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स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III

परमेश्वर का अधिकार (II)

आज हम "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है" के विषय पर अपनी संगति को जारी रखेंगे। हम पहले से ही इस विषय पर दो संगतियाँ कर चुके हैं, जिसमें पहली परमेश्वर के अधिकार से सम्बन्धित थी, और दूसरी परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव से सम्बन्धित थी। इन दोनों संगतियों को सुनने के पश्चात्, क्या तुम लोगों ने परमेश्वर की पहचान, हैसियत, और सार की नई समझ प्राप्त की है? क्या इन अन्तर्दृष्टियों ने परमेश्वर के अस्तित्व की सच्चाई का और अधिक ठोस ज्ञान और निश्चितता प्राप्त करने में तुम लोगों की सहायता की है? आज मेरी योजना "परमेश्वर के अधिकार" शीर्षक पर विस्तार से बात करने की है।

दीर्घ-और सूक्ष्म-परिप्रेक्ष्य से परमेश्वर के अधिकार को समझना

परमेश्वर का अधिकार अद्वितीय है। यह स्वयं परमेश्वर की पहचान की विलक्षण अभिव्यक्ति तथा विशिष्ट सार है। कोई सृजित किया गया या सृजित नहीं किया गया प्राणी ऐसी विलक्षण अभिव्यक्ति और ऐसे सार को धारण नहीं करता है; अर्थात्, केवल सृजनकर्ता ही इस प्रकार के अधिकार को धारण करता है। अर्थात, केवल सृजनकर्ता—अद्वितीय परमेश्वर—ही इस तरह से अभिव्यक्त होता है और उसका यही सार है। परमेश्वर के अधिकार के बारे में बात क्यों करें? स्वयं परमेश्वर का अधिकार मनुष्य के मन में अधिकार से किस प्रकार भिन्न है? इसके बारे में विशेष क्या है? क्यों इसके बारे में यहाँ बात करना विशेष रूप से महत्वपूर्ण है? तुम लोगों में से प्रत्येक को सावधानीपूर्वक इस मुद्दे पर अवश्य ध्यान देना चाहिए? क्योंकि अधिकांश लोगों के लिए, "परमेश्वर का अधिकार" एक अस्पष्ट सोच है, एक ऐसी सोच है जिसे किसी के दिमाग में बैठाना बहुत ही कठिन है, और इसके बारे में कोई चर्चा कदाचित अस्पष्ट हो सकती है। इसलिए परमेश्वर के अधिकार के ज्ञान जिसे धारण करने में मनुष्य समर्थ है और परमेश्वर के अधिकार के सार के बीच सर्वदा एक अन्तर होगा। इस अन्तर को भरने के लिए, किसी को भी वास्तविक-जीवन के लोगों, घटनाओं, चीज़ों, या उन घटनाओं की सहायता से जो मनुष्य की पहुँच के भीतर है, जिन्हें समझने में मनुष्य समर्थ हैं, धीरे-धीरे परमेश्वर के अधिकार को अवश्य जान लेना चाहिए। यद्यपि यह वाक्यांश "परमेश्वर का अधिकार" अथाह प्रतीत हो सकता है, फिर भी परमेश्वर का अधिकार बिल्कुल भी काल्पनिक नहीं है। वह मनुष्य के जीवन के प्रत्येक क्षण में उसके साथ है, और प्रतिदिन उसकी अगुआई करता है। इसलिए, हर मनुष्य दिन-प्रति-दिन के अपने जीवन में आवश्यक रूप से परमेश्वर के अधिकार के अत्यंत साकार पहलू को देखेगा और अनुभव करेगा। यह साकारता इस बात का पर्याप्त प्रमाण है कि परमेश्वर का अधिकार असलियत में मौज़ूद है, और यह किसी भी व्यक्ति को इस तथ्य को पहचानने और समझने की अनुमति देता है कि परमेश्वर इस अधिकार को धारण करता है।

परमेश्वर ने हर चीज़ का सृजन किया, और इसका सृजन करने के बाद, सभी चीज़ों पर उसका प्रभुत्व है। सभी चीज़ों के ऊपर प्रभुत्व रखने के अतिरिक्त, वह हर एक चीज़ को नियन्त्रण में रखता है। यह विचार कि "परमेश्वर हर एक चीज़ को नियन्त्रण में रखता है" इसका अर्थ क्या है? इसकी व्याख्या कैसे की जा सकती है? यह वास्तविक जीवन में किस प्रकार लागू होता है? इस सत्य को समझने के द्वारा कि "परमेश्वर हर एक चीज़ को नियन्त्रण में रखता है" तुम लोग परमेश्वर के अधिकार को कैसे जान सकते हो? "परमेश्वर हर एक चीज़ को नियन्त्रण में रखता है" इस वाक्यांश से हमें देखना चाहिए कि जो कुछ परमेश्वर नियन्त्रित करता है वह ग्रहों का एक भाग, और सृष्टि का एक भाग नहीं है, मनुष्यजाति का एक भाग तो बिलकुल नहीं है, बल्कि हर एक चीज़ है: अति विशाल से लेकर अति सूक्ष्म तक, दृश्य से लेकर अदृश्य तक, ब्रह्माण्ड के सितारों से लेकर पृथ्वी की जीवित चीज़ों तक, और साथ ही अति सूक्ष्मजीवों, जिन्हें नंगी आँखों से देखा नहीं जा सकता है या ऐसे प्राणियों तक जो अन्य रूपों में मौज़ूद हैं। यह "हर एक चीज़" की सही परिभाषा है जिसे परमेश्वर "नियन्त्रण में रखता है," और यह वह दायरा है जिसके ऊपर परमेश्वर अपने अधिकार का उपयोग करता है, और यह उसकी संप्रभुता और उसके शासन का विस्तार है।

मानवजाति के अस्तित्व में आने से पहले, ब्रह्माण्ड—सभी ग्रह, आकाश के सभी सितारे—पहले से ही अस्तित्व में थे। बृहद स्तर पर, ये खगोलीय पिंड, अपने सम्पूर्ण अस्तित्व के लिए, परमेश्वर के नियन्त्रण के अधीन नियमित रूप से अपनी कक्षा में परिक्रमा करते रहे हैं, चाहे इसमें कितने ही वर्ष लगते हों। कौन सा ग्रह कौन से निश्चित समय में कहाँ जाता है; कौन सा ग्रह कौन सा कार्य करता है, और कब करता है; कौन सा ग्रह कौन सी कक्षा में चक्कर लगाता है, और वह कब अदृश्य हो जाता है या बदल दिया जाता है—ये सभी चीज़ें जरा सी भी ग़लती के बिना आगे बढ़ती रहती हैं। ग्रहों की स्थितियाँ और उनके बीच की दूरियाँ सभी सख्त तरतीब का अनुसरण करती हैं, उन में से सभी का सटीक आँकड़ों के द्वारा वर्णन किया जा सकता है; वे पथ जिस पर वे यात्रा करते हैं, उनकी कक्षाओं में परिभ्रमण की उनकी गति और तरतीब, वे समय जब वे विभिन्न स्थितियों में होते हैं, उन्हें विशेष नियमों के द्वारा परिमाणित किया जा सकता है और उनकी व्याख्या की जा सकती है। युगों से ग्रहों ने इन नियमों का पालन किया है, और ज़रा सा भी विचलन नहीं किया है। कोई भी शक्ति उनकी कक्षाओं या साँचों को नहीं बदल सकती है या उनको बाधित नहीं कर सकती है जिनका वे अनुसरण करते हैं। क्योंकि वे विशेष नियम जो उनकी गति को नियन्त्रित करते हैं और वह सटीक आँकड़े जो उनका वर्णन करते हैं उन्हें सृजनकर्ता के अधिकार के द्वारा पूर्वनियत किया जाता है, वे सृजनकर्ता की संप्रभुता और नियन्त्रण के अधीन इन नियमों का पालन स्वयं ही करते हैं। बृहद स्तर पर, कुछ साँचों, कुछ आँकड़ों, और साथ ही कुछ अजीब और अवर्णनीय नियमों या घटनाओं का पता लगाना मनुष्य के लिए कठिन नहीं है। यद्यपि मानवजाति यह नहीं मानती है कि परमेश्वर अस्तित्व में है, इस तथ्य को स्वीकार नहीं करती है कि सृजनकर्ता ने हर एक चीज़ को बनाया है और व‍ह हर चीज़ पर प्रभुत्व रखता है, और इसके अतिरिक्त सृजनकर्ता के अधिकार के अस्तित्व को नहीं पहचानती है, फिर भी मानव-विज्ञानी, खगोलशास्त्री, और भौतिक-विज्ञानी उत्तरोत्तर अधिक खोज कर रहे हैं कि इस विश्व में सभी चीज़ों का अस्तित्व, और वे सिद्धान्त और साँचे जो उनकी गतिविधियों को आदेश देते हैं, उन सभी पर एक विशाल और अदृश्य अंधकारमय ऊर्जा के द्वारा शासन और नियंत्रण किया जाता है। यह तथ्य मनुष्य को बाध्य करता है कि वह इस बात का सामना करे और स्वीकार करे कि इन गतियों के तरतीबों के बीच एकमात्र शक्तिशाली परमेश्वर ही है, जो हर एक चीज़ का आयोजन करता है। उसका सामर्थ्य असाधारण है, और यद्यपि उसके असली चेहरे को कोई नहीं देख सकता है, फिर भी वह हर क्षण हर एक चीज़ पर शासन और नियन्त्रण करता है। कोई भी व्यक्ति या ताक़त उसकी संप्रभुता से परे नहीं जा सकती है। इस सत्य का सामना करते हुए, मनुष्य को यह अवश्य पहचानना चाहिए कि वे नियम जो सभी चीज़ों के अस्तित्व पर शासन करते हैं उन्हें मनुष्यों के द्वारा नियन्त्रित नहीं किया जा सकता है, किसी के द्वारा बदला नहीं जा सकता है; और साथ ही स्वीकार अवश्य करना चाहिए कि मानवजाति इन नियमों को पूरी तरह से नहीं समझ सकती है। और वे प्राकृतिक रूप से घटित होने वाली नहीं हैं, बल्कि एक प्रभु और स्वामी के द्वारा आदेशित की जाती हैं। ये सब परमेश्वर के अधिकार की अभिव्यक्तियाँ हैं जिन्हें बृहद स्तर पर मनुष्यजाति महसूस कर सकती है।

सूक्ष्म स्तर पर, सभी पहाड़ियाँ, नदियाँ, झीलें, समुद्र और भू-भाग जिन्हें मनुष्य पृथ्वी पर देखता है, सभी मौसम जिनका वह अनुभव करता है, सभी चीज़ें जो पृथ्वी पर पाई जाती हैं, जिनमें पेड़-पौधे, जानवर, सूक्ष्मजीव और मनुष्य शामिल हैं, ये सभी परमेश्वर की संप्रभुता के अधीन हैं, और परमेश्वर के द्वारा नियन्त्रित किए जाते हैं। परमेश्वर की संप्रभुता और नियन्त्रण के अधीन, सभी चीज़ें उसके विचारों के अनुरूप अस्तित्व में आती हैं या अदृश्य हो जाती हैं, उन सब के जीवन कुछ नियमों द्वारा शासित होते हैं, और वे उनके साथ बने रहते हुए बढ़ते हैं और बहुगुणित होते हैं। कोई भी मनुष्य या चीज़ इन नियमों के ऊपर नहीं है। ऐसा क्यों है? इसका एकमात्र उत्तर है, परमेश्वर के अधिकार के कारण। या, दूसरे शब्दों में, तो परमेश्वर के विचारों और परमेश्वर के वचनों के कारण; क्योंकि स्वयं परमेश्वर यह सब करता है। अर्थात्, यह परमेश्वर का अधिकार और परमेश्वर का मन है जो इन नियमों को उत्पन्न करता है; ये उसके विचार के अनुसार स्थानांतरित होंगे एवं बदलेंगे, और ये सभी स्थानांतरण और बदलाव उसकी योजना के वास्ते घटित होंगे और गायब होंगे। उदाहरण के लिए, महामारियों को ही लें। वे बिना चेतावनी दिए अचानक शुरू हो जाती हैं, कोई भी उनके उद्भव को या सही कारणों को नहीं जानता है कि वे क्यों होती हैं, और जब कभी भी कोई महामारी किसी निश्चित स्थान पर आती है, तो ऐसे लोग जो अभागे होते हैं वे विपत्ति से बच नहीं सकते हैं। मानव विज्ञान समझता है कि महामारियाँ ख़तरनाक या हानिकारक सूक्ष्म रोगाणुओं के फैलने के द्वारा उत्पन्न होती हैं, और उनकी गति, दायरे, और प्रसारण के तरीके का पूर्वानुमान या नियन्त्रण मानव विज्ञान के द्वारा नहीं किया जा सकता है। यद्यपि मानवजाति हर सम्भव तरीके से उनका प्रतिरोध करती है, फिर भी वे इस बात को नियंत्रित नहीं कर सकती है कि महामारियाँ अचानक आने पर कौन से लोग और पशु अपरिहार्य रूप से प्रभावित होते हैं। एकमात्र चीज़ जिसे मानवजाति कर सकती है वह है उनकी रोकथाम करने का प्रयास करना, उनका सामना करना, और उन पर शोध करना। परन्तु कोई भी उस मूल कारण को नहीं जानता है जो किसी विशिष्ट महामारी के आरम्भ और अंत का वर्णन करता है, और कोई उन्हें नियन्त्रित नहीं कर सकता है। किसी महामारी के उदय और फैलाव का सामना करते समय, पहला उपाय जो मनुष्य करते हैं वह है कोई टीका विकसित करना, परन्तु कई बार टीके के तैयार होने से पहले ही वह महामारी अपने आप ही ख़त्म हो जाती है। क्यों महामारियाँ समाप्त हो जाती हैं? कुछ लोग कहते हैं कि रोगाणुओं को नियन्त्रण में लाया जा चुका है, अन्य लोग कहते हैं कि ऋतुओं में बदलावों के कारण वे समाप्त हो जाती हैं...। जहाँ तक यह बात है कि ये बेबुनियाद अटकलबाज़ियाँ विश्वास-योग्य हैं या नहीं, विज्ञान कोई स्पष्टीकरण प्रस्तुत नहीं कर सकता है, और कोई सटीक उत्तर नहीं दे सकता है। जिसका मानवजाति सामना करती है वह न केवल ये अटकलबाज़ियाँ हैं बल्कि महामारियों के बारे में मानवजाति की समझ की कमी और उसका भय है। अंतिम विश्लेषणों में कोई नहीं जानता है, कि क्यों ये महामारियाँ शुरू होती हैं या क्यों वे समाप्त हो जाती हैं। क्योंकि मानवजाति का विश्वास केवल विज्ञान में है, वह पूरी तरह से इस पर ही आश्रित है, किन्तु वह सृजनकर्ता के अधिकार को नहीं पहचानती है या उसकी संप्रभुता को स्वीकार नहीं करती है, इसलिए उसके पास कभी कोई उत्तर नहीं होगा।

परमेश्वर की संप्रभुता के अधीन, उसके अधिकार के कारण, और उसके प्रबन्धन के कारण, सभी चीज़ें अस्तित्व में आती हैं और नष्ट हो जाती हैं। कुछ चीज़ें चुपके से आती हैं और चली जाती हैं, और मनुष्य नहीं बता सकता है कि वे कहाँ से आई थीं या उन नियमों का आभास नहीं कर सकता है जिनका वे अनुसरण करती हैं, और वह उन कारणों को तो बिलकुल नहीं समझ सकता है कि क्यों वे आती हैं और चली जाती हैं। यद्यपि मनुष्य वह सब कुछ देख, सुन, या अनुभव कर सकता है जो सभी चीज़ों के बीच घटित होती हैं; यद्यपि इन सब का मनुष्य पर असर पड़ता है, और यद्यपि मनुष्य अवचेतन रूप से असाधारणता, नियमितता, या विभिन्न घटनाओं की विचित्रता का आभास करता है, तब भी वह सृजनकर्ता की इच्छा और उसके मन के बारे में कुछ नहीं जानता है जो उनके पीछे होता है। उनके पीछे अनेक कहानियाँ हैं, और अनेक छिपी हुई सच्चाईयाँ हैं। क्योंकि मनुष्य सृजनकर्ता से दूर भटक गया है, क्योंकि वह इस तथ्य को नहीं स्वीकार करता है कि सृजनकर्ता का अधिकार सभी चीज़ों पर शासन करता है, इसलिए वह उस हर एक चीज़ को कभी नहीं जानेगा और समझेगा जो उसकी संप्रभुता के अधीन होती है। क्योंकि अधिकांश भागों में, परमेश्वर का नियन्त्रण और संप्रभुता मानवीय कल्पना, मानवीय ज्ञान, मानवीय समझ, और जो कुछ मानव-विज्ञान प्राप्त कर सकता है उन सीमाओं से बहुत बढ़ कर है, इसलिए सृजन की गई मानवजाति की क्षमताएँ इससे प्रतिस्पर्धा नहीं कर सकती हैं। कुछ लोग कहते हैं, "चूँकि तुमने स्वयं परमेश्वर की संप्रभुता नहीं देखी है, तो तुम कैसे विश्वास कर सकते हो कि हर एक चीज़ उसके अधिकार के अधीन है?" देखना हमेशा विश्वास करना नहीं होता है; देखना हमेशा पहचानना या समझना नहीं होता है। तो विश्वास कहाँ से आता है? मैं यकीन के साथ कह सकता हूँ कि, "विश्वास चीज़ों की वास्तविकता और मूल कारणों के बारे में लोगों की समझ, और अनुभव की मात्रा और गहराई से आता है।" यदि तुम विश्वास करते हो कि परमेश्वर का अस्तित्व है, किन्तु तुम पहचान नहीं सकते हो, और सभी चीज़ों के ऊपर परमेश्वर के नियन्त्रण और परमेश्वर की संप्रभुता का तो बिलकुल एहसास नहीं करते हो, तो तुम अपने हृदय में यह कभी स्वीकार नहीं करोगे कि परमेश्वर के पास ऐसा अधिकार है और यह कि परमेश्वर का अधिकार अद्वितीय है। तुम कभी भी सृजनकर्ता को अपना प्रभु, अपना परमेश्वर स्वीकार नहीं करोगे।

मानवजाति का भाग्य और विश्व का भाग्य सृजनकर्ता की संप्रभुता से अविभाज्य हैं

तुम सब लोग वयस्क हो। तुम लोगों में से कुछ अधेड़-उम्र के हैं; कुछ लोग वृद्धावस्था में प्रवेश कर चुके हैं। एक अविश्वासी से लेकर विश्वासी तक, और परमेश्वर में विश्वास करने की शुरुआत से लेकर परमेश्वर के वचन को ग्रहण करने और परमेश्वर के कार्यों का अनुभव करने तक, तुम लोगों को परमेश्वर की संप्रभुता का कितना ज्ञान है? तुम लोगों को मनुष्य के भाग्य के भीतर कौन सी अंतर्दृष्टियाँ मिली हैं? क्या एक व्यक्ति हर उस चीज़ को प्राप्त कर सकता है जिसकी वह जीवन में इच्छा करता है? लोगों के अस्तित्व के कुछ दशकों के दौरान कितनी चीज़ें हैं जिन्हें जैसा तुम लोग चाहते थे उसके अनुसार तुम लोग पूरा करने में सक्षम रहे हो? जैसी अपेक्षा की गई थी उसके अनुसार कितनी चीज़ें घटित नहीं होती हैं? कितनी चीज़ें सुखद आश्चर्यों के रूप में आती हैं? कितनी चीज़ें हैं जिनके परिणाम आने की तुम लोग अभी भी प्रतीक्षा कर रहे हो—अवचेतन रूप से सही पल की प्रतीक्षा कर रहे हो, और स्वर्ग की इच्छा की प्रतीक्षा कर रहे हो? कितनी ही चीज़ें लोगों को असहाय और कुंठित महसूस कराती हैं? सभी अपने भाग्य के बारे में आशाओं से भरपूर हैं, और अनुमान लगाते हैं कि उनकी ज़िन्दगी में हर एक चीज़ वैसी ही होगी जैसा वे चाहते हैं, कि उनके पास भोजन या वस्त्रों का अभाव नहीं होगा, और उनका भाग्य आलीशान ढंग से उदित होगा। कोई भी ऐसा जीवन नहीं चाहता है जो दरिद्र और कुचला हुआ हो, कठिनाईयों से भरा हो, आपदाओं से घिरा हुआ हो। परन्तु लोग इन चीज़ों को पहले से नहीं देख सकते हैं या नियन्त्रित नहीं कर सकते हैं। कदाचित् कुछ लोगों के लिए, अतीत बस अनुभवों का घालमेल है; वे कभी नहीं सीखते हैं कि स्वर्ग की इच्छा क्या है, और न ही वे इसकी परवाह करते हैं कि यह क्या है। वे बिना सोचे समझे, जानवरों के समान, दिन प्रति दिन जीते हुए अपनी ज़िन्दगियों को बिताते हैं, इस बारे में परवाह नहीं करते हैं कि मानवजाति का भाग्य क्या है, मानव क्यों जीवित हैं या उन्हें किस प्रकार जीवन जीना चाहिए। ये लोग मनुष्य के भाग्य के बारे में कोई समझ प्राप्त किए बिना ही वृद्धावस्था में पहुँच जाते हैं, और उनके मरने की घड़ी तक उनके पास कोई विचार नहीं होता है कि जीवन किस बारे में है। ऐसे लोग मरे हुए हैं; वे ऐसे प्राणी है जिनमें आत्मा नहीं है; वे जानवर हैं। यद्यपि सभी चीज़ों के बीच जीवन बिताते हुए, लोग उन अनेक तरीकों से आनन्द पा लेते हैं जिनसे संसार अपनी भौतक आवश्यकताओं को संतुष्ट करता है, यद्यपि वे इस भौतिक संसार को निरन्तर बढ़ते हुए देखते हैं, फिर भी उनके स्वयं के अनुभव—जो कुछ उनका हृदय और उनकी आत्मा महसूस और अनुभव करती है—का भौतिक चीज़ों के साथ कोई लेना-देना नहीं है, और कोई भी पदार्थ उसका स्थान नहीं ले सकता है। यह एक पहचान है जो किसी व्यक्ति के हृदय की गहराई में होती है, ऐसी चीज़ जिसे नग्न आँखों से नहीं देखा जा सकता है। यह पहचान मनुष्य के जीवन और मनुष्य के भाग्य के बारे में उसकी समझ, और उसकी भावनाओं में निहित होती है। और यह प्रायः किसी व्यक्ति को इस बात की समझ की ओर ले जाती है कि एक अनदेखा स्वामी इन सभी चीज़ों को व्यवस्थित कर रहा है, और मनुष्य के लिए हर एक चीज़ का आयोजन कर रहा है। इन सबके बीच, कोई व्यक्ति भाग्य की व्यवस्थाओं और आयोजनों को स्वीकार करने के अलावा और कुछ नहीं कर सकता है; साथ ही, वह उस आगे के पथ को जिसे सृजनकर्ता ने तैयार किया है, और उसके भाग्य के ऊपर सृजनकर्ता की संप्रभुता को स्वीकार करने के अलावा कुछ नहीं कर सकता है। यह एक निर्विवाद सत्य है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि भाग्य के बारे में कोई क्या अन्तर्दृष्टि और प्रवृत्ति रखता है, कोई भी इस तथ्य को बदल नहीं सकता है।

