5. पुराने और नए दोनों नियमों के युगों में, परमेश्वर ने इस्राएल में काम किया। प्रभु यीशु ने भविष्यवाणी की कि वह अंतिम दिनों के दौरान लौटेगा, इसलिए जब भी वह लौटता है, तो उसे इस्राएल में आना चाहिए। फिर भी आप गवाही देते हैं कि प्रभु यीशु पहले ही लौट चुका है, कि वह देह में प्रकट हुआ है और चीन में अपना कार्य कर रहा है। चीन एक नास्तिक राजनीतिक दल द्वारा शासित राष्ट्र है। किसी भी (अन्य) देश में परमेश्वर के प्रति इससे अधिक विरोध और ईसाइयों का इससे अधिक उत्पीड़न नहीं है। परमेश्वर की वापसी चीन में कैसे हो सकती है?
संदर्भ के लिए बाइबल के पद :
“क्योंकि उदयाचल से लेकर अस्ताचल तक जाति-जाति में मेरा नाम महान् है..., सेनाओं के यहोवा का यही वचन है” (मलाकी 1:11)।
“जैसे बिजली पूर्व से निकलकर पश्चिम तक चमकती है, वैसे ही मनुष्य के पुत्र का भी आना होगा। जहाँ लोथ हो, वहीं गिद्ध इकट्ठे होंगे” (मत्ती 24:27-28)।
परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :
परमेश्वर समस्त सृजित प्राणियों का प्रभु है
पिछले दो युगों के कार्य का एक चरण इस्राएल में पूरा किया गया, और एक यहूदिया में। सामान्य तौर पर कहा जाए तो, इस कार्य का कोई भी चरण इस्राएल छोड़कर नहीं गया, और प्रत्येक चरण पहले चुने गए लोगों पर किया गया। परिणामस्वरूप, इस्राएली मानते हैं कि यहोवा परमेश्वर केवल इस्राएलियों का परमेश्वर है। चूँकि यीशु ने यहूदिया में कार्य किया, जहाँ उसने सूली पर चढ़ाए जाने का काम पूरा किया, इसलिए यहूदी उसे यहूदी लोगों के उद्धारक के रूप में देखते हैं। वे सोचते हैं कि वह केवल यहूदियों का राजा है, अन्य किसी का नहीं; वह अंग्रेजों को छुटकारा दिलाने वाला प्रभु नहीं है, न ही अमेरिकियों को छुटकारा दिलाने वाला प्रभु, बल्कि वह इस्राएलियों को छुटकारा दिलाने वाला प्रभु है, और इस्राएल में भी उसने यहूदियों को छुटकारा दिलाया। वास्तव में, परमेश्वर सभी चीज़ों का संप्रभु है। वह सभी सृजित प्राणियों का परमेश्वर है। वह केवल इस्राएलियों का परमेश्वर नहीं है, न यहूदियों का; बल्कि वह सभी सृजित प्राणियों का परमेश्वर है। उसके कार्य के पिछले दो चरण इस्राएल में हुए और इसकी वजह से लोगों ने कुछ निश्चित धारणाएँ विकसित कर ली हैं। वे मानते हैं कि यहोवा ने अपना कार्य इस्राएल में किया, और स्वयं यीशु ने अपना कार्य यहूदिया में किया, और इतना ही नहीं, यीशु ने यह कार्य देह में किया। चाहे जो भी हो, उन्हें लगता है कि यह कार्य इस्राएल से आगे नहीं बढ़ा। परमेश्वर ने मिस्रियों या भारतीयों पर कार्य नहीं किया; उसने केवल इस्राएलियों पर कार्य किया। लोग इस प्रकार विभिन्न धारणाएँ बना लेते हैं, वे परमेश्वर के कार्य को एक निश्चित दायरे में सीमित कर देते हैं। वे कहते हैं कि जब परमेश्वर कार्य करता है, तो अवश्य ही उसे ऐसा चुने हुए लोगों पर और इस्राएल में करना चाहिए; इस्राएलियों के अलावा परमेश्वर किसी अन्य पर कार्य नहीं करता, न ही उसके कार्य का कोई बड़ा दायरा है। वे देहधारी परमेश्वर को नियंत्रित करने में विशेष रूप से सख़्त हैं और उसे इस्राएल की सीमा से बाहर नहीं जाने देते। क्या ये सब मानवीय धारणाएँ मात्र नहीं हैं? परमेश्वर ने संपूर्ण स्वर्ग और पृथ्वी और सभी चीजें बनाईं, उसने सभी सृजित प्राणी बनाए, तो वह अपने कार्य को केवल इस्राएल तक सीमित कैसे रख सकता है? अगर ऐसा होता, तो उसके तमाम सृजित प्राणी बनाने का क्या तुक था? उसने पूरी दुनिया को बनाया, और उसने अपनी छह हजार वर्षीय प्रबंधन योजना केवल इस्राएल में नहीं, बल्कि ब्रह्मांड में प्रत्येक व्यक्ति पर कार्यान्वित की। चाहे तुम जो कोई भी हो—चीनी, अमेरिकी, अंग्रेज, रूसी—प्रत्येक व्यक्ति आदम का वंशज है; वे सब परमेश्वर के बनाए हुए हैं। उनमें से एक भी सृजित प्राणियों के दायरे से बाहर नहीं जा सकता और उनमें से एक भी खुद को “आदम का वंशज” होने की उपाधि से अलग नहीं कर सकता। वे सभी सृजित प्राणी हैं, वे सभी आदम की संतानें हैं, और वे सभी आदम और हव्वा के भ्रष्ट वंशज भी हैं। केवल इस्राएली ही सृजित प्राणी नहीं हैं, बल्कि सभी लोग सृजित प्राणी हैं; बस इतना ही है कि कुछ को शाप दिया गया है, और कुछ को आशीष। इस्राएलियों के बारे में कई स्वीकार्य बातें हैं; परमेश्वर ने आरंभ में उन पर कार्य किया क्योंकि वे सबसे कम भ्रष्ट थे। चीनियों की उनसे तुलना नहीं की जा सकती; वे उनसे बहुत हीन हैं। इसलिए, आरंभ में परमेश्वर ने इस्राएलियों के बीच कार्य किया, और उसके