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अध्याय 6 विभेदन के कई रूप जिन्हें परमेश्वर में तुम्हारे विश्वास में तुम्हें धारण करना चाहिए

4. तुम सच्चे और झूठे मार्गों में, और सच्ची और झूठी कलीसियाओं में अंतर कैसे बता सकते हो?

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

सच्चे मार्ग की तलाश करने में सबसे बुनियादी सिद्धान्त क्या है? तुम्हें देखना होगा कि क्या इसमें पवित्र आत्मा का कार्य है कि नहीं, क्या ये वचन सत्य की अभिव्यक्ति हैं या नहीं, किसके लिए गवाही देनी है, और यह तुम्हारे लिए क्या ला सकता है। सच्चे मार्ग और गलत मार्ग के मध्य अंतर करने के लिए बुनियादी ज्ञान के कई पहलुओं की आवश्यकता होती है, जिनमें सबसे बुनियादी है यह बताना कि क्या इसमें पवित्र आत्मा का कार्य है या नहीं। क्योंकि परमेश्वर पर विश्वास का मनुष्य का सार पवित्र आत्मा पर विश्वास है, और यहाँ तक कि देहधारी परमेश्वर पर उसका विश्वास इसलिए है क्योंकि यह देह परमेश्वर के आत्मा का मूर्तरूप है, जिसका अर्थ यह है कि ऐसा विश्वास पवित्र आत्मा पर विश्वास है। आत्मा और देह के मध्य अंतर हैं, परन्तु क्योंकि यह देह पवित्रात्मा से आता है और वचन देहधारी होता है, इसलिए मनुष्य जिस में विश्वास करता है वह अभी भी परमेश्वर का अन्तर्निहित सार है। और इसलिए, इस बात का विभेद करने में कि यह सच्चा मार्ग है या नहीं, सर्वोपरि तुम्हें यह अवश्य देखना चाहिए कि क्या इसमें पवित्र आत्मा का कार्य है या नहीं, जिसके बाद तुम्हें अवश्य देखना चाहिए कि क्या इस मार्ग में सत्य है अथवा नहीं। यह सत्य सामान्य मानवता का जीवन स्वभाव है, अर्थात्, वह जो मनुष्य से तब अपेक्षित था कि जब परमेश्वर ने आरंभ में उसका सृजन किया था, यानि, सभी सामान्य मानवता (मानवीय भावना, अंतर्दृष्टि, बुद्धि और मनुष्य होने का बुनियादी ज्ञान) है। अर्थात्, तुम्हें यह देखने की आवश्यकता है कि क्या यह मार्ग मनुष्य को एक सामान्य मानवता के जीवन ले जाता है या नहीं, क्या बोला गया सत्य सामान्य मानवता की आवश्यकता के अनुसार अपेक्षित है या नहीं, क्या यह सत्य व्यवहारिक और वास्तविक है या नहीं, और क्या यह सबसे सही समय पर है या नहीं। यदि इसमें सत्य है, तो यह मनुष्य को सामान्य और वास्तविक अनुभवों में ले जाने में सक्षम है; इसके अलावा, मनुष्य हमेशा से अधिक सामान्य बन जाता है, मनुष्य का देह में जीवन और आध्यात्मिक जीवन हमेशा से अधिक व्यवस्थित हो जाता है, और मनुष्य की भावनाएँ और हमेशा से अधिक सामान्य हो जाती हैं। यह दूसरा सिद्धान्त है। एक अन्य सिद्धान्त है, जो यह है कि क्या मनुष्य के पास परमेश्वर का बढ़ता हुआ ज्ञान है या नहीं, क्या इस प्रकार के कार्य और सत्य का अनुभव करना उसमें परमेश्वर के लिए प्रेम को प्रेरित कर सकता है या नहीं, और उसे हमेशा से अधिक परमेश्वर के निकट ला सकता है या नहीं। इसमें यह मापा जा सकता है कि क्या यह सही मार्ग है अथवा नहीं। सबसे अधिक बुनियादी बात यह है कि क्या यह मार्ग अलौकिक के बजाए यर्थाथवादी है, और क्या यह मनुष्य का जीवन प्रदान करने में सक्षम है या नहीं। यदि यह इन सिद्धान्तों के अनुरूप है, तो निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि यह मार्ग सच्चा मार्ग है।…यदि यह पवित्र आत्मा का कार्य है, तो मनुष्य हमेशा से अधिक सामान्य बन जाता है, और उसकी मानवता हमेशा से अधिक सामान्य बन जाती है। मनुष्य को अपने स्वभाव का, जिसे शैतान के द्वारा भ्रष्ट कर दिया गया है और मनुष्य के सार का बढ़ता हुआ ज्ञान होता है, और उसकी सत्य के लिए हमेशा से अधिक ललक होती है। अर्थात्, मनुष्य का जीवन अधिकाधिक बढ़ता जाता है और मनुष्य का भ्रष्ट स्वभाव अधिकाधिक बदलावों में सक्षम हो जाता है – जिस सब का अर्थ है परमेश्वर का मनुष्य का जीवन बनना। यदि एक मार्ग उन चीजों को प्रकट करने में असमर्थ है जो मनुष्य का सार हैं, मनुष्य के स्वभाव को बदलने में असमर्थ है, और, इसके अलावा, उसे परमेश्वर के सामने लाने में असमर्थ है या उसे परमेश्वर की सच्ची समझ प्रदान कराने में असमर्थ है, और यहाँ तक कि उसकी मानवता का हमेशा से अधिक निम्न होने और उसकी भावना का हमेशा से अधिक असामान्य होने का कारण बनता है, तो यह मार्ग अवश्य सच्चा मार्ग नहीं होना चाहिए और यह दुष्टात्मा का कार्य, या पुराना मार्ग हो सकता है। संक्षेप में, यह पवित्र आत्मा का वर्तमान का कार्य नहीं हो सकता है। तुम लोगों ने इन सभी वर्षों में परमेश्वर पर विश्वास किया है, फिर भी तुम लोगों को सच्चे और गलत मार्ग के मध्य विभेदन करने या सच्चे मार्क की तलाश करने के सिद्धान्तों का कोई आभास नहीं है। अधिकांश लोगों की इन मामलों में दिलचस्पी भी नहीं होती है; वे सिर्फ़ वहाँ चल पड़ते हैं जहाँ बहुसंख्यक जाते हैं, और वह दोहरा देते हो जो बहुसंख्यक कहते हैं। यह कोई कैसा व्यक्ति है जो सत्य की खोज करता है? और इस प्रकार के लोग सच्चा मार्ग कैसे पा सकते हैं? यदि तुम इन अनेक मुख्य नियमों को समझ लो, तो चाहे जो कुछ भी हो जाए तुम धोखा नहीं खाओगे।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "जो परमेश्वर को और उसके कार्य को जानते हैं केवल वे ही परमेश्वर को सन्तुष्ट कर सकते हैं" से

