10.5. ईमानदार व्यक्ति कैसे बनें पर

384. तुम लोगों को पता होना चाहिए कि परमेश्वर उन लोगों को पसंद करता है जो ईमानदार हैं। परमेश्वर के पास विश्वासयोग्यता का सार है, अतः उसके वचनों पर हमेशा भरोसा किया जा सकता है; इसके अतिरिक्त, उसके क्रियाकलाप दोषरहित और निर्विवाद हैं। यही कारण है कि परमेश्वर उन लोगों को पसंद करता है जो उसके साथ पूरी तरह से ईमानदार होते हैं। ईमानदारी का अर्थ है अपना हृदय परमेश्वर को अर्पित करना; किसी भी बात में परमेश्वर के प्रति झूठा न होना; हर बात में उसके साथ खुलापन रखना, कभी तथ्यों को न छुपाना; अपने से ऊपर वाले लोगों को कभी भी धोखा देने की कोशिश न करना और अपने से नीचे वालों से चीजें न छिपाना और ऐसी चीजें न करना जो मात्र परमेश्वर की चापलूसी करने की कोशिशें हों। संक्षेप में, ईमानदार होने का अर्थ है अपने क्रियाकलापों और शब्दों में शुद्ध होना, न तो परमेश्वर को और न ही इंसान को धोखा देना। मैं जो कहता हूँ वह बहुत सरल है, किंतु तुम लोगों के लिए यह दोगुना मुश्किल है। बहुत-से लोग ईमानदारी से बोलने और कार्य करने के बजाय नरक में डाले जाना पसंद करेंगे। इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि जो बेईमान हैं उनसे निपटने के लिए मेरे पास अन्य तरीके भी तैयार हैं। बेशक मैं अच्छी तरह से जानता हूँ कि तुम लोगों के लिए ईमानदार लोग होना कितना मुश्किल है। चूँकि तुम सभी बहुत “चतुर” हो, अपनी घटिया मानसिकता के आधार पर, उच्च नैतिक चरित्र वाले लोगों के हृदय का मूल्यांकन करने में बहुत अच्छे हो, इससे मेरा कार्य और आसान हो जाता है। और चूँकि तुममें से हरेक अपने भेदों को अपने सीने में भींचकर रखता है, तो ठीक है, मैं तुम लोगों को एक-एक करके आपदा में डाल दूँगा जिससे कि अग्नि तुम्हें “सबक सिखाए,” ताकि उसके बाद तुम मेरे वचनों पर अडिग विश्वास रखने लगो। अंततः, मैं तुम लोगों के मुँह से ये शब्द निकलवा लूँगा—“परमेश्वर एक विश्वासयोग्य परमेश्वर है,” तब तुम लोग अपनी छाती पीटोगे और विलाप करोगे, “इंसान का हृदय कितना कपटी है!” उस समय तुम्हारी मनोस्थिति क्या होगी? निश्चित रूप से तुम घमंड में उतना नहीं बहोगे जितना तुम अभी बहते हो! और तुम लोग अब की तुलना में इतने “गहन और गूढ़” तो और भी कम होगे। कुछ लोग परमेश्वर की उपस्थिति में नियम-निष्ठ और उचित शैली में व्यवहार करते हैं, वे विशेष रूप से “शिष्ट व्यवहार” करते हैं, फिर भी आत्मा की उपस्थिति में वे अपने दाँत और पंजे दिखाने लगते हैं। क्या तुम लोग ऐसे इंसानों को ईमानदार लोगों की श्रेणी में गिनोगे? यदि तुम पाखंडी और ऐसे व्यक्ति हो जो “व्यक्तिगत संबंधों” में कुशल है तो मैं कहता हूँ कि तुम निश्चित रूप से ऐसे व्यक्ति हो जो परमेश्वर से खिलवाड़ करने का प्रयास करता है। यदि तुम्हारी बातें बहानों और बेकार तर्कों से भरी हैं, तो मैं कहता हूँ कि तुम ऐसे व्यक्ति हो जो सत्य का अभ्यास करने में अनिच्छुक है। यदि तुम्हारे पास ऐसे बहुत-से निजी मामले हैं जिनके बारे में बात करना मुश्किल है, और यदि तुम प्रकाश के मार्ग की खोज करने के लिए दूसरों के सामने अपने रहस्य यानी अपनी कठिनाइयाँ उजागर करना नहीं चाहते हो, तो मैं कहता हूँ कि तुम्हें उद्धार प्राप्त करने में बड़ी मुश्किल आएगी और तुम्हें अंधकार से बाहर निकलने में कठिनाई होगी। यदि तुम सत्य का मार्ग खोजने में आनंदित होते हो तो तुम सदैव प्रकाश में रहने वाले व्यक्ति हो। यदि तुम परमेश्वर के घर में सेवाकर्मी बने रहकर बहुत प्रसन्न हो, गुमनाम बनकर कर्मठतापूर्वक और कर्तव्यनिष्ठता से काम करते हो, हमेशा देते हो, और कभी लेते नहीं, तो मैं कहता हूँ कि तुम एक वफादार संत हो, क्योंकि तुम्हें किसी पारिश्रमिक की अपेक्षा नहीं है, तुम बस एक ईमानदार इंसान हो। यदि तुम स्पष्टवादी बनने को तैयार हो, अपना सर्वस्व खपाने को तैयार हो, यदि तुम परमेश्वर के लिए अपना जीवन दे सकते हो और दृढ़ता से अपनी गवाही दे सकते हो, यदि तुम इस स्तर तक ईमानदार हो जहाँ तुम्हें केवल परमेश्वर को संतुष्ट करना आता है, और अपने बारे में विचार नहीं करते हो या अपने लिए कुछ नहीं लेते हो, तो मैं कहता हूँ कि तुम जैसे लोग वे हैं जो प्रकाश में पोषित किए जाते हैं और वे सदा राज्य में रहेंगे।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, तीन चेतावनियाँ

