़ना देता है, ताकि तुम स्वयं को जान सको, ताकि तुम्हारे स्वभाव में परिवर्तन हो सके और उससे भी बढ़कर तुम अपनी कीमत जान सको और यह देख सको कि परमेश्वर के सभी कार्य धार्मिक हैं, वे उसके स्वभाव और उसके कार्य की आवश्यकताओं के अनुसार हैं, वह मनुष्य के उद्धार के लिए अपनी योजना के अनुसार कार्य करता है और यह कि वह धार्मिक परमेश्वर है, जो मनुष्य से प्रेम करता है, उसे बचाता है, उसका न्याय करता है और उसे ताड़ना भी देता है। यदि तुम केवल यह जानते हो कि तुम निम्न स्तर के हो, कि तुम भ्रष्ट और विद्रोही हो, परंतु यह नहीं जानते कि परमेश्वर आज तुम पर जो न्याय और ताड़ना का कार्य कर रहा है उसके माध्यम से वह अपने उद्धार को प्रकट करने का इरादा रखता है, तो तुम्हारे पास चीजों को अनुभव करने का कोई तरीका नहीं है, तुम आगे बढ़ने में तो बिल्कुल भी सक्षम नहीं हो। परमेश्वर लोगों को मार गिराने या नष्ट करने के लिए नहीं, बल्कि उनका न्याय करने, उन्हें शाप देने, ताड़ना देने और बचाने के लिए आया है। जब तक उसकी 6,000-वर्षीय प्रबंधन योजना का समापन नहीं हो जाता—पहले वह मनुष्य की प्रत्येक श्रेणी के परिणाम का खुलासा करेगा—पृथ्वी पर परमेश्वर का कार्य पूरी तरह से उद्धार की खातिर है; इसका विशुद्ध प्रयोजन उससे प्रेम करने वाले लोगों को पूरी तरह पूर्ण करना और उन्हें अपने प्रभुत्व के प्रति समर्पण कराना है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि परमेश्वर लोगों को कैसे बचाता है, यह सब उन्हें उनकी पुरानी शैतानी प्रकृति से अलग करके किया जाता है; अर्थात्, वह उन्हें जीवन का अनुसरण करवाकर बचाता है। यदि वे ऐसा नहीं करते, तो उनके पास परमेश्वर के उद्धार को स्वीकार करने का कोई रास्ता नहीं होगा। उद्धार स्वयं परमेश्वर का कार्य है और जीवन का अनुसरण ऐसी चीज है, जो उद्धार स्वीकार करने के लिए मनुष्य के पास होनी ही चाहिए। मनुष्य की निगाह में, उद्धार परमेश्वर का प्रेम है, और परमेश्वर का प्रेम ताड़ना, न्याय और शाप नहीं हो सकता; उद्धार में दया, प्रेमपूर्ण दयालुता और, इनके अलावा, सांत्वना के वचनों के साथ-साथ परमेश्वर द्वारा प्रदान किए गए असीम आशीष समाविष्ट होने चाहिए। लोगों का मानना है कि जब परमेश्वर मनुष्य को बचाता है, तो ऐसा वह उसे अपने आशीषों और अनुग्रह से प्रेरित करके करता है, ताकि वह अपना हृदय परमेश्वर को दे सके। दूसरे शब्दों में, उसका मनुष्य को स्पर्श करना उसे बचाना है। इस तरह का उद्धार लेनदेन पर आधारित है। केवल जब परमेश्वर मनुष्य को सौ गुना प्रदान करता है, तभी मनुष्य परमेश्वर के नाम के प्रति समर्पण करेगा और ऐसा करके वह परमेश्वर को गौरवान्वित करेगा और उसका मान बढ़ाएगा। मानवजाति के लिए परमेश्वर का यह इरादा नहीं है। परमेश्वर पृथ्वी पर भ्रष्ट मानवता को बचाने के लिए कार्य करने आया है—इसमें कोई झूठ नहीं है। यदि ऐसा न होता, तो वह अपना कार्य करने के लिए व्यक्तिगत रूप से निश्चित ही नहीं आता। अतीत में, उद्धार के उसके साधन में परम दया और प्रेमपूर्ण दयालुता दिखाना शामिल था, यहाँ तक कि उसने संपूर्ण मानवजाति के बदले में अपना सर्वस्व शैतान को दे दिया। वर्तमान अतीत जैसा नहीं है : आज तुम लोगों का उद्धार अंत के दिनों के समय घटित होता है, जब प्रत्येक व्यक्ति उसके प्रकार के अनुसार छाँटा जाता है; तुम लोगों के उद्धार का साधन दया या प्रेमपूर्ण दयालुता नहीं है, बल्कि ताड़ना और न्याय है, ताकि मनुष्य को अधिक पूरी तरह से बचाया जा सके। इस प्रकार, तुम लोगों को जो भी प्राप्त होता है, वह ताड़ना, न्याय और निर्मम प्रहार है, लेकिन यह जान लो : इस निर्मम प्रहार में थोड़ा-सा भी दंड नहीं है। मेरे वचन कितने भी कठोर हों, तुम लोगों को जो मिलता है, वे कुछ वचन ही होते हैं, जो तुम लोगों को अत्यंत निर्दय प्रतीत हो सकते हैं, और मैं कितना भी क्रोधित क्यों न हूँ, तुम लोगों को जो मिलता है, वे फिर भी फटकार के वचन ही होते हैं, और मेरा आशय तुम लोगों को नुकसान पहुँचाना या तुम लोगों को मार डालना नहीं है। क्या यह सब तथ्य नहीं है? जान लो कि आजकल हर चीज उद्धार के लिए है, चाहे वह धार्मिक न्याय हो या निर्मम शोधन और ताड़ना। भले ही आज प्रत्येक व्यक्ति उसके प्रकार के अनुसार छाँटा जाए या सभी प्रकार के लोगों को बेनकाब किया जाए, परमेश्वर के समस्त वचनों और कार्य का प्रयोजन उन लोगों को बचाना है जो परमेश्वर से सचमुच प्रेम करते हैं। धार्मिक न्याय मनुष्य को शुद्ध करने के उद्देश्य से लाया जाता है और निर्मम शोधन उसे शुद्ध करने के लिए किया जाता है; कठोर वचन बोलना या ताड़ना देना, दोनों शुद्ध करने के लिए हैं और वे उद्धार के लिए हैं। इस प्रकार, उद्धार का आज का तरीका अतीत के तरीके जैसा नहीं है। आज धार्मिक न्याय तुम्हारे उद्धार का काम करता है और वह तुम लोगों में से प्रत्येक को तुम्हारे प्रकार के अनुसार छाँटने का एक अच्छा उपकरण है और निर्मम ताड़ना तुम लोगों के सर्वोच्च उद्धार का काम करती है। ऐसी ताड़ना और न्याय का सामना होने पर तुम लोगों को क्या कहना है? क्या तुम लोगों ने शुरू से अंत तक हमेशा उद्धार का आनंद नहीं लिया है? तुम लोगों ने देहधारी परमेश्वर को देखा है और उसकी सर्वशक्तिमत्ता और बुद्धि का एहसास किया है; इसके अलावा, तुम लोगों ने बार-बार प्रहार और अनुशासन का अनुभव किया है। लेकिन क्या तुम लोगों को सर्वोच्च अनुग्रह भी प्राप्त नहीं हुआ है? क्या तुम लोगों को प्राप्त हुए आशीष किसी भी अन्य की तुलना में अधिक नहीं हैं? तुम लोगों को प्राप्त हुए अनुग्रह सुलेमान को प्राप्त महिमा और संपत्ति से भी अधिक विपुल हैं! इसके बारे में सोचो : यदि आगमन के पीछे मेरा इरादा तुम लोगों को बचाने के बजाय तुम्हारी निंदा करना और सज़ा देना होता, तो क्या तुम लोगों का जीवन इतने लंबे समय तक चल सकता था? क्या तुम लोग जो मांस और रक्त के पापी प्राणी हो, आज तक जीवित रहते? यदि मेरा उद्देश्य केवल तुम लोगों को दंड देना होता, तो मैं देह धारण क्यों करता और इतने महान उद्यम की शुरुआत क्यों करता? क्या तुम जैसे तुच्छ लोगों को दंडित करने का काम महज एक वचन बोलने से ही नहीं किया जा सकता? क्या तुम लोगों की जानबूझकर निंदा करने के बाद अभी भी मुझे तुम लोगों को नष्ट करने की आवश्यकता होगी? क्या तुम लोगों को अभी भी मेरे इन वचनों पर विश्वास नहीं है? क्या मैं केवल दया और प्रेमपूर्ण दयालुता के माध्यम से मनुष्य को बचा सकता हूँ? या क्या मैं मनुष्यों को बचाने के लिए केवल सूली पर चढ़ने के तरीके का ही उपयोग कर सकता हूँ? क्या मेरा धार्मिक स्वभाव मनुष्य को पूरी तरह से समर्पित बनाने में अधिक सहायक नहीं है? क्या यह मनुष्य को पूरी तरह से बचाने में अधिक सक्षम नहीं है?