वे सभी जो पवित्र आत्मा की मुख्य धारा के भीतर हैं वे पवित्र आत्मा की उपस्थिति एवं अनुशासन के अधीन हैं, और ऐसे लोग जो पवित्र आत्मा की मुख्य धारा में नहीं हैं वे शैतान के नियन्त्रण में हैं, और वे पवित्र आत्मा के किसी भी कार्य से रहित हैं। वे लोग जो पवित्र आत्मा की मुख्य धारा में हैं वे ऐसे लोग हैं जो परमेश्वर के नए कार्य को स्वीकार करते हैं, वे ऐसे मनुष्य हैं जो परमेश्वर के नए कार्य में सहयोग करते हैं। यदि इस मुख्य धारा के लोग सहयोग करने में असमर्थ होते हैं, और इस समय के दौरान उस सच्चाई का अभ्यास करने में असमर्थ होते हैं जिसकी परमेश्वर के द्वारा अपेक्षा की गई है, तो उन्हें अनुशाषित किया जाएगा, और बहुत खराब स्थिति में उन्हें पवित्र आत्मा के द्वारा छोड़ दिया जाएगा। ऐसे लोग जो पवित्र आत्मा के नए कार्य को स्वीकार करते हैं, वे पवित्र आत्मा की मुख्य धारा में जीवन बिताएंगे, और पवित्र आत्मा की देखभाल एवं सुरक्षा को प्राप्त करेंगे। ऐसे लोग जो सत्य को अभ्यास रूप में लाने के इच्छुक हैं उन्हें पवित्र आत्मा द्वारा प्रबुद्ध किया जाता है, और ऐसे लोग जो सत्य को अभ्यास में लाने के अनिच्छुक हैं, उन्हें पवित्र आत्मा के द्वारा अनुशासित किया जाता है, और यहाँ तक कि उन्हें दण्ड भी दिया जा सकता है। इसकी परवाह न करते हुए कि वे किस किस्म के व्यक्ति हैं, इस शर्त पर कि वे पवित्र आत्मा की मुख्य धारा के अंतर्गत हों, परमेश्वर उन सब लोगों की ज़िम्मेदारी लेगा जो उसके नाम के निमित्त उसके नए कार्य को स्वीकार करते हैं। ऐसे लोग जो उसके नाम को गौरवान्वित करते हैं और वे उसके वचनों को अभ्यास में लाने के इच्छुक हैं और वे उसकी आशीषों को प्राप्त करेंगे; ऐसे लोग जो उसकी आज्ञाओं को नहीं मानते हैं और उसके वचनों को अभ्यास में नहीं लाते हैं वे उसके दण्ड को प्राप्त करेंगे। ... यह उन लोगों के लिए नहीं है जो नए कार्य को स्वीकार नहीं करते हैं: वे पवित्र आत्मा की मुख्य धारा से बाहर हैं, और पवित्र आत्मा का अनुशासन एवं फटकार उन पर लागू नहीं होता है। पूरे दिन, ऐसे लोग शरीर में जीवन बिताते रहते हैं, वे अपने मनों के भीतर ही जीवन बिताते हैं, और कुल मिलाकर जो कुछ वे करते हैं वह उस सिद्धान्त के अनुसार होता है जो उनके स्वयं के मस्तिष्क के विश्लेषण एवं अनुसंधान के द्वारा उत्पन्न हुआ है। यह पवित्र आत्मा के नए कार्य की अपेक्षाएं नहीं हैं, और यह परमेश्वर के साथ सहयोग तो बिलकुल भी नहीं है। ऐसे लोग जो परमेश्वर के नए कार्य को स्वीकार नहीं करते हैं वे परमेश्वर की उपस्थिति से वंचित रहते हैं, और, इसके अतिरिक्त, वे परमेश्वर की आशीषों एवं सुरक्षा से रहित होते हैं। उनके अधिकांश वचन एवं कार्य पवित्र आत्मा की पुरानी अपेक्षाओं को थामे रहते हैं; वे सिद्धान्त हैं, सत्य नहीं। ऐसे सिद्धान्त एवं रीति विधियां यह साबित करने के लिए पर्याप्त हैं कि वह एकमात्र चीज़ जो उन्हें एक साथ लेकर आती है वह धर्म है; वे चुने हुए लोग, या परमेश्वर के कार्य के उद्देश्य नहीं हैं। उनके बीच के सभी लोगों की सभा को मात्र धर्म का महासम्मलेन कहा जा सकता है, और उन्हें कलीसिया नहीं कहा जा सकता है। ये एक अपरिवर्तनीय तथ्य है।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "परमेश्वर का कार्य एवं मनुष्य का रीति व्यवहार" से