कार्य का दूसरा चरण केवल यहूदिया में संपन्न हुआ—जिसके कारण मनुष्यों के बीच बहुत सारी धारणाएँ और विनियम बन गए हैं। वास्तव में, यदि परमेश्वर मनुष्य की धारणाओं के अनुसार कार्य करता, तो वह केवल इस्राएलियों का ही परमेश्वर होता, और इस प्रकार वह अन्यजाति-राष्ट्रों के बीच अपने कार्य को फैलाने में असमर्थ होता, क्योंकि वह केवल इस्राएलियों का ही परमेश्वर होता, सभी सृजित प्राणियों का परमेश्वर नहीं। भविष्यवाणियों में कहा गया है कि यहोवा का नाम अन्य-जाति राष्ट्रों में सम्मान पाएगा, कि वह अन्य-जाति राष्ट्रों में फैल जाएगा। यह भविष्यवाणी क्यों की गई थी? यदि परमेश्वर केवल इस्राएलियों का परमेश्वर होता, तो वह केवल इस्राएल में ही कार्य करता। इतना ही नहीं, वह इस कार्य का विस्तार न करता, और वह ऐसी भविष्यवाणी न करता। चूँकि उसने यह भविष्यवाणी की थी, इसलिए वह निश्चित रूप से अन्य-जाति राष्ट्रों के बीच, प्रत्येक देश में और समस्त भूमि पर अपने कार्य को फैलाएगा। चूँकि उसने ऐसा कहा है, इसलिए वह ऐसा ही करेगा; यह उसकी योजना है, क्योंकि वह स्वर्ग और पृथ्वी तथा सभी चीज़ों का सृष्टिकर्ता प्रभु और सभी सृजित प्राणियों का परमेश्वर है। चाहे वह इस्राएलियों पर कार्य करता हो या संपूर्ण यहूदिया में, वह जो कार्य करता है, वह संपूर्ण ब्रह्मांड और संपूर्ण मानवता का कार्य होता है। आज जो कार्य वह बड़े लाल अजगर के देश—एक अन्य-जाति राष्ट्र में—करता है, वह भी संपूर्ण मानवता का कार्य है। इस्राएल पृथ्वी पर उसके कार्य का आधार हो सकता है; इसी प्रकार, अन्यजाति-राष्ट्रों के बीच चीन भी उसके कार्य का आधार हो सकता है। क्या उसने अब इस भविष्यवाणी को पूरा नहीं किया है कि “यहोवा का नाम अन्यजाति-राष्ट्रों में महान होगा”? अन्य-जाति राष्ट्रों के बीच उसके कार्य का पहला चरण यह कार्य है, जिसे वह बड़े लाल अजगर के देश में कर रहा है। देहधारी परमेश्वर का इस राष्ट्र में कार्य करना और इन शापित लोगों पर कार्य करना विशेष रूप से मनुष्य की धारणाओं के विपरीत है; ये लोग सबसे निम्न स्तर के हैं, इनका कोई मूल्य नहीं है, और इन्हें यहोवा ने आरंभ में त्याग दिया था। लोगों को दूसरे लोगों द्वारा त्यागा जा सकता है, परंतु यदि वे परमेश्वर द्वारा त्यागे जाते हैं, तो किसी की भी हैसियत उनसे कम नहीं होगी, और किसी का भी मूल्य उनसे कम नहीं होगा। एक सृजित प्राणी के लिए शैतान द्वारा वश में किया जाना या लोगों द्वारा त्याग दिया जाना बहुत कष्टदायक चीज है—परंतु किसी सृजित प्राणी को उसके सृष्टिकर्ता द्वारा त्याग दिए जाने का अर्थ है कि उसका रुतबा सबसे निचले स्तर पर है। मोआब के वंशज शापित थे और वे इस पिछड़े देश में पैदा हुए थे; निःसंदेह अंधकार के प्रभाव से ग्रस्त सभी लोगों में मोआब के वंशजों का रुतबा सबसे कम है। चूँकि अब तक ये लोग सबसे कम रुतबे वाले रहे हैं, इसलिए उन पर किया गया कार्य मनुष्य की धारणाओं को सबसे अधिक खंडित करता है और परमेश्वर की संपूर्ण छह हजार वर्षीय प्रबंधन योजना के लिए सबसे लाभदायक भी है। इन लोगों पर ऐसा कार्य करना मनुष्य की धारणाओं को खंडित करने में सबसे अधिक सक्षम है और इसके साथ परमेश्वर एक युग का सूत्रपात करता है; इसके साथ वह मनुष्य की सभी धारणाओं को खंडित कर देता है; इसके साथ वह संपूर्ण अनुग्रह के युग के कार्य का समापन करता है। उसका शुरुआती कार्य इस्राएल की सीमाओं के भीतर यहूदिया में किया गया था; अन्य-जाति राष्ट्रों के बीच उसने नए युग का सूत्रपात करने के लिए कोई कार्य नहीं किया। कार्य का अंतिम चरण न केवल अन्य-जातियों पर किया जा रहा है; बल्कि इससे भी अधिक, उन लोगों पर किया जा रहा है, जिन्हें शापित किया गया है। यह एक बिंदु शैतान को अपमानित करने के लिए सबसे सक्षम प्रमाण है, और इस प्रकार, परमेश्वर ब्रह्मांड में सभी सृजित प्राणियों का परमेश्वर, सभी चीज़ों का प्रभु, और सभी जीवधारियों की आराधना की वस्तु “बन” जाता है।
