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अध्याय 7 सत्य के अन्य पहलू जो कि न्यूनतम हैं जिन्हें नए विश्वासियों द्वारा समझा जाना चाहिए

4. पवित्र शिष्टता जो परमेश्वर के विश्वासियों को धारण करनी चाहिए

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

शैतान के द्वारा भ्रष्ट होने से पहले, मनुष्य स्वभाविक रूप से परमेश्वर का अनुसरण करता था और उसके वचनों का आज्ञापालन करता था। वह स्वभाविक रूप से सही समझ और सद्विवेक का था, और सामान्य मानवता का था। शैतान के द्वारा भ्रष्ट होने के बाद, उसकी मूल समझ, सद्विवेक, और मानवता मंदी हो गईं और शैतान के द्वारा खराब हो गईं। इस प्रकार, उसने परमेश्वर के प्रति अपनी आज्ञाकारिता और प्रेम को खो दिया है। मनुष्य की समझ धर्मपथ से हट गई है, उसकी समझ एक जानवर के समान हो गई है, और परमेश्वर के प्रति उसकी विद्रोहशीलता और भी अधिक लगातार और गंभीर हो गई है। अभी तक मनुष्य इसे न तो जानता है और न ही पहचानता है, और केवल आँख बंद करके विरोध और विद्रोह करता है।… "सामान्य समझ" आज्ञापालन और परमेश्वर के प्रति विश्वास योग्य बने रहने को, परमेश्वर के प्रति तड़प, परमेश्वर के प्रति स्पष्ट, और परमेश्वर के प्रति सद्सद्विवेक होने को संदर्भित करती है। यह परमेश्वर के प्रति एक हृदय और मन होने को संदर्भित करती है, और जानबूझकर परमेश्वर का विरोध करने को नहीं। वे जो धर्मपथ से हटनेवाली समझ के हैं वे ऐसे नहीं हैं। मनुष्य शैतान के द्वारा भ्रष्ट किया गया था इसिलिए, उसने परमेश्वर के बारे में धारणाओं का उत्पादन किया है, और परमेश्वर के लिए उसके पास निष्ठा या चाहत नहीं है, और परमेश्वर के प्रति कुछ भी कहने के लिए सद्विवेक नहीं है। मनुष्य जानबूझकर विरोध करता और परमेश्वर पर दोष लगाता है, और, इसके अलावा, उसकी पीठ-पीछे उस पर जोर से अपशब्द फेंक कर मारता है। मनुष्य स्पष्ट रूप से जानता है कि वह परमेश्वर है, फिर भी उसकी पीठ-पीछे उस पर दोष लगाता है, उसकी आज्ञाकारिता करने का कोई भी इरादा नहीं है, और सिर्फ परमेश्वर से अंधाधुंध माँग और निवेदन करता रहता है। ऐसे लोग—वे लोग जो अनैतिक समझ के हैं—वे अपने खुद के घृणित स्वभाव को जानने या अपनी विद्रोहशीलता का पछतावा करने के अयोग्य हैं। यदि लोग अपने आप को जानने के योग्य हों, तो फिर वे अपनी समझ को थोड़ा सा पुनः प्राप्त कर चुके हैं; जितने अधिक लोग परमेश्वर के प्रति विद्रोही हैं लेकिन अपने आप को नहीं जानते, उतने अधिक वे सही समझ के नहीं हैं।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "एक अपरिवर्तित स्वभाव का होना परमेश्वर के साथ शत्रुता होना है" से

आज, तुम पूर्ण होने का प्रयास कर सकते हो अपने बाहरी मनुष्यत्व में बदलाव और क्षमताओं में विकास भी कर सकते हो, परंतु प्रमुख बात यह है कि तुम यह समझ सको कि जो कुछ आज परमेश्वर कर रहा है वह सार्थक और लाभकारी हैः यह तुम्हें गंदगी की धरती पर जीने उस अपवित्रता से बाहर निकलने और उस गंदगी को झटकने की क्षमता प्रदान करता है, यह तुम्हें शैतान के प्रभाव से पार पाने में और शैतान के अंधकारमय प्रभाव को पीछे छोड़ने की क्षमता प्रदान करता है और इन बातों पर ध्यान देने से, तुम इस अपवित्र भूमि पर सुरक्षा प्राप्त करते हो। आखिरकार तुम्हें क्या गवाही देने को कहा जाएगा? तुम एक अपवित्र भूमि पर रहते हुए भी पवित्र बनने में समर्थ हो, और आगे फिर अपवित्र और अशुद्ध नहीं होगे, तुम शैतान के अधिकार क्षेत्र में रहकर भी अपने आपको उसके प्रभाव से छुड़ा लेते हो, और शैतान द्वारा ग्रसित और सताए नहीं जाते, और तुम सर्वशक्तिमान के हाथों में रहते हो। यही गवाही है, और शैतान से युद्ध में विजय का साक्ष्य है। तुम शैतान को त्यागने में सक्षम हो, जो जीवन तुम जीते हो उसमें शैतान प्रकाशित नहीं होता, परंतु क्या यह वही है जो परमेश्वर ने मनुष्य के सृजन के समय चाहा था कि मनुष्य इन्हें प्राप्त करे: सामान्य मानवता, सामान्य युक्तता, सामान्य अंतर्दृष्टि, परमेश्वर के प्रेम हेतु सामान्य संकल्पशीलता, और परमेश्वर के प्रति निष्ठा। यह परमेश्वर के प्राणी मात्र की गवाही है।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "विजयी कार्यों का आंतरिक सत्य (2)" से

