परमेश्वर का स्वभाव और स्वरूप

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 232

मैं धार्मिक हूँ, मैं विश्वसनीय हूँ, और मैं वो परमेश्वर हूँ जो मनुष्यों के अंतरतम हृदय की पड़ताल करता है! मैं एक क्षण में इसे प्रकट कर दूँगा कि कौन असली और कौन झूठा है। घबराओ मत; सभी चीजें मेरे समय के अनुसार काम करती हैं। कौन मुझे सच्चे दिल से चाहता है और कौन नहीं—मैं एक-एक करके तुम सबको बता दूँगा। तुम लोग बस पेट-भर वचनों को खाने और पीने और मेरी उपस्थिति में मेरे करीब आने पर ध्यान केंद्रित करो और मैं अपना कार्य स्वयं करूँगा। त्वरित नतीजों के लिए बहुत अधीर मत होओ; मेरा कार्य ऐसा नहीं है जो सारा एक साथ पूरा किया जा सके। इसके भीतर मेरे चरण और मेरी बुद्धि निहित है, और इसीलिए मेरी बुद्धि प्रकट हो सकती है। मैं तुम सभी को देखने दूँगा कि मेरे हाथों द्वारा क्या किया जाता है—बुराई को दण्डित और भलाई को पुरस्कृत किया जाता है। मैं सब लोगों के प्रति पूरी तरह निष्पक्ष हूँ। तुम जो मुझे सच्चे दिल से प्रेम करते हो, मैं भी तुम्हें सच्चे दिल से प्रेम करूँगा, और जहाँ तक उनकी बात है जो मुझे सच्चे दिल से प्रेम नहीं करते, उन पर मेरा क्रोध हमेशा रहेगा, ताकि वे सदा के लिए याद रखें कि मैं सच्चा परमेश्वर हूँ, ऐसा परमेश्वर जो मनुष्यों के अंतरतम हृदय की पड़ताल करता है। लोगों के सामने एक तरह से और उनकी पीठ पीछे दूसरी तरह से काम न करो; तुम जो कुछ भी करते हो, उसे मैं स्पष्ट रूप से देखता हूँ, तुम दूसरों को भले ही मूर्ख बना लो, लेकिन तुम मुझे मूर्ख नहीं बना सकते। मैं यह सब स्पष्ट रूप से देखता हूँ। तुम्हारे लिए कुछ भी छिपाना संभव नहीं है; सब कुछ मेरे हाथों की पहुँच में है। यह मत समझो कि तुम तुच्छ छोटी-छोटी गणनाओं में बहुत ही चालाक और कुशल हो। मैं तुमसे कहता हूँ : इंसान चाहे जितनी योजनाएँ बना ले, वे चाहे हजारों हों या लाखों, लेकिन अंत में वह मेरे हाथ की पहुँच से बच नहीं सकता। सभी चीजें और सभी घटनाएँ मेरे हाथों से नियंत्रित होती हैं, एक इंसान की तो बिसात ही क्या! मुझसे बचने या छिपने की कोशिश मत करो, फुसलाने या छिपाने की कोशिश मत करो। क्या ऐसा हो सकता है कि तुम अभी भी नहीं देख सकते कि मेरा महिमामय मुख, मेरा क्रोध और मेरा न्याय सार्वजनिक रूप से प्रकट किए गए हैं? जो भी मुझे सच्चे दिल से नहीं चाहते हैं, मैं उनका तत्काल और बिना दया के न्याय करूँगा। मेरी दया समाप्त हो गई है; अब और शेष नहीं रही है। अब और पाखंडी मत बनो, और अपने बेलगाम और उद्दंड चाल-चलन को रोक लो।

मेरे पुत्र, ध्यान दो; मेरी उपस्थिति में अधिक समय बिताओ, मैं तुम्हारा साथ दूँगा। डरो मत, मेरी तेज़ दुधारी तलवार को सामने लाओ, और मेरे इरादों के अनुसार अंत तक शैतान के साथ पूरी ताकत से लड़ो। मैं तुम्हारी रक्षा करूँगा; कोई चिंता न करो। सभी छिपी हुई चीज़ें खोली जाएँगी और प्रकट की जाएँगी। मैं वो सूर्य हूँ जो प्रकाश देता है, निर्दयतापूर्वक समस्त अँधेरे को प्रकाशित कर देता है। मेरा न्याय अपनी पूरी समग्रता में उतर आया है; कलीसिया एक युद्ध का मैदान है। तुम सभी को तैयार हो जाना चाहिए और तुम्हें अंतिम निर्णायक युद्ध के लिए अपने सम्पूर्ण अस्तित्व के साथ अर्पित हो जाना चाहिए; मैं निश्चित रूप से तुम्हारी रक्षा करूँगा ताकि तुम मेरे लिए अच्छी विजयपूर्ण लड़ाई लड़ो।

सावधान रहो, आजकल लोगों के दिल धोखेबाज़ और अपारदर्शी हैं; उन पर भरोसा करना असंभव है। केवल मैं ही पूरी तरह से तुम लोगों के लिए हूँ। मुझमें कोई धोखेबाज़ी नहीं है; तुम बस मेरे सहारे रहो! अंतिम निर्णायक युद्ध में मेरे पुत्र निश्चित रूप से विजयी होंगे और शैतान पक्के तौर पर मृत्यु-संघर्ष के लिए बाहर निकलकर आएगा। कोई भय न रखो! मैं तुम्हारी शक्ति हूँ, मैं तुम्हारा सर्वस्व हूँ। अत्यधिक चिंता मत करो—इन पर ध्यान देना तुम्हारे लिए बहुत ज्यादा है। मैंने पहले कहा है, अब मैं तुम लोगों को राह पर आगे खींचकर नहीं ले जाऊँगा क्योंकि वक़्त निकलता जा रहा है। मेरे पास फिर से तुम लोगों को, तुम्हारे कान पकड़कर, याद दिलाने का समय नहीं है—यह संभव नहीं है! तुम बस युद्ध के लिए अपनी तैयारियों को पूरा कर लो। मैं तुम्हारा सम्पूर्ण दायित्व लेता हूँ; हर चीज़ मेरे हाथों में है। यह जीवन-मृत्यु की लड़ाई है, इसमें दोनों में से एक पक्ष अवश्य नष्ट होगा। लेकिन तुम्हें इस पर स्पष्ट होना चाहिए : मैं हमेशा के लिए विजयी और अजेय हूँ, और शैतान निश्चित रूप से नष्ट हो जाएगा। यही मेरी प्रक्रिया, मेरा काम, मेरी इच्छा और मेरी योजना है!

यह हो चुका है! सब कुछ हो गया है! बुज़दिल और डरपोक मत बनो। मैं तुम्हारे साथ और तुम मेरे साथ, हम सदा-सर्वदा के लिए राजा होंगे! एक बार मेरे द्वारा बोले गए वचन कभी बदलेंगे नहीं, और तुम सब के साथ शीघ्र घटनाएँ होंगी। सतर्क रहो! तुम्हें हर पंक्ति पर अच्छी तरह से विचार करना चाहिए; अब मेरे वचनों के बारे में अस्पष्ट न रहो! तुम्हें उनके बारे में स्पष्ट होना चाहिए! याद रखो—मेरी उपस्थिति में अधिक समय बिताओ!

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, आरंभ में मसीह के कथन, अध्याय 44

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 233

मैंने उन लोगों को सज़ा देने का कार्य शुरू कर दिया है, जो बुराई करते हैं और जो शक्ति का प्रयोग करते हैं और जो परमेश्वर के पुत्रों पर अत्याचार करते हैं। अब से, मेरे प्रशासनिक नियमों का हाथ हमेशा उनके ऊपर होगा, जो अपने दिल में मेरा विरोध करते हैं। इसे जान लो! यह मेरे न्याय की शुरुआत है और किसी के प्रति कोई दया नहीं दिखाई जाएगी, न ही किसी को छोड़ा जाएगा, क्योंकि मैं वह परमेश्वर हूँ जिसके पास कोई दैहिक भावनाएँ नहीं हैं और जो धार्मिकता का पालन करता है और इसे पहचान लेना तुम सभी लोगों के लिए अच्छा होगा।

ऐसा नहीं है कि मैं उन लोगों को दंडित करने का इच्छुक हूँ, जो बुराई करते हैं बल्कि यह उनके खुद के बुरे कामों से उन्हीं पर लाया गया प्रतिशोध है। मैं किसी को दंडित करने में जल्दबाजी नहीं करता, न ही मैं किसी के साथ अन्यायपूर्ण व्यवहार करता हूँ—मैं सभी के प्रति धार्मिक हूँ। मैं निश्चित रूप से अपने पुत्रों से प्रेम करता हूँ और मैं निश्चित रूप से उन दुष्टों से नफ़रत करता हूँ, जो मेरी अवहेलना करते हैं; मेरे कार्यों के पीछे यह सिद्धांत है। तुम लोगों में से प्रत्येक को मेरे प्रशासनिक नियमों के बारे में कुछ अंतर्दृष्टि होनी चाहिए; यदि तुम ऐसा नहीं करते, तो तुम लोगों को जरा भी खौफ न होगा और तुम सब मेरे सामने लापरवाही से काम करोगे। तुम्हें यह भी पता नहीं होगा कि मैं क्या प्राप्त करना चाहता हूँ, मैं किसे सिद्ध करना चाहता हूँ, मैं क्या हासिल करना चाहता हूँ या किस तरह के व्यक्ति की मेरे राज्य को आवश्यकता है।

मेरे प्रशासनिक आदेश इस प्रकार हैं :

1. चाहे तुम कोई भी हो, यदि तुम अपने दिल में मेरा विरोध करते हो, तो तुम्हारा न्याय किया जाएगा।

2. जिन लोगों को मैंने चुना है, उन्हें किसी भी गलत सोच के लिए तुरंत अनुशासित किया जाएगा।

3. मैं उन लोगों को एक तरफ़ कर दूँगा, जो मुझ पर विश्वास नहीं करते। मैं उन्हें अंत तक लापरवाही से बोलने और काम करने दूँगा, जब मैं उन्हें पूरी तरह से दंडित करूँगा और उनसे निपटूंगा।

4. मैं उनकी देखभाल और हर समय उनकी रक्षा करूँगा, जो हर समय मुझ पर विश्वास करते हैं। हर समय मैं उद्धार के मार्ग के जरिए उनके लिए जीवन की आपूर्ति करूँगा। इन लोगों के पास मेरा प्यार होगा और वे निश्चित रूप से न तो गिरेंगे, न ही अपनी राह से भटकेंगे। उनकी कोई भी कमज़ोरी केवल अस्थायी होगी और मैं निश्चित रूप से उनकी कमज़ोरियों को याद नहीं रखूँगा।

5. वे लोग जो विश्वास करते हुए प्रतीत होते हैं, लेकिन जो वास्तव में ऐसा नहीं करते—जो लोग विश्वास करते हैं कि एक परमेश्वर है, लेकिन जो मसीह की तलाश नहीं करते हैं, फिर भी जो विरोध भी नहीं करते—ये सबसे दयनीय किस्म के लोग होते हैं और मेरे कर्मों के माध्यम से मैं उन्हें स्पष्ट रूप से दिखाऊंगा। अपने कार्यों के माध्यम से, मैं ऐसे लोगों को बचाऊंगा और उन्हें वापस लाऊंगा।

6. ज्येष्ठ पुत्रों को, पहले मेरे नाम को स्वीकार करने वालों को, आशीष मिलेगी! मैं निश्चित रूप से तुम लोगों को सबसे अच्छी आशीषें प्रदान करूँगा और तुम लोगों को जी भर कर आनंद लेने की अनुमति दूँगा; कोई भी इसमें बाधा डालने की हिम्मत नहीं करेगा। यह सब तुम लोगों के लिए पूरी तरह से तैयार किया गया है, क्योंकि यह मेरा प्रशासनिक आदेश है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, आरंभ में मसीह के कथन, अध्याय 56

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 234

धन्य हैं वे, जिन्होंने मेरे वचन पढ़े हैं और जो यह विश्वास करते हैं कि वे पूरे होंगे। मैं तुम्हारे साथ बिलकुल भी दुर्व्यवहार नहीं करूँगा; जो तुम विश्वास करते हो, उसे तुम्हारे भीतर पूरा करूँगा। ये तुम पर आता हुआ मेरा आशीष है। मेरे वचन हर व्यक्ति के भीतर छिपे रहस्यों पर सटीकता से वार करते हैं; सभी में प्राणघातक घाव हैं, और मैं वह अच्छा चिकित्सक हूँ, जो उन्हें चंगा करता है : बस मेरी उपस्थिति में आ जाओ। मैंने क्यों कहा कि भविष्य में कोई दुःख नहीं होगा और न ही कोई अश्रु होंगे? उसका कारण यही है। मेरे साथ, सभी चीज़ें संपन्न होती हैं, परंतु मनुष्य के साथ, सभी बातें भ्रष्ट, खोखली और मनुष्यों को धोखा देने वाली हैं। मेरी उपस्थिति में तुम निश्चित रूप से सभी चीज़ें पाओगे, और निश्चित रूप से उन सभी आशीषों को देखोगे और उनका आनंद भी उठाओगे, जिनकी तुम कभी कल्पना भी नहीं कर सकते। जो मेरे समक्ष नहीं आते, वे निश्चित रूप से विद्रोही हैं और पूरी तरह से मेरा प्रतिरोध करने वाले हैं। मैं निश्चित रूप से उन्हें हलके में नहीं छोडूंगा; मैं ऐसे लोगों को कठोरता से ताड़ित करूँगा। इसे स्मरण रखो! लोग जितना अधिक मेरे सामने आएँगे, उतना ही अधिक वे प्राप्त करेंगे—हालाँकि वह सिर्फ़ अनुग्रह होगा। बाद में वे और बड़े आशीष प्राप्त करेंगे।

संसार के सृजन के समय से मैंने लोगों के इस समूह को—अर्थात् आज के तुम लोगों को—पूर्वनिर्धारित करना तथा चुनना प्रारंभ कर दिया है। तुम लोगों का मिज़ाज, काबिलियत, रूप-रंग, आध्यात्मिक कद, वह परिवार जिसमें तुमने जन्म लिया, तुम्हारी नौकरी और तुम्हारा विवाह—अपनी समग्रता में तुम, यहां तक कि तुम्हारे बालों और त्वचा का रंग, और तुम्हारे जन्म का समय—सभी कुछ मेरे हाथों से तय किया गया था। यहां तक कि हर एक दिन जो चीज़ें तुम करते हो और जिन लोगों से तुम मिलते हो, उसकी व्यवस्था भी मैंने अपने हाथों से की थी, इससे भी अधिक आज तुम्हें अपनी उपस्थिति में लाना भी वस्तुतः मेरा ही आयोजन है। अपने आप को अव्यवस्था में न डालो; तुम्हें शांतिपूर्वक आगे बढ़ना चाहिए। आज जिस बात का मैं तुम्हें आनंद लेने देता हूँ, वह एक ऐसा हिस्सा है जिसके तुम योग्य हो, और यह संसार के सृजन के समय मेरे द्वारा पूर्वनिर्धारित किया गया है। सभी मनुष्य बहुत चरमपंथी हैं : या तो वे अत्यधिक दुराग्रही हैं या पूरी तरह से निर्लज्ज। वे मेरी योजना और व्यवस्था के अनुसार कार्य करने में असमर्थ हैं। अब और ऐसा न करो। मेरे साथ, सभी मुक्त हैं; स्वयं को बांधो मत, क्योंकि इससे तुम्हारे जीवन के संबंध में हानि होगी। इसे स्मरण रखो!

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, आरंभ में मसीह के कथन, अध्याय 74

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 235

मैं स्वयं अद्वितीय परमेश्वर हूँ, इससे भी अधिक मैं परमेश्वर का एकमात्र व्यक्तित्व हूँ। इससे भी अधिक, मैं, देह की समग्रता, परमेश्वर की पूर्ण अभिव्यक्ति हूँ। जो कोई मेरा भय न मानने का साहस करता है, जो कोई अपनी आँखों से मेरा विरोध करने का साहस करता है, और जो कोई अपने होंठों से मेरा विरोध करने की हिम्मत करता है, वह निश्चित रूप से मेरे शापों और कोप से मारा जाएगा (मेरे कोप के कारण शाप दिए जाएँगे)। इतना ही नहीं, जो कोई मेरे प्रति निष्ठावान अथवा संतानोचित नहीं होने का दुस्साहस करता, और जो कोई मुझसे चालबाज़ी करने का दुस्साहस करता है, वह निश्चित रूप से मेरी घृणा से मर जाएगा। मेरी धार्मिकता, प्रताप और न्याय सदा-सदा के लिए कायम रहेंगे। पहले मैं प्रेममय और दयालु था, परंतु यह मेरी पूरी दिव्यता का स्वभाव नहीं है; केवल धार्मिकता, प्रताप और न्याय ही मेरा स्वभाव हैं—स्वयं पूर्ण परमेश्वर का स्वभाव। अनुग्रह के युग में मैं प्रेममय और दयालु था। जो कार्य मुझे पूरा करना था, उसके कारण मुझमें प्रेममय-कृपालुता और दया थी; उसके बाद ऐसी चीज़ों की कोई आवश्यकता न रही (और तबसे कोई भी नहीं रही है)। यह सब धार्मिकता, प्रताप और न्याय है और यह मेरी सामान्य मानवता के साथ जुड़ी मेरी पूर्ण दिव्यता का संपूर्ण स्वभाव है।

जो लोग मुझे नहीं जानते, वे अथाह कुंड में नष्ट हो जाएँगे, जबकि जो लोग मेरे बारे में निश्चित हैं, वे हमेशा जिएँगे और उनकी मेरे प्रेम के अंतर्गत देखभाल और सुरक्षा की जाएगी। जिस क्षण मैं एक शब्द भी बोलता हूँ, पूरा ब्रह्मांड और पृथ्वी के छोर हिलने लगते हैं। कौन मेरे वचन सुनकर आतंक से नहीं काँप उठेगा? कौन मेरे प्रति भय मानने वाले हृदय को पनपने से रोक सकता है? और कौन मेरे कार्यकलापों से मेरी धार्मिकता और प्रताप को जानने में अक्षम है? और कौन मेरे कार्यकलापों में मेरी सर्वशक्तिमत्ता और बुद्धि नहीं देख सकता? जो कोई भी ध्यान नहीं देता, वह निश्चित रूप से मर जाएगा। ऐसा इसलिए है, क्योंकि जो ध्यान नहीं देते, वे ऐसे लोग हैं जो मेरा विरोध करते हैं और मुझे नहीं जानते; वे प्रधान दूत हैं और सर्वाधिक निरंकुश हैं। अपने आप को जाँचो : जो कोई निरंकुश, आत्मतुष्ट, घमंडी और दंभी है, वह निश्चित रूप से मेरी नफरत का पात्र है, और वह नष्ट होने के लिए बाध्य है!

अब मैं अपने राज्य के प्रशासनिक आदेशों की घोषणा करता हूँ : सभी चीज़ें मेरे न्याय के अंतर्गत हैं, सभी चीज़ें मेरी धार्मिकता के अंतर्गत हैं, सभी चीज़ें मेरे प्रताप के अंतर्गत हैं, और मैं अपनी धार्मिकता सब पर लागू करता हूँ। जो यह कहते हैं कि वे मुझमें विश्वास रखते हैं परंतु गहराई में मेरा प्रतिरोध करते हैं, या जिनके हृदयों ने मुझे अस्वीकार कर दिया है, वे निकाल बाहर किए जाएँगे—परंतु सब मेरे यथोचित समय पर। जो मेरे बारे में व्यंग्यात्मक ढंग से बात करते हैं, परंतु इस तरह से कि दूसरों के ध्यान में न आए, वे तुरंत मृत्यु को प्राप्त होंगे (वे आत्मा, देह और प्राण से नष्ट हो जाएँगे)। जो लोग मेरे प्रियजनों पर अत्याचार करते हैं अथवा उनसे रूखा व्यवहार करते हैं, मेरे कोप द्वारा उनका तत्काल न्याय किया जाएगा। इसका अर्थ है कि जो मेरे प्रियजनों के प्रति ईर्ष्यालु हैं, और जो मुझे अधार्मिक समझते हैं, उन्हें न्याय किए जाने के लिए मेरे प्रियजनों को सौंप दिया जाएगा। जो निष्कपट, सरल और सच्चे हैं (वे भी, जिनमें बुद्धि की कमी है), और जो मेरे साथ एकचित्त होकर ईमानदारी से व्यवहार करते हैं, वे सभी मेरे राज्य में रहेंगे। जो लोग प्रशिक्षण से नहीं गुज़रे—यानी ऐसे ईमानदार लोग, जिनमें बुद्धि और अंतर्दृष्टि का अभाव है—उन्हें मेरे राज्य में सामर्थ्य प्राप्त होगा। हालाँकि उन्हें काटा-छाँटा और तोड़ा गया है। वे प्रशिक्षण से नहीं गुज़रे, यह परम तथ्य नहीं है। बल्कि इन्हीं चीज़ों के माध्यम से मैं सभी को अपनी सर्वशक्तिमत्ता और अपनी बुद्धि दिखाऊँगा। मैं उन सभी को निकाल बाहर करूँगा, जो अभी भी मुझ पर संदेह करते हैं; मैं उनमें से किसी एक को भी नहीं चाहता (मैं उन लोगों से घृणा करता हूँ, जो ऐसे समय में भी मुझ पर संदेह करते हैं)। उन क्रियाकलापों के माध्यम से, जो मैं पूरे ब्रह्मांड में करता हूँ, मैं ईमानदार लोगों को अपने कर्मों की अद्भुतता दिखाऊँगा, जिससे उनकी बुद्धि, अंतर्दृष्टि और विवेक में वृद्धि होगी। मैं अपने अद्भुत कर्मों के परिणामस्वरूप धोखेबाज लोगों को एक ही पल में नष्ट कर दूँगा। मेरा नाम सबसे पहले स्वीकार करने वाले सभी पहलौठे पुत्र (यानी वे पवित्र और निष्कलंक, ईमानदार लोग) ही सबसे पहले राज्य में प्रवेश करेंगे और मेरे साथ असंख्य राष्ट्रों और सभी लोगों पर शासन करेंगे, और राज्य में राजाओं की तरह राज करेंगे तथा असंख्य राष्ट्रों और सभी लोगों का न्याय करेंगे (यह राज्य में सभी पहलौठे पुत्रों को संदर्भित करता है, किसी और को नहीं)। असंख्य राष्ट्रों और लोगों में से जो न्याय किए जाने के बाद पश्चात्ताप कर चुके हैं, वे मेरे राज्य में प्रवेश करेंगे और मेरे लोग बन जाएँगे, जबकि जो जिद्दी हैं और जिनमें पश्चात्ताप नहीं है, वे अथाह कुंड में फेंक दिए जाएँगे (हमेशा के लिए नष्ट होने हेतु)। राज्य में न्याय अंतिम होगा, और यह दुनिया की मेरी ओर से पूरी सफ़ाई होगी। उसके पश्चात् कोई अन्याय, दुःख, आँसू या आहें नहीं होंगी, और यहाँ तक कि कोई दुनिया भी नहीं रहेगी। सब कुछ मसीह की अभिव्यक्ति होगा, और सब मसीह का राज्य होगा। ऐसी महिमा होगी! ऐसी महिमा होगी!

