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अध्याय 7 सत्य के अन्य पहलू जो तुम्हें परमेश्वर में अपनी आस्था में समझना चाहिए

3. परमेश्वर पर विश्वास में, तुम्हें परमेश्वर के साथ सामान्य सम्बन्ध स्थापित करना चाहिए

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

परमेश्वर में विश्वास करने में तुम्हें कम से कम परमेश्वर के साथ एक सामान्य संबंध रखने के विषय का समाधान करना चाहिए। परमेश्वर के साथ सामान्य संबंध के बिना परमेश्वर में विश्वास करने का महत्व खो जाता है। परमेश्वर के साथ एक सामान्य संबंध को स्थापित करना परमेश्वर की उपस्थिति में अपने हृदय को शांत करने के द्वारा ही किया जा सकता है। परमेश्वर के साथ एक सामान्य संबंध को स्थापित करने का अर्थ है परमेश्वर के किसी भी कार्य पर संदेह न करना या उसका इनकार न करना, बल्कि उसके प्रति समर्पित रहना, और इससे बढ़कर इसका अर्थ है परमेश्वर की उपस्थिति में सही इरादों को रखना, स्वयं के बारे में न सोचते हुए हमेशा परमेश्वर के परिवार की बातों को सबसे महत्वपूर्ण विषय के रूप में सोचना, फिर चाहे तुम कुछ भी क्यों न कर रहे हो, परमेश्वर के अवलोकन को स्वीकार करना और परमेश्वर के प्रबंधनों के प्रति समर्पण करना। परमेश्वर की उपस्थिति में तुम जब भी कुछ करते हो तो तुम अपने हृदय को शांत कर सकते हो; यदि तुम परमेश्वर की इच्छा को नहीं भी समझते हो, फिर भी तुम्हें अपनी सर्वोत्तम योग्यता के साथ अपने कर्तव्‍यों और जिम्मेदारियों को पूरा करना चाहिए। अभी देर नहीं हुई है, परमेश्वर की इच्छा का स्वयं पर प्रकट होने की प्रतीक्षा करो, और फिर तुम इसे अभ्यास में लाओ। जब परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य हो जाता है, तब तुम्हारा संबंध लोगों के साथ भी सामान्य होगा। सब कुछ परमेश्वर के वचनों पर स्थापित है। परमेश्वर के वचनों को खाने और उन्हें पीने से परमेश्वर की माँगों के अनुसार कार्य करो, अपने दृष्टिकोणों को सही रखो, और ऐसे कार्यों को न करो जो परमेश्वर का प्रतिरोध करते हों या कलीसिया में विघ्न डालते हों। ऐसे कार्यों को न करो जो भाइयों और बहनों के जीवनों को लाभान्वित न करें, ऐसी बातों को न कहो जो दूसरे लोगों के जीवन में योगदान न दें, निंदनीय कार्य न करो। सब कार्यों को करने में न्यायी और सम्माननीय बनो और उन्हें परमेश्वर के समक्ष प्रस्तुति योग्य बनाओ। यद्यपि कभी-कभी देह कमज़ोर होती है, फिर भी तुम अपने लाभों का लालच न करते हुए परमेश्वर के परिवार को लाभान्वित करने को सर्वोच्च महत्त्व दे सकते हो, और धार्मिकता को पूरा कर सकते हो। यदि तुम इस तरह से कार्य कर सकते हो, तो परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य होगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध कैसा है?" से उद्धृत