ऐसा क्यों कहा जाता है कि धार्मिक कलीसियाओं के उन लोगों के रीति व्यवहार प्रचलन से बाहर हो गए हैं? ऐसा इसलिए है क्योंकि जिसे वे अभ्यास में लाते हैं वह आज के कार्य से अलग हो गया है। अनुग्रह के युग में, जिसे वे अभ्यास में लाते थे वह सही था, किन्तु चूँकि युग गुज़र चुका है और परमेश्वर का कार्य बदल चुका है, तो उनका रीति व्यवहार धीरे धीरे प्रचलन से बाहर हो गया है। इसे नए कार्य एवं नए प्रकाश के द्वारा पीछे छोड़ दिया गया है। इसके मूल बुनियाद के आधार पर, पवित्र आत्मा का कार्य कई कदम गहराई में बढ़ चुका है। फिर भी वे लोग परमेश्वर के कार्य की मूल अवस्था से अभी भी चिपके हुए हैं, और पुराने रीति व्यवहारों एवं पुराने प्रकाश पर अभी भी अटके हुए हैं। तीन या पाँच वर्षों में परमेश्वर का कार्य बड़े रूप में बदल सकता है, अतः क्या 2000 वर्षों के समयक्रम में और अधिक महान रूपान्तरण भी नहीं हुए होंगे? यदि मनुष्य के पास कोई नया प्रकाश या रीति व्यवहार नहीं है, तो इसका अर्थ है कि वह पवित्र आत्मा के कार्य के साथ साथ बना नहीं रहा। यह मनुष्य की असफलता है; परमेश्वर के नए कार्य के अस्तित्व को नकारा नहीं जा सकता है क्योंकि, आज, ऐसे लोग जिनके पास पवित्र आत्मा का मूल कार्य है वे अभी भी प्रचलन से बाहर हो चुके रीति व्यवहारों में बने रहते हैं। पवित्र आत्मा का कार्य हमेशा आगे बढ़ रहा है, और वे सभी जो पवित्र आत्मा की मुख्य धारा में हैं उन्हें भी और अधिक गहराई में बढ़ना और कदम दर कदम बदलना चाहिए। उन्हें एक ही चरण पर रूकना नहीं चाहिए। ऐसे लोग जो पवित्र आत्मा के कार्य को नहीं जानते हैं केवल वे ही परमेश्वर के मूल कार्य के मध्य बने रहेंगे, और वे पवित्र आत्मा के नए कार्य को स्वीकार नहीं करेंगे। ऐसे लोग जो अनाज्ञाकारी हैं केवल वे ही पवित्र आत्मा के कार्य को प्राप्त करने में असमर्थ होंगे। यदि मनुष्य का रीति व्यवहार पवित्र आत्मा के नए कार्य के साथ कदम से कदम मिलाकर नहीं चलता है, तो मनुष्य के रीति व्यवहार को निश्चित रूप से आज के कार्य से हानि पहुंचता है, और यह निश्चित रूप से आज के कार्य के अनुरूप नहीं है। पुराने हो चुके ऐसे लोग साधारण तौर पर परमेश्वर की इच्छा को पूरा करने में असमर्थ होते हैं, और वे ऐसे अन्तिम लोग तो बिलकुल भी नहीं बन सकते हैं जो परमेश्वर की गवाही देने के लिए खड़े होंगे। इसके अतिरिक्त, सम्पूर्ण प्रबंधकीय कार्य को ऐसे लोगों के समूह के बीच में समाप्त नहीं किया जा सकता है। क्योंकि वे लोग जिन्होंने एक समय यहोवा की व्यवस्था को थामा था, और वे लोग जिन्होंने क्रूस के दुःख को सहा था, यदि वे अन्तिम दिनों के कार्य के चरण को स्वीकार नहीं कर सकते हैं, तो जो कुछ भी उन्होंने किया था वह सब बेकार एवं व्यर्थ होगा।…यदि मनुष्य एक ही अवस्था में चिपका रहता है, तो इससे प्रमाणित होता है कि वह परमेश्वर के कार्य एवं नए प्रकाश के साथ साथ बने रहने में असमर्थ है; इससे यह प्रमाणित नहीं होता है कि प्रबंधन की परमेश्वर की योजना परिवर्तित नहीं हुई है। ऐसे लोग जो पवित्र आत्मा की मुख्य धारा के बाहर हैं वे सदैव सोचते हैं कि वे सही हैं, किन्तु वास्तव में, उसके भीतर परमेश्वर का कार्य बहुत पहले ही रूक गया था, और पवित्र आत्मा का कार्य उनमें अनुपस्थित है। परमेश्वर का कार्य बहुत पहले ही लोगों के एक अन्य समूह को हस्तान्तरित हो चुका था, ऐसा समूह जिस पर उसने अपने नए कार्य को पूरा करने का इरादा किया है। क्योंकि ऐसे लोग जो किसी धर्म में हैं वे परमेश्वर के नए कार्य को स्वीकार करने में असमर्थ हैं, और वे केवल भूतकाल के पुराने कार्य को ही थामे रहते हैं, इस प्रकार परमेश्वर ने इन लोगों को छोड़ दिया है, और उन लोगों पर अपना कार्य करता है जो उसके नए कार्य को स्वीकार करते हैं। ये ऐसे लोग हैं जो उसके नए कार्य में उसका सहयोग करते हैं, और केवल इसी रीति से ही उसके प्रबंधन को पूरा किया जा सकता है। परमेश्वर का प्रबंधन सदैव आगे बढ़ रहा है, तथा मनुष्य का रीति व्यवहार हमेशा से ऊँचा हो रहा है। परमेश्वर सदैव कार्य कर रहा है, और मनुष्य हमेशा अभावग्रस्त होता है, कुछ इस तरह कि दोनों अपने शिरोबिन्दु पर पहुंचते हैं, परमेश्वर एवं मनुष्य सम्पूर्ण एकता में हैं। यह परमेश्वर के कार्य की पूर्णता की अभिव्यक्ति है, और यह परमेश्वर के सम्पूर्ण प्रबंधन का अन्तिम परिणाम है।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "परमेश्वर का कार्य एवं मनुष्य का रीति व्यवहार" से

मनुष्य की सहभागिता:

