10.14. परमेश्वर द्वारा स्वभाव-संबंधी परिवर्तन और पूर्णता का अनुसरण कैसे करें पर
504. मनुष्य के स्वभाव का परिवर्तन परमेश्वर के कई विभिन्न प्रकार के कार्यों के ज़रिए प्राप्त किया जाता है; अपने स्वभाव में ऐसे बदलावों के बिना, मनुष्य परमेश्वर की गवाही देने और उसके इरादों के अनुरूप बनने लायक नहीं हो पाएगा। मनुष्य के स्वभाव में परिवर्तन दर्शाता है कि मनुष्य को शैतान के बंधन और अंधकार के प्रभाव से मुक्त करा दिया गया है और वह वास्तव में परमेश्वर के कार्य का एक आदर्श, एक नमूना, परमेश्वर का गवाह और ऐसा व्यक्ति बन गया है, जो परमेश्वर के इरादों के अनुरूप है। आज देहधारी परमेश्वर अपना कार्य करने के लिए पृथ्वी पर आया है और वह अपेक्षा रखता है कि मनुष्य उसके बारे में ज्ञान प्राप्त करे, उसके प्रति समर्पित हो, और उसकी गवाही दे—मनुष्य को परमेश्वर के व्यावहारिक और सामान्य कार्य को जानना है, उसे उसके उन सभी वचनों और कार्य के प्रति समर्पण करना है, जो मनुष्य की धारणाओं के अनुरूप नहीं हैं और उसे उस समस्त कार्य की गवाही देनी है, जो वह मनुष्य को बचाने के लिए करता है और मनुष्य को जीतने के उसके सभी कर्मों की भी गवाही देनी है। जो परमेश्वर की गवाही देते हैं, उन्हें परमेश्वर का ज्ञान अवश्य होना चाहिए; केवल इस तरह की गवाही ही सटीक और व्यावहारिक होती है और केवल इस तरह की गवाही ही शैतान को शर्मिंदा कर सकती है। परमेश्वर अपनी गवाही के लिए उन लोगों का उपयोग करता है, जिन्होंने उसके न्याय, उसकी ताड़ना, और काट-छाँट से गुज़रकर उसे जान लिया है। वह अपनी गवाही के लिए उन लोगों का उपयोग करता है, जिन्हें शैतान द्वारा भ्रष्ट कर दिया गया है। वह अपनी गवाही देने के लिए उनका उपयोग करता है जिनका स्वभाव बदल गया है और जिन्होंने इस प्रकार उसके आशीर्वाद प्राप्त कर लिए हैं। उसे मनुष्य के मुँह से की जाने वाली स्तुति की आवश्यकता नहीं है, न ही उसे शैतान की किस्म के उन लोगों की स्तुति और गवाही की आवश्यकता है, जिन्हें उसने नहीं बचाया है। केवल वो जो परमेश्वर को जानते हैं, उसकी गवाही देने योग्य हैं और केवल वो जिनके स्वभाव को रूपांतरित कर दिया गया है, उसकी गवाही देने योग्य हैं। परमेश्वर मनुष्य को जानबूझकर अपने नाम को शर्मिंदा नहीं करने देगा।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, केवल परमेश्वर को जानने वाले ही परमेश्वर के लिए गवाही दे सकते हैं
505. लोगों के स्वभाव स्वयं लोगों के द्वारा नहीं बदले जा सकते; उन्हें परमेश्वर के वचनों के न्याय, ताड़ना, परीक्षण और शोधन से गुजरना होगा या उसके वचनों द्वारा काट-छाँट का सामना करना और अनुशासित होना होगा। इन सब के बाद ही वे परमेश्वर के प्रति समर्पण और वफादारी प्राप्त कर सकते हैं और उसके प्रति बेपरवाह होना बंद कर सकते हैं। परमेश्वर के वचनों के शोधन के द्वारा ही मनुष्य के स्वभाव में परिवर्तन आ सकता है। केवल परमेश्वर के वचनों के प्रकाशन, उनके न्याय, अनुशासन और काट-छाँट से ही वे जल्दबाजी में काम करने की हिम्मत नहीं करेंगे, बल्कि शांत और संयमित बनेंगे। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वे परमेश्वर के मौजूदा वचनों और उसके कार्य के प्रति समर्पण करने में सक्षम हो पाएँगे। भले ही यह मनुष्य की धारणाओं के अनुरूप न हो, वे इन धारणाओं को जाने देने और दिल से समर्पण करने में सक्षम होंगे। पहले स्वभाव में बदलाव की बात मुख्यतः स्वयं के खिलाफ विद्रोह करने, अपने शरीर को कष्ट सहने, अपने शरीर को अनुशासित करने, और अपने आपको शारीरिक प्राथमिकताओं से दूर करने देने के बारे में होती थी—जो एक तरह का स्वभाव परिवर्तन है। आज, सभी जानते हैं कि स्वभाव में बदलाव की वास्तविक अभिव्यक्ति परमेश्वर के मौजूदा वचनों के प्रति समर्पण करने में है, और साथ ही साथ उसके नए कार्य को सच में समझने में है। इस प्रकार, परमेश्वर के बारे में लोगों का पहले का धारणात्मक ज्ञान मिटाया जा सकता है और वे परमेश्वर का सच्चा ज्ञान और समर्पण प्राप्त कर सकते हैं—केवल यही है स्वभाव में बदलाव की वास्तविक अभिव्यक्ति।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, जिनके स्वभाव परिवर्तित हो चुके हैं, वे वही लोग हैं जो परमेश्वर के वचनों की वास्तविकता में प्रवेश कर चुके हैं
506. मनुष्य के स्वभाव में बदलाव उसके अपने सार के ज्ञान से और अपनी सोच, प्रकृति और मानसिक दृष्टिकोण में बदलाव के माध्यम से—मूलभूत परिवर्तनों से शुरू होना चाहिए। केवल इसी ढंग से मनुष्य के स्वभाव में सच्चे बदलाव प्राप्त किए जा सकेंगे। मनुष्य में उत्पन्न होने वाले भ्रष्ट स्वभावों का मूल कारण शैतान का गुमराह करना, भ्रष्ट करना और जहर देना है। मनुष्य को शैतान द्वारा बाँधा और नियंत्रित किया गया है, और उसकी सोच, नैतिकता, अंतर्दृष्टि और विवेक शैतान द्वारा सब बुरी तरह नष्ट किए जा चुके हैं। शैतान ने इंसान की मूलभूत चीजों को भ्रष्ट कर दिया है, और वे बिल्कुल भी वैसी नहीं हैं जैसा परमेश्वर ने मूल रूप से उन्हें बनाया था, ठीक इसी वजह से मनुष्य परमेश्वर का विरोध करता है और सत्य को नहीं स्वीकार पाता। इसलिए मनुष्य के स्वभाव में बदलाव लाने के लिए सबसे पहले जो किया जाना चाहिए वह है उसकी सोच, अंतर्दृष्टि और विवेक के संदर्भ में परमेश्वर के बारे में और सत्य के बारे में उसके ज्ञान में बदलाव लाना।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, स्वभाव में बदलाव के बिना होना परमेश्वर के साथ शत्रुता रखना है
507. अगर मनुष्य अपने जीवन में शुद्ध किया जाना और अपने स्वभाव में बदलाव लाना चाहता है, यदि वह एक सार्थक जीवन जीना चाहता है और एक सृजित प्राणी के रूप में अपना कर्तव्य निभाना चाहता है तो उसे परमेश्वर की ताड़ना और न्याय को स्वीकार करना चाहिए, उसे परमेश्वर के अनुशासन और प्रहार को अपने से दूर नहीं होने देना चाहिए, ताकि वह खुद को शैतान की चालाकी और प्रभाव से मुक्त कर सके और परमेश्वर के प्रकाश में जी सके। यह जान लो कि परमेश्वर की ताड़ना और न्याय प्रकाश है, मनुष्य के उद्धार का प्रकाश है और मनुष्य के लिए इससे बेहतर कोई आशीष नहीं है, इससे और बड़ा अनुग्रह या बेहतर सुरक्षा नहीं है। मनुष्य शैतान के प्रभाव में जीता है और देह में अस्तित्वमान रहता है; यदि उसे शुद्ध न किया जाए और उसे परमेश्वर की सुरक्षा प्राप्त न हो, तो वह और भी ज्यादा भ्रष्ट हो जाएगा। यदि वह परमेश्वर से प्रेम करना चाहता है, तो उसे शुद्ध होना और उद्धार पाना होगा। पतरस ने प्रार्थना की, “परमेश्वर, जब तू मुझ पर दया दिखाता है तो मैं प्रसन्न हो जाता हूँ, और मुझे सुकून मिलता है; जब तू मुझे ताड़ना देता है, तब मुझे और भी ज्यादा सुकून और आनंद मिलता है। यद्यपि मैं कमजोर हूँ और मैंने अकथनीय कष्ट सहे हैं, यद्यपि मेरी आँखों में आँसू और मन में दुख है, लेकिन तू जानता है कि यह दुख मेरे विद्रोहीपन और मेरी कमजोरी के कारण है। मैं रोता हूँ क्योंकि मैं तेरा इरादा पूरा नहीं कर सकता हूँ, मैं दुख और पछतावा इसलिए महसूस करता हूँ क्योंकि मैं तेरी अपेक्षाओं के लिए अपर्याप्त हूँ, लेकिन मैं इस स्तर तक पहुँचने का इच्छुक हूँ, मैं तुझे संतुष्ट करने के लिए सब कुछ करने का इच्छुक हूँ। तेरी ताड़ना ने मेरी सुरक्षा का काम किया है, और मेरे लिए श्रेष्ठतम उद्धार का काम किया है; तेरा न्याय तेरी सहनशीलता और धीरज से बढ़कर है। तेरी ताड़ना और न्याय के बगैर, मैं तेरी दया और करुणा का आनंद नहीं ले पाऊँगा। आज, मैं और भी अधिक देख रहा हूँ कि तेरा प्रेम स्वर्ग से भी ऊँचा उठकर अन्य सभी चीजों पर छा गया है। तेरा प्रेम मात्र दया और करुणा नहीं है; बल्कि उससे भी बढ़कर, यह ताड़ना और न्याय है। तेरी ताड़ना और न्याय से मैंने इतना अधिक हासिल किया है। तेरी ताड़ना और न्याय के बगैर एक भी व्यक्ति शुद्ध नहीं होगा और एक भी व्यक्ति सृष्टिकर्ता के प्रेम को अनुभव नहीं कर पाएगा।”
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, पतरस के अनुभव : ताड़ना और न्याय का उसका ज्ञान
508. यदि तू पूर्ण बनाया जाना चाहता है, तो पहले तुझे परमेश्वर की नजरों का कृपापात्र बनना चाहिए, क्योंकि वह उन्हें पूर्ण बनाता है जिन पर वह कृपादृष्टि डालता है और जो उसके इरादों के अनुरूप होते हैं। यदि तू परमेश्वर के इरादों के अनुरूप होना चाहता है, तो तेरे पास ऐसा हृदय अवश्य होना चाहिए जो उसके कार्य के प्रति समर्पण करता हो, तुझे सत्य का अनुसरण करने के लिए भरसक प्रयास अवश्य करना चाहिए, और तुझे सभी बातों में परमेश्वर की जाँच-पड़ताल को अवश्य स्वीकार करना चाहिए। तू जो कुछ भी करता है, क्या वह परमेश्वर की जाँच-पड़ताल से गुजरता है? क्या तेरा इरादा सही है? यदि तेरा इरादा सही है तो परमेश्वर तेरा अनुमोदन करेगा; यदि तेरा इरादा गलत है, तो यह दिखाता है कि तेरा दिल जिससे प्रेम करता है वह परमेश्वर नहीं है, बल्कि देह और शैतान है। इसलिए तुझे सभी मामलों में परमेश्वर की जाँच-पड़ताल स्वीकार करने के लिए प्रार्थना को एक माध्यम के रूप में इस्तेमाल करना चाहिए। जब तू प्रार्थना करता है, तब भले ही मैं व्यक्तिगत रूप से तेरे सामने खड़ा नहीं होता हूँ, लेकिन पवित्र आत्मा तेरे साथ होता है और तू जिससे प्रार्थना करता है वह मैं और परमेश्वर का आत्मा दोनों ही हैं। तू इस देह में विश्वास क्यों करता है? तू इसलिए विश्वास करता है क्योंकि उसमें परमेश्वर का आत्मा है। यदि यह व्यक्ति परमेश्वर के आत्मा के बिना होता तो क्या तू उसमें विश्वास करता? जब तू इस व्यक्ति पर विश्वास करता है, तो तू परमेश्वर के आत्मा पर विश्वास कर रहा होता है। तुम्हारा इस व्यक्ति का भय मानना परमेश्वर के आत्मा का भय मानना है। परमेश्वर के आत्मा पर आस्था इस व्यक्ति पर आस्था है, और इस व्यक्ति पर आस्था परमेश्वर के आत्मा पर भी आस्था है। जब तू प्रार्थना करता है, तो तू महसूस करता है कि परमेश्वर का आत्मा तेरे साथ है और परमेश्वर तेरे सामने है; इसलिए तू उसके आत्मा से प्रार्थना करता है। आज, अधिकांश लोग अपने कृत्यों को परमेश्वर के सम्मुख लाने से डरते हैं; तू परमेश्वर की देह को तो धोखा दे सकता है, परन्तु उसके आत्मा को धोखा नहीं दे सकता है। जो भी मामला परमेश्वर की जाँच-पड़ताल का सामना नहीं कर सकता है वह सत्य के अनुरूप नहीं है और उसे दरकिनार कर देना चाहिए; ऐसा न करना परमेश्वर को नाराज करना है। इसलिए तू चाहे अपने भाई-बहनों के साथ प्रार्थना, बातचीत और संगति कर रहा है या अपना कर्तव्य निभा रहा है और चीजों को कर रहा है, तुझे अपना हृदय परमेश्वर के सम्मुख खोलकर अवश्य रख देना चाहिए। जब तू अपना कार्य पूरा करता है, तो परमेश्वर तेरे साथ होता है, और जब तक तेरा इरादा सही है और परमेश्वर के घर के कार्य के लिए है, तब तक जो कुछ भी तू करेगा, परमेश्वर उसे स्वीकार करेगा; तुझे अपने कार्य को दिल से पूरा करना चाहिए। जब तू प्रार्थना करता है तो तेरे पास परमेश्वर-प्रेमी हृदय होना चाहिए और तुझे परमेश्वर की देखरेख, सुरक्षा और जाँच-पड़ताल खोजनी चाहिए। अगर तेरे ये इरादे हैं, तो तेरी प्रार्थनाएँ फलेंगी। उदाहरण के लिए, जब तू सभाओं में प्रार्थना करता है, यदि तू अपना हृदय खोलता है और परमेश्वर से प्रार्थना करता है और झूठ बोले बिना परमेश्वर को बताता है कि तेरे हृदय में क्या है, तब तेरी प्रार्थनाएँ निश्चित रूप से प्रभावी होंगी। यदि तेरे पास एक सच्चा परमेश्वर-प्रेमी दिल है, तो परमेश्वर से प्रतिज्ञा कर : “परमेश्वर, जो कि स्वर्ग में और पृथ्वी पर और सब वस्तुओं में है, मैं तुझसे प्रतिज्ञा करता हूँ : तेरा आत्मा, जो कुछ मैं करता हूँ, उसकी पड़ताल करे और हर समय मेरी सुरक्षा और देखरेख करे, ताकि जो कुछ भी मैं करूँ वह तुम्हारी उपस्थिति में अडिग रह सके। यदि मेरा हृदय तुझसे प्रेम न करे या यह कभी भी तुझसे विश्वासघात करे, तो तू मुझे कठोरता से ताड़ना और श्राप दे। मुझे न तो इस जीवन में और न आने वाले संसार में क्षमा करना!” क्या तू ऐसी शपथ खाने की हिम्मत करता है? यदि तू नहीं करता है, तो यह दर्शाता है कि तू कायर है, और तू अभी भी खुद से ही प्रेम करता है। क्या तुम लोगों के पास यह संकल्प है? यदि वास्तव में यही तेरा संकल्प है, तो तुझे यह प्रतिज्ञा लेनी चाहिए। यदि तेरे पास संकल्प है और तू ऐसी प्रतिज्ञा लेता है, तो परमेश्वर तेरे संकल्प को पूरा करेगा। जब तू परमेश्वर से प्रतिज्ञा करता है, तो वह सुनता है। परमेश्वर तेरी प्रार्थना और तेरे अभ्यास के आधार पर यह निर्धारित करता है कि तू पापी है या धार्मिक। अभी तुम लोग पूर्ण बनाए जाने की प्रक्रिया में हो और यदि तुझे पूर्ण बनाए जाने में वाकई आस्था है, तो तू जो कुछ भी करता है, वह सब परमेश्वर के सम्मुख लाएगा और उसकी जाँच-पड़ताल को स्वीकार करेगा। यदि तू कुछ ऐसा करता है जो उग्र रूप से विद्रोहपूर्ण है या यदि तू परमेश्वर के साथ विश्वासघात करता है, तो परमेश्वर तेरी प्रतिज्ञा को साकार करेगा; उस समय तू चाहे विनाश का सामना करता है या ताड़ना का, यह तेरी अपनी करनी होगी। तूने प्रतिज्ञा ली थी, इसलिए तुझे ही इसका पालन करना चाहिए। यदि तूने कोई प्रतिज्ञा की, लेकिन उसका पालन नहीं किया, तो तुझे विनाश भुगतना होगा। चूँकि प्रतिज्ञा तेरी थी, परमेश्वर तेरी प्रतिज्ञा को साकार करेगा। कुछ लोग प्रार्थना के बाद डरते हैं और कहते हैं, “सब खत्म हो गया! मेरे असंयमी होने का मौका चला गया; बुरी चीजें करने का मेरा मौका चला गया; सांसारिक लालचों में लिप्त होने का मेरा मौका चला गया!” ऐसे लोग अभी भी संसार और पाप को प्यार करते हैं, और उन्हें निश्चित ही विनाश भुगतना पड़ेगा।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर उन्हें पूर्ण बनाता है, जो उसके इरादों के अनुरूप हैं