जब भी तुम कुछ करते हो, तो तुम्हें यह जांचना आवश्यक है कि क्या तुम्हारी प्रेरणाएँ सही हैं। यदि तुम परमेश्वर की माँगों के अनुसार कार्य कर सकते हो, तो परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य है। यह निम्नतम मापदंड है। जब तुम अपनी प्रेरणाओं को जाँचते हो, तो यदि उनमें ऐसी प्रेरणाएँ मिल जाएँ जो सही न हों, और यदि तुम उनसे फिर सकते हो और परमेश्वर के वचनों के अनुसार कार्य कर सकते हो, तो तुम एक ऐसे व्यक्ति बन जाओगे जो परमेश्वर के समक्ष सही है, और जो दर्शाएगा कि परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य है, और तुम जो कुछ करते हो वह परमेश्वर के लिए है, न कि तुम्हारे अपने लिए। तुम जब भी कुछ करते या कहते हो, तो तुम्हें अपने हृदय को सही रखना, और धर्मी बनना चाहिए, और अपनी भावनाओं में नहीं बहना चाहिए, या तुम्हारी अपनी इच्छा के अनुसार कार्य नहीं करना चाहिए। ये ऐसे सिद्धांत हैं जिनमें परमेश्वर के विश्वासी स्वयं आचरण करते हैं। एक व्यक्ति की प्रेरणाएँ और उसका महत्व छोटी बातों में प्रकट हो सकता है, और इस प्रकार, परमेश्वर द्वारा सिद्ध बनाए जाने के मार्ग में प्रवेश करने के लिए लोगों को पहले उनकी अपनी प्रेरणाओं और परमेश्वर के साथ उनके संबंध का समाधान करना आवश्यक है। जब परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य होता है, केवल तभी तुम परमेश्वर के द्वारा सिद्ध किए जाओगे, और केवल तभी तुम में परमेश्वर का व्यवहार, काट-छाँट, अनुशासन और शोधन अपने वांछित प्रभाव को पूरा कर पाएगा। कहने का अर्थ यह है कि लोग अपने हृदयों में परमेश्वर को रख सकेंगे, और व्यक्तिगत लाभों को नहीं खोजेंगे, अपने व्यक्तिगत भविष्य (अर्थात् शरीर के बारे में सोचना) के बारे में नहीं सोचेंगे, बल्कि वे जीवन में प्रवेश करने के बोझ को रखेंगे, सत्य का अनुसरण करने में अपना सर्वोत्तम प्रयास करेंगे, और परमेश्वर के कार्य के प्रति समर्पित रहेंगे। इस प्रकार से, जिन लक्ष्यों को तुम खोजते हो वे सही हैं, और परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य है। यह कहा जा सकता है कि परमेश्वर के साथ किसी के संबंध को सही करना उसकी आत्मिक यात्रा में प्रवेश करने का पहला कदम है। यद्यपि मनुष्य का गंतव्य या उसकी मंजिल परमेश्वर के हाथों में है, और परमेश्वर के द्वारा पूर्वनिर्धारित की जा चुकी है, और उनके स्वयं के द्वारा बदली नहीं जा सकती, फिर भी तुम सिद्ध बनाए जा सकते हो या नहीं या परमेश्वर के द्वारा स्वीकार किए जा सकते हो या नहीं, यह इस बात पर निर्भर करता है कि क्या परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य है या नहीं। शायद तुम्हारे कुछ भाग हैं जो कमजोर या अवज्ञाकारी हैं—परंतु जब तक तुम्हारा दृष्टिकोण सही है और तुम्हारी प्रेरणाएँ उचित हैं, और जब तक तुमने परमेश्वर के साथ अपने संबंध को सही रखा है और इसे सामान्य रखा है, तब तक तुम परमेश्वर के द्वारा सिद्ध बनाए जाने के योग्य हो जाओगे। यदि तुम्हारा परमेश्वर के साथ सही संबंध नहीं है, और तुम देह के लिए या अपने परिवार के लिए कार्य करते हो, तो चाहे तुम जितनी भी मेहनत करो, यह व्यर्थ ही होगा। यदि परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य है, तो बाकी सब कुछ भी व्यवस्थित हो