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507 परमेश्वर मनुष्य की सच्ची आज्ञाकारिता चाहता है

1 परमेश्वर लोगों को उनकी आज्ञाकारिता के माध्यम से, परमेश्वर के वचन को उनके द्वारा खाए, पीए एवं उसका आनन्द उठाए जाने के माध्यम से, और उनके जीवन में कष्ट एवं शुद्धिकरण के माध्यम से पूर्ण बनाता है। केवल इस तरह के विश्वास के माध्यम से ही लोगों का स्वभाव परिवर्तित हो सकता है, केवल तभी वे परमेश्वर के सच्चे ज्ञान को धारण कर सकते हैं। परमेश्वर के अनुग्रहों के बीच रह कर सन्तुष्ट न होना, सत्य के लिए सक्रियता से प्यासे होना, और सत्य की खोज करना, और परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जाने की खोज करना—सचेतनता से परमेश्वर की आज्ञा मानने का यही अर्थ है; यह ठीक उसी प्रकार का विश्वास है जो परमेश्वर चाहता है। जो लोग परमेश्वर के अनुग्रहों का आनन्द उठाने से अधिक और कुछ नहीं करते हैं, वे पूर्ण नहीं बनाए जा सकते हैं, या परिवर्तित नहीं किए जा सकते हैं, और उनकी आज्ञाकारिता, धर्मनिष्ठता, और प्रेम तथा धैर्य सभी सतही हैं। जो लोग केवल परमेश्वर के अनुग्रहों का आनन्द लेते हैं, वे वास्तव में परमेश्वर को नहीं जान सकते हैं, और यहाँ तक कि जब वे परमेश्वर को जान जाते हैं, तब भी उनका ज्ञान उथला होता है, और वे ऐसी बातें कहते हैं जैसे कि परमेश्वर मनुष्य से प्रेम करता है, या परमेश्वर मनुष्य के प्रति करुणामय है। यह मनुष्य के जीवन का प्रतिनिधित्व नहीं करता है, और यह नहीं दिखाता है कि लोग सचमुच में परमेश्वर को जानते हैं।

2 यदि, जब परमेश्वर के वचन उन्हें शुद्ध करते हैं, या जब परमेश्वर के परीक्षण उन पर आते हैं, तो लोग परमेश्वर की आज्ञा मानने में असमर्थ होते हैं—उसके बजाए, यदि वे सन्देहास्पद हो जाते हैं, और नीचे गिर जाते हैं—तो वे न्यूनतम आज्ञाकारी भी नहीं रहते हैं। उनके भीतर, परमेश्वर के विश्वास के बारे में बहुत सारे नियम और प्रतिबंध हैं, पुराने अनुभव हैं जो कई वर्षों के विश्वास के परिणामस्वरूप हैं, या बाइबल पर आधारित विभिन्न सिद्धांत हैं। क्या इस प्रकार के लोग परमेश्वर का आज्ञापालन कर सकते हैं? ये लोग मानवीय चीज़ों से भरे हुए हैं—वे परमेश्वर का आज्ञापालन कैसे कर सकते हैं? वे सभी अपनी व्यक्तिगत प्राथमिकताओं के अनुसार आज्ञापालन करते हैं—क्या परमेश्वर इस तरह की आज्ञाकारिता की इच्छा कर सकता है? यह परमेश्वर का आज्ञापालन करना नहीं है, बल्कि सिद्धांतों पर अटल रहना है, यह अपने आपको सन्तुष्ट करना और सांत्वना देना है। यदि तुम कहते हो कि यह परमेश्वर का आज्ञापालन है, तो क्या तुम उसका तिरस्कार नहीं करते हो? तुम एक मिस्री फिरौन हो, तुम दुष्टता करते हो, तुम स्पष्ट रूप से परमेश्वर का विरोध करने के काम में संलग्न रहते हो—क्या परमेश्वर इस तरह की सेवा चाह सकता है? तुम्हारे लिए सबसे अच्छा होगा कि शीघ्रता करो और पश्चाताप करो और कुछ आत्म-जागरूकता रखो। तुम हस्तक्षेप नहीं करोगे और विघ्न नहीं ड़ालोगे, तुम अपनी जगह को जानोगे, इस तरह से तुम परमेश्वर का विरोध करने और दण्डित किए जाने से बच जाओगे!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर में अपने विश्वास में तुम्हें परमेश्वर की आज्ञाओं का पालन करना चाहिए" से रूपांतरित

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