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अध्याय 6 विभेदन के कई रूप जिन्हें परमेश्वर में तुम्हारे विश्वास में तुम्हें धारण करना चाहिए

5. परमेश्वर का अनुसरण करने और लोगों का अनुसरण करने में अंतर

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

परमेश्वर का अनुसरण करने में प्रमुख महत्व इस बात का है कि हर चीज परमेश्वर के वास्तविक वचनों के अनुसार होनी चाहिए: चाहे तुम जीवन में प्रवेश कर रहे हो या परमेश्वर की इच्छा की पूर्ति, सब कुछ परमेश्वर के वास्तविक वचनों के आस-पास ही केंद्रित होना चाहिए। यदि तुम्हारा समागम और अनुसरण परमेश्वर के वास्तविक शब्दों के आसपास केंद्रित नहीं होते हैं, तो तुम परमेश्वर के शब्दों के लिए एक अजनबी हो, और पवित्र आत्मा के कार्य से पूरी तरह से वंचित हो।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "परमेश्वर के सबसे नए कार्य को जानो और परमेश्वर के चरण-चिन्हों का अनुसरण करो" से

कुछ आवेगशीलता से विश्वास करते हैं कि जहां पवित्र आत्मा का कार्य है, वहीं परमेश्वर का प्रकटन है। अन्यथा उनका यह मानना है कि जहां आध्यात्मिक मूर्तियां हैं, वहीं परमेश्वर का प्रकटन है। अन्यथा उनका यह मानना है कि जहां लोगों को अच्छी पहचान है, वहाँ परमेश्वर का प्रकट होना है। अभी के लिए, हम विचार विमर्श नहीं करते हैं कि ये मान्यताएं सही हैं या गलत हैं। इस तरह के प्रश्न की व्याख्या करने के लिए, हमारा पहले एक उद्देश्य के विषय में स्पष्ट होना अनिवार्य हैः हम परमेश्वर के पदचिन्हों को खोज रहे हैं। हम आध्यात्मिक व्यक्तियों को नहीं खोज रहे हैं, प्रसिद्ध मूर्तियों का अनुसरण तो बिल्कुल नहीं कर रहे हैं; हम परमेश्वर के पदचिन्हों का अनुसरण कर रहे हैं। वैसे, चूँकि हम परमेश्वर के पदचिन्हों को खोज रहे हैं, हमें अवश्य ही परमेश्वर की इच्छा, परमेश्वर के वचन, परमेश्वर के कथन की खोज करनी चाहिए; क्योंकि जहां परमेश्वर के नए वचन हैं, वहाँ परमेश्वर की वाणी है, और जहां परमेश्वर के पदचिन्ह हैं, वहाँ परमेश्वर के कार्य हैं। जहां परमेश्वर की अभिव्यक्ति है, वहाँ परमेश्वर का प्रकट होना है, और जहां परमेश्वर का प्रकट होना है,वहाँ मार्ग, सत्य और जीवन का अस्तित्व है। परमेश्वर के पदचिन्हों को ढूँढते हुए, तुम लोगों ने उन शब्दों की अवहेलना कर दी कि "परमेश्वर ही मार्ग, सत्य और जीवन है।" इसलिए कई लोग जब सत्य प्राप्त करते हैं, वे विश्वास नहीं करते कि वे परमेश्वर के पदचिन्हों को पा चुके हैं और बहुत कम परमेश्वर के प्रकट होने को स्वीकार करते हैं। कितनी गंभीर त्रुटि है यह!