जाएगा। परमेश्वर किसी और बात को नहीं देखता, परंतु वह केवल यही देखता है कि क्या परमेश्वर पर विश्वास करने के तुम्हारे दृष्टिकोण सही हैं: तुम किस पर विश्वास करते हो, तुम किसके लिए विश्वास करते हो, और तुम क्यों विश्वास करते हो। यदि तुम इन बातों को स्पष्ट रूप से देख सकते हो, और अपने दृष्टिकोणों और कार्य को सही रख सकते हो, तब तुम्हारा जीवन उन्नति करेगा, और तुम निश्चित रूप से सही मार्ग में प्रवेश कर सकते हो। यदि परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य नहीं है, और परमेश्वर में विश्वास करने के तुम्हारे दृष्टिकोण पथभ्रष्ट हैं, तो ये शेष सब बातों को भी असंभव बना देंगे। इसका कोई महत्व नहीं है कि तुम परमेश्वर पर कैसा विश्वास करते हो, तुम कुछ भी प्राप्त नहीं कर पाओगे। जब परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य होता है, केवल तभी तुम परमेश्वर के द्वारा प्रमाणित ठहरोगे जब देह की बातों से फिर जाओगे, प्रार्थना करोगे, दुःख उठाओगे, सहन करोगे, आज्ञा मानोगे, अपने भाइयों और बहनों की सहायता करोगे, परमेश्वर के लिए और अधिक प्रयास करोगे इत्यादि।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध कैसा है?" से उद्धृत

तहेदिल से परमेश्वर की आत्मा को स्पर्श करके लोग परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, उससे प्रेम करते हैं, और उसे संतुष्ट करते हैं, और इस प्रकार वे परमेश्वर की संतुष्टि प्राप्त करते हैं; जब वे परमेश्वर के वचनों के संपर्क में आते हैं, तो परमेश्वर का आत्मा का उन पर भावनात्मक प्रभाव पड़ता है। यदि तुम एक उचित आध्यात्मिक जीवन प्राप्त करना चाहते हो और परमेश्वर के साथ एक उचित संबंध स्थापित करना चाहते हो, तो तुम्‍हें पहले उसे अपना हृदय अर्पित करना होगा, और अपने हृदय को उसके सामने शांत करना होगा। अपने पूरे हृदय को परमेश्वर की स्तुति में डुबोकर ही तुम धीरे-धीरे एक उचित आध्यात्मिक जीवन का विकास कर सकते हो। यदि लोग परमेश्वर को अपना हृदय अर्पित नहीं करते हैं और उस पर पूरी तरह विश्वास नहीं करते हैं, और अगर उनका दिल उन्हें महसूस नहीं करता है और वे परमेश्वर के बोझ को अपना बोझ नहीं मानते हैं, तो जो कुछ भी वे कर रहे हैं उससे केवल परमेश्वर को धोखा दे रहे हैं, और ये धार्मिक व्यक्तियों का केवल व्यवहार है—ये परमेश्वर की प्रशंसा प्राप्त नहीं कर सकता है। इस तरह के व्यक्ति से परमेश्वर को कुछ नहीं मिल सकता; इस तरह का व्यक्ति परमेश्वर के काम के पथ में केवल एक विषमता है, परमेश्वर के घर में सजावट के किसी सामान की तरह, जगह लेता हुआ, और बेकार—परमेश्वर के लिए इस तरह का व्यक्ति उपयोगी नहीं है। ऐसे व्यक्ति में, पवित्र आत्मा के काम के लिए कोई अवसर नहीं है, और इससे भी ज़्यादा, ऐसे व्यक्ति में पूर्णता का कोई महत्व नहीं है। ऐसा व्यक्ति एक चलते-फिरते मृत व्यक्ति की तरह है। ऐसे व्यक्ति के भीतर ऐसा कोई भी अंश नहीं बचा है जिसका उपयोग पवित्र आत्मा कर सके—उन सभी का उपयोग शैतान द्वारा किया जा चुका है, उन्हें पूरी तरह शैतान