परमेश्वर को जानना IV
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 120
वृहत् और सूक्ष्म-परिप्रेक्ष्य से परमेश्वर के अधिकार को समझना
परमेश्वर का अधिकार अद्वितीय है। यह स्वयं परमेश्वर की विलक्षणता की अभिव्यक्ति है, उसका विशिष्ट सार है, स्वयं परमेश्वर की पहचान है, जो उसके द्वारा रचित या अरचित प्राणी के अधिकार में नहीं है; अर्थात्, केवल सृजनकर्त्ता के पास ही यह अधिकार है। यानी, केवल सृजनकर्त्ता—परमेश्वर जो अद्वितीय है—इस तरह से अभिव्यक्त होता है और उसका यही सार है। इसलिए, परमेश्वर के अधिकार के बारे में बात क्यों करें? स्वयं परमेश्वर का अधिकार मनुष्य के अधिकार से भिन्न कैसे है जिसका विचार मनुष्य अपने मन में करता है? इसमें विशेष क्या है? इसके बारे में यहाँ बात करना विशेष रूप से महत्वपूर्ण क्यों है? तुम सबको इस मुद्दे पर बहुत सावधानीपूर्वक विचार करना चाहिए। क्योंकि अधिकांश लोगों के लिए, “परमेश्वर का अधिकार” एक अस्पष्ट सोच है, एक ऐसी सोच है जिसे समझना आसान नहीं है, और इसके बारे में की जाने वाली कोई भी चर्चा कदाचित गूढ़ हो सकती है। इसलिए परमेश्वर के अधिकार के ज्ञान को मनुष्य समझने में समर्थ है और परमेश्वर के अधिकार के सार के बीच हमेशा एक दूरी रहेगी ही। इस दूरी को भरने के लिए, हर किसी को धीरे-धीरे लोगों, घटनाओं, चीज़ों, या उन घटनाओं के माध्यम से जो मनुष्य की पहुँच के भीतर हैं, और जिन्हें वे अपने वास्तविक जीवन में समझने में समर्थ हैं, परमेश्वर के अधिकार के बारे में जान लेना चाहिए। यद्यपि यह वाक्यांश “परमेश्वर का अधिकार” बहुत गहन प्रतीत हो सकता है, फिर भी परमेश्वर का अधिकार बिल्कुल भी गूढ़ नहीं है। वह मनुष्य के जीवन के प्रत्येक क्षण में उसके साथ विद्यमान है, और प्रतिदिन उसकी अगुआई करता है। इसलिए, प्रत्येक मनुष्य वास्तविक जीवन में अनिवार्य रूप से परमेश्वर के अधिकार के अत्यंत साकार स्वरूप को देखेगा और अनुभव करेगा। यह साकार स्वरूप इस बात का पर्याप्त प्रमाण है कि परमेश्वर का अधिकार वास्तव में विद्यमान है, और यह बात किसी भी व्यक्ति को इस तथ्य को पहचानने और समझने में मदद करती है कि परमेश्वर के पास ऐसा अधिकार है।
परमेश्वर ने सभी चीजों को बनाया। इन्हें बनाने के बाद उसने इन पर अपनी संप्रभुता का प्रयोग किया है और साथ ही इन पर नियंत्रण भी रखता है। “परमेश्वर सभी चीजों पर नियंत्रण रखता है”, यह किस तरह की अवधारणा है? इसे कैसे समझाया जाना चाहिए? यह वास्तविक जीवन से कैसे संबंधित है? “परमेश्वर सभी चीजों पर नियंत्रण रखता है,” इस तथ्य को समझकर व्यक्ति को परमेश्वर के अधिकार को कैसे जानना चाहिए? “परमेश्वर सभी चीजों पर नियंत्रण रखता है” इस कथन से हमें यह देखना चाहिए कि परमेश्वर जिन चीजों पर नियंत्रण रखता है वह ग्रहों का कोई हिस्सा या सृष्टि का कोई हिस्सा नहीं है, मानवजाति का कोई हिस्सा तो बिल्कुल भी नहीं है; बल्कि विशाल से लेकर सूक्ष्म तक, दृश्य से लेकर अदृश्य तक और ब्रह्मांड के खगोलीय पिंडों से लेकर पृथ्वी पर मौजूद कई सजीव प्राणियों तक—साथ ही नंगी आँखों से न देखे जा सकने वाले सूक्ष्मजीवों और विभिन्न अन्य रूपों में मौजूद प्राणियों तक—सभी चीजें परमेश्वर द्वारा नियंत्रित हैं। यह “परमेश्वर सभी चीजों पर नियंत्रण रखता है,” कथन में “सभी चीजों” को सटीक रूप से परिभाषित करता है; यह ठीक वही दायरा है जिसके भीतर परमेश्वर अपने अधिकार का प्रयोग करता है और अपनी संप्रभुता और शासन चलाता है।
मानवजाति के अस्तित्व में आने से पहले, ब्रह्माण्ड—आकाश के समस्त ग्रह, सभी सितारे—पहले से ही अस्तित्व में थे। बृहद स्तर पर, ये खगोलीय पिंड, अपने सम्पूर्ण अस्तित्व के लिए, परमेश्वर के नियन्त्रण में नियमित रूप से अपने कक्ष में परिक्रमा करते रहे हैं, चाहे ऐसा करने में कितने ही वर्ष लगते हों। कौन-सा ग्रह किस समय में कहाँ जाता है; कौन-सा ग्रह कौन-सा कार्य करता है, और कब करता है; कौन-सा ग्रह किस कक्ष में चक्कर लगाता है, और वह कब अदृश्य हो जाता है या बदल दिया जाता है—ये सभी चीज़ें बिना कोई त्रुटि के होती रहती हैं। ग्रहों की स्थितियाँ और उनके बीच की दूरियाँ सभी कठोर प्रतिमानों का पालन करती हैं, उन सभी को सटीक आँकड़ों द्वारा वर्णित किया जा सकता है; वे जिस ग्रहपथ पर घूमते हैं, उनके कक्षों की गति और स्वरूप, वह समय जब वे विभिन्न स्थितियों में होते हैं, इन सभी को सटीक ढंग से निर्धारित व विशेष नियमों द्वारा परिमाणित किया जा सकता है। बिना चूके युगों से ग्रह इन नियमों का पालन कर रहे हैं। कोई भी शक्ति उनके कक्षों या तरीकों को, जिनका वे पालन करते हैं, नहीं बदल सकती, न ही कोई रुकावट पैदा कर सकती है। क्योंकि वे विशेष नियम जो उनकी गति को संचालित करते हैं और वे सटीक आँकड़े जो उनका वर्णन करते हैं, सृजनकर्त्ता के अधिकार द्वारा पूर्वनियत हैं, वे सृजनकर्त्ता की संप्रभुता और नियन्त्रण के अधीन इन नियमों का पालन अपनी इच्छा से करते हैं। बृहत स्तर पर, कुछ प्रतिमानों, कुछ आँकड़ों, और कुछ अजीब और समझाए न जा सकने वाले नियमों या घटनाओं के बारे में जानना मनुष्य के लिए कठिन नहीं है। यद्यपि मानवजाति यह नहीं स्वीकारती कि परमेश्वर है, न ही इस तथ्य को स्वीकार करती है कि सृजनकर्त्ता ने ही हर चीज़ को बनाया है और हर चीज़ पर संप्रभु है, और यही नहीं सृजनकर्त्ता के अधिकार के अस्तित्व को भी नहीं स्वीकारती, फिर भी मानव-विज्ञानियों, खगोलशास्त्रियों और भौतिक-विज्ञानियों को लगातार पता चल रहा है कि सभी चीजों के अस्तित्व और गतियों को निर्देशित करने वाले सिद्धांत और आवर्ती कार्यप्रणालियां (पैटर्न) एक विशाल और गुप्त श्याम ऊर्जा द्वारा शासित और नियन्त्रित होती हैं। यह तथ्य मनुष्य को बाध्य करता है कि वह इस बात का सामना करे और स्वीकार करे कि इन गतियों के स्वरूपों के बीच एक शक्तिशाली जन है, जो हर एक चीज़ का आयोजन करता है। उसका सामर्थ्य असाधारण है, और यद्यपि कोई भी उसके असली स्वरूप को नहीं देख पाता, फिर भी वह हर क्षण हर एक चीज पर संप्रभुता रखता हैऔर नियन्त्रित करता है। कोई भी व्यक्ति या ताकत उसकी संप्रभुता से परे नहीं जा सकती। इस सत्य का सामना करते हुए, मनुष्य को यह अवश्य पहचानना चाहिए कि वे नियम जो सभी चीज़ों के अस्तित्व को संचालित करते हैं उन्हें मनुष्यों द्वारा नियन्त्रित नहीं किया जा सकता, किसी के भी द्वारा बदला नहीं जा सकता; साथ ही उसे यह भी स्वीकार करना चाहिए कि मानवजाति इन नियमों को पूरी तरह से नहीं समझ सकती, और वे प्राकृतिक रूप से घटित नहीं हो रही हैं, बल्कि एक परम सत्ता उनका निर्धारण कर रही है। ये सब परमेश्वर के अधिकार की अभिव्यक्तियाँ हैं जिन्हें मनुष्य जाति बृहत स्तर पर समझ व महसूस कर सकती है।
सूक्ष्म स्तर पर, सभी पहाड़, नदियाँ, झीलें, समुद्र और भू-भाग जिन्हें मनुष्य पृथ्वी पर देखता है, सारे मौसम जिनका वह अनुभव करता है, पेड़-पौधे, जानवर, सूक्ष्मजीव और मनुष्य सहित, सारी चीज़ें जो पृथ्वी पर निवास करती हैं, सभी परमेश्वर की संप्रभुता के अधीन हैं, और परमेश्वर द्वारा नियन्त्रित की जाती हैं। परमेश्वर की संप्रभुता और नियन्त्रण के अंतर्गत, सभी चीज़ें उसके विचारों के अनुरूप अस्तित्व में आती हैं या अदृश्य हो जाती हैं; नियम बनते हैं जो उनके जीवन को संचालित करते हैं, और वे उनके अनुसार चलते हुए विकास करते हैं और निरंतर अपनी संख्या बढ़ाते हैं। कोई भी मनुष्य या चीज इन नियमों के ऊपर नहीं है। ऐसा क्यों है? इसका एकमात्र उत्तर है : ऐसा परमेश्वर के अधिकार की वजह से है। दूसरे शब्दों में कहें तो, परमेश्वर के विचारों और परमेश्वर के वचनों के कारण है; स्वयं परमेश्वर के कार्यों की वजह से है। अर्थात्, यह परमेश्वर का अधिकार और परमेश्वर की इच्छा है जो इन नियमों को बनाती है; जो उसके विचार के अनुसार परिवर्तित होंगे एवं बदलेंगे, ये सभी परिवर्तन और बदलाव उसकी योजना की खातिर घटित होंगे या मिट जाएँगे। उदाहरण के लिए, महामारियों को ही लें। वे बिना चेतावनी दिए ही अचानक फैल जाती हैं। वे कैसे फैलीं या क्यों हुईं, इसके सही कारणों के बारे में किसी को नहीं पता, और जब कभी भी कोई महामारी किसी स्थान पर फैलती है, तो अभिशप्त लोग ऐसी विपत्ति से बच नहीं पाते हैं। मानव-विज्ञान का मानना है कि महामारियाँ ख़तरनाक या हानिकारक सूक्ष्म रोगाणुओं के फैलने से उत्पन्न होती हैं, और उनकी रफ्तार, पहुँच और एक से दूसरे तक संचारण के तरीके का पूर्वानुमान या नियन्त्रण मानव-विज्ञान द्वारा करना संभव नहीं है। हालाँकि, मनुष्य हर सम्भव तरीके से महामारी को रोकने का प्रयत्न करता है, लेकिन जब महामारियां फैलती हैं तो कौन-सा व्यक्ति या पशु अपरिहार्य रूप से इसकी चपेट में आ जाएगा, इसे वह नियंत्रित नहीं कर पाता। मनुष्य केवल उनको रोकने का और उनसे बचाव करने का और उन पर शोध करने का प्रयास कर सकता है। परन्तु कोई भी उस मूल वजह को नहीं जानता जो यह बता सके कि किसी महामारी की शुरुआत और अंत कैसे होता है, और न ही कोई उन्हें नियन्त्रित कर सकता है। किसी महामारी के शुरू होने और फैलने पर, सबसे पहले मनुष्य जो कदम उठाता है वह होता है उसका टीका विकसित करना, परन्तु अक्सर टीका तैयार होने से पहले ही वह महामारी अपने आप ही ख़त्म हो जाती है। आखिर क्यों महामारियाँ खत्म हो जाती हैं? कुछ लोग कहते हैं कि रोगाणुओं को नियन्त्रित कर लिया जाता है, कुछ का कहना है कि मौसम के बदलने से वे खत्म हो जाती हैं। ये अनुमान तर्कसंगत हैं या नहीं, विज्ञान इसके बारे में न तो कोई स्पष्टीकरण दे सकता है, न ही कोई सटीक उत्तर। मानवजाति को न केवल इन अटकलबाज़ियों का सामना करना है, वरन महामारियों के बारे में अपनी समझ की कमी और भय से भी निपटना है। अंततः कोई नहीं जानता कि महामारियाँ क्यों शुरू होती हैं या वे क्यों खत्म हो जाती हैं। क्योंकि मानवजाति का विश्वास केवल विज्ञान में है, वह पूरी तरह से उसी पर आश्रित है, वह सृजनकर्ता के अधिकार को नहीं पहचानती या उसकी संप्रभुता को स्वीकार नहीं करती, इसलिए उसे कभी भी इसका कोई उत्तर नहीं मिल पाएगा।
परमेश्वर की संप्रभुता के अधीन, उसके अधिकार के कारण और उसके प्रबंधन की खातिर सभी चीजें जन्म लेती हैं, जीवित रहती हैं और नष्ट हो जाती हैं। कुछ चीजें चुपचाप आती और चली जाती हैं और मनुष्य नहीं देख सकता कि वे कहाँ से आई हैं, न ही उन नियमों को समझ सकता है जिनका वे अनुसरण करती हैं और वह उन कारणों को तो बिल्कुल नहीं समझ पाता कि वे क्यों आती हैं और क्यों चली जाती हैं। यद्यपि सभी वस्तुओं के बीच जो कुछ भी घटित होता है, वह सब मनुष्य द्वारा अपनी ही आँखों से देखा जा सकता है, अपने ही कानों से सुना जा सकता है या स्वयं अनुभव किया जा सकता है; यूँ तो यह मनुष्य से संबंधित है और यूँ तो मनुष्य अवचेतन रूप से विभिन्न घटनाओं की असामान्यता, नियमितता या यहाँ तक कि विचित्रता को भी अनुभव कर सकता है, फिर भी वह सभी चीजों के बीच जो भी घटित होता है उसके पीछे निहित सृष्टिकर्ता के इरादों और विचारों के बारे में कुछ भी नहीं जानता। वहाँ अनेक कहानियाँ और अनेक गुप्त सत्य छिपे हुए होते हैं। चूँकि मनुष्य भटक कर सृष्टिकर्ता से बहुत दूर चला गया है और चूँकि वह इस तथ्य को स्वीकार नहीं करता कि सृष्टिकर्ता का अधिकार सभी चीजों पर संप्रभु है, इसलिए वह कभी भी वह सब कुछ नहीं जान और समझ सकेगा जो सृष्टिकर्ता के अधिकार की संप्रभुता के अंतर्गत घटित होता है। संक्षेप में, परमेश्वर का नियंत्रण और संप्रभुता मानव की कल्पना, मानव के ज्ञान, मानव की समझ और वह सब कुछ जिसकी प्राप्ति मानवीय विज्ञान कर सकता है, इन सबकी सीमाओं से परे है; ये सृजित मानवजाति की क्षमताओं से परे हैं। कुछ लोग कहते हैं, “तुमने परमेश्वर की संप्रभुता नहीं देखी है—तुम कैसे विश्वास कर सकते हो कि यह सब कुछ उसके अधिकार का नतीजा है?” देखने का मतलब जरूरी नहीं कि विश्वास करना या स्वीकार करना और समझना हो। तो विश्वास करना कहाँ से आता है? मैं निश्चय के साथ कह सकता हूँ कि विश्वास लोगों द्वारा चीजों के मूल कारणों और वास्तविकता की समझ और अनुभव के स्तर और गहराई से उत्पन्न होता है। यदि तुम विश्वास करते हो कि परमेश्वर का अस्तित्व है, किंतु तुम सभी चीजों के ऊपर परमेश्वर की संप्रभुता और परमेश्वर के नियंत्रण के तथ्य को स्वीकार नहीं करते हो, इसे देखने की बात तो दूर है, तो तुम अपने हृदय में यह कभी स्वीकार नहीं करोगे कि परमेश्वर के पास इस प्रकार का अधिकार है और परमेश्वर का अधिकार अद्वितीय है और तुम सृष्टिकर्ता को कभी भी अपने प्रभु और अपने परमेश्वर के रूप में सचमुच स्वीकार नहीं करोगे।
—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 121
सृष्टिकर्ता की संप्रभुता से मानवजाति का भाग्य और विश्व का भाग्य अविभाज्य हैं
तुम सब वयस्क हो। तुम लोगों में से कुछ अधेड़-उम्र के हैं; कुछ लोग वृद्धावस्था में कदम रख चुके हैं। तुम लोग परमेश्वर पर विश्वास न करने से लेकर, उस पर विश्वास करने और परमेश्वर पर विश्वास करना शुरू करने से लेकर परमेश्वर के वचन को स्वीकार करने और उसके कार्यों का अनुभव करने तक के दौर से गुजरे हो। तुम्हें परमेश्वर की संप्रभुता का कितना ज्ञान है? मनुष्य के भाग्य में तुम्हें कौन-सी अंतर्दृष्टियाँ प्राप्त हुई हैं? क्या तुम्हारे जीवन में सब कुछ वास्तव में बिल्कुल तुम्हारी इच्छा के अनुसार हो सकता है? तुम लोगों के जीवन के कुछ दशकों के दौरान, कितनी चीजें वैसी हुई हैं जैसा तुम लोग चाहते थे? कितनी चीजों का तुम अनुमान नहीं लगा पाए हो? कितनी चीजें सुखद आश्चर्य के रूप में सामने आईं? कितनी चीजों के नतीजों की तुम अभी भी प्रतीक्षा कर रहे हो या अभी भी अनजाने में सही समय की, स्वर्ग की इच्छा की प्रतीक्षा कर रहे हो? कितनी चीजें तुम्हें असहाय कर देती हैं और तुम्हें समझ नहीं आता कि आगे क्या करना है? हर कोई अपनी नियति से बहुत अपेक्षाएँ रखता है, यह आशा करता है कि उसके जीवन में सब कुछ उसकी इच्छा के अनुसार होगा, उसे भोजन या कपड़े की कोई कमी नहीं होगी और उसका भाग्य शानदार ढंग से चमकेगा। कोई भी जीवन में गरीब और दीन-हीन नहीं होना चाहता, कठिनाइयों और निरंतर आपदाओं से घिरा नहीं रहना चाहता। लेकिन इनमें से कोई भी ऐसी चीज नहीं है जिसका लोग पूर्वानुमान लगा सकें या जिसे नियंत्रित कर सकें। शायद कुछ लोगों के लिए, अतीत बस अनुभवों का घालमेल है; वे कभी नहीं सीखते कि स्वर्ग की इच्छा क्या है, और न ही वे इसकी कोई परवाह ही करते हैं कि वह क्या है। वे बिना सोचे समझे, जानवरों की तरह, दिन-रात जीते हुए, इस बारे में परवाह किए बिना कि मानवजाति का भाग्य क्या है, या मानव क्यों जीवित है या उसे किस प्रकार जीना चाहिए, अपना जीवन बिताते हैं। ऐसे लोग मनुष्य के भाग्य के बारे में कोई समझ प्राप्त किए बिना ही वृद्धावस्था तक पहुँच जाते हैं, और मरने की घड़ी तक उन्हें पता ही नहीं होता है कि जीवन वास्तव में क्या है। ऐसे लोग मरे हुए हैं; वे ऐसे प्राणी हैं जिनमें आत्मा नहीं है; वे जानवर हैं। यद्यपि लोग सृष्टि के अंदर रहते हैं और अनेक तरीकों से आनन्द प्राप्त करते हैं जिनसे संसार अपनी भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति करता है, यद्यपि वे इस भौतिक संसार को निरन्तर आगे बढ़ते हुए देखते हैं, फिर भी उनके स्वयं के अनुभव का—जो उनका हृदय और उनकी आत्मा महसूस और अनुभव करती है—भौतिक चीज़ों के साथ कोई लेना-देना नहीं होता, और कोई भी भौतिक चीज़ अनुभव का पर्याय नहीं बन सकती। अनुभव किसी व्यक्ति के हृदय की गहराई में निहित एक अभिज्ञान है, ऐसी चीज़ है जिसे खुली आँखों से नहीं देखा जा सकता। यह अभिज्ञान मनुष्य के जीवन और उसके भाग्य के बारे में उसकी समझ, और उसकी अनुभूति में निहित होता है। यह प्रायः किसी को भी इस आशंका से ग्रस्त कर देता है कि एक अनदेखा संप्रभु इन सभी चीज़ों को व्यवस्थित कर रहा है, मनुष्य के लिए हर एक चीज़ का आयोजन कर रहा है। इन सबके बीच, व्यक्ति भाग्य की व्यवस्थाओं और आयोजनों को स्वीकार करने के अलावा और कुछ नहीं कर सकता; और इंसान सृजनकर्ता द्वारा उसके लिए बनाए गए मार्ग को स्वीकारने और अपनी नियति पर सृजनकर्ता की संप्रभुता को स्वीकारने के अलावा कुछ नहीं कर पाता। यह एक निर्विवाद सत्य है। इंसान अपने भाग्य के बारे में कोई भी अन्तर्दृष्टि और दृष्टिकोण रखे, लेकिन वह इस सच्चाई को बदल नहीं सकता।
कोई मनुष्य कहाँ जाएगा, वह क्या करेगा, वह किन लोगों या परिस्थितियों का सामना करेगा, वह क्या बातें कहेगा और प्रत्येक दिन के दौरान क्या होगा—क्या ये ऐसी चीजें हैं जिनका वह पूर्वानुमान लगा सकता है? यह कहा जा सकता है कि मनुष्य न केवल इन सभी घटनाओं का पूर्वानुमान नहीं लगा सकता, बल्कि इससे भी बढ़कर, वह यह भी नियंत्रित नहीं कर सकता कि चीजें कैसे विकसित होती हैं। मनुष्य के दैनिक जीवन में, ये अप्रत्याशित चीजें कोई नई बात नहीं हैं, ये आम घटनाएँ हैं। दैनिक जीवन के इन तुच्छ मामलों का घटित होना, और उनके विकसित होने के साधन और नियम, मानवजाति के लिए निरंतर अनुस्मारक हैं : जो कुछ भी होता है वह कोई संयोग नहीं है; जो कुछ भी होता है उसके विकास के क्रम और उसकी अवश्यंभाविता को मानवीय इच्छा से बदला नहीं जा सकता है। जो कुछ भी होता है उसका घटित होना सृष्टिकर्ता की ओर से मानवजाति के लिए एक नसीहत देता है और यह संदेश भेजता है कि लोग अपने भाग्य को नियंत्रित नहीं कर सकते हैं। साथ ही, यह मानवजाति की अपने भाग्य को अपने हाथों में लेने की ढीठ महत्वाकांक्षा और इच्छा के खिलाफ एक पलटवार है। यह वार मानवजाति के चेहरे पर बार-बार पड़ने वाले जोरदार तमाचे की तरह है; इससे लोग यह चिंतन करने के लिए मजबूर होते हैं कि वास्तव में कौन उनके भाग्य पर संप्रभुता रखता है और उसे नियंत्रित करता है। और जैसे-जैसे उनकी महत्वाकांक्षाएँ और इच्छाएँ लगातार धराशायी और चकनाचूर होती जाती हैं, लोग अनजाने में ही भाग्य की व्यवस्थाओं के साथ चलने, और वास्तविकता, स्वर्ग की इच्छा, और सृष्टिकर्ता की संप्रभुता को स्वीकार करने के लिए मजबूर हो जाते हैं। दैनिक जीवन के तुच्छ मामलों के बार-बार घटित होने से लेकर मानवजाति के जीवन के भाग्य तक, ऐसा कुछ भी नहीं है जो सृष्टिकर्ता की संप्रभुता और व्यवस्थाओं को प्रकट न करता हो; ऐसा कुछ भी नहीं है जो यह संदेश न भेजता हो कि सृष्टिकर्ता के अधिकार को पार नहीं किया जा सकता, जो इस शाश्वत अपरिवर्तनीय सत्य को व्यक्त न करता हो कि सृष्टिकर्ता का अधिकार सर्वोच्च है!
मानवजाति और सभी चीजों के भाग्य सृजनकर्ता की संप्रभुता के साथ घनिष्ठता से गुँथे हुए हैं, और सृजनकर्ता के आयोजनों के साथ अविभाज्य रूप से बँधे हुए हैं; अंत में, वे सृजनकर्ता के अधिकार से अलग नहीं हो सकते। सभी चीज़ों के नियमों के माध्यम से मनुष्य सृजनकर्ता के आयोजन और उसकी संप्रभुता को समझ जाता है; सभी चीज़ों के जीने के नियमों के माध्यम से वह सृजनकर्ता के संचालन को समझ जाता है, सभी चीज़ों की नियति से वह उन तरीकों के बारे में अनुमान लगा लेता है जिनके द्वारा सृजनकर्ता अपनी संप्रभुता का उपयोग करता है और उन पर नियन्त्रण करता है; मानवजाति के जीवन चक्रों और सभी चीज़ों में, मनुष्य वास्तव में सभी चीज़ों और जीवित प्राणियों के लिए सृजनकर्ता के आयोजनों और व्यवस्थाओं का अनुभव करता है, वह देखता है कि किस प्रकार वे आयोजन और व्यवस्थाएँ सभी सांसारिक कानूनों, नियमों, संस्थानों और अन्य सभी शक्तियों और ताक़तों की जगह ले लेती हैं। ऐसा होने पर, मानवजाति यह मानने को बाध्य हो जाती है कि कोई भी सृजित प्राणी सृजनकर्ता की संप्रभुता का उल्लंघन नहीं कर सकता, सृजनकर्ता द्वारा पूर्वनिर्धारित घटनाओं और चीज़ों को कोई भी शक्ति बाधा नहीं डाल सकती। मनुष्य इन अलौकिक कानूनों और नियमों के अधीन जीता है, सभी चीज़ें कायम रहती हैं और पीढ़ी दर पीढ़ी वंश बढ़ाती हैं और फैलती हैं। क्या यह सृजनकर्ता के अधिकार का असली मूर्तरूप नहीं है? यद्यपि मनुष्य, वस्तुगत नियमों में, सभी घटनाओं और सभी चीज़ों के लिए सृजनकर्ता की संप्रभुता और उसके विधान को देखता है, फिर भी कितने लोग सभी चीजों पर सृजनकर्ता की संप्रभुता के सिद्धान्त को पूरी तरह से समझ पाते हैं? कितने लोग वास्तव में अपने भाग्य पर सृजनकर्ता की संप्रभुता और व्यवस्था को जान, पहचान, और स्वीकार कर पाते हैं, और उसके प्रति समर्पण कर पाते हैं? कौन, सभी चीज़ों पर सृजनकर्ता की संप्रभुता के सत्य पर विश्वास करने के बाद, वास्तव में विश्वास करेगा और पहचानेगा कि सृजनकर्ता मानव जीवन के भाग्य को भी निर्धारित करता है? कौन वास्तव में इस सच को समझ सकता है कि सृजनकर्ता मनुष्य के जीवन के भाग्य पर भी संप्रभुता रखता है? इस सच्चाई को जानकर कि वह मानवजाति के भाग्य को संचालित और नियन्त्रित करता है, सृजनकर्ता की संप्रभुता के प्रति मानवजाति को किस प्रकार का दृष्टिकोण अपनाना चाहिए? जो कोई भी इस सच्चाई से रूबरू हो चुका है, उसे अपने जीवन में इस बारे में निर्णय ले लेना चाहिए।
—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 122
मानव जीवन में छह मोड़ (चुने हुए अंश)
जीवन पथ पर चलते हुए, प्रत्येक व्यक्ति कई महत्वपूर्ण मोड़ों पर पहुँचता है। ये अत्यधिक बुनियादी, और बेहद महत्वपूर्ण कदम होते हैं जो जीवन में व्यक्ति के भाग्य को निर्धारित करते हैं। आगे जो कुछ बताया गया है वह इन दिशासूचकों का एक संक्षिप्त विवरण है जिनसे अपने जीवन पथ पर प्रत्येक व्यक्ति को गुज़रना चाहिए।
पहला मोड़ : जन्म
किसी व्यक्ति का कहाँ जन्म होता है, वह किस परिवार में जन्म लेता या लेती है, उसका लिंग, रंग-रूप, और जन्म का समय : ये किसी व्यक्ति के जीवन के प्रथम मोड़ के विवरण हैं।
इस मोड़ के विवरण कोई चुन नहीं सकता; ये सभी बहुत पहले ही सृजनकर्ता द्वारा पूर्वनिर्धारित कर दिए जाते हैं। ये किसी भी तरह से बाहरी वातावरण द्वारा प्रभावित नहीं होते, और कोई भी मानव-निर्मित कारक उन तथ्यों को बदल नहीं सकते जो सृजनकर्ता द्वारा पूर्वनिर्धारित हैं। किसी व्यक्ति के पैदा होने का अर्थ है कि सृजनकर्ता ने पहले से ही उसके भाग्य के पहले कदम को पूरा कर लिया है जो उसने उस व्यक्ति के लिए निर्धारित किया है। क्योंकि उसने इन सभी विवरणों को बहुत पहले से ही पूर्वनिर्धारित कर दिया है, इसलिए किसी में भी उनमें से किसी भी चीज़ को बदलने की ताक़त नहीं होती। किसी व्यक्ति का भाग्य चाहे जो भी हो, उसके जन्म की स्थितियाँ पूर्वनिर्धारित होती हैं, और जैसी हैं वैसी ही बनी रहती हैं; वे जीवन में उसके भाग्य द्वारा किसी भी तरह से प्रभावित नहीं होतीं, और न ही वे किसी भी तरह से किसी के जीवन में उसके भाग्य पर सृजनकर्ता की संप्रभुता को प्रभावित करती हैं।
1) सृजनकर्ता की योजनाओं से एक नए जीवन का जन्म होता है
कोई इंसान पहले मोड़ का कौन-सा विवरण चुन सकता है—अपना जन्म स्थान, अपना परिवार, अपना लिंग, अपना रंग-रूप, अपने जन्म का समय? स्पष्ट रूप से, किसी व्यक्ति का जन्म एक निष्क्रिय घटना है। कोई व्यक्ति किसी स्थान-विशेष में, किसी समय-विशेष में, किसी परिवार-विशेष में, और किसी विशिष्ट रंग-रूप के साथ अनायास जन्म लेता है; कोई व्यक्ति अनायास ही किसी परिवार-विशेष का सदस्य बनता है, किसी एक वंश-वृक्ष की शाखा बन जाता है। जीवन के इस प्रथम मोड़ पर किसी व्यक्ति के पास सिवाय एक ऐसे परिवेश में जन्म लेने के, कोई विकल्प नहीं होता, जो सृजनकर्ता की योजना के अनुसार नियत होता है। उसके पास एक विशेष परिवार में, एक विशेष लिंग एवं रंग-रूप के साथ, एक विशेष समय पर जन्म लेने के सिवाय, और कोई विकल्प नहीं होता, जो बहुत अंतरंगता से उसके जीवन-पथ से जुड़ा होता है। इस महत्वपूर्ण मोड़ पर कोई व्यक्ति क्या कर सकता है? कुल मिलाकर, किसी मनुष्य के पास उसके जन्म से संबंधित इन विवरणों में से किसी एक के बारे में भी कोई विकल्प नहीं होता। यदि यह सृष्टिकर्ता की पूर्वनियति और उसका मार्गदर्शन न होता, तो इस संसार में प्रवेश करने वाला नया जन्मा व्यक्ति कभी न जान पाता कि कहाँ जाना है या कहाँ रहना है, किसी से उसका कोई रिश्ता न होता, वह किसी का अपना न होता, और उसका कोई असली घर न होता। किन्तु सृष्टिकर्ता की अत्यंत कुशल व्यवस्थाओं की वजह से, उसके पास रहने के लिए एक जगह, माता-पिता, एक स्थान जो उसका अपना होता है, रिश्तेदार होते हैं और इसके आधार पर वह जीवन में अपनी यात्रा शुरू करता है। इस पूरी प्रक्रिया में, इस नए जीवन का उभरना सृजनकर्ता की योजनाओं द्वारा निर्धारित किया जाता है, हर एक चीज़ जो उसे प्राप्त होती है, वह उसे सृजनकर्ता द्वारा प्रदान की जाती है। मुक्त ढंग से बहती एक देह, जिसका कोई अस्तित्व न था, धीरे-धीरे मांस-और-रक्त का रूप ले लेती है, एक दृश्यमान, साकार मनुष्य का रूप धारण कर लेती है, परमेश्वर की एक रचना बन जाती है, जो सोचती है, साँस लेती है, जिसे सर्दी-गर्मी का एहसास होता है, जो भौतिक संसार में सृजित प्राणियों के सभी सामान्य क्रियाकलापों में शामिल हो सकती है; और जो उन सभी स्थितियों का सामना करती है जिनका अनुभव उन सभी लोगों को करना होता है जिनका जन्म हुआ है। सृष्टिकर्ता द्वारा किसी व्यक्ति के जन्म की पूर्वनियति का अर्थ है कि वह उस व्यक्ति को वो सभी चीज़ें प्रदान करेगा जो उसके जीवित रहने के लिए आवश्यक है; और उसी प्रकार किसी व्यक्ति के जन्म लेने का अर्थ है कि उसे जीवित रहने के लिए आवश्यक सभी चीज़ें सृष्टिकर्ता से प्राप्त होंगी, और उसके बाद से, वह सृष्टिकर्ता द्वारा प्रदत्त और सृष्टिकर्ता की संप्रभुता के अधीन, किसी अन्य रूप में जीवन बिताएगा।
2) अलग-अलग मनुष्य अलग-अलग परिस्थितियों में जन्म क्यों लेते हैं
लोग प्रायः यह सोचना पसंद करते हैं कि यदि उनका जन्म फिर से हुआ, तो किसी शानदार परिवार में जन्म होगा; यदि उनका जन्म महिला के रूप में हुआ तो वे स्नो व्हाइट जैसे दिखेंगे, हर कोई उन्हें प्यार करेगा, और यदि वे पुरुष के रूप में जन्मे, तो वे सुन्दर राजकुमार बनेंगे, उन्हें किसी चीज की कमी न होगी, और पूरा संसार उनके आदेशों का पालन करने के लिए सदा तत्पर रहेगा। प्रायः ऐसे लोग भी होते हैं जो अपने जन्म को लेकर बहुत-से भ्रमों से ग्रस्त रहते हैं और वे अक्सर इससे असंतुष्ट रहते हैं, यहाँ तक कि उन्हें अपने परिवार, अपने रंग-रूप, अपने लिंग, और अपने जन्म के समय से भी असंतोष होता है। फिर भी लोग कभी समझ नहीं पाते कि उनका जन्म इसी परिवार में क्यों हुआ है या वे किसी विशेष प्रकार के क्यों दिखते हैं। वे नहीं जानते कि उन्होंने कहाँ जन्म लिया है या वे कैसे दिखाई देते हैं, इससे परे, उन्हें सृष्टिकर्ता के प्रबंधन में अनेक भूमिकाएँ निभानी हैं और भिन्न-भिन्न ध्येय पूरे करने हैं—और यह उद्देश्य कभी नहीं बदलेगा। सृष्टिकर्ता की नजरों में, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि व्यक्ति कहाँ जन्म लेता है, वह पुरुष है या महिला या वह कैसा दिखता है—ये सभी अस्थायी चीजें हैं। वे सृष्टिकर्ता द्वारा संपूर्ण मानवजाति के प्रबंधन के प्रत्येक चरण के भीतर छोटे चिह्नों और संकेतकों से अधिक कुछ नहीं हैं। और किसी व्यक्ति की सच्ची मंजिल और परिणाम किसी विशेष चरण में उसके जन्म से निर्धारित नहीं होते, बल्कि उस लक्ष्य से निर्धारित होते हैं जिसे वह प्रत्येक जीवन में पूरा करता है और सृष्टिकर्ता की प्रबंधन योजना के संपन्न होने पर उसके द्वारा उसके निर्धारण से तय होते हैं।
कहा जाता है कि प्रत्येक परिणाम का एक कारण होता है, कोई भी परिणाम बिना कारण के नहीं होता। इसलिए, किसी व्यक्ति का जीवन मूलतः उसके वर्तमान जीवन और उसके पिछले जीवन दोनों से जुड़ा हुआ होता है। यदि किसी व्यक्ति की मृत्यु उसके जीवन की वर्तमान अवधि को समाप्त कर देती है, तो व्यक्ति का जन्म एक नए चक्र की शुरुआत है; यदि पुराना चक्र किसी व्यक्ति के पिछले जीवन को दर्शाता है, तो नया चक्र स्वाभाविक रूप से उसका वर्तमान जीवन है। चूँकि व्यक्ति का जन्म उसके पिछले जीवन और उसके वर्तमान जीवन से जुड़ा है, तो माना जाता है कि स्थान, परिवार, लिंग, रंग-रूप, और इसी तरह के अन्य कारक जो उसके जन्म के साथ जुड़े हुए हैं, वे सभी अनिवार्यतः उसके पिछले और वर्तमान जीवन से जुड़े होते हैं। इसका अर्थ है कि किसी व्यक्ति के जन्म के कारण न केवल उसके पिछले जीवन के द्वारा प्रभावित होते हैं, बल्कि वर्तमान जीवन में उसकी नियति द्वारा भी निर्धारित होते हैं, जिसकी वजह से भिन्न-भिन्न परिस्थितियों में लोगों का जन्म होता है : कुछ लोग गरीब परिवारों में जन्म लेते हैं, कुछ का जन्म अमीर परिवारों में होता है। इसलिए कुछ लोग सामान्य परिवार से होते हैं, और अन्य लोग शानदार और प्रसिद्ध वंशों के उत्तराधिकारी होते हैं। कुछ लोग दक्षिण में जन्म लेते हैं, और कुछ का जन्म उत्तर दिशा में होता है। कुछ लोग रेगिस्तान में जन्म लेते हैं, तो कुछ हरी-भरी भूमि में जन्म लेते हैं। कुछ लोगों के जन्म के साथ-साथ उल्लास, हँसी और उत्सव मनाया जाता है, और कुछ अपने साथ आँसू, आपदा और दुःख लेकर आते हैं। कुछ लोगों का जन्म इसलिए होता है ताकि उन्हें एक धरोहर की तरह सँभाल कर रखा जा सके, कुछ लोगों को जंगली खरपतवार की तरह एक तरफ फेंक दिया जाता है। कुछ लोग सुन्दर मुखाकृति के साथ जन्म लेते हैं, और कुछ कुरूपता के साथ। कुछ लोग दिखने में सुन्दर होते हैं, और कुछ भद्दे दिखते हैं। कुछ लोग अर्धरात्रि में जन्म लेते हैं, और कुछ लोग दोपहर के सूर्य की चिलचिलाती धूप में पैदा होते हैं। ... सभी तबकों के लोगों का जन्म उस भाग्य से निर्धारित होता है जो सृजनकर्ता ने उनके लिए लिखा है; उनके जन्म, वर्तमान जीवन में उनके भाग्य और साथ ही उन भूमिकाओं को जिन्हें वे निभाएँगे और उन ध्येयों को जिन्हें वे पूरा करेंगे, को निर्धारित करते हैं। यह सब कुछ सृजनकर्ता की संप्रभुता के अधीन है, उसके द्वारा पूर्व निर्धारित है; कोई भी अपने पूर्वनिर्धारित भाग्य से बच नहीं सकता, अपने जन्म की परिस्थितियों को बदल नहीं सकता, और अपने भाग्य को चुन नहीं सकता।
—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 123
मानव जीवन में छह मोड़ (चुने हुए अंश)
दूसरा मोड़ : बड़ा होना
लोगों ने किस प्रकार के परिवार में जन्म लिया है, इस आधार पर वे भिन्न-भिन्न पारिवारिक परिवेशों में बड़े होते हैं और अपने माता-पिता से भिन्न-भिन्न पाठ सीखते हैं। ये कारण उन स्थितियों को निर्धारित करते हैं जिसमें कोई व्यक्ति वयस्क होता है, और बड़ा होना व्यक्ति के जीवन के दूसरे मोड़ को दर्शाता है। कहने की आवश्यकता नहीं कि इस मोड़ पर भी लोगों के पास कोई विकल्प नहीं होता। यह भी नियत और पूर्वनियोजित है।
1) सृष्टिकर्ता ने इंसान के बड़े होने की परिस्थितियों को नियोजित और नियत कर दिया है
इंसान बड़ा होने के दौरान खुद उन लोगों, घटनाओं या चीजों का चुनाव नहीं कर सकता जिनसे वह सीखता और प्रभावित होता है। कोई यह नहीं चुन सकता कि उसे कौन-सा ज्ञान या कौशल हासिल करना है, कौन-सी आदतें उसे निर्मित करनी हैं। इस पर किसी का कोई वश नहीं है कि कौन उसके माता-पिता और सगे-सम्बन्धी होंगे, वह किस प्रकार के परिवेश में बड़ा होगा; लोगों, घटनाओं, और अपने आसपास की चीज़ों के साथ उसके रिश्ते कैसे होंगे, और वे किस प्रकार उसके विकास को प्रभावित करेंगे, ये सब उसके नियन्त्रण से परे है। तो फिर, इन चीज़ों को कौन तय करता है? कौन इनको निर्धारित करता है? चूँकि इस मामले में लोगों के पास कोई विकल्प नहीं होता, चूँकि वे अपने लिए इन चीज़ों का निर्णय नहीं ले सकते, और चूँकि वे स्पष्टतया स्वाभाविक रूप से आकार नहीं लेतीं, तो कहने की आवश्यकता नहीं कि इन सभी लोगों, घटनाओं, और चीज़ों की रचना सृष्टिकर्ता के हाथों में है। जिस तरह सृष्टिकर्ता हर व्यक्ति के जन्म की विशेष परिस्थितियों की व्यवस्था करता है, उसी तरह वह बेशक उन विशिष्ट परिस्थितियों की भी व्यवस्था करता है जिनमें हर व्यक्ति बड़ा होता है। यदि किसी व्यक्ति का जन्म उसके आसपास के लोगों, घटनाओं और चीजों में बदलाव लाता है, तो उस व्यक्ति का बड़ा होना अनिवार्य रूप से उन्हें भी प्रभावित करेगा। उदाहरण के लिए, कुछ लोग गरीब परिवारों में जन्म लेते हैं, लेकिन धन-दौलत के बीच बड़े होते हैं; अन्य लोगों का जन्म उनके मूल रूप से अमीर परिवारों में गिरावट लाता है, जिससे वे गरीब परिवेशों में बड़े होते हैं। किसी का भी जन्म किसी निश्चित नियम द्वारा नियंत्रित नहीं होता है और जिन परिस्थितियों में कोई बड़ा होता है, उनके लिए कोई नियम या अनिवार्यताएँ नहीं होती हैं। इनमें से कोई भी ऐसी चीज नहीं है जिसकी व्यक्ति कल्पना करके उसे साकार कर सके या नियंत्रित कर सके; ये व्यक्ति के भाग्य के परिणाम हैं और व्यक्ति के भाग्य द्वारा निर्धारित होते हैं। बेशक, मूल रूप से, ये चीजें हर व्यक्ति के भाग्य के लिए सृष्टिकर्ता की पूर्वनियति द्वारा निर्धारित होती हैं; वे उस व्यक्ति के भाग्य पर सृष्टिकर्ता की संप्रभुता और उसकी व्यवस्था द्वारा निर्धारित होती हैं।
2) जिन परिस्थितियों के अधीन लोग बड़े होते हैं, वे भिन्न-भिन्न भूमिकाओं का कारण बनती हैं
किसी व्यक्ति के जन्म की परिस्थितियाँ उस परिवेश और उन परिस्थितियों के बुनियादी स्तर पर स्थापित होती हैं जिसमें वे बड़े होते हैं, और उसी तरह से जिन परिस्थितियों में कोई व्यक्ति बड़ा होता है वे उसके जन्म की परिस्थितियों का परिणाम होती हैं। इस दौरान व्यक्ति भाषा सीखना आरम्भ करता है, और उसका मस्तिष्क कई नई चीज़ों का सामना और उन्हें आत्मसात करना आरम्भ करता है, यह एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें वह लगातार बड़ा होता है। जिन चीजों को इंसान अपने कानों से सुनता है, अपनी आँखों से देखता है, और अपने मस्तिष्क से ग्रहण करता है, वे धीरे-धीरे उसके भीतरी संसार को समृद्ध और जीवंत करती हैं। जिन लोगों, घटनाओं, और चीजों के संपर्क में कोई व्यक्ति आता है; जिस सामान्य ज्ञान, विद्याओं, और कौशल को वह सीखता है, और सोचने के जिन तरीकों से वह प्रभावित होता है, जो उसके मन में बैठाए जाते हैं या उसे सिखाए जाते हैं, वे सब जीवन में उसके भाग्य का मार्गदर्शन करेंगे और उसे प्रभावित करेंगे। जैसे-जैसे व्यक्ति बड़ा होता है, वह जो भाषा सीखता है और जो विचार उसके मन में आते हैं, वे उसके परिवेश से अविभाज्य होते हैं, जिसमें उसके माता-पिता और भाई-बहन, साथ ही उसके आसपास के विभिन्न लोग, घटनाएँ और चीजें शामिल होती हैं। इसलिए, कोई व्यक्ति कैसे बड़ा होता है, यह उस परिवेश द्वारा निर्धारित होता है जिसमें वह रहता है और उन लोगों, घटनाओं और चीजों पर निर्भर करता है जिनके संपर्क में वह इस समयावधि के दौरान आता है। चूँकि जिन परिस्थितियों में कोई व्यक्ति बड़ा होता है, वे बहुत पहले से पूर्वनियत होती हैं, इसलिए इस प्रक्रिया के दौरान वह जिस परिवेश में रहता है, वह भी स्वाभाविक रूप से पूर्वनियत होता है। यह उसकी पसंद और प्राथमिकताओं पर निर्भर नहीं करता, बल्कि सृष्टिकर्ता की योजनाओं, सृष्टिकर्ता की सूक्ष्म व्यवस्थाओं और जीवन में व्यक्ति के भाग्य पर सृष्टिकर्ता की संप्रभुता पर निर्भर करता है। इसलिए बड़ा होने की प्रक्रिया के दौरान जब किसी व्यक्ति का लोगों से सामना होता है और जिन चीजों के संपर्क में वह आता है, वे सभी अनिवार्य रूप से सृष्टिकर्ता के आयोजन और उसकी व्यवस्था से जुड़ी होती हैं। लोग इस प्रकार के जटिल पारस्परिक सम्बन्धों का पूर्वानुमान नहीं लगा सकते, और न ही वे उन्हें नियन्त्रित कर सकते हैं या उनकी थाह पा सकते हैं। जिन परिस्थितियों में हर व्यक्ति बड़ा होता है, उनमें हर प्रकार की चीजें और लोग शामिल होते हैं—और वे भी बड़ी संख्या में। कोई भी इंसान संबंधों के इतने विशाल जाल की व्यवस्था या आयोजन करने में सक्षम नहीं है। सृष्टिकर्ता के अलावा कोई भी व्यक्ति या चीज सभी लोगों, घटनाओं और चीजों के प्रकट होने, जारी रहने और समाप्त होने को नियंत्रित नहीं कर सकती और संबंधों का ऐसा विशाल जाल ही यह आकार देता है कि सृष्टिकर्ता की पूर्वनियति के अधीन हर व्यक्ति कैसे बड़ा होता है और यह उन विभिन्न परिवेशों का निर्माण करता है जिनमें वे बड़े होते हैं; साथ ही, सृष्टिकर्ता के प्रबंधन के कार्य के लिए आवश्यक विभिन्न भूमिकाओं को भी आकार देता है, जिससे लोगों के लिए अपने लक्ष्यों को सुचारू रूप से पूरा करने के लिए एक दृढ़, शक्तिशाली आधारशिला रखी जाती है।
—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 124
मानव जीवन में छह मोड़ (चुने हुए अंश)
तीसरा मोड़ : स्वावलंबन
बचपन और किशोरावस्था पार करने के बाद जब कोई व्यक्ति धीरे-धीरे तथा परिपक्वता प्राप्त करता है, तो उसके लिए अगला कदम अपनी किशोरावस्था को पूरी तरह से अलविदा कहना, अपने माता-पिता को अलविदा कहना, और आगे के मार्ग का एक स्वावलंबी वयस्क के रूप में सामना करना होता है। इस मुकाम पर उसे सभी लोगों, घटनाओं, और चीज़ों का मुकाबला करना है जिनका एक वयस्क को सामना करना चाहिए, उसे अपने भाग्य के सभी अंगों का सामना करना चाहिए जो जल्द ही स्वयं उसके सामने आएँगे। यह तीसरा मोड़ है जिससे होकर व्यक्ति को गुज़रना होता है।
1) स्वावलंबी बनने के पश्चात्, व्यक्ति सृजनकर्ता की संप्रभुता का अनुभव करना आरम्भ करता है
यदि किसी व्यक्ति का जन्म और बड़ा होना उसके जीवन की यात्रा के लिए, व्यक्ति के भाग्य की आधारशिला रखने हेतु “तैयारी की अवधि” है, तो उसका स्वावलंबन जीवन में उसके भाग्य का प्रारम्भिक स्वभाषण है। यदि किसी व्यक्ति का जन्म और बड़ा होना धन-समृद्धि है जो उसने जीवन में अपने भाग्य के लिए संचित की है, तो किसी व्यक्ति का स्वावलंबन तब होता है जब वह अपनी धन-समृद्धि को खर्च करना या उसे बढ़ाना शुरू करता है। जब कोई व्यक्ति अपने माता-पिता को छोड़ता है और स्वावलंबी हो जाता है, तो वह जिस सामाजिक परिवेश का सामना करता है और जिन नौकरियों और करियर का वह सामना करता है, वे सभी पूर्वनिर्धारित होते हैं और उनका उसके माता-पिता से कोई लेना-देना नहीं होता। कुछ लोग कॉलेज में एक अच्छा विषय चुनते हैं और स्नातक होने के बाद एक बढ़िया नौकरी पा लेते हैं; कहा जा सकता है कि वे जीवन के पथ पर एक शानदार शुरुआत करते हैं। दूसरे कई अलग-अलग कौशल सीखते हैं और उनमें महारत हासिल करते हैं, फिर भी उन्हें कभी कोई ऐसी नौकरी नहीं मिलती जो उनके अनुकूल हो, न ही अपनी जगह पाते हैं, अपना खुद का करियर बनाना तो दूर की बात है; कहा जा सकता है कि इन लोगों का जीवन में पहला कदम असफलताओं और मुश्किलों से भरा होता है, उनकी संभावनाएँ धूमिल होती हैं और उनका जीवन अनिश्चित होता है। कुछ अन्य लोग लगन से अपनी पढ़ाई करते हैं, फिर भी उच्च शिक्षा प्राप्त करने के हर अवसर से बाल-बाल चूक जाते हैं; ऐसा लगता है कि वे कभी भी सफलता प्राप्त न करने के लिए अभिशप्त हैं—कहा जा सकता है कि जीवन के पथ पर उनकी पहली उम्मीदें ही धुएँ में उड़ जाती हैं। यह न जानते हुए कि आगे का रास्ता आसान है या चट्टानी, वे पहली बार महसूस करते हैं कि मानव का भाग्य कितना अप्रत्याशित है और इसलिए भय और अपेक्षा के मिश्रण के साथ जीवन का सामना करते हैं। दूसरे बहुत अच्छी तरह से शिक्षित नहीं होते, फिर भी वे किताबें लिख सकते हैं और कुछ हद तक प्रसिद्धि प्राप्त कर सकते हैं। और दूसरे लगभग पूरी तरह से अनपढ़ होते हैं, फिर भी वे व्यवसाय में पैसा कमा सकते हैं और इस तरह अपना भरण-पोषण करने में सक्षम होते हैं। ... कोई कौन-सा पेशा चुनता है, अपनी आजीविका कैसे चलाता है, वह जो चुनाव करता है वे अच्छे हैं या बुरे—क्या इन चीजों में लोगों के पास कोई विकल्प होता है? क्या वे लोगों की इच्छाओं और निर्णयों पर आधारित होते हैं? अधिकांश लोग कम काम करना और अधिक कमाना चाहते हैं, धूप और बारिश में मेहनत न करना, सम्मानजनक कपड़े पहनना, हर जगह आकर्षक दिखना, सबसे ऊपर रहना और अपने पूर्वजों का सम्मान बढ़ाना चाहते हैं। लोगों की ऐसी “आदर्श” इच्छाएँ होती हैं, लेकिन जब वे जीवन के पथ पर अपना पहला कदम रखते हैं, तो वे धीरे-धीरे यह देखने लगते हैं कि मानव का भाग्य कितना अपूर्ण है और पहली बार वास्तव में यह महसूस करते हैं कि यद्यपि कोई अपने भविष्य के लिए साहसिक योजनाएँ बना सकता है और निरंकुश ढंग से हर तरह के सपने संजो सकता है, किसी में भी अपने सपनों को साकार करने की क्षमता या शक्ति नहीं होती, न ही अपने भविष्य को नियंत्रित करने की क्षमता होती है। किसी के सपनों और उसके सामने आने वाली वास्तविकताओं के बीच हमेशा एक अंतर होता है; चीजें कभी भी वैसी नहीं हो सकतीं जैसी कोई कल्पना करता है और ऐसी वास्तविकताओं का सामना करते हुए, लोग कभी भी संतुष्टि या संतोष नहीं पा सकते। कुछ लोग तो ऐसे भी हैं जो अपनी आजीविका और संभावनाओं के लिए और अपने भाग्य को बदलने के लिए, बार-बार हर तरह के तरीके अपनाने और हर संभव माध्यम तलाशने की कोशिश करते हैं, हर तरह के प्रयास और त्याग करते हैं। लेकिन अंत में, भले ही वे अपनी कड़ी मेहनत के माध्यम से अपने सपनों और इच्छाओं को साकार कर सकें, वे कभी भी अपने भाग्य को नहीं बदल सकते और चाहे वे कितना भी संघर्ष कर लें, वे कभी भी अपनी नियति से आगे नहीं बढ़ सकते। अपनी क्षमताओं और बुद्धि में अंतर के बावजूद और चाहे उनमें संकल्प हो या न हो, भाग्य के सामने सभी लोग समान हैं, जहाँ महान और छोटे, ऊँच और नीच, प्रतिष्ठित और तुच्छ के बीच कोई भेद नहीं किया जाता। कोई किस पेशे में संलग्न होता है, वह अपनी आजीविका के लिए क्या करता है और जीवन में उसके पास कितना धन होता है, यह उसके माता-पिता, उसकी प्रतिभा या उसके प्रयासों और महत्वाकांक्षाओं पर निर्भर नहीं करता—यह सृष्टिकर्ता की पूर्वनियति पर निर्भर करता है।
2) अपने माता-पिता को छोड़ना और जीवन के रंगमंच पर अपनी भूमिका निभाने के लिए ईमानदारी से शुरुआत करना
जब कोई व्यक्ति परिपक्व हो जाता है, तो वह अपने माता-पिता को छोड़ने और अपने दम पर आगे बढ़ने की शर्तों को पूरा कर चुका होता है। इसी बिंदु पर वह वास्तव में जीवन में अपनी भूमिका निभानी शुरू करता है, और ठीक इसी समय जीवन में उसका मिशन धीरे-धीरे अस्पष्ट और धुँधले से स्पष्ट और सुस्पष्ट हो जाता है। भले ही ऊपरी तौर पर अपने माता-पिता के साथ एक करीबी रिश्ता बनाए रखता है, लेकिन चूँकि वह जो भूमिका निभाता है और जीवन में उसका जो मिशन है, उसका उसके माता-पिता से कोई लेना-देना नहीं है, इसलिए जैसे-जैसे वह धीरे-धीरे स्वतंत्रता प्राप्त करता जाता है, सार रूप में यह करीबी रिश्ता धीरे-धीरे टूटने लगता है। दैहिक परिप्रेक्ष्य से, वह अवचेतन रूप में अपने माता-पिता पर निर्भर रहना जारी रखने से बच नहीं सकता, लेकिन एक वस्तुनिष्ठ तथ्य के रूप में, जब कोई पूरी तरह बड़ा हो जाता है, तो वह सभी तरह से अपने माता-पिता से पूरी तरह से अलग हो जाता है और वह जो भूमिका ग्रहण करता है उसे वह स्वयं स्वतंत्र रूप से कार्यान्वित करेगा। जन्म देने और पालने के अलावा, किसी के जीवन में माता-पिता की जिम्मेदारी केवल बाहरी रूप से उसे बड़े होने के लिए एक वातावरण प्रदान करना है, और बस इतना ही, क्योंकि यह सृष्टिकर्ता का ही पूर्वनियत करना है जिसका किसी भी व्यक्ति के भाग्य पर प्रभाव पड़ता है। किसी का भविष्य कैसा होगा, यह कोई ऐसी चीज नहीं है जिसे कोई भी व्यक्ति नियंत्रित कर सके; यह बहुत पहले से पूर्वनियत है, और किसी का भाग्य उसके माता-पिता भी नहीं बदल सकते हैं। जहाँ तक भाग्य का सवाल है, हर व्यक्ति का भाग्य अद्वितीय है; हर किसी का अपना भाग्य होता है। इसलिए, किसी के भी माता-पिता जीवन में उसके भाग्य को बिल्कुल भी नहीं रोक सकते, न ही वह जीवन में जो भूमिका निभाता है, उसमें उसकी मदद करने के लिए कुछ भी कर सकते हैं। यह कहा जा सकता है कि चाहे किसी का जन्म किसी भी परिवार में होना पूर्वनियत हो और चाहे कोई किसी भी माहौल में बड़ा हो, ये उसके जीवन के मिशन को पूरा करने के लिए पूर्व-शर्तों से ज्यादा कुछ नहीं हैं। वे किसी भी तरह से किसी व्यक्ति के जीवन के भाग्य या उस तरह की नियति को निर्धारित नहीं करते हैं जिसके भीतर वह अपना मिशन पूरा करता है। इस प्रकार, किसी के भी माता-पिता जीवन में उसके मिशन को पूरा करने में उसकी सहायता नहीं कर सकते हैं, न ही कोई रिश्तेदार जीवन में उसकी भूमिका को पूरा करने में उसकी मदद कर सकता है। कोई अपना मिशन कैसे पूरा करता है और वह किस तरह के रहन-सहन के वातावरण में अपनी भूमिका निभाता है, यह पूरी तरह से उसके जीवन के भाग्य पर निर्भर करता है। दूसरे शब्दों में, कोई भी वस्तुनिष्ठ स्थिति सृष्टिकर्ता द्वारा पूर्वनियत किसी के मिशन को प्रभावित नहीं कर सकती है। हर कोई उस विशेष परिवेश में परिपक्वता तक पहुँचता है जिसमें वह बड़ा होता है; फिर, कदम-दर-कदम, वह जीवन के अपने मार्ग पर चलता है और उस नियति को पूरा करता है जिसकी व्यवस्था सृष्टिकर्ता द्वारा उसके लिए की गई है। वह स्वाभाविक रूप से और स्वतः मानवजाति के विशाल सागर में प्रवेश करता है और जीवन में अपना पद ग्रहण करता है; साथ ही, सृष्टिकर्ता की पूर्वनियति और उसकी संप्रभुता की खातिर वह सृजित प्राणी के रूप में अपनी जिम्मेदारियों को पूरा करना शुरू करता है।
—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 125
मानव जीवन में छह मोड़ (चुने हुए अंश)
चौथा मोड़ : विवाह
जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है और परिपक्वता आती है, तो व्यक्ति अपने माता-पिता से एवं उस परिवेश से और भी अधिक दूर हो जाता है जिसमें वह जन्मा और पला-बढ़ा था। इसके बजाय वह जीवन में एक दिशा खोजने और अपने माता-पिता से भिन्न तरीके से अपने जीवन के लक्ष्यों को पाने का प्रयास शुरू कर देता है। इस दौरान उसे अपने माता-पिता की आवश्यकता नहीं रहती, बल्कि एक साथी की आवश्यकता होती है जिसके साथ वह अपना जीवन बिता सके, यानी कि एक जीवनसाथी, एक ऐसा व्यक्ति जिसके साथ उसका भाग्य घनिष्ठता से जुड़ा हुआ होता है। इस तरह, आत्मनिर्भर बनने के बाद, उसके जीवन की पहली बड़ी घटना विवाह होती है, यह एक चौथा मोड़ है जिससे उसे गुज़रना होता है।