509. परमेश्वर द्वारा लोगों को पूर्ण बनाए जाने का एक नियम है, जो यह है कि वह तुम्हारे किसी वांछनीय भाग का प्रयोग करके तुम्हें प्रबुद्ध करता है, जिससे तुम्हारे पास अभ्यास करने का एक मार्ग हो और तुम समस्त नकारात्मक अवस्थाओं से खुद को अलग कर सको, तुम्हारी आत्मा को मुक्ति पाने में मदद करता है और तुम्हें उससे अधिक प्रेम कर पाने में सक्षम बनाता है। इस तरह से तुम भ्रष्ट शैतानी स्वभावों को उतार फेंकने में सक्षम हो जाते हो। अगर तुम सरल और कुछ न छिपाने वाले हो, और स्वयं को जानने और सत्य का अभ्यास करने के इच्छुक हो, तो परमेश्वर स्वाभाविक रूप से तुम्हें आशीष देगा, और जब तुम दुर्बल और नकारात्मक होते हो, तो वह तुम्हें दोगुना प्रबुद्ध करेगा, स्वयं को और अधिक जानने में तुम्हारी सहायता करेगा, अपने दिल में पश्चात्ताप महसूस करने के लिए और अधिक इच्छुक होने और उन चीज़ों का अभ्यास करने में मदद करेगा, जिनका तुम्हें अभ्यास करना चाहिए। केवल इसी तरह से तुम्हारा हृदय शांत और सहज हो सकता है। जो व्यक्ति साधारणतः परमेश्वर को जानने पर ध्यान देता है, स्वयं को जानने पर ध्यान देता है, अपने अभ्यास पर ध्यान देता है, वह निरंतर परमेश्वर का कार्य, और साथ ही परमेश्वर का मार्गदर्शन और प्रबुद्धता प्राप्त करने में भी समर्थ होगा। एक नकारात्मक अवस्था में होने पर भी ऐसा व्यक्ति चीज़ों को फौरन उलट देने में सक्षम हो जाता है, चाहे वह ऐसा अंतःकरण की कार्रवाई के कारण करे या परमेश्वर के वचनों से प्राप्त प्रबुद्धता के कारण। व्यक्ति के स्वभाव में परिवर्तन हमेशा तभी प्राप्त होता है, जब वह अपनी वास्तविक अवस्था और परमेश्वर के स्वभाव और कार्य को जानता है। जो व्यक्ति स्वयं को जानने और खोलने का इच्छुक होता है, वही सत्य का अभ्यास करने में सक्षम होगा। इस प्रकार का व्यक्ति परमेश्वर के प्रति निष्ठावान होता है। एक व्यक्ति जो परमेश्वर के प्रति निष्ठावान होता है, उसमें परमेश्वर के बारे में समझ होती है, भले ही वह समझ गहरी हो या उथली, अल्प हो या प्रचुर। यह परमेश्वर की धार्मिकता है, और इसे ही लोग प्राप्त करते हैं; यह उनका अपना लाभ है। जिस व्यक्ति के पास परमेश्वर का ज्ञान है, वह ऐसा व्यक्ति है जिसके पास एक आधार है, जिसके पास दर्शन है। इस प्रकार का व्यक्ति परमेश्वर के देह के बारे में निश्चित होता है, और परमेश्वर के वचनों और उसके कार्य के बारे में भी निश्चित होता है। परमेश्वर चाहे कैसे भी कार्य करे या बोले, या अन्य लोग कैसे भी बाधा उत्पन्न करें, वह अपनी बात पर अडिग रह सकता है, और परमेश्वर के प्रति अपनी गवाही में अडिग रह सकता है। व्यक्ति जितना अधिक इस प्रकार का होता है, वह उस सत्य का उतना ही अधिक अभ्यास कर सकता है, जिसे वह समझता है। चूँकि वह हमेशा परमेश्वर के वचनों का इस तरह अभ्यास करता है, इसलिए वह परमेश्वर के बारे में और अधिक समझ प्राप्त कर लेता है और उसके पास परमेश्वर के लिए अपनी गवाही में हमेशा दृढ़ बने रहने का निश्चय होता है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, केवल उन्हें ही पूर्ण बनाया जा सकता है जो अभ्यास पर ध्यान देते हैं
510. परमेश्वर पर विश्वास करने में, यदि लोग अपने स्वभाव में परिवर्तन की चाहत रखते हैं, तो उन्हें अपने आपको वास्तविक जीवन से अलग नहीं करना चाहिए। नियमित परिवर्तन को प्राप्त करने से पहले तुम्हें वास्तविक जीवन में स्वयं को जानने की, स्वयं की इच्छाओं के खिलाफ विद्रोह करने की, सत्य का अभ्यास करने की, और साथ ही सब बातों में सिद्धांतों, व्यवहारिक ज्ञान और हर बात में अपने आचरण के नियमों को समझने की आवश्यकता है। यदि तुम केवल सैद्धांतिक ज्ञान पर ही ध्यान देते हो और वास्तविकता की गहराई में प्रवेश किए बिना, वास्तविक जीवन में प्रवेश किए बिना केवल धार्मिक अनुष्ठान का जीवन जीते हो, तो तुम कभी भी वास्तविकता में प्रवेश नहीं कर पाओगे, तुम कभी स्वयं को, सत्य को या परमेश्वर को नहीं जान पाओगे, और तुम सदैव अंधे और अज्ञानी ही बने रहोगे। लोगों को बचाने का परमेश्वर का कार्य उन्हें छोटी अवधि के बाद सामान्य मानवीय जीवन जीने देने के लिए नहीं है, न ही यह उनकी त्रुटिपूर्ण धारणाओं और सिद्धांतों को परिवर्तित करने के लिए है। बल्कि, परमेश्वर का उद्देश्य लोगों के पुराने स्वभावों को बदलना है, उनके जीवन के पुराने तरीकों की समग्रता को बदलना है, और उनकी सारी पिछड़ी सोच और उनके मानसिक नजरिए को बदलना है। केवल कलीसियाई जीवन पर ध्यान देने से मनुष्य के जीवन की पुरानी आदतें या लंबे समय तक वे जिस तरीके से जिए हैं, वे नहीं बदलेंगे। कुछ भी हो, लोगों को वास्तविक जीवन से अलग नहीं होना चाहिए। परमेश्वर चाहता है कि लोग वास्तविक जीवन में सामान्य मनुष्यत्व को जिएँ, न कि केवल कलीसियाई जीवन जिएँ; वे वास्तविक जीवन में सत्य को जिएँ, न कि केवल कलीसियाई जीवन में; वे वास्तविक जीवन में अपने कार्य को पूरा करें, न कि केवल कलीसियाई जीवन में। वास्तविकता में प्रवेश करने के लिए इंसान को सबकुछ वास्तविक जीवन की ओर मोड़ देना चाहिए। यदि परमेश्वर में विश्वास रखने में, लोग वास्तविक जीवन में प्रवेश करके खुद को न जान पाएँ, और वे वास्तविक जीवन में सामान्य इंसानियत को न जी पाएँ, तो वे विफल हो जाएँगे। जो लोग परमेश्वर के खिलाफ विद्रोह करते हैं, वे सब ऐसे लोग हैं जो वास्तविक जीवन में प्रवेश नहीं कर सकते। वे सब ऐसे लोग हैं जो मनुष्यत्व के बारे में बात करते हैं, परंतु दुष्टात्माओं की प्रकृति को जीते हैं। वे सब ऐसे लोग हैं जो सत्य के बारे में बात करते हैं परंतु सिद्धांतों को जीते हैं। जो लोग वास्तविक जीवन में सत्य के साथ नहीं जी सकते, वे ऐसे लोग हैं जो परमेश्वर पर विश्वास करते हैं परंतु वे उसके द्वारा ठुकरा दिए जाते हैं। तुम्हें वास्तविक जीवन में प्रवेश करने का अभ्यास करना है, अपनी कमियों, विद्रोहशीलता, और मूर्खता को जानना है, और अपने असामान्य मनुष्यत्व और अपनी कमियों को जानना है। इस तरह से, तुम्हारा ज्ञान तुम्हारी वास्तविक स्थिति और कठिनाइयों के साथ एकीकृत हो जाएगा। केवल इस प्रकार का ज्ञान वास्तविक होता है और इससे ही तुम अपनी दशा को सचमुच समझ सकते हो और स्वभाव-संबंधी परिवर्तनों को प्राप्त कर सकते हो।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, कलीसियाई जीवन और वास्तविक जीवन पर विचार-विमर्श
511. परमेश्वर के वचनों को खाना और पीना, प्रार्थना में प्रशिक्षण लेना, परमेश्वर के बोझ को स्वीकार करना और उस आदेश को स्वीकार करना जो उसने तुम्हें सौंपा है—यह सब इसलिए है ताकि तुम्हारे पास आगे बढ़ने का एक मार्ग हो। परमेश्वर के आदेश के प्रति तुम्हारा बोझ जितना अधिक होगा, तुम्हारे लिए उसके द्वारा पूर्ण बनाया जाना उतना ही आसान होगा। कुछ लोग तो परमेश्वर की सेवा में दूसरों के साथ सहयोग करने के इच्छुक ही नहीं होते, जबकि वे बुलाए जाते हैं; ये आलसी लोग हैं जो केवल आराम की लालसा रखते हैं। तुमसे जितना अधिक दूसरों के साथ सेवा में सहयोग करने का आग्रह किया जाएगा, तुम उतने ही अधिक अनुभव प्राप्त करोगे। अधिक बोझ और अधिक अनुभव होने के कारण, तुम्हारे पास पूर्ण बनाए जाने के अधिक अवसर होंगे। इसलिए, यदि तुम सच्चे मन से परमेश्वर की सेवा कर सको, तो तुम परमेश्वर के बोझ के प्रति विचारशील रहोगे; और इस तरह तुम्हारे पास परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने के अधिक अवसर होंगे। ऐसे ही लोगों के एक समूह को इस समय पूर्ण बनाया जा रहा है। पवित्र आत्मा जितनी अधिक तीव्रता से तुम्हारे दिल को छूएगा, तुम उतने ही अधिक परमेश्वर के बोझ के प्रति विचारशील होओगे, तुम्हें परमेश्वर द्वारा उतना अधिक पूर्ण बनाया जाएगा, तुम्हें उसके द्वारा उतना अधिक प्राप्त किया जाएगा, और अंत में, तुम ऐसे व्यक्ति बन जाओगे जिसे परमेश्वर द्वारा प्रयुक्त किया जाता है। वर्तमान में, कुछ ऐसे लोग हैं जो कलीसिया के लिए कोई बोझ नहीं उठाते। ये लोग सुस्त और ढीले-ढाले हैं, वे केवल अपने शरीर की चिंता करते हैं। ऐसे लोग बहुत स्वार्थी होते हैं और अंधे भी होते हैं। यदि तुम इस मामले को स्पष्ट रूप से नहीं देखते, तो तुम कोई बोझ नहीं उठाओगे। तुम जितना अधिक परमेश्वर के इरादों के प्रति विचारशील रहोगे, तुम्हें परमेश्वर उतना ही बड़ा बोझ देगा। स्वार्थी लोग ऐसी चीज़ें सहना नहीं चाहते; वे कीमत नहीं चुकाना चाहते, परिणामस्वरूप, वे परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने के अवसर से चूक जाएँगे। क्या वे अपना नुकसान नहीं कर रहे हैं? यदि तुम ऐसे व्यक्ति हो जो परमेश्वर के इरादों के प्रति विचारशील है, तो तुम कलीसिया के लिए एक सच्चा बोझ विकसित करोगे। असल में इसे कलीसिया के लिए तुम्हारे द्वारा उठाया गया बोझ कहने के बजाय इसे अपने जीवन के लिए तुम्हारे द्वारा उठाया गया बोझ कहना बेहतर होगा, क्योंकि तुम कलीसिया के लिए एक बोझ विकसित करते हो ताकि परमेश्वर तुम्हें ऐसे अनुभवों के माध्यम से पूर्ण कर सके। इसलिए, जो कोई भी कलीसिया के लिए सबसे बड़ा बोझ उठाता है, जो कोई भी जीवन प्रवेश के लिए बोझ उठाता है—वे ही वे लोग हैं जिन्हें परमेश्वर पूर्ण करता है। क्या तुमने इसे स्पष्ट रूप से देखा है? यदि तुम जिस कलीसिया में हो वह रेत की तरह बिखरी हुई है, लेकिन तुम चिंतित नहीं हो और परेशान नहीं हो और तुम तब भी आँखें फेर लेते हो जब तुम्हारे भाई-बहन सामान्य रूप से परमेश्वर के वचन खा और पी नहीं सकते, तो यह कोई बोझ न होने की एक अभिव्यक्ति है। ऐसे लोग वे नहीं हैं, जिन्हें परमेश्वर प्रेम करता है। जिन्हें परमेश्वर प्रेम करता है वे धार्मिकता के भूखे और प्यासे होते हैं और वे परमेश्वर के इरादों के प्रति विचारशील होते हैं। इसलिए, तुम लोगों को परमेश्वर के बोझ के प्रति अभी तुरंत विचारशील हो जाना चाहिए; परमेश्वर के बोझ के प्रति विचारशील होने से पहले तुम्हें तब तक इंतजार नहीं करना चाहिए जब तक कि परमेश्वर असंख्य लोगों के सामने अपना धार्मिक स्वभाव प्रकट करे। क्या तब तक बहुत देर नहीं हो जाएगी? परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने के लिए अभी अच्छा अवसर है। यदि तुम अपने हाथ से इस अवसर को निकल जाने दोगे, तो तुम जीवन भर पछताओगे, जैसे मूसा कनान की अच्छी भूमि में प्रवेश नहीं कर पाया और जीवन भर पछताता रहा, पछतावे के साथ ही मरा। जब परमेश्वर का धार्मिक स्वभाव असंख्य लोगों पर प्रकट होगा, तो तुम पछतावे से भर जाओगे। यदि परमेश्वर तुम्हें ताड़ना नहीं भी देता है, तो भी तुम स्वयं ही अपने आपको अपने पछतावे के कारण ताड़ना दोगे। कुछ लोग इस बात से आश्वस्त नहीं हैं, लेकिन यदि तुम्हें इस पर विश्वास नहीं है, तो इंतजार करो और देखो। कुछ लोग सटीक तौर पर वही लोग हैं जो इन वचनों को स्वयं में साकार होते देखेंगे। क्या तुम इन वचनों के लिए अपनी जान गँवाने को तैयार हो?