आज ऐसे लोग हैं, जो अभी भी नहीं समझते कि परमेश्वर ने कौन-सा नया कार्य आरंभ किया है। अन्यजाति-राष्ट्रों में परमेश्वर ने एक नई शुरुआत की है। उसने एक नया युग प्रारंभ किया है और एक नया कार्य शुरू किया है—और वह इस कार्य को मोआब के वंशजों पर कर रहा है। क्या यह उसका नवीनतम कार्य नहीं है? युगों-युगों में पहले कभी किसी ने इस कार्य का अनुभव नहीं किया है। किसी ने कभी इसके बारे में नहीं सुना है, समझना तो दूर की बात है। परमेश्वर की बुद्धि, परमेश्वर की चमत्कारिकता, परमेश्वर का अथाहपन, परमेश्वर की महानता, परमेश्वर की पवित्रता, सब कार्य के इस चरण के माध्यम से प्रकट किए जाते हैं, जो कि अंत के दिनों का कार्य है। क्या यह नया कार्य नहीं है, ऐसा कार्य, जो मानव की धारणाओं को खंडित करता है? ऐसे लोग भी हैं, जो इस प्रकार सोचते हैं : “चूँकि परमेश्वर ने मोआब को शाप दिया था और कहा था कि वह मोआब के वंशजों का त्याग कर देगा, तो वह उन्हें अब कैसे बचा सकता है?” ये अन्यजाति के वे लोग हैं, जिन्हें परमेश्वर द्वारा शाप दिया गया था और इस्राएल से बाहर निकाल दिया गया था; इस्राएली उन्हें “अन्यजाति के कुत्ते” कहते थे। हरेक की दृष्टि में, वे न केवल अन्यजाति के कुत्ते हैं, बल्कि उससे भी बदतर, विनाश के पुत्र हैं; कहने का तात्पर्य यह कि वे परमेश्वर द्वारा चुने हुए लोग नहीं हैं। भले ही शुरुआत में वे इस्राएल की सीमाओं के भीतर पैदा हुए, फिर भी वे इस्राएल के लोगों का हिस्सा नहीं हैं; और अन्य-जाति राष्ट्रों में निष्कासित कर दिए गए थे। ये सबसे हीन लोग हैं। चूँकि वे मानवता के बीच सबसे निचले स्तर पर हैं, यही कारण है कि परमेश्वर एक नए युग को आरंभ करने का अपना कार्य उन पर करता है, क्योंकि वे भ्रष्ट मानवता के प्रतिनिधि हैं। परमेश्वर का कार्य अविवेकपूर्ण और उद्देश्यहीन नहीं है; जो कार्य वह आज इन लोगों पर करता है, वह सृजित प्राणियों पर किया जाने वाला कार्य भी है। नूह परमेश्वर का एक सृजित प्राणी था, जैसे कि उसके वंशज भी हैं। दुनिया में हाड़-मांस से बना कोई भी प्राणी परमेश्वर का सृजित प्राणी है। परमेश्वर का कार्य सभी सृजित प्राणियों पर निर्देशित है; यह इस बात पर आधारित नहीं है कि सृजित किए जाने के बाद किसी को शापित किया गया है या नहीं। उसका प्रबंधन कार्य सभी सृजित प्राणियों पर निर्देशित है, केवल उन चुने हुए लोगों पर नहीं, जिन्हें शापित नहीं किया गया है। चूँकि परमेश्वर अपने सृजित प्राणियों पर अपना कार्य करने का इरादा रखता है, इसलिए वह इसे निश्चित रूप से सफलतापूर्वक पूरा करेगा, और वह उन लोगों पर कार्य करेगा जो उसके कार्य के लिए लाभदायक हैं। इसलिए, जब वह लोगों पर कार्य करता है, तो सभी विनियमों को तोड़ देता है; “शापित,” “ताड़ित” और “धन्य” शब्द उसके लिए अस्तित्व में नहीं हैं! यहूदी लोग अच्छे हैं, इस्राएल के चुने हुए लोग भी अच्छे हैं; वे उच्च काबिलियत और अच्छी मानवता वाले लोग हैं। प्रारंभ में यहोवा ने उन्हीं पर अपना कार्य आरंभ किया, और अपना सबसे पहला कार्य किया—परंतु आज उन्हें विजय के कार्य का प्राप्तकर्ता बनाना अर्थहीन होगा। वे भी सृजित प्राणियों का एक हिस्सा हो सकते हैं और उनमें बहुत-कुछ सकारात्मक हो सकता है, किंतु उन पर कार्य के इस चरण को कार्यान्वित करना बेमतलब होगा; यह लोगों को जीत पाने में सक्षम नहीं होगा, न ही यह सभी सृजित प्राणियों को समझाने में सक्षम होगा। यही उसके द्वारा अपने कार्य को बड़े लाल अजगर के देश के इन लोगों तक ले जाने का आशय है। यहाँ सबसे अधिक महत्वपूर्ण उसके द्वारा एक युग आरंभ करना, उसके द्वारा सभी विनियमों और सभी मानवीय धारणाओं को तोड़ना और उसके द्वारा संपूर्ण अनुग्रह के युग के कार्य का समापन करना है। यदि उसका वर्तमान कार्य फिर भी इस्राएलियों पर किया गया होता, तो जब तक उसकी छह हजार वर्षीय प्रबंधन योजना समाप्त होने को आती, हर कोई यह विश्वास करने लगता कि परमेश्वर केवल इस्राएलियों का परमेश्वर है, कि केवल इस्राएली ही परमेश्वर के चुने हुए लोग हैं और यह कि केवल इस्राएली ही परमेश्वर का आशीष और प्रतिज्ञा विरासत में पाने योग्य हैं। अंत के दिनों के दौरान बड़े लाल अजगर के अन्य-जाति राष्ट्र में परमेश्वर का देहधारी होना सभी सृजित प्राणियों का परमेश्वर होने का उसका कार्य पूरा करता है; उसका संपूर्ण प्रबंधन कार्य पूरा करता है और बड़े लाल अजगर के देश में उसके प्रबंधन कार्य के केंद्रीय भाग को समाप्त करता है। कार्य के इन तीनों चरणों के मूल में मनुष्य का उद्धार है—अर्थात, सभी सृजित प्राणियों से सृष्टिकर्ता की आराधना करवाना। इस प्रकार, कार्य के प्रत्येक चरण का बहुत बड़ा अर्थ है; परमेश्वर ऐसा कुछ नहीं करता जिसका कोई अर्थ या मूल्य न हो। एक ओर, कार्य का यह चरण एक नए युग का सूत्रपात और पिछले दो युगों का अंत करता है; दूसरी ओर, यह लोगों की समस्त धारणाओं और लोगों के विश्वास के सभी पुराने तरीकों को और चीजों को समझने के पुराने तरीकों को खंडित करता है। पिछले दो युगों का कार्य मनुष्य की विभिन्न