1) विवाह व्यक्तिगत पसंद से नहीं होता
विवाह हर व्यक्ति के जीवन की एक प्रमुख घटना है; यह वह समय है जब व्यक्ति वास्तव में विभिन्न जिम्मेदारियाँ उठाना शुरू करता है और धीरे-धीरे विभिन्न मिशन को पूरा करता है। स्वयं इसका अनुभव करने से पहले लोग विवाह के बारे में कई कल्पनाएँ संजोते हैं और ये सभी एक बहुत ही सुंदर तस्वीर पेश करती हैं। महिलाएँ कल्पना करती हैं कि उनका जीवनसाथी एक सुंदर राजकुमार होगा और पुरुष कल्पना करते हैं कि वे परियों की कहानी वाली किसी राजकुमारी से विवाह करेंगे। ये कल्पनाएँ यह दर्शाती हैं कि जब विवाह की बात आती है, तो हर व्यक्ति के अपने निर्धारित मानक होते हैं। यद्यपि इस बुरे युग में, हर प्रकार की जानकारी लगातार लोगों के मन में विवाह के बारे में विभिन्न विकृत दृष्टिकोण बैठाती है, जिसके कारण लोगों की विवाह के प्रति और भी अधिक अपेक्षाएँ हो जाती हैं और वे विवाह के बारे में हर तरह के बोझ और अजीब रवैये विकसित कर लेते हैं; जिस किसी का भी विवाह हुआ है वह जानता है कि कोई विवाह को चाहे जैसे भी समझे, इसके प्रति किसी का रवैया चाहे जो भी हो, विवाह व्यक्तिगत चुनाव का मामला नहीं है।
एक व्यक्ति जीवन में कई लोगों से मिलेगा, लेकिन कोई नहीं जानता कि अंततः विवाह में उसका जीवनसाथी कौन होगा। यद्यपि विवाह के विषय पर हर किसी के अपने दृष्टिकोण और विचार होते हैं, कोई भी यह पूर्वानुमान नहीं लगा सकता कि अंत में वास्तव में उसका जीवनसाथी कौन बनेगा और इस मामले में लोगों का अपना कोई वश नहीं होता। किसी ऐसे व्यक्ति से मिलने के बाद जिसे तुम पसंद करते हो, तुम उस व्यक्ति को पाने की कोशिश कर सकते हो; लेकिन क्या वह तुममें रुचि रखता है और क्या वह तुम्हारा जीवनसाथी बनेगा, यह तय करना तुम्हारे हाथ में नहीं है। जिसे तुम पसंद करते हो, जरूरी नहीं कि वही वह व्यक्ति हो जिसके साथ तुम अपना जीवन साझा करोगे। बल्कि, ऐसा हो सकता है कि तुम्हें पता चले बिना ही, कोई ऐसा व्यक्ति जिसकी तुमने कभी उम्मीद नहीं की थी, तुम्हारे जीवन में प्रवेश करे और तुम्हारा जीवनसाथी बन जाए, जो तुम्हारे भाग्य का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा बन जाए, तुम्हारा वह जीवनसाथी बन जाए जिसका भाग्य तुम्हारे भाग्य से अटूट रूप से जुड़ा हुआ है। इसलिए, यद्यपि दुनिया में अनगिनत विवाह होते हैं, हर एक विवाह अलग होता है : कुछ निराशाजनक होते हैं, कुछ आनंददायक होते हैं; कुछ पूरब और पश्चिम को मिलाते हैं, कुछ उत्तर और दक्षिण को; कुछ आदर्श जोड़े होते हैं, कुछ समान सामाजिक स्तर के होते हैं; कुछ परमानंद से भरे होते हैं, कुछ त्रासदी से भरे होते हैं; कुछ दूसरों की प्रशंसा और ईर्ष्या जगाते हैं, कुछ लोगों को भ्रमित करते हैं और तिरस्कार पैदा करते हैं; कुछ खुशी से भरे होते हैं, कुछ अंतहीन आँसू और निराशा लाते हैं... इन असंख्य प्रकार के विवाहों में, लोग विवाह के प्रति वफादारी और एक शाश्वत, अटूट प्रतिबद्धता प्रदर्शित करते हैं; वे बहुत अधिक परवाह, दृढ़ लगाव और अपने जीवनसाथी के साथ टिके रहने की प्रतिबद्धता प्रदर्शित करते हैं; वे लाचारी और असमंजस प्रदर्शित करते हैं; वे विश्वासघात और यहाँ तक कि शत्रुता भी प्रदर्शित करते हैं। विवाह स्वयं खुशी लाए या दर्द, विवाह में हर किसी का मिशन, जो सृष्टिकर्ता द्वारा पूर्वनियत है, नहीं बदलता—यह मिशन ऐसा है जिसे हर किसी को पूरा करना ही चाहिए। और हर विवाह के पीछे मौजूद प्रत्येक व्यक्ति का भाग्य भी नहीं बदलता; यह सृष्टिकर्ता द्वारा बहुत पहले से पूर्वनियत होता है।
2) विवाह दोनों साथियों के भाग्य से होता है
विवाह किसी व्यक्ति के जीवन में एक महत्वपूर्ण मोड़ है। यह उसके भाग्य के परिणाम के रूप में सामने आता है, और इस भाग्य की एक महत्वपूर्ण कड़ी है; यह किसी की भी व्यक्तिगत इच्छा या प्राथमिकताओं पर आधारित नहीं होता है, और किसी भी बाहरी कारक द्वारा प्रभावित नहीं होता है, बल्कि यह पूर्णतः दो लोगों के भाग्य, दोनों जीवनसाथियों के भाग्य के लिए सृष्टिकर्ता की पूर्वनियति और व्यवस्थाओं द्वारा निर्धारित होता है। सतही तौर पर विवाह इसलिए मौजूद है ताकि मनुष्य प्रजनन कर सकें, लेकिन वास्तव में विवाह व्यक्ति का मिशन पूरा होने के लिए एक समारोह के अलावा और कुछ नहीं है। विवाह में लोग जो भूमिका निभाते हैं वह केवल अगली पीढ़ी का पालन-पोषण करने की नहीं होती; वे उन सभी भूमिकाओं को अपनाते हैं जो विवाह को बनाए रखने का काम करती हैं, साथ ही उन संबंधित मिशन को भी अपनाते हैं जिन्हें उन्हें पूरा करना चाहिए। चूँकि व्यक्ति का जन्म उसके आसपास के लोगों, घटनाओं और चीजों में होने वाले बदलावों को प्रभावित करता है, इसलिए व्यक्ति का विवाह भी अनिवार्य रूप से इन चीजों को प्रभावित करता है और इससे भी बढ़कर, उनमें हर तरह के बदलाव लाता है।
जब कोई व्यक्ति स्वावलंबी हो जाता है, तो वह जीवन में अपने मार्ग पर चलना शुरू कर देता है, जो उसे कदम-दर-कदम उन लोगों, घटनाओं और चीजों की ओर ले जाता है जिनका उसके विवाह से संबंध होता है। साथ ही, विवाह में उसका भावी जीवनसाथी भी कदम-दर-कदम उन्हीं लोगों, घटनाओं और चीजों की ओर बढ़ रहा होता है। सृष्टिकर्ता की संप्रभुता के अधीन, दो अपरिचित लोग धीरे-धीरे—अपने संबंधित भाग्य के कारण—एक विवाह में प्रवेश करते हैं और चमत्कारिक रूप से एक परिवार बन जाते हैं : “एक ही नाव पर सवार दो यात्री।” इसलिए, जब कोई व्यक्ति विवाह में प्रवेश करता है, तो जीवन में उसका मार्ग उसके जीवनसाथी को प्रभावित करेगा और उससे गहराई से जुड़ जाएगा, जबकि उसके जीवनसाथी का मार्ग जीवन में उसके अपने भाग्य को प्रभावित करेगा और उससे गहराई से जुड़ जाएगा। दूसरे शब्दों में, लोगों के भाग्य आपस में जुड़े हुए हैं और कोई भी एक-दूसरे से वास्तव में स्वतंत्र होकर जीवन में अपना मिशन पूरा नहीं कर सकता या अपनी भूमिका नहीं निभा सकता। व्यक्ति के जन्म का संबंधों के एक विशाल जाल पर प्रभाव पड़ता है; बड़े होने में भी संबंधों का एक जटिल जाल शामिल होता है और इसी तरह, एक विवाह अनिवार्य रूप से संबंधों के एक विशाल और जटिल जाल के भीतर मौजूद और कायम रहता है, जो उस जाल के हर सदस्य को शामिल करता है और उसका हिस्सा बनने वाले हर व्यक्ति के भाग्य को प्रभावित करता है। विवाह किसी के परिवार का, उस परिवेश का जिसमें वे बड़े हुए थे, उनके रंग-रूप, उनकी आयु, उनकी काबिलियत, उनकी प्रतिभाओं, या अन्य कारकों का परिणाम नहीं है; बल्कि यह साझा मिशन और संबंधित भाग्य का परिणाम होता है। यह विवाह का मूल है, सृष्टिकर्ता द्वारा आयोजित और व्यवस्थित मनुष्य के भाग्य के भीतर उपजा हुआ।
—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 126
मानव जीवन में छह मोड़ (चुने हुए अंश)
पाँचवाँ मोड़ : संतान
विवाह करने के पश्चात्, व्यक्ति अगली पीढ़ी को बड़ा करना आरंभ करता है। इस पर किसी का वश नहीं चलता कि उसकी कितनी और किस प्रकार की संतानें होंगी; यह भी, व्यक्ति के भाग्य द्वारा निर्धारित होता है जो सृजनकर्ता द्वारा पूर्वनियत है। यह पाँचवाँ मोड़ है जिससे किसी व्यक्ति को गुज़रना होता है।
यदि कोई किसी का बच्चा होने की भूमिका निभाने के लिए जन्म लेता है, तो वह माता-पिता होने की भूमिका निभाने के लिए अगली पीढ़ी का पालन-पोषण करता है। भूमिकाओं में यह बदलाव व्यक्ति को अलग-अलग परिप्रेक्ष्यों से जीवन के विभिन्न चरणों का अनुभव करने देता है। यह उसे विभिन्न प्रकार के जीवन के अनुभव भी देता है, जिनके माध्यम से वह प्रत्यक्ष रूप से सृष्टिकर्ता की संप्रभुता को जानता है, जिसका प्रयोग हमेशा एक ही तरीके से किया जाता है और जिनके माध्यम से वह इस तथ्य का अनुभव करता है कि कोई भी सृष्टिकर्ता की पूर्वनियति से आगे नहीं जा सकता या उसे बदल नहीं सकता।
1) किसी की संतान का क्या होगा इस पर उसका कोई नियंत्रण नहीं होता
जन्म, बड़ा होना और विवाह, ये सभी विभिन्न मात्राओं में, विभिन्न प्रकार की निराशा लाते हैं। कुछ लोग अपने परिवारों या अपने शारीरिक रंग-रूप से असंतुष्ट होते हैं; कुछ अपने माता-पिता को नापसंद करते हैं; कुछ लोगों को उस परिवेश से शिकायतें होती हैं जिसमें वे बड़े हुए हैं, या वे उससे अप्रसन्न होते हैं। और अधिकांश लोगों के लिए, इन सभी निराशाओं में विवाह सबसे अधिक असंतोषजनक होता है। कोई व्यक्ति अपने जन्म, परिपक्व होने, या अपने विवाह से चाहे कितना ही असंतुष्ट क्यों न हो, हर एक व्यक्ति जो इनसे होकर गुज़र चुका है, जानता है कि वह यह चुनाव नहीं कर सकता कि उसे कहाँ और कब जन्म लेना है, उसका रूप-रंग कैसा होगा, उसके माता-पिता कौन होंगे और कौन उसका जीवनसाथी होगा, वरन वह केवल स्वर्ग की इच्छा को स्वीकार कर सकता है। फिर भी जब लोगों के लिए अगली पीढ़ी का पालन-पोषण करने का समय आता है, तो वे अपने जीवन के प्रथम हिस्से की उन सभी इच्छाओं को पूरा करने का भार अपने वंशजों पर डाल देते हैं जिन्हें वे स्वयं पूरा करने में असफल रहे थे। ऐसा वे इस उम्मीद में करते हैं कि उनकी संतान उनके जीवन के प्रथम हिस्से की समस्त निराशाओं की भरपाई कर देगी। इसलिए, लोग अपने बच्चों को लेकर तमाम तरह की कल्पनाओं में डूबे रहते हैं : उनकी बेटियाँ बड़ी होकर बहुत ही खूबसूरत युवतियाँ बन जाएँगी, उनके बेटे बहुत ही आकर्षक पुरुष बन जाएँगे; उनकी बेटियाँ सुसंस्कृत और प्रतिभाशाली होंगी और उनके बेटे प्रतिभावान छात्र और सुप्रसिद्ध खिलाड़ी होंगे; उनकी बेटियाँ सभ्य, गुणी, और समझदार होंगी, और उनके बेटे बुद्धिमान, सक्षम और संवेदनशील होंगे। वे उम्मीद करते हैं कि उनकी संतान, चाहे बेटे हों या बेटियाँ, अपने बुज़ुर्गों का आदर करेगी, अपने माता-पिता का ध्यान रखेगी, और हर कोई उनसे प्यार और उनकी प्रशंसा करेगा...। इस मोड़ पर जीवन के लिए आशा नए सिरे से अंकुरित होती है, और लोगों के दिल में नई उमंगें पैदा होने लगती हैं। लोग यह जानते हैं कि उनमें योग्यता का अभाव है और वे इस जीवन में कुछ नहीं कर पाए हैं, और उनके पास भीड़ से ऊपर उठने का न तो दूसरा अवसर होगा, न फिर ऐसी कोई आशा होगी और यह भी कि उनके पास अपने भाग्य को स्वीकार करने के सिवाय और कोई विकल्प नहीं होगा। और इसलिए, वे अपनी समस्त आशाओं, अपनी अतृप्त इच्छाओं और आकांक्षाओं को पूरा करने का भार अगली पीढ़ी पर डाल देते हैं, इस उम्मीद से कि उनकी संतान उनके सपनों को पूरा करने और उनकी इच्छाओं को साकार करने में उनकी सहायता कर सकती है; कि उनके बेटे-बेटियाँ परिवार के नाम को गौरवान्वित करेंगे, प्रमुख रुतबा हासिल करेंगे या समृद्ध या प्रसिद्ध बनेंगे। संक्षेप में, वे अपने बच्चों को बहुत ऊँचाई पर पहुँचते देखना चाहते हैं। लोगों की योजनाएँ और कल्पनाएँ उत्तम होती हैं; क्या वे नहीं जानते कि अपने बच्चों की संख्या, अपने बच्चों का रंग-रूप, योग्यताएँ इत्यादि तय करना उन पर निर्भर नहीं है? और उनके बच्चों का भाग्य कैसा होगा इसके बारे में कुछ भी नहीं कहा जा सकता—क्या यह और भी ज्यादा उनके हाथों से बाहर की बात नहीं है? मनुष्य अपने भाग्य के स्वामी नहीं हैं, फिर भी वे युवा पीढ़ी के भाग्य को बदलने की आशा करते हैं; वे स्वयं अपने भाग्य से बचकर नहीं निकल सकते, फिर भी वे अपने बेटे-बेटियों के भाग्य में हेर-फेर करने की कोशिश करते हैं। क्या वे अपने आप को अपनी क्षमता से बढ़कर नहीं आँक रहे हैं? क्या यह मनुष्य की मूर्खता और अज्ञानता नहीं है? लोग अपनी संतान के लिए किसी भी हद तक जाते हैं, किंतु अंत में, किसी व्यक्ति की योजनाएँ और इच्छाएँ इसका निर्धारण नहीं कर सकतीं कि उसके कितने बच्चे हों, या उसके बच्चे कैसे हों। कुछ लोग दरिद्र होते हैं परन्तु उनके कई बच्चे होते हैं; कुछ लोग धनी होते हैं फिर भी उनकी एक भी संतान नहीं होती है। कुछ लोग एक बेटी चाहते हैं परन्तु उनकी यह इच्छा पूरी नहीं होती है; कुछ लोग एक बेटा चाहते हैं परन्तु एक लड़के को जन्म देने में असफल रहते हैं। कुछ लोगों के लिए, बच्चे एक आशीर्वाद होते हैं; अन्य लोगों के लिए, वे एक श्राप होते हैं। कुछ दंपति बुद्धिमान होते हैं, फिर भी मंदबुद्धि बच्चों को जन्म देते हैं; कुछ माता-पिता मेहनती और ईमानदार होते हैं, फिर भी जिन बच्चों का वे पालन-पोषण करते हैं वे आलसी होते हैं। कुछ माता-पिता दयालु और सच्चे होते हैं परन्तु उनके बच्चे कुटिल और शातिर बन जाते हैं। कुछ माता-पिता दिमाग और शरीर से स्वस्थ होते हैं किन्तु अपाहिज बच्चों को जन्म देते हैं। कुछ माता-पिता साधारण और असफल होते हैं, फिर भी उनके बच्चे महान उपलब्धियाँ प्राप्त करते हैं। कुछ माता-पिता की हैसियत निम्न होती है फिर भी उनके ऐसे बच्चे होते हैं जो श्रेष्ठता हासिल करते हैं। ...
2) आगामी पीढ़ी को बड़ा करने के बाद, लोग भाग्य के बारे में एक नई समझ प्राप्त करते हैं
विवाह करने वाले अधिकांश लोग लगभग तीस वर्ष की आयु में विवाह करते हैं, यह जीवन का ऐसा समय होता है जब एक व्यक्ति के पास मानवीय भाग्य की कोई समझ नहीं होती है। किन्तु जब लोग बच्चों की परवरिश करना आरंभ करते हैं और उनकी संतान बड़ी होने लगती है, वे नई पीढ़ी को पिछली पीढ़ी के जीवन और सभी अनुभवों को दोहराते हुए देखते हैं, और अपने अतीत को उनमें प्रतिबिंबित होते हुए देखकर उन्हें एहसास होता है कि, युवा पीढ़ी जिस मार्ग पर चल रही है, उसे उनके मार्ग के समान ही न तो नियोजित किया जा सकता है और न ही चुना जा सकता है। इस सच का सामना होने पर, उनके पास यह स्वीकार करने के सिवाए और कोई विकल्प नहीं होता है कि हर एक व्यक्ति का भाग्य पूर्वनियत है; और इसे पूरी तरह से समझे बिना ही वे धीरे-धीरे अपनी इच्छाओं को दरकिनार कर देते हैं, और उनके दिल का जोश डगमगा जाता है और खत्म हो जाता है...। इस समयावधि के दौरान लोग अधिकांशतः जीवन के महत्वपूर्ण पड़ावों को पार कर चुके होते हैं और उन्होंने जीवन की एक नई समझ प्राप्त कर ली होती है, एक नया दृष्टिकोण अपना लिया होता है। इस आयु वाला व्यक्ति भविष्य से कितनी अपेक्षा कर सकता है और उम्मीद करने के लिए उनके पास कौन-सी संभावनाएँ हैं? ऐसी कौन-सी पचास साल की बूढ़ी स्त्री है जो अभी भी एक सुन्दर राजकुमार का सपना देख रही है? ऐसा कौन-सा पचास साल का बूढ़ा पुरुष है जो अभी भी अपनी परी की खोज कर रहा है? ऐसी कौन-सी अधेड़ उम्र की स्त्री है जो अभी भी एक भद्दी बतख़ से एक हंस में बदलने की आशा कर रही है? क्या अधिकांश बूढ़े पुरुषों में जवान पुरुषों के समान कार्यक्षेत्र में बहुत अधिक पाने की प्रबल प्रेरणा होती है? संक्षेप में, चाहे कोई पुरुष हो या स्त्री, जो कोई भी इस उम्र तक पहुँच चुका है, उसकी विवाह, परिवार, और बच्चों के प्रति अपेक्षाकृत कहीं अधिक तर्कसंगत, व्यावहारिक सोच होने की संभावना होती है। ऐसे व्यक्ति के पास अनिवार्य रूप से कोई विकल्प नहीं बचता, भाग्य को चुनौती देने की कोई इच्छा नहीं बचती है। जहाँ तक मनुष्य के अनुभव की बात है, जैसे ही कोई व्यक्ति इस आयु में पहुँचता है तो उसमें स्वाभाविक रूप से एक दृष्टिकोण विकसित हो जाता है : “व्यक्ति को अपने भाग्य को स्वीकार कर लेना चाहिए; किसी के बच्चों का अपना भाग्य होता है; मनुष्य का भाग्य स्वर्ग द्वारा निर्धारित किया जाता है।” अधिकांश लोग जो सत्य को नहीं समझते हैं, इस संसार के सभी उतार-चढ़ावों, कुंठाओं, और कठिनाइयों को झेलने के बाद, मानव जीवन में अपनी अंतर्दृष्टि को तीन शब्दों में सारांशित करते हैं : “यह भाग्य है!” यद्यपि यह वाक्यांश मनुष्य के भाग्य के बारे में सांसारिक लोगों के निष्कर्ष और समझ को सारगर्भित ढंग से बताता है, और यद्यपि यह मानवजाति के असहाय होने को अभिव्यक्त करता है और इसे तीक्ष्ण और सटीक कहा जा सकता है, फिर भी यह सृजनकर्ता की संप्रभुता को समझने से एकदम अलग है, और सृजनकर्ता के अधिकार के ज्ञान की जगह तो बिल्कुल भी नहीं ले सकता है।
—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 127
भाग्य पर विश्वास करना सृजनकर्ता की संप्रभुता के ज्ञान की जगह नहीं ले सकता है
इतने वर्षों तक परमेश्वर का अनुसरण करने के पश्चात क्या भाग्य के बारे में तुम्हारे ज्ञान और सांसारिक लोगों के ज्ञान के बीच कोई आधारभूत अंतर है? क्या तुम लोग सही मायनों में सृष्टिकर्ता के पूर्व-निर्धारण को समझ गए हो और सही मायनों में सृष्टिकर्ता की संप्रभुता को जान गए हो? “यह भाग्य है,” इस वाक्यांश के बारे में कुछ लोगों को एक गहन, गहराई से महसूस की गई समझ होती है, फिर भी वे परमेश्वर की संप्रभुता पर जरा-सा भी विश्वास नहीं करते हैं; वे यह नहीं मानते हैं कि मनुष्य का भाग्य परमेश्वर द्वारा व्यवस्थित और आयोजित किया जाता है और वे परमेश्वर की संप्रभुता के प्रति समर्पण करने के अनिच्छुक होते हैं। इस प्रकार के लोग मानो महासागर में इधर-उधर भटकते रहते हैं, लहरों के द्वारा उछाले जाते हैं, जलधारा के साथ-साथ बहते रहते हैं। उनके पास निष्क्रियता से इंतजार करने और अपने आप को भाग्य पर छोड़ देने के अलावा और कोई विकल्प नहीं होता है। फिर भी वे नहीं पहचानते हैं कि मनुष्य का भाग्य परमेश्वर की संप्रभुता के अधीन है; वे स्वयं की पहल से परमेश्वर की संप्रभुता को नहीं जान सकते हैं और इसके फलस्वरूप परमेश्वर के अधिकार के ज्ञान को प्राप्त नहीं कर सकते हैं, परमेश्वर के आयोजनों और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण नहीं कर सकते हैं, भाग्य का प्रतिरोध करना बन्द नहीं कर सकते हैं, और परमेश्वर की देखभाल, सुरक्षा और मार्गदर्शन के अधीन जी नहीं सकते हैं। दूसरे शब्दों में, भाग्य को स्वीकार करना और सृष्टिकर्ता की संप्रभुता के अधीन होना एक ही बात नहीं है; भाग्य में विश्वास करने का अर्थ यह नहीं है कि कोई व्यक्ति सृष्टिकर्ता की संप्रभुता को स्वीकार करता है, पहचानता और जानता है; भाग्य में विश्वास करना मात्र उसकी सच्चाई और उसकी सतही प्रकटीकरण की पहचान है। यह इस बात को जानने से भिन्न है कि किस प्रकार सृष्टिकर्ता मनुष्य के भाग्य पर शासन करता है, और सभी चीज़ों के भाग्य पर प्रभुत्व का स्रोत सृष्टिकर्ता ही है, और निश्चित रूप से मानवजाति के भाग्य के लिए सृष्टिकर्ता के आयोजनों और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण से एकदम अलग है। मान लो कि कोई व्यक्ति केवल भाग्य में विश्वास करता है, और यहाँ तक कि उसे इसकी गहरी समझ भी है, लेकिन इससे वह मानवजाति के भाग्य पर सृष्टिकर्ता की संप्रभुता को जानने, मानने, उसके प्रति समर्पण करने या उसे स्वीकार करने में सक्षम नहीं है। ऐसे में, उसका जीवन एक त्रासदी होगा; वह फिर भी यह जीवन व्यर्थ ही जिएगा—यह सब निरर्थक हो जाएगा। वह अभी भी सृष्टिकर्ता के प्रभुत्व के आगे आत्मसमर्पण नहीं कर पाएगा, सच्चे अर्थ में एक सृजित मनुष्य नहीं बन पाएगा और सृष्टिकर्ता की स्वीकृति पाने में असमर्थ होगा। जो व्यक्ति वास्तव में सृष्टिकर्ता की संप्रभुता को जानता और अनुभव करता है उसे एक सकारात्मक दशा में होना चाहिए, न कि ऐसी दशा में जो नकारात्मक या असहाय हो। इसके बजाय, चूँकि वह स्वीकार करता है कि सभी चीजें भाग्य से निर्धारित होती हैं, उसके दिल में भी जीवन और भाग्य की एक सटीक परिभाषा होती है : मनुष्य का संपूर्ण जीवन सृष्टिकर्ता की संप्रभुता के अधीन है। जब वह पीछे मुड़कर उस मार्ग को देखता है जिस पर वह चला है, जब वह अपने जीवन के हर चरण को याद करता है, तो वह देखता है—चाहे उसकी यात्रा कठिन रही हो या सुगम—हर कदम पर परमेश्वर उसे मार्ग दिखा रहा था और उसके लिए व्यवस्थाएँ कर रहा था। वह समझता है कि परमेश्वर की कुशल योजना के साथ ही उसकी सावधानीपूर्ण व्यवस्थाओं ने ही आज तक अनजाने में उसकी अगुआई की है, जहाँ वह सृष्टिकर्ता की संप्रभुता और उसके उद्धार को स्वीकार करने में समर्थ है। यह किसी व्यक्ति के जीवन में सबसे बड़ा आशीष है! यदि भाग्य के प्रति किसी व्यक्ति में नकारात्मक रवैया है तो इससे साबित होता है कि वह हर उस चीज का विरोध कर रहा है जिसकी व्यवस्था परमेश्वर ने उसके लिए की है और उसमें समर्पणशील रवैया नहीं है। यदि मनुष्य के भाग्य पर परमेश्वर की संप्रभुता के प्रति किसी व्यक्ति का सकारात्मक रवैया है, तो जब वह पीछे मुड़कर उस मार्ग को देखता है जिस पर वह चला था, जब वह सही मायनों में परमेश्वर की संप्रभुता का अनुभव करता है तो वह और भी अधिक सच्चे मन से हर उस चीज के प्रति समर्पण करना चाहेगा जिसकी परमेश्वर ने व्यवस्था की है, और उसके पास परमेश्वर को उसके भाग्य की योजना बनाने देने और आगे से परमेश्वर के खिलाफ विद्रोह न करने के लिए और अधिक दृढ़ संकल्प और आस्था होगी। यह इसलिए क्योंकि वह देखता है कि जब लोग नहीं जानते कि भाग्य क्या है या परमेश्वर की संप्रभुता को नहीं समझते हैं तो वे बस मनमर्जी से धुँध में हाथ-पैर मारते हुए और लड़खड़ाते हुए आगे बढ़ते हैं और यह यात्रा बहुत ही कठिन होती है और दिल में बहुत अधिक दर्द उत्पन्न करती है। इसलिए जब लोगों को यह एहसास होता है कि परमेश्वर मानव भाग्य पर संप्रभु है तो चतुर लोग परमेश्वर की संप्रभुता को जानना और स्वीकार करना चुनते हैं और भाग्य के खिलाफ संघर्ष जारी रखने और अपने तरीके से अपने तथाकथित जीवन लक्ष्यों का पीछा करने के बजाय “अपने स्वयं के हाथों से एक अच्छा जीवन बनाने की कोशिश करने” के दर्दनाक दिनों को अलविदा कहते हैं। जब कोई व्यक्ति परमेश्वर के बिना होता है, जब वह उसे नहीं देख सकता है, जब वह वास्तव में और स्पष्टता से परमेश्वर की संप्रभुता को नहीं जान पाता है तो उसका हर दिन निरर्थक, बेकार और अवर्णनीय रूप से पीड़ादायक होता है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि कोई व्यक्ति कहाँ है और उसका क्या काम है, उसके जीने के साधन और जिन लक्ष्यों का वह अनुसरण करता है वे उसे केवल अंतहीन दिल का दर्द और ऐसी पीड़ा देते हैं जिससे उबरना कठिन होता है, जो ऐसे अनुभव हैं जिन्हें वह पीछे मुड़कर देखना भी बर्दाश्त नहीं कर पाता है। सृष्टिकर्ता की संप्रभुता को स्वीकार करके, उसके आयोजनों और उसकी व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करके और एक सच्चा मानव जीवन हासिल करने का अनुसरण करके ही कोई व्यक्ति धीरे-धीरे समस्त दिल के दर्द और पीड़ा से मुक्त हो सकता है और धीरे-धीरे मानव जीवन के सारे खालीपन से खुद को छुटकारा दिला सकता है।
—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 128
केवल वही लोग सच्ची स्वतंत्रता प्राप्त कर सकते हैं जो सृजनकर्ता की संप्रभुता के प्रति समर्पण करते हैं
चूँकि मनुष्य परमेश्वर के आयोजनों और परमेश्वर की संप्रभुता को नहीं जानता है, इसलिए वह नियति का सामना हमेशा प्रतिरोधी मनोदशा और विद्रोही रवैये के साथ करता है, और वह हमेशा परमेश्वर के अधिकार और संप्रभुता और नियति की व्यवस्थाओं से मुक्त होना चाहता है, व्यर्थ ही यह आशा रखता है कि वह अपनी वर्तमान परिस्थितियों को बदल देगा और अपनी नियति को पलट देगा। परंतु वह कभी भी सफल नहीं हो सकता और वह हर मोड़ पर नाकामियों का सामना करता है। उसकी आत्मा की गहराइयों में चलने वाला यह संघर्ष उसे पीड़ा देता है और यह पीड़ा उसकी हड्डियों तक उतर जाती है, साथ ही यह उससे उसका जीवन व्यर्थ करवा देती है। इस पीड़ा का कारण क्या है? क्या यह परमेश्वर की संप्रभुता के कारण है या बुरी नियति के कारण? स्पष्ट है कि दोनों में कोई भी बात सही नहीं है। अंतिम विश्लेषण में, मनुष्य जिस मार्ग पर चलता है और अपना जीवन जीने का जो तरीका वह चुनता है, उसी के कारण ऐसा होता है। हो सकता है कि कुछ लोगों ने इन चीजों को अनुभव ही न किया हो। किन्तु जब तुम सही मायनों में जान जाते हो और यह स्वीकार कर लेते हो कि मनुष्य की नियति पर परमेश्वर की संप्रभुता है, जब तुम सही मायनों में समझ जाते हो कि हर वह चीज जिस पर परमेश्वर की संप्रभुता है और जिसकी वह व्यवस्था करता है, वह तुम्हारे लिए जबरदस्त लाभ और सुरक्षा है, तब तुम्हें अपनी पीड़ा धीरे-धीरे कम होती महसूस होगी और तुम्हारा संपूर्ण अस्तित्व धीरे-धीरे सुकून भरा, स्वतंत्र और मुक्त हो जाएगा। अधिकांश लोगों की स्थितियों का आकलन करने से पता चलता है कि वे तटस्थ भाव से मनुष्य के भाग्य पर सृष्टिकर्ता की संप्रभुता के व्यावहारिक मूल्य एवं अर्थ को स्वीकार नहीं पाते हैं, यद्यपि व्यक्तिपरक स्तर पर वे उसी तरह से जीवन जीते रहना नहीं चाहते हैं, जैसा वे पहले जीते थे, और अपनी पीड़ा से राहत चाहते हैं; फिर भी तटस्थ भाव से वे सृष्टिकर्ता की संप्रभुता को सही मायनों में समझ नहीं पाते और उसके अधीन नहीं हो सकते हैं, और वे यह तो बिल्कुल भी नहीं जानते हैं कि सृष्टिकर्ता के आयोजनों और उसकी व्यवस्थाओं को किस प्रकार खोजें एवं स्वीकार करें। इसलिए, यदि मनुष्य वास्तव में इस तथ्य को नहीं जान पाता है कि सृष्टिकर्ता की उसके भाग्य और उसकी हर चीज पर संप्रभुता है, और वह वास्तव में सृष्टिकर्ता के प्रभुत्व के अधीन समर्पण नहीं कर सकता है, तो उसके लिए इस विचार से संचालित होने और बेड़ियों में जकड़े रहने से बचना बहुत कठिन होगा कि मनुष्य का भाग्य उसके अपने हाथों में है, और उसके लिए भाग्य और सृष्टिकर्ता के अधिकार के खिलाफ अपने तीव्र संघर्ष से उत्पन्न होने वाली पीड़ा से मुक्त होना बहुत कठिन होगा—बेशक, उसके लिए वास्तव में स्वतंत्र और मुक्त होना, परमेश्वर की आराधना करने वाला व्यक्ति बनना भी बहुत कठिन होगा। इस दशा से खुद को मुक्त करने का सबसे सरल तरीका है जीने के अपने पुराने तरीके को अलविदा कहना; जीवन में अपने पुराने लक्ष्यों को अलविदा कहना; अपने पुराने जीने के तरीके, जीवन के दृष्टिकोण, अनुसरणों, इच्छाओं एवं आकांक्षाओं को सारांशित करना और उनका गहन-विश्लेषण करना; और उसके बाद मनुष्य के लिए परमेश्वर के इरादों और अपेक्षाओं के साथ उनकी तुलना करना और यह देखना कि क्या उनमें से कोई परमेश्वर के इरादों के अनुरूप है, क्या उनमें से कोई परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुरूप है, क्या उनमें से कोई जीवन के सही मूल्य प्रदान करता है, व्यक्ति को अधिकाधिक सत्य को समझने की दिशा में ले जाता है और व्यक्ति को मानवता के साथ और मनुष्य के समान जीने में समर्थ बनाता है। जब तुम लोगों द्वारा जीवन में अनुसरण किए जा रहे अपने विभिन्न लक्ष्यों और उनके जीने के विभिन्न तरीकों की बार-बार जाँच करोगे और इनका सावधानीपूर्वक गहन-विश्लेषण करोगे तो तुम यह पाओगे कि उनमें से एक भी सृष्टिकर्ता के उस मूल इरादे के अनुरूप नहीं है जिसके साथ उसने मानवजाति का सृजन किया था। ये सारी चीजें लोगों को सृष्टिकर्ता की संप्रभुता और उसकी देखभाल से दूर करती हैं; ये सभी ऐसे जाल हैं जो लोगों को भ्रष्ट बनने का कारण बनते हैं और उन्हें नरक में ले जाते हैं। इस बात का एहसास होने के बाद तुम्हें जीवन के अपने पुराने दृष्टिकोण को त्याग देना चाहिए, विभिन्न जालों से दूर रहना चाहिए, तुम्हें परमेश्वर को तुम्हारे जीवन का नियंत्रण करने देना चाहिए और इसके लिए व्यवस्थाएँ करने देना चाहिए, केवल परमेश्वर के आयोजनों और मार्गदर्शन के प्रति समर्पण करने का दृढ़ संकल्प करना चाहिए, खुद से कोई चुनाव नहीं करने चाहिए और एक ऐसा इंसान बनना चाहिए जो परमेश्वर की आराधना करता हो। यह सुनने में आसान लगता है, परन्तु इसे करना बहुत कठिन है। कुछ लोग इसकी तकलीफ सहन कर सकते हैं, कुछ नहीं कर सकते हैं। कुछ लोग पालन करने के इच्छुक होते हैं, कुछ लोग अनिच्छुक होते हैं। जो लोग अनिच्छुक होते हैं उनमें ऐसा करने की इच्छा और दृढ़ संकल्प की कमी होती है; वे एकदम स्पष्ट रूप से परमेश्वर की संप्रभुता के बारे में अवगत हैं, बहुत अच्छी तरह से जानते हैं कि यह परमेश्वर ही है जो मनुष्य के भाग्य की योजना बनाता है और उसकी व्यवस्था करता है, और फिर भी वे हाथ-पैर मारते और संघर्ष करते हैं, और अपने भाग्य को परमेश्वर के हाथों में सौंपने और परमेश्वर की संप्रभुता के प्रति समर्पित होने के लिए सहमत नहीं होते हैं; यही नहीं, वे परमेश्वर के आयोजनों और उसकी व्यवस्थाओं से नाराज़ रहते हैं। अतः हमेशा कुछ ऐसे लोग होंगे जो स्वयं देखना चाहते हैं कि वे क्या करने में सक्षम हैं; वे अपने दोनों हाथों से अपने भाग्य को बदलना चाहते हैं, या अपनी ताकत से खुशियाँ प्राप्त करना चाहते हैं, यह देखना चाहते हैं कि वे परमेश्वर के अधिकार की सीमाओं का अतिक्रमण कर सकते हैं या नहीं और परमेश्वर की संप्रभुता से ऊपर उठ सकते हैं या नहीं। मनुष्य की त्रासदी यह नहीं है कि वह सुखी जीवन के पीछे भागता है और न ही यह है कि वह प्रसिद्धि और लाभ का पीछा करता है या वह धुंध में अपनी नियति के खिलाफ संघर्ष करता है, बल्कि यह है कि सृष्टिकर्ता का अस्तित्व देख लेने के बाद भी, यह सच्चाई जान लेने के बाद भी कि सृष्टिकर्ता मानव की नियति पर संप्रभु है, वह गलत मार्ग से लौट नहीं पाता है, वह कीचड़ से अपने पैर बाहर नहीं निकाल पाता है, बल्कि अपना दिल कठोर बना लेता है और अपनी गलतियों पर अड़ा रहता है। लेशमात्र भी पछतावे के बिना, वह कीचड़ में लगातार हाथ पैर मारना, सृष्टिकर्ता की संप्रभुता के विरोध में अवज्ञतापूर्ण ढंग से स्पर्धा करना अधिक पसंद करता है, और दुखद अंत तक प्रतिरोध करता रहता है। जब वह टूटकर बिखर जाता है और उसका रक्त बह रहा होता है तब जाकर वह अंततः हार मान लेने और वापस मुड़ने का निर्णय लेता है। यही मनुष्य की असली त्रासदी है। इसलिए मैं कहता हूँ, जो लोग समर्पण करना चुनते हैं वे बुद्धिमान हैं, जबकि जो संघर्ष करने और बचकर भागने का चुनाव करते हैं, वे वस्तुतः मूर्ख और जिद्दी होते हैं।
—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 129
मानव जीवन में छह मोड़ (चुने हुए अंश)
छठा मोड़ : मृत्यु
इतनी हलचल, भाग-दौड़, इतनी कुंठाओं और निराशाओं के पश्चात्, इतने सारे सुख-दुःख और उतार-चढ़ावों के पश्चात्, इतने सारे अविस्मरणीय वर्षों के पश्चात्, बार-बार ऋतुओं को परिवर्तित होते हुए देखने के पश्चात्, व्यक्ति बिना ध्यान दिए ही जीवन के महत्वपूर्ण पड़ावों को पार कर जाता है, और पलक झपकते ही वह स्वयं को अपने जीवन के ढलते हुए वर्षों में पाता है। समय के निशान उसके पूरे शरीर पर छपे होते हैं : अब वह सीधा खड़ा नहीं हो सकता है, उसके काले बाल सफेद हो चुके होते हैं, जो आँखें कभी चमकदार थीं, साफ देख सकती थीं, वे आँखें धुँधली हो गई हैं, और चिकनी तथा कोमल त्वचा पर झुर्रियाँ और धब्बे पड़ गए हैं। उसकी सुनने की शक्ति कमजोर हो गई है, उसके दाँत ढीले हो कर गिर गए हैं, उसकी प्रतिक्रियाएँ धीमी हो गई हैं, वह तेज़ गति से नहीं चल पाता है...। इस मोड़ पर, उसने अपनी जवानी के जोशीले दिनों को अंतिम विदाई दे दी है और अपने जीवन की संध्या में प्रवेश कर लिया है : बुढ़ापा। अब, वह मृत्यु का सामना करेगा, जो किसी मनुष्य के जीवन का अंतिम मोड़ है।
1) मनुष्य के जीवन और मृत्यु पर केवल सृजनकर्ता का ही सामर्थ्य है
यदि किसी व्यक्ति का जन्म उसके पिछले जीवन से नियत था, तो उसकी मृत्यु उस नियति के अंत को चिह्नित करती है। यदि किसी का जन्म इस जीवन में उसके मिशन की शुरुआत है, तो उसकी मृत्यु उसके उस मिशन के अंत को चिह्नित करती है। चूँकि सृष्टिकर्ता ने प्रत्येक व्यक्ति के जन्म के लिए परिस्थितियों का एक निश्चित समुच्चय तय किया है, तो यह तय है कि उसने उसकी मृत्यु के लिए भी परिस्थितियों के एक निश्चित समुच्चय की व्यवस्था की है। दूसरे शब्दों में, कोई भी व्यक्ति संयोग से पैदा नहीं होता है, किसी भी व्यक्ति की मृत्यु अकस्मात नहीं होती है और जन्म-मरण दोनों ही अनिवार्य रूप से उसके पिछले और वर्तमान जीवन से जुड़े हैं। किसी व्यक्ति के जन्म की परिस्थितियाँ कैसी हैं और उसकी मृत्यु की परिस्थितियाँ कैसी हैं, इनका संबंध सृष्टिकर्ता की पूर्वनियति से है; यह व्यक्ति की नियति है, व्यक्ति का भाग्य है। चूँकि किसी व्यक्ति के जन्म के बारे में बहुत सारी व्याख्याएँ होती हैं, इसलिए उसकी मृत्यु के लिए भी अनिवार्य रूप से विभिन्न विशेष परिस्थितियाँ होनी चाहिए। इस प्रकार, मानवजाति में लोगों के अलग-अलग जीवनकाल और मृत्यु के अलग-अलग तरीके और समय होते हैं। कुछ लोग ताकतवर और स्वस्थ होते हैं, फिर भी जल्दी मर जाते हैं; कुछ लोग कमजोर और बीमार होते हैं, फिर भी बूढ़े होने तक जीते रहते हैं और बिना कोई कष्ट पाए मर जाते हैं। कुछ की मृत्यु अस्वाभाविक कारणों से होती है और कुछ की मृत्यु स्वाभाविक कारणों से होती है। कुछ की मृत्यु अपने घर से दूर होती है, कुछ अपने प्रियजनों के साथ उनके सान्निध्य में आखिरी साँस लेते हैं। कुछ आसमान में मरते हैं, कुछ धरती के नीचे। कुछ पानी में डूब जाते हैं, कुछ आपदाओं में मर जाते हैं। कुछ सुबह मरते हैं, कुछ रात्रि में। ... हर कोई एक शानदार जन्म, एक उत्कृष्ट जीवन और एक गौरवशाली मृत्यु की कामना करता है, परंतु कोई भी व्यक्ति अपनी नियति से परे नहीं जा सकता है, कोई भी सृष्टिकर्ता की संप्रभुता से बचकर नहीं निकल सकता है। यह मनुष्य का भाग्य है। लोग अपने भविष्य के लिए तमाम तरह की योजनाएँ बना सकते हैं, लेकिन कोई भी यह योजना नहीं बना सकता कि वह कैसे पैदा होगा या संसार से उसके जाने का तरीका और समय क्या होंगे। यूँ तो सभी लोग मृत्यु के आगमन से बचने और उसका विरोध करने की भरसक कोशिश करते हैं, फिर भी उन्हें भनक लगे बिना मृत्यु चुपचाप पास आ जाती है। कोई नहीं जानता है कि वह कब या कैसे मरेगा और यह तो बिल्कुल भी नहीं जानता कि वह कहाँ मरेगा। जाहिर है, अपने जीवन-मृत्यु को लेकर सर्वोच्च शक्ति न तो स्वयं मनुष्य के हाथ में है, न ही प्राकृतिक संसार में किसी जीवित प्राणी के हाथ में, बल्कि यह सृष्टिकर्ता के हाथ में है जो अद्वितीय अधिकार संपन्न है। मनुष्य का जीवन-मरण प्राकृतिक संसार के किन्हीं नियमों का परिणाम नहीं है, बल्कि सृष्टिकर्ता के अधिकार की संप्रभुता का परिणाम है।
2) जो सृजनकर्ता की संप्रभुता को नहीं जानता है वह मृत्यु के भय से त्रस्त रहेगा
वृद्धावस्था में पहुँचने के बाद व्यक्ति परिवार का भरण-पोषण करने या जीवन में अपनी उच्च महत्वाकांक्षाओं को पूरा न कर पाने की चुनौती का सामना नहीं करता है, बल्कि उसके सामने चुनौती होती है कि वह किस प्रकार अपने जीवन को अलविदा कहे, किस प्रकार अपने जीवन के अंत का सामना करे, किस प्रकार अपने जीवन की सज़ा को खत्म करने के लिए विराम लगाए। हालाँकि ऊपरी तौर पर ऐसा प्रतीत होता है कि लोग मृत्यु पर कम ही ध्यान देते हैं, फिर भी कोई इस विषय के बारे में जानने से बच नहीं सकता, क्योंकि किसी को भी नहीं पता कि मृत्यु के पार कोई और संसार है भी या नहीं, एक ऐसा संसार जिसके बारे में मनुष्य सोच नहीं सकता, या जिसका एहसास नहीं कर सकता, एक ऐसा संसार जिसके बारे में कोई कुछ भी नहीं जानता है। इसी कारण आमने-सामने मृत्यु का सामना करने से लोग डरते हैं, वे इसका उस तरह से सामना करने से डरते हैं जैसा उनको करना चाहिए; बल्कि वे इस विषय को टालने की भरसक कोशिश करते हैं। और इसलिए यह प्रत्येक व्यक्ति में मृत्यु का भय भर देता है, और जीवन के इस अनिवार्य सच पर रहस्य का परदा डालते हुए प्रत्येक व्यक्ति के हृदय पर लगातार बने रहने वाली छाया डाल देता है।
जब किसी व्यक्ति को लगता है कि उसके शरीर का क्षय हो रहा है, जब उसे आभास होता है कि वह मृत्यु के करीब पहुँच रहा है, तो उसे एक अस्पष्ट ख़ौफ़, एक अवर्णनीय भय जकड़ लेता है। मृत्यु के भय से वह और भी अधिक अकेला और असहाय महसूस करने लगता है, और इस मोड़ पर वह स्वयं से पूछता है : मनुष्य कहाँ से आया था? मनुष्य कहाँ जा रहा है? क्या मनुष्य इसी तरीके से मरता है, जब उसका जीवन तेजी से उसके पास से गुजर चुका होता है? क्या यही वह समय है जो मनुष्य के जीवन के अंत को चिह्नित करता है? अंत में, जीवन का क्या अर्थ है? आख़िरकार, जीवन का मूल्य क्या है? क्या यह प्रसिद्धि और सौभाग्य पाना है? क्या यह परिवार को बढ़ाना है? ... चाहे इन विशेष प्रश्नों के बारे में किसी ने सोचा हो या नहीं, चाहे कोई मृत्यु से कितना भी डरता हो, प्रत्येक व्यक्ति के हृदय की गहराई में हमेशा से इन रहस्यों के बारे में जानने की इच्छा रही है, जीवन को न समझ पाने का एहसास रहा है, और इनके साथ, संसार के बारे में भावुकता, उसे छोड़कर जाने की अनिच्छा समाहित होती है। कदाचित् कोई भी स्पष्ट रूप से नहीं कह सकता है कि वह क्या है जिससे मनुष्य भयभीत होता है, वह क्या है जिसकी मनुष्य तलाश करना चाहता है, वह क्या है जिसके बारे में वह भावुक होता है और वह किसे पीछे छोड़ने को अनिच्छुक होता है ...
क्योंकि लोगों को मृत्यु से डर लगता है, इसलिए वे बहुत ज्यादा चिंता करते है; क्योंकि वे मृत्यु से डरते हैं, इसलिए ऐसा बहुत कुछ है जिसे वे छोड़ नहीं पाते। जब वे मरने वाले होते हैं, तो कुछ लोग किसी न किसी बात को लेकर झल्लाते रहते हैं; वे अपने बच्चों, अपने प्रियजनों, और धन-सम्पत्ति के बारे में चिंता करते हैं, मानो चिंता करके वे उस पीड़ा और भय को मिटा सकते हैं जो मृत्यु लेकर आती है, मानो कि जीवित प्राणियों के साथ एक प्रकार की घनिष्ठता बनाए रखकर, अपनी उस लाचारी और एकाकीपन से बच सकते हैं जो मृत्यु के साथ आती है। मनुष्य के हृदय की गहराई में एक अस्पष्ट-सा भय होता है, अपने प्रियजनों से बिछुड़ने का भय, कभी नीले आसमान को न देख पाने का भय, कभी इस भौतिक संसार को न देख पाने का भय। अपने प्रियजनों के साथ की अभ्यस्त, एक एकाकी आत्मा, अपनी पकड़ को ढीला करने और नितांत अकेले, एक अनजान और अपरिचित संसार में प्रस्थान नहीं करना चाहती है।
—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 130
प्रसिद्धि और लाभ की तलाश में बिताया गया जीवन व्यक्ति को मृत्यु के समय घबराहट में डाल देता है
बिल्कुल शून्य से जीवन आरंभ करने वाली एक एकाकी आत्मा को सृष्टिकर्ता की संप्रभुता और विधान के कारण माता-पिता और परिवार मिलता है, मानवजाति का सदस्य बनने का अवसर मिलता है, मानव जीवन का अनुभव करने और मानव जगत की यात्रा करने का अवसर मिलता है; इसे सृष्टिकर्ता की संप्रभुता का अनुभव करने, सृष्टिकर्ता की सृष्टि की अद्भुतता को जानने और इससे भी बढ़कर, सृष्टिकर्ता के अधिकार को जानने और इसके प्रति आत्मसमर्पण करने का अवसर भी मिलता है। फिर भी अधिकतर लोग वास्तव में इस दुर्लभ और क्षणभंगुर अवसर को नहीं लपकते हैं। लोग भाग्य के विरुद्ध लड़ते हुए अपने पूरे जीवन भर की ऊर्जा खपा देते हैं, अपने परिवारों का भरण-पोषण करने की कोशिश में दौड़-भाग करते हुए और प्रतिष्ठा और लाभ की खातिर दौड़-धूप करते हुए अपना सारा जीवन बिता देते हैं। जिन चीजों को लोग सँजोकर रखते हैं, वे हैं पारिवारिक प्रेम, पैसा, शोहरत और लाभ, जिन्हें वे जीवन में सबसे मूल्यवान चीजों के रूप में देखते हैं। सभी लोग अपना भाग्य खराब होने के बारे में शिकायत करते हैं, फिर भी वे अपने दिमाग में उन प्रश्नों को पीछे धकेल देते हैं जिन्हें सबसे ज्यादा समझना और टटोलना चाहिए : मनुष्य जीवित क्यों है, मनुष्य को कैसे जीना चाहिए और मानव जीवन का मूल्य और अर्थ क्या है। वे अपना पूरा जीवन, चाहे वह कितना भी लंबा क्यों न हो, केवल शोहरत और लाभ के पीछे भागते हुए बिताते हैं, यहाँ तक कि उनकी युवावस्था बीत जाती है, उनके बाल सफेद हो जाते हैं और उनकी त्वचा पर झुर्रियाँ पड़ जाती हैं, यहाँ तक कि उन्हें एहसास होता है कि शोहरत और लाभ उन्हें बूढ़ा होने से नहीं रोक सकते, धन उनके हृदय के खालीपन को नहीं भर सकता और यहाँ तक कि वे समझ जाते हैं कि कोई भी व्यक्ति जन्म, वृद्धावस्था, बीमारी और मृत्यु के नियमों से बच नहीं सकता और यह कि नियति की व्यवस्थाओं से कोई नहीं बच सकता। केवल जब उन्हें जीवन के अंतिम चरण का सामना करना पड़ता है, तभी सही मायने में उन्हें समझ आती है कि भले ही किसी के पास विशाल संपदा हो, भले ही उसका श्रेष्ठ रुतबा हो और वह ऊँचे पद पर हो, फिर भी वह मृत्यु से नहीं बच सकता है, और उसे अपनी मूल स्थिति में वापस लौटना ही पड़ेगा : एक एकाकी आत्मा, जिसके पास अपना कुछ भी नहीं है। जब लोगों के पास माता-पिता होते हैं, तो उन्हें लगता है कि उनके माता-पिता ही सब कुछ हैं; जब लोगों के पास संपत्ति होती है, तो वे सोचते हैं कि पैसा ही उनका मुख्य आधार है और उनके अस्तित्व की नींव है; जब लोगों के पास रुतबा होता है, तो वे उससे कसकर चिपके रहते हैं और उसके लिए अपना जीवन दे देते हैं। केवल जब लोग इस संसार को छोड़कर जाने वाले होते हैं तभी वे एहसास करते हैं कि जिन चीज़ों का पीछा करते हुए उन्होंने अपने जीवन को बिताया है वे पल भर में गायब हो जाने वाले बादलों के अलावा कुछ नहीं हैं, उनमें से किसी को भी वे थामे नहीं रह सकते हैं, उनमें से किसी को भी वे अपने साथ नहीं ले जा सकते हैं, उनमें से कोई भी उन्हें मृत्यु से छुटकारा नहीं दिला सकता है, उनमें से कोई भी उस एकाकी आत्मा का उसकी वापसी यात्रा में साथ या उसे सांत्वना नहीं दे सकता है; और यही नहीं, उनमें से कोई भी चीज किसी व्यक्ति को बचा नहीं सकती है और उसे मृत्यु से ऊपर उठने में सक्षम नहीं बना सकती है। प्रसिद्धि और लाभ जिन्हें कोई व्यक्ति इस भौतिक संसार में अर्जित करता है, उसे अस्थायी संतुष्टि, थोड़े समय का आनंद और आंतरिक सुरक्षा का एक झूठा एहसास प्रदान करते हैं और वे उसे उसके मार्ग से भी भटका देते हैं। और इसलिए, सुकून, आराम और हृदय की शांति की लालसा में मानवता के इस विशाल समुद्र में छटपटाते लोग, लहर दर लहर उसमें डूबते चले जाते हैं। जब लोगों को अब भी ऐसे प्रश्नों के जवाब ढूँढ़ने होते हैं, जिन्हें उन्हें समझना सबसे आवश्यक है—वे कहाँ से आए हैं, वे जीवित क्यों हैं, वे कहाँ जा रहे हैं, इत्यादि—तभी प्रसिद्धि और लाभ उन्हें लुभा लेते हैं, वे उनके द्वारा गुमराह और नियंत्रित हो जाते हैं और हमेशा के लिए दिशाहीन हो जाते हैं। समय पंख लगाए उड़ जाता है; पलक झपकते ही अनेक वर्ष बीत जाते हैं और इससे पहले कि एक व्यक्ति को एहसास हो, वह अपने जीवन के उत्तम वर्षों को अलविदा कह चुका होता है। जब लोगों का संसार से विदा लेने का समय करीब आता है, तो उन्हें धीरे-धीरे यह एहसास होता है कि संसार की हर चीज उनसे दूर होती जा रही है और अब उनमें किसी भी ऐसी चीज को थामे रखने की शक्ति नहीं बची है जो मूल रूप से उनकी थी; उस समय उन्हें सचमुच लगता है कि वे अंततः एक रोते-बिलखते नवजात शिशु की तरह हैं, जिसके पास अब भी बिल्कुल कुछ भी नहीं है। इस मोड़ पर वे यह सोचना शुरू करने को बाध्य होते हैं कि उन्होंने अपने जीवन में क्या किया है, जीवित होने का क्या मोल है, जीवित होने का अर्थ क्या है और लोग इस संसार में क्यों आए हैं। और ठीक इसी मोड़ पर वे और भी अधिक जानना चाहते हैं कि वास्तव में कोई अगला जन्म है भी या नहीं, वास्तव में स्वर्ग है भी या नहीं, वास्तव में प्रतिफल मिलता है या नहीं...। व्यक्ति जितना मृत्यु के निकट पहुँचने लगता है, वह उतना ही अधिक यह समझना चाहता है कि वास्तव में जीवन किस बारे में है; व्यक्ति जितना मृत्यु के निकट पहुँचने लगता है, उसे उतना ही अधिक अपना हृदय खाली महसूस होने लगता है; व्यक्ति जितना मृत्यु के निकट पहुँचने लगता है, वह उतना ही अधिक बेसहारा महसूस करने लगता है; और इस प्रकार मृत्यु के बारे में उसका भय दिन-प्रतिदिन बढ़ता जाता है। लोग जब मृत्यु के निकट पहुँचते हैं तो उनमें इस तरह की प्रतिक्रियाएँ व्यक्त होने के दो कारण हैं : पहला, वे अपनी प्रसिद्धि और लाभ खोने ही वाले होते हैं जिन पर उनका जीवन निर्भर था, उस सबको अलविदा कहने वाले होते हैं जिसे उनकी आँखें इस संसार में देखती हैं; और दूसरा, वे नितांत अकेले एक अनजान संसार का सामना करने वाले होते हैं, एक रहस्यमयी, अज्ञात दुनिया का सामना करने वाले होते हैं जहाँ वे कदम रखने से भी डरते हैं, जहाँ उनका कोई प्रियजन और कोई सहारा नहीं होता। इन दो कारणों से मृत्यु का सामना करने वाला हर व्यक्ति बेचैनी महसूस करता है और इस तरह घबरा जाता है और पूरी तरह असमंजस में पड़ जाता है, जैसा उसने पहले कभी अनुभव नहीं किया होता। जब कोई वास्तव में इस मोड़ पर पहुँचता है केवल तभी उसे एहसास होता है कि जब कोई व्यक्ति इस संसार में कदम रखता है, तो सबसे पहली बात जो उसे समझनी चाहिए, वह है कि मनुष्य कहाँ से आते हैं, लोग जीवित क्यों हैं, कौन मनुष्य के भाग्य पर संप्रभुता रखता है, कौन मानव के अस्तित्व के लिए प्रावधान करता है और इसके ऊपर कौन संप्रभुता रखता है—यह ज्ञान ही वह पूँजी है जिसके द्वारा कोई व्यक्ति जीवन जीता है, और यह व्यक्ति के जीवित रहने के लिए आवश्यक आधार है। उन्हें पहले यह नहीं सीखना चाहिए कि किस प्रकार अपने परिवारों का भरण-पोषण करें या किस प्रकार प्रसिद्धि और लाभ हासिल करें या किसी समूह में किस प्रकार बाकी सबसे विशिष्ट हों या किस प्रकार और अधिक समृद्ध जीवन बिताएँ और यह तो बिल्कुल नहीं कि किस प्रकार दूसरों से आगे निकलें या विभिन्न प्रकार की स्पर्धाओं में कैसे आसानी से प्रतिस्पर्धा करें। यद्यपि जीवित रहने के विभिन्न कौशल, जिन्हें सीखने में लोग अपना पूरा जीवन लगा देते हैं, उन्हें भरपूर भौतिक सुख दे सकते हैं, लेकिन वे कौशल किसी भी मनुष्य के हृदय में सच्ची तसल्ली और स्थिरता कभी नहीं लाते। इसके बजाय वे लोगों को निरंतर उनकी दिशा से भटकाते हैं, लोगों के लिए स्वयं पर नियंत्रण रखना कठिन बनाते हैं और उन्हें जीवन का अर्थ सीखने के एक के बाद एक अवसर से वंचित कर देते हैं, और वे लोगों के अंदर इस बारे में छिपी हुई परेशानियाँ खड़ी करते हैं कि किस प्रकार सही ढंग से मृत्यु का सामना करें—लोगों के जीवन इस तरह बर्बाद हो जाते हैं। सृष्टिकर्ता सभी के साथ निष्पक्ष ढंग से व्यवहार करता है, सभी को अपनी संप्रभुता का अनुभव करने और उसे जानने का जीवनभर का अवसर प्रदान करता है, फिर भी जब मृत्यु निकट आती है, जब मौत का साया मनुष्य पर मँडराता है, केवल तभी वह उस रोशनी को देखना आरंभ करता है—और तब तक बहुत देर हो चुकी होती है!