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, पूर्णता प्राप्त करने के लिए परमेश्वर के इरादों के प्रति विचारशील रहो
512. पवित्र आत्मा के पास प्रत्येक व्यक्ति में चलने के लिए एक मार्ग है, और वह प्रत्येक व्यक्ति को पूर्ण बनाए जाने का अवसर प्रदान करता है। तुम्हारी नकारात्मकता के माध्यम से तुम्हें तुम्हारी भ्रष्टता ज्ञात करवाई जाती है, और फिर नकारात्मकता को फेंककर तुम्हें अभ्यास करने का मार्ग मिल जाएगा; इन्हीं सब तरीकों से तुम पूर्ण बनाए जाते हो। इसके अतिरिक्त, अपने भीतर कुछ सकारात्मक चीज़ों के निरंतर मार्गदर्शन और रोशनी के द्वारा तुम अपना कार्य अग्रसक्रियता से पूरा करोगे, तुम्हारी अंतर्दृष्टि विकसित होगी और तुम विवेक प्राप्त करोगे। जब तुम्हारी स्थितियाँ अच्छी होती हैं, तुम परमेश्वर के वचनों को पढ़ने के विशेष रूप से इच्छुक होते हो, और परमेश्वर से प्रार्थना करने के भी विशेष रूप से इच्छुक होते हो, और जो उपदेश तुम सुनते हो, उसे अपनी अवस्था के साथ जोड़ सकते हो। ऐसे समय परमेश्वर तुम्हें भीतर से प्रबुद्ध और रोशन करता है, और तुम्हें सकारात्मक पहलू वाली कुछ चीज़ों का एहसास कराता है। इसी तरह से तुम सकारात्मक पहलू में पूर्ण बनाए जाते हो। नकारात्मक अवस्थाओं में तुम दुर्बल और नकारात्मक होते हो; तुम्हें महसूस होता है कि तुम्हारे दिल में परमेश्वर नहीं है, फिर भी परमेश्वर तुम्हें रोशन करता है और अभ्यास करने का मार्ग खोजने में तुम्हारी सहायता करता है। इससे बाहर आना नकारात्मक पहलू में पूर्णता प्राप्त करना है। परमेश्वर मनुष्य को सकारात्मक और नकारात्मक दोनों पहलुओं में पूर्ण बना सकता है। यह इस पर निर्भर करता है कि तुम अनुभव करने में सक्षम हो या नहीं, और तुम परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने के लिए प्रयास करते हो या नहीं। यदि तुम सचमुच परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने का अनुसरण करते हो, तो नकारात्मक पहलू तुम्हारी हानि नहीं कर सकता, बल्कि तुम्हारे लिए अधिक वास्तविक चीजें ला सकता है, तुम्हें यह जानने में और अधिक सक्षम कर सकता है कि तुम्हारे भीतर क्या कमी है, अपनी वास्तविक दशा को समझने में अधिक सक्षम बना सकता है और यह देखने में भी कि मनुष्य के पास कुछ नहीं है और मनुष्य कुछ नहीं है; यदि तुम परीक्षण अनुभव नहीं करते, तो तुम नहीं जानते, और तुम हमेशा यह महसूस करोगे कि तुम दूसरों से ऊपर हो और प्रत्येक व्यक्ति से बेहतर हो। इस सबके द्वारा तुम देखोगे कि जो कुछ पहले घटित हुआ था, वह सब परमेश्वर द्वारा किया गया था और सुरक्षित रखा गया था। परीक्षणों में प्रवेश तुम्हें प्रेम या आस्था से रहित बना देता है, तुममें प्रार्थना की कमी होती है और तुम भजन गाने में असमर्थ होते हो और इसे जाने बिना ही तुम इसके मध्य स्वयं को जान लेते हो। परमेश्वर के पास मनुष्य को पूर्ण बनाने के अनेक साधन हैं। मनुष्य के भ्रष्ट स्वभावों की काट-छाँट करने के लिए परमेश्वर समस्त प्रकार के परिवेशों का उपयोग करता है और मनुष्य को बेनकाब करने के लिए विभिन्न चीजों का उपयोग करता है; एक ओर वह मनुष्य की काट-छाँट करता है, दूसरी ओर वह मनुष्य को बेनकाब करता है और तीसरी ओर वह मनुष्य को उजागर करता है, उसके हृदय की गहराइयों में स्थित “रहस्यों” को खोदकर निकालता है, उजागर करता है और मनुष्य की अनेक दशाओं को उजागर करके उसकी प्रकृति दिखाता है। परमेश्वर मनुष्य को अनेक विधियों से पूर्ण बनाता है—प्रकाशन द्वारा, मनुष्य की काट-छाँट करके, मनुष्य के शोधन द्वारा और ताड़ना द्वारा—जिससे मनुष्य जान सके कि परमेश्वर व्यावहारिक है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, केवल उन्हें ही पूर्ण बनाया जा सकता है जो अभ्यास पर ध्यान देते हैं
513. वर्तमान में, तुम लोगों को जिसका मुख्य रूप से अनुसरण करना चाहिए, वह है सब बातों में परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाया जाना, और उन सब लोगों, घटनाओं और चीजों के माध्यम से परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाया जाना, जिनसे तुम लोगों का सामना होता है, ताकि उसके द्वारा परमेश्वर जो है, वह और अधिक तुम्हारे अंदर गढ़ा जाए। तुम्हें पहले पृथ्वी पर परमेश्वर की विरासत को पाना है; केवल तभी तुम और अधिक विरासत और अधिक बड़ी आशीष पाने के पात्र बनोगे। ये सब ही वे चीज़ें हैं, जिनका तुम लोगों को अनुसरण करना चाहिए और अन्य सब चीजों से पहले समझना चाहिए। जितना अधिक तुम परमेश्वर द्वारा हर चीज़ में पूर्ण किए जाने का अनुसरण करोगे, उतना अधिक तुम सभी चीज़ों में परमेश्वर का हाथ देख पाओगे, जिसके परिणामस्वरूप तुम, विभिन्न परिप्रेक्ष्यों और विभिन्न मामलों के माध्यम से, परमेश्वर के वचन के स्वरूप में प्रवेश का सक्रियता से अनुसरण और उसके वचन की वास्तविकता में प्रवेश करने का अनुसरण करोगे। तुम ऐसी नकारात्मक दशाओं से संतुष्ट नहीं हो सकते, जैसे कि मात्र पाप नहीं करना, या कोई धारणा, सांसारिक आचरण के लिए कोई फलसफा नहीं रखना, या कोई मानवीय इच्छा नहीं होना। परमेश्वर मनुष्य को कई तरीकों से पूर्ण बनाता है; तुम्हारे लिए सभी मामलों में पूर्ण बनाए जाने की संभावना है, और वह तुम्हें न केवल सकारात्मक रूप में पूर्ण बना सकता है, बल्कि नकारात्मक रूप में भी बना सकता है, ताकि जो तुम प्राप्त करो, वह अधिक प्रचुर मात्रा में हो। हर एक दिन परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने के अवसर और प्राप्त किए जाने के मौके होते हैं। कुछ समय तक ऐसा अनुभव करने के बाद तुम बहुत बदल जाओगे और स्वाभाविक रूप से ऐसी कई चीज़ें स्पष्ट रूप से देखोगे, जिन्हें तुम पहले नहीं समझते थे। तुम्हें दूसरों से निर्देश पाने की कोई आवश्यकता नहीं होगी; तुम्हारे जाने बिना परमेश्वर तुम्हें प्रबुद्ध बनाएगा, ताकि तुम सभी चीज़ों में प्रबोधन प्राप्त कर सको और अपने अनुभवों की सभी बारीकियों में प्रवेश कर सको। परमेश्वर निश्चित रूप से तुम्हारा मार्गदर्शन करेगा, ताकि तुम दाएँ-बाएँ न भटक जाओ, और इस तरह तुम उसके द्वारा पूर्ण बनाए जाने के मार्ग पर पैर रख दोगे।
... यदि तुम लोग परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाया जाना चाहते हो, तो तुम्हें यह सीखना आवश्यक है कि सभी मामलों में कैसे अनुभव किया जाए, और कैसे अपने साथ घटित होने वाली हर चीज में प्रबोधन प्राप्त करने के योग्य बना जाए। वह चीज अच्छी हो या बुरी, तुम्हें वह लाभ ही पहुँचाए और तुम्हें नकारात्मक न बनाए। चाहे जो हो, तुम्हें परमेश्वर के पक्ष में खड़े होकर चीजों को देखने में सक्षम होना चाहिए और मानवीय दृष्टिकोण से उनका विश्लेषण या अध्ययन नहीं करना चाहिए (यह तुम्हारे अनुभव में भटकना होगा)। यदि तुम चीजों का इस तरह अनुभव करते हो, तो तुम्हारा हृदय तुम्हारे जीवन के बोझ से भर जाएगा; तुम निरंतर परमेश्वर के मुखमंडल की रोशनी में जियोगे, और तुम्हारे अभ्यास में विचलन की संभावना नहीं होगी। ऐसे लोगों का भविष्य उज्ज्वल होता है। परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने के बहुत सारे अवसर हैं। यह सब इस बात पर निर्भर करता है कि क्या तुम लोग सच में परमेश्वर से प्यार करते हो और क्या तुम लोगों में परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने, परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जाने, और उसके आशीष और विरासत प्राप्त करने का संकल्प है। केवल संकल्प ही काफी नहीं है। तुम लोगों के पास बहुत ज्ञान होना चाहिए, अन्यथा तुम लोगों के अभ्यास में हमेशा विचलन होंगे। परमेश्वर तुम लोगों में से प्रत्येक को पूर्ण बनाने का इच्छुक है। वर्तमान में, लंबे समय से अधिकांश लोगों ने पहले ही परमेश्वर के कार्य को स्वीकार कर लिया है, लेकिन उन्होंने अपने आपको मात्र परमेश्वर के अनुग्रह में आनंद लेने तक सीमित कर लिया है, और वे केवल उससे देह के कुछ सुख पाने के लिए लालायित हैं, उससे अधिक और उच्चतर खुलासे प्राप्त करने के इच्छुक नहीं हैं। इससे पता चलता है कि मनुष्य का हृदय अभी भी हमेशा बाहरी बातों में लगा रहता है। भले ही मनुष्य के कार्य, उसकी सेवा और परमेश्वर-प्रेमी हृदय में कुछ अशुद्धताएँ कम हों, पर जहाँ तक उसके भीतरी सार और उसकी पिछड़ी सोच का संबंध है, मनुष्य अभी भी निरंतर देह की शांति और आनंद की खोज में लगा है और परमेश्वर द्वारा मनुष्य को पूर्ण बनाए जाने की शर्तों और प्रयोजनों की जरा भी परवाह नहीं करता। और इसलिए, ज्यादातर लोगों का जीवन अभी भी असभ्य और पतनशील है। उनका जीवन जरा भी नहीं बदला है; वे स्पष्टतः परमेश्वर में आस्था को कोई महत्वपूर्ण मामला नहीं मानते, बल्कि ऐसा लगता है जैसे वे बस दूसरों की खातिर परमेश्वर में आस्था रखते हैं, खानापूर्ति करते हैं, और लापरवाही से काम करते और एक अधम अस्तित्व को ढो रहे हैं। बहुत कम लोग ऐसे हैं जो हर बात में परमेश्वर के वचन में प्रवेश करने का प्रयास करते हैं, जिससे वे और अधिक तथा अधिक समृद्ध प्राप्तियाँ हासिल कर सकें, परमेश्वर के घर में और अधिक समृद्ध व्यक्ति बन सकें, और परमेश्वर के और अधिक आशीष प्राप्त कर सकें। यदि तुम सब चीजों में परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाया जाना चाहते हो, और पृथ्वी पर परमेश्वर ने जो देने का वादा किया है, उसे प्राप्त करने में समर्थ हो; यदि तुम सब चीजों में परमेश्वर द्वारा प्रबुद्ध होना चाहते हो और वर्षों को बेकार गुजरने नहीं देते, तो सक्रियता से प्रवेश करने का यह सर्वोत्तम मार्ग है। केवल इसी तरह से तुम परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने के लायक और पात्र बनोगे।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, पूर्ण बनाए जा चुके लोगों से प्रतिज्ञाएँ
514. पवित्र आत्मा न केवल उन खास लोगों में कार्य करता है जो परमेश्वर द्वारा प्रयुक्त किए जाते हैं, बल्कि कलीसिया में भी कार्य करता है। वह किसी में भी कार्य कर रहा हो सकता है। शायद वह वर्तमान समय में, तुममें कार्य करे, और तुम इस कार्य का अनुभव करोगे। अगली अवधि के दौरान शायद वह किसी और में कार्य करे, और ऐसी स्थिति में तुम्हें तत्काल उसका अनुसरण करना चाहिए; तुम वर्तमान प्रकाश का अनुसरण जितना करीब से करोगे, तुम्हारा जीवन उतना ही अधिक विकसित होकर उन्नति कर सकता है। कोई व्यक्ति कैसा भी क्यों न हो, यदि पवित्र आत्मा उसमें कार्य करता है, तो तुम्हें अनुसरण करना चाहिए। जैसे-जैसे तुम खुद चीजों से होकर गुजरोगे, जिस चीज से वे गुजरे उसका वास्तविक अनुभव हासिल करोगे तो तुम्हें और भी उच्चतर चीजें प्राप्त होंगी। इस तरह से अभ्यास करने के माध्यम से तुम अधिक तेजी से प्रगति करोगे। यह मनुष्य की पूर्णता का मार्ग है और वह साधन है जिससे जीवन विकसित होता है। पवित्र आत्मा के कार्य के प्रति तुम्हारे समर्पण से पूर्ण बनाए जाने के मार्ग तक पहुँचा जाता है। तुम्हें पता नहीं होता कि तुम्हें पूर्ण बनाने के लिए परमेश्वर किस प्रकार के व्यक्ति के जरिए कार्य करेगा, न ही यह पता होता है कि किस व्यक्ति, घटना या चीज के जरिए वह तुम्हें चीजों को हासिल करने और देखने में सक्षम बनाएगा। यदि तुम सही पथ पर चल पाओ, तो इससे सिद्ध होता है कि परमेश्वर द्वारा तुम्हें पूर्ण बनाए जाने की काफी आशा है। यदि तुम ऐसा नहीं कर पाते हो, तो इससे ज़ाहिर होता है कि तुम्हारा भविष्य धुँधला और प्रकाशहीन है। एक बार जब तुम सही पथ पर आ जाओगे, तो तुम्हें सभी चीजों में प्रकाशन प्राप्त होगा। पवित्र आत्मा दूसरों पर कुछ भी प्रकट करे, यदि तुम उनके ज्ञान के आधार पर अपने दम पर चीजों का अनुभव करते हो, तो यह तुम्हारे जीवन का हिस्सा बन जाएगा, और इस अनुभव से तुम दूसरों को भी पोषण दे पाओगे। तोते की तरह वचनों को रटकर दूसरों को पोषण देने वाले लोगों के पास अपना कोई अनुभव नहीं होता; तुम्हें अपने वास्तविक अनुभव और ज्ञान के बारे में बोलना शुरू करने से पहले, दूसरों की प्रबुद्धता और रोशनी के माध्यम से, अभ्यास करने का तरीका ढूँढ़ना सीखना होगा। यह तुम्हारे अपने जीवन के लिए अधिक लाभकारी होगा। जो कुछ भी परमेश्वर से आता है उसके प्रति समर्पण करते हुए, तुम्हें इस तरह से अनुभव करना चाहिए। तुम्हें सभी चीजों में परमेश्वर के इरादे खोजने चाहिए और हर चीज से सबक सीखने चाहिए, ताकि तुम्हारा जीवन वृद्धि कर सके। ऐसे अभ्यास से सबसे जल्दी प्रगति होती है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, जो सच्चे हृदय से परमेश्वर के प्रति समर्पण करते हैं वे निश्चित रूप से परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जाएँगे