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, तुम्हें रुतबे के आशीष को परे रखना चाहिए और मनुष्य का उद्धार लाने का परमेश्वर का इरादा समझना चाहिए
624. तुम सब पाप और व्यभिचार की धरती पर रहते हो; और तुम सब व्यभिचारी और पापी हो। आज तुम लोग न केवल परमेश्वर को देख सकते हो, बल्कि उससे भी महत्वपूर्ण रूप से, तुम लोगों ने ताड़ना और न्याय प्राप्त किया है, तुमने यह गहनतम उद्धार प्राप्त किया है, दूसरे शब्दों में, तुमने परमेश्वर का महानतम प्रेम प्राप्त किया है। परमेश्वर जो कुछ करता है, वह तुम लोगों के लिए सच्चा प्रेम है। वह कोई बुरी मंशा नहीं रखता। यह तुम लोगों के पापों के कारण है कि वह तुम लोगों का न्याय करता है, ताकि तुम लोग आत्म-चिंतन करो और यह जबरदस्त उद्धार प्राप्त करो। यह सारा कार्य मनुष्य को पूर्ण करने के प्रयोजन से किया जाता है। प्रारंभ से लेकर अंत तक, परमेश्वर मनुष्य को बचाने के लिए भरसक कोशिश कर रहा है, और अपने ही हाथों से बनाए हुए लोगों को पूर्णतया नष्ट करने की उसकी बिल्कुल इच्छा नहीं है। आज वह कार्य करने के लिए तुम लोगों के बीच आया है; क्या यह और भी बड़ा उद्धार नहीं है? अगर वह तुम लोगों से नफरत करता, तो क्या फिर भी वह व्यक्तिगत रूप से तुम लोगों का मार्गदर्शन करने के लिए इतने बड़े परिमाण का कार्य करता? वह इस प्रकार कष्ट क्यों उठाए? परमेश्वर तुम लोगों से घृणा नहीं करता, न ही तुम्हारे प्रति कोई बुरी मंशा रखता है। तुम लोगों को जानना चाहिए कि परमेश्वर का प्रेम सर्वाधिक वास्तविक है। केवल लोगों के विद्रोही होने के कारण ही उसे न्याय के माध्यम से उन्हें बचाना पड़ता है; वरना उन्हें बचाना तब भी असंभव होता। क्योंकि तुम लोग नहीं जानते कि अपने जीवन कैसे जिएँ, और नहीं जानते कि कैसे जीना चाहिए, और चूँकि तुम लोग इस व्यभिचारी और पापमय भूमि पर जीते हो और स्वयं व्यभिचारी और गंदे दानव हो, इसलिए वह सह नहीं सकता कि तुम और अधिक पतित बनते जाओ, वह तुम लोगों को इस मलिन भूमि पर उस तरह से रहते हुए देख नहीं सकता जैसे तुम अभी जी रहे हो, शैतान द्वारा उसकी इच्छानुसार कुचले जाते हुए, और वह नहीं सह सकता कि तुम्हें रसातल में गिरने दे। वह केवल लोगों के इस समूह को प्राप्त करना और तुम लोगों को पूर्णतः बचाना चाहता है। तुम लोगों पर विजय का कार्य करने का यह मुख्य उद्देश्य है—यह उद्धार के लिए है। यदि तुम नहीं देख सकते कि जो कुछ तुम पर किया जा रहा है, वह प्रेम और उद्धार है, यदि तुम सोचते हो कि यह मनुष्य को यातना देने की एक पद्धति, एक तरीका भर है और विश्वास के लायक नहीं है, तो तुम पीड़ा और कठिनाई सहने के लिए वापस अपने संसार में ही लौट जाओ! यदि तुम इस धारा में इस न्याय और अमित उद्धार, और इन सब आशीषों का जो मनुष्य के संसार में कहीं न पाए जा सकते और इस प्रेम का आनंद उठाने के इच्छुक हो, तो अच्छा है : विजय के कार्य को स्वीकार करने के लिए इस धारा में बने रहो, ताकि तुम्हें पूर्ण बनाया जा सके। परमेश्वर के न्याय के कारण आज तुम कुछ कष्ट और शोधन सहते हो, लेकिन यह कष्ट मूल्यवान और अर्थपूर्ण है। यद्यपि मनुष्य के लिए परमेश्वर की ताड़ना और न्याय शोधन हैं, निर्दयतापूर्ण प्रकाशन हैं और उसके पापों के लिए उसे सज़ा देने और उसके देह को सज़ा देने के उद्देश्य से की गई चीजें हैं, फिर भी इस कार्य का कुछ भी उनके देह की निंदा करने और उसे नष्ट करने के इरादे से नहीं है। वचन का कठोर प्रकाशन तुम्हें सही मार्ग पर ले जाने के उद्देश्य से है। तुम लोगों ने इस कार्य का बहुत-कुछ व्यक्तिगत रूप से अनुभव किया है, और स्पष्टतः, यह तुम्हें बुरे मार्ग पर नहीं ले गया है! यह सब तुम्हें सामान्य मानवता को जीने योग्य बनाने के लिए है; और यह सब तुम्हारी सामान्य मानवता द्वारा प्राप्त किया जा सकता है। परमेश्वर के कार्य का प्रत्येक कदम तुम्हारी आवश्यकताओं पर आधारित है, तुम्हारी दुर्बलताओं के अनुसार है, और तुम्हारे वास्तविक आध्यात्मिक कद के अनुसार है, और तुम लोगों पर कोई असहनीय बोझ नहीं लादा गया है। यह आज तुम्हें स्पष्ट नहीं है, और तुम्हें लगता है कि मैं तुम पर कठोर हो रहा हूँ, और तुम सदैव यह विश्वास करते हो कि मैं तुम्हें प्रतिदिन इसलिए ताड़ना देता हूँ, इसलिए तुम्हारा न्याय करता हूँ और इसलिए तुम्हारी भर्त्सना करता हूँ, क्योंकि मैं तुमसे घृणा करता हूँ। किंतु यद्यपि जो तुम प्राप्त करते हो, वह ताड़ना और न्याय है, किंतु वास्तव में यह तुम्हारे लिए प्रेम है, और यह सबसे बड़ी सुरक्षा है। यदि तुम इस कार्य के गहन अर्थ को नहीं समझ सकते, तो तुम्हारे लिए अनुभव जारी रखना असंभव होगा। तुम्हें इस उद्धार से आश्वासन प्राप्त करना चाहिए। होश में आने से इनकार मत करो। इतनी दूर आकर तुम्हें विजय के कार्य का अर्थ स्पष्ट दिखाई देना चाहिए, और तुम्हें अब और इसके बारे में ऐसी-वैसी राय नहीं रखनी चाहिए!
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, विजय के कार्य की वास्तविक कहानी (4)
625. सभी लोगों को परमेश्वर के वचनों के कारण शोधन के अधीन किया गया है। यदि परमेश्वर देहधारी न हुआ होता, तो मानव-जाति को इस शोधन द्वारा कष्ट भोगने का आशीष न मिलता। दूसरे ढंग से कहें तो, जो लोग परमेश्वर के वचनों के परीक्षणों को प्राप्त करने में सक्षम हैं, वे धन्य हैं। लोग अपनी अंतर्निहित काबिलियत, अपने व्यवहार और परमेश्वर के प्रति अपने रवैये के आधार पर इस प्रकार का शोधन प्राप्त करने के योग्य नहीं हैं। चूँकि परमेश्वर द्वारा उनका उत्कर्ष किया गया है, इसलिए उन्होंने इस आशीष का आनंद लिया है। लोग कहा करते थे कि वे परमेश्वर के चेहरे को देखने या उसके वचनों को सुनने के योग्य नहीं हैं। आज यह पूरी तरह से परमेश्वर के उत्कर्ष और उसकी दया के कारण है कि लोगों ने उसके वचनों का शोधन प्राप्त किया है। यह हर उस व्यक्ति का आशीष है, जो अंत के दिनों में जन्मा है—क्या तुम लोगों ने इसका व्यक्तिगत रूप से अनुभव किया है? किन पहलुओं में लोगों को पीड़ा और असफलताओं का अनुभव करना चाहिए, यह परमेश्वर द्वारा पूर्वनियत किया गया है—यह लोगों की अपनी माँगों पर आधारित नहीं है। यह बिल्कुल ऐसा ही है। हर विश्वासी में परमेश्वर के वचनों के परीक्षणों को स्वीकारने और उसके वचनों के भीतर पीड़ा सहने की क्षमता होनी चाहिए। क्या तुम लोगों को यह स्पष्ट है? तो, तुमने स्वयं द्वारा सहन की गई पीड़ाओं के बदले आज के आशीष पाए हैं; अगर तुम परमेश्वर के लिए पीड़ा नहीं सहते, तो तुम उसकी स्वीकृति प्राप्त नहीं कर सकते।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के लिए सच्चा प्रेम स्वाभाविक है
626. तुम्हारा आज परमेश्वर के वचनों के न्याय, ताड़ना, प्रहार और शोधन को स्वीकार करने में सक्षम होना और इससे भी अधिक परमेश्वर के आदेशों को स्वीकार कर पाना, युगों से पहले ही परमेश्वर ने पूर्वनिर्धारित कर दिया था और इस प्रकार जब तुम्हें ताड़ना दी जाए तो तुम्हें बहुत व्यथित नहीं होना चाहिए। तुम लोगों पर जो कार्य किया गया है और तुम्हें जो आशीष दिए गए हैं उन्हें कोई नहीं ले जा सकता है और जो तुम लोगों को दिया गया है, वह सब कोई भी नहीं ले जा सकता है। धार्मिक लोग तुम लोगों के साथ तुलना में नहीं ठहर सकते। तुम लोगों के पास उनके जितना बाइबल का ज्ञान नहीं है और तुम्हारे पास वे धर्म-सिद्धांत नहीं हैं जो उनके पास हैं, लेकिन चूँकि परमेश्वर ने तुम पर कार्य किया है, तुमने सारे युगों में अन्य किसी से अधिक प्राप्त किया है—और इसलिए यह तुम्हारा सबसे बड़ा आशीष है। इस कारण तुम लोगों को खुद को परमेश्वर के प्रति और भी अधिक अर्पित करना चाहिए और उसके प्रति निष्ठावान होना चाहिए। परमेश्वर द्वारा उत्कर्ष के कारण तुम्हें अपने प्रयासों को बढ़ाना चाहिए, और परमेश्वर के आदेश स्वीकार करने के लिए अपने आध्यात्मिक कद को तैयार रखना चाहिए। परमेश्वर द्वारा तुम्हें जो स्थान दिया गया है उस पर अडिग रहना, परमेश्वर के लोगों में से एक बनने का प्रयास करना, राज्य के प्रशिक्षण को स्वीकार करना, परमेश्वर द्वारा प्राप्त किया जाना और अंततः परमेश्वर की एक गौरवपूर्ण गवाही बनना—क्या तुम्हारे पास ये संकल्प हैं? यदि तुम्हारे पास ऐसे संकल्प हैं, तो अंततः तुम निश्चित रूप से परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जाओगे और परमेश्वर के लिए एक गौरवपूर्ण गवाही बन जाओगे। तुम्हें यह समझना चाहिए कि प्रमुख आदेश परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जाने वाला होना है और परमेश्वर के लिए एक गौरवपूर्ण गवाही बन जाना है। यही परमेश्वर का इरादा है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के सबसे नए कार्य को जानो और उसके पदचिह्नों का अनुसरण करो
