10.13. शैतान के प्रभाव को दूर कर उद्धार कैसे प्राप्त करें पर
488. मनुष्यों ने शैतान से भ्रष्ट होने के बाद सृजित प्राणियों की जो भूमिका होनी चाहिए थी उसे खोने के साथ-साथ परमेश्वर का भय मानने वाला अपना हृदय भी गँवा दिया। वे सब परमेश्वर के प्रति विद्रोही शत्रु बन गए, शैतान की सत्ता के अधीन जीते थे और शैतान की चालाकी के वश में थे; इस प्रकार, अपने सृजित प्राणियों के बीच कार्य करने का परमेश्वर के पास कोई तरीका नहीं था और वह उनका भय प्राप्त कर पाने में और भी असमर्थ हो गया। मनुष्यों को परमेश्वर ने बनाया था और उन्हें परमेश्वर की आराधना करनी चाहिए थी, पर उन्होंने वास्तव में परमेश्वर से मुँह मोड़ लिया और इसके बजाय शैतान की आराधना करने लगे। शैतान उनके दिलों में आदर्श बन गया। इस प्रकार परमेश्वर ने मनुष्य के हृदय में अपना स्थान खो दिया, जिसका मतलब है कि उसके द्वारा मानवजाति के सृजन के पीछे का अर्थ खो गया। इसलिए मानवजाति के सृजन के अपने अर्थ को बहाल करने के लिए उसे उनकी मूल समानता को बहाल करना होगा और मानवजाति को उसके भ्रष्ट स्वभाव से मुक्ति दिलानी होगी। शैतान से मनुष्यों को वापस प्राप्त करने के लिए, उसे उन्हें पाप से बचाना होगा। केवल इसी तरह परमेश्वर धीरे-धीरे उनकी मूल समानता और भूमिका को बहाल कर सकता है और अंततः अपने राज्य को बहाल कर सकता है। विद्रोह करने वाले उन पुत्रों का अंत में पूर्णतया विनाश भी इसलिए होगा कि मनुष्य बेहतर ढंग से परमेश्वर की आराधना कर सकें और पृथ्वी पर बेहतर ढंग से रह सकें। चूँकि परमेश्वर ने मानवों का सृजन किया, इसलिए वह मनुष्य से अपनी आराधना करवाएगा; क्योंकि वह मानवता के मूल कार्य को बहाल करना चाहता है, वह उसे पूर्ण रूप से और बिना किसी मिलावट के बहाल करेगा। अपना अधिकार बहाल करने का अर्थ है, मनुष्यों से अपनी आराधना कराना और समर्पण कराना; इसका अर्थ है कि वह अपनी वजह से मनुष्यों को जीवित रखेगा और अपने अधिकार की वजह से अपने शत्रुओं का विनाश करेगा। इसका अर्थ है कि परमेश्वर किसी प्रतिरोध के बिना, मनुष्यों के बीच उस सब को बनाए रखेगा जो उसके बारे में है। जो राज्य परमेश्वर स्थापित करना चाहता है, वह उसका स्वयं का राज्य है। वह जिस मानवता की आकांक्षा रखता है वह ऐसी हो जो उसकी आराधना करे, जो उसके प्रति पूरी तरह समर्पण करे और जो उसकी महिमा से युक्त हो। यदि परमेश्वर ने भ्रष्ट मानवता को न बचाया तो उसके द्वारा मानवता के सृजन का अर्थ खत्म हो जाएगा; उसका मनुष्यों के बीच अब और अधिकार नहीं रहेगा और पृथ्वी पर उसके राज्य का अस्तित्व अब और नहीं रह पाएगा। यदि परमेश्वर ने उन शत्रुओं का नाश नहीं किया जो उसके प्रति विद्रोही हैं, तो वह अपनी संपूर्ण महिमा प्राप्त करने में असमर्थ रहेगा, न ही वह पृथ्वी पर अपने राज्य की स्थापना कर पाएगा। मानवता में से उन सबको पूरी तरह नष्ट करना, जो उसके प्रति विद्रोही हैं और जो पूर्ण किए जा चुके हैं, उन्हें विश्राम में लाना—ये उसका कार्य पूरा होने और उसकी महान उपलब्धि के चिह्न होंगे।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर और मनुष्य साथ-साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे
489. सबसे आरंभ में मानव-जाति परमेश्वर के हाथों में थी, किंतु शैतान के प्रलोभन और भ्रष्टता की वजह से, मनुष्य को शैतान द्वारा बाँध लिया गया और वह इस दुष्ट के हाथों में पड़ गया। इस प्रकार, परमेश्वर के प्रबंधन कार्य में शैतान पराजित किए जाने का लक्ष्य बन गया। चूँकि शैतान ने मनुष्य पर कब्ज़ा कर लिया था, और चूँकि मनुष्य परमेश्वर के संपूर्ण प्रबंधन की पूँजी है, इसलिए यदि मनुष्य को बचाया जाना है, तो उसे शैतान के हाथों से वापस लेना होगा, जिसका तात्पर्य है कि मनुष्य को, जिसे शैतान द्वारा बंदी बना लिया गया है, वापस लेना होगा। इस प्रकार, शैतान को मनुष्य के पुराने स्वभाव में बदलावों और मनुष्य के मूल विवेक को पुनर्स्थापित करने के माध्यम से पराजित किया जाना चाहिए। इस तरह से बंदी बना लिए गए मनुष्य को शैतान के हाथों से वापस लिया जा सकता है। यदि मनुष्य शैतान के प्रभाव और बंधन से मुक्त हो जाता है, तो शैतान शर्मिंदा हो जाएगा, मनुष्य को अंततः वापस ले लिया जाएगा, और शैतान को हरा दिया जाएगा। और चूँकि मनुष्य को शैतान के अंधकारमय प्रभाव से मुक्त किया जा चुका है, इसलिए एक बार जब यह युद्ध समाप्त हो जाएगा, तो मनुष्य इस संपूर्ण युद्ध में जीत के परिणामस्वरूप प्राप्त हुआ लाभ बन जाएगा, और शैतान वह लक्ष्य बन जाएगा जिसे दंडित किया जाएगा, जिसके पश्चात् मानव-जाति के उद्धार का संपूर्ण कार्य पूरा कर लिया जाएगा।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, मनुष्य के सामान्य जीवन को बहाल करना और उसे एक अद्भुत मंजिल पर ले जाना
490. वे सब जो अंधकार के प्रभाव में रहते हैं, वे ऐसे लोग हैं जो मृत्यु के बीच जीते हैं, जो शैतान के वश में होते हैं। परमेश्वर द्वारा बचाए जाने और परमेश्वर द्वारा न्याय किए जाने और ताड़ना दिए जाने के बगैर लोग मृत्यु के प्रभाव से नहीं बच सकते; वे जीवित नहीं बन सकते। इस तरह के मृत व्यक्ति परमेश्वर के लिए गवाही नहीं दे सकते, न ही वे परमेश्वर द्वारा इस्तेमाल किए जा सकते हैं, उनका परमेश्वर के राज्य में प्रवेश करना तो दूर की बात है। परमेश्वर को जीवितों की गवाही चाहिए, मृतकों की नहीं, वह यह माँग करता है कि उसके लिए जीवित लोग कार्य करें, मृत नहीं। “मृत” वे हैं जो परमेश्वर का विरोध और उससे विद्रोह करते हैं; ये वे लोग हैं जो आत्मा में संवेदन-शून्य हैं और परमेश्वर के वचनों को नहीं समझते; ये वे लोग हैं जो सत्य को अभ्यास में नहीं लाते और परमेश्वर के प्रति जरा सी भी निष्ठा नहीं रखते, ये वे लोग हैं जो शैतान की शक्ति के अधीन रहते हैं और शैतान द्वारा उपयोग किए जाते हैं। मृत व्यक्तियों के लक्षण हैं सत्य के विरुद्ध खड़े होना, परमेश्वर के खिलाफ विद्रोह करना और नीच, घिनौना, नृशंस, दबंग, चालबाज और कपटी होना। भले ही ऐसे लोग परमेश्वर का वचन खाते और पीते हों, तो भी वे परमेश्वर के वचनों को जीने में समर्थ नहीं होते; वे जीवित तो हैं, परंतु वे बस चलती-फिरती लाशें हैं, सांस लेते मृतक हैं। मृत लोग परमेश्वर को संतुष्ट करने में पूर्णतः असमर्थ हैं, उसके प्रति नितांत समर्पणशील होने की तो बात ही दूर है। वे केवल उसे धोखा दे सकते हैं, उसकी ईशनिंदा कर सकते हैं, उससे विश्वासघात कर सकते हैं और वे जिस चीज को जीते हैं वह पूरी तरह शैतान की प्रकृति के खुलासे हैं। यदि लोग जीवित प्राणी बनना, परमेश्वर की गवाही देना और परमेश्वर द्वारा योग्य समझा जाना चाहते हैं तो उन्हें परमेश्वर का उद्धार स्वीकार करना चाहिए; उन्हें सहर्ष उसके न्याय व ताड़ना के प्रति समर्पण करना चाहिए और परमेश्वर द्वारा काट-छाँट को सहर्ष स्वीकार करना चाहिए। तभी वे परमेश्वर द्वारा अपेक्षित तमाम सत्यों को अभ्यास में ला सकेंगे, तभी वे परमेश्वर का उद्धारकारी अनुग्रह प्राप्त करेंगे और सचमुच जीवित प्राणी बनेंगे। जीवित वे होते हैं जो परमेश्वर द्वारा बचाए जाते हैं; उनका परमेश्वर द्वारा न्याय किया गया है और उनकी परमेश्वर द्वारा ताड़ना की गई है, वे परमेश्वर के लिए खुद को समर्पित करने के इच्छुक होते हैं और खुशी से अपने प्राण न्योछावर करते हैं और वे सहर्ष अपना संपूर्ण जीवन परमेश्वर के लिए खपाते हैं। जब जीवित लोग परमेश्वर की गवाही देते हैं, केवल तभी शैतान को लज्जित किया जा सकता है; केवल जीवित ही परमेश्वर के सुसमाचार कार्य को फैला सकते हैं, केवल जीवित ही परमेश्वर के इरादों के अनुरूप होते हैं और केवल जीवित ही वास्तविक लोग होते हैं। मूलतः परमेश्वर द्वारा बनाया गया मनुष्य जीवित था, परंतु शैतान की भ्रष्टता के कारण मनुष्य मृत्यु में जीता है, शैतान के प्रभाव में जीता है और लिहाजा, इस तरीके से लोग आत्माविहीन मृत हो चुके हैं, वे ऐसे शत्रु बन गए हैं जो परमेश्वर का विरोध करते हैं, वे शैतान के औजार बन गए हैं और वे शैतान के कैदी बन गए हैं। परमेश्वर ने जिन जीवित लोगों की रचना की थी वे मृत बन गए हैं और इसलिए परमेश्वर ने अपनी गवाही खो दी है और उसने उस मानवजाति को भी खो दिया है जिसे उसने रचा है और जो एकमात्र ऐसी चीज है जिसमें उसकी साँस है। अगर परमेश्वर को अपनी गवाही वापस लेनी है और उन लोगों को वापस लेना है जिसे उसने अपने हाथों से बनाया, लेकिन जो शैतान द्वारा कैद कर लिए गए हैं, तो उसे उन्हें पुनर्जीवित करना होगा जिससे वे जीवित प्राणी बन जाएँ, उसे उन सबको वापस लाना होगा ताकि वे उसकी रोशनी में जी सकें। मृत वे लोग हैं जिनमें आत्मा नहीं होती, जो चरम सीमा तक सुन्न हैं, जो परमेश्वर का विरोध करते हैं, और इससे भी बढ़कर जो परमेश्वर को नहीं जानते हैं। इन लोगों का परमेश्वर के प्रति समर्पण करने का जरा-सा भी इरादा नहीं होता है; वे बस उसके विरुद्ध विद्रोह करते हैं और उसका विरोध करते हैं और इनमें थोड़ी-सी भी निष्ठा नहीं होती है। जीवित वे हैं जिनकी आत्मा पुनर्जीवित हो चुकी है, जो परमेश्वर के प्रति समर्पण करना जानते हैं, जो परमेश्वर के प्रति निष्ठावान होते हैं और जिनमें सत्य और गवाही होती है—सिर्फ यही लोग परमेश्वर को अपने घर में पसंद हैं।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, क्या तुम ऐसे व्यक्ति हो जो जीवित हो उठा है?
491. अंधकार का प्रभाव क्या है? यह तथाकथित “अंधकार का प्रभाव”, शैतान द्वारा लोगों को गुमराह करने, भ्रष्ट करने, बाँधने और नियंत्रित करने का प्रभाव है; शैतान का प्रभाव एक ऐसा प्रभाव है जिसमें मृत्यु का साया है। शैतान की सत्ता में रहने वाले सभी लोग नष्ट हो जाने के लिए अभिशप्त हैं। परमेश्वर में विश्वास रखने के बाद, तुम अंधकार के प्रभाव से कैसे बच सकते हो? जब तुम सच्चे मन से परमेश्वर से प्रार्थना करते हो, तुम्हारा हृदय पूरी तरह से परमेश्वर की ओर मुड़ जाएगा और उस समय तुम्हारा हृदय परमेश्वर के आत्मा द्वारा प्रेरित होगा और तुम पूरी तरह से स्वयं को उसे सौंप देने को तैयार हो जाओगे, उस समय, तुम अंधकार के प्रभाव से निकल चुके होगे। यदि किसी व्यक्ति के सारे काम परमेश्वर को प्रसन्न करें और उसकी अपेक्षाओं के अनुरूप हों, तो वह ऐसा व्यक्ति है जो परमेश्वर के वचनों में और उसकी देखभाल एवं सुरक्षा में जीता है। यदि लोग परमेश्वर के वचनों का अभ्यास नहीं कर पाते हैं, अगर वे हमेशा परमेश्वर के प्रति लापरवाह तरीके से काम करते हैं और उसके अस्तित्व में विश्वास नहीं करते हैं, तो ऐसे सभी लोग अंधकार के प्रभाव में रहते हैं। जिन लोगों को परमेश्वर द्वारा बचाया नहीं गया है, वे सभी शैतान की सत्ता में जी रहे हैं; अर्थात्, वे सभी अंधकार के प्रभाव में रहते हैं। जो लोग परमेश्वर में विश्वास नहीं रखते, वे शैतान की सत्ता में रह रहे हैं। यहाँ तक कि जो लोग परमेश्वर के अस्तित्व में विश्वास रखते हैं, जरूरी नहीं कि वे परमेश्वर के प्रकाश में रह रहे हों, क्योंकि जो लोग परमेश्वर में विश्वास रखते हैं, जरूरी नहीं कि वे परमेश्वर के वचनों में जी रहे हों या उसके प्रति समर्पण करने में समर्थ हों। मनुष्य केवल परमेश्वर में विश्वास रखने तक सीमित है, और चूँकि उसे परमेश्वर का ज्ञान नहीं है, इसलिए वह अभी भी पुराने विनियमों में जी रहा है, निर्जीव वचनों के बीच जी रहा है और वह एक ऐसा जीवन जी रहा है जो अंधकारमय और अज्ञात है, जिसे न तो परमेश्वर द्वारा पूरी तरह से शुद्ध किया गया है, न ही पूरी तरह से परमेश्वर द्वारा प्राप्त किया गया है। इसलिए, कहने की आवश्यकता नहीं कि जो लोग परमेश्वर पर विश्वास नहीं करते, वे अंधकार के प्रभाव में जी रहे हैं; यहाँ तक कि जो लोग यह मानते हैं कि परमेश्वर का अस्तित्व है, वे भी पवित्र आत्मा का काम नहीं होने के कारण अंधकार के प्रभाव में जी रहे हैं। जो लोग परमेश्वर के अनुग्रह या दया के बिना हैं, वे पवित्र आत्मा के कार्य की प्रवृत्ति को नहीं देख सकते। जो लोग यह महसूस करने में असमर्थ हैं कि पवित्र आत्मा उनमें काम कर रहा है या नहीं, वे सभी अंधकार के प्रभाव में जी रहे हैं; और ज्यादातर समय वे लोग भी अंधकार के प्रभाव में जी रहे होते हैं, जो महज परमेश्वर के अनुग्रह का आनंद लेते हैं फिर भी परमेश्वर को नहीं जानते हैं। यदि कोई व्यक्ति परमेश्वर पर विश्वास करता है, फिर भी अपना अधिकांश जीवन अंधकार के प्रभाव में जीते हुए बिताता है, तो उस व्यक्ति का अस्तित्व अपना अर्थ खो चुका होता है—और उन लोगों का उल्लेख करने की क्या आवश्यकता है जो परमेश्वर के अस्तित्व में विश्वास ही नहीं रखते?