"वचन देह में प्रकट होता है" से "परमेश्वर का प्रकटीकरण एक नया युग लाया है" से

कुछ लोग सत्य में आनन्द नहीं मनाते हैं, न्याय की तो ही दूर है। बल्कि वे शक्ति और धन में आनन्द मनाते हैं; इस प्रकार के लोग मिथ्याभिमानी समझे जाते हैं। ये लोग अनन्य रूप से संसार के प्रभावशाली सम्प्रदायों तथा सेमिनारियों से निकलने वाले पादरियों और शिक्षकों की खोज में लगे रहते हैं। सत्य के मार्ग को स्वीकार करने के बावजूद, वे उलझन में फंसे रहते हैं और अपने तुम को पूरी तरह से समर्पित करने में असमर्थ होते हो। वे परमेश्वर के लिए बलिदान की बात करते हैं, परन्तु उनकी आखें महान पादरियों और शिक्षकों पर केन्द्रित रहती हैं और मसीह को किनारे कर दिया जाता है। उनके हृदयों में प्रसिद्धि, वैभव और प्रतिष्ठा रहती है। उन्हें बिल्कुल विश्वास नहीं होता कि ऐसा छोटा-सा आदमी इतनोंपर विजय प्राप्त कर सकता है, यह कि वह इतना साधारण होकर भी लोगों को सिद्ध बनाने के योग्य है। वे बिल्कुल विश्वास नहीं करते कि ये धूल में पड़े मामूली लोग और घूरे पर रहने वाले ये साधारण मनुष्य परमेश्वर के द्वारा चुने गए हैं। वे मानते हैं कि यदि ऐसे लोग परमेश्वर के उद्धार की योजना के लक्ष्य रहे होते, तो स्वर्ग और पृथ्वी उलट-पुलट हो जाते और सभी लोग ठहाके लगाकर हंसते। वे विश्वास करते हैं कि यदि परमेश्वर ऐसे सामान्य लोगों को सिद्ध बना सकता है, तो वे सभी महान लोग स्वयं में परमेश्वर बन जाते। उनके दृष्टिकोण अविश्वास से भ्रष्ट हो गए हैं; दरअसल, अविश्वास से कोसों दूर वे बेहूदा जानवर हैं। क्योंकि वे केवल हैसियत, प्रतिष्ठा और शक्ति का मूल्य जानते हैं; वे विशाल समूहों और सम्प्रदायों को ही ऊंचा सम्मान देते हैं। उनकी दृष्टि में उनका कोई सम्मान नहीं है जिनकी अगुवाई मसीह कर रहे हैं। वे सीधे तौर पर विश्वासघाती हैं जिन्होंने मसीह से, सत्य से और जीवन से अपना मुंह मोड़ लिया है।

तुम मसीह की विनम्रता की तारीफ नहीं करते हो, बल्कि उन झूठे चरवाहों की करते हो जो विशेष हैसियत रखते हैं। तुम मसीह की सुन्दरता या ज्ञान से प्रेम नहीं करते हो, बल्कि उन अधम लोगों से करते हो जो घृणित संसार से जुड़े हैं। तुम मसीह के दुख पर हंसते हो, जिसके पास अपना सिर रखने तक की जगह नहीं, परन्तु उन मुर्दों की तारीफ करते हो जो भेंट झपट लेते हैं और व्यभिचारी का जीवन जीते हैं। तुम मसीह के साथ-साथ कष्ट सहने को तैयार नहीं, परन्तु उन धृष्ट मसीह विरोधियों की बाहों में प्रसन्नता से जाते हो, हालांकि वे तुम्हें सिर्फ देह, अक्षरज्ञान और अंकुश ही दे सकते हैं अभी भी तुम्हारा हृदय उनकी ओर, उनकी प्रतिष्ठा की ओर, सभी शैतानों के हृदय में उनकी हैसियत, उनके प्रभाव, उनके अधिकार की ओर लगा रहता है, फिर भी तुम विरोधी स्वभाव बनाए रखते हो और मसीह के कार्य को स्वीकार नहीं करते हो। इसलिए मैं कहता हूं कि तुम्हें मसीह को स्वीकार करने का विश्वास नहीं है। तुमने उसका अनुसरण आज तक सिर्फ़ इसलिए किया क्योंकि तुम्हारे साथ ज़बरदस्ती की गई थी। तुम्हारे हृदय में हमेशा कई बुलंद छवियों का स्थान रहा है; तुम उनके प्रत्येक कार्य और शब्दों को नहीं भूल सकते, न ही उनके प्रभावशाली शब्दों और हाथों को; वे तुम लोगों के हृदय में हैं, हमेशा के लिए सर्वोच्च और योद्धा की तरह। परन्तु आज के समय में मसीह के लिए ऐसा नहीं है। वह हमेशा-हमेशा तुम्हारे हृदय में अयोग्य और आदर के योग्य नहीं रहा है। क्योंकि वह बहुत ही साधारण रहा है, बहुत ही कम प्रभावशाली और उच्चता से बहुत दूर रहा है।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "क्या तुम परमेश्वर के एक सच्चे विश्वासी हो?" से

हर पंथ और संप्रदाय के नेताओं को देखो। वे सभी अभिमानी और आत्म-तुष्ट हैं, और वे बाइबल की व्याख्या संदर्भ के बाहर और उनकी अपनी कल्पना के अनुसार करते हैं। वे सभी अपना काम करने के लिए प्रतिभा और पांडित्य पर भरोसा करते हैं। यदि वे कुछ भी उपदेश करने में असमर्थ होते, तो क्या वे लोग उनका अनुसरण करते? कुछ भी हो, उनके पास कुछ विद्या तो है ही, और वे सिद्धांत के बारे में थोड़ा-बहुत बोल सकते हैं, या वे जानते हैं कि दूसरों को कैसे जीता जाए, और कुछ चालाकियों का उपयोग कैसे करें, जिनके माध्यम से वे लोगों को अपने सामने ले आए हैं और उन्हें धोखा दे चुके हैं। नाम मात्र के लिए, वे लोग ईश्वर पर विश्वास करते हैं, लेकिन वास्तव में वे अपने नेताओं का अनुसरण करते हैं। अगर वे उन लोगों का सामना करते हैं जो सच्चे तरीके से प्रचार करते हैं, तो उनमें से कुछ कहेंगे, "हमें परमेश्वर में अपने विश्वास के बारे में उससे परामर्श करना है।" देखिये, परमेश्वर में विश्वास करने के लिए कैसे उन्हें किसी की सहमति की आवश्यकता है; क्या यह एक समस्या नहीं है?