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, आरंभ में मसीह के कथन, अध्याय 79

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 236

अब मैं तुम लोगों के लिए अपने प्रशासनिक आदेशों की घोषणा करता हूँ (जो घोषणा के दिन से प्रभावी होंगे और भिन्न-भिन्न लोगों को भिन्न-भिन्न ताड़नाएँ देंगे) :

मैं अपने वादे पूरे करता हूँ, और सब-कुछ मेरे हाथों में है : जो कोई भी संदेह करेगा, वह निश्चित रूप से मारा जाएगा। किसी भी लिहाज के लिए कोई जगह नहीं है; वे तुरंत नष्ट कर दिए जाएँगे, जिससे मेरे हृदय को नफ़रत से छुटकारा मिलेगा। (अब से यह पुष्टि की जाती है कि जो कोई भी मारा जाता है, वह मेरे राज्य का सदस्य बिलकुल नहीं होगा, और वह अवश्य ही शैतान का वंशज होगा।)

ज्येष्ठ पुत्रों के रूप में तुम लोगों को अपनी खुद की स्थिति को बनाए रखना चाहिए और अपने कर्तव्य अच्छी तरह से पूरे करने चाहिए, और दखलंदाज नहीं बनना चाहिए। तुम लोगों को मेरी प्रबंधन योजना के लिए खुद को अर्पित कर देना चाहिए, हर जगह जहाँ भी तुम जाओ, तुम्हें मेरी अच्छी गवाही देनी चाहिए और मेरे नाम को महिमा-मंडित करना चाहिए। शर्मनाक कृत्य मत करो; मेरे सभी पुत्रों और मेरे लोगों के लिए उदाहरण बनो। एक पल के लिए भी पथभ्रष्ट मत होओ : तुम्हें सभी के सामने हमेशा मेरे ज्येष्ठ पुत्रों की पहचान के साथ दिखाई देना चाहिए, और गुलाम न बनो; बल्कि तुम्हें सिर ऊँचा करके आगे बढ़ना चाहिए। मैं तुम लोगों से अपने नाम को महिमा-मंडित करने के लिए कह रहा हूँ, उसे अपमानित करने के लिए नहीं। जो लोग मेरे ज्येष्ठ पुत्र हैं, उनमें से प्रत्येक का अपना व्यक्तिगत कार्य है, और वे हर चीज़ नहीं कर सकते। यह वह ज़िम्मेदारी है, जो मैंने तुम लोगों को दी है, और इससे जी नहीं चुराना है। तुम लोगों को स्वयं को अपने पूरे हृदय से, अपने पूरे मन से और अपनी पूरी शक्ति से उस काम को पूरा करने के लिए समर्पित करना चाहिए, जो मैंने तुम्हें सौंपा है।

इस दिन से आगे, समस्त ब्रह्मांडीय दुनिया में मेरे सभी पुत्रों और मेरे सभी लोगों की चरवाही करने का कर्तव्य पूरा करने के लिए मेरे ज्येष्ठ पुत्रों को सौंपा जाएगा, और जो कोई भी अपने पूरे हृदय और पूरे मन से उसे पूरा नहीं कर सकेगा, मैं उसे ताड़ना दूँगा। यह मेरी धार्मिकता है। मैं अपने ज्येष्ठ पुत्रों को क्षमा नहीं करूँगा, न ही उनके साथ नरमी बरतूँगा।

यदि मेरे पुत्रों या मेरे लोगों में से कोई मेरे ज्येष्ठ पुत्रों में से किसी का उपहास और अपमान करता है, तो मैं उसे कठोर दंड दूँगा, क्योंकि मेरे ज्येष्ठ पुत्र स्वयं मेरा प्रतिनिधित्व करते हैं; कोई उनके साथ जो करता है, वह मेरे साथ भी करता है। यह मेरे प्रशासनिक आदेशों में से सबसे गंभीर आदेश है। मेरे पुत्रों और मेरे लोगों में से जो कोई भी इस आदेश का उल्लंघन करेगा, उसके विरुद्ध मैं अपने ज्येष्ठ पुत्रों को उनकी इच्छाओं के अनुसार अपनी धार्मिकता लागू करने दूँगा।

मैं धीरे-धीरे उस व्यक्ति का परित्याग कर कर दूँगा, जो मेरे साथ ओछेपन से पेश आता है और केवल मेरे भोजन, कपड़े और नींद पर ध्यान केंद्रित करता है; केवल मेरे बाह्य मामलों पर ध्यान देता है और मेरे बोझ का विचार नहीं करता; और अपने स्वयं के कार्य सही ढंग से पूरे करने पर ध्यान नहीं देता। यह निर्देश उन सभी के लिए है, जिनके कान हैं।

जो कोई भी मेरे लिए सेवा करने का काम समाप्त कर लेता है, उसे बिना किसी उपद्रव के, आज्ञाकारी ढंग से अलग हो जाना चाहिए। सावधान रहो, मैं तुम्हें बाहर कर दूँगा। (यह एक पूरक आदेश है।)

अब से मेरे ज्येष्ठ पुत्र लोहे की छड़ी उठाएँगे और सभी राष्ट्रों और लोगों पर शासन करने के लिए, सभी राष्ट्रों और लोगों के बीच चलने के लिए, और सभी राष्ट्रों और लोगों के बीच मेरे न्याय, धार्मिकता और प्रताप को कार्यान्वित करने के लिए मेरे अधिकार को निष्पादित करना शुरू करेंगे। मेरे पुत्र और मेरे लोग मुझसे डरेंगे, बिना रुके मेरी स्तुति, मेरी जयजयकार और मेरा महिमा-मंडन करेंगे, क्योंकि मेरी प्रबंधन योजना पूरी हो गई है और मेरे ज्येष्ठ पुत्र मेरे साथ शासन कर सकते हैं।

यह मेरे प्रशासनिक आदेशों का एक हिस्सा है; इसके बाद जैसे-जैसे काम आगे बढ़ेगा, मैं तुम लोगों को उनके बारे में बताऊँगा। उपर्युक्त प्रशासनिक आदेशों से तुम लोग उस गति को देखोगे, जिससे मैं अपना कार्य करता हूँ, और उस कदम को देखोगे, जहाँ तक मेरा कार्य पहुँच चुका है। यह एक पुष्टि होगी।

मैं पहले ही शैतान का न्याय कर चुका हूँ। चूँकि मेरी इच्छा अबाधित है, और चूँकि मेरे ज्येष्ठ पुत्रों ने मेरे साथ महिमा पाई है, इसलिए मैंने पहले ही दुनिया पर और शैतान से संबंधित सभी चीज़ों पर अपनी धार्मिकता और प्रताप का प्रयोग कर लिया है। मैं शैतान की तरफ एक उँगली तक नहीं उठाता या उसकी तरफ बिलकुल ध्यान नहीं देता (क्योंकि वह मुझसे बात करने लायक भी नहीं है)। मैं बस वह करता रहता हूँ, जो मैं करना चाहता हूँ। मेरा कार्य सुचारु रूप से कदम-दर-कदम आगे बढ़ता है, और मेरी इच्छा सारी धरती पर अबाधित है। इसने शैतान को एक सीमा तक शर्मिंदा कर दिया है, और उसे पूरी तरह से नष्ट कर दिया गया है, लेकिन यह मेरे इरादों पर खरा नहीं उतरा है। मैं अपने ज्येष्ठ पुत्रों को अपने प्रशासनिक आदेश उन पर भी कार्यान्वित करने की अनुमति देता हूँ। एक ओर तो मैं शैतान को अपना कोप देखने देता हूँ, और दूसरी ओर मैं उसे अपनी महिमा देखने देता हूँ (देखो कि मेरे ज्येष्ठ पुत्र शैतान को दिए गए अपमान के ज़बरदस्त गवाह हैं)। मैं उसे व्यक्तिगत रूप से दंड नहीं देता, बल्कि अपने ज्येष्ठ पुत्रों को अपनी धार्मिकता और प्रताप को कार्यान्वित करने देता हूँ। चूँकि शैतान मेरे पुत्रों के साथ दुर्व्यवहार करता था, मेरे पुत्रों को सताता था और मेरे पुत्रों का दमन करता था, अतः आज जब उसका काम पूरा हो गया है, तो मैं अपने परिपक्व ज्येष्ठ पुत्रों को उससे निपटने देता हूँ। इस पतन के सामने शैतान शक्तिहीन रहा है। दुनिया के सभी राष्ट्रों का पक्षाघात इसकी सबसे अच्छी गवाही है; आपस में लड़ते हुए लोग और युद्धरत राष्ट्र शैतान के राज्य के ढहने की प्रकट अभिव्यक्तियाँ हैं। मेरे द्वारा पहले कोई चिह्न और चमत्कार न दिखाया जाना शैतान को अपमानित करने और अपने नाम को उत्तरोत्तर महिमा-मंडित करने के लिए था। जब शैतान पूरी तरह खत्म हो जाता है, तब मैं अपना सामर्थ्य दिखाना शुरू करता हूँ : मैं जो भी कहता हूँ वह साकार हो जाता है, और वे अलौकिक चीज़ें जो मानवीय धारणाओं के अनुरूप नहीं हैं, पूरी हों जाएँगी (यह शीघ्र ही आने वाले आशीषों को संदर्भित करता है)। चूँकि मैं स्वयं व्यावहारिक परमेश्वर हूँ और मेरे पास कोई नियम नहीं हैं, और चूँकि मैं अपनी प्रबंधन योजना में होने वाले बदलावों के अनुसार बोलता हूँ, इसलिए अतीत में मैंने जो कुछ कहा, उसका वर्तमान में लागू होना ज़रूरी नहीं है। अपनी धारणाओं से चिपके मत रहो! मैं नियमों का पालन करने वाला परमेश्वर नहीं हूँ; मेरे साथ हर चीज़ स्वतंत्र, उत्कृष्ट और पूरी तरह मुक्त है। शायद कल जो कहा गया था, वह आज पुराना पड़ गया हो, या आज उसे अलग कर दिया जाए (लेकिन मेरे प्रशासनिक आदेश, जब से घोषित हुए हैं, कभी नहीं बदलेंगे)। ये मेरी प्रबंधन योजना के कदम हैं। विनियमों से चिपके मत रहो। हर दिन नया प्रकाश होता है, नए प्रकटीकरण होते हैं, और यह मेरी योजना है। हर दिन मेरा प्रकाश तुम में प्रकट होगा, और मेरी वाणी ब्रह्मांड की दुनिया में जारी की जाएगी। समझे तुम? यह तेरा कर्तव्य है, यह वह उत्तरदायित्व है जो मैंने तुम्हें सौंपा है। तुम्हें एक पल के लिए भी इसकी उपेक्षा नहीं करनी चाहिए। जिन लोगों का मैं अनुमोदन करूँगा, उनका मैं अंत तक उपयोग करूँगा, और यह कभी नहीं बदलेगा। चूँकि मैं सर्वशक्तिमान परमेश्वर हूँ, इसलिए मुझे पता है कि किस तरह के व्यक्ति को क्या कार्य करना चाहिए, और किस प्रकार का व्यक्ति क्या करने में सक्षम है। यह मेरी सर्वशक्तिमत्ता है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, आरंभ में मसीह के कथन, अध्याय 88

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 237

हर एक वाक्य जो मैं कहता हूँ, उसमें अधिकार और न्याय होता है, और कोई मेरे वचनों को बदल नहीं सकता। एक बार जब मेरे वचन निर्गत हो जाते हैं, तो चीज़ें मेरे वचनों के अनुसार संपन्न होनी निश्चित हैं; यह मेरा स्वभाव है। मेरे वचन अधिकार हैं और जो कोई उन्हें संशोधित करता है, वह मेरी ताड़ना को अपमानित करता है, और मुझे उन्हें मार गिराना होगा। गंभीर मामलों में वे अपने जीवन पर बरबादी लाते हैं और वे अधोलोक में या अथाह गड्ढे में जाते हैं। यही एकमात्र तरीका है, जिससे मैं मानवजाति से निपटता हूँ, और मनुष्य के पास इसे बदलने का कोई तरीका नहीं है—यह मेरा प्रशासनिक आदेश है। इसे याद रखना! किसी को भी मेरे आदेश का उल्लंघन करने की अनुमति नहीं है; चीज़ें मेरे इरादों के अनुसार की जानी चाहिए! अतीत में, मैं तुम लोगों के प्रति बहुत नरम था और तुमने केवल मेरे वचनों का सामना किया था। लोगों को मार गिराने के बारे में मैंने जो वचन बोले थे, वे अभी तक घटित नहीं हुए हैं। किंतु आज से, उन सभी लोगों पर सभी आपदाएँ (मेरे प्रशासनिक आदेशों से संबंधित) एक-एक करके पड़ेंगी, जो मेरे इरादों से मेल नहीं खाते हैं। तथ्यों का आगमन अवश्य होना चाहिए—अन्यथा लोग मेरे कोप को देखने में सक्षम नहीं होंगे, बल्कि बार-बार व्यभिचार में लिप्त होंगे। यह मेरी प्रबंधन योजना का एक चरण है, और यह वह तरीका है, जिससे मैं अपने कार्य का अगला चरण करता हूँ। मैं तुम लोगों से यह अग्रिम रूप से कहता हूँ, ताकि तुम लोग सदैव के लिए अपराध करने और नरक-यंत्रणा भुगतने से बच सको। अर्थात्, आज से मैं अपने ज्येष्ठ पुत्रों को छोड़कर सभी लोगों को मेरे इरादों के अनुसार अपनी उचित जगह लेने के लिए मजबूर कर दूँगा, और मैं उन्हें एक-एक करके ताड़ना दूँगा। मैं उनमें से एक को भी दोषमुक्त नहीं करूँगा। तुम लोग ज़रा फिर से लंपट होने की हिम्मत तो करो! तुम लोग ज़रा फिर से विद्रोही होने की हिम्मत तो करो! मैं पहले कह चुका हूँ कि मैं सभी के लिए धार्मिक हूँ, कि मुझमें भावना का लेशमात्र भी नहीं है, जो यह दिखाता है कि मेरे स्वभाव को ठेस नहीं पहुँचाई जानी चाहिए। यह मेरा व्यक्तित्व है। इसे कोई नहीं बदल सकता। सभी लोग मेरे वचनों को सुनते हैं और सभी लोग मेरे गौरवशाली चेहरे को देखते हैं। सभी लोगों को पूर्णतया और सर्वथा मेरे प्रति समर्पण करना चाहिए—यह मेरा प्रशासनिक आदेश है। पूरे ब्रह्मांड में और पृथ्वी के छोरों तक सभी लोगों को मेरी प्रशंसा करनी चाहिए और मुझे गौरवान्वित करना चाहिए, क्योंकि मैं स्वयं अद्वितीय परमेश्वर हूँ, क्योंकि मैं परमेश्वर का व्यक्तित्व हूँ। कोई मेरे वचनों और कथनों को, मेरे भाषण और तौर-तरीकों को नहीं बदल सकता, क्योंकि ये केवल मेरे अपने मामले हैं, और ये वे चीज़ें हैं, जो मुझमें प्राचीनतम काल से हैं और हमेशा रहेंगी।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, आरंभ में मसीह के कथन, अध्याय 100

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 238

मेरा योजनाबद्ध कार्य पल भर भी रुके बिना आगे बढ़ता रहता है। राज्य के युग में रहने लगने के बाद, और तुम लोगों को अपने लोगों के रूप में अपने राज्य में ले जाने के बाद, मेरी तुम लोगों से अन्य माँगें होंगी; अर्थात्, मैं तुम लोगों के सामने उस संविधान को लागू करना आरंभ करूँगा जिसके साथ मैं इस युग पर शासन करूँगा :

चूँकि तुम सभी मेरे लोग कहलाते हो, इसलिए तुम्हें इस योग्य होना चाहिए कि मेरे नाम को महिमामंडित कर सको; अर्थात्, परीक्षण के बीच गवाही दे सको। यदि कोई मुझे मनाने की कोशिश करता है और मुझसे सच छुपाता है, या मेरी पीठ पीछे अपकीर्तिकर व्यवहार करता है, तो ऐसे लोगों को, बिना किसी छूट के मेरे घर से खदेड़ और बाहर निकाल दिया जाएगा ताकि वे इस बात के लिए मेरा इंतज़ार करें कि मैं उनसे कैसे निपटूँगा। अतीत में जो लोग मेरे प्रति विश्वासघाती रहे हैं और संतान की भांति नहीं रहे हैं, और आज फिर से खुलकर मेरी आलोचना करने के लिए उठ खड़े हुए हैं, उन्हें भी मेरे घर से खदेड़ दिया जाएगा। जो मेरे लोग हैं उन्हें लगातार मेरी ज़िम्मेदारियों के प्रति चिंता दर्शानी चाहिए और साथ ही मेरे वचनों को जानने की खोज करते रहना चाहिए। केवल इस तरह के लोगों को ही मैं प्रबुद्ध करूँगा, और वे निश्चित रूप से, कभी भी ताड़ना को प्राप्त न करते हुए, मेरे मार्गदर्शन और प्रबुद्धता के अधीन रहेंगे। जो मेरी ज़िम्‍मेदारियों के प्रति चिंता दर्शाने में असफल रहते हुए, अपने खुद के भविष्य की योजना बनाने पर ध्यान केन्द्रित करते हैं—अर्थात् वे जो अपने कार्यों के द्वारा मेरे हृदय को संतुष्ट करने का लक्ष्य नहीं रखते हैं, बल्कि इसके बजाय भोजन, धन, आदि सामान की तलाश में रहते हैं, मैं इन भिखारी-जैसे प्राणियों का उपयोग करने से पूरी तरह इनकार करता हूँ, क्योंकि वे जब से पैदा हुए हैं, वे बिल्कुल नहीं जानते कि मेरी ज़िम्मेदारियों के प्रति चिंता दर्शाने के मायने क्या हैं। वे ऐसे लोग हैं जिनमें सामान्य समझ का अभाव है; ऐसे लोग मस्तिष्क के “कुपोषण” से पीड़ित हैं, और उन्हें कुछ “पोषण” पाने के लिए घर जाने की आवश्यकता है। मेरे लिए ऐसे लोग किसी काम के नहीं हैं। जो मेरे लोग हैं उनमें से प्रत्येक को, मुझे अंत तक वैसे अनिवार्य कर्तव्य के रूप में जानना जरूरी होगा जैसे कि खाना, पहनना, सोना, जिसे कोई एक पल के लिए भी भूलता नहीं, ताकि अंत में, मुझे जानना खाना खाने जितनी जानी-पहचानी चीज़ बन जाए, जिसे तुम सहजतापूर्वक अभ्यस्त हाथों से करते हो। जहाँ तक उन वचनों की बात है जो मैं बोलता हूँ, तो प्रत्येक शब्द को अत्यधिक निष्ठा और पूरी तरह से आत्मसात करते हुए ग्रहण करना चाहिए; इसमें अन्यमनस्क ढंग से किए गए आधे-अधूरे प्रयास नहीं हो सकते हैं। जो कोई भी मेरे वचनों पर ध्यान नहीं देता है, उसे सीधे मेरा विरोध करने वाला माना जाएगा; जो कोई भी मेरे वचनों को नहीं खाता, या उन्हें जानने की इच्छा नहीं करता है, उसे मुझ पर ध्यान नहीं देने वाला माना जाएगा, और उसे मेरे घर के द्वार से सीधे बाहर कर दिया जाएगा। ऐसा इसलिए है, जैसा कि मैंने अतीत में कहा है, कि मैं जो चाहता हूँ, वह यह नहीं है कि बड़ी संख्या में लोग हों, बल्कि उत्कृष्टता हो। सौ लोगों में से, यदि कोई एक भी मेरे वचनों के द्वारा मुझे जानने में सक्षम है, तो मैं इस एक व्यक्ति को प्रबुद्ध और रोशन करने पर ध्यान केंद्रित करने के लिए अन्य सभी को स्वेछा से हटा दूँगा। इससे तुम देख सकते हो कि यह अनिवार्य रूप से सत्य नहीं है कि बड़ी संख्या ही मुझे अभिव्यक्त कर सकती है, और मुझे जी सकती है। मैं गेहूँ (चाहे दाने पूरे भरे न हों) चाहता हूँ, न कि जंगली दाने (चाहे उसमें दाने इतने भरे हों कि मन प्रसन्न हो जाए)। उन लोगों के लिए जो तलाश करने की परवाह नहीं करते हैं, बल्कि इसके बजाय शिथिलता से व्यवहार करते हैं, उन्हें स्‍वेच्‍छा से चले जाना चाहिए; मैं उन्हें अब और देखना नहीं चाहता हूँ, अन्‍यथा वे मेरे नाम को अपमानित करते रहेंगे।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन, अध्याय 5

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 239

चूँकि तुम मेरे घराने के लोगों में हो और मेरे राज्य में निष्ठावान हो, इसलिए तुम जो भी करते हो उसमें उन मानकों को पूरा करो जिनकी मैं अपेक्षा करता हूँ। मैं यह नहीं कहता कि तुम केवल एक घुमक्कड़ बादल बनकर रह जाओ, बल्कि चमकती हुई बर्फ़ के समान बनो, उसका सार और उससे भी बढ़कर, उसका मूल्य धारण करो। क्योंकि मैं पवित्र भूमि से हूँ, मैं कमल के समान नहीं, जिसके पास केवल एक नाम है, कोई सार नहीं क्योंकि वह कीचड़ में होता है न कि पवित्र भूमि में। जिस समय एक नया स्वर्ग पृथ्वी पर उतरता है और एक नई पृथ्वी आसमान पर फैल जाती है, उसी समय मैं भी औपचारिक रूप से मनुष्यों के बीच कार्य करता हूँ। इंसानों के बीच मुझे कौन जानता है? किसने मेरे आगमन के समय को देखा था? किसने देखा है कि मेरे पास न केवल एक नाम है, बल्कि, मुझमें सार भी है? मैं अपने हाथ से सफ़ेद बादलों को हटाता हूँ और नज़दीक से आसमान का अवलोकन करता हूँ; अंतरिक्ष में ऐसा कुछ भी नहीं जिसे मेरे हाथ ने व्यवस्थित न किया हो, और उसके नीचे ऐसा कोई भी नहीं, जो मेरे पराक्रमी उद्यम को पूरा करने में अपना थोड़ा-बहुत योगदान नहीं देता हो। मैं पृथ्वी पर लोगों से कष्टसाध्य माँगें नहीं करता, क्योंकि मैं हमेशा से व्यावहारिक परमेश्वर रहा हूँ, और सर्वशक्तिमान हूँ जिसने मनुष्य की रचना की है और जो उन्हें अच्छी तरह जानता है। सभी लोग सर्वशक्तिमान की आँखों के सामने हैं। जो लोग पृथ्वी के दूरस्थ कोनों में रहते हैं, वो मेरी आत्मा द्वारा की गई जाँच से कैसे बच सकते हैं? यद्यपि लोग मेरी आत्मा को “जानते” हैं, फिर भी वो मेरी आत्मा को नाराज़ करते हैं। मेरे वचन लोगों के कुरुप चेहरों के साथ-साथ उनके अंतरतम में छिपे विचारों को भी प्रकट कर पृथ्वी पर सभी को मेरे प्रकाश से स्पष्ट दिखते हैं और मेरी जाँच में गिर पड़ते हैं। हालांकि गिर पड़ने के बावजूद, उनके हृदय मुझसे दूर नहीं जा पाते। सृजित प्राणियों में कौन है, जो मेरे कार्यों के फलस्वरूप मुझसे प्रेम नहीं करने लगता? कौन है जो मेरे वचनों के फलस्वरूप मेरे लिए नहीं तरसता? मेरे प्रेम के कारण किसके हृदय में अनुराग की भावनाएँ पैदा नहीं होतीं? शैतान की भ्रष्टता के कारण ही मनुष्य उस स्थिति तक नहीं पहुँच पाता जिसकी मैं अपेक्षा रखता हूँ। यहां तक कि मेरे द्वारा अपेक्षित निम्नतम मानकों की वजह से भी लोगों में आशंकाएं पैदा हो जाती हैं, आज का तो क्या कहें—जब इस युग में शैतान हंगामा खड़ा कर देता है और बुरी तरह से निरंकुश हो जाता है—या जब शैतान लोगों को इस क़द्र कुचल देता है कि उनके शरीर पूरी तरह गंदगी में सन जाते हैं। ऐसा कब हुआ है जब इंसान अपनी अनैतिकता की वजह से मेरे हृदय का ध्यान रखने में नाकाम हुआ हो और मुझे दुःख नहीं पहुँचा हो? क्या ऐसा हो सकता है कि मैं शैतान पर तरस दिखाऊँ? क्या ऐसा हो सकता है कि मेरे प्रेम में मुझे ग़लत समझा गया हो? जब लोग मेरे खिलाफ विद्रोह करते हैं, तो मेरा हृदय चुपचाप रोता है; जब वे मेरा विरोध करते हैं, तो मैं उन्हें ताड़ना देता हूँ; जब मैं उन्हें बचाता हूँ और मृत्यु के बाद फिर से जीवित करता हूँ, तब मैं उन्हें बेहद सावधानी से पोषित करता हूँ; जब वे मुझे समर्पित होते हैं, तो मेरा दिल हल्का हो जाता है और मैं तुरंत स्वर्ग में और पृथ्वी पर और सभी चीज़ों में बड़े परिवर्तन होते महसूस करता हूँ। जब लोग मेरी स्तुति करते हैं, तो मैं कैसे उसका आनंद न उठाऊं? जब वे मेरी गवाही देते हैं और मेरे द्वारा प्राप्त कर लिए जाते हैं, तो मैं कैसे महिमा प्राप्त नहीं कर सकता? क्या ऐसा हो सकता है कि इंसान जैसे चाहे कार्य और व्यवहार करे और मैं उसे नियंत्रित और पोषित न करूँ? जब मैं दिशा-निर्देश प्रदान नहीं करता, तो लोग निष्क्रिय और निश्चल हो जाते हैं; इसके अलावा, मेरी पीठ पीछे, वे “प्रशंसनीय” गंदे लेन-देन में लिप्त हो जाते हैं। क्या तुम्हें लगता है कि जिस देह को मैंने ओढ़ रखा है, वह तुम्हारे चाल-चलन, तुम्हारे आचरण और तुम्हारे वचनों के बारे में कुछ नहीं जानती। कई वर्षों तक मैंने हवा और बारिश को सहा है, और मैंने मनुष्य के संसार की कड़वाहट का भी अनुभव किया है; हालांकि गहन चिंतन करने पर, कितना भी कष्ट क्यों न आए, लेकिन वो मेरे प्रति इंसान के अंदर निराशा पैदा नहीं कर सकते, कोई भी मधुरता मनुष्यों को मेरे प्रति उदासीन, हताश या उपेक्षापूर्ण होने का कारण तो बिलकुल नहीं बन सकती। क्या मेरे लिए उनका प्रेम वास्तव में पीड़ा की कमी या फिर मिठास की कमी तक ही सीमित है?

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन, अध्याय 9

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 240

आज, चूँकि मैं तुम लोगों को इस स्थिति तक ले आया हूँ, इसलिए मैंने उपयुक्त व्यवस्थाएँ की हैं, और मेरे स्वयं के लक्ष्य हैं। यदि मैं तुम लोगों को आज उनके बारे में बताता, तो क्या तुम लोग उन्हें सच में जानने में समर्थ हो पाते? मैं मनुष्य के मन के विचारों और मनुष्य के हृदय की इच्छाओं से भली-भांति परिचित हूँ : कौन है जिसने ख़ुद के लिए कभी बचने का तरीका नहीं खोजा? कौन है जिसने कभी अपने लिए संभावनाओं के बारे में नहीं सोचा? फिर भी भले ही मनुष्य के पास विचारों की बहुलता और प्राचुर्य है, पर कौन इस भविष्यवाणी में समर्थ था कि हजारों सालों के बाद, वर्तमान जैसा हो गया है वैसा होगा? क्या यह वास्तव में तुम्हारे व्यक्तिनिष्ठ प्रयासों का परिणाम है? क्या यही तुम्हारे संघर्ष का प्रतिदान है? क्या यह तुम्हारे मन में परिकल्पित सुंदर झाँकी है? यदि मैंने संपूर्ण मनुष्यजाति का मार्गदर्शन नहीं किया होता, तो कौन स्वयं को मेरी व्यवस्थाओं से अलग करने और कोई अन्य तरीका ढूँढ़ने में समर्थ हो पाता? क्या मनुष्यों की कल्पनाएँ और इच्छाएँ उसे आज यहाँ तक लेकर आई हैं? बहुत-से लोगों का संपूर्ण जीवन उनकी इच्छाएँ पूरी हुए बिना ही बीत जाता है। क्या यह वास्तव में उनकी सोच में किसी दोष की वजह से होता है? बहुत-से लोगों का जीवन अप्रत्याशित खुशी और संतुष्टि से भरा होता है। क्या यह वास्तव में इसलिए है क्योंकि वे बहुत कम अपेक्षा रखते हैं? संपूर्ण मानवजाति में कौन है जिसकी सर्वशक्तिमान की नजरों में देखभाल नहीं की जाती? कौन सर्वशक्तिमान के पूर्व-निर्धारण के बीच नहीं जीता है? क्या मनुष्य का जीवन और मृत्यु उसका अपना चुनाव है? क्या मनुष्य अपने भाग्य को खुद नियंत्रित करता है? बहुत-से लोग मृत्यु को पुकारते हैं, फिर भी वह उनसे काफी दूर रहती है; बहुत-से लोग जीवन में मजबूत बनना चाहते हैं और मृत्यु से डरते हैं, फिर भी उनकी जानकारी के बिना, उनकी मृत्यु का दिन निकट आ जाता है, उन्हें मृत्यु की खाई में डुबा देता है; बहुत-से लोग आसमान की ओर देखते हैं और गहरी आह भरते हैं; कई लोग अत्यधिक रोते हैं, दर्दनाक आवाज में सिसकते हैं; कई लोग परीक्षणों के बीच विफल हो जाते हैं; और कई प्रलोभन के बीच फाँस लिए जाते हैं। यद्यपि मैं मनुष्य को मुझे स्पष्ट रूप से निहारने की अनुमति देने के लिए व्यक्तिगत रूप से प्रकट नहीं होता, तब भी बहुत-से लोग मेरा चेहरा देखने से भयभीत होते हैं, बेहद डरते हैं कि मैं उन्हें मार गिराऊँगा, या मैं उन्हें नष्ट कर दूँगा। क्या मनुष्य वास्तव में मुझे जानता भी है या नहीं? कोई भी निश्चित रूप से नहीं कह सकता। क्या ऐसा नहीं है? तुम लोग मुझसे और मेरी ताड़ना से डरते हो, फिर भी तुम लोग खड़े होकर मेरा खुलकर विरोध करते हो और मेरी आलोचना करते हो। क्या यही बात नहीं है? मनुष्य ने मुझे कभी नहीं जाना है ऐसा इसलिए है क्योंकि उसने कभी भी मेरा चेहरा नहीं देखा या मेरी आवाज नहीं सुनी है। इसलिए, भले ही मैं मनुष्य के हृदय के भीतर हूँ, क्या ऐसा कोई है जिसके हृदय में मैं धुँधला और अस्पष्ट नहीं हूँ? क्या ऐसा कोई है जिसके हृदय में मैं पूरी तरह से स्पष्ट हूँ? वो लोग जो मेरे हैं, मैं उनके लिए इच्छा नहीं रखता कि वे भी मुझे अस्पष्टता और अपारदर्शिता से देखें, और इसीलिए मैंने इस महान कार्य को शुरू किया है।

मैं चुपचाप मनुष्यों के बीच आता हूँ, और फिर धीरे से चला जाता हूँ। क्या किसी ने कभी मुझे देखा है? क्या सूर्य अपनी दहकती हुई लपटों के कारण मुझे देख सकता है? क्या चन्द्रमा अपनी चमकदार स्पष्टता के कारण मुझे देख सकता है? क्या आकाश में अपनी स्थिति के कारण तारामंडल मुझे देख सकते हैं? जब मैं आता हूँ, तो मनुष्य को पता नहीं चलता, और सभी चीजें अनभिज्ञ रहती हैं और जब मैं जाता हूँ, तब भी मनुष्य बेख़बर रहता है। कौन मेरे लिए गवाही दे सकता है? क्या यह पृथ्वी पर लोगों द्वारा स्तुति हो सकती है? क्या यह जंगल में खिलने वाली कुमुदिनियाँ हो सकती हैं? क्या यह आकाश में उड़ने वाले पक्षी हैं? क्या यह पहाड़ों में गर्जना करने वाले शेर हैं? कोई भी पूरी तरह मेरे लिए गवाही नहीं दे सकता! कोई भी उस कार्य को नहीं कर सकता है जो मैं करूँगा! यदि उन्होंने इस कार्य को किया भी, तो उसका क्या प्रभाव होगा? हर दिन मैं बहुत-से लोगों के प्रत्येक कार्य को देखता हूँ, और हर दिन मैं बहुत-से लोगों के हृदय और मन की पड़ताल करता हूँ; कोई भी कभी भी मेरे न्याय से नहीं बचा है, और न ही कभी कोई मेरे न्याय की वास्तविकता से बच निकला है। मैं आसमानों से ऊपर हूँ और दूर से देखता हूँ : असंख्य लोग मेरे द्वारा मार गिराए जा चुके हैं, फिर भी, असंख्य लोग मेरी दया और करुणा के बीच रहते भी हैं। क्या तुम लोग भी इसी प्रकार की परिस्थितियों के बीच नहीं रहते?

