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अध्याय 6 विभेदन के कई रूप जिन्हें परमेश्वर में तुम्हारे विश्वास में तुम्हें धारण करना चाहिए

4. सच्चे और झूठे मार्गों में, तथा सच्ची और झूठी कलीसियाओं में विभेदन

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

सच्चे मार्ग की तलाश करने में सबसे बुनियादी सिद्धान्त क्या है? तुम्हें देखना होगा कि क्या इस मार्ग में पवित्र आत्मा का कार्य है कि नहीं, क्या ये वचन सत्य की अभिव्यक्ति हैं या नहीं, किसके लिए गवाही देनी है, और यह तुम्हारे लिए क्या ला सकता है। सच्चे मार्ग और गलत मार्ग के मध्य अंतर करने के लिए बुनियादी ज्ञान के कई पहलुओं की आवश्यकता होती है, जिनमें सबसे बुनियादी है यह बताना कि क्या इसमें पवित्र आत्मा का कार्य है या नहीं। क्योंकि परमेश्वर पर विश्वास का मनुष्य का सार पवित्र आत्मा पर विश्वास है, और यहाँ तक कि देहधारी परमेश्वर पर उसका विश्वास इसलिए है क्योंकि यह देह परमेश्वर के आत्मा का मूर्तरूप है, जिसका अर्थ यह है कि ऐसा विश्वास पवित्र आत्मा पर विश्वास है। आत्मा और देह के मध्य अंतर हैं, परन्तु क्योंकि यह देह पवित्रात्मा से आता है और वचन देहधारी होता है, इसलिए मनुष्य जिस में विश्वास करता है वह अभी भी परमेश्वर का अन्तर्निहित सार है। और इसलिए, इस बात का विभेद करने में कि यह सच्चा मार्ग है या नहीं, सर्वोपरि तुम्हें यह अवश्य देखना चाहिए कि क्या इसमें पवित्र आत्मा का कार्य है या नहीं, जिसके बाद तुम्हें अवश्य देखना चाहिए कि क्या इस मार्ग में सत्य है अथवा नहीं। यह सत्य सामान्य मानवता का जीवन स्वभाव है, अर्थात्, वह जो मनुष्य से तब अपेक्षित था कि जब परमेश्वर ने आरंभ में उसका सृजन किया था, यानि, सभी सामान्य मानवता (मानवीय भावना, अंतर्दृष्टि, बुद्धि और मनुष्य होने का बुनियादी ज्ञान) है। अर्थात्, तुम्हें यह देखने की आवश्यकता है कि क्या यह मार्ग मनुष्य को एक सामान्य मानवता के जीवन में ले जा सकता है या नहीं, क्या बोला गया सत्य सामान्य मानवता की आवश्यकता के अनुसार अपेक्षित है या नहीं, क्या यह सत्य व्यवहारिक और वास्तविक है या नहीं, और क्या यह सबसे सही समय पर है या नहीं। यदि इसमें सत्य है, तो यह मनुष्य को सामान्य और वास्तविक अनुभवों में ले जाने में सक्षम है; इसके अलावा, मनुष्य हमेशा से अधिक सामान्य बन जाता है, मनुष्य का देह में जीवन और आध्यात्मिक जीवन हमेशा से अधिक व्यवस्थित हो जाता है, और मनुष्य की भावनाएँ हमेशा से और अधिक सामान्य हो जाती हैं। यह दूसरा सिद्धान्त है। एक अन्य सिद्धान्त है, जो यह है कि क्या मनुष्य के पास परमेश्वर का बढ़ता हुआ ज्ञान है या नहीं, क्या इस प्रकार के कार्य और सत्य का अनुभव करना उसमें परमेश्वर के लिए प्रेम को प्रेरित कर सकता है या नहीं, और उसे हमेशा से अधिक परमेश्वर के निकट ला सकता है या नहीं। इसमें यह मापा जा सकता है कि क्या यह सही मार्ग है अथवा नहीं। सबसे अधिक बुनियादी बात यह है कि क्या यह मार्ग अलौकिक