385. मैं सचमुच उन लोगों की सराहना करता हूँ जो दूसरों पर शक नहीं करते, और मैं सचमुच उन लोगों को पसंद करता हूँ जो सत्य स्वीकारने के लिए तैयार रहते हैं; इन दो प्रकार के लोगों की मैं बहुत परवाह करता हूँ, क्योंकि मेरी नज़र में ये ईमानदार लोग हैं। यदि तुम बहुत धोखेबाज हो, तो तुम सभी लोगों और मामलों के प्रति सतर्क और शंकित रहोगे; इस प्रकार मुझमें तुम्हारी आस्था संदेह की नींव पर निर्मित होगी। मैं इस तरह की आस्था को कभी स्वीकार नहीं कर सकता। सच्चे विश्वास के अभाव में तुम सच्चे प्यार से और भी अधिक वंचित हो। और यदि तुम परमेश्वर पर संदेह भी कर सकते हो और उसके बारे में मनमाने ढंग से अनुमान लगा सकते हो, तो तुम यकीनन सभी लोगों में सबसे अधिक धोखेबाज हो। तुम अनुमान लगाते हो कि क्या परमेश्वर मनुष्य जैसा हो सकता है : अक्षम्य रूप से पापी, क्षुद्र, निष्पक्षता और तर्कसंगतता से विहीन, न्याय की भावना से रहित, कुटिल चालें चलने वाला, कपटी और धूर्त, बुराई और अंधकार में खुश होने वाला, आदि-आदि। क्या लोगों के ऐसे विचारों का कारण यह नहीं है कि उन्हें परमेश्वर का थोड़ा-सा भी ज्ञान नहीं है? ऐसा विश्वास पाप से कम नहीं है! कुछ लोग तो यह तक मानते हैं कि मुझे सिर्फ वही लोग पसंद हैं जो चापलूसी करना और तलवे चाटना जानते हैं और जो लोग ऐसा करना नहीं जानते, वे परमेश्वर के घर में अवांछनीय होंगे और वे वहाँ अपना स्थान खो देंगे। क्या तुम लोगों ने इतने बरसों में बस यही ज्ञान हासिल किया है? क्या तुम लोगों ने यही प्राप्त किया है? और मेरे बारे में तुम लोगों का ज्ञान इन गलतफहमियों पर ही नहीं रुकता; परमेश्वर के आत्मा के खिलाफ तुम्हारी निंदा और स्वर्ग की बदनामी इससे भी बुरी बात है। इसीलिए मैं कहता हूँ कि ऐसी आस्था तुम लोगों को केवल मुझसे दूर भटकाएगी और मेरे प्रति शत्रुता और बढ़ा देगी।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, पृथ्वी के परमेश्वर को वास्तव में कैसे जानें

386. आज, अधिकांश लोग अपने कृत्यों को परमेश्वर के सम्मुख लाने से डरते हैं; तू परमेश्वर की देह को तो धोखा दे सकता है, परन्तु उसके आत्मा को धोखा नहीं दे सकता है। जो भी मामला परमेश्वर की जाँच-पड़ताल का सामना नहीं कर सकता है वह सत्य के अनुरूप नहीं है और उसे दरकिनार कर देना चाहिए; ऐसा न करना परमेश्वर को नाराज करना है। इसलिए तू चाहे अपने भाई-बहनों के साथ प्रार्थना, बातचीत और संगति कर रहा है या अपना कर्तव्य निभा रहा है और चीजों को कर रहा है, तुझे अपना हृदय परमेश्वर के सम्मुख खोलकर अवश्य रख देना चाहिए। जब तू अपना कार्य पूरा करता है, तो परमेश्वर तेरे साथ होता है, और जब तक तेरा इरादा सही है और परमेश्वर के घर के कार्य के लिए है, तब तक जो कुछ भी तू करेगा, परमेश्वर उसे स्वीकार करेगा; तुझे अपने कार्य को दिल से पूरा करना चाहिए। जब तू प्रार्थना करता है तो तेरे पास परमेश्वर-प्रेमी हृदय होना चाहिए और तुझे परमेश्वर की देखरेख, सुरक्षा और जाँच-पड़ताल खोजनी चाहिए। अगर तेरे ये इरादे हैं, तो तेरी प्रार्थनाएँ फलेंगी। उदाहरण के लिए, जब तू सभाओं में प्रार्थना करता है, यदि तू अपना हृदय खोलता है और परमेश्वर से प्रार्थना करता है और झूठ बोले बिना परमेश्वर को बताता है कि तेरे हृदय में क्या है, तब तेरी प्रार्थनाएँ निश्चित रूप से प्रभावी होंगी। ...