सच्चा मार्ग वह मार्ग है जो लोगों को बचा सकता है, लोगों को बदल सकता है, और उन्हें परमेश्वर का अनुमोदन प्राप्त करने और वास्तविक नियति में प्रवेश करने में समर्थ बनाता है। केवल यही सच्चा मार्ग है। यदि लोग सोचते हैं कि वे सच्चे मार्ग पर विश्वास करते हैं, किंतु फिर भी ये लक्ष्य और प्रभाव प्राप्त नहीं हुए हैं, तब यह कहा जा सकता है कि उनका मार्ग झूठा मार्ग है, कि यह सच्चा मार्ग नहीं है। कुछ लोग कहते हैं: "मैं कैसे सकारात्मक और नकारात्मक के बीच का अंतर बताऊँ?" यह परमेश्वर के वचनों के आधार पर संपन्न होती है। वह सब जो परमेश्वर के द्वारा अनुमोदित किया जाता है, वह सब जो वह अपेक्षा करता है कि मनुष्य धारण करे, और वह सब जो वह पसंद करता है कि मनुष्य करे, वह सब सकारात्मक है; वह सब जो परमेश्वर अपेक्षा करता है कि मनुष्य अस्वीकार करे और त्याग दे, वह सब जिसकी परमेश्वर निंदा करता है, वह नकारात्मक है। इस प्रकार से, सकारात्मक और नकारात्मक का मूल्यांकन का निर्णय परमेश्वर के वचनों के आधार पर किया जाता है; परमेश्वर के वचन वह कसौटी है, जो सत्यापित करती है कि क्या कोई बात सच्ची है या झूठी, और वे ही इस बात के लिए एकमात्र मानक हैं कि क्या कोई बात सत्य है या झूठ। तुम कैसे तय करते हो कि कौन सा मार्ग सत्य है, और कौन सा झूठ है? वह मार्ग जो तुम्हें सच्चा जीवन देता है, वह जिससे तुम प्रकाश को देखते हो, और जो तुम्हें शैतान की भ्रष्टता और उसके प्रभाव से छुटकारा पाने की अनुमति देता है, और परमेश्वर के अनुमोदन और आशीषों को पाने में सक्षम बनाता है—वही सच्चा मार्ग है। क्या यह बात सही नहीं है? परमेश्वर का न्याय और ताड़ना हमारे लिए क्या लाया है? यह उन सभी सत्यों को लाया है जिन्हें भ्रष्ट मानवजाति को उद्धार पाने के लिए अवश्य धारण करना चाहिए, यह जीवन का सच्चा मार्ग लाया है, इसने हमें जीवन का प्रकाश देखने दिया है, इसने हमें सबसे बड़ा उद्धार, और सच्चा उद्धार दिया है, जिसे परमेश्वर द्वारा संसार के सृजन के समय से पूर्व नियत कर दिया गया था, और उसने हमें ऐसे लोगों से जो शैतान के द्वारा भ्रष्ट किये गए थे, और शैतान से संबंधित थे, वास्तविक लोगों में रूपांतरित कर दिया है जिन्हें परमेश्वर के द्वारा वास्तव में शुद्ध किया जा चुका है, और जो सत्य और मानवता से संपन्न हैं। ये सभी परमेश्वर के न्याय और ताड़ना के द्वारा, अंत के दिनों के परमेश्वर के कार्य के द्वारा प्राप्त किए गए प्रभाव हैं। परमेश्वर के न्याय और ताड़ना के बिना हम सत्य को पाने में समर्थ नहीं हो सकते हैं, हमारी भ्रष्टता अनसुलझी रहेगी, हम कभी भी जीवन के प्रकाश को देखने में समर्थ नहीं होंगे, और कभी भी परमेश्वर का अनुमोदन नहीं करेंगे। इस प्रकार, आज हमनें जितने भी आशीष प्राप्त किए हैं वे परमेश्वर के न्याय और ताड़ना का अनुभव करने और आज्ञापालन करने का परिणाम हैं।