ने दूषित कर दिया है, और उन्हें हटाना परमेश्वर का उद्देश्य है। फिलहाल, पवित्र आत्मा लोगों के गुणों को उजागर करके ही केवल उनका उपयोग नहीं कर रहा है, बल्कि उनकी कमियों में सुधार और परिवर्तन भी कर रहा है। यदि तुम्हारा हृदय परमेश्वर में डूब सकता है और उसके सामने शांत रह सकता है, तो तुम्हारे पास यह अवसर और वह योग्यता होगी कि पवित्र आत्मा तुम्हारा उपयोग करे, पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता और रोशनी को तुम प्राप्त करो, और इससे भी ज़्यादा, तुम्हारे पास अवसर होगा कि पवित्र आत्मा तुम्हारी कमियों को दूर करे। जब तुम अपने हृदय को परमेश्वर के सामने अर्पित करते हो, तो सकारात्मक पहलू में, तुम अधिक गहराई से प्रवेश कर सकोगे और समझ के उच्च स्तर पर पहुंच सकोगे; नकारात्मक पहलू में, तुम अपनी गलतियों और कमियों की अधिक समझ प्राप्त कर सकोगे, तुम परमेश्वर की इच्छा की पूर्ति करने के लिए ज़्यादा उत्सुक रहोगे, और तुम निष्क्रिय नहीं, बल्कि सक्रिय रूप से प्रवेश करोगे। इसका मतलब होगा कि तुम एक सही व्यक्ति हो।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर के साथ एक उचित संबंध स्थापित करना बहुत महत्वपूर्ण है" से उद्धृत

यदि तुम परमेश्वर के साथ एक उचित संबंध बनाना चाहते हो, तो ज़रूरी है कि तुम्हारा दिल उसकी तरफ़ झुके, और इस बुनियाद पर, तुम दूसरों के साथ भी उचित संबंध बनाओगे। यदि परमेश्वर के साथ तुम्हारा उचित संबंध नहीं है, तो चाहे तुम दूसरों के साथ संबंध बनाए रखने की जितनी भी कोशिश कर लो, चाहे तुम जितनी भी मेहनत कर लो या जितनी भी ताक़त लगा दो, वह तब भी जीवन के मानवीय दर्शनशास्त्र का हिस्सा रहेगा। वह तुम लोगों के बीच एक मानवीय दृष्टिकोण और मानवीय दर्शनशास्त्र के माध्यम से अपनी स्थिति बनाकर रख रहा है ताकि वे तुम्हारी प्रशंसा करे। तुम परमेश्वर के वचनों के अनुसार लोगों के साथ उचित संबंध स्थापित नहीं करते हैं। यदि तुम लोगों के साथ अपने संबंधों पर ध्यान केंद्रित नहीं करते हो लेकिन परमेश्वर के साथ एक उचित संबंध बनाए रखते हो, अगर तुम अपने दिल को परमेश्वर को देने के लिए और उसकी आज्ञा का पालने करने के लिए तैयार हो, तो बहुत स्वाभाविक है कि सभी लोगों के साथ तुम्हारे संबंध सही हो जाएंगे। इस तरह से, ये संबंध शरीर के स्तर पर स्थापित नहीं होंगे, बल्कि परमेश्वर का प्रेम इनकी बुनियाद होगा। शरीर के आधार लगभग कोई मेलजोल नहीं होता है, लेकिन उसकी आत्मा में साहचर्य है, और साथ ही साथ प्रेम, आराम और एक दूसरे के लिए आदान-प्रदान की भावना है। यह सब एक ऐसे हृदय पर आधारित होता है, जो परमेश्वर को संतुष्ट करता हो। ये संबंध जीवन के मानवीय दर्शनशास्त्र के आधार पर नहीं बनाए रखे जाते हैं, बल्कि वे बहुत ही स्वाभाविक रूप से परमेश्वर के लिए बोझ के माध्यम से बनते हैं। इसके लिए मानवीय प्रयासों की आवश्यकता नहीं होती—परमेश्वर के वचन के सिद्धांतों के माध्यम से उन पर चला जाता है। क्या तुम परमेश्वर की इच्छा की ओर विचारशील होने के लिए तैयार हो? क्या तुम परमेश्वर