"मसीह की बातचीतों के अभिलेख" से "केवल सत्य का अनुसरण ही परमेश्वर में सच्चा विश्वास है" से

जो लोग परमेश्वर में विश्वास करते हैं, उन्हें परमेश्वर की आज्ञा माननी चाहिए और उसकी आराधना करनी चाहिए। तुम्हें किसी व्यक्ति को ऊँचा नहीं ठहराना चाहिए या किसी व्यक्ति पर श्रद्धा नहीं रखनी चाहिए; तुम्हें पहला स्थान परमेश्वर को, दूसरा स्थान उन लोगों को जिनकी तुम श्रद्धा करते हो, और तीसरा स्थान अपने आपको नहीं देना चाहिए। किसी भी व्यक्ति को तुम्हारे हृदय में कोई स्थान नहीं लेना चाहिए, और तुम्हें लोगों को—विशेष रूप से उन्हें जिनका तुम सम्मान करते हो—परमेश्वर के समतुल्य, उसके बराबर नहीं मानना चाहिए। यह परमेश्वर के लिए असहनीय है।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "दस प्रशासनिक आज्ञाएँ जिनका परमेश्वर के चयनित लोगों द्वारा राज्य के युग में पालन अवश्य किया जाना चाहिए" से

जो सत्य को नहीं समझते हैं वे हमेशा दूसरों का अनुसरण करते हैं: यदि लोग कहते हैं कि यह पवित्र आत्मा का कार्य है, तो तुम भी कहते हो कि यह पवित्र आत्मा का कार्य है; यदि लोग कहते हैं कि यह दुष्टात्मा का कार्य है, तो तुम्हें भी संदेह हो जाता है, या तुम भी कहते हो कि यह किसी दुष्टात्मा का कार्य है। तुम हमेशा दूसरों के शब्दों को तोते की तरह कहते हो और स्वयं किसी भी चीज का अंतर करने में असमर्थ होते हो, न ही तुम स्वयं सोचने में सक्षम होते हो। यह कोई बिना स्थिति वाला व्यक्ति है, जो विभेद करने में असमर्थ है—इस प्रकार का व्यक्ति निरर्थक अभागा है! ऐसे लोग हमेशा दूसरों के वचनों को दोहराते हो: आज ऐसा कहा जाता है कि यह पवित्र आत्मा का कार्य है, परन्तु ऐसी सम्भावना है कि कल कोई कहेगा कि यह पवित्र आत्मा का कार्य नहीं है, और कुछ नहीं बल्कि मनुष्य के कर्म हैं—फिर भी तुम इसकी सही प्रकृति को नहीं जान सकते हो, और जब तुम इसे दूसरों के द्वारा कहा गया देखते हो, तो तुम भी वही बात कहते हो। यह वास्तव में पवित्र आत्मा का कार्य है, परन्तु तुम कहते हो कि यह मनुष्य का कार्य है, क्या तुम पवित्र आत्मा के कार्य की ईशनिंदा करने वालों में से एक नहीं बन गए हो? इसमें, क्या तुमने परमेश्वर का विरोध नहीं किया क्योंकि तुम विभेद नहीं कर सकते हो? कौन जानता है, हो सकता है कि एक दिन कोई मूर्ख दिखाई दे जाए जो कहता हो कि "यह किसी दुष्टात्मा का कार्य है," और जब तुम इन वचनों को सुनोगे तो तुम हैरानी में पड़ जाओगे, और एक बार फिर दूसरों के शब्दों में बँध जाओगे। हर बार जब कोई अशांति मचाता है तो तुम अपनी स्थिति में खड़े रहने में असमर्थ हो जाते हो, और यह सब इसलिए है क्योंकि तुम सत्य को धारण नहीं करते हो। परमेश्वर पर विश्वास करना और परमेश्वर के ज्ञान का अनुसरण करना आसान बात नहीं है। इन्हें केवल एक साथ इकट्ठे होने और उपदेश सुनने के द्वारा प्राप्त नहीं किया जा सकता है, और केवल ज़ुनून के द्वारा तुम्हें पूर्ण नहीं किया जा सकता है। तुम्हें अपने कार्यों को अवश्य अनुभव करना और जानना चाहिए, और अपने कार्यों में सैद्धान्तिक होना चाहिए, और पवित्र आत्मा के कार्यों को प्राप्त करना चाहिए।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "जो परमेश्वर को और उसके कार्य को जानते हैं केवल वे ही परमेश्वर को सन्तुष्ट कर सकते हैं" से

