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अध्याय 6 विभेदन के कई रूप जिन्हें परमेश्वर में तुम्हारे विश्वास में तुम्हें धारण करना चाहिए

5. परमेश्वर का अनुसरण करने और लोगों का अनुसरण करने में अंतर

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

परमेश्वर का अनुसरण करने में प्रमुख महत्व इस बात का है कि हर चीज़ आज परमेश्वर के वचनों के अनुसार होनी चाहिए: चाहे तुम जीवन प्रवेश का अनुसरण कर रहे हो या परमेश्वर की इच्छापूर्ति, सब कुछ आज परमेश्वर के वचनों के आस-पास ही केन्द्रित होना चाहिए। यदि तुम्हारे समागम और अनुसरण परमेश्वर के वचनों के आसपास केन्द्रित नहीं होते हैं, तो तुम परमेश्वर के वचनों के लिए एक अजनबी हो, और पवित्र आत्मा के कार्य से पूरी तरह से वंचित हो। परमेश्वर ऐसे लोग चाहता है जो उसके पदचिन्हों का अनुसरण करें। भले ही जो तुमने पहले समझा था वह कितना ही अद्भुत और शुद्ध क्यों न हो, परमेश्वर उसे नहीं चाहता है, और यदि तुम ऐसी चीजों को दूर नहीं कर सकते, तो वे भविष्य में तुम्हारे प्रवेश के लिए एक बड़ी बाधा होंगी। वे सभी धन्य हैं जो पवित्र आत्मा के वर्तमान प्रकाश का अनुसरण करने में सक्षम हैं। पिछले युगों के लोग भी परमेश्वर के नक़्शेकदम पर चलते थे, फिर भी वे आज तक इसका अनुसरण नहीं कर सके; यह आखिरी दिनों के लोगों के लिए आशीर्वाद है। जो लोग पवित्र आत्मा के वर्तमान कार्य का अनुसरण कर सकते हैं, और जो परमेश्वर के नक्शेकदम पर चलने में सक्षम हैं, इस तरह कि चाहे परमेश्वर उन्हें जहाँ कहीं भी ले जाए वे उसका अनुसरण करते ही हैं—वे लोग हैं जिन्हें परमेश्वर का आशीर्वाद प्राप्त है। जो लोग पवित्र आत्मा के वर्तमान कार्य का अनुसरण नहीं करते हैं, उन्होंने परमेश्वर के वचनों के कार्य में प्रवेश नहीं किया है, और चाहे वे कितना भी काम करें, या उनकी पीड़ा कितनी भी बड़ी हो, या वे कितनी ही भाग-दौड़ करें, परमेश्वर के लिए इनमें से किसी बात का कोई महत्व नहीं है, और वह उनकी सराहना नहीं करेगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर के सबसे नए कार्य को जानो और परमेश्वर के चरण-चिन्हों का अनुसरण करो" से उद्धृत