515. क्या तुम सचमुच पूर्ण बनना चाहते हो? यदि तुम सचमुच परमेश्वर द्वारा पूर्ण बना दिए जाना चाहते हो, तो तुम्हारे अंदर अपनी देह का परित्याग करने का साहस होगा, तुम परमेश्वर के वचनों का अभ्यास कर पाओगे और तुम नकारात्मक या कमजोर नहीं होगे। जो कुछ भी परमेश्वर से आता है उसके प्रति तुम समर्पण कर पाओगे, और तुम अपने सभी कृत्यों को परमेश्वर के सामने रख सकोगे, तुमने उन्हें चाहे दूसरों के सामने किया हो या उनकी पीठ पीछे। यदि तुम ईमानदार इंसान के रूप में कार्य करते हो और सभी चीजों में सत्य का अभ्यास करते हो, तो तुम वह व्यक्ति होगे जिसे पूर्ण बनाया जाता है। ऐसे धोखेबाज लोग जो दूसरों के सामने एक तरह से व्यवहार करते हैं और उनकी पीठ पीछे दूसरी तरह से, वे पूर्ण बनने के इच्छुक नहीं होते हैं। वे सब बरबादी के पुत्र होते हैं और विनाश के पुत्र होते हैं; वे शैतान के होते हैं और वे परमेश्वर के नहीं हैं। ऐसे लोगों को परमेश्वर नहीं चुनता! यदि तुम्हारे क्रियाकलापों और व्यवहार को परमेश्वर के सामने प्रस्तुत नहीं किया जा सके या परमेश्वर के आत्मा द्वारा इनकी पड़ताल न की जा सके, तो यह इस बात का प्रमाण है कि तुम्हारे साथ कुछ गड़बड़ है। तुम्हें परमेश्वर के न्याय और ताड़ना को स्वीकार जरूर करना चाहिए और अपने स्वभाव के रूपांतरण पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए; केवल तभी तुम पूर्ण बनाए जाने के पथ पर कदम रख पाओगे। यदि तुम परमेश्वर द्वारा सच में पूर्ण बनाए जाना और परमेश्वर की इच्छा के अनुसार चलना चाहते हो, तो तुम्हें, बिना किसी शिकायत के, बिना परमेश्वर के कार्य की कोई मनमानी आलोचना किए या निष्कर्ष निकाले, परमेश्वर के सभी कार्यों के प्रति समर्पण करना चाहिए। परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने की ये न्यूनतम आवश्यकताएँ हैं। जो लोग परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने का प्रयास करते हैं उनके लिए अनिवार्य आवश्यकता यह है : हर काम परमेश्वर-प्रेमी हृदय से करो। हर काम परमेश्वर-प्रेमी हृदय से करने का क्या अर्थ है? इसका अर्थ है कि तुम्हारे सारे काम और आचरण को परमेश्वर के सामने प्रस्तुत किया जा सकता है। चूँकि तुम्हारे इरादे सही हैं, इसलिए चाहे तुम्हारे काम सही हों या गलत, तुम उन्हें परमेश्वर या भाई-बहनों को दिखाने से नहीं डरोगे; तुम परमेश्वर के सामने शपथ लेने का साहस रखोगे। तुम्हें अपना हर इरादा, विचार और कल्पना परमेश्वर के सामने पड़ताल के लिए प्रस्तुत करना चाहिए; यदि तुम इस प्रकार से अभ्यास और प्रवेश करोगे, तो जीवन में तुम्हारी प्रगति शीघ्र होगी।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, जो सच्चे हृदय से परमेश्वर के प्रति समर्पण करते हैं वे निश्चित रूप से परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जाएँगे
516. अगर तुम परमेश्वर द्वारा उपयोग में लाया जाना और पूर्ण बनाया जाना चाहते हो तो तुम्हारे पास सत्य का हर पहलू होना चाहिए : पीड़ा सहने का संकल्प, आस्था, सहनशीलता, समर्पण, सत्य खोजने और परमेश्वर के इरादे समझने की योग्यता, उसके दुःख और श्रमसाध्य इरादों के प्रति विचारशील होने की योग्यता, आदि। व्यक्ति को पूर्ण बनाना आसान नहीं है और तुम्हारे द्वारा अनुभव किए जाने वाले प्रत्येक शोधन को तुम्हारी आस्था और तुम्हारे प्रेम की जरूरत पड़ती है। अगर तुम परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाया जाना चाहते हो तो महज दौड़-भाग करना पर्याप्त नहीं है, न खुद को परमेश्वर के लिए खपाना ही पर्याप्त है। ऐसा व्यक्ति बनने के लिए जिसे परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाया जाता है, तुम्हारे पास कई चीजें होनी चाहिए। जब तुम कष्ट का सामना करते हो तो तुम्हें देह की परवाह न करने और परमेश्वर के विरुद्ध शिकायतें न करने में समर्थ होना चाहिए। जब परमेश्वर स्वयं को तुमसे छिपाता है तो तुम्हें यह आस्था रखने में सक्षम होना चाहिए कि तुम उसका अनुसरण कर सको, अपने पिछले प्रेम को बदले या मिटने दिए बिना इसे कायम रख सको। परमेश्वर चाहे कुछ भी करे, तुम्हें उसकी इच्छा के अनुसार उसे आयोजन करने देना चाहिए और उसके विरुद्ध शिकायत करने के बजाय अपनी देह को कोसना पसंद करना चाहिए। जब तुम्हारा सामना परीक्षणों से हो, तो तुम्हें परमेश्वर को संतुष्ट करने में असफल होने की अपेक्षा उन चीज़ों को त्यागने की पीड़ा सहना और फूट-फूटकर रोना अधिक स्वीकार होना चाहिए। केवल यही सच्चा प्रेम और सच्ची आस्था है। तुम्हारा असली आध्यात्मिक कद चाहे जो भी हो, तुममें सबसे पहले पीड़ा सहने का यह संकल्प और सच्ची आस्था दोनों ही होने चाहिए। तुममें देह के खिलाफ विद्रोह करने का संकल्प भी होना चाहिए; तुम्हें परमेश्वर के इरादे पूरे करने में विफल होने की अपेक्षा कष्ट सहना और अपने निजी हितों का नुकसान उठाना अधिक पसंद होना चाहिए। तुम्हें अपने हृदय में पछतावा महसूस करने में भी सक्षम होना चाहिए : अतीत में तुम परमेश्वर को संतुष्ट करने में असमर्थ थे और अब तुम पछतावा कर सकते हो। तुममें इनमें से किसी भी मामले में कमी नहीं होनी चाहिए—इन्हीं चीजों के जरिए परमेश्वर तुम्हें पूर्ण बनाएगा। अगर तुम इन शर्तों को पूरा नहीं करते, तो फिर तुम्हें पूर्ण नहीं बनाया जा सकता है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, जिन्हें पूर्ण बनाया जाना है उन्हें शोधन से गुजरना होगा
517. स्वभाव में परिवर्तन मुख्य रूप से एक व्यक्ति की प्रकृति में परिवर्तन को संदर्भित करता है। किसी व्यक्ति की प्रकृति में निहित चीजों को उसके बाहरी व्यवहारों से नहीं महसूस किया जा सकता। उनका सीधा संबंध उस व्यक्ति के अस्तित्व की कीमत और महत्व से और जीवन के बारे में उसके नजरिए और उसके मूल्यों से है; उनका संबंध उसकी आत्मा की गहराई में स्थित चीजों और उसके सार से है। अगर कोई व्यक्ति सत्य को स्वीकार नहीं कर पाता, तो वह इन पहलुओं में किसी भी रूपांतरण का अनुभव नहीं करेगा। केवल परमेश्वर के वचनों के न्याय और ताड़ना का अनुभव करने और परमेश्वर का ज्ञान प्राप्त करने से ही लोग वास्तव में सत्य को समझ सकते हैं। चीजों के बारे में उनके परिप्रेक्ष्य और अस्तित्व और मूल्यों को लेकर उनके नजरिए बदलने लगते हैं। चीजों के बारे में उनके दृष्टिकोण सत्य के अनुरूप और परमेश्वर के वचन के साथ संगत हो जाते हैं और वे वास्तव में परमेश्वर के प्रति समर्पण करने और अपना कर्तव्य निभाने में उसके प्रति वफादार होने में सक्षम हो जाते हैं। केवल यही स्वभावगत बदलाव है। वर्तमान में, यदि लोग सत्य की समझ प्राप्त नहीं कर सकते, तो यद्यपि वे अपने कर्तव्य के निर्वहन में बाहरी तौर पर थोड़ा प्रयास कर सकते हैं और थोड़ा कष्ट सह सकते हैं, वे ऊपरवाले की कार्य-व्यवस्थाओं को पूरा करने में सक्षम हो सकते हैं, कुछ सरल कार्य कर सकते हैं और उनमें थोड़ा समर्पण प्रतीत हो सकता है, लेकिन जब उनका सामना किसी ऐसी चीज से होता है जो उनकी धारणाओं के अनुरूप नहीं है, तो उनकी विद्रोहशीलता फिर से प्रकट हो जाएगी। उदाहरण के लिए, जब तुम्हारी काट-छाँट की जाएगी, तो तुम बहस करोगे और अपना बचाव करने की कोशिश करोगे और जब कोई प्राकृतिक या मानव-निर्मित आपदा आएगी, तब तुम परमेश्वर के बारे में शिकायत करोगे और बड़बड़ाओगे। यह प्रकट करता है कि तुम ऐसे व्यक्ति नहीं हो जो वास्तव में परमेश्वर के प्रति समर्पण करता है। इसलिए वह थोड़ा-सा बाहरी समर्पण और बदलाव केवल व्यवहार में बदलाव है; यह स्वभावगत बदलाव के स्तर तक नहीं पहुँच पाता है। तुम बहुत भाग-दौड़ करने में सक्षम हो सकते हो, कई कठिनाइयों का सामना कर सकते हो, और बहुत अपमान सह सकते हो; तुम खुद को परमेश्वर के बहुत करीब महसूस कर सकते हो, और पवित्र आत्मा तुम पर कुछ काम कर सकता है। लेकिन, जब परमेश्वर तुमसे कुछ ऐसा करने के लिए कहता है जो तुम्हारी धारणाओं के अनुरूप नहीं है, तब तुम समर्पण करने से इनकार कर सकते हो, बहाने बना सकते हो, परमेश्वर के खिलाफ विद्रोह और उसका प्रतिरोध कर सकते हो और गंभीर मामलों में सवाल खड़े कर सकते हो और उसका विरोध कर सकते हो। यह एक गंभीर समस्या है! यह दिखाता है कि तुममें अभी भी परमेश्वर का प्रतिरोध करने वाली प्रकृति है, तुम वास्तव में सत्य नहीं समझते, और तुम्हारे जीवन स्वभाव में बिल्कुल भी कोई परिवर्तन नहीं आया है। बर्खास्त किए जाने या हटा दिए जाने के बाद भी, कुछ लोग परमेश्वर के बारे में राय बनाने और यह कहने की हद तक जाते हैं कि परमेश्वर धार्मिक नहीं है। यहाँ तक कि वे परमेश्वर के साथ बहस करते और लड़ते भी हैं, जहाँ भी जाते हैं, परमेश्वर के बारे में अपनी धारणाएँ और परमेश्वर के प्रति अपना असंतोष फैलाते हैं। इस तरह के लोग वास्तव में बुरे दानव हैं जो परमेश्वर का प्रतिरोध करते हैं। जिन लोगों में दुष्ट दानव की प्रकृति होती है वे कभी नहीं बदलेंगे और उन्हें छोड़ देना चाहिए। जो लोग हर स्थिति में सत्य खोज सकते हैं, सत्य को स्वीकार कर सकते हैं और परमेश्वर के कार्य के प्रति समर्पित हो सकते हैं, केवल उनके पास ही सत्य पाने और स्वभाव में बदलाव प्राप्त करने की आशा होती है। अपने अनुभवों में, तुम्हें उन दशाओं का भेद पहचानना सीखना चाहिए जो बाहर से सामान्य दिखाई देती हैं। तुम प्रार्थना के दौरान सुबक और रो सकते हो, या महसूस कर सकते हो कि तुम्हारा दिल परमेश्वर से बहुत प्रेम करता है, और उसके बहुत करीब है, फिर भी ये दशाएँ केवल पवित्र आत्मा का कार्य हैं और यह नहीं दर्शातीं कि तुम परमेश्वर से प्रेम करते हो। यदि तुम तब भी परमेश्वर से प्रेम और उसके प्रति समर्पण कर सको, जब पवित्र आत्मा कार्य न कर रहा हो या जब परमेश्वर तुम्हारी धारणाओं के विपरीत कार्य करता है, केवल तभी तुम वह व्यक्ति हो जो वास्तव में परमेश्वर से प्रेम करता है, ऐसा व्यक्ति जिसमें सत्य वास्तविकता है और ऐसा व्यक्ति जिसका जीवन स्वभाव बदल गया है।
—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, स्वभावगत परिवर्तन के बारे में क्या जानना चाहिए
518. स्वभाव में बदलाव व्यवहार में बदलाव नहीं होता, न ही यह झूठा बाह्य परिवर्तन होता है, यह जोश में आकर अस्थायी बदलाव भी नहीं होता। ये परिवर्तन कितने भी अच्छे क्यों न हों, वे जीवन स्वभाव में परिवर्तन का स्थान नहीं ले सकते। इन सबका कारण यह है कि ये बाहरी परिवर्तन मानवीय प्रयासों से लाए जा सकते हैं, लेकिन जीवन स्वभाव में परिवर्तन केवल व्यक्ति के अपने प्रयासों से नहीं लाए जा सकते। इसके लिए परमेश्वर के न्याय, ताड़ना, परीक्षण और शोधन का अनुभव करना और साथ ही पवित्र आत्मा की पूर्णता आवश्यक है। भले ही परमेश्वर में विश्वास रखने वाले लोगों का व्यवहार थोड़ा अच्छा होता है, लेकिन उनमें से कोई भी वास्तव में परमेश्वर के प्रति समर्पण नहीं करता, वास्तव में परमेश्वर से प्रेम नहीं करता या परमेश्वर की इच्छा के अनुसार नहीं चल सकता। ऐसा क्यों है? क्योंकि ऐसा करने के लिए जीवन स्वभाव में बदलाव की आवश्यकता होती है, केवल व्यवहार में बदलाव बिल्कुल भी काफी नहीं होता। स्वभाव में बदलाव का मतलब है कि तुम्हारे अंदर सत्य का ज्ञान और अनुभव है, सत्य तुम्हारा जीवन बन गया है, यह तुम्हारे जीवन और तुम्हारी हर चीज को निर्देशित कर सकता है और उन पर इसका प्रभुत्व हो सकता है। यह तुम्हारे जीवन स्वभाव में आया बदलाव है। जिन लोगों के लिए सत्य जीवन बन गया है, केवल उनके ही स्वभाव बदले हैं। हो सकता है पहले कुछ सत्य ऐसे रहे हों जिन्हें तुमने समझ तो लिया था, लेकिन उन्हें अभ्यास में नहीं ला पाए, लेकिन अब तुम सत्य के हर उस पहलू को, जिसे तुम समझते हो, बिना बाधाओं या कठिनाई के अभ्यास में ला सकते हो। जब तुम सत्य का अभ्यास करते हो, तो तुम खुद को शांति और प्रसन्नता से भरा महसूस करते हो, लेकिन यदि तुम सत्य का अभ्यास नहीं कर पाते, तो तुम्हें पीड़ा का अनुभव होता है और तुम्हारी अंतरात्मा विचलित हो जाती है। तुम हर चीज में सत्य का अभ्यास कर सकते हो, परमेश्वर के वचनों के अनुसार जी सकते हो और जीने का आधार पा सकते हो। इसका मतलब है कि तुम्हारा स्वभाव बदल गया है। अब तुम आसानी से अपनी धारणाएँ, कल्पनाएँ, दैहिक प्राथमिकताएँ, लक्ष्य