के बजाए यर्थाथवादी है, और क्या यह मनुष्य का जीवन प्रदान करने में सक्षम है या नहीं। यदि यह इन सिद्धान्तों के अनुरूप है, तो निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि यह मार्ग सच्चा मार्ग है। मैं ये वचन तुम लोगों से तुम लोगों के भविष्य के अनुभवों में अन्य मार्गों को स्वीकार करवाने के लिए नहीं कहता हूँ, न ही किसी भविष्यवाणी के रूप में कहता हूँ कि भविष्य में एक अन्य नए युग का कार्य होगा। मैं इन्हें कहता हूँ ताकि तुम लोगों को निश्चित हो जाए कि आज का मार्ग ही सच्चा मार्ग है, ताकि आज के कार्य के प्रति तुम लोगों के विश्वास में तुम लोग केवल आधा-अधूरा ही निश्चित नहीं रहोगे और इसमें अंतर्दृष्टि प्राप्त करने में असमर्थ नहीं रहोगे। यहाँ ऐसे कई हैं जो, निश्चित होने के बावजूद, अभी भी भ्रम में अनुगमन करते हैं; ऐसी निश्चितता का कोई सिद्धान्त नहीं होता है, और इन्हें कभी न कभी अवश्य हटा दिया जाना चाहिए। यहाँ तक कि वे भी जो अपने अनुसरण में विशेष रूप से उत्साही हैं तीन भाग ही निश्चित हैं और पाँच भाग अनिश्चित हैं, जो दर्शाता है कि उनका कोई आधार नहीं है। क्योंकि तुम लोगों की क्षमता बहुत ही कमज़ोर है और तुम्हारा आधार बहुत ही सतही है, इसलिए तुम लोगों को विभेदन की समझ नहीं है। परमेश्वर अपने कार्य को दोहराता नहीं है, वह ऐसा कार्य नहीं करता है जो वास्तविक न हो, वह मनुष्यों से अत्याधिक अपेक्षाएँ नहीं रखता है और वह ऐसा कार्य नहीं करता है जो मनुष्यों की समझ से परे हो। वह जो कुछ भी कार्य करता है मनुष्य की सामान्य समझ के दायरे के भीतर है, और सामान्य मानवता की समझ से परे नहीं है, और उसका कार्य मनुष्य की सामान्य अपेक्षाओं के अनुसार है। यदि यह पवित्र आत्मा का कार्य है, तो मनुष्य हमेशा से अधिक सामान्य बन जाता है, और उसकी मानवता हमेशा से अधिक सामान्य बन जाती है। मनुष्य को अपने शैतानी स्वभाव का, और मनुष्य के सार का बढ़ता हुआ ज्ञान होता है, और उसकी सत्य के लिए हमेशा से अधिक ललक होती है। अर्थात्, मनुष्य का जीवन अधिकाधिक बढ़ता जाता है और मनुष्य का भ्रष्ट स्वभाव अधिकाधिक बदलावों में सक्षम हो जाता है—जिस सब का अर्थ है परमेश्वर का मनुष्य का जीवन बनना। यदि एक मार्ग उन चीजों को प्रकट करने में असमर्थ है जो मनुष्य का सार हैं, मनुष्य के स्वभाव को बदलने में असमर्थ है, और, इसके अलावा, उसे परमेश्वर के सामने लाने में असमर्थ है या उसे परमेश्वर की सच्ची समझ प्रदान कराने में असमर्थ है, और यहाँ तक कि उसकी मानवता का हमेशा से अधिक निम्न होने और उसकी भावना का हमेशा से अधिक असामान्य होने का कारण बनता है, तो यह मार्ग अवश्य सच्चा मार्ग नहीं होना चाहिए और यह दुष्टात्मा का कार्य, या पुराना मार्ग हो सकता है। संक्षेप में, यह पवित्र आत्मा का वर्तमान का कार्य नहीं हो सकता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "जो परमेश्वर को और उसके कार्य को जानते हैं केवल वे ही परमेश्वर को सन्तुष्ट कर सकते हैं" से उद्धृत