तुम प्रतिदिन कहाँ जाओगे, तुम क्या करोगे, तुम किस व्यक्ति का या चीज़ का सामना करोगे, तुम क्या कहोगे, तुम्हारे साथ क्या होगा—क्या इसमें से किसी की भी भविष्यवाणी की जा सकती है? लोग इन सभी घटनाओं को पहले से नहीं देख सकते हैं, और जिस प्रकार वे विकसित होती हैं उसको तो बिलकुल भी नियन्त्रित नहीं कर सकते हैं। जीवन में, पहले से देखी न जा सकने वाली ये घटनाएँ हर समय घटित होती हैं, और ये प्रतिदिन घटित होने वाली घटनाएँ हैं। ये दैनिक उतार-चढ़ाव और तरीके जिन्हें वे प्रकट करते हैं, या ऐसे तरीके जिनके द्वारा वे घटित होते हैं, मानवजाति के लिए निरन्तर अनुस्मारक हैं कि कुछ भी बस यूँ ही नहीं होता है, यह कि विकास का मार्ग जो ये चीज़ें अपनाती हैं उसे, और उनकी अनिवार्यता को मनुष्य की इच्छा के द्वारा बदला नहीं जा सकता है। हर घटना सृजनकर्ता की ओर से मनुष्यजाति को दी गई झिड़की को सूचित करती है, और यह सन्देश भी देती है कि मानवजाति अपने भाग्य को नियन्त्रित नहीं कर सकती है, साथ ही हर घटना मानवजाति की अपने भाग्य को अपने हाथों में लेने की निराधार, व्यर्थ महत्वाकांक्षा और इच्छा का खण्डन है। ये मानव जाति के कान के पास एक के बाद एक मारे गए जोरदार थप्पड़ों के समान हैं, जो लोगों को पुनर्विचार करने के लिए बाध्य करती हैं कि अंत में कौन उनके भाग्य पर शासन और नियन्त्रण करता है। और जब मनुष्य की महत्वाकांक्षाएँ और इच्छाएँ लगातार नाकाम और ध्वस्त होती हैं, तो वे स्वाभाविक रूप से उस चीज़ के लिए एक अचैतन्य स्वीकृति पर आ जाते हैं जो भाग्य ने भण्डार में रखा है, और स्वर्ग की इच्छा और सृजनकर्ता की संप्रभुता की वास्तविकता की स्वीकृति पर आ जाते हैं। सम्पूर्ण मानवजीवन के भाग्य के इन दैनिक उतार-चढ़ावों से, ऐसा कुछ भी नहीं है जो सृजनकर्ता की योजना और उसकी संप्रभुता को प्रकट नहीं करता हो; ऐसा कुछ भी नहीं है जो यह सन्देश नहीं देता हो कि "सृजनकर्ता के अधिकार से आगे बढ़ा नहीं जा सकता है," जो इस शाश्वत सत्य को सूचित नहीं करता हो कि "सृजनकर्ता का अधिकार ही सर्वोच्च है।"

मानवजाति और विश्व के भाग्य सृजनकर्ता की संप्रभुता के साथ घनिष्ठता से गुँथे हुए हैं, और सृजनकर्ता के आयोजनों के साथ अविभाज्य रूप से बँधे हुए हैं; अंत में, उन्हें सृजनकर्ता के अधिकार से धुनकर अलग नहीं किया जा सकता है। सभी चीज़ों के नियमों के माध्यम से सृजनकर्ता के आयोजन और उसकी संप्रभुता मनुष्य की समझ में आते हैं; जीवित बचे रहने के नियमों के माध्यम से वह सृजनकर्ता के शासन का एहसास करता है; सभी चीज़ों के भाग्य से वह उन तरीकों के बारे में निष्कर्ष निकालता है जिनसे सृजनकर्ता अपनी संप्रभुता का उपयोग करता है और उन पर नियन्त्रण करता है; और मानवजाति और सभी चीज़ों के जीवन चक्रों में मनुष्य सचमुच में सभी चीज़ों और जीवित प्राणियों के लिए सृजनकर्ता के आयोजनों और व्यवस्थाओं का अनुभव करता है और सचमुच में इस बात को देखता है कि किस प्रकार वे आयोजन और व्यवस्थाएँ सभी पार्थिव कानूनों, नियमों, और संस्थानों, तथा अन्य सभी शक्तियों और ताक़तों का स्थान ले लेती हैं। इसके आलोक में, मानवजाति यह पहचानने के लिए बाध्य हो जाती है कि किसी भी सृजित किए गए प्राणी के द्वारा सृजनकर्ता की संप्रभुता का उल्लंघन नहीं किया जा सकता है, यह कि सृजनकर्ता के द्वारा पूर्वनियत की गई घटनाओं और चीज़ों के साथ कोई भी शक्ति हस्तक्षेप नहीं कर सकती है या उन्हें बदल नहीं सकती है। यह इन अलौकिक कानूनों और नियमों के अधीन है कि मनुष्य और सभी चीज़ें पीढ़ी दर पीढ़ी जीवन बिताती हैं और बढ़ती हैं। क्या यह सृजनकर्ता के अधिकार का असली मूर्तरूप नहीं है? यद्यपि मनुष्य, वस्तुगत नियमों में, सभी घटनाओं और सभी चीज़ों के लिए सृजनकर्ता की संप्रभुता और उसके विधान को देखता है, फिर भी कितने लोग विश्व के ऊपर सृजनकर्ता की संप्रभुता के सिद्धान्तों को समझ पाते हैं? कितने लोग सचमुच में अपने स्वयं के भाग्य के ऊपर सृजनकर्ता की संप्रभुता और व्यवस्था को जान, पहचान, और स्वीकार कर सकते हैं, और उसके प्रति समर्पण कर सकते हैं? कौन, सभी चीज़ों के ऊपर सृजनकर्ता की संप्रभुता के सत्य पर विश्वास करने के बाद, सचमुच में विश्वास करेगा और पहचानेगा कि सृजनकर्ता मानव जीवन के भाग्य को भी निर्धारित करता है? कौन सचमुच में इस तथ्य को समझ सकता है कि मनुष्य का भाग्य सृजनकर्ता की हथेली में रहता है? जब इस सत्य से सामना होता है कि वह मानवजाति के भाग्य पर शासन और नियन्त्रण करता है, तो मानवजाति को सृजनकर्ता की संप्रभुता के प्रति किस प्रकार की प्रवृत्ति अपनानी चाहिए, यह एक ऐसा निर्णय है जिसे हर एक मनुष्य को अपने लिए अवश्य लेना चाहिए जिसका अब इस सत्य से सामना होता है।

मानव जीवन में छह मोड़

अपने जीवन के मार्ग में, हर एक व्यक्ति महत्वपूर्ण मोड़ों की एक श्रृंखला पर पहुँचता है। ये अत्यधिक बुनियादी, और अति महत्वपूर्ण कदम हैं जो जीवन में किसी व्यक्ति के भाग्य को निर्धारित करते हैं। जो कुछ आगे दिया गया है वह इन मील के पत्थरों का एक संक्षिप्त विवरण है जिनसे होकर हर एक व्यक्ति को अपने जीवन के मार्ग में गुज़रना होगा।

जन्म: पहला मोड़

किसी व्यक्ति का कहाँ जन्म होता है, वह किस परिवार में जन्म लेता या लेती है, उसका लिंग, रंग-रूप, जन्म का समय: ये किसी व्यक्ति के जीवन के प्रथम मोड़ के विवरण हैं।

इस मोड़ पर इन भागों के बारे में किसी के भी पास कोई विकल्प नहीं होता है; उन सभी को सृजनकर्ता के द्वारा बहुत पहले अग्रमि में ही पूर्वनियत कर दिया जाता है। ये किसी भी तरह से बाहरी वातावरण के द्वारा प्रभावित नहीं होते हैं, और कोई भी मानव-निर्मित कारक इन तथ्यों को बदल नहीं सकते हैं जिन्हें सृजनकर्ता ने पूर्वनियत किया है। क्योंकि किसी व्यक्ति के पैदा होने का अर्थ है कि सृजनकर्ता ने पहले से ही उस भाग्य के पहले कदम को पूरा कर लिया है जिसे उसने उस व्यक्ति के लिए व्यवस्थित किया है। क्योंकि उसने इन सभी विवरणों को बहुत पहले ही अग्रिम में पूर्वनिर्धारित कर दिया है, इसलिए किसी में भी उनमें से किसी को भी बदलने की ताक़त नहीं है। किसी व्यक्ति का बाद का भाग्य चाहे जो भी हो, उसके जन्म की स्थितियाँ पूर्वनियत होती हैं, और जैसी हैं वैसी ही बनी रहती हैं; वे जीवन में उसके भाग्य के द्वारा किसी भी तरह से प्रभावित नहीं होती हैं, और न ही वे किसी भी तरह से उसके ऊपर सृजनकर्ता की संप्रभुता पर असर डालती हैं।

1. सृजनकर्ता की योजनाओं से एक नए जीवन की उत्पत्ति होती है

कोई व्यक्ति प्रथम मोड़ के—अपने जन्म स्थान, अपने परिवार, अपने लिंग, अपने शारीरिक रंग-रूप, अपने जन्म के समय—अंशों में से किसे चुनने में समर्थ है? स्पष्ट रूप से, किसी व्यक्ति का जन्म एक निष्क्रिय घटना है: वह अस्वैच्छिक रूप से, किसी निश्चित स्थान में, किसी निश्चित समय में, किसी निश्चित परिवार में, और किसी निश्चित शारीरिक रंग-रूप के साथ जन्म लेता है; वह अस्वैच्छिक रूप से किसी निश्चित परिवार का सदस्य बन जाता है, और किसी निश्चित वंश-वृक्ष का उत्तराधिकारी होता है। जीवन के इस प्रथम मोड़ में किसी व्यक्ति के पास कोई विकल्प नहीं होता है, किन्तु वह एक ऐसे परिवेश में जो सृजनकर्ता की योजना के अनुसार नियत होता है, एक विशेष परिवार में, एक विशेष लिंग एवं रंग-रूप के साथ, और एक विशेष समय पर जन्म लेता है जो घनिष्ठ रूप से उसके जीवन के पथ से जुड़ा होता है। इस महत्वपूर्ण मोड़ पर कोई व्यक्ति क्या कर सकता है? सभी ने कहा है, किसी मनुष्य के पास उसके जन्म से सम्बन्धित इन विवरणों में से किसी एक के बारे में भी कोई विकल्प नहीं है। यदि सृजनकर्ता द्वारा पूर्वनियत और मार्गदर्शित नहीं होता, तो इस संसार में नवजात नहीं जानता कि कहाँ जाना है या कहाँ रहना है, उसके पास कोई रिश्ते नहीं होते, वह किसी से सम्बन्धित नहीं होता, और उसका कोई वास्तविक घर नहीं होता। किन्तु सृजनकर्ता की अत्यंत सतर्क व्यवस्थाओं की वजह से, वह रहने के लिए एक स्थान, माता-पिता, एक स्थान जिससे वह सम्बन्धित होता है, और रिश्तेदारों के साथ, अपने जीवन की यात्रा का आरम्भ करता है। इस प्रक्रिया के माध्यम से, इस नए जीवन का आगमन सृजनकर्ता की योजनाओं के द्वारा निर्धारित किया जाता है, और हर एक चीज़ जिसे वह धारण करेगा वह उसे सृजनकर्ता के द्वारा प्रदान की जाएगी। स्वतन्त्र रूप से तैरती हुई एक नगण्‍य देह से, धीरे-धीरे मांस-और-लहू की परमेश्वर की एक रचना, एक दृश्यमान, साकार मानव तैयार हो जाता है, जो सोचता, साँस लेता, और गर्माहट और ठण्ड का एहसास करता है, जो भौतिक संसार में सृजित किए गए प्राणियों के सभी सामान्य क्रियाकलापों में भाग ले सकता है, और जो उन सभी हालातों से होकर गुज़रेगी जिनका अनुभव सृजित किए गए मानव को जीवन में करना होगा। सृजनकर्ता के द्वारा किसी व्यक्ति के जन्म के पूर्वनिर्धारण का अर्थ है कि वह उस व्यक्ति को जीवित बचे रहने के लिए आवश्यक सभी चीज़ें प्रदान करेगा; और यह कि उसी प्रकार किसी व्यक्ति के जन्म लेने का अर्थ है कि वह जीवित बचे रहने के लिए आवश्यक सभी चीज़ों को सृजनकर्ता के द्वारा प्राप्त करेगा या करेगी, यह कि इस बिन्दु के आगे वह, सृजनकर्ता के द्वारा प्रदान किए गए और सृजनकर्ता की संप्रभुता के अधीन, किसी अन्य रूप में जीवन बिताएगा या बिताएगी।

2. क्यों भिन्न-भिन्न मनुष्य भिन्न-भिन्न परिस्थितियों के अधीन जन्म लेते हैं

लोग प्रायः यह कल्पना करना पसंद करते हैं कि यदि वे फिर से जन्म लेते, तो किसी प्रसिद्ध परिवार में जन्म लेते; यदि वे महिला होते, तो वे शुद्ध गोरे रंग के समान दिखते और हर एक के द्वारा प्रेम किए जाते, और यदि वे पुरुष होते, तो वे सुन्दर राजकुमार होते, उन्हें कोई अभाव नहीं होता, और पूरा संसार उनके आदेशों का पालन करने के लिए सदा तत्पर रहता। प्रायः ऐसे लोग हैं जो अपने जन्म के बारे में बहुत से भ्रमों के अधीन हैं और वे अक्सर इससे असंतुष्ट रहते हैं, और अपने परिवार, अपने रंग-रूप, अपने लिंग, और यहाँ तक कि अपने जन्म के समय से भी नाराज़ रहते हैं। फिर भी लोगों की समझ में कभी नहीं आता हैं कि क्यों उनका जन्म किसी विशिष्ट परिवार में हुआ है या क्यों वे किसी विशेष प्रकार के दिखते हैं। वे नहीं जानते हैं कि इस बात की परवाह किए बिना कि उन्होंने कहाँ जन्म लिया है या वे कैसे दिखाई देते हैं, उन्हें सृजनकर्ता के प्रबंधन में अनेक भूमिकाएँ निभानी हैं और भिन्न-भिन्न ध्येयों को पूरा करना है—यह उद्देश्य कभी नहीं बदलेगा। सृजनकर्ता की नज़रों में, वह स्थान जहाँ किसी व्यक्ति का जन्म होता है, उसका लिंग, उसका शारीरिक रंग-रूप, ये सभी अस्थायी चीज़ें हैं। ये संपूर्ण मनुष्यजाति के उसके प्रबंधन के प्रत्येक पहलू में अति सूक्ष्म बिन्दुओं, और छोटे-छोटे संकेतों की एक श्रृंखला है। और किसी व्यक्ति की वास्तविक मंज़िल और उसका अंत किसी विशेष चरण में उसके जन्म के द्वारा निर्धारित नहीं होते हैं, बल्कि उस ध्येय के द्वारा निर्धारित होते हैं जिसे वह प्रत्येक जीवन में पूरा करता है, उन पर सृजनकर्ता के न्याय के द्वारा निर्धारित होते हैं जब उसकी प्रबंधन योजना पूरी हो जाती है।

ऐसा कहा जाता है कि प्रत्येक प्रभाव का एक कारण होता है, यह कि कोई भी प्रभाव बिना कारण के नहीं होता है। और इसलिए किसी व्यक्ति का जीवन आवश्यक रूप से उसके वर्तमान जीवन और उसके पूर्ववर्ती जीवन दोनों से जुड़ा हुआ होता है। यदि किसी व्यक्ति की मृत्यु उसके जीवन की वर्तमान अवधि को समाप्त कर देती है, तो व्यक्ति का जन्म एक नए चक्र की शुरुआत है; यदि पुराना चक्र किसी व्यक्ति के पूर्ववर्ती जीवन को दर्शाता है, तो नया चक्र स्वाभाविक रूप से उसका वर्तमान जीवन है। चूँकि व्यक्ति का जन्म उसके पूर्ववर्ती जीवन और साथ ही उसके वर्तमान जीवन, स्थान, परिवार, लिंग, रंग-रूप, और इसी तरह के अन्य कारकों से जुड़ा हुआ है, जो उसके जन्म के साथ जुड़े हुए हैं, तो वे सभी आवश्यक रूप से उससे सम्बन्धित हैं। इसका अर्थ है कि किसी व्यक्ति के जीवन के कारक न केवल उसके पूर्ववर्ती जीवन के द्वारा प्रभावित होते हैं, बल्कि वर्तमान में उसकी नियति के द्वारा भी निर्धारित होते हैं। इससे अनेक प्रकार की भिन्न-भिन्न परिस्थितियों का पता चलता है जिनमें लोगों का जन्म होता है; कुछ लोग गरीब परिवारों में जन्म लेते हैं, अन्य अमीर परिवारों में जन्म लेते हैं। इसलिए कुछ लोग सामान्य कुटुम्ब से होते हैं, और अन्य लोगों की प्रसिद्ध वंशावलियाँ होती हैं। कुछ लोग दक्षिण दिशा में जन्म लेते हैं, और अन्य लोग उत्तर दिशा में जन्म लेते हैं। कुछ लोग रेगिस्तान में जन्म लेते हैं, और अन्य लोग हरी-भरी भूमि में जन्म लेते हैं। कुछ लोगों के जन्म के साथ-साथ उल्लास, हँसी और उत्सव आता है, और अन्य लोग आँसू, आपदा और दुःख लेकर आते हैं। कुछ लोगों का जन्म सँजोकर रखे जाने के लिए होता है, अन्य लोगों को जंगली खरपतवार की तरह अलग कर दिया जाता है। कुछ लोग सुन्दर मुखाकृति के साथ जन्म लेते हैं, और अन्य लोग कुरूपता के साथ। कुछ लोग दिखने में सुन्दर होते हैं, और अन्य लोग भद्दे होते हैं। कुछ लोग अर्धरात्रि में जन्म लेते हैं, और अन्य लोग दोपहर के सूर्य की चिलचिलाती धूप के नीचे पैदा होते हैं। ...सभी तबकों के लोगों के जन्म को उस भाग्य के द्वारा निर्धारित किया जाता है जो सृजनकर्ता ने उनके लिए संचित किया है; उनके जन्म, वर्तमान जीवन में उनके भाग्य और साथ ही उन भूमिकाओं को जिन्हें वे निभाएँगे और उस ध्येय को जिन्हें वे पूरा करेंगे, को निर्धारित करते हैं। यह सब कुछ सृजनकर्ता की संप्रभुता के अधीन है, उसके द्वारा पूर्वनियत है; कोई भी अपने पूर्वनियत भाग्य से बच कर नहीं जा सकता है, कोई भी अपने जन्म की परिस्थितियों को[क] बदल नहीं सकता है, और कोई भी अपने स्वयं के भाग्य को चुन नहीं सकता है।

बड़ा होना: दूसरा मोड़

इस बात पर निर्भर करते हुए कि उन्होंने किस प्रकार के परिवार में जन्म लिया है, लोग भिन्न-भिन्न पारिवारिक परिवेशों में बड़े होते हैं और अपने माता-पिता से भिन्न पाठ सीखते हैं। यह उन स्थितियों को निर्धारित करता है जिसमें कोई व्यक्ति वयस्क होता है, और बड़ा होना[ख] व्यक्ति के जीवन के दूसरे मोड़ को दर्शाता है। कहने की कोई आवश्यकता नहीं कि, इस मोड़ पर लोगों के पास कोई विकल्प नहीं होता है। यह भी नियत, और पूर्वनियोजित है।

1. जिन परिस्थितियों के अधीन कोई व्यक्ति बड़ा होता है वे सृजनकर्ता के द्वारा नियत की जाती हैं

कोई व्यक्ति ऐसे लोगों या कारकों का चुनाव नहीं कर सकता है जिनकी नसीहतों और प्रभाव के अधीन वह बड़ा होता या होती है। कोई यह चुनाव नहीं कर सकता है कि वह कौन सा ज्ञान या कौशल हासिल करता है, और वह कौन सी आदतें निर्मित करता है। इस पर किसी का कोई वश नहीं है कि कौन उसके माता-पिता और सगे सम्बन्धी हैं, वह किस प्रकार के परिवेश में बड़ा होता है; लोगों, घटनाओं, और अपने आस-पास की चीज़ों के साथ उसके रिश्‍ते, और वे किस प्रकार उसके विकास को प्रभावित करते हैं, ये सब उसके नियन्त्रण से परे है। तो, इन चीज़ों तो कौन तय करता है? कौन इनकी व्यवस्था करता है? चूँकि इस मामले में लोगों के पास कोई विकल्प नहीं होता है, चूँकि वे अपने लिए इन चीज़ों का निर्णय नहीं ले सकते हैं, और चूँकि वे स्वाभविक रूप से आकार नहीं लेती हैं, तो स्पष्ट है कि इन सब चीज़ों की रचना सृजनकर्ता के हाथों में है। कहने की कोई आवश्कता नहीं कि ठीक जैसे सृजनकर्ता हर एक व्यक्ति के जन्म की विशेष परिस्थितियों की व्यवस्था करता है, वैसे ही वह उन विशिष्ट परिस्थितियों की भी व्यवस्था करता है जिनमें कोई व्यक्ति बड़ा होता है। यदि किसी व्यक्ति का जन्म लोगों, घटनाओं, और उस के आस-पास की चीज़ों में परिवर्तन लाता है, तो उस व्यक्ति का बड़ा होना और उसका विकास आवश्यक रूप से उन्हें भी प्रभवित करेगा। उदाहरण के लिए, कुछ लोगों का जन्म गरीब परिवारों में होता है, किन्तु वे धन सम्पत्ति के साथ बड़े होते हैं; अन्य लोग समृद्ध परिवारों में जन्म लेते हैं किन्तु अपने परिवारों के सौभाग्य के पतन का इस तरह से कारण बनते हैं, कि वे गरीब परिवेश में बड़े होते हैं। किसी का भी जन्म नियत नियमों के द्वारा शासित नहीं होता है, और कोई भी व्यक्ति परिस्थतियों की अनिवार्य, नियत श्रृंखला के अधीन बड़ा नहीं होता है। ये ऐसी चीजें नहीं हैं जिनका कोई व्यक्ति अनुमान लगा सकता है या नियन्त्रण कर सकता है; ये उसके भाग्य के परिणाम हैं, और उसके भाग्य के द्वारा निर्धारित होते हैं। निस्संदेह, सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि उन्हें सृजनकर्ता के द्वारा किसी व्यक्ति के भाग्य के लिए पूर्वनियत किया जाता है, उन्हें उस व्यक्ति के भाग्य के ऊपर सृजनकर्ता की संप्रभुता के द्वारा, और उसके लिए उसकी योजनाओं के द्वारा, निर्धारित किया जाता है।

