परमेश्वर की भेड़ें परमेश्वर की आवाज को सुनती हैं (नये विश्वासियों के लिए अनिवार्य चीजें)

विषय-वस्तु

अध्याय 8 विभिन्न प्रकार के लोगों और मनुष्य को की गई परमेश्वर की प्रतिज्ञा के अंत।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

क्या अब तुम समझ गए कि न्याय क्या है और सत्य क्या है? यदि तुम अब समझ गए हो, तो मैं तुम्हें न्याय के प्रति समर्पित होने के लिए प्रोत्साहित करता हूँ, अन्यथा तुम्हें कभी भी परमेश्वर की प्रशंसा पाने का या परमेश्वर द्वारा उसके राज्य में ले जाए जाने का अवसर नहीं मिलेगा। जो केवल न्याय को ग्रहण करते हैं परन्तु कभी भी शुद्ध नहीं हो सकते हैं, अर्थात्, जो न्याय के कार्य के मध्य ही भाग जाते हैं, वे हमेशा के लिए परमेश्वर द्वारा नफ़रत किए और अस्वीकार कर दिए जाएँगे। फरीसियों की तुलना में उनके पाप बहुत अधिक हैं, और अधिक दारुण हैं, क्योंकि उन्होंने परमेश्वर के साथ विश्वासघात किया है और वे परमेश्वर के विरोधी हैं। इस प्रकार के लोग सेवा करने के योग्य भी नहीं है वे अधिक कठोर, अनन्त दण्ड भुगतेंगे। परमेश्वर किसी भी गद्दार को नहीं छोड़ेगा जिसने एक बार तो अपने वचनों के साथ वफादारी का दावा किया मगर फिर परमेश्वर को धोखा दिया। इस प्रकार के लोग आत्मा, प्राण और देह के दण्ड के माध्यम से प्रतिफल महसूस करेंगे। क्या यह परमेश्वर के धर्मी स्वभाव को प्रकट नहीं करता है? क्या यही वास्तव में परमेश्वर के न्याय और मनुष्यों के प्रकाशन का उद्देश्य नहीं है? सभी प्रकार के दुष्ट कर्म करने वाले ऐसे सभी लोगों को परमेश्वर न्याय के समय ऐसे स्थान में रखेगा जहाँ दुष्टात्माएँ रहती हैं ताकि आत्माएँ अपनी इच्छानुसार उनके दैहिक शरीरों को नष्ट करें। उनके शरीरों से लाश की दुर्गंध आने लगेगी और ऐसा ही उनका उचित प्रतिफल होगा। परमेश्वर उन निष्ठाहीन झूठे विश्वासियों, झूठे प्रेरितों, और झूठे कार्यकर्ताओं के हर एक पाप को उनकी अभिलेख पुस्तक में लिखता है, फिर जब सही समय आता है, वह उन्हें गंदी आत्माओं के बीच में फेंक देता है ताकि आत्माएँ अपनी इच्छानुसार उनके सम्पूर्ण शरीरों को दूषित करें और, परिणामस्वरूप, वे कभी भी पुनःदेहधारण नहीं कर पाएँगे और कभी भी रोशनी को नहीं देखेंगे। ऐसे पाखण्डी जो किसी समय सेवकाई किया करते थे परन्तु अंत तक वफादार बने रहने में सक्षम नहीं रहे उन्हें परमेश्वर द्वारा दुष्टों में मध्य गिना जाएगा ताकि वे दुष्टों की सलाह पर चलें, एक उपद्रवी भीड़ का हिस्सा बनें। अंत में, परमेश्वर उन्हें ऩष्ट कर देगा। परमेश्वर उन लोगों को अलग फेंक देगा और उन पर कोई ध्यान नहीं देगा जो कभी भी मसीह के वफादार नहीं रहे हैं या जिन्होंने कोई भी प्रयास समर्पित नहीं किया है, और युगों के बदलने में उन सभी को नष्ट कर देगा। वे पृथ्वी पर अब और नहीं रहेंगे, परमेश्वर के राज्य में मार्ग तो बिल्कुल नहीं प्राप्त करेंगे। जो कभी भी परमेश्वर के प्रति सच्चे नहीं रहे हैं परन्तु परमेश्वर के साथ कार्य करने के लिए मजबूर किए जाते हैं उनकी गिनती परमेश्वर के लिए कार्य करने वालों के मध्य होगी। छोटी सी संख्या में केवल ऐसे ही कुछ लोग जीवित रह सकते हैं, जबकि बहुसंख्य उन लोगों के साथ समाप्त हो जाएँगे जो सेवा करने के लिए भी योग्य नहीं हैं। अंत में, परमेश्वर उन सभी को जिनका मन परमेश्वर के समान है, लोगों को और परमेश्वर के पुत्रों को और साथ ही पादरी बनाए जाने के लिए पूर्वनियत लोगों को, अपने राज्य में ले आएगा। यही प्रतिफल परमेश्वर द्वारा उसके कार्य के माध्यम के द्वारा उत्पन्न किया गया है। उनके लिए जो परमेश्वर द्वारा निर्धारित किसी भी श्रेणी में नहीं आ सकते हैं, वे अविश्वासियों के मध्य गिने जाएँगे। और तुम लोग निश्चय ही कल्पना कर सकते हो कि उनका परिणाम क्या होगा। मैं तुम सभी लोगों से पहले ही कह चुका हूँ जो मुझे कहना चाहिए था; तुम लोग जिस मार्ग को चुनते हो वह निर्णय तुम लोगों का लिया हुआ निर्णय होगा। तुम्हें जो समझने की आवश्यकता है वह है किः परमेश्वर का कार्य ऐसे किसी का भी इंतज़ार नहीं करता है जो परमेश्वर के साथ तालमेल बनाए नहीं रख सकता है, और परमेश्वर का धर्मी स्वभाव किसी भी व्यक्ति के प्रति कोई दया नहीं दिखाता है।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "मसीह न्याय का कार्य सत्य के साथ करता है" से