परमेश्वर के विश्वासी होने के नाते तुम्हें अपने सारे कर्म और क्रियाकलाप उसके सामने लाने और उसकी जाँच-पड़ताल स्वीकार करने में सक्षम होना चाहिए। यदि तुम जो कुछ भी करते हो वह परमेश्वर के आत्मा के सम्मुख लाया जा सकता है, लेकिन परमेश्वर की देह के सम्मुख नहीं लाया जा सकता है तो यह दर्शाता है कि तुमने उसके आत्मा की जाँच-पड़ताल स्वीकार नहीं की है। परमेश्वर का आत्मा कौन है? वह व्यक्ति कौन है जिसकी गवाही परमेश्वर देता है? क्या वे एक और एक ही समान नहीं हैं? अधिकतर उन्हें दो अलग अस्तित्वों के रूप में देखते हैं, विश्वास करते हैं कि परमेश्वर का आत्मा तो परमेश्वर का आत्मा है और परमेश्वर जिसकी गवाही देता है वह मात्र एक मानव है। लेकिन क्या तुम गलत नहीं हो? किसकी ओर से यह व्यक्ति काम करता है? जो लोग देहधारी परमेश्वर को नहीं जानते, उनके पास आध्यात्मिक समझ नहीं होती है। परमेश्वर का आत्मा और उसका देहधारी देह एक ही हैं, क्योंकि परमेश्वर का आत्मा देह रूप में प्रकट हुआ है। यदि यह व्यक्ति तुम्हारे प्रति निर्दयी है, तो क्या परमेश्वर का आत्मा दयालु होगा? क्या तुम भ्रमित नहीं हो? आज, जो कोई भी परमेश्वर की जाँच-पड़ताल को स्वीकार नहीं कर सकता है, वह परमेश्वर की स्वीकृति नहीं पा सकता है, और जो देहधारी परमेश्वर को न जानता हो, उसे पूर्ण नहीं बनाया जा सकता। तुम जो कुछ भी करते हो उसे देखो और यह देखो कि क्या यह परमेश्वर के सम्मुख लाया जा सकता है कि नहीं। यदि तुम जो कुछ भी करते हो उसे परमेश्वर के सम्मुख नहीं ला सकते हो तो यह दर्शाता है कि तुम एक कुकर्मी हो। क्या कुकर्मियों को पूर्ण बनाया जा सकता है? तुम जो कुछ भी करते हो, हर क्रियाकलाप, हर इरादा और हर प्रतिक्रिया, अवश्य ही परमेश्वर के सम्मुख लाई जानी चाहिए। इसका मतलब है कि तुम्हारे दैनिक आध्यात्मिक जीवन की हर चीज—प्रार्थना करना, परमेश्वर के करीब आना, परमेश्वर के वचन खाना और पीना, अपने भाइयों और बहनों के साथ संगति करना और कलीसियाई जीवन जीना—से लेकर दूसरों के साथ सहयोग में की जाने वाली तुम्हारी सेवा तक, सब कुछ परमेश्वर के सामने उसकी जाँच-पड़ताल के लिए लाया जाना चाहिए। यह ऐसा अभ्यास है, जो तुम्हें जीवन में संवृद्धि हासिल करने में मदद करेगा। परमेश्वर की जाँच-पड़ताल को स्वीकार करने की प्रक्रिया शुद्धिकरण की प्रक्रिया है। तुम परमेश्वर की जाँच-पड़ताल को जितना अधिक स्वीकार करते हो, तुम उतने ही अधिक शुद्ध होते जाते हो और तुम उतने ही अधिक परमेश्वर के इरादों के अनुरूप होते जाते हो, ताकि तुम असंयमता में न गिरो और तुम्हारा हृदय उसकी उपस्थिति में जी पाए। जितना तुम उसकी जाँच-पड़ताल को स्वीकार करते हो, शैतान उतना ही लज्जित होता है और उतना ही अधिक तुम देह के खिलाफ विद्रोह करने में सक्षम होते हो। इसलिए, परमेश्वर की जाँच-पड़ताल को स्वीकार करना अभ्यास का वह मार्ग है जिसका सभी को अनुसरण करना चाहिए। चाहे तुम जो भी करो, यहाँ तक कि अपने भाई-बहनों के साथ संगति करते हुए भी, तुम्हें अपने कर्म परमेश्वर के सम्मुख लाने चाहिए और उसकी जाँच-पड़ताल खोजनी चाहिए और तुम्हें उद्देश्यपूर्ण ढंग से स्वयं परमेश्वर के प्रति समर्पण करना चाहिए; यह तुम्हारे अभ्यास को और अधिक सटीक बना देगा। केवल जब तुम जो कुछ भी करते हो वह सब कुछ परमेश्वर के सम्मुख लाते हो और परमेश्वर की जाँच-पड़ताल को स्वीकार करते हो, तभी तुम ऐसे व्यक्ति हो सकते हो जो परमेश्वर की उपस्थिति में जीता है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर उन्हें पूर्ण बनाता है, जो उसके इरादों के अनुरूप हैं