2. अनेक परिस्थितियाँ जिनके अधीन लोग बड़े होते हैं भिन्न-भिन्न भूमिकाओं का कारण बनती हैं

किसी व्यक्ति के जन्म की परिस्थितियाँ उस परिवेश और उन परिस्थितियों के बुनियादी स्तर पर स्थापित होती हैं जिसमें वे बड़े होते हैं, और उसी तरह से जिन परिस्थितियों में कोई व्यक्ति बड़ा होता है वे उसके जन्म की परिस्थितियों का परिणाम होती हैं। इस समय के दौरान व्यक्ति भाषा सीखना आरम्भ करता है, और उसका मस्तिष्क कई नई चीज़ों का सामना और उन्हें आत्मसात करना आरम्भ करता है, इस प्रक्रिया में वह लगातार बड़ा होता है। जिन चीज़ों को कोई व्यक्ति अपने कानों से सुनता है, अपनी आँखों से देखता है, और अपने मस्तिष्क से ग्रहण करता है वे धीरे-धीरे उसके भीतरी संसार को समृद्ध और जीवंत करती हैं। जिन लोगों, घटनाओं, और चीज़ों के सम्पर्क में कोई व्यक्ति आता है, जिन सामान्यबोध, विद्याओं, कौशलों को वह सीखता है, और सोचने के जिन तरीकों के द्वारा वह प्रभावित होता है, जो उसके मन में बैठाए जाते हैं, या उसे सिखाए जाते हैं, वे सब जीवन में किसी व्यक्ति के भाग्य का मार्गदर्शन करेंगे और उसे प्रभावित करेंगे। बड़ा होने पर कोई व्यक्ति जिस भाषा को सीखता है और उसका सोचने का तरीका उस परिवेश से अविभाज्य होता है जिसमें वह अपनी किशोरावस्था को बिताता है, और वह परिवेश माता-पिता, सहोदरों, और अन्य लोगों, घटनाओं, और उस के आस-पास की चीज़ों से मिलकर बनता है। इसलिए किसी व्यक्ति के विकास का मार्ग उस परिवेश के द्वारा निर्धारित होता है जिसमें कोई व्यक्ति बड़ा होता है, और उन लोगों, घटनाओं, और चीज़ों पर भी निर्भर करता है जिनके सम्पर्क में इस समयावधि के दौरान कोई व्यक्ति आता है। चूँकि ऐसी स्थितियाँ जिनके अधीन कोई व्यक्ति बड़ा होता है अग्रिम में बहुत पहले ही पूर्वनिर्धारित होती हैं, इसलिए वह परिवेश जिसमें कोई व्यक्ति इस प्रक्रिया के दौरान जीवन बिताता है भी, प्राकृतिक रूप से, पूर्वनिर्धारित होता है। इसे किसी व्यक्ति की पसंद और प्राथमिकताओं के द्वारा तय नहीं किया जाता है, बल्कि इसे सृजनकर्ता की योजनाओं के अनुसार तय किया जाता है, सृजनकर्ता द्वारा सावधानी से की गई व्यवस्थाओं के द्वारा, जीवन में व्यक्ति के भाग्य पर सृजनकर्ता की संप्रभुता के द्वारा निर्धारित किया जाता है। इसलिए बड़ा होने के मार्ग में कोई व्यक्ति जब लोगों का सामना करता है, और जिन चीजों के सम्पर्क में व‍ह आता है, वे सभी अनिवार्य रूप से सृजनकर्ता के आयोजन और उसकी व्यवस्था से जुड़े होते हैं। लोग इस प्रकार के जटिल पारस्परिक सम्बन्धों को पहले से नहीं देख सकते हैं, और न ही वे उन्हें नियन्त्रित कर सकते हैं या उनकी थाह पा सकते हैं। बहुत सी अलग-अलग चीज़ों और बहुत से अलग-अलग लोगों का उस परिवेश पर प्रभाव पड़ता है जिसमें कोई व्यक्ति बड़ा होता है, और कोई मनुष्य सम्बन्धों के इतने विशाल जाल की व्यवस्था और आयोजन करने में समर्थ नहीं है। सृजनकर्ता को छोड़ कर कोई व्यक्ति या चीज़ भी अनेक प्रकार के अलग-अलग लोगों, घटनाओं, और चीज़ों के रंग-रूप, उपस्थिति, तथा उनके लुप्त होने को नियन्त्रित नहीं कर सकती है, और यह केवल सम्बन्धों का इतना विशाल जाल ही है जो किसी व्यक्ति के विकास को सृजनकर्ता द्वारा पूर्वनियत किए गए अनुसार आकार देता है, अनेक प्रकार के परिवेशों का निर्माण करता है जिनमें लोग बड़े होते हैं, तथा सृजनकर्ता के प्रबंधन के कार्य के लिए आवश्यक अनेक भूमिकाओं की रचना करता है, लोगों के लिए ठोस और मज़बूत बुनियाद डालता है ताकि वे सफलतापूर्वक अपने ध्येयों को पूरा करें।

स्वावलंबन: तीसरा मोड़

जब कोई व्यक्ति बचपन और किशोरावस्था से होकर गुज़र जाता है और धीरे-धीरे तथा अनिवार्य रूप से परिपक्वता तक पहुँच जाता है, तो उसके लिए अगला कदम अपनी किशोरावस्था को पूरी तरह से अलविदा कहना, अपने माता-पिता को अलविदा कहना, और आगे के मार्ग का एक स्वावलंबी वयस्क के रूप में सामना करना है। इस मुकाम पर[ग] उसे अवश्य सभी लोगों, घटनाओं, और चीज़ों का सामना करना चाहिए जिनका एक वयस्क को सामना करना पड़ता है, और अपने भाग्य की जंज़ीर की सभी कड़ियों का सामना करना चाहिए। यह तीसरा मोड़ है जिससे होकर व्यक्ति को गुज़रना होगा।

1. स्वावलंबी होने के पश्चात्, व्यक्ति सृजनकर्ता की संप्रभुता का अनुभव करना आरम्भ करता है

यदि किसी व्यक्ति का जन्म और बड़ा होना उसके जीवन की यात्रा के लिए, व्यक्ति के भाग्य की आधारशिला रखने के लिए "तैयारी की अवधि" है, तो उसका स्वावलंबन जीवन में उसके भाग्य का आरम्भिक आत्मभाषण है। यदि किसी व्यक्ति का जन्म और बड़ा होना वह धन-समृद्धि है जिसे उसने जीवन में अपने भाग्य के लिए संचित किया है, तो किसी व्यक्ति का स्वावलंबन तब है जब वह अपनी धन-समृद्धि को खर्च करना और उसे बढ़ाना आरम्भ करता है। जब कोई अपने माता-पिता को छोड़ देता है और स्वावलंबी हो जाता है, तो जिन सामाजिक स्थितियाँ का वह सामना करता है, और उसके लिए उपलब्ध कार्य व जीवनवृत्ति का प्रकार दोनों भाग्य द्वारा आदेशित होते हैं और उनका उसके माता-पिता के साथ कोई लेना देना नहीं होता है। कुछ लोग महाविद्यालय में अच्छे मुख्य विषय चुनते हैं और अंत में स्नातक के पश्चात् एक संतोषजनक नौकरी पाते हैं, और अपने जीवन की यात्रा में पहली विजयी छलांग लगाते हैं। कुछ लोग कई विभिन्न कौशलों को सीखते और उनमें महारत हासिल कर लेते हैं और फिर भी ऐसी नौकरी नहीं ढूँढ़ पाते हैं जो उनके अनुकूल हो या अपने पद को नहीं पाते हैं, जीवनवृत्ति तो बिलकुल नहीं पाते हैं; अपनी जीवन यात्रा के आरम्भ में वे अपने आप को हर एक मोड़ पर कुंठित, परेशानियों से घिरा हुए, अपने भविष्य को निराशाजनक और अपने जीवन को अनिश्चित पाते हैं। कुछ लोग स्वयं को कर्मठतापूर्वक अपने अध्ययनों में लगा देते हैं, फिर भी उच्च शिक्षा पाने के अपने सभी अवसरों से बाल-बाल चूक जाते हैं, और कभी सफलता हासिल नहीं करने के लिए भाग्य के द्वारा निर्दिष्ट होते हैं, अपनी जीवन यात्रा में उनकी सबसे पहली आकांक्षा विशाल शून्य में गायब हो जाती है। न जानते हुए[घ] कि आगे का मार्ग निर्बाध है या पथरीला, वे पहली बार महसूस करते हैं कि प्रभावित करने वाली कितनी चीज़ों से मनुष्य की नियति भरी हुई है, और इसलिए वे आशा और भय के साथ जीवन का सम्मान करते हैं। कुछ लोग, बहुत अच्छी तरह से शिक्षित नहीं होने के बावजूद, पुस्तकें लिखते हैं और बड़ी प्रसिद्धि प्राप्त करते हैं; कुछ, यद्यपि पूरी तरह से अशिक्षित होते हैं, फिर भी व्यवसाय में पैसा कमाते हैं और परिणामस्वरूप स्वयं का खर्च वहन करने में समर्थ होते हैं...। कोई व्यक्ति कौन सा व्यवसाय चुनता है, कोई व्यक्ति कैसे जीविका अर्जित करता है: क्या लोगों का इस पर कोई नियन्त्रण है कि वे अच्छा चुनाव करते हैं या बुरा चुनाव? क्या वे उनकी इच्छाओं एवं निर्णयों के अनुरूप होते हैं? अधिकांश लोग चाहते हैं कि वे कम काम करें और अधिक कमा सकें, धूप और बरसात में परिश्रम न करें, अच्छे कपड़े पहनें, हर जगह जगमगाएँ और चमकें, दूसरों से ऊँचा उठें, और अपने पूर्वजों का सम्मान बढ़ाएँ। लोगों की इच्छाएँ बहुत उत्तम होती हैं, किन्तु जब लोग अपने जीवन की यात्रा में अपना पहला कदम उठाते हैं, तो उन्हें धीरे-धीरे समझ में आने लगता है कि मनुष्यों के भाग्य कितने अपूर्ण है, पहली बार सचमुच में यह तथ्य उनकी समझ में आता है कि, यद्यपि कोई व्यक्ति अपने भविष्य के लिए सुस्पष्ट योजना बना सकता है, यद्यपि कोई साहसिक कल्पनाओं को आश्रय दे सकता है, फिर भी किसी के पास भी अपने सपनों को साकार करने की योग्यता या सामर्थ्य नहीं होती है, और कोई भी अपने स्वयं के भविष्य को नियन्त्रित करने की स्थिति में नहीं होता है। किसी व्यक्ति के सपनों और उन सच्चाईयों के बीच हमेशा कुछ दूरी रहेगी जिनका उसे सामना करना होगा; चीज़ें वैसी कभी नहीं होती हैं जैसा कोई व्यक्ति चाहता है कि वे हों, और जब ऐसी सच्चाईयों से सामना होता है तो लोग कभी भी संतुष्टि या तृप्ति प्राप्त नहीं कर सकते हैं। यहाँ तक कि कुछ लोग अपनी स्वयं की नियति को बदलने के प्रयास में, हर संभव हद तक जाएँगे, वे अपनी जीविका और भविष्य के वास्ते बहुत अधिक प्रयास करेंगे और बड़े-बड़े बालिदन करेंगे। किन्तु अंत में, भले ही वे अपने सपनों और इच्छाओं को अपने स्वयं के कठिन परिश्रम के माध्यम से साकार कर सकते हैं, फिर भी वे अपने भाग्य को कभी बदल नहीं सकते हैं, और भले ही वे कितने ही दृढ़ निश्चय के साथ कोशिश क्यों न करें वे कभी भी उससे आगे नहीं बढ़ सकते हैं जो नियति ने उन्हें आवंटित किया है। योग्यता, बौद्धिक स्तर, और संकल्प-शक्ति में भिन्नताओं की परवाह किए बिना, भाग्य के सामने सभी लोग एक समान हैं, जो महान और तुच्छ, ऊँचे और नीचे, तथा उत्कृष्ट और निकृष्ट के बीच कोई भेद नहीं करता है। कोई किस व्यवसाय की खोज करता है, कोई आजीविका के लिए क्या करता है, और कोई जीवन में कितनी धन-सम्पत्ति संचित करता है, ये उसके माता-पिता, उसकी प्रतिभाओं, उसके प्रयासों या उसकी महत्वाकांक्षाओं के द्वारा तय नहीं किए जाते हैं, बल्कि सृजनकर्ता के द्वारा पूर्वनिर्धारित किए जाते हैं।

2. अपने माता-पिता को छोड़ना और जीवन के रंगमंच में अपनी भूमिका निभाने की ईमानदारी से शुरुआत करना

जब कोई व्यक्ति परिपक्व हो जाता है, तो वह अपने माता-पिता को छोड़ने और अपने बलबूते पर कुछ करने में सक्षम हो जाता है, और यह इसी बिन्दु पर होता है कि वह सही मायने में अपनी भूमिका निभानी शुरू करता है, कि जीवन में उसका ध्येय धुँधला नहीं पड़ता है और धीरे-धीरे स्पष्ट होता जाता है। नाममात्र के लिए वह अभी भी अपने माता-पिता के साथ घनिष्ठता से जुड़ा रहता है, किन्तु क्योंकि उसका ध्येय और वह भूमिका जिसे वह जीवन में अदा करता है उनका उसके माता-पिता के साथ कोई लेना-देना नहीं होता है, इसलिए, जैसे-जैसे कोई व्यक्ति धीरे-धीरे स्वावलंबी होता जाता है, वास्तविकता में यह घनिष्ठ बन्धन धीरे-धीरे टूटता जाता है। जैविक परिप्रेक्ष्य में, लोग अभी भी अवचेतन रूप में माता-पिता पर निर्भर होने से अपने आप को रोक नहीं सकते हैं, किन्तु वस्तुनिष्ठ रूप से कहें, तो जब एक बार वे बड़े हो जाते हैं तो उनके जीवन अपने माता पिता से बिलकुल भिन्न होते हैं, और वे उन भूमिकाओं को निभाएँगे जिन्हें उन्होंने स्वावलंबन से ग्रहण किया है। जन्म और बच्चे के पालन-पोषण के अलावा, बच्चे के जीवन में माता-पिता का उत्तरदायित्व उसके बड़ा होने के लिए बस एक औपचारिक परिवेश प्रदान करना है, क्योंकि सृजनकर्ता के पूर्वनियोजन के अलावा किसी भी चीज़ का उस व्यक्ति के भाग्य से कोई सम्बन्ध नहीं होता है। कोई भी इस चीज़ को नियन्त्रित नहीं कर सकता है कि किसी व्यक्ति का भविष्य कैसा होगा; इसे बहुत पहले ही पूर्वनिर्धारित किया जाता है, और यहाँ तक कि किसी के माता-पिता भी उसके भाग्य को नहीं बदल सकते हैं। जहाँ तक भाग्य की बात है, हर कोई स्वतन्त्र है, और हर किसी का अपना स्वयं का भाग्य है। इसलिए किसी के भी माता-पिता जीवन में उसके भाग्य को नहीं टाल सकते हैं या उस भूमिका पर जरा सा भी प्रभाव नहीं डाल सकते हैं जिसे वह जीवन में निभाता है। ऐसा कहा जा सकता है कि वह परिवार जिसमें किसी व्यक्ति का जन्म लेना नियत किया जाता है, और वह परिवेश जिसमें वह बड़ा होता है, वे जीवन में उसके ध्येय को पूरा करने के लिए उन पूर्व शर्तों से बढ़कर और कुछ नहीं हैं। वे किसी भी तरह से किसी व्यक्ति के जीवन के भाग्य को या उस प्रकार की नियति को निर्धारित नहीं करते हैं जिसके बीच कोई व्यक्ति अपने ध्येय को पूरा करता है। और इसलिए किसी के भी माता-पिता जीवन में उसके ध्येय को पूरा करने में उसकी सहायता नहीं कर सकते हैं, किसी के भी रिश्तेदार जीवन में उसकी भूमिका को ग्रहण करने में उसकी सहायता नहीं कर सकते हैं। कोई किस प्रकार अपने ध्येय को पूरा करता है और वह किस प्रकार के जीवन जीने के परिवेश में अपनी भूमिका को निभाता है ये पूरी तरह से जीवन में उसके भाग्य के द्वारा निर्धारित किए जाते हैं। दूसरे शब्दों में, कोई भी अन्य वस्तुनिष्ठ स्थितियाँ किसी व्यक्ति के ध्येय को प्रभावित नहीं कर सकती हैं, जो सृजनकर्ता के द्वारा पूर्वनिर्धारित किया जाता है। सभी लोग बड़े होने के अपने स्वयं के विशेष परिवेश में परिपक्व होते हैं, तब धीरे-धीरे, उत्तरोत्तर, जीवन में अपने स्वयं के मार्गों में चल पड़ते हैं, उन नियतियों को पूरा करते हैं जिन्हें सृजनकर्ता के द्वारा उनके लिए नियोजित किया गया था, स्वाभाविक रूप से, अनायास ही मानवजाति के विशाल समुद्र में प्रवेश करते हैं और जीवन में अपने स्वयं के पदों को ग्रहण करते हैं, जहाँ वे सृजनकर्ता के पूर्वनिर्धारण के वास्ते, उसकी संप्रभुता के वास्ते, सृजित किए गए प्राणियों के रूप में अपने उत्तरदायित्वों को पूरा करना शुरू करते हैं।

विवाह: चौथा मोड़

जब कोई उम्र में बढ़ता है और परिपक्व होता है, तो वह अपने माता-पिता से और उस परिवेश से और भी अधिक दूर हो जाता है जिसमें वह जन्मा और पला-बढ़ा था, और इसके बजाय वह अपने जीवन के लिए एक दिशा को खोजने और उस तरीके से अपने स्वयं के जीवन के लक्ष्यों को पाने का प्रयास शुरू कर देता है जो उसके माता-पिता से भिन्न होते हैं। इस दौरान उसे अपने माता-पिता की अब और आवश्यकता नहीं होती है, किन्तु उसके बजाए एक साथी की आवश्यकता होती है जिसके साथ वह अपने जीवन को बिता सकता हैः एक जीवनसाथी, एक ऐसा व्यक्ति जिसके साथ उसका भाग्य घनिष्ठता से गुँथा हुआ होता है। इस तरह, पहली बड़ी घटना जिसका वह स्वावलंबन के पश्चात् सामना करता है वह विवाह है, चौथा मोड़ जिससे उसे अवश्य गुज़रना चाहिए।

1. विवाह के बारे में किसी के पास कोई विकल्प नहीं है

किसी भी व्यक्ति के जीवन में विवाह एक मुख्य घटना है; यह वह समय है जब कोई सचमुच विभिन्न प्रकार के उत्तरदायित्वों को ग्रहण करना शुरू करता है, विभिन्न प्रकार के ध्येयों को धीरे-धीरे पूरा करना आरम्भ करता है। लोग विवाह के बारे में स्वयं इसका अनुभव करने से पहले बहुत से भ्रमों को आश्रय देते हैं, और ये सभी भ्रम बहुत ही खूबसूरत होते हैं। महिलाएँ कल्पना करती हैं कि उनके होने वाले पति सुन्दर राजकुमार होंगे, और पुरुष कल्पना करते हैं कि वे शुद्ध, गोरी महिला से विवाह करेंगे। इन कल्पनाओं से पता चलता है कि विवाह के लिए प्रत्येक व्यक्ति की कुछ निश्चित अपेक्षाएँ होती हैं, उनकी स्वयं की माँगें और मानक होते हैं। यद्यपि इस दुष्ट युग में लोगों के ऊपर विवाह के बारे में विकृत संदेशों की लगातार बमबारी की जाती है, जो और भी अधिक अतिरिक्त अपेक्षाओं का निर्माण करते हैं और लोगों को सब प्रकार के सामान एवं अजीब प्रवृत्तियाँ प्रदान करते हैं, कोई व्यक्ति जिसने विवाह का अनुभव किया है वह जानता है कि कोई इसे किसी भी तरह से क्यो न समझे, इसके प्रति उसकी प्रवृत्ति कुछ भी क्यों न हो, विवाह व्यक्तिगत पसंद का मामला नहीं है।