जो लोग परमेश्वर के काम को स्वीकार नहीं कर सकते हैं या जो परमेश्वर के कार्य को स्वीकार तो करते हैं लेकिन उसकी अपेक्षाओं को पूरा नहीं कर पाते, वे लोग अंधकार के प्रभाव में जी रहे हैं। जो लोग सत्य का अनुसरण करते हैं और परमेश्वर की अपेक्षाओं को पूरा करने में सक्षम हैं, केवल वे ही परमेश्वर का आशीष प्राप्त करते हैं और केवल वे ही अंधकार के प्रभाव से बच पाए हैं। जो लोग कोई मुक्ति महसूस नहीं करते हैं, जो हमेशा कुछ चीजों से बाधित होते हैं और जो अपना हृदय परमेश्वर को नहीं दे पाते, वे लोग शैतान के बंधन में हैं और वे मौत के साये में जी रहे हैं। जो लोग उन कर्तव्यों के प्रति समर्पित नहीं हैं जो उन्हें अवश्य करने चाहिए, जो परमेश्वर के आदेश के प्रति समर्पित नहीं हैं और जो कलीसिया में अपना कार्य नहीं कर रहे हैं, वे ऐसे लोग हैं जो अंधकार के प्रभाव में जी रहे हैं। जो जानबूझकर कलीसियाई जीवन में बाधा डालते हैं, जो जानबूझकर अपने भाई-बहनों के बीच फूट डालते हैं या अपने गुट बनाते हैं, वे और भी अधिक अंधकार के प्रभाव में रहते हैं, शैतान के बंधन में रहते हैं। जिनका परमेश्वर के साथ एक असामान्य रिश्ता है, जिनकी हमेशा असंयमित इच्छाएँ होती हैं, जो हमेशा लाभ लेना चाहते हैं और जो बिल्कुल भी स्वभावगत परिवर्तन का अनुसरण नहीं करना चाहते हैं, वे ऐसे लोग होते हैं जो अंधकार के प्रभाव में रहते हैं। जो लोग हमेशा लापरवाह होते हैं, सत्य के अपने अभ्यास में गंभीर नहीं होते, परमेश्वर के इरादों को पूरा करने का प्रयास नहीं करते, जो केवल अपनी देह को संतुष्ट करने में लगे रहते हैं, ऐसे लोग भी अंधकार के प्रभाव में जी रहे हैं, और मृत्यु से घिरे हुए हैं। जो लोग परमेश्वर के लिए काम करते समय चालबाजी और धूर्तता करते हैं, परमेश्वर के साथ लापरवाही से व्यवहार करते हैं, जो परमेश्वर को धोखा देते हैं, हमेशा स्वयं के लिए सोचते रहते हैं, ऐसे लोग अंधकार के प्रभाव में रह रहे हैं। जो लोग ईमानदार हृदय के साथ परमेश्वर से प्रेम नहीं कर सकते हैं, जो सत्य का अनुसरण नहीं करते, और जो अपने स्वभाव को बदलने पर ध्यान नहीं देते, वे लोग अंधकार के प्रभाव में रह रहे हैं।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, अंधकार के प्रभाव से बच निकलो और तुम परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जाओगे
492. मनुष्य देह के बीच रहता है, जिसका मतलब है कि वह एक मानवीय नरक में रहता है और परमेश्वर के न्याय और ताड़ना के बगैर मनुष्य शैतान के समान ही गंदा है। मनुष्य पवित्र कैसे हो सकता है? पतरस मानता था : परमेश्वर द्वारा ताड़ना और न्याय मनुष्य की सर्वश्रेष्ठ सुरक्षा और सबसे बड़ा अनुग्रह है। परमेश्वर की ताड़ना और न्याय से ही मनुष्य जाग सकता है और देह से घृणा कर सकता है, शैतान से घृणा कर सकता है। परमेश्वर का कठोर अनुशासन मनुष्य को शैतान के प्रभाव से मुक्त करता है, उसे अपने खुद के छोटे-से संसार से मुक्त करता है और उसे परमेश्वर के मुखमंडल के प्रकाश में जीने देता है। ताड़ना और न्याय से बेहतर उद्धार कोई नहीं है! पतरस ने प्रार्थना की, “परमेश्वर! जब तक तू मुझे ताड़ना देता रहेगा और मेरा न्याय करता रहेगा, मुझे पता होगा कि तूने मुझे नहीं छोड़ा है। भले ही तू मुझे आनंद या शांति न दे, और मुझे कष्ट में रहने दे, और मुझे अनगिनत ताड़नाओं से अनुशासित करे, किंतु जब तक तू मुझे छोड़ेगा नहीं, तब तक मेरा हृदय सुकून में रहेगा। आज, तेरी ताड़ना और न्याय मेरी बेहतरीन सुरक्षा और महानतम आशीष बन गए हैं। जो अनुग्रह तू मुझे देता है वह मेरी सुरक्षा करता है। आज तू मुझ पर अनुग्रह बरसाता है और यह अनुग्रह तेरे धार्मिक स्वभाव का प्रकाशन है, और यह ताड़ना और न्याय है; और भी ज्यादा यह एक परीक्षण और एक कष्टों भरा जीवन है।” पतरस देह के सुख त्याग पाया और एक ज्यादा गहरा प्रेम और ज्यादा बड़ी सुरक्षा खोज पाया क्योंकि उसने परमेश्वर की ताड़ना और न्याय से बहुत सारा अनुग्रह हासिल कर लिया था। अगर मनुष्य अपने जीवन में शुद्ध किया जाना और अपने स्वभाव में बदलाव लाना चाहता है, यदि वह एक सार्थक जीवन जीना चाहता है और एक सृजित प्राणी के रूप में अपना कर्तव्य निभाना चाहता है तो उसे परमेश्वर की ताड़ना और न्याय को स्वीकार करना चाहिए, उसे परमेश्वर के अनुशासन और प्रहार को अपने से दूर नहीं होने देना चाहिए, ताकि वह खुद को शैतान की चालाकी और प्रभाव से मुक्त कर सके और परमेश्वर के प्रकाश में जी सके। यह जान लो कि परमेश्वर की ताड़ना और न्याय प्रकाश है, मनुष्य के उद्धार का प्रकाश है और मनुष्य के लिए इससे बेहतर कोई आशीष नहीं है, इससे और बड़ा अनुग्रह या बेहतर सुरक्षा नहीं है। मनुष्य शैतान के प्रभाव में जीता है और देह में अस्तित्वमान रहता है; यदि उसे शुद्ध न किया जाए और उसे परमेश्वर की सुरक्षा प्राप्त न हो, तो वह और भी ज्यादा भ्रष्ट हो जाएगा। यदि वह परमेश्वर से प्रेम करना चाहता है, तो उसे शुद्ध होना और उद्धार पाना होगा। पतरस ने प्रार्थना की, “परमेश्वर, जब तू मुझ पर दया दिखाता है तो मैं प्रसन्न हो जाता हूँ, और मुझे सुकून मिलता है; जब तू मुझे ताड़ना देता है, तब मुझे और भी ज्यादा सुकून और आनंद मिलता है। यद्यपि मैं कमजोर हूँ और मैंने अकथनीय कष्ट सहे हैं, यद्यपि मेरी आँखों में आँसू और मन में दुख है, लेकिन तू जानता है कि यह दुख मेरे विद्रोहीपन और मेरी कमजोरी के कारण है। मैं रोता हूँ क्योंकि मैं तेरा इरादा पूरा नहीं कर सकता हूँ, मैं दुख और पछतावा इसलिए महसूस करता हूँ क्योंकि मैं तेरी अपेक्षाओं के लिए अपर्याप्त हूँ, लेकिन मैं इस स्तर तक पहुँचने का इच्छुक हूँ, मैं तुझे संतुष्ट करने के लिए सब कुछ करने का इच्छुक हूँ। तेरी ताड़ना ने मेरी सुरक्षा का काम किया है, और मेरे लिए श्रेष्ठतम उद्धार का काम किया है; तेरा न्याय तेरी सहनशीलता और धीरज से बढ़कर है। तेरी ताड़ना और न्याय के बगैर, मैं तेरी दया और करुणा का आनंद नहीं ले पाऊँगा। आज, मैं और भी अधिक देख रहा हूँ कि तेरा प्रेम स्वर्ग से भी ऊँचा उठकर अन्य सभी चीजों पर छा गया है। तेरा प्रेम मात्र दया और करुणा नहीं है; बल्कि उससे भी बढ़कर, यह ताड़ना और न्याय है। तेरी ताड़ना और न्याय से मैंने इतना अधिक हासिल किया है। तेरी ताड़ना और न्याय के बगैर एक भी व्यक्ति शुद्ध नहीं होगा और एक भी व्यक्ति सृष्टिकर्ता के प्रेम को अनुभव नहीं कर पाएगा। यद्यपि मैंने सैकड़ों परीक्षण और क्लेश सहे हैं, यहाँ तक कि मैं मौत से भी बाल-बाल बचा हूँ, फिर भी इन्होंने मुझे वाकई तुझे जानने और असीम उद्धार प्राप्त करने दिया है। यदि तेरी ताड़ना, न्याय और अनुशासन मुझसे दूर हो गए होते, तो मैं अंधकार में शैतान की सत्ता के अधीन जी रहा होता। मनुष्य की देह का क्या लाभ है? यदि तेरी ताड़ना और न्याय मुझे छोड़कर चले जाएँ तो यह ऐसा होगा मानो तेरे आत्मा ने मुझे छोड़ दिया हो, मानो अब से तू मेरे साथ न हो। यदि ऐसा हो जाता तो मैं कैसे जीता रह पाता? तूने मुझे बीमारी दी और मेरी स्वतंत्रता छीन ली, मैं जीते रहने में सक्षम था, परंतु अगर तेरी ताड़ना और न्याय मुझे छोड़ दें तो मेरे पास जीने का कोई रास्ता न होगा। यदि मेरे पास तेरी ताड़ना और न्याय न होता तो मैं तेरे प्रेम को खो चुका होता, तेरा प्रेम जो इतना गहरा है कि मैं इसे शब्दों में बयाँ नहीं कर सकता। तेरे प्रेम के बिना, मैं शैतान की सत्ता के अधीन जी रहा होता, और तेरे महिमामय मुखड़े को न देख पाता। मैं कैसे जीवित रह पाता? मैं ऐसे अंधकार में, ऐसे जीवन में मुश्किल से ही जी पाता। मेरे साथ तेरे होने का अर्थ है कि मैं तुझे देख रहा हूँ, तो मैं तुझे कैसे छोड़ सकता हूँ? मैं तुझसे पूरी ईमानदारी से विनती करता हूँ, याचना करता हूँ, तू मेरी सबसे बड़ी सांत्वना मत छीन, भले ही ये तेरे सांत्वना देने वाले वचनों की बस एक फुहार ही हो। मैंने तेरे प्रेम का आनंद लिया है, और आज मैं तुझसे दूर नहीं रह सकता; मैं तुझसे कैसे प्रेम न करूँ? मैंने तेरे प्रेम के कारण दुख में बहुत आँसू बहाए हैं, फिर भी हमेशा यही लगा है कि इस तरह का जीवन अधिक अर्थपूर्ण है, मुझे समृद्ध बनाने में अधिक सक्षम है, मुझे बदलने में अधिक सक्षम है, और वह सत्य हासिल करने में अधिक सक्षम है जो सृजित प्राणियों के पास होना चाहिए।”