627. उन सभी भाइयों और बहनों के लिए, जिन्होंने मेरी आवाज सुनी है : तुम लोगों ने मेरे प्रचंड न्याय की आवाज सुनी है और तुमने चरम पीड़ा सहन की है। लेकिन तुम लोगों को पता होना चाहिए कि मेरी कठोर आवाज के पीछे मेरे इरादे छिपे हैं! मैं तुम लोगों को इसलिए अनुशासित करता हूँ, ताकि तुम लोगों को बचाया जा सके। तुम लोगों को पता होना चाहिए कि अपने प्यारे पुत्रों की खातिर मैं निश्चित रूप से तुम लोगों को अनुशासित करूँगा, तुम लोगों की काट-छाँट करूँगा और शीघ्र ही तुम लोगों को पूर्ण कर दूँगा। मेरा हृदय बहुत उत्सुक है, लेकिन तुम लोग मेरे हृदय को नहीं समझते और मेरे वचन के अनुसार कार्य नहीं करते। मेरे वचन आज तुम लोगों पर आते हैं और तुम लोगों को वास्तव में यह पहचान करवाते हैं कि परमेश्वर एक प्रेम करने वाला परमेश्वर है, और वे तुम सबको परमेश्वर के सच्चे प्रेम का अनुभव कराते हैं। हालाँकि, एक छोटी संख्या में ऐसे लोग भी हैं, जो ढोंग कर रहे हैं। जब वे अन्य लोगों का दुःख देखते हैं, तो वे अपनी आँखों में भी आँसू भरकर उनकी नकल करते हैं। कुछ अन्य लोग हैं, जो—सतह पर—परमेश्वर के ऋणी दिखते हैं और और पश्चात्ताप करते प्रतीत होते हैं, किंतु अपने भीतर वे वास्तव में परमेश्वर को नहीं समझते, न ही वे उसके बारे में निश्चित हैं; बल्कि, वे बस मुखौटा लगाते हैं। मैं इन लोगों से सबसे ज्यादा घृणा करता हूँ! देर-सबेर ये लोग मेरे शहर से कट जाएँगे। मेरा इरादा यह है : मुझे वे लोग चाहिए जिनमें मेरे लिए प्रबल लालसा है और केवल वे ही मुझे प्रसन्न कर सकते हैं जो सच्चे हृदय से मेरा अनुसरण करते हैं। मैं निश्चित रूप से ऐसे लोगों को अपने हाथों से सहारा दूँगा और उन्हें सभी आपदाओं से बचाऊँगा। जो लोग वास्तव में परमेश्वर को चाहते हैं वे परमेश्वर के हृदय के प्रति विचारशील होने और मेरी इच्छा के अनुसार चलने के लिए तैयार रहते हैं। तो, तुम लोगों को शीघ्र ही वास्तविकता में प्रवेश करना चाहिए और मेरे वचन को अपने जीवन के रूप में स्वीकार करना चाहिए—यह मेरा सबसे बड़ा बोझ है। यदि सभी कलीसियाएँ और संत वास्तविकता में प्रवेश करते हैं और वे सब मेरे साथ सीधे संगति करने में सक्षम होते हैं, मेरे साथ आमने-सामने आ सकते हैं और सत्य और धार्मिकता का अभ्यास कर सकते हैं, तो केवल तभी वे मेरे प्यारे पुत्र होंगे, ऐसे लोग, जिनसे मैं बहुत प्रसन्न हूँ। इन लोगों को मैं सभी महान आशीष प्रदान करूँगा।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, आरंभ में मसीह के कथन, अध्याय 23
628. आज तुम केवल इस बात से संतुष्ट नहीं हो सकते कि तुम्हें कैसे जीता जाना है, बल्कि तुम्हें यह विचार भी करना चाहिए कि तुम्हारे सामने जो मार्ग है उस पर तुम्हें कैसे चलना चाहिए। तुममें पूर्ण बनाए जाने का संकल्प और साहस होना चाहिए और तुम्हें हमेशा खुद को अक्षम नहीं समझना चाहिए। क्या सत्य लोगों के साथ पक्षपाती तरीके से पेश आ सकता है? क्या सत्य जानबूझकर लोगों का विरोध कर सकता है? अगर तुम सत्य का अनुसरण करते हो तो क्या वह तुम पर हावी हो सकता है? यदि तुम न्याय के लिए अडिग रहते हो तो क्या वह तुम्हें गिरा देगा? अगर जीवन का अनुसरण करना सच में तुम्हारा संकल्प है, तो क्या जीवन तुम्हें मिले बिना रह सकता है? अगर तुम सत्य से रहित हो तो इसका कारण यह नहीं है कि सत्य तुम्हें नजरअंदाज करता है, बल्कि ऐसा इसलिए है क्योंकि तुम सत्य से दूर रहते हो; अगर तुम न्याय के लिए मजबूती से खड़े नहीं हो सकते तो इसका कारण यह नहीं है कि न्याय के साथ कुछ गड़बड़ है, बल्कि ऐसा इसलिए है क्योंकि तुम यह मानते हो कि न्याय तथ्यों को तोड़-मरोड़ देता है; अगर बरसों के अनुसरण के बाद भी तुम्हें जीवन प्राप्त नहीं हुआ है तो इसका कारण यह नहीं है कि जीवन तुम्हें कोई जमीर नहीं दिखाता, बल्कि इसका कारण यह है कि तुम जीवन को कोई जमीर नहीं दिखाते और तुमने जीवन को दूर भगा दिया है; अगर तुम रोशनी में जीते हो और फिर भी रोशनी प्राप्त नहीं कर पाए हो तो इसका कारण यह नहीं है कि रोशनी तुम्हें रोशन करने में असमर्थ है, बल्कि यह है कि तुमने रोशनी के अस्तित्व पर कोई ध्यान नहीं दिया है, इसलिए रोशनी चुपचाप तुमसे दूर चली गई है। यदि तुम अनुसरण नहीं करते हो, तो सिर्फ यही कहा जा सकता है कि तुम बेकार का कूड़ा हो और तुममें जीने के साहस का अभाव है और अंधकार की शक्तियों का प्रतिरोध करने का जज्बा नहीं है। तुम बहुत ही कायर हो! तुम शैतान की शक्तियों की घेराबंदी से मुक्त होने में असमर्थ हो और केवल इस तरह की शांति और सुरक्षा में अपना जीवन बिताने और अज्ञानता में मरने के इच्छुक हो। जीत लिए जाने का अनुसरण ही वह चीज है जिसे तुम्हें हासिल करना चाहिए; यह तुम्हारा परम कर्तव्य है। अगर तुम सिर्फ जीत लिए जाने से संतुष्ट हो, तो तुम रोशनी के अस्तित्व को दूर भगा रहे हो। तुम्हें सत्य के लिए कष्ट उठाने चाहिए, तुम्हें सत्य के लिए खुद को कुर्बान करना चाहिए, तुम्हें सत्य के लिए अपमान सहना चाहिए और तुम्हें और अधिक सत्य प्राप्त करने की खातिर और अधिक कष्ट सहना चाहिए। यही है जो तुम्हें करना चाहिए। पारिवारिक सामंजस्य का आनंद लेने की खातिर तुम्हें सत्य का त्याग नहीं करना चाहिए और तुम्हें अस्थायी आनंद के लिए जीवन भर की गरिमा और सत्यनिष्ठा नहीं गँवानी चाहिए। तुम्हें उस सबका अनुसरण करना चाहिए जो खूबसूरत और अच्छा है और तुम्हें जीवन में एक ऐसे मार्ग का अनुसरण करना चाहिए जो ज्यादा अर्थपूर्ण है। अगर तुम ऐसा साधारण और सांसारिक जीवन जीते हो और तुम्हारे पास अनुसरण करने के लिए कोई लक्ष्य नहीं है, तो क्या यह अपना जीवन बर्बाद करना नहीं है? ऐसे जीवन से तुम क्या पा सकते हो? तुम्हें एक सत्य के लिए देह के सभी सुख त्याग देने चाहिए और थोड़े-से सुख के लिए सारे सत्य नहीं छोड़ने चाहिए। ऐसे लोगों में कोई सत्यनिष्ठा या गरिमा नहीं होती; उनके होने का कोई अर्थ नहीं है!
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, पतरस के अनुभव : ताड़ना और न्याय का उसका ज्ञान
629. ऐसा मत सोचो कि परमेश्वर का अनुसरण करना इतनी आसान बात है। मुख्य बात यह है कि तुम्हें अवश्य ही उसे जानना चाहिए, तुम्हें उसका कार्य अवश्य जानना चाहिए और तुम में उसके वास्ते कठिनाई सहने, उसके लिए अपने जीवन का त्याग करने और उसके द्वारा पूर्ण किए जाने का संकल्प अवश्य होना चाहिए। यही वह दर्शन है जो तुम्हारे पास होना चाहिए। अगर तुम्हारे विचार हमेशा अनुग्रह का आनंद लेने पर तुले रहते हैं तो यह नहीं चलेगा। यह मानकर न चलो कि परमेश्वर यहाँ केवल लोगों के आनंद और केवल उन पर अनुग्रह बरसाने के लिए है। अगर तुम ऐसा सोचते हो तो तुम गलत होगे! अगर कोई उसका अनुसरण करने के लिए अपने जीवन को जोखिम में नहीं डाल सकता और यदि कोई अनुसरण के लिए अपनी प्रत्येक बाहरी चीज को त्याग नहीं सकता है, तो वह अंत तक कदापि अनुसरण नहीं कर पाएगा! तुम्हारे पास अवश्य ही दर्शन होने चाहिए और वे तुम्हारी नींव होने चाहिए। अगर किसी दिन तुम पर आपदा आ पड़े, तो तुम्हें क्या करना चाहिए? क्या तुम तब भी उसका अनुसरण कर पाओगे? तुम अंत तक अनुसरण कर पाओगे या नहीं, इस बात को हल्के में न कहो। बेहतर होगा कि तुम पहले अपनी आँखों को अच्छे से खोलो और देखो कि अभी समय क्या है। भले ही तुम लोग वर्तमान में मंदिर के खंभों की तरह हो, परंतु एक समय आएगा जब ऐसे खंभे कीड़ों द्वारा कुतर दिये जाएंगे जिससे मंदिर ढह जाएगा, क्योंकि वर्तमान में तुम लोगों के पास बहुत-से दर्शनों का अभाव है। तुम लोग केवल अपने छोटे-से संसार पर ध्यान देते हो, तुम लोगों को नहीं पता कि अनुसरण करने का सबसे विश्वसनीय, सबसे उपयुक्त तरीका क्या है। तुम लोग आज के कार्य के दर्शन पर ध्यान नहीं देते, न ही तुम लोग इन बातों को अपने दिल में रखते हो। क्या तुम लोगों ने कभी सोचा है कि एक दिन तुम लोगों का परमेश्वर तुम्हें एक बहुत ही अपरिचित जगह में रखेगा? क्या तुम लोग सोच सकते हो जब मैं तुम लोगों से सब कुछ छीन लूँगा, तो तुम लोगों का क्या होगा? क्या उस दिन तुम लोगों की ऊर्जस्विता वैसी ही होगी जैसी आज है? क्या तुम लोगों की आस्था फिर से प्रकट होगी? परमेश्वर के अनुसरण में तुम्हें इस सबसे महान दर्शन को जानना चाहिए जो “परमेश्वर” है : यह सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, तुम लोगों को कार्य को समझना चाहिए—भ्रम में अनुसरण मत करो!
630. परमेश्वर में विश्वास करके ही उसे जाना जा सकता है : यह अंतिम उद्देश्य है और यह मनुष्य के अनुसरण का अंतिम लक्ष्य है। तुम्हें परमेश्वर के वचनों को जीने का प्रयास करना चाहिए, ताकि तुम्हारे अभ्यास में उन्हें साकार किया जा सके। यदि तुम्हारे पास सिर्फ़ सैद्धांतिक ज्ञान है, तो परमेश्वर में तुम्हारा विश्वास बेकार हो जाएगा। यदि तुम इसे अभ्यास में लाते हो और उसके वचन को जीते हो तभी तुम्हारा विश्वास पूर्ण और परमेश्वर के इरादों के अनुरूप माना जाएगा। इस मार्ग पर बहुत-से लोग बहुत ज्ञान की बातें कर सकते हैं, लेकिन मृत्यु के समय उनकी आँखें आँसुओं से भर आती हैं और वे इस बात से घृणा करते हैं कि उन्होंने अपना पूरा जीवन बेकार कर दिया और बुढ़ापे तक जीना व्यर्थ हो गया। वे केवल धर्म-सिद्धांत समझते हैं, लेकिन सत्य को अभ्यास में नहीं ला पाते और न ही परमेश्वर की गवाही दे सकते हैं; वे बस इधर-उधर दौड़ते रहते हैं, अपने काम में काफी व्यस्त दिखते हैं और केवल मृत्यु के कगार पर ही वे अंततः देख पाते हैं कि उनके पास सच्ची गवाही नहीं है, वे परमेश्वर को बिल्कुल नहीं जानते हैं। क्या तब बहुत देर नहीं हो गई होती है? फिर तुम वर्तमान समय का लाभ क्यों नहीं उठाते और उस सत्य का अनुसरण क्यों नहीं करते जिससे तुम प्रेम करते हो? कल तक का इंतज़ार क्यों? यदि जीवन में तुम सत्य के लिए कष्ट नहीं उठाते हो या इसे पाने का प्रयास नहीं करते हो, तो क्या तुम मरने के समय पछताना चाहते हो? यदि ऐसा है, तो फिर परमेश्वर में विश्वास क्यों करते हो? वास्तव में अगर वे थोड़ा-सा भी प्रयास करें तो ऐसे कई मामले हैं जिनमें लोग सत्य को अभ्यास में ला सकते हैं और परमेश्वर को संतुष्ट कर सकते हैं। यह केवल इसलिए है क्योंकि लोगों के मन हमेशा भ्रमित रहते हैं, इसलिए वे परमेश्वर के लिए कार्य नहीं कर सकते, और अपनी देह की खातिर लगातार भाग-दौड़ करते हैं, लेकिन अंत में उन्हें कुछ भी हासिल नहीं होता। इसी कारण लोगों को लगातार परेशानियाँ और कठिनाइयाँ झेलनी पड़ती हैं। क्या ये शैतान से आए कष्ट नहीं हैं? क्या यह देह की भ्रष्टता नहीं है? तुम्हें बस झूठी बातों से परमेश्वर को मूर्ख बनाने की कोशिश नहीं करनी चाहिए—तुम्हें वास्तव में अभ्यास करना चाहिए। खुद को धोखा मत दो—ऐसा करने से क्या फायदा? अपनी देह के वास्ते जीकर और प्रसिद्धि और लाभ के लिए संघर्ष करके तुम क्या प्राप्त कर लोगे?