अब वह समय है जब मैंने प्रत्येक व्यक्ति का अंत करने का निश्चय कर लिया है, पर मैं उस मंच का अंत नहीं करूंगा जिस पर मैंने मनुष्यों का कार्य आरंभ किया था। मैंने अपनी पुस्तक में प्रत्येक मनुष्य के शब्दों और कार्यों को लिखता हूं, साथ ही साथ मेरे अनुयायी के रूप में उनके मार्ग, उनके अंतर्निहित लक्षण और अंतिम प्रदर्शन भी लिखता हूं। इस तरह, किसी भी प्रकार का मनुष्य मेरे हाथ से नहीं बचेगा, और जैसा मैं उन्हें नियत करूंगा, वैसे ही वे अपनी तरह के लोगों के साथ इकट्ठे किये जाएंगे। मैं प्रत्येक व्यक्ति का गंतव्य आयु, वरिष्ठता, पीड़ा का परिमाण, या कम से कम, दुर्दशा के अनुपात के आधार पर तयकरता, बल्कि इस आधार पर करता हूं कि उनमें सत्य है या नहीं। इसे छोड़कर अन्य कोई विकल्प नहीं है। तुम्हें यह समझना चाहिये कि वे सब जो परमेश्वर की इच्छा का अनुसरण नहीं करते हैं वे दण्ड पायेंगे। यह एक अपरिवर्तनीय तथ्य है। इस कारण, वे सब जो दण्ड पाते हैं, वे परमेश्वर की धार्मिकता के कारण दण्ड पाते हैं और उन्हें उनके बुरे कामों का दण्ड मिलता है।

मेरी दया उनके लिये है जो मुझसे प्रेम करते हैं और अपने आपको नकारते हैं। और दुष्टों को दिया गया दण्ड मेरे धार्मिक स्वभाव का प्रमाण और उससे बढ़कर मेरे क्रोध का साक्षी है। जब कभी संकट, अकाल और महामारी आयेगीं, तो ये सब मेरा विरोध करने वालों पर आयेगी और वे विलाप करेंगे। जिन्होंने बहुत वर्षों तक मेरा अनुसरण करते हुए भी सब प्रकार के बुरे कर्म किये हैं - वे निर्दोष नहीं होंगे; वे उस संकट के बीच लगातार आंतक और भय के साथ जीयेंगे, जिसे इन युगों के बीच पहले कभी नहीं देखा गया। मेरे अनुयायी जो किसी और के प्रति निष्ठावान नहीं थे वे मेरी सामर्थ में आनंद करेंगे और तालियां बजाएंगे। वे वर्णन से बाहर संतुष्टि का अनुभव करेंगे और उस आनंद में रहेंगे जो मैंने पहले कभी मानव जाति को नहीं दिया। क्योंकि मैं मनुष्यों के ‘भले कामों’ से सुख पाता हूँ और उनके ‘बुरे कामों’ से घृणा करता हूँ। क्योंकि पहले जब मैंने मनुष्य जाति की अगुवाई करना आरंभ किया, तो मुझे आशा थी कि मनुष्यों का एक दल जिसकी सोच मेरे समान है, मेरे साथ है। और जिनके मन मेरे समान नहीं है, उन्हें मैंने कभी भुलाया नहीं, मैंने हृदय से उनके प्रति घृणा की, और उस अवसर की प्रतीक्षा कर रहा हूँ जब गलत काम करने वालों और उनमें सुख पाने वालों को मेरी ओर से दण्ड मिलेगा। अंततः मेरा दिन आ गया है, और अब मुझे प्रतीक्षा करने की आवश्यकता नहीं है!