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, पतरस के अनुभव : ताड़ना और न्याय का उसका ज्ञान
493. मनुष्य की देह शैतान की है, यह विद्रोही स्वभावों से परिपूर्ण है, यह दुखद रूप से गंदी है, और यह कुछ ऐसी है जो अस्वच्छ है। लोग देह के आनंद के लिए बहुत अधिक ललचाते हैं और देह को बहुत सारी अभिव्यक्तियाँ देते हैं; यही कारण है कि परमेश्वर मनुष्य की देह से इस हद तक नफरत करता है। जब लोग शैतान की गंदी, भ्रष्ट चीजों को निकाल फेंकते हैं, तब वे परमेश्वर से उद्धार प्राप्त करते हैं। परंतु यदि वे गंदगी और भ्रष्टता का अब भी त्याग नहीं करते हैं, तो वे अभी भी शैतान की सत्ता के अधीन रह रहे हैं। लोगों का साजिश और लड़ाई करना, कपट, और कुटिलता सब शैतान की चीजें हैं। परमेश्वर द्वारा तुम्हारा उद्धार तुम्हें शैतान की इन चीजों से छुड़ाने के लिए है। परमेश्वर का कार्य ग़लत नहीं हो सकता है; यह सब लोगों को अंधकार से बचाने के लिए किया जाता है। जब तुम परमेश्वर में अपने विश्वास में एक बिंदु तक पहुँच गए हो जहाँ तुम देह की भ्रष्टता से अपने को छुड़ा सकते हो, और इस भ्रष्टता से अब और बाधित नहीं हो, तो क्या तुम बचाए नहीं जा चुके होगे? जब तुम शैतान की सत्ता के अधीन रहते हो तब तुम परमेश्वर को अभिव्यक्त करने में असमर्थ होते हो, तुम कोई गंदी चीज होते हो, और परमेश्वर की विरासत प्राप्त नहीं कर सकते हो। एक बार जब तुम्हें स्वच्छ कर दिया और पूर्ण बना दिया गया, तो तुम पावनीकृत किए जाओगे, तुम सामान्य व्यक्ति हो जाओगे, और तुम परमेश्वर द्वारा धन्य किए जाओगे और परमेश्वर को खुश करने वाले बन जाओगे।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, अभ्यास (2)
494. मनुष्य का सारा जीवन शैतान की सत्ता के अधीन बीतता है और एक भी ऐसा इंसान नहीं है जो अपने बलबूते खुद को शैतान के प्रभाव से आजाद कर सके। सब एक मलिन संसार में, भ्रष्टता और खोखलेपन में जीते हैं, जिसमें लेशमात्र भी अर्थ या मूल्य नहीं होता है; वे देह के लिए, वासना के लिए और शैतान के लिए ऐसा बेफिक्र जीवन जीते हैं। उनके अस्तित्व का कोई मूल्य नहीं है। मनुष्य उस सत्य को खोज पाने में असमर्थ है जो उसे शैतान के प्रभाव से मुक्त कर दे। भले ही मनुष्य परमेश्वर में विश्वास करता है और बाइबल पढ़ता है, फिर भी वह यह नहीं समझ पाता कि अपने आपको शैतान के प्रभाव के नियंत्रण से कैसे मुक्त करे। विभिन्न युगों के दौरान बहुत ही कम लोगों ने इस रहस्य को जाना है, बहुत ही कम लोगों ने इसे भली-भाँति समझा है। ऐसे में यद्यपि मनुष्य शैतान और देह से घृणा करता है, फिर भी वह नहीं जानता कि अपने आपको शैतान के हानिकारक प्रभाव से कैसे छुड़ाए। क्या आज भी तुम लोग शैतान की सत्ता के अधीन नहीं हो? तुम लोग अपने विद्रोही कार्यों पर पछताते नहीं हो, और यह तो बिल्कुल भी महसूस नहीं करते कि तुम अशुद्ध और विद्रोही हो। परमेश्वर का विरोध करके भी तुम लोगों को मन की शांति मिलती है और तुम्हें शांतचित्तता का एहसास होता है। क्या तुम्हारी यह शांतचित्तता इसलिए नहीं है क्योंकि तुम भ्रष्ट हो? क्या शांति का यह भाव तुम्हारे विद्रोहीपन से नहीं उपजता? मनुष्य एक मानवीय नरक में रहता है, वह शैतान के अंधेरे प्रभाव में रहता है; पूरी धरती पर, प्रेत मनुष्य के साथ-साथ जीते हैं, और मनुष्य की देह का क्षरण करते हैं। पृथ्वी पर तुम किसी सुंदर स्वर्गलोक में नहीं रहते। जहाँ तुम रहते हो वह दानवों का संसार है, एक मानवीय नरक है, अधोलोक है। यदि मनुष्य को शुद्ध न किया जाए तो वह मलिनता का है; यदि परमेश्वर द्वारा उसकी सुरक्षा और देखभाल न की जाए तो वह अभी भी शैतान का बंदी ही है; यदि उसका न्याय और उसकी ताड़ना नहीं की जाए तो वह शैतान के अंधकारमय प्रभाव के दमन से बचने में और भी कम सक्षम होगा। तुम जो भ्रष्ट स्वभाव दिखाते हो और जिस विद्रोही व्यवहार को जीते हो, वे यह साबित करने के लिए काफी हैं कि तुम अभी भी शैतान की सत्ता के अधीन जी रहे हो। यदि तुम्हारे मन और विचारों को शुद्ध नहीं किया गया है और यदि तुम्हारे स्वभाव का न्याय और ताड़ना नहीं हुए हैं तो तुम्हारा पूरा अस्तित्व अभी भी शैतान की सत्ता की पकड़ में है, तुम्हारा मन शैतान के द्वारा नियंत्रित किया जाता है, तुम्हारे विचार शैतान द्वारा बहकाए जाते हैं और तुम्हारा पूरा अस्तित्व शैतान के हाथों में है। क्या तुम जानते हो, तुम फिलहाल पतरस के स्तर से कितनी दूर हो? क्या तुममें वह योग्यता है? तुम आज के न्याय और ताड़ना के बारे में कितना जानते हो? जितना पतरस जान पाया उसमें से तुम कितना जान पाए हो? यदि तुम आज जानने में असमर्थ हो, तो क्या तुम इस ज्ञान को भविष्य में जानने योग्य हो पाओगे? तुम जैसा आलसी और डरपोक व्यक्ति न्याय और ताड़ना को जानने में समर्थ है ही नहीं। यदि तुम दैहिक शांति और दैहिक सुख की खोज करते हो, तो तुम्हारे पास शुद्ध होने का कोई उपाय नहीं होगा, और अंत में तुम शैतान को दे दिए जाओगे, क्योंकि जिस प्रकार का जीवन तुम जीते हो, वह शैतानी और दैहिक है। आज स्थिति यह है कि बहुत-से लोग जीवन का बिल्कुल भी अनुसरण नहीं करते, जिसका मतलब है कि वे शुद्ध होने या जीवन के अधिक गहरे अनुभव में प्रवेश करने की परवाह नहीं करते। इस प्रकार कैसे उन्हें पूर्ण बनाया जा सकता है? जो लोग जीवन का अनुसरण नहीं करते, उनके पास पूर्ण किए जाने का कोई अवसर नहीं होता, और जो लोग परमेश्वर के ज्ञान की खोज नहीं करते, जो अपने स्वभावों में बदलावों का अनुसरण नहीं करते, वे शैतान के अंधकारमय प्रभाव से बच पाने में असमर्थ होते हैं।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, पतरस के अनुभव : ताड़ना और न्याय का उसका ज्ञान
495. जो लोग परमेश्वर में विश्वास करते हैं लेकिन फिर भी सत्य का अनुसरण नहीं करते, वे शैतान के प्रभाव से किसी भी तरह नहीं बच सकते। जो लोग निष्कपट ढंग से आचरण नहीं करते, जो लोगों के सामने एक तरह से और उनकी पीठ पीछे दूसरी तरह से व्यवहार करते हैं, जो नम्रता, धैर्य और प्रेम का दिखावा करते हैं, जबकि वे अपने सार में कपटी और धूर्त हैं और परमेश्वर के प्रति उनकी कोई निष्ठा नहीं होती, ऐसे सभी लोग अंधकार के प्रभाव में रहने वाले लोगों के विशिष्ट नमूने हैं; वे सर्प की किस्म के लोग हैं। जो लोग परमेश्वर में अपने विश्वास में हमेशा अपनी खातिर साजिश रचते हैं, जो आत्मतुष्ट और खुदगर्ज हैं, जो दिखावा करते हैं और जो अपने रुतबे की रक्षा करते हैं, वे ऐसे लोग होते हैं जो शैतान से प्यार करते हैं और सत्य का विरोध करते हैं। वे लोग परमेश्वर का प्रतिरोध करते हैं और पूरी तरह से शैतान के होते हैं। जो लोग परमेश्वर के बोझ के प्रति विचारशील नहीं हैं, जो पूरे दिल से परमेश्वर की सेवा नहीं करते, जो हमेशा अपने और अपने परिवार के हितों के लिए चिंतित रहते हैं, जो खुद को परमेश्वर की खातिर खपाने के लिए हर चीज का त्याग करने में सक्षम नहीं हैं और जो परमेश्वर के वचनों के अनुसार अपनी जिंदगी नहीं जीते, वे परमेश्वर के वचनों के बाहर जी रहे हैं। ऐसे लोगों को परमेश्वर की स्वीकृति प्राप्त नहीं हो सकती।