परमेश्वर के कार्य के प्रत्येक चरण में मनुष्य से तद्नुरूपी अपेक्षाएँ भी होती हैं। जो पवित्र आत्मा की धारा के भीतर हैं वे सभी पवित्र आत्मा की उपस्थिति और अनुशासन के अधीन हैं, और जो पवित्र आत्मा की मुख्य धारा में नहीं हैं वे शैतान के नियन्त्रण में हैं, और वे पवित्र आत्मा के किसी भी कार्य से रहित हैं। जो लोग पवित्र आत्मा की धारा में हैं ये वे लोग हैं जो परमेश्वर के नए कार्य को स्वीकार करते हैं, ऐसे लोग हैं जो परमेश्वर के नए कार्य में सहयोग करते हैं। यदि इस मुख्य धारा के लोग सहयोग करने में अक्षम रहते हैं, और इस समय के दौरान परमेश्वर के द्वारा अपेक्षित सत्य का अभ्यास करने में असमर्थ रहते हैं, तो उन्हें अनुशासित किया जाएगा, और बहुत खराब स्थिति में उन्हें पवित्र आत्मा के द्वारा छोड़ दिया जाएगा। जो पवित्र आत्मा के नए कार्य को स्वीकार करते हैं, वे पवित्र आत्मा की मुख्य धारा में जीवन बिताएँगे, पवित्र आत्मा की देखभाल और सुरक्षा प्राप्त करेंगे। जो लोग सत्य को अभ्यास रूप में लाने के इच्छुक हैं उन्हें पवित्र आत्मा द्वारा प्रबुद्ध किया जाता है, और जो लोग सत्य को अभ्यास में लाने के अनिच्छुक हैं, उन्हें पवित्र आत्मा के द्वारा अनुशासित किया जाता है, और यहाँ तक कि उन्हें दण्ड भी दिया जा सकता है। इस बात की परवाह न करते हुए कि वे किस प्रकार के व्यक्ति हैं, बशर्ते कि वे पवित्र आत्मा की मुख्य धारा के भीतर हों, परमेश्वर उन सभी लोगों की ज़िम्मेदारी लेगा जो उसके नाम के वास्ते उसके नए कार्य को स्वीकार करते हैं। जो लोग उसके नाम की महिमा करते हैं और उसके वचनों को अभ्यास में लाने के इच्छुक हैं वे उसके आशीषों को प्राप्त करेंगे; जो लोग उसकी अवज्ञा करते हैं और उसके वचनों को अभ्यास में नहीं लाते हैं वे उसके दण्ड को प्राप्त करेंगे। जो लोग पवित्र आत्मा की मुख्य धारा में हैं वे ऐसे लोग हैं जो नए कार्य को स्वीकार करते हैं, और चूँकि उन्होंने उस नए कार्य को स्वीकार कर लिया है, तो उनका परमेश्वर के साथ उचित सहयोग होना चाहिए, और उन्हें ऐसे विद्रोहियों के समान कार्य नहीं करना चाहिए जो अपने कर्तव्य को नहीं निभाते हैं। यह मनुष्य से की गई परमेश्वर की एकमात्र अपेक्षा है। यह उन लोगों के लिए नहीं है जो नए कार्य को स्वीकार नहीं करते हैं: वे पवित्र आत्मा की धारा से बाहर हैं, और पवित्र आत्मा का अनुशासन और झिड़की उन पर लागू नहीं होते हैं। पूरा दिन, ये लोग देह में जीवन बिताते रहते हैं, वे अपने मन के भीतर जीवन बिताते हैं, और वे जो कुछ भी करते हैं वह सब उनके स्वयं के मस्तिष्क के विश्लेषण और अनुसंधान के द्वारा उत्पन्न हुए सिद्धान्त के अनुसार होता है। यह पवित्र आत्मा के नए कार्य की अपेक्षाएँ नहीं हैं, और यह परमेश्वर के साथ सहयोग तो बिलकुल भी नहीं है। जो लोग परमेश्वर के नए कार्य को स्वीकार नहीं करते