व्यक्ति का अपने जीवन में कई लोगों से सामना होता है, किन्तु कोई नहीं जानता है कि उसका जीवनसाथी कौन बनेगा। यद्यपि विवाह के विषय पर प्रत्येक की अपनी स्वयं की सोच और अपने व्यक्तिगत रवैये होते हैं, फिर भी वह पूर्वानुमान नहीं लगा सकता हैं कि अंततः कौन उसका सच्चा जीवनसाथी बनेगा, और उसकी स्वयं की अवधारणाएँ कम महत्व रखती हैं। तुम जिस व्यक्ति को पसंद करते हो उससे मिलने के बाद, उसे पाने का प्रयास कर सकते हो; किन्तु वह तुममें रुचि रखता या रखती है या नहीं, वह तुम्हारा या तुम्हारी जीवन साथी बनने के योग्य है या नहीं, यह तय करना तुम्हारा काम नहीं है। तुम्हारी अनुरक्तियों का व्यक्ति ज़रूरी नहीं कि वह व्यक्ति हो जिसके साथ तुम अपना जीवन साझा करने में समर्थ होगे; और इसी बीच कोई ऐसा जिसकी तुमने कभी अपेक्षा नहीं की थी वह चुपके से तुम्हारे जीवन में प्रवेश कर जाता है और तुम्हारा साथी बन जाता है, तुम्हारे भाग्य का सबसे महत्वपूर्ण अवयव, तुम्हारा जीवन-साथी बन जाता है, जिसके साथ तुम्हारा भाग्य अभिन्न रूप से बँध जाता है। और इसलिए, यद्यपि संसार में लाखों विवाह होते हैं, फिर भी हर एक भिन्न है: कितने विवाह असंतोषजनक होते हैं, कितने सुखद होते हैं; कितने पूर्व तथा पश्चिम, कितने उत्तर और दक्षिण तक फैल जाते हैं; कितने परिपूर्ण जोड़े होते हैं, कितने समकक्ष श्रेणी के होते हैं; कितने सुखद और सामंजस्यपूर्ण होते हैं, कितने दुःखदाई और कष्टपूर्ण होते हैं; कितने दूसरों से ईर्ष्यापूर्ण होते हैं, कितनों को ग़लत समझा जाता है और उन पर नाक-भौं चढ़ाई जाती है; कितने आनन्द से भरे होते हैं, कितने आँसूओं से भरे हैं और मायूसी पैदा करते हैं...। इन अनगिनत विवाहों में, मनुष्य विवाह के प्रति वफादारी और आजीवन समर्पण प्रकट करते हैं, या प्रेम, आसक्ति, एवं अवियोज्यता को, या परित्याग और न समझ पाने को, या विवाह के प्रति विश्वासघात को, और यहाँ तक कि घृणा को भी प्रकट करते हैं। चाहे विवाह स्वयं में खुशी लाता हो या पीड़ा, विवाह में हर एक व्यक्ति का ध्येय सृजनकर्ता के द्वारा पूर्वनियत होता है और यह बदलेगा नहीं; हर एक को इसे पूरा करना ही होगा। और प्रत्येक विवाह के पीछे निहित व्यक्तिगत भाग्य अपविर्तनीय होता है; इसे बहुत पहले ही सृजनकर्ता के द्वारा अग्रिम में निर्धारित किया गया था।

2. विवाह दो भागीदारों के भाग्य से जन्म लेता है

विवाह किसी व्यक्ति के जीवन में एक महत्वपूर्ण मोड़ है। यह किसी व्यक्ति के भाग्य का परिणाम है, उसके भाग्य में एक महत्वपूर्ण कड़ी है; यह किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत इच्छा या प्राथमिकताओं पर स्थापित नहीं होता है, और किसी भी बाहरी कारक के द्वारा प्रभावित नहीं होता है, बल्कि यह पूर्णतः दो पक्षों के भाग्य के द्वारा, दम्पत्ति के भाग्य के बारे में सृजनकर्ता की व्यवस्थाओं और उसके पूर्वनिर्धारणों के द्वारा निर्धारित होता है। सतही तौर पर, विवाह का उद्देश्य मानव जाति को जारी रखना है, परन्तु असलियत में विवाह और कुछ नहीं बल्कि एक रस्म है जिसमें कोई व्यक्ति अपने ध्येय को पूरा करने की प्रक्रिया से गुज़रता है। लोग जिन भूमिकाओं को विवाह में निभाते हैं वे मात्र अगली पीढ़ी का पालन पोषण करना नहीं हैं; वे ऐसी विभिन्न भूमिकाएँ हैं जिन्हें वे ग्रहण करते हैं और ऐसे ध्येय हैं जिन्हें विवाह को बनाए रखने के दौरान उन्हें पूरा करना होगा। चूँकि व्यक्ति का जन्म लोगों, घटनाओं और आसपास की चीज़ों के परिवर्तन को प्रभावित करता है, इसलिए उसका विवाह भी अनिवार्य रूप से उन्हें प्रभावित करेगा, और इसके अतिरिक्त, अनेक भिन्न-भिन्न तरीकों से उन्हें रूपान्तरित करेगा।

जब कोई स्वावलंबी हो जाता है, तो वह अपनी स्वयं की जीवन यात्रा आरम्भ करता है, जो उसे कदम दर कदम उसके विवाह से सम्बन्धित लोगों, घटनाओं, और चीज़ों की और ले जाती है; और उसके साथ-साथ, वह दूसरा व्यक्ति जो उस विवाह को पूरा करेगा वह, कदम-दर-कदम, उन्हीं लोगों, घटनाओं एवं चीज़ों की ओर आ रहा होता है। सृजनकर्ता की संप्रभुता के अधीन, दो असम्बद्ध लोग जो एक सम्बद्ध भाग्य को साझा करते हैं धीरे-धीरे विवाह में प्रवेश करते हैं और, चमत्कारी ढ़ंग से, एक परिवार, "एक ही रस्सी से लटकी हुई दो टिड्डियाँ" बन जाते हैं। इसलिए जब कोई विवाह में प्रवेश करता है, तो उसकी जीवन यात्रा उसके जीवनसाथी को प्रभावित और स्पर्श करेगी, और उसी तरह उसके साथी की जीवन यात्रा भी जीवन में उसके भाग्य को प्रभावित और स्पर्श करेगी। दूसरे शब्दों में, मनुष्य के भाग्य आपस में एक दूसरे से जुड़े होते हैं, और कोई भी दूसरों से पूरी तरह से स्वतन्त्र होकर जीवन में अपने ध्येय को पूरा नहीं कर सकता है या अपनी भूमिका को नहीं निभा सकता है। व्यक्ति का जन्म सम्बन्धों की एक बड़ी श्रृंखला से सम्बन्धित होता है; बड़े होने में भी सम्बन्धों की एक जटिल श्रृंखला शामिल होती है; और उसी प्रकार, मानवीय सम्बन्धों के एक विशाल और जटिल जाल में विवाह अनिवार्य रूप से अस्तित्व में आता है और कायम रहता है, जिसमें प्रत्येक वह सदस्य शामिल होता है और उस हर एक की नियति प्रभावित होती है जो इसका एक भाग है। विवाह दोनों सदस्यों के परिवारों का, उन परिस्थितियों का जिनमें वे बड़े हुए थे, उनके रंग-रूप, उनकी आयु, उनके गुणों, उनकी प्रतिभाओं, या अन्य कारकों का परिणाम नहीं है; बल्कि, यह साझा ध्येय और सम्बद्ध भाग्य से उत्पन्न होता है। यह विवाह का मूल है, और सृजनकर्ता के द्वारा आयोजित और व्यवस्थित मनुष्य के भाग्य का एक उत्पाद है।

सन्तान: पाँचवाँ मोड़

विवाह करने के पश्चात्, व्यक्ति अगली पीढ़ी का पालन-पोषण करना आरम्भ करता है। कोई नहीं कह सकता कि उसकी कितनी और किस प्रकार की संतानें होंगी; यह भी, सृजनकर्ता द्वारा पूर्वनिर्धारित, व्यक्ति के भाग्य द्वारा निर्धारित होता है। यह पाँचवाँ मोड़ है जिसके माध्यम से किसी व्यक्ति को गुज़रना ही होगा।

यदि किसी ने किसी और बच्चे की भूमिका को पूरा करने के लिए जन्म लिया है, तो वह किसी और के माता-पिता की भूमिका पूरा करने के लिए अगली पीढ़ी का पालन-पोषण करता है। भूमिकाओं का यह स्थानान्तरण व्यक्ति को भिन्न-भिन्न परिप्रेक्ष्यों से जीवन के भिन्न-भिन्न चरणों का अनुभव कराता है। यह व्यक्ति को जीवन के अनुभवों के भिन्न-भिन्न समुच्चय प्रदान करता है, जिसमें वह सृजनकर्ता की उसी संप्रभुता को, और साथ ही इस तथ्य को जान लेता है कि कोई भी व्यक्ति सृजनकर्ता के पूर्वनिर्धारण का अतिक्रमण या उसे परिवर्तित नहीं सकता है।

1. किसी की संतान का क्या होता है इस पर उसका कोई नियन्त्रण नहीं होता है

जन्म, बड़ा होना और विवाह, ये सभी विभिन्न प्रकार की और विभिन्न अंशों में निराशा प्रदान करते हैं। कुछ लोग अपने परिवारों या अपने शारीरिक रंग-रूप से असंतुष्ट होते हैं; कुछ अपने माता-पिता को नापसंद करते हैं; कुछ लोग उस परिवेश से नाराज़ हैं या उन्हें उससे कई शिकायतें हैं जिसमें वे बड़े हुए हैं। और अधिकांश लोगों के लिए, इन सभी निराशाओं के बीच विवाह सबसे अधिक असंतोषजनक है। इस बात की परवाह किए बिना कि कोई व्यक्ति अपने जन्म, अपने बड़े होने, या अपने विवाह से कितना असंतुष्ट है, हर एक व्यक्ति जो इनसे होकर गुज़र चुका है जानता है कि वह चुन नहीं सकता है कि उसे कहाँ और कब जन्म लेना है, उसे कैसा दिखना है, उसके माता-पिता कौन हैं, और कौन उसका जीवनसाथी है, बल्कि उसे केवल स्वर्ग की इच्छा को स्वीकार करना होगा। किन्तु जब लोगों का अगली पीढ़ी का पालन पोषण करने का समय आता है, तो वे अपने जीवन के प्रथम भाग की अपनी समस्त अतृप्त इच्छाओं को अपने वंशजों पर डाल देते हैं, यह आशा करते हुए कि उनकी संतान उनकी सभी निराशाओं की क्षतिपूर्ति करेगी जो उन्होंने अपने जीवन के प्रथम भाग में अनुभव की थी। अतः लोग अपने बच्चों के बारे में सभी प्रकार की कल्पनाओं में लिप्त रहते हैं: कि उनकी बेटियाँ बड़ी होकर बहुत ही खूबसूरत सुन्दरियाँ बन जाएँगी, उनके बेटे बहुत ही आकर्षक जोशीले सज्जन व्यक्ति बन जाएँगे; यह कि उनकी बेटियाँ सुसंस्कृत और प्रतिभाशाली होंगी और उनके बेटे प्रतिभावान छात्र और स्टार एथलीट होंगे; यह कि उनकी बेटियाँ सभ्य, गुणी, और संवेदनशील होंगी, उनके बेटे बुद्धिमान, सक्षम और संवेदनशील होंगे। वे आशा करते हैं कि चाहे बेटे हों या बेटियाँ, वे अपने बुज़ुर्गों का आदर करेंगे, अपने माता पिता का ध्यान रखेंगे, और हर कोई उनसे प्रेम करेगा और उनकी प्रशंसा करेगा...। इस मुकाम पर जीवन की आशा नए सिरे से अंकुरित होती है, और लोगों के हृदयों में नई उमंगें उत्पन्न होने लगती हैं। लोग जानते हैं कि वे इस जीवन में निर्बल और आशाहीन हैं, कि उनके पास औरों से विशिष्ट होने का अन्य अवसर, और अन्य आशा नहीं होगी, और यह कि उनके पास अपने भाग्य को स्वीकार करने के सिवाय और कोई विकल्प नहीं है। और इसलिए वे अगली पीढ़ी पर अपनी समस्त आशाओं, अपनी अतृप्त इच्छाओं, और आदर्शों को डाल देते हैं, यह आशा करते हुए कि उनकी संतान उनके सपनों को हासिल करने में और उनकी इच्छाओं को साकार करने में उनकी सहायता कर सकती हैं; यह कि उनकी बेटियाँ और बेटे परिवार के नाम को गौरवान्वित करेंगे, और महत्वपूर्ण, समृद्ध, या प्रसिद्ध हो जाएँगे; संक्षेप में, वे अपने बच्चों के सौभाग्य को बहुत ऊँचा देखना चाहते हैं। लोगों की योजनाएँ और कल्पनाएँ उत्तम होती हैं; क्या वे नहीं जानते हैं कि उनके बच्चों की संख्या, उनके बच्चों का रंग-रूप, योग्यताएँ, इत्यादि, यह तय करना उनके हाथ में नहीं है, यह कि उनके बच्चों के भाग्य उनकी हथेलियों में नहीं है? मनुष्य अपने स्वयं के भाग्य के स्वामी नहीं हैं, फिर भी वे युवा पीढ़ी के भाग्य को बदलने की आशा करते हैं; वे अपने स्वयं के भाग्य से बच निकलने में निर्बल हैं, फिर भी वे अपने बेटे और बेटियों के भाग्य को नियन्त्रित करने की कोशिश करते हैं। क्या वे अपने आप को बहुत अधिक मूल्यांकित नहीं कर रहे हैं? क्या यह मनुष्य की मूर्खता और अज्ञानता नहीं है? लोग अपनी संतान के लिए किसी भी हद तक जाते हैं, किन्तु अंत में, किसी व्यक्ति के कितने बच्चे हैं, और उसके बच्चे किस प्रकार के हैं, यह उनकी योजनाओं और इच्छाओं का उत्तर नहीं है। कुछ लोग दरिद्र होते हैं परन्तु कई बच्चे होते हैं; कुछ लोग धनी होते हैं फिर भी उनके बच्चे नहीं होते हैं। कुछ लोग एक बेटी चाहते हैं परन्तु उनकी यह इच्छा नकार दी जाती है; कुछ लोग एक बेटा चाहते हैं परन्तु एक लड़के को जन्म देने में असफल रह जाते हैं। कुछ लोगों के लिए, बच्चे एक आशीष हैं; अन्य लोगों के लिए, वे एक श्राप हैं। कुछ दम्पत्ति बुद्धिमान होते हैं, फिर भी मंदबुद्धि बच्चों को जन्म देते हैं; कुछ माता-पिता मेहनती और ईमानदार होते हैं, फिर भी जिन बच्चों का वे पालन-पोषण करते हैं वे आलसी होते हैं। कुछ माता-पिता दयालु और सच्चे होते हैं परन्तु उनके बच्चे कुटिल और शातिर बन जाते हैं। कुछ माता-पिता दिमाग और शरीर से स्वस्थ्य होते हैं किन्तु अपाहिज बच्चों को जन्म देते हैं। कुछ माता-पिता साधारण और असफल होते हैं फिर भी उनके ऐसे बच्चे होते हैं जो महान चीज़ों को प्राप्त करते हैं। कुछ माता-पिता की हैसियत निम्न होती है फिर भी उनके ऐसे बच्चे होते हैं जो प्रतिष्ठा में बढ़ जाते हैं। ...

2. आगामी पीढ़ी का पालन-पोषण करने के बाद, लोग भाग्य के बारे में एक नई समझ प्राप्त करते हैं

अधिकांश लोग जो विवाह करते हैं वे लगभग तीस वर्ष की आयु में ऐसा करते है, और जीवन के इस मुकाम पर किसी को मनुष्य की नियति के बारे में कोई समझ नहीं होती है। किन्तु जब लोग बच्चों का पालन-पोषण करना आरम्भ करते हैं, तो जैसे-जैसे उनकी संतानें बड़ी होती हैं, वे नई पीढ़ी को पिछली पीढ़ी के जीवन और सभी अनुभवों को दोहराते हुए देखते हैं, और वे अपने स्वयं के अतीत को उनमें प्रतिबिम्बित होते हुए देखते हैं और समझते हैं कि, उनके मार्ग के समान ही, उस मार्ग की योजना नहीं बनाई जा सकती है और उसे चुना नहीं जा सकता है जिस पर युवा पीढ़ी के द्वारा चला गया है। इस तथ्य का सामना करके, उनके पास यह स्वीकार करने के सिवाए और कोई विकल्प नहीं होता है कि हर एक व्यक्ति का भाग्य पूर्वनियत होता है; और पूरी तरह से इसे समझे बिना ही वे धीरे-धीरे अपनी स्वयं की इच्छाओं को एक ओर कर देते हैं, और उनके हृदय का जोश डगमगा जाता है और समाप्त हो जाता है...। इस समयावधि के दौरान, उस व्यक्ति ने अधिकांशतः जीवन में महत्वपूर्ण मील के पत्थरों को पार कर लिया है और जीवन की एक नई समझ प्राप्त कर ली होती है, एक नई प्रवृत्ति अपना ली होती है। इस आयु वाला व्यक्ति भविष्य से कितनी अपेक्षा कर सकता है और उनके भविष्य की सम्भावनाएँ क्या हैं? ऐसी कौन सी पचास साल की बूढ़ी स्त्री है जो अभी भी एक सुन्दर राजकुमार का सपना देख रही है? ऐसा कौन सा पचास साल का बूढ़ा पुरुष है जो अभी भी अपनी शुद्ध गोरी स्त्री की खोज कर रहा है? ऐसी कौन सी अधेड़ स्त्री है जो अभी भी एक भद्दी बतख़ से एक हंस में बदलने की आशा कर रही है? क्या अधिकांश बूढ़े पुरुषों में जवान पुरुषों के समान जीवनवृत्ति की प्रबल प्रेरणा होती है? संक्षेप में, इस बात की परवाह किए बिना कि कोई पुरुष है या स्त्री, जो कोई भी इस आयु में जीवन बिताता है उसकी विवाह, परिवार, और बच्चों के प्रति अपेक्षाकृत कहीं अधिक तर्कसंगत, व्यावहारिक प्रवृत्ति होने की संभावना होती है। ऐसे व्यक्ति के पास अनिवार्य रूप से कोई विकल्प नहीं बचता है, भाग्य को चुनौती देने की कोई प्रबल इच्छा नहीं बचती है। जहाँ तक मनुष्य के अनुभव की बात है, जैसे ही कोई व्यक्ति इस आयु में पहुँचता है तो उसमें स्वाभाविक रूप से यह प्रवृत्ति विकसित हो जाती है: "उसे भाग्य को स्वीकार करना ही होगा; उसके बच्चों का अपना स्वयं का सौभाग्य है; मनुष्य का भाग्य स्वर्ग द्वारा निर्धारित किया जाता है।" अधिकांश लोग जो सत्य को नहीं समझते हैं, इस संसार के सभी उतार-चढ़ावों, कुंठाओं, और कठिनाईयों को झेलने के बाद, मानव जीवन में अपनी अंतर्दृष्टि को तीन शब्दों में सारांशित करते हैं: "यह भाग्य है!" यद्यपि यह वाक्यांश मनुष्य के भाग्य के बारे में सांसारिक लोगों के निष्कर्ष और एहसास को सारगर्भित ढंग से बताता है, यद्यपि यह मानवजाति की असहायता को अभिव्यक्ति करता है और भेदने वाला और अचूक कहा जा सकता है, फिर भी यह सृजनकर्ता की संप्रभुता को समझने से बहुत दूर है, और सृजनकर्ता के अधिकार के ज्ञान का कोई विकल्‍प नहीं है।