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन, अध्याय 11

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 241

पृथ्वी पर मैं स्वयं व्यावहारिक परमेश्वर हूँ, जो मनुष्यों के हृदय में रहता है; स्वर्ग में मैं समस्त सृष्टि का संप्रभु हूँ। मैंने पर्वत चढ़े हैं और नदियाँ लाँघी हैं, और मैं मानवजाति के बीच से अंदर-बाहर प्रवाहित होता रहा हूँ। कौन स्वयं व्यावहारिक परमेश्वर का खुलेआम विरोध करने की हिम्मत करता है? कौन सर्वशक्तिमान की संप्रभुता से अलग होने का साहस करता है? कौन यह दृढ़ता से कहने का साहस करता है कि मैं असंदिग्ध रूप से स्वर्ग में हूँ? साथ ही, कौन यह दृढ़ता से कहने का साहस करता है कि मैं निर्विवाद रूप से पृथ्वी पर हूँ? समस्त मनुष्यों में से कोई भी उन स्थानों के बारे में स्पष्ट रूप से हर विवरण के साथ बताने में सक्षम नहीं है, जहाँ मैं रहता हूँ। क्या ऐसा हो सकता है कि जब मैं स्वर्ग में होता हूँ, तो मैं स्वयं अलौकिक परमेश्वर होता हूँ, और जब मैं पृथ्वी पर होता हूँ, तो मैं स्वयं व्यावहारिक परमेश्वर होता हूँ? मैं वाकई स्वयं व्यावहारिक परमेश्वर हूँ या नहीं, यह मेरे समस्त सृष्टि का संप्रभु होने से या इस तथ्य से कि मैं मानव-संसार की पीड़ा का अनुभव करता हूँ, निर्धारित नहीं किया जा सकता, है ना? अगर ऐसा होता, तो क्या मनुष्य समस्त आशाओं से परे अज्ञानी न होते? मैं स्वर्ग में हूँ, लेकिन मैं पृथ्वी पर भी हूँ; मैं सृष्टि की असंख्य वस्तुओं के बीच हूँ, और असंख्य लोगों के बीच भी हूँ। मनुष्य मुझे हर दिन छू सकते हैं; इतना ही नहीं, वे मुझे हर दिन देख सकते हैं। जहाँ तक मानवजाति का संबंध है, मैं उसे कभी-कभी छिपा हुआ और कभी-कभी दृश्यमान प्रतीत होता हूँ; कभी लगता है कि वास्तव में मेरा अस्तित्व है, फिर ऐसा भी लगता है कि मेरा अस्तित्व नहीं है। मुझमें मनुष्यजाति के लिए अज्ञेय रहस्य मौजूद हैं। यह ऐसा है, मानो सभी मनुष्य मुझमें और अधिक रहस्य खोजने के लिए मुझे सूक्ष्मदर्शी यंत्र से देख रहे हों, यह आशा करते हुए कि ऐसा करके वे अपने हृदय से उस असुखद अनुभूति को दूर कर सकेंगे। परंतु यदि वे एक्स-रे का भी उपयोग करें, तब भी मनुष्य कैसे मुझमें छिपे रहस्यों में से किसी का भी खुलासा कर सकेंगे?

जिस क्षण मेरे लोग मेरे कार्यों के परिणामस्वरूप मेरे साथ-साथ महिमा प्राप्त करेंगे, उस क्षण बड़े लाल अजगर की माँद उजागर कर दी जाएगी, सारा कीचड़ साफ कर दिया जाएगा और असंख्य वर्षों से जमा सारा दूषित जल मेरी दहकती आग में सूख जाएगा और उसका अस्तित्व नहीं रहेगा। इसके बाद बड़ा लाल अजगर आग और गंधक की झील में नष्ट हो जाएगा। क्या तुम लोग सच में मेरी प्रेमपूर्ण देखभाल के अधीन रहना चाहते हो ताकि बड़े लाल अजगर द्वारा छीन न लिए जाओ? क्या तुम लोग सचमुच इसके षड्यंत्रों से घृणा करते हो? कौन मेरे लिए मजबूत गवाही देने में सक्षम है? मेरे नाम के वास्ते, मेरे आत्मा के वास्ते, और मेरी समस्त प्रबंधन योजना के वास्ते, कौन अपने समस्त सामर्थ्य को अर्पित कर सकता है? आज, राज्य मनुष्यों के संसार में है और यह वह समय है, जब मैं व्यक्तिगत रूप से मनुष्यों के संसार में उतरा हूँ। यदि ऐसा न होता, तो क्या कोई है जो बिना किसी भय के मेरी ओर से युद्ध क्षेत्र में उतर सके? ताकि राज्य आकार ले सके, ताकि मेरा हृदय संतुष्ट हो सके, और इससे भी बढ़कर, ताकि मेरा दिन आ सके, ताकि वह समय आ सके जब सभी चीजें पुनर्जीवित हों और प्रचुर मात्रा में विकसित हों, ताकि मनुष्यों को पीड़ा के सागर से बचाया जा सके, ताकि आने वाला कल आ सके, और ताकि वह अद्भुत हो सके और फल-फूल सके तथा विकसित हो सके, और इतना ही नहीं, ताकि भविष्य का आनंद साकार हो सके, सभी मनुष्य मेरे लिए अपने आपको बलिदान करने में कोई कसर बाकी न रखते हुए अपनी संपूर्ण शक्ति से प्रयास कर रहे हैं। क्या यह इस बात का संकेत नहीं है कि विजय पहले ही मेरी हो चुकी है? क्या यह मेरी योजना के पूर्ण होने का चिह्न नहीं है?

लोग जितना अधिक अंत के दिनों में रहेंगे, उतना ही अधिक वे संसार का खालीपन महसूस करेंगे और उतना ही उनमें जीवन जीने का साहस कम हो जाएगा। इसी कारण से, असंख्य लोग निराशा से मर गए हैं, असंख्य अन्य लोग अपनी खोज में निराश हो गए हैं, और असंख्य अन्य लोग शैतान के हाथों अपने साथ छेड़छाड़ किए जाने की पीड़ा भोग रहे हैं। मैंने बहुत-से लोगों को बचाया है, बहुतों को राहत दी है, और कितनी ही बार, मनुष्यों के ज्योति खो देने पर मैं उन्हें वापस ज्योति के स्थान पर ले गया हूँ, ताकि ज्योति के भीतर वे मुझे जान सकें और खुशी के बीच मेरा आनंद ले सकें। मेरी ज्योति के आने की वजह से, मेरे राज्य में रहने वाले लोगों के हृदय में श्रद्धा बढ़ती है, क्योंकि मनुष्यों के लिए मैं प्रेम किया जाने वाला परमेश्वर हूँ—ऐसा परमेश्वर, जिससे मनुष्य अनुरक्त आसक्ति के साथ चिपकते हैं—और वे मेरे रूप की स्थायी छाप से भर जाते हैं। फिर भी, अंततः, कोई भी ऐसा नहीं है, जो समझता हो कि यह पवित्रात्मा का कार्य है, या देह की क्रिया है। इस अकेली चीज़ का विस्तार से अनुभव करने में लोगों को पूरा जीवन लग जाएगा। मनुष्यों ने अपने हृदय की अंतरतम गहराइयों में मुझे कभी भी तिरस्कृत नहीं किया है; बल्कि वे अपनी आत्मा की गहराई से मुझसे चिपकते हैं। मेरी बुद्धि उनकी सराहना को बढ़ाती है, जो अद्भुत कार्य मैं करता हूँ, वे उनकी आँखों के लिए एक दावत हैं, मेरे वचन उनके मन को हैरान करते हैं, फिर भी वे उन्हें बहुत प्यारे लगते हैं। मेरी व्यावहारिकता मनुष्य को चकित, भौचक्का और व्यग्र कर देती है, फिर भी वे उसे स्वीकार करने के लिए तैयार हैं। क्या मनुष्य वास्तव में ऐसा ही नहीं है?

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन, अध्याय 15

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 242

1. मनुष्य को स्वयं को बड़ा नहीं दिखाना चाहिए, न अपनी बड़ाई करनी चाहिए। उसे परमेश्वर की आराधना और बड़ाई करनी चाहिए।

2. वह सब कुछ करो जो परमेश्वर के कार्य के लिए लाभदायक है और ऐसा कुछ भी न करो जो परमेश्वर के कार्य के हितों के लिए हानिकारक हो। परमेश्वर के नाम, परमेश्वर की गवाही और परमेश्वर के कार्य की रक्षा करो।

3. परमेश्वर के घर में धन, भौतिक पदार्थ और समस्त संपत्ति ऐसी भेंटें हैं, जो मनुष्य द्वारा दी जानी चाहिए। इन भेंटों का आनंद याजक और परमेश्वर के अलावा अन्य कोई नहीं ले सकता, क्योंकि मनुष्य की भेंटें परमेश्वर के आनंद के लिए हैं और परमेश्वर इन भेंटों को केवल याजक के साथ साझा करता है; और उनके किसी भी अंश का आनंद उठाने के लिए अन्य कोई योग्य और पात्र नहीं है। मनुष्य की समस्त भेंटें (धन और आनंद लिए जा सकने योग्य भौतिक चीजों सहित) परमेश्वर को दी जाती हैं, मनुष्य को नहीं और इसलिए, इन चीजों का मनुष्य द्वारा आनंद नहीं लिया जाना चाहिए; यदि मनुष्य उनका आनंद उठाता है, तो वह इन भेंटों को चुरा रहा होगा। जो कोई भी ऐसा करता है वह यहूदा है, क्योंकि प्रभु के साथ विश्वासघात करने के अलावा, यहूदा ने बिना इजाजत थैली में रखा धन भी लिया था।

4. मनुष्य में भ्रष्ट स्वभाव हैं और उसके पास भावनाएँ अधिक हैं। इसलिए, परमेश्वर की सेवा के समय विपरीत लिंग के दो सदस्यों को अकेले एक साथ मिलकर काम करना पूरी तरह निषिद्ध है। जो भी ऐसा करते पाए जाते हैं, उन्हें बिना किसी अपवाद के निष्कासित कर दिया जाएगा।

5. परमेश्वर की आलोचना न करो और न परमेश्वर से संबंधित बातों पर यूँ ही चर्चा करो। वैसा करो, जैसा मनुष्य को करना चाहिए और वैसे बोलो जैसे मनुष्य को बोलना चाहिए, तुम अपनी सीमाओं को पार न करो और न अपनी सीमाओं का उल्लंघन करो। अपनी जुबान पर लगाम लगाओ और ध्यान दो कि कहाँ कदम रख रहे हो, ताकि परमेश्वर के स्वभाव को नाराज न कर बैठो।

6. वह करो जो मनुष्य द्वारा किया जाना चाहिए और अपने दायित्वों का पालन करो, अपने उत्तरदायित्वों को पूरा करो और अपने कर्तव्य को धारण करो। चूँकि तुम परमेश्वर में विश्वास करते हो, इसलिए तुम्हें परमेश्वर के कार्य में अपना योगदान देना चाहिए; यदि तुम नहीं देते हो, तो तुम परमेश्वर के वचनों को खाने और पीने के योग्य नहीं हो और परमेश्वर के घर में रहने के योग्य नहीं हो।

7. कलीसिया के कार्यों में और मामलों में परमेश्वर के प्रति समर्पण के अलावा, उस व्यक्ति के निर्देशों का हर चीज में पालन करो, जिसे पवित्र आत्मा उपयोग करता है। जरा-सा भी उल्लंघन अस्वीकार्य है। अपने अनुपालन में एकदम पक्के रहो और सही या गलत का विश्लेषण न करो; क्या सही या गलत है, इससे तुम्हारा कोई लेना-देना नहीं। तुम्हें केवल पूर्ण समर्पण की चिंता करनी चाहिए।

8. जो लोग परमेश्वर में विश्वास करते हैं, उन्हें परमेश्वर के प्रति समर्पण करना चाहिए और उसकी आराधना करनी चाहिए। किसी व्यक्ति की बड़ाई मत करो, न किसी का आदर करो; परमेश्वर को पहले, जिनका आदर करते हो उन्हें दूसरे और खुद को तीसरे स्थान पर मत रखो। किसी भी व्यक्ति का तुम्हारे हृदय में कोई स्थान नहीं होना चाहिए और तुम्हें लोगों को—विशेषकर उन्हें जिन पर तुम श्रद्धा रखते हो—परमेश्वर के समतुल्य या उसके बराबर नहीं मानना चाहिए। यह परमेश्वर के लिए असहनीय है।

9. अपने विचार कलीसिया के कार्य पर लगाए रखो। अपनी देह की संभावनाएँ छोड़ दो, पारिवारिक मामलों के बारे में निर्णायक रहो, स्वयं को पूरे हृदय से परमेश्वर के कार्य में समर्पित करो और परमेश्वर के कार्य को पहले और अपने जीवन को दूसरे स्थान पर रखो। यह एक संत की शालीनता है।

10. सगे-संबंधी जो विश्वास नहीं रखते (तुम्हारे बच्चे, तुम्हारे पति या पत्नी, तुम्हारी बहनें या तुम्हारे माता-पिता इत्यादि) उन्हें कलीसिया में आने को बाध्य नहीं करना चाहिए। परमेश्वर के घर में सदस्यों की कमी नहीं है और ऐसे लोगों से इसकी संख्या बढ़ाने की कोई आवश्यकता नहीं, जिनका कोई उपयोग नहीं है। वे सभी जो खुशी-खुशी विश्वास नहीं करते, उन्हें कलीसिया में बिल्कुल नहीं ले जाना चाहिए। यह आदेश सब लोगों पर निर्देशित है। तुम लोगों को इस मामले में एक-दूसरे को रोकना चाहिए, एक-दूसरे का पर्यवेक्षण करना चाहिए और एक-दूसरे को याद दिलानी चाहिए; कोई भी इसका उल्लंघन नहीं कर सकता। यहाँ तक कि जब ऐसे सगे-संबंधी जो विश्वास नहीं करते, अनिच्छा से कलीसिया में प्रवेश करते हैं, उन्हें किताबें जारी नहीं की जानी चाहिए या नया नाम नहीं देना चाहिए; ऐसे लोग परमेश्वर के घर के नहीं हैं और कलीसिया में उनके प्रवेश पर जैसे भी जरूरी हो, रोक लगाई जानी चाहिए। यदि राक्षसों के आक्रमण के कारण कलीसिया पर मुसीबत आती है, तो तुम निष्कासित कर दिए जाओगे या तुम पर प्रतिबंध लगा दिए जाएँगे। संक्षेप में, इस मामले में हरेक का उत्तरदायित्व है, हालाँकि तुम्हें लापरवाह नहीं होना चाहिए, न ही इसका इस्तेमाल निजी बदला लेने के लिए करना चाहिए।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, दस प्रशासनिक आदेश जो राज्य के युग में परमेश्वर के चुने हुए लोगों द्वारा पालन किए जाने चाहिए

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 243

लोगों को उन अनेक कर्तव्यों का पालन करना होगा, जो उन्हें अवश्य संपन्न करने चाहिए। यही वह चीज है, जिसका लोगों द्वारा दृढ़ता से पालन किया जाना चाहिए, और यही वह चीज है, जिसे उन्हें अवश्य संपन्न करना चाहिए। पवित्र आत्मा को वह करने दो, जो पवित्र आत्मा द्वारा किया जाना चाहिए; मनुष्य इसमें कोई भूमिका नहीं निभा सकता। मनुष्य को उस बात का पालन करना चाहिए, जिसे मनुष्य द्वारा किया जाना आवश्यक है, जिसका पवित्र आत्मा से कोई संबंध नहीं है। यह उसके अतिरिक्त कुछ नहीं है, जो मनुष्य द्वारा किया जाना चाहिए, और जिसका आज्ञा के रूप में पालन किया जाना चाहिए, ठीक उसी तरह, जैसे पुराने विधान की व्यवस्था का पालन किया जाता है। यद्यपि अब व्यवस्था का युग नहीं है, फिर भी ऐसे कई वचन हैं, जो व्यवस्था के युग में बोले गए वचनों जैसे हैं, और जिनका पालन किया जाना चाहिए। इन वचनों का पालन केवल पवित्र आत्मा के स्पर्श पर भरोसा करके नहीं किया जाता, बल्कि ये ऐसी बातें हैं, जिनका मनुष्य द्वारा पालन किया जाना चाहिए। उदाहरण के लिए :

तुम व्यावहारिक परमेश्वर के कार्य की आलोचना नहीं करोगे।

तुम उस मनुष्य का विरोध नहीं करोगे, जिसकी परमेश्वर द्वारा गवाही दी गई है।

परमेश्वर के सामने तुम लोग अपने स्थान पर रहोगे और स्वच्छंद नहीं होगे।

तुम्हें वाणी में संयत होना चाहिए, और तुम्हारे शब्द और काम उस व्यक्ति की व्यवस्थाओं के अनुसार होने चाहिए, जिसकी परमेश्वर द्वारा गवाही दी गई है।

तुम्हें परमेश्वर की गवाही का भय मानना चाहिए। तुम परमेश्वर के कार्य और उसके मुँह से निकले वचनों की उपेक्षा नहीं करोगे।

तुम परमेश्वर के वचनों के लहजे और लक्ष्यों की नकल नहीं करोगे।

बाहरी तौर से तुम लोग ऐसा कुछ नहीं करोगे, जो परमेश्वर द्वारा गवाही दिए गए व्यक्ति का प्रत्यक्ष रूप से विरोध करता हो।

ये वे चीजें हैं, जिनका प्रत्येक व्यक्ति को पालन करना चाहिए। प्रत्येक युग में परमेश्वर कई विनियम निर्दिष्ट करता है, जो व्यवस्थाओं के समान होते हैं और जिनका मनुष्य द्वारा पालन किया जाना होता है। इसके माध्यम से वह मनुष्य के स्वभाव पर अंकुश लगाता है और उसकी ईमानदारी का पता लगाता है। उदाहरण के लिए, पुराने विधान के युग के इन वचनों पर विचार करो, “तू अपने पिता और अपनी माता का आदर करना”। ये वचन आज लागू नहीं होते; उस समय ये मनुष्य के मात्र कुछ बाहरी स्वभाव पर अंकुश लगाते थे, और इनका उपयोग परमेश्वर में मनुष्य के विश्वास की ईमानदारी को प्रदर्शित करने के लिए किया जाता था। ये परमेश्वर पर विश्वास करने वालों का पहचान चिह्न भी थे। यद्यपि अब राज्य का युग है, फिर भी, अब भी बहुत-से ऐसे विनियम हैं, जिनका मनुष्य द्वारा पालन किया जाना आवश्यक है। अब अतीत के नियम लागू नहीं होते, और आज मनुष्य के करने के लिए और भी बहुत-से उपयुक्त अभ्यास हैं, जो आवश्यक हैं। इनमें पवित्र आत्मा का कार्य शामिल नहीं है और ये मनुष्य द्वारा ही किए जाने चाहिए।

अनुग्रह के युग में व्यवस्था के युग के बहुत-से अभ्यास हटा दिए गए थे, क्योंकि ये व्यवस्थाएँ उस समय के कार्य के लिए कोई खास कारगर नहीं थीं। उन्हें हटा दिए जाने के बाद कई ऐसे अभ्यास निर्धारित किए गए, जो उस युग के लिए उपयुक्त थे, और जो आज के बहुत-से विनियम बन चुके हैं। जब आज का परमेश्वर आया, तो इन विनियमों को हटा दिया गया और इनके अनुपालन की अब और आवश्यकता नहीं रही, और आज के कार्य के उपयुक्त कई अभ्यास निर्धारित किए गए। आज ये अभ्यास विनियम नहीं हैं, बल्कि इनका उद्देश्य परिणाम प्राप्त करना है; ये आज के लिए अनुकूल हैं—और कल शायद ये विनियम बन जाएँगे। कुल मिलाकर, तुम्हें उसका पालन करना चाहिए, जो आज के कार्य के लिए लाभदायक है। आने वाले कल पर ध्यान न दो : जो आज किया जाता है, वह आज के लिए होता है। हो सकता है, जब कल आए तो बेहतर अभ्यास हों, जिन्हें करने की तुम्हें आवश्यकता होगी—किंतु उस पर कोई ध्यान मत दो। इसकी बजाय, उसका पालन करो, जिसका आज पालन किया जाना चाहिए, ताकि परमेश्वर का विरोध करने से बचा जाए। आज मनुष्य के लिए निम्नलिखित बातों का पालन करने से अधिक महत्वपूर्ण कुछ भी नहीं है :

तुम उस परमेश्वर को फुसलाने की कोशिश नहीं करोगे जो तुम्हारी आँखों के सामने खड़ा है, न ही तुम उससे कुछ छिपाओगे।

तुम अपने सामने खड़े परमेश्वर के सम्मुख कोई गंदी या अहंकार से भरी बात नहीं कहोगे।

तुम परमेश्वर के भरोसे को जीतने के लिए अपनी मीठी और साफ़-सुथरी बातों से अपनी आँखों के सामने खड़े परमेश्वर को धोखा नहीं दोगे।

तुम परमेश्वर के सामने अनादर से व्यवहार नहीं करोगे। तुम परमेश्वर के मुख से बोले जाने वाले समस्त वचनों के प्रति समर्पण करोगे, और उनका प्रतिरोध, विरोध या प्रतिवाद नहीं करोगे।

तुम परमेश्वर के मुख से बोले गए वचनों की मनमाने ढंग से व्याख्या नहीं करोगे। तुम्हें अपनी जीभ को काबू में रखना चाहिए, ताकि इसके कारण तुम बुरे लोगों की कपटपूर्ण योजनाओं के शिकार न हो जाओ।

तुम्हें अपने क़दमों के प्रति सचेत रहना चाहिए, ताकि तुम परमेश्वर द्वारा तुम्हारे लिए निर्दिष्ट की गई सीमा का अतिक्रमण करने से बच सको, जो तुम्हारे द्वारा परमेश्वर की स्थिति में खड़े होने और अहंकार भरे शब्द बोलने का कारण बनेगा, जिससे तुम परमेश्वर की नजरों में घृणास्पद बन जाओगे।

तुम परमेश्वर के मुँह से निकले वचनों को लापरवाही से प्रसारित नहीं करोगे, ताकि कहीं ऐसा न हो कि दूसरे तुम्हारी हँसी उड़ाएँ और दानव तुम्हें मूर्ख बनाएँ।

तुम आज के परमेश्वर के समस्त कार्य के प्रति समर्पण करोगे। भले ही तुम इसे समझ न पाओ, तो भी तुम इसकी आलोचना नहीं करोगे; तुम केवल खोज और संगति कर सकते हो।

कोई भी व्यक्ति परमेश्वर के मूल स्थान का अतिक्रमण नहीं करेगा। तुम एक मनुष्य की हैसियत से आज के परमेश्वर की सेवा करने से अधिक कुछ नहीं कर सकते। तुम एक मनुष्य की हैसियत से आज के परमेश्वर को सिखा नहीं सकते—ऐसा करना गलत है।

कोई भी व्यक्ति परमेश्वर द्वारा गवाही दिए गए व्यक्ति के स्थान पर खड़ा नहीं हो सकता; अपने शब्दों, कार्यों, और अंतर्तम विचारों में तुम मनुष्य की हैसियत में खड़े हो। इसका पालन किया जाना आवश्यक है, यह मनुष्य का उत्तरदायित्व है, और इसे कोई बदल नहीं सकता; ऐसा न करना प्रशासनिक आदेशों का उल्लंघन होगा। यह सभी को स्मरण रखना चाहिए।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, नए युग की आज्ञाएँ