जब परमेश्वर ने लोगों को बनाया, तो उसका उद्देश्य था कि वे परमेश्वर की समृद्धि का आनंद लें और वास्तव में उससे प्यार करें; इस तरह, वे उसके प्रकाश में रहेंगे। आज, जो लोग परमेश्वर से प्रेम नहीं कर सकते, परमेश्वर के बोझ के प्रति विचारशील नहीं हो सकते, अपना हृदय पूरी तरह से परमेश्वर को नहीं सौंप सकते, परमेश्वर के हृदय को अपना हृदय नहीं मान सकते और परमेश्वर के बोझ को अपना बोझ मानकर उसे अपने ऊपर नहीं ले सकते, ऐसे सभी लोगों पर परमेश्वर का प्रकाश नहीं चमकता है और इसलिए ऐसे सभी लोग अंधकार के प्रभाव में जी रहे हैं। ये लोग पूरी तरह से परमेश्वर के इरादों के विपरीत जाते हैं और उनके किसी भी काम में लेशमात्र भी सत्य नहीं होता। वे शैतान के साथ दलदल में लोट रहे हैं और अंधकार के प्रभाव में जी रहे हैं। यदि तुम अक्सर परमेश्वर के वचनों को खा और पी सको, साथ ही परमेश्वर के इरादों के प्रति विचारशील रह सको और परमेश्वर के वचनों का अभ्यास कर सको, तो तुम परमेश्वर द्वारा चुने गए हो, तुम ऐसे व्यक्ति हो जो परमेश्वर के वचनों में जी रहा है। क्या तुम शैतान की सत्ता से निकलने और परमेश्वर के प्रकाश में रहने के लिए तैयार हो? यदि तुम परमेश्वर के वचनों में रहते हो, तो पवित्र आत्मा को अपना काम करने का अवसर मिलेगा। यदि तुम शैतान के प्रभाव में रहते हो, तो पवित्र आत्मा के पास ऐसा कोई अवसर नहीं होगा। पवित्र आत्मा लोगों पर जो काम करता है, वह जो प्रकाश उन पर डालता है और वह जो आस्था उन्हें देता है, वह केवल एक ही पल तक रहता है; यदि लोग सचेत न रहें और ध्यान न दें, तो पवित्र आत्मा का कार्य उनके पास से निकल जाएगा। यदि लोग परमेश्वर के वचनों में जीते हैं, तो पवित्र आत्मा उनके साथ रहेगा और उन पर काम करेगा; अगर वे परमेश्वर के वचनों में नहीं जीते हैं, तो वे शैतान के बंधन में जीते हैं। यदि वे भ्रष्ट स्वभावों में जीते हैं, तो उनमें पवित्र आत्मा की उपस्थिति और पवित्र आत्मा का कार्य नहीं होता। यदि तुम परमेश्वर के वचनों की सीमाओं में जी रहे हो और तुम परमेश्वर द्वारा अपेक्षित दशा में जी रहे हो, तो तुम परमेश्वर द्वारा चुने गए हो और उसका काम तुम पर किया जाएगा। अगर तुम परमेश्वर की अपेक्षाओं के दायरे में नहीं जी रहे हो, बल्कि शैतान की सत्ता के अधीन जी रहे हो, तो निश्चित रूप से तुम शैतान की भ्रष्टता के अधीन जी रहे हो। केवल परमेश्वर के वचनों में जीकर और अपना हृदय परमेश्वर को समर्पित करके ही तुम परमेश्वर की अपेक्षाओं को पूरा कर सकते हो। तुम्हें वैसा ही करना चाहिए जैसा परमेश्वर कहता है, तुम्हें परमेश्वर के वचनों को अपने अस्तित्व की बुनियाद और अपने दैनिक जीवन की वास्तविकता बनाना चाहिए; केवल तभी तुम परमेश्वर द्वारा चुने गए व्यक्ति हो। यदि तुम वास्तव में परमेश्वर के इरादों के अनुसार अभ्यास करते हो, तो परमेश्वर तुम पर काम करेगा, और फिर तुम उसके आशीष में रहोगे, उसके मुखमंडल की रोशनी में रहोगे; तुम पवित्र आत्मा के कार्य को समझोगे और परमेश्वर की उपस्थिति का आनंद महसूस करोगे।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, अंधकार के प्रभाव से बच निकलो और तुम परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जाओगे
496. अंधकार के प्रभाव से बचने के लिए, पहले तुम्हें परमेश्वर के प्रति वफादार होना चाहिए और तुम्हारे पास सत्य का अनुसरण करने वाला हृदय होना चाहिए, तभी तुम्हारी दशा सही हो सकती है। अंधकार के प्रभाव से बचने के लिए सही दशा में रहना इसकी पूर्व-शर्त है। सही दशा न होने का मतलब है कि तुम परमेश्वर के प्रति वफादार नहीं हो और तुम्हारे पास सत्य की खोज करने वाला हृदय नहीं है, जिस स्थिति में अंधकार के प्रभाव से बचने का तो प्रश्न ही नहीं उठता। मेरे वचन इंसान के अंधकार के प्रभावों से बचने का आधार हैं और जो लोग मेरे वचनों के अनुसार अभ्यास नहीं कर सकते, वे अंधकार के प्रभाव के बंधन से बचने में समर्थ नहीं होंगे। सही अवस्था में जीने का अर्थ है परमेश्वर के वचनों के मार्गदर्शन में जीना, परमेश्वर के प्रति वफादार होने की दशा में जीना, सत्य खोजने की दशा में जीना, सच्चे मन से परमेश्वर के लिए खुद को खपाने की वास्तविकता में जीना और वास्तव में परमेश्वर से प्रेम करने की दशा में जीना। जो लोग इन दशाओं में और इन वास्तविकताओं में जीते हैं, वे जैसे-जैसे सत्य में अधिक गहराई से प्रवेश करेंगे और जैसे-जैसे काम गहन होता जाएगा, वैसे-वैसे वे धीरे-धीरे परिवर्तित होते जाएँगे; और अंत में, वे निश्चित रूप से ऐसे लोग बन जाएँगे जो परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए गए हैं और सचमुच उससे प्रेम करते हैं। जो लोग अंधकार के प्रभाव से बच निकले हैं, वे धीरे-धीरे परमेश्वर के इरादों को ग्रहण कर सकते हैं, धीरे-धीरे इसे समझ सकते हैं, और अंततः परमेश्वर के विश्वासपात्र बन जाते हैं। उनके अंदर न केवल परमेश्वर के बारे में कोई धारणा नहीं होती, वे लोग परमेश्वर के खिलाफ कोई विद्रोह भी नहीं करते, बल्कि वे लोग अपनी पिछली धारणाओं और विद्रोह से और भी अधिक घृणा करने लगते हैं और उनके हृदय में परमेश्वर के लिए सच्चा प्यार पैदा हो जाता है। जो लोग अंधकार के प्रभाव से बच निकलने में असमर्थ हैं, वे अपनी देह में लिप्त रहते हैं, और विद्रोह से भरे होते हैं; उनके हृदय मानवीय धारणाओं और सांसारिक आचरण के फलसफों से और साथ ही अपने इरादों और योजनाओं से भरे रहते हैं। परमेश्वर मनुष्य से एकनिष्ठ प्रेम चाहता है; परमेश्वर चाहता है कि मनुष्य उसके वचनों से भरा रहे और उसके प्रति प्यार भरे हृदय से परिपूर्ण रहे। परमेश्वर के वचनों में जीना, उसके वचनों में वह ढूँढ़ना जिसका उसे अनुसरण करना चाहिए, परमेश्वर को उसके वचनों के कारण प्यार करना, उसके वचनों के कारण भागना, उसके वचनों के कारण जीना—मनुष्य को यही सब हासिल करना चाहिए। सब कुछ परमेश्वर के वचनों पर निर्मित किया जाना चाहिए; इंसान तभी परमेश्वर की अपेक्षाओं को पूरा करने में सक्षम हो पाएगा। यदि मनुष्य में परमेश्वर के वचन नहीं होंगे, तो इंसान शैतान के चंगुल में फँसे भुनगे से ज़्यादा कुछ नहीं है! इसका आकलन करो : परमेश्वर के कितने वचनों ने तुम्हारे अंदर जड़ें जमाई हैं? किन चीजों में तुम परमेश्वर के वचनों के अनुसार जीवन जी रहे हो? किन चीजों में तुम उसके वचनों के अनुसार नहीं जी रहे हो? यदि परमेश्वर के वचन पूरी तरह से तुम्हारे दिल में नहीं बसे हैं, तो तुम्हारे दिल पर आखिर किस चीज ने कब्जा कर रखा है? अपने रोजमर्रा के जीवन में, क्या तुम शैतान द्वारा नियंत्रित किए जा रहे हो, या परमेश्वर के वचनों ने तुम पर अधिकार कर रखा है? क्या तुम्हारी प्रार्थनाएँ परमेश्वर के वचनों की बुनियाद पर आधारित हैं? क्या तुम परमेश्वर के वचनों के प्रबोधन से अपनी नकारात्मक अवस्था से बाहर आ गए हो? परमेश्वर के वचनों को अपने अस्तित्व की नींव की तरह लेना—यही वो है जिसमें सबको प्रवेश करना चाहिए। यदि तुम्हारे जीवन में परमेश्वर के वचन विद्यमान नहीं हैं, तो तुम अंधकार के प्रभाव में जी रहे हो, तुम परमेश्वर से विद्रोह कर रहे हो, तुम उसका विरोध कर रहे हो, और तुम परमेश्वर के नाम का अपमान कर रहे हो। इस तरह के लोगों का परमेश्वर में विश्वास पूरी तरह से तमाशा और विघ्न है! तुम अपना कितना समय परमेश्वर के वचनों के अनुसार जीते हो? तुम अपना कितना समय उसके वचनों के अनुसार नहीं जीते हो? परमेश्वर के वचन को तुमसे जो अपेक्षाएँ थीं, उनमें से कितनी तुममें पूरी हुई हैं? कितनी तुममें विफल हो गई हैं? क्या तुमने ऐसी चीज़ों को बारीकी से देखा है?