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कुछ लोग कहते हैं: "अरे, यदि यह सच्चा मार्ग है तो इसमें इतने कम लोग क्यों शामिल हुए हैं? चूँकि यह सच्चा मार्ग है, इसलिए क्या इसमें बहुत से विश्वासियों को नहीं होना चाहिए? क्या समस्त मानवजाति को इसमें विश्वास नहीं करना चाहिए? क्या समस्त मानवजाति को विश्वास नहीं करना चाहिए?" ऐसे बात करने वाले लोग सत्य को नहीं समझते हैं, वे मंद दृष्टि हैं। समस्त मानवजाति की भ्रष्टता एक सीमा तक बढ़ चुकी है; बहुत कम लोग सत्य से प्रेम करते हैं, अधिकाधिक लोग अपने हितों का अनुसरण करते हैं, और इस बात की परवाह किए बिना कि वे किस विश्वास को स्वीकार करेंगे, वे सबसे पहले यह देखते हैं कि क्या यह उनके लिए लाभदायक है—जिसका अर्थ है कि जो सच्चे मार्ग पर विश्वास करते हैं उनकी संख्या निश्चित रूप से कम होती है, और जो झूठे मार्गों पर और उन मार्गों पर विश्वास करते हैं जिनसे उन्हें अनुग्रह और लाभ मिलता है, वे निश्चित रूप में संख्या में अधिक होंगे। मेरी यह व्याख्या सुनने के बाद तुम मामले के सार की वास्तविक प्रकृति का पता लगाने में समर्थ हो जाओगे। हम जिस मार्ग पर विश्वास करते हैं, वह लोगों को चंगा नहीं करता, रोटी से उनके पेट नहीं भरता है, या उन्हें अनुग्रह नहीं देता है या उनमें से दुष्टात्माओं को नहीं निकालता है। किन्तु यदि हम अपने विश्वास के मार्ग में एक बात जोड़ दें—कि जब विश्वासियों पर कोई भी विपदा पड़ेगी तो वे नहीं मरेंगे—तब संसार के सभी लोग उस पर विश्वास करेंगे। आज, यह बात हमारे मार्ग में शामिल नहीं है। परमेश्वर ने नहीं कहा है, "मैं गारंटी देता हूँ कि जो सर्वशक्तिमान परमेश्वर के नाम पर विश्वास करते हैं नहीं मरेंगे|" इसलिए, जब तुम सुसमाचार का प्रचार-प्रसार करते हो, तो तुम सावधान रहते हो। लोग पूछते हैं, "इसलिए यदि मैं सर्वशक्तिमान परमेश्वर पर विश्वास करता हूँ तो क्या मैं नहीं मरूँगा?" "मैं नहीं जानता।" "यदि वह मुझे मरने से रोक नहीं सकता है, तो उस पर विश्वास करने का कोई मतलब नहीं है।" लोग यह भी पूछेंगे, "सर्वशक्तिमान परमेश्वर पर विश्वास करने से मुझे क्या प्राप्त होगा?" "तुम सत्य को पा सकते हो।" "सत्य पाने से मुझे क्या मिलेगा?" "तुम जीवित बचे रहोगे।" "ऐसा किसने देखा है? कौन गारंटी दे सकता है? सत्य को पाने का क्या अर्थ है?" "मैं नहीं जानता।" "मैं किसी भी तरह से विश्वास नहीं कर सकता हूँ।" इस प्रकार, सर्वशक्तिमान की गवाही देना और सुसमाचार का प्रचार-प्रसार करना हमारे लिए कठिन है, क्योंकि जो सत्य से प्रेम करते हैं वे संख्या में अतिशय कम है। यह सत्य है। फिर भी सर्वशक्तिमान परमेश्वर के कार्य को स्वीकार करने के बाद, जितना अधिक हम विश्वास करते हैं, उतना ही अधिक महसूस करते हैं कि वह वास्तविक है, और उतना ही अधिक हमारा विश्वास प्रबल बन जाता है। ऐसा क्यों है? यह सत्य को समझने का प्रभाव है। कोई व्यक्ति सत्य को जितना अधिक समझता है, उतना ही अधिक वह समझता है कि यह सच्चा मार्ग और परमेश्वर का काम है। वे सत्य को जितना अधिक समझते हैं उतना ही अधिक वे स्वयं से कहते हैं "ओह! परमेश्वर द्वारा मनुष्य का इस प्रकार से उद्धार कितना अधिक वास्तविक है, सत्य को समझना वास्तव में मुझे बचा सकता है, मेरे स्वभाव में परिवर्तन ला सकता है, मुझे एक सच्चा मनुष्य बना सकता है, और मुझे सामान्य मानवता का वास्तविक जीवन जीने में सहायता कर सकता है—और इसलिए, इस मार्ग का अर्थ है।" वे अनुभव करते हैं कि सत्य को प्राप्त करना अधिक अर्थपूर्ण, योग्य और किसी भी लाभ, बीमारों की चंगा करने, या लोगों का पेट रोटी से भरने की अपेक्षा बहुमूल्य है। परिणाम स्वरूप, जो बहुत वर्षों से सर्वशक्तिमान परमेश्वर पर विश्वास करते हैं वे महसूस करते हैं कि कोई भी अनुग्रह जो उन्हें दिया जा सकता है वह कोई बहुमूल्य नहीं है, यह कि केवल सत्य को पाना ही बहुमूल्य है। और इस में, उन्होंने सच्चे मार्ग को देख लिया है। देखो, क्या वे सब जो सर्वशक्तिमान पर विश्वास करते हैं उनमें से कोई भागा है? यद्यपि कुछ लोग सत्य की खोज नहीं करते हैं, फिर भी जब तक उन्होंने कुछ वर्षों तक प्रचार सुना है, तब तक क्या वे पीछे हटना चाहेंगे? उनमें से कोई नहीं चाहेगा। और वे क्यो नहीं चाहेंगे? वे जो जानते हैं वह है कि "यही सच्चा मार्ग है, जब तक मैं परिश्रम करूँगा, अपने कर्तव्य को अच्छी तरह पूरा करूँगा, तब इस बात की बहुत संभावना है कि मैं जीवित बचा रहूँगा, कि मेरा अंत मृत्यु नहीं होगा। मृत्यु न होना बहुत मूल्यवान है।" आज, लोग नहीं जानते कि मृत्यु से बचने के लिए क्या अपेक्षित है। जैसे ही वे जान जाएँगे, तभी हर कोई विश्वासी बन जाएगा, और उनका विश्वास मज़बूत हो जाएगा।

जीवन में प्रवेश के विषय में संगति एवं प्रवचन (VI) में "परमेश्वर के कार्य का पालन करने के लिए चार आधारभूत पाठ जिनमें प्रवेश आवश्यक है" से