सामान्य मानवता में ये पहलू शामिल होते हैं: अंतर्दृष्टि, समझ, विवेक, और चरित्र। यदि तुम इनमें से प्रत्येक के संबंध में सामान्यता प्राप्त कर सकते हो, तो तुम्हारी मानवता मानक के मुताबिक है। तुममें एक सामान्य इंसान की समानता होनी चाहिए और तुम्हें परमेश्वर में विश्वासी की तरह व्यवहार करना चाहिए। तुम्हें महान ऊँचाइयाँ नहीं प्राप्त करनी हैं या कूटनीति में संलग्न नहीं होना है। तुम्हें बस एक सामान्य व्यक्ति की समझ वाला, चीजों का स्वभाव जानने में सक्षम, केवल एक सामान्य इंसान होना है, और कम से कम एक सामान्य इंसान की तरह दिखाई देना है। यह पर्याप्त होगा।…बहुत से लोग देखते हैं कि युग बदल गया है, इसलिए वे किसी भी विनम्रता या धैर्य का अभ्यास नहीं करते हैं, और हो सकता है कि उनमें कोई प्रेम या संतों वाली शालीनता भी न हो। ये लोग बहुत बेहूदा हैं! क्या उनमें सामान्य मानवता का एक औंस भीहै? क्या उनके पास बोलने के लिए कोई गवाही है? उनके पास किसी भी तरह की कोई अंतर्दृष्टि और समझ नहीं है। निस्सन्देह, लोगों के व्यवहार के कुछ पहलू जो पथभ्रष्ट और गलत हैं, उन्हें सही किए जाने की आवश्यकता है। लोगों की कठोर आध्यात्मिक जीवन या अतीत की संवेदनशून्यता और मूर्खता का आभास—इन सभी चीजों को बदलना होगा। परिवर्तन का अर्थ यह नहीं है कि तुम्हें स्वच्छंद होने दिया जाए या शरीर में आसक्त होने दिया जाए या तुम जो चाहो वह करने दिया जाए। लापरवाही से बोलने से कार्य नहीं चल सकता है! एक सामान्य इंसान की तरह व्यवहार करना सुसंगति से बोलना है। हाँ का अर्थ हाँ, नहीं का अर्थ नहीं है। तथ्यों के प्रति सच्चे रहें और उचित तरीके से बोलें। कपट मत करो, झूठ मत बोलो।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "क्षमता को सुधारने का प्रयोजन परमेश्वर द्वारा उद्धार प्राप्त करना है" से

मैं जिस सामान्य मानवता के बारे में बात करता हूँ वह ऐसी अलौकिक नहीं है जैसा कि लोग समझते हैं। बल्कि, इसका अर्थ यह है कि तुम सभी व्यक्तियों, घटनाओं, और बातों से पार जा सकते हो, अपने आसपास की मजबूरियों पर विजय प्राप्त कर सकते हो, और कि तुम किसी भी स्थान या किसी भी वातावरण में मेरे निकट हो सकते हो और मेरे साथ संगति कर सकते हो।

"आरंभ में मसीह के कथन और गवाहियाँ" से 

तुम लोगों को जानना चाहिए कि परमेश्वर एक ईमानदार इंसान को पसंद करता है।…ईमानदारी का अर्थ है अपना हृदय परमेश्वर को अर्पित करना; किसी भी चीज़ में उस से झूठा व्यवहार नहीं करना; सभी चीजों में उसके प्रति निष्कपट होना, सत्य को कभी आच्छादित नहीं करना; कभी ऐसा कार्य नहीं करना जो उन लोगों को धोखा देता हो जो ऊँचे हैं और उन लोगों को भ्रम में डालता हो जो नीचे हैं; और कभी ऐसा काम नहीं करना जो केवल परमेश्वर से अपने लिए अनुग्रह प्राप्त करने के लिए किया जाता है। संक्षेप में, ईमानदार होने का अर्थ है अपने कार्यों और वचनों में अशुद्धता से परहेज करना, और न तो परमेश्वर को और न मनुष्य को धोखा देना।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "तीन चेतावनियाँ" से