हैं वे परमेश्वर की उपस्थिति से वंचित रहते हैं, और, इसके अतिरिक्त, वे परमेश्वर के आशीषों और सुरक्षा से रहित होते हैं। उनके अधिकांश वचन और कार्य पवित्र आत्मा की पुरानी अपेक्षाओं को थामे रहते हैं; वे सिद्धान्त हैं, सत्य नहीं। ऐसे सिद्धान्त और विनियमन यह साबित करने के लिए पर्याप्त हैं कि वह एकमात्र चीज़ जो उन्हें एक साथ लाती है धर्म है; वे चुने हुए लोग, परमेश्वर के कार्य के लक्ष्य नहीं हैं। उनमें से सभी लोगों की सभा को मात्र धर्म का महासम्मलेन कहा जा सकता है, और उन्हें कलीसिया नहीं कहा जा सकता है। यह एक अपरिवर्तनीय तथ्य है। उनके पास पवित्र आत्मा का नया कार्य नहीं है; जो कुछ वे करते हैं वह धर्म का द्योतक प्रतीत होता है, जैसा जीवन वे जीते हैं वह धर्म से भरा हुआ प्रतीत होता है; उनमें पवित्र आत्मा की उपस्थिति और कार्य नहीं होता है, और वे पवित्र आत्मा से अनुशासन या प्रबुद्धता प्राप्त करने के लायक तो बिलकुल भी नहीं हैं। ऐसे समस्त लोग निर्जीव लाशों और कीड़ों के समान हैं जो आध्यात्मिकता से रहित हैं। उन्हें मनुष्य की विद्रोहशीलता और विरोध का कोई ज्ञान नहीं है, मनुष्य के समस्त कुकर्मों का कोई ज्ञान नहीं है, और वे परमेश्वर के समस्त कार्य और परमेश्वर की वर्तमान इच्छा के बारे में बिलकुल भी नहीं जानते हैं। वे सभी अज्ञानी और अधम लोग हैं, वे कूडा करकट हैं जो विश्वासी कहलाने के योग्य नहीं हैं! वे ऐसा कुछ भी नहीं करते हैं जिसका परमेश्वर के प्रबंधन के कार्य के साथ कोई सम्बन्ध हो, और यह परमेश्वर के कार्य को तो बिलकुल भी नहीं बिगाड़ सकता है। उनके वचन और कार्य अत्यंत घृणास्पद, अत्यंत दयनीय, और उल्लेख करने के लायक मात्र भी नहीं होते हैं। ऐसे लोग जो पवित्र आत्मा की धारा में नहीं हैं उनके द्वारा किए गए किसी भी कार्य का पवित्र आत्मा के नए कार्य के साथ कोई लेना-देना नहीं होता है। इस वजह से, चाहे वे कुछ भी क्यों न करें, वे पवित्र आत्मा के अनुशासन से रहित होते हैं, और, इसके अतिरिक्त, वे पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता से रहित होते हैं। क्योंकि वे सभी ऐसे लोग हैं जिन्हें सत्य से कोई प्रेम नहीं है, और वे पवित्र आत्मा के द्वारा घृणा और अस्वीकृत किए जाते हैं। उन्हें कुकर्मी कहा जाता हैं क्योंकि वे देह के अनुसार चलते हैं, और परमेश्वर के नामपट्ट के अधीन जो उन्हें अच्छा लगता है वे वही करते हैं। जब परमेश्वर कार्य करता है, तो वे जानबूझकर उसके विरोध में हो जाते हैं, और उसकी विपरीत दिशा में दौड़ते हैं। परमेश्वर के साथ सहयोग करने में मनुष्य की असफलता अपने आप में चरम रूप से विद्रोही है, इसलिए क्या ऐसे लोग, जो जानबूझकर परमेश्वर के प्रतिकूल चलते हैं, विशेष रूप से प्रतिफल प्राप्त नहीं करेंगे?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का अभ्यास" से उद्धृत