धारणाओं के अनुसार किया गया था; किंतु यह चरण मनुष्य की धारणाओं को पूरी तरह मिटा देता है, और ऐसा करके वह मानवजाति को पूरी तरह से जीत लेता है। मोआब के वंशजों पर किए गए कार्य के माध्यम से उसके वंशजों को जीतकर परमेश्वर संपूर्ण ब्रह्मांड के लोगों को जीत लेगा। यह उसके कार्य के इस चरण का गहनतम अर्थ है, और यही उसके कार्य के इस चरण का सबसे मूल्यवान पहलू है। भले ही तुम अब जानते हो कि तुम्हारा अपना स्थान निम्न है और तुम कम मूल्य के हो, फिर भी तुम यह महसूस करोगे कि तुमने एक बहुत बड़ा आशीष विरासत में प्राप्त किया है और इतना बड़ा वादा प्राप्त किया है, और यह कि तुम परमेश्वर के इस महान कार्य को पूरा करने में सहायता कर सकते हो, तुम परमेश्वर का असली मुखमंडल देख सकते हो, तुम परमेश्वर के अंतर्निहित स्वभाव को जान सकते हो और तुम परमेश्वर की इच्छा के अनुसार चल सकते हो, जो तुम्हें सबसे आनंददायक चीज लगती है। परमेश्वर के कार्य के पिछले दो चरण इस्राएल में संपन्न किए गए थे। यदि अंत के दिनों के दौरान उसके कार्य का यह चरण भी इस्राएलियों पर किया जाता, तो न केवल सभी सृजित प्राणी मान लेते कि केवल इस्राएली ही परमेश्वर के चुने हुए लोग हैं, बल्कि परमेश्वर की संपूर्ण प्रबंधन योजना भी अपना वांछित परिणाम प्राप्त न कर पाती। जिस समय इस्राएल में उसके कार्य के दो चरण पूरे किए गए थे, उस दौरान अन्य-जाति राष्ट्रों के बीच न तो कोई नया कार्य—न ही नया युग प्रारंभ करने का कोई कार्य—किया गया था। कार्य का आज का चरण—एक नए युग के सूत्रपात का कार्य—पहले अन्यजाति-राष्ट्रों में किया जा रहा है, और इतना ही नहीं, प्रारंभ में मोआब के वंशजों पर किया जा रहा है; इस प्रकार संपूर्ण युग का आरंभ किया गया है। परमेश्वर ने मनुष्य की धारणाओं में निहित किसी भी ज्ञान को बाकी नहीं रहने दिया और सब खंडित कर दिया। विजय प्राप्त करने के अपने कार्य में उसने मानवीय धारणाओं को और चीजों को समझने के लोगों के पुराने, आरंभिक तरीकों को ध्वस्त कर दिया है। वह लोगों को देखने देता है कि परमेश्वर पर कोई विनियम लागू नहीं होते, कि परमेश्वर के मामले में कुछ भी पुराना नहीं है, कि वह जो कार्य करता है वह पूरी तरह से स्वतंत्र है, पूरी तरह से मुक्त है, और कि वह अपने समस्त कार्य में सही है। वह सृजित प्राणियों पर जो भी कार्य करता है, उसके प्रति तुम्हें पूरी तरह से समर्पित होना चाहिए। उसके समस्त कार्य का अर्थ होता है, और यह उसके इरादों और बुद्धि के अनुसार किया जाता है, मनुष्य की पसंद और धारणाओं के अनुसार नहीं। अगर कोई चीज उसके कार्य के लिए लाभदायक होती है, तो वह उसे करता है; और अगर कोई चीज उसके कार्य के लिए लाभदायक नहीं होती, तो वह उसे नहीं करता, चाहे वह कितनी ही अच्छी क्यों न हो! वह कार्य करता है और अपने कार्य के अर्थ और प्रयोजन के अनुसार अपने कार्य के प्राप्तकर्ताओं और स्थान का चयन करता है। कार्य करते हुए वह पुराने विनियमों से चिपका नहीं रहता, न ही वह पुराने सूत्रों का पालन करता है। इसके बजाय, वह अपने कार्य की योजना उसके मायने के अनुसार बनाता है। अंततः वह वास्तविक प्रभाव और प्रत्याशित लक्ष्य प्राप्त करेगा। यदि तुम आज इन बातों को नहीं समझते, तो इस कार्य का तुम पर कोई प्रभाव नहीं होगा।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य
यहोवा का कार्य दुनिया का सृजन था, वह आरंभ था; कार्य का यह चरण कार्य का अंत है, और यह समापन है। आरंभ में, परमेश्वर का कार्य इस्राएल के चुने हुए लोगों के बीच किया गया था और यह सभी जगहों में से सबसे पवित्र जगह पर एक अभूतपूर्व कार्य था। कार्य का अंतिम चरण दुनिया का न्याय करने और युग को समाप्त करने के लिए सभी देशों में से सबसे गंदे देश में किया जा रहा है। पहले चरण में, परमेश्वर का कार्य सबसे प्रकाशमान स्थान पर किया गया था और अंतिम चरण सबसे अंधकारमय स्थान पर किया जाता है, और यह अंधकार भगा दिया जाएगा, रोशनी लाई जाएगी और सब लोगों पर विजय प्राप्त की जाएगी। जब इस सबसे गंदे और सबसे अंधकारमय स्थान के लोगों पर विजय प्राप्त कर ली जाएगी और समस्त आबादी स्वीकार कर लेगी कि परमेश्वर होता है, जो कि सच्चा परमेश्वर है, और हर व्यक्ति पूरी तरह से कायल हो जाएगा, तब समस्त ब्रह्मांड पर विजय प्राप्त करने का कार्य कार्यान्वित करने के लिए इस तथ्य का उपयोग किया जाएगा। कार्य का यह चरण प्रातिनिधिक है : एक बार इस युग का कार्य समाप्त हो गया, तो छह हजार वर्षों का प्रबंधन कार्य