कुछ लोग सत्य का आनन्द नहीं लेते हैं, न्याय का तो बिल्कुल भी नहीं। बल्कि वे शक्ति और सम्पत्तियों में आनन्दित होते हैं; इस प्रकार के लोग दंभी समझे जाते हैं। ये लोग अनन्य रूप से दुनिया के प्रभावशाली सम्प्रदायों तथा सेमिनरी से आने वाले पादरियों और शिक्षकों को खोजते हैं। सत्य के मार्ग को स्वीकार करने के बावजूद, वे संशय में रहते हैं और अपने आप को पूरी तरह से समर्पित करने में असमर्थ होते हैं। वे परमेश्वर के लिए बलिदान करने की बात करते हैं, किन्तु उनकी नज़रें बड़े पादरियों और शिक्षकों पर केन्द्रित रहती हैं, और मसीह को एक ओर कर दिया जाता है। उनके हृदयों में प्रसिद्धि, वैभव और महिमा भरी रहती हैं। उन्हें बिल्कुल विश्वास नहीं होता है कि ऐसा मामूली सा आदमी बहुत से लोगों पर विजय प्राप्त कर सकता है, यह कि एक इतना साधारण व्यक्ति लोगों को पूर्ण बनाने में सक्षम है। उन्हें बिल्कुल विश्वास नहीं होता है कि ये धूल और घूरे में पड़े नाचीज़ परमेश्वर के द्वारा चुने गए लोग हैं। वे मानते हैं कि यदि ऐसे लोग परमेश्वर के उद्धार की योजना के लक्ष्य रहे होते, तो स्वर्ग और पृथ्वी उलट-पुलट हो जाते और सभी लोग ठहाके लगाकर हँसते। उनका मानना है कि यदि परमेश्वर ने ऐसे नाचीज़ों को पूर्ण बनाने के लिए चुना होता, तो वे सभी बड़े लोग स्वयं परमेश्वर बन जाते। उनके दृष्टिकोण अविश्वास से दूषित हैं; दरअसल, अविश्वास से दूर, वे हास्यास्पद जानवर हैं। क्योंकि वे केवल पद, प्रतिष्ठा और सत्ता को महत्व देते हैं; वे विशाल समूहों और सम्प्रदायों को ऊँचा सम्मान देते हैं। उनमें उनके लिए बिल्कुल भी सम्मान नहीं है जिनकी अगुवाई मसीह करते हैं; वे मात्र विश्वसघाती हैं जिन्होंने मसीह से, सत्य से और जीवन से अपना मुँह मोड़ लिया है।

आप जिसकी प्रशंसा करते हैं वह मसीह की विनम्रता नहीं, बल्कि विशेष हैसियत वाले उन झूठे चरवाहों की है। आप मसीह की सुन्दरता या बुद्धि से प्रेम नहीं करते हैं, बल्कि उन आवारा लोगों से प्रेम करते हैं जो घृणित संसार से जुडे हैं। आप मसीह की पीड़ा पर हँसते हैं, जिसके पास अपना सिर टिकाने तक की जगह नहीं है, किन्तु उन मुरदों की तारीफ़ करते हैं जो चढ़ावों को हड़प लेते हैं और लंपटता का जीवन जीते हैं। आप मसीह के साथ-साथ कष्ट सहने को तैयार नहीं हैं, परन्तु उन धृष्ट मसीह विरोधियों की बाहों में प्रसन्नता से जाते हैं, हालाँकि वे आपको सिर्फ देह, लिखित पत्र और नियंत्रण ही प्रदान कर सकते हैं। फिर भी आपका हृदय उनकी ही ओर, उनकी प्रतिष्ठा की ओर, उनकी हैसियत, उनके प्रभाव की ओर जाता रहता है, फिर भी आप रवैया बनाये रखते हैं जहाँ आपमसीह के कार्य को स्वीकारना कठिन पाते हैं और आप उसे स्वीकारने के अनिच्छुक हैं। इसीलिए मैं कहता हूँ कि आपमें मसीह को स्वीकार करने का विश्वास नहीं है। आपने आज तक उसका अनुसरण सिर्फ़ इसलिए किया क्योंकि आप बाध्य थे। आपके हृदय में हमेशा कई अहंकारी आचरण वाली छवियों का ऊँचा स्थान रहा है; आप न तो उनके हर वचन और कर्म को, और न ही उनके प्रभावशाली वचनों और हाथों को भूल सकते हैं। आपके हृदय में वे हमेशा सर्वोच्च और नायक हैं। किन्तु आज के मसीह के लिए ऐसा नहीं है। आपके हृदय में वह हमेशा महत्वहीन और हमेशा आदर के अयोग्य रहा है। क्योंकि वह बहुत ही साधारण है, उसका बहुत ही कम प्रभाव है और वह अहंकारी तो बिल्कुल नहीं है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "क्या आप परमेश्वर के एक सच्चे विश्वासी हैं?" से उद्धृत