लोग अपना सारा जीवन पैसे और प्रसिद्धि व लाभ के पीछे भागने में बिता देते हैं; वे इन चीजों को जीवन-रेखा, अपने सहारे का एकमात्र साधन मानते हैं—मानो ये चीजें अपने पास होने का मतलब यह है कि वे जीते रह सकते हैं और मृत्यु से बच सकते हैं। लेकिन केवल जब वे मरने वाले होते हैं, तभी उन्हें एहसास होता है कि पैसा, प्रसिद्धि और लाभ उनसे कितने दूर हैं और मृत्यु के सामने वे कितने कमजोर और शक्तिहीन हैं, वे कितने भंगुर हैं, कितने अकेले और बेसहारा हैं, और वे कितने असहाय हैं। उन्हें एहसास होता है कि पैसे या प्रसिद्धि और लाभ के बदले जीवन हासिल नहीं किया जा सकता है, कि कोई व्यक्ति चाहे कितना भी धनी हो, उसका रुतबा कितना भी ऊँचा हो, मृत्यु के सामने सभी समान रूप से दीन-हीन और महत्वहीन हैं। उन्हें एहसास हो जाता है कि धन-दौलत से जीवन नहीं खरीदा जा सकता है, प्रसिद्धि और लाभ किसी व्यक्ति को मृत्यु से नहीं बचा सकते और न पैसा, न ही प्रसिद्धि और लाभ किसी व्यक्ति के जीवन को एक मिनट या एक पल के लिए भी बढ़ा सकते हैं। लोग जितना अधिक इस प्रकार महसूस करते हैं, उतनी ही अधिक उनकी जीवित रहने की लालसा बढ़ जाती है; लोग जितना अधिक इस प्रकार महसूस करते हैं, उतना ही अधिक वे मृत्यु के पास आने से भयभीत होते हैं। केवल इसी मुकाम पर उन्हें वास्तव में एहसास होता है कि उनका जीवन उनका नहीं है, और उनके नियंत्रण में नहीं है, और किसी का इस पर वश नहीं है कि वह जीवित रहेगा या मर जाएगा—यह सब किसी के नियंत्रण से बाहर है।
—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 131
सृजनकर्ता के प्रभुत्व के आगे आत्मसमर्पण करो और शान्ति से मृत्यु का सामना करो
जिस क्षण किसी व्यक्ति का जन्म होता है, तब एक एकाकी आत्मा पृथ्वी पर जीवन का अनुभव आरंभ करती है और सृष्टिकर्ता के अधिकार का अनुभव आरंभ करती है, जिसे सृष्टिकर्ता ने उसके लिए व्यवस्थित किया है। कहने की आवश्यकता नहीं कि, यह उस व्यक्ति—उस आत्मा—के लिए सृष्टिकर्ता की संप्रभुता का ज्ञान अर्जित करने का, उसके अधिकार को जानने का, उसे व्यक्तिगत रूप से अनुभव करने का सर्वोत्तम अवसर है। लोग सृष्टिकर्ता द्वारा उनके लिए निर्धारित भाग्य के नियमों के अनुसार अपना जीवन जीते हैं और जिस किसी के पास जमीर और विवेक है, उसके लिए अपने जीवन के दशकों के दौरान सृष्टिकर्ता की संप्रभुता को स्वीकार करना और उसके अधिकार को जानना कोई कठिन बात नहीं है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति के लिए अपने कई दशकों के जीवन-अनुभवों के आधार पर यह पहचानना बहुत आसान होना चाहिए कि सभी मनुष्यों के भाग्य पूर्वनियत हैं और यह समझना या इस निष्कर्ष पर पहुँचना भी बहुत आसान होना चाहिए कि जीवित होने का अर्थ क्या है। जब व्यक्ति इस जीवन अनुभव को स्वीकारता है, तो धीरे-धीरे उसकी समझ में आने लगता है कि जीवन कहाँ से आता है, यह समझने लगता है कि हृदय को सचमुच किसकी आवश्यकता है, क्या उसे जीवन के सही मार्ग पर ले जाएगा और मनुष्य के जीवन का ध्येय और लक्ष्य क्या होना चाहिए। धीरे-धीरे वह समझने लगेगा कि यदि वह सृष्टिकर्ता की आराधना नहीं करता है, यदि वह उसके प्रभुत्व के अधीन आत्मसमर्पण नहीं करता है, तो जब मृत्यु का सामना करने का समय आएगा—जब उसकी आत्मा एक बार फिर से सृष्टिकर्ता का सामना करने वाली होगी—तब उसका हृदय असीमित भय और बेचैनी से भर जाएगा। यदि कोई व्यक्ति कई दशकों से इस संसार में है लेकिन अभी तक यह नहीं समझा है कि मानव जीवन कहाँ से आता है, न ही यह समझ पाया है कि किसकी हथेली में मनुष्य का भाग्य निहित है, तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि वह मृत्यु का सामना शांत होकर नहीं कर सकता है। जिस व्यक्ति ने जीवन के कई दशकों के अपने अनुभव में सृष्टिकर्ता की संप्रभुता का ज्ञान प्राप्त कर लिया है, वह ऐसा व्यक्ति है जिसके पास जीवन के अर्थ और मूल्य की शुद्ध समझ है। ऐसे व्यक्ति के पास जीवन के उद्देश्य का गहन ज्ञान होता है, सृष्टिकर्ता की संप्रभुता की वास्तविक समझ और अनुभव होता है और उससे भी बढ़कर, वह सृष्टिकर्ता के अधिकार के प्रति समर्पण कर सकता है। ऐसा व्यक्ति सृष्टिकर्ता के द्वारा मानवजाति के सृजन का अर्थ समझता है, वह समझता है कि मनुष्य को सृष्टिकर्ता की आराधना करनी चाहिए, कि जो कुछ भी मनुष्य के पास है, वह सृष्टिकर्ता से आता है और वह निकट भविष्य में ही किसी दिन उसके पास लौट जाएगा। ऐसा व्यक्ति समझता है कि सृष्टिकर्ता मनुष्य के जन्म की व्यवस्था करता है और मनुष्य की मृत्यु पर संप्रभुता रखता है, और जीवन व मृत्यु दोनों ही सृष्टिकर्ता के अधिकार द्वारा पूर्वनियत हैं। इसलिए, जब कोई व्यक्ति वास्तव में इन बातों को समझ लेता है, तो वह शांत होकर मृत्यु का सामना करने, अपनी सारी बाहरी चीजों को शांत होकर छोड़ देने, और जो होने वाला है उसे सहर्ष स्वीकार करने व उसके प्रति समर्पण करने और सृष्टिकर्ता द्वारा व्यवस्थित जीवन के अंतिम पड़ाव का स्वागत करने में स्वाभाविक रूप से सक्षम होगा, न कि लगातार इससे डरेगा और इसके खिलाफ संघर्ष करेगा। यदि कोई अपने जीवन को सृष्टिकर्ता की संप्रभुता का अनुभव करने और उसके अधिकार को जानने के एक अवसर के रूप में देखता है, यदि कोई अपने जीवन को सृजित मनुष्य के रूप में अपना कर्तव्य निभाने और अपना मिशन पूरा करने के एक दुर्लभ अवसर के रूप में देखता है, तो जीवन के बारे में उसके पास निश्चित ही सही दृष्टिकोण होगा और वह निश्चित ही सृष्टिकर्ता के आशीषों और मार्गदर्शन में जिएगा, वह निश्चित रूप से सृष्टिकर्ता की रोशनी में चलेगा, वह निश्चित रूप से सृष्टिकर्ता की संप्रभुता को जानेगा, वह निश्चित रूप से उसके प्रभुत्व के अधीन आत्मसमर्पण करेगा, और निश्चित रूप से उसके अद्भुत कर्मों और उसके अधिकार का गवाह बनेगा। कहने की आवश्यकता नहीं कि, निश्चित रूप से, ऐसा व्यक्ति सृष्टिकर्ता के द्वारा प्रेम पाएगा और स्वीकार किया जाएगा, और केवल ऐसा व्यक्ति ही मृत्यु के प्रति एक शांत दृष्टिकोण रख सकता है और जीवन के अंतिम पड़ाव का सहर्ष स्वागत कर सकता है। जाहिर है, अय्यूब मृत्यु के प्रति ऐसा ही रवैया रखता था। उसने वे शर्तें पूरी कीं, जिन्होंने उसे जीवन के अंतिम पड़ाव को सहर्ष स्वीकारने में सक्षम बनाया। उसने अपनी जीवन यात्रा एक सहज निष्कर्ष पर पहुँचाई और जीवन में अपना मिशन पूरा किया और फिर सृष्टिकर्ता के पास रहने के लिए लौट गया।
—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 132
अय्यूब के जीवन के लक्ष्य और उसके द्वारा हासिल की गयी वस्तुएँ उसे शान्तिपूर्वक मृत्यु का सामना करने देती हैं
धर्मग्रंथ में अय्यूब के बारे में लिखा गया है कि : “अन्त में अय्यूब वृद्धावस्था में दीर्घायु होकर मर गया” (अय्यूब 42:17)। इसका अर्थ है कि जब अय्यूब की मृत्यु हुई, तो उसे कोई पछतावा नहीं था और उसने कोई पीड़ा महसूस नहीं की, बल्कि स्वाभाविक रूप से इस संसार से चला गया। जैसे कि हर किसी को पता है, अय्यूब ऐसा मनुष्य था जो अपने जीवन में परमेश्वर का भय मानता था और बुराई से दूर रहता था। उसके धार्मिक कर्मों को परमेश्वर ने स्वीकृति दी और दूसरों ने उन्हें याद रखा, और कहा जा सकता है कि उसका जीवन पूरी मानवता में सर्वोच्च मूल्य और महत्व रखता था। अय्यूब ने परमेश्वर की आशीषें प्राप्त कीं, परमेश्वर ने उसे पृथ्वी पर धार्मिक कहा और उसकी परीक्षा भी ली, साथ ही शैतान ने उसे प्रलोभन भी दिया। वह परमेश्वर के लिए अपनी गवाही में दृढ़ रहा और वह उसके द्वारा “धार्मिक मनुष्य” कहलाने के योग्य था। परमेश्वर द्वारा उसकी परीक्षा लिए जाने के बाद के दशकों में वह पहले की तुलना में और भी अधिक मूल्यवान, सार्थक, स्थिर और शांत तरीके से जिया। उसके धार्मिक कर्मों की वजह से परमेश्वर ने उसकी परीक्षा ली और उसके धार्मिक कर्मों की वजह से ही परमेश्वर उसके सामने प्रकट हुआ और उससे व्यक्तिगत रूप से बात की। इसलिए अपनी परीक्षा लिए जाने के बाद के वर्षों में अय्यूब ने अधिक व्यावहारिक ढंग से जीवन का मूल्य अनुभव किया और उसे समझा, सृष्टिकर्ता की संप्रभुता की और अधिक गहन समझ प्राप्त की और इस बारे में और अधिक सटीक और निश्चित ज्ञान प्राप्त किया कि कैसे सृष्टिकर्ता अपनी आशीषें देता है और वापस ले लेता है। अय्यूब की पुस्तक में दर्ज है कि यहोवा परमेश्वर ने अय्यूब को पहले की अपेक्षा कहीं अधिक आशीषें प्रदान कीं और इस प्रकार उसे ऐसी और भी बेहतर स्थिति में पहुँचा दिया कि वह सृष्टिकर्ता की संप्रभुता को जान सके और मृत्यु का शांति से सामना कर सके। इसलिए जब अय्यूब बूढ़ा हुआ और उसने मृत्यु का सामना किया, तब वह निश्चित रूप से अपनी संपत्ति के बारे में चिंतित नहीं था। उसे कोई चिंता नहीं थी, कोई पछतावा नहीं था और निश्चित रूप से उसे मृत्यु का डर नहीं था। चूँकि उसने अपना सारा जीवन परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने के मार्ग पर चलते हुए बिताया था, इसलिए उसे अपने परिणाम की चिंता नहीं थी। आज कितने लोग वैसा कर सकते हैं जैसा अय्यूब ने अपनी मृत्यु का सामना करते हुए किया था? कोई भी इतना सरल बाहरी रवैया प्राप्त करने में सक्षम क्यों नहीं है? इसका केवल एक ही कारण है : अय्यूब ने अपना जीवन परमेश्वर की संप्रभुता पर विश्वास करने, उसे स्वीकार करने और उसके प्रति समर्पण करने के व्यक्तिपरक अनुसरण में जिया और इसी विश्वास, स्वीकृति और समर्पण के साथ वह जीवन के महत्वपूर्ण पड़ावों से गुजरा, अपने अंतिम वर्ष जिए और अपने जीवन के अंतिम पड़ाव का स्वागत किया। अय्यूब ने अपने जीवन में चाहे जो भी अनुभव किया हो, जीवन में उसके अनुसरण और लक्ष्य पीड़ादायक नहीं, बल्कि सुखद थे। वह न केवल सृष्टिकर्ता की आशीषों या अनुमोदन के कारण खुश था, बल्कि इससे भी महत्वपूर्ण रूप से वह अपने अनुसरणों और जीवन लक्ष्यों के कारण और परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने के अपने अनुसरण के माध्यम से प्राप्त सृष्टिकर्ता की संप्रभुता के बढ़ते ज्ञान और सच्चे अनुभव के कारण खुश था। इससे भी बढ़कर वह इसलिए प्रसन्न था क्योंकि सृष्टिकर्ता की संप्रभुता का अनुभव करते हुए उसने व्यक्तिगत रूप से सृष्टिकर्ता के अद्भुत कर्मों का अनुभव किया, साथ ही उसने परमेश्वर के साथ मेलजोल करने, उससे परिचित होने और उसे जानने के हर कोमल किंतु अविस्मरणीय अनुभव और स्मृति को भी सँजोया। अय्यूब उस सांत्वना और प्रसन्नता की वजह से खुश था जो सृष्टिकर्ता के इरादों को जानने से आई थी और परमेश्वर का भय मानने वाले हृदय की वजह से खुश था जो उसमें यह देखने के बाद उभरा था कि परमेश्वर महान, अद्भुत, प्यारा और विश्वसनीय है। अय्यूब बिना किसी कष्ट के अपनी मृत्यु का सामना इसलिए कर पाया, क्योंकि वह जानता था कि मरने के बाद वह सृष्टिकर्ता के पास लौट जाएगा। ये जीवन में उसके अनुसरण और लाभ ही थे जिन्होंने उसे शांति से मृत्यु का सामना करने दिया, सृष्टिकर्ता द्वारा अपना जीवन वापस लिए जाने का शांति से सामना करने दिया और इससे भी अधिक, उसे बेदाग और चिंता-मुक्त होकर सृष्टिकर्ता का सामना करने दिया। क्या आजकल लोग उस प्रकार की प्रसन्नता को प्राप्त कर सकते हैं जो अय्यूब के पास थी? क्या तुम लोगों के पास ऐसा करने की स्थितियाँ हैं? चूँकि लोग आजकल ऐसा करने की स्थिति में हैं, तो वे अय्यूब के समान खुशी से जीवन बिताने में असमर्थ क्यों हैं? वे मृत्यु के भय के कष्ट से बच निकलने में असमर्थ क्यों हैं? मृत्यु का सामना करते समय कुछ लोगों का पेशाब निकल जाता है; कुछ काँपने लगते हैं, कुछ मूर्छित हो जाते हैं और कुछ स्वर्ग तथा मनुष्यों दोनों को कोसने लगते हैं; यहाँ तक कि कुछ रोने-बिलखने भी लगते हैं। ये मृत्यु नजदीक आने पर किसी भी तरह से लोगों में अचानक होने वाली प्रतिक्रियाएँ नहीं हैं। मृत्यु का सामना करते समय लोग मुख्यतः इसलिए ऐसे लज्जास्पद ढंग से व्यवहार करते हैं क्योंकि अपने हृदय की गहराई में वे मृत्यु से डरते हैं, क्योंकि उन्हें परमेश्वर की संप्रभुता और उसकी व्यवस्थाओं का स्पष्ट ज्ञान और समझ नहीं होती और सही मायने में वे उनके प्रति समर्पित तो बिल्कुल नहीं होते। लोग इस तरह व्यवहार इसलिए करते हैं, क्योंकि वे केवल स्वयं ही हर चीज की व्यवस्था और उसे संचालित करना चाहते हैं, अपने भाग्य, अपने जीवन और मृत्यु को नियंत्रित करना चाहते हैं। इसलिए यह आश्चर्य की बात नहीं कि लोग कभी भी मृत्यु के भय से बच नहीं पाते हैं।
—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 133
केवल सृजनकर्ता की संप्रभुता को स्वीकार करके ही कोई व्यक्ति उसकी ओर लौट सकता है
जब किसी के पास परमेश्वर की संप्रभुता और उसकी व्यवस्थाओं का स्पष्ट ज्ञान और अनुभव नहीं होता, तो भाग्य और मृत्यु के बारे में उसकी समझ का भ्रमित होना अपरिहार्य है। लोग स्पष्ट रूप से नहीं देख सकते कि हर चीज परमेश्वर की हथेली में है, वे यह नहीं समझते कि हर चीज परमेश्वर के नियंत्रण और संप्रभुता के अधीन है और यह भी नहीं समझते कि मनुष्य न तो ऐसी संप्रभुता से छुटकारा पा सकता है और न ही उससे मुक्त हो सकता है। और यही कारण है कि जब उनका मृत्यु का सामना करने का समय आता है तो उनके पास हमेशा अंतहीन अंतिम शब्द होते हैं, उनके पास हमेशा चिंताएँ होती हैं और उनके पास हमेशा पछतावे होते हैं। वे अत्यधिक बोझ, अत्यधिक अनिच्छा, अत्यधिक भ्रम से दबे होते हैं। इसी वजह से वे मृत्यु से डरते हैं। इस संसार में जन्म लेने वाले किसी भी व्यक्ति के लिए, उसका जन्म आवश्यक है और उसकी मृत्यु अनिवार्य है; जो कुछ घटित होता है, उससे परे कोई नहीं जा सकता है। यदि कोई इस संसार से बिना किसी पीड़ा के जाना चाहता है, यदि कोई जीवन के इस अंतिम पड़ाव का सामना चले जाने की अनिच्छा या चिंताओं के बिना करना चाहता है, तो इसका एक ही रास्ता है कि वो कोई पछतावा न रखे। और बिना किसी पछतावे के चले जाने का एकमात्र मार्ग है सृष्टिकर्ता की संप्रभुता को जानना, उसके अधिकार को जानना और उनके प्रति समर्पण करना। केवल इसी तरह से कोई व्यक्ति मानवीय लड़ाई-झगड़ों, बुराई और शैतान के बंधन से दूर रह सकता है; और केवल इसी तरह से ही कोई व्यक्ति अय्यूब के समान, सृष्टिकर्ता के मार्गदर्शन वाला और आशीष-प्राप्त जीवन जी सकता है, ऐसा जीवन जो स्वतंत्र और मुक्त हो, ऐसा जीवन जिसका मूल्य और अर्थ हो, ऐसा जीवन जो ईमानदार और निष्कपट हो। केवल इसी तरह कोई अय्यूब की तरह सृष्टिकर्ता के द्वारा परीक्षण किए जाने और वंचित किए जाने के प्रति, सृष्टिकर्ता के आयोजनों और उसकी व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण कर सकता है। केवल इसी तरह से कोई व्यक्ति अय्यूब की तरह जीवनभर सृष्टिकर्ता की आराधना कर सकता है और उसकी स्वीकृति पा सकता है, उसकी आवाज सुन सकता है और उसे प्रकट होते हुए देख सकता है। केवल इसी तरह से कोई व्यक्ति अय्यूब की तरह बिना किसी पीड़ा, चिंता और पछतावे के प्रसन्नता के साथ जी और मर सकता है। केवल इसी तरह से कोई व्यक्ति अय्यूब की तरह रोशनी में जी सकता है, अपने जीवन का हर मोड़ रोशनी में पार कर सकता है, अपनी यात्रा को रोशनी में बिना किसी व्यवधान के पूरा कर सकता है, और एक सृजित प्राणी के रूप में सृष्टिकर्ता की संप्रभुता का अनुभव करने और इसे जानने के अपने ध्येय को सफलतापूर्वक पूरा कर सकता है—और रोशनी में ही मृत्यु को प्राप्त कर सकता है, और तत्पश्चात एक ऐसे सृजित प्राणी के रूप में सदा सृष्टिकर्ता के सान्निध्य में रह सकता है जिसे उसकी स्वीकृति प्राप्त है।
—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 134
सृजनकर्ता की संप्रभुता को जानने के अवसर को मत छोड़ो
अनेक दशक जो किसी मानव जीवन को बनाते हैं वे न तो लंबे होते हैं और न ही छोटे। जन्म और वयस्क होने के बीच के लगभग बीस वर्ष पलक झपकते ही बीत जाते हैं, और यद्यपि जीवन के इस मोड़ पर किसी व्यक्ति को वयस्क माना जाता है, फिर भी इस आयु वर्ग के लोग मानव जीवन और मानव के भाग्य के बारे में लगभग कुछ भी नहीं जानते हैं। जैसे-जैसे वे और अधिक अनुभव प्राप्त करते हैं, वे धीरे-धीरे अधेड़ अवस्था की ओर कदम रखते हैं। तीस-चालीस की उम्र में लोग जीवन और भाग्य के बारे में आरंभिक अनुभव अर्जित करते हैं, किन्तु इन चीजों के बारे में उनके विचार अभी भी बिल्कुल अस्पष्ट होते हैं। कुछ लोग चालीस वर्ष की उम्र के बाद ही मनुष्यजाति और सृजनकर्ता को समझना आरंभ करते हैं, जिनका सृजन परमेश्वर ने किया था, और यह समझने लगते हैं कि वास्तव में मानव जीवन क्या है, मनुष्य का भाग्य क्या है। कुछ लोगों के पास, काफी लंबे समय से परमेश्वर के अनुयायी रहने और अधेड़ अवस्था में पहुँचने के बाद भी परमेश्वर की संप्रभुता का सटीक ज्ञान और उसकी परिभाषा नहीं होती, सच्चा समर्पण होने का तो बिल्कुल ही सवाल नहीं उठता है। कुछ लोग आशीषों को पाने की चाह करने के अलावा किसी भी चीज़ की परवाह नहीं करते हैं, और यद्यपि वे लम्बी उम्र जी चुके हैं, फिर भी वे मनुष्य के भाग्य पर सृजनकर्ता की संप्रभुता के तथ्य को बिल्कुल नहीं जानते और समझते हैं, और इसलिए उन्होंने परमेश्वर के आयोजनों और उसकी व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण के व्यावहारिक सबक में एक छोटा-सा कदम तक नहीं रखा है। ऐसे लोग पूरी तरह से मूर्ख हैं, और उनका जीवन व्यर्थ है।
यदि मानव जीवन की समयावधियों को लोगों के जीवन के अनुभवों के स्तर और मनुष्य के भाग्य के उनके ज्ञान के अनुसार विभाजित किया जाए, तो मोटे तौर पर उन्हें तीन अवस्थाओं में बांटा जा सकता है। पहली अवस्था है युवावस्था, जो जन्म से लेकर मध्यवय के बीच के वर्ष होते हैं, या जन्म से लेकर तीस वर्ष की आयु तक। दूसरी अवस्था है परिपक्वता, जो मध्यवय से लेकर वृद्धावस्था तक होती है, या तीस से लेकर साठ वर्ष की आयु तक। और तीसरी अवस्था है किसी व्यक्ति की परिपक्व अवधि, जो वृद्धावस्था से शुरू होती है, साठ वर्ष से शुरू होकर, उसके इस संसार से जाने तक रहती है। दूसरे शब्दों में, जन्म से लेकर मध्यवय तक, भाग्य और जीवन के बारे में अधिकतर लोगों का ज्ञान दूसरों के विचारों की नकल करते रहने तक सीमित होता है, और इसमें लगभग कोई वास्तविक, व्यावहारिक सार नहीं होता है। इस अवधि के दौरान, जीवन के प्रति व्यक्ति का दृष्टिकोण और जिस प्रकार वह दूसरे लोगों से बातचीत करता है वह बहुत ही सतही और अबोध होता है। यह उसके किशोरवय की अवधि है। जीवन के सभी आनंद और दुःखों का स्वाद चखने के बाद ही, उसे भाग्य के बारे में वास्तविक समझ प्राप्त होती है, और वह—अवचेतन रूप से, अपने हृदय की गहराई में—धीरे-धीरे भाग्य की अपरिवर्तनीयता की सराहना करने लगता है, और धीरे-धीरे उसे एहसास होता है कि मनुष्य के भाग्य पर सृजनकर्ता की संप्रभुता वास्तव में मौजूद है। यह किसी व्यक्ति की परिपक्वता की अवधि है। जब वह भाग्य के विरुद्ध संघर्ष करना समाप्त कर देता है, और जब वह संघर्षों में अब और पड़ने को इच्छुक नहीं होता है, और इसके बजाय, जीवन में अपने भाग्य को जानता है, स्वर्ग की इच्छा के प्रति समर्पण करता है, अपनी उपलब्धियों और जीवन में हुई ग़लतियों का सार निकालता है, और अपने जीवन में सृजनकर्ता के न्याय का इंतज़ार करता है, तब वह परिपक्वता की अवधि में प्रवेश करता है। इन तीन अवस्थाओं के दौरान, लोगों के द्वारा अर्जित विभिन्न प्रकार के अनुभवों और उपलब्धियों पर विचार करते हुए, सामान्य परिस्थितियों में, एक व्यक्ति के लिए सृजनकर्ता की संप्रभुता को जानने की अवधि बहुत बड़ी नहीं होती है। यदि कोई व्यक्ति साठ वर्ष की आयु तक जीवित रहता है, तो उसके पास परमेश्वर की संप्रभुता को जानने के लिए केवल लगभग तीस वर्ष का समय ही है; यदि वह और अधिक लंबी समयावधि चाहता है, तो ऐसा तभी संभव है जब वह काफी लंबे समय तक जीवित रहे, जब वह सौ वर्ष तक जीवित रह सके। इसलिए मैं कहता हूँ, मानव अस्तित्व के सामान्य नियमों के अनुसार, किसी व्यक्ति द्वारा पहली बार सृजनकर्ता की संप्रभुता को जानने के विषय का सामना करने से लेकर उस समय तक जब वह सृजनकर्ता की संप्रभुता के तथ्य को पहचानने में समर्थ हो जाता है, और वहाँ से लेकर उस बिन्दु तक जब वह उसके प्रति समर्पण करने में समर्थ हो जाता है, यद्यपि यह पूरी प्रक्रिया बहुत ही लम्बी है, परंतु यदि वास्तव में कोई उन वर्षों को गिने, तो वे तीस या चालीस से अधिक नहीं होंगे जिनके दौरान उसके पास इन प्रतिफलों को प्राप्त करने का अवसर होता है। और प्रायः, लोग आशीषों को पाने के लिए अपनी इच्छाओं और अपनी महत्वाकांक्षाओं के कारण अपना विवेक खो देते हैं; इसलिए, वे नहीं पहचान सकते हैं कि मानव जीवन का सार कहाँ है, परमेश्वर की संप्रभुता को जानने के महत्व को नहीं समझते हैं। ऐसे लोग मानव जीवन और सृजनकर्ता की संप्रभुता का अनुभव करने के लिए मानव संसार में प्रवेश करने का यह मूल्यवान अवसर सँजोकर नहीं रख पाते हैं, और वे यह समझ नहीं पाते हैं कि एक सृजित किए गए प्राणी के लिए सृजनकर्ता का व्यक्तिगत मार्गदर्शन प्राप्त करना कितना बहुमूल्य है। इसलिए मैं कहता हूँ, कि जो लोग चाहते हैं कि परमेश्वर का कार्य जल्दी से समाप्त हो जाए, जो इच्छा करते हैं कि जितनी जल्दी हो सके परमेश्वर मनुष्य के अंत की व्यवस्था करे, ताकि वे तुरंत ही उसके वास्तविक व्यक्तित्व को निहार सकें और जितनी जल्दी हो सके, आशीषें प्राप्त कर सकें—वे निकृष्टतम प्रकार की अवज्ञा के दोषी हैं और वे अत्यधिक मूर्ख हैं। इस दौरान, जो लोग बुद्धिमान हैं, जिनके पास अत्यंत बौद्धिक तीक्षणता है, वे ऐसे लोग हैं जो अपने सीमित समय के दौरान सृजनकर्ता की संप्रभुता को जानने के इस अनोखे अवसर को समझने की इच्छा रखते हैं। ये दो अलग-अलग इच्छाएँ, दो अत्यंत भिन्न दृष्टिकोणों और खोजों को उजागर करती हैं : जो लोग आशीषों की खोज करते हैं वे स्वार्थी और नीच हैं; वे परमेश्वर के इरादों के बारे में नहीं सोचते हैं, कभी परमेश्वर की संप्रभुता को जानने की खोज नहीं करते हैं, कभी उसके प्रति समर्पण करने की इच्छा नहीं करते हैं, बल्कि जैसा उनको अच्छा लगता है बस वैसा ही जीवन बिताना चाहते हैं। वे आनंदित रहने वाले भ्रष्ट लोग हैं; वे ऐसी श्रेणी के लोग हैं जिन्हें नष्ट किया जाएगा। जो लोग परमेश्वर को जानने की खोज करने का प्रयास करते हैं वे अपनी इच्छाओं की उपेक्षा करने में समर्थ हैं, वे परमेश्वर की संप्रभुता और परमेश्वर की व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करने के लिए तैयार हैं, और वे इस प्रकार के लोग बनने की कोशिश करते हैं जो परमेश्वर के अधिकार के प्रति समर्पित हैं और परमेश्वर के इरादे पूरे करते हैं। ऐेसे लोग प्रकाश में रहते हैं, परमेश्वर की आशीषों के बीच जीवन जीते हैं, और निश्चित रूप से परमेश्वर के द्वारा उनकी प्रशंसा की जाएगी। चाहे कुछ भी हो, मानव पसंद बेकार है, और मनुष्य का इस बात पर कोई वश नहीं है कि परमेश्वर का कार्य कितना समय लेगा। लोगों के लिए यही अच्छा है कि वे अपने आपको परमेश्वर के आयोजनों पर छोड़ दें, और उसकी संप्रभुता के प्रति समर्पण कर दें। यदि तुम अपने आपको उसके आयोजनों पर नहीं छोड़ते हो, तो तुम क्या कर सकते हो? क्या परमेश्वर को इसकी वजह से कोई नुकसान उठाना पड़ेगा? यदि तुम अपने आपको उसके आयोजनों पर नहीं छोड़ते हो, इसके बजाय हर चीज अपने हाथ में लेने की कोशिश करते हो, तो तुम एक मूर्खतापूर्ण चुनाव कर रहे हो, और अंततः, केवल तुम ही हो जिसे नुकसान उठाना पड़ेगा। यदि लोग यथाशीघ्र परमेश्वर के साथ सहयोग करेंगे, यदि वे उसके आयोजनों को स्वीकार करने में, उसके अधिकार को जानने में, और वह सब जो उसने उनके लिए किया है उसे समझने में शीघ्रता करेंगे, केवल तभी उनके पास आशा होगी। केवल इसी तरह से वे अपने जीवन को व्यर्थ में नहीं बिताएँगे, केवल तभी वे उद्धार प्राप्त करेंगे।
—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 135
कोई भी इस सच्चाई को नहीं बदल सकता है कि परमेश्वर मनुष्य के भाग्य पर संप्रभुता रखता है
परमेश्वर के अधिकार के अधीन, प्रत्येक व्यक्ति सक्रिय या निष्क्रिय रूप से उसकी संप्रभुता और उसकी व्यवस्थाओं को स्वीकार करता है, और चाहे कोई व्यक्ति अपने जीवन के दौरान कैसे भी संघर्ष क्यों न करता हो, भले ही वह कितने ही टेढ़े-मेढ़े पथों पर क्यों न चलता हो, अंत में वह सृजनकर्ता के द्वारा उसके लिए निर्धारित भाग्य के परिक्रमा-पथ पर वापस लौट आएगा। यह सृजनकर्ता के अधिकार की अजेयता है, और इसी तरह उसका अधिकार ब्रह्मांड पर नियंत्रण करता और उसे संचालित करता है। यही अजेयता, इस तरह का नियंत्रण और संचालन उन नियमों के लिए उत्तरदायी है जो सभी चीजों के जीवन का निर्धारण करते हैं, जो मनुष्यों को बिना किसी हस्तक्षेप के बार-बार पुनर्जन्म लेने देते हैं, जो इस संसार को नियमित रूप से चलाते और दिन प्रतिदिन, साल दर साल, आगे बढ़ाते रहते हैं। तुम लोगों ने इन सभी तथ्यों को देखा है और, चाहे सतही तौर पर समझो या गहराई से, तुम लोग उन्हें समझते हो; तुम लोगों की समझ की गहराई सत्य के बारे में तुम लोगों के अनुभव और ज्ञान पर, और परमेश्वर के बारे में तुम लोगों के ज्ञान पर निर्भर करती है। तुम सत्य वास्तविकता को कितनी अच्छी तरह से जानते हो, तुम्हारे पास परमेश्वर के वचनों का कितना अनुभव है, तुम परमेश्वर के सार और उसके स्वभाव को कितनी अच्छी तरह से जानते हो—ये सब चीजें परमेश्वर की संप्रभुता और उसकी व्यवस्थाओं के बारे में तुम्हारी समझ की गहराई को प्रदर्शित करती हैं। क्या परमेश्वर की संप्रभुता और उसकी व्यवस्थाएँ इस बात पर निर्भर करती हैं कि मनुष्य उसके प्रति समर्पण करता है या नहीं? क्या यह तथ्य कि परमेश्वर इस अधिकार को धारण करता है, इस बात के द्वारा निर्धारित होता है कि मानवजाति उसके प्रति समर्पण करती है या नहीं? परिस्थितियाँ चाहे जो भी हों परमेश्वर का अधिकार अस्तित्व में रहता है। समस्त परिस्थितियों में परमेश्वर अपने विचारों, और अपनी इच्छाओं के अनुरूप प्रत्येक मनुष्य के भाग्य और सभी चीजों पर नियंत्रण और उनकी व्यवस्था करता है। यह मनुष्यों के बदलने की वजह से नहीं बदलेगा; और यह मनुष्य की इच्छा से स्वतंत्र है, और समय, स्थान, और भूगोल में होने वाले किन्ही भी परिवर्तनों द्वारा इसे नहीं बदला जा सकता है, क्योंकि परमेश्वर का अधिकार उसका सार ही है। चाहे मनुष्य परमेश्वर की संप्रभुता को जानने और स्वीकार करने में समर्थ हो या न हो, और चाहे मनुष्य इसके प्रति समर्पण करने में समर्थ हो या न हो, यह मनुष्य के भाग्य पर परमेश्वर की संप्रभुता के सच को जरा-सा भी नहीं बदलता है। अर्थात्, परमेश्वर की संप्रभुता के प्रति मनुष्य भले ही कोई भी दृष्टिकोण क्यों न रखे, यह इस सच को नहीं बदल सकता है कि परमेश्वर मनुष्य के भाग्य और सभी चीजों पर संप्रभुता रखता है। चाहे तुम परमेश्वर की संप्रभुता के प्रति समर्पण न भी करो, तब भी वह तुम्हारे भाग्य को नियंत्रित करता है; चाहे तुम उसकी संप्रभुता को न भी जान सको, फिर भी उसका अधिकार अस्तित्व में रहता है। परमेश्वर का अधिकार और मनुष्य के भाग्य पर उसकी संप्रभुता मनुष्य की इच्छा से स्वतंत्र हैं, और मनुष्य की प्राथमिकताओं और पसंद के अनुसार बदलते नहीं हैं। परमेश्वर का अधिकार हर समय और हर एक क्षण हर जगह मौजूद है। स्वर्ग और पृथ्वी समाप्त हो जाएँगे, पर उसका अधिकार कभी समाप्त नहीं होगा, क्योंकि वह स्वयं परमेश्वर है, उसके पास अद्वितीय अधिकार है, और उसका अधिकार लोगों, घटनाओं या चीजों के द्वारा, स्थान या भूगोल के द्वारा प्रतिबंधित या सीमित नहीं होता है। परमेश्वर हमेशा अपने अधिकार को काम में लाता है, अपनी ताक़त दिखाता है, हमेशा की तरह अपने प्रबंधन-कार्य को करता रहता है; वह हमेशा सभी चीजों पर शासन करता है, सभी चीजों का भरण-पोषण करता है, और सभी चीजों का आयोजन करता है—ठीक वैसे ही जैसे उसने हमेशा से किया है। इसे कोई नहीं बदल सकता है। यह एक सच्चाई है; यह चिरकाल से अपरिवर्तनीय सत्य है!
—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 136
उस व्यक्ति के लिए उचित दृष्टिकोण और अभ्यास जो परमेश्वर के अधिकार के प्रति समर्पण करने की इच्छा रखता है
किस रवैये के साथ अब मनुष्य को परमेश्वर के अधिकार और मनुष्य के भाग्य पर परमेश्वर की संप्रभुता के तथ्य को जानना और उससे निपटना चाहिए? यह एक वास्तविक समस्या है जो हर व्यक्ति के सामने खड़ी है। वास्तविक जीवन में समस्याओं का सामना करते समय तुम्हें किस प्रकार परमेश्वर के अधिकार और उसकी संप्रभुता को समझना और गहराई से अनुभव करना चाहिए? जब तुम्हारे सामने ये समस्याएँ आती हैं और तुम्हें इन समस्याओं को समझने, इनसे निपटने और इनका अनुभव करने का तरीका नहीं आता, तो तुम्हें यह दिखाने के लिए क्या रवैया अपनाना चाहिए कि तुममें परमेश्वर की संप्रभुता और उसकी व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करने का इरादा और इच्छा है और इस समर्पण की वास्तविकता है? पहले तुम्हें प्रतीक्षा करना सीखना होगा; फिर तुम्हें खोजना सीखना होगा; फिर तुम्हें समर्पण करना सीखना होगा। “प्रतीक्षा” का अर्थ है परमेश्वर के समय की प्रतीक्षा करना, उन लोगों, घटनाओं एवं चीजों की प्रतीक्षा करना जो उसने तुम्हारे लिए व्यवस्थित की हैं, और इस बात की प्रतीक्षा करना कि उसके इरादे धीरे-धीरे तुम्हारे सामने प्रकट किए जाएँ। “खोजने” का अर्थ है, परमेश्वर द्वारा आयोजित लोगों, घटनाओं और चीजों के माध्यम से उसके श्रमसाध्य इरादों की जाँच करना और उन्हें समझना, उनमें सत्यों को समझना, यह समझना कि मनुष्यों को क्या करना चाहिए, उन मार्गों को समझना जिनका उन्हें पालन अवश्य करना चाहिए, यह समझना कि परमेश्वर मनुष्यों में किन नतीजों को प्राप्त करने का अभिप्राय रखता है और उनमें किन उपलब्धियों को पाना चाहता है। बेशक, “समर्पण करने” का अर्थ उन लोगों, घटनाओं और चीजों को स्वीकार करना है जो परमेश्वर ने आयोजित की हैं; इसका अर्थ उसकी संप्रभुता को स्वीकार करना और उसके माध्यम से यह अनुभव करना है कि सृष्टिकर्ता किस तरह से मनुष्य की नियति पर संप्रभु है, वह किस प्रकार अपना जीवन मनुष्य को प्रदान करता है और वह किस प्रकार मनुष्यों के भीतर सत्य को डालता है। परमेश्वर की व्यवस्थाओं और संप्रभुता के अधीन सभी चीजें प्राकृतिक नियमों का पालन करती हैं, और यदि तुम उन सभी चीजों की व्यवस्था परमेश्वर को करने देने और उन पर उसे संप्रभु होने देने का संकल्प लेते हो, तो तुम्हें प्रतीक्षा करना सीखना चाहिए, तुम्हें खोज करना सीखना चाहिए, और तुम्हें समर्पण करना सीखना चाहिए। हर उस व्यक्ति को जो परमेश्वर के अधिकार के प्रति समर्पण करने के लिए इच्छुक है, यह रवैया अपनाना चाहिए और हर वह व्यक्ति जो परमेश्वर की संप्रभुता और उसकी व्यवस्थाओं को स्वीकार करने का इच्छुक है, उसमें यही वह सबसे मूलभूत गुण होना चाहिए। इस प्रकार का रवैया रखने के लिए, इस प्रकार का गुण धारण करने के लिए, तुम लोगों को और अधिक कठिन परिश्रम करना होगा। केवल तभी तुम सत्य वास्तविकता में प्रवेश कर सकते हो।
—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 137
परमेश्वर को अपने अद्वितीय संप्रभु के रूप में स्वीकार करना उद्धार पाने का पहला कदम है
परमेश्वर के अधिकार से संबंधित सत्य ऐसे सत्य हैं जिन्हें प्रत्येक व्यक्ति को अवश्य ही गंभीरता से लेना चाहिए, अपने हृदय से अनुभव करना और समझना चाहिए—क्योंकि इन सत्यों का प्रत्येक व्यक्ति के जीवन से सरोकार है; प्रत्येक व्यक्ति के अतीत, वर्तमान और भविष्य से सरोकार है; उन अहम मोड़ों से सरोकार है जिनसे प्रत्येक व्यक्ति को जीवन में अवश्य गुजरना पड़ता है; परमेश्वर की संप्रभुता के बारे में मनुष्य के ज्ञान से और उस रवैये से सरोकार है जिसके साथ उसे परमेश्वर के अधिकार का सामना करना चाहिए, और स्वाभाविक रूप से प्रत्येक व्यक्ति के अंतिम गंतव्य से सरोकार है। इसलिए उन्हें जानने और अनुभव करने के लिए जीवनभर की ऊर्जा चाहिए। जब तुम परमेश्वर के अधिकार को प्रत्यक्ष रूप से देखोगे, जब तुम परमेश्वर की संप्रभुता को स्वीकार करोगे, तब तुम धीरे-धीरे परमेश्वर के अधिकार के वास्तविक अस्तित्व को जानने और अनुभव करने लगोगे। किन्तु यदि तुम परमेश्वर के अधिकार को कभी नहीं मानते हो और उसकी संप्रभुता को कभी भी स्वीकार नहीं करते हो, तब चाहे तुम कितने ही वर्ष क्यों न जीवित रहो, तुम परमेश्वर की संप्रभुता का थोड़ा-सा भी ज्ञान प्राप्त नहीं करोगे। यदि तुम सचमुच परमेश्वर के अधिकार को जानते और अनुभव नहीं करते हो, तो जब तुम मार्ग के अंत में पहुँचोगे, तब भले ही तुमने दशकों से परमेश्वर में विश्वास किया हो, तुम्हारे पास अपने जीवन में दिखाने के लिए कुछ नहीं होगा, और स्वाभाविक रूप से मनुष्य के भाग्य पर परमेश्वर की संप्रभुता के बारे में तुम्हारे पास थोड़ा-सा भी ज्ञान नहीं होगा। क्या यह बहुत ही दुःखदायी बात नहीं है? इसलिए, तुम जीवन में चाहे कितनी ही दूर तक क्यों न चले हो, तुम अब चाहे कितने ही वृद्ध क्यों न हो गए हो, तुम्हारी शेष यात्रा चाहे कितनी ही लंबी क्यों न हो, पहले तुम्हें परमेश्वर के अधिकार को मानना होगा और इसका प्रत्यक्ष रूप से सामना करना होगा, और इस सच को स्वीकार करना होगा कि परमेश्वर तुम्हारा अद्वितीय संप्रभु है। मनुष्य के भाग्य पर परमेश्वर की संप्रभुता से संबंधित इन सत्यों का स्पष्ट और सटीक ज्ञान और समझ प्राप्त करना सभी के लिए एक अनिवार्य सबक है; मानव जीवन को जानने और सत्य को प्राप्त करने की एक कुंजी है। यह परमेश्वर को जानने का जीवन और बुनियादी सबक भी है जिसका सभी को हर दिन सामना करना होगा, और इससे कोई बच नहीं सकता है। यदि तुममें से कोई इस लक्ष्य तक पहुँचने के लिए छोटा मार्ग लेना चाहता है, तो मैं तुमसे कहता हूँ, यह असंभव है! यदि तुम परमेश्वर की संप्रभुता से बच निकलना चाहते हो, तो यह और भी अधिक असंभव है! परमेश्वर ही मनुष्य का एकमात्र प्रभु है, परमेश्वर ही मनुष्य के भाग्य का एकमात्र संप्रभु है, और इसलिए मनुष्य के लिए अपनी नियति पर संप्रभु होना असंभव है, और उससे पार जाना असंभव है। किसी व्यक्ति की योग्यताएँ चाहे कितनी ही असाधारण क्यों न हों, वह दूसरों के भाग्य को प्रभावित नहीं कर सकता है, दूसरों के भाग्य को आयोजित, व्यवस्थित, नियंत्रित या परिवर्तित तो बिल्कुल नहीं कर सकता है। केवल स्वयं अद्वितीय परमेश्वर ही मनुष्य के बारे में सभी चीजों पर संप्रभुता रखने में सक्षम है। क्योंकि केवल स्वयं अद्वितीय परमेश्वर ही वह अद्वितीय अधिकार धारण करता है जो मनुष्य के भाग्य पर संप्रभुता रखता है, केवल सृष्टिकर्ता ही मनुष्य का अद्वितीय संप्रभु है। परमेश्वर का अधिकार न केवल सृजित की गई मानवजाति पर, बल्कि मनुष्यों को दिखाई न देने वाले अनसृजे प्राणियों पर, तारों पर और ब्रह्माण्ड पर संप्रभुता रखता है। यह एक निर्विवाद सत्य है, ऐसा सत्य जो वास्तव में विद्यमान है, जिसे कोई मनुष्य या चीज़ बदल नहीं सकती है। यदि चीजें जैसी हैं, उनसे तुममें से कुछ लोग अभी भी असंतुष्ट हो, यह मानते हो कि तुम्हारे पास कुछ ताकत या योग्यता है, और तुम अभी भी अपना भाग्य आजमाने की मानसिकता रखते हो, अपनी वर्तमान परिस्थितियों को बदलना चाहते हो या उनसे बच निकलना चाहते हो, यदि तुम मानवीय प्रयासों के माध्यम से अपने भाग्य को बदलने का और उसके द्वारा दूसरों से ऊपर उठने और परिणामस्वरूप प्रसिद्धि और लाभ अर्जित करने का प्रयास करते हो तो मैं तुमसे कहता हूँ कि तुम अपने लिए चीजों को कठिन बना रहे हो, तुम केवल मुसीबत को आमंत्रित कर रहे हो, तुम अपनी ही कब्र खोद रहे हो! देर-सवेर तुम यह जान जाओगे कि तुमने गलत विकल्प चुना है और तुम्हारे प्रयास व्यर्थ रहे हैं। भाग्य के विरुद्ध लड़ने की तुम्हारी महत्वाकांक्षा और इच्छा और तुम्हारा स्वयं का पथभ्रष्ट आचरण निश्चित रूप से तुम्हें ऐसे मार्ग पर ले जाएगा जहाँ से कोई वापसी नहीं है, और इसके लिए तुम्हें एक भारी कीमत चुकानी पड़ेगी। यूँ तो इस समय तुम्हें परिणाम की गंभीरता दिखाई नहीं देती, किन्तु जैसे-जैसे तुम और भी अधिक गहराई से उस सत्य का अनुभव और सराहना करोगे कि परमेश्वर मनुष्य के भाग्य का संप्रभु है, तो जिसके बारे में आज मैं बात कर रहा हूँ उसके बारे में और उसके वास्तविक निहितार्थों को तुम धीरे-धीरे समझने लगोगे। तुम्हारे पास सचमुच में हृदय और आत्मा है या नहीं, तुम सत्य से प्रेम करने वाले व्यक्ति हो या नहीं, यह इस बात पर निर्भर करता है कि तुम परमेश्वर की संप्रभुता के प्रति और सत्य के प्रति किस प्रकार का दृष्टिकोण अपनाते हो। स्वाभाविक रूप से, यह निर्धारित करता है कि तुम वास्तव में परमेश्वर के अधिकार को जान और समझ सकते हो या नहीं। यदि तुमने अपने जीवन में परमेश्वर की संप्रभुता और उसकी व्यवस्थाओं को कभी-भी महसूस नहीं किया है, और परमेश्वर के अधिकार को तो बिल्कुल नहीं पहचानते और स्वीकार करते हो, तो उस मार्ग के कारण जिसे तुमने अपनाया है और अपने चुनावों के कारण, तुम बिल्कुल बेकार हो जाओगे, और बिना किसी संशय के तुम परमेश्वर द्वारा ठुकरा दिए जाओगे। परन्तु वे लोग जो, परमेश्वर के कार्य में, उसके परीक्षणों को स्वीकार कर सकते हैं, उसकी संप्रभुता को स्वीकार कर सकते हैं, उसके अधिकार के प्रति समर्पण कर सकते हैं, और धीरे-धीरे उसके वचनों का वास्तविक अनुभव प्राप्त कर सकते हैं, वे परमेश्वर के अधिकार के वास्तविक ज्ञान को, उसकी संप्रभुता की वास्तविक सराहना को प्राप्त कर चुके होंगे, और वे सचमुच में सृष्टिकर्ता के आगे आत्मसमर्पण कर चुके होंगे। केवल ऐसे लोगों को ही सचमुच में बचाया गया होगा। क्योंकि उन्होंने परमेश्वर की संप्रभुता को जान लिया है, क्योंकि उन्होंने इसे स्वीकार लिया है, उन्हें इस बात की ठीक-ठीक समझ है और वे इस तथ्य के आगे समर्पण करते हैं कि मनुष्य के भाग्य पर परमेश्वर की संप्रभुता है। जब वे मृत्यु का सामना करेंगे, तो अय्यूब के समान, उनका मन भी मृत्यु के द्वारा विचलित नहीं होगा, और बिना किसी व्यक्तिगत पसंद के, बिना किसी व्यक्तिगत इच्छा के, सभी चीजों में परमेश्वर के आयोजनों और उसकी व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करने में समर्थ होंगे। केवल ऐसा व्यक्ति ही एक सृजित किए गए सच्चे मनुष्य के रूप में सृष्टिकर्ता की तरफ़ लौटने में समर्थ होगा।
—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 138
मनुष्य के लिए यहोवा परमेश्वर की आज्ञा
उत्पत्ति 2:15-17 तब यहोवा परमेश्वर ने आदम को लेकर अदन की वाटिका में रख दिया, कि वह उसमें काम करे और उसकी रक्षा करे। और यहोवा परमेश्वर ने आदम को यह आज्ञा दी, “तू वाटिका के सब वृक्षों का फल बिना खटके खा सकता है; पर भले या बुरे के ज्ञान का जो वृक्ष है, उसका फल तू कभी न खाना : क्योंकि जिस दिन तू उसका फल खाएगा उसी दिन अवश्य मर जाएगा।”
सर्प के द्वारा स्त्री को बहकाया जाना
उत्पत्ति 3:1-5 यहोवा परमेश्वर ने जितने बनैले पशु बनाए थे, उन सब में सर्प धूर्त था; उसने स्त्री से कहा, “क्या सच है कि परमेश्वर ने कहा, ‘तुम इस वाटिका के किसी वृक्ष का फल न खाना’?” स्त्री ने सर्प से कहा, “इस वाटिका के वृक्षों के फल हम खा सकते हैं; पर जो वृक्ष वाटिका के बीच में है, उसके फल के विषय में परमेश्वर ने कहा है कि न तो तुम उसको खाना और न उसको छूना, नहीं तो मर जाओगे।” तब सर्प ने स्त्री से कहा, “निश्चित नहीं कि तुम मरोगे! वरन् परमेश्वर आप जानता है कि जिस दिन तुम उसका फल खाओगे उसी दिन तुम्हारी आँखें खुल जाएँगी, और तुम भले बुरे का ज्ञान पाकर परमेश्वर के तुल्य हो जाओगे।”
ये दोनों अंश बाइबल की “उत्पत्ति” नामक पुस्तक के अंश हैं। क्या तुम सभी इन दोनों अंशों से परिचित हो? ये सृष्टि के आरंभ में हुई घटनाओं से संबंधित हैं, जब पहली बार मानव-जाति का सृजन किया गया था; ये घटनाएँ वास्तविक थीं। पहले हम यह देखें कि यहोवा परमेश्वर ने आदम और हव्वा को किस प्रकार की आज्ञा दी थी; इस आज्ञा की विषयवस्तु आज हमारे विषय के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। “और यहोवा परमेश्वर ने आदम को यह आज्ञा दी, ‘तू वाटिका के सब वृक्षों का फल बिना खटके खा सकता है; पर भले या बुरे के ज्ञान का जो वृक्ष है, उसका फल तू कभी न खाना : क्योंकि जिस दिन तू उसका फल खाएगा उसी दिन अवश्य मर जाएगा।’” इस अंश में मनुष्य को दी गई परमेश्वर की आज्ञा का क्या तात्पर्य है? पहला, परमेश्वर मनुष्य को बताता है कि वह क्या खा सकता है, अर्थात् अनेक प्रकार के पेड़ों के फल। इसमें कोई खतरा या ज़हर नहीं है, सब कुछ खाया जा सकता है और बिना किसी संदेह के मनुष्य की इच्छा के अनुसार स्वतंत्रतापूर्वक खाया जा सकता है। यह परमेश्वर की आज्ञा का एक भाग है। दूसरा भाग एक चेतावनी है। इस चेतावनी में परमेश्वर मनुष्य को बताता है कि उसे भले और बुरे के ज्ञान के वृक्ष का फल नहीं खाना चाहिए। इस वृक्ष का फल खाने पर क्या होगा? परमेश्वर ने मनुष्य से कहा : यदि तुम इस वृक्ष का फल खाओगे, तो तुम निश्चित ही मर जाओगे। क्या ये वचन सीधे-स्पष्ट नहीं हैं? यदि परमेश्वर ने तुमसे यह कहा होता, पर तुम लोग यह न समझ पाते कि ऐसा क्यों कहा, तो क्या तुम उसके वचनों को एक नियम या आज्ञा के रूप में मानते, जिसका पालन किया जाना चाहिए? ऐसे वचनों का पालन किया जाना चाहिए। परंतु मनुष्य इनका पालन करने योग्य हो या नहीं, परमेश्वर के वचन पूरी तरह से स्पष्ट हैं। परमेश्वर ने मनुष्य से बिल्कुल साफ़-साफ़ कहा कि वह क्या खा सकता है और क्या नहीं खा सकता, और अगर वह उसे खा लेता है जिसे नहीं खाना चाहिए, तो क्या होगा। क्या तुम परमेश्वर द्वारा कहे गए इन संक्षिप्त वचनों में परमेश्वर के स्वभाव की कोई चीज़ देख सकते हो? क्या परमेश्वर के ये वचन सत्य हैं? क्या इनमें कोई छलावा है? क्या इनमें कोई झूठ है? क्या इनमें कोई धमकी है? (नहीं।) परमेश्वर ने ईमानदारी से, सच्चाई से और निष्कपटता से मनुष्य को बताया कि वह क्या खा सकता है और क्या नहीं खा सकता। परमेश्वर ने स्पष्टता से और सीधे-सीधे कहा। क्या इन वचनों में कोई छिपा हुआ अर्थ है? क्या ये वचन सीधे-स्पष्ट नहीं हैं? क्या किसी अटकलबाज़ी की ज़रूरत है? अटकलबाज़ी की कोई ज़रूरत नहीं है। एक नज़र में इनका अर्थ स्पष्ट है। इन्हें पढ़ने पर आदमी इनके अर्थ के बारे में बिल्कुल स्पष्ट महसूस करता है। यानी परमेश्वर जो कुछ कहना चाहता है और जो कुछ वह व्यक्त करना चाहता है, वह उसके हृदय से आता है। परमेश्वर द्वारा व्यक्त चीज़ें स्वच्छ, सीधी और स्पष्ट हैं। उनमें कोई गुप्त उद्देश्य या कोई छिपा हुआ अर्थ नहीं है। उसने सीधे मनुष्य से बात की और बताया कि वह क्या खा सकता है और क्या नहीं खा सकता। दूसरे शब्दों में, परमेश्वर के इन वचनों से मनुष्य देख सकता है कि परमेश्वर का हृदय पारदर्शी और सच्चा है। उसमें ज़रा भी झूठ नहीं है; यह ऐसा मामला नहीं है, जिसमें तुमसे कहा जाए कि तुम उसे नहीं खा सकते जो खाने योग्य है, या न खा सकने योग्य चीज़ों के बारे में तुमसे कहा जाए कि “खाकर देखो, क्या होता है”। परमेश्वर के कहने का यह अभिप्राय नहीं है। परमेश्वर जो कुछ अपने हृदय में सोचता है, वही कहता है। यदि मैं कहूँ कि परमेश्वर पवित्र है, क्योंकि वह इस प्रकार से इन वचनों में स्वयं को दिखाता और प्रकट करता है, तो हो सकता है कि तुम यह महसूस करो कि मैंने राई का पहाड़ बना दिया है या मैं दूर की कौड़ी ले आया हूँ। यदि ऐसा है, तो चिंता मत करो, हमारी बात अभी पूरी नहीं हुई है।