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 244

बहुत-सी चीजें हैं, जिन्हें तुम लोगों द्वारा हासिल किए जाने की मैं आशा करता हूँ, लेकिन तुम्हारे कुछ कार्य, तुम्हारे जीवन की कुछ बातें मेरी अपेक्षाएँ पूरी करने में समर्थ नहीं हैं, इसलिए सीधे मुद्दे पर आकर अपने इरादे तुम्हें बताने के अलावा मेरे पास और कोई चारा नहीं है। यह देखते हुए कि चीजों को पहचानने की तुम्हारी क्षमता कमजोर है और वैसे ही चीज़ों को समझने की तुम्हारी क्षमता भी है, तुम लोग मेरे स्वभाव और सार से लगभग पूरी तरह से अनजान हो—इसलिए यह अत्यावश्यक बात है कि मैं उनके बारे में तुम लोगों को सूचित करूँ। चाहे तुमने पहले कितना भी समझा हो, चाहे तुम इन मुद्दों को समझने के इच्छुक हो या नहीं, फिर भी मुझे उनके बारे में तुम्हें विस्तारपूर्वक बताना होगा। ये मुद्दे तुम लोगों के लिए बहुत अपरिचित नहीं हैं, फिर भी तुम लोग इनमें निहित अर्थ की अधिक समझ, उससे अधिक परिचय नहीं रखते। तुममें से बहुतों के पास इनकी केवल कुछ धुँधली-सी समझ है, जो कि आंशिक और अधूरी है। तुम लोगों की सत्य का बेहतर ढंग से अभ्यास करने—मेरे वचनों का बेहतर ढंग से अभ्यास करने में मदद करने के लिए, मुझे लगता है कि ये ऐसे मुद्दे हैं, जिनसे तुम लोगों को सबसे पहले अवगत होना चाहिए। वरना तुम लोगों का विश्वास अस्पष्ट, पाखंडयुक्त, और धर्म के बाह्य रूपों से भरा होगा। अगर तुम परमेश्वर के स्वभाव को नहीं समझते, तो तुम्हारे लिए उस काम को करना असंभव होगा, जो तुम्हें उसके लिए करना चाहिए। अगर तुम परमेश्वर के सार को नहीं जानते, तो तुम्हारे लिए उसका भय और खौफ मानना असंभव होगा; इसके बजाय, तुम केवल बेपरवाह ढंग से यंत्रवत् काम करोगे, वाक्छल करोगे, और इससे भी अधिक, सुधारी न जा सकने वाली ईश-निंदा करोगे। हालाँकि परमेश्वर के स्वभाव को समझना वास्तव में महत्वपूर्ण है, और परमेश्वर का सार जानने को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, फिर भी किसी ने इन मुद्दों का गंभीरता से परीक्षण नहीं किया है या कोई इनकी गहराई में नहीं गया है। यह स्पष्ट देखा जा सकता है कि तुम सब लोगों ने मेरे द्वारा दिए गए सभी प्रशासनिक आदेशों की उपेक्षा की है। अगर तुम लोग परमेश्वर के स्वभाव को नहीं समझते, तो बहुत संभव है कि तुम उसके स्वभाव को ठेस पहुँचा दो। उसके स्वभाव को ठेस पहुँचाना स्वयं परमेश्वर के क्रोध को भड़काने के समान है, और उस स्थिति में तुम्हारे कार्यों का अंतिम परिणाम प्रशासनिक आदेशों का उल्लंघन होगा। अब तुम्हें समझ जाना चाहिए कि जब तुम परमेश्वर के सार को जान जाते हो, तो तुम उसके स्वभाव को भी समझ सकते हो—और जब तुम उसके स्वभाव को समझ जाते हो, तो तुम उसके प्रशासनिक आदेशों को भी समझ जाते हो। कहने की आवश्यकता नहीं कि प्रशासनिक आदेशों में जो निहित है, उसमें से काफी कुछ परमेश्वर के स्वभाव से जुड़ा है, किंतु उसका संपूर्ण स्वभाव प्रशासनिक आदेशों में व्यक्त नहीं किया जाता; अतः तुम लोगों को परमेश्वर के स्वभाव की समझ और ज्यादा विकसित करने के लिए एक कदम और आगे बढ़ना चाहिए।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के स्वभाव को समझना बहुत महत्वपूर्ण है

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 245

परमेश्वर का स्वभाव एक ऐसा विषय है, जो सबको बहुत अमूर्त लगता है, और इतना ही नहीं, लोगों के लिए इसे स्वीकार करना आसान नहीं है, क्योंकि उसका स्वभाव मनुष्यों के व्यक्तित्व के समान नहीं है। परमेश्वर में भी आनंद, क्रोध, दुःख और खुशी की भावनाएँ होती हैं, किंतु ये भावनाएँ मनुष्यों की भावनाओं से अलग हैं। स्वयं परमेश्वर के पास अपने गुण और अस्तित्व है। जो कुछ वह व्यक्त और प्रकट करता है, वह उसके अपने सार और उसकी अपनी पहचान को दर्शाता है। परमेश्वर के पास जो है और जो वह स्वयं है, उसके साथ ही यह सार और पहचान ऐसी चीजें हैं, जिनका स्थान कोई मनुष्य नहीं ले सकता है। उसके स्वभाव में मानवजाति के प्रति उसका प्रेम, मानवजाति के प्रति उसकी दिलासा, मानवजाति के प्रति उसकी नफरत और इससे भी बढ़कर, मानवजाति के बारे में उसकी संपूर्ण समझ शामिल है। जबकि मनुष्य का व्यक्तित्व उल्लासपूर्ण, जीवंत या निष्ठुर हो सकता है। परमेश्वर का स्वभाव वह है जो सभी चीजों और जीवित प्राणियों के संप्रभु के पास होता है; यह वह है जो सृष्टिकर्ता के पास होता है। उसका स्वभाव सम्माननीयता, सामर्थ्य, कुलीनता, महानता और सबसे बढ़कर, सर्वोच्चता को दर्शाता है। उसका स्वभाव अधिकार का प्रतीक है, उस सबका प्रतीक है जो न्यायोचित है, उस सबका प्रतीक है जो सुंदर और अच्छा है। इससे भी बढ़कर, उसका स्वभाव अंधकार या किसी शत्रु-बल से परास्त होने या आक्रमण होने के विरुद्ध सुरक्षा का प्रतीक है, साथ ही यह किसी सृजित प्राणी से अपमानित होने (और अपमान न सहने) के प्रति सुरक्षा का प्रतीक है। उसका स्वभाव सर्वोच्च सामर्थ्य का प्रतीक है। कोई एक या अधिक व्यक्ति उसके कार्य या उसके स्वभाव को बाधित नहीं कर सकते। किंतु मनुष्य का व्यक्तित्व पशुओं से थोड़ा बेहतर होने के प्रतीक से अधिक कुछ नहीं है। मनुष्य के पास या उसका अपना कोई अधिकार नहीं है, कोई स्वायत्तता नहीं है, अपना अतिक्रमण करने की योग्यता नहीं है, बल्कि अपने सार में वह ऐसा है जो हर प्रकार के व्यक्तियों, घटनाओं और वस्तुओं के नियंत्रण में निर्बलतापूर्वक रहता है। परमेश्वर का आनंद न्याय और प्रकाश की उपस्थिति और आविर्भाव के कारण है; अंधकार और बुराई के विनाश के कारण है। उसका आनंद उसके द्वारा मानवजाति के लिए प्रकाश और अच्छा जीवन लाने के कारण है; उसका आनंद न्यायसंगत आनंद है, वह हर सकारात्मक चीज के अस्तित्व का प्रतीक है, और इससे भी बढ़कर, वह मंगल का प्रतीक है। परमेश्वर का क्रोध उसकी मानवजाति को नुकसान पहुँचाने वाली अन्यायपूर्ण चीजों के अस्तित्व और विघ्न-बाधा के कारण है; बुराई और अंधकार के अस्तित्व के कारण है, और ऐसी चीजों के अस्तित्व के कारण है जो सत्य को निकाल बाहर करती हैं, और इनसे भी बढ़कर, उन चीजों के अस्तित्व के कारण है जो अच्छे और सुंदर का विरोध करती हैं। उसका क्रोध इस बात का प्रतीक है कि सभी नकारात्मक चीजें अब अस्तित्व में नहीं हैं, और इससे भी बढ़कर, यह उसकी अंतर्निहित पवित्रता का प्रतीक है। उसका दुःख मानवजाति के कारण है, जिसके लिए उसकी आशाएँ हैं, किंतु जो अंधकार में गिर गई है, ऐसा इसलिए है कि जो कार्य वह मनुष्यों पर करता है, वह उसके इरादों पर खरा नहीं उतर रहा है, जिस मानवजाति से वह प्रेम करता है, उसके सभी मनुष्य रोशनी में नहीं जी सकते। वह मासूम मानवजाति के लिए, ईमानदार किंतु अज्ञानी मनुष्य के लिए, उस मनुष्य के लिए जो अच्छा तो है लेकिन जिसमें अपने स्वतंत्र दृष्टिकोणों की कमी है, दुःख अनुभव करता है। उसका दुःख उसकी अच्छाई और दया का प्रतीक है, सुंदरता और दयालुता का प्रतीक है। उसकी प्रसन्नता बेशक अपने शत्रुओं को हराने और मनुष्यों का सच्चा विश्वास प्राप्त करने से आती है। इससे भी बढ़कर, यह सभी शत्रु शक्तियों के निष्कासन और विनाश से आती है और मनुष्यों द्वारा अच्छा और शांतिपूर्ण जीवन प्राप्त करने से उत्पन्न होती है। परमेश्वर की प्रसन्नता मनुष्य के आनंद के समान नहीं है; बल्कि यह अच्छे फल प्राप्त करने का एहसास है, ऐसा एहसास जो आनंद से भी बढ़कर है। उसकी प्रसन्नता अब से मानवजाति के कष्ट मुक्त होने की प्रतीक है और मानवजाति के प्रकाश के संसार में प्रवेश करने की प्रतीक है। दूसरी ओर, मनुष्यों की समस्त भावनाएँ उनके अपने हितों की खातिर उपजती हैं, न कि न्याय, प्रकाश, या उसके लिए जो कि सुंदर है, और स्वर्ग द्वारा प्रदत्त अनुग्रह के लिए तो और भी नहीं। मानवजाति की भावनाएँ स्वार्थी हैं, वे अंधकार के संसार में रहती हैं और वे परमेश्वर की इच्छा की खातिर नहीं पैदा होतीं; परमेश्वर की योजना के लिए तो बिल्कुल नहीं होतीं। इसलिए मनुष्य और परमेश्वर की तुलना कभी नहीं की जा सकती। परमेश्वर हमेशा सर्वोच्च और हमेशा आदरणीय है, जबकि मनुष्य हमेशा नीच और हमेशा निकम्मा है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि परमेश्वर हमेशा खुद को मनुष्यों के लिए समर्पित करता है और खपाता है, जबकि मनुष्य हमेशा अपने लिए माँगता और प्रयास करता है। परमेश्वर सदा से मानवजाति के अस्तित्व के लिए कठिन प्रयास कर रहा है, लेकिन मनुष्य कभी भी न्याय या प्रकाश की खातिर कोई योगदान नहीं करता, और अगर मनुष्य कोई क्षणिक प्रयास करता भी है, तो भी वह हलके-से झटके का भी सामना नहीं कर सकता, क्योंकि मनुष्य का प्रयास हमेशा अपने लिए होता है, दूसरों के लिए नहीं; मनुष्य हमेशा स्वार्थी होता है, जबकि परमेश्वर हमेशा निस्स्वार्थ होता है। परमेश्वर उस सबका स्रोत है जो न्यायसंगत, अच्छा और सुंदर है, जबकि मनुष्य वह है जो सारी कुरूपता और बुराई विरासत में पाता और अभिव्यक्त करता है। परमेश्वर अपने न्याय और सुंदरता के सार को कभी नहीं बदलेगा, जबकि मनुष्य किसी भी समय और किसी भी स्थान पर न्याय से विश्वासघात कर सकता है और परमेश्वर से दूरी बना सकता है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के स्वभाव को समझना बहुत महत्वपूर्ण है

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 246

मेरे द्वारा कहे गए हर वाक्य में परमेश्वर का स्वभाव निहित है। मेरे वचनों की ध्यान से जाँच करना तुम लोगों के लिए अच्छा होगा, और निश्चित ही तुम्हें उनसे बहुत लाभ होगा। परमेश्वर के सार को समझना बहुत कठिन है, किंतु मुझे विश्वास है कि तुम सभी को परमेश्वर के स्वभाव के बारे में कम से कम कुछ तो पता है। तो फिर, मैं आशा करता हूँ कि तुम लोगों के पास मुझे दिखाने के लिए तुम्हारे द्वारा की गई ऐसी ज्यादा चीजें होंगी, जो परमेश्वर के स्वभाव को अपमानित नहीं करतीं। तभी मैं आश्वस्त हो पाऊँगा। उदाहरण के लिए, परमेश्वर को हर समय अपने दिल में रखो। जब तुम कार्य करो, तो उसके वचनों के अनुसार करो। सभी चीजों में उसकी इच्छाओं की खोज करो, और ऐसा काम करने से बचो, जिससे परमेश्वर का अनादर और अपमान हो। अपने हृदय के भावी शून्य को भरने के लिए तुम्हें परमेश्वर की उपेक्षा तो बिल्कुल भी नहीं करनी चाहिए। अगर तुम ऐसा करोगे, तो तुम परमेश्वर के स्वभाव को नाराज़ करोगे। एक दूसरे उदाहरण में अगर तुम अपने पूरे जीवन में परमेश्वर के विरुद्ध कभी ईशनिंदा की टिप्पणी या शिकायत नहीं करते, या तुम अपने संपूर्ण जीवन में, जो कुछ उसने तुम्हें सौंपा है, उसे उचित रूप से करने में समर्थ हो, और साथ ही उसके सभी वचनों के प्रति समर्पित रहते हो, तो तुम प्रशासनिक आदेशों का उल्लंघन करने से बच जाओगे। उदाहरण के लिए, अगर तुमने कभी ऐसा कहा है, “मुझे ऐसा क्यों नहीं लगता कि वह परमेश्वर है?”, “मुझे लगता है कि ये शब्द पवित्र आत्मा के कुछ प्रबोधन से अधिक कुछ नहीं हैं,” “मेरी राय में, परमेश्वर जो कुछ करता है, जरूरी नहीं कि वह सब सही हो,” “परमेश्वर की मानवता मेरी मानवता से बढ़कर नहीं है,” “परमेश्वर के वचन विश्वास करने योग्य हैं ही नहीं,” या इस तरह की अन्य आलोचनात्मक टिप्पणियाँ, तो मैं तुम्हें अधिक बार अपने पापों को स्वीकार करने और पश्चात्ताप करने के लिए प्रोत्साहित करता हूँ। वरना तुम्हें क्षमा पाने का कभी अवसर नहीं मिलेगा, क्योंकि तुमने किसी मनुष्य को नाराज़ नहीं किया, बल्कि स्वयं परमेश्वर को नाराज़ किया है। तुम मान सकते हो कि तुम एक मनुष्य की आलोचना कर रहे हो, किंतु परमेश्वर का आत्मा इसे इस तरह नहीं देखता है। तुम्हारा उसके देह के प्रति अनादर उसका अनादर करने के बराबर है। ऐसा होने पर, क्या तुमने जो किया है उससे परमेश्वर के स्वभाव को नाराज़ नहीं किया है? तुम्हें याद रखना चाहिए कि जो कुछ भी परमेश्वर के आत्मा द्वारा किया जाता है, वह उसके देह में किए गए कार्य की सुरक्षा के लिए किया जाता है और इसलिए किया जाता है, ताकि उस कार्य को भली-भाँति किया जा सके। अगर तुम इसे नजरअंदाज करते हो, तो मैं कहता हूँ कि तुम वो शख्स हो, जो परमेश्वर पर विश्वास करने में कभी सफल नहीं हो पाएगा। चूँकि तुमने परमेश्वर का क्रोध भड़का दिया है, इसलिए वह तुम्हें सबक सिखाने के लिए उचित दंड देगा।

परमेश्वर के सार को जानना कोई मामूली बात नहीं है। तुम्हें उसके स्वभाव को समझना चाहिए। इस तरह से तुम धीरे-धीरे और अनजाने ही परमेश्वर के सार को जान जाओगे। जब तुम्हारे पास यह ज्ञान होगा तो तुम खुद को एक उच्चतर और अधिक सुंदर स्थिति में प्रवेश करता हुआ पाओगे। अंत में तुम अपनी घृणित आत्मा पर लज्जा महसूस करोगे, और इतना ही नहीं, तुम अपनी शक्ल दिखाने से भी लजाओगे। उस समय, तुम्हारे क्रियाकलापों में परमेश्वर के स्वभाव को नाराज करने वाली चीजें कम से कम होती चली जाएँगी, तुम्हारा हृदय परमेश्वर के हृदय के अधिकाधिक निकट होता जाएगा, और धीरे-धीरे तुम्हारे हृदय में उसके लिए प्रेम बढ़ता जाएगा। यह मानवजाति के सुंदर स्थिति में प्रवेश करने का चिह्न है। किंतु अभी तुम लोगों ने इसे प्राप्त नहीं किया है। तुम सब अपनी नियति के लिए दौड़ते रहते हो, ऐसे में परमेश्वर के सार को जानने का प्रयास करने का इरादा किसमें है? अगर यह जारी रहा, तो तुम लोग अनजाने ही प्रशासनिक आदेशों का उल्लंघन कर बैठोगे, क्योंकि तुम परमेश्वर के स्वभाव के बारे में बहुत ही कम जानते हो। तो क्या अब तुम लोग जो कर रहे हो, वो परमेश्वर के स्वभाव के विरुद्ध तुम्हारे अपराधों की नींव नहीं डाल रहा? मेरा तुमसे यह कहना कि तुम परमेश्वर के स्वभाव को समझो, मेरे कार्य से पृथक नहीं है। क्योंकि अगर तुम लोग बार-बार प्रशासनिक आदेशों का उल्लंघन करते रहोगे, तो तुममें से कौन दंड से बच पाएगा? तब क्या मेरा कार्य पूरी तरह व्यर्थ नहीं हो जाएगा? इसलिए, मैं अभी भी कहता हूँ कि अपने आचरण पर अंकुश रखने के अलावा, तुम जो कदम उठाते हो, उनमें सावधान रहो। तुम लोगों से मेरी यह उच्चतर अपेक्षा है, और मैं आशा करता हूँ कि तुम सब इस पर ध्यान से विचार करोगे और इससे गंभीरता से पेश आओगे। अगर कोई दिन ऐसा आया, जब तुम लोगों के कार्य मुझे प्रचंड रूप से क्रोधित कर दें, तब परिणाम सिर्फ तुम्हें ही भुगतने होंगे, और तुम लोगों के स्थान पर दंड भोगने वाला और कोई नहीं होगा।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के स्वभाव को समझना बहुत महत्वपूर्ण है

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 247

लोग कहते हैं, “परमेश्वर एक धार्मिक परमेश्वर है। अगर मनुष्य अंत तक उसका अनुसरण करता रहे, तो वह निश्चित रूप से मनुष्य के प्रति निष्पक्ष होगा, क्योंकि वह सबसे धार्मिक है। यदि मनुष्य अंत तक उसका अनुसरण करता रहे, तो क्या वह मनुष्य को दरकिनार कर सकता है?” मैं सभी लोगों के प्रति निष्पक्ष हूँ और सभी लोगों का न्याय अपने धार्मिक स्वभाव से करता हूँ, फिर भी मैं लोगों से जो अपेक्षाएँ रखता हूँ उन सबमें उचित शर्तें शामिल होती हैं, और मैं जो अपेक्षा करता हूँ वह सभी लोगों के लिए पूरा करना जरूरी है, चाहे वे कोई भी हों। मैं इसकी परवाह नहीं करता कि तुम कितने वरिष्ठ हो या कितने अनुभवी हो; मैं सिर्फ इसकी परवाह करता हूँ कि तुम मेरे मार्ग का अनुसरण कर रहे हो या नहीं, सत्य के लिए तुममें प्रेम और प्यास है या नहीं। यदि तुममें सत्य की कमी है, और इसकी बजाय तुम मेरे नाम का अनादर करते हो, और मेरे मार्ग के अनुसार क्रिया-कलाप नहीं करते हो, कोई परवाह या चिंता किए बगैर सिर्फ अनुसरण मात्र कर रहे हो, तो मैं उस समय तुम पर प्रहार करूँगा और तुम्हारी बुराई के लिए तुम्हें दंड दूँगा, तब तुम्हारे पास कहने के लिए क्या होगा? क्या तुम यह कह पाओगे कि परमेश्वर धार्मिक नहीं है? यदि तुमने आज मेरे द्वारा बोले गए सभी वचनों का पालन किया है, तो तुम एक ऐसे इंसान हो जिसे मैं स्वीकृति देता हूँ। तुम कहते हो कि तुमने परमेश्वर का अनुसरण करते हुए हमेशा पीड़ा सही है, कि तुमने तूफानों के बीच उसका अनुसरण किया है और उसके साथ अच्छा और बुरा समय बिताया है, लेकिन तुमने परमेश्वर द्वारा बोले गए वचनों को नहीं जिया है; तुम हर दिन सिर्फ परमेश्वर के लिए भाग-दौड़ करना और उसके लिए स्वयं को खपाना चाहते हो, तुमने कभी भी एक अर्थपूर्ण जीवन जीने के बारे में नहीं सोचा है। तुम यह भी कहते हो, “चाहे जो हो, मैं मानता हूँ कि परमेश्वर धार्मिक है। मैं उसके लिए पीड़ा सहता हूँ, उसके लिए भाग-दौड़ करता हूँ और अपने आपको उसे समर्पित करता हूँ, और भले ही मेरे पास कोई उपलब्धियाँ न हो, फिर भी मैंने कठिनाई सही है; वह निश्चित ही मुझे याद रखेगा।” यह सच है कि परमेश्वर धार्मिक है, फिर भी इस धार्मिकता पर किसी अशुद्धता का दाग नहीं है : इसमें कोई मानवीय इच्छा नहीं है, और यह देह या मानवीय लेन-देनों से दूषित नहीं है। जो लोग विद्रोही हैं और विरोध में हैं, जो उसके मार्ग का पालन नहीं करते हैं, उन सबको दंडित किया जाएगा; न तो किसी को क्षमा किया जाएगा, न ही किसी को बख्शा जाएगा! कुछ लोग कहते हैं, “आज मैं तुम्हारे लिए भाग-दौड़ करता हूँ; अंत में क्या तुम मुझे थोड़ा-सा आशीष दे सकते हो?” इसलिए मैं तुमसे पूछता हूँ, “क्या तुमने मेरे वचनों का पालन किया है?” तुम जिस धार्मिकता की बात करते हो, वह एक लेन-देन पर आधारित है। तुम केवल यह सोचते हो कि मैं धार्मिक हूँ, कि मैं सब लोगों के प्रति निष्पक्ष हूँ, और जो बिल्कुल अंत तक मेरा अनुसरण करेंगे वे सब निश्चित रूप से बचा लिए जाएँगे और मेरे आशीष प्राप्त करेंगे। “जो बिल्कुल अंत तक मेरा अनुसरण करेंगे वे सब निश्चित रूप से बचा लिए जाएँगे,” मेरे इन वचनों का एक आंतरिक अर्थ है : जो लोग बिल्कुल अंत तक मेरा अनुसरण करेंगे वे ऐसे लोग होंगे जिन्हें मेरे द्वारा पूरी तरह से प्राप्त कर लिया जाएगा, वे ऐसे लोग हैं जो मेरे द्वारा जीते जाने के बाद, सत्य खोजते हैं और जिन्हें पूर्ण बनाया जाता है। तुम कितनी अपेक्षाएँ पूरी कर चुके हो? तुमने केवल अंत तक मेरा अनुसरण करने की अपेक्षा पूरी की है, लेकिन और क्या? क्या तुमने मेरे वचनों का पालन किया है? तुमने मेरी पाँच अपेक्षाओं में से एक को पूरा किया है, लेकिन बाकी चार को पूरा करने का तुम्हारा कोई इरादा नहीं है। तुमने बस सबसे सरल और आसान रास्ता ढूँढ़ लिया है और भाग्यशाली होने की उम्मीद के रवैये के साथ अनुसरण किया है। तुम्हारे जैसे इंसान के लिए मेरे धार्मिक स्वभाव का अर्थ सिर्फ ताड़ना और न्याय और धार्मिक प्रतिफल है; इसका अर्थ है बुरा काम करने वाले सभी लोगों के लिए धार्मिक दंड। जो लोग मेरे मार्ग का अनुसरण नहीं करते हैं उन सबको निश्चित ही दंड दिया जाएगा, भले ही वे बिल्कुल अंत तक अनुसरण करते रहें। यह परमेश्वर की धार्मिकता है। जब यह धार्मिक स्वभाव मनुष्य के दंड में व्यक्त होता है, तो मनुष्य भौंचक्का रह जाता है, और उसे अफसोस होता है कि परमेश्वर का अनुसरण करते हुए उसने उसके मार्ग का अनुसरण क्यों नहीं किया। “उस समय, परमेश्वर का अनुसरण करते हुए मैंने केवल थोड़ा-सा ही कष्ट सहा, किंतु मैंने परमेश्वर के मार्ग का अनुसरण नहीं किया। इसके लिए क्या बहाने बनाये जा सकते हैं? ताड़ना दिए जाने के सिवाय और कोई विकल्प नहीं है!” फिर भी वह अपने मन में सोच रहा होता है, “जो भी हो, मैंने तेरा अंत तक अनुगमन किया है, अगर तू मुझे ताड़ना भी देगा, तो वह ताड़ना बहुत कठोर नहीं हो सकती, और मेरी ताड़ना करने के बाद भी तू मुझे चाहेगा। मैं जानता हूँ कि तू धार्मिक है, और तू हमेशा मेरे साथ इस प्रकार का व्यवहार नहीं करेगा। आखिरकार, मैं उनके समान नहीं हूँ जिन्हें मिटा दिया जाएगा; जो मिटा दिए जाएँगे, उन्हें कठोर ताड़ना मिलेगी, जबकि मेरी ताड़ना हल्की होगी।” परमेश्वर का धार्मिक स्वभाव वैसा नहीं है जैसा तुम कहते हो। ऐसा नहीं है कि जो लोग अपने पाप सही तरह से स्वीकारते हैं उनके साथ नरमी से निपटा जाता है। धार्मिकता पवित्रता है, और एक ऐसा स्वभाव है जो मनुष्य के द्वारा अपमान को सहन नहीं कर सकता, और वह सब कुछ जो अशुद्ध है और जो परिवर्तित नहीं हुआ है, वह परमेश्वर की घृणा का पात्र है। परमेश्वर का धार्मिक स्वभाव व्यवस्था नहीं, बल्कि प्रशासनिक आज्ञा है : यह राज्य के भीतर एक प्रशासनिक आज्ञा है, और यह प्रशासनिक आज्ञा हर उस व्यक्ति के लिए धार्मिक दंड है जिसमें सत्य नहीं है और जो परिवर्तित नहीं हुआ है, और जिसके उद्धार की कोई गुंजाइश नहीं है। क्योंकि जब प्रत्येक व्यक्ति को उसकी किस्म के अनुसार छाँटा जाएगा, तो अच्छे को पुरस्कार और बुरे को दंड दिया जाएगा। इसी समय मनुष्य के गंतव्य को भी प्रकट किया जाएगा; यह वह समय होगा जब उद्धार का कार्य भी समाप्त हो जाएगा, उसके बाद मनुष्य के उद्धार का कार्य नहीं किया जाएगा, और बुराई करने वाले हर इंसान को कठोर दंड दिया जाएगा।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, पतरस के अनुभव : ताड़ना और न्याय का उसका ज्ञान