संदर्भ के लिए धर्मोपदेश और संगति के उद्धरण:

यदि संपूर्ण धार्मिक समुदाय इसके प्रति शत्रुतापूर्ण और विरोध में नहीं होते, तो यह सत्य मार्ग नहीं होता। स्मरण रखें: सत्य मार्ग का अधिकांश लोगों द्वारा, यहाँ तक कि समस्त संसार द्वारा अवश्य विरोध किया जायेगा। जब प्रभु यीशु पहली बार कार्य करने और उपदेश देने आया, तो क्या समस्त यहूदीवादियों ने उसका विरोध नहीं किया था? हर बार जब भी परमेश्वर नया काम आरंभ करता है, तो भ्रष्ट मानवजाति को इसे स्वीकार करने में बड़ी कठिनाई होती है, क्योंकि परमेश्वर का कार्य मनुष्यों की धारणाओं के असंगत होता है और उनका खण्डन करता है; लोगों में समझने की क्षमता का अभाव है, और आध्यात्मिक क्षेत्र में घुसने में अक्षम हैं, और यदि यह पवित्र आत्मा के कार्य के लिए नहीं होता, तो वे सच्चे मार्ग को स्वीकार करने में असमर्थ होते। यदि इसे परमेश्वर का काम मान लिया जाता, किन्तु धार्मिक समुदाय द्वारा उसका विरोध नहीं किया जाता, और संसार की ओर से विरोध और शत्रुता का अभाव होता, तो इससे साबित होता कि परमेश्वर का कार्य झूठा है। मानवजाति सत्य को स्वीकार करने में असमर्थ क्यों है? सबसे पहले, मनुष्य देह का है, वह भौतिक सार वाला है। भौतिक वस्तुएँ आध्यात्मिक क्षेत्र में घुसने में असमर्थ हैं। "आध्यात्मिक क्षेत्र में घुसने में असमर्थ" का क्या अर्थ है? इसका अर्थ है, आत्माओं को, आत्माओं और आध्यात्मिक क्षेत्र की गतिविधियों को देखने में असमर्थ होना, परमेश्वर क्या कर और कह रहा है वह अनदेखा रह जाना। लोग आध्यात्मिक क्षेत्र में जो कुछ हो रहा है प्रति अंधे हो जाएँगे। भौतिक जगत में लोग केवल ठोस चीज़ों को देखते हैं। तुम नहीं देख सकते कि कौन सी आत्मा लोगों में क्या करती है या देख सकते कि परमेश्वर का आत्मा क्या करने और कहने आया है। कभी-कभी तुम्हें उसकी आवाज सुनाई दे सकती है, लेकिन तुम नहीं जानते कि यह कहाँ से आती है; तुम पुस्तक से परमेश्वर के वचनों को पढ़ सकते हो, पर फिर भी तुम नहीं जानते हो कि परमेश्वर ने कैसे या कब इन वचनों को कहा, या कि उनका अर्थ क्या है। लोग आध्यात्मिक क्षेत्र में घुसने, या परमेश्वर के वचनों के स्रोत को समझने में असमर्थ हैं, और इसलिए सत्य को समझने के लिए उन्हें पवित्र आत्मा द्वारा प्रबुद्धता और रोशनी, और पवित्र आत्मा के कार्य की आवश्यकता है। दूसरा, मानवजाति बहुत गहराई तक भ्रष्ट है, उसके भीतर शैतान का बहुत सा विष और बहुत सा ज्ञान भरा हुआ है, यदि वह हर चीज का मूल्यांकन शैतान की विभिन्न दार्शनिकताओं और उसके ज्ञान का उपयोग करके करता है, तो वह कभी भी यह स्थापित करने में समर्थ नहीं होगा कि सत्य क्या है। पवित्र आत्मा द्वारा प्रबुद्धता और रोशनी के बिना मनुष्य सत्य को समझने में अक्षम होगा। और इसलिए सच्चे मार्ग को अपरिहार्य रूप में मनुष्य के उत्पीड़न और अस्वीकरण के अधीन किया जाता है। मनुष्य के लिए शैतान के ज्ञान और उसकी दार्शनिकता को स्वीकार करना क्यों आसान है? सबसे पहले, क्योंकि यह उनकी धारणाओं और उनके देह के हितों के अनुरूप है, और यह उनकी देह के लिए लाभदायक है। वे अपने आप से कहते हैं कि, "इस तरह के ज्ञान को स्वीकार करना मेरी सहायता करता है: यह मेरी उन्नति करवाएगा, यह मुझे सफल बनाएगा, और मुझे वस्तुओं को प्राप्त करने की अनुमति देगा। इस तरह के ज्ञान के साथ लोग मेरी ओर देखेंगे।" जिन बातों से लोगों लाभ मिलता है वे उनकी धारणाओं के अनुरूप हैं। ...इस हद तक भ्रष्ट हो जाने और आध्यात्मिक क्षेत्र में प्रवेश करने में असमर्थ हो जाने पर, लोग केवल परमेश्वर का विरोध ही कर सकते हैं, और इस प्रकार परमेश्वर के कार्य को मनुष्य का अस्वीकरण, विरोध और निंदा ही मिली है। यह सामान्य है। यदि परमेश्वर के काम को संसार और मानवजाति की ओर से निंदा और विरोध नहीं मिला होता, तो इससे यह साबित होता कि यह सत्य नहीं है। यदि परमेश्वर द्वारा कही गई सब बातें लोगों की धारणाओं के अनुरूप होती, तो क्या वे उसकी भर्त्सना करते? क्या वे उसका विरोध करते? वे निश्चित रूप से नहीं करते।