आओ, अब “सर्प के द्वारा स्त्री को बहकाए जाने” के बारे में बात करें। सर्प कौन है? शैतान। वह परमेश्वर के छह हज़ार वर्षों की प्रबंधन योजना में विषमता की भूमिका निभाता है, और यह वह भूमिका है, जिसका जिक्र हमें परमेश्वर की पवित्रता के बारे में संगति करते समय करना होगा। मैं ऐसा क्यों कहता हूँ? अगर तुम शैतान की दुष्टता और भ्रष्टता को नहीं जानते, अगर तुम शैतान के स्वभाव को नहीं जानते, तो तुम्हारे पास पवित्रता को पहचानने का कोई उपाय नहीं है, न ही तुम यह जान सकते हो कि पवित्रता वास्तव में क्या है। भ्रम की स्थिति में लोग यह विश्वास करते हैं कि शैतान जो कुछ करता है, वह सही है, क्योंकि वे इस प्रकार के भ्रष्ट स्वभाव के अंतर्गत जीते हैं। बिना विषमता के, बिना तुलना के किसी बिंदु के, तुम नहीं जान सकते कि पवित्रता क्या है। अतः यहाँ पर शैतान का उल्लेख करना होगा। यह उल्लेख कोई निरर्थक बातचीत नहीं है। शैतान के शब्दों और कार्यों से हम देखेंगे कि शैतान कैसे काम करता है, वह किस तरह मनुष्य को भ्रष्ट करता है, और उसका स्वभाव और चेहरा कैसा है। तो स्त्री ने सर्प से क्या कहा था? स्त्री ने सर्प को वह बात बताई, जो यहोवा परमेश्वर ने उससे कही थी। जब उसने शैतान को यह बात बताई, तो क्या वह निश्चित थी कि जो कुछ परमेश्वर ने उससे कहा है, वह सच है? वह आश्वस्त नहीं हो सकती थी। एक ऐसे प्राणी के रूप में, जिसका नया-नया सृजन किया गया था, उसके पास भले और बुरे को परखने की कोई योग्यता नहीं थी, न ही उसे अपने आसपास की किसी चीज़ का कोई संज्ञान था। सर्प से कहे गए उसके शब्दों को देखते हुए, वह अपने हृदय में आश्वस्त नहीं थी कि परमेश्वर के वचन सही हैं; ऐसा उसका रवैया था। अतः जब सर्प ने परमेश्वर के वचनों के प्रति स्त्री का अनिश्चित रवैया देखा, तो उसने कहा : “निश्चित नहीं कि तुम मरोगे! वरन् परमेश्वर आप जानता है कि जिस दिन तुम उसका फल खाओगे उसी दिन तुम्हारी आँखें खुल जाएँगी, और तुम भले बुरे का ज्ञान पाकर परमेश्वर के तुल्य हो जाओगे।” क्या इन शब्दों में कोई समस्या है? जब तुम लोग इस वाक्य को पढ़ते हो, तो तुम्हें सर्प के इरादों का कोई आभास होता है? क्या हैं वे इरादे? वह उस स्त्री को परमेश्वर के वचनों पर ध्यान देने से रोकने के लिए उसे उकसाना चाहता था। लेकिन उसने इसे सीधे तौर पर नहीं कहा। अतः हम कह सकते हैं कि वह बहुत चालाक है। वह अपने इच्छित उद्देश्य तक पहुँचने के लिए अपने अर्थ को शातिर और कपटपूर्ण तरीके से व्यक्त करता है, जिसे वह मनुष्य से छिपाकर अपने मन के भीतर गुप्त रखता है—यह सर्प की चालाकी है। शैतान का बोलने और कार्य करने का हमेशा यही तरीका रहा है। वह किसी तरह से पुष्टि न करते हुए “निश्चित नहीं” कहता। लेकिन यह सुनकर इस अबोध स्त्री का हृदय द्रवित हो गया। सर्प प्रसन्न हो गया, क्योंकि उसके शब्दों ने इच्छित प्रभाव पैदा कर दिया था—ऐसा धूर्त इरादा था सर्प का। इतना ही नहीं, मनुष्यों को वांछित लगने वाले परिणाम का वादा करके उसने यह कहकर उसे बहका दिया था, कि “जिस दिन तुम उसका फल खाओगे उसी दिन तुम्हारी आँखें खुल जाएँगी।” इसलिए वह सोचती है, “मेरी आँखों का खुलना तो एक अच्छी बात है!” और फिर उसने कुछ और भी प्रभावी बात कही, ऐसे शब्द जिनसे मनुष्य अब तक अनजान था, ऐसे शब्द जो सुनने वाले को उकसाने की बड़ी ताकत रखते हैं : “तुम भले बुरे का ज्ञान पाकर परमेश्वर के तुल्य हो जाओगे।” क्या ये शब्द मनुष्य को सशक्त रूप से लुभाने वाले नहीं हैं? जैसे कोई तुमसे कहे : “तुम्हारे चेहरे का आकार तो बहुत सुंदर है, बस नाक का ऊपरी हिस्सा थोड़ा छोटा है। अगर तुम इसे ठीक करवा लो, तो तुम विश्वस्तरीय सुंदरी बन जाओगी!” क्या ये शब्द ऐसे व्यक्ति के हृदय को द्रवित नहीं कर देंगे, जिसने पहले कभी कॉस्मेटिक सर्जरी करवाने की इच्छा नहीं पाली होगी? क्या ये शब्द प्रलोभन देने वाले नहीं हैं? क्या यह प्रलोभन तुम्हें उकसा नहीं रहा है? और क्या यह एक प्रलोभन नहीं है? (हाँ।) क्या परमेश्वर ऐसी बातें कहता है? क्या परमेश्वर के वचनों में, जिन्हें हमने अभी पढ़ा, इसका कोई संकेत था? क्या परमेश्वर वही कहता है, जो उसके दिल में होता है? क्या मनुष्य परमेश्वर के वचनों के माध्यम से उसके हृदय को देख सकता है? (हाँ।) परंतु जब सर्प ने स्त्री से वे शब्द कहे, तब क्या तुम उसके हृदय को देख सके? नहीं। और अपनी अज्ञानता के कारण मनुष्य सर्प के शब्दों से आसानी से बहक गया और ठगा गया। तो क्या तुम शैतान के इरादों को देख सके? क्या तुम जो कुछ शैतान ने कहा, उसके पीछे के उद्देश्य को देख सके? क्या तुम उसकी साज़िश और चालों को देख सके? (नहीं।) शैतान के बोलने का तरीका किस तरह के स्वभाव का प्रतिनिधित्व करता है? इन शब्दों के माध्यम से तुमने शैतान में किस प्रकार का सार देखा है? क्या वह कपटी नहीं है? शायद ऊपर से वह तुम पर मुस्कुराता हो या शायद वह किसी भी प्रकार की भाव-भंगिमा प्रकट न करता हो। परंतु अपने हृदय में वह गणना कर रहा है कि किस प्रकार अपना उद्देश्य हासिल किया जाए, और इस उद्देश्य को ही देखने में तुम असमर्थ हो। सभी वादे जो वह तुमसे करता है, सभी फायदे जो वह तुम्हें बताता है, उसके प्रलोभन की आड़ हैं। ये चीज़ें तुम्हें अच्छी दिखाई देती हैं, इसलिए तुम्हें लगता है कि जो कुछ वह कहता है, वह परमेश्वर की बातों से अधिक उपयोगी और ठोस है। जब यह होता है, तब क्या मनुष्य एक विनीत कैदी नहीं बन जाता? क्या शैतान द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली यह रणनीति दुष्टतापूर्ण नहीं है? तुम स्वयं को पतन में गर्त होने देते हो। शैतान के बिना एक उँगली भी हिलाए, केवल ये दो वाक्य कहने भर से तुम खुश होकर उसका अनुसरण और अनुपालन करने लगते हो। इस प्रकार उसने अपना उद्देश्य पूरा कर लिया। क्या यह इरादा भयंकर नहीं है? क्या यह शैतान का असली चेहरा नहीं है? शैतान के शब्दों से मनुष्य उसके भयंकर इरादों, उसके घिनौने चेहरे और उसके सार को देख सकता है। क्या ऐसा नहीं है? इन वाक्यों की तुलना करने पर, बिना विश्लेषण किए तुम शायद सोच सकते हो कि यहोवा परमेश्वर के वचन नीरस, साधारण और घिसे-पिटे हैं, और वे परमेश्वर की ईमानदारी की प्रशंसा में बढ़-चढ़कर बताए जाने लायक नहीं हैं। लेकिन जब हम तुलना के रूप में शैतान के शब्दों और उसके घिनौने चेहरे को लेते हैं, तो क्या परमेश्वर के ये वचन आज के लोगों के लिए ज्यादा वजन नहीं रखते? (रखते हैं।) इस तुलना के माध्यम से मनुष्य परमेश्वर की पवित्र निर्दोषता का आभास कर सकता है। शैतान का हर एक शब्द, और साथ ही उसके प्रयोजन, उसके इरादे और उसके बोलने का तरीका—सभी अशुद्ध हैं। शैतान के बोलने के तरीके की मुख्य विशेषता क्या है? तुम्हें अपने दोरंगेपन को देखने का मौका न देते हुए वह तुम्हें बहकाने के लिए वाक्छल का प्रयोग करता है, न ही वह तुम्हें अपने उद्देश्य को पहचानने देता है; वह तुम्हें चारा चुगने देता है और तुमसे अपनी स्तुति और गुणगान करवाता है। क्या यह चाल शैतान की पसंद का अभ्यस्त तरीका नहीं है? (है।)
—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है IV
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 139
शैतान और यहोवा परमेश्वर के मध्य वार्तालाप (चुने हुए अंश)
अय्यूब 1:6-11 एक दिन यहोवा परमेश्वर के पुत्र उसके सामने उपस्थित हुए, और उनके बीच शैतान भी आया। यहोवा ने शैतान से पूछा, “तू कहाँ से आता है?” शैतान ने यहोवा को उत्तर दिया, “पृथ्वी पर इधर-उधर घूमते-फिरते और डोलते-डालते आया हूँ।” यहोवा ने शैतान से पूछा, “क्या तू ने मेरे दास अय्यूब पर ध्यान दिया है? क्योंकि उसके तुल्य खरा और सीधा और मेरा भय माननेवाला और बुराई से दूर रहनेवाला मनुष्य और कोई नहीं है।” शैतान ने यहोवा को उत्तर दिया, “क्या अय्यूब परमेश्वर का भय बिना लाभ के मानता है? क्या तू ने उसकी, और उसके घर की, और जो कुछ उसका है उसके चारों ओर बाड़ा नहीं बाँधा? तू ने तो उसके काम पर आशीष दी है, और उसकी सम्पत्ति देश भर में फैल गई है। परन्तु अब अपना हाथ बढ़ाकर जो कुछ उसका है, उसे छू; तब वह तेरे मुँह पर तेरी निन्दा करेगा।”
अय्यूब 2:1-5 फिर एक और दिन यहोवा परमेश्वर के पुत्र उसके सामने उपस्थित हुए, और उनके बीच शैतान भी उसके सामने उपस्थित हुआ। यहोवा ने शैतान से पूछा, “तू कहाँ से आता है?” शैतान ने यहोवा को उत्तर दिया, “इधर-उधर घूमते-फिरते और डोलते-डालते आया हूँ।” यहोवा ने शैतान से पूछा, “क्या तू ने मेरे दास अय्यूब पर ध्यान दिया है कि पृथ्वी पर उसके तुल्य खरा और सीधा और मेरा भय माननेवाला और बुराई से दूर रहनेवाला मनुष्य और कोई नहीं है? यद्यपि तू ने मुझे बिना कारण उसका सत्यानाश करने को उभारा, तौभी वह अब तक अपनी खराई पर बना है।” शैतान ने यहोवा को उत्तर दिया, “खाल के बदले खाल; परन्तु प्राण के बदले मनुष्य अपना सब कुछ दे देता है। इसलिए केवल अपना हाथ बढ़ाकर उसकी हड्डियाँ और मांस छू, तब वह तेरे मुँह पर तेरी निन्दा करेगा।”
इन दो अंशों में पूरी तरह से परमेश्वर और शैतान के मध्य एक वार्तालाप है; ये अंश इस बात को दर्ज करते हैं कि परमेश्वर ने क्या कहा और शैतान ने क्या कहा। परमेश्वर ने बहुत अधिक नहीं बोला, और बड़ी सरलता से बोला। क्या हम परमेश्वर के सरल वचनों में उसकी पवित्रता देख सकते हैं? कुछ लोग कहेंगे कि ऐसा करना आसान नहीं है। तो क्या हम शैतान के प्रत्युत्तरों में उसका घिनौनापन देख सकते हैं? आओ, पहले देखें कि यहोवा परमेश्वर ने शैतान से किस प्रकार के प्रश्न पूछे। “तू कहाँ से आता है?” क्या यह एक सीधा प्रश्न नहीं है? क्या इसमें कोई छिपा हुआ अर्थ है? नहीं; यह केवल एक सीधा प्रश्न है। यदि मुझे तुम लोगों से पूछना होता : “तुम कहाँ से आए हो?” तब तुम लोग किस प्रकार उत्तर देते? क्या इस प्रश्न का उत्तर देना कठिन है? क्या तुम लोग यह कहते : “इधर-उधर घूमते-फिरते और डोलते-डालते आया हूँ”? (नहीं।) तुम लोग इस प्रकार उत्तर न देते। तो फिर शैतान को इस तरीके से उत्तर देते देख तुम लोगों को कैसा लगता है? (हमें लगता है कि शैतान बेतुका है, लेकिन धूर्त भी है।) क्या तुम लोग बता सकते हो कि मुझे कैसा लग रहा है? हर बार जब मैं शैतान के इन शब्दों को देखता हूँ, तो मुझे घृणा महसूस होती है, क्योंकि वह बोलता तो है, पर उसके शब्दों में कोई सार नहीं होता। क्या शैतान ने परमेश्वर के प्रश्न का उत्तर दिया? नहीं, शैतान ने जो शब्द कहे, वे कोई उत्तर नहीं थे, उनसे कुछ हासिल नहीं हुआ। वे परमेश्वर के प्रश्न के उत्तर नहीं थे। “पृथ्वी पर इधर-उधर घूमते-फिरते और डोलते-डालते आया हूँ।” तुम इन शब्दों से क्या समझते हो? आखिर शैतान कहाँ से आया था? क्या तुम लोगों को इस प्रश्न का कोई उत्तर मिला? (नहीं।) यह शैतान की धूर्त योजनाओं की “प्रतिभा” है—किसी को पता न लगने देना कि वह वास्तव में क्या कह रहा है। ये शब्द सुनकर भी तुम लोग यह नहीं जान सकते कि उसने क्या कहा है, हालाँकि उसने उत्तर देना समाप्त कर लिया है। फिर भी वह मानता है कि उसने उत्तम तरीके से उत्तर दिया है। तो तुम कैसा महसूस करते हो? घृणा महसूस करते हो ना? (हाँ।) अब तुमने इन शब्दों की प्रतिक्रिया में घृणा महसूस करना शुरू कर दिया है। शैतान के शब्दों की एक निश्चित विशेषता है : शैतान जो कुछ कहता है, वह तुम्हें अपना सिर खुजलाता छोड़ देता है, और तुम उसके शब्दों के स्रोत को समझने में असमर्थ रहते हो। कभी-कभी शैतान के इरादे होते हैं और वह जानबूझकर बोलता है, और कभी-कभी वह अपनी प्रकृति से नियंत्रित होता है, जिससे ऐसे शब्द अनायास ही निकल जाते हैं, और सीधे शैतान के मुँह से निकलते हैं। शैतान ऐसे शब्दों को तौलने में लंबा समय नहीं लगाता; बल्कि वे बिना सोचे-समझे व्यक्त किए जाते हैं। जब परमेश्वर ने पूछा कि वह कहाँ से आया है, तो शैतान ने कुछ अस्पष्ट शब्दों में उत्तर दिया। तुम बिल्कुल उलझन में पड़ जाते हो, और नहीं जान पाते कि आखिर वह कहाँ से आया है। क्या तुम लोगों के बीच में कोई ऐसा है, जो इस प्रकार से बोलता है? यह बोलने का कैसा तरीका है? (यह अस्पष्ट है और निश्चित उत्तर नहीं देता।) बोलने के इस तरीके का वर्णन करने के लिए हमें किस प्रकार के शब्दों का प्रयोग करना चाहिए? यह ध्यान भटकाने वाला और गलत दिशा दिखाने वाला है। मान लो, कोई व्यक्ति नहीं चाहता कि दूसरे यह जानें कि उसने कल क्या किया था। तुम उससे पूछते हो : “मैंने तुम्हें कल देखा था। तुम कहाँ जा रहे थे?” वह तुम्हें सीधे यह नहीं बताता कि वह कहाँ गया था। इसके बजाय वह कहता है : “कल क्या दिन था। बहुत थकाने वाला दिन था!” क्या उसने तुम्हारे प्रश्न का उत्तर दिया? दिया, लेकिन वह उत्तर नहीं दिया, जो तुम चाहते थे। यह मनुष्य के बोलने की चालाकी की “प्रतिभा” है। तुम कभी पता नहीं लगा सकते कि उसका क्या मतलब है, न तुम उसके शब्दों के पीछे के स्रोत या इरादे को ही समझ सकते हो। तुम नहीं जानते कि वह क्या टालने की कोशिश कर रहा है, क्योंकि उसके हृदय में उसकी अपनी कहानी है—वह कपटी है। क्या तुम लोगों में भी कोई है, जो अक्सर इस तरह से बोलता है? (हाँ।) तो तुम लोगों का क्या उद्देश्य होता है? क्या यह कभी-कभी तुम्हारे अपने हितों की रक्षा के लिए होता है, और कभी-कभी अपना अभिमान, अपनी स्थिति, अपनी छवि बनाए रखने के लिए, अपने निजी जीवन के रहस्य सुरक्षित रखने के लिए? उद्देश्य चाहे कुछ भी हो, यह तुम्हारे हितों से अलग नहीं है, यह तुम्हारे हितों से जुड़ा हुआ है। क्या यह मनुष्य का स्वभाव नहीं है? ऐसी प्रकृति वाले सभी व्यक्ति अगर शैतान का परिवार नहीं हैं, तो उससे घनिष्ठ रूप से जुड़े अवश्य हैं। हम ऐसा कह सकते हैं, है न? सामान्य रूप से कहें, तो यह अभिव्यक्ति घृणित और वीभत्स है। तुम लोग भी अब घृणा़ महसूस करते हो, है न? (हाँ।)
आओ, निम्नलिखित पद देखें। शैतान फिर से यहोवा के प्रश्न का उत्तर देते हुए कहता है : “क्या अय्यूब परमेश्वर का भय बिना लाभ के मानता है?” शैतान अय्यूब के संबंध में यहोवा के आकलन पर हमला कर रहा है, और यह हमला दुश्मनी के रंग में रँगा है। “क्या तू ने उसकी, और उसके घर की, और जो कुछ उसका है उसके चारों ओर बाड़ा नहीं बाँधा?” यह अय्यूब पर किए गए यहोवा के कार्य के संबंध में शैतान की समझ और उसका आकलन है। शैतान उसका इस तरह आकलन करता है, और कहता है : “तू ने तो उसके काम पर आशीष दी है, और उसकी सम्पत्ति देश भर में फैल गई है। परन्तु अब अपना हाथ बढ़ाकर जो कुछ उसका है, उसे छू; तब वह तेरे मुँह पर तेरी निन्दा करेगा।” शैतान सदा अस्पष्टता से बात करता है, पर यहाँ वह निश्चय के साथ बोल रहा है। लेकिन निश्चय के साथ बोले जाने के बावजूद ये शब्द एक हमला हैं, ईश-निंदा हैं और यहोवा परमेश्वर की, स्वयं परमेश्वर की अवज्ञा हैं। जब तुम लोग ये शब्द सुनते हो तो तुम्हें कैसा लगता है? क्या तुम्हें घृणा महसूस होती है? क्या तुम लोग शैतान के इरादों को देख पा रहे हो? सर्वप्रथम, शैतान अय्यूब के संबंध में—जो परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने वाला मनुष्य है, यहोवा के आकलन को नकारता है। फिर वह हर उस चीज को नकारता है, जिसे अय्यूब कहता और करता है, अर्थात् वह उसके मन में मौजूद यहोवा के भय को नकारता है। क्या यह आरोप लगाना नहीं है? शैतान यहोवा की हर कथनी और करनी पर दोषारोपण करता है, उसे नकारता है और उस पर संदेह करता है। वह यह कहते हुए विश्वास नहीं करता कि “अगर तुम कहते हो कि चीजें ऐसी हैं तो फिर मैंने उन्हें क्यों नहीं देखा? तुमने उसे बहुत सारे आशीष दिए हैं तो वह तुम्हारा भय क्यों नहीं मानेगा?” क्या यह परमेश्वर के हर कार्य का खंडन नहीं है? दोषारोपण, खंडन, ईश-निंदा—क्या शैतान के शब्द हमला नहीं हैं? क्या ये शब्द, शैतान जो कुछ अपने हृदय में सोचता है, उसकी सच्ची अभिव्यक्ति नहीं हैं? ये वचन निश्चित रूप से वैसे नहीं हैं, जैसे हमने अभी पढ़े थे : “पृथ्वी पर इधर-उधर घूमते-फिरते और डोलते-डालते आया हूँ।” वे पूरी तरह से भिन्न हैं। इन शब्दों के माध्यम से शैतान अपने दिल की बात पूरी तरह से अनावृत कर देता है—परमेश्वर के प्रति अपना रवैया और अय्यूब के परमेश्वर का भय मानने से घृणा। जब ऐसा होता है, तो उसकी दुर्भावना और दुष्ट प्रकृति पूरी तरह से उजागर हो जाती हैं। वह उनसे घृणा करता है, जो परमेश्वर का भय मानते हैं; वह उनसे घृणा करता है, जो बुराई से दूर रहते हैं; और इनसे भी बढ़कर, वह मनुष्य को आशीष प्रदान करने के लिए यहोवा से घृणा करता है। वह इस अवसर का उपयोग अय्यूब को नष्ट करने के लिए करना चाहता है; जिस अय्यूब को परमेश्वर ने अपने हाथों से बड़ा किया है, उसे बरबाद करने के लिए वह कहता है : “तुम कहते हो, अय्यूब तुम्हारा भय मानता है और बुराई से दूर रहता है। मैं इसे अलग तरह से देखता हूँ।” वह यहोवा को उकसाने और प्रलोभन देने के लिए कई तरीकों का इस्तेमाल करता है और कई हथकंडे अपनाता है, ताकि यहोवा परमेश्वर अय्यूब को शैतान को सौंप दे, जिससे कि वह उसके साथ बेहूदगी से पेश आ सके, उसे नुकसान पहुँचा सके और उसके साथ दुर्व्यवहार कर सके। वह इस अवसर का लाभ इस मनुष्य को नष्ट करने के लिए करना चाहता है, जो परमेश्वर की नजरों में धार्मिक और पूर्ण है। क्या शैतान के पास इस प्रकार का हृदय होना केवल एक क्षणिक आवेग का परिणाम है? नहीं, ऐसा नहीं है। इसे बनने में लंबा समय लगा है। जब परमेश्वर कार्य करता है—जब परमेश्वर किसी व्यक्ति की परवाह करता है और उसकी पड़ताल करता है, और जब वह उसे योग्य पाता है और उसका अनुमोदन करता है—तो शैतान ठीक उसके पीछे-पीछे आता है, उसे गुमराह करने और गंभीर रूप से नुकसान पहुँचाने की कोशिश करता है। चूँकि परमेश्वर इस व्यक्ति को पाना चाहता है, इसलिए शैतान आड़े आने के लिए अपनी पूरी ताकत लगा देता है, वह ललचाने, बाधा डालने और परमेश्वर के कार्य को नुकसान पहुँचाने के लिए विभिन्न दुष्टतापूर्ण तरीके अपनाता है ताकि अपना अकथनीय मकसद हासिल कर सके। यह मकसद क्या है? वह नहीं चाहता कि परमेश्वर किसी को भी पाए; वह उन लोगों को छीन लेना चाहता है जिन्हें परमेश्वर पाने का इरादा रखता है, ताकि वह उन पर कब्जा कर सके, उन्हें नियंत्रित कर सके और उन्हें अपने प्रभार में ले सके, ताकि वे उसकी आराधना करें और परमेश्वर का विरोध करने के लिए बुराई करने में उसका साथ दें। क्या यह शैतान का कुटिल उद्देश्य नहीं है? तुम लोग अक्सर कहते हो कि शैतान कितना दुष्ट, कितना खराब है, परंतु क्या तुमने उसे देखा है? तुम यह देख सकते हो कि मनुष्य जाति कितनी बुरी है; तुमने यह नहीं देखा है कि असल शैतान कितना बुरा है। पर अय्यूब के मामले में, तुम स्पष्ट रूप से देखा है कि शैतान कितना दुष्ट है। इस मामले ने शैतान के भयंकर चेहरे और उसके सार को बिल्कुल स्पष्ट कर दिया है। परमेश्वर के साथ युद्ध करने और उसके पीछे-पीछे चलने में शैतान का मकसद उस समस्त कार्य को नष्ट करना है जिसे परमेश्वर करना चाहता है, और उन लोगों पर कब्ज़ा और नियंत्रण करना है जिन्हें परमेश्वर प्राप्त करना चाहता है। वह उन लोगों को पूरी तरह से खत्म कर देना चाहता है जिन्हें परमेश्वर प्राप्त करना चाहता है, या यदि वे खत्म नहीं होते हैं तो वह उन पर कब्जा करके उनका इस्तेमाल करना चाहता है। उसका मकसद यही है। और परमेश्वर क्या करता है? परमेश्वर इस अंश में केवल एक सरल वाक्य कहता है; परमेश्वर के इससे कुछ भी अधिक करने का कोई अभिलेख नहीं है, परंतु शैतान के कहने और करने के और भी कई अभिलेख हम देखते हैं। पवित्र शास्त्र के नीचे दिए गए अंश में यहोवा शैतान से पूछता है, “तू कहाँ से आता है?” शैतान क्या उत्तर देता है? (उसका उत्तर अभी भी यही है “इधर-उधर घूमते-फिरते और डोलते-डालते आया हूँ।”) यह अभी भी वही वाक्य है। यह शैतान का आदर्श वाक्य, उसका परिचय-कार्ड बन गया है। ऐसा कैसे है? क्या शैतान घृणास्पद नहीं है? निश्चित रूप से इस घिनौने वाक्य को एक बार कहना ही काफी है। शैतान बार-बार इसे दोहराए क्यों जाता है। इससे एक बात साबित होती है : शैतान का स्वभाव अपरिवर्तनीय है। शैतान अपना बदसूरत चेहरा छिपाने के लिए दिखावे का इस्तेमाल नहीं कर सकता है। परमेश्वर उससे एक प्रश्न पूछता है और वह इस तरह प्रत्युत्तर देता है। ऐसा है, तो सोचो, मनुष्यों के साथ वह कैसा व्यवहार करता होगा! वह परमेश्वर से नहीं डरता, परमेश्वर का भय नहीं मानता, और परमेश्वर की आज्ञा का पालन नहीं करता। अतः वह बेहूदगी से परमेश्वर के सम्मुख ढीठ होने की, परमेश्वर के प्रश्न पर लीपापोती करने के लिए उन्हीं शब्दों का प्रयोग करने की, परमेश्वर के प्रश्न का वही उत्तर दोहराने और इस उत्तर से परमेश्वर को उलझाने की कोशिश करता है—यह शैतान का कुरूप चेहरा है। वह परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता पर विश्वास नहीं करता, वह परमेश्वर के अधिकार पर विश्वास नहीं करता, और वह निश्चित रूप से परमेश्वर के प्रभुत्व के आगे समर्पण करने के लिए तैयार नहीं होता। वह लगातार परमेश्वर के विरोध में रहता है, लगातार परमेश्वर के हर कार्य पर हमला कर उसे बरबाद करने की कोशिश करता है—यह उसका दुष्ट उद्देश्य है।
—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है IV
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 140
शैतान और यहोवा परमेश्वर के मध्य वार्तालाप (चुने हुए अंश)
अय्यूब 1:6-11 एक दिन यहोवा परमेश्वर के पुत्र उसके सामने उपस्थित हुए, और उनके बीच शैतान भी आया। यहोवा ने शैतान से पूछा, “तू कहाँ से आता है?” शैतान ने यहोवा को उत्तर दिया, “पृथ्वी पर इधर-उधर घूमते-फिरते और डोलते-डालते आया हूँ।” यहोवा ने शैतान से पूछा, “क्या तू ने मेरे दास अय्यूब पर ध्यान दिया है? क्योंकि उसके तुल्य खरा और सीधा और मेरा भय माननेवाला और बुराई से दूर रहनेवाला मनुष्य और कोई नहीं है।” शैतान ने यहोवा को उत्तर दिया, “क्या अय्यूब परमेश्वर का भय बिना लाभ के मानता है? क्या तू ने उसकी, और उसके घर की, और जो कुछ उसका है उसके चारों ओर बाड़ा नहीं बाँधा? तू ने तो उसके काम पर आशीष दी है, और उसकी सम्पत्ति देश भर में फैल गई है। परन्तु अब अपना हाथ बढ़ाकर जो कुछ उसका है, उसे छू; तब वह तेरे मुँह पर तेरी निन्दा करेगा।”
अय्यूब 2:1-5 फिर एक और दिन यहोवा परमेश्वर के पुत्र उसके सामने उपस्थित हुए, और उनके बीच शैतान भी उसके सामने उपस्थित हुआ। यहोवा ने शैतान से पूछा, “तू कहाँ से आता है?” शैतान ने यहोवा को उत्तर दिया, “इधर-उधर घूमते-फिरते और डोलते-डालते आया हूँ।” यहोवा ने शैतान से पूछा, “क्या तू ने मेरे दास अय्यूब पर ध्यान दिया है कि पृथ्वी पर उसके तुल्य खरा और सीधा और मेरा भय माननेवाला और बुराई से दूर रहनेवाला मनुष्य और कोई नहीं है? यद्यपि तू ने मुझे बिना कारण उसका सत्यानाश करने को उभारा, तौभी वह अब तक अपनी खराई पर बना है।” शैतान ने यहोवा को उत्तर दिया, “खाल के बदले खाल; परन्तु प्राण के बदले मनुष्य अपना सब कुछ दे देता है। इसलिए केवल अपना हाथ बढ़ाकर उसकी हड्डियाँ और मांस छू, तब वह तेरे मुँह पर तेरी निन्दा करेगा।”
जैसा कि अय्यूब की पुस्तक में दर्ज है, शैतान द्वारा बोले गए ये दो अंश और शैतान द्वारा किए गए कार्य परमेश्वर की छह हजार वर्षीय प्रबंधन योजना में उसके प्रतिरोध का प्रतिनिधित्व करते हैं—यहाँ शैतान का असली रंग प्रकट हो जाता है। क्या तुमने असली जीवन में शैतान के शब्दों और कार्यों को देखा है? जब तुम उन्हें देखते हो, तो हो सकता है, तुम उन्हें शैतान द्वारा बोली गई बातें न समझो, बल्कि मनुष्य द्वारा बोली गई बातें समझो। जब मनुष्य द्वारा ऐसी बातें बोली जाती हैं, तो किसका प्रतिनिधित्व होता है? शैतान का प्रतिनिधित्व होता है। भले ही तुम इसे पहचान लो, फिर भी तुम यह नहीं समझ सकते कि वास्तव में इसे शैतान द्वारा बोला जा रहा है। पर यहाँ और अभी तुमने सुस्पष्ट ढंग से देखा है कि शैतान ने स्वयं क्या कहा है। अब तुम्हारे पास शैतान के भयानक चेहरे और उसकी दुष्टता की स्पष्ट और बिल्कुल साफ समझ है। तो क्या शैतान द्वारा बोले गए ये दो अंश आज लोगों को शैतान के स्वभाव के बारे में जानकारी पाने में मदद करने की दृष्टि से मूल्यवान हैं? क्या ये दो अंश आज मानव-जाति के लिए शैतान के भयंकर चेहरे को, उसके मूल, असली चेहरे को पहचानने में सक्षम होने के लिए सावधानी से संगृहीत किए जाने योग्य हैं? यद्यपि ऐसा कहना शायद उचित प्रतीत न हो, फिर भी इस तरह कहे गए ये शब्द ठीक लग सकते हैं। निस्संदेह, मैं इस विचार को केवल इसी रूप में व्यक्त कर सकता हूँ, और यदि तुम लोग इसे समझ सको, तो यह काफी है। शैतान यहोवा द्वारा किए गए कार्यों पर बार-बार हमला करता है और यहोवा परमेश्वर के प्रति अय्यूब के भय के संबंध में अनेक इलज़ाम लगाता है। वह यहोवा को उकसाने का प्रयास करता है और यहोवा को अय्यूब का लालच छोड़ने के लिए प्रेरित करने की कोशिश करता है। इसलिए उसके शब्द बहुत भड़काने वाले हैं। तो मुझे बताओ, जब एक बार शैतान ये शब्द बोल देता है, तो क्या परमेश्वर साफ-साफ देख सकता है कि शैतान क्या करना चाहता है? (हाँ।) परमेश्वर के हृदय में यह मनुष्य अय्यूब, जिस पर परमेश्वर दृष्टि रखता है—परमेश्वर का यह सेवक, जिसे परमेश्वर धार्मिक मनुष्य, एक पूर्ण मनुष्य मानता है—क्या वह इस तरह के प्रलोभन का सामना कर सकता है? (हाँ।) परमेश्वर उसके बारे में इतना निश्चित क्यों है? क्या परमेश्वर हमेशा मनुष्य के हृदय की जाँच करता रहता है? (हाँ।) तो क्या शैतान मनुष्य के हृदय की जाँच करने में सक्षम है? शैतान जाँच नहीं कर सकता। यहाँ तक कि यदि शैतान तुम्हारा हृदय देख भी सकता हो, तो भी उसकी दुष्ट प्रकृति उसे कभी विश्वास नहीं करने देगा कि पवित्रता, पवित्रता है, या गंदगी, गंदगी है। दुष्ट शैतान कभी किसी ऐसी चीज को सँजोकर नहीं रख सकता, जो पवित्र, न्यायसंगत और उज्ज्वल है। शैतान अपनी प्रकृति, अपनी दुष्टता के अनुसार और उन तरीकों के माध्यम से, जिनका वह आदी है, कार्य किए बिना नहीं रह सकता है। यहाँ तक कि परमेश्वर द्वारा स्वयं को दंडित या नष्ट किए जाने की कीमत पर भी वह ढिठाई से परमेश्वर का विरोध करने से नहीं हिचकिचाता—यह दुष्टता है, यह शैतान का स्वभाव है। तो इस अंश में शैतान कहता है : “खाल के बदले खाल; परन्तु प्राण के बदले मनुष्य अपना सब कुछ दे देता है। इसलिए केवल अपना हाथ बढ़ाकर उसकी हड्डियाँ और मांस छू, तब वह तेरे मुँह पर तेरी निन्दा करेगा।” शैतान सोचता है कि परमेश्वर के प्रति मनुष्य का भय इस कारण है, क्योंकि मनुष्य ने परमेश्वर से बहुत सारे लाभ प्राप्त किए हैं। मनुष्य परमेश्वर से अनेक लाभ उठाता है, इसलिए वह कहता है कि परमेश्वर अच्छा है। वह इस तरह से परमेश्वर का भय इसलिए नहीं मानता क्योंकि परमेश्वर अच्छा है, बल्कि सिर्फ इसलिए मानता है क्योंकि वह उससे इतने सारे लाभ प्राप्त करता है। एक बार यदि परमेश्वर उसे इन लाभों से वंचित कर दे, तो वह परमेश्वर को त्याग देगा। अपनी दुष्ट प्रकृति के कारण शैतान यह नहीं मानता कि मनुष्य का हृदय सच में परमेश्वर का भय मान सकता है। अपनी दुष्ट प्रकृति के कारण वह नहीं जानता कि पवित्रता क्या है, और भय को तो बिल्कुल भी नहीं जानता। वह नहीं जानता कि परमेश्वर को समर्पित होना क्या है, या परमेश्वर का भय मानना क्या है। चूँकि वह इन चीजों को नहीं जानता, इसलिए वह सोचता है, मनुष्य भी परमेश्वर का भय नहीं मान सकता। मुझे बताओ, क्या शैतान दुष्ट नहीं है? हमारी कलीसिया को छोड़कर, विभिन्न धर्मों और संप्रदायों या धार्मिक और सामाजिक समूहों में से कोई भी परमेश्वर के अस्तित्व में विश्वास नहीं करता, इस बात पर तो वे बिल्कुल भी विश्वास नहीं करते कि परमेश्वर देह बन गया है और न्याय का कार्य कर रहा है। दुराचारी व्यक्ति चारों ओर देखता है, तो उसे हर कोई दुराचारी नजर आता है, जैसा वह खुद है। झूठे आदमी को चारों ओर बेईमानी और झूठ ही दिखाई देता है। दुष्ट व्यक्ति हर एक को दुष्ट समझता है और उससे लड़ना चाहता है। तुलनात्मक रूप से ईमानदार लोग हर किसी को ईमानदार समझते हैं, अतः वे हमेशा झाँसे में आ जाते हैं, हमेशा धोखा खाते हैं, और इस बारे में कुछ नहीं कर सकते। तुम लोगों को अपने विश्वास में दृढ़ करने के लिए मैं ये कुछ उदाहरण देता हूँ : शैतान की दुष्ट प्रकृति क्षणिक मजबूरी या परिस्थितियों से निर्धारित नहीं है, न ही वह किसी कारण या संदर्भगत कारकों से उत्पन्न कोई अस्थायी अभिव्यक्ति है। बिल्कुल नहीं! शैतान इसके अलावा कुछ हो ही नहीं सकता! वह कुछ भी अच्छा नहीं कर सकता। यहाँ तक कि जब वह कुछ कर्णप्रिय बात भी कहता है, तो वह केवल तुम्हें बहकाने के लिए होती है। जितनी ज्यादा कर्णप्रिय, उतनी ज्यादा चतुराई से भरी; जितने ज्यादा कोमल शब्द, उनके पीछे उतने ही ज्यादा दुष्ट और भयानक इरादे। इन दो अंशों में शैतान किस तरह का चेहरा, किस तरह का स्वभाव दिखाता है? (कपटी, दुर्भावनापूर्ण और दुष्ट।) शैतान का प्रमुख लक्षण दुष्टता है; अन्य सबसे बढ़कर, शैतान दुष्ट और दुर्भावनापूर्ण है।
—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है IV
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 141
जब से परमेश्वर ने मनुष्य को बनाया, तब से उसने हमेशा मानवजाति के जीवन का मार्गदर्शन किया है, फिर चाहे यह मानवजाति को आशीष देना रहा हो, मानवजाति के लिए व्यवस्थाएँ बनाना और आज्ञाएँ जारी करना रहा हो या जीवन के लिए विभिन्न आदेश जारी करना रहा हो—इन चीजों को करने में परमेश्वर का अभिप्राय और उद्देश्य क्या है? क्या तुम जानते हो यह क्या है? पहला, क्या तुम निश्चित रूप से कह सकते हो कि परमेश्वर जो कुछ भी करता है वह सब मानवजाति की भलाई के लिए है? यह कथन तुम लोगों को भव्य, खोखले शब्दों की तरह लग सकता है, लेकिन खासकर ब्योरों को देखें तो क्या वह सब जो परमेश्वर करता है, एक सामान्य जीवन जीने की दिशा में मनुष्य की अगुआई और मार्गदर्शन नहीं कर रहा है? चाहे मनुष्य विनियमों का पालन करे या व्यवस्थाओं के हिसाब से चले, परमेश्वर का उद्देश्य है कि मनुष्य शैतान की आराधना में न पड़े और शैतान से नुकसान न उठाए—यह उसका सबसे बुनियादी लक्ष्य है, और यही उसका मूल लक्ष्य है। बिल्कुल शुरुआत में, जब मनुष्य परमेश्वर के इरादों को नहीं समझता था, तब उसने कुछ सरल व्यवस्थाएँ और नियम बनाए और ऐसे विनियम बनाए, जिनमें हर ऐसे पहलू का समावेश था, जिसकी कल्पना की जा सकती थी। ये विनियम सरल हैं, फिर भी उनमें परमेश्वर के इरादे शामिल हैं। परमेश्वर मानवजाति को सँजोता है, उसका पोषण करता है और उससे बहुत प्रेम करता है। तो क्या हम कह सकते हैं कि उसका हृदय पवित्र है? क्या हम कह सकते हैं कि उसका हृदय साफ है? (हाँ।) क्या परमेश्वर की कोई और भी मंशा है? (नहीं।) तो क्या उसका यह उद्देश्य सही और सकारात्मक है? अपने कार्य के दौरान परमेश्वर ने जो भी विनियम बनाए हैं, उन सबका प्रभाव मनुष्य के लिए सकारात्मक है, और वे उसका मार्ग प्रशस्त करते हैं। तो क्या परमेश्वर के मन में कोई स्वार्थपूर्ण विचार हैं? जहाँ तक मनुष्य का संबंध है, क्या परमेश्वर के कोई अतिरिक्त उद्देश्य हैं? क्या परमेश्वर किसी तरह से मनुष्य का उपयोग करना चाहता है? जरा भी नहीं। परमेश्वर वही करता है, जो वह कहता है और उसके वचन और कार्य उसके हृदय के विचारों से मेल खाते हैं। इसमें कोई दूषित उद्देश्य नहीं है, कोई स्वार्थपूर्ण विचार नहीं हैं। वह अपने लिए कुछ नहीं करता, जो कुछ भी वह करता है, मनुष्य के लिए करता है, बिना किसी व्यक्तिगत उद्देश्य के। भले ही मनुष्य को लेकर उसकी अपनी योजनाएँ और इरादे हैं, लेकिन ये उसके अपने लिए नहीं है। वह जो कुछ भी करता है, वह सब विशुद्ध रूप से मानवजाति के लिए करता है, मानवजाति की सुरक्षा के लिए, उसे गुमराह न होने देने के लिए करता है। तो क्या उसका यह हृदय बहुमूल्य नहीं है? क्या तुम इस बहुमूल्य हृदय का लेशमात्र संकेत भी शैतान में देख सकते हो? तुम इसका लेशमात्र संकेत भी शैतान में नहीं देख सकते, तुम इसे बिल्कुल नहीं देख सकते। परमेश्वर जो कुछ करता है, वह सहज रूप से प्रकट होता है। आओ, अब परमेश्वर के कार्य करने के तरीके को देखें; वह अपना कार्य कैसे करता है? क्या परमेश्वर इन व्यवस्थाओं और अपने वचनों को लेकर वशीकरण मंत्र[क] की तरह हर आदमी के सिर पर कसकर बाँध देता है और इस प्रकार उन्हें प्रत्येक मनुष्य पर थोपता है? क्या वह इस तरह से कार्य करता है? (नहीं।) तो फिर परमेश्वर किस तरह से अपना कार्य करता है? क्या वह धमकाता है? क्या वह तुमसे गोल-मोल बात करता है? (नहीं।) जब तुम सत्य को नहीं समझते, तो परमेश्वर तुम्हारा मार्गदर्शन कैसे करता है? वह तुम्हें प्रबुद्ध और प्रकाशित करता है, तुम्हें स्पष्ट रूप से बताता है कि तुम जो कर रहे हो वह सत्य के अनुरूप नहीं है और तुम्हें क्या करना चाहिए। परमेश्वर के कार्य करने के इन तरीकों के आधार पर तुम्हें क्या लगता है, परमेश्वर के साथ तुम्हारा रिश्ता कैसा है? क्या इनसे तुम्हें लगता है कि परमेश्वर पहुँच से परे है? (नहीं।) तो इनसे तुम्हें क्या महसूस होता है? इनसे यह महसूस होता है कि परमेश्वर के वचन अत्यंत वास्तविक हैं, मनुष्य के साथ उसका संबंध विशेष रूप से सामान्य है, परमेश्वर तुम्हारे निहायत करीब है, और तुम्हारे और परमेश्वर के बीच कोई दूरी नहीं है। जब परमेश्वर तुम्हारा मार्गदर्शन करता है, जब वह तुम्हारे लिए प्रावधान करता है, तुम्हारी सहायता करता है और तुम्हें सहारा देता है, तुम्हें परमेश्वर की मिलनसारिता और सम्माननीयता महसूस होती है, उसकी मनोहरता और गर्मजोशी महसूस होती है। लेकिन जब परमेश्वर तुम्हारी भ्रष्टता के लिए तुम्हारी भर्त्सना करता है या जब वह तुम्हारी विद्रोहशीलता के लिए तुम्हारा न्याय करता है और तुम्हें अनुशासित करता है, तो वह किन तरीकों का इस्तेमाल करता है? क्या वह वचनों से तुम्हारी भर्त्सना करता है? क्या वह परिवेश के जरिए और लोगों, घटनाओं और चीजों के माध्यम से तुम्हें अनुशासित करता है? (हाँ।) परमेश्वर किस सीमा तक तुम्हें अनुशासित करता है? क्या परमेश्वर तुम्हें उसी पैमाने पर अनुशासित करता है, जिस पैमाने पर लोगों को शैतान भयंकर नुकसान पहुँचाता है? (नहीं, परमेश्वर लोगों को केवल उसी सीमा तक अनुशासित करता है जिस सीमा तक वे सह सकते हैं।) परमेश्वर सौम्य, कोमल, प्रेमपूर्ण और परवाह करने के तरीके से कार्य करता है, एक ऐसा तरीका जो असाधारण रूप से नपा-तुला और उचित होता है और जो तुम्हारे भीतर तीव्र भावनाएँ उत्पन्न नहीं करता, जैसे कि : “परमेश्वर मुझसे यह करा रहा है” या “परमेश्वर मुझसे वह करा रहा है।” परमेश्वर कभी तुम्हें उस किस्म का गहन एहसास या अनुभूति नहीं कराता है जिसे तुम्हारा दिल सह न सके। क्या ऐसा ही नहीं है? यहाँ तक कि जब तुम परमेश्वर के न्याय और ताड़ना के वचनों को स्वीकार करते हो, तब तुम कैसा महसूस करते हो? जब तुम परमेश्वर के अधिकार और उसकी शक्ति को महसूस करते हो, तब तुम्हें कैसा लगता है? क्या तुम महसूस करते हो कि परमेश्वर दिव्य और अनुल्लंघनीय है? क्या उस समय तुम अपने और परमेश्वर के बीच दूरी महसूस करते हो? क्या तुम्हें महसूस होता है कि परमेश्वर कितना भयावह है? नहीं—बल्कि तुम परमेश्वर के प्रति भय महसूस करते हो। क्या लोग ये चीजें परमेश्वर के कार्य के कारण महसूस नहीं करते? यदि शैतान मनुष्य पर काम करता, तो क्या तब भी उनमें ये भावनाएँ होतीं? बिल्कुल नहीं। परमेश्वर अपने वचनों, सत्य और अपने जीवन का प्रयोग मनुष्य के लिए निरंतर प्रावधान करने और उसे सहारा देने के लिए करता है। जब मनुष्य नकारात्मक होता है, जब मनुष्य मायूस होता है तो परमेश्वर बाध्यकारी ढंग से यह नहीं कहता : “नकारात्मक मत महसूस करो! इसमें नकारात्मक होने की क्या बात है? तुम कमजोर क्यों हो? इसमें कमजोर होने का क्या कारण है? तुम हमेशा कितने कमजोर हो, और तुम हमेशा कितने नकारात्मक रहते हो—तुम्हारे जिंदा रहने का क्या फायदा है? तो फिर मर ही जाओ!” क्या परमेश्वर इस तरह से कार्य करेगा? (नहीं।) क्या परमेश्वर के पास इस तरह से कार्य करने का अधिकार है? हाँ, है। फिर भी परमेश्वर इस तरह से कार्य नहीं करता। परमेश्वर के इस तरह से कार्य न करने की वजह है उसका सार, उसका सार जो पवित्रता है। मनुष्य के प्रति उसका प्रेम, मनुष्य को सँजोने और सँभालने को मनुष्य द्वारा केवल एक-दो वाक्यों में स्पष्ट अभिव्यक्त नहीं किया जा सकता है। ये ऐसी चीजें नहीं हैं जो इंसान के डींग मारने से आती हों, बल्कि ये ऐसी चीजें हैं जिन्हें स्वयं परमेश्वर साकार करता है; यह परमेश्वर के सार का प्रकटीकरण है। क्या ये सभी तरीके, जिनके द्वारा परमेश्वर कार्य करता है, मनुष्य को परमेश्वर की पवित्रता दिखा सकते हैं? इन सभी तरीकों से, जिनके द्वारा परमेश्वर कार्य करता है, जिनमें परमेश्वर के अच्छे इरादे शामिल हैं, जिनमें वे प्रभाव शामिल हैं जिन्हें परमेश्वर मनुष्य पर लागू करना चाहता है, जिनमें वे विभिन्न तरीके शामिल हैं जिन्हें परमेश्वर मनुष्य पर कार्य करने के लिए अपनाता है, जिनमें उस प्रकार का कार्य शामिल है जिसे वह करता है, वह मनुष्य को क्या समझाना चाहता है—क्या तुमने परमेश्वर के अच्छे इरादों में कोई दुष्टता या धोखा देखा है? (नहीं।) तो जो कुछ परमेश्वर करता है, जो कुछ परमेश्वर कहता है, जो कुछ वह अपने हृदय में सोचता है, उसमें और साथ ही परमेश्वर के समस्त सार में, जिसे वह प्रकट करता है—क्या हम परमेश्वर को पवित्र कह सकते हैं? (हाँ।) क्या किसी मनुष्य ने संसार में, या अपने अंदर कभी ऐसी पवित्रता देखी है? परमेश्वर को छोड़कर, क्या तुमने इसे कभी किसी मनुष्य या शैतान में देखा है? (नहीं।) अपनी अब तक की चर्चा के आधार पर, क्या हम परमेश्वर को अद्वितीय, स्वयं पवित्र परमेश्वर कह सकते हैं? (हाँ।) परमेश्वर मनुष्य को जो भी चीजें देता है, जिनमें परमेश्वर के वचन, विभिन्न तरीकों से मनुष्य पर किया गया परमेश्वर का कार्य, मनुष्य से कही जाने वाली उसकी बातें, परमेश्वर मनुष्य को जो याद दिलाता है, जो सलाह और प्रोत्साहन देता है वह सब शामिल है—यह सब एक सार से उत्पन्न होता है : परमेश्वर की पवित्रता से। यदि कोई ऐसा पवित्र परमेश्वर न होता, तो कोई मनुष्य उसके कार्य को करने के लिए उसका स्थान न ले पाता। यदि परमेश्वर ने इन लोगों को पूरी तरह से शैतान को सौंप दिया होता, तो क्या तुम लोगों ने कभी सोचा है कि तुम किस हालत में होते? क्या तुम सब यहाँ सही-सलामत बैठे होते? क्या तुम भी यह कहोगे : “इधर-उधर घूमते-फिरते और डोलते-डालते आया हूँ”? क्या तुम इतने बेशरम, ढीठ और अकड़ू होगे कि ऐसे शब्द बोलो और परमेश्वर के सामने निर्लज्जता से डींग हाँको? बेशक, तुम बिल्कुल ऐसा ही करोगे! मनुष्य के प्रति शैतान का रवैया उसे यह देखने का मौका देता है कि शैतान का प्रकृति सार परमेश्वर से पूर्णतः अलग है। शैतान के सार की वह कौन-सी बात है, जो परमेश्वर की पवित्रता के विपरीत है? (शैतान की दुष्टता।) शैतान की दुष्ट प्रकृति परमेश्वर की पवित्रता के विपरीत है। अधिकतर लोगों द्वारा परमेश्वर के इस प्रकटीकरण और परमेश्वर की पवित्रता के इस सार को न पहचान पाने का कारण यह है कि वे शैतान की सत्ता के अधीन, शैतान की भ्रष्टता के अंतर्गत और शैतान के जीवन जीने के दायरे के भीतर रहते हैं। वे नहीं जानते कि पवित्रता क्या है या पवित्रता को कैसे परिभाषित किया जाए। यहाँ तक कि परमेश्वर की पवित्रता को समझ लेने के बाद भी तुम किसी निश्चय के साथ उसे परमेश्वर की पवित्रता के रूप में परिभाषित नहीं कर सकते। यह परमेश्वर की पवित्रता के संबंध में मनुष्य के ज्ञान की विसंगति है।
—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है IV
फुटनोट :
क. “वशीकरण मंत्र” एक मंत्र है, जिसे भिक्षु तांग सानज़ैंग ने चीनी उपन्यास “जर्नी टु द वेस्ट” (पश्चिम की यात्रा) में इस्तेमाल किया है। वह इस मंत्र का उपयोग सन वूकोंग (वानर राजा) को नियंत्रित करने के लिए उसके सिर के चारों ओर एक धातु का छल्ला कसकर करता है, जिससे उसे तेज सिरदर्द हो जाता है और वह काबू में आ जाता है। यह व्यक्ति को बाँधने वाली किसी चीज का वर्णन करने के लिए एक रूपक बन गया है।
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 142
मनुष्य पर शैतान के कार्य को क्या चिह्नित करता है? तुम लोगों को अपने खुद के अनुभवों के माध्यम से इसे जानने में समर्थ होना चाहिए—यह शैतान का आद्यप्ररूपीय लक्षण है, वह चीज जिसे वह सबसे ज्यादा करता है, वह चीज जिसे वह हर एक व्यक्ति के साथ करने की कोशिश करता है। शायद तुम लोग इस लक्षण को नहीं देख पाते, इसलिए तुम यह महसूस नहीं करते कि शैतान बहुत ही भयावह और घिनौना है। क्या कोई जानता है कि वह लक्षण क्या है? (वह मनुष्य को बहकाता, फुसलाता और ललचाता है।) यह सही है; ये विभिन्न तरीके हैं, जिनमें वह लक्षण प्रकट होता है। शैतान मनुष्य को गुमराह भी करता है, उस पर हमला भी करता है और आरोप भी लगाता है—ये सब अभिव्यक्तियाँ हैं। और कुछ? (वह झूठ बोलता है।) धोखा देना और झूठ बोलना शैतान को सबसे ज्यादा स्वाभाविक रूप से आते हैं। वह अक्सर ऐसा करता है। अपने आसपास के लोगों पर रौब जमाना, उन्हें उकसाना, उन्हें चीजें करने के लिए बाध्य करना, उन्हें आदेश देना और उनके शरीर को जबरन अपने कब्जे में कर लेना भी इसमें शामिल है। अब मैं तुम लोगों को एक ऐसी बात बताऊँगा, जो तुम्हारे रोंगटे खड़े कर देगी, लेकिन मैं ऐसा तुम लोगों को डराने के लिए नहीं कर रहा। जब परमेश्वर मनुष्य पर कार्य करता है, वह मनुष्य को अपने रवैये और हृदय दोनों में ही सँजोता है। दूसरी ओर, शैतान मनुष्य को थोड़ा भी नहीं सँजोता है, और वह मनुष्य को हानि कैसे पहुँचाए इस बारे में सोचने में अपना सारा समय बिताता है। क्या ऐसा नहीं है? जब वह मनुष्य को हानि पहुँचाने के बारे में सोच रहा होता है, तो क्या उसकी मनःस्थिति अत्यावश्यकता की होती है? (हाँ।) इसलिए जहाँ तक मनुष्य पर शैतान के कार्य का संबंध है, मेरे पास दो ऐसे वाक्यांश हैं जो शैतान की दुष्टता और दुर्भावना का पर्याप्त रूप से वर्णन कर सकते हैं, जिससे तुम लोग शैतान का घिनौनापन सचमुच समझ सकते हो : मनुष्य से पेश आने के अपने तरीके में शैतान हमेशा हर एक मनुष्य पर इस सीमा तक बलपूर्वक अधिकार और उसे वश में करना चाहता है कि वह मनुष्य पर पूरा नियंत्रण हासिल कर सके और उसे विनाशकारी क्षति पहुँचा सके, ताकि शैतान अपना उद्देश्य हासिल और अपनी महत्वाकांक्षा पूरी कर सके। “बलपूर्वक कब्जा” करने का क्या अर्थ है? क्या यह तुम्हारी सहमति से होता है, या बिना तुम्हारी सहमति के? क्या यह तुम्हारी जानकारी से होता है, या बिना तुम्हारी जानकारी के? उत्तर है कि यह पूरी तरह से बिना तुम्हारी जानकारी के होता है! यह ऐसी स्थितियों में होता है, जब तुम अनजान रहते हो, संभवतः उसके तुमसे बिना कुछ कहे या तुम्हारे साथ बिना कुछ किए, बिना किसी प्रस्तावना के, बिना प्रसंग के—शैतान वहाँ होता है, तुम्हारे इर्द-गिर्द, तुम्हें घेरे हुए। वह फायदा उठाने का मौका ताड़ता है और फिर बलपूर्वक तुम पर अधिकार कर लेता है, तुम्हें वश में कर लेता है, तुम पर पूरा नियंत्रण प्राप्त करने और तुम्हें विनाशकारी क्षति पहुँचाने के अपने उद्देश्य को हासिल कर लेता है। यह मानव-जाति को परमेश्वर से छीनने के संघर्ष में शैतान के सबसे विशिष्ट इरादों और अभिव्यक्तियों में से एक है। इसे सुनकर तुम्हें कैसा लगता है? (हम दिल में आतंकित और भयभीत महसूस करते हैं।) क्या तुम लोग घृणा महसूस करते हो? (हाँ।) जब तुम लोग घृणा महसूस करते हो, तो क्या तुम्हें लगता है कि शैतान निर्लज्ज है? जब तुम्हें लगता है कि शैतान निर्लज्ज है, तो क्या तुम अपने आसपास के उन लोगों के प्रति घृणा महसूस करते हो, जो हमेशा तुम्हें नियंत्रित करना चाहते हैं, जो हैसियत और हितों के लिए प्रचंड महत्वाकांक्षाएँ रखते हैं? (हाँ।) तो शैतान मनुष्य पर बलपूर्वक कब्जा करने और उसे काबू में करने के लिए कौन-से तरीके इस्तेमाल करता है? क्या तुम लोग इस बारे में स्पष्ट हो? जब तुम लोग ये दो शब्द “बलपूर्वक कब्जा” और “काबू” सुनते हो, तो तुम घृणा महसूस करते हो और तुम्हें इन शब्दों की दुष्टता का एहसास हो सकता है कि बिना तुम्हारी सहमति या जानकारी के शैतान तुम पर कब्ज़ा करता है, तुम्हें काबू में करता है और भ्रष्ट करता है। तुम्हें अपने हृदय में क्या महसूस होता है? क्या तुम्हें घृणा और नाराजगी का अनुभव होता है? (हाँ।) जब तुम्हें शैतान के इन तरीकों से घृणा और नाराजगी का अनुभव होता है, तो परमेश्वर के लिए किस तरह का एहसास होता है? (कृतज्ञता का।) तुम्हें बचाने के लिए परमेश्वर के प्रति कृतज्ञता का। तो अब, इस क्षण, क्या तुम्हारे अंदर यह अभिलाषा या इच्छा है कि परमेश्वर तुम्हें और जो कुछ तुम्हारे पास है, वह सब अपने अधिकार में ले ले और उस पर नियंत्रण कर ले? (हाँ।) किस संदर्भ में तुम ऐसा उत्तर दे रहे हो? क्या तुम इसलिए “हाँ” कहते हो, क्योंकि तुम्हें शैतान द्वारा खुद पर बलपूर्वक कब्जा किए जाने और काबू में किए जाने का डर है? (हाँ।) तुम्हारी मानसिकता इस तरह की नहीं होनी चाहिए; यह सही नहीं है। डरो मत, क्योंकि परमेश्वर यहाँ है। डरने की कोई बात नहीं है। जब तुमने शैतान के दुष्ट सार को समझ लिया है, तो तुम्हारे अंदर परमेश्वर के प्रेम, परमेश्वर के अच्छे इरादों, मनुष्य के लिए परमेश्वर की करुणा और उसकी सहिष्णुता तथा उसके धार्मिक स्वभाव की अधिक सटीक समझ या उन्हें गहराई से सँजोने का भाव होना चाहिए। शैतान इतना घृणित है, लेकिन यदि यह अभी भी परमेश्वर के प्रति तुम्हारे प्रेम और परमेश्वर पर तुम्हारी निर्भरता और परमेश्वर में तुम्हारे भरोसे को प्रेरित नहीं करता, तो तुम किस प्रकार के व्यक्ति हो? क्या तुम इस प्रकार शैतान द्वारा खुद को नुकसान पहुँचाए जाने के इच्छुक हो? शैतान की दुष्टता और भयंकरता को देखने के बाद हम पलटते हैं और तब परमेश्वर को देखते हैं। क्या परमेश्वर के संबंध में तुम्हारी जानकारी में कुछ बदलाव आया है? क्या हम कह सकते हैं परमेश्वर पवित्र है? क्या हम कह सकते हैं कि परमेश्वर दोष-रहित है? “परमेश्वर अद्वितीय पवित्रता है”—क्या परमेश्वर इस उपाधि पर खरा उतरता है? (हाँ।) तो इस संसार में और सब चीजों के मध्य, क्या वह केवल स्वयं परमेश्वर ही नहीं है जो मनुष्य की परमेश्वर संबंधी इस समझ पर खरा उतर सकता है? (हाँ।) तो परमेश्वर मनुष्य को वास्तव में क्या देता है? क्या वह केवल तुम्हारे जाने बिना ही तुम्हें थोड़ी देखभाल, परवाह और ध्यान देता है? परमेश्वर ने मनुष्य को क्या दिया है? परमेश्वर ने मनुष्य को जीवन दिया है, और उसने मनुष्य को सब कुछ दिया है, और वह मनुष्य को यह सब बिना किसी शर्त के, बिना कोई चीज माँगे, बिना किसी गूढ़ प्रयोजन के प्रदान करता है। वह मनुष्य की अगुआई और मार्गदर्शन करने के लिए सत्य, अपने वचनों और अपने जीवन का प्रयोग करते हुए मनुष्य को शैतान के नुकसान से दूर ले जाता है, शैतान के प्रलोभन और बहकावे से दूर ले जाता है और वह मनुष्य को शैतान की दुष्ट प्रकृति और उसका भयंकर चेहरा दिखाता है। क्या मानव-जाति के लिए परमेश्वर का प्रेम और चिंता सच्ची है? क्या तुम सभी लोग इसे अनुभव कर सकते हो? (हाँ।)
—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है IV
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 143