पूरी तरह से समाप्त हो जाएगा। जब सबसे अंधकारमय स्थान के लोगों को जीत लिया जाएगा, तो कहने की जरूरत नहीं है कि बाकी सब जगह भी ऐसा ही होगा। इस तरह, केवल चीन में विजय का कार्य ही प्रातिनिधिक महत्व रखता है। चीन अंधकार की सभी शक्तियों का मूर्त रूप है और चीन के लोग उन सभी लोगों का प्रतिनिधित्व करते हैं जो देह के हैं, शैतान के हैं, दैहिक हैं। चीनी लोग ही बड़े लाल अजगर द्वारा सबसे ज्यादा भ्रष्ट किए गए हैं, वही परमेश्वर के सबसे कट्टर विरोधी हैं, उन्हीं की मानवता सबसे अधम और सबसे गंदी है, इसलिए वे समस्त भ्रष्ट मानवता के आद्यरूप हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि अन्य देशों में कोई समस्या नहीं है; मनुष्य की धारणाएँ समान हैं, यद्यपि इन देशों के लोग अच्छी काबिलियत वाले हो सकते हैं, किन्तु यदि वे परमेश्वर को नहीं जानते हैं, तो अवश्य ही वे उसका विरोध करते होंगे। यहूदियों ने भी परमेश्वर का विरोध और उससे विद्रोह क्यों किया? फरीसियों ने भी उसका विरोध क्यों किया? यहूदा ने यीशु के साथ विश्वासघात क्यों किया? उस समय, बहुत-से अनुयायी यीशु को नहीं जानते थे। यीशु को सूली पर चढ़ाये जाने और उसके फिर से जी उठने के बाद भी, लोगों ने उस पर विश्वास क्यों नहीं किया? क्या मनुष्य का विद्रोहीपन बिल्कुल समान नहीं है? बात बस इतनी है कि चीन के लोग इसके एक उदाहरण के रूप में पेश किए जाते हैं, जब उन पर विजय प्राप्त कर ली जाएगी तो वे एक मॉडल और नमूना बन जाएँगे और दूसरों के लिए संदर्भ का काम करेंगे। मैंने हमेशा क्यों कहा है कि तुम लोग मेरी प्रबंधन योजना का केवल एक गौण अंग हो? चीन के लोगों में ही भ्रष्टता, अशुद्धता, अधार्मिकता, विरोध और विद्रोहशीलता सर्वाधिक पूर्णता से व्यक्त होती हैं और अपने विविध रूपों में प्रकट होती हैं। एक लिहाज से, वे खराब काबिलियत के हैं और दूसरे लिहाज से, उनका जीवन और उनकी मानसिकता पिछड़ी हुई है, उनकी आदतें, सामाजिक वातावरण, जिस परिवार में वे जन्मे हैं—सभी दयनीय और सर्वाधिक पिछड़े हैं। उनकी हैसियत भी निम्न है। इस स्थान पर कार्य प्रातिनिधिक है, एक बार जब यह परीक्षा-कार्य पूरी तरह से कार्यान्वित हो जाएगा, तो परमेश्वर का उसके ठीक बाद का कार्य अधिक आसान हो जाएगा। जब कार्य का यह चरण पूरा हो जाएगा, तब अगला कार्य बिल्कुल भी कठिन नहीं होगा। एक बार जब कार्य का यह चरण सम्पन्न हो जाएगा, तो बड़ी सफलता पूरी तरह प्राप्त हो चुकी होगी और समस्त ब्रह्माण्ड में विजय का कार्य पूर्ण अंत तक पहुँच चुका होगा। वास्तव में, एक बार तुम लोगों के बीच कार्य सफल हो जाएगा तो यह समस्त ब्रह्माण्ड में सफलता के बराबर होगा। यही इस बात की महत्ता है कि क्यों मैं तुम लोगों को एक मॉडल और नमूने के रूप में कार्य करने को कहता हूँ। विद्रोहशीलता, विरोध, अशुद्धता, अधार्मिकता—ये सभी इन लोगों में पाए जा सकते हैं और ये मानवजाति की समस्त विद्रोहशीलता का प्रतिनिधित्व करते हैं। वे वास्तव में कुछ हैं। इस प्रकार, उन्हें विजय के प्रतीक के रूप में लिया जाता है, एक बार जब वे जीत लिए गए तो वे स्वाभाविक रूप से दूसरों के लिए मॉडल और नमूने बन जाएँगे।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के कार्य का दर्शन (2)
परमेश्वर ने ब्रह्माण्ड में अपने कार्य का सम्पूर्ण ध्यान लोगों के इस समूह पर रखा है। उसने तुम लोगों के लिए अपने हृदय का सारा रक्त अर्पित कर दिया है; वह ब्रह्माण्ड में आत्मा का समस्त कार्य वापस ले चुका है और तुम लोगों को दे चुका है। इसी कारण से तुम लोग सौभाग्यशाली हो। इतना ही नहीं, वह अपनी महिमा इस्राएल, अपने चुने हुए लोगों से हटाकर तुम लोगों के ऊपर ले आया है और वह इस समूह के माध्यम से अपनी योजना का उद्देश्य पूर्ण रूप से प्रत्यक्ष करेगा। इसलिए तुम लोग ही वे हो जो परमेश्वर की विरासत प्राप्त करोगे और इससे भी अधिक, तुम परमेश्वर की महिमा के वारिस हो। तुम सब लोगों को शायद ये वचन स्मरण हों : “क्योंकि हमारा पल भर का हल्का-सा क्लेश हमारे लिए कहीं अधिक और अनन्त महिमा उत्पन्न करता जाता है।” तुम सब लोगों ने पहले भी ये वचन सुने हैं, किंतु तुममें से किसी ने भी उनका सच्चा अर्थ नहीं समझा। आज तुम उनके वास्तविक अर्थ से गहराई से अवगत हो। ये वचन परमेश्वर द्वारा अंत के दिनों के दौरान पूरे किए जाएँगे और वे उन लोगों में पूरे किए जाएँगे जिन्हें बड़े लाल अजगर द्वारा निर्दयतापूर्वक उत्पीड़ित किया गया है, उस देश में जहाँ वह कुण्डली मारकर बैठा