यदि संपूर्ण धार्मिक समुदाय इसके प्रति शत्रुतापूर्ण और विरोध में नहीं होते, तो यह सत्य मार्ग नहीं होता। स्मरण रखें: सत्य के अधिकांश मार्ग का लोगों द्वारा, यहाँ तक कि समस्त संसार द्वारा भी विरोध अवश्य किया जाना चाहिए। जब प्रभु यीशु पहली बार कार्य करने और उपदेश देने आया, तो क्या समस्त यहूदीवादियों ने उसका विरोध नहीं किया था? हर बार जब भी परमेश्वर नया काम आरंभ करता है, तो भ्रष्ट मानवजाति को इसे स्वीकार करने में बड़ी कठिनाई होती है, क्योंकि परमेश्वर का कार्य मनुष्यों की धारणाओं के असंगत होता है और उनका खण्डन करता है; लोगों में समझने की क्षमता का अभाव है, और आध्यात्मिक क्षेत्र में घुसने में अक्षम हैं, और यदि यह पवित्र आत्मा के कार्य के लिए नहीं होता, तो वे सच्चे मार्ग को स्वीकार करने में असमर्थ होते। यदि इसे परमेश्वर का काम मान लिया जाता, किन्तु धार्मिक समुदाय द्वारा उसका विरोध नहीं किया जाता, और संसार की ओर से विरोध और शत्रुता का अभाव होता, तो इससे साबित होता कि परमेश्वर का यह कार्य झूठा है। मानवजाति सत्य को स्वीकार करने में असमर्थ क्यों है? सबसे पहले, मनुष्य देह का है, वह भौतिक सार वाला है। भौतिक वस्तुएँ आध्यात्मिक क्षेत्र में घुसने में असमर्थ हैं। "आध्यात्मिक क्षेत्र में घुसने में असमर्थ" का क्या अर्थ है? इसका अर्थ है, आत्माओं को, आत्माओं और आध्यात्मिक क्षेत्र की गतिविधियों को देखने में असमर्थ होना, परमेश्वर क्या कर और कह रहा है वह अनदेखा रह जाना। लोग आध्यात्मिक क्षेत्र में अंधे हो जाएँगे। यदि तुम भौतिक जगत में आँखें बंद कर लो, तो तुम्हें कुछ नहीं दिखाई देता है। जब तुम उन्हें खोलते हो, तो तुम क्या देख सकते हो? भौतिक जगत। क्या तुम देख सकते हो कि कौन सी आत्मा लोगों में क्या करती है? क्या तुम देख सकते हो कि परमेश्वर का आत्मा क्या करने और कहने आया है? तुम नहीं देख सकते हो। कभी-कभी तुम्हें उसकी आवाज सुनाई दे सकती है, तुम पुस्तक में लिखे परमेश्वर के वचनों को पढ़ सकते हो, पर फिर भी तुम नहीं जानते हो कि परमेश्वर ने कैसे या कब इन वचनों को कहा। तुम उसकी आवाज को सुन सकते हो, पर तुम नहीं जानते हो कि वह कहाँ से आती है; तुम पृष्ठ पर मुद्रित परमेश्वर के वचनों को देखते हो, किन्तु तुम नहीं जानते हो कि उनका अर्थ क्या है। लोग आध्यात्मिक क्षेत्र में घुसने, या परमेश्वर के वचनों के स्रोत को समझने में असमर्थ हैं, और इसलिए प्रभावों को प्राप्त करने के लिए उन्हें पवित्र आत्मा द्वारा प्रबुद्धता और रोशनी, और पवित्र आत्मा के कार्य की आवश्यकता है। दूसरा, मानवजाति बहुत गहराई तक भ्रष्ट है, उसके भीतर शैतान का बहुत सा विष और बहुत सा ज्ञान भरा हुआ है, यदि वह हर चीज का मूल्यांकन शैतान की विभिन्न दार्शनिकताओं और उसके ज्ञान का उपयोग करके करता है, तो वह कभी भी यह स्थापित करने में समर्थ नहीं होगा कि सत्य क्या है। पवित्र आत्मा द्वारा प्रबुद्धता और रोशनी के बिना मनुष्य सत्य को समझने में अक्षम होगा। भ्रष्ट मानवजाति सहज प्रवृत्ति में आध्यात्मिक जगत में घुसने करने में अक्षम है। वह शैतान की दार्शनिकता और ज्ञान से भरी हुई है, और सत्य की पहचान करने में असमर्थ है। और इसलिए सच्चे मार्ग को अपरिहार्य रूप में मनुष्य के उत्पीड़न और अस्वीकरण के अधीन किया जाता है। मनुष्य के लिए शैतान के ज्ञान और उसकी दार्शनिकता को स्वीकार करना क्यों आसान है? सबसे पहले, क्योंकि यह उनकी धारणाओं और उनके देह के हितों के अनुरूप है, और यह उनकी देह के लिए लाभदायक है। वे अपने आप से कहते हैं कि, "इस तरह के ज्ञान को स्वीकार करना मेरी सहायता करता है: यह मेरी उन्नति करवाएगा, यह मुझे सफल बनाएगा, और मुझे वस्तुओं को प्राप्त करने की अनुमति देगा। इस तरह के ज्ञान के साथ लोग मेरी ओर देखेंगे।" देखो कि कैसे जिन बातों से लोगों लाभ मिलता है वे उनकी धारणाओं के अनुरूप हैं। ... इस हद तक भ्रष्ट हो जाने और आध्यात्मिक क्षेत्र में प्रवेश करने में असमर्थ हो जाने पर, लोग केवल परमेश्वर का विरोध ही कर सकते हैं, और इस प्रकार परमेश्वर के कार्य के आगमन को मनुष्य का अस्वीकरण, विरोध और निंदा ही मिली है। क्या यह अपेक्षित नहीं है? यदि परमेश्वर के काम के आगमन को संसार और मानवजाति की ओर से निंदा और विरोध नहीं मिला होता, तो इससे यह साबित होता कि यह सत्य नहीं है। यदि परमेश्वर द्वारा कही गई सब बातें लोगों की धारणाओं के अनुरूप होती, तो क्या वे उसकी भर्त्सना करते? क्या वे उसका विरोध करते? वे निश्चित रूप से नहीं करते।

"फेलोशिप एण्ड प्रीचिंग ऑफ दी अबव कनसर्निग स्प्रेडिंग द गॉस्पल" से

केवल ऐसी कलीसिया जो पवित्र आत्मा के कार्य से संपन्न है ही परमेश्वर की कलीसिया है, और यदि इसमें ऐसे लोग हैं जो सचमुच सत्य की खोज करते हैं और परमेश्वर के कार्य का आज्ञपालन करते हैं केवल तभी कोई कलीसिया पवित्र आत्मा के कार्य से संपन्न हो सकती है; परमेश्वर उन कलीसियाओं को मान्यता देता है जिनमें पवित्र आत्मा का कार्य होता है, और उन कलीसियाओं को मान्यता नहीं देता है जो पवित्र आत्मा के कार्य से रहित होती हैं। यह परमेश्वर के चुने हुए लोगों द्वारा समझ लिया जाना चाहिए।

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एक वास्तविक कलीसिया उन लोगों से बनती है जो परमेश्वर में सचमुच विश्वास करते हैं और सत्य से प्रेम करते हैं, और यह उन लोगों की मण्डली है जो परमेश्वर से डरते हैं। केवल तभी यह कलीसिया कहला सकती है। ... केवल ऐसे लोगों की एक मण्डली ही एक कलीसिया है जो परमेश्वर द्वारा पूर्वनियत और चयन किए जा चुके हैं और पवित्र आत्मा के कार्य से संपन्न हैं।

कलीसिया के कार्य की सहभागिता और प्रबन्धों के वार्षिक वृतांत (II) में "स्थानीय कलीसिया के मध्य गड़बड़ी पर कैसे चर्चा करें और सुलझाएं" से