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 248

मैं एक सर्वभक्षी अग्नि हूँ और मैं अपमान बरदाश्त नहीं करता। क्योंकि सभी मानव मेरे द्वारा बनाए गए थे, इसलिए मैं जो कुछ कहता और करता हूँ, उसके प्रति उन्हें समर्पण करना चाहिए और वे विरोध नहीं कर सकते। लोगों को मेरे कार्य में हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं है, और वे इस बात का विश्लेषण करने के योग्य तो बिल्कुल नहीं हैं कि मेरे कार्य और मेरे वचनों में क्या सही या गलत है। मैं सृष्टिकर्ता हूँ और सृजित प्राणियों को मेरा भय मानने वाले हृदय के साथ वह सब कुछ हासिल करना चाहिए, जिसकी मुझे अपेक्षा है; उन्हें मेरे साथ बहस नहीं करनी चाहिए, और विशेष रूप से उन्हें मेरा विरोध नहीं करना चाहिए। मैं अपने अधिकार के साथ अपने लोगों पर शासन करता हूँ और मेरे द्वारा बनाए गए सभी सृजित प्राणियों को मेरे अधिकार के प्रति समर्पण करना चाहिए। यद्यपि आज तुम लोग मेरे सामने दबंग और धृष्ट हो, यद्यपि तुम उन वचनों के खिलाफ विद्रोह करते हो जिनसे मैं तुम लोगों को शिक्षा देता हूँ और डरना नहीं जानते हो, फिर भी मैं तुम लोगों की विद्रोहशीलता का केवल सहिष्णुता से सामना करता हूँ; मैं केवल इसलिए गुस्से से आगबबूला नहीं होऊँगा कि छोटे, तुच्छ भुनगों ने गोबर में हलचल मचा दी है, क्योंकि ऐसा करना मेरे कार्य को प्रभावित होने देना होगा। मैं अपने पिता की इच्छा के लिए उन सभी चीजों के निरंतर अस्तित्व को सहता हूँ जिनसे मैं बेहद घृणा करता हूँ और उन सभी चीजों को भी जिनसे मैं नफरत करता हूँ; मैं अपने कथन पूरे होने तक, अपने अंतिम क्षण तक ऐसा करूँगा। चिंता मत करो! मैं किसी गुमनाम भुनगे के स्तर तक नहीं गिरूँगा और मैं अपने कौशल की तुम्हारे कौशल के साथ तुलना नहीं करूँगा। मैं तुमसे घृणा करता हूँ, किंतु मैं सहने में सक्षम हूँ। तुम मुझसे विद्रोह करते हो, किंतु तुम उस दिन से नहीं बच सकते, जब मैं तुम्हारी ताड़ना करूँगा, जिसका मेरे पिता ने मुझसे वादा किया है। क्या एक सृजित भुनगा सृष्टिकर्ता पर हावी हो सकता है? शरद ऋतु में झड़ते हुए पत्ते अपनी जड़ों की ओर लौट जाते हैं; तुम अपने “पिता” के घर लौट जाओगे, और मैं अपने पिता के पास लौट जाऊँगा। मेरे साथ मेरे पिता का कोमल स्नेह होगा, और तुम अपने पिता के द्वारा कुचले जाओगे। मेरे पास मेरे पिता की महिमा होगी, और तुम्हारे पास तुम्हारे पिता की शर्मिंदगी होगी। मैं उस ताड़ना का उपयोग करूँगा, जिसे मैंने तुम्हारा साथ देने के लिए लंबे समय से रोककर रखा है और तुम अपनी दुर्गंधयुक्त देह से, जो लाखों साल से भ्रष्ट हो चुकी है, मेरी ताड़ना का सामना करोगे। मैंने सहिष्णुता के साथ तुम पर वचनों के अपने कार्य का समापन कर लिया होगा और तुम मेरे वचनों में बोले गए हाय को भोगने की भूमिका निभाना शुरू करोगे। मैं इस्राएल में बहुत आनंदित होऊँगा और कार्य करूँगा; तुम रोओगे और अपने दाँत पीसोगे और कीचड़ में जीते और मरते रहोगे। मैं अपना मूल स्वरूप पुनः प्राप्त कर लूँगा और तुम्हारे साथ अब और गंदगी में नहीं रहूँगा, जबकि तुम अपनी मूल कुरूपता को पुनः प्राप्त कर लोगे और गोबर के ढेर के इर्द-गिर्द बिल बनाते रहोगे। जब मेरा कार्य और वचन पूरे हो जाएँगे, तो वह मेरे लिए खुशी का दिन होगा। जब तुम्हारा प्रतिरोध और विद्रोहशीलता पूरे हो जाएँगे, तो वह तुम्हारे लिए रोने का दिन होगा। मैं तुमसे सहानुभूति नहीं रखूँगा, और तुम मुझे पुनः कभी नहीं देखोगे। मैं तुम्हारे साथ और अधिक संवाद में संलग्न नहीं होऊँगा, और तुम्हारा मुझसे कभी सामना नहीं होगा। मैं तुम्हारी विद्रोहशीलता से नफरत करूँगा और तुम्हें मेरी मनोहरता याद आएगी। मैं तुम पर प्रहार करूँगा और तुम मुझे याद करोगे। मैं खुशी से तुमसे दूर चला जाऊँगा और तुम मेरे प्रति ऋणी महसूस करोगे। मैं तुम्हें फिर कभी नहीं देखूँगा, लेकिन तुम हमेशा मुझे देखने की आशा करोगे। मैं तुमसे नफ़रत करूँगा क्योंकि तुम वर्तमान में मेरा विरोध करते हो, और तुम्हें मेरी याद आएगी क्योंकि मैं वर्तमान में तुम्हें ताड़ना देता हूँ। मैं तुम्हारे साथ रहने का इच्छुक नहीं होऊँगा, लेकिन तुम इसके लिए बुरी तरह लालायित रहोगे और अनंत काल तक रोओगे, क्योंकि तुम्हें उस सबके लिए पछतावा होगा, जो तुमने मेरे साथ किया है। तुम्हें अपनी विद्रोहशीलता और अपने प्रतिरोध के लिए ग्लानि होगी, यहाँ तक कि तुम पछतावे में औंधे मुँह जमीन पर उल्टा लेट जाओगे, मेरे सामने गिर जाओगे और फिर कभी मुझसे विद्रोह न करने की कसम खाओगे। हालाँकि, अपने हृदय में तुम केवल मुझे प्यार करोगे, मगर तुम कभी भी मेरी आवाज नहीं सुन पाओगे। मैं तुम्हें तुमसे ही शर्मिंदा करवाऊँगा।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, जब झड़ते हुए पत्ते अपनी जड़ों की ओर लौटेंगे, तो तुम्हें अपनी की हुई सभी बुराइयों पर पछतावा होगा

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 249

मेरी दया उन पर अभिव्यक्त होती है जो मुझसे प्रेम करते हैं और स्वयं का त्याग करते हैं। इस बीच, कुकर्मियों को मिला दंड निश्चित रूप से मेरे धार्मिक स्वभाव का प्रमाण है, और उससे भी बढ़कर, मेरे क्रोध की गवाही है। जब आपदा आएगी, तो मेरा विरोध करने वाले सभी अकाल और महामारी के शिकार हो जाएँगे और विलाप करेंगे। जिन्होंने कई वर्षों तक मेरा अनुसरण किया है, लेकिन सभी तरह के बुरे कर्म किए हैं, वे अपने पापों का फल भुगतने से नहीं बचेंगे; वे भी लाखों वर्षों में कभी-कभार ही दिखने वाली आपदा में डुबा दिए जाएँगे, और वे लगातार आतंक और भय की स्थिति में जिएँगे। और मेरे वे अनुयायी, जिन्होंने मेरे प्रति परम निष्ठा दर्शाई है, वे आनंद लेंगे और गुणगान करेंगे, मेरी शक्ति की प्रशंसा करेंगे। वे बेफिक्र खुशी की अवर्णनीय मनोदशा का अनुभव करेंगे और ऐसे आनंद में रहेंगे जो मैंने मानवजाति को पहले कभी प्रदान नहीं किया है। क्योंकि मैं मनुष्य के अच्छे कर्मों को सँजोकर रखता हूँ और उसके बुरे कर्मों से घृणा करता हूँ। जबसे मैंने पहली बार मानवजाति की अगुआई करनी आरंभ की, तबसे मैं उत्सुकतापूर्वक मनुष्यों के ऐसे समूह को पाने की आशा करता रहा हूँ, जो मेरे साथ एकचित्त हों। इस बीच मैं उन लोगों को कभी नहीं भूलता, जो मेरे साथ एकचित्त नहीं हैं; अपने हृदय में मैं हमेशा उनसे नफरत करता हूँ, उन्हें बुरे कर्मों के जवाब देने को मजबूर करने के अवसर की प्रतीक्षा करता हूँ, जो कुछ ऐसा है जिसे देखकर मुझे खुशी होगी। अब अंततः मेरा दिन आ गया है, और मुझे अब और प्रतीक्षा करने की आवश्यकता नहीं है!

मेरा अंतिम कार्य केवल मनुष्यों को दंड देने के लिए ही नहीं है, बल्कि मनुष्य की मंजिल की व्यवस्था करने के लिए भी है। इससे भी अधिक, यह सभी लोगों से मेरे कर्म और कार्य स्वीकार करवाने की खातिर है। मैं हर एक मनुष्य को दिखा दूँगा कि जो कुछ मैंने किया है, वह सही है, और वह मेरे स्वभाव की अभिव्यक्ति है, कि यह मनुष्य का कार्य नहीं है, और प्रकृति तो वह बिल्कुल भी नहीं है जिसने मानवजाति की रचना की है, और इसके बजाय यह मैं हूँ जो सभी चीजों में हर जीव का पोषण करता है। मेरे अस्तित्व के बिना मानवजाति केवल नष्ट होगी और आपदा का दंड भोगेगी। कोई भी मानव फिर कभी सुंदर सूर्य और चंद्रमा या हरे-भरे संसार को नहीं देखेगा; मानवजाति केवल काली, शीत रात्रि और मृत्यु की छाया की निर्मम घाटी देखेगी। मैं ही मानवजाति का एकमात्र उद्धार हूँ। मैं ही मानवजाति की एकमात्र आशा हूँ, और इससे भी बढ़कर, मैं ही वह हूँ जिस पर संपूर्ण मानवजाति का अस्तित्व निर्भर करता है। मेरे बिना मानवजाति तुरंत अवरुद्ध हो जाएगी, मेरे बिना मानवजाति केवल बर्बाद कर देने वाला विनाश झेलेगी और सभी प्रकार के भूतों द्वारा कुचली जाएगी, इसके बावजूद कोई मुझ पर ध्यान नहीं देता। मैंने वह काम किया है जो किसी दूसरे के द्वारा नहीं किया जा सकता, और मैं केवल यह आशा करता हूँ कि मनुष्य कुछ अच्छे कर्मों से मुझे प्रतिफल दे सके। यद्यपि कुछ ही लोग मुझे प्रतिफल दे पाए हैं, फिर भी मैं मनुष्यों के संसार में अपनी यात्रा पूरी करूँगा और अपने उस कार्य का अगला कदम आरंभ करूँगा जो अभी खुलने वाला है, क्योंकि इन अनेक वर्षों में मनुष्यों के बीच मेरे आने-जाने की सारी भागदौड़ फलदायक रही है, और मैं अति प्रसन्न हूँ। मैं जिस चीज की परवाह करता हूँ, वह मनुष्यों की संख्या नहीं, बल्कि उनके अच्छे कर्म हैं। किसी भी स्थिति में, मैं आशा करता हूँ कि तुम लोग अपनी मंजिल के लिए पर्याप्त अच्छे कर्म तैयार करोगे। तभी मुझे संतुष्टि होगी; अन्यथा तुम लोगों में से कोई भी उस आपदा के हमले से नहीं बचेगा। आपदा मेरे द्वारा शुरू की जाती है और निश्चित रूप से मेरे द्वारा ही आयोजित की जाती है। यदि तुम लोग मेरी नजरों में अच्छे दिखाई नहीं दे सकते, तो तुम लोग आपदा भुगतने से नहीं बच सकते। क्लेश के बीच तुम लोगों के कार्य और कर्म पूरी तरह से उचित नहीं माने गए, क्योंकि तुम लोगों की आस्था और प्रेम खोखले थे और तुम लोगों ने स्वयं को केवल डरपोक या मजबूत दिखाया। इस संबंध में, मैं केवल भले या बुरे का ही न्याय करूँगा। मेरे लिए अब भी सबसे महत्वपूर्ण तुम लोगों में से प्रत्येक के क्रियाकलाप, कर्म और समस्त अभिव्यक्तियाँ ही हैं, जिनके आधार पर मैं तुम लोगों के परिणाम निर्धारित करूँगा। हालाँकि, मुझे यह स्पष्ट कर देना चाहिए : मैं उन लोगों पर अब और दया नहीं करूँगा, जिन्होंने क्लेश के समय में मेरे प्रति रत्ती भर भी निष्ठा नहीं दिखाई, क्योंकि मेरी दया का विस्तार केवल इतनी दूर तक ही है। इसके अतिरिक्त, मुझे ऐसा कोई इंसान पसंद नहीं जिसने कभी मेरे साथ विश्वासघात किया हो और ऐसे लोगों के साथ जुड़ना तो मुझे बिल्कुल भी पसंद नहीं जो अपने मित्रों के हितों के साथ गद्दारी करते हैं। चाहे जो भी व्यक्ति हो, मेरा यही स्वभाव है। मुझे तुम लोगों को यह बता देना चाहिए : जो कोई भी पूरी तरह से मेरा दिल तोड़ता है, उसे मुझसे दूसरी बार क्षमा नहीं मिलेगी, और जो कोई मेरे प्रति वफादार रहा है, वह सदैव मेरे दिल में रहेगा।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, अपनी मंजिल के लिए पर्याप्त अच्छे कर्म तैयार करो

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 250

जब परमेश्वर पृथ्वी पर आता है, तो वह संसार का नहीं होता है और संसार का आनंद लेने के लिए वह देह नहीं बनता है। जहाँ कहीं भी उसका कार्य उसके स्वभाव को प्रकट करता है और सबसे अधिक सार्थक होता है, वह उसी स्थान पर जन्म लेता है, फिर चाहे वह भूमि पवित्र हो या गंदी। वह चाहे कहीं भी कार्य करे, वह पवित्र है। दुनिया में सारी चीजें उसके द्वारा बनाई गई थीं, बात बस इतनी है कि वे शैतान द्वारा भ्रष्ट की जा चुकी हैं। लेकिन सभी चीजें अभी भी परमेश्वर की हैं; वे सभी चीजें उसके हाथों में हैं। वह अपनी पवित्रता प्रकट करने के लिए एक गंदी भूमि में आता है और वहाँ कार्य करता है; वह केवल अपने कार्य की खातिर ऐसा करता है, अर्थात् वह ऐसा कार्य करने के लिए अत्यधिक अपमान सहता है, केवल इस गंदी भूमि के लोगों को बचाने के लिए। यह गवाही की खातिर, पूरी मानवजाति की खातिर किया जाता है। ऐसा कार्य लोगों को जो दिखाता है वह है परमेश्वर की धार्मिकता और यह बेहतर ढंग से दिखा पाता है कि परमेश्वर सर्वोच्च है। उसकी महानता और सत्यनिष्ठा उन नीच लोगों के एक समूह के उद्धार में सटीक रूप से प्रकट होती हैं, जिनका अन्य लोग तिरस्कार करते हैं। एक गंदी भूमि में पैदा होना यह साबित नहीं करता कि वह निम्न है; यह तो बस सभी सृजित प्राणियों को उसकी महानता और मानवजाति के लिए उसका सच्चा प्यार देखने देता है। जितना अधिक वह ऐसा करता है, उतना ही अधिक यह मनुष्य के लिए उसके शुद्ध प्रेम, उसके दोषरहित प्रेम को प्रकट करता है। परमेश्वर पवित्र और धार्मिक है, भले ही वह एक गंदी भूमि में पैदा हुआ था और भले ही वह उन लोगों के साथ रहता है जो गंदगी से भरे हुए हैं, ठीक वैसे ही जैसे अनुग्रह के युग में यीशु पापियों के साथ रहता था। क्या उसके कार्य का हर अंश संपूर्ण मानवजाति के जीवित रहने की खातिर नहीं किया जाता? क्या यह सब इसीलिए नहीं है ताकि मानवजाति महान उद्धार प्राप्त कर सके? दो हजार साल पहले, वह अनेक वर्षों तक पापियों के साथ रहा। यह छुटकारे के वास्ते था। आज, वह घिनौने, निम्न लोगों के एक समूह के साथ रह रहा है। यह उद्धार के वास्ते है। क्या उसका सारा कार्य तुम मनुष्यों के लिए नहीं है? यदि मानवजाति को बचाने की बात न होती, तो वह एक चरनी में पैदा होने के बाद इतने वर्षों तक पापियों के साथ क्यों रहता और कष्ट सहता? और यदि मानवजाति को बचाने की बात न होती तो वह क्यों दूसरी बार देह में लौटता, क्यों इस भूमि पर जन्म लेता जहाँ दानव इकट्ठे होते हैं और क्यों इन लोगों के साथ रहता जो शैतान द्वारा गहराई से भ्रष्ट किए गए हैं? क्या परमेश्वर निष्ठापूर्ण नहीं है? उसके कार्य का कौन-सा हिस्सा मानवजाति के लिए नहीं रहा है? कौन-सा हिस्सा तुम्हारी नियति के लिए नहीं रहा है? परमेश्वर पवित्र है—यह अपरिवर्तनीय है! वह गंदगी से अदूषित है, भले ही वह एक घिनौनी भूमि में आया है; इस सब का केवल यही अर्थ हो सकता है कि मानवजाति के लिए परमेश्वर का प्रेम अत्यंत निःस्वार्थ है और वह जो पीड़ा और अपमान सहता है वह अत्यंत महान है! क्या तुम लोग यह नहीं जानते कि वह तुम सभी के लिए, और तुम लोगों की नियति के लिए जो अपमान सहता है, वह कितना बड़ा है? वह बड़े लोगों या अमीर और शक्तिशाली परिवारों के पुत्रों को बचाने के बजाय विशेष रूप से उनको बचाता है, जो दीन-हीन हैं और नीची निगाह से देखे जाते हैं। क्या यह सब उसकी पवित्रता नहीं है? क्या यह सब उसकी धार्मिकता नहीं है? समस्त मानवजाति के अस्तित्व के लिए वह स्वेच्छा से एक घिनौनी भूमि में पैदा हुआ और उसने हर अपमान सहा। परमेश्वर बहुत वास्तविक है—वह कोई मिथ्या कार्य नहीं करता। क्या उसके कार्य का हर चरण इतने व्यावहारिक रूप से नहीं किया गया है? यद्यपि सब लोग उसकी निंदा करते हैं और कहते हैं कि वह पापियों के साथ मेज पर बैठता है, यद्यपि सब लोग उसका मज़ाक उड़ाते हैं और कहते हैं कि वह गंदगी के पुत्रों के साथ रहता है, कि वह सबसे अधम लोगों के साथ रहता है, फिर भी वह निस्वार्थ रूप से अपने आपको समर्पित करता है और फिर भी उसे मानवजाति के बीच इस तरह नकारा जाता है। क्या जो कष्ट वह सहता है, वह तुम लोगों के कष्टों से बड़ा नहीं है? क्या जो कार्य वह करता है, वह तुम लोगों द्वारा चुकाई गई कीमत से ज्यादा नहीं है?

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, मोआब के वंशजों को बचाने का अर्थ

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 251

परमेश्वर ने स्वयं को इस स्तर तक विनम्र किया है कि वह अपना कार्य इन अशुद्ध और भ्रष्ट लोगों पर करता है, और लोगों के इस समूह को पूर्ण बनाता है। परमेश्वर न केवल लोगों के बीच रहने और खाने-पीने, लोगों की चरवाही करने और जो उनकी जरूरतें हैं, उन्हें प्रदान करने के लिए देहधारी हुआ है। बल्कि इससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह है कि वह उद्धार और विजय का अपना विशाल कार्य इन अत्यधिक भ्रष्ट लोगों पर करता है। वह इन सबसे अधिक भ्रष्ट लोगों को बचाने के लिए बड़े लाल अजगर के केंद्र में आया, जिससे सभी लोग परिवर्तित हो सकें और नए बनाए जा सकें। वह अत्यधिक कष्ट, जो परमेश्वर सहन करता है, मात्र वह कष्ट नहीं है जो वह देहधारी बनने में सहन करता है, अपितु सबसे बढ़कर वह परम निरादर है, जो परमेश्वर का आत्मा सहन करता है—वह स्वयं को इतना अधिक विनम्र बनाता है और इतना अधिक छिपाए रखता है कि वह एक साधारण व्यक्ति बन जाता है। परमेश्वर ने देहधारण किया और देह का रूप लिया, ताकि लोग देखें कि उसके पास सामान्य मानवीय जीवन है और सामान्य मानवीय जरूरतें भी हैं। यह इस बात को प्रमाणित करने के लिए पर्याप्त है कि परमेश्वर ने स्वयं को बेहद विनम्र बनाया है। परमेश्वर का आत्मा देह में साकार होता है। उसका आत्मा इतना सर्वोच्च और महान है, लेकिन फिर भी वह अपने आत्मा का कार्य करने के लिए एक साधारण मानव, एक मामूली मानव का रूप धारण करता है। तुममें से हरेक व्यक्ति की काबिलियत, अंतर्दृष्टि, विवेक, मानवता और जीवन के लिहाज से तुम सब वास्तव में परमेश्वर के इस प्रकार के कार्य को ग्रहण करने के अयोग्य हो और तुम लोग वास्तव में इस योग्य नहीं हो कि परमेश्वर तुम्हारे लिए यह कष्ट उठाए। परमेश्वर इतना ऊँचा है। वह इस हद तक सर्वोच्च है और लोग इस स्तर तक नीच हैं, फिर भी वह उन पर कार्य करता है। उसने लोगों का भरण-पोषण करने, उनसे बात करने के लिए न केवल देहधारण किया, वह उनके साथ रहता भी है। परमेश्वर इतना विनम्र, इतना प्यारा है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, केवल उन्हें ही पूर्ण बनाया जा सकता है जो अभ्यास पर ध्यान देते हैं

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 252

मानवजाति के लिए कार्य करने की खातिर परमेश्वर ने कई रातें बिना सोए गुजारी हैं। वह उच्चतम स्थान से लेकर अनंत गहराई तक जीते-जागते नरक में, जहाँ मनुष्य रहता है, वहाँ पृथ्वी के दोनों छोरों के बीच मनुष्य के साथ अपने दिन गुजारने के लिए उतर आया है, फिर भी उसने कभी मनुष्य के बीच पसरी मलिनता की शिकायत नहीं की है, मनुष्य के विद्रोहीपन के लिए कभी भी उसे फटकारा नहीं है, बल्कि वह स्वयं अपना कार्य करते हुए अत्यधिक अपमान सहन करता है। परमेश्वर नरक का कैसे हो सकता है? वह नरक में अपना जीवन कैसे बिता सकता है? लेकिन समस्त मानवजाति के लिए, ताकि पूरी मानवजाति को जल्द ही विश्राम मिल सके, उसने अपमान सहा है और पृथ्वी पर आने में अन्याय झेला है, और मनुष्य को बचाने की खातिर स्वयं “नरक” और “रसातल” में, बाघ की माँद में प्रवेश किया है। मनुष्य परमेश्वर का विरोध करने योग्य कैसे हो सकता है? परमेश्वर से शिकायत करने का उसके पास क्या कारण है? वह परमेश्वर के सामने जाने की हिम्मत कैसे कर सकता है? स्वर्ग का परमेश्वर व्यभिचार की इस सबसे घिनौनी भूमि में आया है, और कभी भी उसने अपनी शिकायतें जाहिर नहीं की, न ही मनुष्य के बारे में शिकायत की, बल्कि वह चुपचाप मनुष्य द्वारा कुचले जाने[1] और उसके अत्याचार को स्वीकार करता है। उसने कभी मनुष्य की अनुचित माँगों का प्रतिकार नहीं किया है, कभी भी उसने मनुष्य से अत्यधिक अपेक्षाएँ नहीं की हैं, और कभी भी उसने मनुष्य से अनुचित माँगें नहीं की हैं; वह, तमाम कठिनाइयाँ झेलते हुए और बिना शिकायत किए, बस मनुष्य की जरूरत के सभी कार्य करता है : शिक्षा देना, प्रबुद्ध करना, फटकारना, वचनों के माध्यम से शोधन करना, याद दिलाना, प्रोत्साहन देना, सांत्वना देना, न्याय करना और उजागर करना। उसका कौन-सा कदम मनुष्य के जीवन की खातिर नहीं है? यद्यपि उसने मनुष्यों की संभावनाओं और नियति को हटा दिया है, फिर भी परमेश्वर द्वारा उठाया गया कौन-सा कदम मनुष्य के भाग्य के लिए नहीं रहा है? उनमें से कौन-सा कदम मनुष्य के अस्तित्व के लिए नहीं रहा है? उनमें से कौन-सा कदम मनुष्य को इस कष्ट से और अँधेरी शक्तियों के अत्याचार से मुक्त कराने के लिए नहीं रहा है, जो इतनी काली हैं जितनी कि रात? उनमें से कौन-सा कदम मनुष्य की खातिर नहीं है? परमेश्वर के हृदय को, जो ममतामयी माँ के हृदय जैसा है, कौन समझ सकता है? परमेश्वर के उत्सुक हृदय को कौन समझ सकता है? परमेश्वर के उत्साही हृदय और उसकी उत्साही आशाओं का प्रतिफल बर्फीले दिलों से, ठंडी और उदासीन आँखों से, मनुष्य द्वारा बार-बार की फटकार और अपमान से दिया गया है; उनका प्रतिफल तीखी टिप्पणियों, कटाक्ष और हिकारत से दिया गया है; उनका प्रतिफल मनुष्य द्वारा उपहास करके, कुचलकर और नकारकर, अपनी गलतफहमियों, शिकायत, मनो-मालिन्य टालमटोल और धोखे, हमले और कड़वाहट से ही दिया गया है। गर्मजोशी से भरे शब्दों को तनी हुई भौंहों और इनकार में हिलती हजारों उँगलियों की ठंडी अवज्ञा मिली है। किंतु परमेश्वर सिर झुकाए नत-मस्तक बैल की तरह लोगों की सेवा करने की पीड़ा सहन कर सकता है।[2] कितनी बार सूर्य और चंद्रमा आए और गए, कितनी ही बार उसने सितारों का सामना किया है, कितनी ही बार वह भोर में निकला और गोधूलि में लौटा है, कितनी ही बार उसने अपने पिता के वियोग की तुलना में हजार गुना ज्यादा पीड़ा सहते हुए, मनुष्य के हमले और तोड़-फोड़ बर्दाश्त करते हुए, और मनुष्य की काट-छाँट करते हुए बेचैनी से करवटें बदलीं हैं। मनुष्य ने परमेश्वर की विनम्रता और अदृश्यता का प्रतिफल अपने पूर्वाग्रह[3] से, अनुचित विचारों और अनुचित व्यवहार से चुकाया है, और परमेश्वर के गुमनामी में कार्य करने के निश्शब्द तरीके, उसके धैर्य और सहनशीलता की चुकौती मनुष्य की लालचभरी निगाह से की गई है; मनुष्य परमेश्वर को बिना तरस खाए घसीटकर मार डालने की कोशिश करता है और परमेश्वर को जमीन पर कुचल देने का प्रयास करता है। परमेश्वर के प्रति अपने व्यवहार में मनुष्य का रवैया “अजीब चतुराई” का है, और परमेश्वर को, जिसे मनुष्य द्वारा तंग और तिरस्कृत किया गया है, असंख्य लोगों के पैरों तले कुचल दिया जाता है, जबकि मनुष्य स्वयं को ऊँचा खड़ा करता है, जैसे कि वह “पहाड़ी का राजा” हो, जैसे कि वह पूरी सत्ता हथियाना,[4] परदे के पीछे से अपना दरबार चलाना, परदे के पीछे परमेश्वर को एक कर्तव्यनिष्ठ और नियम-निष्ठ निर्देशक बनाना चाहता हो, जिसे प्रतिरोध करने या अवज्ञा करने नहीं दिया जाता है। मनुष्य ने परमेश्वर को “अंतिम सम्राट” की भूमिका दिलवा दी है, जो हर तरह की स्वतंत्रता से रहित एक कठपुतली[5] की भूमिका निभाए। मनुष्य के कर्म अकथनीय हैं, तो वह परमेश्वर से कुछ भी माँगने योग्य कैसे हुआ? वह परमेश्वर को “सुझाव” देने योग्य कैसे हुआ? वह यह माँग करने योग्य कैसे हुआ कि परमेश्वर उसकी कमजोरियों के प्रति सहानुभूति रखे? वह परमेश्वर की दया पाने योग्य कैसे हुआ? वह बार-बार परमेश्वर की उदारता प्राप्त करने योग्य कैसे हुआ? वह बार-बार परमेश्वर की क्षमा पाने योग्य कैसे हुआ? उसकी अंतरात्मा कहाँ गयी? उसने बहुत पहले ही परमेश्वर का दिल तोड़ दिया था, उसने बहुत पहले ही परमेश्वर का दिल टुकड़े-टुकड़े करके छोड़ दिया था। परमेश्वर चमक से भरे चेहरे और आनंद से भरे दिल के साथ मनुष्यों के बीच इस आशा से आया था कि मनुष्य उसके प्रति दयालु होगा, भले ही उसमें गर्मजोशी की कमी हो। फिर भी, परमेश्वर के दिल को मनुष्य ने कम सुकून पहुँचाया है, जो कुछ उसने प्राप्त किया है, वह केवल तेजी से बढ़ते[6] हमले और यातनाएँ हैं। मनुष्य का दिल बहुत लालची है, उसकी इच्छा बहुत बड़ी है, वह कभी भी संतुष्ट नहीं होता, वह हमेशा शातिर और उजड्ड रहता है, वह परमेश्वर को कभी बोलने की आज़ादी या अधिकार नहीं देता, और अपमान के सामने सिर झुकाने, और मनुष्य द्वारा अपने साथ मनचाहे तरीके से की जाने वाली जोड़-तोड़ स्वीकार करने के अलावा परमेश्वर के लिए कोई विकल्प नहीं छोड़ता।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, कार्य और प्रवेश (9)