है। बड़ा लाल अजगर परमेश्वर को सताता है और परमेश्वर का शत्रु है, इसीलिए इस देश में लोगों को परमेश्वर में विश्वास रखने के कारण अपमान और उत्पीड़न सहना पड़ता है और परिणामस्वरूप ये वचन तुम लोगों में, लोगों के इस समूह में पूरे होते हैं। चूँकि परमेश्वर अपना कार्य उस देश में कार्यान्वित करता है जो परमेश्वर का विरोध करता है, इसलिए उसका संपूर्ण कार्य प्रचंड बाधाओं का सामना करता है और उसके बहुत-से वचन तुरंत पूरे नहीं हो सकते हैं; इस प्रकार, परमेश्वर के वचनों के परिणामस्वरूप लोग शोधित किए जाते हैं, जो पीड़ा सहने का हिस्सा भी है। परमेश्वर के लिए बड़े लाल अजगर के देश में अपना कार्य कार्यान्वित करना अत्यंत कठिन है, परंतु इसी कठिनाई के माध्यम से परमेश्वर अपने कार्य का एक चरण करता है, ताकि वह अपनी बुद्धि और अपने अद्भुत कर्मों को प्रकट कर सके और परमेश्वर इस अवसर का उपयोग लोगों के इस समूह को पूर्ण करने के लिए करता है। लोगों की पीड़ा के माध्यम से, उनकी काबिलियत के माध्यम से और इस गंदे देश के लोगों के समस्त शैतानी स्वभावों के माध्यम से ही परमेश्वर शुद्धिकरण और विजय का अपना कार्य करता है, ताकि इससे वह महिमा प्राप्त कर सके और उन लोगों को प्राप्त कर सके जो उसके कर्मों की गवाही देते हैं। परमेश्वर ने इस समूह के लोगों के लिए जो समस्त कीमत चुकाई है, उसका सम्पूर्ण अर्थ यही है। अर्थात्, परमेश्वर विजय का कार्य उन्हीं लोगों के माध्यम से करता है जो उसका विरोध करते हैं, और केवल इसी प्रकार परमेश्वर की महान सामर्थ्य प्रकट हो सकती है। दूसरे शब्दों में, गंदे देश के लोग ही परमेश्वर की महिमा को विरासत में पाने के योग्य हैं, और केवल यही परमेश्वर की महान सामर्थ्य को उभारकर सामने ला सकता है। इसी कारण गंदे देश से ही, और गंदे देश में रहने वालों से ही परमेश्वर महिमा प्राप्त करता है—परमेश्वर का ऐसा ही इरादा है। यह बिल्कुल यीशु के कार्य के चरण जैसा है : वह केवल उन्हीं फरीसियों के बीच महिमा प्राप्त कर सकता था जिन्होंने उसे सताया था; यदि फरीसियों द्वारा किया गया उत्पीड़न और यहूदा द्वारा दिया गया धोखा नहीं होता, तो यीशु का उपहास नहीं उड़ाया जाता या उसे लांछित नहीं किया जाता, सलीब पर तो और भी नहीं चढ़ाया जाता, और उसे कभी महिमा प्राप्त नहीं हो सकती थी। जहाँ परमेश्वर प्रत्येक युग में कार्य करता है, और जहाँ वह देह में कार्य करता है वहीं वह महिमा प्राप्त करता है और वहीं वह उन्हें प्राप्त करता है जिन्हें वह प्राप्त करना चाहता है। यही परमेश्वर के कार्य की योजना है और यही उसका प्रबंधन है।
परमेश्वर की कई हज़ार वर्षों की योजना में, कार्य के दो भाग देह में किए गए हैं : पहला है सलीब पर चढ़ाए जाने का कार्य, जिसके लिए वह महिमा प्राप्त करता है; दूसरा है अंत के दिनों में विजय और पूर्णता का कार्य, जिसके लिए वह महिमा प्राप्त करता है। यही परमेश्वर का प्रबंधन है। इसलिए परमेश्वर के कार्य, या तुम लोगों को दिए गए परमेश्वर के आदेश को सीधी-सादी बात मत समझो। तुम सभी लोग परमेश्वर की कहीं अधिक असाधारण और अनंत महत्व की महिमा के वारिस हो, और यह परमेश्वर द्वारा विशेष रूप से निश्चित किया गया था। उसकी महिमा के दो भागों में से एक तुम लोगों में अभिव्यक्त किया जाता है; परमेश्वर की महिमा का एक समूचा भाग तुम लोगों को प्रदान किया गया है, ताकि यह तुम लोगों की विरासत हो सके। यही परमेश्वर द्वारा तुम्हारा उत्कर्ष है, और यह वह योजना भी है जो उसने बहुत पहले पूर्वनिर्धारित कर दी थी। जहाँ बड़ा लाल अजगर रहता है उस देश में परमेश्वर द्वारा किए गए कार्य की महानता को देखते हुए, यदि यह कार्य कहीं और ले जाया जाता, तो यह बहुत पहले अत्यंत फलदायी हो गया होता और मनुष्य द्वारा तत्परता से स्वीकार कर लिया जाता। यही नहीं, परमेश्वर में विश्वास करने वाले पश्चिम के पादरियों के लिए इस कार्य को स्वीकार कर पाना अत्यंत आसान होता, क्योंकि यीशु के कार्य का चरण एक मिसाल का काम करता है। यही कारण है कि परमेश्वर महिमा पाने के कार्य का यह चरण कहीं और पूरा कर पाने में असमर्थ है; जब कार्य का लोगों द्वारा समर्थन किया जाता है और उसे राज्य द्वारा मान्यता प्राप्त होती है तो परमेश्वर की महिमा स्थापित होने के लिए कोई जगह नहीं होती है। इस देश में कार्य के इस चरण का यही असाधारण महत्व है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, क्या परमेश्वर का कार्य उतना सरल है जितना मनुष्य कल्पना करता है?