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, तुम्हें सत्य के लिए जीना चाहिए क्योंकि तुम्हें परमेश्वर में विश्वास है
631. जो लोग जीवन का अनुसरण नहीं करते वे रूपान्तरित नहीं किए जा सकते और जो सत्य के लिए प्यासे नहीं होते हैं वे सत्य प्राप्त नहीं कर सकते हैं। तू व्यक्तिगत रूपान्तरण का अनुसरण करने और प्रवेश करने पर ध्यान नहीं देता; बल्कि तू हमेशा उन असंयत इच्छाओं और उन चीजों पर ध्यान देता है जो तुझे परमेश्वर से प्रेम करने और उसके करीब आने से रोकती हैं। क्या ये चीजें तुझे रूपान्तरित कर सकती हैं? क्या ये तुझे राज्य में ला सकती हैं? यदि तेरे अनुसरण का लक्ष्य सत्य की तलाश करना नहीं है, तो तू इस अवसर का लाभ उठाकर फिर से दुनिया में जाकर अपनी किस्मत आजमा सकती है। अपने समय को इस तरह बर्बाद करना ठीक नहीं है—क्यों अपने आप को यातना देती है? क्या यह सच नहीं है कि तू सुंदर दुनिया में सभी प्रकार की चीजों का आनंद उठा सकती है? धन, सुंदर स्त्री-पुरुष, रुतबा, अभिमान, परिवार, बच्चे, इत्यादि—क्या ये दुनिया की वे बेहतरीन चीजें नहीं हैं जिनका तू आनंद उठा सकती है? यहाँ एक सहूलियत भरे स्थान की खोज में इधर-उधर भटकने का क्या फायदा? जब मनुष्य के पुत्र के पास ऐसी कोई जगह नहीं है जहाँ वह आराम करने के लिए अपना सिर रख सके, तो तुझे आराम के लिए जगह कैसे मिल सकती है? वह तेरे लिए आराम की एक सुन्दर जगह कैसे बना सकता है? क्या यह संभव है? मेरे न्याय के अतिरिक्त, आज तू केवल सत्य की शिक्षाएँ प्राप्त कर सकती है। तू मुझसे आराम प्राप्त नहीं कर सकती और तू मुझसे उस सुखद आशियाने को भी प्राप्त नहीं कर सकती जिसके बारे में तू दिन-रात सोचती रहती है। मैं तुझे दुनिया की दौलत और वैभव नहीं प्रदान करूँगा। यदि तू सच्चे मन से अनुसरण करे, तो मैं तुझे समग्र जीवन का मार्ग देने, तुझे फिर से मछली की तरह पानी में लौटा देने को तैयार हूँ। यदि तू सच्चे मन से अनुसरण नहीं करेगी, तो मैं यह सब वापस ले लूँगा। मैं अपने मुँह के वचन उन्हें प्रदान करने को तैयार नहीं हूँ जो आराम का लालच करते हैं, जो बिल्कुल सूअरों और कुत्तों जैसे हैं!
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, तुम विषमता होने के अनिच्छुक क्यों हो?
632. आज, यह आस्था ही है जो तुम्हारा जीता जाना संभव बनाती है और यह तुम्हारा जीता जाना ही है जो तुम्हें यहोवा के प्रत्येक कार्य पर विश्वास करने देता है। केवल आस्था के कारण ही तुम इस प्रकार की ताड़ना और न्याय पाते हो। इस ताड़ना और न्याय के द्वारा तुम जीते और पूर्ण किए जाते हो। यदि आज यह ताड़ना और न्याय न हो, तो तुम्हारी आस्था व्यर्थ होगी, क्योंकि तुम परमेश्वर को नहीं जान पाओगे; इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि तुम उसमें कितना विश्वास करते हो, तुम्हारी आस्था बस खोखले शब्द रह जाएगी और उसमें कोई वास्तविकता नहीं होगी। जब तुम इस विजय के कार्य को प्राप्त कर लेते हो, जो तुम्हें पूर्णतः समर्पित बनाता है, तभी तुम्हारी आस्था सच्ची और विश्वसनीय बनती है और तुम्हारा हृदय परमेश्वर की ओर मुड़ता है। भले ही तुम इस “आस्था” शब्द के कारण काफी अधिक न्याय या बहुत से शापों से होकर गुजरते हो, फिर भी तुममें सच्ची आस्था है और तुम सबसे सच्ची, सबसे वास्तविक और सबसे मूल्यवान वस्तु प्राप्त कर चुके हो। ऐसा इसलिए है क्योंकि न्याय की प्रक्रिया में ही तुम सृजित प्राणियों की मंजिल को देखते हो; इस न्याय में ही तुम सृष्टिकर्ता की मनोहरता देखते हो; इस प्रकार के विजय-कार्य में ही तुम परमेश्वर की भुजा को देखते हो; इसी विजय में तुम मानव जीवन को पूरी तरह समझते हो; इसी विजय में तुम जीवन में सही मार्ग प्राप्त करते हो और “मनुष्य” का सच्चा अर्थ समझ जाते हो; केवल इसी विजय में तुम सर्वशक्तिमान के धार्मिक स्वभाव और उसके सुंदर, महिमामय मुखमंडल को देखते हो। इसी विजय-कार्य में तुम मनुष्य की उत्पत्ति को जान पाते हो और समस्त मनुष्यजाति के “अनश्वर इतिहास” को समझते हो; इसी विजय में तुम मनुष्यजाति के पूर्वजों और मनुष्यजाति की भ्रष्टता के उद्गम के बारे में जान पाते हो; इसी विजय में तुम आनंद और दिलासा के साथ-साथ अंतहीन ताड़ना, अनुशासन और उस मनुष्यजाति के लिए सृष्टिकर्ता के फटकार के वचन प्राप्त करते हो जिसे उसने बनाया है; इसी विजय-कार्य में तुम आशीष प्राप्त करते हो, साथ ही वे विपत्तियाँ भी भुगतते हो जो मनुष्य को भोगनी ही हैं...। क्या यह सब तुम्हारी थोड़ी-सी आस्था के कारण नहीं है? और क्या ये चीजें प्राप्त करने से तुम्हारी आस्था नहीं बढ़ती है? क्या तुमने काफी अधिक प्राप्त नहीं कर लिया है? तुमने मात्र परमेश्वर के वचन को ही नहीं सुना और परमेश्वर की बुद्धि को ही नहीं देखा, अपितु तुमने उसके कार्य के प्रत्येक चरण को भी व्यक्तिगत रूप से अनुभव किया है। हो सकता है तुम कहो कि यदि तुम्हारे पास आस्था नहीं होती तो तुम इस प्रकार की ताड़ना और न्याय से पीड़ित न होते। परन्तु तुम्हें जानना चाहिए कि बिना आस्था के न केवल तुम इस प्रकार की ताड़ना प्राप्त करने या सर्वशक्तिमान से इस प्रकार की देखभाल प्राप्त करने में असमर्थ होते, बल्कि तुम सृष्टिकर्ता से मिलने के इस सुअवसर को भी सदा के लिए खो देते। तुम मनुष्यजाति के उद्गम को कभी भी नहीं जान पाते और न ही मानव जीवन की महत्ता को समझ पाते। भले ही तुम्हारी देह नष्ट हो जाती और तुम्हारी आत्मा अलग हो जाती, फिर भी तुम सृष्टिकर्ता के समस्त कार्यों को नहीं समझ पाते, तुम्हें इस बात का ज्ञान तो कभी न हो पाता कि मनुष्यजाति को बनाने के पश्चात सृष्टिकर्ता ने इस पृथ्वी पर कितने महान कार्य किए। उसके द्वारा बनाई गई इस मनुष्यजाति के एक सदस्य के रूप में क्या तुम इस प्रकार अज्ञानतावश अंधकार में गिरने और अनंत दंड की पीड़ा उठाने के लिए तैयार हो? यदि तुम स्वयं को आज की ताड़ना और न्याय से अलग करते हो, तो तुम्हें किसका सामना करना पड़ेगा? क्या तुम सोचते हो कि वर्तमान न्याय से एक बार अलग होकर तुम इस कष्ट भरे जीवन से बचने में समर्थ हो जाओगे? क्या यह सत्य नहीं है कि यदि तुम “इस स्थान” को छोड़ते हो, तो जिससे तुम्हारा सामना होगा, वह दानवों के द्वारा दी जाने वाली पीड़ादायक यातना या गंभीर नुकसान होगा? क्या तुम्हारा सामना असहनीय दिनों और रातों से हो सकता है? क्या तुम सोचते हो कि आज इस न्याय से बचकर, तुम भविष्य की उस पीड़ा को सदा के लिए टाल सकते हो? तुम्हारे मार्ग में क्या आएगा? क्या यह कोई स्वप्न-लोक होगा जिसकी तुम आशा करते हो? क्या तुम सोचते हो कि वास्तविकता से वैसे ही भागकर, जैसे तुम आज भाग रहे हो, तुम भविष्य की उस अनंत ताड़ना से बच सकते हो? क्या आज के बाद, तुम दोबारा इस प्रकार का अवसर और इस प्रकार का आशीष प्राप्त कर पाओगे? क्या तुम उन्हें तब खोज पाओगे जब आपदाएँ तुम पर आ पड़ेंगी? क्या तुम उन्हें खोज पाओगे, जब सम्पूर्ण मनुष्यजाति विश्राम में प्रवेश करेगी? तुम्हारा वर्तमान खुशहाल जीवन और तुम्हारा छोटा-सा मैत्रीपूर्ण परिवार—क्या वे तुम्हारी भविष्य की अनन्त मंजिल की जगह ले सकते हैं? यदि तुम सच्ची आस्था रखते हो और यदि अपनी आस्था के कारण तुम्हें बहुत अधिक प्राप्त होता है, तो यह सबकुछ तुम्हें, एक सृजित प्राणी को, प्राप्त होना चाहिए और यह सब तुम्हारे पास पहले ही हो जाना चाहिए था। तुम्हारी आस्था और तुम्हारे जीवन के लिए ऐसी विजय से अधिक लाभकारी और कुछ नहीं है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, विजय के कार्य की वास्तविक कहानी (1)