कलीसिया उनसे बनती है जो परमेश्वर के द्वारा सचमुच पूर्वनियत और चयन किए जा चुके हैं—यह उनसे बनती है जो सत्य से प्रेम करते हैं, सत्य की खोज करते हैं, और पवित्र आत्मा के काम से संपन्न हैं। केवल जब ऐसे लोग परमेश्वर के वचन को खाने और पीने, कलीसियाई जीवन जीने, परमेश्वर के कार्य का अनुभव करने, और परमेश्वर के प्राणी के रूप में अपने कर्तव्य को पूरा करने के लिए एकत्रित होते हैं तभी यह एक कलीसिया हो सकती है। यदि एक जमावड़ा कहता है कि वह सचमुच परमेश्वर पर विश्वास करता है, किन्तु सत्य से प्रेम या सत्य की खोज नहीं करता है, और पवित्र आत्मा के कार्य से रहित है, और धार्मिक रीति-रिवाजों, और प्रार्थनाओं को करता है, और परमेश्वर के वचनों को पढ़ता है, तो वह कलीसिया नहीं है। अधिक सटीकता से, पवित्र आत्मा के कार्य से रहित कलीसियाएँ कलीसियाएँ नहीं हैं; वे केवल धार्मिक स्थल हैं और ऐसे लोग हैं जो धार्मिक समारोह करते हैं। वे वास्तव में परमेश्वर का आज्ञापालन करने वाले और परमेश्वर के कार्य का अनुभव करने वाले लोग नहीं हैं।

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कलीसिया उन लोगों का समूह है जो परमेश्वर पर सचमुच विश्वास करते हैं और सत्य की खोज करते हैं, और उनमें कोई भी दुष्ट नहीं होता है—वे कलीसिया से संबंधित नहीं होते हैं। यदि ऐसे लोगों का एक समूह एक साथ इकट्ठा होता है जिन्होंने सत्य की खोज नहीं की और सत्य को अभ्यास में लाने के लिए कुछ नहीं किया, तो क्या यह कोई कलीसिया होगी? यह क्या होगा? यह एक धार्मिक स्थल या कोई जमावड़ा होगा। कलीसिया अवश्य ऐसे लोगों से बनी होनी चाहिए जो परमेश्वर पर सचमुच विश्वास करते हैं और सत्य की खोज करते हैं, जो लोग परमेश्वर के वचनों को खाते और पीते हैं, और परमेश्वर की आराधना करते हैं, अपने कर्तव्य को करते हैं, और परमेश्वर के कार्य का अनुभव करते हैं और पवित्र आत्मा के कार्य को प्राप्त कर चुके हैं। केवल यही एक कलीसिया है। इस प्रकार, जब तुम कलीसिया का मूल्यांकन करते हो, तो तुम्हें सबसे पहले यह अवश्य देखना चाहिए कि उसमें किस प्रकार के लोग हैं। दूसरा, तुम्हें अवश्य देखना चाहिए कि उनमें पवित्र आत्मा का कार्य है या नहीं; यदि उनकी सभा पवित्र आत्मा के कार्य से रहित है, तो वह कलीसिया नहीं है, और यदि यह उन लोगों का जनसमूह नहीं है जो सत्य की खोज करते हैं, तो यह कलीसिया नहीं है। यदि किसी कलीसिया में एक भी ऐसा नहीं है जो सचमुच सत्य की खोज करता है, और वह पवित्र आत्मा के कार्य से सर्वथा रहित है, तब यदि इसमें कोई व्यक्ति हो जो सत्य की खोज करना चाहता हो, और वह ऐसी कलीसिया में बना रहता है, तो क्या उस व्यक्ति को बचाया जा सकता है? उन्हें नहीं बचाया जा सकता है, और उन्हें उस जमावड़े को छोड़ देना चाहिए और जितनी जल्दी हो सके किसी कलीसिया को ढूँढना चाहिए। यदि, किसी कलीसिया के भीतर, तीन या पाँच ऐसे लोग हों जो सत्य की खोज करते हों, और 30 या 50 ऐसे लोग हों जो केवल जमावड़ा हों, तो उन तीन या पाँच लोगों को जो परमेश्वर पर वास्तव में विश्वास करते हैं और सत्य की खोज करते हैं एक साथ इकट्ठा हो जाना चाहिए; यदि वे एक साथ एकत्रित हो जाते हैं तो उनका जनसमूह तब भी एक कलीसिया, बहुत कम सदस्यों वाली एक कलीसिया है, किन्तु जो शुद्ध है।

जीवन में प्रवेश के विषय में संगति एवं प्रवचन (VII) में "कलीसिया के वास्तविक अर्थ को समझना और अंतिम समय में कलीसिया का कार्य पांच सिद्धांतों के अनुसार करना अति महत्वपूर्ण है" से