— ऊपर से संगति में से उद्धृत

कलीसिया उनसे बनती है जो परमेश्वर के द्वारा सचमुच पूर्वनियत और चयन किए जा चुके हैं—यह उनसे बनती है जो सत्य से प्रेम करते हैं, सत्य की खोज करते हैं, और पवित्र आत्मा के काम से संपन्न हैं। केवल जब ऐसे लोग परमेश्वर के वचन को खाने और पीने, कलीसियाई जीवन जीने, परमेश्वर के कार्य का अनुभव करने, और परमेश्वर के प्राणी के रूप में अपने कर्तव्य को पूरा करने के लिए एकत्रित होते हैं तभी यह एक कलीसिया हो सकती है। यदि एक जमावड़ा कहता है कि वह सचमुच परमेश्वर पर विश्वास और प्रार्थना करता है और परमेश्वर के वचन पढ़ता है, किन्तु सत्य से प्रेम या सत्य की खोज नहीं करता है, और पवित्र आत्मा के कार्य से रहित है, और धार्मिक रीति-रिवाजों, करता है, तो वह कलीसिया नहीं है। अधिक सटीकता से, पवित्र आत्मा के कार्य से रहित कलीसियाएँ कलीसियाएँ नहीं हैं; वे केवल धार्मिक स्थल हैं और ऐसे लोग हैं जो धार्मिक समारोह करते हैं। वे वास्तव में परमेश्वर का आज्ञापालन करने वाले और परमेश्वर के कार्य का अनुभव करने वाले लोग नहीं हैं। ...

............