633. जब मूसा ने चट्टान पर प्रहार किया, और यहोवा द्वारा प्रदान किया गया पानी उसमें से बहने लगा, तो यह उसकी आस्था के कारण ही था। जब दाऊद ने—आनंद से भरे अपने हृदय के साथ—मुझ यहोवा की स्तुति में तंतुवाद्य और वीणा बजाई, तो यह उसकी आस्था के कारण ही था। जब अय्यूब ने पहाड़ों में भरे अपने पशु और संपदा के अनगिनत ढेर खो दिए, और उसका शरीर पीड़ादायक फोड़ों से भर गया, तो यह उसकी आस्था के कारण ही था। जब वह मुझ यहोवा की वाणी सुन सका, और मेरी महिमा देख सका, तो यह उसकी आस्था के कारण ही था। पतरस उसकी आस्था के कारण ही यीशु मसीह का अनुसरण कर सका था। वह जो मेरे वास्ते सलीब पर चढ़ाया जा सका और महिमामयी गवाही दे सका, यह भी उसकी आस्था के कारण ही था। जब यूहन्ना ने मनुष्य के पुत्र की महिमामयी छवि देखी, तो यह उसकी आस्था के कारण ही था। जब उसने अंत के दिनों का दर्शन देखा, तो यह सब और भी ज्यादा उसकी आस्था के कारण था। इतने सारे तथाकथित अन्य-जाति राष्ट्रों के लोगों ने मेरा प्रकाशन प्राप्त कर लिया है और वे जान गए हैं कि मैं मनुष्यों के बीच अपना कार्य करने के लिए देह में लौट आया हूँ, यह भी उनकी आस्था के कारण ही है। वे सब जो मेरे कठोर वचनों द्वारा मार खाते हैं और फिर भी इससे सांत्वना पाते हैं और बचाए जाते हैं—क्या उन्होंने ऐसा अपनी आस्था के कारण ही नहीं किया है? जो लोग मुझमें विश्वास करते हुए भी कठिनाइयों का सामना करते हैं, क्या वे भी संसार द्वारा अस्वीकृत नहीं किए गए हैं? जो लोग मेरे वचन से बाहर जी रहे हैं और परीक्षण के कष्टों से भाग रहे हैं, क्या वे सभी संसार में उद्देश्यहीन नहीं भटक रहे हैं? वे पतझड़ के पत्तों के सदृश इधर-उधर फड़फड़ा रहे हैं, जिनके पास आराम के लिए कोई जगह नहीं है, मेरी सांत्वना के वचन तो बिल्कुल भी नहीं हैं। यद्यपि मेरी ताड़ना और शोधन उनका पीछा नहीं करते, फिर भी क्या वे ऐसे भिखारी नहीं हैं, जो स्वर्ग के राज्य के बाहर सड़कों पर, एक जगह से दूसरी जगह उद्देश्यहीन भटक रहे हैं? क्या संसार सच में तुम्हारे आराम करने की जगह है? क्या तुम वास्तव में, मेरी ताड़ना से बचकर संसार से संतुष्टि की कमजोर-सी मुसकराहट प्राप्त कर सकते हो? क्या तुम वास्तव में अपने क्षणभंगुर आनंद का उपयोग अपने हृदय के खालीपन को ढकने के लिए कर सकते हो, उस खालीपन को, जिसे छिपाया नहीं जा सकता? तुम अपने परिवार में हर किसी को धोखा दे सकते हो, लेकिन मुझे कभी धोखा नहीं दे सकते। चूँकि तुम्हारी आस्था बहुत कम है इसलिए तुम आज भी जीने का आनंद नहीं पा सकते। तुम्हारे लिए मेरा प्रोत्साहन यह है : देह की खातिर अपना पूरा जीवन निरर्थक स्थिति में बिताने और उन सभी कष्टों को सहने के बजाय जिन्हें एक व्यक्ति मुश्किल से ही सह सकता है, तुम्हारे लिए बेहतर होगा कि तुम अपना आधा जीवन सच्चे मन से मेरे लिए खुद को खपाने में बिताओ। अपने आप को इतना अधिक सँजोने और मेरी ताड़ना से भागने से कौन-सा उद्देश्य पूरा होता है? केवल अनंतकाल की शर्मिंदगी, अनंतकाल की ताड़ना का फल भुगतने के लिए मेरी क्षणिक ताड़ना से अपने आप को छिपाने से कौन-सा उद्देश्य पूरा होता है? मैं अपनी अपेक्षाएँ मनुष्य पर नहीं थोपता। यदि कोई सच में मेरी सभी व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करने का इच्छुक है, तो मैं उसके साथ खराब बरताव नहीं करूँगा। परंतु मैं अपेक्षा करता हूँ कि सभी लोग मुझमें विश्वास करें, वैसे ही जैसे अय्यूब ने मुझ यहोवा में विश्वास किया था। यदि तुम लोगों की आस्था थोमा की आस्था से बढ़कर होगी, तो तुम लोगों की आस्था मेरी स्वीकृति प्राप्त करेगी, तुम लोगों की निष्ठा मुझे खुश करेगी और तुम लोग अपने दिनों में मेरी महिमा निश्चित रूप से प्राप्त करोगे।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, एक वास्तविक व्यक्ति होने का क्या अर्थ है
634. अगर मैं तुम लोगों के सामने अभी कुछ पैसे रखूँ और तुम्हें चुनने की आजादी दूँ—और अगर मैं तुम्हारी पसंद के लिए तुम्हारी निंदा न करूँ—तो तुममें से ज्यादातर लोग पैसे का चुनाव करेंगे और सत्य को छोड़ देंगे। तुममें से जो बेहतर होंगे, वे पैसे को छोड़ देंगे और अनिच्छा से सत्य को चुन लेंगे, जबकि इन दोनों के बीच वाले एक हाथ से पैसे को झपट लेंगे और दूसरे हाथ से सत्य को। इस तरह तुम्हारा असली रंग क्या स्वतः प्रकट नहीं हो जाएगा? सत्य और किसी ऐसी अन्य चीज के बीच, जिसके प्रति तुम लोग वफादार हो, तुम सभी ऐसा ही चुनाव करोगे और तुम्हारा रवैया ऐसा ही रहेगा। क्या ऐसा नहीं है? तुम लोगों में बहुत-से सही और गलत के बीच डगमगाए हैं, है ना? सकारात्मक और नकारात्मक, काले और सफेद, परिवार और परमेश्वर, संतानों और परमेश्वर, सद्भाव और बिगाड़, धन और गरीबी, रुतबा और मामूलीपन, समर्थन दिए जाने और ठुकरा दिए जाने इत्यादि के बीच सभी संघर्षों के दौरान तुम लोगों ने जो विकल्प चुने हैं उनके बारे में तुम लोग निश्चित ही अनजान नहीं हो! एक सौहार्दपूर्ण परिवार और टूटे हुए परिवार के बीच तुमने पहले को चुना और तुमने ऐसा बिना किसी संकोच के किया; धन-संपत्ति और कर्तव्य के बीच तुमने फिर से पहले को चुना, यहाँ तक कि तुममें किनारे पर वापस लौटने[क] की इच्छा भी नहीं रही; विलासिता और निर्धनता के बीच तुमने पहले को चुना; अपने बच्चों, पत्नियों और पतियों या मेरे बीच तुमने पहले को चुना; और धारणाओं और सत्य के बीच तुमने अब भी पहले को चुना। तुम लोगों के तरह-तरह के बुरे कर्मों को देखते हुए मेरा विश्वास तुम पर से बिल्कुल उठ गया है, मैं बिल्कुल स्तब्ध हूँ। तुम्हारे हृदय अप्रत्याशित रूप से इतने कठोर हैं कि उन्हें कोमल नहीं बनाया जा सकता। सालों तक मैंने अपने हृदय का जो खून खपाया है, उससे मुझे आश्चर्यजनक रूप से तुम्हारे परित्याग और विवशता से अधिक कुछ नहीं मिला, लेकिन तुम लोगों के प्रति मेरी आशाएँ हर गुजरते दिन के साथ बढ़ती ही जाती हैं, क्योंकि मेरा दिन सबके सामने पूरी तरह से खुला हुआ है। फिर भी अब तुम लोग अंधेरी और बुरी चीजों का पीछा कर रहे हो और उनसे अपनी पकड़ ढीली करने से इनकार करते हो। तो फिर तुम्हारा परिणाम क्या होगा? क्या तुम लोगों ने कभी इस पर सावधानी से विचार किया है? अगर तुम लोगों को फिर से चुनाव करने को कहा जाए, तो तुम्हारा क्या रुख रहेगा? क्या अब भी तुम लोग पहले को ही चुनोगे? क्या अब भी तुम लोग निराशा और दर्दनाक शोक से मेरा प्रतिदान करोगे? क्या अब भी तुम्हारे हृदयों में जरा-सी ही गर्मजोशी होगी? क्या तुम अब भी इस बात से अनभिज्ञ रहोगे कि मेरे हृदय को सुकून पहुँचाने के लिए तुम्हें क्या करना चाहिए? इस क्षण तुम्हारा चुनाव क्या है? क्या तुम मेरे वचनों के प्रति समर्पण करोगे या उनसे विमुख रहोगे? मेरा दिन तुम लोगों की आँखों के सामने रख दिया गया है, और एक नया जीवन और एक नया प्रारंभिक बिंदु तुम लोगों के सामने है। लेकिन मुझे तुम लोगों को बताना होगा कि यह प्रारंभिक बिंदु नए कार्य का प्रारंभ नहीं है जैसा कि अतीत में हुआ था, बल्कि यह पुराने कार्य का अंत है। अर्थात् यह अंतिम कार्य है। मेरा ख्याल है कि तुम लोग समझ सकते हो कि इस प्रारंभिक बिंदु के बारे में असामान्य क्या है। लेकिन जल्दी ही किसी दिन तुम लोग इस प्रारंभिक बिंदु का सही अर्थ समझ जाओगे, अतः आओ, हम एक-साथ इससे आगे बढ़ें और आने वाले समापन का स्वागत करें! लेकिन तुम्हारे बारे में जो बात मुझे चिंतित किए रहती है, वह यह है कि अन्याय और न्याय से सामना होने पर तुम लोग हमेशा पहले को चुनते हो। हालाँकि यह सब तुम्हारे अतीत की बात है। मैं तुम लोगों के अतीत की हर बात भूल जाने की उम्मीद करता हूँ, हालाँकि ऐसा करना बहुत मुश्किल है। फिर भी मेरे पास ऐसा करने का एक अच्छा तरीका है : भविष्य को अतीत का स्थान लेने दो और अपने अतीत की छाया मिटाकर अपने आज के सच्चे व्यक्तित्व को उसकी जगह लेने दो। इस तरह मैं एक बार फिर तुम लोगों को चुनाव करने का कष्ट दूँगा : तुम वास्तव में किसके प्रति वफादार हो?
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, तुम वास्तव में किसके प्रति वफादार हो?