और ऐसी चीजें त्याग सकते हो जिन्हें तुम पहले नहीं छोड़ सकते थे। तुम्हें लगने लगता है कि परमेश्वर के वचन वास्तव में अच्छे हैं और सत्य का अभ्यास करना सबसे अच्छी बात है। इसका मतलब है कि तुम्हारा स्वभाव बदल गया है। अपना स्वभाव बदलना बहुत सरल लगता है, लेकिन यह वास्तव में एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें बहुत सारे अनुभव शामिल होते हैं। इस अवधि के दौरान, लोगों को बहुत कष्ट सहने पड़ते हैं—उन्हें अपने शरीर को वश में करना और अपनी देह के खिलाफ विद्रोह करना पड़ता है, उन्हें न्याय, ताड़ना, काट-छाँट, परीक्षणों और शोधन का कष्ट भी सहना पड़ता है, उन्हें कई असफलताओं का अनुभव करना और ठोकर भी खाना पड़ता है; आंतरिक संघर्षों और यंत्रणा का कष्ट भी सहना पड़ता है। इन अनुभवों के बाद ही लोगों को अपनी प्रकृति की कुछ समझ हो पाती है, लेकिन कुछ समझ से तुरंत पूर्ण परिवर्तन नहीं होता; उन्हें परीक्षणों, शोधन और काट-छाँट की एक लंबी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है, उन्हें लगातार सत्य को खोजने और सत्य का अभ्यास करने की आवश्यकता होती है, तभी वे थोड़ा-थोड़ा करके अपने भ्रष्ट स्वभावों को त्याग देने में सक्षम हो पाएँगे। इसीलिए अपने स्वभाव को बदलने में पूरा जीवन लग जाता है। उदाहरण के लिए, यदि तुम किसी मामले में भ्रष्टता दिखाते हो, तो क्या इसका एहसास होते ही, तुम तुरंत सत्य का अभ्यास कर सकते हो? नहीं। समझने के इस चरण में, दूसरे तुम्हारी काट-छाँट करते हैं और तब तुम्हारा परिवेश तुम्हें सत्य सिद्धांतों के अनुसार कार्य करने के लिए बाध्य करता है। कभी-कभी तुम ऐसा करने के लिए इच्छुक नहीं होते हो और तुम अपने आपसे कहते हो, “क्या मुझे इसे ऐसे ही करना पड़ेगा? मैं इसे अपने हिसाब से क्यों नहीं कर सकता? मुझे हमेशा सत्य का अभ्यास करने के लिए क्यों कहा जाता है? मैं यह नहीं करना चाहता, इसके लिए मुझमें ऊर्जा नहीं है!” परमेश्वर के कार्य का अनुभव करने के लिए निम्न प्रक्रिया से गुजरना होता है : सत्य का अभ्यास करने का अनिच्छुक होने से लेकर सहर्ष सत्य का अभ्यास करने तक; नकारात्मकता और कमजोरी से लेकर सशक्त बनने और देह के खिलाफ विद्रोह कर पाने की क्षमता तक। जब लोग अनुभव के एक निश्चित बिंदु तक पहुँच जाते हैं और फिर कुछ परीक्षणों और शोधन से गुजरकर अंततः परमेश्वर के इरादे और कुछ सत्य समझने लगते हैं, तब वे थोड़े खुश होकर सत्य सिद्धांतों के अनुसार कार्य करने को तैयार हो जाते हैं। शुरू में लोग थोड़ी अनिच्छा से सत्य का अभ्यास करते हैं। उदाहरण के तौर पर, समर्पित होकर अपने कर्तव्यों का निर्वहन करने को ही ले लो : तुम्हारे अंदर अपने कर्तव्य निभाने में कुछ समर्पण, परमेश्वर के प्रति समर्पित होने की कुछ समझ और सत्य की थोड़ी समझ है, लेकिन तुम पूरी तरह से समर्पित होने में कब समर्थ होगे और कब नाम और कर्म दोनों में तुम अपने कर्तव्यों का निर्वहन कर सकोगे? इसमें प्रक्रिया की आवश्यकता है। इस प्रक्रिया के दौरान तुम्हें कई कठिनाइयों को झेलना पड़ सकता है। शायद कुछ लोग तुम्हारी काट-छाँट करें, कुछ तुम्हारी आलोचना करें। सबकी निगाहें तुम पर लगी रहेंगी, तुम्हारी पड़ताल कर रही होंगी, केवल तब जाकर तुम्हें एहसास होगा कि तुम गलत हो, तुम ही हो जिसने गलती की है, अपने कर्तव्य के निर्वहन में लगन की कमी होना अस्वीकार्य है और यह भी कि तुम्हें लापरवाह नहीं होना चाहिए। पवित्र आत्मा तुम्हें भीतर से प्रबुद्ध करता है और जब तुम कोई भूल करते हो, तो वह तुम्हें फटकारता है। इस प्रक्रिया के दौरान तुम अपने बारे में कुछ बातें समझने लगोगे और जान जाओगे कि तुममें बहुत सारी अशुद्धियाँ हैं, तुम्हारे अंदर निजी इरादे भरे पड़े हैं और अपने कर्तव्य निभाते समय तुम्हारे अंदर बहुत सारी असंयमित इच्छाएँ होती हैं। जब तुम इन चीजों के सार को समझ जाते हो, तब अगर तुम परमेश्वर के समक्ष आकर उससे प्रार्थना कर सच्चा प्रायश्चित कर सकते हो, तो तुम्हारी वे भ्रष्ट चीजें शुद्ध की जा सकती हैं। यदि इस तरह अपनी वास्तविक समस्याओं का समाधान करने के लिए तुम अक्सर सत्य की खोज करोगे, तो तुम आस्था के सही मार्ग पर कदम-दर-कदम आगे बढ़ पाओगे; तुम्हें सच्चे जीवन अनुभव होने लगेंगे और धीरे-धीरे तुम्हारे भ्रष्ट स्वभाव शुद्ध होने लगेंगे। तुम्हारे भ्रष्ट स्वभाव जितने अधिक शुद्ध होते जाएँगे, तुम्हारा जीवन स्वभाव उतना ही परिवर्तित होगा।
भले ही अब बहुत-से लोग अपने कर्तव्य निभा रहे हैं, लेकिन सार रूप में, ऐसे कितने लोग हैं जो बेमन से अपने कर्तव्य निभा रहे हैं? कितने लोग सत्य को स्वीकार कर सत्य सिद्धांतों के अनुसार अपने कर्तव्य निभा सकते हैं? कितने लोग अपने स्वभाव में बदलाव आने के बाद परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुसार अपने कर्तव्य निभाते हैं? इन बातों की ज्यादा जाँच करके तुम जान सकते हो कि क्या कर्तव्यों का निर्वहन करने में तुम मानक के अनुरूप हो, तुम यह भी स्पष्ट रूप से देख पाओगे कि तुम्हारे स्वभाव में कोई बदलाव आया है या नहीं। स्वभाव में रूपांतरण लाना कोई आसान बात नहीं है; इसका मतलब महज व्यवहार में थोड़ा-सा बदलाव लाना और सत्य का थोड़ा ज्ञान हासिल कर लेना, सत्य के हर पहलू के बारे में अपने अनुभव पर थोड़ा बात कर लेना, या अनुशासित किए जाने के बाद थोड़ा बदल जाना या थोड़ा-सा समर्पित हो जाना नहीं है। ये चीजें किसी व्यक्ति के जीवन स्वभाव में परिवर्तन के बराबर नहीं हैं। मैं ऐसा क्यों कहता हूँ? यद्यपि तुममें कुछ बदलाव आया हो, फिर भी तुम वास्तव में समर्पण नहीं कर रहे हो। तुम कभी-कभी सत्य का अभ्यास करने में इसलिए सक्षम हो सकते हो क्योंकि परिवेश अनुकूल है या कोई तुम्हारा पर्यवेक्षण कर रहा है और केवल तभी तुम कुछ हद तक समर्पण कर पाते हो। इसके अलावा, जब तुम्हारा मिजाज अच्छा होता है और तुम्हारी मनोदशा सामान्य होती है या जब तुममें पवित्र आत्मा का कार्य होता है, तब तुम सत्य का अभ्यास कर सकते हो। लेकिन यदि तुम किसी परीक्षण से गुजर रहे हो—जब तुम परीक्षण के बीच अय्यूब की तरह कष्ट उठा रहे हो या जब तुम मौत के परीक्षण का सामना करते हो—क्या तुम तब भी सत्य का अभ्यास कर पाओगे और गवाही में अडिग रह पाओगे? क्या तुम कुछ ऐसा कह पाओगे जैसा कि पतरस ने कहा था, “अगर तुझे जानने के बाद मुझे मरना भी पड़े, तो मैं ऐसा हर्ष और प्रसन्नता के साथ कैसे नहीं करूँगा?” पतरस ने किस चीज को महत्व दिया? पतरस ने समर्पण को महत्व दिया, उसने परमेश्वर को जानने को सर्वाधिक महत्वपूर्ण समझा, तभी वह मृत्युपर्यंत समर्पण कर पाया। स्वभाव में परिवर्तन रातोंरात नहीं होता; इसमें जीवन भर का अनुभव लग जाता है। सत्य को समझना थोड़ा आसान होता है, लेकिन विभिन्न संदर्भों में सत्य का अभ्यास करना कठिन होता है। सत्य का अभ्यास करने में हमेशा कुछ कठिनाइयाँ क्यों होती हैं, जबकि अपनी इच्छा के अनुसार चलने पर कोई कठिनाई नहीं होती? यह दर्शाता है कि जब लोग सत्य का अभ्यास करते हैं, तो वे हमेशा अपने भ्रष्ट स्वभावों द्वारा बाधित होते हैं; इसका बाहरी परिवेश से बहुत कम लेना-देना है। इसलिए सत्य का अभ्यास करने में लोगों की सबसे बड़ी कठिनाई उनके अपने भ्रष्ट स्वभाव हैं। चाहे किसी भी प्रकार की कठिनाई हो, उसका सीधा संबंध व्यक्ति के भ्रष्ट स्वभावों से होता है; सभी कठिनाइयाँ इसलिए हैं क्योंकि उनके भ्रष्ट स्वभाव हावी हो रहे हैं और बाधाएँ पैदा कर रहे हैं। इस प्रकार, सत्य का अभ्यास करने के लिए देह के खिलाफ विद्रोह करना और अपने भ्रष्ट स्वभावों के खिलाफ विद्रोह करना आवश्यक है; सत्य का अभ्यास कर सकने से पहले लोगों को कष्ट सहने और कीमत चुकाने की आवश्यकता होती है। यदि उनमें भ्रष्ट स्वभाव नहीं होते, तो उन्हें सत्य का अभ्यास करने के लिए कष्ट सहने और कीमत चुकाने की आवश्यकता नहीं होती। क्या यह स्पष्ट तथ्य नहीं है? कभी-कभी ऐसा लग सकता है जैसे तुम सत्य को अभ्यास में ला रहे हो, लेकिन वास्तव में, तुम्हारे क्रियाकलापों की प्रकृति सत्य का अभ्यास करने की प्रकृति नहीं है। परमेश्वर का अनुसरण करने में कई लोग अपने परिवार और काम-धंधे त्याग करके अपने कर्तव्य करने में सक्षम होते हैं, इसलिए वे मानते हैं कि वे सत्य का अभ्यास कर रहे हैं। लेकिन वे कभी सच्ची अनुभवात्मक गवाही देने में सक्षम नहीं होते। यहाँ असल में क्या चल रहा है? मनुष्य की धारणाओं से उन्हें मापने पर वे सत्य का अभ्यास करते प्रतीत होते हैं, फिर भी परमेश्वर नहीं मानता कि वे जो कर रहे हैं, वह सत्य का अभ्यास करना है। ऐसा इसलिए है क्योंकि वे जो कुछ भी करते हैं वह परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए नहीं, बल्कि आशीष और प्रतिफल पाने के लिए होता है। यदि तुम्हारे द्वारा किए जाने वाले कार्यों में तुम्हारी व्यक्तिगत मंशाओं की मिलावट है, तो तुम्हारे सिद्धांतों से भटकने की संभावना है और यह नहीं कहा जा सकता कि तुम सत्य का अभ्यास कर रहे हो; यह केवल एक प्रकार का आचरण है। सख्ती से कहा जाए तो तुम्हारे इस प्रकार के आचरण की परमेश्वर द्वारा निंदा किए जाने की संभावना है; इसे उसके द्वारा स्वीकृति नहीं दी जाएगी या याद नहीं रखा जाएगा। इसके सार और स्रोत का आगे गहन-विश्लेषण करने पर पता चलेगा कि यह शैतान की प्रकृति से उत्पन्न होता है। तब यह तुम्हें एक कुकर्मी बनाता है और फिर तुम्हारा यह आचरण परमेश्वर का प्रतिरोध करना है। मानवीय परिप्रेक्ष्य से, शायद कुछ लोग जिनमें भेद पहचानने की क्षमता नहीं होती है, वे कहेंगे, “यह बुराई करना नहीं है, न ही यह गड़बड़ियाँ और बाधाएँ पैदा करना है और इससे कोई नुकसान नहीं हुआ है। जो कहा और किया गया, वह भी तार्किक और उचित लगता है।” लेकिन लोग जिस बात की असलियत नहीं जान पाते वह यह है कि उनके भीतर की मिलावट और मंशाएँ बुरे तत्व हैं, इसलिए उनके क्रियाकलाप बुरे कर्म हैं और परमेश्वर का प्रतिरोध हैं। इसलिए परमेश्वर के वचनों के प्रयोग से और अपने क्रियाकलापों के पीछे के इरादों को देखकर तुम्हें यह तय करना चाहिए कि क्या तुम्हारे स्वभाव में कोई परिवर्तन हुआ है और क्या तुम सत्य को अभ्यास में ला रहे हो। यह इस पर निर्भर नहीं करता कि तुम्हारे क्रियाकलाप इंसानी कल्पनाओं और विचारों के अनुरूप हैं या नहीं या वे तुम्हारी रुचि के लिए उपयुक्त हैं या नहीं; यह इन चीजों पर निर्भर नहीं करता है। बल्कि, यह परमेश्वर के इस निर्णय पर निर्भर करता है कि तुम उसके इरादों के अनुसार काम करते हो या नहीं, तुम्हारे क्रियाकलापों में सत्य वास्तविकता है या नहीं, और वे उसके अपेक्षित मानकों को पूरा करते हैं या नहीं। केवल परमेश्वर की अपेक्षाओं से तुलना करके अपने आप को मापना ही सटीक है। स्वभाव में रूपांतरण और सत्य को अभ्यास में लाना उतना सहज और आसान नहीं है जैसा लोग सोचते हैं। क्या तुम लोग अब इस बात को समझ गए? क्या इसका तुम सबको कोई अनुभव है? जब इस मामले के सार की बात आती है, तो शायद तुम लोग इसे नहीं समझ सकोगे; तुम लोगों का प्रवेश बहुत ही उथला रहा है। तुम लोग सुबह से शाम तक दिन भर भागते-दौड़ते हो, सुबह जल्दी उठते हो और देर से सोते हो, फिर भी तुम्हारा जीवन स्वभाव परिवर्तित नहीं हुआ है और तुम लोग इस बात को समझ नहीं सकते कि स्वभावगत परिवर्तन क्या है। इसका अर्थ है कि तुम्हारा प्रवेश बहुत ही उथला है, है न? चाहे तुम लोगों ने कितने भी लंबे समय से परमेश्वर में विश्वास रखा हो, फिर भी हो सकता है कि तुम लोग स्वभाव में परिवर्तन की मूल प्रकृति और उससे जुड़ी गहरी चीजों को महसूस न कर सको। क्या यह कहा जा सकता है कि तुम्हारा स्वभाव बदल गया है? तुम कैसे जानते हो कि परमेश्वर तुम्हें स्वीकृति देता है या नहीं? कम से कम, तुम अपने हर काम में जबरदस्त आंतरिक शांति महसूस करोगे और तुम महसूस करोगे कि जब तुम अपने कर्तव्य निभा रहे हो, परमेश्वर के घर में या अपने रोजमर्रा के जीवन में कोई भी काम कर रहे हो, पवित्र आत्मा तुम्हारा मार्गदर्शन और प्रबोधन कर रहा है और तुममें कार्य कर रहा है। तुम यह देखने में सक्षम होगे कि कैसे तुम्हारे क्रियाकलाप परमेश्वर के वचनों के अनुरूप हैं, वे सत्य सिद्धांतों के अनुरूप होंगे और जब तुमने चीजों को कुछ हद तक अनुभव कर लिया होगा, तब तुम महसूस करोगे कि अतीत में तुमने जो कुछ किया वह अपेक्षाकृत उपयुक्त था। लेकिन अगर कुछ समय तक चीजों का अनुभव करने के बाद, तुम महसूस करो कि अतीत में तुम्हारे द्वारा किए गए कुछ काम उपयुक्त नहीं थे, तुम उनसे असंतुष्ट हो, और तुम्हें लगे कि वे सत्य के अनुरूप नहीं थे, तो इससे यह साबित होता है कि तुमने जो कुछ भी किया, वह परमेश्वर के विरोध में था। यह साबित करता है कि तुम्हारी सेवा विद्रोहशीलता, प्रतिरोध और काम करने के मानवीय तरीकों से भरी हुई थी और तुम अपने स्वभाव में बदलाव लाने में पूरी तरह से नाकाम रहे हो।