फुटनोट :

1. “विनाश” का इस्तेमाल मानवजाति का विद्रोहीपन उजागर करने के लिए किया गया है।

2. “उग्र भौंहों और इनकार में हिलतीं उँगलियों की ठंडी अवज्ञा मिली है, एक राज़ी बैल की तरह सिर झुकाए लोगों की सेवा करते हुए” मूलतः एक वाक्य था, लेकिन यहाँ चीजों को साफ करने के लिए इसे दो भागों में विभाजित किया गया है। वाक्य का पहला भाग मनुष्य के कार्यों को दर्शाता है, जबकि दूसरा वाक्य परमेश्वर द्वारा सही गई पीड़ा और इस बात को इंगित करता है कि परमेश्वर दीन और छिपा हुआ है।

3. “पूर्वाग्रह” लोगों के विद्रोही व्यवहार को दर्शाता है।

4. “पूरी सत्ता हथियाने” का तात्पर्य लोगों के विद्रोही से है। वे खुद को ऊँचा उठाकर रखते हैं, दूसरों को बेड़ियों से बाँधते हैं, उनसे अपना अनुकरण करवाते हैं और अपने लिए कष्ट उठाने को कहते हैं। ये वे ताकतें हैं, जो कि परमेश्वर के प्रति शत्रुतापूर्ण हैं।

5. “कठपुतली” का इस्तेमाल उन लोगों का उपहास करने के लिए किया गया है, जो परमेश्वर को नहीं जानते।

6. “तेजी से बढ़ते” का इस्तेमाल लोगों के घृणित व्यवहार को रेखांकित करने के लिए किया गया है।


परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 253

परमेश्वर जो कुछ भी करता है, उसका बड़ा गहरा महत्व होता है। उदाहरण के तौर पर यीशु के क्रूसीकरण को लो। यीशु को क्रूस पर क्यों चढ़ना पड़ा? क्या यह संपूर्ण मानवजाति को छुटकारा दिलाने के लिए नहीं था? वैसे ही, परमेश्वर के वर्तमान देहधारण का, और उसके द्वारा संसार की पीड़ा का अनुभव करने का भी बहुत बड़ा अर्थ है—यह मानवजाति की खूबसूरत मंजिल के लिए है। अपने कार्य में, परमेश्वर हमेशा ठीक वही करता है, जो सबसे अधिक व्यावहारिक है। ऐसा क्यों है कि परमेश्वर देखता है कि मनुष्य पापरहित है, और उसके पास परमेश्वर के सामने आने का अच्छा सौभाग्य हो सकता है? ऐसा इसलिए है, क्योंकि यीशु ने क्रूस पर चढ़कर मनुष्य के पाप अपने ऊपर ले लिए और मानवजाति को छुटकारा दिला दिया। तो फिर क्यों मानवजाति अब और कष्ट नहीं सहेगी, दुःख महसूस नहीं करेगी, आँसू नहीं बहाएगी, और आह नहीं भरेगी? इसका कारण यह है कि परमेश्वर के मौजूदा देहधारण ने यह समस्त कष्ट अपने ऊपर ले लिया है, और यह कष्ट अब मनुष्य की ओर से सहा जा चुका है। यह उस माँ के समान है, जो अपने बच्चे को बीमार होते देखती है और स्वर्ग से प्रार्थना करती है, यह इच्छा करती है कि उसका अपना जीवन छोटा हो जाए मगर उसका बच्चा ठीक हो जाए। परमेश्वर भी इसी तरह काम करता है, वह मानवजाति को भविष्य में मिलने वाली खूबसूरत मंजिल के बदले दर्द सहने की पेशकश करता है। अब कोई दुःख नहीं होगा, आँसू नहीं होंगे, आहें नहीं होंगी और कष्ट नहीं होगा। परमेश्वर मानवजाति को मिलने वाली खूबसूरत मंजिल के बदले में व्यक्तिगत रूप से दुनिया की पीड़ा अनुभव करने की कीमत—लागत—चुकाता है। यह कहने का कि यह “खूबसूरत मंजिल के बदले में” किया जाता है, यह अर्थ नहीं कि परमेश्वर के पास मानवजाति को खूबसूरत मंजिल प्रदान करने का सामर्थ्य या अधिकार नहीं है, बल्कि इसके बजाय परमेश्वर लोगों को पूरी तरह से आश्वस्त करने के लिए कहीं अधिक व्यावहारिक और शक्तिशाली प्रमाण ढूँढ़ना चाहता है। परमेश्वर ने पहले ही इस पीड़ा का अनुभव कर लिया है, इसलिए वह योग्य है, उसके पास वह सामर्थ्य है, और इससे भी बढ़कर, उसके पास मानवजाति को उस खूबसूरत मंजिल तक पहुँचाने, उसे वह खूबसूरत मंजिल और वादा प्रदान करने का अधिकार है। शैतान पूरी तरह आश्वस्त हो जाएगा; ब्रह्मांड की सभी रचनाएँ पूरी तरह आश्वस्त हो जाएंगी। अंत में, परमेश्वर मानवजाति को अपना वादा और प्रेम प्राप्त करने देगा। हर चीज जो परमेश्वर करता है वह व्यावहारिक है, वह ऐसा कुछ नहीं करता है जो खोखला हो, और वह सब कुछ स्वयं अनुभव करता है। परमेश्वर मानवजाति के गंतव्य के बदले में दुःख सहन करने के अपने अनुभव को कीमत के रूप में चुकाता है। क्या यह व्यावहारिक कार्य नहीं है? माता-पिता अपने बच्चों के लिए एक सच्ची कीमत चुका सकते हैं और यह अपने बच्चों के लिए उनका प्रेम दर्शाता है। ऐसा करने में, देहधारी परमेश्वर ज़ाहिर तौर पर मानवता के प्रति अत्यधिक ईमानदार और वफादार है। परमेश्वर का सार विश्वसनीय है; जो वह कहता है उसे करता है और जो कुछ भी वह करता है वह पूरा होता है। हर चीज जो वह मनुष्य के लिए करता है वह निष्कपट होती है—वह मात्र वचनों की उक्ति नहीं करता। जब वह कहता है कि वह मूल्य चुकाएगा, तो वह एक वास्तविक मूल्य चुकाता है; जब वह कहता है कि वह मनुष्य के कष्ट अपने ऊपर ले लेगा और उनके स्थान पर कष्ट उठाएगा, तो वह वास्तव में उनके बीच रहने के लिए आता है, व्यक्तिगत रूप से इस कष्ट को महसूस और अनुभव करता है। उसके बाद, ब्रह्मांड की सभी चीजें मानेंगी कि हर चीज जो परमेश्वर करता है वह सही और धर्मी है, कि सब कुछ जो परमेश्वर करता है वह वास्तविक है। यह सामर्थ्यवान प्रमाण है। इसके अलावा, भविष्य में मानवजाति के पास एक खूबसूरत मंजिल होगी और वे सभी जो बचेंगे वे परमेश्वर की प्रशंसा करेंगे; वे बड़ाई करेंगे कि परमेश्वर के कार्य वास्तव में मानवता के लिए उसके प्रेम के कारण किए गए हैं। परमेश्वर मानव के बीच एक साधारण व्यक्ति के रूप में विनम्रतापूर्वक आता है। वह केवल कुछ कार्य करके, कुछ वचनों को बोलकर, चला नहीं जाता है; बल्कि, वह संसार की पीड़ा का अनुभव करते हुए व्यावहारिक तौर पर बोलता और कार्य करता है। जब वह इस पीड़ा का अनुभव करना समाप्त कर लेगा, तभी वह जाएगा। परमेश्वर का कार्य इतना वास्तविक और इतना व्यावहारिक होता है; वे सब जो बाकी रहेंगे वे इसके कारण उसकी प्रशंसा करेंगे, और वे मनुष्य के प्रति परमेश्वर की निष्ठा और उसकी दयालुता को देखेंगे। परमेश्वर की सुन्दरता और अच्छाई के सार को उसके देहधारण के महत्व में देखा जा सकता है। जो कुछ भी वह करता है वह सच्चा है; जो कुछ भी वह कहता है वह सच्चा और विश्वसनीय है। वह जो भी चीजें करने का इरादा रखता है, व्यावहारिक तौर पर करता है; जब मूल्य चुकाना होता है, वह वास्तव में मूल्य चुकाता है; वह महज वचनों की उक्ति नहीं करता। परमेश्वर एक धर्मी परमेश्वर है; परमेश्वर एक विश्वासयोग्य परमेश्वर है।

—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, देहधारण के अर्थ का दूसरा पहलू

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 254

जीवन का मार्ग कोई ऐसी चीज नहीं है जो हर व्यक्ति के पास हो, न ही यह कोई ऐसी चीज है जिसे हर व्यक्ति आसानी से प्राप्त कर सके। ऐसा इसलिए है क्योंकि जीवन केवल परमेश्वर से आ सकता है, कहने का तात्पर्य यह है कि केवल स्वयं परमेश्वर के पास जीवन का सार है और केवल स्वयं परमेश्वर के पास जीवन का मार्ग है। और इसलिए केवल परमेश्वर ही जीवन का स्रोत है और जीवन के जीवंत जल का सदा बहने वाला झरना है। संसार के सृजन के समय से ही परमेश्वर ने बहुत सारा कार्य किया है जो अपने साथ जीवन की प्राणशक्ति लेकर चलता है, उसने मनुष्य को जीवन प्रदान करने वाला काफी सारा कार्य किया है और उसने बहुत बड़ी कीमत चुकाई है जो मनुष्य को जीवन प्राप्त करने में सक्षम बनाती है। ऐसा इसलिए है क्योंकि स्वयं परमेश्वर ही अनंत जीवन है और स्वयं परमेश्वर ही वह मार्ग है, जिससे मनुष्य पुनर्जीवित हो सकता है। परमेश्वर मनुष्य के हृदय से कभी अनुपस्थित नहीं होता और हर समय लोगों के बीच रहता है। वह मनुष्य के जीवन की प्रेरक शक्ति, मनुष्य के जीवित रहने का मूल और जन्म लेने के बाद मनुष्य के जीवित रहने के लिए समृद्ध संसाधन रहा है। वह लोगों को पुनः जन्म लेने में समर्थ बनाता है और उन्हें अपनी हर व्यक्तिगत भूमिका में दृढ़तापूर्वक जीने में समर्थ बनाता है। उसके सामर्थ्य और उसकी अविनाशी जीवन-शक्ति के सहारे मनुष्य पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवित रहा है जबकि परमेश्वर के जीवन का सामर्थ्य मनुष्यों के बीच निरंतर सहारा देता रहा है, और परमेश्वर ने वह कीमत चुकाई है जो किसी साधारण मनुष्य ने कभी नहीं चुकाई। परमेश्वर की जीवन-शक्ति किसी भी सामर्थ्य पर भारी है; इससे भी अधिक, यह किसी भी सामर्थ्य से बढ़कर है। उसका जीवन अनंत है, उसका सामर्थ्य असाधारण है और उसकी जीवन-शक्ति को कोई भी सृजित प्राणी या शत्रु शक्ति दबा नहीं सकती। परमेश्वर की जीवन-शक्ति हर समय और हर स्थान पर विद्यमान रहती है और तेज चमक बिखेरती है। स्वर्ग और पृथ्वी में जबरदस्त बदलाव हो सकते हैं, परंतु परमेश्वर का जीवन हमेशा एक-समान रहता है। हर चीज का अस्तित्व समाप्त हो सकता है, परंतु परमेश्वर के जीवन का अस्तित्व फिर भी रहेगा। ऐसा इसलिए है क्योंकि परमेश्वर सभी चीजों के जीवित रहने का स्रोत और मूल है जिस पर सभी चीजें जीवित रहने के लिए निर्भर करती हैं। मनुष्य का जीवन परमेश्वर से उत्पन्न होता है, स्वर्ग का अस्तित्व परमेश्वर के कारण है और पृथ्वी का बचे रहना भी परमेश्वर के जीवन के सामर्थ्य से उत्पन्न होता है। कोई भी जीवित वस्तु परमेश्वर की संप्रभुता से परे नहीं जा सकती और जीवन शक्ति से युक्त कोई भी वस्तु परमेश्वर के अधिकार क्षेत्र के दायरे से नहीं बच सकती। इस प्रकार से सभी लोगों को, चाहे वे कोई भी हों, परमेश्वर के प्रभुत्व के आगे आत्मसमर्पण कर देना चाहिए, सभी लोगों को परमेश्वर के नियंत्रण के अधीन रहना चाहिए, और उनमें से कोई भी उसके हाथों से बच नहीं सकता।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, केवल अंत के दिनों का मसीह ही मनुष्य को अनंत जीवन का मार्ग दे सकता है

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 255

यदि तुम सचमुच अनंत जीवन का मार्ग प्राप्त करना चाहते हो, और यदि तुम उसे खोजने के लिए आतुर हो, तो पहले इस प्रश्न का उत्तर दो : आज परमेश्वर कहाँ है? शायद तुम उत्तर दो, “निस्संदेह, परमेश्वर स्वर्ग में रहता है—वह तुम्हारे घर में तो रहेगा नहीं, है न?” शायद तुम कह सकते हो कि परमेश्वर स्पष्टतः सारी चीजों में रहता है। या तुम कह सकते हो कि परमेश्वर प्रत्येक व्यक्ति के हृदय में रहता है, या परमेश्वर आध्यात्मिक क्षेत्र में है। मैं इनमें से किसी से भी इनकार नहीं करता, परंतु मुझे मुद्दा स्पष्ट कर देना चाहिए। यह कहना पूरी तरह सही नहीं है कि परमेश्वर मनुष्य के हृदय में रहता है, किंतु यह पूरी तरह गलत भी नहीं है। इसका कारण यह है कि परमेश्वर के विश्वासियों में ऐसे लोग भी हैं जिनका विश्वास सच्चा है, और ऐसे लोग भी हैं जिनका विश्वास झूठा है, ऐसे लोग भी हैं जिन्हें परमेश्वर स्वीकृति देता है और ऐसे लोग भी हैं जिन्हें परमेश्वर स्वीकृति नहीं देता, ऐसे लोग भी हैं जो उसके लिए मनभावन होते हैं और ऐसे लोग भी हैं जिनसे वह घृणा करता है, और ऐसे लोग भी हैं जिन्हें वह पूर्ण बनाता है और ऐसे लोग भी हैं जिन्हें वह हटा देता है। और इसलिए मैं कहता हूँ कि परमेश्वर बस कुछ ही लोगों के हृदय में रहता है, और ये लोग निस्संदेह वे हैं जो परमेश्वर में सचमुच विश्वास करते हैं, जिन्हें परमेश्वर स्वीकृति देता है, जो उसके लिए मनभावन होते हैं, और जिन्हें वह पूर्ण बनाता है। ये वे लोग हैं, जिनकी परमेश्वर द्वारा अगुआई की जाती है। चूँकि उनकी परमेश्वर द्वारा अगुआई की जाती है, इसलिए ये वे लोग हैं जो परमेश्वर का अनंत जीवन का मार्ग पहले ही सुन और देख चुके हैं। जिनका परमेश्वर में विश्वास झूठा है, जो परमेश्वर द्वारा स्वीकृत नहीं हैं, जिनसे परमेश्वर घृणा करता है, जो परमेश्वर द्वारा हटा दिए जाते हैं—उन्हें परमेश्वर द्वारा अस्वीकृत किया जाना तय है, उनका जीवन के मार्ग से विहीन रहना तय है, और उनका इस बात से अनभिज्ञ रहना तय है कि परमेश्वर कहाँ है। इसके विपरीत, जिनके हृदय में परमेश्वर रहता है, वे जानते हैं कि वह कहाँ है। ये ही वे लोग हैं, जिन्हें परमेश्वर अनंत जीवन का मार्ग प्रदान करता है, और ये ही परमेश्वर का अनुसरण करते हैं। अब क्या तुम जानते हो कि परमेश्वर कहाँ है? परमेश्वर मनुष्य के हृदय में भी है और मनुष्य की बगल में भी है। वह न केवल आध्यात्मिक क्षेत्र में है, और सभी चीजों के ऊपर है, बल्कि उस पृथ्वी पर तो वह और भी अधिक है जिस पर मनुष्य रहता है। और इसलिए अंत के दिनों का आगमन परमेश्वर के कार्य के कदमों को नए क्षेत्र में ले आया है। परमेश्वर सभी चीजों में है, वह सभी चीजों पर संप्रभुता रखता है, वह मनुष्य के सहारे के रूप में काम करते हुए मनुष्य के हृदय में भी है और इससे भी अधिक, वह मनुष्यों के बीच विद्यमान है। केवल इसी तरह से वह मनुष्य-जाति के लिए जीवन का मार्ग ला सकता है, और मनुष्य को जीवन के मार्ग में ला सकता है। परमेश्वर पृथ्वी पर आया है और मनुष्यों के बीच रहता है, ताकि मनुष्य जीवन का मार्ग प्राप्त कर सके और मनुष्य के अस्तित्व की खातिर भी। साथ ही, वह सभी चीजों में है, हर चीज को आदेश भी देता है, ताकि मनुष्य के बीच वह जो प्रबंधन करता है उसे सुगम बनाया जा सके। और इसलिए, यदि तुम केवल इस सिद्धांत को स्वीकार करते हो कि परमेश्वर स्वर्ग में है और मनुष्य के हृदय में है, किंतु मनुष्यों के बीच परमेश्वर के अस्तित्व के सत्य को स्वीकार नहीं करते, तो तुम कभी जीवन प्राप्त नहीं करोगे, और न ही कभी सत्य का मार्ग प्राप्त करोगे।

स्वयं परमेश्वर ही जीवन और सत्य है और उसका जीवन और सत्य सह-अस्तित्व में हैं। जो लोग सत्य प्राप्त करने में असमर्थ हैं, वे निश्चित ही जीवन प्राप्त नहीं करेंगे। सत्य के मार्गदर्शन, सहारे और पोषण के बिना तुम जो कुछ भी प्राप्त करते हो वह केवल शब्द, धर्म-सिद्धांत और इससे भी अधिक मृत्यु है। परमेश्वर का जीवन सदा विद्यमान है, और उसका सत्य और जीवन साथ-साथ सह-अस्तित्व में हैं। यदि तुम सत्य का स्रोत नहीं पा सकते हो तो तुम जीवन का पोषण प्राप्त नहीं करोगे; यदि तुम जीवन का पोषण प्राप्त नहीं कर सकते हो तो तुम्हारे पास निश्चित ही कोई सत्य नहीं होगा, और कल्पनाओं और धारणाओं के अलावा तुम्हारे संपूर्ण अस्तित्व में तुम्हारी देह—तुम्हारी दुर्गंधित देह—के सिवाय कुछ भी नहीं होगा। यह जान लो कि महज किताबों के शब्द जीवन नहीं हो सकते हैं, इतिहास के अभिलेखों को सत्य के रूप में पूजित नहीं किया जा सकता और अतीत के विनियम परमेश्वर के वर्तमान वचनों का लेखा-जोखा नहीं हो सकते हैं, और परमेश्वर पृथ्वी पर आकर मनुष्य के बीच रहकर जो वचन अभिव्यक्त करता है केवल वही सत्य हैं, जीवन हैं, परमेश्वर के इरादे हैं और उसके कार्य करने का वर्तमान तरीका हैं। यदि तुम अतीत के युगों के दौरान परमेश्वर द्वारा कहे गए वचनों के अभिलेखों को लेते हो और आज उनका पालन करते हो तो यह तुम्हें पुरातत्ववेत्ता बना देता है, ऐसे में तुम्हें ऐतिहासिक धरोहरों के शोध का विशेषज्ञ कहना ही सबसे उपयुक्त होगा। तुम हमेशा परमेश्वर द्वारा विगत युगों में किए गए कार्य के चिह्नों पर विश्वास करते हो, तुम केवल पूर्व में मनुष्यों के बीच कार्य करते समय छोड़ी गई परमेश्वर की परछाई में विश्वास करते हो और केवल पिछले युगों में परमेश्वर द्वारा अपने अनुयायियों को बताए गए मार्ग में विश्वास करते हो, लेकिन तुम परमेश्वर के आज के कार्य की दिशा पर विश्वास नहीं करते, परमेश्वर के आज के महिमामय मुखमंडल में विश्वास नहीं करते और परमेश्वर द्वारा वर्तमान में व्यक्त किए जा रहे सत्य के मार्ग पर विश्वास नहीं करते। इसलिए तुम निर्विवाद रूप से एक दिवास्वप्नदर्शी हो जो पूरी तरह वास्तविकता से दूर है। यदि तुम अब भी उन शब्दों से चिपके रहते हो जो मनुष्य को जीने देने में समर्थ बनाने में अक्षम हैं तो तुम एक लाइलाज सड़ी-गली लकड़ी हो, क्योंकि तुम अत्यंत रूढ़िवादी, अत्यंत हठी, अत्यंत विवेकहीन हो!