फुटनोट :
क. किनारे पर वापस लौटना : एक चीनी कहावत, जिसका मतलब है “अपने बुरे कामों से विमुख होना; अपने बुरे काम छोड़ना।”
635. युवा लोगों को आकांक्षाओं, प्रेरणा और ऊपर उठने की जबरदस्त भावना से रहित नहीं होना चाहिए। उन्हें अपनी संभावनाओं को लेकर निराश नहीं होना चाहिए और न ही उन्हें जीवन में आशा और भविष्य में आस्था खोनी चाहिए। उनमें यह दृढ़ता होनी चाहिए कि वे सत्य के उस मार्ग पर कायम रहें जो उन्होंने अब चुना है—ताकि वे मेरे लिए पूरा जीवन खपाने की अपनी इच्छा साकार कर सकें। युवा लोगों को सत्य से रहित नहीं होना चाहिए, न ही उन्हें पाखंड और अधार्मिकता को प्रश्रय देना चाहिए—उन्हें अपने उचित रुख पर दृढ़ रहना चाहिए; उन्हें धारा के साथ बहना नहीं चाहिए, बल्कि उनमें न्याय और सत्य के लिए त्याग करने और संघर्ष करने का हिम्मत भरा जज्बा होना चाहिए। उनमें यह बहादुरी होनी चाहिए कि वे अंधकार की शक्तियों के उत्पीड़न के सामने न झुकें और अपने अस्तित्व की सार्थकता को परिवर्तित कर दें। उन्हें सब-कुछ चुपचाप नहीं सह लेना चाहिए, बल्कि इससे भी बढ़कर उनमें सच्चाई, बेबाकी और अपने भाई-बहनों के प्रति क्षमा की भावना होनी चाहिए। बेशक, मेरी ये अपेक्षाएँ सभी से हैं और सभी को मेरा यह प्रोत्साहन है। लेकिन इससे भी बढ़कर ये सभी युवा लोगों के लिए मेरे सांत्वनापूर्ण वचन हैं। तुम लोगों को मेरे वचनों के अनुसार अभ्यास करना चाहिए। विशेष रूप से युवा लोगों को चीजों के सही-गलत का स्पष्ट भेद पहचानने, न्याय और सत्य खोजने के संकल्प से रहित नहीं होना चाहिए। तुम लोगों को सभी सुंदर और अच्छी चीजों का अनुसरण करना चाहिए और सभी सकारात्मक चीजों की वास्तविकता प्राप्त करनी चाहिए। यही नहीं, तुम लोगों को अपने खुद के जीवन के प्रति जिम्मेदार होना चाहिए और इसे हल्के में नहीं लेना चाहिए। लोग इस दुनिया में तो आते हैं, पर मुझसे उनका सामना होना दुर्लभ है और सत्य खोजने और उसे प्राप्त करने का अवसर मिलना भी दुर्लभ है। तुम लोग इस सुंदर समय को इस जीवन में अनुसरण करने के सही मार्ग के रूप में क्यों नहीं सँजोओगे? और तुम लोग हमेशा सत्य और न्याय के प्रति इतने तिरस्कारपूर्ण क्यों बने रहते हो? तुम लोग क्यों हमेशा अधार्मिकता और गंदगी के लिए स्वयं को रौंदते और बरबाद करते रहते हो, जो लोगों के साथ खिलवाड़ करती है? और तुम लोग क्यों उन बूढ़े लोगों की तरह वैसे काम करते हो जो अधर्मी करते हैं? तुम लोग पुरानी चीजों के पुराने तरीकों का अनुकरण क्यों करते हो? तुम लोगों का जीवन न्याय, सत्य और पवित्रता से भरा होना चाहिए; तुम लोगों से कभी भी इतनी जल्दी पतित होने और इस तरह रसातल में गिर जाने की अपेक्षा नहीं की गई थी। क्या तुम लोगों को नहीं लगता कि यह एक भयानक दुर्भाग्य होगा? क्या तुम लोगों को नहीं लगता कि यह बहुत अन्यायपूर्ण होगा?
तुम सभी लोगों को अपना कार्य पूर्णरूपेण उत्तम ढंग से करना चाहिए और उसे मेरी वेदी पर बलिदान कर देना चाहिए—इसे एकमात्र—और सर्वश्रेष्ठ बलिदान बनाना चाहिए जो तुम मुझे अर्पित करते हो। तुम लोगों को अपने रुख पर अडिग होना चाहिए और आकाश में बादलों की तरह हवा के हर झोंके के साथ उड़ नहीं जाना चाहिए। अपने आधे जीवन में तुम लोग कड़ी मेहनत करते हो, तो तुम उस गंतव्य की तलाश क्यों नहीं करोगे, जो तुम लोगों का होना चाहिए? तुम लोग आधे जीवन-काल में कठिन परिश्रम करते हो, फिर भी तुम लोग सुअर और कुत्ते जैसे अपने माता-पिता को सत्य को और अपने अस्तित्व के महत्व को कब्र में घसीटने देते हो। क्या तुम्हें यह अपने प्रति भारी अन्याय नहीं लगता? क्या तुम्हें नहीं लगता कि इस तरह से जीवन जीना किसी भी अन्य ढंग से जीने से ज्यादा अर्थहीन है? इस तरह से सत्य और उचित मार्ग की तलाश करने से अंततः समस्याएँ खड़ी हो जाएँगी, जिससे पड़ोसी बेचैन होंगे और पूरा परिवार नाखुश होगा, और इससे घातक विपत्तियाँ आएँगी। क्या तुम्हारा इस तरह से जीना जीवन का सबसे मूल्यहीन होना नहीं है? तुमसे ज्यादा भाग्यशाली जीवन किसका हो सकता है, और तुमसे ज्यादा हास्यास्पद जीवन भी किसका हो सकता है? क्या तुम मुझे अपने लिए मेरा आनंद और मेरे दिलासा देने वाले वचन प्राप्त करने के लिए नहीं खोजते? लेकिन अपने आधे जीवन-काल तक दौड़-भाग कर चुकने के बाद, तुम मुझे इतना उत्तेजित कर देते हो कि मैं क्रोध से भर जाता हूँ और तुम्हारी ओर कोई ध्यान नहीं देता या तुम्हारा अनुमोदन नहीं करता—क्या इसका मतलब यह नहीं है कि तुम्हारा पूरा जीवन व्यर्थ चला गया है? किस मुँह से तुम युगों-युगों के उन संतों की आत्माओं को देखने के लिए जा सकोगे, जो पापशोधन-स्थल से मुक्त हो गए हैं? तुम मेरे प्रति निरुत्साह हो और अंत में तुम एक घातक आपदा को उकसाते हो—बेहतर होगा कि तुम इस मौके का लाभ उठाओ और विशाल समुद्र में एक सुहावनी यात्रा करो और फिर मेरे “सौंपे गए कार्य” का आज्ञापालन करो। मैंने तुम लोगों को बहुत पहले बताया था : जो वैसे हैं—जैसे तुम आज हो—उदासीन फिर भी जाने के अनिच्छुक, वे अंत में मेरे द्वारा उठाई गई लहरों द्वारा अपने में समा लिए जाएँगे और उनके द्वारा निगल लिए जाएँगे। क्या तुम लोग वाकई अपनी रक्षा कर सकते हो? क्या तुम वास्तव में आश्वस्त हो कि अनुसरण करने का तुम्हारा यह वर्तमान तरीका यह सुनिश्चित करेगा कि तुम पूर्ण बनाए जाओगे? क्या तुम्हारा दिल बहुत हठधर्मी नहीं है? इस तरह का अनुगमन, इस तरह का अनुसरण, इस तरह का जीवन और इस तरह का चरित्र—यह मेरी स्वीकृति कैसे प्राप्त कर सकता है?
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, युवा और वृद्ध लोगों के लिए वचन
636. परमेश्वर ताड़ना के ज़रिए लोगों पर विजय प्राप्त नहीं करना चाहता, वह हमेशा लोगों की नाक में नकेल डालकर उनका मार्गदर्शन नहीं करना चाहता। वह चाहता है कि लोग उसके वचनों के प्रति समर्पण करें और अनुशासित तरीके से काम करें, और इसके ज़रिए उसके इरादों को पूरा करें। लेकिन लोगों में कोई शर्म नहीं है और वे लगातार उसके विरुद्ध विद्रोह करते रहते हैं। मेरा मानना है कि हमारे लिए सबसे अच्छा यही है कि हम उसे संतुष्ट करने के लिए सबसे आसान तरीका ढूँढें, यानी उसकी सारी व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करें। अगर तुम वाकई इस मुकाम तक पहुँच सकते हो, तो तुम पूर्ण बनाए जा चुके होगे। क्या यह आसान और आनंददायक बात नहीं है? उस मार्ग पर चलो जिस पर तुम्हें चलना चाहिए; दूसरों की बातों पर ध्यान मत दो, और बहुत अधिक मत सोचो। क्या तुम्हारा भविष्य और तुम्हारी नियति तुम्हारे अपने हाथों में है? तुम हमेशा बच निकलने का प्रयास करते हो, सांसारिक मार्ग अपनाना चाहते हो—लेकिन तुम निकल क्यों नहीं पाते? तुम बरसों से चौराहे पर आकर डगमगा क्यों जाते हो और एक बार फिर उसी मार्ग को चुन लेते हो? बरसों तक भटकने के बाद, न चाहते हुए भी तुम इसी घर में क्यों लौट आए? क्या यह तुम पर निर्भर है? जो इस प्रवाह में हैं उनके लिए, अगर तुम्हें मुझ पर विश्वास न हो, तो यह सुनो : अगर तुम छोड़ने की योजना बना रहे हो, तो देखो क्या परमेश्वर तुम्हें छोड़ने देता है, देखो कि पवित्र आत्मा तुम्हें किस तरह प्रेरित करता है—इसे तुम स्वयं अनुभव करो। स्पष्ट रूप से कहूँ तो, अगर तुम विपत्ति सहते भी हो तो भी, तुम्हें उसे इसी प्रवाह में सहना होगा; दोनों ही सूरतों में तुम कठिनाई सहोगे, इसलिए तुम्हें उसे आज यहीं सहना चाहिए और कहीं और नहीं जाना चाहिए। क्या यह बात तुम्हें स्पष्ट हो गयी? तुम कहाँ जाओगे? यह परमेश्वर की प्रशासनिक आज्ञा है। क्या तुम्हें लगता है कि परमेश्वर द्वारा इस समूह के लोगों का चयन कोई मायने नहीं रखता? परमेश्वर आज अपने काम में, आसानी से नाराज़ नहीं होता, लेकिन अगर लोग उसके काम में व्यवधान डालने की कोशिश करें, तो उसका चेहरा तुरंत बदल जाता है, चमकदार से अंधकारमय हो जाता है। तो तुम्हें मेरी सलाह है कि तुम शांत होकर परमेश्वर को अपने लिए आयोजन करने दो और उसे तुम्हें पूर्ण करने दो। ऐसा करने वाले लोग ही कुशाग्र होते हैं।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, मार्ग ... (7)
637. तुम्हारा गंतव्य और तुम्हारी नियति तुम लोगों के लिए बहुत अहम हैं—उनका तुम लोगों पर बहुत असर होता है। तुम मानते हो कि अगर तुम लोग अत्यंत सावधानी से चीजें नहीं करते, तो इसका अर्थ यह होगा कि अब तुम्हारा कोई गंतव्य नहीं रह जाएगा, कि तुमने अपना भाग्य बर्बाद कर लिया है। लेकिन क्या तुम लोगों ने कभी यह सोचा है कि अगर लोग मात्र अपने गंतव्य के लिए प्रयास करते हैं, तो वे व्यर्थ ही कड़ी मेहनत कर रहे हैं? ऐसे प्रयास सच्चे नहीं हैं—वे नकली हैं, धोखा हैं। यदि ऐसा है, तो जो लोग केवल अपने गंतव्य के लिए प्रयास करते हैं, वे अपनी अंतिम पराजय की दहलीज पर हैं, क्योंकि परमेश्वर में व्यक्ति के विश्वास की विफलता धोखे के कारण होती है। मैं पहले कह चुका हूँ कि मुझे चाटुकारिता, खुशामद या उत्साहपूर्ण ढंग से व्यवहार किया जाना पसंद नहीं है। मुझे पसंद है कि ईमानदार लोग मेरे सत्य और अपेक्षाओं का सामना कर सकें। इससे भी अधिक मुझे तब अच्छा लगता है, जब लोग पूरी बारीकी से मेरे हृदय के प्रति विचारशील होते हैं, और जब वे मेरी खातिर सब कुछ खपाने तक में सक्षम होते हैं। केवल इसी तरह से मेरे हृदय को सुकून मिल सकता है। इस समय, तुम लोगों के विषय में ऐसी कितनी चीज़ें हैं, जो मुझे नापसंद हैं? तुम लोगों के विषय में ऐसी कितनी चीज़ें हैं, जो मुझे पसंद हैं? क्या ऐसा हो सकता है कि तुम लोगों में से किसी ने भी कुरूपता के वे सभी विभिन्न प्रकार महसूस न किए हों, जो तुम लोगों ने अपने गंतव्य की खातिर खुद को खपाने में प्रदर्शित किए हैं?