मेरा अंतिम कार्य मनुष्यों को केवल दण्ड देना नहीं है परंतु प्रत्येक को उनके लक्ष्य तक पहुंचाना है। साथ ही जो कार्य मैं संपन्न कर चुका हूँ, उसके लिये मुझे मान्यता भी प्राप्त करनी है। मैं चाहता हूँ कि प्रत्येक मनुष्य देखे कि जो कुछ मैंने किया है, वह सही है-और मेरे स्वभाव की अभिव्यक्ति है; यह मनुष्यों का कार्य नहीं है, और प्रकृति का भी नहीं जिसने मनुष्यों को उत्पन्न किया है। इसके विपरीत, यह मैं हूँ - जिसने सभी वस्तुओं के बीच जीवित प्राणियों का संवर्धन किया है। मेरे अस्तित्व के बिना, मानव जाति केवल नष्ट होगी और महामारियों के आक्रमण का शिकार बनेगी, कोई भी सूर्य और चंद्रमा और हरे-भरे संसार का सौंदर्य फिर कभी नहीं देख पायेगा; मानव जाति केवल ठंडी और निष्क्रिय रात एवं मृत्यु की छाया की निर्मम घाटी का सामना करेगी। मैं ही मनुष्य जाति का एक मात्र उद्धारक हूँ, मनुष्य जाति की एकमात्र आशा हूँ - और इससे बढ़कर मैं ही वह हूँ - जिस पर समूची मानवजाति का अस्तित्व निर्भर है। बिना मेरे, मानवजाति तुरंत ही प्रवाहहीन बन जाएगी। मेरे बिना मानवजाति बहुत बड़े संकट में फंस जाएगी और सभी प्रकार के भूत उस पर तांडव करेंगे, यद्यपि उनमें से कोई मुझ पर अधिक ध्यान नहीं देगा। मैंने वह काम किया है जिसे कोई दूसरा नहीं कर सकता, केवल इस आशा में कि मनुष्य मुझे भले काम करके प्रतिफल देगा। यद्यपि कुछ लोग मुझे प्रतिफल दे सकते हैं परंतु फिर भी मैं संसार में अपनी यात्रा पूर्ण करता हूँ और उस कार्य को आरंभ करता हूँ जो आगे चलकर प्रकट होगा, क्योंकि इन अनेक वर्षों में मनुष्यों के बीच मेरी यात्रा फलवती हुई और मैं अति प्रसन्न हूँ। मैं मनुष्यों की संख्या पर नहीं, पर उनके 'भले कामों' की परवाह करता हूँ। कुछ भी हो, मुझे आशा है कि तुम अपने लक्ष्य की तैयारी में पर्याप्त भले काम करोगे, और तब मुझे संतुष्टि होगी। अन्यथा तुम में से कोई भी संकट से नहीं बचेगा। संकट मेरे द्वारा ही लाया जाएगा और निश्चित रूप से मैं ही उसका क्रियान्वयन करूँगा। यदि तुम मेरी उपस्थिति में भले के लिये काम नहीं कर सकते, तब तुम संकट में दुख उठाने से नहीं बच सकते। क्लेश के समय में तुम्हारे कार्य और क्रियायें- पूर्णत: उचित नहीं थे, क्योंकि तुम्हारा विश्वास और प्रेम खोखला था और तुमने केवल 'भय' या 'बल' को प्रदर्शित किया। इस बारे में मैं भले या बुरे का न्याय करूँगा। अब भी मेरी चिंता तुमतुम्हारे कामों और आचरण को लेकर है, जिस पर तुम्हारे अंत का मेरा निश्चय आधारित है। मैं तुम्हें यह स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि क्लेश के दिनों में, जो मेरे प्रति पूरी तरह निष्ठावान नहीं रहे, उन पर मैं आगे दया नहीं करूँगा, क्योंकि मेरी दया का विस्तार केवल इतनी ही दूर तक है। साथ ही, जिन्होंने एक बार मेरे साथ विश्वासघात किया है, अब उनमें मेरी रुचि जरा भी नहीं है - मैं उनसे थोड़ी-सी भी संगति नहीं करना चाहता हूँ जो अपने मित्रों का सौदा कर लेते हैं। व्यक्ति चाहे जो भी हो, मेरा स्वभाव यही है। मैं तुम्हें बताना चाहता हूँ: यदि कोई मेरा हृदय तोड़ता है, तो वह फिर से दया का पात्र नहीं होगा, और जो मेरे प्रति विश्वासयोग्य है वह सदैव मेरे हृदय में बना रहेगा।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "अपने लक्ष्य की तैयारी में तुम्हें पर्याप्त भले काम करने चाहिये" से

परमेश्वर का राज्य मानवता के मध्य विस्तार पा रहा है, यह मानवता के मध्य बन रहा है, यह मानवता के मध्य खड़ा हो रहा है; ऐसी कोई भी शक्ति नहीं है जो मेरे राज्य को नष्ट कर सके। आज के राज्य के मेरे लोगों में से तुम सबमें से ऐसा कौन है जो मानवों में मानव नहीं है? तुम लोगों में से कौन मानवीय परिस्थितियों से बाहर है? जब भीड़ के मध्य मेरे प्रारम्भ बिन्दु को सुनाया जायेगा, तो मानवजाति किस प्रकार से प्रतिक्रिया व्यक्त करेगी? तुम सबने अपनी आंखों से मानवजाति की दशा को देखा है; निश्चय ही तुम लोग अब इस संसार में हमेशा के लिए बने रहने की आशा नहीं कर रहे होगे? अब मैं निर्बाध अपने लोगों के मध्य चल रहा हूं, मेरे लोगों के मध्य में रहता हूं। आज, जो मेरे लिए वास्तविक प्रेम रखते हैं, ऐसे लोग ही धन्य हैं; जो मुझे समर्पित रहते हैं वे धन्य हैं, वे निश्चय ही मेरे राज्य में रहेंगे; जो मुझे जानते हैं वे धन्य हैं, वे निश्चय ही मेरे राज्य में शक्ति प्राप्त करेंगे; जो मेरा अनुसरण करते हैं वे धन्य हैं, वे निश्चय ही शैतान के बंधनों से स्वतंत्र होंगे और मेरी आशीषों का आनन्द लेंगे; वे लोग धन्य हैं जो अपने आप को मेरे लिए त्यागते हैं, वे निश्चय ही मेरे राज्य को प्राप्त करेंगे और मेरे राज्य का उपहार पाएंगे। जो लोग मेरे खातिर मेरे चारों ओर दौड़ते हैं उनके लिए मैं उत्सव बनाऊंगा, जो लोग मेरे लिए अपने आप को समर्पित करते हैं मैं उन्हें आनन्द से गले लगाऊंगा, जो लोग मुझे भेंट देते हैं मैं उन्हें आनन्द दूंगा। जो लोग मेरे शब्दों में आनन्द प्राप्त करते हैं उन्हें मैं आशीष दूंगा; वे निश्चय ही ऐसे खम्भे होंगे जो मेरे राज्य में शहतीर को थामने वाले होंगे, वे निश्चय ही अनेकों उपहारों को मेरे घर में प्राप्त करेंगे और उनके साथ कोई तुलना नहीं कर पाएगा। क्या तुम सबने मिलने वाली आशीषों को स्वीकार किया है? क्या कभी तुम सबने मिलने वाले वायदों को पाया है? तुम लोग निश्चय ही, मेरी रोशनी के नेतृत्व में, अंधकार की शक्तियों के गढ़ को तोड़ोगे। तुम अंधकार के मध्य निश्चय ही मार्गदर्शन करने वाली ज्योति से वंचित नहीं रहोगे। तुम सब निश्चय ही सम्पूर्ण सृष्टि पर स्वामी होगे। तुम लोग शैतान पर निश्चय ही विजयी बनोगे। तुम सब निश्चय ही महान लाल ड्रैगन के राज्य के पतन को देखोगे और मेरी विजय की गवाही के लिए असंख्य लोगों की भीड़ में खड़े होगे। तुम लोग निश्चय ही पाप के देश में दृढ़ और अटूट खड़े रहोगे। तुम सब जो कष्ट सह रहे हो, उनके मध्य तुम मेरे द्वारा आने वाली आशीषों को प्राप्त करोगे और मेरी महिमा के भीतर के ब्रह्माण्ड में निश्चय ही जगमगाओगे।

सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के लिये परमेश्वर के कथन "वचन देह में प्रकट होता है" के "उन्नीसवाँ कथन" से लिया गया

मेरे वचनों के पूर्ण होने के बाद, राज्य धीरे-धीरे पृथ्वी पर आकार लेने लगता है और मनुष्य धीरे-धीरे सामान्य हो जाता, और इस प्रकार पृथ्वी पर मेरे हृदय में राज्य स्थापित हो जाता है। उस राज्य में, परमेश्वर के सभी लोगों को सामान्य मनुष्य का जीवन वापस मिल जाता है। बर्फीली शीत ऋतु चली गई है, उसका स्थान जल के सोतों के बहरों में संसार ने ले लिया है, जहाँ वे साल भर प्रस्फुटित होते रहते हैं। लोग आगे से मनुष्य के उदास और अभागे संसार का सामना नहीं करते हैं, और न ही वे आगे से मनुष्य के शांत ठण्डे संसार को सहते हैं। लोग एक दूसरे से लड़ाई नहीं करते हैं। एक दूसरे के विरूद्ध युद्ध नहीं करते हैं, वहाँ अब कोई नरसंहार नहीं होता है और न ही नरसंहार से लहू बहता है; पूरी ज़मीं प्रसन्नता से भर जाती है, और यह हर जगह मनुष्यों के बीच उत्साह को बढ़ाता है। मैं पूरे संसार में घूमता हूँ, मैं ऊपर सिंहासन से आनन्दित होता हूँ, और मैं सितारों के मध्य रहता हूँ। और स्वर्गदूत मेरे लिए नए नए गीत गाते और नए नए नृत्य करते हैं। अब उनके चेहरों से उनकी स्वयं की क्षणभंगुरता के कारण आँसू नहीं ढलकते हैं। मैं अब अपने सामने स्वर्गदूतों के रोने की आवाज़ नहीं सुनता हूँ, और अब कोई मुझ से किसी कठिनाई की शिकायत नहीं करता है। आज, तुम लोगमेरे सामने रहते हो; कल तुम लोग मेरे राज्य में बने रहोगे। क्या यह सब से बड़ा आशीष नहीं है जिसे मैं मनुष्य को देता हूँ?

सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के लिये परमेश्वर के कथन "वचन देह में प्रकट होता है" के "बीसवाँ कथन" से लिया गया