387. जब कुछ लोग यह सुनते हैं कि ईमानदार बनने के लिए सत्य बोलना चाहिए और दिल की बात कहनी चाहिए और अगर वे झूठ बोलें या धोखा दें तो उन्हें खुलकर बताना चाहिए, खुद को उजागर करना चाहिए और अपनी गलती मान लेनी चाहिए, तो वे कहते हैं : “एक ईमानदार व्यक्ति होना कठिन है। क्या मुझे हर वह चीज दूसरों को बता देनी चाहिए जो मैं सोचता हूँ? क्या सिर्फ सकारात्मक चीजों पर संगति करना काफी नहीं है? मुझे दूसरों को अपने काले या भ्रष्ट हिस्से के बारे में बताने की जरूरत नहीं है, है न?” अगर तुम खुद को दूसरों के सामने खोलकर पेश नहीं करते, और अपना विश्लेषण नहीं करते, तो तुम कभी खुद को नहीं जान पाओगे। तुम कभी नहीं पहचानोगे कि तुम किस किस्म की चीज हो, और दूसरे तुम पर कभी भरोसा नहीं कर पाएँगे। यह एक तथ्य है। अगर तुम चाहते हो कि दूसरे तुम पर भरोसा करें, तो पहले तुम्हें एक ईमानदार व्यक्ति होना चाहिए। ईमानदार व्यक्ति होने के लिए तुम्हें पहले अपना दिल खोलकर रखना चाहिए ताकि सभी उसके भीतर झाँक सकें, तुम्हारी सोच और तुम्हारा असली चेहरा देख सकें। तुम्हें भेस बदलने की कोशिश नहीं करनी चाहिए, या खुद को छिपाना नहीं चाहिए। तभी दूसरे तुम पर भरोसा करेंगे, और तुम्हें ईमानदार व्यक्ति मानेंगे। यह सबसे बुनियादी अभ्यास है और ईमानदार व्यक्ति बनने की पहली शर्त है। यदि तुम हमेशा ढोंग करते हो, हमेशा पवित्रता, श्रेष्ठता, महानता और ऊँचे चरित्र का दिखावा करते हो, दूसरों से अपनी भ्रष्टता और खामियों को छिपाते हो, उनके सामने एक झूठी छवि पेश करते हो और उन्हें यह विश्वास दिलाते हो कि तुम ईमानदार, महान, आत्म-त्यागी, न्यायसंगत और निस्वार्थी हो—तो क्या इसमें कपट और छल नहीं है? समय बीतने के साथ, क्या लोग तुम्हारी असलियत नहीं जान पाएँगे? इसलिए, पाखंडी मत बनो या दिखावा मत करो। बल्कि सरल और निष्कपट बनो, और खुद को खोलकर रख देना सीखो—अपना दिल खोलकर दूसरों को देखने दो। यदि तुम अपने सभी विचारों और उन सभी चीजों को जो तुम करना चाहते हो—चाहे वे सकारात्मक हों या नकारात्मक—दूसरों के देखने के लिए खोलकर रख सकते हो तो क्या तुम ईमानदार नहीं हो रहे हो? जब तुम खुद को दूसरों के देखने के लिए खोलकर रख देते हो तो परमेश्वर तुम्हें देख रहा होता है। वह कहेगा, “चूँकि तुमने खुद को दूसरों के देखने के लिए खोलकर रख दिया है, तो तुम निश्चित रूप से मेरे सामने भी ईमानदार हो।” लेकिन अगर तुम केवल गुप्त रूप से परमेश्वर के सामने खुद को खोलकर रखते हो, फिर भी दूसरों के सामने हमेशा महान, श्रेष्ठ और स्वार्थहीन होने का ढोंग करते हो तो परमेश्वर तुम्हारे बारे में क्या सोचेगा? वह क्या कहेगा? वह कहेगा, “तुम पूरी तरह से एक धोखेबाज व्यक्ति हो। तुम एक नंबर के पाखंडी और बदमाश हो और तुम एक ईमानदार व्यक्ति नहीं हो।” परमेश्वर तुम्हें इस तरह से दोषी ठहराएगा। एक ईमानदार व्यक्ति होने का अर्थ यह है कि चाहे तुम परमेश्वर के सामने हो या दूसरे लोगों के सामने, तुम अपनी आंतरिक दशा और अपने दिल की बातों को लेकर शुद्ध और सरल तरीके से खुल सकते हो। क्या यह करना आसान है? इसके लिए कुछ समय तक प्रशिक्षण की आवश्यकता होती है, साथ ही बार-बार प्रार्थना करने और परमेश्वर पर निर्भर रहने की भी। तुम्हें सभी मामलों में