अपने दिल में मैं ऐसे किसी भी दिल को चोट नहीं पहुँचाना चाहता, जो सकारात्मक है और ऊपर उठने की आकांक्षा रखता है, और किसी व्यक्ति के समर्पित होकर अपना कर्तव्य करने के जोश को मिटा देने की इच्छा तो मैं और भी नहीं रखता। फिर भी, मुझे तुम लोगों में से प्रत्येक को तुम्हारी कमियों और तुम्हारे दिलों के गहनतम कोनों में मौजूद मलिन आत्माओं के बारे में चेताना होगा। मैं ऐसा सिर्फ इस उम्मीद में करता हूँ कि तुम लोग मेरे वचनों के सामने अपना सच्चा हृदय अर्पित करने में सक्षम होगे, क्योंकि मुझे सबसे ज्यादा घृणा लोगों द्वारा मेरे साथ किए जाने वाले धोखे से है। मैं केवल यह उम्मीद करता हूँ कि मेरे कार्य के अंतिम चरण में तुम लोग अपने सर्वोत्कृष्ट प्रदर्शन में सक्षम होंगे, और तुम स्वयं को पूरे मन से समर्पित करोगे, अधूरे मन से नहीं। बेशक, मैं यह उम्मीद भी करता हूँ कि तुम सभी लोगों को अच्छा गंतव्य प्राप्त हो सके। फिर भी, मेरी तुमसे अपेक्षा है, और वह यह है कि तुम लोग मुझे अपनी एकमात्र और अंतिम वफादारी समर्पित करने में सर्वोत्तम निर्णय लो। अगर किसी में वह एकमात्र वफादारी नहीं है, तो वह व्यक्ति निश्चित रूप से शैतान की सँजोई हुई संपत्ति है और मैं आगे उसे इस्तेमाल करने के लिए नहीं रखूँगा, बल्कि उसे उसके माता-पिता द्वारा देखभाल किए जाने के लिए घर भेज दूँगा।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, गंतव्य के बारे में
638. भविष्य में तुम्हें आशीष मिलेगा या संताप, यह तुम्हारे आज के क्रियाकलापों और व्यवहार के आधार पर तय होगा। यदि तुम्हें परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाया जाना है, तो यह इस वर्तमान युग में ही होना चाहिए; भविष्य में दूसरा कोई अवसर नहीं होगा। परमेश्वर तुम लोगों को सच में अभी पूर्ण बनाना चाहता है और यह केवल कहने की बात नहीं है। भविष्य में तुम पर चाहे जो भी परीक्षण आएँ, चाहे कैसी भी घटनाएँ घटें या तुम्हें कैसी भी आपदाओं का सामना करना पड़े, परमेश्वर तुम लोगों को पूर्ण बनाना चाहता है; यह एक निश्चित और निर्विवाद तथ्य है। इसे कहाँ देखा जा सकता है? इसे इस तथ्य में देखा जा सकता है कि युगों और पीढ़ियों से परमेश्वर के वचन ने ऐसी महान ऊँचाई कभी प्राप्त नहीं की और ऐसे उच्चतम क्षेत्र में प्रवेश नहीं किया, जैसा कि उसने आज किया है। सभी लोगों पर पवित्र आत्मा का कार्य आज अभूतपूर्व है। पिछली पीढ़ियों में से शायद ही किसी को ऐसा अनुभव हुआ था; यहाँ तक कि यीशु के युग में भी आज के प्रकाशन विद्यमान नहीं थे। तुम लोगों से बोले गए वचन, जो तुम लोग समझते हो और तुम लोगों के अनुभव, सब एक शीर्षबिंदु पर पहुँच गए हैं। यहाँ तक कि परीक्षणों और ताड़नाओं के बीच भी तुम लोग छोड़कर जाते नहीं हो, यह इस बात का पर्याप्त प्रमाण है कि परमेश्वर के कार्य ने एक अभूतपूर्व वैभव प्राप्त कर लिया है। यह कोई ऐसी बात नहीं है जिसे मनुष्य कर सकता है। यह कोई ऐसी बात नहीं है जिसे मनुष्य बनाए रखता है; बल्कि यह स्वयं परमेश्वर का कार्य है। इस तरह परमेश्वर के कार्य के अनेक तथ्यों से यह देखा जा सकता है कि परमेश्वर मनुष्य को पूर्ण बनाना चाहता है और वह निश्चित रूप से तुम लोगों को पूर्ण करने में सक्षम है। यदि तुम लोगों में यह अंतर्दृष्टि है और तुम यह नई खोज करते हो, तो तुम यीशु के दूसरे आगमन की प्रतीक्षा नहीं करोगे, बल्कि तुम सब परमेश्वर को इसी युग में स्वयं को पूर्ण करने दोगे। इसलिए, तुम लोगों में से प्रत्येक को अपना अधिकतम प्रयास करना चाहिए, कोई कसर नहीं छोड़नी चाहिए, ताकि तुम परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जा सको।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, सभी के द्वारा अपना कार्य करने के बारे में
639. प्रत्येक व्यक्ति के लिए परमेश्वर की इच्छा है कि उसे पूर्ण बनाया जाए, अंततः उसके द्वारा उसे प्राप्त किया जाए, उसके द्वारा उसे पूरी तरह से शुद्ध किया जाए, और वह ऐसा इंसान बने जिससे वह प्रेम करता है। चाहे मैं तुम लोगों को पिछड़ा हुआ कहता हूँ या खराब काबिलियत वाला—यह सब तथ्य है। हालाँकि मेरा ऐसा कहना यह प्रमाणित नहीं करता कि मेरा तुम लोगों को त्यागने का इरादा है, कि मैंने तुम लोगों में आशा खो दी है, और यह तो बिल्कुल नहीं कि मैं तुम लोगों को बचाना नहीं चाहता। आज मैं तुम लोगों के उद्धार का कार्य करने के लिए आया हूँ, जिसका तात्पर्य है कि जो कार्य मैं करता हूँ, वह उद्धार के कार्य की निरंतरता है। प्रत्येक व्यक्ति के पास पूर्ण बनाए जाने का अवसर होता है : बशर्ते तुम इच्छुक हो, बशर्ते तुम अनुसरण करते हो, अंत में तुम इस परिणाम को प्राप्त करने में समर्थ होगे और तुममें से किसी एक को भी छोड़ नहीं दिया जाएगा। यदि तुम कम काबिलियत के हो तो तुमसे मेरी अपेक्षाएँ तुम्हारी कम काबिलियत के अनुसार होंगी; यदि तुम उच्च काबिलियत के हो तो तुमसे मेरी अपेक्षाएँ तुम्हारी उच्च काबिलियत के अनुसार होंगी; यदि तुम अज्ञानी और निरक्षर हो तो तुमसे मेरी अपेक्षाएँ इसी अनुसार होंगी; यदि तुम साक्षर हो तो तुमसे मेरी अपेक्षाएँ तुम्हारे साक्षर होने के अनुसार होंगी; यदि तुम उम्रदराज हो तो तुमसे मेरी अपेक्षाएँ तुम्हारी उम्र के अनुसार होंगी; यदि तुम मेजबानी का कर्तव्य निभाने में सक्षम हो तो तुमसे मेरी अपेक्षाएँ इसी अनुसार होंगी; यदि तुम कहते हो कि तुम मेजबानी का कर्तव्य नहीं निभा सकते हो और केवल एक निश्चित भूमिका ही निभा सकते हो, चाहे वह सुसमाचार प्रचार का कार्य हो या कलीसिया की देखरेख करने का कार्य या अन्य सामान्य मामलों को करने का कार्य, तो मेरे द्वारा तुम्हारी पूर्णता भी उस कार्य के अनुसार होगी जो तुम करते हो। वफादार होना, बिल्कुल अंत तक समर्पण करना और परमेश्वर से अत्यधिक प्रेम करने का प्रयास करना—ये चीजें तुम्हें अवश्य हासिल करनी चाहिए, बस ये तीन चीजें और यही सर्वोत्तम अभ्यास हैं। अंततः लोगों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे इन तीन चीजों को हासिल करें और जो इन्हें हासिल कर सकते हैं वे पूर्ण बनाए जाएँगे। किंतु, इन सबसे ऊपर, तुम्हें सच्चे मन से अनुसरण करना होगा, तुम्हें सक्रियता से आगे और ऊपर की ओर बढ़ते जाना होगा और इस मामले में निष्क्रिय नहीं होना होगा। मैं कह चुका हूँ कि प्रत्येक व्यक्ति के पास पूर्ण बनाए जाने का अवसर है और प्रत्येक व्यक्ति पूर्ण बनाए जाने में सक्षम है, और यह सच है, किंतु तुम ऊपर की ओर बढ़ने का प्रयास नहीं करते हो। जो इन तीन मापदंडों को हासिल नहीं करते हैं वे अंततः फिर भी हटा दिए जाएँगे। मैं चाहता हूँ कि कोई भी पीछे न रहे, मैं चाहता हूँ कि प्रत्येक के पास पवित्र आत्मा का कार्य और प्रबोधन हो और वह बिल्कुल अंत तक समर्पण करने में समर्थ हो, क्योंकि यही वह कर्तव्य है जिसे तुम लोगों में से प्रत्येक को निभाना चाहिए। जब तुम सब लोग अपना कर्तव्य अच्छी तरह निभा चुके होगे तो तुम सभी लोगों को पूर्ण बनाया जा चुका होगा और तुम लोगों के पास गूँजती हुई गवाही भी होगी। जिन लोगों के पास गवाही है वे सभी ऐसे लोग हैं जो शैतान पर विजयी हुए हैं और जिन्होंने परमेश्वर की प्रतिज्ञा प्राप्त कर ली है, और वही लोग बने रहेंगे और अद्भुत मंजिल में जीवन व्यतीत करेंगे।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, मनुष्य के सामान्य जीवन को बहाल करना और उसे एक अद्भुत मंजिल पर ले जाना
640. सर्वशक्तिमान के जीवन के पोषण से भटक चुकी मानवजाति अस्तित्व के उद्देश्य से अनभिज्ञ है, लेकिन मृत्यु से फिर भी डरती है। उनके पास मदद या सहारा नहीं है, लेकिन फिर भी वे अपनी आँखों को बंद करने के अनिच्छुक हैं, वे अपनी सुन्न पड़ चुकी आत्माओं वाली देह को गिरने न देने के लिए खुद को मजबूत बनाते हैं, और वे इस दुनिया में एक अधम अस्तित्व को घसीटते हैं। तुम इस तरह बिना आशा के जीते हो, जैसे कि अन्य लोग उद्देश्यहीन होकर जीते हैं। केवल किंवदंती का पवित्र जन ही उन लोगों को बचाएगा जो अपने दुःख में कराहते हुए उसके आगमन के लिए अत्यंत व्याकुल हैं। ऐसा विश्वास बहुत समय तक उनमें साकार नहीं हुआ है जो चेतना विहीन हैं। फिर भी, वे अभी भी इसके लिए तरस रहे हैं। सर्वशक्तिमान गहराई से पीड़ित इन लोगों पर दया करता है; साथ ही, वह उन लोगों से विमुख महसूस करता है जिनमें जरा-सी भी चेतना नहीं है, क्योंकि उसे लोगों से जवाब पाने के लिए बहुत लंबा इंतजार करना पड़ता है। वह खोजना चाहता है, तुम्हारे दिल और तुम्हारी आत्मा को खोजना चाहता है, तुम्हें पानी और भोजन देना चाहता है, ताकि तुम जाग जाओ और अब तुम भूखे या प्यासे न रहो। जब तुम थक जाओ और तुम्हें इस दुनिया की वीरानी का कुछ-कुछ एहसास हो, तो तुम भ्रमित मत होना, रोना मत। सर्वशक्तिमान परमेश्वर, प्रहरी, किसी भी समय तुम्हारे आगमन को गले लगा लेगा। वह तुम्हारी बगल में पहरा दे रहा है। वह तुम्हारे वापस मुड़ जाने का इंतजार कर रहा है, उस दिन की प्रतीक्षा कर रहा है जिस दिन तुम अचानक अपनी याददाश्त फिर से पा लोगे : जब तुम्हें यह एहसास होगा कि तुम परमेश्वर से आए हो और किसी अज्ञात समय में तुमने अपनी दिशा खो दी थी, किसी अज्ञात समय में तुम राह में होश खो बैठे थे, और किसी अज्ञात समय में तुम्हारा एक “पिता” था; इसके अलावा, जब तुम्हें यह एहसास होगा कि सर्वशक्तिमान हमेशा से ही वहीं ठहरकर, धैर्य के साथ, बहुत लंबे समय से तुम्हारी वापसी का इंतजार करता रहा है। वह बेसब्री से लालायित रहा है, बिना किसी उत्तर के प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा कर रहा है। उसका नजर रखना बहुत ही अनमोल है और यह मनुष्य के दिल और मनुष्य की आत्मा के लिए है। शायद ऐसे नजर रखना अनिश्चितकालीन है, या शायद इसका अंत हो चुका है। लेकिन तुम्हें सटीक रूप से पता होना चाहिए कि तुम्हारा दिल और तुम्हारी आत्मा इस वक्त कहाँ हैं।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, सर्वशक्तिमान की आह