पीछे मुड़कर अपने अब तक के जीवन में उन सब कार्यों को देखो, जिन्हें परमेश्वर ने तुम्हारे विश्वास के इन सभी वर्षों में किया है। यह तुम्हारे भीतर गहरी या उथली कैसी भी भावनाएँ उभारे, पर क्या यह चीज़ तुम्हारे लिए सर्वाधिक आवश्यक नहीं थी? क्या यह वह चीज़ नहीं थी, जिसे प्राप्त करना तुम्हारे लिए सबसे जरूरी था? (हाँ।) क्या यह सत्य नहीं है? क्या यह जीवन नहीं है? (हाँ।) क्या कभी परमेश्वर ने तुम्हें प्रबोधन दिया और फिर तुमसे, जो कुछ उसने तुम्हें दिया है, उसके बदले में कोई चीज़ देने के लिए कहा? (नहीं।) तो परमेश्वर का क्या उद्देश्य है? परमेश्वर ऐसा क्यों करता है? क्या परमेश्वर का उद्देश्य तुम पर कब्ज़ा करना है? (नहीं।) क्या परमेश्वर मनुष्य के हृदय में अपने सिंहासन पर चढ़ना चाहता है? (हाँ।) तो परमेश्वर द्वारा अपने सिंहासन पर चढ़ने और शैतान द्वारा बलपूर्वक कब्ज़ा करने में क्या अंतर है? परमेश्वर मनुष्य के हृदय को पाना चाहता है, वह मनुष्य के हृदय पर कब्ज़ा करना चाहता है—इसका क्या मतलब है? क्या इसका मतलब यह है कि परमेश्वर मनुष्य को अपनी कठपुतली, अपनी मशीन बनाना चाहता है? (नहीं।) तो परमेश्वर का क्या उद्देश्य है? क्या परमेश्वर द्वारा मनुष्य के हृदय पर कब्ज़ा करने की इच्छा करने और शैतान द्वारा बलपूर्वक कब्ज़ा और काबू करने में कोई अंतर है? (हाँ।) क्या अंतर है? क्या तुम लोग मुझे स्पष्ट रूप से बता सकते हो? (शैतान इसे बलपूर्वक करता है, जबकि परमेश्वर मनुष्य को स्वेच्छा से करने देता है।) क्या यही अंतर है? तुम्हारे हृदय का परमेश्वर के लिए क्या उपयोग है? और तुम पर कब्ज़ा करने का परमेश्वर के लिए क्या उपयोग है? तुम लोग अपने दिल में “परमेश्वर मनुष्य के हृदय पर कब्ज़ा करता है” से क्या समझते हो? हमें यहाँ परमेश्वर के बारे में बात करने में ईमानदार होना चाहिए, वरना लोग हमेशा ग़लत समझेंगे और सोचेंगे कि : “परमेश्वर हमेशा मुझ पर कब्ज़ा करना चाहता है। वह मुझ पर कब्ज़ा क्यों करना चाहता है? मैं नहीं चाहता कि कोई मुझ पर कब्ज़ा करे, मैं बस अपना मालिक आप रहना चाहता हूँ। तुम कहते हो, शैतान लोगों पर कब्ज़ा करता है, किंतु परमेश्वर भी तो लोगों पर कब्ज़ा करता है। क्या ये दोनों चीज़ें एक जैसी नहीं हैं? मैं किसी को भी खुद पर कब्ज़ा नहीं करने देना चाहता। मैं, मैं हूँ।” यहाँ अंतर क्या है? इस पर ज़रा सोचो। मैं तुम लोगों से पूछता हूँ, कि क्या “परमेश्वर मनुष्य पर कब्ज़ा करता है” एक खोखला वाक्यांश है? क्या परमेश्वर के मनुष्य पर कब्ज़े का अर्थ है कि परमेश्वर तुम्हारे हृदय में रहता है और तुम्हारे प्रत्येक शब्द और प्रत्येक गतिविधि को नियंत्रित करता है? यदि वह तुमसे बैठने के लिए कहता है, तो क्या तुम खड़े होने की हिम्मत नहीं कर सकते? यदि वह तुमसे पूर्व दिशा में जाने के लिए कहता है, तो क्या तुम पश्चिम दिशा में जाने की हिम्मत नहीं कर सकते? क्या यह कब्ज़ा कुछ ऐसा ही अर्थ रखता है? (नहीं, ऐसा नहीं है। परमेश्वर चाहता है कि मनुष्य परमेश्वर के स्वरूप में जिए।) वर्षों से परमेश्वर द्वारा किए गए गए मनुष्य के प्रबंधन में, और इस अंतिम चरण में अब तक मनुष्य पर किए गए उसके कार्य में, उसके द्वारा बोले गए समस्त वचनों का मनुष्य पर क्या वांछित प्रभाव रहा है? क्या मनुष्य परमेश्वर के स्वरूप में जीता है? “परमेश्वर मनुष्य के हृदय पर कब्ज़ा करता है” के शाब्दिक अर्थ को देखने पर ऐसा प्रतीत होता है, मानो परमेश्वर मनुष्य के हृदय को लेता है और उस पर कब्ज़ा कर लेता है, उसमें रहता है और फिर बाहर नहीं आता; वह मनुष्य का स्वामी बन जाता है और उस पर हावी होकर मनमरजी से उसमें फेरबदल कर देता है, ताकि मनुष्य वही करे, जो परमेश्वर उसे करने के लिए कहे। इस अर्थ में ऐसा प्रतीत होता है, मानो हर व्यक्ति परमेश्वर बन सकता है और उसके सार और स्वभाव को धारण कर सकता है। तो क्या इस स्थिति में मनुष्य भी परमेश्वर के कार्यों को अंजाम दे सकता है? क्या “कब्ज़े” को इस तरीके से समझाया जा सकता है? (नहीं।) तो फिर यह क्या है? मैं तुम लोगों से पूछता हूँ : क्या वे सारे वचन और सत्य, जिनकी परमेश्वर मनुष्य को आपूर्ति करता है, परमेश्वर के सार और स्वरूप के प्रकटीकरण हैं? (हाँ।) यह निश्चित रूप से सच है। किंतु क्या यह अनिवार्य है कि परमेश्वर खुद भी उन सभी वचनों का अभ्यास करे और उन्हें धारण करे, जिनकी वह मनुष्य को आपूर्ति करता है? इस पर थोड़ा विचार करो। जब परमेश्वर मनुष्य का न्याय करता है, तो वह किस कारण से ऐसा करता है? ये वचन कैसे अस्तित्व में आए? इन वचनों की विषय-वस्तु क्या होती है, जब परमेश्वर मनुष्य का न्याय करते समय इन्हें बोलता है? वे किस पर आधारित होते हैं? क्या वे मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव पर आधारित होते हैं? (हाँ।) तो क्या परमेश्वर द्वारा मनुष्य का न्याय किए जाने से हासिल होने वाला प्रभाव परमेश्वर के सार पर आधारित होता है? (हाँ।) तो क्या परमेश्वर द्वारा “मनुष्य पर कब्ज़ा करना” एक खोखला वाक्यांश है? निश्चित रूप से ऐसा नहीं है। तो परमेश्वर मनुष्य से ये वचन क्यों कहता है? इन वचनों को कहने का उसका क्या उद्देश्य है? क्या वह मनुष्य के जीवन के लिए इन वचनों का उपयोग करना चाहता है? (हाँ।) परमेश्वर इन वचनों में कहे अपने समस्त सत्य का उपयोग मनुष्य के जीवन के लिए करना चाहता है। जब मनुष्य इस समस्त सत्य और परमेश्वर के वचन को लेकर उन्हें अपने जीवन में रूपांतरित करता है, तब क्या मनुष्य परमेश्वर को समर्पित हो सकता है? तब क्या मनुष्य परमेश्वर का भय मान सकता है? तब क्या मनुष्य बुराई से दूर रह सकता है? जब मनुष्य इस बिंदु पर पहुँच जाता है, तब क्या वह परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्था को समर्पित हो सकता है? तब क्या मनुष्य परमेश्वर के अधिकार के अधीन होने की स्थिति में होता है? जब अय्यूब या पतरस जैसे लोग अपने मार्ग के अंतिम छोर पर पहुँच जाते हैं, जब यह माना जाता है कि उनका जीवन परिपक्व हो चुका है, जब उनके पास परमेश्वर की वास्तविक समझ होती है—तो क्या शैतान उन्हें तब भी भटका सकता है? क्या शैतान उन पर अभी भी कब्ज़ा कर सकता है? क्या शैतान उन पर अभी भी बलपूर्वक काबू कर सकता है? (नहीं।) तो यह किस प्रकार का व्यक्ति है? क्या यह कोई ऐसा व्यक्ति है, जिसे परमेश्वर द्वारा पूरी तरह से प्राप्त कर लिया गया है। (हाँ।) अर्थ के इस स्तर पर तुम लोग ऐसे व्यक्ति को किस प्रकार देखते हो, जिसे परमेश्वर द्वारा पूरी तरह से प्राप्त कर लिया गया है? परमेश्वर के दृष्टिकोण से, इन परिस्थितियों के अंतर्गत वह इस व्यक्ति के हृदय पर पहले ही कब्ज़ा कर चुका है। किंतु यह व्यक्ति कैसा महसूस करता है? क्या परमेश्वर का वचन, परमेश्वर का अधिकार और परमेश्वर का मार्ग मनुष्य के भीतर उसका जीवन बन जाता है, फिर यह जीवन मनुष्य के संपूर्ण अस्तित्व पर काबिज़ हो जाता है और फिर यह उसके जीवन और उसके सार को ऐसा बना देता है, जो परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए पर्याप्त होता है? क्या परमेश्वर के दृष्टिकोण से इस क्षण मनुष्य के हृदय पर उसके द्वारा कब्ज़ा कर लिया जाता है? (हाँ।) अब तुम लोग इस स्तर के अर्थ को कैसा समझते हो? क्या यह परमेश्वर का आत्मा है, जो तुम पर कब्ज़ा करता है? (नहीं, वह परमेश्वर का वचन है, जो हम पर कब्ज़ा करता है।) यह परमेश्वर का मार्ग और परमेश्वर का वचन है, जो तुम्हारा जीवन बन गए हैं, और यह सत्य है, जो तुम्हारा जीवन बन गया है। इस समय मनुष्य के पास वह जीवन होता है, जो परमेश्वर से आता है, किंतु हम यह नहीं कह सकते कि यह जीवन परमेश्वर का जीवन है। दूसरे शब्दों में, हम यह नहीं कह सकते कि मनुष्य द्वारा परमेश्वर के वचन से प्राप्त किया जाने वाला जीवन परमेश्वर का जीवन है। अतः चाहे मनुष्य कितने ही लंबे समय तक परमेश्वर का अनुसरण कर ले, चाहे मनुष्य परमेश्वर से कितने ही वचन प्राप्त कर ले, मनुष्य कभी परमेश्वर नहीं बन सकता। यहाँ तक कि यदि परमेश्वर किसी दिन यह कहे, “मैंने तेरे हृदय पर कब्ज़ा कर लिया है, अब तू मेरे जीवन को धारण करता है,” तो क्या तुम्हें यह लगेगा कि तुम परमेश्वर हो? (नहीं।) तब तुम क्या बन जाओगे? क्या तुम्हारे अंदर परमेश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण नहीं होगा? क्या तुम्हारा हृदय उस जीवन से नहीं भर जाएगा, जिसे परमेश्वर ने तुम्हें प्रदान किया है? यह इस बात की एक सामान्य अभिव्यक्ति होगी कि जब परमेश्वर मनुष्य के हृदय पर कब्ज़ा करता है, तो क्या होता है। यह तथ्य है। तो इसे इस पहलू से देखने पर, क्या मनुष्य परमेश्वर बन सकता है? जब मनुष्य परमेश्वर के वचनों की वास्तविकता को जीने में सक्षम हो जाता है, और ऐसा व्यक्ति बन जाता है जो परमेश्वर का भय मानता है और बुराई से दूर रहता है, तब क्या मनुष्य में परमेश्वर का जीवन सार और पवित्रता हो सकती है? बिल्कुल नहीं। चाहे कुछ भी हो जाए, मनुष्य अंततः मनुष्य ही रहता है। तुम एक सृजित प्राणी हो; जब तुम परमेश्वर से उसका वचन और परमेश्वर का मार्ग प्राप्त कर लेते हो, तो तुम केवल उस जीवन को धारण करते हो, जो परमेश्वर के वचनों से आता है, तुम ऐसे व्यक्ति बन जाते हो जिसकी परमेश्वर द्वारा प्रशंसा की जाती है, लेकिन तुम्हारे पास कभी भी परमेश्वर का जीवन सार नहीं होगा, परमेश्वर की पवित्रता तो बिल्कुल भी नहीं होगी।
—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है IV
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 144
शैतान का प्रलोभन (चुने हुए अंश)
मत्ती 4:1-4 तब आत्मा यीशु को जंगल में ले गया ताकि इब्लीस से उस की परीक्षा हो। वह चालीस दिन, और चालीस रात, निराहार रहा, तब उसे भूख लगी। तब परखनेवाले ने पास आकर उस से कहा, “यदि तू परमेश्वर का पुत्र है, तो कह दे, कि ये पत्थर रोटियाँ बन जाएँ।” यीशु ने उत्तर दिया : “लिखा है, ‘मनुष्य केवल रोटी ही से नहीं, परन्तु हर एक वचन से जो परमेश्वर के मुख से निकलता है, जीवित रहेगा।’”
ये वे वचन हैं, जिनसे इब्लीस ने पहली बार प्रभु यीशु को प्रलोभित करने का प्रयास किया था। इब्लीस ने जो कहा था, उसकी विषयवस्तु क्या है? (“यदि तू परमेश्वर का पुत्र है, तो कह दे, कि ये पत्थर रोटियाँ बन जाएँ।”) इब्लीस द्वारा कहे गए ये शब्द काफी साधारण हैं, किंतु क्या इनके सार के साथ कोई समस्या है? इब्लीस ने कहा, “यदि तू परमेश्वर का पुत्र है,” लेकिन अपने दिल में वह जानता था या नहीं कि यीशु परमेश्वर का पुत्र है? वह जानता था या नहीं कि वह मसीह है? (वह जानता था।) तो उसने ऐसा क्यों कहा “यदि तू है”? (वह परमेश्वर को प्रलोभित करने का प्रयास कर रहा था।) किंतु ऐसा करने में उसका क्या उद्देश्य था? उसने कहा, “यदि तू परमेश्वर का पुत्र है।” अपने दिल में वह जानता था कि यीशु मसीह परमेश्वर का पुत्र है, यह उसके दिल में बहुत स्पष्ट था, किंतु यह जानने के बावजूद, क्या उसने उसके सामने समर्पण किया या उसकी आराधना की? (नहीं।) वह क्या करना चाहता था? वह मसीह को क्रोध दिलाने और फिर अपने इरादों के अनुसार कार्य करवाने में प्रभु यीशु को मूर्ख बनाने के लिए इस पद्धति और इन वचनों का उपयोग करना चाहता था। क्या इब्लीस के शब्दों के पीछे यही अर्थ नहीं था? अपने दिल में शैतान स्पष्ट रूप से जानता था कि यह प्रभु यीशु मसीह है, किंतु उसने फिर भी ये शब्द कहे। क्या यह शैतान की प्रकृति नहीं है? शैतान की प्रकृति क्या है? (धूर्त, दुष्ट होना और परमेश्वर का कोई भय न मानना।) परमेश्वर का कोई भय न मानने के क्या परिणाम होंगे? क्या वह परमेश्वर पर हमला नहीं करना चाहता था? वह इस तरीके का उपयोग परमेश्वर पर हमला करने के लिए करना चाहता था, और इसलिए उसने कहा, “यदि तू परमेश्वर का पुत्र है, तो कह दे, कि ये पत्थर रोटियाँ बन जाएँ”; क्या यह शैतान की बुरी नीयत नहीं है? वह वास्तव में क्या करने का प्रयास कर रहा था? उसका उद्देश्य बिल्कुल स्पष्ट है : वह इस तरीके का उपयोग प्रभु यीशु मसीह के पद और पहचान को नकारने के लिए करने की कोशिश कर रहा था। उन शब्दों से शैतान का आशय यह था कि, “अगर तू परमेश्वर का पुत्र है, तो इन पत्थरों को रोटियों में बदल दे। अगर तू ऐसा नहीं कर सकता, तो तू परमेश्वर का पुत्र नहीं है, इसलिए तुझे अपना काम अब और नहीं करना चाहिए।” क्या ऐसा नहीं है? वह इस तरीके का उपयोग परमेश्वर पर हमला करने के लिए करना चाहता था, और वह परमेश्वर के काम को खंडित और नष्ट करना चाहता था; यह शैतान का द्वेष है। उसका द्वेष उसकी प्रकृति की स्वाभाविक अभिव्यक्ति है। यद्यपि वह जानता था कि प्रभु यीशु मसीह परमेश्वर का पुत्र, स्वयं परमेश्वर का ही देहधारण है, फिर भी वह परमेश्वर का पीछा करते हुए, उस पर लगातार आक्रमण करते हुए और उसके कार्य में विघ्न डालने और उसे नष्ट करने का भरसक प्रयास करते हुए इस प्रकार का काम करने से बाज नहीं आता।
अब, आओ शैतान द्वारा बोले गए इस वाक्यांश का विश्लेषण करें : “तो कह दे, कि ये पत्थर रोटियाँ बन जाएँ।” पत्थरों को रोटी में बदलना—क्या इसका कुछ अर्थ है? अगर वहाँ भोजन है, तो क्यों न उसे खाया जाए? पत्थरों को भोजन में बदलना क्यों आवश्यक है? क्या यह कहा जा सकता है कि यहाँ कोई अर्थ नहीं है? यद्यपि वह उस समय उपवास कर रहा था, फिर भी क्या निश्चित रूप से प्रभु यीशु के पास खाने को भोजन था? (उसके पास भोजन था।) तो हम यहाँ शैतान के शब्दों की असंगति देख सकते हैं। शैतान की सारी दुष्टता और कपट के बावजूद हम उसकी असंगति और बेतुकापन देख सकते हैं। शैतान बहुत सारी चीज़ें करता है, जिसके माध्यम से तुम उसकी द्वेषपूर्ण प्रकृति को देख सकते हो; तुम उसे वैसी चीज़ें करते देख सकते हो, जो परमेश्वर के कार्य को खंडित करती हैं, और यह देखकर तुम अनुभव करते हो कि वह घृणित और कुपित करने वाला है। किंतु दूसरी ओर, क्या तुम उसके शब्दों और कार्यों के पीछे एक बचकानी और बेहूदी प्रकृति नहीं देखते? यह शैतान की प्रकृति के बारे में एक प्रकाशन है; चूँकि उसकी ऐसी प्रकृति है, इसलिए वह ऐसे ही काम करेगा। आज लोगों के लिए शैतान के ये शब्द असंगत और हास्यास्पद हैं। किंतु शैतान बेशक ऐसे शब्द कहने में सक्षम है। क्या हम कह सकते हैं कि वह अज्ञानी और बेतुका है? शैतान की दुष्टता हर जगह है और लगातार प्रकट हो रही है। और प्रभु यीशु ने उसे कैसे उत्तर दिया? (“मनुष्य केवल रोटी ही से नहीं, परन्तु हर एक वचन से जो परमेश्वर के मुख से निकलता है, जीवित रहेगा।”) क्या इन वचनों में कोई सामर्थ्य है? (उनमें सामर्थ्य है।) हम क्यों कहते हैं कि उनमें सामर्थ्य है? वह इसलिए, क्योंकि ये वचन सत्य हैं। अब, क्या मनुष्य केवल रोटी से जीवित रहता है? प्रभु यीशु ने चालीस दिन और रात उपवास किया। क्या वह भूख से मर गया? वह भूख से नहीं मरा, इसलिए शैतान उसके पास गया और उसे इस तरह की बातें कहते हुए पत्थरों को भोजन में बदलने के लिए उकसाया : “अगर तू पत्थरों को खाने में बदल देगा, तो क्या तब तेरे पास खाने की चीज़ें नहीं होंगी? तब तुझे उपवास नहीं करना पड़ेगा, भूखा नहीं रहना पड़ेगा!” किंतु प्रभु यीशु ने कहा, “मनुष्य केवल रोटी ही से नहीं जीवित रहेगा,” जिसका अर्थ है कि, यद्यपि मनुष्य भौतिक शरीर में रहता है, किंतु उसका भौतिक शरीर भोजन से नहीं, बल्कि परमेश्वर के मुख से निकले प्रत्येक वचन से जीवित रहता और साँस लेता है। एक ओर, ये वचन सत्य हैं; ये लोगों को विश्वास देते हैं, उन्हें यह महसूस कराते हैं कि वे परमेश्वर पर निर्भर रह सकते हैं और कि वह सत्य है। दूसरी ओर, क्या इन वचनों का कोई व्यावहारिक पहलू है? क्या प्रभु यीशु चालीस दिन और रात उपवास करने के बाद भी खड़ा नहीं था, जीवित नहीं था? क्या यह एक वास्तविक उदाहरण नहीं है? उसने चालीस दिन और रात कोई भोजन नहीं किया था, और वह फिर भी ज़िंदा था। यह सशक्त गवाही है, जो उसके वचनों की सच्चाई की पुष्टि करती है। ये वचन सरल है, किंतु क्या प्रभु यीशु ने इन्हें केवल तभी बोला जब शैतान ने उसे प्रलोभित किया, या ये पहले से ही प्राकृतिक रूप से उसका एक हिस्सा थे? इसे दूसरी तरह से कहें तो, परमेश्वर सत्य है, और परमेश्वर जीवन है, लेकिन क्या परमेश्वर का सत्य और जीवन बाद के जोड़ थे? क्या वे बाद के अनुभव से उत्पन्न हुए थे? नहीं—वे परमेश्वर में जन्मजात थे। कहने का तात्पर्य यह है कि सत्य और जीवन परमेश्वर के सार हैं। उस पर चाहे जो भी बीते, वह सब सत्य ही प्रकट करता है। यह सत्य, ये वचन—चाहे उसकी वाणी की अंतर्वस्तु लंबी हो या छोटी—वे मनुष्य को जीने में सक्षम बना सकते हैं और उसे जीवन दे सकते हैं; वे लोगों को मानव-जीवन के मार्ग के बारे में सत्य और स्पष्टता हासिल करने में सक्षम बना सकते हैं, और उन्हें परमेश्वर पर विश्वास करने में सक्षम बना सकते हैं। दूसरे शब्दों में, परमेश्वर द्वारा इन वचनों के प्रयोग का स्रोत सकारात्मक है। तो क्या हम कह सकते हैं कि यह सकारात्मक चीज़ पवित्र है? (हाँ।) शैतान के वे शब्द शैतान की प्रकृति से आते हैं। शैतान हर जगह लगातार अपनी दुष्ट और द्वेषपूर्ण प्रकृति प्रकट करता रहता है। अब, क्या शैतान ये प्रकाशन स्वाभाविक रूप से करता है? क्या कोई उसे ऐसा करने का निर्देश देता है? क्या कोई उसकी सहायता करता है? क्या कोई उसे विवश करता है? नहीं। ये सब प्रकाशन वह स्वतः करता है। यह शैतान की दुष्ट प्रकृति है। जो कुछ भी परमेश्वर करता है और जैसे भी करता है, शैतान उसके पीछे-पीछे चलता है। शैतान द्वारा कही और की जाने वाली इन चीज़ों का सार और उनकी वास्तविक प्रकृति शैतान का सार है—ऐसा सार, जो दुष्ट और द्वेषपूर्ण है।
—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है V
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 145
शैतान का प्रलोभन (चुने हुए अंश)
मत्ती 4:5-7 तब इब्लीस उसे पवित्र नगर में ले गया और मन्दिर के कंगूरे पर खड़ा किया, और उससे कहा, “यदि तू परमेश्वर का पुत्र है, तो अपने आप को नीचे गिरा दे; क्योंकि लिखा है : ‘वह तेरे विषय में अपने स्वर्गदूतों को आज्ञा देगा, और वे तुझे हाथों-हाथ उठा लेंगे; कहीं ऐसा न हो कि तेरे पाँवों में पत्थर से ठेस लगे।’” यीशु ने उससे कहा, “यह भी लिखा है : ‘तू प्रभु अपने परमेश्वर की परीक्षा न कर।’”
आओ, पहले शैतान द्वारा यहाँ कहे गए शब्दों को देखें। शैतान ने कहा, “यदि तू परमेश्वर का पुत्र है, तो अपने आप को नीचे गिरा दे,” और तब उसने पवित्र शास्त्र से उद्धृत किया, “वह तेरे विषय में अपने स्वर्गदूतों को आज्ञा देगा, और वे तुझे हाथों-हाथ उठा लेंगे; कहीं ऐसा न हो कि तेरे पाँवों में पत्थर से ठेस लगे।” शैतान के शब्द सुनकर तुम्हें कैसा लगता है? क्या वे बहुत बचकाने नहीं हैं? वे बचकाने, असंगत और घृणास्पद हैं। मैं ऐसा क्यों कहता हूँ? शैतान अक्सर मूर्खतापूर्ण बातें करता रहता है, और वह स्वयं को बहुत चतुर मानता है। वह प्रायः पवित्र शास्त्र के उद्धरण—यहाँ तक कि परमेश्वर द्वारा कहे गए वचन भी—उद्धृत करता है, वह परमेश्वर पर आक्रमण करने और उसे प्रलोभित करने के लिए इन वचनों का उपयोग परमेश्वर के विरुद्ध करने का प्रयास करता है, ताकि उसकी कार्य-योजना को खंडित करने का अपना उद्देश्य पूरा कर सके। क्या तुम शैतान द्वारा कहे गए इन शब्दों में कुछ देख पाते हो? (शैतान दुष्ट इरादे रखता है।) शैतान ने अपने समस्त कार्यों में हमेशा मानवजाति को प्रलोभित करने की कोशिश की है। वह सीधे तौर पर नहीं बोलता, बल्कि प्रलोभन, उकसावे और फरेब का उपयोग करते हुए गोल-मोल तरीके से बोलता है। शैतान परमेश्वर को भी प्रलोभन देने की कोशिश करता है, मानो वह कोई साधारण मनुष्य हो, और वह यह मानता है कि परमेश्वर भी मनुष्य की ही तरह अज्ञानी, मूर्ख और चीज़ों के सही रूप को स्पष्ट रूप से पहचानने में असमर्थ है। शैतान सोचता है कि परमेश्वर और मनुष्य समान रूप से उसके सार, उसकी चालाकी और उसके कुटिल इरादे को आर-पार देख पाने में असमर्थ हैं। क्या यह शैतान की मूर्खता नहीं है? इतना ही नहीं, शैतान खुल्लम-खुल्ला पवित्र शास्त्र को उद्धृत करता है, और यह विश्वास करता है कि ऐसा करने से उसे विश्वसनीयता मिलती है, और तुम उसके शब्दों में कोई गलती नहीं पकड़ पाओगे या मूर्ख बनाए जाने से नहीं बच पाओगे। क्या यह शैतान की मूर्खता और बचकानापन नहीं है? यह ठीक वैसा ही है, जैसा जब लोग सुसमाचार को फैलाते हैं और परमेश्वर की गवाही देते हैं : तो क्या अविश्वासी कुछ ऐसा ही नहीं कहते, जैसा शैतान ने कहा था? क्या तुम लोगों ने लोगों को वैसा ही कुछ कहते हुए सुना है? ऐसी बातें सुनकर तुम्हें कैसा लगता है? क्या तुम घृणा महसूस करते हो? (हाँ।) जब तुम घृणा महसूस करते हो, तो क्या तुम अरुचि और विरक्ति भी महसूस करते हो? जब तुम्हारे भीतर ऐसी भावनाएँ होती हैं, तो क्या तुम यह पहचान पाते हो कि शैतान, और मनुष्य के भीतर काम करने वाला उसका स्वभाव, दुष्ट हैं? क्या अपने दिलों में तुमने कभी ऐसा महसूस किया है : “जब शैतान बोलता है, तो वह ऐसा हमले और प्रलोभन के रूप में करता है; शैतान के शब्द बेतुके, हास्यास्पद, बचकाने और घृणास्पद होते हैं; लेकिन परमेश्वर कभी इस तरह से नहीं बोलता या कार्य करता और वास्तव में उसने कभी ऐसा नहीं किया है”? निस्संदेह, इस स्थिति में लोग इसे बहुत कम समझ पाते हैं और परमेश्वर की पवित्रता को समझने में असमर्थ रहते हैं। अपने वर्तमान आध्यात्मिक कद के साथ तुम लोग मात्र यही महसूस करते हो : “परमेश्वर जो कुछ भी कहता है, सच कहता है, वह हमारे लिए लाभदायक है, और हमें उसे स्वीकार करना चाहिए।” चाहे तुम इसे स्वीकार करने में सक्षम हो या नहीं, बिना अपवाद के तुम कहते हो कि परमेश्वर का वचन सत्य है और यह कि परमेश्वर सत्य है, किंतु तुम यह नहीं जानते कि सत्य स्वयं पवित्र है और यह कि परमेश्वर पवित्र है।
तो शैतान के इन शब्दों पर यीशु की क्या प्रतिक्रिया थी? यीशु ने उससे कहा, “यह भी लिखा है : ‘तू प्रभु अपने परमेश्वर की परीक्षा न कर।’” क्या यीशु द्वारा कहे गए इन वचनों में सत्य है? निश्चित रूप से है। ऊपरी तौर पर ये वचन लोगों द्वारा अनुसरण किए जाने के लिए एक आदेश हैं, एक सरल वाक्यांश, परंतु फिर भी, मनुष्य और शैतान दोनों ने अक्सर इन वचनों का उल्लंघन किया है। तो, प्रभु यीशु ने शैतान से कहा, “तू प्रभु अपने परमेश्वर की परीक्षा न कर,” क्योंकि शैतान ने प्रायः ऐसा किया था, बिना थके ऐसा किया था, और यह कहा जा सकता है कि शैतान ने बेशर्मी और ढिठाई से ऐसा किया था। परमेश्वर से न डरना और परमेश्वर का भय मानने वाला हृदय न रखना शैतान का प्रकृति सार है। यहाँ तक कि जब शैतान परमेश्वर के पास खड़ा था और उसे देख सकता था, फिर भी वह स्वयं को परमेश्वर की परीक्षा लेने से रोक नहीं सका। इसलिए प्रभु यीशु ने शैतान से कहा, “तू प्रभु अपने परमेश्वर की परीक्षा न कर।” ये वे वचन हैं, जो परमेश्वर ने शैतान से प्रायः कहे हैं। तो क्या इस वाक्यांश को वर्तमान समय में लागू किया जाना उपयुक्त है? (हाँ, क्योंकि हम भी अक्सर परमेश्वर की परीक्षा लेते हैं।) लोग अक्सर परमेश्वर की परीक्षा क्यों लेते हैं? क्या इसका कारण यह नहीं है कि लोग शैतान के भ्रष्ट स्वभावों से भरे हुए हैं? (हाँ।) तो क्या शैतान के उपर्युक्त शब्द ऐसे नहीं हैं, जिन्हें लोग प्रायः कहते हैं? और लोग इन शब्दों को किन स्थितियों में कहते हैं? कोई यह कह सकता है कि लोग समय और स्थान की परवाह किए बिना ऐसा कहते आ रहे हैं। यह सिद्ध करता है कि लोगों का स्वभाव शैतान के भ्रष्ट स्वभाव से अलग नहीं है। प्रभु यीशु ने कुछ सरल वचन कहे; वचन, जो सत्य का प्रतिनिधित्व करते हैं; वचन, जिनकी लोगों को आवश्यकता है। लेकिन क्या प्रभु यीशु शैतान से जरा भी बहस कर रहा था? क्या जो कुछ उसने शैतान से कहा, उसमें टकराव की कोई बात थी? (नहीं।) प्रभु यीशु ने शैतान के प्रलोभन के संबंध में अपने दिल में कैसा महसूस किया? क्या उसने वितृष्णा और घृणा महसूस की? प्रभु यीशु ने घृणा और वितृष्णा महसूस की, फिर भी उसने शैतान से बहस नहीं की, किन्हीं महान सिद्धांतों के बारे में तो उसने बिल्कुल भी बात नहीं की। ऐसा क्यों है? (क्योंकि शैतान हमेशा से ऐसा ही है; वह कभी बदल नहीं सकता।) क्या यह कहा जा सकता है कि शैतान विवेकहीन है? (हाँ।) क्या शैतान पहचान सकता है कि परमेश्वर सत्य है? शैतान कभी नहीं पहचानेगा कि परमेश्वर सत्य है और कभी स्वीकार नहीं करेगा कि परमेश्वर सत्य है; यह उसकी प्रकृति है। शैतान की प्रकृति का एक और पहलू है, जो घृणास्पद है। वह क्या है? प्रभु यीशु को प्रलोभित करने के अपने प्रयासों में शैतान ने सोचा कि भले ही वह असफल हो जाए, फिर भी वह ऐसा करने का प्रयास करेगा। भले ही उसे दंडित किया जाएगा, फिर भी, वह किसी न किसी प्रकार से कोशिश करेगा। भले ही ऐसा करने से कुछ लाभ नहीं होगा, फिर भी वह कोशिश करेगा, और अपने प्रयासों में दृढ़ रहते हुए बिल्कुल अंत तक परमेश्वर का विरोध करेगा। यह किस तरह की प्रकृति है? क्या यह दुष्टता नहीं है? मान लो कोई व्यक्ति परमेश्वर का उल्लेख होने पर आग-बबूला हो जाता है या क्रोधित हो जाता है : क्या उसने परमेश्वर को देखा है? क्या वह जानता है कि परमेश्वर कौन है? वह नहीं जानता कि परमेश्वर कौन है, वह उसमें विश्वास नहीं करता, परमेश्वर ने उससे बात नहीं की है और परमेश्वर ने उसे कभी उकसाया नहीं है—तो वह क्रोधित क्यों होगा? क्या हम कह सकते हैं कि यह व्यक्ति दुष्ट है? सांसारिक प्रवृत्तियाँ, खाना-पीना, मौज-मस्ती और मशहूर हस्तियों की पूजा—इनमें से कोई भी चीज ऐसे व्यक्ति को क्रोधित नहीं करेगी। लेकिन, केवल “परमेश्वर” शब्द का उल्लेख होने पर या परमेश्वर के वचनों के सत्य का उल्लेख होने पर ही वह क्रोधित हो जाता है। क्या यह एक दुष्ट प्रकृति नहीं है? यह इस बात को साबित करने के लिए पर्याप्त है कि यह उसकी दुष्ट प्रकृति है। इस बारे में सोचो कि क्या तुम लोग कभी ऐसे समय का अनुभव करते हो : जब सत्य का उल्लेख किया जाता है या जब परमेश्वर द्वारा मनुष्य के परीक्षणों या मनुष्य का न्याय करने वाले परमेश्वर के वचनों का उल्लेख किया जाता है, तो तुम लोग अरुचि या एक प्रकार की घृणा महसूस करते हो और तुम ऐसी चीजें सुनना नहीं चाहते और सोचते हो, “क्या सभी लोग यह नहीं कहते कि परमेश्वर सत्य है? उसके कुछ वचन सत्य नहीं हैं! वे स्पष्ट रूप से परमेश्वर के ऐसे वचन हैं जो केवल मनुष्य को डाँटने के लिए हैं!” यहाँ तक कि तुममें से कुछ लोग अपने दिलों में अरुचि भी महसूस करते हैं और सोचते हैं, “इसके बारे में हर दिन बात की जाती है—उसके परीक्षण, उसका न्याय, यह कब खत्म होगा? हमें अच्छी मंजिल कब मिलेगी?” यह अकथनीय क्रोध अचानक आ जाता है। यह किस प्रकार की प्रकृति है? (दुष्ट प्रकृति।) यह शैतान की दुष्ट प्रकृति द्वारा निर्देशित होता है। परमेश्वर के परिप्रेक्ष्य से, शैतान की दुष्ट प्रकृति और मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव के संबंध में वह कभी बहस नहीं करता या लोगों के प्रति द्वेष नहीं रखता, और जब मनुष्य मूर्खतापूर्ण कार्य करते हैं, तो वह कभी बात का बतंगड़ नहीं बनाता। तुम परमेश्वर को चीज़ों के संबंध में मनुष्यों जैसे विचार रखते नहीं देखोगे, और इतना ही नहीं, उसे तुम चीज़ों को सँभालने के लिए मनुष्य के दृष्टिकोणों, ज्ञान, विज्ञान, दर्शन या कल्पना का उपयोग करते हुए भी नहीं देखोगे। इसके बजाय, परमेश्वर जो कुछ भी करता है और जो कुछ भी वह प्रकट करता है, वह सत्य से जुड़ा है। अर्थात्, उसका कहा हर वचन और उसका किया हर कार्य सत्य से संबंधित है। यह सत्य किसी आधारहीन कल्पना की उपज नहीं है; यह सत्य और ये वचन परमेश्वर द्वारा अपने सार और अपने जीवन के आधार पर व्यक्त किए जाते हैं। चूँकि ये वचन और परमेश्वर द्वारा की गई हर चीज का सार सत्य हैं, इसलिए हम कह सकते हैं कि परमेश्वर का सार पवित्र है। दूसरे शब्दों में, प्रत्येक बात जो परमेश्वर कहता और करता है, वह लोगों के लिए जीवन-शक्ति और प्रकाश लाती है; वह लोगों को सकारात्मक चीजें और उन सकारात्मक चीजों की वास्तविकता देखने में सक्षम बनाती है, और मनुष्यों को राह दिखाती है, ताकि वे सही मार्ग पर चलें। ये सब चीजें परमेश्वर के सार और उसकी पवित्रता के सार द्वारा निर्धारित की जाती हैं।
—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है V
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 146
शैतान का प्रलोभन (चुने हुए अंश)
मत्ती 4:8-11 फिर इब्लीस उसे एक बहुत ऊँचे पहाड़ पर ले गया और सारे जगत के राज्य और उसका वैभव दिखाकर उससे कहा, “यदि तू गिरकर मुझे प्रणाम करे, तो मैं यह सब कुछ तुझे दे दूँगा।” तब यीशु ने उससे कहा, “हे शैतान दूर हो जा, क्योंकि लिखा है : तू प्रभु अपने परमेश्वर को प्रणाम कर, और केवल उसी की उपासना कर।” तब शैतान उसके पास से चला गया, और देखो, स्वर्गदूत आकर उसकी सेवा करने लगे।
दुष्ट शैतान ने अपनी पिछली दो चालों में असफल होने के बाद एक और कोशिश की : उसने प्रभु यीशु को दुनिया के समस्त राज्य और उनका वैभव दिखाया और उससे अपनी आराधना करने के लिए कहा। इस स्थिति से तुम दानव के वास्तविक चेहरे के बारे में क्या देख सकते हो? क्या दुष्ट शैतान पूरी तरह से बेशर्म नहीं है? (हाँ, है।) वह कैसे बेशर्म है? सभी चीज़ें परमेश्वर द्वारा रची गई थीं, फिर भी शैतान ने पलटकर परमेश्वर को सारी चीज़ें दिखाईं और कहा, “इन सभी राज्यों की संपत्ति और वैभव देख। अगर तू मेरी उपासना करे, तो मैं यह सब तुझे दे दूँगा।” क्या यह पूरी तरह से भूमिका उलटना नहीं है? क्या शैतान बेशर्म नहीं है? परमेश्वर ने सारी चीज़ें बनाईं, पर क्या वह इन चीजों का आनंद लेता है? परमेश्वर ने सारी चीजें मनुष्य को प्रदान कर दीं, लेकिन शैतान उन पर कब्जा करना चाहता था और उन पर कब्जा करने के बाद उसने परमेश्वर से कहा, “मेरी आराधना कर! मेरी आराधना कर और मैं यह सब तुझे दे दूँगा।” यह शैतान का बदसूरत चेहरा है; वह पूर्णतः बेशर्म है! यहाँ तक कि शैतान “शर्म” शब्द का मतलब भी नहीं जानता। यह उसकी दुष्टता का सिर्फ एक और उदाहरण है। वह यह भी नहीं जानता कि “शर्म” क्या होती है। शैतान स्पष्ट रूप से जानता है कि परमेश्वर ने सारी चीज़ें बनाईं और वह सभी चीजों का प्रबंधन करता है और उन पर संप्रभु है। वह जानता है कि सारी चीज़ें मनुष्य की नहीं हैं, शैतान की तो बिल्कुल भी नहीं हैं, बल्कि परमेश्वर की हैं, और फिर भी दुष्ट शैतान ने ढिठाई से कहा कि वह सारी चीज़ें परमेश्वर को दे देगा। क्या यह शैतान के बेतुकेपन और बेशर्मी से कार्य करने का एक और उदाहरण नहीं है? इसके कारण परमेश्वर को शैतान से और अधिक घृणा हुई, है न? फिर भी, शैतान ने चाहे जो भी कोशिश की, पर क्या प्रभु यीशु उसके झाँसे में आया? प्रभु यीशु ने क्या कहा? (“तू प्रभु अपने परमेश्वर को प्रणाम कर, और केवल उसी की उपासना कर।”) क्या इन वचनों का कोई व्यावहारिक अर्थ है? (हाँ, है।) किस प्रकार का व्यवहारिक अर्थ? हम शैतान की वाणी में उसकी दुष्टता और बेशर्मी देखते हैं। तो अगर मनुष्य शैतान की उपासना करेगा, तो क्या परिणाम होगा? क्या उसे सभी राज्यों का धन और वैभव मिल जाएगा? (नहीं।) उसे क्या मिलेगा? क्या वह शैतान जितना ही बेशर्म और हास्यास्पद बन जाएगा? (हाँ।) तब वह शैतान से भिन्न नहीं होगा। इसलिए, प्रभु यीशु के ये वचन हर व्यक्ति के लिए महत्वपूर्ण हैं : “तू प्रभु अपने परमेश्वर को प्रणाम कर, और केवल उसी की उपासना कर।” इसका अर्थ है कि प्रभु के अलावा, स्वयं परमेश्वर के अलावा, अगर तुम किसी दूसरे की उपासना करते हो, अगर तुम दुष्ट शैतान की उपासना करते हो, तो तुम उसी गंदगी में लोट लगाओगे, जिसमें शैतान लगाता है। तब तुम शैतान की बेशर्मी और उसकी दुष्टता साझा करोगे, और ठीक शैतान की ही तरह तुम परमेश्वर की परीक्षा लोगे और उस पर हमला करोगे। तब तुम्हारा क्या परिणाम होगा? परमेश्वर तुमसे घृणा करेगा, परमेश्वर तुम्हें मार गिराएगा और परमेश्वर तुम्हें नष्ट कर देगा। प्रभु यीशु को कई बार प्रलोभन देने में असफल होने के बाद क्या शैतान ने फिर कोशिश की? शैतान ने फिर कोशिश नहीं की और फिर वह चला गया। इससे क्या साबित होता है? इससे यह साबित होता है कि शैतान की दुष्ट प्रकृति, उसकी दुर्भावना, उसकी बेहूदगी और उसकी असंगतता परमेश्वर के सामने उल्लेख करने योग्य भी नहीं हैं। प्रभु यीशु ने शैतान को केवल तीन वाक्यों से परास्त कर दिया, जिसके बाद वह दुम दबाकर खिसक गया, और इतना शर्मिंदा हुआ कि चेहरा दिखाने लायक भी नहीं रहा, और उसने दोबारा प्रभु को प्रलोभन नहीं दिया। चूँकि प्रभु यीशु ने शैतान के इस प्रलोभन को परास्त कर दिया, इसलिए अब वह बिना रुकावट के वह कार्य जारी रख सकता था जो उसे करना था, वह कार्य जो उसे अपने कंधे पर लेना था। क्या इस परिस्थिति में जो कुछ प्रभु यीशु ने कहा और किया, वह वर्तमान समय में प्रत्येक मनुष्य के लिए कोई व्यावहारिक अर्थ रखता है? (हाँ।) किस प्रकार का व्यावहारिक अर्थ? क्या शैतान को हराना आसान बात है? क्या लोगों को शैतान की दुष्ट प्रकृति की स्पष्ट समझ होनी चाहिए? क्या लोगों को शैतान के प्रलोभनों की सही समझ होनी चाहिए? (हाँ।) जब तुम शैतान के प्रलोभनों का अनुभव करते हो, तब यदि तुम शैतान की दुष्ट प्रकृति की असलियत जानने में सक्षम होते हो, तो क्या तुम उसे हराने में सक्षम नहीं होगे? यदि तुम शैतान की बेहूदगी और असंगतता के बारे में जानते हो, तो क्या तुम अभी भी शैतान के पक्ष में खड़े होगे और परमेश्वर पर हमला करोगे? यदि तुम समझते हो कि शैतान की दुर्भावना और बेशर्मी तुममें प्रकट होती हैं—यदि तुम इस तथ्य को स्पष्ट रूप से पहचानते और समझते हो—तो क्या तुम अभी भी इस तरह से परमेश्वर पर हमला करोगे और उसकी परीक्षा लोगे? (नहीं, हम ऐसा नहीं करेंगे।) तुम क्या करोगे? (हम शैतान के खिलाफ विद्रोह करेंगे और उसे त्याग देंगे।) क्या यह आसान कार्य है? यह आसान नहीं है। ऐसा करने के लिए लोगों को लगातार प्रार्थना करनी चाहिए, उन्हें बार-बार परमेश्वर के सामने आना चाहिए और अपनी जाँच करनी चाहिए। और उन्हें परमेश्वर के अनुशासन और उसके न्याय तथा ताड़ना को अपने ऊपर आने देना चाहिए। केवल इसी तरह से लोग धीरे-धीरे अपने आपको शैतान द्वारा गुमराह किए जाने और नियंत्रित किए जाने से मुक्त कर पाएँगे।
अब, शैतान द्वारा बोले गए इन सभी शब्दों को देखकर हम उन चीजों को संक्षेप में प्रस्तुत करेंगे, जो शैतान के सार का निर्माण करती हैं। पहली बात, शैतान के सार को सामान्यतया दुष्टता कहा जा सकता है, जो परमेश्वर की पवित्रता के विपरीत है। मैं क्यों कहता हूँ कि शैतान का सार दुष्टता है? इस प्रश्न का उत्तर देने के लिए व्यक्ति को, जो कुछ शैतान लोगों के साथ करता है, उसके परिणामों की जाँच करनी चाहिए। शैतान मनुष्य को भ्रष्ट और नियंत्रित करता है, और मनुष्य शैतान के भ्रष्ट स्वभाव के तहत काम करता है, और वह शैतान द्वारा भ्रष्ट किए गए लोगों की दुनिया में रहता है। मानवजाति अनजाने ही शैतान द्वारा अधिकृत और आत्मसात कर ली जाती है; इसलिए मनुष्य में शैतान का भ्रष्ट स्वभाव है, जो कि शैतान की प्रकृति है। शैतान द्वारा कही और की गई हर चीज से क्या तुमने उसका अंहकार देखा है? क्या तुमने उसका छल और द्वेष देखा है। शैतान का अंहकार मुख्य रूप से कैसे प्रदर्शित होता है? क्या शैतान सदैव परमेश्वर का स्थान लेने की इच्छा रखता है? शैतान हमेशा परमेश्वर के कार्य और पद को खंडित करने और उसे खुद हथियाने की चाह रखता है, ताकि लोग शैतान का अनुसरण, समर्थन और उसकी आराधना करें; यह शैतान की अंहकारी प्रकृति है। जब शैतान लोगों को भ्रष्ट करता है, तो क्या वह उनसे सीधे कहता है कि उन्हें क्या करना चाहिए? जब शैतान परमेश्वर को प्रलोभित करता है, तो क्या वह सामने आकर कहता है कि, “मैं तुझे प्रलोभित कर रहा हूँ, मैं तुझ पर हमला करने जा रहा हूँ”? वह ऐसा बिल्कुल नहीं करता। शैतान कौन-सा तरीका इस्तेमाल करता है? वह बहकाता है, प्रलोभित करता है, हमला करता है, और अपना जाल बिछाता है, यहाँ तक कि पवित्र शास्त्र को भी उद्धृत करता है। अपने कुटिल उद्देश्य हासिल करने और अपने इरादे पूरे करने के लिए शैतान कई तरीकों से बोलता और कार्य करता है। शैतान के ऐसा कर लेने के बाद मनुष्य में जो अभिव्यक्त होता है, उससे क्या देखा जा सकता है? क्या लोग भी अंहकारी़ नहीं हो जाते? हजारों सालों से मनुष्य शैतान की भ्रष्टता से पीड़ित रहा है, इसलिए मनुष्य अहंकारी, धोखेबाज, दुर्भावनाग्रस्त और विवेकहीन हो गया है। ये सभी चीज़ें शैतान की प्रकृति के कारण उत्पन्न हुई हैं। चूँकि शैतान की प्रकृति दुष्ट है, इसलिए इसने मनुष्य को यह दुष्ट प्रकृति दी है और उसे यह दुष्ट, भ्रष्ट स्वभाव प्रदान किया है। इसलिए मनुष्य भ्रष्ट शैतानी स्वभाव के तहत जीता है और शैतान की ही तरह परमेश्वर का विरोध करता है, परमेश्वर पर हमला करता है, यहाँ तक कि वह परमेश्वर की आराधना नहीं कर सकता, उसके पास परमेश्वर का भय मानने वाला हृदय नहीं है।
—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है V
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 147
शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए ज्ञान का उपयोग कैसे करता है
क्या ज्ञान ऐसी चीज़ है, जिसे हर कोई सकारात्मक चीज मानता है? लोग कम से कम यह तो सोचते ही हैं कि “ज्ञान” शब्द का संकेतार्थ नकारात्मक के बजाय सकारात्मक है। तो हम यहाँ क्यों उल्लेख कर रहे हैं कि शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए ज्ञान का उपयोग करता है? क्या विकास का सिद्धांत ज्ञान का एक पहलू नहीं है? क्या न्यूटन के नियम ज्ञान का भाग नहीं हैं? पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण भी ज्ञान का ही एक भाग है, है न? (हाँ।) तो फिर ज्ञान क्यों उन चीजों की सूची में है जिन्हें शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए इस्तेमाल करता है? तुम लोगों का इस बारे में क्या दृष्टिकोण है? क्या ज्ञान में सत्य का लेश मात्र भी होता है? (नहीं।) तो ज्ञान का सार क्या है? लोग जो समस्त ज्ञान अर्जित करते हैं उसका आधार क्या है? क्या यह विकास के सिद्धांत पर आधारित नहीं है? क्या मनुष्य द्वारा अन्वेषण और सारांशित किए जाने के माध्यम से प्राप्त ज्ञान नास्तिकता पर आधारित नहीं है? क्या ऐसे किसी ज्ञान का परमेश्वर के साथ कोई संबंध है? क्या यह परमेश्वर की आराधना करने के साथ जुड़ा है? क्या यह सत्य के साथ जुड़ा है? (नहीं।) तो मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए शैतान ज्ञान का उपयोग कैसे करता है? मैंने अभी-अभी कहा कि इसमें से कोई भी ज्ञान परमेश्वर की आराधना करने या सत्य से नहीं जुड़ा है। कुछ लोग इस बारे में इस तरह सोचते हैं : “हो सकता है, ज्ञान का सत्य से कोई लेना-देना न हो, किंतु फिर भी, यह लोगों को भ्रष्ट नहीं करता।” तुम लोगों का इस बारे में क्या दृष्टिकोण है? क्या तुम्हें ज्ञान के द्वारा यह सिखाया गया है कि व्यक्ति की खुशी उसके अपने दो हाथों से रची जाती है? क्या ज्ञान ने तुम्हें यह सिखाया कि मनुष्य का भाग्य उसके अपने हाथों में है? (हाँ।) यह कैसी बात है? (यह शैतानी बात है।) बिल्कुल सही! यह शैतानी बात है! ज्ञान वास्तव में काफी जटिल है। सरल शब्दों में कहें तो, चाहे ज्ञान किसी भी क्षेत्र का हो, यह एक ऐसी चीज है जिसे लोग अच्छा मानते हैं। ज्ञान कैसे उत्पन्न होता है? सारा ज्ञान उन अविश्वासियों द्वारा सारांशित किया गया है जो परमेश्वर को नहीं जानते हैं और उसकी आराधना नहीं करते हैं। जब लोग ज्ञान के इस क्षेत्र का अध्ययन करते हैं, तो वे यह नहीं देख पाते कि सभी चीजों पर परमेश्वर की संप्रभुता है; वे यह नहीं देख पाते कि परमेश्वर ही सारी चीजों को सँभालता या उनका प्रबंधन करता है। इसके बजाय, वे बस अंतहीन रूप से शोध और अन्वेषण करते हैं और ज्ञान के भीतर उन उत्तरों को खोजते हैं। लेकिन क्या यह सच नहीं है कि अगर लोग परमेश्वर पर विश्वास नहीं करेंगे और इसके बजाय केवल अनुसंधान करेंगे, तो वे कभी भी सही उत्तर नहीं पाएँगे? यह सारा ज्ञान तुम्हें केवल एक आजीविका, एक नौकरी और आमदनी दे सकता है ताकि तुम भूखे न रहो; किंतु वह तुमसे कभी भी परमेश्वर की आराधना नहीं कराएगा और वह कभी भी तुम्हें बुराई से दूर नहीं रखेगा। लोग जितना अधिक ज्ञान अर्जित करेंगे, उतना ही अधिक वे परमेश्वर के विरुद्ध विद्रोह करने, परमेश्वर की पड़ताल करने, परमेश्वर की परीक्षा लेने और परमेश्वर का प्रतिरोध करने की इच्छा करेंगे। तो अब हम ऐसा क्या देखते हैं जो ज्ञान लोगों को सिखा रहा है? यह सब शैतान का फलसफा है। क्या शैतान द्वारा भ्रष्ट मानवजाति के बीच फैलाए गए फलसफों और जीवित रहने के नियमों का सत्य से कोई लेना-देना है? उनका सत्य से कोई लेना-देना नहीं है, और वास्तव में, वे सत्य के प्रतिकूल हैं। लोग प्रायः कहते हैं, “जीवन गति है” और “मनुष्य लोहा है, चावल इस्पात है, अगर मनुष्य एक बार का भोजन छोड़ता है, तो वह भूख से बेज़ार महसूस करता है”; ये क्या कहावतें हैं? ये भ्रातियाँ हैं और इन्हें सुनने से घृणा की भावना पैदा होती है। मनुष्य के तथाकथित ज्ञान में शैतान ने सांसारिक आचरण का अपना फलसफा और अपनी सोच काफी कुछ भर दी है। और जब शैतान ऐसा करता है, तो वह मनुष्य को अपनी सोच, अपना फलसफा और दृष्टिकोण अपनाने देता है, ताकि मनुष्य परमेश्वर के अस्तित्व को नकार सके, सभी चीज़ों और मनुष्य के भाग्य पर परमेश्वर के प्रभुत्व को नकार सके। तो जब मनुष्य का अध्ययन आगे बढ़ता है और वह अधिक ज्ञान प्राप्त कर लेता है, वह परमेश्वर के अस्तित्व को धुँधला होता महसूस करता है, और फिर वह यह भी महसूस कर सकता है कि परमेश्वर का अस्तित्व ही नहीं है। चूँकि शैतान ने मनुष्य में कुछ विचार, मत और धारणाएँ भर दी हैं, जब शैतान मनुष्य के अंदर यह जहर भर देता है, तो क्या मनुष्य शैतान द्वारा गुमराह और भ्रष्ट नहीं किया जाता? तो तुम लोग क्या कहोगे कि आज के लोग किस चीज के अनुसार जीते हैं? क्या वे शैतान द्वारा भरे गए ज्ञान और विचारों से नहीं जीते? और जो चीजें इस ज्ञान और इन विचारों में छिपी हैं—क्या वे शैतान के दर्शन और विष नहीं हैं? मनुष्य शैतान के दर्शनों और विष से जीता है। और शैतान द्वारा मनुष्य को भ्रष्ट किए जाने के मूल में क्या है? शैतान मनुष्य से परमेश्वर का खंडन करवाना, उसका विरोध करवाना, और अपनी तरह उसे उसके विरुद्ध खड़ा करवाना चाहता है; मनुष्य को भ्रष्ट करने के पीछे यही शैतान का लक्ष्य है, और वह साधन भी, जिसके द्वारा शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करता है।
हम ज्ञान के सबसे सतही पहलू पर चर्चा से शुरुआत करेंगे। क्या भाषाओं का व्याकरण और शब्द लोगों को भ्रष्ट करने में समर्थ हैं? क्या शब्द लोगों को भ्रष्ट कर सकते हैं? शब्द लोगों को भ्रष्ट नहीं करते; वे एक उपकरण हैं, जिसका लोग बोलने के लिए इस्तेमाल करते हैं, और वे वह उपकरण भी हैं, जिसका लोग परमेश्वर के साथ संवाद करने के लिए इस्तेमाल करते हैं, और इतना ही नहीं, वर्तमान समय में भाषा और शब्द ही हैं, जिनसे परमेश्वर लोगों के साथ संवाद करता है। वे उपकरण हैं, और वे एक आवश्यकता हैं। एक और एक दो होते हैं, और दो गुणा दो चार होते हैं; क्या यह ज्ञान नहीं है? पर क्या यह तुम्हें भ्रष्ट कर सकता है? यह सामान्य ज्ञान है—यह एक निश्चित प्रतिमान है—और इसलिए यह लोगों को भ्रष्ट नहीं कर सकता। तो किस तरह का ज्ञान लोगों को भ्रष्ट करता है? भ्रष्ट करने वाला ज्ञान वह ज्ञान होता है, जिसमें शैतान के दृष्टिकोणों और विचारों की मिलावट होती है। शैतान इन दृष्टिकोणों और विचारों को ज्ञान के माध्यम से मानवजाति में भरने का प्रयास करता है। उदाहरण के लिए, किसी लेख में, लिखित शब्दों में अपने आप में कुछ ग़लत नहीं होता। जब लेखक लेख लिखता है तो समस्या उसके दृष्टिकोण और अभिप्राय के साथ ही उसके विचारों की विषयवस्तु में होती है। ये आत्मा की चीज़ें हैं, और ये लोगों को भ्रष्ट करने में सक्षम हैं। उदाहरण के लिए, अगर तुम टेलीविज़न पर कोई कार्यक्रम देख रहे हो, तो उसमें किस प्रकार की चीज़ें लोगों का दृष्टिकोण बदल सकती हैं? क्या कलाकारों द्वारा कहे गए शब्द खुद लोगों को भ्रष्ट करने में सक्षम होंगे? (नहीं।) किस प्रकार की चीज़ें लोगों को भ्रष्ट करेंगी? ये कार्यक्रम के मुख्य विचार और विषय-वस्तु होंगे, जो निर्देशक के विचारों का प्रतिनिधित्व करेंगे। इन विचारों द्वारा वहन की गई सूचना लोगों के मन और मस्तिष्क को प्रभावित कर सकती है। क्या ऐसा नहीं है? अब तुम लोग जानते हो कि मैं अपनी चर्चा में शैतान द्वारा लोगों को भ्रष्ट करने के लिए ज्ञान का उपयोग करने के संदर्भ में क्या कह रहा हूँ। तुम ग़लत नहीं समझोगे, है न? तो अगली बार जब तुम कोई उपन्यास या लेख पढ़ोगे, तो क्या तुम आकलन कर सकोगे कि लिखित शब्दों में व्यक्त किए गए विचार मनुष्य को भ्रष्ट करते हैं या मानवजाति के लिए योगदान करते हैं? (हाँ, कुछ हद तक।) यह ऐसी चीज़ है, जिसे धीमी गति से पढ़ा और अनुभव किया जाना चाहिए, और यह ऐसी चीज़ नहीं है, जिसे तुरंत आसानी से समझ लिया जाए। उदाहरण के लिए, ज्ञान के किसी क्षेत्र में शोध या अध्ययन करते समय, उस ज्ञान के कुछ सकारात्मक पहलू उस क्षेत्र के बारे में कुछ सामान्य ज्ञान पाने में सहायता कर सकते हैं, साथ ही यह जानने में भी सक्षम बना सकते हैं कि किन चीज़ों से लोगों को बचना चाहिए। उदाहरण के लिए “बिजली” को लो—यह ज्ञान का एक क्षेत्र है, है न? अगर तुम्हें यह पता न होता कि बिजली लोगों को झटका मार सकती है और चोट पहुँचा सकती है, तो क्या तुम अनभिज्ञ न होते? किंतु एक बार ज्ञान के इस क्षेत्र को समझ लेने पर तुम बिजली के करेंट वाली चीज़ों को छूने में लापरवाही नहीं बरतोगे, और तुम जान जाओगे कि बिजली का उपयोग कैसे करना है। ये दोनों सकारात्मक बातें हैं। क्या अब तुम लोगों को स्पष्ट हो गया है कि हम, ज्ञान लोगों को किस तरह भ्रष्ट करता है, इस बारे में क्या चर्चा कर रहे हैं? दुनिया में कई प्रकार के ज्ञान का अध्ययन किया जाता है और तुम लोगों को स्वयं उनमें अंतर करने के लिए समय देना चाहिए।
—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है V
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 148
शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए विज्ञान का उपयोग कैसे करता है