संदर्भ के लिए धर्मोपदेश और संगति के उद्धरण:

परमेश्वर का अनुसरण करने का अर्थ है हर चीज़ में परमेश्वर की बात मानना, परमेश्वर के समस्त आयोजन को समर्पित होना, उसके वचनों के अनुसार आचरण करना, और परमेश्वर की ओर से आने वाली सब बातों को स्वीकार करना। जो लोग परमेश्वर पर विश्वास करते हैं उन्हें परमेश्वर का अनुसरण करना चाहिए, मगर अधिकतर लोग अनजाने में लोगों का अनुसरण करते हैं। यह बात बेतुकी और दुखदायी दोनों है। सच कहें तो, लोग जिस का भी अनुसरण करते हैं, उस पर विश्वास करेंगे। यद्यपि कुछ लोग नाममात्र के लिए परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, किन्तु उनके हृदय में कोई परमेश्वर नहीं होता है। अपने हृदयों में वे उस व्यक्ति की आराधना करते हैं जो उनकी अगुवाई कर रहा है। जब लोग इस हद तक अगुवा की ही बात मानते हैं कि वे परमेश्वर के आयोजन से भी इंकार कर देते हैं, तो यह सटीक रूप से, परमेश्वर पर विश्वास करते हुए लोगों का अनुसरण करने का प्रकटन है। सत्य को पाने से लोग इस प्रकार के भ्रमपूर्ण तरीके पर विश्वास करते हैं और यह भी नहीं जानते कि परमेश्वर का अनुसरण क्या होता है। वे नहीं जानते कि परमेश्वर का अनुसरण करने और लोगों का अनुसरण करने के बीच अंतर कैसे करना है। जो कोई भी सबसे अच्छी, सबसे ऊंची बात करता है, वे उसे पिता कहकर या माता कहकर बुलाते हैं। उनके लिए जिसके पास भी दूध है, वह उनकी माता है, और जिसके पास भी सामर्थ्य है, वह उनका अपना पिता है। लोग इतने दयनीय हो सकते हैं। यह कहा जा सकता है कि, अधिकतर लोगों की, अलग-अलग अंशों में, ऐसी स्थिति होती है।

परमेश्वर का अनुसरण करने का क्या अर्थ है? और तुम इसे कैसे अभ्यास में लाते हो? परमेश्वर का अनुसरण करने का अर्थ परमेश्वर की प्रार्थना करने और परमेश्वर की स्तुति करने मात्र को ही शामिल नहीं करता है; जो महत्वपूर्ण है वह है परमेश्वर के वचनों को खाना और पीना और परमेश्वर के वचनों के अनुसार जीवन जीना, सत्य के अनुसार क्रिया करना, परमेश्वर के वचनों में जीवन अनुभव का मार्ग खोजना, परमेश्वर के आदेश को स्वीकार करना, अपने हर एक कर्तव्य को उचित प्रकार से पूरा करना, और पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन के अनुसार अपने सामने के मार्ग पर चलना। विशेष रूप में, महत्वपूर्ण समयों पर, जब तुम्हारे ऊपर बड़ी समस्याएँ पड़ती हैं, तब परमेश्वर के इरादों को खोजने की, मनुष्य के सिद्धांतों द्वारा धोखा दिए जाने से सावधान रहने, और किसी के नियंत्रण में न पड़ने की और भी अधिक आवश्यकता होती है। "परमेश्वर की ओर से जो कुछ आता है मैं उसका आज्ञापालन और अनुसरण करता हूँ, किन्तु यदि यह मनुष्य की इच्छा से आता है तो मैं उसे दृढ़ता से अस्वीकार करता हूँ। जब अगुवे या कार्यकर्ता जो कहते हैं वह परमेश्वर की व्यवस्थाओं के टकराव में होता है, तब मैं पूर्णरूप में परमेश्वर का अनुसरण करता हूँ और लोगों को अस्वीकृत करता हूँ। यदि यह पूर्णतः परमेश्वर की व्यवस्थाओं और इच्छा के अनुसार है, तो मैं इसे सुन सकता हूँ।" जो लोग इस तरह से अभ्यास करते हैं ये वे लोग हैं जो परमेश्वर का अनुसरण करते हैं।