अपने दिल की बातों को सरल और खुले तौर पर बोलने के लिए खुद को अभ्यस्त अवश्य करना चाहिए। इस तरह के प्रशिक्षण से तुम प्रगति कर सकते हो। यदि तुम्हें कोई बड़ी कठिनाई आती है तो तुम्हें अवश्य परमेश्वर से प्रार्थना करनी चाहिए और सत्य खोजना चाहिए; तुम्हें तब तक अपने दिल में संघर्ष करना होगा और देह पर विजय पानी होगी, जब तक कि तुम सत्य को अभ्यास में लाने में समर्थ नहीं हो जाते। इस तरह से धीरे-धीरे खुद को प्रशिक्षित करके, तुम्हारा दिल धीरे-धीरे खुल जाएगा। तुम अधिकाधिक शुद्ध और सरल होते जाओगे और तुम्हारे शब्दों और क्रियाकलापों का पहले की तुलना में एक अलग प्रभाव होगा। तुम उत्तरोत्तर कम झूठ बोलोगे और धोखा दोगे और तुम परमेश्वर के सामने जीने में सक्षम होगे। तब तुम मूलतः एक ईमानदार व्यक्ति बन चुके होगे।

—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, एक ईमानदार व्यक्ति होने का सबसे बुनियादी अभ्यास

388. तुम्हारा गंतव्य और तुम्हारी नियति तुम लोगों के लिए बहुत अहम हैं—उनका तुम लोगों पर बहुत असर होता है। तुम मानते हो कि अगर तुम लोग अत्यंत सावधानी से चीजें नहीं करते, तो इसका अर्थ यह होगा कि अब तुम्हारा कोई गंतव्य नहीं रह जाएगा, कि तुमने अपना भाग्य बर्बाद कर लिया है। लेकिन क्या तुम लोगों ने कभी यह सोचा है कि अगर लोग मात्र अपने गंतव्य के लिए प्रयास करते हैं, तो वे व्यर्थ ही कड़ी मेहनत कर रहे हैं? ऐसे प्रयास सच्चे नहीं हैं—वे नकली हैं, धोखा हैं। यदि ऐसा है, तो जो लोग केवल अपने गंतव्य के लिए प्रयास करते हैं, वे अपनी अंतिम पराजय की दहलीज पर हैं, क्योंकि परमेश्वर में व्यक्ति के विश्वास की विफलता धोखे के कारण होती है। मैं पहले कह चुका हूँ कि मुझे चाटुकारिता, खुशामद या उत्साहपूर्ण ढंग से व्यवहार किया जाना पसंद नहीं है। मुझे पसंद है कि ईमानदार लोग मेरे सत्य और अपेक्षाओं का सामना कर सकें। इससे भी अधिक मुझे तब अच्छा लगता है, जब लोग पूरी बारीकी से मेरे हृदय के प्रति विचारशील होते हैं, और जब वे मेरी खातिर सब कुछ खपाने तक में सक्षम होते हैं। केवल इसी तरह से मेरे हृदय को सुकून मिल सकता है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, गंतव्य के बारे में

389. सत्य का अनुसरण करने के लिए हमें सत्य का अभ्यास करने पर ध्यान देना चाहिए, लेकिन सत्य का अभ्यास कहाँ से शुरू किया जाए? इसके लिए कोई विनियम नहीं हैं। तुम सत्य के जिस किसी पहलू को समझते हो, उसका अभ्यास करना चाहिए। अगर तुम कर्तव्य निभाना शुरू कर चुके हो, तो अपने कर्तव्य पालन में सत्य का अभ्यास करना शुरू कर दो। अपना कर्तव्य निभाते हुए सत्य का अभ्यास करने के लिए कई पहलू होते हैं, और तुम जिस किसी पहलू को समझते हो उसका अभ्यास करना चाहिए। उदाहरण के लिए, तुम ईमानदार इंसान बनकर, ईमानदारी से बात करके और अपना दिल खोलकर शुरुआत कर सकते हो। अगर ऐसी कोई बात है जिस पर अपने भाई-बहनों से चर्चा करते हुए तुमको शर्म आती है, तो तुम्हें परमेश्वर के आगे घुटनों के बल झुककर प्रार्थना के माध्यम से उससे अपनी बात कह देनी चाहिए। तुमको परमेश्वर से क्या कहना चाहिए? तुम परमेश्वर से अपने दिल की बात कहो। तुम उनसे खुश करने वाली औपचारिक बातें न करो या उन्हें धोखा देने की कोशिश न करो। ईमानदार होने से शुरुआत करो। अगर तुम दुर्बल रहे हो, तो कहो कि तुम दुर्बल रहे हो; अगर तुम दुष्ट रहे हो, तो कहो कि तुम दुष्ट रहे