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, केवल अंत के दिनों का मसीह ही मनुष्य को अनंत जीवन का मार्ग दे सकता है

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 256

परमेश्वर स्वयं सत्य है, उसके पास समस्त सत्य हैं। परमेश्वर सत्य का स्रोत है। प्रत्येक सकारात्मक वस्तु और प्रत्येक सत्य परमेश्वर से आता है। वह समस्त चीजों और घटनाओं के औचित्य एवं अनौचित्य के विषय में न्याय कर सकता है; वह उन चीजों का न्याय कर सकता है जो घट चुकी हैं, वे चीजें जो अब घटित हो रही हैं और भावी चीजें जो कि मनुष्य के लिए अभी अज्ञात हैं। परमेश्वर सभी चीजों के औचित्य एवं अनौचित्य के विषय में न्याय करने वाला एकमात्र न्यायाधीश है, और इसका तात्पर्य यह है कि सभी चीजों के औचित्य एवं अनौचित्य के विषय में केवल परमेश्वर द्वारा ही निर्णय किया जा सकता है। वह सभी चीजों की कसौटी जानता है। वह किसी भी समय और स्थान पर सत्य को व्यक्त कर सकता है। परमेश्वर सत्य का प्रतिरूप है, जिसका आशय यह है कि वह स्वयं सत्य के सार से युक्त है। भले ही मनुष्य अनेक सत्य समझता हो और परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाया गया हो, फिर भी क्या उसका सत्य के मूर्त रूप से कुछ लेना-देना होगा? नहीं। यह सुनिश्चित है। जब मनुष्य को पूर्ण बनाया जाता है, तब परमेश्वर के वर्तमान कार्य और परमेश्वर द्वारा मनुष्य से अपेक्षित विभिन्न मानकों के बारे में उसके पास सटीक निर्णय और अभ्यास के तरीके होंगे और वह परमेश्वर के इरादे पूरी तरह से समझ सकेगा। वह इसमें अंतर कर सकता है कि कौन-सी चीज परमेश्वर से आती है और कौन-सी मनुष्य से, कि क्या सही है और क्या गलत है। पर फिर भी कुछ चीजें ऐसी होती हैं जो मनुष्य की पहुँच से दूर और अस्पष्ट रहती हैं, ऐसी चीजें जिन्हें वह परमेश्वर द्वारा बताए जाने के बाद ही जान सकता है। क्या मनुष्य ऐसी चीजों को जान सकता है या उनके बारे में भविष्यवाणी कर सकता है जो अभी अज्ञात हैं, ऐसी चीजें जो परमेश्वर ने उसे अभी नहीं बताई हैं? बिल्कुल नहीं। इसके अतिरिक्त, यदि मनुष्य परमेश्वर से सत्य प्राप्त कर भी ले और उसके पास सत्य वास्तविकता हो और उसे बहुत-से सत्यों के सार का ज्ञान हो, और उसके पास गलत सही को पहचानने की क्षमता हो, तो क्या उसमें सभी चीजों पर नियंत्रण व शासन करने की क्षमता होगी? उसमें यह क्षमता नहीं होगी। परमेश्वर और मनुष्य में यही अंतर है। सृजित प्राणी केवल सत्य के स्रोत से ही सत्य प्राप्त कर सकते हैं। क्या वे मनुष्य से सत्य प्राप्त कर सकते हैं? क्या मनुष्य सत्य है? क्या मनुष्य सत्य प्रदान कर सकता है? वह ऐसा नहीं कर सकता और बस यहीं पर अंतर है। तुम केवल सत्य ग्रहण कर सकते हो, इसे प्रदान नहीं कर सकते—तब क्या तुम्हें ऐसा व्यक्ति कहा जा सकता है जिसके पास सत्य है? क्या तुम्हें सत्य का प्रतिरूप कहा जा सकता है? बिल्कुल नहीं। सत्य का प्रतिरूप होने का वास्तव में क्या सार है? यह सत्य प्रदान करने वाला स्रोत है, सभी चीजों पर शासन और प्रभुता का स्रोत, और इसके अलावा यह वह एकमात्र कसौटी और मानक है जिसके अनुसार सभी चीजों और घटनाओं का आकलन किया जाता है। यही सत्य का प्रतिरूप है।

—वचन, खंड 4, मसीह-विरोधियों को उजागर करना, मद आठ : वे दूसरों से केवल अपने प्रति समर्पण करवाएँगे, सत्य या परमेश्वर के प्रति नहीं (भाग तीन)

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 257

सत्य की अपनी अभिव्यक्ति में परमेश्वर अपने स्वभाव और सार को व्यक्त करता है; सत्य की उसकी अभिव्यक्ति लोगों द्वारा विश्वास की जाने वाली उन विभिन्न सकारात्मक चीजों और वक्तव्यों पर आधारित नहीं है जिन्हें मानवजाति सारांशित करती है। परमेश्वर के वचन परमेश्वर के वचन हैं; परमेश्वर के वचन सत्य हैं। वे एकमात्र नींव और विधान हैं जिनसे मानवजाति का अस्तित्व है। इंसान से उत्पन्न होने वाली सभी तथाकथित मान्यताएँ गलत, बेतुकी और परमेश्वर द्वारा निंदनीय हैं। उन्हें परमेश्वर की मान्यता नहीं मिलती है और वे उसके कथनों का मूल या आधार तो और भी नहीं हैं। परमेश्वर अपने वचनों के माध्यम से अपने स्वभाव और अपने सार को व्यक्त करता है। परमेश्वर द्वारा व्यक्त सभी वचन सत्य हैं, क्योंकि उसमें परमेश्वर का सार है और वह सभी सकारात्मक चीजों की वास्तविकता है। यह भ्रष्ट मानवजाति परमेश्वर के वचनों को चाहे कैसे भी प्रस्तुत या परिभाषित करे या उन्हें कैसे भी देखे या समझे, परमेश्वर के वचन शाश्वत रूप से सत्य हैं और यह एक ऐसा तथ्य है जो कभी नहीं बदलता। परमेश्वर ने चाहे कितने भी वचन बोले हों और यह भ्रष्ट, दुष्ट मानवजाति चाहे उनकी कैसे भी निंदा करे, उन्हें कैसे भी अस्वीकार करे, एक तथ्य ऐसा है जो हमेशा अपरिवर्तनीय रहता है : परमेश्वर के वचन सदा सत्य होंगे। मनुष्य इसे कभी नहीं बदल सकता। अंत में समस्त मानवजाति यह मानेगी कि परमेश्वर के वचन सत्य हैं और मानवजाति की सम्मानजनक पारंपरिक संस्कृति हो या वैज्ञानिक ज्ञान, ये कभी सकारात्मक चीजें नहीं बन सकते हैं और ये कभी सत्य नहीं बन सकते हैं। यह अटल है। मानवजाति की पारंपरिक संस्कृति और अपना अस्तित्व बचाने के तरीके समय बीतने के साथ या समय के लंबे अंतरालों के बाद सत्य नहीं बन जाएँगे, न ही परमेश्वर के वचन मानवजाति की निंदा या विस्मृति के कारण मनुष्य के शब्द बन जाएँगे। सत्य हमेशा सत्य रहेगा; यह सार कभी नहीं बदलेगा। यहाँ कौन-सा तथ्य मौजूद है? यह कि मानवजाति द्वारा सारांशित इन सामान्य कहावतों का स्रोत शैतान और मानवीय कल्पनाएँ और धारणाएँ हैं, वे मनुष्य की उग्रता और उसके भ्रष्ट स्वभाव से उत्पन्न होती हैं और उनका सकारात्मक चीजों से कोई लेना-देना नहीं है। दूसरी ओर, परमेश्वर के वचन परमेश्वर के सार और पहचान की अभिव्यक्ति हैं। वह इन वचनों को किस कारण से व्यक्त करता है? मैं क्यों कहता हूँ कि वे सत्य हैं? इसका कारण यह है कि परमेश्वर समस्त चीजों के सारे विधानों, नियमों, जड़ों, सारतत्वों, वास्तविकताओं और रहस्यों का संप्रभु है और इन्हें अपने हाथों में रखता है। इसलिए सिर्फ परमेश्वर ही सभी चीजों के नियमों, वास्तविकताओं, तथ्यों और रहस्यों को जानता है। परमेश्वर सभी चीजों के मूल को जानता है और परमेश्वर जानता है कि वास्तव में सभी चीजों की जड़ क्या है। परमेश्वर के वचनों में दी गई सभी चीजों की परिभाषाएँ ही सर्वाधिक सटीक हैं और परमेश्वर के वचन ही मनुष्यों के जीवन के लिए मानक और सिद्धांत हैं और ये वे सत्य और मानदंड हैं जिनके सहारे मनुष्य जी सकते हैं, जबकि मनुष्य ने शैतान द्वारा भ्रष्ट किए जाने के बाद से जीने के लिए शैतान के जिन विधानों और सिद्धांतों पर भरोसा किया है, वे सब साथ ही साथ इस तथ्य के विपरीत हैं कि परमेश्वर समस्त चीजों का संप्रभु है और इस तथ्य के भी विपरीत हैं कि वह समस्त चीजों के विधानों और नियमों का संप्रभु है।

—वचन, खंड 4, मसीह-विरोधियों को उजागर करना, मद नौ (भाग एक)

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 258

जिस क्षण तुम रोते हुए इस दुनिया में आते हो उसी पल से तुम अपनी जिम्मेदारियाँ निभाना शुरू कर देते हो। परमेश्वर की योजना और उसके विधान की खातिर तुम अपनी भूमिका निभाते हो और अपनी जीवन यात्रा शुरू करते हो। तुम्हारी पृष्ठभूमि जो भी हो और तुम्हारी आगे की यात्रा जैसी भी हो, किसी भी स्थिति में कोई भी स्वर्ग के आयोजनों और व्यवस्थाओं से बच नहीं सकता और कोई भी अपनी नियति को नियंत्रित नहीं कर सकता, क्योंकि जो सभी चीजों का संप्रभु है सिर्फ वही ऐसा करने में सक्षम है। मनुष्य के अस्तित्व में आने की शुरुआत से ही परमेश्वर अपने कार्य को हमेशा से इसी ढंग से करता आ रहा है, ब्रह्मांड को सँभाल रहा है और सभी चीजों के लिए परिवर्तन के नियमों और उनकी गतिविधियों के पथ को संचालित कर रहा है। सभी चीजों की तरह मनुष्य भी चुपचाप और अनजाने में परमेश्वर से मिठास, बारिश और ओस से पोषित हो रहा है; सभी चीजों की तरह मनुष्य भी अनजाने में परमेश्वर के हाथ के आयोजन के अधीन रहता है। मनुष्य का हृदय और आत्मा परमेश्वर की मुट्ठी में होते हैं और उसके जीवन की हर चीज परमेश्वर की दृष्टि में रहती है। चाहे तुम यह सब मानो या न मानो, एक-एक चीज, चाहे वह सजीव हो या निर्जीव, परमेश्वर के विचारों के अनुसार ही हरकत करेगी, बदलेगी, नई बनेगी और लुप्त हो जाएगी। परमेश्वर इसी तरह सभी चीजों पर संप्रभु है।

जब रात चुपचाप आती है, मनुष्य अनजान रहता है, क्योंकि मनुष्य का हृदय यह नहीं समझ सकता कि रात कैसे आती है या कहाँ से आती है। जब रात चुपचाप चली जाती है, मनुष्य दिन के उजाले का स्वागत करता है, लेकिन उजाला कहाँ से आया है और कैसे इसने रात के अँधेरे को दूर भगाया है, मनुष्य का हृदय तो और भी अनभिज्ञ है, और भी कम अवगत है। दिन और रात की यह बारंबार होने वाली अदला-बदली मनुष्य को एक अवधि से दूसरी अवधि में, एक युग के संदर्भ से अगले में ले जाती है, और यह भी सुनिश्चित करती है कि हर अवधि में परमेश्वर का कार्य और हर युग के लिए उसकी योजना कार्यान्वित की जाए। मनुष्य परमेश्वर का अनुसरण करते हुए इन सभी अलग-अलग अवधियों में चला है, फिर भी वह यह नहीं जानता है कि परमेश्वर सभी चीजों और जीवित प्राणियों के भाग्य पर संप्रभु है, न ही वह यह जानता है कि परमेश्वर सभी चीजों की कैसे योजना बनाता और निर्देशित करता है। इस बात को जानने में आज के मनुष्य और यहाँ तक कि अतीत के मनुष्य भी विफल रहे हैं। जहाँ तक कारण का सवाल है, ऐसा इसलिए नहीं है क्योंकि परमेश्वर के कर्म बहुत छिपे हुए हैं, न इसलिए कि परमेश्वर की योजना अभी तक साकार नहीं हुई है, बल्कि इसलिए है कि मनुष्य का हृदय और आत्मा परमेश्वर से बहुत दूर हैं, उतनी दूर जहाँ मनुष्य “परमेश्वर का अनुसरण” करते हुए भी शैतान की सेवा में बना रहता है—और फिर भी उसे इसका पता नहीं होता। कोई भी सक्रिय रूप से परमेश्वर के पदचिह्नों और उसके प्रकटन को नहीं खोजता और कोई भी परमेश्वर की देखभाल और सुरक्षा में रहने के लिए तैयार नहीं है। इसके बजाय वे इस दुनिया के और बुरी मानवजाति द्वारा अनुसरण किए जाने वाले अस्तित्व के नियमों के अनुकूल होने के लिए, उस शैतान, दुष्ट दानव द्वारा किए जाने वाले क्षरण को स्वीकारने को तैयार हैं। इस बिंदु पर, मनुष्य का हृदय और उसकी आत्मा ऐसा नजराना बन जाते हैं जो मनुष्य शैतान को पेश करता है और उसके आहार की वस्तु बन जाते हैं। इससे भी अधिक, मानव हृदय और आत्मा एक ऐसा स्थान बन जाते हैं, जिसमें शैतान रहता है और उसका उचित खेल का मैदान बन जाते हैं। इस प्रकार मनुष्य अनजाने में ही स्व-आचरण के सिद्धांतों की अपनी समझ खो देता है और मानव-अस्तित्व के मूल्य और महत्व के बारे में अपनी समझ खो देता है। परमेश्वर के नियम और परमेश्वर और मनुष्य के बीच की वाचा धीरे-धीरे मनुष्य के दिल में धुंधली पड़ती जाती है और वह परमेश्वर की तलाश करना या उस पर ध्यान देना बंद कर देता है। समय गुजरने के साथ मनुष्य ने परमेश्वर द्वारा उसे सृजित किए जाने के महत्व के बारे में अपनी समझ खो दी है और न ही वह परमेश्वर के मुख से निकलने वाले वचनों को और परमेश्वर से आने वाली सभी बातों को समझता है। मनुष्य फिर परमेश्वर की व्यवस्थाओं और विधानों का प्रतिरोध करना शुरू कर देता है और उसका दिल और आत्मा सुन्न हो जाते हैं...। परमेश्वर उस मनुष्य को खो देता है, जिसे उसने शुरू में बनाया था, और मनुष्य उस मूल को खो देता है जो मूल रूप से उसके पास था : यही इस मानवजाति की त्रासदी है। वास्तव में, बिल्कुल शुरुआत से अब तक परमेश्वर ने मनुष्य-जाति के लिए एक त्रासदी का मंचन किया है, ऐसी त्रासदी, जिसमें मनुष्य नायक और पीड़ित दोनों है। और कोई इसका उत्तर नहीं दे सकता कि इस त्रासदी का निर्देशक कौन है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर मनुष्य के जीवन का स्रोत है

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 259

परमेश्वर ने इस संसार की रचना की और इसमें एक जीवित प्राणी, मनुष्य को लेकर आया, जिसे उसने जीवन प्रदान किया। क्रमशः मनुष्य के माता-पिता और परिजन हुए और वह अकेला नहीं रहा। जब से मनुष्य ने पहली बार इस भौतिक दुनिया पर नजरें डालीं, तब से वह परमेश्वर के विधान के भीतर विद्यमान रहने के लिए नियत था। यह परमेश्वर से प्राप्त जीवन की साँस ही है जो हर एक प्राणी के पल-बढ़कर वयस्क होने के पूरे दौरान सहयोग देती है। इस प्रक्रिया के दौरान कोई भी महसूस नहीं करता कि मनुष्य परमेश्वर की देखरेख में अस्तित्व में रहता है और बड़ा होता है, बल्कि यह मानता है कि मनुष्य अपने माता-पिता की परवरिश के अनुग्रह में बड़ा होता है और यह उसकी अपने जीवन की सहज-प्रवृत्ति है जो उसके विकास को संचालित करती है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि मनुष्य नहीं जानता कि उसे जीवन किसने प्रदान किया है या यह कहाँ से आया है, और यह तो वह बिल्कुल भी नहीं जानता कि जीवन की प्रवृत्ति किस तरह से चमत्कार करती है। वह केवल इतना ही जानता है कि भोजन ही वह आधार है जिस पर उसका जीवन चलता रहता है, कि अध्यवसाय ही उसके जीवन के अस्तित्व का स्रोत है, और उसके मन का विश्वास वह पूँजी है जिस पर उसका अस्तित्व निर्भर करता है। परमेश्वर के अनुग्रह और भरण-पोषण के प्रति मनुष्य पूरी तरह से बेखबर है और यही वह तरीका है जिससे वह परमेश्वर द्वारा प्रदान किया गया जीवन गँवा देता है...। जिन मनुष्यों की परमेश्वर दिन-रात निगरानी करता है उनमें से एक भी व्यक्ति उसकी आराधना करने की पहल नहीं करता है। परमेश्वर बस अपनी बनाई योजना के अनुसार उस मनुष्य पर कार्य करता है जिससे कोई अपेक्षा नहीं है। वह ऐसा इस आशा में करता है कि एक दिन मनुष्य अपने सपने से जागेगा और अचानक जीवन के मूल्य और अर्थ को समझेगा, परमेश्वर ने उसे जो कुछ प्रदान किया है, उसके लिए परमेश्वर द्वारा चुकाई गई कीमत और परमेश्वर की उस उत्सुकता को समझेगा जिसके साथ परमेश्वर मनुष्य के वापस अपनी ओर मुड़ने के लिए बेसब्री से लालायित रहता है। किसी ने कभी भी मनुष्य के जीवन की उत्पत्ति और निरंतरता से संबंधित रहस्यों पर गौर नहीं किया है। केवल परमेश्वर, जो इस सबको समझता है, चुपचाप मनुष्य द्वारा पहुँचाई गई ठेस और आघात को सहन करता है, जिसने परमेश्वर से सब कुछ प्राप्त किया है किंतु जो कृतघ्न है। जीवन से जो कुछ मिलता है, मनुष्य उसे स्वाभाविक समझकर उसका आनंद लेता है, और इसी तरह, यह एक “स्वाभाविक बात” है कि मनुष्य द्वारा परमेश्वर के साथ विश्वासघात किया जाता है, उसे भुला दिया जाता है, और उससे जबरन वसूली की जाती है। क्या ऐसा हो सकता है कि परमेश्वर की योजना सच में इतने ही महत्व की है? क्या ऐसा हो सकता है कि यह जीवित प्राणी, यह मनुष्य, जो कि परमेश्वर के हाथ से आया है, वास्तव में इतने महत्व का है? परमेश्वर की योजना निश्चित रूप से महत्व की है; किंतु परमेश्वर के हाथ से बनाया गया यह जीवित प्राणी उसकी योजना के वास्ते विद्यमान है। इसलिए परमेश्वर इस मानव-जाति के प्रति घृणा के कारण अपनी योजना को बेकार नहीं कर सकता। यह परमेश्वर की योजना के वास्ते और उसके द्वारा फूँकी गई साँस के लिए है कि परमेश्वर, मनुष्य की देह के लिए नहीं बल्कि मनुष्य के जीवन के लिए, समस्त कष्ट सहता है। वह ऐसा मनुष्य की देह को वापस लेने के लिए नहीं, बल्कि उस जीवन को वापस लेने के लिए करता है, जिसमें उसने प्राण फूँके थे। यही उसकी योजना है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर मनुष्य के जीवन का स्रोत है

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 260

इस दुनिया में आने वाले सभी लोगों को जीवन और मृत्यु से गुजरना होता है, और उनमें से अधिकतर मृत्यु और पुनर्जन्म के चक्र से गुजर चुके हैं। जो जीवित हैं, वे शीघ्र ही मर जाएँगे और मृत शीघ्र ही लौट आएँगे। यह सब परमेश्वर द्वारा प्रत्येक जीवित प्राणी के लिए व्यवस्थित जीवन यात्रा है। फिर भी यह यात्रा और यह चक्र ठीक वही तथ्य है जिसे परमेश्वर चाहता है कि मनुष्य देखे कि परमेश्वर द्वारा मनुष्य को प्रदान किया गया जीवन निरंतर अविराम रूप से प्रवाहित होने वाला है और भौतिकता, समय या स्थान से मुक्त है। परमेश्वर द्वारा मनुष्य को प्रदान किए गए जीवन का रहस्य ऐसा है और इस बात का प्रमाण है कि जीवन उसी से आया है। यद्यपि हो सकता है कि बहुत-से लोग यह न मानें कि मनुष्य का जीवन परमेश्वर से आया है, फिर भी मनुष्य अनिवार्य रूप से उस सब का आनंद लेता है जो परमेश्वर से आता है, फिर चाहे वह परमेश्वर के अस्तित्व को मानता हो या नकारता हो। यदि किसी दिन परमेश्वर का अचानक मन बदल जाए और वह पृथ्वी पर विद्यमान हर वस्तु को पुनः अपने अधिकार में लेना चाहे और अपना दिया जीवन वापस लेने की इच्छा करे तो कुछ भी नहीं रहेगा। परमेश्वर अपने जीवन का उपयोग सभी चीजों, जीवित और निर्जीव दोनों की आपूर्ति करने के लिए करता है और अपनी सामर्थ्य और अधिकार के बल पर सभी को सुव्यवस्थित करता है—यह एक ऐसा तथ्य है जिसकी कल्पना कोई भी नहीं कर सकता है या जिसे कोई भी समझ नहीं सकता है। ये अबूझ तथ्य परमेश्वर की जीवन-शक्ति की सटीक अभिव्यक्ति और प्रमाण हैं। अब मैं तुम्हें एक रहस्य बताता हूँ : परमेश्वर के जीवन की महानता और उसके जीवन के सामर्थ्य की थाह कोई भी सृजित प्राणी नहीं पा सकता है। यह अभी भी वैसा ही है जैसा अतीत में था और आने वाले समय में भी यह ऐसा ही रहेगा। दूसरा रहस्य जो मैं बताऊँगा वह यह है : सभी प्राणियों के लिए जीवन का स्रोत परमेश्वर से आता है; चाहे वे जीवन-रूप या संरचना में कितने ही भिन्न हों और चाहे वे किसी भी प्रकार के जीव हों, कोई भी प्राणी उस जीवन-पथ का उल्लंघन नहीं कर सकता जिसे परमेश्वर ने निर्धारित किया है। हर हाल में, मेरी बस यह इच्छा है कि मनुष्य इसे समझे : परमेश्वर की देखभाल, सुरक्षा और आपूर्ति के बिना मनुष्य वह सब कुछ प्राप्त नहीं कर सकता जो उसे प्राप्त होना था, फिर चाहे वह कितनी भी तत्परता से कोशिश क्यों न करे या कितना भी कठिन संघर्ष क्यों न करे। परमेश्वर से जीवन की आपूर्ति के बिना मनुष्य जीने का मूल्य और जीवन का अर्थ गँवा देता है। परमेश्वर उस मनुष्य को इतना बेफिक्र कैसे होने दे सकता है, जो लापरवाही से परमेश्वर द्वारा दिए गए जीवन के मूल्य को व्यर्थ गँवा देता है? जैसा कि मैंने पहले कहा है : मत भूलो कि परमेश्वर तुम्हारे जीवन का स्रोत है। यदि मनुष्य वह सब सँजोने में विफल रहता है, जो परमेश्वर ने प्रदान किया है, तो परमेश्वर न केवल उसे वापस ले लेगा जो उसने शुरुआत में दिया था, बल्कि वह मनुष्य से उस सबका दोगुना मूल्य वसूल करेगा जो उसने दिया है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर मनुष्य के जीवन का स्रोत है

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 261

इस दुनिया की हर चीज़ तेज़ी से सर्वशक्तिमान के विचारों और उसकी नज़रों तले बदलती है। मानवजाति ने जिन चीज़ों के बारे में कभी नहीं सुना है वो अचानक आ जाती हैं, जबकि मनुष्य के पास जो कुछ लंबे समय से रहा है वो अनजाने में उसके हाथ से फिसल जाता है। सर्वशक्तिमान के ठौर-ठिकाने की थाह कोई नहीं पा सकता, सर्वशक्तिमान की जीवन शक्ति की उत्कृष्टता और महानता का एहसास करने की तो बात ही दूर है। वह इसलिए उत्कृष्ट है कि वह वो समझ सकता है जो मनुष्य नहीं समझ सकता। वह महान इसलिए है कि वह मानवजाति द्वारा त्यागे जाने के बाद भी उसे बचाता है। वह जीवन और मृत्यु का अर्थ जानता है, इसके अतिरिक्त, वह जानता है कि सृजित मानवजाति को अस्तित्व में रहने के किन नियमों का पालन करना चाहिए। वह मानव अस्तित्व की नींव है, वह मानवजाति को फिर से जीवित करने वाला मुक्तिदाता है। वह प्रसन्नचित्त दिलों को दुःख देकर नीचे लाता है और दुखी दिलों को खुशी देकर ऊपर उठाता है, ये सब उसके कार्य के लिए है, उसकी योजना के लिए है।

सर्वशक्तिमान के जीवन के पोषण से भटक चुकी मानवजाति अस्तित्व के उद्देश्य से अनभिज्ञ है, लेकिन मृत्यु से फिर भी डरती है। उनके पास मदद या सहारा नहीं है, लेकिन फिर भी वे अपनी आँखों को बंद करने के अनिच्छुक हैं, वे अपनी सुन्न पड़ चुकी आत्माओं वाली देह को गिरने न देने के लिए खुद को मजबूत बनाते हैं, और वे इस दुनिया में एक अधम अस्तित्व को घसीटते हैं। तुम इस तरह बिना आशा के जीते हो, जैसे कि अन्य लोग उद्देश्यहीन होकर जीते हैं। केवल किंवदंती का पवित्र जन ही उन लोगों को बचाएगा जो अपने दुःख में कराहते हुए उसके आगमन के लिए अत्यंत व्याकुल हैं। ऐसा विश्वास बहुत समय तक उनमें साकार नहीं हुआ है जो चेतना विहीन हैं। फिर भी, वे अभी भी इसके लिए तरस रहे हैं। सर्वशक्तिमान गहराई से पीड़ित इन लोगों पर दया करता है; साथ ही, वह उन लोगों से विमुख महसूस करता है जिनमें जरा-सी भी चेतना नहीं है, क्योंकि उसे लोगों से जवाब पाने के लिए बहुत लंबा इंतजार करना पड़ता है। वह खोजना चाहता है, तुम्हारे दिल और तुम्हारी आत्मा को खोजना चाहता है, तुम्हें पानी और भोजन देना चाहता है, ताकि तुम जाग जाओ और अब तुम भूखे या प्यासे न रहो। जब तुम थक जाओ और तुम्हें इस दुनिया की वीरानी का कुछ-कुछ एहसास हो, तो तुम भ्रमित मत होना, रोना मत। सर्वशक्तिमान परमेश्वर, प्रहरी, किसी भी समय तुम्हारे आगमन को गले लगा लेगा। वह तुम्हारी बगल में पहरा दे रहा है। वह तुम्हारे वापस मुड़ जाने का इंतजार कर रहा है, उस दिन की प्रतीक्षा कर रहा है जिस दिन तुम अचानक अपनी याददाश्त फिर से पा लोगे : जब तुम्हें यह एहसास होगा कि तुम परमेश्वर से आए हो और किसी अज्ञात समय में तुमने अपनी दिशा खो दी थी, किसी अज्ञात समय में तुम राह में होश खो बैठे थे, और किसी अज्ञात समय में तुम्हारा एक “पिता” था; इसके अलावा, जब तुम्हें यह एहसास होगा कि सर्वशक्तिमान हमेशा से ही वहीं ठहरकर, धैर्य के साथ, बहुत लंबे समय से तुम्हारी वापसी का इंतजार करता रहा है। वह बेसब्री से लालायित रहा है, बिना किसी उत्तर के प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा कर रहा है। उसका नजर रखना बहुत ही अनमोल है और यह मनुष्य के दिल और मनुष्य की आत्मा के लिए है। शायद ऐसे नजर रखना अनिश्चितकालीन है, या शायद इसका अंत हो चुका है। लेकिन तुम्हें सटीक रूप से पता होना चाहिए कि तुम्हारा दिल और तुम्हारी आत्मा इस वक्त कहाँ हैं।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, सर्वशक्तिमान की आह

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 262

मानवजाति के सदस्यों और धर्मनिष्ठ ईसाइयों के रूप में हम सबकी जिम्मेदारी और दायित्व है कि हम अपने मन और शरीर को परमेश्वर के आदेश की पूर्ति करने के लिए अर्पित करें, क्योंकि हमारा संपूर्ण अस्तित्व परमेश्वर से आया है और यह परमेश्वर की संप्रभुता के कारण अस्तित्व में है। यदि हमारा मन और शरीर परमेश्वर के आदेश और मानवजाति के न्यायसंगत कार्य को समर्पित नहीं है, तो हमारी आत्माएँ उन लोगों के सामने शर्मिंदा महसूस करेंगी जो परमेश्वर के आदेश के लिए शहीद हुए थे, और परमेश्वर के सामने तो और भी अधिक शर्मिंदा होंगी जिसने हमें सब कुछ प्रदान किया है।