मनुष्य की सहभागिता:

परमेश्वर का अनुसरण करने का अर्थ है हर चीज़ में परमेश्वर की बात सुनना, परमेश्वर के समस्त प्रबंध का आज्ञापालन करना, उसके वचनों के अनुसार आचरण करना, और परमेश्वर की ओर से आने वाली सब बातों को स्वीकार करना। यदि तुम परमेश्वर पर विश्वास करते हो तो तुम्हें परमेश्वर का अनुसरण करना चाहिए, मगर, इस बात को समझे बिना, जब वे परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, तो अधिकतर लोग लोगों का अनुसरण करते हैं, जो कि हास्यास्पद और दुःखद दोनों है। सही अर्थों में, लोग जिस किसी का भी अनुसरण करते हैं यह वह है जिस पर वे विश्वास करते हैं। यद्यपि कुछ लोग नाममात्र के लिए परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, किन्तु उनके हृदय में परमेश्वर नहीं होता है, अपने हृदयों में वे अपने अगुवों की आराधना करते हैं। अपने अगुवों की सुनना, इस हद तक चले जाना कि परमेश्वर के प्रबंधनों को इनकार कर देना, यह प्रकट करता है कि विश्वास परमेश्वर पर है, किन्तु अनुसरण लोगों का है। सत्य को जानने से पहले सभी के विश्वास इसी तरह अव्यवस्थित और भ्रमित होते हैं। वे यहाँ तक कि इस बात से भी सर्वथा अनभिज्ञ होते हैं कि परमेश्वर का अनुसरण करने का क्या अर्थ है, परमेश्वर का अनुसरण करने और लोगों का अनुसरण करने के बीच अंतर बताने में असमर्थ होते हैं। वे बस यह मानते हैं कि जो कोई भी ऐसे सिद्धांतों की बात करता है जो अच्छे हैं, उच्च हैं, वह उनका पिता या माता है, उनके लिए, जिसके पास भी दूध है, वह उनकी माता है, और जिसके पास भी सामर्थ्य है, वह उनका पिता है। यही कारण है कि वे ऐसे दयनीय हैं। यह कहा जा सकता है कि, अलग-अलग अंशों में, अधिकतर लोगों की ऐसी ही आध्यात्मिक स्थिति है।

परमेश्वर का अनुसरण करने का क्या अर्थ है? और तुम इसे कैसे अभ्यास में लाते हो? परमेश्वर का अनुसरण करने का अर्थ परमेश्वर की प्रार्थना करने और परमेश्वर की स्तुति करने मात्र को ही शामिल नहीं करता है; जो महत्वपूर्ण है वह है परमेश्वर के वचनों को खाना और पीना और परमेश्वर के वचनों के अनुसार जीवन जीना, सत्य के अनुसार क्रिया करना, परमेश्वर के वचनों के बीच जीवन का अनुभव करने का मार्ग खोजना, परमेश्वर के आदेश को स्वीकार करना, अपने हर एक कर्तव्य को उचित प्रकार से पूरा करना, और पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन के अनुसार अपने सामने के मार्ग पर चलना। विशेष रूप में, महत्वपूर्ण समयों पर, जब तुम्हारे ऊपर बड़ी समस्याएँ पड़ती हैं, तब परमेश्वर के अभिप्राय को खोजने की, मनुष्य के सिद्धांतों द्वारा धोखा दिए जाने से सावधान रहने, और किसी के नियंत्रण में न पड़ने की और भी अधिक आवश्यकता होती है। "परमेश्वर की ओर से जो कुछ आता है मैं उसका आज्ञापालन और अनुसरण करता हूँ, किन्तु यदि यह मनुष्य की इच्छा से आता है तो मैं उसे दृढ़ता से अस्वीकार करता हूँ। जब अगुवे या कार्यकर्ता जो कहते हैं वह परमेश्वर की व्यवस्थाओं के टकराव में होता है, तब मैं पूर्णरूप में परमेश्वर का अनुसरण करता हूँ और लोगों को अस्वीकृत करता हूँ। यदि यह पूर्णतः परमेश्वर की व्यवस्थाओं और इच्छा के अनुसार है, तो मैं इसे सुन सकता हूँ।" जो लोग इस तरह से अभ्यास करते हैं ये वे लोग हैं जो परमेश्वर का अनुसरण करते हैं।