641. परमेश्वर का प्रेम और उसकी दया उसके प्रबंधन कार्य के हर ब्योरे में व्याप्त रहती है और इसकी परवाह किए बिना कि चाहे लोग परमेश्वर के श्रमसाध्य इरादे समझ पाएँ या नहीं, वह जो कार्य पूरा करना चाहता है, उसे वह निरंतर दृढ़ता के साथ करता है। इस बात की परवाह किए बिना कि परमेश्वर के प्रबंधन को लोग कितना समझते हैं, परमेश्वर के कार्य से मनुष्य को हुए लाभ और सहायता को हर कोई अनुभव कर सकता है। शायद आज तुमने परमेश्वर से कोई प्रेम या जीवन की आपूर्ति महसूस नहीं की है, लेकिन जब तक तुम परमेश्वर को नहीं छोड़ते और सत्य का अनुसरण करने के अपने संकल्प को नहीं छोड़ते, एक दिन ऐसा आएगा, जब परमेश्वर का मुस्काता मुखमंडल तुम पर प्रकट होगा। क्योंकि परमेश्वर के प्रबंधन कार्य का उद्देश्य शैतान की सत्ता के अधीन मौजूद लोगों को फिर से पाना है, न कि उन लोगों को त्याग देना, जो शैतान द्वारा भ्रष्ट किए जा चुके हैं और परमेश्वर का विरोध करते हैं।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परिशिष्ट 3 : मनुष्य को केवल परमेश्वर के प्रबंधन के बीच ही बचाया जा सकता है
642. उद्धार का अपना कार्य करने के दौरान परमेश्वर हर उस व्यक्ति को यथासंभव बचाता है जिसे बचाया जा सकता है और उनमें से किसी को भी नहीं छोड़ता है, क्योंकि परमेश्वर के कार्य का उद्देश्य मनुष्य को बचाना है। जो लोग परमेश्वर द्वारा मनुष्य के उद्धार के दौरान अपने स्वभाव में परिवर्तन हासिल करने में असमर्थ रहते हैं—और वे भी, जो पूरी तरह से परमेश्वर के प्रति समर्पण नहीं कर पाते हैं—वे दंड के भागी होंगे। कार्य का यह चरण—वचनों का कार्य—लोगों के लिए वे सभी वचन खोल देगा जिन्हें वे नहीं समझते हैं, साथ ही उन सभी रहस्यों को भी खोल देगा जो उन्हें समझ में नहीं आते हैं। यह उन्हें परमेश्वर के इरादों को और उनसे परमेश्वर की अपेक्षाओं को समझने देता है और अपने में परमेश्वर के वचनों को अभ्यास में लाने और अपने स्वभाव में परिवर्तन हासिल करने की पूर्वापेक्षाएँ रखने देता है। परमेश्वर अपना कार्य करने के लिए केवल वचनों का उपयोग करता है और लोगों को थोड़ा-सा विद्रोही होने पर दंडित नहीं करता है। ऐसा इसलिए कि यह उद्धार के कार्य का समय है और यदि लोग जब भी विद्रोही हों उन्हें दंडित किया जाए, तो किसी के पास भी बचाए जाने का अवसर नहीं होगा और हरेक दंडित होगा और रसातल में जा गिरेगा। मनुष्य का न्याय करने के लिए वचनों के उपयोग का उद्देश्य उसे स्वयं को जानने और परमेश्वर के प्रति समर्पण करने देना है; इसका उद्देश्य उसे इस तरह के न्याय से दंडित करना नहीं है। वचनों के कार्य के दौरान बहुत-से लोग देहधारी परमेश्वर के प्रति अपनी विद्रोहशीलता और प्रतिरोध उजागर करने के साथ ही अपने समर्पण की गैर-मौजूदगी भी उजागर करेंगे। फिर भी, इसकी वजह से वह उन्हें दंडित नहीं करेगा, बल्कि केवल उन लोगों को अस्वीकार कर देगा, जो पूरी तरह से भ्रष्ट हो चुके हैं और जिन्हें बचाया नहीं जा सकता। वह उनकी देह शैतान को दे देगा, और कुछ मामलों में, उनकी देह का अंत कर देगा। शेष लोग अनुसरण करना और काट-छाँट किए जाने का अनुभव करना जारी रखेंगे। यदि अनुसरण करते समय भी ये लोग काट-छाँट किए जाने को स्वीकार नहीं करते, और ज्यादा पतित हो जाते हैं, तो वे उद्धार पाने के अपने अवसर से वंचित हो जाएँगे। हर ऐसे व्यक्ति के पास उद्धार के लिए कई अवसर होंगे जिसने परमेश्वर के वचनों द्वारा जीत लिया जाना स्वीकार कर लिया है; प्रत्येक व्यक्ति के उद्धार में परमेश्वर उसे यथासंभव अधिकतम छूट देगा। दूसरे शब्दों में, उसके प्रति परम उदारता दिखाई जाएगी। अगर लोग गलत रास्ता छोड़ दें और पश्चात्ताप करें, तो परमेश्वर उन्हें उद्धार प्राप्त करने के अवसर देगा। जब मनुष्य पहली बार परमेश्वर से विद्रोह करते हैं तो वह उन्हें मार गिराना नहीं चाहता; बल्कि वह उन्हें बचाने की पूरी कोशिश करता है। यदि किसी में वास्तव में उद्धार के लिए कोई गुंजाइश नहीं है तो परमेश्वर उन्हें छोड़ देता है। किसी को दंडित करने में परमेश्वर थोड़ा धीमा इसलिए चलता है क्योंकि वह हर उस व्यक्ति को बचाना चाहता है जिसे बचाया जा सकता है। वह लोगों का न्याय करने, उन्हें प्रबुद्ध करने और उनका मार्गदर्शन करने के लिए बस वचनों का उपयोग करता है; वह उन्हें मार गिराने के लिए छड़ी का उपयोग नहीं करता है। मनुष्य को उद्धार दिलाने के लिए वचनों का उपयोग करना कार्य के अंतिम चरण का उद्देश्य और महत्त्व है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, तुम्हें रुतबे के आशीष को परे रखना चाहिए और मनुष्य का उद्धार लाने का परमेश्वर का इरादा समझना चाहिए
643. दुनिया के विशाल विस्तार में अनगिनत बार गाद भरने से महासागर खेतों में बदल जाते हैं और खेत बाढ़ से महासागरों में बदल जाते हैं। सिवाय उसके जो सभी चीजों पर संप्रभु है, ऐसा कोई नहीं है जो इस मानवजाति की अगुआई और मार्गदर्शन कर सके। कोई ऐसा “पराक्रमी” नहीं है जो इस मानवजाति के लिए कड़ी मेहनत या तैयारी कर सकता हो, और ऐसा तो कोई भी नहीं है जो इस मानवजाति को प्रकाश की मंज़िल की ओर ले जाने में अगुआई कर सके और इसे मानव संसार के अन्यायों से मुक्त करा सके। परमेश्वर मानवजाति के भविष्य पर विलाप करता है, वह मानवजाति के पतन पर शोक करता है, और उसे पीड़ा होती है कि मानवजाति कदम-दर-कदम क्षय और ऐसे मार्ग की ओर बढ़ रही है जहाँ से वापसी संभव नहीं है। किसी ने कभी यह नहीं सोचा है : जिस मानवजाति ने पूरी तरह परमेश्वर का दिल तोड़ दिया है और बुरे को खोजने के लिए परमेश्वर का त्याग कर दिया है, वह भला कहाँ जा रही होगी? ठीक इसी कारण से कोई परमेश्वर के क्रोध को भाँपने की कोशिश नहीं करता, उस मार्ग को नहीं खोजता जो परमेश्वर को खुश करे या परमेश्वर के करीब आने की कोशिश नहीं करता, और इससे भी अधिक, कोई परमेश्वर के दुख और दर्द को समझने की कोशिश नहीं करता। परमेश्वर की वाणी सुनने के बाद भी मनुष्य अपने मार्ग पर चलता रहता है, परमेश्वर से दूर रहने, परमेश्वर के अनुग्रह और देखभाल से बचने, उसके सत्य से कतराने में लगा रहता है, अपने आप को परमेश्वर के दुश्मन, शैतान को बेचना पसंद करता है। और किसने इस बात पर कोई विचार किया है कि अगर मनुष्य अपने हठीपन पर अड़ा रहा तो परमेश्वर इस मानवजाति के साथ कैसे पेश आएगा जो उसका इतना अत्यंत निरादर करती है? कोई नहीं जानता कि मनुष्य को लेकर परमेश्वर के बार-बार के अनुस्मारकों और गंभीर आग्रहों का कारण यह है कि उसने अपने हाथों में अभूतपूर्व विनाश तैयार कर रखे हैं, ऐसे विनाश जो मनुष्य की देह और आत्मा के लिए असहनीय होंगे, ये विनाश केवल देह का ही दंड नहीं होंगे, बल्कि मनुष्य की आत्मा को भी निशाना बनाएँगे। तुम्हें यह जानने की आवश्यकता है : जब परमेश्वर की योजना निष्फल होगी और जब उसके अनुस्मारकों और आग्रहों का कोई प्रतिदान नहीं मिलेगा, तो वह किस प्रकार का क्रोध प्रकट करेगा? यह ऐसा होगा जिसे पहले कभी किसी सृजित प्राणी ने अनुभव किया या जाना नहीं होगा। और इसलिए मैं कहता हूँ, ये विनाश पहले कभी नहीं हुए और कभी दोहराए नहीं जाएँगे। क्योंकि परमेश्वर की योजना मानवजाति का केवल इस बार सृजन करने और उसे केवल इस बार बचाने की है। यह पहली बार है और यही अंतिम बार भी है। इसलिए परमेश्वर इस बार मानवजाति को जिन श्रमसाध्य इरादों और उत्कट प्रत्याशा से बचाता है, उन्हें कोई नहीं समझ सकता।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर मनुष्य के जीवन का स्रोत है