... कलीसिया उन लोगों का समूह है जो परमेश्वर पर सचमुच विश्वास करते हैं और सत्य की खोज करते हैं, और उनमें कोई भी दुष्ट नहीं होता है—वे कलीसिया से संबंधित नहीं होते हैं। यदि ऐसे लोगों का एक समूह एक साथ इकट्ठा होता है जिन्होंने सत्य की खोज नहीं की और सत्य को अभ्यास में लाने के लिए कुछ नहीं किया, तो यह कलीसिया नहीं होगी। यह एक धार्मिक स्थल या कोई जमावड़ा होगा। कलीसिया अवश्य ऐसे लोगों से बनी होनी चाहिए जो परमेश्वर पर सचमुच विश्वास करते हैं और सत्य की खोज करते हैं, जो लोग परमेश्वर के वचनों को खाते और पीते हैं, और परमेश्वर की आराधना करते हैं, अपने कर्तव्य को करते हैं, और परमेश्वर के कार्य का अनुभव करते हैं और पवित्र आत्मा के कार्य को प्राप्त कर चुके हैं। केवल यही एक कलीसिया है। इस प्रकार, जब तुम कलीसिया का मूल्यांकन करते हो कि यह वास्तविक कलिसिया है या नहीं, तो तुम्हें सबसे पहले यह अवश्य देखना चाहिए कि उसमें किस प्रकार के लोग हैं। दूसरा, तुम्हें अवश्य देखना चाहिए कि उनमें पवित्र आत्मा का कार्य है या नहीं; यदि उनकी सभा पवित्र आत्मा के कार्य से रहित है, तो वह कलीसिया नहीं है, और यदि यह उन लोगों का जनसमूह नहीं है जो सत्य की खोज करते हैं, तो यह कलीसिया नहीं है। यदि किसी कलीसिया में एक भी ऐसा नहीं है जो सचमुच सत्य की खोज करता है, तो यह कलीसिया पवित्र आत्मा के कार्य से रहित है, यदि इसमें कोई व्यक्ति हो जो सत्य की खोज करना चाहता हो, और वह ऐसी कलीसिया में बना रहता है, तो उस व्यक्ति को बचाया नहीं जा सकता है। उन्हें उस जमावड़े को छोड़ देना चाहिए और जितनी जल्दी हो सके किसी कलीसिया को ढूँढना चाहिए। यदि, किसी कलीसिया के भीतर, तीन या पाँच ऐसे लोग हों जो सत्य की खोज करते हों, और 30 या 50 ऐसे लोग हों जो केवल जमावड़ा हों, तो उन तीन या पाँच लोगों को जो परमेश्वर पर वास्तव में विश्वास करते हैं और सत्य की खोज करते हैं एक साथ इकट्ठा हो जाना चाहिए; यदि वे एक साथ एकत्रित हो जाते हैं तो उनका जनसमूह तब भी एक कलीसिया, बहुत कम सदस्यों वाली एक कलीसिया है, किन्तु जो शुद्ध है।