मेरी बहुत-सी इच्छाएं हैं। मैं चाहता हूँ कि तुम लोग अपने आचरण को उपयुक्त और बेहतर बनाओ, अपने दायित्व पूरी निष्ठा से पूरे करो, तुम्हारे अंदर सच्चाई और मानवीयता हो, ऐसे बनो जो अपना सर्वस्व, अपना जीवन परमेश्वर के लिये न्योछावर कर सके, वगैरह-वगैरह। ये सारी कामनाएँ तुम्हारी कमियों, भ्रष्टता और अवज्ञाओं से उत्पन्न होती हैं।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "उल्लंघन मनुष्य को नरक में ले जाएगा" से

परमेश्वर चाहता है कि लोग वास्तविक जीवन में सामान्य मनुष्यत्व को जीएँ, न केवल कलीसियाई जीवन में; कि वे वास्तविक जीवन में सत्य को जीएँ, न केवल कलीसियाई जीवन में; कि वे वास्तविक जीवन में अपने कार्य को पूरा करें, न केवल कलीसियाई जीवन में। वास्तविकता में प्रवेश करने के लिए एक व्यक्ति को सब कुछ वास्तविक जीवन की ओर मोड़ देना चाहिए। यदि परमेश्वर पर विश्वास करने वाले वास्तविक जीवन में प्रवेश नहीं कर सकते और स्वयं को नहीं जान सकते या वास्तविक जीवन में सामान्यमनुष्यत्व को नहीं जी सकते, तो वे विफल हो जाएँगे। वे जो परमेश्वर की आज्ञा नहीं मानते वे सब ऐसे लोग हैं जो वास्तविक जीवन में प्रवेश नहीं कर सकते। वे सब ऐसे लोग हैं जो मनुष्यत्व के बारे में बात करते हैं परंतु दुष्टात्माओं की प्रकृति में जीते हैं। वे सब ऐसे लोग हैं जो सत्य के बारे में बात करते हैं परंतु उसके स्थान पर धर्मसिद्धांतों को जीते हैं। जो वास्तविक जीवन में सत्य के साथ नहीं जी सकते, वे ऐसे लोग हैं जो परमेश्वर पर विश्वास तो करते हैं परंतु वे उसके द्वारा घृणित और अस्वीकृत माने जाते हैं। तुम्हें वास्तविक जीवन में प्रवेश करने का अभ्यास करना है, अपनी कमियों, अवज्ञाकारिता, और अज्ञानता को जानना है, और अपने असामान्य मनुष्यत्व और अपनी कमियों को जानना है। इस तरह से, तुम्हारा सारा ज्ञान तुम्हारी वास्तविक परिस्थिति और कठिनाइयों के साथ एकीकृत हो जाएगा। केवल इस प्रकार का ज्ञान वास्तविक होता है और तुम्हें स्वयं की दशा को सच्चाई के साथ समझने और तुम्हारे स्वभाव-संबंधी परिवर्तनों को प्राप्त करने की अनुमति दे सकता है।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "कलीसिया जीवन और वास्तविक जीवन पर विचार-विमर्श" से