बहुत-सी जगहों पर परमेश्वर ने भविष्यवाणी की है कि वह विजेताओं के एक समूह को सीनियों के देश में प्राप्त कर रहा होगा—वह जगह दुनिया के पूर्व में है जहाँ विजेताओं को प्राप्त किया जाना है। इस प्रकार परमेश्वर अपने दूसरे देहधारण में जहाँ कदम रखता है, वह बिना किसी संदेह के सीनियों का देश है, ठीक वह स्थान जहाँ बड़ा लाल अजगर कुंडली मारे पड़ा है। वहाँ परमेश्वर बड़े लाल अजगर के वंशजों को प्राप्त करेगा, ताकि वह पूर्णतः पराजित और शर्मिंदा हो जाए। परमेश्वर पीड़ा के बोझ से अत्यधिक दबे इन लोगों को जगाने जा रहा है, जब तक कि वे पूरी तरह से जाग नहीं जाते, वह उन्हें कोहरे से बाहर निकालेगा, और उनसे बड़े लाल अजगर को अस्वीकार करवाएगा। वे अपने सपने से जागेंगे, बड़े लाल अजगर के सार को जानेंगे, परमेश्वर को अपना संपूर्ण हृदय देने में सक्षम होंगे, अन्धकार की शक्तियों के दमन के बीच उठ खड़े होंगे, दुनिया के पूर्व में खड़े होंगे और परमेश्वर की विजय का प्रमाण बनेंगे। केवल इसी तरीके से परमेश्वर महिमा प्राप्त करेगा। केवल इसी कारण से परमेश्वर इस्राएल में समाप्त हुए कार्य को उस देश में लाया, जहाँ बड़ा लाल अजगर कुंडली मारे पड़ा है, और प्रस्थान करने के लगभग दो हजार वर्ष बाद वह अनुग्रह के युग के कार्य को जारी रखने के लिए पुनः देह में आया है। मनुष्य की नग्न आँखों को लग रहा है कि परमेश्वर देह में नए कार्य का शुभारंभ कर रहा है। किंतु परमेश्वर की दृष्टि से, वह अनुग्रह के युग के कार्य को जारी रख रहा है, पर केवल कुछ हजार वर्षों के अंतराल के बाद, और अपने कार्य के स्थान तथा कार्यक्रम में बदलाव के साथ।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, कार्य और प्रवेश (6)
चाहे तुम अमेरिकी हो, ब्रिटिश या फिर किसी अन्य देश के, तुम्हें अपनी राष्ट्रीयता की सीमाओं से बाहर कदम रखना चाहिए, अपनी अस्मिता के पार जाना चाहिए, और परमेश्वर के कार्य को एक सृजित प्राणी की पहचान के परिप्रेक्ष्य से देखना चाहिए—इस तरह तुम परमेश्वर के पदचिह्नों को किसी निश्चित दायरे में नहीं सीमित करोगे। ऐसा इसलिए है क्योंकि अपनी धारणाओं के अनुसार आजकल बहुत-से लोग विश्वास करते हैं कि परमेश्वर का किसी देश विशेष में या किसी निश्चित राष्ट्र के बीच प्रकट होना संभव नहीं है। परमेश्वर के कार्य का कितना गहन अर्थ है, और परमेश्वर का प्रकटन कितना महत्वपूर्ण है! मनुष्य की धारणाएँ और सोच भला उन्हें कैसे माप सकती हैं? और इसलिए मैं कहता हूँ, कि तुम्हें परमेश्वर के प्रकटन की तलाश करने के लिए अपनी राष्ट्रीयता और जातीयता की अपनी धारणाओं को तोड़ देना चाहिए। केवल इसी प्रकार से तुम अपनी धारणाओं से बंधे नहीं होगे; केवल इसी प्रकार से तुम परमेश्वर के प्रकटन का स्वागत करने के योग्य होगे। अन्यथा, तुम शाश्वत अंधकार में रहोगे, और कभी भी परमेश्वर का अनुमोदन प्राप्त नहीं करोगे।
परमेश्वर समस्त मानवजाति का परमेश्वर है। वह स्वयं को किसी भी देश या राष्ट्र की निजी संपत्ति नहीं मानता, बल्कि अपना कार्य अपनी बनाई योजना के अनुसार, किसी भी रूप, देश या राष्ट्र द्वारा बंधे बिना करता है। शायद तुमने इस रूप की कभी कल्पना नहीं की है या शायद इस रूप के प्रति तुम्हारा रवैया इनकार करने वाला है या शायद वह देश और वह राष्ट्र जिसके बीच परमेश्वर प्रकट होता है, वही ऐसा है जिसके साथ सभी भेदभाव करते हैं और वही पृथ्वी पर सर्वाधिक पिछड़ा हुआ है। लेकिन परमेश्वर के पास अपनी बुद्धि है। उसने अपने महान सामर्थ्य के साथ और अपने सत्य और स्वभाव के माध्यम से सचमुच ऐसे लोगों के समूह को हासिल कर लिया है जो उसके साथ एक मन वाले हैं और जिन्हें वह पूर्ण करना चाहता है—उसके द्वारा जीता गया एक समूह जिसने तमाम तरह के परीक्षण और पीड़ा और तमाम तरह का उत्पीड़न सहा है और बिल्कुल अंत तक उसका अनुसरण कर सकता है। परमेश्वर का प्रकटन, जो किसी देश या रूप तक सीमित नहीं है, इसका लक्ष्य उसे अपनी योजना के अनुसार कार्य पूरा करने में सक्षम बनाना है। यह ठीक वैसा ही है जैसे जब परमेश्वर यहूदिया