3. भाग्य पर विश्वास करना सृजनकर्ता की संप्रभुता के ज्ञान का कोई विकल्‍प नहीं है

इतने वर्षों तक परमेश्वर का अनुयायी रहने के पश्चात्, क्या भाग्य के बारे में तुम लोगों के ज्ञान और संसारिक लोगों के ज्ञान के बीच कोई सारभूत अन्तर है? क्या तुम लोग सचमुच में सृजनकर्ता के पूर्वनिर्धारण को समझ गए हो, और सचमुच में सृजनकर्ता की संप्रभुता को जान गए हो? कुछ लोगों में इस वाक्यांश "यह भाग्य है" की गहन, एवं गहराई से महसूस की जाने वाली समझ होती है, फिर भी वे परमेश्वर की संप्रभुता पर जरा सा भी विश्वास नहीं करते हैं, यह विश्वास नहीं करते हैं कि मनुष्य के भाग्य को परमेश्वर के द्वारा व्यवस्थित और आयोजित किया जाता है, और वे परमेश्वर की संप्रभुता के प्रति समर्पण करने के लिए तैयार नहीं होते हैं। इस प्रकार के लोग मानो ऐसे हैं जो महासागर में इधर-उधर बहते रहते हैं, लहरों के द्वारा उछाले जाते हैं, जलधारा के साथ-साथ तैरते रहते हैं, निष्क्रियता से इंतज़ार करने और अपने आप को भाग्य पर छोड़ देने के आलावा उनके पास कोई विकल्प नहीं होता है। फिर भी वे नहीं पहचानते हैं कि मनुष्य का भाग्य परमेश्वर की संप्रभुता के अधीन है; वे अपनी स्वयं की पहल से परमेश्वर की संप्रभुता को नहीं जान सकते हैं, फलस्वरूप परमेश्वर के अधिकार के ज्ञान को प्राप्त नहीं कर सकते हैं, परमेश्वर के आयोजनों और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण नहीं कर सकते हैं, भाग्य का प्रतिरोध करना बन्द नहीं कर सकते हैं, और परमेश्वर की देखभाल, सुरक्षा और मार्गदर्शन के अधीन नहीं जी सकते हैं। दूसरे शब्दों में, भाग्य को स्वीकार करना सृजनकर्ता की संप्रभुता के अधीन होने के समान नहीं है; भाग्य में विश्वास करने का अर्थ यह नहीं है कि कोई व्यक्ति सृजनकर्ता की संप्रभुता को स्वीकार करता, पहचानता और जानता है; भाग्य में विश्वास करना इस तथ्य और इस बाहरी घटना की पहचान मात्र है, जो इस बात को जानने से भिन्न है कि किस प्रकार सृजनकर्ता मनुष्य के भाग्य को शासित करता है, और इस बात को पहचानने से भिन्न है कि सभी चीज़ों के भाग्य के ऊपर प्रभुत्व का सृजनकर्ता ही स्रोत है, और उससे बढ़कर मानवजाति के भाग्य के लिए सृजनकर्ता के आयोजनों और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण से भिन्न है। यदि कोई व्यक्ति केवल भाग्य पर ही विश्वास करता है—यहाँ तक कि इसके बारे में गहराई से महसूस करता है—किन्तु फलस्वरूप मानवजाति के भाग्य के ऊपर सृजनकर्ता की संप्रभुता को जानने, पहचानने, उसके प्रति समर्पण करने, और उसे स्वीकार करने में समर्थ नहीं है, तो उसका जीवन तब भी एक त्रासदी, व्यर्थ में बिताया गया जीवन, खालीपन होगा; वह तब भी सृजनकर्ता के प्रभुत्व के अधीन होने, उस वाक्यांश के सच्चे अर्थ के रूप में एक सृजित किया गया मानव प्राणी बनने, और सृजनकर्ता के अनुमोदन का आनन्द उठाने में असमर्थ होगा या होगी। जो व्यक्ति सचमुच में सृजनकर्ता की संप्रभुता को जानता और अनुभव करता है उसे एक सक्रिय अवस्था में होना चाहिए, न कि निष्क्रिय या असहाय अवस्था में। जबकि साथ ही यह स्वीकार करके कि सभी चीज़ें भाग्य के द्वारा तय हैं, उसे जीवन और भाग्य के बारे में एक सटीक परिभाषा को धारण करना चाहिए: कि प्रत्येक जीवन सृजनकर्ता की संप्रभुता के अधीन है। जब कोई व्यक्ति पीछे मुड़कर उस मार्ग को देखता है जिस पर वह चला था, जब कोई व्यक्ति अपनी यात्रा के हर एक चरण का स्मरण करता है, तो वह देखता है कि हर एक कदम पर, चाहे उसका मार्ग कठिन रहा था या सरल रहा हो, परमेश्वर उसके पथ का मार्गदर्शन कर रहा था, और उसकी योजना बना रहा था। ये परमेश्वर की कुशल व्यवस्थाएँ थी, और उसकी सतर्क योजना थी, जिन्होंने आज तक, अनजाने में, व्यक्ति की अगुवाई की है। सृजनकर्ता की संप्रभुता को स्वीकार करने, उसके उद्धार को प्राप्त करने में समर्थ होना—कितना बड़ा सौभाग्य है! यदि भाग्य के प्रति किसी व्यक्ति की प्रवृत्ति निष्क्रिय है, तो इससे साबित होता है कि वह हर एक चीज़ का विरोध कर रहा है या कर रही है जो परमेश्वर ने उसके लिए व्यवस्थित की है, और यह कि उसकी विनम्र प्रवृत्ति नहीं है। यदि मनुष्य के भाग्य के ऊपर परमेश्वर की संप्रभुता के प्रति किसी व्यक्ति की प्रवृत्ति सक्रिय है, तो जब वह अपनी यात्रा को पीछे मुड़कर देखता है, जब सचमुच में परमेश्वर की संप्रभुता उसकी समझ में आने लगती है, तो वह और भी अधिक ईमानदारी से हर उस चीज़ के प्रति समर्पण करना चाहेगा जिनकी परमेश्वर ने व्यवस्था की है, उसके पास परमेश्वर को उसके भाग्य का आयोजन करने देने, और परमेश्वर के विरुद्ध विद्रोह रोकने के लिए और अधिक दृढ़ संकल्प और आत्मविश्वास होगा। क्योंकि वह देखता है कि जब वह भाग्य को नहीं बूझता है, जब वह परमेश्वर की संप्रभुता को नहीं समझता है, जब वह जानबूझकर अँधेरे में टटोलते हुए आगे बढ़ता है, कोहरे के बीच लड़खड़ाता और डगमगाता है, तो यात्रा बहुत ही कठिन, और बहुत ही मर्मभेदी होती है। इसलिए जब लोग मनुष्य के भाग्य के ऊपर परमेश्वर की संप्रभुता को पहचान जाते हैं, तो चतुर मनुष्य, स्वयं के तरीके से भाग्य के विरुद्ध लगातार संघर्ष करने और जीवन के अपने तथाकथित लक्ष्यों की खोज करने के बजाय, इसे जानना और स्वीकार करना, उन दर्द भरे दिनों को अलविदा कहना चुनते हैं जब उन्होंने अपने दोनों हाथों से एक अच्छे जीवन का निर्माण करने का प्रयास किया था। जब किसी व्यक्ति का कोई परमेश्वर नहीं होता है, जब वह उसे नहीं देख सकता है, जब वह स्पष्ट रूप से परमेश्वर की संप्रभुता को नहीं देख सकता है, तो हर एक दिन निरर्थक, बेकार, और दयनीय है। कोई व्यक्ति जहाँ कहीं भी हो, उसका कार्य जो कुछ भी हो, उसके जीवन जीने का अर्थ और उसके लक्ष्यों की खोज उसके लिए अंतहीन मर्मभेदी दुःख और असहनीय पीड़ा के सिवाय और कुछ लेकर नहीं आती है, कुछ इस तरह कि वह पीछे मुड़कर देखना बर्दाश्त नहीं कर सकता है। जब वह सृजनकर्ता की संप्रभुता को स्वीकार करेगा, उसके आयोजनों और उसकी व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करेगा, और सच्चे मानव जीवन की खोज करेगा, केवल तभी वह धीरे-धीरे सभी मर्मभेदी दुःख और पीड़ा से छूटकर आज़ाद होगा, और जीवन के सम्पूर्ण खालीपन से छुटकारा पाएगा।

4. केवल वे लोग ही सच्ची स्वतंत्रता प्राप्त कर सकते हैं जो सृजनकर्ता की संप्रभुता के प्रति समर्पण करते हैं

क्योंकि लोग परमेश्वर के आयोजनों और परमेश्वर की संप्रभुता को नहीं पहचानते हैं, इसलिए वे हमेशा ढिठाई से, विद्रोही प्रवृत्ति के साथ भाग्य का सामना करते हैं, और हमेशा परमेश्वर के अधिकार और उसकी संप्रभुता तथा उन चीज़ों को त्याग देना चाहते हैं जो भाग्य ने भण्डार में रखी हैं, तथा अपनी वर्तमान परिस्थितियों के बदलने और अपने भाग्य के पलटने की व्यर्थ की आशा करते हैं। परन्तु वे कभी भी सफल नहीं हो सकते हैं; वे हर मोड़ पर नाकाम रहते हैं। यह संघर्ष, जो किसी व्यक्ति की आत्मा की गहराई में होता है, पीड़ादायी है; यह पीड़ा अविस्मरणीय है; और पूरे समय वह अपने जीवन को गवाँता रहता है। इस पीड़ा का कारण क्या है? क्या यह परमेश्वर की संप्रभुता के कारण है, या इसलिए है क्योंकि उस व्यक्ति ने भाग्यहीन जन्म लिया था? स्पष्ट रूप से दोनों में कोई भी सही नहीं है। वास्तव में, यह उन मार्गों के कारण है जिन्हें लोग अपनाते हैं, ऐसे मार्ग जिन्हें लोग अपनी ज़िन्दगियों को जीने के लिए चुनते हैं। हो सकता है कि कुछ लोगों ने इन चीज़ों का एहसास नहीं किया हो। किन्तु जब तुम सचमुच में जान जाते हो, जब तुम्हें सचमुच में एहसास हो जाता है कि मनुष्य के भाग्य के ऊपर परमेश्वर की संप्रभुता है, जब तुम सचमुच समझ जाते हो कि वह हर चीज़ जिसकी परमेश्वर ने तुम्हारे लिए योजना बनाई और जो तुम्हारे लिए निश्चित की है वह बहुत लाभकारी है, और वह एक बहुत बड़ी सुरक्षा है, तो तुम महसूस करते हो कि तुम्हारी पीड़ा धीरे-धीरे कम हो जाती है, और तुम्हारा सम्पूर्ण अस्तित्व शांत, स्वतंत्र, एवं बन्धन मुक्त हो जाता है। अधिकांश लोगों की स्थितियों का आकलन करने पर, यद्यपि व्यक्तिपरक स्तर पर वे उसी तरह से जीवन जीते रहना नहीं चाहते हैं जैसा वे पहले जीते थे, यद्यपि वे अपनी पीड़ा से राहत चाहते हैं, फिर भी वस्तुनिष्ठ रूप से वे मनुष्य के भाग्य के ऊपर सृजनकर्ता की संप्रभुता के व्यावहारिक मूल्य एवं अर्थ को नहीं समझ सकते हैं; वे सृजनकर्ता की संप्रभुता को वास्तव में समझ नहीं सकते है और उसके अधीन नहीं हो सकते हैं। और वे यह तो बिलकुल भी नहीं जान सकते हैं कि सृजनकर्ता के आयोजनों और उसकी व्यवस्थाओं को किस प्रकार खोजें एवं स्वीकार करें। इसलिए यदि लोग सचमुच में इस तथ्य को पहचान नहीं सकते हैं कि सृजनकर्ता की मनुष्य के भाग्य और मनुष्य की सभी स्थितियों के ऊपर संप्रभुता है, यदि वे सचमुच में सृजनकर्ता के प्रभुत्व के प्रति समर्पण नहीं कर सकते हैं, तो उनके लिए इस अवधारणा द्वारा विवश न किया जाना, और न रोका जाना कठिन होगा कि "किसी का भाग्य उसके अपने हाथों में होता है," उनके लिए भाग्य और सृजनकर्ता के अधिकार के विरुद्ध अपने प्रचण्ड संघर्ष की पीड़ा से छुटकारा पाना कठिन होगा, और कहने की आवश्यकता नहीं कि उनके लिए सच में बन्धनमुक्त और स्वतन्त्र होना, और ऐसे लोग बनना भी कठिन होगा जो परमेश्वर की आराधना करते हैं। अपने आपको इस स्थिति से स्वतन्त्र करने का एक सबसे आसान तरीका हैः जीवन जीने के अपने पुराने तरीके को विदा करना, जीवन में अपने पुराने लक्ष्यों को अलविदा कहना, अपनी पुरानी जीवनशैली, जीवन-दर्शन, अनुसरणों, इच्छाओं एवं आदर्शों को सारांशित करना और उनका विश्लेषण करना, और उसके बाद मनुष्य के लिए परमेश्वर की इच्छा और माँग के साथ उनकी तुलना करना, और देखना कि उनमें से कोई परमेश्वर की इच्छा और माँग के अनुकूल है या नहीं, उनमें से कोई जीवन के सही मूल्य प्रदान करता है या नहीं, सत्य की महान समझ की ओर उसकी अगुवाई करता है या नहीं, और उसे मानवता और मनुष्य की सदृशता के साथ जीवन जीने देता है या नहीं। जब तुम जीवन के उन विभिन्न लक्ष्यों की, जिनकी लोग खोज करते हैं और जीवन जीने के उनके अनेक अलग-अलग तरीकों की बार-बार जाँच-पड़ताल करोगे और सावधानीपूर्वक उनका विश्लेषण करोगे, तो तुम यह पाओगे कि इनमें से एक भी सृजनकर्ता के उस मूल इरादे के अनुरूप नहीं है जब उसने मानवजाति का सृजन किया था। वे सभी, लोगों को सृजनकर्ता की संप्रभुता और उसकी देखभाल से दूर करते हैं; ये सभी ऐसे गड्ढे हैं जिनमें मानवजाति गिरती है, और जो उन्हें नरक की ओर लेकर जाते हैं। तुम्हारे इसे पहचान जाने के पश्चात्, तुम्हारा कार्य है कि जीवन के अपने पुराने दृष्टिकोण को छोड़ दो, अनेक फंदों से दूर रहो, परमेश्वर को तुम्हारे जीवन का प्रभार लेने दो और तुम्हारे लिए व्यवस्था करने दो, केवल परमेश्वर के आयोजनों और मार्गदर्शन के प्रति समर्पण करने का प्रयास करो, कोई विकल्प मत रखो, और एक ऐसे इंसान बनो जो परमेश्वर की आराधना करता हो। यह सुनने में आसान लगता है, परन्तु इसे करना बहुत कठिन है। कुछ लोग इसकी पीड़ा को सहन कर सकते हैं, परन्तु दूसरे सहन नहीं कर सकते हैं। कुछ लोग अनुपालन करने के इच्छुक होते हैं, परन्तु कुछ लोग अनिच्छुक होते हैं। जो लोग अनिच्छुक हैं उनमें ऐसा करने की इच्छा और दृढ़ संकल्प की कमी होती है; वे परमेश्वर की संप्रभुता के बारे में स्पष्ट रूप से अवगत हैं, बहुत अच्छी तरह से जानते हैं कि यह परमेश्वर है जो मनुष्य के भाग्य की योजना बनाता है और उसकी व्यवस्था करता है, और तब भी वे पैर मारते हैं और संघर्ष करते हैं, तब भी अपने भाग्य को परमेश्वर की हथेली में रखने और परमेश्वर की संप्रभुता के प्रति समर्पित होने के लिए सहमत नहीं हैं, और इसके अतिरिक्त, वे परमेश्वर के आयोजनों और उसकी व्यवस्थाओं से नाराज़ होते हैं। अतः हमेशा कुछ ऐसे लोग होंगे जो स्वयं देखना चाहते हैं कि वे क्या करने में सक्षम हैं; वे अपने दोनों हाथों से अपने भाग्य को बदलना चाहते हैं, या अपनी स्वयं की सामर्थ्य के अधीन खुशियाँ प्राप्त करना चाहते हैं, यह देखना चाहते हैं कि वे परमेश्वर के अधिकार की सीमाओं का अतिक्रमण कर सकते हैं या नहीं और परमेश्वर की संप्रभुता से ऊपर उठ सकते हैं या नहीं। मनुष्य की उदासी यह नहीं है कि मनुष्य सुखी जीवन की खोज करता है, यह नहीं है कि वह प्रसिद्धि एवं सौभाग्य की खोज करता है या धुंध के बीच अपने स्वयं के भाग्य के विरुद्ध संघर्ष करता है, परन्तु यह है कि सृजनकर्ता के अस्तित्व को देखने के पश्चात्, इस तथ्य को जानने के पश्चात् कि मनुष्य के भाग्य के ऊपर सृजनकर्ता की संप्रभुता है, वह अभी भी अपने मार्ग को सुधार नहीं सकता है, अपने पैरों को दलदल से बाहर नहीं निकाल सकता है, बल्कि अपने हृदय को कठोर बना देता है और अपनी ग़लतियों को निरन्तर करता रहता है। बल्कि वह कीचड़ में लगातार हाथ पैर मारता रहता है, और बिना किसी लेशमात्र पछतावे के, सृजनकर्ता की संप्रभुता के विरोध में ढिठाई से निरन्तर स्पर्धा करता रहता है, और कड़वे अंत तक इसका विरोध करता रहता है, और जब वह टूट कर बिखर जाता है और उसका रक्त बहने लगता है केवल तभी वह आखिरकार छोड़ने और पीछे हटने का निर्णय लेता है। यह असली मानवीय दुःख है। इसलिए मैं कहता हूँ, ऐसे लोग जो समर्पण करना चुनते हैं वे बुद्धिमान हैं, और जो बच निकलने का चुनाव करते हैं वे महामूर्ख हैं।

मृत्यु: छठा मोड़

इतनी अफरा-तफरी, इतनी कुंठाओं और निराशाओं के पश्चात्, इतने सारे सुखों और दुःखों और उतार-चढ़ावों के पश्चात्, इतने सारे अविस्मरणीय वर्षों के पश्चात्, बार-बार ऋतुओं को परिवर्तित होते हुए देखने के पश्चात्, कोई व्यक्ति बिना ध्यान दिए ही जीवन के महत्वपूर्ण मील के पत्थरों को पार कर जाता है, और पलक झपकते ही वह स्वयं को अपने जीवन के ढलते हुए वर्षों में पाता है। समय के निशान उसके सारे शरीर पर छपे होते है: वह अब और सीधा खड़ा नहीं हो सकता है, घने काले बालों वाला सिर अब सफेद, और चमकदार हो गया है, चमकीली आँखें धुँधली हो गई हैं और अँधेरा छा गया है, चिकनी तथा कोमल त्वचा झुर्रीदार तथा दागदार हो गई है। उसकी सुनने की शक्ति कमज़ोर हो गई है, उसके दाँत ढीले हो कर गिर गए हैं, उसकी प्रतिक्रियाएँ धीमी हो गई हैं, उसकी गतिविधियाँ सुस्त हो गई हैं...। इस मुकाम पर, उसने अपनी जवानी के जोशीले दिनों को पूरी तरह से अलविदा कह दिया है और अपने जीवन की सन्ध्या में प्रवेश कर लिया है: बुढ़ापा। इसके आगे, वह मृत्यु का सामना करेगा, किसी मनुष्य के जीवन का अंतिम मोड़।

1. मनुष्य के जीवन और मृत्यु के ऊपर केवल सृजनकर्ता ही सामर्थ्य धारण करता है

यदि किसी व्यक्ति का जन्म उसके पूर्ववर्ती जीवन पर नियत था, तो उसकी मृत्यु उसकी नियति के अंत को चिह्नित करती है। यदि किसी का जन्म इस जीवन में उसके ध्येय का आरम्भ है, तो उसकी मृत्यु उसके उस ध्येय के अन्त को चिह्नित करती है। चूँकि सृजनकर्ता ने किसी व्यक्ति के जन्म के लिए परिस्थितियों का एक निश्चित समुच्चय निर्धारित किया है, इसलिए स्पष्ट है कि उसने उसकी मृत्यु के लिए भी परिस्थितियों के एक निश्चित समुच्चय की व्यवस्था की है। दूसरे शब्दों में, कोई भी व्यक्ति अकस्मात पैदा नहीं होता है, किसी भी व्यक्ति की मृत्यु अप्रत्याशित नहीं होती है, और जन्म और मृत्यु दोनों ही उसके पिछले और वर्तमान जीवन से आवश्यक रूप से जुड़े हैं। किसी व्यक्ति की जन्म और मृत्यु की परिस्थितियाँ सृजनकर्ता के द्वारा पूर्वनिर्धारित की जाती हैं; यह किसी व्यक्ति की नियति है, और किसी व्यक्ति का भाग्य है। जैसे किसी व्यक्ति के जन्म के बारे में बहुत कुछ कहा जा सकता है, वैसे ही हर एक व्यक्ति की मृत्यु भी विशेष परिस्थितियों के एक भिन्न समुच्चय में होगी, इसलिए लोगों के अलग-अलग जीवनकाल और उनकी मृत्यु के अलग-अलग तरीके और समय होते हैं। कुछ लोग मज़बूत और स्वस्थ्य होते हैं और फिर भी जल्दी मर जाते हैं; कुछ लोग कमज़ोर और बीमार होते हैं फिर भी अपने बुढ़ापे तक जीवित रहते हैं, और शान्तिपूर्वक मर जाते हैं। कुछ अप्राकृतिक कारणों से नष्ट हो जाते हैं, और अन्य प्राकृतिक कारणों से। कुछ घर से दूर अपने जीवन को समाप्त करते हैं, अन्य अपने प्रियजनों के साथ उनके सानिध्य में अपनी आँखें बन्द कर लेते हैं। कुछ अधर में मरते हैं, अन्य धरती के नीचे। कुछ पानी के नीचे डूब जाते हैं, अन्य आपदाओं में खो जाते हैं। कुछ सुबह मरते हैं, कुछ रात्रि में। ...हर कोई एक शानदार जन्म, एक शानदार ज़िन्दगी, और एक गौरवशाली मृत्यु की कामना करता है, परन्तु कोई भी व्यक्ति अपनी स्वयं की नियति का अतिक्रमण नहीं कर सकता है, कोई भी सृजनकर्ता की संप्रभुता से बचकर नहीं निकल सकता है। यह मनुष्य का भाग्य है। मनुष्य अपने भविष्य के लिए सभी प्रकार की योजनाएँ बना सकता है, परन्तु कोई भी अपने जन्म के तरीके और समय की और संसार से अपने प्रस्थान की योजना नहीं बना सकता है। यद्यपि लोग मृत्यु को टालने और उसका प्रतिरोध करने की भरसक कोशिश करते है, फिर भी, उनके जाने बिना, मृत्यु ख़ामोशी से पास चली आती है। कोई नहीं जानता है कि वह कब मरेगा या वह कैसे मरेगा, और यह तो बिलकुल भी नहीं जानता है कि वह कहाँ मरेगा। स्पष्ट रूप से, न तो मानवजाति, न ही इस प्राकृतिक संसार में कोई प्राणी, जीवन और मृत्यु की सामर्थ्य रखता है, परन्तु केवल सृजनकर्ता ही सामर्थ्य रखता है, जिसका अधिकार अद्वितीय है। मनुष्य का जीवन और उसकी मृत्यु प्राकृतिक संसार के कुछ नियमों का परिणाम नहीं है, बल्कि सृजनकर्ता के अधिकार की संप्रभुता का एक परिणाम है।

2. जो सृजनकर्ता की संप्रभुता को नहीं जानता है उसका मृत्यु के भय के द्वारा पीछा किया जाएगा

जब कोई व्यक्ति वृद्धावस्था में प्रवेश करता है, तो जिस चुनौती का वह सामना करता है वह परिवार के लिए आपूर्ति करना नहीं है या जीवन में अपनी भव्य महत्वाकांक्षाओं को निर्धारित करना नहीं है, बल्कि चुनौती यह है कि किस प्रकार अपने जीवन को अलविदा कहे, किस प्रकार अपने जीवन के अंत तक पहुँचे, और किस प्रकार अपने अस्तित्व के अंत में पूर्णविराम लगाए। हालाँकि सतही तौर पर ऐसा प्रतीत होता है कि लोग मृत्यु पर थोड़ा सा ही ध्यान देते हैं, फिर भी कोई इस विषय पर खोजबीन करने से बच नहीं सकता है, क्योंकि कोई भी नहीं जानता है कि मृत्यु के पार कोई और संसार है या नहीं, एक ऐसा संसार जिसे मनुष्य आभास या एहसास नहीं कर सकता है, एक ऐसा संसार जिसके बारे में कोई कुछ भी नहीं जानता है। इससे सामने खड़ी मृत्यु का सामना करने से लोग डरते हैं, वे इसका उस तरह से सामना करने से डरते हैं जैसा उनको करना चाहिए, और इसके बजाए वे इस विषय को टालने की भरसक कोशिश करते हैं। और इसलिए यह प्रत्येक व्यक्ति को मृत्यु के भय से भर देता है, और जीवन के इस अपरिहार्य तथ्य पर रहस्य का परदा डाल देता है, और प्रत्येक व्यक्ति के हृदय पर लगातार बने रहने वाली छाया डाल देता है।

जब किसी व्यक्ति को लगता है कि उसके शरीर का क्षय हो रहा है, जब उसे आभास होता है कि वह मृत्यु के और करीब आ रहा है, तो उसे एक अस्पष्ट ख़ौफ़, एक अवर्णनीय भय महसूस होता है। मृत्यु के भय से वह और भी अधिक अकेला और असहाय महसूस करने लगता है, और इस मुकाम पर वह स्वयं से पूछता हैः मनुष्य कहाँ से आया था? मनुष्य कहाँ जा रहा है? क्या मनुष्य की यही नियति है कि पूरा जीवन तेज़ी से गुज़र जाए और वह काल का गाल बन जाए? क्या यही वह समय है जो मनुष्य के जीवन के अंत को चिह्नित करता है? अंत में, जीवन का क्या अर्थ है? आख़िरकार, जीवन का मूल्य क्या है? क्या यह प्रसिद्धि और सौभाग्य का होना है? क्या यह परिवार को बढ़ाना है? ... इस बात की परवाह किए बिना कि किसी ने इन विशेष प्रश्नों के बारे में सोचा है या नहीं, इस बात की परवाह किए बिना कि कोई कितनी गहराई से मृत्यु से डरता है, प्रत्येक व्यक्ति के हृदय की गहराई में हमेशा से इन रहस्यों की जाँच-पड़ताल करने की इच्छा, जीवन के विषय में नासमझी की भावना होती है, और इनके साथ संसार के बारे में भावुकता, छोड़कर जाने की अनिच्छा, मिली हुई होती है। कदाचित् कोई भी स्पष्ट रूप से नहीं कह सकता है कि वह क्या है जिससे मनुष्य भयभीत होता है, वह क्या है जिसकी मनुष्य जाँच-पड़ताल करना चाहता है, वह क्या है जिसके बारे में वह भावुक होता है और वह किसे पीछे छोड़ने का अनिच्छुक होता है।

क्योंकि लोग मृत्यु से डरते हैं, इसलिए वे बहुत ज्यादा चिंता करते है; क्योंकि वे मृत्यु से डरते हैं, इसलिए ऐसा बहुत कुछ है जिसे वे जाने नहीं दे सकते हैं। जब वे मरने ही वाले होते हैं, तो कुछ लोग इसके या उसके बारे में झल्लाते हैं; वे अपने बच्चों, अपने प्रियजनों, और धन-सम्पत्ति की चिंता करते हैं, मानो चिंता करके वे उस पीड़ा और भय को मिटा सकते हैं जो मृत्यु लेकर आती है, मानो कि जीवितों के साथ एक प्रकार की घनिष्ठता बनाए रख कर वे अपनी उस लाचारी और एकाकीपन से बच सकते हैं जो मृत्यु के साथ आती है। मनुष्य के हृदय की गहराई में एक शुरूआती भय होता है, अपने प्रियजनों से बिछुड़ने का भय, फिर कभी नीले आसमान पर निगाह न डाल पाने का भय, और फिर कभी इस भौतिक संसार को न देख पाने का भय। अपने प्रियजनों के साथ की आदी, एक एकाकी आत्मा, अपनी पकड़ को ढीला करने और नितान्त अकेले, एक अनजाने और अपरिचित संसार में प्रस्थान करने की अनिच्छुक होती है।

3. प्रसिद्धि और सौभाग्य की तलाश में बिताया गया जीवन मृत्यु का सामना होने पर व्यक्ति को घबराहट में डाल देगा

सृजनकर्ता की संप्रभुता और उसके द्वारा पूर्वनिर्धारण के कारण, एक एकाकी आत्मा जिसने अपने नाम पर शून्य से आरम्भ किया था वह माता-पिता और परिवार प्राप्त करती है, मानव जाति का एक सदस्य बनने का अवसर प्राप्त करती है, मानव जीवन का अनुभव करने और दुनिया को देखने का अवसर प्राप्त करती है; और यह सृजनकर्ता की संप्रभुता का अनुभव करने, सृजनकर्ता के द्वारा सृष्टि की अद्भुतता को जानने, और सबसे बढ़कर, सृजनकर्ता के अधिकार को जानने और उसके अधीन होने का अवसर भी प्राप्त करती है। परन्तु अधिकांश लोग वास्तव में इस दुर्लभ और क्षणभंगुर अवसर को नहीं पकड़ते हैं। कोई व्यक्ति भाग्य के विरुद्ध लड़ते हुए जीवन भर की ऊर्जा को खत्म कर देता है, अपने परिवार का भरण-पोषण करने की कोशिश में दौड़-भाग करते हुए और धन-सम्पत्ति और हैसियत के बीच इधर-उधर भागते हुए अपना सारा समय बिता देता है। जिन चीज़ों को लोग सँजो कर रखते हैं वे परिवार, पैसा और प्रसिद्धि हैं; वे इन्हें जीवन में सबसे महत्वपूर्ण चीज़ों के रूप में देखते हैं। सभी लोग अपने भाग्य के बारे में शिकायत करते हैं, फिर भी वे अपने दिमाग में इन प्रश्नों को पीछे धकेल देते हैं कि यह जाँचना और समझना बहुत अनिवार्य है: मनुष्य जीवित क्यों है, मनुष्य को कैसे जीवनयापन करना चाहिए, जीवन का मूल्य और अर्थ क्या है। अपने सम्पूर्ण जीवन, चाहे कितने ही वर्षों का क्यों न हो, वे तब तक सिर्फ़ प्रसिद्धि एवं सौभाग्य को तलाशते हुए दौड़-भाग करते हैं जब तक कि उनकी युवावस्था भाग नहीं जाती है, उनके बाल सफेद नहीं हो जाते हैं और उनकी त्वचा में झुर्रियाँ नहीं पड़ जाती हैं; जब तक वे यह देख नहीं लेते हैं कि प्रसिद्धि व सौभाय किसी का बुढ़ापा आने से रोक नहीं सकते हैं, यह कि धन हृदय के खालीपन को नहीं भर सकता है; जब तक वे यह नहीं समझ लेते हैं कि कोई भी व्यक्ति जन्म, उम्र के बढ़ने, बीमारी और मृत्यु के नियम से बच नहीं सकता है, और यह कि कोई भी उससे बच कर नहीं भाग सकता है जो कुछ नियति ने भण्डार में रखा हैं। जब वे जीवन के अंतिम मोड़ का सामना करने के लिए बाध्य होते हैं केवल तभी उनकी सचमुच समझ में आता है कि चाहे कोई करोड़ों रुपयों की सम्पत्ति का मालिक हो जाए, भले ही किसी को विशेषाधिकार प्राप्त हो जाए और वह ऊँचे पद पर हो, कोई भी मृत्यु से बच कर नहीं भाग सकता है, हर एक मनुष्य अपनी मूल स्थिति में वापस लौटेगा: एक एकाकी आत्मा, जिसके नाम कुछ भी नहीं है। जब किसी व्यक्ति के पास माता-पिता होते हैं, तो वह विश्वास करता है कि उसके माता-पिता ही सब कुछ हैं; जब किसी व्यक्ति के पास सम्पत्ति होती है, तो वह सोचता है कि पैसा ही उसका मुख्य आधार है, यही उसके जीवन की सम्पत्ति है; जब लोगों के पास हैसियत होती है, तो वे उससे कस कर चिपक जाते हैं और इसके वास्ते अपने जीवन को जोखिम में डाल देते हैं। जब लोग इस संसार को छोड़कर जाने ही वाले होते हैं केवल तभी वे यह एहसास करते हैं कि जिन चीज़ों की खोज करते हुए उन्होंने अपने जीवन को बिताया है वे क्षणभंगुर बादल के अलावा कुछ नहीं हैं, उनमें से किसी को भी वे थामे नहीं रह सकते हैं, उनमें से किसी को भी वे अपने साथ नहीं ले जा सकते हैं, उनमें से कोई भी उन्हें मृत्यु से छूट नहीं दे सकता है, उनमें से कोई भी उस एकाकी आत्मा की वापसी यात्रा में उसका साथ या उसे सांत्वना नहीं दे सकता है; और उनमें से कोई भी किसी व्यक्ति का उद्धार नहीं कर सकता है, मृत्यु से पार जाने की अनुमति तो बिल्कुल नहीं दे सकता है। प्रसिद्धि और सौभाग्य जिन्हें कोई व्यक्ति इस भौतिक संसार में अर्जित करता है, उसे अस्थायी संतुष्टि, थोड़े समय का आनन्द, चैन का एक झूठा एहसास प्रदान करते हैं, और उसे उसके मार्ग से भटका देते हैं। और इसलिए लोग, जब, शान्ति, आराम, और हृदय की निश्चलता की लालसा करते हुए, मानवजाति के इस विशाल समुद्र में हाथ पैर मारते हैं, तो वे बार-बार लहरों के नीचे समा जाते हैं। लोगों ने अब तक सबसे महत्‍वपूर्ण प्रश्नों जैसे—वे कहाँ से आते हैं, वे जीवित क्यों हैं, वे कहाँ जा रहे हैं, इत्यादि—का पता भी नहीं लगाया होता है कि वे प्रसिद्धि और सौभाग्य के द्वारा फुसला लिए जाते हैं, गुमराह हो जाते हैं, उनके द्वारा नियन्त्रित हो जाते हैं, हमेशा के लिए खो जाते हैं। समय उड़ जाता हैः पलक झपकते ही वर्षों बीत जाते हैं, इससे पहले कि कोई इसका एहसास करे, वह अपने जीवन के उत्तम वर्षों को अलविदा कह चुका होता है। जब कोई व्यक्ति जल्दी ही संसार से जाने वाला होता है, तो वह धीरे-धीरे इस एहसास की ओर पहुँचता है कि संसार की हर चीज़ दूर हो रही है, यह कि वह उन चीज़ों को थामे नहीं रह सकता है जो उसके अधिकार में थी; केवल तभी वह महसूस करता है कि अब वाकई उससे पास कुछ भी नहीं है, ठीक अभी-अभी इस संसार में आये एक क्रन्दन करते हुए शिशु के समान महसूस करता है। इस मुकाम पर, व्यक्ति इस बात पर विचार करने के लिए बाध्य हो जाता है कि उसने जीवन में क्या किया है, जीवित रहने का मूल्य क्या है, इसका अर्थ क्या है, वह इस संसार में क्यों आया; इस मुकाम पर, वह और भी अधिक जानना चाहता है कि वास्तव में दूसरा जीवन है या नहीं, स्वर्ग का वास्तव में अस्तित्व है या नहीं, वास्तव में गुनाहों की सज़ा है या नहीं...। व्यक्ति मृत्यु के जितना अधिक नज़दीक आता है, वह उतना ही अधिक यह समझना चाहता है कि वास्तव में जीवन किस बारे में है; व्यक्ति मृत्यु के जितना अधिक नज़दीक आता है, उतना ही अधिक उसका हृदय खाली महसूस होता है; व्यक्ति मृत्यु के जितना अधिक नज़दीक आता है, वह उतना ही अधिक असहाय महसूस करता है; और इस प्रकार मृत्यु के बारे में उसका भय दिन प्रति दिन बढ़ता जाता है। जब मनुष्य मृत्यु के नज़दीक पहुँचते हैं तो उनका इस तरह से व्यवहार करने के दो कारण हैं: पहला, वे अपनी प्रसिद्धि और सम्पत्ति को खोने ही वाले होते हैं जिन पर उनका जीवन आधारित था, वे इस संसार में दृश्यमान हर चीज़ को पीछे छोड़ने ही वाले होते हैं; और दूसरा, वे नितान्त अकेले एक अनजाने संसार, एक रहस्मयी, अज्ञात राज्य का सामना करने ही वाले होते हैं जहाँ वे कदम रखने से भयभीत होते हैं, जहाँ उनके पास कोई प्रियजन नहीं है और किसी प्रकार का सहारा नहीं है। इन दो कारणों से, मृत्यु का सामना करने वाला हर एक व्यक्ति बेचैनी महसूस करता है, अत्यंत भय और लाचारी के एहसास का अनुभव करता है जिसे उसने पहले कभी नहीं जाना था। जब लोग वास्तव में इस मुकाम पर पहुँचते हैं केवल तभी उनकी समझ में आता है कि, जब कोई इस पृथ्वी पर कदम रखता है, तो पहली बात जो उन्हें अवश्य समझनी चाहिए, वह है कि मानव कहाँ से आता है, लोग जीवित क्यों हैं, कौन मनुष्य के भाग्य का निर्धारण करता है, कौन मानव के अस्तित्व को भरण-पोषण करता है और किसके पास उसके अस्तित्व के ऊपर संप्रभुता है। ये जीवन की वास्तविक सम्पत्तियाँ हैं, मानव के जीवित बचे रहने के लिए आवश्यक आधार हैं, न कि यह सीखना कि किस प्रकार अपने परिवार का भरण-पोषण करें या किस प्रकार प्रसिद्धि और धन-सम्पत्ति प्राप्त करें, किस प्रकार भीड़ से अलग दिखें या किस प्रकार और अधिक समृद्ध जीवन बिताएँ, और यह तो बिलकुल नहीं कि किस प्रकार दूसरों से आगे बढ़ें और उनके विरुद्ध सफलतापूर्वक प्रतिस्पर्धा करें। यद्यपि जीवित बचे रहने के जिन विभिन्न कौशलों पर महारत हासिल करने के लिए लोग अपना जीवन खर्च करते हैं वे भरपूर भौतिक आराम दे सकते हैं, फिर भी वे किसी मनुष्य के हृदय में सच्ची शान्ति और सांत्वना नहीं ला सकते हैं, बल्कि इसके बदले वे लोगों को निरन्तर उनकी दिशा से भटका देते हैं, उन्हें अपने आप पर नियन्त्रण रखने में कठिनाई होती है, वे जीवन का अर्थ सीखने के हर अवसर को खो देते हैं; और वे इस बारे में परेशानी का एक अंतर्प्रवाह पैदा करते हैं कि किस प्रकार ठीक ढंग से मृत्यु का सामना करें। इस तरह से, लोगों की ज़िन्दगियाँ बर्बाद हो जाती हैं। सृजनकर्ता सभी के साथ निष्पक्ष ढंग से व्यवहार करता है, सभी को उसकी संप्रभुता का अनुभव करने और उसे जानने का जीवन भर का अवसर प्रदान करता है, फिर भी, जब मृत्यु नज़दीक आती है, जब मौत का साया उसके ऊपर छा जाता है, केवल तभी वह उस रोशनी को देखना आरम्भ करता है—और तब बहुत देर हो जाती है।

लोग धन-दौलत और प्रसिद्धि का पीछा करते हुए अपनी ज़िन्दगियाँ बिता देते हैं; वे इन तिनकों को मज़बूती से पकड़े रहते हैं, यह सोचते रहते हैं कि केवल ये ही उनका सहारा हैं, मानों कि उन्हें प्राप्त करके वे निरन्तर जीवित रह सकते हैं, और अपने आपको मृत्यु से बचा सकते हैं। परन्तु जब वे मरने के करीब होते हैं केवल तभी उनकी समझ में आता है कि ये चीज़ें उनसे कितनी दूर हैं, मृत्यु के सामने वे कितने कमज़ोर हैं, वे कितनी आसानी से चकनाचूर हो जाते हैं, वे कितने एकाकी और असहाय हैं, और कहीं नहीं भाग सकते हैं। उनकी समझ में आता है कि जीवन को धन-दौलत और प्रसिद्धि से नहीं खरीदा जा सकता है, कोई व्यक्ति कितना ही धनी क्यों न हो, उसका पद कितना ही ऊँचा क्यों न हो, मृत्यु का सामना होने पर सभी लोग समान रूप से कंगाल और महत्वहीन होते हैं। उनकी समझ में आता है कि धन-दौलत से जीवन को नहीं खरीदा जा सकता है, प्रसिद्धि मृत्यु को नहीं मिटा सकती है, यह कि न तो धन-दौलत और न ही प्रसिद्धि किसी व्यक्ति के जीवन को एक मिनट, या एक पल के लिए भी बढ़ा सकती है। लोग जितना अधिक इस प्रकार से सोचते हैं, उतना ही अधिक वे जीवित रहने की लालसा करते हैं; लोग जितना अधिक इस प्रकार से सोचते हैं, उतना ही अधिक वे मृत्यु के पास आने से भयभीत होते हैं। केवल इसी मुकाम पर उनकी वास्तव में समझ में आता है कि उनका जीवन उनसे सम्बन्धित नहीं है, उनके नियन्त्रण में नहीं है, और यह कि वह जीवित रहेगा या मर जाएगा इस पर किसी का वश नहीं है, कि यह सब उसके नियन्त्रण से बाहर है।

4. सृजनकर्ता के प्रभुत्व के अधीन आओ और शान्ति से मृत्यु का सामना करो

जिस क्षण किसी व्यक्ति का जन्म होता है, तब अकेली आत्मा इस पृथ्वी पर जीवन का अपना अनुभव और सृजनकर्ता के अधिकार का अपना अनुभव आरम्भ करती है जिसे सृजनकर्ता ने उसके लिए व्यवस्थित किया है। कहने की आवश्यकता नहीं कि, यह उस व्यक्ति, उस आत्मा के लिए सृजनकर्ता की संप्रभुता का ज्ञान अर्जित करने का, और उसके अधिकार को जानने का और इसे व्यक्तिगत रूप से अनुभव करने का सर्वोत्तम अवसर है। लोग सृजनकर्ता के द्वारा उनके लिए लागू किए गए भाग्य के नियमों के अधीन अपना जीवन जीते हैं जिसे, और किसी भी न्यायसंगत व्यक्ति के लिए जिसके पास विवेक है, सृजनकर्ता की संप्रभुता को स्वीकार करना और पृथ्वी पर उनके कई दशकों के जीवन के दौरान उसके अधिकार को जानना कोई कठिन कार्य नहीं है कि उसे किया न जा सके। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति के लिए, कई दशकों के दौरान अपने स्वयं के जीवन के अनुभवों के माध्यम से, यह पहचानना कि सभी मनुष्यों के भाग्य पूर्वनियत होते हैं, और यह समझना या इस बात का सार निकालना कि जीवित रहने का अर्थ क्या है, बहुत आसान होना चाहिए। साथ ही जब कोई व्यक्ति जीवन के इन सीखों को ग्रहण करता है, तो धीरे-धीरे उसकी समझ में आने लगता है कि जीवन कहाँ से आता है, यह समझने लगता है कि हृदय को सचमुच में किसकी आवश्यकता है, कौन जीवन के सही मार्ग पर उसकी अगुवाई करेगा, मनुष्य के जीवन का ध्येय और लक्ष्य क्या होना चाहिए; और धीरे-धीरे उसकी समझ में आने लगेगा कि यदि वह सृजनकर्ता की आराधना नहीं करता है, यदि वह उसके प्रभुत्व के अधीन नहीं आता है, तो जब वह मृत्यु का सामना करेगा—जब कोई आत्मा एक बार फिर से सृजनकर्ता का सामना करने ही वाली होगी—तब उसका हृदय असीमित भय और बेचैनी से भर जाएगा। यदि कोई व्यक्ति इस संसार में कुछ दशकों तक अस्तित्व में रहा है और फिर भी नहीं जान पाया है कि मानव जीवन कहाँ से आता है, अभी तक उसकी समझ में नहीं आया है कि किसकी हथेली में मनुष्य का भाग्य रहता है, तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं है कि वह शान्ति से मृत्यु का सामना करने में समर्थ नहीं होगा या होगी। जिस व्यक्ति ने जीवन के कई दशकों का अनुभव करने के बाद सृजनकर्ता की संप्रभुता का ज्ञान प्राप्त कर लिया है, वह ऐसा व्यक्ति है जिसके पास जीवन के अर्थ और मूल्य की सही समझ है; ऐसा व्यक्ति है जिसके पास जीवन के उद्देश्य का गहरा ज्ञान है, और सृजनकर्ता की संप्रभुता का सच्चा अनुभव और सच्ची समझ है; और उससे भी बढ़कर, ऐसा व्यक्ति है जो सृजनकर्ता के अधिकार के प्रति समर्पण कर सकता है। ऐसा व्यक्ति परमेश्वर के द्वारा मानवजाति के सृजन के अर्थ को समझता है, समझता है कि मनुष्य को सृजनकर्ता की आराधना करनी चाहिए, कि जो कुछ भी मनुष्य के पास है वह सृजनकर्ता से आता है और वह निकट भविष्य में ही किसी दिन उसके पास लौट जाएगा; ऐसा व्यक्ति समझता है कि सृजनकर्ता मनुष्य के जन्म की व्यवस्था करता है और मनुष्य की मृत्यु पर उसकी संप्रभुता है, और यह कि जीवन व मृत्यु दोनों सृजनकर्ता के अधिकार द्वारा पूर्वनियत हैं। इसलिए, जब किसी व्यक्ति की समझ में सचमुच ये बाते आ जाती हैं, तो वह शांति से मृत्यु का सामना करने, अपनी सारी संसारिक सम्पत्तियों को शांतिपूर्वक एक ओर करने, और बाद में जो कुछ भी होता है उसको खुशी से स्वीकार करने और उसके प्रति समर्पित होने, और सृजनकर्ता द्वारा व्यवस्थित जीवन के अंतिम मोड़ का स्वागत करने में समर्थ हो जाएगा, बजाए इसके कि आँख बंद करके इससे ख़ौफ़ खाए और इसके विरुद्ध संघर्ष करे। यदि कोई जीवन को सृजनकर्ता की संप्रभुता का अनुभव करने के एक अवसर के रूप में देखता है और उसके अधिकार को जानने लगता है, यदि कोई अपने जीवन को सृजित किए गए प्राणी के रूप में अपने कर्तव्य को निभाने के और अपने ध्येय को पूरा करने के एक दुर्लभ अवसर के रूप में देखता है, तो उसके पास आवश्यक रूप से जीवन के बारे में सही दृष्टिकोण होगा, और वह सृजनकर्ता के आशीष वाला और मार्गदर्शित जीवन बिताएगा, वह सृजनकर्ता के प्रकाश में चलेगा, सृजनकर्ता की संप्रभुता को जानेगा, उसके प्रभुत्व में आएगा, और उसके अद्भुत कर्मों और उसके अधिकार का एक गवाह बनेगा। कहने की आवश्यकता नहीं कि, ऐसे व्यक्ति को सृजनकर्ता के द्वारा प्रेम किया जाएगा और स्वीकार किया जाएगा, और केवल ऐसा व्यक्ति ही मृत्यु के प्रति शांत प्रवृत्ति रख सकता है, और जीवन के अंतिम मोड़ का प्रसन्नतापूर्वक स्वागत कर सकता है। अय्यूब स्पष्ट रूप से मृत्यु के प्रति इस प्रकार की प्रवृत्ति रखता था; वह जीवन के अंतिम मोड़ को प्रसन्नता से स्वीकार करने के लिए स्थिति में था, और अपनी जीवन यात्रा को एक सहज अंत तक पहुँचाने के बाद, जीवन में अपने ध्येय को पूरा करने के बाद, वह सृजनकर्ता के पास लौट गया।

5. अय्यूब के जीवन की खोजों और प्राप्तियों ने उसे शान्तिपूर्वक मृत्यु का सामना करने दिया

धर्मग्रंथ में अय्यूब के बारे में लिखा गया है कि: "अन्त में अय्यूब वृद्धावस्था में दीर्घायु होकर मर गया" (अय्यूब 42:17)। इसका अर्थ है कि जब अय्यूब की मृत्यु हुई, तो उसे कोई पछतावा नहीं था और उसने कोई पीड़ा महसूस नहीं की, बल्कि प्राकृतिक रुप से इस संसार से चला गया। जैसा कि हर कोई जानता है, अय्यूब ऐसा मनुष्य था जो जब वह जीवित था तो परमेश्वर से डरता था और बुराई से दूर रहता था; परमेश्वर ने उसके धार्मिकता के कार्यों की सराहना की थी, लोगों ने उन्हें स्मरण रखा, और उसका जीवन किसी भी अन्य इंसान से बढ़कर मूल्यवान और महत्वपूर्ण था। अय्यूब ने परमेश्वर के आशीषों का आनन्द लिया और परमेश्वर के द्वारा उसे पृथ्वी पर धार्मिक कहा गया था, और परमेश्वर के द्वारा भी उसकी परीक्षा ली गई और शैतान के द्वारा भी उसकी परीक्षा ली गई; वह परमेश्वर का गवाह बना और वह धार्मिक पुरुष कहलाने के योग्य था। परमेश्वर के द्वारा परीक्षा लिए जाने के बाद कई दशकों के दौरान, उसने ऐसा जीवन बिताया जो पहले से कहीं अधिक बहुमूल्य, अर्थपूर्ण, स्थिर, और शान्तिपूर्ण था। उसके धार्मिक कर्मों की वजह से, परमेश्वर ने उसकी परीक्षा ली; उसके धार्मिकता के कर्मों की वजह से, परमेश्वर उसके सामने प्रकट हुआ और सीधे उससे बात की। इसलिए, उसकी परीक्षा लिए जाने के बाद के वर्षों के दौरान अय्यूब ने जीवन के मूल्यों को और अधिक ठोस तरीके से समझा और उसकी सराहना की, सृजनकर्ता की संप्रभुता की और अधिक गहरी समझ प्राप्त की, और इस बारे में और अधिक सटीक और निश्चित ज्ञान प्राप्त किया कि किस प्रकार सृजनकर्ता अपने आशीष देता तथा वापस लेता है। अय्यूब की पुस्तक में दर्ज है कि यहोवा परमेश्वर ने अय्यूब को पहले की अपेक्षा कहीं अधिक आशीषें प्रदान की थीं, सृजनकर्ता की संप्रभुता को जानने के लिए और मृत्यु का शान्ति से सामना करने के लिए उसने अय्यूब को और भी बेहतर स्थिति में रखा था। इसलिए अय्यूब, जब वृद्ध हुआ और उसका मृत्यु से सामना हुआ, तो वह निश्चित रूप से अपनी सम्पत्ति के विषय में चिंतित नहीं हुआ होगा। उसे कोई चिन्ता नहीं थी, कुछ पछतावा नहीं था, और वह वास्तव में मृत्यु से भयभीत नहीं था; क्योंकि उसने अपना सम्पूर्ण जीवन परमेश्वर का भय मानते हुए, बुराई से दूर रहते हुए बिताया था, और उसके पास अपने स्वयं के अन्त के बारे में चिन्ता करने का कोई कारण नहीं था। आज कितने लोग हैं जो उन सभी तरह से कार्य कर सकते हैं जैसे अय्यूब ने किया था जब उसने अपनी मृत्यु का सामना किया था? क्यों कोई भी व्यक्ति इस प्रकार के सरल बाह्य आचरण को बनाए रखने में सक्षम नहीं है? केवल एक ही कारण हैः अय्यूब ने अपना जीवन परमेश्वर की संप्रभुता के प्रति विश्वास, पहचान, एवं समर्पण की व्यक्तिपरक खोज में बिताया था, और यह इस विश्वास, पहचान और समर्पण के साथ था कि उसने अपने जीवन में एक महत्वपूर्ण मोड़ को पार किया था, अपने जीवन के अंतिम वर्षों को जीया था, और अपने जीवन के अंतिम मोड़ का अभिनन्दन किया था। इस बात की परवाह किए बिना कि अय्यूब ने क्या अनुभव किया, जीवन में उसकी खोज और लक्ष्य सुखद थे, कष्टपूर्ण नहीं। वह केवल उन आशीषों या प्रशंसाओं की वजह से खुश नहीं था जो सृजनकर्ता के द्वारा उसे प्रदान की गईं थीं, बल्कि अधिक महत्वपूर्ण रूप से, अपनी खोजों और जीवन के लक्ष्यों की वजह से, सृजनकर्ता की संप्रभुता के क्रमिक ज्ञान और सही समझ की वजह से जिसे उसने परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने के माध्यम से अर्जित किया था, और इसके अतिरिक्त, परमेश्वर के अद्भुत कर्मों की वजह से जिन्हें अय्यूब ने सृजनकर्ता की संप्रभुता के अधीन एक व्यक्ति के रूप में अपने समय के दौरान व्यक्तिगत रूप से अनुभव किया था, और मनुष्य और परमेश्वर के बीच सह-अस्तित्व, जान-पहचान, तथा पारस्परिक समझ के उत्साही और अविस्मरणीय अनुभवों और स्मृतियों की वजह से; उस दिलासा और प्रसन्नता की वजह से जो सृजनकर्ता की इच्छा को जानने से आई थी; उस आदर की वजह से जो यह देखने से बाद उभरा था कि परमेश्वर कितना महान, अद्भुत, प्यारा एवं विश्वासयोग्य है, इन कारणों की वजह से वह खुश था। अय्यूब जिस कारण से बिना किसी कष्ट के अपनी मृत्यु का सामना करने में समर्थ था वह यह था कि वह जानता था कि, मरने पर, वह सृजनकर्ता के पास लौट जाएगा। और जीवन में यही उसकी खोज और प्राप्तियाँ थीं जिसने उसे शान्ति से मृत्यु का सामना करने, सृजनकर्ता के द्वारा उसके जीवन को वापस लेने की सम्भावना का समहृदय से सामना करने, और इसके अतिरिक्त, शुद्ध और चिंतामुक्त होकर, सृजनकर्ता के सामने खड़े होने दिया था। क्या आजकल लोग उस प्रकार की प्रसन्नता को प्राप्त कर सकते हैं जो अय्यूब के पास थी? क्या तुम लोग स्वयं ऐसा करने के स्थिति में हो? चूँकि लोग आजकल ऐसा करने की स्थिति में हैं, तो वे अय्यूब के समान खुशी से जीवन बिताने में असमर्थ क्यों हैं? वे मृत्यु के भय के कष्ट से बच निकलने में असमर्थ क्यों हैं? मृत्यु का सामना करते समय, कुछ पसीने से भीग जाते हैं; कुछ काँपते हैं, मूर्छित हो जाते हैं, स्वर्ग और मनुष्य के विरुद्ध समान रूप से घोर निन्दा करते हैं, यहाँ तक कि रोते और विलाप करते हैं। ये किसी भी तरह से अचानक होने वाली प्रतिक्रियाएँ नहीं हैं जो तब घटित होती हैं जब मृत्यु नज़दीक आती है। लोग मुख्यत: ऐसे शर्मनाक तरीकों से इसलिए व्यवहार करते हैं क्योंकि, अपने हृदय की गहराई में, वे मृत्यु से डरते हैं, क्योंकि उन्हें परमेश्वर की संप्रभुता और उसकी व्यवस्थाओं के बारे में स्पष्ट ज्ञान और समझ नहीं है, और सही मायने में वे उनके प्रति समर्पण तो बिलकुल नहीं करते हैं; क्योंकि लोग स्वयं ही हर चीज़ की व्यवस्था और उसे शासित करने, अपने स्वयं के भाग्य, अपने जीवन और मृत्यु को नियन्त्रित करने के सिवाय और कुछ नहीं चाहते हैं। इसलिए इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि लोग कभी मृत्यु के भय से बचने में समर्थ नहीं होते हैं।

6. केवल सृजनकर्ता की संप्रभुता को स्वीकार करके ही कोई व्यक्ति उसकी ओर लौट सकता है

जब किसी को सृजनकर्ता की संप्रभुता और उसकी व्यवस्थाओं का स्पष्ट ज्ञान और अनुभव नहीं होगा, तो भाग्य और मृत्यु के बारे में उसका ज्ञान आवश्यक रूप से असंगत होगा। लोग स्पष्ट रूप से नहीं देख सकते हैं कि यह सब परमेश्वर की हथेली में होता है, यह एहसास नहीं कर सकते हैं कि परमेश्वर उनके ऊपर नियन्त्रण और संप्रभुता रखता है, यह नहीं पहचान सकते हैं कि मनुष्य ऐसी संप्रभुता को दूर नहीं फेंक सकता है या उससे बच नहीं सकता है; और इसलिए मृत्यु का सामना करते समय उनके अंतिम शब्दों, चिंताओं एवं पछतावों का कोई अन्त नहीं होता है। वे अत्यधिक बोझ, अत्यधिक अनिच्छा, अत्यधिक भ्रम, से दबे हुए होते हैं, और इन सब के कारण उन्हें मृत्यु का भय उत्पन्न होता है। क्योंकि कोई भी व्यक्ति जिसने इस संसार में जन्म लिया है, उनका जन्म ज़रूरी है और उसकी मृत्यु अनिवार्य है, और कोई भी इस प्रवाह से परे नहीं हो सकता है। यदि कोई इस संसार से पीड़ा रहित प्रस्थान करना चाहता है, यदि कोई जीवन के इस अंतिम मोड़ का बिना किसी अनिच्छा या चिंता के सामना करने में समर्थ होना चाहता है, तो इसका एक ही रास्ता है कि कोई पछतावा न छोड़ें। और बिना किसी पछतावे के प्रस्थान करने का एकमात्र मार्ग है सृजनकर्ता की संप्रभुता को जानना, उसके अधिकार को जानना है, और उनके प्रति समर्पण करना। केवल इसी तरह से कोई व्यक्ति मानवीय लड़ाई-झगड़ों से, दुष्टताओं से, और शैतान के बन्धन से दूर रह सकता है; केवल इसी तरह से ही कोई व्यक्ति अय्यूब के समान, सृजनकर्ता के द्वारा निर्देशित और आशीष-प्राप्त जीवन जी सकता है, ऐसा जीवन जो स्वतंत्र और मुक्त हो, ऐसा जीवन जिसका मूल्य और अर्थ हो, ऐसा जीवन जो सत्यनिष्ठ और खुले हृदय का हो; केवल इसी तरह से ही कोई व्यक्ति समर्पण कर सकता है; अय्यूब के समान, सृजनकर्ता के द्वारा परीक्षा लिए जाने और वंचित किए जाने के लिए, सृजनकर्ता के आयोजनों और उसकी व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करता है; केवल इसी तरह से ही कोई व्यक्ति अपने जीवन भर सृजनकर्ता की आराधना कर सकता है और उसकी प्रशंसा अर्जित कर सकता है, जैसा कि अय्यूब ने किया था, और उसकी आवाज़ को सुन सकता है, और उसे प्रकट होते हुए देख सकता है; केवल इसी तरह से ही कोई व्यक्ति, अय्यूब के समान, बिना किसी पीड़ा, चिंता और पछतावे के जी और मर सकता है; केवल इसी तरह से ही कोई व्यक्ति, अय्यूब के समान, प्रकाश में जीवन बिता सकता है, प्रकाश में अपने जीवन के हर मोड़ से होकर गुज़र सकता है, अपनी यात्रा को प्रकाश में सरलता से पूरा कर सकता है, और अपने ध्येय को सफलतापूर्वक प्राप्त कर सकता है—एक सृजित किए गए प्राणी के रूप में सृजनकर्ता की संप्रभुता का अनुभव कर, सीख कर, और जान कर—और प्रकाश में गमन कर सकता है, और उसके पश्चात् एक सृजित किए गए प्राणी के रूप में हमेशा सृजनकर्ता की तरफ़ खड़ा हो सकता है, और उसकी सराहना पा सकता है।

सृजनकर्ता की संप्रभुता को जानने के अवसर को मत चूको

ऊपर वर्णन किए गए छः मोड़ सृजनकर्ता के द्वारा व्यवस्थित किए गए ऐसे महत्वपूर्ण चरण हैं जिनसे होकर प्रत्येक सामान्य व्यक्ति को अपने जीवन में गुज़रना ही होगा। इन में से हर एक मोड़ वास्तविक है; इनमें से किसी एक को भी धोखा नहीं दिया जा सकता है, और सभी सृजनकर्ता के पूर्वनिर्धारण और उसकी संप्रभुता से सम्बन्ध रखते हैं। इसलिए एक मनुष्य के लिए, इन में से प्रत्येक मोड़ एक महत्वपूर्ण जाँच-चौकी है, और किस प्रकार इनमें से प्रत्येक से आसानी से गुज़रा जाए यह एक गम्भीर प्रश्न है जिसका अब तुम लोग को सामना करते हो।

कुछ मुट्ठी भर दशक जो किसी मानव जीवन को बनाते हैं वे न तो लम्बे होते हैं और न ही छोटे। जन्म और वयस्क होने के बीच के लगभग बीस वर्ष पलक झपकते ही गुज़र जाते हैं, और यद्यपि जीवन के इस मुकाम पर किसी व्यक्ति को वयस्क माना जाता है, फिर भी इस आयु वर्ग के लोग मानव जीवन और मानव के भाग्य के बारे में लगभग कुछ भी नहीं जानते हैं। जैसे-जैसे वे और अधिक अनुभव प्राप्त करते हैं, वे धीरे-धीरे अधेड़ अवस्था की ओर बढ़ते जाते हैं। लोग अपने तीस और चालीस के दशक की आयु में जीवन और भाग्य के बारे में आरम्भिक अनुभव अर्जित करते हैं, किन्तु इन चीजों के बारे में उनके विचार अभी भी बिलकुल अस्पष्ट होते हैं। यह चालीस वर्ष की आयु तक तो नहीं होता है कि कुछ लोग मनुष्यजाति और सृजनकर्ता को समझना आरम्भ करते हैं, जिन्हें परमेश्वर के द्वारा सृजित किया गया था, कि वे आभास करें कि मानव जीवन के बारे में सब कुछ क्या है, और मनुष्य के भाग्य के बारे में सब कुछ क्या है। कुछ लोग, यद्यपि वे काफी लम्बे समय से परमेश्वर के अनुयायी रहे हैं और अब वे अधेड़ अवस्था में हैं, फिर भी वे अभी भी परमेश्वर की संप्रभुता का सटीक ज्ञान और उसकी परिभाषा धारण नहीं करते हैं, सच्चे समर्पण को तो बिलकुल धारण नहीं करते हैं। कुछ लोग आशीषों को पाने की खोज करने के अलावा किसी भी चीज़ की परवाह नहीं करते हैं, और यद्यपि वे कई वर्षों का जीवन बिता चुके हैं, फिर भी वे मनुष्य के भाग्य के ऊपर सृजनकर्ता की संप्रभुता के तथ्य को बिलकुल नहीं जानते और समझते हैं, और इसलिए उन्होंने परमेश्वर के आयोजनों और उसकी व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण के व्यावहारिक सबक में जरा सा भी प्रवेश नहीं किया है। ऐसे लोग पूरी तरह से मूर्ख हैं; ऐसे लोग अपना जीवन व्यर्थ में जीते हैं।

यदि किसी मानव जीवन को उसके जीवन के अनुभवों के अंश और मनुष्य के भाग्य के उसके ज्ञान के अनुसार विभाजित किया जाए, तो यह मोटे तौर पर तीन चरणों में विभक्त होगा। पहला चरण है युवावस्था, जन्म से लेकर अधेड़ आयु के बीच के वर्ष, या जन्म से लेकर तीस वर्ष की आयु तक। दूसरा चरण है परिपक्वता, अधेड़ आयु से लेकर वृद्धावस्था तक, या तीस से लेकर साठ वर्ष की आयु तक। और तीसरा चरण है किसी व्यक्ति की परिपक्व अवधि, वृद्धावस्था से, अर्थात् साठ वर्ष से, शुरू होकर, उसके इस संसार से प्रस्थान करने तक। दूसरे शब्दों में, जन्म से लेकर अधेड़ आयु तक, भाग्य और जीवन के बारे में अधिकतर लोगों का ज्ञान दूसरों के विचारों को तोते से समान रटते रहने तक सीमित होता है; इसमें लगभग कोई वास्तविक, व्यावहारिक सार नहीं होता है। इस अवधि के दौरान, जीवन के प्रति उसका दृष्टिकोण और किस प्रकार वह इस संसार में अपना मार्ग बनाता है इस बारे में वे सभी बहुत ही सतही और सीधे-सादे होते हैं। यह उसके लड़कपन की अवधि है। जब कोई व्यक्ति जीवन के सभी आनन्द और दुःखों का स्वाद चख लेता है, केवल उसके पश्चात् ही वह भाग्य के बारे में वास्तविक समझ को प्राप्त करता है, वह—अवचेतन रूप से, अपने हृदय की गहराई में—धीरे-धीरे भाग्य की अपरिवर्तनीयता की सराहना करने लगता है, और धीरे-धीरे एहसास करता है कि मनुष्य के भाग्य पर सृजनकर्ता की संप्रभुता वास्तव में मौजूद है। यह किसी व्यक्ति की परिपक्वता की अवधि है। जब वह भाग्य के विरुद्ध संघर्ष करना समाप्त कर देता है, और जब वह झगड़ों में अब और पड़ने की इच्छा नहीं करता है, परन्तु अपने भाग्य को जानता है, स्वर्ग की इच्छा के प्रति समर्पण करता है, अपनी स्वयं की उपलब्धियों और जीवन में हुई ग़लतियों का सार निकलता है, और अपने जीवन में सृजनकर्ता के न्याय का इंतज़ार कर रहा है—यह उसकी परिपक्वता की अवधि है। इन तीन चरणों के दौरान लोगों के द्वारा अर्जित विभिन्न प्रकार के अनुभवों और उपलब्धियों पर विचार करते हुए, सामान्य परिस्थितियों के अधीन सृजनकर्ता की संप्रभुता को जानने के उसके अवसर की अवधि बहुत बड़ी नहीं होती है। यदि कोई व्यक्ति साठ वर्ष की आयु तक जीवित रहता है, तो परमेश्वर की संप्रभुता को जानने ले लिए उसके पास केवल लगभग तीस वर्ष का समय ही है; यदि वह और अधिक लम्बी समयावधि चाहता है, तो यह केवल तभी सम्भव है यदि उसका जीवन काफी लम्बा हो, यदि वह सौ वर्ष तक जीवित रहने समर्थ हो। इसलिए मैं कहता हूँ, मानव अस्तित्व के सामान्य नियमों के अनुसार, यद्यपि यह एक बहुत ही लम्बी प्रक्रिया है जब कोई व्यक्ति पहलेपहल सृजनकर्ता की संप्रभुता को जानने के विषय का सामना करता है वहाँ से लेकर उस समय तक जब वह सृजनकर्ता की संप्रभुता के तथ्य को पहचानने में समर्थ हो जाता है, और वहाँ से लेकर उस बिन्दु तक जब वह उसके प्रति समर्पण करने में समर्थ हो जाता है, यदि कोई वास्तव में उन वर्षों को गिने, तो वे तीस या चालीस से अधिक नहीं होंगे जिनके दौरान उसके पास इन प्रतिफलों को प्राप्त करने का अवसर होता है। और प्रायः, लोग अपनी इच्छाओं और आशीषों को पाने की अपनी महत्वाकांक्षाओं के द्वारा बहक जाते हैं; वे नहीं पहचान सकते हैं कि मानव जीवन का सार कहाँ है, परमेश्वर की संप्रभुता को जानने के महत्व को नहीं समझते हैं, और इसलिए उन्हें मानव जीवन का अनुभव करने और सृजनकर्ता की संप्रभुता का अनुभव करने के लिए मानव संसार में प्रवेश करने का यह मूल्यवान अवसर अच्छा नहीं लगता है, और वे य‍ह एहसास नहीं करते हैं कि एक सृजित किए गए प्राणी के लिए सृजनकर्ता का व्यक्तिगत मार्गदर्शन प्राप्त करना कितना बहुमूल्य है। इसलिए मैं कहता हूँ, कि जो लोग जो चाहते हैं कि परमेश्वर का कार्य जल्दी से समाप्त हो जाए, जो इच्छा करते हैं कि जितना जल्दी हो सके परमेश्वर मनुष्य के अंत की व्यवस्था करे, ताकि वे तुरन्त ही उसके वास्तविक व्यक्तित्व को देख सकें और शीघ्र ही धन्य हो सकें, वे बदतरीन प्रकार की अवज्ञा और चरण मूर्खता के दोषी हैं। और जो लोग अपने सीमित समय के दौरान सृजनकर्ता की संप्रभुता को जानने के इस अनोखे अवसर को समझने की इच्छा करते हैं, वे ही बुद्धिमान लोग हैं, और वे ही प्रतिभाशाली लोग हैं। ये दो अलग-अलग इच्छाएँ दो अत्यंत भिन्न दृष्टिकोणों और खोजों को उजागर करती हैं: जो लोग आशीषों की खोज करते हैं वे स्वार्थी और नीच हैं; वे परमेश्वर की इच्छा के प्रति कोई विचार नहीं करते हैं, परमेश्वर की संप्रभुता को जानने की कभी खोज नहीं करते हैं, उसके प्रति समर्पण करने की कभी इच्छा नहीं करते हैं, और जैसा उनको अच्छा लगता है बस वैसा ही जीवन बिताना चाहते हैं। वे लापरवाह चरित्रहीन लोग हैं; वे ऐसी श्रेणी हैं जिन्हें नष्ट किया जाएगा। जो लोग परमेश्वर को जानने का प्रयास करते हैं वे अपनी इच्छाओं को दरकिनार करने में समर्थ हैं, वे परमेश्वर की संप्रभुता और परमेश्वर की व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करने के लिए तैयार हैं; वे इस प्रकार के लोग होने की कोशिश करते हैं जो परमेश्वर के अधिकार के प्रति विनम्र हैं और परमेश्वर की इच्छा को संतुष्ट करते हैं। ऐेसे लोग प्रकाश में रहते हैं, परमेश्वर की आशीषों के बीच जीवन जीते हैं; निश्चित रूप से परमेश्वर के द्वारा उनकी प्रशंसा की जाएगी। जो भी हो, मानव पसंद बेकार है, मनुष्य का इस बात पर कोई वश नहीं है कि परमेश्वर का कार्य कितना समय लेगा। लोगों के लिए यह अच्छा है कि वे अपने आपको परमेश्वर की करुणा पर छोड़ दें, और उसकी संप्रभुता के प्रति समर्पण कर दें। यदि तुम अपने आपको उसकी करुणा पर नहीं छोड़ते हो, तो तुम क्या कर सकते हो? क्या परमेश्वर को नुकसान उठाना पड़ेगा? यदि तुम अपने आपको उसकी करुणा पर नहीं छोड़ते हो, यदि तुम प्रभारी होने की कोशिश करते हो, तो तुम एक मूर्खतापूर्ण चुनाव कर रहे हो, और एकमात्र तुम ही हो जो अंत में नुकसान उठाओगे। यदि लोग यथाशीघ्र परमेश्वर के साथ सहयोग करेंगे, यदि वे उसके आयोजनों को स्वीकार करने में, उसके अधिकार को जानने में, और वह सब जो उसने उनके लिए किया है उसे समझने में शीघ्रता करेंगे, केवल तभी उनके पास आशा होगी, केवल तभी वे अपने जीवन को व्यर्थ में नहीं बिताएँगे, केवल तभी वे उद्धार प्राप्त करेंगे।