विश्राम में जीवन बिना युद्ध, बिना गंदगी और लगातार बनी रहने वाली अधार्मिकता के बिना है। कहने का अर्थ है कि इसमें शैतान के उत्पीड़न (यहाँ "शैतान" का संकेत शत्रुतापूर्ण शक्तियों से हैं), शैतान की भ्रष्टता, और साथ ही परमेश्वर की विरोधी किसी भी शक्ति के आक्रमण का अभाव है। हर चीज अपने मूल स्वभाव का अनुसरण करती है और सृष्टि के प्रभु की आराधना करती है। स्वर्ग और पृथ्वी पूरी तरह से शांत हो जाते हैं। यह मानव जाति का विश्राम से भरा जीवन है। जब परमेश्वर विश्राम में प्रवेश करेगा, तो पृथ्वी पर अब और कोई अधार्मिकता नहीं रहेगी, और शत्रुतापूर्ण शक्तियों का आक्रमण नहीं होगा। मानवजाति एक नये राज्य में भी प्रवेश करेगी, वह शैतान द्वारा भ्रष्ट की गयी मानव जाति अब और नहीं होगी, बल्कि ऐसी मानव जाति होगी जिसे शैतान द्वारा भ्रष्ट किए जाने के बाद बचाया गया है। मानवजाति के विश्राम का दिन परमेश्वर के भी विश्राम का दिन है। मानवजाति के विश्राम में प्रवेश करने की असमर्थता के कारण परमेश्वर ने अपना विश्राम खोया; ऐसा नहीं था कि वह मूलरूप में विश्राम करने में असमर्थ था। विश्राम में प्रवेश करने का यह अर्थ नहीं है कि सभी चीज़ों का चलना बंद हो जाएगा, या सभी चीजें विकसित होना बंद कर देंगी, न ही इसका यह अर्थ है कि परमेश्वर का कार्य होना बंद हो जाएगा, या मनुष्य का जीवित रहना बंद हो जाएगा। विश्राम में प्रवेश करने का चिन्ह इस प्रकार है: शैतान नष्ट कर दिया गया है; शैतान के साथ बुरे कामों में शामिल दुष्ट लोगों को दण्डित दिया गया है और मिटा दिया गया है; परमेश्वर के प्रति सभी शत्रुतापूर्ण शक्तियों का अस्तित्व समाप्त हो गया है। परमेश्वर के विश्राम में प्रवेश करने का अर्थ है कि वह मानवजाति के उद्धार के अपने कार्य को अब और नहीं करेगा। मानवजाति के विश्राम में प्रवेश करने का अर्थ है कि समस्त मानवजाति परमेश्वर के प्रकाश के भीतर और उसके आशीषों के अधीन जीवन जीएगी; वहाँ शैतान की कुछ भी भ्रष्टता नहीं होगी, न ही कोई अधार्मिक बात होगी। मानवजाति सामान्य रूप से पृथ्वी पर रहेगी, वह परमेश्वर की देखभाल के अधीन रहेगी। जब परमेश्वर और मनुष्य दोनों एक साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे, तो इसका अर्थ होगा कि मानवजाति को बचा लिया गया है और शैतान का विनाश हो चुका है, कि मनुष्यों के बीच परमेश्वर का कार्य पूरी तरह समाप्त हो गया है। परमेश्वर मनुष्यों के बीच अब और कार्य नहीं करता रहेगा, और मनुष्य शैतान के अधिकार क्षेत्र में अब और नहीं रहेगा। इसलिए, परमेश्वर अब और व्यस्त नहीं रहेगा, और मनुष्य अब और जल्दबाजी नहीं करेगा; परमेश्वर और मनुष्य एक साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे। परमेश्वर अपनी मूल अवस्था में लौट जाएगा, और प्रत्येक व्यक्ति अपने-अपने स्थान में लौट जाएगा। ये वे स्थान हैं जिनमें परमेश्वर के समस्त प्रबंधन के अंत के बाद परमेश्वर और मनुष्य अपने-अपने विश्राम करेंगे। परमेश्वर के पास परमेश्वर की मंज़िल है, और मनुष्य के पास मनुष्य की मंज़िल है। विश्राम करते हुए, परमेश्वर पृथ्वी पर समस्त मानवजाति के जीवन का मार्गदर्शन करता रहेगा। जबकि परमेश्वर के प्रकाश में, मनुष्य स्वर्ग के एकमात्र सच्चे परमेश्वर की आराधना करेगा। परमेश्वर मनुष्यों के बीच अब और नहीं रहेगा, और मनुष्य भी परमेश्वर के साथ परमेश्वर की मंज़िल में रहने में असमर्थ होगा। परमेश्वर और मनुष्य दोनों एक ही राज्य के भीतर नहीं रह सकते हैं; बल्कि दोनों के जीने के अपने स्वयं के तरीके हैं। परमेश्वर वह एक है जो समस्त मानवजाति का मार्गदर्शन करता है, जबकि समस्त मानवजाति परमेश्वर के प्रबंधन के कार्य का ठोस स्वरूप है। यह मानवजाति है जिसकी अगुवाई की जाती है; सार के संबंध में, मानवजाति परमेश्वर के समान नहीं है। विश्राम करने का अर्थ है अपने मूल स्थान में लौटना। इसलिए, जब परमेश्वर विश्राम में प्रवेश करता है, तो इसका अर्थ है कि परमेश्वर अपने मूल स्थान में लौट जाता है। परमेश्वर पृथ्वी पर मनुष्यों के बीच अब और नहीं रहेगा, या मानवजाति के बीच होने के समय मानवजाति के आनंद या उसकी पीड़ाओं में सहभागी नहीं बनेगा। जब मानवजाति विश्राम में प्रवेश करती है, तो इसका अर्थ है कि मनुष्य एक सच्ची सृष्टि बन गया है; मानवजाति पृथ्वी पर से परमेश्वर की आराधना करेगी और सामान्य मानवीय जीवन जीएगी। लोग परमेश्वर के अब और अवज्ञाकारी और प्रतिरोध करने वाले नहीं होंगे; वे आदम और हव्वा के मूल जीवन की ओर लौट जाएँगे। विश्राम में प्रवेश करने के बाद ये परमेश्वर और मनुष्य के संबंधित जीवन और उनकी मंज़िलें हैं। परमेश्वर और शैतान के बीच युद्ध में शैतान की पराजय अपरिहार्य प्रवृत्ति है। इस तरह, परमेश्वर का अपने प्रबंधन का कार्य पूरा करने के बाद विश्राम में प्रवेश करना और मनुष्य का पूर्ण उद्धार और विश्राम में प्रवेश इसी तरह से अपरिहार्य प्रवृत्ति बन जाता है। मनुष्य के विश्राम का स्थान पृथ्वी है, और परमेश्वर के विश्राम का स्थान स्वर्ग में है। मनुष्य विश्राम करते हुए परमेश्वर की आराधना करेगा और पृथ्वी पर जीवन यापन करेगा, और जब परमेश्वर विश्राम करेगा, तो वह मानवजाति के बचे हुए हिस्से की अगुआई करेगा; वह उनकी स्वर्ग से अगुआई करेगा, पृथ्वी से नहीं। परमेश्वर तब भी पवित्रात्मा ही होगा, जबकि मनुष्य तब भी देह होगा। परमेश्वर और मनुष्य दोनों के विश्राम करने के स्वयं के संबंधित भिन्न-भिन्न तरीके हैं। जिस समय परमेश्वर विश्राम करेगा, तो वह मनुष्यों के बीच आएगा और प्रकट होगा; जिस समय मनुष्य विश्राम करेगा, तो वह स्वर्ग आने में और स्वर्ग के जीवन का आनंद उठाने में भी परमेश्वर द्वारा अगुवाई किया जाएगा। परमेश्वर और मनुष्य के विश्राम में प्रवेश करने के बाद, शैतान का अस्तित्व अब और नहीं रहेगा। और शैतान की तरह, वे दुष्ट लोग भी अस्तित्व में अब और नहीं रहेंगे। परमेश्वर और मनुष्यों के विश्राम में जाने से पहले, वे दुष्ट व्यक्ति जिन्होंने कभी परमेश्वर को पृथ्वी पर उत्पीड़ित किया था और वे शत्रु जो पृथ्वी पर उसके प्रति अवज्ञाकारी थे, वे पहले ही नष्ट कर दिये गए होंगे; वे अंत के दिनों की बड़ी आपदा द्वारा नष्ट कर दिये गए होंगे। उन दुष्ट व्यक्तियों को पूरी तरह नष्ट कर दिए जाने के बाद, पृथ्वी पुनः कभी भी शैतान की पीडाओं को नहीं जानेगी। मानवजाति संपूर्ण उद्धार प्राप्त करेगी, और केवल तब कहीं जाकर परमेश्वर का कार्य पूर्णतः समाप्त होगा। परमेश्वर और मनुष्य के विश्राम में प्रवेश करने के लिए ये पूर्वापेक्षाएँ हैं।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "परमेश्वर और मनुष्य एक साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे" से