लोगों का अनुसरण करने का क्या अर्थ है? लोगों का अनुसरण करने का अर्थ है उन अगुवों और कार्यकर्ताओं का अनुसरण करना जिनकी वे आराधना करते हैं? परमेश्वर के लिए उनके हृदयों में अधिक स्थान नहीं होता है; उन्होंने केवल एक संकेत टाँग लिया है कि वे परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, और हर चीज़ जो वे करते हैं उसमें वे लोगों की नकल या अनुकृति करते हैं। विशेष रूप से जब कोई बड़ी बात होती है, तो वे लोगों को निर्णय लेने देते हैं, वे लोगों को उनके भाग्य पर नियंत्रण करने देते हैं, वे स्वयं परमेश्वर के अभिप्राय की खोज नहीं करते हैं, और वे लोगों के द्वारा कहे गये वचनों को समझने में असमर्थ होते हैं। जब तक जो वे सुनते हैं वह उन्हें तर्कसंगत लगता है, तब इस बात की परवाह किए बिना कि यह सत्य के अनुरूप है या नहीं वे तब भी इसे स्वीकार कर लेते हैं और इसे सुनते हैं। ये लोगों का अनुसरण करने की अभिव्यक्तियाँ हैं। ऐसे लोगों के परमेश्वर में विश्वास के कोई सिद्धांत नहीं हैं। उनके कृत्यों में कोई सत्यता नहीं होती है, वे हर उस की सुनते हैं जो तर्क से बोलता है, और भले ही उनके आराध्य व्यक्ति गलत मार्ग अपना लें, वे अंत तक उनका अनुसरण करते हैं। यदि परमेश्वर उनके आराध्य व्यक्तियों की निंदा करता है, तो वे परमेश्वर के बारे में कुछ अवधारणाएँ बना लेंगे और अपने आराध्य व्यक्तियों से कस कर चिपक जाते हैं। उनके कारण हैं कि "हमें उसकी सुननी चाहिए जो कोई भी हमारा प्रभारी है; पास की सामर्थ्य दूर की सामर्थ की अपेक्षा बेहतर है।" यह दुर्भावनापूर्ण तर्क है, शुद्ध और सरल, किन्तु उन लोगों की ऐसी ही मूर्खता है जो लोगों का अनुसरण करते हैं। जो लोगों का अनुसरण करते हैं, वे सत्य के बिना हैं। केवल वे जो परमेश्वर का अनुसरण करते हैं वास्तव में परमेश्वर पर विश्वास करते हैं; जो लोगों का अनुसरण करते हैं वे आराध्य व्यक्तियों की आराधना करते हैं, वे लोगों के द्वारा बहकाए गए हैं, और उनके हृदयों में न तो परमेश्वर है, न ही सत्य है।

कलीसिया के कार्य की सहभागिता और प्रबन्धों के वार्षिक वृतांत (I) में, "वास्तव में सत्य को समझने के प्रभाव" से

बहुत से लोग परमेश्वर में विश्वास करते हैं किन्तु नहीं जानते हैं कि परमेश्वर का आज्ञापालन करने का क्या अर्थ है, और सोचते हैं कि हर चीज़ में अपने अगुवों की सुनना और परमेश्वर का आज्ञापालन करना एक ही बात है। ऐसे विचार पूर्ण रूप से बेतुके हैं, क्योंकि उनकी आज्ञाकारिता का स्रोत गलत है। वे मानते हैं कि अपने अगुवों की सुनना ही परमेश्वर का आज्ञापालन करना है। इन विचारों के अनुसार परमेश्वर में विश्वास करना नाम के लिए परमेश्वर पर विश्वास करना है; वास्तविकता में, ये लोग लोगों पर ही विश्वास करते हैं। ...