जिन लोगों का परमेश्वर इस्तेमाल करता है, वे बाहर से तर्कहीन प्रतीत होते हैं और ऐसा लगता है कि दूसरों के साथ वे उचित संबंध नहीं रख पाते, हालांकि वे औचित्य के साथ और न कि लापरवाही के साथ बोलते हैं, और परमेश्वर के सामने हमेशा शांत हृदय रख पाते हैं। लेकिन केवल इसी तरह का व्यक्ति पवित्र आत्मा द्वारा इस्तेमाल किए जाने के लिए पर्याप्त है। जिन "तर्कहीन" व्यक्तियों के बारे में परमेश्वर बात करता है वे कुछ ऐसे दिखते हैं जैसे उनके दूसरों के साथ कोई भी उचित संबंध नहीं हैं, और उनका कोई भी बाहरी प्रेम या दिखावटी अभ्यास नहीं हैं, लेकिन जब वे आध्यात्मिक चीज़ों पर संवाद करते हैं, तो वे अपने दिल को पूरी तरह खोल सकते हैं और निस्वार्थ रूप से दूसरों को वह रोशनी और प्रबुद्धता प्रदान कर सकते हैं जो उन्होंने परमेश्वर के साथ अपने वास्तविक अनुभव से हासिल की है। यही वह तरीका है जिससे वे परमेश्वर के प्रति अपना प्रेम व्यक्त करते हैं और परमेश्वर की इच्छा को पूरा करते हैं। जब दूसरे सभी लोग उनकी निंदा और उपहास कर रहे होते हैं, तो वे बाहर के लोगों, घटनाओं, या चीज़ों द्वारा नियंत्रित नहीं किए जा सकते हैं, और फिर भी परमेश्वर के सामने शांत रह पाते हैं। ऐसे व्यक्ति के पास अपनी स्वयं की अनूठी अंतर्दृष्टि होती है। दूसरे चाहे कुछ भी कहें या करें, उनका दिल कभी भी परमेश्वर से दूर नहीं जाता है। जब दूसरे लोग उत्साहपूर्वक और मज़ाकिया ढंग से बातें करते हैं, तो उनका दिल तब भी परमेश्वर के समक्ष रहता है, परमेश्वर के वचनों पर विचार करता रहता है या उनकी मंशा प्राप्त करने के प्रयास में अपने मन में परमेश्वर को चुपचाप प्रार्थना करता रहता है। वे दूसरों के साथ अपने उचित संबंधों को बनाए रखने के प्रयास को अपने ध्यान का मुख्य केंद्र नहीं बनाते हैं। इस तरह के व्यक्ति का जीवन के बारे में कोई दर्शनशास्त्र नहीं होता है। बाहरी रूप से ऐसा व्यक्ति जीवंत, प्रिय, और मासूम होता है, लेकिन उसके पास शांति की भावना मौजूद रहती है। परमेश्वर जिन व्यक्तियों का उपयोग करता है उनमें कुछ ऐसे ही गुण होते हैं।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "परमेश्वर के साथ एक उचित संबंध स्थापित करना बहुत महत्वपूर्ण है" से

जिन में सत्य है वे ऐसे लोग हैं जिनके पास असली अनुभव है और वे अपनी गवाही में,परमेश्वर के लिये दृढ़ता से खड़े रह सकते हैं, बिना कभी पीछे हटे और जो परमेश्वर के साथ प्रेम रखते हैं और लोगों के साथ भी सामान्य सम्बन्ध रखतेहैं, जबउनके साथ कुछघटनाएं घटती हैं, तोवे पूरी तरह से परमेश्वर का आज्ञापालन कर सकते हैं और मृत्यु तक उसका आज्ञापालन करने में सक्षम होतेहैं। वास्तविक जीवन में तुम्हारा व्यवहार और प्रकाशन परमेश्वर के लिए गवाही है, वे मनुष्य के द्वारा जीए जाते हैं और परमेश्वर के लिए गवाही ठहरते हैं, और वास्वत में यही परमेश्वर के प्रेम को आनन्द लेना है; जब इस बिन्दु तक तुम्हारा अनुभव होता है, तो उसमें एक प्रभाव की उपलब्धि हो चुकी होती है। तुम असली जीवन जी रहे होते हैं, और तुम्हारे प्रत्येक कार्य को अन्य लोग प्रशंसा से देखते हैं, तुम्हारा बाह्य रूप साधारण होता है परन्तु तुम अत्यंत धार्मिकता का जीवन जीते हैं, और जब तुम परमेश्वर के वचन दूसरों तक पहुंचाते हो तो तुम्हें परमेश्वर मार्गदर्शन और प्रबुद्धता प्रदान करता है। तुम अपने शब्दों के द्वारा परमेश्वर की इच्छा को व्यक्त करते हो और वास्तविकता को सम्प्रेषित करते हो, और आत्मा की सेवा को अच्छी तरह समझते हो। तुम खुलकर बोलते हो, तुम सभ्य और ईमानदार हो, झगड़ालू नहीं और शालीन हो, परमेश्वर के प्रबंधों को मानते हो और जब तुम पर चीज़ें आ पड‌ती हैं तो तुम अपनी गवाही में दृढ़ रहते हो, चाहे कुछ भी हो जाए तुम जिसके साथ भी व्यवहार कर रहे होते हो शांत और शांतचित्त बने रहते हो।इस तरह के व्यक्ति ने परमेश्वर के प्रेम को देखा है। कुछ लोग अभी भी युवा हैं, परन्तु वे मध्यम आयु के समान व्यवहार करते हैं; वे परिपक्व होते हैं, सत्य को धारण किए रहते हैं और दूसरों के द्वारा प्रशंसा प्राप्त करते हैं - और यह वे लोग हैं जो गवाही देते हैं और परमेश्वर की अभिव्यक्ति हैं।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "परमेश्वर से प्रेम करने वाले लोग हमेशा के लिए उसके प्रकाश में रहेंगे" से

पिछला:परमेश्वर पर विश्वास में, तुम्हें परमेश्वर के साथ सामान्य सम्बन्ध स्थापित करना चाहिए।

अगला:परमेश्वर पर विश्वास केवल शान्ति और आशीषों को खोजने के लिए ही नहीं होना चाहिए।

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