क्योंकि वे परमेश्वर की गवाही देने के योग्य हैं और परमेश्वर के कार्यों के लिये अपने सभी प्रयास समर्पित कर सकते हैं, जो सच में परमेश्वर को प्रेम करते हैं वे कहीं भी स्वर्ग के नीचे बिना किसी के विरोध के आ-जा सकते हैं। और वे पृथ्वी पर सामर्थ्य धारण करते हैं और परमेश्वर के सभी लोगों पर शासन करते हैं। ये लोग संसार के अलग-अलग भागों से एक साथ आते हैं, वे भिन्न-भिन्न भाषाएं बोलते और उनकी त्वचा का रंग अलग-अलग होता है, परन्तु उनके अस्तित्व की सार्थकता समान होती है, उन सबमें परमेश्वर को प्रेम करने वाला हृदय होता है, उन सबकी एक ही गवाही होती है और एक ही संकल्प और इच्छा होती है। जो परमेश्वर को प्रेम करते हैं वे संसार में कहीं भी स्वतंत्रता से आ-जा सकते हैं, जो परमेश्वर की गवाही देते हैं वे सम्पूर्ण ब्रह्माण्डमें यात्रा कर सकते हैं। ये परमेश्वर के अत्यधिक प्रेम के पात्र होते है, ये परमेश्वर के द्वारा आशीषित लोग हैं, और वे हमेशा के लिए उसके प्रकाश में रहेंगे।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "परमेश्वर से प्रेम करने वाले लोग हमेशा के लिए उसके प्रकाश में रहेंगे" से

वे जो परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाएंगे, उनमें से होंगे जो परमेश्वर की आशीषें और उसकी धरोहर पाएँगे। अर्थात्, वे वही ग्रहण करते हैं जो परमेश्वर के पास है और वह जो है, ताकि यह वह बन जाए जो उनके भीतर होता है; उनमें परमेश्वर के सारे वचन गढ़ दिए गए होंगे; परमेश्वर की हस्ती चाहे जैसी भी हो, तुम लोग उन सबको जैसा वे हैं बिल्कुल उसी रूप में ले पाओगे, इस प्रकार से सत्य में जीवन बिताते हैं। यह उस प्रकार का व्यक्ति है जो परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाया जाता है और परमेश्वर द्वारा अर्जित किया जाता है। केवल इसी प्रकार का मनुष्य परमेश्वर द्वारा दी जाने वाली आशीषों को पाने योग्य है:

1. परमेश्वर के संपूर्ण प्रेम को पाना।

2. सभी बातों में परमेश्वर की इच्छानुसार चलना।

3. परमेश्वर की अगुवाई को पाना, परमेश्वर की ज्योति में जीवन व्यतीत करना और परमेश्वर के द्वारा प्रबुद्ध बनाया जाना।

4. पृथ्वी पर परमेश्वर को भाने वाली "छवि" के साथ जीवन बिताना; पतरस के समान परमेश्वर से सच्चा प्रेम करना, परमेश्वर के लिए क्रूस पर चढ़ना और परमेश्वर के प्रेम की कीमत को अदा करने वाले मृत्यु के योग्य होना और पतरस के समान महिमा प्राप्त करना।