जब हम परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, तो परमेश्वर को हमारे हृदयों पर अग्रणी स्थिति धारण करनी चाहिए, हमें सभी मामलों में नियंत्रण परमेश्वर को आत्मसमर्पित कर देना चाहिए, हमें सभी चीज़ों में परमेश्वर के अभिप्राय की खोज करनी चाहिए, हमारे कार्य परमेश्वर के वचनों के अनुसार, और पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन के अनुसार होने चाहिए, और जो कुछ भी परमेश्वर की ओर से आता है हमें उस सब का आज्ञापालन करना चाहिए। यदि तुम लोगों की सुनते हो तो यह प्रमाणित करता है कि तुम्हारे हृदय में परमेश्वर के लिए जगह नहीं है, यह कि तुम्हारे हृदय में केवल लोगों के लिये स्थान है। लोगों के लिये सत्य की खोज करने और परमेश्वर की इच्छा को समझने से अधिक महत्वपूर्ण कुछ भी नहीं है। यदि तुम परमेश्वर के अभिप्रायों को खोजने और उसकी इच्छा को समझने में ध्यान केंद्रित नहीं करते हो, तो तुम्हारी आज्ञाकारिता सच्ची नहीं है। इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता है कि वे कितनी सही लगती हैं, यदि तुम सदैव लोगों की सुनते हो, तब सार रूप में तुम लोगों का आज्ञापालन कर रहे हो—जो कि परमेश्वर का आज्ञापालन करने जैसा बिलकुल भी नहीं है। वास्तव में, यदि परमेश्वर पर विश्वास करने वाले परमेश्वर के वचनों से सीधे उसका अभिप्राय समझने में समर्थ हैं, यदि वे उसके वचनों में अभ्यास करने का अपना मार्ग पा सकते हैं, और वे उसके वचनों में सत्य की संगति करते हैं, और सत्य को समझते हैं, जिसके बाद वे इसे अभ्यास में लाते हैं, और यदि महत्वपूर्ण पलों में, वे अधिक प्रार्थना कर सकते हैं, और पवित्र आत्मा की अगुवाई की खोज कर सकते हैं, और पवित्रात्मा के अभिप्रायों का आज्ञापालन कर सकते हैं, तो यह वास्तव में परमेश्वर का आज्ञापालन करना है। जो परमेश्वर का आज्ञापालन करते हैं वे परमेश्वर के वचनों में मार्ग को खोजते हैं, परमेश्वर के वचनों में उनकी समस्याएँ हल हो जाती हैं, और वे पवित्र आत्मा की अगुवाई में कार्य करते हैं; यही परमेश्वर का सच्चा आज्ञापालन करना है। जो हर बात में अपने अगुवों की सुनते हैं वे निश्चित रूप से अपने हृदयों में परमेश्वर से दूर भटक चुके हैं। इतना ही नहीं, वे परमेश्वर के सम्मुख शांति में नहीं हैं, वे ऐसे लोग नहीं है जो परमेश्वर के सम्मुख रहते हैं और सत्य को खोजते हैं, परमेश्वर के साथ उनका कोई संबंध नहीं है, और उनके कार्य के पीछे का सिद्धांत है कि जो कोई भी सही बातों को कहता है उसकी सुनो—जब तक वह कोई अगुवा है, वे उसका आज्ञापालन करेंगे। ऐसा अभ्यास हास्यास्पद है। उनमें न तो सत्य है, और न अंतर करने की योग्यता है, वे केवल अपनी धारणाओं या मस्तिष्क के अनुसार केवल यह स्थापित कर सकते हैं कि क्या सही है, और क्या गलत है. इसलिए वे कैसे जान सकते हैं कि क्या यह सत्य के अनुरूप है? यदि वे ऐसे दृष्टिकोणों के अनुसार परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, तब अपने जीवन भर वे कभी सत्य को नहीं समझेंगे और परमेश्वर को नहीं जानेंगे। विश्वास का ऐसा रूप अपने मस्तिष्क पर विश्वास करना और अपने मार्ग पर चलना कहा जा सकता है, और उनका व्यवहारिक परमेश्वर से कोई संबंध नहीं हैं।

"मसीह की बातचीतों के अभिलेख" से "अपने अगुवों की हर बात मानने का अर्थ परमेश्वर की आज्ञा मानना नहीं है" से