में देहधारी हुआ : उसका लक्ष्य समस्त मानवजाति के छुटकारे के लिए सलीब पर चढ़ने का कार्य पूरा करना था। फिर भी यहूदी मानते थे कि यह करना परमेश्वर के लिए असंभव है और उन्हें यह असंभव लगता था कि परमेश्वर देहधारी बन सकता है और प्रभु यीशु का रूप ग्रहण कर सकता है। उनका “असंभव” वह आधार बन गया जिस पर उन्होंने परमेश्वर की निंदा की और उसका विरोध किया और जो अंततः इस्राएल के विनाश का कारण बना। आज बहुत-से लोग वैसी ही गलती कर चुके हैं। वे अपनी समस्त शक्ति के साथ परमेश्वर के आसन्न प्रकटन की घोषणा करते हैं, मगर साथ ही उसके प्रकटन की निंदा भी करते हैं; उनका “असंभव” परमेश्वर के प्रकटन को एक बार फिर उनकी कल्पना के दायरे में सीमित कर देता है। और इसलिए मैंने बहुत-से लोगों को परमेश्वर के वचन उन्हें प्राप्त होने के बाद असभ्य और कर्कश हँसी का ठहाका लगाते देखा है। लेकिन क्या यह ठहाका यहूदियों द्वारा की गई निंदा और ईशनिंदा से किसी तरह भिन्न है? तुम लोग सत्य की उपस्थिति में श्रद्धावान नहीं हो और तुममें ललक का रवैया तो और भी कम है। तुम बस अड़े रहते हुए पड़ताल करते हो और लापरवाही भरी उदासीनता के साथ प्रतीक्षा करते हो। इस तरह पड़ताल और प्रतीक्षा करने से तुम क्या हासिल कर सकते हो? क्या तुम्हें लगता है कि तुम्हें परमेश्वर से व्यक्तिगत मार्गदर्शन मिलेगा? यदि तुम परमेश्वर के कथनों का भेद नहीं पहचान सकते तो तुम किस प्रकार परमेश्वर का प्रकटन देखने के योग्य हो? जहाँ कहीं परमेश्वर प्रकट होगा, वहीं सत्य व्यक्त किया जाएगा और वहीं परमेश्वर की वाणी होगी। जो लोग सत्य स्वीकार कर सकते हैं केवल वे ही परमेश्वर की वाणी सुनने में सक्षम हैं और केवल इसी तरह के लोग परमेश्वर का प्रकटन देखने के योग्य हैं। अपनी धारणाओं को जाने दो! खुद को शांत करो और इन शब्दों को ध्यान से पढ़ो। जब तक तुम्हारे पास ऐसा दिल है जो सत्य के लिए लालायित रहता है, तब तक परमेश्वर तुम्हें प्रबुद्ध करेगा ताकि तुम उसके इरादे और वचन समझ सको। “असंभवता” के अपने तर्क छोड़ दो! लोग किसी चीज़ को जितना अधिक असंभव मानते हैं, उसके घटित होने की उतनी ही अधिक संभावना होती है, क्योंकि परमेश्वर की बुद्धि स्वर्ग से ऊँची है, परमेश्वर के विचार मनुष्य के विचारों से ऊँचे हैं और परमेश्वर अपना कार्य मनुष्य की सोच और धारणा की सीमाओं से परे करता है। जितना अधिक कुछ असंभव होता है, उतना ही अधिक उसमें खोजने लायक सत्य होता है; जितना अधिक किसी चीज की कल्पना मनुष्य की धारणाओं द्वारा नहीं की जा सकती है, उसमें परमेश्वर के इरादे उतने ही अधिक होते हैं। ऐसा इसलिए है, क्योंकि परमेश्वर चाहे कहीं भी प्रकट क्यों न हो, वह फिर भी परमेश्वर है और उसका सार उसके प्रकटन के स्थान या तरीके के आधार पर कभी नहीं बदलेगा। परमेश्वर के पदचिह्न चाहे कहीं भी हों, उसका स्वभाव नहीं बदलेगा और चाहे परमेश्वर के पदचिह्न कहीं भी हों, वह समस्त मनुष्यजाति का परमेश्वर है, ठीक वैसे ही, जैसे कि प्रभु यीशु न केवल इस्राएलियों का परमेश्वर है, बल्कि वह एशिया, यूरोप और अमेरिका के सभी लोगों का और इससे भी अधिक, वह समस्त ब्रह्मांड भर में और इसके ऊपर एकमात्र, अद्वितीय परमेश्वर है। तो आओ, हम परमेश्वर के इरादे खोजें और उसके कथनों और वचनों में उसके प्रकटन का पता लगाएँ और उसके पदचिह्नों के साथ तालमेल रखें! परमेश्वर सत्य, मार्ग और जीवन है। उसके वचन और उसका प्रकटन साथ-साथ विद्यमान हैं और उसका स्वभाव और पदचिह्न हर समय मानवजाति के सामने सार्वजनिक रूप से प्रकट किए जाते हैं। प्यारे भाई-बहनो, मुझे आशा है कि तुम सभी लोग इन वचनों में परमेश्वर का प्रकटन देख सकते हो, उसके पदचिह्नों के साथ-साथ चलना शुरू कर सकते हो और एक नए युग की तरफ बढ़ सकते हो और उस सुंदर नए स्वर्ग और पृथ्वी में प्रवेश कर सकते हो, जिसे परमेश्वर ने उन लोगों के लिए तैयार किया है, जो उसके प्रकटन का इंतजार करते हैं!
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परिशिष्ट 1 : परमेश्वर के प्रकटन ने एक नए युग का सूत्रपात किया है