5. पृथ्वी में सभी के प्रिय, सम्माननीय और प्रशंसनीय बनना।

6. मृत्यु और पाताल के सारे बंधनों पर जय पाना, शैतान के कार्य को कोई अवसर न देना, परमेश्वर द्वारा नियंत्रित रहना, स्वच्छ और जिंदादिल आत्मा में जीवन व्यतीत करना, और थकानरहित बोध का अनुभव रखना।

7. पूरी जिंदगी हमेशा अकथनीय आत्मिक आनंद और जोश का भाव होना, मानो उसने परमेश्वर की महिमा के दिन को आते हुए देख लिया हो।

8. परमेश्वर के साथ महिमा को पाना और परमेश्वर के प्रिय संतों के जैसे हाव-भाव रखना।

9. वह बनना जो पृथ्वी पर परमेश्वर को पसंद है, अर्थात्, परमेश्वर का प्रिय संतान।

10. स्वरूप का बदल जाना और शरीर से श्रेष्ठ होकर, परमेश्वर के साथ तीसरे आसमान की ओर चढ़ना।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "प्रतिज्ञाएं उनके लिए जो पूर्ण बनाए जा चुके हैं" से

जब मनुष्य अनंत मंज़िल में प्रवेश करता है, तो मनुष्य सृष्टिकर्ता की आराधना करेगा, और क्योंकि मनुष्य ने उद्धार को प्राप्त किया है और अनंतकाल में प्रवेश किया है, तो मनुष्य किसी उद्देश्य का पीछा नहीं करेगा, इसके अतिरिक्त, न ही उसे इस बात की चिंता होगी कि उसे शैतान के द्वारा घेर लिया गया है। इस समय, मनुष्य अपने स्थान को जानेगा, और अपने कर्तव्य को निभाएगा, और भले ही उन्हें ताड़ना नहीं दी जाती है या उनका न्याय नहीं किया जाता है, फिर भी प्रत्येक व्यक्ति अपने अपने कर्तव्य को निभाएगा। उस समय, मनुष्य पहचान एवं रुतबे दोनों में महज एक प्राणी ही होगा। आगे से ऊँच एवं नीच में कोई अन्तर नहीं होगा; प्रत्येक व्यक्ति बस अलग अलग कार्य करेगा। फिर भी मनुष्य तब भी मानवजाति के व्यवस्थित एवं उपयुक्त मंज़िल में जीवन बिताएगा, मनुष्य सृष्टिकर्ता की आराधना करने के लिए अपने कर्तव्य को निभाएगा, और इस प्रकार की मानवजाति ही अनंतकाल की मानवजाति होगी। उस समय, मनुष्य ऐसे जीवन को प्राप्त कर चुका होगा जिसे परमेश्वर के द्वारा प्रकाशित किया गया है, ऐसा जीवन जो परमेश्वर की देखरेख एवं संरक्षण के अधीन है, और ऐसा जीवन जो परमेश्वर के साथ है। मानवजाति पृथ्वी पर एक सामान्य जीवन को जीएगी, और सम्पूर्ण मानवजाति सही मार्ग में प्रवेश करेगी।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "मनुष्य के सामान्य जीवन को पुनःस्थापित करना और उसे एक बेहतरीन मंज़िल पर ले चलना" से