के समक्ष "तर्कहीन" के व्यक्ति बनने के लिए तैयार हो? क्या तुम पूरी तरह से अपने दिल को परमेश्वर को देने के लिए और लोगों के बीच अपनी स्थिति के बारे में चिंता न करने के लिए तैयार हो? जिन सभी लोगों के साथ तुम्हारे संपर्क हैं, उनमें से किनके साथ तुम्हारे सबसे अच्छे संबंध हैं? इनमें से किनके साथ तुम्हारे सबसे खराब संबंध हैं? क्या लोगों के साथ तुम्हारे संबंध उचित हैं? क्या तुम सभी लोगों को बराबरी का दर्जा देते हो? क्या दूसरों के साथ तुम्हारे संबंध स्वयं के जीवन के दर्शनशास्त्र के अनुसार बनाए गए हैं, या क्या वे परमेश्वर के प्रेम की बुनियाद पर बने हैं? जब कोई परमेश्वर को अपना दिल नहीं देता, तो उसकी आत्मा सुस्त, सुन्न और बेसुध हो जाती है। इस प्रकार का व्यक्ति परमेश्वर के वचनों को कभी नहीं समझेगा और परमेश्वर के साथ कभी भी उसके संबंध उचित नहीं होंगे; इस तरह का व्यक्ति अपने स्वभाव को कभी भी नहीं बदलेगा। अपने स्वभाव को बदलने की प्रक्रिया में व्यक्ति पूरी तरह से परमेश्वर को अपना दिल अर्पित करता है, और परमेश्वर के वचनों से प्रबुद्धता और रोशनी प्राप्त करता है। परमेश्वर का कार्य किसी के लिए भी सक्रियता से प्रवेश करना संभव कर सकता है, और साथ ही ज्ञान प्राप्त करने के बाद उसे अपने नकारात्मक पहलुओं से मुक्त करने में सक्षम बना सकता है। जब तुम अपना दिल परमेश्वर को समर्पित करते हो, तो तुम अपनी आत्मा के भीतर हल्की-सी प्रत्येक हलचल को समझ पाओगे, और तुम परमेश्वर से प्राप्त हर प्रबुद्धता और रोशनी को जान सकोगे। इसे पकड़ कर रखो, और तुम धीरे-धीरे पवित्र आत्मा द्वारा परिपूर्ण होने की राह में प्रवेश करोगे। तुम्हारा दिल परमेश्वर के समक्ष जितना शांत रह पाएगा, तुम्हारी आत्मा उतनी अधिक संवेदनशील और नाज़ुक रहेगी, और उतनी अधिक तुम्हारी आत्मा पवित्र आत्मा की हलचल को समझ पाएगी, और फिर परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध अधिक से अधिक उचित होता जाएगा। लोगों के बीच एक उचित संबंध परमेश्वर को अपना दिल सौंपने की नींव पर स्थापित होता है; यह मानवीय प्रयासों के माध्यम से प्राप्त नहीं किया जाता। अपने दिलों में परमेश्वर के बिना, लोगों के बीच के परस्पर आंतरिक संबंध केवल शरीर के स्तर पर रह जाते हैं। वे उचित नहीं होते, बल्कि वासना से आसक्त होते हैं—वे ऐसे रिश्ते होते हैं जिनसे परमेश्वर घृणा करता है, जिनसे वह नफ़रत करता है। यदि तुम कहते हो कि तुम्हारी आत्मा पर प्रभाव हुआ है, लेकिन तुम हमेशा उन लोगों के साथ साहचर्य चाहते हो जो तुमको आकर्षित करते हैं, जिन्हें तुम उत्कृष्ट मानते हो, और वहीं एक दूसरा साधक है जो तुमको आकर्षित नहीं करता है, जिसके बारे में तुम्हारे पूर्वाग्रह हैं और तुम उनके साथ मेलजोल नहीं करते हो, तो यह भी प्रमाण है कि तुम एक भावुक व्यक्ति हो और परमेश्वर के साथ तुम्हारे उचित संबंध नहीं हैं। तुम परमेश्वर को धोखा देने का और अपनी कुटिलता को छिपाने का प्रयास कर रहे हो। अगर तुम कुछ समझ साझा कर पाते हो, लेकिन तुम्हारे इरादे गलत हैं, तो तुम