अंधकार के प्रभाव से बच निकलने के लिए, पवित्र आत्मा के कार्य और इंसान के अधिकतम संभव सहयोग, दोनों की आवश्यकता होती है। मैं क्यों कहता हूँ कि इंसान सही रास्ते पर नहीं है? जो लोग सही रास्ते पर हैं, वे सबसे पहले, अपना हृदय परमेश्वर को समर्पित कर सकते हैं। इस सबक में प्रवेश करने में लंबा समय लगता है, क्योंकि मानवजाति हमेशा से अंधकार के प्रभाव में जीती आई है, हजारों सालों से शैतान के बंधन में जी रही है। इसलिए यह प्रवेश एक या दो दिन में प्राप्त नहीं किया जा सकता। आज मैंने यह मुद्दा इसलिए उठाया है ताकि लोग अपनी दशाओं की समझ प्राप्त कर सकें; एक बार जब लोग इस बात का भेद पहचान सकेंगे कि अंधकार का प्रभाव क्या होता है और प्रकाश में रहना क्या होता है, तो प्रवेश आसान हो जाता है। क्योंकि इससे पहले कि तुम शैतान के प्रभाव से निकलो, तुम्हें पता होना चाहिए कि यह क्या होता है; तभी तुम्हारे पास धीरे-धीरे इससे मुक्त होने का मार्ग होगा। जहाँ तक यह बात है कि उसके बाद क्या करना है, यह तो इंसान का खुद का मामला है। हर चीज में एक सकारात्मक पहलू से प्रवेश करो, और कभी निष्क्रिय होकर इंतजार मत करो। मात्र यही तरीका है जिससे तुम्हें परमेश्वर द्वारा प्राप्त किया जा सकता है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, अंधकार के प्रभाव से बच निकलो और तुम परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जाओगे
497. वह सब जो परमेश्वर करता है सचमुच आवश्यक है और असाधारण महत्व रखता है, क्योंकि वह मनुष्य पर जो कुछ करता है उसका सरोकार उसके प्रबंधन और मनुष्यजाति के उद्धार से है। स्वाभाविक रूप से, परमेश्वर ने अय्यूब पर जो कार्य किया वह भी कोई भिन्न नहीं है, फिर भले ही परमेश्वर की नजरों में अय्यूब पूर्ण और खरा था। दूसरे शब्दों में, परमेश्वर चाहे जो करता हो या वह जो करता है उसे चाहे जिन उपायों से करता हो, क़ीमत चाहे जो हो, उसका ध्येय चाहे जो हो, किंतु उसके कार्यकलापों का उद्देश्य नहीं बदलता है। उसका उद्देश्य है मनुष्य में परमेश्वर के वचनों, और साथ ही मनुष्य से परमेश्वर की अपेक्षाओं और उसके प्रति परमेश्वर के इरादों को आकार देना; दूसरे शब्दों में, यह मनुष्य के भीतर उस सबको आकार देना है जिसे परमेश्वर अपने सोपानों के अनुसार सकारात्मक चीजें मानता है, जो मनुष्य को परमेश्वर का हृदय समझने और परमेश्वर के सार को समझने और बूझने में समर्थ बनाता है, और मनुष्य को परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करने में समर्थ बनाता है, इस प्रकार मनुष्य को परमेश्वर का भय मानना और बुराई से दूर रहना प्राप्त करने देता है—यह सब परमेश्वर जो करता है उसमें निहित उसके उद्देश्य का एक पहलू है। दूसरा पहलू यह है कि चूँकि शैतान परमेश्वर के कार्य में विषमता और सेवा करने वाली वस्तु है, इसलिए मनुष्य प्रायः शैतान को दिया जाता है; यह वह साधन है जिसका उपयोग परमेश्वर लोगों को शैतान के प्रलोभनों और हमलों में शैतान की दुष्टता, कुरूपता और घिनौनेपन को देखने देने के लिए करता है, इस प्रकार लोगों में शैतान के प्रति घृणा उपजाता है और उन्हें नकारात्मक चीजों को जानने और उनका भेद पहचानने में समर्थ बनाता है। यह प्रक्रिया उन्हें शैतान के नियंत्रण, आरोपों, विघ्नों और हमलों से धीरे-धीरे स्वयं को स्वतंत्र करने देती है—जब तक कि परमेश्वर के वचनों, परमेश्वर के प्रति अपने ज्ञान और समर्पण, और परमेश्वर के प्रति अपनी आस्था और परमेश्वर का भय मानने की बदौलत वे शैतान के हमलों और आरोपों पर पूरी तरह विजय नहीं पा लेते हैं; केवल तभी वे शैतान की सत्ता से पूर्णतः मुक्त कर दिए गए होंगे। लोगों की मुक्ति का अर्थ है कि शैतान की हार घोषित कर दी गई है, इसका अर्थ है कि वे अब शैतान के मुँह का भोजन नहीं हैं, कि वे अब शैतान द्वारा निगले नहीं जाएँगे, इसके बजाय शैतान ने उन्हें छोड़ दिया है। ऐसा इसलिए है क्योंकि ऐसे लोग खरे हैं, क्योंकि उनमें परमेश्वर के प्रति आस्था, समर्पण और भय है और क्योंकि उन्होंने शैतान के साथ पूरी तरह नाता तोड़ लिया है। वे शैतान को लज्जित करते हैं, वे शैतान को कायर बना देते हैं, और वे शैतान को पूरी तरह हरा देते हैं। परमेश्वर का अनुसरण करने में उनकी आस्था, और परमेश्वर के प्रति समर्पण और उसका भय शैतान को हरा देते हैं, और उन्हें पूरी तरह छोड़ देने के लिए शैतान को विवश कर देते हैं। केवल इस जैसे लोग ही परमेश्वर द्वारा सच में प्राप्त किए गए हैं, और यह मनुष्य को बचाने में परमेश्वर का चरम उद्देश्य है। जो भी परमेश्वर का अनुसरण करते हैं, यदि वे बचाए जाना चाहते हैं, और परमेश्वर द्वारा पूरी तरह प्राप्त किए जाना चाहते हैं, तो उन्हें शैतान के बड़े और छोटे दोनों प्रलोभनों और हमलों का सामना करना ही चाहिए। जो लोग इन प्रलोभनों और हमलों से उभरकर निकलते हैं और शैतान पर पूरी तरह विजय प्राप्त कर पाते हैं ये वे लोग हैं जिन्हें बचा लिया गया है। कहने का तात्पर्य यह है कि, वे लोग जिन्हें परमेश्वर द्वारा बचा लिया गया है ये वे लोग हैं जो परमेश्वर के परीक्षणों से गुजर चुके हैं, और अनगिनत बार शैतान उन्हें लुभा चुका और उन पर हमला कर चुका है। वे जिन्हें परमेश्वर द्वारा बचा लिया गया है परमेश्वर के इरादों और अपेक्षाओं को समझते हैं, और परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण कर पाते हैं, और वे शैतान के प्रलोभनों के बीच परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने के मार्ग को नहीं त्यागते हैं। वे जो परमेश्वर द्वारा बचा लिए गए हैं वे ईमानदारी से युक्त हैं, वे उदार हृदय हैं, वे प्रेम और घृणा के बीच अंतर करते हैं, उनमें न्याय की समझ है और वे तर्कसंगत हैं, और वे परमेश्वर के प्रति विचारशीलता दिखा पाते हैं और वह सब जो परमेश्वर का है सँजोकर रख पाते हैं। ऐसे लोग शैतान द्वारा बाध्य नहीं हैं, वह उनकी जासूसी और उन पर दोषारोपण नहीं करता या उन्हें बुरी तरह नुकसान नहीं पहुँचाता, वे पूरी तरह स्वतंत्र हैं, उन्हें पूरी तरह मुक्त और रिहा कर दिया गया है। अय्यूब बिल्कुल ऐसा ही स्वतंत्र मनुष्य था, और ठीक यही परमेश्वर द्वारा उसे शैतान को सौंपे जाने का महत्व है।
—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II