बहुत से लोग परमेश्वर में विश्वास करते हैं किन्तु प्रधान गिरजाघरों की आराधना करते हैं और पादरियों पर अंधा विश्वास करते हैं—परिणाम यह होता है कि परमेश्वर पर कई वर्षों तक विश्वास करने के बाद, उन्होंने अभी तक सत्य को नहीं समझा है या वास्तविकता में प्रवेश नहीं किया है, उन्होने कुछ धार्मिक सिद्धांतों और धार्मिक अनुष्ठानों और अभ्यासों को प्राप्त कर लिया है, और वे परमेश्वर को वास्तव में नहीं जानते हैं। परिणाम स्वरूप, उनके जीवन स्वभाव में जरा सा भी परिवर्तन नहीं हुआ है। आश्चर्य नहीं कि, तब ऐसे धार्मिक अगुवे और पादरी अपना पूरा जीवन परमेश्वर पर विश्वास करते हुए और उपदेश देते हुए व्यतीत करते हैं, और फिर भी उनमें से एक भी परमेश्वर को वास्तव में नहीं जानता है, या ऐसा हृदय नहीं रखता है जो परमेश्वर से डरता हो; वे आरंभिक दिनों के फरीसियों के समान बने रहते हैं, मसीह का विरोध करने के लिए अपनी पूरी कोशिश करते हुए, सच्चे मार्ग की निंदा करते है, और अपनी स्वयं की हैसियत और आजीविका के वास्ते परमेश्वर के चुने हुए लोगों को फुसलाते और उन पर नियंत्रण करते हैं। वे अपने आप को परमेश्वर के झुंड को इतना प्रेम करने वाला और सँजोने वाला विशुद्ध रूप से अपनी आजीविका को बचाने के लिए प्रकट करते हैं, ठीक वैसे ही जैसे कि व्यापारी लोग पैसा बनाने और धनी बनने के लिए अपने ग्राहकों को ईश्वर जैसा मानते हैं। धार्मिक समुदाय जो भी करता है वह परमेश्वर के प्रति इसके विरोध की एक अभिव्यक्ति है; धार्मिक अनुष्ठान के अलावा और कुछ नहीं है, और सत्य की जरा सी भी वास्तविकता से युक्त नहीं होती है, और इसमें पवित्र आत्मा के कार्य का जरा सा अंश भी नहीं होता है। स्पष्ट है कि धार्मिक समुदाय सच्चे परमेश्वर की नहीं, बल्कि अस्पष्ट और काल्पनिक परमेश्वर की आराधना करता है। यह धार्मिक सिद्धांतों, और बाइबल के शाब्दिक ज्ञान का उपदेश देता है, और यह पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता और रोशनी से पूरी तरह से रहित है। इसलिए, धार्मिक समुदाय मूलरूप से लोगों को परमेश्वर के सामने लाने में अक्षम है, यह लोगों की परमेश्वर पर विश्वास करने के सही मार्ग पर अगुवाई नहीं कर सकता है, और, इसके अतिरिक्त, यह लोगों को सत्य की वास्तविकता में ले जाने में, या उन्हें बचाए जाने में उनकी सहायता करने में असमर्थ है। इसका कारण यह है कि इसके अगुवों और पादरियों को परमेश्वर के कार्य का अनुभव करते समय पवित्र आत्मा के द्वारा पूर्ण नहीं किया गया और बनाया नहीं गया है, बल्कि इसके बजाय वे किसी शिक्षालय से स्नातक होने और डिप्लोमा दिए जाने के बाद धार्मिक समुदाय में अगुवे या पादरी बन गये हैं। उनमें पवित्र आत्मा के कार्य और पुष्टि के बिना हैं, उनके पास परमेश्वर का जरा सा भी सच्चा ज्ञान नहीं है, और उनके मुँह केवल आध्यात्मविद्या संबंधी का ज्ञान और सिद्धांतों के अलावा और कुछ नहीं बोल सकते हैं। उन्होंने वास्तव में कुछ भी अनुभव नहीं किया है। ऐसे लोग परमेश्वर के द्वारा उपयोग किये जाने के सर्वथा अयोग्य है; वे कैसे परमेश्वर के सामने लोगों की अगुवाई कर सकते हैं? वे अपनी पात्रता के साक्ष्य के रूप में शिक्षालय से प्राप्त स्नातकता को अहंकार के साथ दर्शाते हैं, वे बाइबल के अपने ज्ञान पर इठलाने के लिए जो कुछ भी कर सकते हैं, करते हैं, वे असह्य रूप से अभिमानी हैं—और इस कारण से, परमेश्वर द्वारा उनकी निंदा की जाती है, और परमेश्वर द्वारा उनसे घृणा की जाती है, और ये पवित्र आत्मा का कार्य खो चुके हैं। इस बारे में कोई संदेह नहीं है। क्यों धार्मिक समुदाय मसीह का प्राणघातक शत्रु बन गया है एक बहुत विचारोत्तेजक प्रश्न है। क्या यह इस बात को दर्शाता है कि, अनुग्रह के युग में, यहूदीवादियों ने यीशु मसीह को सलीब पर चढ़ाया था? अंत के दिनों के राज्य के युग में धार्मिक समुदाय ने एकता बनाई है और अंत के दिनों में परमेश्वर के कार्य का विरोध और आलोचना करने में पूरे प्रयास समर्पित किए, यह अंत के दिनों में मसीह के देहधारण को इनकार और अस्वीकृत करता है, इसने देहधारी परमेश्वर और परमेश्वर की कलीसिया के बारे में बहुत सी अफवाहें बनाई, और इनके विरुद्ध आक्रमण किए, इनका तिरस्कार किया, और ईशनिंदा की है, और इसने बहुत पहले ही लौटकर आये, अंत के दिनों के मसीह, यीशु को सलीब पर चढ़ा दिया है। यह प्रमाणित करता है कि धार्मिक समुदाय बहुत पहले से ही शैतान की सेनाओं में पतित हो चुका है जो परमेश्वर का विरोध और उसके प्रति विद्रोह करती हैं। धार्मिक समुदाय परमेश्वर के द्वारा शासित नहीं होता है, और यह सत्य के द्वारा तो बिल्कुल भी शासित नहीं होता है; वह पूरी तरह से भ्रष्ट मानवों, और उससे भी अधिक मसीह के विरोधियों के द्वारा शासित होता है।

जब लोग परमेश्वर पर इस तरह के—एक ऐसे जो शैतान से संबंधित है और दुष्टात्माओं तथा महीस के विरोधियों के द्वारा शासित और नियंत्रित होती है—धार्मिक स्थलों में विश्वास करते हैं तो वे केवल धार्मिक सिद्धांतों को समझने में सक्षम होते है, वे केवल धार्मिक अनुष्ठानों और विनियमों का पालन कर सकते हैं, और वे कभी भी सत्य को नहीं समझेंगे, परमेश्वर के काम का अनुभव नहीं करेंगे, और बचाए जाने में सर्वथा अक्षम हैं। यह परम सिद्धांत है। क्योंकि धार्मिक स्थलों में पवित्र आत्मा के कार्य के बारे में कुछ भी नहीं है, और ये ऐसे स्थान हैं जो परमेश्वर को अप्रिय हैं, जिनसे परमेश्वर घृणा करता है, और जिन्हें परमेश्वर निंदित और श्रापित करता है। परमेश्वर ने धर्म को कभी भी मान्यता नहीं दी, इसकी प्रशंसा को कभी भी बिल्कुल नहीं की है, और यीशु के समय से ही धार्मिक समुदाय की परमेश्वर द्वारा निंदा की गई है। इसलिए, जब तुम परमेश्वर पर विश्वास करते हो तो तुम्हें उन स्थानों को अवश्य खोजना चाहिए जो पवित्र आत्मा के कार्य से युक्त हों; केवल ये ही सच्ची कलीसिया हैं, और केवल सच्ची कलीसियाओं में ही तुम परमेश्वर की वाणी को सुनने, और परमेश्वर के कार्य के पदचिह्नों को खोजने में समर्थ होगे। यही वे साधन हैं जिनके द्वारा परमेश्वर की खोज की जाती है।

कलीसिया के कार्य की सहभागिता और प्रबन्धों के वार्षिक वृतांत (I) में, "वास्तव में सत्य को समझने के प्रभाव" से

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