जो कुछ भी करते हो वे केवल मानवीय मानकों से ही अच्छे हैं। परमेश्वर तुम्हारी प्रशंसा नहीं करेगा—तुम शरीर के अनुसार काम कर रहे हो, परमेश्वर के बोझ के अनुसार नहीं। यदि परमेश्वर के सामने तुम अपने दिल को शांत करने में सक्षम हो और उन सभी लोगों के साथ तुम्हारे उचित संबंध हैं जो परमेश्वर से प्रेम करते हैं, केवल तब ही तुम परमेश्वर के उपयोग के लिए उपयुक्त होगे। इस तरह से चाहे तुम दूसरों के साथ जैसे भी जुड़े हो, तुम जीवन के दर्शनशास्त्र के अनुसार नहीं जुड़ोगे, बल्कि यह परमेश्वर के सामने जीना होगा, उसके बोझ के प्रति विचारशील होना होगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर के साथ एक उचित संबंध स्थापित करना बहुत महत्वपूर्ण है" से उद्धृत

इसको पढ़ने के बाद और एक समझ प्राप्त कर लेने के बाद तुम परमेश्वर की हर वाणी को कार्य में लाओगे। इसके बारे में सोचे बिना कि तुम पहले इसे कैसे कार्य में लाते थे—शायद अतीत में तुम्हारी देह कमज़ोर थी, तुम विद्रोही थे, और तुम विरोध करते थे—यह कोई बड़ी बात नहीं है, और यह आज तुम्हारे जीवन को बढ़ने से नहीं रोक सकती। जब तक तुम वर्तमान में परमेश्वर के साथ सामान्य संबंध रख सकते हो, तो एक आशा है। यदि हर बार जब तुम परमेश्वर के वचन को पढ़ते हो, और तुम में परिवर्तन होते हैं और तुम दूसरे लोगों को अनुमति देते हो कि वे देखें कि तुम्हारा जीवन बेहतरी के लिए बदल गया है, तो यह दिखाता है कि तुम्हारा परमेश्वर के साथ एक सामान्य संबंध है और यह एक सही रूप में है। परमेश्वर लोगों से उनके अपराधों के आधार पर व्यवहार नहीं करता। समझ लेने और जानकारी प्राप्त कर लेने के बाद जब तक तुम उसके विरुद्ध फिर से विद्रोह नहीं करते और फिर से उसका विरोध नहीं करते, तब तक परमेश्वर तुम पर दया करता रहेगा। जब तुम इस समझ को प्राप्त कर लेते हो और परमेश्वर के द्वारा सिद्ध किए जाने की इच्छा को रखते हो तो परमेश्वर की उपस्थिति में तुम्हारी स्थिति सामान्य रहेगी। तुम चाहे कुछ भी करते हो, बस इस बात पर ध्यान दो: यदि मैं यह कार्य करूँगा तो परमेश्वर क्या सोचेगा? क्या यह भाइयों और बहनों को लाभ पहुंचाएगा? क्या यह परमेश्वर के भवन के कार्य के लिए लाभकारी होगा? अपनी प्रार्थना, संगति, बोलचाल, कार्य और लोगों के साथ संपर्क में अपने इरादों या अभिप्रायों को जाँचो, और जाँचो कि क्या परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य है या नहीं। यदि तुम अपने इरादों और विचारों में भेद कर पाने में अयोग्य हो, तो तुम में जाँचने की शक्ति नहीं है, जो प्रमाणित करता है कि तुम सत्य के बारे में बहुत कम जानते हो। अगर तुम, जो कुछ भी परमेश्वर करता है उसकी स्पष्ट समझ रखने में, परमेश्वर के वचन के अनुसार बातों को देखने में, और परमेश्वर की ओर खड़े होकर बातों को देखने में समर्थ हुए तो तुम्हारे दृष्टिकोण सही होंगे। अतः, परमेश्वर के साथ एक सही संबंध बनाना हर उस व्यक्ति के लिए सबसे बड़ी प्राथमिकता है जो परमेश्वर पर विश्वास करता है; प्रत्येक व्यक्ति को इसे सबसे महत्वपूर्ण