498. अय्यूब की आस्था, उसका समर्पण और शैतान पर विजय पाने की उसकी गवाही लोगों के लिए अत्यधिक सहायता और प्रोत्साहन का स्रोत रहे हैं। वे अय्यूब में अपने स्वयं के उद्धार की आशा देखते हैं, और देखते हैं कि परमेश्वर के प्रति आस्था, समर्पण और उसके भय के माध्यम से शैतान को हराना और शैतान के ऊपर हावी होना पूरी तरह संभव है। वे देखते हैं कि जब तक वे परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करते हैं, और जब तक सब कुछ खो देने के बाद भी परमेश्वर को न त्यागने का दृढ़संकल्प और आस्था उनमें है, तब तक वे शैतान को लज्जित और पराजित कर सकते हैं, और वे देखते हैं कि शैतान को भयभीत करने और हड़बड़ी में पीछे हटने को मजबूर करने के लिए, उन्हें केवल अपनी गवाही में अडिग रहने के निश्चय और सतत प्रयास की आवश्यकता है—भले ही इसका अर्थ अपने प्राण गँवाना हो। अय्यूब की गवाही बाद की पीढ़ियों के लिए चेतावनी है, और यह चेतावनी उन्हें बताती है कि यदि वे शैतान को नहीं हराते हैं, तो वे शैतान के दोषारोपणों और विघ्नों से कभी अपना पीछा नहीं छुड़ा पाएँगे, न ही वे कभी शैतान के हमलों और दुर्व्यवहार से बचकर निकल पाएँगे। अय्यूब की गवाही ने बाद की पीढ़ियों को भी प्रबुद्ध किया है। यह प्रबुद्धता लोगों को सिखाती है कि यदि वे पूर्ण और खरे लोग बनते हैं, केवल तभी वे परमेश्वर का भय मान पाएँगे और बुराई से दूर रह पाएँगे; यह उन्हें सिखाती है कि यदि वे परमेश्वर का भय मानते और बुराई से दूर रहते हैं, केवल तभी वे परमेश्वर के लिए ज़ोरदार और गुंजायमान गवाही दे सकते हैं; यदि वे परमेश्वर के लिए ज़ोरदार और गूँजती हुई गवाही देते हैं, केवल तभी वे शैतान द्वारा कभी नियंत्रित नहीं किए जा सकते हैं और परमेश्वर के मार्गदर्शन तथा सुरक्षा में रहते हैं—केवल तभी उन्हें सचमुच बचा लिया गया होगा। अय्यूब के चरित्र और जीवन के उसके अनुसरण की बराबरी हर उस व्यक्ति को करनी चाहिए जो उद्धार का अनुसरण करता है। अपने संपूर्ण जीवन के दौरान उसने जो जिया और अपने परीक्षणों के दौरान उसकी अभिव्यक्तियाँ उन सब लोगों के लिए अनमोल ख़ज़ाने हैं जो परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने के मार्ग का अनुसरण करते हैं।
—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II
499. जब लोग अभी बचाए नहीं गए होते हैं तो उनका जीवन अक्सर शैतान के द्वारा बाधित किया जाता है और नियंत्रित तक किया जाता है। दूसरे शब्दों में, वे लोग जिन्हें बचाया नहीं गया है शैतान के कैदी होते हैं, उन्हें कोई स्वतंत्रता नहीं होती, वे अब भी शैतान की पकड़ में हैं, वे परमेश्वर की आराधना करने के योग्य नहीं हैं और न ही उनके पास इसका कोई अधिकार है, शैतान द्वारा उनका अनवरत पीछा किया जाता है और उन पर क्रूरतापूर्वक आक्रमण किया जाता है। ऐसे लोगों के पास कहने को भी कोई खुशी नहीं होती है, उनके पास कहने को भी सामान्य अस्तित्व का अधिकार नहीं होता, और तो और, उनके पास कहने को भी कोई गरिमा नहीं होती है। यदि तुम डटकर खड़े हो जाते हो और शैतान के साथ संग्राम करते हो, शैतान के साथ जीवन और मरण की लड़ाई लड़ने के लिए तुम परमेश्वर में अपनी आस्था, समर्पण और परमेश्वर के प्रति भय का उपयोग हथियारों की तरह करते हो, ऐसे कि तुम शैतान को पूरी तरह परास्त कर देते हो और उसे तुम्हें देखते ही दुम दबाने और भीतकातर बन जाने को मजबूर कर देते हो, केवल तभी वह तुम्हारे विरुद्ध अपने आक्रमणों और आरोपों को पूरी तरह छोड़ देगा, और उस मुकाम पर, तुम बचाए जाओगे और स्वतंत्र हो जाओगे। यदि तुमने शैतान के साथ पूरी तरह नाता तोड़ने का बस ठाना है, किंतु यदि तुम शैतान को पराजित करने वाले प्रभावकारी शस्त्रास्त्रों से सुसज्जित नहीं हो, तो तुम अब भी बहुत बड़े खतरे में हो। समय बीतने के साथ, जब शैतान तुम्हें इतनी यातना दे देता है कि तुममें रत्ती भर भी शक्ति नहीं बची होती है, अगर तब भी तुम गवाही देने में असमर्थ हो, तुमने अब भी स्वयं को शैतान के आरोपों और हमलों से पूरी तरह मुक्त नहीं किया है, तो तुम्हारे उद्धार की कम ही आशा होगी। अंत में, अर्थात् जब परमेश्वर के कार्य के समापन की घोषणा की जाती है, तब भी अगर तुम शैतान के शिकंजे में हो, अपने आपको मुक्त करने में असमर्थ हो, तो तुम्हारे पास कभी कोई अवसर या आशा नहीं होगी। तो निहितार्थ यह है कि ऐसे लोग पूरी तरह शैतान की कैद में होंगे।
—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II
500. मनुष्य के चिरकालिक भरण-पोषण और सहारे के अपने कार्य के दौरान, परमेश्वर अपने इरादे और अपनी अपेक्षाएँ मनुष्य को संपूर्णता में बताता है, और मनुष्य को अपने कर्म, स्वभाव, और जो उसके पास है और जो वह स्वयं है, उसे दिखाता है। उद्देश्य है मनुष्य को आध्यात्मिक कद से सुसज्जित करना और उसे परमेश्वर का अनुसरण करते हुए विभिन्न सत्य प्राप्त करने में सक्षम बनाना—सत्य जो मनुष्य को परमेश्वर द्वारा शैतान से लड़ने के लिए दिए गए शक्तिशाली हथियार हैं। इस प्रकार सुसज्जित होकर मनुष्य को परमेश्वर की परीक्षाओं का सामना करना ही चाहिए। परमेश्वर के पास मनुष्य की परीक्षा लेने के लिए बहुत-से साधन और मार्ग हैं, किंतु उनमें से प्रत्येक को परमेश्वर के शत्रु—शैतान—के “सहयोग” की आवश्यकता होती है। कहने का तात्पर्य यह है, शैतान से युद्ध करने के लिए मनुष्य को शक्तिशाली शस्त्र देने के बाद परमेश्वर मनुष्य को शैतान को सौंप देता है और शैतान को मनुष्य के आध्यात्मिक कद की “परीक्षा” लेने देता है। यदि मनुष्य शैतान की व्यूह रचनाओं को तोड़कर बाहर निकल सकता है, यदि वह शैतान की घेराबंदी से बचकर निकल सकता है और अभी भी जीवित रह सकता है, तो मनुष्य ने परीक्षा उत्तीर्ण कर ली होगी। परंतु यदि मनुष्य शैतान की व्यूह रचनाओं से छूटने में विफल हो जाता है और शैतान के अधीन हो जाता है, तो उसने परीक्षा उत्तीर्ण नहीं की होगी। परमेश्वर मनुष्य के जिस किसी भी पहलू को परखता है, उसकी परीक्षाओं की कसौटी यही होती है कि क्या शैतान द्वारा आक्रमण किए जाने पर मनुष्य अपनी गवाही में अडिग रहता है या नहीं, और क्या शैतान द्वारा जाल में फँसाए जाने पर वह परमेश्वर को त्याग देता है या नहीं और शैतान के आगे हार मानकर आत्मसमर्पण करता है या नहीं। कहा जा सकता है कि मनुष्य को बचाया जा सकता है या नहीं यह इस पर निर्भर करता है कि क्या वह शैतान पर विजय प्राप्त कर सकता है और उसे हरा सकता है, और वह स्वतंत्रता प्राप्त कर सकता है या नहीं यह इस पर निर्भर करता है कि क्या वह शैतान के बंधन पर विजय पाने के लिए परमेश्वर द्वारा दिए गए शस्त्र अपने दम पर उठा सकता है, शैतान को पूरी तरह आस तजने और उसे छोड़ देने के लिए विवश कर पाता है या नहीं। यदि शैतान आशा छोड़ देता है और किसी को छोड़ देता है, तो इसका अर्थ है कि शैतान फिर कभी इस व्यक्ति को परमेश्वर से लेने की कोशिश नहीं करेगा, फिर कभी इस व्यक्ति पर दोषारोपण नहीं करेगा और व्यवधान नहीं डालेगा, फिर कभी उसे निर्दयतापूर्वक यातना नहीं देगा या उस पर आक्रमण नहीं करेगा; केवल इस जैसे किसी व्यक्ति को ही परमेश्वर द्वारा सचमुच प्राप्त किया गया होगा। यही वह संपूर्ण प्रक्रिया है जिसके द्वारा परमेश्वर किसी व्यक्ति को प्राप्त करता है।
—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II
