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अध्याय 7 सत्य के अन्य पहलू जो कि न्यूनतम हैं जिन्हें नए विश्वासियों द्वारा समझा जाना चाहिए

7. परमेश्वर पर विश्वास करने वालों को अपने गंतव्य के लिए भले कार्यों से पर्याप्त होकर तैयार होना चाहिए।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

मेरी दया उनके लिये है जो मुझसे प्रेम करते हैं और अपने आपको नकारते हैं। और दुष्टों को दिया गया दण्ड मेरे धार्मिक स्वभाव का प्रमाण और उससे बढ़कर मेरे क्रोध का साक्षी है। जब कभी संकट, अकाल और महामारी आयेगीं, तो ये सब मेरा विरोध करने वालों पर आयेगी और वे विलाप करेंगे। जिन्होंने बहुत वर्षों तक मेरा अनुसरण करते हुए भी सब प्रकार के बुरे कर्म किये हैं - वे निर्दोष नहीं होंगे; वे उस संकट के बीच लगातार आंतक और भय के साथ जीयेंगे, जिसे इन युगों के बीच पहले कभी नहीं देखा गया। मेरे अनुयायी जो किसी और के प्रति निष्ठावान नहीं थे वे मेरी सामर्थ में आनंद करेंगे और तालियां बजाएंगे। वे वर्णन से बाहर संतुष्टि का अनुभव करेंगे और उस आनंद में रहेंगे जो मैंने पहले कभी मानव जाति को नहीं दिया। क्योंकि मैं मनुष्यों के 'भले कामों' से सुख पाता हूँ और उनके 'बुरे कामों' से घृणा करता हूँ।

मैंने वह काम किया है जिसे कोई दूसरा नहीं कर सकता, केवल इस आशा में कि मनुष्य मुझे भले काम करके प्रतिफल देगा। यद्यपि कुछ लोग मुझे प्रतिफल दे सकते हैं परंतु फिर भी मैं संसार में अपनी यात्रा पूर्ण करता हूँ और उस कार्य को आरंभ करता हूँ जो आगे चलकर प्रकट होगा, क्योंकि इन अनेक वर्षों में मनुष्यों के बीच मेरी यात्रा फलवती हुई और मैं अति प्रसन्न हूँ। मैं मनुष्यों की संख्या पर नहीं, पर उनके 'भले कामों' की परवाह करता हूँ। कुछ भी हो, मुझे आशा है कि तुम अपने लक्ष्य की तैयारी में पर्याप्त भले काम करोगे, और तब मुझे संतुष्टि होगी। अन्यथा तुम में से कोई भी संकट से नहीं बचेगा। संकट मेरे द्वारा ही लाया जाएगा और निश्चित रूप से मैं ही उसका क्रियान्वयन करूँगा। यदि तुम मेरी उपस्थिति में भले के लिये काम नहीं कर सकते, तब तुम संकट में दुख उठाने से नहीं बच सकते। क्लेश के समय में तुम्हारे कार्य और क्रियायें - पूर्णत: उचित नहीं थे, क्योंकि तुम्हारा विश्वास और प्रेम खोखला था और तुमने केवल 'भय' या 'बल' को प्रदर्शित किया। इस बारे में मैं भले या बुरे का न्याय करूँगा। अब भी मेरी चिंता तुमतुम्हारे कामों और आचरण को लेकर है, जिस पर तुम्हारे अंत का मेरा निश्चय आधारित है। मैं तुम्हें यह स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि क्लेश के दिनों में, जो मेरे प्रति पूरी तरह निष्ठावान नहीं रहे, उन पर मैं आगे दया नहीं करूँगा, क्योंकि मेरी दया का विस्तार केवल इतनी ही दूर तक है। साथ ही, जिन्होंने एक बार मेरे साथ विश्वासघात किया है, अब उनमें मेरी रुचि जरा भी नहीं है - मैं उनसे थोड़ी-सी भी संगति नहीं करना चाहता हूँ जो अपने मित्रों का सौदा कर लेते हैं। व्यक्ति चाहे जो भी हो, मेरा स्वभाव यही है। मैं तुम्हें बताना चाहता हूँ: यदि कोई मेरा हृदय तोड़ता है, तो वह फिर से दया का पात्र नहीं होगा, और जो मेरे प्रति विश्वासयोग्य है वह सदैव मेरे हृदय में बना रहेगा।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "अपने लक्ष्य की तैयारी में तुम्हें पर्याप्त भले काम करने चाहिये" से

मुझे आशा है कि मेरे कार्य के अंतिम चरण में, तुम्हारी कार्यशीलता उल्लेखनीय हो, तुम सब पूर्ण समर्पित हो, और अधूरे मन से कार्य न करो। मैं यह भी आशा करता हूं कि तुम सभी को अच्छा गंतव्य प्राप्त हो। उसके बावजूद, अभी भी मेरी अपनी आवश्यकताएं हैं, और वो ये कि तुम्हें सर्वोत्तम निर्णय करना है कि तुम लोग अपनी एकमात्र और अंतिम भक्ति मुझे प्रदान करो। यदि किसी की एकनिष्ठ भक्ति नहीं है, तो वह व्यक्ति निश्चित रूप से शैतान की पूंजी बन जायेगा, और मैं उसका इस्तेमाल करना जारी नहीं रखूंगा। मैं उसे उसके माता-पिता के पास देखभाल के लिये घर भेज दूंगा।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "गंतव्य पर" से