कार्य के रूप में, और उनके जीवन की एक मुख्य घटना के रूप में मानना चाहिए। जो कुछ भी तुम करते हो उसका आकलन इसके सामने किया जाना चाहिए कि परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य है या नहीं। यदि परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य है और तुम्हारे इरादे सही हैं, तब वह कार्य करो। परमेश्वर के साथ एक सामान्य संबंध बनाए रखने के लिए तुम अपने व्यक्तिगत लाभों को खो देने का भय नहीं रख सकते, तुम शैतान को सफल होने की अनुमति नहीं दे सकते, तुम शैतान को अपने खिलाफ कुछ भी खोज पाने की अनुमति नहीं दे सकते, तुम शैतान को यह अनुमति नहीं दे सकते कि वह तुम्हें हँसी का पात्र बनाए। ऐसा इरादा इस बात का प्रकटीकरण है कि परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य है। यह देह के कार्यों के लिए नहीं है, बल्कि यह आत्मा की शांति के लिए है, यह पवित्र आत्मा के कार्य को प्राप्त करने के लिए है और परमेश्वर की इच्छा को पूरी करने के लिए है। यदि तुम्हें एक उचित या सही दशा में प्रवेश करना है, तो तुम्हें परमेश्वर के साथ एक अच्छा संबंध बनाना आवश्यक है, तुम्हें परमेश्वर पर विश्वास करने के दृष्टिकोणों को सही रखना आवश्यक है। यह परमेश्वर को अनुमति देना है कि वह तुम्हें प्राप्त करे, परमेश्वर को अनुमति देना है कि वह अपने वचन के फलों को तुम में प्रकट करे, और तुम्हें और अधिक प्रकाशित और प्रज्ज्वलित करे। इस प्रकार से तुम सही आचरण में प्रवेश करोगे। निरंतर रूप से परमेश्वर के वर्तमान वचनों को खाते और पीते रहो, पवित्र आत्मा के कार्य के वर्तमान मार्ग में प्रवेश करो, परमेश्वर की वर्तमान मांगों को पूरा करो, पुराने कार्यों को मत करो, कार्यों को करने के पुराने तरीकों पर न अटके रहो, और आज के कार्य के आचरण में शीघ्रता से प्रवेश करो। इस प्रकार से परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध पूरी तरह से सामान्य होगा और तुम परमेश्वर पर विश्वास करने के सही मार्ग में प्रवेश करोगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध कैसा है?" से उद्धृत

पिछला:सच्चे मार्ग की खोज में तुम्हें तर्कशक्ति से सम्पन्न अवश्य होना चाहिए

अगला:पवित्र शिष्टता जो परमेश्वर के विश्वासियों को धारण करनी चाहिए

वचन देह में प्रकट होता है अंत के दिनों के मसीह के कथन (संकलन) मेमने ने पुस्तक को खोला न्याय परमेश्वर के घर से शुरू होता है राज्य के सुसमाचार पर सर्वशक्तिमान परमेश्वर के उत्कृष्ट वचन -संकलन परमेश्वर की भेड़ें परमेश्वर की आवाज को सुनती हैं (नये विश्वासियों के लिए अनिवार्य चीजें) राज्य के सुसमाचार पर उत्कृष्ट प्रश्न और उत्तर (संकलन) मेमने का अनुसरण करना और नए गीत गाना अंत के दिनों के मसीह के लिए गवाहियाँ विजेताओं की गवाहियाँ मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवों की गवाहियाँ जीवन में प्रवेश पर उपदेश और वार्तालाप मैं वापस सर्वशक्तिमान परमेश्वर के पास कैसे गया सर्वशक्तिमान परमेश्वर, अंतिम दिनों के मसीह, के उत्कृष्ट वचन