परमेश्वर ने इस संसार की सृष्टि की, उसने इस मानवजाति को बनाया, और इतना ही नहीं, वह प्राचीन यूनानी संस्कृति और मानव-सभ्यता का वास्तुकार भी था। केवल परमेश्वर ही इस मानवजाति को आराम देता है और केवल परमेश्वर ही रात-दिन इस मानवजाति की देखभाल करता है। मानव का विकास और प्रगति परमेश्वर की संप्रभुता से अविभाज्य हैं, और मानवजाति का इतिहास और भविष्य परमेश्वर के हाथों द्वारा की गई व्यवस्थाओं से बच नहीं सकता। यदि तुम एक सच्चे ईसाई हो, तो तुम निश्चित ही इस बात पर विश्वास करोगे कि किसी भी देश या राष्ट्र का उत्थान या पतन परमेश्वर की व्यवस्थाओं के अनुसार होता है। केवल परमेश्वर ही किसी देश या राष्ट्र के भाग्य को जानता है और केवल परमेश्वर ही इस मानवजाति की दिशा नियंत्रित करता है। यदि मानवजाति अच्छा भाग्य पाना चाहती है, यदि कोई देश अच्छा भाग्य पाना चाहता है, तो सभी को परमेश्वर के सामने झुकना और उसकी आराधना करनी होगी और परमेश्वर के सामने पश्चात्ताप करने और उसके सामने पाप कबूलने के लिए आना होगा, अन्यथा मनुष्य का भाग्य और गंतव्य एक अपरिहार्य विनाश बन जाएँगे।

पीछे मुड़कर उस समय को देखो, जब नूह ने जहाज बनाई थी : मानवजाति गहराई से भ्रष्ट थी और वह परमेश्वर के आशीषों से भटक गई थी, परमेश्वर द्वारा अब और उसकी देखभाल नहीं की जा रही थी और वे परमेश्वर के वादे खो चुके थे। लोग परमेश्वर की रोशनी के बिना अंधकार में रहते थे। फिर वे प्रकृति से व्यभिचारी बन गए और एक भद्दे स्तर तक भ्रष्ट हो गए। ऐसे लोग अब और परमेश्वर के वादे प्राप्त नहीं कर सकते थे; वे परमेश्वर का चेहरा देखने या परमेश्वर की वाणी सुनने के लायक नहीं थे, क्योंकि उन्होंने परमेश्वर को त्याग दिया था, उन सब चीजों को किनारे कर दिया था, जो परमेश्वर ने उन्हें प्रदान की थीं, और वे परमेश्वर की शिक्षा के वचनों को भूल गए थे। उनके हृदय परमेश्वर से अधिकाधिक दूर भटक गए थे, बाद में वे इस हद तक भ्रष्ट हो गए कि उन्होंने अपना विवेक और मानवता ही खो दी और अधिक से अधिक बुरे होते गए। फिर वे मृत्यु की ओर चल पड़े और परमेश्वर के कोप और दंड के अधीन हो गए। केवल नूह ने परमेश्वर की आराधना की और बुराई से दूर रहा, और इसलिए वह परमेश्वर की वाणी और निर्देशों को सुनने में सक्षम था। उसने परमेश्वर के वचन के निर्देशानुसार जहाज बनाया, और सभी प्रकार के जीवित प्राणियों को उसमें एकत्र किया। और इस तरह, जब एक बार सब कुछ तैयार हो गया, तो परमेश्वर ने संसार को नष्ट करने का अपना कार्य शुरू कर दिया। केवल नूह और उसके परिवार के सात अन्य लोग इस विनाशलीला में जीवित बचे, क्योंकि नूह ने यहोवा की आराधना की थी और बुराई से दूर रहा था।

अब वर्तमान युग को देखो : नूह जैसे धार्मिक लोग, जो परमेश्वर की आराधना कर सके और बुराई से दूर रह सके, अब नहीं होते। फिर भी परमेश्वर अब भी इस मानवजाति के प्रति अनुग्रही है और वह इस अंतिम युग की मानवजाति के प्रति अभी भी उदारता दिखाता है। परमेश्वर उन लोगों की खोज कर रहा है जो उसके प्रकट होने की लालसा करते हैं। वह उन लोगों की खोज कर रहा है जो उसके वचनों को सुनते हैं, जो उसके आदेश को नहीं भूलते और अपना तन-मन उसे समर्पित करते हैं। वह उनकी खोज कर रहा है जो उसके सामने शिशुओं के समान समर्पित और प्रतिरोध न करने वाले हों। यदि तुम किसी भी बल से बाधित हुए बिना खुद को परमेश्वर के प्रति समर्पित करते हो, तो परमेश्वर तुम्हारे ऊपर अनुग्रह की दृष्टि डालेगा और तुम्हें अपने आशीष प्रदान करेगा। यदि तुम्हारे पास ऊँचा रुतबा है, अत्यधिक प्रतिष्ठा है, प्रचुर ज्ञान है, असंख्य संपत्तियाँ हैं और बहुत-से लोगों का सहारा है, लेकिन तुम इन बातों से अप्रभावित रहते हो और परमेश्वर की पुकार और आदेश को स्वीकार करने और परमेश्वर तुमसे जो कुछ कहता है वह करने के लिए अभी भी उसके सम्मुख आते हो तो फिर तुम जो कुछ भी करोगे वह सब पृथ्वी पर सर्वाधिक सार्थक ध्येय होगा और मनुष्य का सर्वाधिक न्यायसंगत उपक्रम होगा। यदि तुम अपने रुतबे या लक्ष्यों की खातिर परमेश्वर के आह्वान को अस्वीकार करोगे, तो जो कुछ भी तुम करोगे, वह परमेश्वर द्वारा शापित किया जाएगा, और भी अधिक यह उसके लिए घृणित होगा। शायद तुम कोई प्रधानमंत्री, कोई वैज्ञानिक, कोई पादरी या कोई एल्डर हो, किंतु इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि तुम्हारा पद कितना उच्च है, यदि तुम अपनी योग्यता और ज्ञान का उपयोग अपना खुद का उपक्रम चलाने में करते हो, तो तुम हमेशा असफल रहोगे, और हमेशा परमेश्वर के आशीषों से वंचित रहोगे, क्योंकि परमेश्वर ऐसा कुछ भी स्वीकार नहीं करता जो तुम करते हो, वह यह नहीं मानता कि तुम्हारा उपक्रम न्यायसंगत है या यह नहीं मानता कि तुम मानवजाति के भले के लिए कार्य कर रहे हो। वह कहेगा कि जो कुछ भी तुम करते हो, वह परमेश्वर द्वारा मनुष्य की सुरक्षा को दूर ढकेलने की कोशिश में इंसानी ज्ञान और ताकत का उपयोग करना है और यह परमेश्वर के आशीषों को नकारना है। वह कहेगा कि तुम मानवजाति को अंधकार की ओर, मृत्यु की ओर और एक ऐसे अंतहीन अस्तित्व के आरंभ की ओर ले जा रहे हो जिसमें मनुष्य परमेश्वर के बिना है और उसने उसके आशीष खो दिए हैं।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परिशिष्ट 2 : परमेश्वर संपूर्ण मानवजाति के भाग्य पर संप्रभु है

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 263

सामाजिक विज्ञानों के आगमन के बाद से ही मनुष्य का दिल विज्ञान और ज्ञान से भर गया है। विज्ञान और ज्ञान तब से मानवजाति के शासन के लिए उपकरण बन गए हैं, जिससे मनुष्य के पास परमेश्वर की आराधना करने के लिए पर्याप्त गुंजाइश और परमेश्वर की आराधना करने के लिए उतनी अनुकूल परिस्थितियाँ नहीं बची हैं। मनुष्य के हृदय में परमेश्वर की स्थिति लगातार गिरती जा रही है। अपने हृदय में परमेश्वर के लिए स्थान न होने पर मनुष्य का आंतरिक संसार अंधकारमय, निराशाजनक और खाली होता है। बाद में मनुष्य के हृदय और मन में भरने के लिए कई समाज-वैज्ञानिकों, इतिहासकारों और राजनीतिज्ञों ने सामने आकर सामाजिक विज्ञान के सिद्धांत, मानव-विकास के सिद्धांत और अन्य कई सिद्धांत व्यक्त किए, जो इस सत्य का खंडन करते हैं कि परमेश्वर ने मनुष्य की रचना की है, और इस तरह, यह विश्वास करने वाले बहुत कम होते गए हैं कि परमेश्वर ने सब कुछ बनाया है और विकास के सिद्धांत पर विश्वास करने वालों की संख्या और अधिक बढ़ती गई है। अधिकाधिक लोग पुराने विधान के युग के दौरान परमेश्वर के कार्य के अभिलेखों और उसके वचनों को मिथक और किंवदंतियाँ समझते हैं। अपने हृदयों में लोग परमेश्वर की गरिमा और महानता के प्रति उदासीन हो जाते हैं और वे परमेश्वर के अस्तित्व के प्रति उदासीन हो जाते हैं और इस सिद्धांत के प्रति भी कि परमेश्वर सभी चीजों पर संप्रभु है। मानवजाति का अस्तित्व और देशों एवं राष्ट्रों का भाग्य उनके लिए अब महत्वपूर्ण नहीं रहे, और मनुष्य केवल खाने-पीने और भोग-विलास के अनुसरण पर ध्यान लगाए एक खोखले संसार में रहता है। ... बहुत थोड़े लोग स्वयं इस बात की खोज करने की पहल करते हैं कि आज परमेश्वर अपना कार्य कहाँ करता है, या यह तलाशने की पहल कि वह किस प्रकार मनुष्य के गंतव्य पर संप्रभु है और उसकी व्यवस्था करता है। और इस तरह, मनुष्य के बिना जाने ही मानव-सभ्यता मनुष्य की इच्छाओं के अनुसार चलने में अधिक से अधिक अक्षम होती चली जाती है; कई ऐसे लोग भी हैं जो यह महसूस करते हैं कि ऐसे संसार में रहकर वे उन लोगों की तुलना में कम खुश हैं जिनकी मृत्यु हो चुकी है। यहाँ तक कि उन देशों के लोग भी, जो अत्यधिक सभ्य हुआ करते थे, इस तरह की शिकायतें व्यक्त करते हैं। क्योंकि परमेश्वर के मार्गदर्शन के बिना अगर शासक और समाजशास्त्री मानव सभ्यता को संरक्षित रखने के लिए अपना दिमाग खपा भी लें, तो भी कोई फायदा नहीं होगा। मनुष्य के हृदय का खालीपन कोई व्यक्ति नहीं भर सकता, क्योंकि कोई भी व्यक्ति मनुष्य का जीवन नहीं हो सकता और कोई भी सामाजिक सिद्धांत मनुष्य को खालीपन की परेशानियों से मुक्ति नहीं दिला सकता। विज्ञान, ज्ञान, स्वतंत्रता, लोकतंत्र, सुख और आराम मनुष्य को केवल अस्थायी सांत्वना देते हैं। ये चीजें होने के बावजूद मनुष्य अभी भी अपरिहार्य रूप से पाप करता है और समाज में अन्याय की शिकायत करता है। इन चीजों का होना मनुष्य की अन्वेषण की अभिलाषा और इच्छा को बाधित नहीं कर सकता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि मनुष्य को परमेश्वर द्वारा बनाया गया था और मनुष्य के निरर्थक त्याग और अन्वेषण उसके लिए अधिकाधिक कष्ट ही लाएंगे, और मनुष्य को निरंतर व्याकुलता की स्थिति में रखेंगे, वह यह नहीं जानता कि मानवजाति के भविष्य का सामना कैसे करे या आगामी मार्ग का सामना कैसे करे, इस हद तक कि मनुष्य ज्ञान-विज्ञान से भी डरने लगता है और खालीपन के एहसास से तो और भी घबराने लगता है। इस संसार में, चाहे तुम किसी स्वतंत्र देश में रहते हो या बिना मानवाधिकारों वाले देश में, तुम मानवजाति के भाग्य से बचने में सर्वथा अक्षम हो। तुम चाहे शासक हो या शासित, तुम मानवजाति के भाग्य, रहस्यों और गंतव्य का पता लगाने की इच्छा से बचने में सर्वथा अक्षम हो, खालीपन की अव्याख्येय भावना से बचने में तो तुम और भी अधिक अक्षम हो। इस प्रकार की घटनाएँ, जो समस्त मानवजाति के लिए आम हैं, समाजशास्त्रियों द्वारा सामाजिक घटनाएँ कही जाती हैं, लेकिन कोई भी महान व्यक्ति ऐसी समस्याओं का समाधान करने के लिए सामने नहीं आ सकता है। मनुष्य आखिर मनुष्य है; परमेश्वर के दर्जे और जीवन की जगह कोई मनुष्य नहीं ले सकता। मानवजाति को केवल एक ऐसे न्यायपूर्ण समाज की ही आवश्यकता नहीं है जिसमें हर व्यक्ति को भरपेट भोजन मिले, सभी समान और स्वतंत्र हों; मानवजाति को जिस चीज की जरूरत है वह है परमेश्वर का उद्धार और मनुष्य के लिए उसके जीवन की आपूर्ति। जब मनुष्य परमेश्वर के जीवन की आपूर्ति और उसका उद्धार प्राप्त करता है, केवल तभी उसकी आवश्यकताओं, अन्वेषण की इच्छा और दिल के खालीपन का समाधान हो सकता है। यदि किसी देश या राष्ट्र के लोग परमेश्वर का उद्धार और उसकी छत्रछाया प्राप्त करने में असमर्थ हैं तो ऐसा देश या राष्ट्र पतन की ओर, अंधकार की ओर बढ़ेगा और नतीजे में परमेश्वर द्वारा जड़ से मिटा दिया जाएगा।

शायद तुम्हारा देश वर्तमान में समृद्ध हो रहा है, किंतु यदि तुम अपने लोगों को परमेश्वर से भटकने दोगे तो तुम्हारा देश स्वयं को उत्तरोत्तर परमेश्वर के आशीषों से वंचित होता हुआ पाएगा, इसकी सभ्यता उत्तरोत्तर मनुष्य के पैरों तले रौंदी जाएगी और जल्दी ही इसके लोग परमेश्वर के विरुद्ध उठ खड़े होंगे और स्वर्ग को कोसने लगेंगे। इस तरह से देश का भाग्य अनजाने में ही नष्ट हो जाएगा। परमेश्वर शक्तिशाली देशों को उन देशों का मुकाबला करने के लिए ऊपर उठाएगा जिन्हें परमेश्वर द्वारा श्राप दिया गया है, यहाँ तक कि वह पृथ्वी से उनका अस्तित्व भी मिटा सकता है। किसी देश या राष्ट्र की समृद्धि या विनाश की कुँजी यह है कि उसके शासक परमेश्वर की आराधना करते हैं या नहीं, और क्या वे अपने लोगों की अगुआई परमेश्वर के निकट लाने और उसकी आराधना करने में करते हैं। लेकिन इस अंतिम युग में चूँकि ईमानदारी से परमेश्वर को खोजने और उसकी आराधना करने वाले लोग तेजी से दुर्लभ होते जा रहे हैं, इसलिए परमेश्वर उन देशों पर अपना विशेष अनुग्रह बरसाता है जिनमें ईसाइयत एक राज्य धर्म है। वह संसार में एक अपेक्षाकृत न्यायसंगत शिविर बनाने के लिए उन देशों को इकट्ठा करता है, जबकि नास्तिक देश और सच्चे परमेश्वर की आराधना न करने वाले देश न्यायसंगत शिविर के विरोधी बन जाते हैं। इस तरह से परमेश्वर का मानवजाति के बीच न केवल एक स्थान होता है, जिसमें वह अपना कार्य करता है, बल्कि साथ ही वह उन देशों को भी प्राप्त करता है जो न्यायसंगत अधिकार का प्रयोग कर सकते हैं, और उन देशों पर अंकुश और प्रतिबंध लगाने देता है जो परमेश्वर का विरोध करते हैं। इसके बावजूद परमेश्वर अभी भी अपनी आराधना करने के लिए और अधिक लोगों को हासिल करने में समर्थ नहीं है, क्योंकि मनुष्य परमेश्वर से बहुत दूर भटक गया है और बहुत समय से उसे भूल बैठा है, और इस पृथ्वी पर मात्र देश हैं जो न्याय को लागू करते हैं और अन्याय को रोकते हैं। किंतु यह परमेश्वर की इच्छाओं तक पहुँचने से दूर है, क्योंकि किसी भी देश का शासक अपने लोगों के ऊपर परमेश्वर को शासन नहीं करने देगा, और किसी भी देश का कोई राजनीतिक दल अपने लोगों को परमेश्वर को श्रद्धा अर्पित करने के लिए इकट्ठा नहीं करेगा; परमेश्वर प्रत्येक देश, राष्ट्र, सत्तारूढ़ दल और यहाँ तक कि प्रत्येक व्यक्ति के हृदय में अपना यथोचित स्थान खो चुका है। यद्यपि इस संसार में कुछ न्यायसंगत शक्तियों का अस्तित्व जरूर है, ऐसा कोई भी शासन बहुत कमजोर है जिसमें मनुष्य के हृदय में परमेश्वर का स्थान न हो, और जिस राजनीतिक परिदृश्य में परमेश्वर का आशीष न हो वह अव्यवस्थित है और एक भी झटके के सामने टिक नहीं पाएगा। मानवजाति के लिए परमेश्वर के आशीष से रहित होना सूर्य से रहित होने के बराबर है। शासक अपने लोगों के लिए चाहे कितने भी परिश्रम से योगदान क्यों न करें, मानवजाति चाहे कितने भी न्यायसंगत सम्मेलन आयोजित क्यों न करे, इनमें से कुछ भी ज्वार को नहीं पलटेगा या मानवजाति के भाग्य को नहीं बदलेगा। मनुष्य का मानना है कि वह देश, जिसमें लोगों को भोजन और वस्त्र मिलते हैं, जिसमें वे शांति से एक-साथ रहते हैं, एक अच्छा देश है, ऐसा देश है जिसमें अच्छे नेता हैं। किंतु परमेश्वर ऐसा नहीं सोचता। उसका मानना है कि वह देश, जिसमें कोई उसकी आराधना नहीं करता, एक ऐसा देश है, जिसे वह जड़ से मिटा देगा। मनुष्य के विचार परमेश्वर के विचारों से हमेशा बहुत भिन्न होते हैं। इसलिए यदि किसी देश का मुखिया परमेश्वर की आराधना नहीं करता तो उस देश का भाग्य बहुत ही दुःखद होगा और उस देश का कोई गंतव्य नहीं होगा।

परमेश्वर मनुष्य की राजनीति में भाग नहीं लेता, फिर भी वह हर देश और राष्ट्र का भाग्य नियंत्रित करता है, वह इस संसार को और संपूर्ण ब्रह्मांड को नियंत्रित करता है। मानवजाति का भाग्य और परमेश्वर की योजना घनिष्ठता से जुड़े हुए हैं, और कोई भी व्यक्ति, देश या राष्ट्र परमेश्वर की संप्रभुता से बच नहीं सकता है। यदि मनुष्य अपना भाग्य जानना चाहता है तो उसे परमेश्वर के सामने आना होगा। परमेश्वर उन लोगों को समृद्ध करेगा जो उसका अनुसरण और उसकी आराधना करते हैं, और वह उनका पतन और विनाश करेगा, जो उसका प्रतिरोध करते हैं और उसे अस्वीकार करते हैं।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परिशिष्ट 2 : परमेश्वर संपूर्ण मानवजाति के भाग्य पर संप्रभु है

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 264

ब्रह्मांड और आकाश की विशालता में अनगिनत जीव रहते और प्रजनन करते हैं, एक अंतहीन चक्र में जीवन के नियम का पालन करते हैं, और एक अटल नियम का अनुसरण करते हैं। जो मर जाते हैं वे अपने साथ जीवित लोगों की कहानियाँ लेकर चले जाते हैं, और जो लोग जी रहे हैं वे खत्म हो चुके लोगों के उसी त्रासद इतिहास को दोहराते हैं। और इसलिए, मानवजाति यह पूछे बिना नहीं रह पाती : हम क्यों जीते हैं? और हमें मरना क्यों पड़ता है? इस संसार पर कौन शासन करता है? और इस मानवजाति को किसने बनाया? क्या मानवजाति को वास्तव में प्रकृति ने बनाया? क्या मानवजाति वास्तव में अपने भाग्य को नियंत्रित कर सकती है? ... ये वे सवाल हैं, जो मानवजाति ने हजारों वर्षों से अनवरत पूछे हैं। दुर्भाग्य से, जितना अधिक मनुष्य इन सवालों से ग्रस्त हुआ है, उसमें उतनी ही अधिक प्यास विज्ञान के लिए विकसित हुई है। विज्ञान देह की संक्षिप्त तृप्ति और अस्थायी आनंद प्रदान करता है, लेकिन वह मनुष्य को उसकी आत्मा के भीतर की तन्हाई, अकेलेपन, बमुश्किल छिपाए जा सकने वाले आतंक और लाचारी से मुक्त नहीं कर सकता है। मानवजाति केवल उसी वैज्ञानिक ज्ञान का उपयोग करती है, जिसे वह अपनी खुली आँखों से देख सकती है और अपने मस्तिष्क से समझ सकती है, जिससे अपने हृदय को चेतनाशून्य कर सके। फिर भी यह वैज्ञानिक ज्ञान मानवजाति को रहस्यों की खोज करने से रोकने के लिए पर्याप्त नहीं है। मानवजाति यह नहीं जानती कि ब्रह्मांड और सभी चीजों का संप्रभु कौन है, और मानवजाति के प्रारंभ और भविष्य के बारे में तो वह बिल्कुल भी नहीं जानती। मानवजाति केवल इस व्यवस्था के बीच विवशतापूर्वक जीती है। इससे कोई बच नहीं सकता और इसे कोई बदल नहीं सकता, क्योंकि सभी चीजों के बीच और ब्रह्मांड के ऊपर अनंतकाल से लेकर अनंतकाल तक वह एक ही है, जो सभी चीजों पर अपनी संप्रभुता रखता है। वह एक ही है, जिसे मनुष्य द्वारा कभी देखा नहीं गया है, वह जिसे मनुष्य ने कभी नहीं जाना है, जिसके अस्तित्व पर मनुष्य ने कभी विश्वास नहीं किया है—फिर भी वह एक ही है, जिसने मनुष्य के पूर्वजों में साँस फूँकी और मानवजाति को जीवन प्रदान किया। वह एक ही है, जो मानवजाति के लिए आपूर्ति और इसका भरण-पोषण करता है और उसका अस्तित्व बनाए रखता है; और वह एक ही है, जिसने आज तक मानवजाति का मार्गदर्शन किया है। इससे भी अधिक, वह और केवल वह एक ही है, जिस पर मानवजाति अपने अस्तित्व के लिए निर्भर करती है। वह सभी चीजों पर और ब्रह्मांड के सभी जीवित प्राणियों पर संप्रभुता रखता है। वह चारों मौसमों को शासित करता है और वही है जो हवा, पाले, हिमपात और बारिश के बदलावों को नियंत्रित करता है। वह मानवजाति के लिए सूर्य का प्रकाश लाता है और रात्रि का सूत्रपात करता है। यह वही था, जिसने स्वर्ग और पृथ्वी की व्यवस्था की, और मनुष्य को पहाड़, झीलें और नदियाँ और उनके भीतर के सभी जीव प्रदान किए। उसके कर्म सर्वव्यापी हैं, उसकी सामर्थ्य सर्वव्यापी है, उसकी बुद्धि सर्वव्यापी है, और उसका अधिकार सर्वव्यापी है। इन व्यवस्थाओं और नियमों में से प्रत्येक उसके कर्मों का मूर्त रूप है, प्रत्येक उसकी बुद्धिमत्ता और अधिकार का प्रकाशन है। कौन खुद को उसके प्रभुत्व से मुक्त कर सकता है? और कौन उसकी अभिकल्पनाओं से खुद को छुड़ा सकता है? सभी चीजें उसकी निगाह के नीचे मौजूद हैं, और इतना ही नहीं, सभी चीजें उसकी संप्रभुता के अधीन रहती हैं। उसके कर्म और सामर्थ्य मानवजाति के लिए इसे स्वीकार करने के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं छोड़ते कि वह वास्तव में मौजूद है, साथ ही इस तथ्य को भी कि वह सभी चीजों पर संप्रभुता रखता है। उसके अतिरिक्त कुछ भी ब्रह्मांड पर शासन नहीं कर सकता और मानवजाति का निरंतर भरण-पोषण तो बिल्कुल नहीं कर सकता। चाहे तुम परमेश्वर के कर्मों को पहचानने में सक्षम हो या न हो, और चाहे तुम परमेश्वर के अस्तित्व में विश्वास करते हो या न करते हो, इसमें कोई शक नहीं कि तुम्हारा भाग्य परमेश्वर द्वारा नियत किया जाता है, और इसमें भी कोई शक नहीं कि परमेश्वर ही हमेशा वह एक रहेगा जो सभी चीजों पर अपनी संप्रभुता रखेगा। उसका अस्तित्व और अधिकार इस बात से निर्धारित नहीं होता कि वे मनुष्य द्वारा पहचाने और समझे जाते हैं या नहीं। केवल वही मनुष्य के अतीत, वर्तमान और भविष्य को जानता है, और केवल वही मानवजाति के भाग्य का निर्धारण कर सकता है। चाहे तुम इस तथ्य को स्वीकार करने में सक्षम हो या न हो, इसमें ज्यादा समय नहीं लगेगा, जब मानवजाति अपनी आँखों से यह सब देखेगी, और परमेश्वर जल्दी ही इस तथ्य को साकार करेगा। मनुष्य परमेश्वर की आँखों के सामने जीता है और मर जाता है। मनुष्य परमेश्वर के प्रबंधन के लिए जीता है, और अपनी आँखें आखिरी बार इसी प्रबंधन के लिए बंद करता है। मनुष्य बार-बार आता और जाता रहता है, चक्र चलता रहता है। बिना किसी अपवाद के, यह सब परमेश्वर की संप्रभुता और उसकी अभिकल्पना का हिस्सा है। परमेश्वर का प्रबंधन निरंतर अग्रसर है; यह कभी रुका नहीं है। वह मानवजाति को अपने अस्तित्व से अवगत कराएगा, अपनी संप्रभुता में विश्वास करवाएगा, अपने कर्मों का दर्शन करवाएगा, और अपने राज्य में वापस लौटा ले जाएगा। यही उसकी योजना है और वह कार्य है जिसका वह हजारों वर्षों से प्रबंधन कर रहा है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परिशिष्ट 3 : मनुष्य को केवल परमेश्वर के प्रबंधन के बीच ही बचाया जा सकता है

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परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?

परमेश्वर का प्रकटन और कार्य परमेश्वर को जानने के बारे में अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन मसीह-विरोधियों को उजागर करना अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ सत्य के अनुसरण के बारे में सत्य के अनुसरण के बारे में न्याय परमेश्वर के घर से शुरू होता है अंत के दिनों के मसीह, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अत्यावश्यक वचन परमेश्वर के दैनिक वचन सत्य वास्तविकताएं जिनमें परमेश्वर के विश्वासियों को जरूर प्रवेश करना चाहिए मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ राज्य का सुसमाचार फ़ैलाने के लिए दिशानिर्देश परमेश्वर की भेड़ें परमेश्वर की आवाज को सुनती हैं परमेश्वर की आवाज़ सुनो परमेश्वर के प्रकटन को देखो राज्य के सुसमाचार पर अत्यावश्यक प्रश्न और उत्तर मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 1) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 2) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 3) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 4) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 5) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 6) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 7) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 8) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 9) मैं वापस सर्वशक्तिमान परमेश्वर के पास कैसे गया

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