विज्ञान क्या है? क्या विज्ञान प्रत्येक व्यक्ति के मन में बड़ी प्रतिष्ठा नहीं रखता और अगाध नहीं माना जाता? जब विज्ञान का उल्लेख किया जाता है, तो क्या लोग ऐसा महसूस नहीं करते : “यह एक ऐसी चीज़ है, जो सामान्य लोगों की पहुँच से परे है; यह ऐसा विषय है, जिसे केवल वैज्ञानिक शोधकर्ता या विशेषज्ञ ही स्पर्श कर सकते हैं; इसका हम जैसे आम लोगों से कुछ लेना-देना नहीं है”? क्या इसका आम लोगों के साथ कोई संबंध है? (हाँ।) शैतान लोगों को भ्रष्ट करने के लिए विज्ञान का उपयोग कैसे करता है? हम यहाँ अपनी चर्चा में केवल उन चीज़ों के बारे में बात करेंगे, जिनसे लोगों का अपने जीवन में बार-बार सामना होता है, और अन्य मामलों को नज़रअंदाज़ कर देंगे। एक शब्द है “जींस।” क्या तुमने यह शब्द सुना है? तुम सब इस शब्द से परिचित हो। क्या जींस विज्ञान के माध्यम से नहीं खोजे गए थे? लोगों के लिए जींस ठीक-ठीक क्या मायने रखते हैं? क्या ये लोगों को यह महसूस नहीं कराते कि शरीर एक रहस्यमयी चीज है? लोगों को इस विषय से परिचित कराए जाने पर क्या कुछ लोग ऐसे नहीं होंगे—विशेषकर जिज्ञासु—जो और अधिक जानना चाहेंगे या और अधिक विवरण पाना चाहेंगे? ये जिज्ञासु लोग अपनी ऊर्जा इस विषय पर केंद्रित करेंगे और जब उनके पास कोई और चीज़ करने को नहीं होगी, तो वे इसके बारे में और अधिक विवरण पाने के लिए पुस्तकों में और इंटरनेट पर जानकारी खोजेंगे। विज्ञान क्या है? स्पष्ट रूप से कहूँ तो, विज्ञान उन चीज़ों से संबंधित विचार और सिद्धांत हैं, जिनके बारे में मनुष्य जिज्ञासु है, जो अज्ञात चीज़ें हैं, और जो उन्हें परमेश्वर द्वारा नहीं बताई गई हैं; विज्ञान उन रहस्यों से संबंधित विचार और सिद्धांत हैं, जिन्हें मनुष्य खोजना चाहता है। विज्ञान का दायरा क्या है? तुम कह सकते हो कि वह काफी व्यापक है और हर उस चीज का शोध और अध्ययन करता है, जिसमें उसकी रुचि होती है। विज्ञान में इन चीज़ों के विवरण और नियमों का शोध करना और फिर वे संभावित सिद्धांत सामने लाना शामिल है, जो हर किसी को सोचने पर मजबूर कर देते हैं : “ये वैज्ञानिक सचमुच ज़बरदस्त हैं। वे इतना अधिक जानते हैं, इन चीज़ों को समझने के लिए इनमें बहुत ज्ञान है!” उनके मन में वैज्ञानिकों के लिए बहुत सराहना होती है, है न? जो लोग विज्ञान संबंधी शोध करते हैं, वे किस तरह के विचार रखते हैं? क्या वे ब्रहमांड का शोध नहीं करना चाहते, अपनी रुचि के क्षेत्र में रहस्यमयी चीज़ों पर शोध नहीं करना चाहते? इसका अंतिम परिणाम क्या होता है? कुछ विज्ञानों में लोग अनुमान के आधार पर अपने निष्कर्ष निकालते हैं, और अन्य विज्ञानों में वे निष्कर्ष निकालने के लिए मानव-अनुभव पर भरोसा करते हैं। विज्ञान के दूसरे क्षेत्रों में लोग ऐतिहासिक और पृष्ठभूमिगत अवलोकनों के आधार पर अपने निष्कर्षों पर पहुँचते हैं। क्या ऐसा नहीं है? तो विज्ञान लोगों के लिए क्या करता है? विज्ञान लोगों को केवल भौतिक जगत की वस्तुएँ देखने देता है जिससे मनुष्य की केवल जिज्ञासा शांत होती है, लेकिन वह मनुष्य को वे नियम देखने में सक्षम नहीं बना सकता जिनके द्वारा परमेश्वर सभी चीजों पर संप्रभु है। मनुष्य को विज्ञान में उत्तर मिल गए लगते हैं और वे उत्तर गुमराह करने वाले हैं और अस्थायी संतुष्टि लाते हैं, ऐसी संतुष्टि जो मनुष्य के दिल को भौतिक संसार तक सीमित रखने का काम करती है। मनुष्य को लगता है कि उसे विज्ञान से उत्तर मिल गए हैं, इसलिए जो भी मुद्दा सामने आता है, वह उस मुद्दे को सत्यापित और स्वीकार करने के आधार के रूप में वैज्ञानिक विचारों का उपयोग करता है। मनुष्य के दिल को विज्ञान बहका देता और अपने वश में कर लेता है और परिणामस्वरूप, मनुष्य का परमेश्वर को जानने, परमेश्वर की आराधना करने और यह विश्वास करने का मन नहीं रह जाता कि सभी चीजें परमेश्वर से आती हैं और मनुष्य को सभी उत्तर परमेश्वर से प्राप्त करने चाहिए। क्या यह सच नहीं है? व्यक्ति जितना अधिक विज्ञान में विश्वास करता है, उतना ही अधिक बेतुका हो जाता है और यह मानने लगता है कि हर चीज का एक वैज्ञानिक समाधान होता है, कि शोध किसी भी चीज का समाधान कर सकता है। वह परमेश्वर को नहीं खोजता और वह यह विश्वास नहीं करता कि उसका अस्तित्व है। परमेश्वर में लंबे समय से विश्वास करने वाले कई लोग हैं, जो कोई समस्या सामने आने पर चीजों के बारे में जानने और उत्तर खोजने के लिए कंप्यूटर का उपयोग करते हैं; वे केवल वैज्ञानिक ज्ञान में विश्वास करते हैं। वे यह नहीं मानते कि परमेश्वर के वचन सत्य हैं, वे यह नहीं मानते कि परमेश्वर के वचन मानवजाति की सभी समस्याएँ हल कर सकते हैं और वे मानवजाति की प्रत्येक समस्या को सत्य के दृष्टिकोण से नहीं देखते। चाहे उनके सामने कोई भी समस्या आए, वे कभी परमेश्वर से प्रार्थना नहीं करते, न ही परमेश्वर के वचनों में सत्य खोजकर उसका समाधान करने की कोशिश करते हैं। अनेक मामलों में वे अभी भी यह विश्वास करते हैं कि ज्ञान समस्या का समाधान कर सकता है और विज्ञान ही अंतिम उत्तर है। परमेश्वर ऐसे लोगों के दिलों से बिल्कुल नदारद रहता है। वे छद्म-विश्वासी हैं और परमेश्वर में विश्वास के बारे में उनके विचार उन कई उच्चस्तरीय बुद्धिजीवियों और वैज्ञानिकों के विचारों से अलग नहीं हैं, जो हमेशा वैज्ञानिक तरीकों का उपयोग करके परमेश्वर का अध्ययन करने की कोशिश करते रहते हैं। उदाहरण के लिए, कई धर्म-विशेषज्ञ हैं, जिन्होंने उस पर्वत पर जाकर जहाज का निरीक्षण किया है, जहाँ महान जल-प्रलय के बाद वह जहाज रुका था, और इस प्रकार उन्होंने जहाज़ के अस्तित्व को प्रमाणित कर दिया है। किंतु जहाज के बाहरी रूप में वे परमेश्वर के अस्तित्व को नहीं देखते। वे केवल कहानियों और इतिहास पर विश्वास करते हैं; यह उनके वैज्ञानिक शोध और भौतिक संसार के अध्ययन का परिणाम है। अगर तुम भौतिक चीजों पर शोध करोगे, चाहे वह सूक्ष्म जीवविज्ञान हो, खगोलशास्त्र हो या भूगोल हो, तो तुम कभी ऐसा परिणाम नहीं पाओगे, जो यह निर्धारित करता हो कि परमेश्वर का अस्तित्व है या यह कि वह सभी चीज़ों पर संप्रभु है। तो विज्ञान मनुष्य के लिए क्या करता है? क्या वह मनुष्य को परमेश्वर से दूर नहीं करता? क्या वह लोगों को परमेश्वर को अध्ययन के अधीन करने के लिए प्रेरित नहीं करता? क्या वह लोगों को परमेश्वर के अस्तित्व और संप्रभुता के बारे में अधिक संशयात्मक नहीं बनाता और इस प्रकार उनसे परमेश्वर का खंडन नहीं करवाता और परमेश्वर के साथ विश्वासघात नहीं करवाता? यही परिणाम होता है। तो जब शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए विज्ञान का उपयोग करता है, तो वह कौन-सा उद्देश्य हासिल करने की कोशिश कर रहा होता है? वह लोगों को गुमराह और संज्ञाहीन करने के लिए वैज्ञानिक निष्कर्षों का उपयोग करना चाहता है और उनके हृदयों पर कब्जा करने के लिए अस्पष्ट उत्तरों का भी उपयोग करना चाहता है, ताकि वे परमेश्वर के अस्तित्व की खोज या उस पर विश्वास न करें। इसीलिए मैं कहता हूँ कि विज्ञान भी उन तरीकों में से एक है, जिनसे शैतान लोगों को भ्रष्ट करता है।
—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है V
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 149
शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए पारंपरिक संस्कृति का उपयोग कैसे करता है
क्या ऐसी कई चीज़ें हैं या क्या ऐसी कई चीज़ें नहीं हैं, जो पारंपरिक संस्कृति का अंग मानी जाती हैं? (हाँ, हैं।) इस “पारंपरिक संस्कृति” का अर्थ क्या है? कुछ लोग कहते हैं कि यह पूर्वजों से चली आती है—यह एक पहलू है। आरंभ से ही परिवारों, जातीय समूहों, यहाँ तक कि पूरी मानवजाति में जीवन के तरीके, रीति-रिवाज, कहावतें और नियम आगे बढ़ाए गए हैं, और वे लोगों के विचारों में बैठ गए हैं। लोग उन्हें अपने जीवन का अविभाज्य अंग समझते हैं और उन्हें नियमों की तरह मानते हैं, और उनका इस तरह पालन करते हैं, जैसे वे स्वयं जीवन हों। दरअसल, वे कभी भी इन चीज़ों को बदलना या इनका परित्याग करना नहीं चाहते, क्योंकि ये उनके पूर्वजों से आई हैं। पारंपरिक संस्कृति के अन्य पहलू भी हैं, जो लोगों की हड्डियों तक में जम गए हैं, जैसे कि वे चीज़ें, जो कन्फ्यूशियस या मेंसियस से आई हैं, और वे चीज़ें, जो चीनी ताओवाद और कन्फ्यूशीवाद द्वारा लोगों को सिखाई गई हैं। क्या यह सही नहीं हैं? पारंपरिक संस्कृति में क्या चीज़ें शामिल हैं? क्या इसमें वे त्योहार शामिल हैं, जिन्हें लोग मनाते हैं? उदाहरण के लिए : वसंत महोत्सव, दीप-महोत्सव, चिंगमिंग दिवस, ड्रैगन नौका महोत्सव, और साथ ही, भूत महोत्सव और मध्य-हेमंत महोत्सव। कुछ परिवार तब भी उत्सव मनाते हैं, जब वरिष्ठ लोग एक निश्चित उम्र पर पहुँच जाते हैं, या जब बच्चे एक माह या सौ दिन की उम्र के हो जाते हैं। और इसी तरह चलता रहता है। ये सब पारंपरिक त्योहार हैं। क्या इन त्योहारों में पारंपरिक संस्कृति अंतर्निहित नहीं है? पारंपरिक संस्कृति का मूल क्या है? क्या इनका परमेश्वर की उपासना से कुछ लेना-देना है? क्या इनका लोगों को सत्य का अभ्यास करने के लिए कहने से कुछ लेना-देना है? क्या परमेश्वर को भेंट चढ़ाने, परमेश्वर की वेदी पर जाने और उसकी शिक्षाएँ प्राप्त करने के लिए भी लोगों के कोई त्योहार हैं? क्या इस तरह के कोई त्योहार हैं? (नहीं।) इन सभी त्योहारों में लोग क्या करते हैं? आधुनिक युग में इन्हें खाने, पीने और मज़े करने के अवसरों के रूप में देखा जाता है। पारंपरिक संस्कृति का अंतर्निहित स्रोत क्या है? पारंपरिक संस्कृति किससे आती है? यह शैतान से आती है। इन पारंपरिक त्योहारों के दृश्यों के पीछे शैतान मनुष्यों में कुछ खास चीजें भर देता है। वे चीज़ें क्या हैं? यह सुनिश्चित करना कि लोग अपने पूर्वजों को याद रखें—क्या यह उनमें से एक है? उदाहरण के लिए, चिंगमिंग महोत्सव के दौरान लोग कब्रों की सफ़ाई करते हैं और अपने पूर्वजों को भेंट चढ़ाते हैं, ताकि वे अपने पूर्वजों को भूलें नहीं। साथ ही, शैतान सुनिश्चित करता है कि लोग देशभक्त होना याद रखें, जिसका एक उदाहरण ड्रैगन नौका महोत्सव है। मध्य-हेमंत उत्सव किसलिए मनाया जाता है? (पारिवारिक पुनर्मिलन के लिए।) पारिवारिक पुनर्मिलनों की पृष्ठभूमि क्या है? इसका क्या कारण है? यह भावनात्मक रूप से संवाद करने और जुड़ने के लिए है। निस्संदेह, चाहे वह चंद्र नववर्ष की पूर्व संध्या मनाना हो या दीप-महोत्सव, उन्हें मनाने के पीछे के कारणों का वर्णन करने के कई तरीके हैं। लेकिन कोई उन कारणों का वर्णन कैसे भी करे, उनमें से प्रत्येक कारण शैतान द्वारा लोगों में अपना फ़लसफ़ा और सोच भरने का तरीका है, ताकि वे परमेश्वर से भटक जाएँ और यह न जानें कि परमेश्वर है, और वे भेंटें या तो अपने पूर्वजों को चढ़ाएँ या फिर शैतान को, या देह-सुख की इच्छाओं के वास्ते खाएँ, पीएँ और मज़ा करें। जब भी ये त्योहार मनाए जाते हैं, तो इनमें से हर त्योहार में लोगों के जाने बिना ही उनके मन में शैतान के विचार और दृष्टिकोण गहरे जम जाते हैं। जब लोग अपनी उम्र के चालीसवें, पचासवें दशक में या उससे भी बड़ी उम्र में पहुँचते हैं, तो शैतान के ये विचार और दृष्टिकोण पहले से ही उनके मन में गहरे जम चुके होते हैं। इतना ही नहीं, लोग इन विचारों को, चाहे वे सही हों या गलत, अविवेकपूर्ण ढंग से और बिना दुराव-छिपाव के, अगली पीढ़ी में संचारित करने का भरसक प्रयास करते हैं। क्या ऐसा नहीं है? (है।) पारंपरिक संस्कृति और ये त्योहार लोगों को कैसे भ्रष्ट करते हैं? क्या तुम जानते हो? (लोग इन परंपराओं के नियमों से इतने विवश और बाध्य हो जाते हैं कि उनमें परमेश्वर को खोजने का समय और ऊर्जा नहीं बचती।) यह एक पहलू है। उदाहरण के लिए, चंद्र नव वर्ष के दौरान हर कोई उत्सव मनाता है—अगर तुमने नहीं मनाया, तो क्या तुम दुःखी महसूस नहीं करोगे? क्या तुम अपने दिल में कोई अंधविश्वास रखते हो? शायद तुम ऐसा महसूस करो : “मैंने नववर्ष का उत्सव नहीं मनाया, और चूँकि चंद्र नव वर्ष का दिन एक खराब दिन था; तो कहीं बाकी पूरा वर्ष भी खराब ही न बीते”? क्या तुम बुरा और थोड़ा डरा हुआ महसूस नहीं करोगे? ऐसे भी कुछ लोग हैं, जिन्होंने वर्षों से अपने पुरखों को भेंट नहीं चढ़ाई है और वे अचानक स्वप्न देखते हैं, जिसमें कोई मृत व्यक्ति उनसे धन माँगता है। वे कैसा महसूस करेंगे? “कितने दुःख की बात है कि इस मृत व्यक्ति को खर्च करने के लिए धन चाहिए! मैं उसके लिए कुछ कागज़ी मुद्रा जला दूँगा। अगर मैं ऐसा नहीं करता हूँ, तो यह बिल्कुल भी सही नहीं होगा। इससे हम जीवित लोग किसी मुसीबत में पड़ सकते हैं—कौन कह सकता है, दुर्भाग्य कब आ पड़ेगा?” उनके मन में डर और चिंता का यह छोटा-सा बादल हमेशा मँडराता रहेगा। उन्हें यह चिंता कौन देता है? शैतान इस चिंता का स्रोत है। क्या यह शैतान द्वारा मनुष्य को भ्रष्ट करने का एक तरीका नहीं है? वह तुम्हें भ्रष्ट करने, तुम्हें धमकाने और तुम्हें बाँधने के लिए विभिन्न तरीके और बहाने इस्तेमाल करता है, ताकि तुम स्तब्ध रह जाओ और झुक जाओ और उसके सामने समर्पण कर दो; शैतान इसी तरह मनुष्य को भ्रष्ट करता है। प्रायः जब लोग कमजोर होते हैं या परिस्थितियों से पूर्णतः अवगत नहीं होते, तब वे असावधानीवश, भ्रमित तरीके से कुछ कर सकते हैं; अर्थात्, वे अनजाने में शैतान के चंगुल में फँस जाते हैं और वे बेइरादा कुछ कर सकते हैं, कुछ ऐसी चीज़ें कर सकते हैं, जिनके बारे में वे नहीं जानते कि वे क्या कर रहे हैं। शैतान इसी तरह से मनुष्य को भ्रष्ट करता है। यहाँ तक कि अब कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो गहरे जड़ जमाई हुई पारंपरिक संस्कृति से अलग होने के अनिच्छुक हैं, और उसे नहीं छोड़ सकते। विशेष रूप से जब वे कमज़ोर और नकारात्मक होते हैं, तब वे इस प्रकार के उत्सव मनाना चाहते हैं और वे फिर से शैतान से मिलना और उसे संतुष्ट करना चाहते हैं, ताकि उनके दिलों को सुकून मिल जाए। पारंपरिक संस्कृति की पृष्ठभूमि क्या है? क्या पर्दे के पीछे से शैतान का काला हाथ डोर खींच रहा है? क्या शैतान की दुष्ट प्रकृति जोड़-तोड़ और नियंत्रण कर रही है? क्या शैतान इन सभी चीज़ों को नियंत्रित कर रहा है? (हाँ।) जब लोग इस पारंपरिक संस्कृति में जीते हैं और इस प्रकार के पारंपरिक त्योहार मनाते हैं, तो क्या हम कह सकते हैं कि यह एक ऐसा परिवेश है, जिसमें वे शैतान द्वारा मूर्ख बनाए और भ्रष्ट किए जा रहे हैं, और इतना ही नहीं, वे शैतान द्वारा मूर्ख बनाए जाने और भ्रष्ट किए जाने से खुश हैं? (हाँ।) यह एक ऐसी चीज है, जिसे तुम सब स्वीकार करते हो, जिसके बारे में तुम जानते हो।
—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है V
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 150
शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए अंधविश्वास का उपयोग कैसे करता है
शैतान लोगों को भ्रष्ट करने के लिए अंधविश्वास का उपयोग कैसे करता है? सभी लोग अपना भाग्य जानना चाहते हैं, इसलिए शैतान उनकी उत्सुकता का उन्हें लालच देने के लिए फायदा उठाता है। लोग अटकल, भविष्य-कथन, और चेहरा पढ़वाने में संलग्न हो जाते हैं, ताकि जान सकें कि भविष्य में उनके साथ क्या होगा और आगे किस प्रकार का मार्ग है। यद्यपि अंततः वह भाग्य या संभावनाएँ किसके हाथ में हैं जिनसे लोग इतने चिंतित हैं? (परमेश्वर के हाथ में।) ये सभी चीज़ें परमेश्वर के हाथों में हैं। इन विधियों का उपयोग करके शैतान लोगों को क्या ज्ञात करवाना चाहता है? शैतान चेहरा पढ़ने और भविष्य-कथन का उपयोग लोगों को यह बताने के लिए करना चाहता है कि वह उनका भविष्य और भाग्य जानता है, और न केवल वह इन चीज़ों को जानता है, बल्कि ये उसके नियंत्रण में भी हैं। शैतान इस अवसर का लाभ उठाना चाहता है और इन विधियों का उपयोग लोगों को नियंत्रित करने के लिए करना चाहता है, ताकि लोग उस पर अंधे होकर विश्वास करें और उसके हर शब्द का पालन करें। उदाहरण के लिए, अगर तुम अपना चेहरा पढ़वाओ, और अगर भाग्य बताने वाला व्यक्ति अपनी आँखें बंद करके पूर्ण स्पष्टता के साथ तुम्हें बता दे कि पिछले कुछ दशकों में तुम्हारे साथ क्या-क्या घटित हुआ है, तो तुम भीतर कैसा महसूस करोगे? तुम तुरंत महसूस करोगे, “यह कितना सटीक है! मैंने अपना अतीत पहले कभी किसी को नहीं बताया, इसने उसके बारे में कैसे जाना? मैं सच में इस भविष्यवक्ता की सराहना करता हूँ!” क्या शैतान के लिए तुम्हारे अतीत के बारे में जानना बहुत आसान नहीं है? परमेश्वर तुम्हें वहाँ तक लेकर आया है, जहाँ आज तुम हो, और इस पूरे समय के दौरान शैतान लोगों को भ्रष्ट करता रहा है और तुम्हारा पीछा करता रहा है। तुम्हारे जीवन के दशकों का समय शैतान के लिए कुछ भी नहीं है और इन चीज़ों को जानना उसके लिए कठिन नहीं है। जब तुम जानते हो कि शैतान जो कहता है, वह सटीक है, तो क्या तुम अपना हृदय उसे नहीं दे देते? क्या तुम अपना भविष्य और भाग्य उसके नियंत्रण में नहीं छोड़ देते? एक पल में तुम्हारा हृदय उसके लिए कुछ आदर या श्रद्धा महसूस करेगा, और कुछ लोगों के लिए, इस बिंदु पर उनकी आत्माएँ उसके द्वारा पहले ही छीन ली गई होंगी। और तुम तुरंत भविष्यवक्ता से पूछोगे, “मैं आगे क्या करूँ? आने वाले साल में मुझे किससे बचना चाहिए? मुझे क्या नहीं करना चाहिए?” और फिर, वह कहेगा, “तुम्हें वहाँ नहीं जाना चाहिए, तुम्हें यह नहीं करना चाहिए, फ़लाँ रंग के कपड़े मत पहनो, तुम्हें अमुक-अमुक स्थानों पर नहीं जाना चाहिए, और तुम्हें फ़लाँ चीज़ें अधिक करनी चाहिए...।” क्या तुम उसकी हर बात तुरंत दिल से स्वीकार नहीं कर लोगे? तुम उसके वचन परमेश्वर के वचनों से भी अधिक तेजी से याद कर लोगे। तुम उन्हें इतनी शीघ्रता से क्यों याद कर लोगे? क्योंकि तुम अच्छे भाग्य के लिए शैतान पर भरोसा करना चाहोगे। क्या तभी वह तुम्हारे दिल पर कब्ज़ा नहीं कर लेता? जब उसकी भविष्यवाणियाँ एक के बाद एक सच हो जाती हैं, तब क्या तुम यह जानने के लिए वापस उसके पास नहीं जाना चाहोगे, कि अगला साल कैसा भाग्य लेकर आएगा? (हाँ।) तुम वही करोगे, जो शैतान तुमसे करने के लिए कहेगा, और उन चीज़ों से बचोगे, जिनसे वह बचने के लिए कहेगा। इस तरह से, क्या तुम उसकी कही हर बात का पालन नहीं कर रहे होते? बहुत जल्दी तुम उसकी गोद में जा गिरोगे, गुमराह होगे और उसके नियंत्रण में चले जाओगे। ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि तुम विश्वास करते हो कि वह जो कहता है, वह सत्य है, और क्योंकि तुम मानते हो कि वह तुम्हारी पिछली ज़िंदगियों, तुम्हारी वर्तमान ज़िंदगी और तुम्हारे भविष्य में घटित होने वाली चीज़ों के बारे में जानता है। यही वह विधि है, जिससे शैतान लोगों को नियंत्रित करता है। किंतु वास्तव में कौन नियंत्रण करता है? स्वयं परमेश्वर नियंत्रण करता है, शैतान नहीं। शैतान इस मामले में अपनी चालाकियों का उपयोग केवल अज्ञानी लोगों को चकमा देने के लिए करता है, उन लोगों को बरगलाने के लिए करता है, जो उस पर विश्वास और भरोसा करने में केवल भौतिक जगत को देखते हैं। फिर वे शैतान के चंगुल में फँस जाते हैं और उसकी हर बात मानते हैं। किंतु क्या जब लोग परमेश्वर पर विश्वास करना और उसका अनुसरण करना चाहते हैं, तब शैतान अपनी पकड़ ढीली करता है? शैतान अपनी पकड़ ढीली नहीं करता। इस स्थिति में, क्या लोग वास्तव में शैतान के चंगुल में फँस रहे हैं? (हाँ।) क्या हम कह सकते हैं कि इस संदर्भ में शैतान का व्यवहार सचमुच निर्लज्जतापूर्ण है? (हाँ।) हम ऐसा क्यों कहेंगे? क्योंकि ये धोखा देने वाली और छल से भरी हुई चालबाजियाँ हैं। शैतान बेशर्म है और लोगों को गलत दिशा दिखाता है कि वह उनसे संबंधित सभी चीज़ों को नियंत्रित करता है और वह उनके भाग्य को भी नियंत्रित करता है। इससे अज्ञानी लोग उसे पूरी तरह से मानने लगते हैं। वे केवल कुछ शब्दों से मूर्ख बना दिए जाते हैं। हतप्रभ होकर लोग उसके आगे झुक जाते हैं। तो शैतान किस तरह के तरीके इस्तेमाल करता है, खुद पर विश्वास करवाने के लिए वह क्या कहता है? उदाहरण के लिए, तुमने शैतान को नहीं बताया होगा कि तुम्हारे परिवार में कितने सदस्य हैं, किंतु शायद वह बता दे कि तुम्हारे परिवार में कितने सदस्य हैं, और साथ ही तुम्हारे माता-पिता और बच्चों की उम्र भी बता दे। इससे पहले अगर तुम्हें शैतान पर कुछ शक या संदेह रहा भी हो, तो क्या ऐसी बातें सुनने के बाद तुम यह महसूस नहीं करोगे कि यह थोड़ा अधिक विश्वसनीय है? तब शैतान कह सकता है कि हाल ही में तुम्हारा कार्य कितना कठिन रहा है, कि तुम्हारे वरिष्ठ तुम्हें उतना महत्व नहीं देते, जितना तुम्हें मिलना चाहिए और वे हमेशा तुम्हारे विरुद्ध कार्य करते हैं, इत्यादि। यह सुनने के बाद तुम सोचोगे, “यह बिल्कुल सही है! कार्यालय में सब चीज़ें सुचारु रूप से नहीं चल रही हैं।” तो तुम शैतान पर थोड़ा और विश्वास करोगे। फिर वह तुम्हें गुमराह करने के लिए कुछ और कहेगा, जिससे तुम उस पर और भी अधिक विश्वास करोगे। थोड़ा-थोड़ा करके तुम अब खुद को उसका और प्रतिरोध करने या उस पर संदेह करने में असमर्थ पाओगे। शैतान सिर्फ कुछ मामूली चालाकियाँ, यहाँ तक कि छोटी-छोटी तुच्छ चालाकियाँ इस्तेमाल करता है और इस तरह तुम्हें गुमराह कर देता है। जब तुम गुमराह हो जाते हो, तो तुम अपना व्यवहार स्थिर नहीं रख पाते, तुम्हारी समझ में नहीं आता कि क्या करूँ, और तुम वही करना आरंभ कर देते हो, जो शैतान कहता है। यह वह शानदार तरीका है, जिसे शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए इस्तेमाल करता है, जिससे तुम अनजाने ही उसके जाल में फँस जाते हो और उसके द्वारा बहकाए जाते हो। शैतान तुमसे कुछ बातें कहता है, जिन्हें लोग अच्छी बातें मानते हैं, और तब वह तुम्हें कहता है कि क्या करना है और क्या नहीं करना। इस तरह तुम अनजाने ही छले जाते हो। एक बार जब तुम इसमें पड़ जाते हो, तो तुम्हारे लिए चीज़ें परेशानी देने वाली हो जाती हैं; तुम लगातार इसी बारे में सोचते रहते हो कि शैतान ने क्या कहा और उसने तुमसे क्या करने को कहा, और तुम अनजाने ही उसके कब्ज़े में आ जाते हो। ऐसा क्यों होता है? ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि मनुष्यों में सत्य का अभाव है और इसलिए वे शैतान के प्रलोभन और बहकावे के विरुद्ध मजबूती से खड़े होने और उसका विरोध करने में असमर्थ हैं। शैतान की दुष्टता और उसके धोखे, विश्वासघात और दुर्भावना का सामना करने में मानवजाति बहुत अज्ञानी, अपरिपक्व और कमजोर है, है न? क्या यह उन तरीकों में से एक नहीं है, जिनसे शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करता है? (हाँ, है।) मनुष्य अनजाने में, थोड़ा-थोड़ा करके, शैतान के विभिन्न तरीकों द्वारा धोखा खाते और छले जाते हैं, क्योंकि उनमें सकारात्मक और नकारात्मक के बीच अंतर करने की योग्यता का अभाव है। शैतान पर विजय पाने के लिए उनमें इस आध्यात्मिक कद और योग्यता का अभाव है।
—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है V
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 151
शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए सामाजिक प्रवृत्तियों का उपयोग कैसे करता है
सामाजिक प्रवृत्तियाँ कब अस्तित्व में आईं? क्या वे केवल वर्तमान समय में अस्तित्व में आईं? कोई यह कह सकता है कि सामाजिक प्रवृत्तियाँ तब अस्तित्व में आईं, जब शैतान ने मनुष्य को भ्रष्ट करना आरंभ किया। सामाजिक प्रवृत्तियों में क्या शामिल है? (कपड़े पहनने और शृंगार करने की शैलियाँ।) ये ऐसी चीजें हैं, जिनके संपर्क में लोग अक्सर आते हैं। कपड़े पहनने की शैलियाँ, फैशन, रुझान—ये चीजें एक छोटा पहलू निर्मित करती हैं। क्या और भी कुछ है? क्या वे लोकप्रिय वाक्यांश भी इसमें शामिल हैं, जिन्हें लोग अक्सर बोलते हैं? क्या वे जीवन-शैलियाँ इसमें शामिल हैं, जिनकी लोग कामना करते हैं? क्या संगीत के सितारे, मशहूर हस्तियाँ, पत्रिकाएँ और उपन्यास, जिन्हें लोग पसंद करते हैं, इसमें शामिल होते हैं? (हाँ।) तुम लोगों के विचार में, सामाजिक प्रवृत्तियों का कौन-सा पहलू मनुष्य को भ्रष्ट करने में सक्षम है? इनमें से कौन-सा रुझान तुम लोगों को सबसे लुभावना लगता है? कुछ लोग कहते हैं : “हम सब एक खास उम्र में पहुँच गए हैं, हम अपनी उम्र के पचासवें या साठवें, सत्तरवें या अस्सीवें दशक में हैं, और हम अब और इन रुझानों के अनुकूल नहीं हो सकते और वे वास्तव में हमारा ध्यान आकर्षित नहीं करते।” क्या यह सही है? दूसरे कहते हैं : “हम मशहूर हस्तियों का अनुसरण नहीं करते, वह तो बीसेक साल के युवा लोग किया करते हैं; हम फैशन वाले कपड़े भी नहीं पहनते, वह तो अपनी छवि के बारे में सतर्क लोग किया करते हैं।” तो इनमें से क्या तुम लोगों को भ्रष्ट करने में सक्षम है? (लोकप्रिय कहावतें।) क्या ये कहावतें लोगों को भ्रष्ट कर सकती हैं? मैं एक उदाहरण दूँगा, और तुम लोग देख सकते हो कि वे लोगों को भ्रष्ट करती हैं या नहीं : “दुनिया पैसों के इशारों पर नाचती है”; क्या यह एक रुझान है? क्या यह तुम लोगों द्वारा उल्लिखित फैशन और स्वादिष्ट भोजन के रुझानों की तुलना में अधिक शक्तिशाली नहीं है? “दुनिया पैसों के इशारों पर नाचती है” यह शैतान का एक फलसफा है। यह लोगों में, हर समाज में बहुत प्रचलित है; तुम कह सकते हो, यह एक रुझान है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि यह हर एक व्यक्ति के हृदय में बैठा दिया गया है, जिसने पहले तो इस कहावत को स्वीकार नहीं किया, किंतु फिर जब वह जीवन की वास्तविकताओं के संपर्क में आया, तो इसे मूक सहमति दे दी और महसूस करना शुरू किया कि ये वचन वास्तव में सत्य हैं। क्या यह शैतान द्वारा मनुष्य को भ्रष्ट करने की प्रक्रिया नहीं है? शायद लोगों के पास इस कहावत को लेकर समान मात्रा में अनुभवजन्य ज्ञान नहीं होता, लेकिन हर एक व्यक्ति अपने आसपास घटित घटनाओं और अपने निजी अनुभवों के आधार पर इस कहावत की अलग-अलग रूप में व्याख्या करता है और इसे अलग-अलग मात्रा में स्वीकार करता है। क्या ऐसा नहीं है? चाहे किसी व्यक्ति का इस कहावत के साथ कितना भी गहरा अनुभव क्यों न हो, इसका उसके हृदय पर क्या नकारात्मक प्रभाव पड़ा है? वह यह है कि इस दुनिया के लोग—और यह कहा जा सकता है कि इसमें तुम लोगों में से हर एक शामिल है—अपने स्वभाव से कुछ प्रकट करते हैं। वह क्या है? वह है पैसे की पूजा। क्या इसे लोगों के दिलों से निकालना आसान है? नहीं, यह आसान नहीं है! यह दर्शाता है कि शैतान द्वारा मनुष्य की भ्रष्टता वास्तव में गहरी है! शैतान लोगों को लुभाने के लिए पैसे का उपयोग करता है, उन सभी को पैसे और भौतिक चीजों की पूजा करने के लिए भ्रष्ट करता है। और लोगों में पैसे की यह पूजा कैसे अभिव्यक्त होती है? क्या तुम लोग नहीं सोचते कि इस दुनिया में तुम पैसे के बिना जीवित नहीं रह सकते और तुम इसके बिना एक भी दिन नहीं गुजार सकते? लोगों के पास कितना पैसा है, यह तय करता है कि उनका रुतबा कितना ऊँचा है और वे कितने प्रतिष्ठित हैं। गरीबों को नहीं लगता कि वे सिर उठाकर और गर्व से खड़े हो सकते हैं, जबकि अमीरों का ऊँचा रुतबा होता है, वे सिर उठाकर और गर्व से खड़े होते हैं, ऊँची आवाज में बोल सकते हैं और घमंडी और बेलगाम तरीके से जी सकते हैं। यह कहावत और प्रवृत्ति लोगों के लिए क्या लेकर आती है? क्या यह सच नहीं है कि बहुत-से लोग पैसा कमाने के लिए कोई भी त्याग करने को तैयार रहते हैं? क्या अधिक पैसे की खोज में कई लोग अपनी गरिमा और सत्यनिष्ठा का बलिदान नहीं कर देते? क्या कई लोग पैसे की खातिर अपना कर्तव्य करने और परमेश्वर का अनुसरण करने का अवसर नहीं गँवा देते? क्या सत्य प्राप्त करने और बचाए जाने का अवसर खोना लोगों का सबसे बड़ा नुकसान नहीं है? केवल इस तरीके और इस कहावत का उपयोग करके, शैतान मनुष्य को इस हद तक भ्रष्ट कर देता है। क्या शैतान का इरादा कुटिल नहीं है? क्या यह एक दुर्भावनापूर्ण चाल नहीं है? जैसे-जैसे यह कहावत लोकप्रिय होती जाती है, तुम इससे असहमत होने से लेकर अंततः यह मानने लगते हो कि यही सत्य है और उस समय तक तुम्हारा हृदय पूरी तरह से शैतान की पकड़ में आ जाता है, इसलिए तुम न चाहते हुए भी इस कहावत के अनुसार जीने लगते हो। इस कहावत ने तुम्हें किस हद तक प्रभावित किया है? हो सकता है कि तुम सच्चे मार्ग को जानते हो और हो सकता है कि तुम सत्य को जानते हो, किंतु उसका अनुसरण करने में तुम असमर्थ हो। हो सकता है कि तुम स्पष्ट रूप से जानते हो कि परमेश्वर के वचन सत्य हैं, किन्तु सत्य को प्राप्त करने के लिए न तो कीमत चुकाने को तैयार हो और न ही कष्ट सहने को। इसके बजाय तुम अंत तक परमेश्वर के प्रतिरोध के लिए अपना भविष्य बलिदान करना अधिक पसंद करोगे। चाहे परमेश्वर कुछ भी क्यों न कहे, चाहे परमेश्वर कुछ भी क्यों न करे, चाहे वह प्रेम कितना गहरा और कितना महान क्यों न हो जो परमेश्वर को तुम्हारे प्रति है, जहाँ तक तुम समझने में समर्थ हो, इस कहावत के कारण तुम फिर भी हठपूर्वक स्वयं प्रयास करने पर जोर दोगे। कहने का तात्पर्य यह है कि यह कहावत पहले ही तुम्हारे विचारों को गुमराह और नियंत्रित कर चुकी है, यह पहले ही तुम्हारे व्यवहार को नियंत्रित कर चुकी है और तुम धन के पीछे भागना छोड़ने के बजाय इसे अपने भाग्य पर शासन करने दोगे। तुम इस प्रकार व्यवहार कर सकते हो, तुम शैतान के शब्दों द्वारा नियंत्रित किए और इशारों पर नचाए जा सकते हो—क्या इसका यह अर्थ नहीं है कि तुम्हें शैतान द्वारा गुमराह और भ्रष्ट किया गया है? क्या इसका यह मतलब नहीं है कि शैतान के फलसफे, उसके विचारों और उसके स्वभाव ने तुम्हारे दिल में जड़ जमा ली है? जब तुम एकाग्रचित्त होकर धन के पीछे दौड़ते हो और सत्य का अनुसरण करना छोड़ देते हो, तो क्या शैतान ने तुम्हें गुमराह करने का अपना उद्देश्य प्राप्त नहीं कर लिया है? ठीक यही मामला है। तो क्या जब शैतान द्वारा तुम्हें गुमराह और भ्रष्ट किया जाता है, तो तुम इसे महसूस कर पाते हो? तुम नहीं कर पाते। अगर तुम शैतान को अपने सामने खड़ा नहीं देख सकते, या यह महसूस नहीं कर सकते कि यह शैतान है जो छिपकर कार्य कर रहा है, तो क्या तुम शैतान की दुष्टता देख पाओगे? क्या तुम जान पाओगे कि शैतान मानवजाति को कैसे भ्रष्ट करता है? शैतान हर समय और हर जगह लोगों को भ्रष्ट करता है। शैतान उनके लिए इस भ्रष्टता से बचाव करना असंभव बना देता है और उन्हें इसके खिलाफ असहाय कर देता है। शैतान लोगों से अपने विचारों, अपने दृष्टिकोणों और उससे आने वाली दुष्ट चीजों को ऐसी स्थितियों में स्वीकार करवाता है जहाँ वे अनजान होते हैं और जब उन्हें इस बात की कोई पहचान नहीं होती कि उनके साथ क्या हो रहा है और इन चीजों को स्वीकार करने के बाद लोग उन पर कोई आपत्ति नहीं करते। वे इन चीज़ों को सँजोते हैं और एक खजाने की तरह सँभाले रखते हैं, वे इन चीज़ों से खुद को बहकाए जाने देते हैं और उन्हें अपने साथ खिलवाड़ करने देते हैं; और इस तरह लोग शैतान की सत्ता के अधीन जीते हैं और अनजाने ही शैतान की आज्ञा का पालन करते हैं और शैतान का मनुष्य को भ्रष्ट करना और अधिक गहरा होता जाता है।
—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है V
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 152
शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए इन अनेक विधियों का उपयोग करता है। मनुष्य को कुछ वैज्ञानिक सिद्धांतों का ज्ञान और समझ है, मनुष्य पारंपरिक संस्कृति के प्रभाव में जीता है, और प्रत्येक मनुष्य पारंपरिक संस्कृति का उत्तराधिकारी और हस्तांतरणकर्ता है। मनुष्य शैतान द्वारा स्वयं को दी गई पारंपरिक संस्कृति को आगे बढ़ाने के लिए बाध्य है, और वह शैतान द्वारा मानवजाति को प्रदान किए जाने वाले सामाजिक प्रवृत्तियों का पालन भी करता है। मनुष्य शैतान से अविभाज्य है, वह हर समय शैतान का अनुसरण करता है, उसकी दुष्टता, धोखेबाजी, दुर्भावना और अहंकार को स्वीकार करता है। शैतान के इन स्वभावों को धारण कर लेने पर, क्या मनुष्य इस भ्रष्ट मनुष्यजाति के बीच रहते हुए खुश रहा है या दुःखी? (दुःखी।) तुम ऐसा क्यों कहते हो? (चूँकि मनुष्य इन चीज़ों से बँधा है और इन भ्रष्ट चीज़ों से नियंत्रित है, वह पाप में रहता है और एक कठिन संघर्ष में डूबा हुआ है।) कुछ लोग बहुत बौद्धिक दिखाई देने के लिए चश्मा पहनते हैं; वे वाक्पटुता और तार्किकता के साथ बहुत सम्मानास्पद ढंग से बोल सकते हैं, और चूँकि वे कई चीजों से होकर गुजरे हैं, इसलिए वे बहुत अनुभवी और परिष्कृत हो सकते हैं। वे छोटे-बड़े मामलों के बारे में विस्तार से बोलने में समर्थ हो सकते हैं; वे चीज़ों की प्रामाणिकता और तर्क का आकलन करने में भी समर्थ हो सकते हैं। कुछ लोग इन लोगों के व्यवहार और रूप-रंग, और साथ ही इनके चरित्र, इनकी ईमानदारी और आचरण इत्यादि को देख सकते हैं, और उन्हें इनमें कोई दोष नहीं मिलता होगा। ऐसे व्यक्ति मौजूदा सामाजिक प्रवृत्तियों के अनुकूल होने में खास तौर से सक्षम होते हैं। भले ही ये लोग अधिक उम्र के हों, पर वे कभी समकालीन प्रवृत्तियों से पीछे नहीं रहते और कभी इतने बूढ़े नहीं होते कि सीखना बंद कर दें। सतह पर, कोई भी ऐसे व्यक्ति में दोष नहीं निकाल सकता, लेकिन अपने भीतरी सार से वे शैतान द्वारा सरासर और पूरी तरह से भ्रष्ट किए जा चुके होते हैं। हालाँकि इन लोगों में कोई बाहरी दोष नहीं ढूँढ़ा जा सकता, और हालाँकि सतह पर वे सौम्य, परिष्कृत होते हैं और ज्ञान और एक खास नैतिकता रखते हैं, और उनमें ईमानदारी होती है, और हालाँकि ज्ञान के मामले में वे किसी भी तरह से युवा लोगों से कम नहीं होते, फिर भी जहाँ तक उनके प्रकृति सार का संबंध होता है, ऐसे लोग शैतान के पूर्ण और जीवित प्रतिमान होते हैं। वे शैतान के पूर्ण प्रतिबिंब होते हैं। यह शैतान द्वारा मनुष्य को भ्रष्ट करने का “फल” है। मैंने जो कहा है, उससे तुम्हें ठेस पहुँच सकती है, पर यह सब सत्य है। जिस ज्ञान का मनुष्य अध्ययन करता है, जिस विज्ञान को वह समझता है और सामाजिक प्रवृत्तियों के अनुरूप होने के लिए जिन साधनों का वह चयन करता है, वे निरपवाद रूप से शैतान द्वारा मनुष्य को भ्रष्ट करने के उपकरण हैं। यह बिल्कुल सत्य है। इसलिए मनुष्य एक ऐसे स्वभाव के भीतर जीता है, जिसे शैतान द्वारा पूरी तरह से भ्रष्ट कर दिया गया होता है, और मनुष्य के पास यह जानने का कोई तरीका नहीं है कि परमेश्वर की पवित्रता क्या है या परमेश्वर का सार क्या है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि व्यक्ति शैतान के मनुष्य को भ्रष्ट करने के तरीकों में ऊपरी तौर पर दोष नहीं ढूँढ़ सकता; किसी के व्यवहार से कोई यह नहीं कह सकता कि कुछ अनुचित है। प्रत्येक व्यक्ति अपना कार्य सामान्य रूप से करता है और सामान्य जीवन जीता है; वह सामान्य रूप से पुस्तकें और समाचारपत्र पढ़ता है, सामान्य रूप से अध्ययन करता और बोलता है। कुछ लोग कुछ नैतिकता सीख लेते है, और वे बोलने में अच्छे, दूसरों को समझने वाले और मित्रतापूर्ण होते हैं, मददगार और उदार होते हैं, और छोटी-छोटी बातों पर झगड़ा नहीं करते या लोगों का फायदा नहीं उठाते। लेकिन उनका भ्रष्ट शैतानी स्वभाव उनमें गहरी जड़ें जमाए होता है और यह सार बाहरी प्रयासों पर भरोसा करके नहीं बदला जा सकता। इस सार के कारण मनुष्य परमेश्वर की पवित्रता को समझने में समर्थ नहीं है, और परमेश्वर की पवित्रता के सार को मनुष्य पर प्रकट किए जाने के बावज़ूद वह इसे गंभीरता से नहीं लेता। ऐसा इसलिए है, क्योंकि विभिन्न साधनों के जरिये शैतान पहले ही मनुष्य की भावनाओं, मतों, दृष्टिकोणों और विचारों को अपने कब्जे में करने के लिए आ चुका होता है। यह कब्ज़ा और भ्रष्टता अस्थायी या आकस्मिक नहीं होते; बल्कि हर जगह और हर समय विद्यमान रहते हैं। इस प्रकार, तीन या चार साल से, या पाँच या छह साल से भी, परमेश्वर पर विश्वास करते आ रहे बहुत-से लोग अभी भी इन दुष्ट विचारों, दृष्टिकोणों, तर्क और फलसफ़ों को खजाने के रूप में लेते हैं जो शैतान ने उनमें भर दिए हैं, और उन्हें छोड़ देने में असमर्थ हैं। चूँकि मनुष्य ने शैतान की प्रकृति से आने वाली दुष्ट, अहंकारी और दुर्भावनापूर्ण चीज़ों को स्वीकार किया है, इसलिए उनके अंतर्वैयक्तिक संबंधों में अपरिहार्य रूप से प्रायः संघर्ष, बहसबाजी और असामंजस्य रहता है, जो शैतान की अहंकारी प्रकृति के परिणामस्वरूप आता है। अगर शैतान ने मानवजाति को सकारात्मक चीजें दी होतीं—उदाहरण के लिए, अगर मनुष्य द्वारा स्वीकृत पारंपरिक संस्कृति का कन्फ्यूशीवाद और ताओवाद अच्छी चीजें होतीं—तो उन चीजों को स्वीकार करने के बाद समान मानसिकता वाले व्यक्तियों को आपस में मिलजुलकर रहने में समर्थ होना चाहिए था। तो समान चीजें स्वीकार करने वालों के बीच इतनी बड़ी फूट क्यों है? क्यों है इतनी बड़ी फूट? ऐसा इसलिए है, क्योंकि ये चीजें शैतान से आती हैं और शैतान लोगों में दरार पैदा करता है। शैतान से आने वाली चीजें, चाहे वे ऊपरी तौर पर कितनी ही गरिमापूर्ण और महान क्यों न दिखाई पड़ें, मनुष्यों के लिए और उनके जीवन में केवल अहंकार और कपटपूर्ण प्रकार की दुष्ट प्रकृति के अलावा और कुछ नहीं लातीं। क्या यह सही नहीं है? कोई ऐसा व्यक्ति, जो अपने को छिपाने में सक्षम हो, जिसके पास ज्ञान की संपदा हो या जिसकी अच्छी परवरिश हुई हो, उसे भी अपने भ्रष्ट शैतानी स्वभाव को छिपाने में कठिनाई होगी। अर्थात्, इस व्यक्ति ने भले ही अपने आपको कितने ही तरीकों से छिपाया हो, चाहे तुम उसे संत समझते थे या सोचते थे कि वह पूर्ण है, या तुम सोचते थे कि वह एक फरिश्ता है, चाहे तुमने उसे कितना भी शुद्ध क्यों न समझा हो, पर्दे के पीछे उसका जीवन किस तरह का है? उसके स्वभाव के प्रकाशन में तुम क्या सार देखोगे? निस्संदेह तुम शैतान की दुष्ट प्रकृति देखोगे। क्या ऐसा कहना स्वीकार्य है? (हाँ।) उदाहरण के लिए, मान लो कि तुम लोग अपने करीबी किसी व्यक्ति को जानते हो, जिसके बारे में तुम सोचते थे कि वह अच्छा व्यक्ति है, शायद कोई ऐसा व्यक्ति, जिसे तुम एक आदर्श मानते थे। अपने वर्तमान आध्यात्मिक कद के अनुसार तुम उसके बारे में क्या सोचते हो? पहले, तुम यह आकलन करते हो कि इस प्रकार के व्यक्ति में मानवता है या नहीं, क्या वह ईमानदार है, क्या उसमें लोगों के लिए सच्चा प्रेम है, क्या उसके वचन और कार्य दूसरों को लाभ और सहायता पहुँचाते हैं। (नहीं पहुँचाते।) इन लोगों द्वारा दिखाई जाने वाली तथाकथित दयालुता, प्रेम या अच्छाई क्या है? यह सब झूठ है, मुखौटा है। इस मुखौटे के पीछे एक गुप्त दुष्ट उद्देश्य है : उस व्यक्ति को इष्ट और पूजनीय बनाना। क्या तुम लोग इसे स्पष्ट रूप से देखते हो? (हाँ।)
—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है V
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 153
शैतान लोगों को भ्रष्ट करने के लिए जिन विधियों का उपयोग करता है, वे मानवजाति के लिए क्या लेकर आती हैं? क्या वे कोई सकारात्मक चीज़ लाती हैं? पहली बात, क्या मनुष्य अच्छे और बुरे के बीच अंतर कर सकता है? क्या तुम कहोगे कि इस संसार में, चाहे कोई प्रसिद्ध या महान व्यक्ति हो, या कोई पत्रिका या अन्य प्रकाशन, जिन मानकों का यह निर्णय करने के लिए उपयोग करते हैं कि कोई चीज अच्छी है या बुरी, और सही है या ग़लत, वे सटीक मानक हैं? क्या घटनाओं और लोगों के बारे में उनके आकलन निष्पक्ष हैं? क्या उनमें सच्चाई है? क्या यह संसार, यह मानवजाति, सकारात्मक और नकारात्मक चीजों का आकलन सत्य के मानक के आधार पर करती है? (नहीं।) लोगों में वह क्षमता क्यों नहीं है? लोगों ने ज्ञान का इतना अधिक अध्ययन किया है और विज्ञान के विषय में इतना अधिक जानते हैं, इसलिए वे महान क्षमताओं से युक्त हैं, है न? तो फिर वे सकारात्मक और नकारात्मक चीज़ों के बीच अंतर करने में क्यों असमर्थ हैं? ऐसा क्यों है? (क्योंकि लोगों के पास सत्य नहीं है, विज्ञान और ज्ञान सत्य नहीं हैं।) शैतान मानवजाति के लिए जो भी चीज़ लेकर आता है, वह दुष्ट और भ्रष्ट होती है, और उसमें सत्य, जीवन और मार्ग का अभाव होता है। शैतान द्वारा मनुष्य के लिए लाई जाने वाली दुष्टता और भ्रष्टता को देखते हुए क्या तुम कह सकते हो कि शैतान के पास प्रेम है? क्या तुम कह सकते हो कि मनुष्य के पास प्रेम है? कुछ लोग कह सकते हैं : “तुम ग़लत हो, दुनिया में बहुत लोग हैं, जो गरीबों और बेघर लोगों की सहायता करते हैं। क्या वे अच्छे लोग नहीं हैं? यहाँ धर्मार्थ संगठन भी हैं, जो अच्छे कार्य करते हैं; क्या उनके द्वारा किए जाने वाले कार्य अच्छे नहीं हैं?” तुम उसे क्या कहोगे? शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए कई अलग-अलग विधियों और सिद्धांतों का उपयोग करता है; क्या मनुष्य की यह भ्रष्टता एक अस्पष्ट धारणा है? नहीं, यह अस्पष्ट नहीं है। शैतान कुछ व्यावहारिक चीज़ें भी करता है, और वह इस दुनिया और समाज में किसी दृष्टिकोण या किसी सिद्धांत को बढ़ावा भी देता है। प्रत्येक राजवंश और प्रत्येक काल-खंड में वह एक सिद्धांत को बढ़ावा देता है और मनुष्यों के मन में विचार भरता है। ये विचार और सिद्धांत धीरे-धीरे लोगों के हृदयों में जड़ जमा लेते हैं, और तब वे उन विचारों और सिद्धांतों के अनुसार जीना आरंभ कर देते हैं। एक बार जब वे इन चीज़ों के अनुसार जीने लगते हैं, तो क्या वे अनजाने ही शैतान नहीं बन जाते? क्या तब लोग शैतान के साथ एक नहीं हो जाते? जब लोग शैतान के साथ एक हो जाते हैं, तो अंत में परमेश्वर के प्रति उनका क्या रवैया होता है? क्या यह वही रवैया नहीं होता, जो शैतान परमेश्वर के प्रति रखता है? कोई भी यह स्वीकार करने का साहस नहीं करता, है न? यह कितना भयावह है। मैं क्यों कहता हूँ कि शैतान की प्रकृति दुष्ट है? मैं ऐसा अकारण नहीं कहता; बल्कि, शैतान की प्रकृति का निर्धारण और विश्लेषण इस आधार पर किया जाता है कि उसने क्या किया है और किन चीज़ों को प्रकट किया है। अगर मैंने केवल यह कहा होता कि शैतान दुष्ट है, तो तुम लोग क्या सोचते? तुम लोग सोचते : “स्पष्टतः शैतान दुष्ट है।” इसलिए मैं तुमसे पूछता हूँ : “शैतान के कौन-से पहलू दुष्टता हैं?” अगर तुम कहते हो : “शैतान द्वारा परमेश्वर का विरोध करना दुष्टता है,” तो तुम अभी भी स्पष्टता के साथ नहीं बोल रहे होगे। अब जबकि मैंने इस प्रकार विशिष्ट रूप से कहा है; तो क्या तुम्हें शैतान की दुष्टता के सार की विशिष्ट अंतर्वस्तु के बारे में समझ है? (हाँ।) अगर तुम शैतान की दुष्ट प्रकृति स्पष्ट रूप से देखने में सक्षम हो, तो तुम अपनी खुद की स्थितियाँ देखोगे। क्या इन दोनों चीज़ों के बीच कोई संबंध है? यह तुम लोगों के लिए मददगार है या नहीं? (हाँ, है।) जब मैं परमेश्वर की पवित्रता के सार के बारे में संगति करता हूँ, तो क्या यह आवश्यक है कि मैं शैतान के दुष्ट सार के बारे में भी संगति करूँ? इस बारे में तुम्हारी क्या राय है? (हाँ, यह आवश्यक है।) क्यों? (शैतान की दुष्टता परमेश्वर की पवित्रता को स्पष्टता से उभार देती है।) क्या यह ऐसा ही है? यह आंशिक रूप से सही है, इस अर्थ में कि शैतान की दुष्टता के बिना लोग परमेश्वर की पवित्रता को नहीं जानेंगे; यह कहना सही है। लेकिन अगर तुम कहते हो कि परमेश्वर की पवित्रता केवल शैतान की दुष्टता के विपरीत होने के कारण विद्यमान है, तो क्या यह सही है? सोचने का यह द्वंद्वात्मक तरीका ग़लत है। परमेश्वर की पवित्रता परमेश्वर का अंतर्निहित सार है; यहाँ तक कि जब परमेश्वर इसे अपने कर्मों के माध्यम से प्रकट करता है, तब भी वह परमेश्वर के सार की एक स्वाभाविक अभिव्यक्ति है और यह तब भी परमेश्वर का अंतर्निहित सार है; यह हमेशा विद्यमान रही है और स्वयं परमेश्वर के लिए अंतर्भूत और सहज है, यद्यपि मनुष्य इसे नहीं देख सकता। ऐसा इसलिए है, क्योंकि मनुष्य शैतान के भ्रष्ट स्वभाव के बीच और शैतान के प्रभाव के अधीन रहता है, और वह पवित्रता के बारे में ही नहीं जानता, परमेश्वर की पवित्रता की विशिष्ट अंतर्वस्तु के बारे में तो कैसे जानेगा। तो क्या यह आवश्यक है कि हम पहले शैतान के दुष्ट सार के बारे में संगति करें? (हाँ, यह आवश्यक है।) कुछ लोग कुछ संदेह व्यक्त कर सकते हैं : “तुम स्वयं परमेश्वर के बारे में संगति कर रहे हो, तो फिर तुम हर समय इस बारे में बात क्यों करते रहते हो कि शैतान लोगों को भ्रष्ट कैसे करता है और शैतान की प्रकृति दुष्ट कैसे है?” अब तुमने इन संदेहों का समाधान कर लिया है, है ना? जब लोगों को शैतान की दुष्टता का बोध हो जाता है और जब उनके पास उसकी एक सही परिभाषा होती है, जब लोग दुष्टता की विशिष्ट अंतर्वस्तु और अभिव्यक्ति को, दुष्टता के स्रोत और सार को स्पष्ट रूप से देख लेते हैं, केवल तभी, परमेश्वर की पवित्रता की चर्चा के माध्यम से, लोग स्पष्ट रूप से समझ और पहचान पाते हैं कि परमेश्वर की पवित्रता क्या है, पवित्रता मात्र क्या है। अगर मैं शैतान की दुष्टता की चर्चा न करूँ, तो कुछ लोग ग़लती से यह विश्वास कर लेंगे कि कुछ चीजों का, जिन्हें लोग समाज में या लोगों के बीच करते हैं—या कुछ खास चीजों का, जो इस संसार में विद्यमान हैं—पवित्रता से कुछ संबंध हो सकता है। क्या यह दृष्टिकोण ग़लत नहीं है? (हाँ, है।)
—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है V
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 154
शैतान द्वारा मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए ज्ञान का और उसे नियंत्रित करने के लिए प्रसिद्धि और लाभ का उपयोग करना (चुना हुआ अंश)