और लोगों का अनुसरण करने का क्या अर्थ है? इसका अर्थ है एक व्यक्ति उनका अनुसरण करता है जिनकी वो आराधना करता है। उसके हृदय में, परमेश्वर का अधिक कद नहीं होता है; वो केवल परमेश्वर पर विश्वास करने कि एक तख्ती टाँगे रहता है। वो बस लोगों की नकल करता है और उनके उदाहरण का अनुसरण करता है। विशेष रूप से बड़ी बातों में, वो लोगों को निर्णय लेने देता है, लोगों को उसके भाग्य पर नियंत्रण करने देता है। वो स्वयं परमेश्वर की इच्छा की खोज नहीं करता है, और लोगों की बातों के विषय में विवेक का इस्तेमाल नहीं करता है। जब तक जो वो सुनते है वह उसे विवेकसंगत लगता है, तब इस बात की परवाह किए बिना कि उनकी कही बातें सत्य के अनुरूप है या नहीं, वो उन्हें स्वीकार कर उसका पालन करता है। ये लोगों का अनुसरण करने वाले व्यक्ति का आचरण है। परमेश्वर में उसके विश्वास का कोई सिद्धांत नहीं हैं और उसके मामलों को संभालने में कोई सत्यता नहीं है। जो भी विवेक के साथ बोलता है वो उससे सहमत होता है। यदि उसका आराध्य कोई गलत मार्ग अपना ले, तो वो अंत तक उसका अनुसरण करेगा। यदि परमेश्वर उसके आराध्य व्यक्तियों की निंदा करता है, तो वो परमेश्वर के बारे में धारणा बना लेगा और अपने आराध्य व्यक्ति से कस कर चिपका रहेगा। वो विवेक देता है कि उसे उसकी सुननी चाहिए जो उसका प्रभारी है। एक उच्च अधिकारी, एक व्यवहारिक प्रबन्धक की तुलना में कुछ नहीं है। यह बिलकुल एक मूर्ख का विवेक है। जो मनुष्य का अनुसरण करते हैं वे इस हद तक भ्रमित होते हैं। जो लोगों का अनुसरण करते हैं उनके हृदय में परमेश्वर नहीं होता, सत्य नहीं होता, और वे मूर्ति-पूजक होते हैं, और अन्य लोगों द्वारा भरमाए गए हैं, वे परमेश्वर के सच्चे विश्वासी नहीं हैं। केवल परमेश्वर के अनुयायी ही वास्तव में परमेश्वर पर विश्वास करते हैं।

— ऊपर से संगति में से उद्धृत

बहुत से लोग परमेश्वर में विश्वास करते हैं किन्तु नहीं जानते हैं कि परमेश्वर का आज्ञापालन करने का क्या अर्थ है, और सोचते हैं कि हर चीज़ में अपने अगुवों की सुनना और परमेश्वर का आज्ञापालन करना एक ही बात है। ऐसा विचार पूर्ण रूप से बेतुका है, क्योंकि उनकी आज्ञाकारिता का स्रोत गलत है। वे मानते हैं कि अपने अगुवों की सुनना ही परमेश्वर का आज्ञापालन करना है। इस विचार के अनुसार परमेश्वर में विश्वास करना नाम के लिए परमेश्वर पर विश्वास करना है; वास्तविकता में, ये लोग लोगों पर ही विश्वास करते हैं। ...