"केवल परमेश्वर पर विश्वास करना" किस बात को संदर्भित करता है? इसका अर्थ यह विश्वास करना है यह कि केवल परमेश्वर ही सर्वशक्तिमान है, यह कि परमेश्वर ही सब कुछ है, यह कि परमेश्वर मनुष्यों को बचा सकता है, यह कि परमेश्वर सर्वशक्तिमान और सर्वज्ञ है, यह कि परमेश्वर में ऐसा कुछ नहीं है जो संपन्न नहीं किया जा सकता है। इसका अर्थ है केवल परमेश्वर पर विश्वास करना, और इस बात पर संदेह या अविश्वास नहीं करना कि परमेश्वर सर्वशक्तिमान और सर्वज्ञ है, या कि वह सब कुछ करने में समर्थ है। इस प्रकार के लोग ही परमेश्वर के समक्ष प्रार्थना करने में समर्थ हैं, चाहे उनके साथ कुछ भी हो जाए, और इस बात की परवाह किए बिना कि उन पर कैसी भी मुसीबतें आती हैं वे परमेश्वर पर निर्भर होने में समर्थ होते हैं। मसीह उनके हृदयों में गर्व का स्थान रखता है, वे लोगों की ओर नहीं देखते हैं, या उनकी उपासना नहीं करते हैं, वे केवल परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, और केवल व्यवहारिक परमेश्वर का अनुसरण करते हैं, वे परमेश्वर के अलावा किसी और पर निर्भर नहीं होते हैं या किसी और की ओर नहीं देखते है वे किसी भी मनुष्य पर आँखें बंद करके विश्वास नहीं करते हैं, और उनके हृदयों में केवल परमेश्वर के लिए स्थान होता है, अन्य किसी के लिए नहीं। यदि वे उस स्तर तक पहुँच गये हैं, तब वे अपने विश्वास में परमेश्वर का अनुसरण करने और उस पर भरोसा करने की वास्तविकता से संपन्न हैं। कुछ लोगों का परमेश्वर पर विश्वास बहुत कम होता हैः वे कभी परमेश्वर की सर्वशक्तिमान के रूप में कल्पना कभी नहीं करते हैं, और इस प्रकार जब उनके साथ कुछ होता है, तो अपना विश्वास खोना उनके लिए आसान होता है। इसके अतिरिक्त, उनके लिए लोगों की ओर देखना और उनकी उपासना करना आसान होता है, और यह ऐसा है मानो कि वे परमेश्वर के उन अंशों की भरपाई करने के लिए इसका उपयोग करते हैं जो उनके लिए पर्याप्त नहीं है। क्योंकि वे सदैव लोगों की ओर देख रहे हैं और उनकी उपासना कर रहे हैं, इसलिए उनकी जानकारी के बिना उनके हृदय में परमेश्वर का स्थान बहुत छोटा हो जाता है, और जिन लोगों की वे आराधना करते हैं, उन का स्थान बहुत अधिक बढ़ जाता है। अंतत:, वे अनजाने में ही ऐसे बन जाते हैं जो बस नाम के लिए परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, जो वास्तविकता में लोगों में विश्वास करते हैं, लोगों का अनुसरण करते हैं, लोगों की आराधना करते हैं, और लोगों की ओर देखते हैं। ठीक उन धार्मिक लोगों के समान, परमेश्वर में उनका विश्वास नाममात्र का होता है; वास्तविकता में, वे जिन पर विश्वास करते हैं और जिनका अनुसरण करते हैं वे पादरी हैं, और केवल पादरी ही उनके प्रभु और परमेश्वर हैं। परमेश्वर पर विश्वास करने के मार्ग से फिसल कर वे लोगों का अनुसरण और उनका आज्ञापालन करने लगते हैं—क्या यह पथभ्रष्टता नहीं है? क्या ऐसे लोग परमेश्वर पर सच्चा विश्वास धारण करते हैं? वे धारण नहीं करते हैं। इस प्रकार, वे जो कुछ भी करते हैं, उसमें वे परमेश्वर पर भरोसा नहीं करते हैं, बल्कि लोगों की ओर देखते और उनकी उपासना करते हैं। वे सदैव दूसरों से संकेत पाने की खोज में रहते हैं, वे मार्ग की खोज करने में दूसरों से इशारा प्राप्त करते हैं, वे सदैव वह सुनते हैं जो लोग कहते हैं वह देखते हैं जो वे करते हैं, उनके प्रत्येक वचन और कार्य इन लोगों से अवियोज्य होते हैं। इस बात का एहसास किए बिना, वे ऐसे बन गए हैं जो लोगों पर विश्वास करते हैं और उनका अनुसरण करते हैं। यह कहना सत्य है कि वे सभी जो लोगों का बहुत अधिक सम्मान करते हैं और लोगों की आराधना करते हैं, वे वास्तव में लोगों पर विश्वास करते हैं और उनका अनुसरण करते हैं।

जीवन में प्रवेश के विषय में संगति एवं प्रवचन (IV) में "बचाए जाने और सिद्ध किये जाने के लिए परमेश्वर के वचनों की दस वास्तविकताएं जिनमें प्रवेश आवश्यक है" से

लोग अपने हृदयों में जिस किसी की भी उपासना करते हैं, वह उनका आराध्य व्यक्ति है; जो कोई भी अपने अगुवों की आराधना करता है, वह कोई ऐसा व्यक्ति है जो आराध्य व्यक्तियों की आराधना करता है। वह एक जिसकी लोग आराधना करते हैं, उसका उनके हृदयों में एक स्थान होता है, और वह अपरिहार्य रूप से उन पर कब्जा कर लेगा और उन्हें अपना दास बना लेगा। सुसमाचार के प्रसार का कार्य करने के दौरान, हम पाते हैं कि विभिन्न धर्मों और संप्रदाओं के सभी लोग आराध्य व्यक्तियों की आराधना करते हैं, और सभी अपने अगुवों द्वारा नियंत्रित होते हैं, यहाँ तक कि वे सत्य को स्वीकार करने का साहस तक नहीं करते हैं। वे दयनीय दासों के समान हैं। जो लोग अपने अगुवों की उपासना करते हैं ये वे लोग हैं जो आराध्य व्यक्तियों की आराधना करते हैं, उनके हृदय निर्विवाद रूप से सत्य के बिना हैं, और वे परमेश्वर को बिल्कुल भी नहीं जानते हैं; इसलिए, उनके हृदयों में परमेश्वर का कोई स्थान नहीं है, और वे परमेश्वर द्वारा घृणा और श्रापित किए जाते हैं। परमेश्वर एक धार्मिक परमेश्वर है, वह एक ईर्ष्यालु परमेश्वर है, और जब लोग आराध्य व्यक्तियों की आराधना करते हैं तो वह उससे अधिक किसी से घृणा नहीं करता है। अगुवों को परमेश्वर के बराबर मानने से बढ़कर कोई ईशनिंदा नहीं है। वास्तव में, जो परमेश्वर के सम्मुख वापस आ चुके हैं उनके हृदयों में केवल परमेश्वर ही होना चाहिए। किसी अन्य के लिए उनके हृदय में कोई स्थान नहीं होना चाहिए। क्योंकि उनके विचारों और कल्पनाओं में ऐसी चीजों का आना भी गंदा और भ्रष्ट है, और परमेश्वर द्वारा घृणा एवं नापसंद किया जाता है। इस में, अधिकांश लोग अशुद्ध हैं, और कम या अधिक सीमा तक, जिनकी वे आराधना करते हैं उनका उनके हृदयों में स्थान होता है। जब परमेश्वर के स्वभाव की बात आती है, तो यह अस्वीकार्य है कि लोग अपने हृदयों में किसी मनुष्य के लिए जरा सा स्थान भी रखते हैं, और यदि वे आरंभ से लेकर अंत तक शुद्धता प्राप्त नहीं कर सकते हैं, तो वे निंदित किए जाएँगे।