शैतान जिन पाँच तरीकों से मनुष्य को भ्रष्ट करता है, उनमें से जिस पहले तरीके का हमने जिक्र किया था, वह ज्ञान है, इसलिए हम संगति के लिए अपने पहले विषय के रूप में ज्ञान को लेते हैं। शैतान ज्ञान को चारे की तरह इस्तेमाल करता है। ध्यान से सुनो : ज्ञान बस एक तरह का चारा है। लोगों को कड़ी मेहनत से अध्ययन करने और खुद को दिन-प्रतिदिन बेहतर बनाने, ज्ञान को हथियार बनाने और खुद को उससे हथियारबंद करने, और फिर ज्ञान का उपयोग विज्ञान का द्वार खोलने हेतु करने के लिए फुसलाया जाता है; दूसरे शब्दों में, जितना अधिक ज्ञान तुम अर्जित करोगे, उतना ही अधिक तुम समझोगे। शैतान लोगों को यह सब कुछ बताता है; वह लोगों को ज्ञान अर्जित करते समय ऊँचे आदर्शों को बढ़ावा देने के लिए कहता है, उन्हें महत्वाकांक्षाएँ और आकांक्षाएँ निर्मित करने का निर्देश देता है। शैतान इस तरह के कई संदेश देता है, जिनसे मनुष्य अनजान होता है और लोगों को अनजाने ही यह महसूस करवाता है कि ये चीजें सही या लाभप्रद हैं। अनजाने ही लोग इस मार्ग पर कदम रख देते हैं, अनजाने ही अपने आदर्शों और महत्वाकांक्षाओं द्वारा आगे बढ़ा दिए जाते हैं। धीरे-धीरे वे बिना जाने ही शैतान द्वारा दिए गए ज्ञान से महान या प्रसिद्ध लोगों के सोचने के तरीके सीख लेते हैं। वे उन लोगों के कर्मों से भी कुछ चीजें सीखते हैं, जिन्हें नायक माना जाता है। इन नायकों के कर्मों में शैतान मनुष्य के लिए किस बात की वकालत करता है? वह मनुष्य के मन के भीतर क्या बैठाना चाहता है? वह यह कि मनुष्य को देशभक्त होना चाहिए, उसमें राष्ट्रीय अखंडता की भावना होनी चाहिए, वीरोचित भावना होनी चाहिए। मनुष्य ऐतिहासिक कहानियों से या वीर नायकों की जीवनियों से क्या सीखता है? व्यक्तिगत निष्ठा की भावना रखना, अपने दोस्तों और भाइयों के लिए कुछ भी कर गुजरने को तैयार रहना सीखता है। शैतान के इस ज्ञान के अंतर्गत मनुष्य अनजाने ही कई ऐसी चीजें सीख लेता है, जो बिल्कुल सकारात्मक नहीं हैं। मनुष्य की अनभिज्ञता के बीच शैतान द्वारा तैयार किए गए बीज लोगों के अपरिपक्व मन में बो दिए जाते हैं। ये बीज उन्हें यह महसूस कराते हैं कि उन्हें महान व्यक्ति होना चाहिए, प्रसिद्ध होना चाहिए, नायक होना चहिए, देशभक्त होना चाहिए, अपने परिवार से प्रेम करने वाला व्यक्ति होना चाहिए, और ऐसा व्यक्ति होना चाहिए जो मित्र के लिए कुछ भी करेगा और व्यक्तिगत निष्ठा की भावना रखेगा। शैतान के बहकाए में आकर वे अनजाने ही उस रास्ते पर चल पड़ते हैं, जिसे उसने उनके लिए तैयार किया होता है। जब वे इस रास्ते पर चलते हैं, तो उन्हें शैतान के जीवन जीने के नियम स्वीकारने के लिए बाध्य किया जाता है। पूरी तरह से अनजान, वे जीवन जीने के अपने नियम विकसित कर लेते हैं, लेकिन ये शैतान के नियमों से ज्यादा कुछ नहीं होते, जिन्हें उसने जबरदस्ती उनके भीतर बैठा दिया है। सीखने की प्रक्रिया के दौरान शैतान उन्हें बनाता है, उनके लक्ष्यों को बढ़ावा देता है और उनके जीवन के लक्ष्य, जीवन जीने के सिद्धांत और जीवन की दिशा निर्धारित करता है और इस पूरे समय कहानियों, जीवनियों और लोगों को बहकाने के सभी संभावित माध्यमों का उपयोग करके उनमें थोड़ी-थोड़ी करके शैतान की चीजें भरता है, जब तक कि वे उसके जाल में पूरी तरह फँस नहीं जाते। इस तरह से, सीखने के दौरान कुछ लोग साहित्य, तो कुछ लोग अर्थशास्त्र, और कुछ लोग खगोल विज्ञान या भूगोल पसंद करने लगते हैं। फिर कुछ लोग ऐसे होते हैं, जो राजनीति को पसंद करने लगते हैं, कुछ लोग भौतिक विज्ञान को, कुछ रसायन विज्ञान को, यहाँ तक कि कुछ अन्य लोग धर्मशास्त्र को पसंद करते हैं। ये सब उस बृहत्तर इकाई के अंग हैं, जिसे ज्ञान कहते हैं। तुम सभी लोग मन ही मन जानते हो कि ये चीजें वास्तव में क्या हैं, तुम सभी का उनके साथ पहले संपर्क रहा है। तुममें से प्रत्येक व्यक्ति ज्ञान की इन शाखाओं में से किसी न किसी के संबंध में निरंतर बात कर सकता है। इसलिए यह स्पष्ट है कि यह ज्ञान मनुष्य के मन में कितनी गहराई तक प्रवेश कर चुका है, यह आसानी से देखा जा सकता है कि इस ज्ञान ने लोगों के मन में क्या स्थान बना लिया है और इसका उन पर कितना गहरा प्रभाव है। जब व्यक्ति ज्ञान के किसी पहलू को पसंद करने लगता है, जब व्यक्ति को उससे गहराई से प्रेम हो जाता है, तब वह अनजाने ही महत्वाकांक्षाएँ विकसित कर लेता है : कुछ लोग लेखक बनना चाहते हैं, कुछ लोग साहित्यकार बनना चाहते हैं, कुछ लोग राजनीति को अपना पेशा बनाना चाहते हैं, और कुछ अर्थशास्त्र में संलग्न होकर व्यवसायी बनना चाहते हैं। फिर एक हिस्सा ऐसे लोगों का भी है, जो नायक बनना चाहते हैं, महान या प्रसिद्ध बनना चाहते हैं। कोई चाहे जिस भी प्रकार का व्यक्ति बनना चाहे, उसका लक्ष्य ज्ञान अर्जित करने के इस तरीके को अपनाना और उसे अपने उद्देश्यों के लिए, अपनी इच्छाएँ और महत्वाकांक्षाएँ साकार करने के लिए इस्तेमाल करना होता है। चाहे यह कितना भी अच्छा क्यों न लगे—चाहे वे अपने स्वप्न साकार करना चाहते हों, अपना जीवन व्यर्थ न करना चाहते हों, या कोई खास करियर बनाना चाहते हों—वे ये ऊँचे आदर्श और महत्वाकांक्षाएँ पाल लेते हैं, लेकिन इन सब का मतलब क्या है? क्या तुम लोगों ने पहले कभी इस प्रश्न पर विचार किया है? शैतान इस तरह की हरकतें क्यों करता है? मनुष्य के भीतर ये चीजें बैठाने में शैतान का क्या उद्देश्य है? अब तुम लोगों को इस प्रश्न का उत्तर मिल गया होगा।
—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 155
शैतान द्वारा मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए ज्ञान का और उसे नियंत्रित करने के लिए प्रसिद्धि और लाभ का उपयोग करना (चुने हुए अंश)
लोगों के ज्ञान प्राप्त करने की प्रक्रिया के दौरान सभी प्रकार के तरीके इस्तेमाल करके, चाहे वह कहानियाँ सुनाना हो, बस उन्हें कुछ ज्ञान देकर या उन्हें अपनी इच्छाएँ या आकांक्षाएँ पूरी करने देकर, शैतान लोगों को किस मार्ग पर ले जाना चाहता है? लोगों को लगता है कि ज्ञान अर्जित करने में कुछ भी गलत नहीं है, यह पूरी तरह स्वाभाविक और न्यायोचित है। इसे आकर्षक ढंग से प्रस्तुत करें तो ऊँची आकांक्षाएँ रखने या महत्वाकांक्षाएँ होने का मतलब दृढ़-संकल्प होना है और यही जीवन में सही मार्ग होना चाहिए। अगर कोई अपने जीवनकाल में अपनी आकांक्षाएँ पूरी कर सके या सफल करियर बना सके, तो क्या यह जीने का अधिक शानदार तरीका नहीं है? इस तरह व्यक्ति न केवल अपने पूर्वजों का सम्मान कर सकता है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए अपनी छाप छोड़ने का मौका भी पा सकता है—क्या यह अच्छी बात नहीं है? सांसारिक लोगों की दृष्टि में यह एक अच्छी बात है, और उनकी निगाह में यह उचित और सकारात्मक होनी चाहिए। लेकिन क्या शैतान, अपने दुर्भावनापूर्ण इरादों के साथ, लोगों को ऐसे मार्ग पर ले जाता है और बस इतना ही होता है? बिल्कुल नहीं। वास्तव में, मनुष्य की आकांक्षाएँ चाहे कितनी भी बड़ी क्यों न हों, उसकी इच्छाएँ चाहे कितनी भी यथार्थपरक क्यों न हों या वे कितनी भी उचित क्यों न हों, मनुष्य जो कुछ भी हासिल करना चाहता है और मनुष्य जिस चीज का भी अनुसरण करता है वह सब अटूट रूप से दो शब्दों से जुड़ा है। ये दो शब्द हर व्यक्ति के लिए उसके संपूर्ण जीवन में अत्यंत महत्वपूर्ण हैं, और ये ऐसी चीजें हैं जिन्हें शैतान मनुष्य के भीतर बैठाना चाहता है। वे दो शब्द कौन-से हैं? वे हैं “प्रसिद्धि” और “लाभ।” शैतान एक बहुत ही सौम्य तरीका चुनता है, एक ऐसा तरीका जो मनुष्य की धारणाओं के बहुत ही अनुरूप है और जो बहुत आक्रामक नहीं है, ताकि वह लोगों से अनजाने में ही जीवित रहने के अपने साधन और नियम स्वीकार करवा ले, जीवन लक्ष्य और जीवन की दिशाएँ विकसित करवा ले और जीवन की आकांक्षाएँ रखवाने लगे। अपने जीवन की आकांक्षाओं के बारे में लोगों के वर्णन कितने ही आडंबरपूर्ण क्यों न लगते हों, ये आकांक्षाएँ हमेशा “प्रसिद्धि” और “लाभ” के इर्द-गिर्द घूमती हैं। कोई भी महान या प्रसिद्ध व्यक्ति—या वास्तव में कोई भी व्यक्ति—जीवन भर जिन सारी चीजों का पीछा करता है वे केवल इन दो शब्दों से जुड़ी होती हैं : “प्रसिद्धि” और “लाभ।” लोगों को लगता है कि एक बार उनके पास प्रसिद्धि और लाभ आ जाए तो उनके पास ऊँचे रुतबे और अपार धन-संपत्ति का आनंद लेने और जीवन का आनंद लेने के लिए पूँजी आ जाती है। उन्हें लगता है कि एक बार उनके पास प्रसिद्धि और लाभ आ जाए तो उनके पास वह पूँजी होती है जिसका इस्तेमाल वे सुख खोजने और देह के उच्छृंखल आनंद में लिप्त रहने के लिए कर सकते हैं। लोग जिस प्रसिद्धि और लाभ की कामना करते हैं उसकी खातिर वे खुशी से और अनजाने में, अपने शरीर, दिल और यहाँ तक कि अपनी संभावनाओं और नियतियों समेत वह सब जो उनके पास है, शैतान को सौंप देते हैं। वे बिना कुछ बाकी रखे ऐसा करते हैं, बिना एक पल के संदेह के करते हैं और उनके पास कभी जो कुछ था उसे वापस लेने की जागरूकता के बिना करते हैं। लोग जब इस प्रकार खुद को शैतान को सौंप देते हैं और उसके प्रति वफादार हो जाते हैं तो क्या वे खुद पर कोई नियंत्रण बनाए रख सकते हैं? कदापि नहीं। वे पूरी तरह से और शत-प्रतिशत शैतान से नियंत्रित होते हैं। वे पूरी तरह से और सर्वथा इस दलदल में धँस जाते हैं और अपने आप को मुक्त कराने में असमर्थ रहते हैं। जब कोई प्रसिद्धि और लाभ की दलदल में फँस जाता है तो फिर वह कभी उसे नहीं खोजता जो उजला है, जो न्यायसंगत है या वे चीजें नहीं खोजता जो खूबसूरत और अच्छी हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि लोगों के लिए प्रसिद्धि और लाभ का प्रलोभन बहुत बड़ा होता है और ये ऐसी चीजें हैं जिनका अनुसरण लोग अंतहीन ढंग से अपने पूरे जीवन भर और यहाँ तक कि अनंत काल तक कर सकते हैं। क्या यह असली स्थिति नहीं है? कुछ लोग कहेंगे कि ज्ञान अर्जित करना पुस्तकें पढ़ने और कुछ ऐसी चीजें सीखने से अधिक कुछ नहीं है जिन्हें तुम पहले से नहीं जानते हो, ताकि समय से पीछे न रह जाओ या संसार द्वारा पीछे न छोड़ दिए जाओ। ज्ञान का अर्जन केवल आजीविका जुटाने के लिए, अपने भविष्य के लिए या बुनियादी आवश्यकताएँ मुहैया कराने के लिए किया जाता है। क्या कोई ऐसा व्यक्ति है, जो मात्र मूलभूत आवश्यकताओं के लिए और मात्र भोजन का मसला हल करने के लिए एक दशक तक कठिन परिश्रम से अध्ययन करेगा? नहीं, ऐसा कोई नहीं है। तो फिर व्यक्ति इन सारे वर्षों तक ये कठिनाइयाँ क्यों सहन करता है? प्रसिद्धि और लाभ के लिए। प्रसिद्धि और लाभ आगे उसका इंतजार कर रहे हैं, उसे इशारे से बुला रहे हैं, और वह मानता है कि केवल अपने परिश्रम, कठिनाइयों और संघर्ष के माध्यम से ही वह उस मार्ग पर कदम बढ़ा सकता है जो प्रसिद्धि और लाभ की ओर ले जाएगा, जिससे उसे ये चीजें प्राप्त होंगी। ऐसे व्यक्ति को अपने भविष्य के पथ के लिए, अपने भविष्य के आनंद के लिए और एक बेहतर जिंदगी प्राप्त करने के लिए ये कठिनाइयाँ सहनी ही होंगी। भला यह ज्ञान क्या है—क्या तुम लोग मुझे बता सकते हो? क्या यह जीवन जीने के वे नियम और फलसफे नहीं हैं जिन्हें शैतान मनुष्य के भीतर डालता है, जैसे “पार्टी से प्यार करो, देश से प्यार करो, और अपने धर्म से प्यार करो” और “बुद्धिमान इंसान हालात के अनुसार अपना रुख बदलता है”? क्या ये जीवन की “ऊँची आकांक्षाएँ” नहीं हैं, जिन्हें शैतान द्वारा मनुष्य के भीतर डाला गया है, जैसे, महान लोगों की सोच, प्रसिद्ध लोगों की ईमानदारी या वीर शख्सियतों की बहादुरी की भावना या मार्शल आर्ट से जुड़े उपन्यासों में शूरवीरों और तलवारबाजों का शौर्य और उदारता? ये विचार और कथन पीढ़ी-दर-पीढ़ी लोगों को प्रभावित करते हैं; बहुत-से लोग इन विचारों को स्वीकार करते हैं, और वे इन “ऊँची आकांक्षाओं” को पूरा करने के लिए उनके पीछे भागते हैं, लगातार संघर्ष करते हैं और यहाँ तक कि अपने प्राणों की आहुति देने को भी तैयार रहते हैं। यह वह साधन और तरीका है जिसके द्वारा शैतान लोगों को भ्रष्ट करने के लिए ज्ञान का उपयोग करता है। तो जब शैतान लोगों को इस मार्ग पर ले जाता है, तो क्या वे परमेश्वर के प्रति समर्पण और उसकी आराधना कर पाते हैं? और क्या वे परमेश्वर के वचन स्वीकार कर पाते हैं और सत्य का अनुसरण कर पाते हैं? बिल्कुल नहीं—क्योंकि वे शैतान द्वारा दिग्भ्रमित किए जा चुके हैं। आओ, अब हम इस पर विचार करें : शैतान द्वारा लोगों के मन में बिठाए गए ज्ञान, विचारों और दृष्टिकोणों के भीतर क्या परमेश्वर के प्रति समर्पण करने और उसकी आराधना करने के सत्य हैं? क्या परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने के सत्य हैं? क्या परमेश्वर का कोई वचन है? क्या उनमें कुछ ऐसा है जो सत्य का है? बिल्कुल नहीं—ये चीजें पूरी तरह से अनुपस्थित हैं। क्या तुम लोग निश्चित हो सकते हो कि शैतान द्वारा लोगों में डाली गई चीजों में कोई सत्य नहीं है? भले ही तुम निश्चित रूप से कहने का साहस न करो, इसमें कोई समस्या नहीं है। अगर तुम यह मानते हो कि “प्रसिद्धि” और “लाभ” वे दो प्रमुख शब्द हैं, जिनका इस्तेमाल शैतान लोगों को बहकाकर दुष्टता के मार्ग पर ले जाने के लिए करता है, तो यह पर्याप्त है।
अब आओ, समीक्षा करते हैं : मनुष्य को मजबूती से अपने नियंत्रण में रखने के लिए शैतान किस चीज का उपयोग करता है? (प्रसिद्धि और लाभ का।) शैतान मनुष्य के विचारों को नियंत्रित करने के लिए प्रसिद्धि और लाभ का इस्तेमाल करता है, उससे और कुछ नहीं, बस इन दो ही चीजों के बारे में सोच-विचार करवाता है और उससे प्रसिद्धि और लाभ के लिए संघर्ष करवाता है, प्रसिद्धि और लाभ के लिए कष्ट उठवाता है, प्रसिद्धि और लाभ के लिए अपमान सहन करवाता है और भारी बोझ उठवाता है, प्रसिद्धि और लाभ के लिए अपना सर्वस्व त्याग करवाता है और उससे प्रसिद्धि और लाभ की खातिर हर फैसला या निर्णय करवाता है। इस तरीके से शैतान मनुष्य पर अदृश्य बेड़ियाँ डाल देता है और इन बेड़ियों के रहते उसमें उन बंधनों से मुक्त होने की न तो क्षमता होती है, न ही साहस। अनजाने में वह बड़ी ही कठिनाई से कदम-दर-कदम आगे घिसटते हुए ये बेड़ियाँ ढोता रहता है। इस प्रसिद्धि और लाभ की खातिर मानवजाति परमेश्वर से दूर हो जाती है, उसके साथ विश्वासघात करती है और अधिकाधिक दुष्ट होती जाती है। इस तरह, एक के बाद एक पीढ़ी शैतान की प्रसिद्धि और लाभ के बीच नष्ट होती जाती है। अब शैतान की करतूतें देखते हुए क्या उसके धूर्त इरादे एकदम घृणास्पद नहीं हैं? शायद आज भी तुम शैतान की धूर्त मंशाओं की असलियत नहीं देख पाते हो क्योंकि तुम्हें लगता है कि प्रसिद्धि और लाभ के बिना जीवन का कोई अर्थ नहीं होगा और लोग अब आगे का मार्ग नहीं देख पाएँगे, अपने लक्ष्य नहीं देख पाएँगे और उनका भविष्य अंधकारमय, धुँधला और प्रकाशरहित हो जाएगा। परंतु धीरे-धीरे तुम सब लोग एक दिन समझ जाओगे कि प्रसिद्धि और लाभ ऐसी भारी-भरकम बेड़ियाँ हैं जिन्हें शैतान मनुष्य पर डाल देता है। जब वह दिन आएगा, तुम पूरी तरह से शैतान के नियंत्रण का प्रतिरोध करोगे और पूरी तरह से उन बेड़ियों का भी प्रतिरोध करोगे जो शैतान ने तुम पर डाल दी हैं। जब तुम उन सभी चीजों से खुद को मुक्त करना चाहोगे जिन्हें शैतान ने तुम्हारे भीतर गहराई से बैठा दिया है, तब तुम शैतान से अपने आपको पूरी तरह से अलग कर लोगे और उस सबसे सच में नफरत करोगे जो शैतान तुम्हारे लिए लाया है। तभी तुम्हारे पास परमेश्वर के प्रति सच्चा प्रेम होगा और तड़प होगी।
—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 156
शैतान द्वारा मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए विज्ञान का उपयोग करना
शैतान विज्ञान के नाम का उपयोग मनुष्य की विज्ञान की खोज करने और रहस्यों की छानबीन करने की जिज्ञासा और इच्छा पूरी करने के लिए करता है। विज्ञान के नाम पर शैतान मनुष्य की भौतिक आवश्यकताएँ और उसके जीवन की गुणवत्ता में लगातार सुधार करने की माँग पूरी करता है। इस तरह शैतान इस बहाने से मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए विज्ञान का उपयोग करता है। क्या शैतान विज्ञान के उपयोग से सिर्फ मनुष्य की सोच या उसके दिमाग को भ्रष्ट करता है? हमारे आस-पड़ोस के लोगों, घटनाओं और चीजों में से, जिन्हें हम देख सकते हैं और जिनके संपर्क में हम आते हैं, और ऐसा क्या है जिसे शैतान विज्ञान से भ्रष्ट करता है? (प्राकृतिक परिवेश।) सही कहा। ऐसा प्रतीत होता है कि तुम लोगों को इससे भारी नुकसान हुआ है, और तुम लोग इससे बहुत प्रभावित हुए हो। मनुष्य को गुमराह करने के लिए विज्ञान की सभी विभिन्न खोजों और निष्कर्षों का उपयोग करने के अलावा, शैतान विज्ञान का उपयोग उस जीवन-परिवेश के प्रचंड विनाश और दोहन के लिए भी करता है, जो परमेश्वर ने मनुष्य को प्रदान किया था। वह ऐसा इस बहाने से करता है कि अगर मनुष्य वैज्ञानिक अनुसंधान करता है, तो मनुष्य के जीवन-परिवेश और जीवन की गुणवत्ता में निरंतर सुधार होगा, और इतना ही नहीं, वैज्ञानिक विकास का प्रयोजन लोगों की रोज बढ़ती भौतिक आवश्यकताएँ और अपने जीवन की गुणवत्ता निरंतर सुधारने की उनकी आवश्यकता पूरी करना है। यह शैतान द्वारा विज्ञान के विकास का सैद्धांतिक आधार है। लेकिन, विज्ञान मानवजाति के लिए क्या लाया है? क्या हमारा जीवन-परिवेश—और समस्त मानवजाति का जीवन-परिवेश—अशुद्ध नहीं हुआ है? मनुष्य जिस वायु में साँस लेता है, क्या वह अशुद्ध नहीं हुई है? जो पानी हम पीते हैं, क्या वह अशुद्ध नहीं हुआ है? जो खाना हम खाते हैं, क्या वह अभी भी जैविक और प्राकृतिक है? ज्यादातर अनाज और सब्जियाँ आनुवांशिक रूप से संशोधित होती हैं, वे उर्वरक से उगाई जाती हैं, और कुछ विज्ञान का उपयोग करके बनाई गई किस्में होती हैं। जो सब्जियाँ और फल हम खाते हैं, वे भी अब प्राकृतिक नहीं रह गए हैं। यहाँ तक कि प्राकृतिक अंडे पाना भी अब आसान नहीं रहा, और शैतान के तथाकथित विज्ञान द्वारा पहले से ही संसाधित कर दिए जाने के कारण अंडों का स्वाद भी वैसा नहीं रहा, जैसा पहले हुआ करता था। कुल मिलाकर पूरा वातावरण नष्ट और प्रदूषित कर दिया गया है; पहाड़, झीलें, जंगल, नदियाँ, सागर, और जमीन के ऊपर और नीचे की हर चीज को तथाकथित वैज्ञानिक उपलब्धियों द्वारा तहस-नहस कर दिया गया है। संक्षेप में, मानवजाति को परमेश्वर द्वारा दिए गए संपूर्ण पारिस्थितिक परिवेश, और जीवन परिवेश को तथाकथित विज्ञान द्वारा तहस-नहस और बरबाद कर दिया गया है। यद्यपि ऐसे बहुत-से लोग हैं, जिन्होंने अपनी इच्छाओं और देह, दोनों को संतुष्ट करते हुए जीवन की गुणवत्ता के संदर्भ में वह प्राप्त कर लिया है, जिसकी उन्होंने सदैव आशा की थी, लेकिन जिस परिवेश में मनुष्य रहता है, उसे विज्ञान द्वारा लाई गई विभिन्न “उपलब्धियों” द्वारा सार रूप से नष्ट और तहस-नहस कर दिया गया है। अब हमें स्वच्छ हवा की एक साँस लेने का भी अधिकार नहीं रह गया है। क्या यह मानवजाति का दुःख नहीं है? क्या मजबूरन इस तरह की जगह में रहते हुए मनुष्य के लिए कहने लायक कोई खुशी बची है? मनुष्य इस तरह की जगह में रहता है फिर भी मनुष्य का जीवन परिवेश, बिल्कुल शुरुआत में, परमेश्वर द्वारा मनुष्य के लिए सृजित किया गया था। जो पानी लोग पीते हैं, जिस वायु में वे साँस लेते हैं, जो तरह-तरह का भोजन लोग खाते हैं, विभिन्न पौधे और जीवित प्राणी, यहाँ तक कि पहाड़, झीलें और सागर—इस जीवन-परिवेश का हर हिस्सा मनुष्य को परमेश्वर द्वारा प्रदान किया गया था; यह प्राकृतिक है, परमेश्वर द्वारा निर्धारित प्राकृतिक व्यवस्था के अनुसार संचालित हो रहा है। विज्ञान के बिना भी लोग परमेश्वर द्वारा प्रदान की गई विधियों का उपयोग करते, वे उस सबका आनंद लेने में सक्षम होते जो मौलिक और प्राकृतिक है और वे बहुत खुश होते। लेकिन, अब यह सब कुछ शैतान द्वारा नष्ट और तहस-नहस कर दिया गया है; मनुष्य के रहने की बुनियादी जगह अब अपने मूल स्वरूप में नहीं रह गई है। परंतु कोई भी यह समझने में सक्षम नहीं है कि यह क्यों और कैसे हुआ, और अधिकाधिक लोग शैतान द्वारा उनमें डाले गए विचारों का उपयोग करके विज्ञान को समझ रहे और उससे पेश आ रहे हैं। क्या यह अत्यंत घृणास्पद और दयनीय नहीं है? अब जबकि शैतान ने लोगों के रहने की जगह के साथ-साथ उनके जीवन परिवेश को भी इस दशा तक भ्रष्ट कर दिया है, और मानवजाति के निरंतर इस तरह से विकसित होते रहने से, क्या स्वयं परमेश्वर को पृथ्वी पर लोगों को नष्ट करने की कोई आवश्यकता है? अगर लोग निरंतर इसी तरह से विकसित होते रहे, तो वे कौन-सी दिशा में जाएँगे? (वे पूर्णतया नष्ट कर दिए जाएँगे।) वे कैसे पूर्णतया नष्ट कर दिए जाएँगे? प्रसिद्धि और लाभ के अपने लालच-भरे अनुसरण के अलावा, लोग निरंतर वैज्ञानिक अन्वेषण करते हैं और अनुसंधान की गहराई में उतरते रहते हैं, और फिर लगातार अपनी भौतिक आवश्यकताएँ और इच्छाएँ पूरी करने के लिए इस तरह से कार्य करते रहते हैं; तो फिर मनुष्य के लिए इसके क्या नतीजे होते हैं? सबसे पहले, पारिस्थितिक संतुलन टूट जाता है, और जब ऐसा होता है, तो लोगों के आंतरिक अंग इस असंतुलित परिवेश से दूषित और क्षतिग्रस्त हो जाते हैं, और दुनिया भर में विभिन्न संक्रामक रोग और महामारियाँ फैल जाती हैं। क्या यह सच नहीं है कि अब एक ऐसी स्थिति है, जिस पर मनुष्य का कोई नियंत्रण नहीं है? अब जबकि तुम लोग इसे समझ गए हो, अगर मानवजाति परमेश्वर का अनुसरण नहीं करेगी, बल्कि इसी तरह से शैतान का ही अनुसरण करती रहेगी—अपने आपको लगातार समृद्ध करने के लिए ज्ञान का उपयोग करती रहेगी, मानव-जीवन के भविष्य की खोज करने के लिए निरंतर विज्ञान का उपयोग करती रहेगी, जीते रहने के लिए इस प्रकार की पद्धति का उपयोग करना जारी रखेगी—तो क्या तुम इसका एहसास कर सकते हो कि मानवजाति के लिए इसका अंत क्या होगा? स्वाभाविक है कि मानवजाति विलुप्त हो जाएगी : धीरे-धीरे मानवजाति विनाश की ओर बढ़ रही है, अपने ही विनाश की ओर! क्या यह खुद पर विनाश लाना नहीं है? और क्या यह वैज्ञानिक प्रगति का परिणाम नहीं है? अब ऐसा लगता है, मानो विज्ञान एक प्रकार का जादुई मिश्रण है, जिसे शैतान ने मनुष्य के लिए तैयार किया है, ताकि जब तुम चीजें समझने की कोशिश करो, तो तुम्हारे सामने सब कुछ अस्पष्ट और धुँधला हो; चाहे तुम कितने भी ध्यान से देखो, तुम चीजों को साफ-साफ न देख पाओ, तमाम प्रयासों के बावजूद, तुम उन्हें समझ न पाओ। शैतान तुम्हारी भूख बढ़ाने और तुम्हारी नाक में नकेल डालकर चलाने के लिए, एक के बाद एक कदम उठाते हुए तुम्हें रसातल और मृत्यु की ओर ले जाने के लिए विज्ञान के नाम का उपयोग करता है। और परिणामस्वरूप, लोग स्पष्ट रूप से देखेंगे कि वास्तव में मनुष्य का विनाश शैतान के हाथों से गढ़ा गया है—शैतान सरगना है।
—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 157
शैतान द्वारा मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए पारंपरिक संस्कृति का उपयोग करना
पारंपरिक संस्कृति तीसरा तरीका है, जिससे शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करता है। पारंपरिक संस्कृति और अंधविश्वास के बीच अनेक समानताएँ हैं, लेकिन अंतर यह है कि पारंपरिक संस्कृति में कुछ निश्चित कहानियाँ, संकेत और स्रोत होते हैं। शैतान ने कई लोक-कथाएँ और इतिहास की पुस्तकों में मिलने वाली कहानियाँ गढ़ी हैं, जिनसे लोगों पर पारंपरिक संस्कृति या अंधविश्वासी शख्सियतों की गहरी छाप छोड़ी जाती है। उदाहरण के लिए, चीन में “समुद्र पार करने वाली आठ अमर हस्तियाँ,” “पश्चिम की यात्रा,” जेड सम्राट, “नेझा की अजगर राजा पर विजय,” और “देवताओं का अधिष्ठापन।” क्या इन्होंने मनुष्य के मन में गहराई से जड़ें नहीं जमा ली हैं? भले ही तुम में से कुछ लोग पूरा विवरण न जानते हों, फिर भी तुम आम कहानियाँ जानते हो, और यह सामान्य विषयवस्तु ही है जो तुम्हारे हृदय और मस्तिष्क में बैठ जाती है, ताकि तुम उन्हें भुला न सको। ये ही वे विभिन्न विचार या किंवदंतियाँ हैं, जिन्हें शैतान ने बहुत समय पहले मनुष्य के लिए तैयार किया था और जिन्हें विभिन्न समय पर फैलाया गया है। ये चीजें सीधे लोगों की आत्माओं को हानि पहुँचाती और नष्ट करती हैं और लोगों को एक के बाद दूसरे सम्मोहन में डालती हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि जब तुम ऐसी पारंपरिक संस्कृति, कथाओं या अंधविश्वास भरी चीजों को स्वीकार कर लेते हो, जब वे तुम्हारे मन में बैठ जाती हैं, और जब वे तुम्हारे हृदय में अटक जाती हैं, तो तुम सम्मोहित-से हो जाते हो—तुम इन सांस्कृतिक जालों में, इन विचारों और पारंपरिक कथाओं में उलझ जाते हो और उनसे प्रभावित हो जाते हो। वे तुम्हारे जीवन को, जीवन के प्रति तुम्हारे नजरिए को और चीजों के बारे में तुम्हारे निर्णय को प्रभावित करती हैं। इससे भी बढ़कर, वे जीवन के सच्चे मार्ग के तुम्हारे अनुसरण को भी प्रभावित करती हैं : यह वास्तव में एक दुष्टतापूर्ण सम्मोहन है। तुम जितनी भी कोशिश कर लो, लेकिन उन्हें झटककर दूर नहीं कर सकते; तुम उन पर चोट तो करते हो, लेकिन उन्हें काटकर नीचे नहीं गिरा सकते; तुम उन पर प्रहार तो करते हो, लेकिन उन पर प्रहार करके उन्हें दूर नहीं कर सकते। इसके अतिरिक्त, जब लोगों पर अनजाने ही इस प्रकार का सम्मोहन डाला जाता है, तो वे अनजाने ही शैतान की आराधना करना आरंभ कर देते हैं, जिससे उनके अपने दिलों में शैतान की छवि को बढ़ावा मिलता है। दूसरे शब्दों में, वे शैतान को अपने आदर्श के रूप में, अपनी आराधना और आदर के पात्र के रूप में स्थापित कर लेते हैं, यहाँ तक कि वे उसे परमेश्वर मानने की हद तक भी चले जाते हैं। अनजाने ही ये चीजें लोगों के हृदय में हैं और उनके शब्दों और कर्मों को नियंत्रित कर रही हैं। इतना ही नहीं, तुम पहले तो इन कहानियों और किंवदंतियों को झूठा मानते हो, लेकिन फिर अनजाने ही उनका अस्तित्व स्वीकार कर लेते हो, उन्हें वास्तविक चीजें बना देते हो, और उन्हें वास्तविक, विद्यमान चीजों में बदल लेते हो। अपनी अनभिज्ञता में तुम अवचेतन रूप से इन विचारों को और इन चीजों के अस्तित्व को ग्रहण कर लेते हो। अवचेतन रूप में तुम दुष्टात्माओं, शैतान और मूर्तियों को भी अपने घर और हृदय में ग्रहण कर लेते हो—यह वास्तव में एक सम्मोहन है। क्या ये वचन तुम लोगों की समझ में आते हैं? (हाँ।) क्या तुम लोगों के बीच में कोई है, जिसने बुद्ध के सामने धूप जलाई है और उसकी आराधना की है? (हाँ।) तो बुद्ध के सामने धूप जलाने और उसकी आराधना करने का उद्देश्य क्या था? (शांति के लिए प्रार्थना करना।) अब इस बारे में सोचते हुए, क्या शांति के लिए शैतान से प्रार्थना करना बेतुका नहीं है? क्या शैतान शांति लाता है? (नहीं।) क्या तुम्हें नहीं लगता कि तब तुम कितने अज्ञानी थे? इस प्रकार का आचरण बहुत ही बेतुका, अज्ञानतापूर्ण और बेवकूफी भरा है, है न? शैतान सिर्फ इससे मतलब रखता है कि तुम्हें किस तरह भ्रष्ट किया जाए। शैतान संभवतः तुम्हें शांति नहीं दे सकता, वह तुम्हें केवल अस्थायी राहत ही दे सकता है। लेकिन यह राहत पाने के लिए तुम्हें एक प्रतिज्ञा लेनी होगी और अगर तुमने शैतान से किया अपना वादा या प्रतिज्ञा तोड़ी, तो तुम देखोगे कि वह तुम्हें किस प्रकार कष्ट देता है। तुमसे प्रतिज्ञा करवाकर वह वास्तव में तुम्हें नियंत्रित करना चाहता है। जब तुम लोगों ने शांति के लिए प्रार्थना की थी, तो क्या तुम लोगों को शांति मिली? (नहीं।) तुम्हें शांति नहीं मिली, बल्कि इसके विपरीत तुम्हारे प्रयास दुर्भाग्य और अंतहीन आपदाएँ—वास्तव में कड़वाहट का एक असीम सागर लाए। शांति शैतान की सत्ता में नहीं है, और यह तथ्य है। यह वह परिणाम है, जो सामंती अंधविश्वास और पारंपरिक संस्कृति मानवजाति के लिए लाए हैं।
—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 158
शैतान द्वारा मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए सामाजिक प्रवृत्तियों का उपयोग करना
सामाजिक प्रवृत्तियाँ वह अंतिम तरीका है, जिससे शैतान मनुष्य को भ्रष्ट और नियंत्रित करता है। सामाजिक प्रवृत्तियों में कई पहलू हैं जिनमें ऐसे क्षेत्र शामिल हैं, जैसे प्रसिद्ध और महान हस्तियों और साथ ही फिल्म और संगीत के नायकों की आराधना, सेलिब्रिटी-आराधना और ऑनलाइन गेम। ये सभी सामाजिक प्रवृत्तियों का हिस्सा हैं, और यहाँ विवरण में जाने की कोई आवश्यकता नहीं। हम बस उन विचारों के बारे में, जिन्हें सामाजिक प्रवृत्तियाँ लोगों में लाती हैं, उस तरीके के बारे में बात करेंगे, जिस तरह से वे लोगों को संसार से निपटने की दिशा दिखाती हैं, और ये लोगों में जो जीवित रहने के लक्ष्य और जीवन-दृष्टिकोण लेकर आती हैं। ये अत्यंत महत्वपूर्ण हैं; ये लोगों के विचार और मत नियंत्रित और प्रभावित कर सकते हैं। इनमें से हर एक प्रवृत्ति अपने साथ एक बुरा प्रभाव लेकर आती है। यह बुरा प्रभाव मानवजाति को लगातार पतित करता है और इसके कारण लोग अपना जमीर, मानवता और विवेक खोते रहते हैं, यह लगातार उनकी नैतिकता को कमजोर करता है और उनकी सत्यनिष्ठा को अधिकाधिक कम करता है, इस हद तक कि हम यह भी कह सकते हैं कि अधिकांश लोगों में अब कोई सत्यनिष्ठा, कोई मानवता और कोई जमीर नहीं है, विवेक की तो बात ही छोड़ दो। तो ये सामाजिक प्रवृत्तियाँ क्या हैं? ये ऐसी प्रवृत्तियाँ हैं जिन्हें तुम नंगी आँखों से नहीं देख सकते। जब कोई नई प्रवृत्ति आती है तो शायद केवल कुछ ही लोग इसे जल्दी अपनाते हैं—वे इस तरह की चीज करने, इस तरह के विचार को स्वीकार करने और इस तरह के दृष्टिकोण को स्वीकार करने में अगुआई करते हैं। इसके बावजूद अधिकांश लोग बिना एहसास किए इस प्रवृत्ति से लगातार संक्रमित, आकर्षित और आत्मसात होते रहेंगे, जब तक कि वे सभी अनजाने में और अनैच्छिक रूप से इसे स्वीकार नहीं कर लेते और इसमें डूब नहीं जाते और इसके द्वारा नियंत्रित नहीं हो जाते। एक के बाद एक, ऐसी प्रवृत्तियाँ उन लोगों से, जो स्वस्थ शरीर और मन के नहीं होते; जो नहीं जानते कि सत्य क्या है, और जो सकारात्मक और नकारात्मक चीजों के बीच बिल्कुल भी अंतर नहीं कर सकते, इन्हें और साथ ही शैतान से आने वाले जीवन के दृष्टिकोण और मूल्य को खुशी से स्वीकार करवाती हैं। शैतान उन्हें जीवन के प्रति नजरिया रखने के बारे में जो कुछ भी बताता है, वे उसे और जीते रहने के उस तरीके को खुशी से स्वीकार कर लेते हैं, जो शैतान उन्हें “प्रदान” करता है। उनके पास न तो प्रतिरोध करने का सामर्थ्य होता है, न ही योग्यता, और जागरूकता तो बिल्कुल भी नहीं होती। तो इन प्रवृत्तियों को कैसे पहचानें? मैंने एक सरल उदाहरण चुना है, जिसे तुम लोग धीरे-धीरे समझ सकते हो। उदाहरण के लिए, अतीत में लोग अपने व्यवसाय को इस प्रकार चलाते थे, जिससे कोई भी धोखा न खाए; वे वस्तुओं को एक ही दाम पर बेचते थे, चाहे उन्हें कोई भी खरीदे। क्या यहाँ सद्विवेक और मानवता के कुछ तत्त्व संप्रेषित नहीं हो रहे? जब लोग अपना व्यवसाय इस तरह, सद्भाव के साथ चलाते थे, तो यह देखा जा सकता है कि उस समय भी उनमें कुछ विवेक और कुछ मानवता रहती थी। परंतु मनुष्य की धन की लगातार बढ़ती माँग के कारण लोग अनजाने ही धन, लाभ और आनंद से अधिकाधिक प्रेम करने लगे। क्या लोग धन को पहले से अधिक प्राथमिकता नहीं देते? जब लोग धन को बहुत महत्वपूर्ण समझने लगते हैं, तो वे अनजाने ही अपनी प्रतिष्ठा, अपनी प्रसिद्धि, अपनी साख और अपनी ईमानदारी को कम महत्व देने लगते हैं; है न? जब तुम व्यवसाय में संलग्न होते हो, तो तुम दूसरों को धोखा देकर धनी बनते हुए देखते हो। यद्यपि कमाया गया धन पाप की कमाई होता है, लेकिन वे अधिकाधिक धनी बनते जाते हैं। उनके परिवारों को आनंद उठाते देखना तुम्हें परेशान करता है : “हम दोनों व्यवसाय में हैं, लेकिन वे अमीर हो गए। मैं बहुत सारा पैसा क्यों नहीं कमा सकता? मैं इसे स्वीकार नहीं कर सकता—मुझे और पैसा बनाने का तरीका खोजना होगा।” उसके बाद तुम सिर्फ यही सोचते हो कि संपत्ति कैसे बनाई जाए। जब तुम इस विश्वास को त्याग देते हो कि “धन विवेक से कमाया जाना चाहिए, किसी को धोखा देकर नहीं,” तो अपने हितों से प्रेरित होकर तुम्हारा सोचने का तरीका धीरे-धीरे बदल जाता है, और उसी के साथ बदल जाते हैं तुम्हारे कार्यों के पीछे के सिद्धांत। जब तुम पहली बार किसी को धोखा देते हो, तो तुम अपने अंतःकरण का उपालंभ महसूस करते हो, और तुम्हारा दिल तुमसे कहता है, “एक बार यह हो जाने के बाद, यह आखिरी बार होगा जब मैं किसी को धोखा दूँगा। लोगों को हमेशा धोखा देने का परिणाम प्रतिशोध होगा!” यह मनुष्य के विवेक का कार्य है—तुम्हें संकोच का एहसास कराना और तुम्हें धिक्कारना, ताकि जब तुम किसी को धोखा दो, तो असहज महसूस करो। लेकिन जब तुम किसी को सफलतापूर्वक धोखा दे देते हो, तो तुम देखते हो कि अब तुम्हारे पास पहले से अधिक धन है, और तुम्हें लगता है कि यह तरीका तुम्हारे लिए अत्यंत फायदेमंद हो सकता है। तुम्हारे दिल में हलके-से दर्द के बावजूद, तुम्हारा मन करता है कि तुम अपनी सफलता पर स्वयं को बधाई दो, और तुम स्वयं से थोड़ा खुश महसूस करते हो। पहली बार तुम अपने व्यवहार को, अपनी धोखेबाजी का अनुमोदन करते हो। जब मनुष्य ऐसे धोखे से दूषित हो जाता है, तो वह उस व्यक्ति के समान हो जाता है, जो जुए में संलग्न हो जाता है और फिर जुआरी बन जाता है। अपनी अनभिज्ञता में, तुम अपने धोखाधड़ी के व्यवहार का अनुमोदन कर देते हो और उसे स्वीकार कर लेते हो। अनभिज्ञता में, तुम धोखाधड़ी को जायज वाणिज्यिक व्यवहार मान लेते हो और अपने अस्तित्व और आजीविका के लिए तुम धोखाधड़ी को सबसे उपयोगी साधन मान लेते हो; तुम्हें लगता है कि ऐसा करके तुम जल्दी से पैसा बना सकते हो। यह एक प्रक्रिया है : शुरुआत में लोग इस प्रकार के व्यवहार को स्वीकार नहीं कर पाते, वे इस व्यवहार और अभ्यास को नीची निगाह से देखते हैं। फिर वे स्वयं इस व्यवहार के साथ प्रयोग करने लगते हैं, अपने तरीके से इसे आजमाते हैं, और उनका हृदय धीरे-धीरे बदलना शुरू हो जाता है। यह किस तरह का बदलाव है? यह इस प्रवृत्ति का, सामाजिक प्रवृत्ति द्वारा तुम्हारे भीतर डाले गए इस विचार का अनुमोदन और स्वीकृति है। अनजाने ही, अगर तुम लोगों के साथ व्यवसाय करते समय उन्हें धोखा नहीं देते, तो तुम्हें लगता है कि तुम असफल हो; अगर तुम लोगों को धोखा नहीं देते, तो तुम्हें लगता है कि तुमने कोई चीज खो दी है। अनजाने ही, यह धोखाधड़ी तुम्हारी आत्मा, तुम्हारी रीढ़ की हड्डी, और एक अनिवार्य प्रकार का व्यवहार बन जाती है, जो तुम्हारे जीवन में एक सिद्धांत होता है। मनुष्य द्वारा यह व्यवहार और सोच स्वीकार कर लिए जाने के बाद क्या उसके हृदय में बदलाव नहीं आया? तुम्हारा हृदय बदल गया है, तो क्या तुम्हारी ईमानदारी भी बदल गई है? क्या तुम्हारी मानवता बदल गई है? क्या तुम्हारा विवेक बदल गया है? तुम्हारा पूरा अस्तित्व, तुम्हारे हृदय से लेकर तुम्हारे विचारों तक, भीतर से लेकर बाहर तक बदल गया है, और यह एक गुणात्मक बदलाव है। यह परिवर्तन तुम्हें परमेश्वर से अधिकाधिक दूर करता चला जाता है और तुम शैतान के अधिकाधिक अनुरूप बनते चले जाते हो; तुम अधिकाधिक शैतान के समान बन जाते हो, जिसका परिणाम यह होता है कि शैतान की भ्रष्टता तुम्हें एक दुष्टात्मा बना देती है।
इन सामाजिक प्रवृत्तियों को देखते हुए, क्या तुम कहोगे कि इनका लोगों पर बड़ा प्रभाव है? क्या वे लोगों का गहराई से विनाश करती हैं? वास्तव में बहुत गहराई से! इनमें से प्रत्येक प्रवृत्ति के साथ शैतान मनुष्य के किन पहलुओं को भ्रष्ट करता है? शैतान मुख्य रूप से मनुष्य के जमीर, विवेक, मानवता, नैतिकता और अस्तित्व के प्रति दृष्टिकोण को भ्रष्ट करता है। और क्या ये सामाजिक प्रवृत्तियाँ धीरे-धीरे लोगों को नीचे नहीं गिराती हैं, उन्हें और अधिक भ्रष्ट नहीं बनाती हैं? शैतान इन सामाजिक प्रवृत्तियों का उपयोग लोगों को कदम-दर-कदम दानवों की माँद में लुभाने के लिए करता है, ताकि लोग अनजाने में सामाजिक प्रवृत्तियों के बीच धन, भौतिक इच्छाओं, बुराई और हिंसा की पूजा करें। एक बार जब ये चीजें लोगों के दिलों में प्रवेश कर जाती हैं तो लोग क्या बन जाते हैं? वे दानव और शैतान बन जाते हैं! ऐसा इसलिए है क्योंकि लोगों के दिल उस चीज के वश में आ जाते हैं जिसे वे पूजते हैं; जब लोग नकारात्मक चीजों को पूजते हैं, तो वे बुराई और हिंसा पसंद करने लगते हैं, और वे सुंदरता और अच्छाई को पसंद नहीं करते हैं, शांति को पसंद करना तो और भी दूर की बात है। वे सामान्य मानवता में सरल जीवन जीने के अनिच्छुक हो जाते हैं, बल्कि ऊँचे रुतबे और बहुत सारे धन का आनंद लेना चाहते हैं, देह का आनंद लेना चाहते हैं, बिना किसी प्रतिबंध या बंधन के अपनी देह को संतुष्ट करने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ते—दूसरे शब्दों में, जो कुछ भी वे चाहते हैं वही करते हैं। तो जब तुम इस तरह की प्रवृत्तियों में फँस गए हो, तो क्या वह ज्ञान जो तुमने सीखा है, तुम्हें खुद को मुक्त करने में मदद कर सकता है? क्या पारंपरिक संस्कृति और अंधविश्वासों के वे पहलू जिन्हें तुम जानते हो, तुम्हें इस दुर्दशा से बचने में मदद कर सकते हैं? क्या वे पारंपरिक नैतिकता और शिष्टाचार जिन्हें तुम जानते हो, तुम्हें संयम बरतने में मदद कर सकते हैं? उदाहरण के लिए, एनालेक्ट्स और ताओ ते चिंग को लो। क्या वे लोगों को इन बुरी प्रवृत्तियों के दलदल से अपने पैर बाहर निकालने में मदद कर सकते हैं? बिल्कुल नहीं। इस प्रकार, लोग अधिकाधिक बुरे, घमंडी, अत्यंत अभिमानी, स्वार्थी और दुर्भावनापूर्ण हो जाते हैं। लोगों के बीच अब कोई स्नेह और निष्ठा नहीं होती है, परिवार के सदस्यों के बीच अब कोई प्यार नहीं रहता है, रिश्तेदारों और दोस्तों के बीच अब कोई समझ नहीं रहती है; मानवीय रिश्ते हिंसा से भरे होते हैं। प्रत्येक व्यक्ति हिंसक साधनों और तरीकों से दूसरों के बीच रहने, हिंसा का उपयोग कर अपने लिए आजीविका के साधन छीनने, हिंसा का उपयोग करके अपना स्थान कब्जाने और अपने लाभ प्राप्त करने और अपनी इच्छानुसार किसी भी चीज को करने के लिए हिंसक और दुष्ट तरीकों का उपयोग करने का प्रयास करता है। क्या यह मानवजाति भयावह नहीं है? यह बहुत हद तक ऐसा ही है : न केवल वे परमेश्वर को क्रूस पर चढ़ा सकते हैं, बल्कि उन सबको नेस्तनाबूद भी कर सकते हैं, जो उसका अनुसरण करते हैं—क्योंकि यह मानवजाति बहुत बुरी है। ये सभी बातें सुनने के बाद, जो मैंने अभी बात कही हैं, क्या तुम लोगों को इस परिवेश में, इस संसार में और इस प्रकार के लोगों के बीच रहना भयानक नहीं लगता, जिनके बीच शैतान मानवजाति को भ्रष्ट करता है? (हाँ।) तो क्या तुम लोगों ने कभी अपने आपको दयनीय महसूस किया है? इस पल तुम्हें ऐसा थोड़ा तो महसूस करना चाहिए, है न? (हाँ।) तुम लोगों का स्वर सुनकर ऐसा प्रतीत होता है, मानो तुम लोग सोच रहे हो, “शैतान के पास मनुष्य को भ्रष्ट करने के कई विभिन्न तरीके हैं। वह हर अवसर लपक लेता है और जहाँ कहीं हम जाते हैं, वहीं मौजूद रहता है। क्या फिर भी मनुष्य को बचाया जा सकता है?” क्या मनुष्य अभी भी बचाया जा सकता है? क्या मनुष्य अपने आपको बचा सकता है? (नहीं।) क्या जेड सम्राट मनुष्य को बचा सकता है? क्या कन्फ्यूशियस मनुष्य को बचा सकता है? क्या गुआनयिन बोधिसत्व मनुष्य को बचा सकती है? (नहीं।) तो कौन मनुष्य को बचा सकता है? (परमेश्वर।) हालाँकि, कुछ लोगों के हृदय में ऐसे प्रश्न उठेंगे : “शैतान हमें इतनी बुरी तरह से, इतने विक्षिप्त उन्माद में हानि पहुँचाता है कि हमारे पास जीने की कोई उम्मीद नहीं रहती, न ही जीने का कोई आत्मविश्वास रहता है। हम सभी भ्रष्टता के बीच जीते हैं और हर एक व्यक्ति किसी न किसी तरीके से परमेश्वर का प्रतिरोध करता है, और अब हमारे दिल उतने नीचे डूब गए हैं, जितना डूब सकते थे। तो, जब शैतान हमें भ्रष्ट कर रहा है, तो परमेश्वर कहाँ है? परमेश्वर क्या कर रहा है? जो कुछ भी परमेश्वर हमारे लिए कर रहा है, हम उसे कभी महसूस नहीं करते!” कुछ लोग अनिवार्य रूप से निराश और निरुत्साहित अनुभव करते हैं। तुम लोगों के लिए यह अनुभूति बहुत गहरी है, क्योंकि वह सब जो मैं कहता रहा हूँ, उससे लोगों को धीरे-धीरे इन मामलों की समझ आती जा रही है, और इसके बाद उन्हें अधिकाधिक यह महसूस होने लगा है कि वे आशारहित हैं, और वे अधिकाधिक यह महसूस करते हैं कि उन्हें परमेश्वर द्वारा छोड़ दिया गया है। लेकिन चिंता न करो। हमारी आज की संगति का विषय “शैतान की दुष्टता” हमारा वास्तविक विषय नहीं है। लेकिन परमेश्वर की पवित्रता के सार के बारे में बातचीत करने के लिए पहले हमें शैतान किस तरह मनुष्य को भ्रष्ट करता है, और शैतान की दुष्टता पर चर्चा करनी चाहिए, ताकि लोगों पर यह और अधिक स्पष्ट किया जा सके कि मनुष्य इस समय किस प्रकार की स्थिति में है। इस बारे में बात करने का एक लक्ष्य लोगों को शैतान की दुष्टता के बारे में जानकारी देना है, जबकि दूसरा लक्ष्य लोगों को और गहराई से यह समझाना है कि सच्ची पवित्रता क्या है।
—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 159
परमेश्वर मनुष्य के साथ जो करता है उससे परमेश्वर की पवित्रता को समझना (चुना हुआ अंश)
जब भी शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करता है या उसे बेधड़क क्षति पहुँचाता है, तो परमेश्वर बेपरवाही से चुपचाप देखता नहीं रहता, न ही वह अपने चुने हुए लोगों से मुँह फेरता है या उनकी तरफ से आँख मूँदता है। शैतान जो कुछ भी करता है, परमेश्वर वह सब बिल्कुल स्पष्ट रूप से समझता है। शैतान चाहे कुछ भी करे, चाहे वह कोई भी प्रवृत्ति उत्पन्न करे, परमेश्वर वह सब जानता है जो शैतान करने का प्रयास कर रहा है, और परमेश्वर उन लोगों का साथ नहीं छोड़ता, जिन्हें उसने चुना है। इसके बजाय, कोई ध्यान आकर्षित किए बिना—गुप्त रूप से, चुपचाप—परमेश्वर वह सब करता है, जो आवश्यक है। जब परमेश्वर किसी पर कार्य करना आरंभ करता है, जब वह किसी को चुन लेता है, तो वह इसकी घोषणा किसी के सामने नहीं करता, न ही वह इसकी घोषणा शैतान के सामने करता है, कोई भव्य हाव-भाव तो वह बिल्कुल भी नहीं दिखाता। वह बस बहुत शांति से, बहुत स्वाभाविक रूप से, जो वह चाहता है वही करता है। पहले, वह तुम्हारे लिए एक परिवार चुनता है; तुम्हारे परिवार की पृष्ठभूमि, तुम्हारे माता-पिता, तुम्हारे पूर्वज—यह सब परमेश्वर पहले से ही तय कर देता है। इसलिए, परमेश्वर ये निर्णय किसी सनक के चलते नहीं लेता; बल्कि उसने यह कार्य बहुत पहले शुरू कर दिया था। जब परमेश्वर तुम्हारे लिए कोई परिवार चुन लेता है, तो फिर वह वो तिथि चुनता है, जब तुम्हारा जन्म होगा। फिर परमेश्वर तुम्हें जन्म लेते और रोते हुए संसार में आते देखता है। वह तुम्हारे आने को देखता है, तुम्हें तुतलाना सीखते हुए देखता है, तुम्हें कदम-दर-कदम लड़खड़ाते हुए चलना सीखते हुए देखता है। अब तुम दौड़ सकते हो, कूद सकते हो, बात कर सकते हो और अपनी भावनाओं को व्यक्त कर सकते हो...। जैसे-जैसे लोग बड़े होते हैं, शैतान की नज़र उनमें से हर एक पर टिकी होती है, जैसे कोई बाघ अपने शिकार को देख रहा हो। लेकिन अपना काम करने में, परमेश्वर कभी भी किसी व्यक्ति, घटना या चीज और स्थान या समय से उत्पन्न होने वाली चीज की सीमाओं के अधीन नहीं रहा है; वह वही करता है जो उसे करना चाहिए और जो वह करना चाहता है। बड़े होने की प्रक्रिया में, तुम्हें कई अवांछनीय चीजों का सामना करना पड़ सकता है, जिनमें बीमारी और रास्ते में आने वाली बाधाएँ शामिल हैं। लेकिन जैसे-जैसे तुम इस रास्ते पर चलते हो, तुम्हारा जीवन और तुम्हारा भविष्य परमेश्वर की करीबी देखभाल में होता है। परमेश्वर तुम्हारे पूरे जीवन के लिए एक सच्ची गारंटी प्रदान करता है, क्योंकि वह तुम्हारे ठीक बगल में है, तुम्हारी रक्षा कर रहा है और तुम्हारी देखभाल कर रहा है। तुम इससे अनजान रहते हुए बड़े होते हो। तुम नई-नई चीजों के संपर्क में आने लगते हो और इस संसार और इस मानवजाति को जानना आरंभ करते हो। तुम्हारे लिए हर चीज ताजी और नई होती है। कुछ चीजें होती हैं, जिन्हें करना तुम्हें अच्छा लगता है। तुम अपनी ही मानवता के भीतर रहते हो, अपने ही दायरे के भीतर जीते हो, और तुम्हें परमेश्वर के अस्तित्व का जरा भी बोध नहीं होता। लेकिन जैसे-जैसे तुम बड़े होते हो, परमेश्वर मार्ग के हर कदम पर तुम्हें देखता है, और वह तुम्हें हर कदम आगे बढ़ाते देखता है। यहाँ तक कि जब तुम ज्ञानार्जन करते हो, या विज्ञान का अध्ययन करते हो, तब भी परमेश्वर एक कदम के लिए भी तुम्हारा साथ नहीं छोड़ता। इस मामले में तुम भी अन्य लोगों के ही समान होते हो, संसार को जानने और उससे जुडने के दौरान तुमने अपने आदर्श स्थापित कर लिए होते हैं, तुम्हारे अपने शौक, अपनी रुचियाँ होती हैं, और तुम ऊँची महत्वाकांक्षाएँ भी रखते हो। तुम प्रायः अपने भविष्य पर विचार करते हो, प्रायः इस बात की रूपरेखा खींचते हो कि तुम्हारा भविष्य कैसा दिखना चाहिए। लेकिन इस दौरान जो कुछ भी होता है, परमेश्वर स्पष्टता से सब कुछ होते देखता है। हो सकता है, तुम स्वयं अपने अतीत को भूल गए हो, लेकिन जहाँ तक परमेश्वर का संबंध है, ऐसा कोई नहीं जो तुम्हें उससे बेहतर समझ सकता हो। तुम बड़े होते हुए, परिपक्व होते हुए परमेश्वर की नजर में रहते हो। इस अवधि के दौरान परमेश्वर का सबसे महत्वपूर्ण कार्य ऐसा होता है, जिसे कोई कभी महसूस नहीं करता, जिसे कोई नहीं जानता। परमेश्वर निश्चित रूप से किसी को इसके बारे में नहीं बताता। तो वह सबसे महत्वपूर्ण चीज क्या होती है? कहा जा सकता है कि यह इस बात की गारंटी होती है कि परमेश्वर व्यक्ति को बचाएगा। इसका अर्थ है कि अगर परमेश्वर इस व्यक्ति को बचाना चाहता है, तो उसे बचाना ही होगा। यह कार्य मनुष्य और परमेश्वर दोनों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। क्या तुम लोग जानते हो, वह क्या है? ऐसा लगता है कि तुम लोगों को इसकी कोई अनुभूति नहीं है, या इसकी कोई अवधारणा नहीं है, इसलिए मैं तुम लोगों को बताऊँगा। जब तुम्हारा जन्म हुआ, तब से लेकर अब तक परमेश्वर ने तुम पर बहुत कार्य किया है, लेकिन वह तुम्हें हर उस चीज का विस्तृत विवरण नहीं देता, जो उसने की है। परमेश्वर ने तुम्हें इसे नहीं जानने दिया, न ही उसने तुम्हें बताया। लेकिन परमेश्वर द्वारा की जाने वाली हर चीज मानवजाति के लिए महत्वपूर्ण है। जहाँ तक परमेश्वर का संबंध है, यह ऐसी चीज है जो उसे अवश्य करनी चाहिए। उसके हृदय में कुछ महत्वपूर्ण चीज है, जो उसे करने की आवश्यकता है, जो इनमें से किसी भी चीज से कहीं बढ़कर है। अर्थात्, जब व्यक्ति पैदा होता है, उस समय से लेकर आज तक, परमेश्वर को उसकी सुरक्षा की गारंटी अवश्य देनी चाहिए। इन वचनों को सुनकर, हो सकता है तुम लोगों को ऐसा महसूस हो कि तुम लोगों को पूरी तरह समझ नहीं आ रहा है। तुम पूछ सकते हो, “क्या यह सुरक्षा इतनी महत्वपूर्ण है?” भला, “सुरक्षा” का शाब्दिक अर्थ क्या है? हो सकता है, तुम लोग इसका अर्थ शांति समझते हो या हो सकता है, तुम लोग इसका अर्थ कभी विपत्ति या आपदा का अनुभव न करना, अच्छी तरह से जीवन बिताना, एक सामान्य जीवन बिताना समझते हो। लेकिन अपने हृदय में तुम लोगों को जानना चाहिए कि यह इतना सरल नहीं है। तो आखिर वह क्या चीज है, जिसके बारे में मैं बात करता रहा हूँ, जिसे परमेश्वर को करना है? परमेश्वर के लिए सुरक्षा का क्या अर्थ है? क्या यह वास्तव में “सुरक्षा” के सामान्य अर्थ वाली गारंटी है? नहीं। तो वह क्या है, जो परमेश्वर करता है? इस “सुरक्षा” का अर्थ यह है कि तुम शैतान द्वारा निगले नहीं जाओगे। क्या यह महत्वपूर्ण है? शैतान द्वारा निगला न जाना—यह तुम्हारी सुरक्षा से संबंधित है या नहीं? हाँ, यह तुम्हारी व्यक्तिगत सुरक्षा से संबंधित है, और इससे अधिक महत्वपूर्ण कुछ नहीं हो सकता। जब तुम शैतान द्वारा निगल लिए जाते हो, तो तुम्हारी आत्मा और तुम्हारा शरीर परमेश्वर के नहीं रह जाते। अब परमेश्वर तुम्हें नहीं बचाएगा। परमेश्वर उन आत्माओं और लोगों को त्याग देता है, जो शैतान द्वारा निगले जा चुके होते हैं। इसलिए मैं कहता हूँ कि सबसे महत्वपूर्ण चीज जो परमेश्वर को करनी होती है, वह है तुम्हारी इस सुरक्षा की गारंटी देना, इस बात की गारंटी देना कि तुम शैतान द्वारा निगले नहीं जाओगे। यह बहुत महत्वपूर्ण है, है न? तो तुम लोग उत्तर क्यों नहीं दे पाते? लगता है कि तुम लोग परमेश्वर की महान दया महसूस करने में असमर्थ हो!