—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, स्वभावगत परिवर्तन के बारे में क्या जानना चाहिए
519. चाहे कोई व्यक्ति कितने ही अच्छे कर्म क्यों न करे, इसका मतलब यह नहीं है कि उसमें सत्य वास्तविकताएँ हैं। सत्य वास्तविकता के होने का अर्थ है सत्य का अभ्यास करना और सिद्धांतों के अनुसार कार्य करना। सत्य वास्तविकता के होने का अर्थ है परमेश्वर का भय मानना और बुराई से दूर रहना। ऐसे लोग होते हैं जो उत्साही होते हैं, वे सिद्धांत बोल सकते हैं, विनियमों का पालन करते हैं और कई अच्छी चीजें करते हैं, लेकिन उनके बारे में इतना ही कहा जा सकता है कि उनमें थोड़ी-सी मानवता है। यह जरूरी नहीं कि जो लोग सिद्धांत बोल सकते हों और हमेशा विनियमों का पालन करते हों, वे सत्य का अभ्यास भी करते हों। भले ही वे जो कुछ कहते हैं वह सही होता है और ऐसा लगता है यह समस्या-मुक्त है, लेकिन सत्य के सार से संबंधित मामलों में उनके पास कहने को कुछ नहीं होता। इसलिए, कोई कितने भी सिद्धांत बोले, इसका मतलब यह नहीं है कि उसे सत्य की समझ है, वह चाहे कितना भी सिद्धांत समझता हो, कोई समस्या नहीं सुलझा सकता। धार्मिक सिद्धांतकार बाइबल की व्याख्या कर सकते हैं, लेकिन अंत में, उन सभी का पतन हो जाता है, क्योंकि वे परमेश्वर द्वारा व्यक्त किसी भी सत्य को नहीं स्वीकारते। जिन लोगों ने अपने स्वभाव में परिवर्तन का अनुभव किया है, वे अलग हैं; उन्होंने सत्य समझ लिया है, वे सभी मुद्दों पर विवेकी होते हैं, वे जानते हैं कि कैसे परमेश्वर के इरादों के अनुसार कार्य करना है, कैसे सत्य सिद्धांत के अनुसार कार्य करना है, कैसे परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए कार्य करना है, और वे उस भ्रष्टता की प्रकृति को समझते हैं जो उनसे प्रकट होती है। जब उनके अपने विचार और धारणाएँ प्रकट होती हैं, तो वे विवेकी बन सकते और देह के खिलाफ विद्रोह कर सकते हैं। स्वभाव में परिवर्तन इसी तरह से दिखता है। जिन लोगों का स्वभाव बदल चुका है, उनकी मुख्य अभिव्यक्ति यह है कि उन्होंने सत्य को स्पष्ट रूप से समझ लिया है और कार्य करते समय तो वे काफी सटीकता के साथ सत्य का अभ्यास करते हैं और वे अक्सर भ्रष्टता प्रकट नहीं करते। आम तौर पर, जिन लोगों का स्वभाव बदल गया है, वे खासकर तर्कसंगत और विवेकपूर्ण प्रतीत होते हैं, और सत्य की अपनी समझ के कारण, वे उतनी आत्मतुष्टता और अहंकार प्रकट नहीं करते। वे अपनी प्रकट हुई ज्यादातर भ्रष्टता की असलियत जान लेते हैं और उसका भेद पहचान लेते हैं, इसलिए उनमें अभिमान उत्पन्न नहीं होता। उन्हें कौन-सा स्थान लेना चाहिए, विवेकयुक्त व्यक्ति समझा जाने के लिए उन्हें क्या करना चाहिए, अपने कर्तव्यों का पालन कैसे करना चाहिए, क्या कहना और क्या नहीं कहना चाहिए, और किन लोगों से क्या कहना और क्या करना चाहिए—इस बारे में उन्हें एक विवेकपूर्ण समझ होती है। इस प्रकार जिन लोगों का स्वभाव बदल गया है, वे अपेक्षाकृत विवेकी होते हैं और सही मायनों में ऐसे लोग ही मानव के समान जीवन जीते हैं। क्योंकि उन्हें सत्य की समझ होती है, वे सत्य के अनुरूप बोलने और मामलों को देखने में समर्थ होते हैं और वे जो भी करते हैं, उसमें सिद्धांत का पालन करते हैं; वे किसी व्यक्ति, घटना या चीज़ के प्रभाव में नहीं होते, उनका अपना दृष्टिकोण होता है और वे सत्य सिद्धांतों को कायम रख सकते हैं। उनका स्वभाव काफी स्थिर होता है, वे भावनात्मक रूप से अस्थिर नहीं होते, चाहे उनकी स्थिति कैसी भी हो, वे जानते हैं कि कैसे उन्हें अपने कर्तव्यों को अच्छे से निभाना है और कैसे उस ढंग से व्यवहार करना है जो परमेश्वर को संतुष्ट करता है। जिन लोगों के स्वभाव बदल गए हैं वे इस पर ध्यान नहीं देते कि बाहरी तौर पर ऐसा क्या करना चाहिए ताकि दूसरे उनके बारे में अच्छा सोचें; अपने दिलों में वे स्पष्ट हैं कि परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए क्या करना है। इसलिए, हो सकता है कि बाहर से लगे कि वे उतने उत्साही नहीं हैं या उन्होंने बहुत-से बड़े काम नहीं किए हैं, लेकिन वो जो कुछ भी करते हैं वह सार्थक होता है, मूल्यवान होता है, और उसके परिणाम वास्तविक होते हैं। जिन लोगों के स्वभाव बदल गए हैं उनके अंदर निश्चित रूप से बहुत-सी सत्य वास्तविकताएँ होती हैं, और इस बात की पुष्टि चीज़ों के बारे में उनके दृष्टिकोण और उनके कार्यकलाप के सिद्धांतों के आधार पर की जा सकती है। जिन लोगों ने सत्य प्राप्त नहीं किया है, उनके जीवन स्वभाव में बिल्कुल कोई परिवर्तन नहीं हुआ होता है। स्वभाव में परिवर्तन कैसे लाया जाता है? मनुष्यों को शैतान द्वारा गहराई से भ्रष्ट किया गया है, वे सभी परमेश्वर का प्रतिरोध करते हैं, और परमेश्वर का प्रतिरोध करना ही उनकी प्रकृति है। परमेश्वर द्वारा मनुष्य के उद्धार का अर्थ है जिन लोगों की प्रकृति परमेश्वर का प्रतिरोध करना है और जो परमेश्वर का प्रतिरोध कर सकते हैं, उन्हें उन लोगों में बदलना जो परमेश्वर के प्रति समर्पण कर और उसका भय मान सकते हैं। जिनके स्वभाव में बदलाव हो चुका है वे ऐसे लोग होते हैं। कोई व्यक्ति कितना भी भ्रष्ट क्यों न हो या उसके पास कितने भी भ्रष्ट स्वभाव हों, अगर वह सत्य स्वीकार सकता है, परमेश्वर का न्याय और ताड़ना स्वीकार सकता है, विभिन्न परीक्षण और शोधन स्वीकार सकता है, तो उसमें परमेश्वर की सच्ची समझ होगी, और साथ ही, वह स्पष्ट रूप से अपने प्रकृति सार को भी देख पाएगा। जब वह स्वयं को वास्तव में जान लेगा, तो उसे स्वयं से और शैतान से घृणा हो जाएगी, और वह शैतान से विद्रोह करने को तैयार हो जाएगा और पूरी तरह से परमेश्वर के प्रति समर्पण करेगा। जब किसी व्यक्ति में यह संकल्प आ जाता है तो वह सत्य का अनुसरण करेगा। जब किसी व्यक्ति को परमेश्वर का सच्चा ज्ञान होता है, जब उसका शैतानी स्वभाव शुद्ध कर दिया जाता है और परमेश्वर के वचन उसके भीतर जड़ें जमा लेते हैं और उसका जीवन और उसके अस्तित्व का आधार बन जाते हैं, जब वह परमेश्वर के वचनों के अनुसार जी सकता है और पूरी तरह से बदलकर नया व्यक्ति बन गया है, केवल तभी उसके जीवन स्वभाव में बदलाव आया है। स्वभाव में बदलाव का मतलब परिपक्व और अनुभवी मानवता होना नहीं है या यह नहीं है कि लोग पहले की तुलना में स्वभाव में अधिक नम्र दिखाई देते हैं—अतीत में अहंकारी होने से लेकर अब विवेक से बोलने में सक्षम होने तक, या अतीत में किसी की न सुनने से लेकर अब दूसरों की बात थोड़ा-बहुत सुनने में सक्षम होने तक। ऐसे बाहरी परिवर्तनों को स्वभाव में परिवर्तन नहीं कहा जा सकता। बेशक स्वभाव में बदलाव में ऐसी अभिव्यक्तियाँ शामिल होती हैं लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि व्यक्ति का आंतरिक जीवन बदल जाता है। यह पूरी तरह इसलिए है क्योंकि परमेश्वर के वचनों और सत्य ने उनमें अंदर जड़ें जमा ली हैं, उनके भीतर वे शासन करने लग गए हैं और वे उनका जीवन बन गए हैं। चीजों पर उनके विचार भी बदल गए हैं। वे दुनिया और मानवजाति को स्पष्ट रूप से देख सकते हैं। वे पूरी तरह से इसकी असलियत जान सकते हैं कि शैतान मानवजाति को कैसे भ्रष्ट करता है, बड़ा लाल अजगर परमेश्वर का प्रतिरोध कैसे करता है और बड़े लाल अजगर का सार क्या है। वे अपने दिलों में बड़े लाल अजगर और शैतान से घृणा कर पाते हैं और वे पूरी तरह से परमेश्वर की ओर मुड़कर उसका अनुसरण कर सकते हैं। इसका अर्थ है कि उनका जीवन स्वभाव बदल गया है और वे परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए गए हैं। जीवन स्वभाव में परिवर्तन मौलिक परिवर्तन होता है, जबकि व्यवहार में परिवर्तन सतही होता है। जिन लोगों ने जीवन स्वभाव में परिवर्तन प्राप्त कर लिया है, उन्हीं लोगों ने सत्य प्राप्त किया है और केवल वही परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए गए हैं।
—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, भाग तीन
520. अगर तुम भ्रष्टता से शुद्ध होना और अपने जीवन स्वभाव में बदलाव से गुजरना चाहते हो, तो तुममें सत्य के लिए प्रेम होना चाहिए और तुम्हें सत्य को स्वीकार करने में सक्षम होना चाहिए। सत्य स्वीकार करने का क्या अर्थ है? सत्य स्वीकारने का यह अर्थ है कि चाहे तुममें कोई भी भ्रष्ट स्वभाव हो या बड़े लाल अजगर के जो विष—शैतान के विष—तुम्हारी प्रकृति में हों, जब परमेश्वर के वचन इन चीजों को उजागर कर दें, तो तुम्हें उन्हें मान लेना और समर्पण कर देना चाहिए, तुम कोई और विकल्प नहीं चुन सकते, तुम्हें परमेश्वर के वचनों के अनुसार खुद को जानना चाहिए। इसका मतलब है परमेश्वर के वचनों और सत्य को स्वीकारने में सक्षम होना। मान लो कि चाहे परमेश्वर कुछ भी कहे, चाहे उसके वचन कितने भी कठोर हों, चाहे वह किन्हीं भी वचनों का उपयोग करे, तुम इन्हें तब तक स्वीकार कर सकते हो जब तक कि वह जो भी कहता है वह सत्य है, और तुम इन्हें तब तक मान सकते हो जब तक कि वे वास्तविकता के अनुरूप हैं। इससे फर्क नहीं पड़ता कि तुम परमेश्वर के वचनों को कितनी गहराई से समझते हो, तुम उनके प्रति समर्पण कर सकते हो; और भले ही भाई-बहन पवित्र आत्मा के प्रबोधन से प्राप्त प्रकाश के बारे में संगति करते हों, तुम अभी भी उसे स्वीकार करने और उसके प्रति समर्पण करने में सक्षम हो। जब ऐसा व्यक्ति सत्य का अनुसरण एक निश्चित बिंदु तक कर लेता है, तो वह सत्य को प्राप्त कर सकता है और अपने स्वभाव के परिवर्तन को प्राप्त कर सकता है। भले ही सत्य से प्रेम न करने वाले लोगों में थोड़ी-बहुत मानवता हो, वे कुछ अच्छी चीजें कर सकते हों, त्याग कर सकते हों और परमेश्वर के लिए खुद को खपा सकते हों, फिर भी वे भ्रमित हैं और सत्य को लेकर बहुत सावधान नहीं हैं, इसलिए उनके जीवन स्वभाव कभी नहीं बदलते। तुम देख सकते हो कि पतरस और अन्य शिष्यों की मानवता लगभग एक समान थी लेकिन पतरस की एक प्रमुख विशेषता यह थी कि उसने विशेष रूप से सत्य का अनुसरण किया। यीशु ने चाहे जो भी कहा उसने उस पर गंभीरता से विचार किया, इन वचनों के माध्यम से खुद पर आत्म-चिंतन किया और परमेश्वर के इरादों को खोजा। यीशु ने पूछा, “हे शमौन बारयोना, क्या तुम मुझसे प्रेम करते हो?” पतरस ने ईमानदारी से उत्तर दिया, “मैं केवल उस पिता से प्रेम करता हूँ जो स्वर्ग में है, अभी तक मैंने पृथ्वी के प्रभु से प्रेम नहीं किया है।” बाद में उसने समझा, यह सोचते हुए, “यह सही नहीं है, पृथ्वी का परमेश्वर स्वर्ग का परमेश्वर है। क्या स्वर्ग और पृथ्वी में यही एक परमेश्वर नहीं है? अगर मैं केवल स्वर्ग के परमेश्वर से प्रेम करता हूँ, तो मेरा प्रेम व्यावहारिक नहीं है। मुझे पृथ्वी के परमेश्वर से प्रेम करना चाहिए, और तभी मेरा प्रेम व्यावहारिक होगा।” इस प्रकार, यीशु ने जो पूछा था, उससे पतरस ने परमेश्वर के वचनों का सच्चा अर्थ जाना। परमेश्वर के प्रति व्यक्ति का प्रेम केवल तब ही व्यावहारिक होता है अगर वह पृथ्वी पर देहधारी परमेश्वर से प्रेम करता है। किसी अज्ञात और अदृश्य परमेश्वर से प्रेम करना न तो यथार्थपरक है और न ही व्यावहारिक, जबकि व्यावहारिक, दृश्यमान परमेश्वर से प्रेम करना सत्य है। यीशु के वचनों से पतरस ने सत्य को हासिल किया और परमेश्वर के इरादे की समझ प्राप्त की। स्पष्टतः, पतरस का परमेश्वर में विश्वास केवल सत्य की तलाश पर केंद्रित था। अंततः, उसने व्यावहारिक परमेश्वर—पृथ्वी के परमेश्वर—को प्रेम करने की अवस्था प्राप्त की। सत्य की तलाश में पतरस विशेष रूप से गंभीर था। जब भी यीशु ने उसे एक मार्गदर्शन दिया, उसने गंभीरतापूर्वक यीशु के वचनों पर चिंतन किया। शायद उसने महीनों, एक वर्ष, यहाँ तक कि वर्षों तक चिंतन किया और तब पवित्र आत्मा द्वारा उसे प्रबुद्ध किया गया और वह परमेश्वर के वचनों का सार समझ पाया। इस तरह, पतरस ने सत्य में प्रवेश किया, और जब उसने ऐसा किया, तो उसके जीवन के स्वभाव का रूपांतरण और नवीनीकरण हुआ।
—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, मनुष्य की प्रकृति को कैसे जानें