हो; अगर कपटी रहे हो, तो कहो कि तुम कपटी रहे हो; अगर तुम्हारे मन में दुर्भावनापूर्ण और कपटी विचार आए हैं, तो उनके बारे में परमेश्वर को बताओ। अगर तुम हमेशा पद के लिए प्रतिस्पर्धा करते रहते हो, तो उसे यह भी बताओ। परमेश्वर को तुम्हें अनुशासित करने दो; उसे तुम्हारे लिए परिवेशों का इंतजाम करने दो। परमेश्वर को अनुमति दो कि वह तमाम मुश्किलें पार करने और सारी समस्याएँ दूर करने में तुम्हारी मदद करे। तुम्हें परमेश्वर के सामने अपना दिल खोल देना चाहिए; उसे बंद न रखो। अगर तुम परमेश्वर के लिए अपने दिल के दरवाजे बंद भी कर देते हो, तो भी वह तुम्हारी पड़ताल कर सकता है। लेकिन अगर तुम उसके सामने अपना दिल खोलते हो, तो तुम सत्य को प्राप्त कर सकते हो। तो तुम्हें कौन-सा मार्ग चुनना चाहिए? तुम्हें अपना दिल खोलकर परमेश्वर से अपने दिल की बात कहनी चाहिए। किसी भी तरीके से तुम्हें कोई झूठी बात नहीं कहनी चाहिए या खुद को छिपाना नहीं चाहिए। तुम्हें ईमानदार इंसान बनकर शुरुआत करनी चाहिए। बरसों से हम ईमानदार इंसान बनने संबंधी सत्य पर संगति करते आ रहे हैं, फिर भी अभी तक ऐसे अनेक लोग हैं जो इसके प्रति उदासीन बने हुए हैं जो सिर्फ अपनी मंशाओं, इच्छाओं और लक्ष्यों के अनुरूप बोलते और काम करते हैं और जिन्होंने कभी भी पश्चात्ताप करने की नहीं सोची है। यह ईमानदार लोगों का रवैया नहीं है। परमेश्वर लोगों से ईमानदार होने की अपेक्षा क्यों करता है? क्या इसका उद्देश्य लोगों पर नियंत्रण बनाना है? बेशक नहीं। परमेश्वर लोगों को ईमानदार बनने को इसलिए कहता है क्योंकि वह ईमानदार लोगों से प्रेम करता है और उन्हें आशीष देता है। ईमानदार व्यक्ति होने का अर्थ है अंतरात्मा और विवेक युक्त व्यक्ति होना। इसका अर्थ है भरोसेमंद होना, ऐसा व्यक्ति जिससे परमेश्वर प्रेम करता है, और जो सत्य का अभ्यास और परमेश्वर से प्रेम कर सके। ईमानदार व्यक्ति होना सामान्य मानवता होने और सच्चे मानव स्वरूप को जीने की सबसे मूल अभिव्यक्ति है। अगर कोई व्यक्ति कभी भी ईमानदार नहीं रहा या उसने ईमानदार बनने की नहीं सोची, तो फिर उसके लिए सत्य हासिल करना तो बहुत दूर रहा, वह सत्य को समझ भी नहीं सकता है। अगर तुम मुझ पर विश्वास नहीं करते, तो जाओ और खुद देख लो या जाओ और इसका खुद अनुभव कर लो। केवल ईमानदार व्यक्ति होने का अभ्यास करने से ही तुम्हारे दिल के द्वार परमेश्वर के लिए खुल पाएँगे, तुम सत्य स्वीकार कर पाओगे, सत्य तुम्हारे हृदय में तुम्हारा जीवन बन सकेगा और तुम सत्य को समझ और हासिल कर सकोगे। यदि तुम्हारा दिल हमेशा बंद रहता है, यदि तुम किसी के सामने नहीं खुलते या अपने दिल की बात नहीं कहते और कोई तुम्हारी थाह नहीं ले सकता, तो तुम्हारी छिपी हुई साजिश बहुत गहरी है और तुम लोगों में सबसे अधिक धोखेबाज हो। यदि तुम परमेश्वर में विश्वास करते हो, फिर भी परमेश्वर के प्रति सरल और खुले नहीं हो सकते, यदि तुम परमेश्वर से दिल की बात कहने में असमर्थ हो और फिर भी गोल-मोल बातें कर सकते हो और अपना छोटा-मोटा एजेंडा पाल सकते हो और यहाँ तक कि परमेश्वर से झूठ भी बोल सकते हो या उसे धोखा देने के लिए डींगें मार सकते हो, तो तुम खुद को नुकसान पहुँचाओगे और परमेश्वर तुम्हें नजरअंदाज कर देगा और तुममें कार्य नहीं करेगा। तुम न कोई सत्य समझ पाओगे, न कोई सत्य हासिल कर सकोगे। क्या तुम लोगों ने अब सत्य का अनुसरण करने और इसे हासिल करने का महत्व समझ लिया है? सत्य का अनुसरण करने के लिए तुम्हें पहला काम क्या करना चाहिए? तुम्हें ईमानदार व्यक्ति बनना चाहिए। यदि लोग ईमानदार होने का प्रयास करें, तभी वे जान सकते हैं कि वे कितनी बुरी तरह से भ्रष्ट हैं, उनमें वास्तव में मानव स्वरूप है या नहीं और वे अपनी असली स्थिति को स्पष्ट रूप से समझ सकते हैं और अपनी कमियों को देख सकते हैं। केवल ईमानदार होने का अभ्यास करने पर ही वे जागरूक हो सकते हैं कि वे कितने झूठ बोलते हैं और धोखेबाजी और कपट उनके अंदर कितनी गहराई में छिपे हैं। केवल ईमानदार होने का अभ्यास करने का अनुभव होने के जरिए ही वे धीरे-धीरे अपनी भ्रष्टता की सच्चाई को जान सकते हैं और अपने प्रकृति सार को पहचान सकते हैं और तभी उनका भ्रष्ट स्वभाव निरंतर शुद्ध हो सकेगा। अपने भ्रष्ट स्वभाव के निरंतर शुद्ध होते रहने के दौरान ही लोग सत्य पा सकते हैं। इन वचनों का अनुभव करने के लिए समय लो। परमेश्वर उन लोगों को पूर्ण नहीं बनाता है जो धोखेबाज हैं। अगर तुम्हारा हृदय ईमानदार नहीं है—अगर तुम ईमानदार व्यक्ति बनने का प्रयास नहीं करते हो, तो तुम परमेश्वर द्वारा प्राप्त नहीं किए जाओगे। इसी तरह, तुम कभी भी सत्य को प्राप्त नहीं कर पाओगे और न ही तुम परमेश्वर को प्राप्त कर पाओगे। परमेश्वर को न पाने का क्या अर्थ है? अगर तुम परमेश्वर को प्राप्त नहीं करते हो और तुम सत्य को नहीं समझते हो, तो तुम परमेश्वर को नहीं जानोगे और तुम्हारे पास परमेश्वर से सुसंगत होने का कोई रास्ता नहीं होगा, ऐसा हुआ तो तुम परमेश्वर के शत्रु हो। अगर तुम परमेश्वर से सुसंगत नहीं हो, तो परमेश्वर तुम्हारा परमेश्वर नहीं है; अगर परमेश्वर तुम्हारा परमेश्वर नहीं है, तो तुम्हें बचाया नहीं जा सकता। अगर तुम उद्धार प्राप्त करने का प्रयास नहीं करते, तो तुम परमेश्वर में विश्वास क्यों करते हो? अगर तुम उद्धार प्राप्त नहीं कर सकते, तो तुम हमेशा परमेश्वर के कट्टर शत्रु बनकर रहोगे और तुम्हारा परिणाम तय हो चुका होगा। इस प्रकार, अगर लोग चाहते हैं कि उन्हें बचाया जाए, तो उन्हें ईमानदार लोग बनना शुरू करना होगा। ऐसे लोग जिन्हें अंत में परमेश्वर द्वारा प्राप्त किया जाएगा, उनमें एक खास चिह्न होता है। क्या तुम लोग जानते हो कि वह क्या है? बाइबल में, प्रकाशितवाक्य में लिखा है : “उनके मुँह से कभी झूठ न निकला था, वे निर्दोष हैं” (प्रकाशितवाक्य 14:5)। कौन हैं “वे”? ये वे लोग हैं, जिन्हें परमेश्वर द्वारा बचाया, पूर्ण किया और प्राप्त किया जाता है। परमेश्वर उनका वर्णन कैसे करता है? उनके स्व-आचरण की विशेषताएँ और अभिव्यक्तियाँ क्या हैं? वे निर्दोष हैं। उनके मुँह से कोई झूठ नहीं निकलता। तुम सब लोग शायद समझ-बूझ और पकड़ सकते हो कि “कोई झूठ नहीं” का क्या अर्थ है : इसका अर्थ ईमानदार होना है। “निर्दोष” का क्या मतलब है? इसका मतलब है कोई बुराई न करना। और कोई बुराई न करना किस नींव पर निर्मित है? बिना किसी संदेह के, यह परमेश्वर का भय मानने की नींव पर निर्मित है। अतः दोषरहित होने का अर्थ है परमेश्वर का भय मानना और बुराई से दूर रहना। दोषरहित व्यक्ति को परमेश्वर कैसे परिभाषित करता है? परमेश्वर की दृष्टि में केवल वे ही पूर्ण हैं, जो परमेश्वर का भय मानते हैं और बुराई से दूर रहते हैं; इस प्रकार, दोषरहित लोग वे हैं जो परमेश्वर का भय मानते हैं और बुराई से दूर रहते हैं और केवल पूर्ण लोग ही दोषरहित हैं। यह बिल्कुल सही है।