—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 160
परमेश्वर मनुष्य के साथ जो करता है उससे परमेश्वर की पवित्रता को समझना (चुना हुआ अंश)
परमेश्वर लोगों की सुरक्षा की गारंटी देने, इस बात की गारंटी देने कि वे शैतान द्वारा निगले नहीं जाएँगे, के अतिरिक्त और भी बहुत-कुछ करता है। वह किसी को चुनने और बचाने से पहले तैयारी का काफी काम करता है। पहले, परमेश्वर इस बात की बहुत सावधानी से तैयारी करता है कि तुम्हारा चरित्र किस प्रकार का होगा, किस प्रकार के परिवार में तुम पैदा होगे, कौन तुम्हारे माता-पिता होंगे, तुम्हारे कितने भाई-बहन होंगे, और उस परिवार की स्थिति, आर्थिक दशा और परिस्थितियाँ क्या होगी, जिसमें तुम्हारा जन्म होना है। क्या तुम लोग जानते हो कि परमेश्वर के चुने हुए अधिकतर लोग किस प्रकार के परिवार में पैदा होते हैं? क्या वे प्रमुख परिवार होते हैं? हम निश्चित रूप से नहीं कह सकते कि ऐसा कोई नहीं है, जो प्रमुख परिवार में पैदा हुआ हो। कुछ हो सकते हैं, लेकिन वे बहुत कम होते हैं। क्या वे असाधारण धन-संपत्ति वाले परिवार में पैदा होते हैं, अरबपति या खरबपति परिवार में? नहीं, वे लगभग कभी भी इस प्रकार के परिवार में पैदा नहीं होते। तो परमेश्वर इन लोगों में से अधिकतर के लिए किस प्रकार के परिवार की व्यवस्था करता है? (साधारण परिवार की।) तो कौन-से परिवार साधारण परिवार माने जा सकते हैं? उनमें कामकाजी परिवार शामिल होते हैं—अर्थात्, वे जो जीवित रहने के लिए मजदूरी पर निर्भर रहते हैं, आधारभूत आवश्यकताएँ पूरी कर सकते हैं, और अत्यधिक संपन्न नहीं होते; उनमें किसान-परिवार भी शामिल हैं। किसान अपने भोजन के लिए फसलें उगाने पर निर्भर होते हैं, उनके पास खाने के लिए अनाज और पहनने के लिए कपड़े होते हैं, और वे भूखे नहीं रहते या ठिठुरते नहीं। फिर कुछ ऐसे परिवार होते हैं जो छोटे व्यवसाय चलाते हैं, और कुछ ऐसे जहाँ माता-पिता बुद्धिजीवी होते हैं, इन्हें भी साधारण परिवारों के रूप में गिना जा सकता है। कुछ ऐसे माता-पिता भी होते हैं, जो कार्यालय-कर्मचारी या मामूली सरकारी अधिकारी होते हैं, उन्हें भी प्रमुख परिवारों से संबंधित नहीं माना जा सकता। अधिकतर लोग साधारण परिवारों में पैदा होते हैं, और यह सब परमेश्वर द्वारा व्यवस्थित किया जाता है। अर्थात्, सबसे पहले तो वह परिवेश, जिसमें तुम रहते हो, साधन-संपन्न परिवार का नहीं होता, जैसी शायद लोग कल्पना करें, और यह वह परिवार होता है, जिसे परमेश्वर द्वारा तुम्हारे लिए तय किया गया होता है, और अधिकतर लोग इसी प्रकार के परिवार की सीमाओं के भीतर जीवन बिताएँगे। तो सामाजिक हैसियत के बारे में क्या? अधिकतर माता-पिताओं की आर्थिक स्थिति औसत दर्जे की होती हैं और उनकी ऊँची सामाजिक हैसियत नहीं होती—उनके लिए किसी नौकरी का होना मात्र ही अच्छा है। क्या उनमें राज्यपाल होते हैं? या राष्ट्रपति? नहीं, है न? अधिक से अधिक वे छोटे कारोबार के प्रबंधक या छोटे-मोटे कारोबार के मालिक होते हैं। उनकी सामाजिक हैसियत मध्यम और आर्थिक स्थिति औसत दर्जे की होती हैं। अन्य कारक है परिवार का जीवन-परिवेश। सबसे पहले, इन परिवारों में ऐसे माता-पिता नहीं होते, जो स्पष्ट रूप से अपने बच्चों को भविष्यवाणी और भविष्य-कथन के पथ पर चलने के लिए प्रभावित करें; इन चीजों से जुड़ने वाले बहुत कम होते हैं। अधिकतर माता-पिता काफी सामान्य होते हैं। जिस समय परमेश्वर लोगों को चुनता है, उसी समय वह उनके लिए इस प्रकार के परिवेश का इंतजाम करता है, जो उसके द्वारा लोगों के उद्धार के लिए अत्यंत लाभदायक है। ऊपर से ऐसा प्रतीत होता है कि परमेश्वर ने मनुष्य के लिए धरती हिला देने वाला कोई काम नहीं किया है; वह बस हर कर्म बिना ध्यान आकर्षित किए, अज्ञात रूप से और चुपचाप करता है। लेकिन वास्तव में, परमेश्वर जो भी करता है, वह तुम्हारे उद्धार हेतु एक नींव डाल रहा है, आगे का मार्ग तैयार कर रहा और तुम्हारे उद्धार के लिए सभी आवश्यक स्थितियाँ तैयार कर रहा है। फिर, परमेश्वर हर व्यक्ति को वापस अपने सामने लाता है, हर एक को निश्चित समय पर : तभी तुम परमेश्वर की वाणी सुनते हो; तभी तुम उसके सामने आते हो। जब तक यह घटित होता है, कुछ लोग पहले ही खुद माता-पिता बन चुके होते हैं, जबकि अन्य लोग अभी भी किसी के बच्चे होते हैं। दूसरे शब्दों में, कुछ लोगों ने विवाह कर लिया होता है और उनके बच्चे हो गए होते हैं, जबकि कुछ अभी भी अकेले ही होते हैं, उन्होंने अभी तक अपने परिवार शुरू नहीं किए होते। लेकिन परमेश्वर के सुसमाचार और वचन जब तुम्हारे पास पहुँचे तो चीजें चाहे जैसी भी हों, यह कुछ ऐसा है जिसे परमेश्वर द्वारा तुम्हारे लिए बहुत पहले ही पूर्वनिर्धारित किया जा चुका है। परमेश्वर ने एक परिवेश का इंतजाम कर दिया है और वह व्यक्ति निर्धारित कर दिया है जो एक निश्चित संदर्भ में तुम्हें सुसमाचार सुनाएगा, ताकि तुम एक निश्चित परिवेश में परमेश्वर की वाणी सुन सको और उसे स्वीकार कर सको। यह सब परमेश्वर द्वारा पूर्वनिर्धारित है। परमेश्वर ने तुम्हारे लिए पहले ही सभी आवश्यक परिस्थितियाँ तैयार कर दी हैं। इस तरह से, लोग अनजाने ही उसके सामने आ जाते हैं और परमेश्वर के घर में लौट आते हैं। वे परमेश्वर के कार्य के प्रत्येक कदम में अनजाने ही उसका अनुसरण भी करते हैं, परमेश्वर के कार्य के प्रत्येक तरीकों में प्रवेश करते हैं, जो उसने उनके लिए तैयार किए हैं। इस समय मनुष्य के लिए कार्य करते हुए परमेश्वर किन तरीकों का उपयोग करता है? पहले, न्यूनतम कार्य है वह देखभाल और सुरक्षा, जिसका मनुष्य आनंद लेता है। इसके अलावा, परमेश्वर विभिन्न लोग, घटनाएँ और चीजें निर्धारित करता है, ताकि उनके माध्यम से मनुष्य परमेश्वर का अस्तित्व और उसके कर्म देख सके। उदाहरण के लिए, कुछ लोग परमेश्वर पर इसलिए विश्वास करते हैं, क्योंकि उनके परिवार में कोई बीमार होता है। जब दूसरे उन्हें सुसमाचार सुनाते हैं, तो वे परमेश्वर पर विश्वास करना आरंभ कर देते हैं, और परमेश्वर में यह विश्वास परिस्थिति के कारण उत्पन्न होता है। तो किसने इस परिस्थिति की व्यवस्था की? (परमेश्वर ने।) इस बीमारी के माध्यम से कुछ परिवारों में सभी लोग विश्वासी हो जाते हैं, जबकि कुछ परिवारों में कुछ ही लोग विश्वास करते हैं। ऊपर से ऐसा लग सकता है कि तुम्हारे परिवार में किसी को बीमारी है, लेकिन वास्तव में यह तुम्हें प्रदान की गई एक परिस्थिति होती है, ताकि तुम परमेश्वर के सामने आ सको—यह परमेश्वर की दयालुता है। चूँकि कुछ लोगों के लिए पारिवारिक जीवन कठिन होता है और उन्हें कोई शांति नहीं मिलती, इसलिए एक आकस्मिक अवसर सामने आ सकता है—कोई सुसमाचार देगा और कहेगा, “प्रभु यीशु में विश्वास करो, तुम्हें शांति मिलेगी।” इस तरह, अनजाने ही, वे अत्यंत स्वाभाविक परिस्थितियों के अंतर्गत परमेश्वर में विश्वास करने लगते हैं, तो क्या यह एक प्रकार की स्थिति नहीं है? और क्या यह तथ्य कि उनके परिवार में शांति नहीं है, परमेश्वर द्वारा प्रदान किया गया एक अनुग्रह नहीं है? कुछ ऐसे लोग भी होते हैं, जो कुछ अन्य कारणों से परमेश्वर पर विश्वास करने लगते हैं। विश्वास के विभिन्न कारण और विभिन्न तरीके होते हैं, लेकिन चाहे जिस भी कारण से तुम उसमें विश्वास करने लगो, यह सब वास्तव में परमेश्वर के द्वारा व्यवस्थित और मार्गदर्शित होता है। पहले परमेश्वर तुम्हें चुनने और अपने परिवार में लाने के लिए विभिन्न तरीके इस्तेमाल करता है। यह वह अनुग्रह है, जो परमेश्वर हर एक व्यक्ति को प्रदान करता है।
—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 161
परमेश्वर मनुष्य के साथ जो करता है उससे परमेश्वर की पवित्रता को समझना (चुना हुआ अंश)
इन अंतिम दिनों में, अपने कार्य के वर्तमान चरण में परमेश्वर मनुष्य को पहले की तरह अनुग्रह और आशीष प्रदान नहीं करता, न ही वह लोगों को आगे बढ़ने के लिए मनाता है। कार्य के इस चरण के दौरान, परमेश्वर के कार्य के सभी पहलुओं से मनुष्य ने क्या देखा है, जिसका उसने अनुभव किया है? मनुष्य ने परमेश्वर का प्रेम, उसका न्याय और उसकी ताड़ना देखी है। इस अवधि में परमेश्वर मनुष्य का भरण-पोषण करता है, उसे सहारा देता है, उसे प्रबुद्ध करता है और उसका मार्गदर्शन करता है, ताकि मनुष्य उसके बोले हुए वचनों और उसके द्वारा मनुष्य को प्रदत्त सत्य को जानने के लिए धीरे-धीरे उसके इरादों को जानने लगे। जब मनुष्य कमजोर होता है, जब वह नकारात्मक होता है, जब वह किसी अंधी गली में फँस जाता है, तब परमेश्वर मनुष्य को सांत्वना, सलाह और प्रोत्साहन देने के लिए अपने वचनों का उपयोग करता है, ताकि मनुष्य का छोटा आध्यात्मिक कद धीरे-धीरे मजबूत हो सके, सकारात्मकता में उठ सके और परमेश्वर के साथ सहयोग करने के लिए तैयार हो सके। लेकिन जब मनुष्य परमेश्वर के खिलाफ विद्रोह करता है या उसका विरोध करता है, या अपनी भ्रष्टता प्रकट करता है, तो परमेश्वर मनुष्य को ताड़ना देने और उसे अनुशासित करने में कोई दया नहीं दिखाता। हालाँकि, मनुष्य की मूर्खता, अज्ञानता, दुर्बलता और अपरिपक्वता के प्रति परमेश्वर सहिष्णुता और धैर्य दिखाता है। इस तरीके से, उस समस्त कार्य के माध्यम से जिसे परमेश्वर मनुष्य के लिए करता है, मनुष्य धीरे-धीरे परिपक्व होता है, बड़ा होता है, और परमेश्वर के इरादे जानने लगता है, कुछ निश्चित सत्य जानने लगता है, यह जानने लगता है कि कौन-सी चीज़ें सकारात्मक हैं और कौन-सी नकारात्मक, यह जानने लगता है कि दुष्टता और अंधकार क्या हैं। परमेश्वर मनुष्य को सदैव ताड़ित और अनुशासित करने का ही एकमात्र दृष्टिकोण नहीं रखता, लेकिन वह हमेशा सहिष्णुता और धैर्य भी नहीं दिखाता। बल्कि वह सभी लोगों का, विभिन्न चरणों में विभिन्न तरीकों से और उनके विभिन्न आध्यात्मिक कदों और क्षमता के अनुसार, भरण-पोषण करता है। वह मनुष्य के लिए अनेक चीजें करता है और बड़ी कीमत पर करता है; मनुष्य इन चीजों या इस कीमत के बारे में कुछ नहीं जानता, फिर भी व्यवहार में, वह जो कुछ करता है, उसे सच में हर एक व्यक्ति पर कार्यान्वित किया जाता है। परमेश्वर का प्रेम व्यावहारिक है : परमेश्वर के अनुग्रह के माध्यम से मनुष्य एक के बाद दूसरी आपदा से बचता है, और इस पूरे समय मनुष्य की दुर्बलता के प्रति परमेश्वर बार-बार सहिष्णुता दिखाता है। परमेश्वर के न्याय और उसकी ताड़ना से लोग धीरे-धीरे मानवजाति की भ्रष्टता और शैतानी सार जान जाते हैं। कि परमेश्वर मनुष्य को जो कुछ प्रदान करता है, उसके द्वारा किया जाने वाला मनुष्य का प्रबोधन और मार्गदर्शन, इस सबसे मनुष्य सत्य के सार को अधिकाधिक जान जाता है, और वह उत्तरोत्तर यह जान जाता है कि लोगों को किस चीज की आवश्यकता है, उन्हें कौन-सा मार्ग अपनाना चाहिए, वे किसके लिए जीते हैं, उनकी जिंदगी का मूल्य और अर्थ, और आगे के मार्ग पर कैसे चलें। ये सभी चीजें जो परमेश्वर करता है, उसके एकमात्र मूल उद्देश्य से अभिन्न हैं। तो वह उद्देश्य क्या है? क्यों परमेश्वर मनुष्य पर अपना कार्य करने के लिए इन विधियों का उपयोग करता है? वह क्या परिणाम प्राप्त करना चाहता है? दूसरे शब्दों में, वह मनुष्य में क्या देखना चाहता है? वह उससे क्या प्राप्त करना चाहता है? परमेश्वर जो देखना चाहता है, वह यह है कि मनुष्य के हृदय को पुनर्जीवित किया जा सकता है। ये विधियाँ, जिनका वह मनुष्य पर कार्य करने के लिए उपयोग करता है, निरंतर प्रयास हैं मनुष्य के हृदय को जाग्रत करने का, मनुष्य की आत्मा को जाग्रत करने का, मनुष्य को यह जानने में समर्थ बनाने का कि वह कहाँ से आया है, कौन उसका मार्गदर्शन, उसकी सहायता और उसका भरण-पोषण कर रहा है, और किसने मनुष्य को आज तक जीने दिया है; वे मनुष्य को यह ज्ञात करवाने एक का साधन हैं कि सृष्टिकर्ता कौन है, मनुष्य को किसकी आराधना करनी चाहिए, किस प्रकार के मार्ग पर चलना चाहिए, और किस तरह से परमेश्वर के सामने आना चाहिए; वे मनुष्य के हृदय को धीरे-धीरे पुनर्जीवित करने का साधन हैं, ताकि मनुष्य परमेश्वर के हृदय को जान ले, परमेश्वर के हृदय को समझ ले, और मनुष्य को बचाने के उसके कार्य के पीछे के श्रमसाध्य इरादे को समझ ले। जब मनुष्य का हृदय पुनर्जीवित हो जाता है, तब मनुष्य पतित और भ्रष्ट स्वभाव के साथ जीना नहीं चाहता, बल्कि परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए सत्य का अनुसरण करना चाहता है। जब मनुष्य का हृदय जाग्रत हो जाता है, तो वह खुद को शैतान से पूरी तरह अलग करने में सक्षम हो जाता है। अब उसे शैतान द्वारा हानि नहीं पहुँचाई जाएगी, नियंत्रित या मूर्ख नहीं बनाया जाएगा। इसके बजाय, मनुष्य परमेश्वर के हृदय को संतुष्ट करने के लिए परमेश्वर के कार्य और वचनों में सक्रिय रूप से सहयोग कर सकता है, और इस प्रकार परमेश्वर का भय मान सकता है और बुराई से दूर रह सकता है। परमेश्वर के कार्य का यही मूल उद्देश्य है।
—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 162
परमेश्वर मनुष्य के साथ जो करता है उससे परमेश्वर की पवित्रता को समझना (चुना हुआ अंश)
शैतान की दुष्टता के बारे में हमने अभी-अभी जो चर्चा की, उससे सभी को ऐसा महसूस होता है, मानो मनुष्य बड़ी अप्रसन्नता के बीच जीता है और मनुष्य का जीवन दुर्भाग्य से घिरा हुआ है। लेकिन अब जबकि मैं परमेश्वर की पवित्रता और उसके द्वारा मनुष्य पर किए जाने वाले कार्य के बारे में बात कर रहा हूँ, तो इससे तुम लोगों को कैसा अनुभव हो रहा है? (बहुत प्रसन्न।) हम अब देख सकते हैं कि जो कुछ भी परमेश्वर करता है, जिसे वह अत्यंत परिश्रम से मनुष्य के लिए व्यवस्थित करता है, वह सब बेदाग होता है। परमेश्वर जो कुछ भी करता है, वह त्रुटिरहित होता है, जिसका अर्थ है कि वह दोषरहित होता है, किसी को उसमें सुधार करने, सलाह देने या कोई बदलाव करने की जरूरत नहीं होती। परमेश्वर प्रत्येक व्यक्ति के लिए जो कुछ करता है, वह संदेह से परे होता है; वह हाथ पकड़कर हर किसी की अगुआई करता है, हर गुजरते पल तुम्हारी देखरेख करता है और उसने कभी तुम्हारा साथ नहीं छोड़ा है। जब लोग इस प्रकार के परिवेश और इस प्रकार की पृष्ठभूमि में बढ़ते हैं, तो क्या हम कह सकते हैं कि लोग वास्तव में परमेश्वर की हथेली में बढ़ते हैं? (हाँ।) तो क्या अब भी तुम लोगों को नुकसान का एहसास होता है? क्या कोई अभी भी नकारात्मक महसूस करता है? क्या कोई ऐसा महसूस करता है कि परमेश्वर ने मानवजाति को त्याग दिया है? (नहीं।) तो फिर परमेश्वर ने वास्तव में क्या किया है? (उसने मानवजाति पर नजर रखी है।) परमेश्वर जो कुछ भी करता है उसमें वह जो श्रमसाध्य विचार लगाता है वह सवालों से परे है। इतना ही नहीं, अपना कार्य करते हुए परमेश्वर ने ऐसा हमेशा बेशर्त किया है। उसने तुममें से किसी से कभी यह अपेक्षा नहीं रखी कि तुम वह कीमत जानो जो वह तुम्हारे लिए चुकाता है, जिससे तुम उसके प्रति अत्यंत आभारी महसूस करो। क्या परमेश्वर ने कभी तुमसे यह अपेक्षा की है? (नहीं।) तुम सभी इतने वर्षों से जी रहे हो और तुममें से लगभग हर व्यक्ति ने अपने जीवनकाल में बहुत-सी खतरनाक स्थितियों और बहुत-से प्रलोभनों का सामना किया है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि शैतान तुम्हारी बगल में खड़ा है, उसकी आँखें लगातार तुम्हारे ऊपर जमी हैं। शैतान को तुम्हें विपत्तियों और मुसीबतों में घिरा देखकर खुशी होती है; वह यही चाहता है कि तुम्हारे साथ कुछ भी सही न हो और तुम उसके जाल में फँसे रहो। रही बात यह कि परमेश्वर क्या कर रहा है, तो वह हर गुजरते पल के साथ तुम्हारी सुरक्षा कर रहा है, एक के बाद दूसरे दुर्भाग्य से और एक के बाद दूसरी आपदा से तुम्हें बचा रहा है। इसीलिए मैं कहता हूँ कि मनुष्य से संबंधित हर चीज, जिसमें शांति और आनंद, आशीष और व्यक्तिगत सुरक्षा शामिल है, वास्तव में परमेश्वर के नियंत्रण में है; वह हर व्यक्ति की नियति का मार्गदर्शन करता है और इस पर संप्रभुता रखता है। लेकिन क्या परमेश्वर में अपनी स्थिति की कोई विस्फारित धारणा है, जैसा कि कुछ लोग कहते हैं? क्या परमेश्वर तुम्हारे सामने घोषणा करता है, “मैं सबसे महान हूँ। वह मैं हूँ, जो तुम लोगों का प्रभार लेता है। तुम लोगों को मुझसे दया की भीख माँगनी चाहिए, और अवज्ञा के लिए मृत्युदंड दिया जाएगा”? क्या परमेश्वर ने कभी मानवजाति को इस प्रकार से धमकाया है? (नहीं।) क्या उसने कभी कहा है, “मानवजाति भ्रष्ट है, इसलिए मैं चाहे जैसे उससे व्यवहार करूँ, और उसके साथ कैसे भी व्यवहार किया जा सकता है; मुझे उसके लिए पुख्ता इंतजाम करने की आवश्यकता नहीं है”? क्या परमेश्वर इस तरह से सोचता है? क्या परमेश्वर ने इस तरह से कार्य किया है? (नहीं।) इसके विपरीत, प्रत्येक व्यक्ति के साथ परमेश्वर का बरताव निष्कपट और जिम्मेदारी भरा है। यहाँ तक कि वह तुम्हारे साथ उससे भी अधिक जिम्मेदारी से व्यवहार करता है, जितना तुम खुद अपने साथ करते हो। क्या ऐसा नहीं है? परमेश्वर व्यर्थ में नहीं बोलता, वह अपनी ऊँची स्थिति की शान नहीं दिखाता है, और लोगों के साथ अनमना नहीं होता है। इसके बजाय वह ईमानदारी और खामोशी से वे चीजें करता है, जो उसे स्वयं करने की आवश्यकता है। ये चीजें मनुष्य के लिए आशीष, शांति और आनंद लाती हैं। वे मनुष्य को शांति और प्रसन्नता से परमेश्वर की दृष्टि के सामने और उसके परिवार में लाती हैं; फिर वे सामान्य विवेक और सोच के साथ परमेश्वर के सामने रहते हैं और परमेश्वर का दिया उद्धार स्वीकारते हैं। तो क्या परमेश्वर ने अपने कार्य में कभी मनुष्य के साथ धोखा किया है? क्या उसने कभी उदारता का झूठा प्रदर्शन किया है, इंसान से कुछ मीठी-मीठी बातें करके अनमने ढंग से पेश आया है और फिर मुँह फेर लिया है? (नहीं।) क्या परमेश्वर ने कभी कहा कुछ और फिर किया कुछ और है? क्या परमेश्वर ने लोगों से यह कहते हुए कभी खोखले वादे किए और शेखी बघारी है कि वह उनके लिए ऐसा कर सकता है या वैसा करने में उनकी सहायता कर सकता है, लेकिन फिर गायब हो गया है? (नहीं।) परमेश्वर में कोई कपट नहीं है, कोई झूठ नहीं है। परमेश्वर विश्वसनीय है और अपने हर काम में सच्चा है। एकमात्र वही है, जिस पर लोग भरोसा कर सकते हैं; वह वो परमेश्वर है, जिसे लोग अपना जीवन और अपना सर्वस्व सौंप सकते हैं। चूँकि परमेश्वर में कोई छल नहीं है, तो क्या हम ऐसा कह सकते हैं कि परमेश्वर सबसे ईमानदार है? (हाँ।) बेशक हम कह सकते हैं! यद्यपि “ईमानदार” शब्द परमेश्वर पर लागू किए जाने के मामले में बहुत कमजोर, बहुत मानवीय है, लेकिन हमारे पास और कौन-सा शब्द है जिसे हम इस्तेमाल कर सकते हैं? इंसानी भाषा की ऐसी ही सीमाएँ हैं। यद्यपि परमेश्वर को “ईमानदार” कहना थोड़ा अनुचित है, लेकिन फिर भी हम कुछ समय के लिए इस शब्द का उपयोग करेंगे। परमेश्वर विश्वसनीय और ईमानदार है। तो जब हम इन पहलुओं के बारे में बात करते हैं, तो हम क्या कहना चाहते हैं? क्या हम परमेश्वर और मनुष्य के बीच और परमेश्वर और शैतान के बीच के अंतर बताना चाहते हैं? हाँ, हम ऐसा कह सकते हैं। ऐसा इसलिए है, क्योंकि मनुष्य परमेश्वर में शैतान के भ्रष्ट स्वभाव का एक भी निशान नहीं देख सकता। क्या मेरा यह कहना सही है? आमीन? (आमीन!) शैतान का कोई भी दुष्ट स्वभाव परमेश्वर में प्रकट नहीं होता। परमेश्वर जो कुछ भी करता है और जो कुछ भी प्रकट करता है, वह पूरी तरह से मनुष्य के लिए लाभप्रद और सहायक होता है, पूरी तरह से मनुष्य की आपूर्ति के लिए किया जाता है, जीवन से भरपूर होता है और मनुष्य को अनुसरण करने के लिए एक मार्ग और चलने के लिए एक दिशा देता है। परमेश्वर भ्रष्ट नहीं है और, इसके अलावा, हर वह चीज देखते हुए, जिसे परमेश्वर करता है, क्या हम कह सकते हैं कि परमेश्वर पवित्र है? चूँकि परमेश्वर में मनुष्य का कोई भ्रष्ट स्वभाव नहीं है, न ही भ्रष्ट मनुष्य के शैतानी सार जैसी कोई चीज है, इसलिए इस दृष्टिकोण से हम पूरी तरह से कह सकते हैं कि परमेश्वर पवित्र है। परमेश्वर किसी भ्रष्टता का प्रदर्शन नहीं करता, और साथ ही जब परमेश्वर कार्य करता है, तो वह अपना सार प्रकट करता है, जो पूरी तरह से पुष्टि करता है कि स्वयं परमेश्वर पवित्र है। क्या तुम लोग इसे देखते हो? परमेश्वर के पवित्र सार को जानने के लिए फिलहाल इन दो पहलुओं पर नजर डालते हैं : पहला, परमेश्वर में भ्रष्ट स्वभाव का नामोनिशान नहीं है, और दूसरा, मनुष्य पर परमेश्वर के कार्य का सार मनुष्य को परमेश्वर का सार दिखाता है, और यह सार पूरी तरह से सकारात्मक है। क्योंकि परमेश्वर के कार्य के हर हिस्से द्वारा मनुष्य के लिए लाई जाने वाली सभी चीजें सकारात्मक हैं। सबसे पहले, परमेश्वर मनुष्य से ईमानदार होने की अपेक्षा करता है—क्या यह एक सकारात्मक चीज नहीं है? परमेश्वर मनुष्य को बुद्धि देता है—क्या यह सकारात्मक नहीं है? परमेश्वर मनुष्य को भले और बुरे के बीच पहचान करने में सक्षम बनाता है—क्या यह सकारात्मक नहीं है? वह मनुष्य को मानव-जीवन का अर्थ और मूल्य समझाता है—क्या यह सकारात्मक नहीं है? वह मनुष्य को सत्य के अनुसार लोगों, घटनाओं और चीजों के सार के भीतर देखने देता है—क्या यह सकारात्मक नहीं है? है। और इन सबका परिणाम यह है कि मनुष्य अब शैतान द्वारा गुमराह नहीं किया जाता, शैतान द्वारा अब उसे नुकसान नहीं पहुँचाया जाता रहेगा या नियंत्रित नहीं किया जाता रहेगा। दूसरे शब्दों में, ये चीजें लोगों को शैतान की भ्रष्टता से पूरी तरह मुक्त कराती हैं, और फलस्वरूप वे धीरे-धीरे परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने के मार्ग पर चल पड़ते हैं।
—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 163
छह प्राथमिक चालें हैं, जिन्हें शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए इस्तेमाल करता है
पहला है नियंत्रण और जोर-जबरदस्ती। अर्थात्, तुम्हारे हृदय को नियंत्रित करने के लिए शैतान हर संभव कार्य करता है। “जोर-जबरदस्ती” का क्या अर्थ है? इसका अर्थ है अपनी बात मनवाने के लिए धमकी और बल की युक्तियों का इस्तेमाल करना, और बात न मानने के परिणामों के बारे में विचार करने पर मजबूर करना। तुम डर जाते हो और उसे मानने से मना करने की हिम्मत नहीं करते, इसलिए तुम हार मान लेते हो।
दूसरा है धोखाधड़ी और छल-कपट। “धोखाधड़ी और छल-कपट” में क्या होता है? शैतान कुछ कहानियाँ और झूठ गढ़ता है, और छल-कपट करके तुमसे उन पर विश्वास करवाता है। वह तुम्हें कभी नहीं बताता कि मनुष्य को परमेश्वर द्वारा सृजित किया गया था, लेकिन वह प्रत्यक्ष रूप से यह भी नहीं कहता कि तुम्हें परमेश्वर ने नहीं बनाया था। वह “परमेश्वर” शब्द का उपयोग बिल्कुल नहीं करता, बल्कि उसके बदले किसी और चीज का उपयोग करता है, और इस चीज का उपयोग वह तुम्हें गुमराह करने के लिए करता है, ताकि तुम्हें परमेश्वर के अस्तित्व के बारे में मूल रूप से कुछ पता न चले। बेशक, इस “छल-कपट” में यह अकेला पहलू नहीं, बल्कि कई पहलू शामिल हैं।
तीसरा है जबरदस्ती कोई चीज दिमाग में भरना। लोगों के दिमाग में कौन-सी चीज जबरदस्ती भरी जाती है? क्या जबरदस्ती दिमाग में कोई चीज भरने का काम मनुष्य की अपनी पसंद से किया जाता है? क्या इसे मनुष्य की सहमति से किया जाता है? निश्चित रूप से नहीं। तुम उससे सहमत न भी हो, तो भी तुम इस बारे में कुछ नहीं कर सकते। तुम्हारे जाने बिना ही शैतान तुम्हारे दिमाग में जबरदस्ती चीजें भरता है, अपनी सोच, जीवन के अपने नियम और अपना सार तुम्हारे भीतर डालता है।
चौथा है धमकाना और भुलावा देना। अर्थात्, शैतान तुमसे खुद को स्वीकार करवाने, अपना अनुसरण करवाने और अपनी सेवा करवाने के लिए विभिन्न चालें चलता है। अपने लक्ष्य हासिल करने के लिए वह कुछ भी करता है। कभी वह तुम पर छोटे-छोटे अनुग्रह करता है, और इस पूरे समय तुम्हें पाप करने के लिए फुसलाता है। अगर तुम उसका अनुसरण नहीं करते, तो वह तुम्हें पीड़ित और दंडित करेगा और तुम पर आक्रमण करने और तुम्हारे खिलाफ साजिश करने के लिए विभिन्न तरीके इस्तेमाल करेगा।
पाँचवा है गुमराह करना और पंगु बनाना। “गुमराह करना और पंगु बनाना” तब होता है, जब शैतान लोगों में कुछ ऐसे कर्णप्रिय शब्द और विचार डालता है, जो उनकी धारणाओं से मेल खाते हैं और उन्हें उचित लगते हैं, ताकि ऐसा लगे मानो वह लोगों की दैहिक स्थिति, उनके जीवन और भविष्य के प्रति विचारशील हो रहा है, जबकि वास्तव में उसका एकमात्र लक्ष्य तुम्हें मूर्ख बनाना होता है। तब वह तुम्हें पंगु बना देता है, ताकि तुम यह न जान पाओ कि क्या सही है और क्या गलत, और तुम अनजाने ही छले जाओ और फलस्वरूप उसके नियंत्रण के अधीन आ जाओ।
छठा है तन और मन का विनाश। शैतान मनुष्य के किस हिस्से को नष्ट करता है? शैतान तुम्हारे मन को नष्ट करता है, और वैसा करके तुम्हें विरोध करने में असमर्थ बना देता है, जिसका अर्थ है कि तुम्हारे न चाहने के बावजूद धीरे-धीरे तुम्हारा हृदय शैतान की ओर मुड़ने लगता है। ये चीजें वह हर दिन तुम्हारे भीतर डालता है, तुम्हें प्रतिदिन प्रभावित करने और तैयार करने के लिए ये विचार और संस्कृतियाँ इस्तेमाल करता है, धीरे-धीरे तुम्हारी इच्छाशक्ति को तोड़ता है, जिसके कारण अंततः तुम एक अच्छा इंसान नहीं बने रहना चाहते, जिसके कारण तुम अब उस चीज के पक्ष में डटे नहीं रहना चाहते, जिसे तुम “न्याय” कहते हो। अनजाने ही तुम्हारे भीतर धारा के विरुद्ध तैरने की इच्छा-शक्ति नहीं रह जाती, बल्कि तुम धारा के साथ बहने लगते हो। “विनाश” का अर्थ है शैतान द्वारा लोगों को इतना अधिक कष्ट देना कि वे अपनी छायामात्र बन जाते हैं, मनुष्य नहीं रह जाते। इसी वक्त शैतान उन्हें निगलने का मौका लपक लेता है।
शैतान द्वारा मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए इस्तेमाल की जाने वाली इन चालों में से प्रत्येक चाल मनुष्य को विरोध करने में असमर्थ बना देती है; इनमें से कोई भी चाल मनुष्य के लिए घातक हो सकती है। दूसरे शब्दों में, शैतान जो कुछ भी करता है और वह जो भी चाल चलता है, वह तुम्हें पतित कर सकती है, तुम्हें शैतान के नियंत्रण के अधीन ला सकती है और तुम्हें बुराई और पाप के दलदल में धँसा सकती है। ऐसी हैं वे चालें, जिन्हें शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए इस्तेमाल करता है।
—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 164
अभी के लिए, परमेश्वर के सार की तुम लोगों की बोधात्मक समझ को अभी भी प्रत्यक्ष रूप से समझने, उसकी पुष्टि करने, उसे महसूस करने और उसका अनुभव करने के लिए एक लंबी अवधि की आवश्यकता है, जब एक दिन तुम लोग अपने हृदय के केंद्र से जान लोगे कि “परमेश्वर की पवित्रता” का अर्थ है कि परमेश्वर का सार दोषरहित है, परमेश्वर का प्रेम निस्स्वार्थ है, जो कुछ परमेश्वर मनुष्य को प्रदान करता है वह निस्स्वार्थ है, और तुम लोग जान लोगे कि परमेश्वर की पवित्रता की आलोचना करना असंभव और पहुँच से बाहर की बात है। परमेश्वर के सार के ये पहलू ऐसे शब्द नहीं हैं जिन्हें वह अपनी पहचान का दिखावा करने के लिए उपयोग करता हो, बल्कि परमेश्वर हर एक व्यक्ति के साथ शांत और सच्चे ढंग से व्यवहार करने के लिए अपने सार का उपयोग करता है। दूसरे शब्दों में, परमेश्वर का सार खोखला नहीं है, न ही यह कोई सिद्धांत या धर्म-सिद्धांत है, यह किसी प्रकार का ज्ञान तो और भी नहीं है। यह मनुष्य के लिए किसी प्रकार की शिक्षा नहीं है; बल्कि यह परमेश्वर के अपने कार्यकलापों का सच्चा प्रकाशन और जो परमेश्वर के पास है और जो वह स्वयं है का सार है जो उससे प्रकट हुआ है। यह सार कुछ ऐसा है जिसे मनुष्य को जानना और समझना चाहिए, क्योंकि हर चीज जो परमेश्वर करता है और हर वचन जो वह कहता है, उसका हर एक व्यक्ति के लिए बड़ा मूल्य और बड़ा महत्व होता है। जब तुम परमेश्वर की पवित्रता को समझने लगते हो, तब तुम वास्तव में परमेश्वर में विश्वास कर सकते हो; जब तुम परमेश्वर की पवित्रता को समझने लगते हो, तब तुम वास्तव में “स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है” शब्दों के सच्चे अर्थ को समझ सकते हो। तब तुम यह कल्पना नहीं करोगे कि चलने के लिए इसके अलावा भी मार्ग हैं जिन्हें तुम चुन सकते हो, और तुम उस हर चीज के साथ विश्वासघात नहीं करना चाहोगे जिसकी परमेश्वर ने तुम्हारे लिए व्यवस्था की है। चूँकि परमेश्वर का सार पवित्र है, इसलिए इसका अर्थ है कि केवल परमेश्वर ही तुम्हें जीवन के सही, उज्ज्वल मार्ग पर चलने में सक्षम बना सकता है; केवल परमेश्वर ही तुम्हें जीवित रहने का अर्थ समझने में सक्षम बना सकता है; केवल परमेश्वर ही तुम्हें वास्तविक मानवता को जीने में और सत्य को धारण करने और समझने दोनों में सक्षम बना सकता है। केवल परमेश्वर ही तुम्हें सत्य से जीवन प्राप्त करने में सक्षम बना सकता है। केवल स्वयं परमेश्वर ही तुम्हें बुराई से दूर रहने में सहायता कर सकता है और तुम्हें शैतान की भारी क्षति और नियंत्रण से बचा सकता है। परमेश्वर के अलावा कोई भी और कुछ भी तुम्हें कष्ट के सागर से नहीं बचा सकता, जिससे तुम और कष्ट न सहो। यह परमेश्वर के सार द्वारा निर्धारित किया जाता है। केवल स्वयं परमेश्वर ही इतने निस्स्वार्थ भाव से तुम्हें बचाता है; केवल परमेश्वर ही बिल्कुल अंत तक तुम्हारे भविष्य के लिए, तुम्हारी नियति के लिए और तुम्हारे जीवन के लिए जिम्मेदार है, और केवल वही तुम्हारे लिए सभी चीजों की व्यवस्था करता है। यह कुछ ऐसा है जिसे कोई भी सृजित या गैर-सृजित प्राणी हासिल नहीं कर सकता। चूँकि कोई भी सृजित या गैर-सृजित प्राणी परमेश्वर के सार जैसा सार धारण नहीं कर सकता, इसलिए किसी भी व्यक्ति या चीज में तुम्हें बचाने या तुम्हारी अगुआई करने की क्षमता नहीं है। मनुष्य के लिए परमेश्वर के सार का यही महत्व है। कदाचित् तुम लोगों को लगे कि मेरे द्वारा कहे गए ये वचन सिद्धांततः थोड़ी सहायता कर सकते हैं। लेकिन अगर तुम सत्य का अनुसरण करते हो, अगर तुम सत्य से प्रेम करते हो, तो तुम यह अनुभव करोगे कि कैसे ये वचन न केवल तुम्हारी नियति बदल देंगे, बल्कि इसके अलावा वे तुम्हें मानव-जीवन के सही मार्ग पर ले आएँगे। तुम यह समझते हो, है न?
—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 165
मैं तुम लोगों से उस चीज के बारे में बात करना चाहता हूँ, जो तुम लोगों ने आज हमारी सभा के आरंभ में की थी, जिसने मुझे आश्चर्य में डाल दिया था। कदाचित् तुम में से कुछ लोग कृतज्ञता का बोध पाले हुए थे, शायद तुम आभारी महसूस कर रहे थे और तुम्हारे पास अपने विचार थे जिनके कारण एक तदनुरूप क्रिया कराई। तुम लोगों ने जो किया, वह ऐसा नहीं है जिसकी निंदा करने की आवश्यकता हो; वह न तो सही है और न ही गलत। लेकिन मैं चाहता हूँ कि तुम लोग कुछ समझो। वह क्या है, जो मैं चाहता हूँ कि तुम समझो? पहले, मैं तुम लोगों से उसके बारे में पूछना चाहूँगा, जो तुम लोगों ने अभी-अभी किया। यह दंडवत् करना था या आराधना करने के लिए घुटने टेकना? क्या कोई मुझे बता सकता है? (हम मानते हैं कि यह दंडवत् करना था।) तुम लोग मानते हो कि यह दंडवत् करना था, तो दंडवत् करने का क्या अर्थ है? (आराधना।) तो फिर, आराधना करने के लिए घुटने टेकना क्या होता है? मैंने तुम लोगों के साथ पहले इसके बारे में संगति नहीं की है, लेकिन आज मुझे लगता है कि ऐसा करना आवश्यक है। क्या तुम लोग अपनी सामान्य सभाओं में दंडवत् करते हो? (नहीं।) क्या तुम लोग अपनी प्रार्थनाएँ करते समय दंडवत् करते हो? (हाँ।) परिस्थिति अनुमति दे, तो क्या तुम हर बार प्रार्थना करते समय दंडवत् करते हो? (हाँ।) यह अच्छा है। लेकिन मैं चाहता हूँ कि आज तुम लोग यह समझो कि परमेश्वर दो प्रकार के लोगों का आदर में घुटने टेकना स्वीकार करता है। हमें बाइबल से या किन्हीं आध्यात्मिक हस्तियों के कर्मों या आचरण से परामर्श लेने की आवश्यकता नहीं है। इसके बजाय, मैं अभी और यहीं तुम लोगों को कुछ सत्य बताऊँगा। पहला, दंडवत् करना और आराधना करने के लिए घुटने टेकना एक ही चीज नहीं है। क्यों परमेश्वर उन लोगों का घुटने टेकना स्वीकार करता है, जो दंडवत् करते हैं? ऐसा इसलिए है, क्योंकि परमेश्वर किसी व्यक्ति को अपने पास बुलाता है और उस व्यक्ति को परमेश्वर का आदेश स्वीकार करने के लिए कहता है, इसलिए परमेश्वर उस व्यक्ति को अपने सामने दंडवत् करने देता है। यह पहले प्रकार का व्यक्ति है। दूसरा प्रकार किसी ऐसे व्यक्ति का आराधना करने के लिए घुटने टेकना है, जो परमेश्वर का भय मानता है और बुराई से दूर रहता है। इन्हीं दो प्रकार के लोग होते हैं। तो तुम लोग इनमें से किस प्रकार के हो? क्या तुम लोग कहने में सक्षम हो? यह एक तथ्य है, यद्यपि यह तुम्हारी भावनाओं को थोडा आहत कर सकता है। प्रार्थना के दौरान लोगों के घुटने टेकने के बारे में कहने के लिए कुछ नहीं है—यह उचित है और वैसा ही है जैसा इसे होना चाहिए, क्योंकि जब लोग प्रार्थना करते हैं तो अधिकांशतः किसी चीज के लिए प्रार्थना करते हैं, परमेश्वर के लिए अपने हृदय खोलते हैं और उसके आमने-सामने आते हैं। यह परमेश्वर के साथ दिल से दिल तक बातचीत और विचार-विनिमय है। घुटनों के बल आराधना करना एक औपचारिकता मात्र नहीं होनी चाहिए। आज जो कुछ तुम लोगों ने किया है, मेरा इरादा उसके लिए तुम लोगों की निंदा करना नहीं है। मैं बस इसे तुम लोगों के लिए स्पष्ट करना चाहता हूँ, ताकि तुम इस सिद्धांत को समझो—तुम लोग इसे जानते हो, है न? (हाँ, हम जानते हैं।) मैं तुम लोगों को यह इसलिए बता रहा हूँ, ताकि यह दोबारा न हो। तो, क्या लोगों के पास परमेश्वर के चेहरे के सामने दंडवत् करने और घुटने टेकने का कोई अवसर होता है? ऐसा नहीं है कि ऐसा अवसर कभी नहीं आएगा। देर-सबेर ऐसा दिन आएगा, लेकिन अभी वह समय नहीं है। क्या तुम देखते हो? क्या यह तुम लोगों को परेशान करता है? (नहीं।) यह अच्छा है। शायद ये वचन तुम लोगों को प्रेरित करें या प्रेरणा दें, जिससे तुम लोग अपने हृदय में परमेश्वर और मनुष्य के बीच की वर्तमान स्थिति और मनुष्य और परमेश्वर के बीच इस समय किस प्रकार का संबंध है, उसे जान सको। यद्यपि हमने हाल ही में थोड़ी और बातचीत और विचार-विनिमय किया है, फिर भी परमेश्वर के बारे में मनुष्य की समझ अभी भी पर्याप्त नहीं है। परमेश्वर को समझने का प्रयास करने के मार्ग पर मनुष्य को अभी भी एक लंबा रास्ता तय करना है। मेरा इरादा तुम लोगों से इसे एक अत्यावश्यक कार्य के रूप में करवाने, या जल्दबाजी में इस प्रकार की आकांक्षाएँ या भावनाएँ व्यक्त करवाने का नहीं है। आज जो कुछ तुम लोगों ने किया, वह तुम लोगों की सच्ची भावनाएँ प्रकट और व्यक्त कर सकता है, और मैंने उन्हें महसूस किया है। इसलिए जब तुम लोग ऐसा कर रहे थे, तब मैं बस खड़े होकर तुम लोगों को अपनी शुभकामनाएँ देना चाहता था, क्योंकि मैं तुम सभी लोगों के भले की कामना करता हूँ। इसलिए अपने हर वचन और कार्य में मैं तुम लोगों की सहायता करने, तुम लोगों का मार्गदर्शन करने का भरसक प्रयास करता हूँ, ताकि तुम लोगों को सभी चीजों की सही समझ और सही दृष्टि मिल सके। तुम लोग इसे समझ सकते हो, है न? (हाँ।) यह बहुत अच्छा है। यद्यपि लोगों को परमेश्वर के स्वभावों के प्रत्येक पहलू, जो परमेश्वर के पास है और जो वह स्वयं है, उसके प्रत्येक पहलू और उसके द्वारा किए जाने वाले कार्य की कुछ समझ है, फिर भी अधिकांशतः यह समझ शब्दों, धर्म-सिद्धांतों और विचारों के स्तर पर ही रहती है। लोगों में जिस चीज का अत्यंत अभाव है, वह है वास्तविक ज्ञान और अंतर्दृष्टि, जो वास्तविक अनुभव से आते हैं। भले ही परमेश्वर लोगों के हृदय जाग्रत करने के लिए विभिन्न तरीके इस्तेमाल करता है, पर जिस हद तक लोग वास्तव में जागृत हो सकते हैं वह उनके अनुसरणों पर निर्भर करता है—तुम सभी को अभी भी एक लंबा रास्ता तय करना है। मैं किसी को ऐसा महसूस करते हुए नहीं देखना चाहता, मानो परमेश्वर ने उसे अनदेखा कर दिया हो, उसे त्याग दिया हो या उसका तिरस्कार किया हो। मैं बस हर एक व्यक्ति को बिना किसी संदेह या बोझ के, केवल सत्य का अनुसरण करने और परमेश्वर को जानने का प्रयास करने के मार्ग पर बिना हिचकिचाए या पीछे मुड़े, दृढ़ संकल्प के साथ आगे बढ़ते देखना चाहता हूँ। तुमने चाहे जो भी गलतियाँ की हों, चाहे तुम किसी भी गलत मोड़ पर मुड़ गए हो, या तुमने कितने भी गंभीर अपराध किए हों, इन्हें वह बोझ या फालतू सामान मत बनने दो, जिसे तुम्हें परमेश्वर के बारे में ज्ञान की अपनी खोज में ढोना पड़े। आगे बढ़ते रहो। हर वक्त, मनुष्य को बचाने का परमेश्वर का इरादा कभी नहीं बदलता। यह परमेश्वर के सार का सबसे कीमती पहलू है।
—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI