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परमेश्वर चाहता है इंसानियत जीती रहे

I

जब इंसानियत मैल से भरी थी,

कुछ हद तक नाफ़र्मानी करती थी,

तो अपने उसूलों और सार की ख़ातिर

परमेश्वर को उसे तबाह करना पड़ा।

इंसानों केविद्रोहकी वजह से

परमेश्वर को उनसे नफ़रत थी।

मगर उनकी तबाही के बावजूद,

उसका दिल ना बदला,

उसकी दया बनी रही।

II

परमेश्वर को इंसान से हमदर्दी थी,

वो हर तरह से उसका

उद्धार करना चाहता था।

मगर परमेश्वर के उद्धार को नकारकर,

इंसान नाफ़र्मानी करता रहा।

परमेश्वर ने हर तरह से पुकारा,

ख़बरदार किया, मदद की, पोषण दिया

मगर इंसान ने इसे ना समझा,

और ना सराहा।

III

इस तरह परमेश्वर ने बहुत बर्दाश्त किया,

दर्द में, इंसान के मुड़ने का इंतज़ार किया।

अपनी हद पे पहुँचकर,

जो करना था, वही किया।

उस पल से,

जब परमेश्वर ने तबाही की योजना बनाई,

योजना की शुरुआत के लम्हे तक,

ये वक्त था इंसान के पलटने का।

ये आख़िरी मौका था,

जो परमेश्वर ने इन्सान को दिया।

ये आख़िरी मौका था,

जो परमेश्वर ने इन्सान को दिया,

इन्सा को दिया, इन्सा को दिया।

"वचन देह में प्रकट होता है" से

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परमेश्वर सम्पूर्ण मानवजाति के भाग्य का नियन्ता है प्रश्न 24: तुम यह प्रमाण देते हो कि प्रभु यीशु पहले से ही सर्वशक्तिमान परमेश्वर के रूप में वापस आ चुका है, कि वह पूरी सच्चाई को अभिव्यक्त करता है जिससे कि लोग शुद्धिकरण प्राप्त कर सकें और बचाए जा सकें, और वर्तमान में वह परमेश्वर के घर से शुरू होने वाले न्याय के कार्य को कर रहा है, लेकिन हम इसे स्वीकार करने की हिम्मत नहीं करते। यह इसलिए है क्योंकि धार्मिक पादरियों और प्राचीन लोगों का हमें बहुधा यह निर्देश है कि परमेश्वर के सभी वचन और कार्य बाइबल में अभिलेखित हैं और बाइबल के बाहर परमेश्वर का कोई और वचन या कार्य नहीं हो सकता है, और यह कि बाइबल के विरुद्ध या उससे परे जाने वाली हर बात विधर्म है। हम इस समस्या को समझ नहीं सकते हैं, तो तुम कृपया इसे हमें समझा दो। केवल परमेश्वर के प्रबंधन के मध्य ही मनुष्य बचाया जा सकता है बुलाए हुए बहुत हैं, परन्तु चुने हुए कुछ ही हैं