कोई इस तथ्य को नहीं बदल सकता है कि परमेश्वर मनुष्य के भाग्य के ऊपर संप्रभुता रखता है

जो कुछ मैंने अभी-अभी कहा है उसे सुनने के बाद, क्या भाग्य के बारे में तुम लोगों का विचार बदला है? तुम लोग मनुष्य के भाग्य के ऊपर परमेश्वर की संप्रभुता के तथ्य को किस प्रकार समझते हो? इसे साधारण रूप से कहें, तो परमेश्वर के अधिकार के अधीन प्रत्येक व्यक्ति सक्रिय रूप से या निष्क्रिय रूप से उसकी संप्रभुता और उसकी व्यवस्थाओं को स्वीकार करता है, और कोई भी व्यक्ति अपने जीवन के दौरान भले ही किसी भी प्रकार से संघर्ष क्यों न करता हो, भले ही वह कितने ही टेढ़े-मेढ़े पथों पर क्यों न चलता हो, अंत में वह सृजनकर्ता के द्वारा उसके लिए चिह्नित भाग्य के परिक्रमा-पथ पर वापस लौट आएगा। यह सृजनकर्ता के अधिकार की अजेयता है, और वह तरीका है जिससे उसका अधिकार विश्व पर नियन्त्रण और शासन करता है। यह वही अजेयता है, नियन्त्रण और शासन का वही रूप है, जो उन नियमों के लिए ज़िम्मेदार है जो सभी चीज़ों के जीवन पर हुक्म चलाते हैं, जो मनुष्यों को बिना किसी हस्तक्षेप के बार-बार पुनर्जन्म लेने देते हैं, जो इस संसार को नियमित रूप से घुमाते रहते हैं और दिन प्रतिदिन, साल दर साल, आगे बढ़ाते रहते हैं। तुम लोगों ने इन सभी तथ्यों को देखा है और, चाहे सतही तौर पर या गहराई से तुम लोग उन्हें समझते हो; तुम लोगों की समझ की गहराई सत्य के बारे में तुम लोगों के अनुभव और ज्ञान पर, और परमेश्वर के बारे में तुम लोगों के ज्ञान पर निर्भर करती है। तुम सत्य की वास्तविकता को कितनी अच्छी तरह से जानते हो, तुमने परमेश्वर के वचन का कितना अनुभव किया है, तुम परमेश्वर के सार और उसके स्वभाव को कितनी अच्छी तरह से जानते हो—यह परमेश्वर की संप्रभुता और उसकी व्यवस्थाओं के बारे में तुम्हारी समझ की गहराई को प्रदर्शित करता है। क्या परमेश्वर की संप्रभुता और उसकी व्यवस्थाएँ इस बात पर निर्भर करती हैं कि मनुष्य उसके प्रति समर्पण करते हैं या नहीं? क्या यह तथ्य कि परमेश्वर इस अधिकार को धारण करता है इस बात के द्वारा निर्धारित होता है कि मानवजाति उसके प्रति समर्पण करती है या नहीं? परिस्थितियाँ चाहे जो भी हों परमेश्वर का अधिकार अस्तित्व में रहता है; सभी परिस्थितियों में परमेश्वर अपने विचारों, और अपनी इच्छाओं के अनुरूप हर मनुष्य के भाग्य और सभी चीज़ों पर हुक्म चलाता है और उनकी व्यवस्था करता है। मनुष्यों के बदलने की वजह से यह नहीं बदलेगा, और यह मनुष्य की इच्छा से स्वतन्त्र है, और समय, अंतरिक्ष, और भूगोल में किन्ही भी परिवर्तनों के द्वारा इसे नहीं बदला जा सकता है, क्योंकि परमेश्वर का अधिकार उसका वास्तविक सार है। चाहे मनुष्य परमेश्वर की संप्रभुता को जानने और स्वीकार करने में समर्थ हो या नहीं, और चाहे मनुष्य इसके प्रति समर्पण करने में समर्थ हो या नहीं, यह मनुष्य के भाग्य के ऊपर परमेश्वर की संप्रभुता के तथ्य को ज़रा सा भी नहीं बदलता है। अर्थात्, परमेश्वर की संप्रभुता के प्रति मनुष्य भले ही कोई भी प्रवृत्ति क्यों न अपनाए, यह बस इस तथ्य को नहीं बदल सकता है कि परमेश्वर मनुष्य के भाग्य और सभी चीज़ों के ऊपर संप्रभुता रखता है। भले ही तुम परमेश्वर की संप्रभुता के प्रति समर्पण न कर सकते हो, तब भी वह तुम्हारे भाग्य को शासित करता है; भले ही तुम उसकी संप्रभुता को नहीं जान सकते हो, फिर भी उसका अधिकार अस्तित्व में है। परमेश्वर का अधिकार और मनुष्य के भाग्य के ऊपर उसकी संप्रभुता मनुष्य की इच्छा से स्वतन्त्र हैं, वे मनुष्य की प्राथमिकताओं और पसंदों के अनुसार बदलते नहीं हैं। परमेश्वर का अधिकार हर जगह, हर घण्टे, और हर एक क्षण है। यदि स्वर्ग और पृथ्वी समाप्त जाएँ, तब भी उसका अधिकार कभी समाप्त नहीं होगा, क्योंकि वह स्वयं परमेश्वर है, वह अद्वितीय अधिकार धारण करता है, और उसका अधिकार लोगों, घटनाओं या चीज़ों के द्वारा, अंतरीक्ष के द्वारा या भूगोल के द्वारा प्रतिबन्धित या सीमित नहीं होता है। परमेश्वर हमेशा अपने अधिकार को काम में लाता है, अपनी ताक़त दिखाता है, हमेशा की तरह अपने प्रबंधन के कार्य को करता रहता है; वह हमेशा सभी चीज़ों के ऊपर शासन करता है, सभी चीज़ों का भरण-पोषण करता है, और सभी चीज़ों का आयोजन करता है, ठीक वैसे ही जैसे उसने हमेशा से किया था। इसे कोई नहीं बदल सकता है। यह एक तथ्य है; यह आदि काल से अपरिवर्तनीय सत्य है।

उस व्यक्ति के लिए उचित प्रवृत्ति और अभ्यास जो परमेश्वर के अधिकार के प्रति समर्पण करने की इच्छा रखता है

किस प्रवृत्ति के साथ अब मनुष्य को परमेश्वर के अधिकार, और मनुष्य के भाग्य के ऊपर परमेश्वर की संप्रभुता के तथ्य को जानना और मानना चाहिए? यह एक वास्तविक समस्या है जो हर व्यक्ति के सामने खड़ी होती है। वास्तविक-जीवन की समस्याओं का सामना करते समय, तुम्हें किस प्रकार परमेश्वर के अधिकार और उसकी संप्रभुता को जानना और समझना चाहिए? जब तुम नहीं जानते हो कि किस प्रकार इन समस्याओं को समझें, सँभालें और अनुभव करें, तो तुम्हें अपने इरादे, अपनी इच्छा, और परमेश्वर की संप्रभुता और उसकी व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करने की अपनी वास्तविकता को दर्शाने के लिए किस प्रकार की प्रवृत्ति अपनानी चाहिए? पहले तुम्हें प्रतीक्षा करना सीखना होगा; फिर तुम्हें खोजना सीखना होगा; तब तुम्हें समर्पण करना सीखना होगा। "प्रतीक्षा" का अर्थ है परमेश्वर के समय की प्रतीक्षा करना, उन लोगों, घटनाओं एवं चीज़ों की प्रतीक्षा करना जो उसने तुम्हारे लिए व्यवस्थित की हैं, और उसकी इच्छा की प्रतीक्षा करना कि वह धीरे-धीरे अपनी इच्छा को तुम पर प्रकट करे। "खोजना" का अर्थ है उन लोगों, घटनाओं और चीज़ों के माध्यम से तुम्हारे लिए परमेश्वर के विचारशील इरादों का अवलोकन करना और उन्हें समझना जो उसने बनाए हैं, उनके माध्यम से सत्य को समझना, वह समझना जो मनुष्यों को अवश्य पूरा करना चाहिए और उन मार्गों को समझना जिनका उन्हें पालन अवश्य करना चाहिए, इस बात को समझना कि परमेश्वर का मनुष्यों में किन परिणामों को प्राप्त करने का अभिप्राय है और उसका उनमें किन उपलब्धियों को देखने का अभिप्राय है। "समर्पण करना", वास्तव में, उन लोगों, घटनाओं, और चीज़ों को स्वीकार करने की ओर संकेत करता है जो परमेश्वर ने आयोजित की हैं, उसकी संप्रभुता को स्वीकार करने और, उसके माध्यम से, यह जान लेने की ओर संकेत करता है कि किस प्रकार सृजनकर्ता मनुष्य के भाग्य पर हुक्म चलाता है, कि वह किस प्रकार अपने जीवन से मनुष्य को आपूर्ति करता है, कि वह किस प्रकार मनुष्यों के भीतर सत्य का कार्य करता है। परमेश्वर की व्यवस्थाओं और संप्रभुता के अधीन सभी चीज़ें प्राकृतिक नियमों का पालन करती हैं, और यदि तुम परमेश्वर को अपने लिए सभी चीज़ों की व्यवस्था करने और उन पर हुक्म चलाने देते हो, तो तुम्हें प्रतीक्षा करना सीखना चाहिए, तुम्हें खोज करना सीखना चाहिए, और तुम्हें समर्पण करना सीखना चाहिए। यही वह प्रवृत्ति है जिसे हर उस व्यक्ति को अवश्य अपनानी चाहिए जो परमेश्वर में अधिकार के प्रति समर्पण करना चाहता है, और वह मूल गुण है जो हर उस व्यक्ति को अवश्य धारण करना चाहिए जो परमेश्वर की संप्रभुता और उसकी व्यवस्थाओं को स्वीकार करना चाहता है। इस प्रकार की प्रवृत्ति रखने के लिए, इस प्रकार की योग्यता धारण करने के लिए, तुम लोगों को और अधिक कठिन परिश्रम करना होगा; और केवल इस प्रकार से ही तुम लोग सच्ची वास्तविकता में प्रवेश कर सकते हो।

परमेश्वर को अपने अद्वितीय स्वामी के रूप में स्वीकार करना उद्धार हासिल करने का पहला कदम है

परमेश्वर के अधिकार के बारे में सच्चाईयाँ ऐसी सच्चाईयाँ हैं जिन्हें प्रत्येक व्यक्ति को अवश्य गम्भीरता से लेना चाहिए, अवश्य अपने हृदय से अनुभव करना और समझना चाहिए; क्योंकि ये सच्चाईयाँ हर व्यक्ति के जीवन से सम्बन्धित हैं, हर व्यक्ति के अतीत, वर्तमान और भविष्य से सम्बन्धित हैं, उन महत्वपूर्ण मोड़ों से सम्बन्धित हैं जिनसे प्रत्येक व्यक्ति को अवश्य गुज़रना है, और परमेश्वर की संप्रभुता और उस प्रवृत्ति से सम्बन्धित हैं जिनके साथ उसे परमेश्वर के अधिकार का सामना करना चाहिए, और स्वाभाविक रूप से, प्रत्येक व्यक्ति की आख़िरी मंज़िल से सम्बन्धित हैं। इसलिए उन्हें जानने और समझने के लिए जीवन भर की ऊर्जा लगती है। जब तुम परमेश्वर के अधिकार को गम्भीरता से लोगे, जब तुम परमेश्वर की संप्रभुता को स्वीकार करोगे, तब धीरे-धीरे एहसास करने लगोगे और समझने लगोगे कि परमेश्वर का अधिकार सचमुच अस्तित्व में है। किन्तु यदि तुम परमेश्वर के अधिकार को कभी नहीं समझते हो, उसकी संप्रभुता को कभी स्वीकार नहीं करते हो, तब तुम कितने ही वर्ष क्यों न जीवित रहो, तुम परमेश्वर की संप्रभुता का थोड़ा सा भी ज्ञान प्राप्त नहीं करोगे। यदि तुम सचमुच में परमेश्वर के अधिकार को जानते और समझते नहीं हो, तो जब तुम मार्ग के अंत में पहुँचोगे, तो भले ही तुमने दशकों तक परमेश्वर में विश्वास किया हो, तुम्हारे पास अपने जीवन में दिखाने के लिए कुछ नहीं होगा, मनुष्य के भाग्य के ऊपर परमेश्वर की संप्रभुता के बारे में तुम्हारा ज्ञान अनिवार्य रूप से शून्य होगा। क्या यह बहुत ही दुःखदायी बात नहीं है? इसलिए तुम जीवन में चाहे कितनी ही दूर तक क्यों न चले हो, अब तुम चाहे कितने ही वृद्ध क्यों न हो गए हो, तुम्हारी शेष यात्रा चाहे कितनी ही लम्बी क्यों न हो, पहले तुम्हें परमेश्वर के अधिकार को पहचानना होगा और इसे गम्भीरतापूर्वक लेना होगा, और इस तथ्य को स्वीकार करना होगा कि परमेश्वर तुम्हारा अद्वितीय स्वामी है। मनुष्य के भाग्य के ऊपर परमेश्वर की संप्रभुता की इन सच्चाईयों का स्पष्ट और सटीक ज्ञान और समझ प्राप्त करना सभी के लिए एक अनिवार्य सबक है, मानव जीवन को जानने और सत्य को प्राप्त करने की एक कुंजी है, परमेश्वर को जानने हेतु जीवन तथा बुनियादी सबक है जिसका सभी हर दिन सामना करते हैं, और जिससे कोई बच नहीं सकता है। यदि तुममें से कोई एक इस लक्ष्य तक पहुँचने के लिए कोई छोटा मार्ग लेना चाहता है, तो मैं तुमसे कहता हूँ, कि यह असंभव है! यदि तुम परमेश्वर की संप्रभुता से बच निकलना चाहते हो, तो यह और भी अधिक असंभव है! परमेश्वर ही मनुष्य का एकमात्र प्रभु है, परमेश्वर ही मनुष्य के भाग्य का एकमात्र स्वामी है, और इसलिए मनुष्य के लिए अपने स्वयं के भाग्य पर हुक्म चलाना असंभव है, और उससे परे होना असंभव है। किसी व्यक्ति की योग्यताएँ चाहे कितनी ही बड़ी क्यों न हों, वह दूसरों के भाग्य को प्रभावित नहीं कर सकता है, आयोजित, व्यवस्थित, नियन्त्रित, या परिवर्तित तो बिलकुल नहीं कर सकता है। केवल स्वयं अद्वितीय परमेश्वर ही मनुष्य के लिए सभी चीज़ों पर हुक्म चलाता है, क्योंकि केवल वही अद्वितीय अधिकार धारण करता है जो मनुष्य के भाग्य के ऊपर संप्रभुता रखता है; और इसलिए केवल सृजनकर्ता ही मनुष्य का अद्वितीय स्वामी है। परमेश्वर का अधिकार न केवल सृजित की गई मानवजाति के ऊपर, बल्कि सृजित नहीं किए गए प्राणियों, जिन्हें कोई मनुष्य देख नहीं सकता है, के ऊपर भी संप्रभुता रखता है, तारों के ऊपर, और ब्रह्माण्ड के ऊपर संप्रभुता रखता है। यह एक निर्विवाद तथ्य है, ऐसा तथ्य जो वास्तव में अस्तित्व में है, जिसे कोई मनुष्य या चीज़ बदल नहीं सकती है। यदि चीज़ें जैसी हैं उससे तुम में से कोई एक अभी भी असंतुष्ट हैं, यह विश्वास करता है कि तुम्हारे पास कुछ विशेष कौशल या योग्यता है, और अभी भी यह सोचता है कि तुम भाग्यशाली हो सकते हो और अपनी वर्तमान परिस्थितियों को बदल सकते हो या उनसे बच निकल सकते हो; यदि तुम मानवीय प्रयासों के माध्यम से अपने भाग्य को बदलने का, और इसके द्वारा दूसरों से विशिष्ट दिखाई देने, और परिणामस्वरूप प्रसिद्धि और सौभाग्य अर्जित करने का प्रयास करते हो; तो मैं तुमसे कहता हूँ, कि तुम अपने लिए जीवन के हालातों को कठिन बना रहे हो, तुम केवल समस्याओं को ही माँग रहे हो, तुम अपनी ही कब्र खोद रहे हो! एक दिन, देर-सवेर, तुम यह जान जाओगे कि तुमने ग़लत चुनाव किया था, यह कि तुम्हारी कोशिशें व्यर्थ थी। तुम्हारी महत्वाकांक्षाएँ, भाग्य से लड़ने की तुम्हारी इच्छाएँ, और तुम्हारा स्वयं का कट्टर स्वभाव, तुम्हें ऐसे मार्ग में ले जाएगा जहाँ से कोई वापसी नहीं है, और इसके लिए तुम एक कड़वी कीमत चुकाओगे। हालाँकि, अभी तुम्हें परिणाम की भयंकरता नहीं दिखाई देती है, किन्तु जैसे-जैसे तुम और भी अधिक गहराई से उस सत्य का अनुभव और उसकी सराहना करोगे कि परमेश्वर मनुष्य के भाग्य का स्वामी है, तो जिसके बारे में आज मैं बात कर रहा हूँ और इसके वास्तविक निहितार्थों को तुम धीरे-धीरे महसूस करने लगोगे। तुम्हारे पास सचमुच में हृदय और आत्मा है या नहीं, तुम एक ऐसे व्यक्ति हो या नहीं जो सत्य से प्रेम करता है, यह इस बात पर निर्भर करता है कि तुम परमेश्वर की संप्रभुता के प्रति और सत्य के प्रति किस प्रकार की प्रवृत्ति अपनाते हो। और स्वाभाविक रूप से, यह निर्धारित करता है कि तुम वास्तव में परमेश्वर के अधिकार को जान और समझ सकते हो या नहीं। यदि तुमने अपने जीवन में परमेश्वर की संप्रभुता और उसकी व्यवस्थाओं को कभी भी महसूस नहीं किया है, परमेश्वर के अधिकार को तो बिलकुल नहीं पहचाते और स्वीकार करते हो, तो उस मार्ग के कारण जिसे तुमने अपनाया है और उस पसंद के कारण जो तुमने की है, तुम सर्वथा मूल्यहीन हो जाओगे, निःसन्देह परमेश्वर की घृणा और तिरस्कार की वस्तु हो जाओगे। परन्तु वे लोग जो, परमेश्वर के कार्य में, उसकी परीक्षाओं को स्वीकार कर सकते हैं, उसकी संप्रभुता को स्वीकार कर सकते हैं, उसके अधिकार के प्रति समर्पण कर सकते हैं, और धीरे-धीरे उसके वचनों का वास्तविक अनुभव प्राप्त कर सकते हैं, वे परमेश्वर के अधिकार के वास्तविक ज्ञान को, उसकी संप्रभुता की वास्तविक समझ को प्राप्त कर चुके होंगे, और वे सचमुच में सृजनकर्ता की प्रजा बन गए होंगे। केवल इस प्रकार के लोगों को ही सचमुच में बचाया गया होगा। क्योंकि उन्होंने परमेश्वर की संप्रभुता को जान लिया है, क्योंकि उन्होंने इसे स्वीकार लिया है, मनुष्य के भाग्य के ऊपर परमेश्वर की संप्रभुता के तथ्य की उनकी समझ और उसके प्रति उनका समर्पण वास्तविक और परिशुद्ध है। जब वे मृत्यु का सामना करेंगे, तो वे अय्यूब के समान, ऐसा मन रखने में समर्थ होंगे जो मृत्यु के द्वारा विचलित नहीं होता है, किसी व्यक्तिगत पसंद के बिना, किसी व्यक्तिगत इच्छा के बिना, सभी चीज़ों में परमेश्वर के आयोजनों और उसकी व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करने में समर्थ होंगे। केवल ऐसा व्यक्ति ही एक सृजित किए गए सच्चे मनुष्य के रूप सृजनकर्ता की तरफ़ लौटने में समर्थ होगा।

17 दिसंबर, 2013

फुटनोट:

क. मूल पाठ में "की परिस्थितियों को" वाक्यांश नहीं है।

ख. मूल पाठ में "यह" पढ़ा जाता है।

ग. मूल पाठ में "इस मुकाम पर" वाक्यांश नहीं है।

घ. मूल पाठ में "न जानते हुए" वाक्यांश नहीं है।

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