जब एक बार विजय के कार्य को पूरा कर लिया जाता है, तब मनुष्य को एक सुन्दर संसार में पहुंचाया जाएगा। निश्चित रूप से, यह जीवन तब भी पृथ्वी पर ही होगा, परन्तु यह मनुष्य के आज के जीवन से पूरी तरह से भिन्न होगा। यह वह जीवन है जो मानवजाति के तब पास होगा जब सम्पूर्ण मानवजाति पर विजय प्राप्त कर लिया जाता है, यह पृथ्वी पर मनुष्य के लिए, और मानवजाति के लिए एक नई शुरुआत होगी कि उसके पास ऐसा जीवन हो जो इस बात का सबूत होगा कि मानवजाति ने एक नए एवं सुन्दर आयाम में प्रवेश कर लिया है। यह पृथ्वी पर मनुष्य एवं परमेश्वर के जीवन की शुरुआत होगी। ऐसे सुन्दर जीवन का आधार ऐसा ही होगा, जब मनुष्य को शुद्ध कर लिया जाता है और उस पर विजय पा लिया जाता है उसके पश्चात्, वह परमेश्वर के सम्मुख समर्पित हो जाता है। और इस प्रकार, इससे पहले कि मानवजाति उस बेहतरीन मंज़िल में प्रवेश करे विजय का कार्य परमेश्वर के कार्य का अंतिम चरण है। ऐसा जीवन ही पृथ्वी पर मनुष्य के भविष्य का जीवन है, यह पृथ्वी पर सबसे अधिक सुन्दर जीवन है, उस प्रकार का जीवन है जिसकी लालसा मनुष्य करता है, और उस प्रकार का जीवन है जिसे मनुष्य ने संसार के इतिहास में पहले कभी हासिल नहीं किया गया है। यह 6,000 वर्षों के प्रबधंकीय कार्य का अंतिम परिणाम है, यह वह है जिसकी मानवजाति ने अत्यंत अभिलाषा की है, और साथ ही यह मनुष्य के लिए परमेश्वर की प्रतिज्ञा भी है। परन्तु यह प्रतिज्ञा तुरन्त ही पूरी नहीं हो सकती है: मनुष्य अपने भविष्य की मंज़िल में केवल तभी प्रवेश करेगा जब एक बार अंतिम दिनों के कार्य को पूरा कर लिया जाता है और उस पर पूरी तरह से विजय पा लिया जाता है, अर्थात्, जब एक बार शैतान को पूरी तरह से पराजित कर दिया जाता है। जब मनुष्य को परिष्कृत कर दिया जाता है उसके पश्चात् ही वह पापपूर्ण स्वभाव से रहित होगा, क्योंकि परमेश्वर ने शैतान को पराजित कर दिया होगा, जिसका अर्थ यह है कि विरोधी ताकतों के द्वारा कोई अतिक्रमण नहीं होगा, और कोई विरोधी ताकतें मनुष्य के शरीर पर आक्रमण नहीं कर सकती हैं। और इस प्रकार मनुष्य स्वतन्त्र एवं पवित्र होगा – वह अनन्तकाल में प्रवेश कर चुका होगा। जब अन्धकार की विरोधी ताकतों को बांध दिया जाता है केवल तभी मनुष्य जहाँ कहीं जाता है वहाँ वह स्वतन्त्र होगा, और विद्रोहीपन या विरोध से रहित होगा। मनुष्य की सलामती के लिए शैतान को बस बांधना है; आज, वह सही सलामत नहीं है क्योंकि[क] शैतान पृथ्वी पर अभी भी हर जगह समस्याएं खड़ी करता है, और क्योंकि परमेश्वर के प्रबधंन का समूचा कार्य अभी तक समाप्ति पर नहीं पहुंचा है। जब एक बार शैतान को पराजित कर दिया जाता है, तो मनुष्य पूरी तरह से स्वतन्त्र हो जाएगा; जब मनुष्य परमेश्वर को प्राप्त करता है और शैतान के प्रभुत्व से बाहर निकल आता है, तब वह धार्मिकता के सूर्य को देखेगा। वह जीवन जिसे सामान्य मानव को प्राप्त करना है उसे पुनः प्राप्त कर लिया जाएगा; वह सब कुछ जिसे एक सामान्य मनुष्य के द्वारा धारण किया जाना चाहिए – जैसे भले एवं बुरे को परखने की योग्यता, और एक समझ कि किस प्रकार भोजन करना है और स्वयं को वस्त्र से ढंकना है, और सामान्य जीवन व्यतीत करने की क्षमता - यह सब कुछ पुनः प्राप्त कर लिया जाएगा।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "मनुष्य के सामान्य जीवन को पुनःस्थापित करना और उसे एक बेहतरीन मंज़िल पर ले चलना" से

जब मनुष्य पृथ्वी पर मनुष्य के असली जीवन को हासिल करता है, तो शैतान की सारी ताकतों को बांध दिया जाएगा, और मनुष्य आसानी से पृथ्वी पर जीवन यापन करेगा। परिस्थितियां उतनी जटिल नहीं होंगी जितनी आज हैं: मानवीय रिश्ते, सामाजिक रिश्ते, जटिल पारिवारिक रिश्ते..., वे इस प्रकार परेशान करने वाले और कितने दुखदायी हैं! यहाँ पर मनुष्य का जीवन कितना दयनीय है! एक बार मनुष्य पर विजय प्राप्त कर ली जाए तो, उसका दिल और दिमाग बदल जाएगा: उसके पास ऐसा हृदय होगा जो परमेश्वर पर श्रद्धा रखता है और ऐसा हृदय होगा जो परमेश्वर से प्रेम करता है। जब एक बार ऐसे लोग जो इस विश्व में हैं जो परमेश्वर से प्रेम करने की इच्छा रखते हैं उन पर विजय पा ली जाती है, कहने का तात्पर्य है, जब एक बार शैतान को हरा दिया जाता है, और जब एक बार शैतान को - अंधकार की सारी शक्तियों को बांध लिया जाता है, तो फिर पृथ्वी पर मनुष्य का जीवन कष्टरहित होगा, और वह पृथ्वी पर आज़ादी से जीवन जीने में सक्षम होगा। यदि मनुष्य का जीवन शारीरिक रिश्तों के बगैर हो, और देह की जटिलताओं के बगैर हो, तो यह कितना अधिक आसान होगा। मनुष्य के देह के रिश्ते बहुत ही जटिल होते हैं, और मनुष्य के लिए ऐसे रिश्तों का होना इस बात का प्रमाण है कि उसने स्वयं को अभी तक शैतान के प्रभाव से स्वतन्त्र नहीं कराया है। यदि आपका भाइयों एवं बहनों के साथ ऐसा ही रिश्ता होता, यदि आपका अपने नियमित परिवार के साथ ऐसा ही रिश्ता होता, तो आपके पास कोई चिंता नहीं होती, और किसी के भी विषय में चिंता करने की कोई आवश्यकता नहीं होती। इस से बेहतर और कुछ नहीं हो सकता था, और इस रीति से मनुष्य को उसकी आधी तकलीफों से मुक्ति मिल गई होती। पृथ्वी पर एक सामान्य मानवीय जीवन जीने से, मनुष्य स्वर्गदूत के समान होगा: हालाँकि अभी भी देह का प्राणी होगा, फिर भी वह काफी हद तक स्वर्गदूत के समान होगा। यही वह अंतिम प्रतिज्ञा है, यह वह अंतिम प्रतिज्ञा है जो मनुष्य को प्रदान की गई है।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "मनुष्य के सामान्य जीवन को पुनःस्थापित करना और उसे एक बेहतरीन मंज़िल पर ले चलना" से

पदटिप्पणियां:

क. मूलपाठ कहता है "आज, यह इसलिए है।"