—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, जीवन संवृद्धि के छह संकेतक

390. तुम्हें पता होना चाहिए कि क्या तुम्हारे भीतर सच्ची आस्था और सच्ची वफादारी है, क्या परमेश्वर के लिए कष्ट उठाने का तुम्हारा कोई इतिहास है और क्या तुम्हारे पास परमेश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण है। यदि तुममें ये चीजें नहीं हैं, तो तुम्हारे भीतर विद्रोहीपन, कपट, लालच और शिकायत अभी शेष हैं। चूँकि तुम्हारा हृदय ईमानदार नहीं है, इसलिए तुम्हें कभी भी परमेश्वर द्वारा सराहा नहीं गया है और तुम कभी भी प्रकाश में नहीं रहे हो। अंत में किसी व्यक्ति का भाग्य कैसा होगा, यह इस बात पर निर्भर करता है कि क्या उसके अंदर एक ईमानदार और रक्तिम हृदय है और क्या उसकी आत्मा शुद्ध है। यदि तुम ऐसे इंसान हो जो बहुत बेईमान है, जिसका हृदय अत्यन्त दुर्भावना से भरा है, जिसकी आत्मा अशुद्ध है, तो तुम अंत में निश्चित रूप से ऐसी जगह जाओगे जहाँ इंसान को दंड दिया जाता है, जैसा कि तुम्हारे भाग्य के अभिलेख में लिखा है। यदि तुम बहुत ईमानदार होने का दावा करते हो, मगर तुम कभी सत्य के अनुसार कार्य नहीं कर पाए हो या सत्य का एक शब्द भी नहीं बोल पाए हो, तो क्या तुम तब भी परमेश्वर से पुरस्कृत किए जाने की प्रतीक्षा कर रहे हो? क्या तुम तब भी परमेश्वर से आशा करते हो कि वह तुम्हें अपनी आँख का तारा समझे? क्या ऐसी सोच हास्यास्पद नहीं है? यदि तुम हर चीज में परमेश्वर को धोखा देते हो, तो परमेश्वर का घर तुम जैसे इंसान को, जिसके हाथ अशुद्ध हैं, जगह कैसे दे सकता है?

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, तीन चेतावनियाँ

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परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?

परमेश्वर का प्रकटन और कार्य परमेश्वर को जानने के बारे में अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन मसीह-विरोधियों को उजागर करना अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ सत्य के अनुसरण के बारे में सत्य के अनुसरण के बारे में न्याय परमेश्वर के घर से शुरू होता है अंत के दिनों के मसीह, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अत्यावश्यक वचन परमेश्वर के दैनिक वचन सत्य वास्तविकताएं जिनमें परमेश्वर के विश्वासियों को जरूर प्रवेश करना चाहिए मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ राज्य का सुसमाचार फ़ैलाने के लिए दिशानिर्देश परमेश्वर की भेड़ें परमेश्वर की आवाज को सुनती हैं परमेश्वर की आवाज़ सुनो परमेश्वर के प्रकटन को देखो राज्य के सुसमाचार पर अत्यावश्यक प्रश्न और उत्तर मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 1) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 2) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 3) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 4) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 5) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 6) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 7) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 8) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 9) मैं वापस सर्वशक्तिमान परमेश्वर के पास कैसे गया

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