जब हम परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, तो परमेश्वर को हमारे हृदयों पर अग्रणी स्थिति धारण करनी चाहिए, हमें सभी मामलों में नियंत्रण परमेश्वर को आत्मसमर्पित कर देना चाहिए, हमें सभी चीज़ों में परमेश्वर के इरादों की खोज करनी चाहिए, हमारे कार्य परमेश्वर के वचनों के अनुसार, और पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन के अनुसार होने चाहिए, और जो कुछ भी परमेश्वर की ओर से आता है हमें उस सब का आज्ञापालन करना चाहिए। यदि तुम लोगों की सुनते हो तो यह प्रमाणित करता है कि तुम्हारे हृदय में परमेश्वर के लिए जगह नहीं है, यह कि तुम्हारे हृदय में केवल लोगों के लिये स्थान है। लोगों के लिये सत्य की खोज करने और परमेश्वर की इच्छा को समझने से अधिक महत्वपूर्ण कुछ भी नहीं है। यदि तुम परमेश्वर के अभिप्रायों को खोजने और उसकी इच्छा को समझने में ध्यान केंद्रित नहीं करते हो, तो तुम्हारी आज्ञाकारिता सच्ची नहीं है। इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता है कि उनकी बातें कितनी सही लगती हैं, यदि तुम सदैव लोगों की सुनते हो, तब सार रूप में तुम लोगों का आज्ञापालन कर रहे हो—जो कि परमेश्वर का आज्ञापालन करने जैसा बिलकुल भी नहीं है। वास्तव में, यदि परमेश्वर पर विश्वास करने वाले परमेश्वर के वचनों से सीधे उसके इरादों समझने में समर्थ हैं, यदि वे उसके वचनों में अभ्यास करने का अपना मार्ग पा सकते हैं, और वे उसके वचनों में सत्य की संगति करते हैं, और सत्य को समझते हैं, जिसके बाद वे इसे अभ्यास में लाते हैं, और यदि महत्वपूर्ण पलों में, वे अधिक प्रार्थना कर सकते हैं, और पवित्र आत्मा की अगुवाई की खोज कर सकते हैं, और पवित्रात्मा के अभिप्रायों का आज्ञापालन कर सकते हैं, तो यह वास्तव में परमेश्वर का आज्ञापालन करना है। जो परमेश्वर का आज्ञापालन करते हैं वे परमेश्वर के वचनों में मार्ग को खोजते हैं, परमेश्वर के वचनों में उनकी समस्याएँ हल हो जाती हैं, और वे पवित्र आत्मा की अगुवाई में कार्य करते हैं; यही परमेश्वर का सच्चा आज्ञापालन करना है। जो हर बात में अपने अगुवों की सुनते हैं वे निश्चित रूप से अपने हृदयों में परमेश्वर से दूर भटक चुके हैं। इतना ही नहीं, वे परमेश्वर के सम्मुख शांति में नहीं हैं, वे ऐसे लोग नहीं है जो परमेश्वर के सम्मुख रहते हैं और सत्य को खोजते हैं, परमेश्वर के साथ उनका कोई संबंध नहीं है, और उनके कार्य के पीछे का सिद्धांत है कि जो कोई भी सही बातों को कहता है उसकी सुनो और जब तक वह उनका अगुवा कुछ भी कहता है, वे उसका आज्ञापालन करेंगे। ऐसा अभ्यास हास्यास्पद है। उनमें न तो सत्य है, और न अंतर करने की योग्यता है, वे केवल अपनी धारणाओं या मस्तिष्क के अनुसार केवल यह स्थापित कर सकते हैं कि क्या सही है, और क्या गलत है. इसलिए वे कैसे जान सकते हैं कि क्या यह सत्य के अनुरूप है? यदि वे ऐसे दृष्टिकोण के अनुसार परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, तब अपने जीवन भर वे कभी सत्य को नहीं समझेंगे और परमेश्वर को नहीं जानेंगे। विश्वास का ऐसा रूप अपने मस्तिष्क पर विश्वास करना और अपने मार्ग पर चलना कहा जा सकता है, और उनका व्यवहारिक परमेश्वर से कोई संबंध नहीं हैं।

— ऊपर से संगति में से उद्धृत

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