जो अपने हृदयों में अपने अगुवों की आराधना करते हैं उन सब में विशिष्ट अभिव्यक्तियाँ होती हैं। वे निम्नानुसार पहचाने जा सकते हैं: यदि तुम्हारे अगुवों के प्रति तुम्हारा आज्ञापालन परमेश्वर के प्रति तुम्हारे आज्ञापालन की अपेक्षा अधिक है, तो तुम आराध्य व्यक्तियों की उपासना करते हो; यदि परमेश्वर के लिए तुम्हारी अभिलाषा और लालसा की अपेक्षा तुम्हारी अभिलाषा और लालसा उन लोगों के लिए अधिक है जिनकी तुम आराधना करते हो, तो तुम आराध्य व्यक्तियों की आराधना करते हो; यदि तुम परमेश्वर की अपेक्षा अपने अगुवे के प्रति अधिक उत्सुक हो, तो तुम आराध्य व्यक्तियों की आराधना करते हो; यदि, अपने हृदय में तुम उनके अधिक नजदीक हो जिनकी तुम आराधना करते हो और परमेश्वर से दूर हो, तो तुम आराध्य व्यक्तियों की आराधना करते हो; यदि तुम्हारे हृदय में, तुम जिनकी आराधना करते हो उनका स्थान परमेश्वर के बराबर है, तो यह और भी बड़ा प्रमाण है कि तुम उन लोगों को परमेश्वर के समान मानते हो जिनकी तुम आराधना करते हो; और, तुम्हारे साथ चाहे जो हो जाए, यदि तुम अपने अगुवे की सुनने के लिए तैयार हो, और सत्य की खोज करने के लिए परमेश्वर के सामने आने के लिये तैयार नहीं हो, तब इस बात को साबित करने के लिए यह पर्याप्त है कि तुम परमेश्वर पर विश्वास नहीं करते हो, बल्कि लोगों पर विश्वास करते हो। कुछ लोग, संभवतः, यह कहते हुए अपना बचाव करने का प्रयास करेंगे कि: "मैं अमुक-अमुक की वास्तव में प्रशंसा करता हूँ, मेरे हृदय में उसके लिए वास्तव में एक स्थान है। इसे जाने बिना, मैंने परमेश्वर के साथ अपने संबंधों में उससे थोड़ी दूरी बढ़ा ली है।" ये वचन मामले की सच्चाई को प्रदर्शित करते हैं; जैसे ही कोई किसी के हृदय में स्थान पाता है, वह व्यक्ति परमेश्वर से दूर हो जाता है। यह खतरनाक है, फिर भी कुछ लोग इसे हल्के में लेते हैं, उन्हें थोड़ी सी भी चिंता नहीं होती है, जो दर्शाता है कि वे परमेश्वर के स्वभाव को नहीं जानते हैं। ... लोगों की आराधना करना बहुत अज्ञानी और विवेकशून्य होना है, यह बहुत भ्रष्ट और दुष्ट होना है। लोगों की आराधना करना शैतान और दुष्टात्माओं की आराधना करना है, यह महीस विरोधियों की आराधना करना है, और जो लोगों की उपासना करते हैं, उनमें थोड़ा सा भी सत्य नहीं होता है। इस तरह के लोग निश्चित रूप से परमेश्वर के थोडे से ज्ञान से भी वंचित होते हैं; वे पतित लोग हैं जो परमेश्वर द्वारा श्रापित हैं। तुम क्या कहते हो, क्या ये तथ्य नहीं हैं?

"मसीह की बातचीतों के अभिलेख" से "अपने अगुवों की हर बात मानने का अर्थ परमेश्वर की आज्ञा मानना नहीं है" से

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