521. स्वभाव में बदलाव लाने की कुंजी अपनी प्रकृति को जानना है और यह परमेश्वर के प्रकाशन के अनुसार ही होना चाहिए। केवल परमेश्वर के वचनों में ही व्यक्ति अपनी घिनौनी प्रकृति, अपनी प्रकृति के भीतर छिपे शैतान के विभिन्न विषों, अपनी मूर्खता और अज्ञानता, और अपनी प्रकृति के कमजोर और नकारात्मक तत्वों को जान सकता है। इन बातों को तुम्हारे पूरी तरह से जानने के बाद, और तुम्हारे सच में खुद से नफरत करने, देह से विद्रोह करने, परमेश्वर के वचनों का अभ्यास करने में लगे रहने, स्वभाव में बदलाव लाने के लिए अपना कर्तव्य निभाते हुए सत्य के अनुसरण में लगे रहने और सच में परमेश्वर से प्रेम करने वाले व्यक्ति बनने में सक्षम हो जाने के बाद, तुम पतरस के मार्ग पर चल पड़े होगे। परमेश्वर के अनुग्रह या पवित्रात्मा से मिलने वाले प्रबोधन और मार्गदर्शन के बिना, इस मार्ग पर चलना मुश्किल होगा, क्योंकि सत्य के बिना, लोग खुद से विद्रोह नहीं कर सकते। पतरस के पूर्ण बनाए जाने के मार्ग पर चलना मुख्य रूप से संकल्प रखने, आस्था रखने और परमेश्वर पर निर्भर रहने पर निर्भर करता है। इसके अलावा, व्यक्ति को पवित्रात्मा के कार्य के प्रति समर्पण करना चाहिए और सभी चीजों में, परमेश्वर के वचनों से कभी भी भटकना नहीं चाहिए। ये वे महत्वपूर्ण पहलू हैं जिनका कभी भी उल्लंघन नहीं किया जाना चाहिए। अपने अनुभवों के दौरान, खुद को जानना बहुत मुश्किल होता है और पवित्रात्मा के कार्य के बिना, कोई परिणाम नहीं मिलेगा। पतरस के मार्ग पर चलने के लिए, व्यक्ति को खुद को जानने और अपने स्वभाव को बदलने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। पौलुस का मार्ग जीवन का अनुसरण करने या आत्म-ज्ञान पर ध्यान केंद्रित करने का नहीं था, बल्कि काम करने पर और किए गए काम की भव्यता और प्रतिष्ठा पर विशेष ध्यान देने का मार्ग था। उसका इरादा अपने काम और कष्ट के बदले में परमेश्वर के आशीष और पुरस्कार पाने का था। यह इरादा गलत था। पौलुस ने जीवन पर ध्यान केंद्रित नहीं किया, न ही उसने अपने स्वभाव के बदलाव को कोई महत्व दिया। उसने केवल पुरस्कारों पर ध्यान केंद्रित किया। जिस लक्ष्य का उसने अनुसरण किया, वह गलत था; स्वाभाविक रूप से, फिर जिस मार्ग पर वह चला, वह भी गलत था। यह उसकी घमंडी और दंभी प्रकृति के कारण हुआ। स्पष्ट रूप से, पौलुस में जरा भी सत्य नहीं था, न ही उसमें कोई जमीर या विवेक था। लोगों को बचाने और बदलने में, परमेश्वर मुख्य रूप से उनके स्वभाव को बदलता है। परमेश्वर के वचनों का उद्देश्य लोगों के स्वभाव में परिवर्तन लाना है और लोगों को उसे जानने और उसके प्रति समर्पण करने में सक्षम बनाना है और एक सामान्य तरीके से उसकी आराधना करने में सक्षम बनाना है। यही परमेश्वर के वचनों और कार्य का उद्देश्य है। पौलुस का अनुसरण करने का तरीका सीधे तौर पर परमेश्वर के इरादों के विरुद्ध और उनके साथ टकराव में था। यह पूरी तरह से उनके विपरीत था। हालाँकि, पतरस का अनुसरण करने का तरीका पूरी तरह से परमेश्वर के इरादों के अनुरूप था। पतरस ने जीवन पर और स्वभाव में बदलाव पर ध्यान केंद्रित किया, जो कि वास्तव में वही है जो परमेश्वर अपने कार्य से लोगों में पूरा करना चाहता है। इसलिए, पतरस का मार्ग परमेश्वर द्वारा धन्य और स्वीकृत था, जबकि पौलुस का मार्ग ठीक वही था जिससे परमेश्वर घृणा करता था और जिसे शाप देता था क्योंकि वह उसके इरादों के विपरीत था।
—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, भाग तीन
522. अधिकतर लोगों को अपनी बहुत सतही समझ होती है। वे अपनी प्रकृति के भीतर की चीजों को बिल्कुल भी साफ तौर पर नहीं जानते। उन्हें अपने द्वारा प्रकट की जाने वाली कुछ भ्रष्ट दशाओं, अपने द्वारा संभावित रूप से की जाने वाली चीजों या अपनी कमियों की जानकारी होती है और इससे उन्हें लगता है कि वे खुद को जानते हैं। फिर अगर वे कुछ विनियमों का पालन कर लेते हैं, यह सुनिश्चित कर लेते हैं कि वे कुछ क्षेत्रों में गलतियाँ न करें, और कुछ अपराध करने से बच जाते हैं, तो वे सोचने लगते हैं कि परमेश्वर में उनके विश्वास में वास्तविकता है और मान लेते हैं कि वे बचा लिए जाएँगे। यह सिर्फ इंसानी कल्पना है, और कुछ नहीं। अगर तुम उन चीजों का पालन करते हो, तो क्या तुम सच में अपराध करने से बचने में समर्थ हो जाओगे? क्या तुमने सच में अपने स्वभाव में कोई बदलाव प्राप्त कर लिया होगा? क्या तुम सच में एक मानव के समान जी लिए होगे? क्या तुम सच में परमेश्वर को संतुष्ट कर पाओगे? बिल्कुल नहीं। यह निश्चित है। लोगों के पास परमेश्वर में विश्वास करने का एक ऊँचा मानक अवश्य होना चाहिए : उन्हें अवश्य सत्य प्राप्त करना और अपने जीवन स्वभाव में कुछ बदलाव लाना चाहिए। इसके लिए सबसे पहले जरूरी है कि लोग खुद को जानने की कोशिश करें। अगर किसी व्यक्ति का खुद के बारे में ज्ञान बहुत उथला है, तो इससे कोई भी समस्या कतई हल नहीं होगी और उसका जीवन स्वभाव बिल्कुल नहीं बदलेगा। तुम्हें खुद को बहुत गहराई से जानना होगा। इसका मतलब है अपनी प्रकृति को जानना, यह जानना कि उसमें कौन-से तत्व शामिल हैं, ये चीजें कहाँ से पैदा होती हैं और कहाँ से आती हैं। इसके अलावा, क्या तुम सच में इन चीजों से नफरत करने में समर्थ हो? क्या तुमने अपनी बदसूरत आत्मा और अपनी दुष्ट प्रकृति को देखा है? अगर तुम सच में अपनी सच्चाई देख लो, तो तुम खुद से नफरत करने लगोगे। जब तुम खुद से नफरत करते हो और फिर परमेश्वर के वचनों का अभ्यास करने की कोशिश करते हो, तो तुम देह से विद्रोह कर पाओगे और सत्य का अभ्यास करने की ताकत पा लोगे, और तब यह संघर्ष जैसा महसूस नहीं होगा। कई लोग अपनी दैहिक पसंद के अनुसार काम क्यों करते हैं? क्योंकि वे खुद को काफी अच्छा समझते हैं और महसूस करते हैं कि उनके काम काफी उचित और जायज हैं, उनमें कोई त्रुटि नहीं है और यहाँ तक कि वे पूरी तरह से सही हैं और इसलिए वे पूरी आत्म-निश्चितता से काम करते हैं। जब वे सच में जान लेंगे कि उनकी प्रकृति कैसी है—यह कितनी बदसूरत, घिनौनी और दयनीय है—तो वे खुद को इतना बड़ा समझना और इतना घमंड करना बंद कर देंगे और वे खुद से इतने खुश नहीं रहेंगे। वे सोचेंगे, “मुझे जमीन से जुड़े रहकर परमेश्वर के कुछ वचनों का अभ्यास करना चाहिए। वरना, मैं मानव होने के मानक पर खरा नहीं उतरूँगा और परमेश्वर के सामने जीने में मुझे शर्म आएगी।” वे सच में खुद को छोटा और नितांत तुच्छ समझेंगे। इस मुकाम पर, उनके लिए सत्य का अभ्यास करना आसान हो जाएगा और वे कुछ-कुछ वैसे दिखने लगेंगे जैसा एक इंसान को दिखना चाहिए। जब कोई व्यक्ति सच में खुद से नफरत करता है, केवल तभी वह देह से विद्रोह कर पाता है। अगर वह खुद से नफरत नहीं करता, तो वह देह से विद्रोह नहीं कर पाएगा। खुद से सचमुच नफरत करना कोई आसान मामला नहीं है। इसके लिए व्यक्ति को कुछ सत्य समझने की आवश्यकता होती है : सबसे पहले उन्हें अपनी प्रकृति का ज्ञान अवश्य होना चाहिए। दूसरे, उसे यह देखना चाहिए कि वह दीन-हीन और दयनीय है, वह अत्यंत छोटा और तुच्छ है, और उसे अपनी दयनीय, गंदी आत्मा को देखना चाहिए। जब वह पूरी तरह से देख लेता है कि वह असल में क्या है—जब यह नतीजा हासिल हो जाता है—तो उसे सच में खुद का ज्ञान मिलता है और तब कहा जा सकता है कि खुद के बारे में उसका ज्ञान बिल्कुल सटीक है। केवल इस मुकाम पर वह खुद से नफरत कर सकता है, यहाँ तक कि खुद को कोस सकता है और सच में यह महसूस कर सकता है कि शैतान ने इंसानों को इतनी गहराई तक भ्रष्ट कर दिया है कि वे किसी भी मानवीय स्वरूप से रहित हैं। एक दिन, अगर उस पर सच में मौत का खतरा मँडराएगा, तो वह सोचेगा, “यह परमेश्वर का धार्मिक दंड है। परमेश्वर सच में धार्मिक है। मैं मरने के ही लायक हूँ!” इस मुकाम पर, वह अपनी कोई शिकायत व्यक्त नहीं करेगा, परमेश्वर की शिकायत करने की तो बात ही दूर है—वह सिर्फ यह महसूस करेगा कि वह अत्यंत दीन-हीन, दयनीय, गंदा और भ्रष्ट है और उसे परमेश्वर द्वारा हटाकर नष्ट कर दिया जाना चाहिए और वह महसूस करेगा कि उसकी जैसी आत्मा इस धरती पर जीने के लायक नहीं है। इसलिए, वह परमेश्वर की शिकायत या उसका प्रतिरोध नहीं करेगा और उसे धोखा देने का तो सवाल ही नहीं उठता। लेकिन अगर वह खुद को नहीं जानता और अब भी खुद को काफी अच्छा समझता है, तो जब मौत का खतरा करीब आएगा, तो वह सोचेगा, “मैंने अपनी आस्था में बहुत अच्छा किया है। मैंने इतनी मेहनत से सत्य का अनुसरण किया है, इतना कुछ त्यागा है और इतने कष्ट सहे हैं, लेकिन आखिर में, परमेश्वर मुझे मरने दे रहा है। मुझे नहीं पता कि परमेश्वर की धार्मिकता कहाँ है। वह मुझे क्यों मरने दे रहा है? अगर मुझ जैसा इंसान भी मरेगा, तो फिर कौन बचाया जा सकेगा? क्या पूरी मानवजाति का अंत नहीं हो गया?” सबसे पहले, उसके मन में परमेश्वर को लेकर धारणाएँ बनेंगी। दूसरे, वह परमेश्वर की शिकायत करेगा और उसमें जरा भी समर्पण नहीं होगा। वह बिल्कुल पौलुस की तरह है, जो मरते दम तक खुद को नहीं जान पाया। जब परमेश्वर का दंड उन पर आएगा, तब बहुत देर हो चुकी होगी।
—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, भाग तीन
523. जब लोग पूर्णता के मार्ग पर कदम रखते हैं, तो उनका पुराना स्वभाव बदल सकता है। इसके अतिरिक्त, उनके जीवन निरंतर विकसित होते रहते हैं, और वे धीरे-धीरे सत्य में और गहरे प्रवेश करते जाते हैं। वे संसार से और उन सभी से घृणा करने में सक्षम होते हैं, जो सत्य का अनुसरण नहीं करते। विशेष रूप से वे न केवल स्वयं से घृणा करते हैं, परंतु उससे अधिक, वे स्वयं को स्पष्ट रूप से जानते हैं। वे सत्य के अनुसार जीने को तैयार होते हैं और वे सत्य के अनुसरण को अपना लक्ष्य बनाते हैं और वे अपने मस्तिष्क द्वारा उत्पन्न विचारों के भीतर जीवन जीने के लिए तैयार नहीं हैं। वे मनुष्य की आत्मतुष्टि, अकड़ और दंभ के प्रति घृणा महसूस करते हैं, वे औचित्य की सशक्त भावना के साथ बोलते हैं, चीजों का सामना करते समय उनमें विवेक और बुद्धि होती है, और वे परमेश्वर के प्रति वफादार और समर्पित होते हैं। यदि वे ताड़ना और न्याय की किसी घटना का अनुभव करते हैं, तो न केवल वे नकारात्मक और दुर्बल नहीं बनते, बल्कि वे परमेश्वर की इस ताड़ना और न्याय के प्रति आभारी होते हैं, यह विश्वास करते हुए कि वे परमेश्वर की ताड़ना और न्याय के बिना नहीं रह सकते; कि वे उसकी रक्षा करते हैं। वे लोग शांति और आनंद की आस्था और पेट भरने की खोज में रहने का अनुसरण नहीं करते। न ही वे अस्थायी दैहिक आनंद के पीछे भागते हैं। पूर्ण किए गए लोगों के पास यह होता है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, विजय के कार्य की वास्तविक कहानी (4)
524. यदि कोई अपना कर्तव्य करते हुए परमेश्वर को संतुष्ट कर सकता है, और अपने शब्दों और क्रियाकलापों में सिद्धांत पर चलता है और सत्य के समस्त पहलुओं की वास्तविकता में प्रवेश करता है, तो वह ऐसा व्यक्ति है जो परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाया गया है। यह कहा जा सकता है कि परमेश्वर के कार्य और उसके वचनों ने उन पर पूरी तरह से प्रभाव प्राप्त कर लिया है : परमेश्वर के वचन उनका जीवन बन गए हैं, और उन्होंने सत्य प्राप्त कर लिया है, और वे परमेश्वर के वचनों के अनुसार जीने में समर्थ हैं। इसके बाद, उनके देह की प्रकृति—अर्थात्, उनके अस्तित्व की मूल नींव—हिलकर अलग हो जाएगी और ढह जाएगी। जब लोग परमेश्वर के वचन को अपने जीवन के रूप में धारण कर लेंगे, केवल तभी वे नए लोग बनेंगे। अगर परमेश्वर के वचन लोगों का जीवन बन जाते हैं; परमेश्वर के कार्य का दर्शन, उसका प्रकाशन और मानवता से उसकी अपेक्षाएँ, और मानव जीवन के वे मानक जो परमेश्वर अपेक्षा करता है कि वे प्राप्त करें, लोगों का जीवन बन जाते हैं, अगर लोग इन वचनों और सत्यों के अनुसार जीते हैं, तो वे परमेश्वर के वचनों द्वारा पूर्ण बनाए जाते हैं। ऐसे लोग परमेश्वर के वचनों के माध्यम से पुनर्जन्म लेते हैं और नए लोग बन गए हैं। यह वह मार्ग है जिसके द्वारा पतरस ने सत्य का अनुसरण किया। यह पूर्ण बनाए जाने का मार्ग है। पतरस परमेश्वर के वचनों द्वारा पूर्ण बनाया गया था, उसने परमेश्वर के वचनों से जीवन प्राप्त किया, परमेश्वर द्वारा व्यक्त किया गया सत्य उसका जीवन बन गया, और तब जाकर वह ऐसा व्यक्ति बन गया जिसने सत्य को प्राप्त किया।
—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, पतरस के मार्ग पर कैसे चलें
525. जब लोगों को परमेश्वर के स्वभाव की वास्तविक समझ होती है, जब वे देख पाते हैं कि परमेश्वर का स्वभाव वास्तविक है, वह वास्तव में पवित्र है, वास्तव में धार्मिक है और जब वे परमेश्वर की पवित्रता और धार्मिकता की अपने हृदय से प्रशंसा कर पाते हैं, तब वे वास्तव में परमेश्वर को जान लेंगे और उन्होंने सत्य प्राप्त कर लिया होगा। जो लोग परमेश्वर को जानते हैं, वे ही प्रकाश में रहते हैं। परमेश्वर को सच में जानने का सीधा प्रभाव परमेश्वर से सचमुच प्रेम करने और उसके प्रति समर्पण करने में सक्षम होना है। जब लोग वास्तव में परमेश्वर को जान जाते हैं, सत्य को समझते हैं और सत्य प्राप्त करते हैं तो जीवन के प्रति उनकी विश्वदृष्टि और दृष्टिकोण वास्तविक बदलाव से गुजरते हैं, जिसके बाद उनके जीवन स्वभाव में भी वास्तविक परिवर्तन होता है। जब लोगों के सही जीवन-लक्ष्य होते हैं, जब वे सत्य का अनुसरण करने में सक्षम होते हैं और सत्य के अनुसार आचरण करते हैं, जब वे पूरी तरह से परमेश्वर के प्रति समर्पित होते हैं और उसके वचनों के अनुसार जीते हैं, जब वे अपने दिल की गहराई में स्थिर और रोशन महसूस करते हैं, जब उनके दिल अंधकार से मुक्त होते हैं और वे पूरी तरह से स्वतंत्र और मुक्त होकर परमेश्वर की उपस्थिति में जीते हैं, तभी उन्हें एक सच्चा मानव जीवन प्राप्त होता है और केवल ऐसे लोगों में ही सत्य और मानवता होती है। इसके अलावा, जो भी सत्य तुमने समझे और प्राप्त किए हैं, वे सभी परमेश्वर के वचनों से और स्वयं परमेश्वर से आए हैं। जब तुम सर्वोच्च परमेश्वर—सृष्टिकर्ता—का अनुमोदन प्राप्त करते हो और वह कहता है कि तुम एक मानक स्तर के सृजित प्राणी हो और तुम मानव के समान जीते हो, तभी तुम्हारा जीवन सबसे अधिक सार्थक होगा।
—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, मनुष्य की प्रकृति को कैसे जानें
526. परमेश्वर पर अपने विश्वास के सन्दर्भ में, यदि मनुष्य, जीवन के मामलों के प्रति गंभीर नहीं है, वह सत्य में प्रवेश करने की कोशिश नहीं करता, अपने स्वभाव में परिवर्तन की कोशिश नहीं करता परमेश्वर के कार्य के ज्ञान का अनुसरण तो दूर की बात है, तो उसे पूर्ण नहीं बनाया जा सकता। यदि तुम पूर्ण बनाया जाना चाहते हो तो तुम्हें परमेश्वर के कार्य को समझना होगा। खासतौर से तुम्हें उसकी ताड़ना और उसके न्याय की सार्थकता को समझना होगा और यह समझना होगा कि इस कार्य को मनुष्य पर क्यों किया जाता है। क्या तुम यह कार्य स्वीकार कर पाते हो? इस प्रकार की ताड़ना के दौरान क्या तुम पतरस जैसे ही अनुभव और ज्ञान प्राप्त कर पाते हो? यदि तुम परमेश्वर के ज्ञान और पवित्र आत्मा के कार्य के ज्ञान के लिए प्रयास करोगे और अपने स्वभाव में बदलाव लाने के प्रयास करोगे तो तुम्हारे पास पूर्ण बनाए जाने का अवसर होता है।
जिन्हें पूर्ण बनाया जाना है, उनके लिए जीत लिए जाने के कार्य का यह कदम अति आवश्यक है; जब मनुष्य पर विजय पा ली जाती है, तो उसके बाद ही मनुष्य पूर्ण बनाए जाने के कार्य का अनुभव कर सकता है। केवल जीत लिए जाने की भूमिका को निभाने का कोई बड़ा महत्व नहीं है, जो तुम्हें परमेश्वर के इस्तेमाल के योग्य नहीं बनाएगा। सुसमाचार फैलाने की अपनी भूमिका को निभाने के लिए तुम्हारे पास कोई साधन नहीं होगा, क्योंकि तुम जीवन का अनुसरण नहीं करते, अपने अंदर परिवर्तन लाने और नवीनीकरण का प्रयास नहीं करते, और इसलिए तुम्हारे पास व्यावहारिक जीवन अनुभव नहीं है। इस कदम दर कदम कार्य के दौरान, तुम जब एक बार एक सेवाकर्मी और एक विषम के तौर पर कार्य कर लेते हो, लेकिन अगर अंततः तुम पतरस बनने का अनुसरण नहीं करते, और यदि तुम्हारी खोज उस मार्ग के अनुसार नहीं है जिसके द्वारा पतरस को पूर्ण बनाया गया था, तो स्वाभाविक रूप से, तुम अपने स्वभाव में परिवर्तन का अनुभव नहीं कर पाओगे। यदि तुम पूर्ण बनाए जाने का प्रयास करते हो, तो तुम गवाही दे चुके होगे, और तुम कहोगे : “परमेश्वर के इस कदम दर कदम कार्य में, मैंने परमेश्वर की ताड़ना और न्याय के कार्य को स्वीकार कर लिया है, और हालाँकि मैंने बड़ा कष्ट सहा है, फिर भी मैं जान गया हूँ कि परमेश्वर मनुष्य को पूर्ण कैसे बनाता है, मैंने परमेश्वर द्वारा किए गए कार्य को प्राप्त कर लिया है, मैंने परमेश्वर की धार्मिकता का ज्ञान प्राप्त कर लिया है, और उसकी ताड़ना ने मुझे बचा लिया है। उसका धार्मिक स्वभाव मुझ पर आ गया है, और मेरे लिए आशीष और अनुग्रह लेकर आया है; यह उसका न्याय और ताड़ना ही है जिसने मेरी रक्षा की और शुद्ध किया है। यदि परमेश्वर ने मुझे ताड़ना न दी होती और मेरा न्याय न किया होता, और यदि परमेश्वर ने मुझे कठोर वचन न कहे होते, तो मैं परमेश्वर को नहीं जान पाता, और न ही मुझे बचाया जा सका होता। आज मैं देखता हूँ : एक सृजित प्राणी के रूप में, न केवल व्यक्ति सृष्टिकर्ता द्वारा बनाई गई सभी चीजों का आनंद उठाता है, बल्कि, महत्वपूर्ण यह है कि सभी सृजित प्राणी परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव का आनंद उठाएँ, और उसके धार्मिक न्याय का आनंद उठाएँ, क्योंकि परमेश्वर का स्वभाव मनुष्य के आनंद के योग्य है। एक ऐसे सृजित प्राणी के रूप में जिसे शैतान द्वारा भ्रष्ट कर दिया गया है, इंसान को परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव का आनंद उठाना चाहिए। उसके धार्मिक स्वभाव में उसकी ताड़ना और न्याय है, और इससे भी बढ़कर, उसमें महान प्रेम है। हालाँकि आज मैं परमेश्वर के प्रेम को पूरी तरह प्राप्त करने में असमर्थ हूँ, फिर भी मुझे उसे देखने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है और इससे मैं धन्य हो गया हूँ।” यह वह पथ है जिस पर वे लोग चले हैं जो पूर्ण बनाए जाने का अनुभव करते हैं और यह है वह ज्ञान जिसके बारे में वे बोलते हैं। ऐसे लोग पतरस के समान हैं; उनके अनुभव भी पतरस के समान ही होते हैं। ऐसे लोग वे लोग भी हैं जो जीवन प्राप्त कर चुके होते हैं, जिनके अंदर सत्य है। जब उनका अनुभव अंत तक बना रहता है, तो परमेश्वर के न्याय के बीच वे अपने-आपको पूरी तरह से शैतान के प्रभाव से छुड़ाने और परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जाने में सक्षम होंगे।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, पतरस के अनुभव : ताड़ना और न्याय का उसका ज्ञान
527. मुझे पतरस जैसे लोग चाहिए, ऐसे लोग जो पूर्ण बनाए जाने का प्रयास करते हैं। आज का सत्य उन्हें प्रदान किया जाता है जो उसकी लालसा रखते हैं और उसे खोजते हैं। यह उद्धार उन्हें दिया जाता है जो परमेश्वर द्वारा बचाए जाने की लालसा रखते हैं। यह उद्धार सिर्फ तुम लोगों द्वारा प्राप्त किए जाने के लिए नहीं है; यह तुम लोगों को परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जाने भी देता है—तुम लोग परमेश्वर को प्राप्त करते हो ताकि परमेश्वर तुम्हें प्राप्त कर सके। आज मैंने ये वचन तुम लोगों से कहे हैं, और तुमने इन्हें सुना है, तुम्हें इन वचनों के अनुसार अभ्यास करना चाहिए। अगर तुम लोग आखिरकार इन वचनों को अभ्यास में लाओगे तो मैं इन वचनों द्वारा तुम्हें हासिल कर चुका हूँगा; उसी समय, तुम भी इन वचनों को हासिल कर चुके होगे, यानी तुम यह असीम उद्धार प्राप्त कर चुके होगे। एक बार शुद्ध कर दिए जाने के बाद तुम लोग सच्चे मानव बन गए होगे। यदि तुम सत्य को जीने में असमर्थ हो, या उस व्यक्ति के समान जीवन बिताने में असमर्थ हो, जिसे पूर्ण बना दिया गया है, तो यह कहा जा सकता है कि तुम एक मानव नहीं, एक चलती-फिरती लाश हो, पशु हो, क्योंकि तुममें सत्य नहीं है, दूसरे शब्दों में, तुममें यहोवा की श्वास नहीं है, और इस प्रकार तुम एक मरे हुए इंसान हो जिसमें कोई आत्मा नहीं है! यद्यपि जीत लिए जाने के बाद गवाही देना संभव है, लेकिन इससे तुम्हें थोड़ा-सा ही उद्धार प्राप्त होता है, और तुम ऐसे जीवित प्राणी नहीं बन पाते जिसमें आत्मा है। हालाँकि तुमने ताड़ना और न्याय का अनुभव कर लिया होता है, फिर भी तुम्हारा स्वभाव नहीं बदलता या नवीनीकृत नहीं हुआ होता; तुम अभी भी पुराने बने रहते हो, तुम शैतान के होते हो, और तुम एक शुद्ध किए गए इंसान नहीं होते। केवल उन्हीं का मूल्य है जिन्हें पूर्ण बनाया जा चुका है, और केवल ऐसे ही लोगों ने एक सच्चा जीवन प्राप्त किया होता है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, पतरस के अनुभव : ताड़ना और न्याय का उसका ज्ञान
528. अपनी सेवा के भविष्य के पथ में, तू परमेश्वर के इरादों को कैसे पूरा कर सकता है? एक अहम बात है जीवन प्रवेश का अनुसरण करना, अपने स्वभाव में बदलाव का अनुसरण करना और सत्य में अधिक गहराई से प्रवेश करने का अनुसरण करना—यह परमेश्वर के द्वारा पूर्ण बनाए जाने और प्राप्त किए जाने का मार्ग है। तुम सभी लोग परमेश्वर के आदेश के प्राप्तकर्ता हो, लेकिन आदेश क्या है? यह कार्य के अगले क़दम से जुड़ा है; अगले चरण का कार्य एक अधिक बड़ा कार्य होगा जो पूरे ब्रह्मांड में किया जाता है, इसलिए आज, तुम लोगों को अपने जीवन स्वभाव में बदलाव लाने की चेष्टा करनी चाहिए ताकि भविष्य में तुम सब वास्तव में परमेश्वर द्वारा अपने कार्य के माध्यम से महिमा पाने का एक प्रमाण बन जाओ और तुम लोग उसके भविष्य के कार्य के लिए एक मिसाल बनाए जा सकते हो। आज का अनुसरण पूरी तरह से भविष्य के कार्य के लिए एक नींव बनाने की खातिर है, ताकि तू परमेश्वर द्वारा उपयोग किया जा सके और उसकी गवाही देने में सक्षम बन सके। अगर तू इसे अपने प्रयासों का लक्ष्य बना ले, तो तू पवित्र आत्मा की उपस्थिति को प्राप्त कर पायेगा। तू अपने अनुसरण का लक्ष्य जितना ऊँचा रखेगा, उतना ही अधिक तू पूर्ण बनाया जा सकेगा। जितना अधिक तू सत्य का अनुसरण करेगा, उतना ही अधिक पवित्र आत्मा कार्य करेगा। अनुसरण के लिए तेरा प्रयास जितना अधिक होगा, उतना ही अधिक तू प्राप्त करेगा। पवित्र आत्मा लोगों को उनकी आंतरिक अवस्था के आधार पर पूर्ण करता है। कुछ लोग कहते हैं कि वे परमेश्वर द्वारा उपयोग होने या उसके द्वारा पूर्ण किए जाने के इच्छुक नहीं हैं, वे बस चाहते हैं कि उनकी देह सुरक्षित हो और उन्हें कोई दुर्भाग्य न झेलना पड़े। कुछ लोग राज्य में प्रवेश करना नहीं चाहते लेकिन अथाह कुंड में उतरना चाहते हैं। अगर ऐसा है तो परमेश्वर भी तेरी इच्छा को पूरा करेगा। तू जो भी प्रयास करेगा परमेश्वर उसे पूरा करेगा। तो इस समय तेरा प्रयास क्या है? क्या यह पूर्ण किया जाना है? क्या तेरे वर्तमान कार्यकलाप और व्यवहार परमेश्वर द्वारा पूर्ण किए जाने की खातिर हैं, उसके द्वारा प्राप्त किए जाने के लिए हैं? तुझे अपने रोजमर्रा के जीवन में इस तरह से स्वयं का आकलन निरंतर करना होगा। यदि तू पूरे दिल से एक लक्ष्य का अनुसरण करने में लग जाता है, तो निस्संदेह परमेश्वर तुझे पूर्ण बनाएगा। यह पवित्र आत्मा का मार्ग है। पवित्र आत्मा की अगुआई वाला मार्ग लोगों के अनुसरण के माध्यम से प्राप्त किया जाता है। जितनी अधिक तेरे भीतर परमेश्वर के द्वारा पूर्ण और प्राप्त किए जाने की प्यास होगी, पवित्र आत्मा तेरे अंदर उतना ही अधिक काम करेगा। जितना अधिक तू अनुसरण करने में असफल होता है, जितना अधिक तू नकारात्मक और पीछे हटने वाला होता है, पवित्र आत्मा से कार्य करने के अवसर उतने ही कम होते हैं; जैसे-जैसे समय बीतता जाएगा पवित्र आत्मा तुझे त्याग देगा। क्या तू परमेश्वर के द्वारा पूर्ण किया जाना चाहता है? क्या तू परमेश्वर के द्वारा प्राप्त किया जाना चाहता है? क्या तू परमेश्वर के द्वारा उपयोग किया जाना चाहता है? तुम लोगों को परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने, प्राप्त किए जाने और उपयोग किए जाने के लिए सब कुछ करने का अनुसरण करना चाहिए, ताकि ब्रह्मांड और उसमें मौजूद सभी चीज़ें तुम लोगों में परमेश्वर के क्रियाकलापों को अभिव्यक्त होते देख सकें। तुम सभी चीजों के बीच स्वामी हो, और जो सभी चीज़ें हैं उन सबके बीच, तुम्हें ऐसा करना चाहिए ताकि परमेश्वर को तुम लोगों के माध्यम से गवाही और महिमा का आनंद मिल सके। केवल इसी से यह साबित होता है कि तुम सभी पीढ़ियों में सबसे सौभाग्यशाली हो!
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, जिनके स्वभाव परिवर्तित हो चुके हैं, वे वही लोग हैं जो परमेश्वर के वचनों की वास्तविकता में प्रवेश कर चुके हैं