तुम्हें अपना दायित्व पूरी क्षमता से और खुले तथा निर्मल हृदय से पूरा करना चाहिये, एवं हर स्थिति में पूर्ण करना चाहिये। जैसा कि तुम सबने कहा है, जब दिन आयेगा, तो जिसने भी परमेश्वर के लिये कष्ट उठाए हैं, परमेश्वर उसके साथ दुर्व्यवहार नहीं करेगा। इस प्रकार का दृढ़निश्चय बनाये रखना चाहिये और इसे कभी भूलना नहीं चाहिये। केवल इसी प्रकार से मैं तुम लोगों के बारे में निश्चिंत हो सकता हूं। वरना मैं कभी भी तुम लोगों के विषय में बेफिक्र नहीं हो पाऊंगा, और तुम सदैव मेरी घृणा के पात्र रहोगे। यदि तुम सभी अपनी अंतरात्मा की आवाज़ सुन सको और अपना सर्वस्व मुझे अर्पित कर सको, मेरे कार्य के लिये कोई कोर-कसर न छोड़ो, और मेरे सुसमाचार के कार्य के लिये अपने आजीवन किये गये प्रयास अर्पित कर सको, तो क्या फिर मेरा हृदय तुम्हारे लिये हर्षित नहीं होगा? क्या मैं तुम्हारी ओर से पूर्णत: निश्चिंत नहीं हो जाऊंगा?

"वचन देह में प्रकट होता है" से "गंतव्य पर" से

तुम अपना हृदय और शरीर और अपना समस्त वास्तविक प्यार परमेश्वर को समर्पित कर सकते हो, उसके सामने रख सकते हो, उसके प्रति पूरी तरह से आज्ञाकारी हो सकते हो, और उसकी इच्छा के प्रति पूर्णतः विचारशील हो सकते हो। शरीर के लिए नहीं, परिवार के लिए नहीं, और अपनी व्यक्तिगत इच्छाओं के लिए नहीं, बल्कि परमेश्वर के परिवार के हित के लिए। तुम परमेश्वर के वचन को हर चीज में सिद्धांत के रूप में, नींव के रूप में ले सकते हो। इस तरह, तुम्हारे इरादे और तुम्हारे दृष्टिकोण सब सही जगह पर होंगे, और तुम ऐसे व्यक्ति होगे जो उसके सामने परमेश्वर की प्रशंसा प्राप्त करता है। जिन लोगों को परमेश्वर पसंद करता है ये वे लोग हैं जो पूर्णतः उसकी ओर हैं, वे लोग हैं जो उसके प्रति समर्पित हैं तथा किसी अन्य के प्रति नहीं।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "जो लोग परमेश्वर की व्यावहारिकता के प्रति पूर्णतः आज्ञाकारी हो सकते हैं ये वे लोग हैं जो परमेश्वर से सचमुच प्यार करते हैं" से

यदि सच्चाई का मार्ग खोजने से तुम्हें प्रसन्नता मिलती है, तो तुम उसके समान हो जो अक्सर प्रकाश में जीवन बिताता है। यदि तुम परमेश्वर के घर में सेवा करने वाले के रूप काम करने वाला बन कर प्रसन्न हो, तथा गुमनामी में कर्मठतापूर्वक और शुद्ध अंतःकरण के साथ काम करते हो, हमेशा अर्पित करते हो और कभी भी लेते नहीं हो, तो मैं कहता हूँ कि तुम एक वफादार संत हो, क्योंकि तुम किसी प्रतिफल की खोज नहीं करते हो और तुम मात्र एक ईमानदार इंसान बने रहते हो। यदि तुम निष्कपट बनने के इच्छुक हो, यदि तुम अपना सर्वस्त अर्पित करने के इच्छुक हो, यदि तुम परमेश्वर के लिए अपना जीवन बलिदान करने और उसका गवाह बनने में समर्थ हो, यदि तुम ईमानदार हो और केवल परमेश्वर को प्रसन्न करने की सोचते हो, और कभी अपने बारे में विचार नहीं करते हो या अपने लिए कुछ नहीं लेते हो, तो मैं कहता हूँ कि ऐसे लोग वे उनके समान हैं जो प्रकाश के द्वारा पोषित हैं और सदा राज्य में रहेंगे।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "तीन चेतावनियाँ" से

पिछला:परमेश्वर के विश्वासियों को किस प्रकार की पीड़ा अवश्य सहनी चाहिए और पीड़ा का अर्थ।

अगला:अध्याय 8 विभिन्न प्रकार के लोगों और मनुष्य को की गई परमेश्वर की प्रतिज्ञा के अंत।

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