501. आज तुम पूर्ण बनाए जाने का प्रयास कर सकते हो या अपनी बाहरी मानवता में बदलावों और अपनी काबिलियत में सुधारों का अनुसरण कर सकते हो, परंतु प्रमुख महत्व की बात यह है कि तुम यह समझ सको कि जो कुछ आज परमेश्वर कर रहा है, वह सार्थक और लाभकारी है : यह गंदगी की भूमि में पैदा हुए तुम्हें खुद को गंदगी से छुटकारा दिलाने और उसे झाड़कर फेंकने में सक्षम बनाता है, यह तुम्हें शैतान के प्रभाव पर विजय पाने और शैतान के अंधकारमय प्रभाव से मुक्त होने में सक्षम बनाता है और तुम्हारा ध्यान इन चीजों पर केंद्रित करवाकर यह तुम्हें इस गंदगी की भूमि में सुरक्षा प्रदान करता है। अंततः तुमसे कौन-सी गवाही देने के लिए कहा जाएगा? इसका उद्देश्य यह है कि तुम, जो गंदगी की भूमि में पैदा हुए हो, पवित्रीकृत हो सको ताकि फिर कभी गंदगी से मैले न हो और तुम, जो शैतान की शक्ति के अधीन रहते हो, शैतान के प्रभाव से मुक्त हो सको ताकि न तो शैतान तुम्हें अपने कब्जे में कर सके और न ही तुम्हें परेशान कर सके; इस प्रकार तुम सर्वशक्तिमान के हाथों में रहो। यही गवाही और शैतान से युद्ध में विजय का साक्ष्य है। तुम शैतान से विद्रोह करने में सक्षम हो, अपने जीवन में अब और शैतानी स्वभाव प्रकट नहीं करते, इसके बजाय उस स्थिति को जीते हो, जिसे परमेश्वर ने मनुष्य के सृजन के समय चाहा था कि मनुष्य प्राप्त करे : सामान्य मानवता, सामान्य समझ, सामान्य अंतर्दृष्टि, परमेश्वर से प्रेम करने का सामान्य संकल्प और परमेश्वर के प्रति निष्ठा। एक सृजित प्राणी को ऐसी ही गवाही देनी चाहिए। तुम कहते हो, “हम गंदगी की भूमि पर पैदा हुए थे, परंतु परमेश्वर की सुरक्षा के कारण, उसकी अगुआई के कारण, और क्योंकि उसने हम पर विजय प्राप्त की है इसलिए, हम शैतान के प्रभाव से मुक्त हो गए हैं। हम आज समर्पण कर पाते हैं, तो यह भी इस बात का प्रभाव है कि परमेश्वर ने हम पर विजय पाई है, और यह इसलिए नहीं है कि हम अच्छे हैं, या हम स्वभावतः परमेश्वर से प्रेम करते थे। चूँकि परमेश्वर ने हमें चुना और हमें पूर्वनिर्धारित किया, इसीलिए आज हम पर विजय पाई गई है, और इसीलिए हम उसके लिए गवाही देने में समर्थ हुए हैं और उसकी सेवा कर सकते हैं; ठीक वैसे ही, चूँकि उसने हमें चुना और हमारी रक्षा की, इसीलिए हमें उद्धार प्राप्त हुआ है और हमें शैतान की सत्ता से बचाया गया है और हमने गंदगी से छुटकारा प्राप्त कर लिया है और हम बड़े लाल अजगर के देश में शुद्ध किए गए हैं।”
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, विजय के कार्य की वास्तविक कहानी (2)
502. आज, तुम मेरी बातों पर विश्वास नहीं करते, और उन पर ध्यान नहीं देते; जब वह दिन आएगा जब यह कार्य फैल जाएगा और तुम इसकी संपूर्णता देखोगे, तब तुम्हें अफसोस होगा, और उस समय तुम भौंचक्के रह जाओगे। आशीषें हैं, फिर भी तुम्हें उनका आनंद लेना नहीं आता, सत्य है, फिर भी तुम उसका अनुसरण नहीं करते। क्या तुम अपने-आप पर मुसीबत नहीं लाते? आज, यद्यपि परमेश्वर के कार्य का अगला चरण अभी शुरू होना बाकी है, फिर भी तुमसे जो कुछ अपेक्षित है और तुम्हें जिन्हें जीने के लिए कहा जाता है, उनमें कुछ भी अतिरिक्त नहीं है। इतना सारा कार्य है, इतने सारे सत्य हैं; क्या वे इस योग्य नहीं हैं कि तुम उन्हें जानो? क्या ताड़ना और न्याय तुम्हारी आत्मा को जागृत करने में असमर्थ हैं? क्या ताड़ना और न्याय तुममें खुद के प्रति नफरत पैदा करने में असमर्थ हैं? क्या तुम शैतान के प्रभाव में जीकर, और शांति, आनंद और थोड़े-बहुत दैहिक सुख के साथ जीवन बिताकर संतुष्ट हो? क्या तुम सभी लोगों में सबसे अधिक निम्न नहीं हो? उनसे ज्यादा मूर्ख और कोई नहीं है जो उद्धार को देख चुके हैं लेकिन इसे प्राप्त करने का प्रयास नहीं करते हैं; वे ऐसे लोग हैं जो देह-सुख में लिप्त होते हैं और शैतान का आनंद लेते हैं। तुम यह आशा करते हो कि परमेश्वर में तुम्हारी आस्था के मार्ग में कोई भी मुश्किल या क्लेश या लेशमात्र भी पीड़ा नहीं होगी। तुम हमेशा निरर्थक चीजों के पीछे भागते हो और तुम जीवन को कोई अहमियत नहीं देते, बल्कि तुम अपने बेतुके विचारों को सत्य से ज्यादा महत्व देते हो। तुम कितने निकम्मे हो! तुम सूअर की तरह जीते हो—तुममें और सूअर और कुत्ते में क्या अंतर है? जो लोग सत्य का अनुसरण नहीं करते, बल्कि देह से प्यार करते हैं, क्या वे सब जानवर नहीं हैं? क्या वे मरे हुए लोग जिनमें आत्मा नहीं है, चलती-फिरती लाशें नहीं हैं? तुम लोगों के बीच कितने सारे वचन कहे गए हैं? क्या तुम लोगों के बीच केवल थोड़ा-सा ही कार्य किया गया है? मैंने तुम लोगों के बीच कितनी आपूर्ति की है? तो फिर तुमने इसे प्राप्त क्यों नहीं किया? तुम्हें किस बारे में शिकायत करनी है? क्या ऐसा नहीं है कि तुमने इसलिए कुछ भी प्राप्त नहीं किया है क्योंकि तुम देह से बहुत अधिक प्रेम करते हो? और क्या इसकी वजह यह नहीं है कि तुम्हारे विचार बहुत ज्यादा असंयमित हैं? क्या इसकी वजह यह नहीं है कि तुम बहुत ज्यादा मूर्ख हो? यदि तुम इन आशीषों को प्राप्त करने में विफल होते हो, तो क्या तुम परमेश्वर को दोष दोगे कि उसने तुम्हें नहीं बचाया?
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, पतरस के अनुभव : ताड़ना और न्याय का उसका ज्ञान
503. परमेश्वर इतने विशाल पैमाने पर कार्य इसलिए करता है और लोगों के इस समूह को पूरी तरह इसलिए बचाता है ताकि तुम शैतान के प्रभाव से बच सको, पवित्र देश में रह सको, परमेश्वर की ज्योति में रह सको, और ज्योति की अगुआई और मार्गदर्शन पा सको। तब तुम्हारे जीवन का अर्थ है। तुम लोग जो खाते और पहनते हो, वह अविश्वासियों से भिन्न है; तुम लोग परमेश्वर के वचनों का आनंद लेते हो और सार्थक जीवन जीते हो—और वे किसका आनंद लेते हैं? वे बस अपने “पूर्वजों की विरासत” और अपनी “राष्ट्रीय भावना” का आनंद लेते हैं। उनमें लेश मात्र भी मानवता नहीं है! तुम लोगों के कपड़े और साज-शृंगार, शब्द और कार्य सब उनसे भिन्न हैं। तुम लोग अंततः गंदगी से पूरी तरह बच जाओगे, शैतान के प्रलोभन के फंदे में अब और नहीं फँसोगे, और प्रतिदिन परमेश्वर का पोषण प्राप्त करोगे। तुम लोगों को सदैव चौकन्ना रहना चाहिए। यद्यपि तुम गंदी जगह में रहते हो, किंतु तुम गंदगी से बेदाग़ हो और परमेश्वर के साथ रह सकते हो, उसकी उत्कृष्ट सुरक्षा प्राप्त कर सकते हो। परमेश्वर ने इस पीले देश के समस्त लोगों में से तुम लोगों को चुना है। क्या तुम सबसे धन्य लोग नहीं हो? तुम सृजित प्राणी हो—तुम्हें निस्संदेह परमेश्वर की आराधना और सार्थक जीवन का अनुसरण करना चाहिए। यदि तुम परमेश्वर की आराधना नहीं करते हो बल्कि अपनी अशुद्ध देह के भीतर रहते हो, तो क्या तुम बस मानव भेष में जानवर नहीं हो? चूँकि तुम मानव प्राणी हो, इसलिए तुम्हें स्वयं को परमेश्वर के लिए खपाना और सारे कष्ट सहने चाहिए! आज तुम्हें जो थोड़ा-सा कष्ट दिया जाता है, वह तुम्हें प्रसन्नतापूर्वक और दृढ़तापूर्वक स्वीकार करना चाहिए और अय्यूब तथा पतरस के समान सार्थक जीवन जीना चाहिए। इस संसार में, मनुष्य दानव द्वारा दिए गए कपड़े पहनता है, दानव का दिया भोजन खाता है, दानव के नियंत्रण में कार्य और सेवा करता है और गंदगी में पूरी तरह ढँक जाने तक उसके पैरों तले रौंदा जाता है। उसने जीवन का अर्थ नहीं समझा है, न सच्चा मार्ग प्राप्त किया है—इस तरह जीने का क्या महत्व है? तुम वे लोग हो जो सही मार्ग का अनुसरण करते हो और सुधार की खोज करते हो। तुम लोग बड़े लाल अजगर के देश में उठ खड़े होते हो और उनमें हो जिन्हें परमेश्वर धार्मिक कहता है। क्या यह सबसे सार्थक जीवन नहीं है?
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, अभ्यास (2)