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परमेश्वर को इंतज़ार है उनकी मण्डली को पाने का जो उसके साक्षी हैं

I

इंसान के लिये परमेश्वर की इच्छा है, जैसा वो चाहता है-

लोग वैसे बनें, वैसे करें, वैसे जिएं,

धरती पर हर इंसान किस तरह, उसकी इच्छा पूरी करे।

क्या ये नियम परमेश्वर के सार से अलग हो सकते हैं?

वो अपने स्वभाव को, स्वरूप को दर्शाता है,

साथ ही इंसान से मांग भी करता है,

उसके करने में, ना झूठ है, ना छिपाव है,

ना दिखावा है, ना सजावट है।

II

जब परमेश्वर का काम आगे बढ़ा,

उसने इंद्रधनुष भेजा, जो था इस वादे की निशानी कि,

अब सैलाब से ना वो धरती का विनाश करेगा।

इसके बाद परमेश्वर ने बहुत उन्हें पाना चाहा,

जो लोग उसके साथ एक मन हो सकें,

जो उसकी ख्वाहिश को इस धरती पर अंजाम दे सकें,

जो अंधेरी ताकतों से खुद को आज़ाद कर सकें।

परमेश्वर हासिल करना चाहता है उन्हें,

जो लोग शैतान के बंधन में नहीं हैं,

जो लोग परमेश्वर की गवाही दे सकें।

ये परमेश्वर की पुरानी ख़्वाहिश है,

जिसका उसने इंतज़ार किया,

हर चीज़ की उत्पत्ति से, उत्पत्ति से, उत्पत्ति से।

III

परमेश्वर के सैलाब से धरती की तबाही

और इंसान से उसके वादे से बेपरवाह,

उसकी ख़्वाहिश, दिमाग़ी सोच, उसकी योजना, असल में सब वही है।

सृजन से पहले से वो चाहता था, उसकी लालसा थी,

जो उसकी ख़्वाहिशों को, उसके स्वभाव को जानते हैं,

उनको पाना चाहता है, जिन्हें वो पाना चाहता था।

परमेश्वर हासिल करना चाहता है उन्हें,

जो लोग शैतान के बंधन में नहीं हैं,

जो लोग परमेश्वर की गवाही दे सकें।

ये परमेश्वर की पुरानी ख़्वाहिश है,

जिसका उसने इंतज़ार किया,

हर चीज़ की उत्पत्ति से, उत्पत्ति से, उत्पत्ति से।

IV

ऐसे लोग जो उसको पूजने में, उसकी गवाही में समर्थ हैं,

वही उसके हमराज़ हैं।

परमेश्वर हासिल करना चाहता है उन्हें,

जो लोग शैतान के बंधन में नहीं हैं,

जो लोग परमेश्वर की गवाही दे सकें।

ये परमेश्वर की पुरानी ख़्वाहिश है,

जिसका उसने इंतज़ार किया,

हर चीज़ की उत्पत्ति से, उत्पत्ति से, उत्पत्ति से।

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