— जीवन में प्रवेश पर धर्मोपदेश और संगति

धार्मिक जगत के अगुवों और पादरियों ने परमेश्वर के कार्य का अनुभव नहीं किया है, न ही वे पवित्र आत्मा के द्वारा पूर्ण किए या बनाए गए हैं, बल्कि इसके बजाय वे किसी शिक्षालय से स्नातक होने और डिप्लोमा दिए जाने के बाद धार्मिक समुदाय में अगुवे या पादरी बन गये हैं। उनमें पवित्र आत्मा के कार्य और पुष्टि के बिना हैं, उनके पास परमेश्वर का जरा सा भी सच्चा ज्ञान नहीं है, और उनके मुँह केवल आध्यात्मविद्या संबंधी का ज्ञान और सिद्धांतों के अलावा और कुछ नहीं बोल सकते हैं। उन्होंने वास्तव में कुछ भी अनुभव नहीं किया है। ऐसे लोग परमेश्वर के द्वारा उपयोग किये जाने के सर्वथा अयोग्य है; वे कैसे परमेश्वर के सामने लोगों की अगुवाई कर सकते हैं? वे अपनी पात्रता के साक्ष्य के रूप में शिक्षालय से प्राप्त स्नातकता को दर्शाते हैं, वे बाइबल के अपने ज्ञान पर इठलाने के लिए जो कुछ भी कर सकते हैं, करते हैं, वे असह्य रूप से अभिमानी हैं—और इस कारण से, परमेश्वर द्वारा उनकी निंदा की जाती है, और परमेश्वर द्वारा उनसे घृणा की जाती है, और ये पवित्र आत्मा का कार्य खो चुके हैं। इस बारे में कोई संदेह नहीं है। क्यों धार्मिक समुदाय मसीह का प्राणघातक शत्रु बन गया है एक बहुत विचारोत्तेजक प्रश्न है। क्या यह इस बात को दर्शाता है कि, अनुग्रह के युग में, यहूदीवादियों ने प्रभु यीशु मसीह को सलीब पर चढ़ाया था? अंत के दिनों के राज्य के युग में धार्मिक समुदाय ने एकता बनाई है और अंत के दिनों में परमेश्वर के कार्य का विरोध और आलोचना करने में पूरे प्रयास समर्पित किए, यह अंत के दिनों में मसीह के देहधारण को इनकार और अस्वीकृत करता है, इसने देहधारी परमेश्वर और परमेश्वर की कलीसिया के बारे में बहुत सी अफवाहें बनाई, और इनके विरुद्ध आक्रमण किए, इनका तिरस्कार किया, और ईशनिंदा की है, और इसने बहुत पहले ही लौटकर आये, अंत के दिनों के मसीह, यीशु को सलीब पर चढ़ा दिया है। यह प्रमाणित करता है कि धार्मिक समुदाय बहुत पहले से ही शैतान की सेनाओं में पतित हो चुका है जो परमेश्वर का विरोध और उसके प्रति विद्रोह करती हैं। धार्मिक समुदाय परमेश्वर के द्वारा शासित नहीं होता है, और यह सत्य के द्वारा तो बिल्कुल भी शासित नहीं होता है; वह पूरी तरह से भ्रष्ट मानवों, और उससे भी अधिक मसीह के विरोधियों के द्वारा शासित होता है।

जब लोग परमेश्वर पर इस तरह के—एक ऐसे जो शैतान से संबंधित है और दुष्टात्माओं तथा महीस के विरोधियों के द्वारा शासित और नियंत्रित होती है—धार्मिक स्थलों में विश्वास करते हैं तो वे केवल धार्मिक सिद्धांतों को समझने में सक्षम होते है, वे केवल धार्मिक अनुष्ठानों और विनियमों का पालन कर सकते हैं, और वे कभी भी सत्य को नहीं समझेंगे, परमेश्वर के काम का अनुभव नहीं करेंगे, और बचाए जाने में सर्वथा अक्षम हैं। क्योंकि धार्मिक स्थलों में पवित्र आत्मा के कार्य के बारे में कुछ भी नहीं है, और ये ऐसे स्थान हैं जो परमेश्वर को अप्रिय हैं, जिनसे परमेश्वर घृणा करता है, और जिन्हें परमेश्वर निंदित और श्रापित करता है। परमेश्वर ने धर्म को कभी भी मान्यता नहीं दी, इसकी प्रशंसा को कभी भी बिल्कुल नहीं की है, और प्रभु यीशु के समय से ही धार्मिक समुदाय की परमेश्वर द्वारा निंदा की गई है। इसलिए, जब तुम परमेश्वर पर विश्वास करते हो तो तुम्हें उन स्थानों को अवश्य खोजना चाहिए जो पवित्र आत्मा के कार्य से युक्त हों; केवल ये ही सच्ची कलीसिया हैं, और केवल सच्ची कलीसियाओं में ही तुम परमेश्वर की वाणी को सुनने, और परमेश्वर के कार्य के पदचिह्नों को खोजने में समर्थ होगे। यही वे साधन हैं जिनके द्वारा परमेश्वर की खोज की जाती है।

— ऊपर से संगति में से उद्धृत

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