परमेश्वर उन्हें पूर्ण बनाता है, जो उसके हृदय के अनुसार हैं

परमेश्वर अब एक विशेष लोगों के समूह को प्राप्त करना चाहता है, ऐसा समूह जिसमें वे लोग शामिल हैं जो उसके साथ सहयोग करने का प्रयास करते हैं, जो उसके कार्य का पालन कर सकते हैं, जो विश्वास करते हैं कि परमेश्वर द्वारा बोले हुए वचन सत्य हैं, जो परमेश्वर की अपेक्षाओं को अपने अभ्यास में ला सकते हैं; ये वे लोग हैं जिनके हृदयों में सच्ची समझ है, ये वे लोग हैं, जिन्हें पूर्ण बनाया जा सकता है, और वे निःसंदेह पूर्णता के पथ पर चलने में समर्थ होंगे। जिन्हें पूर्ण नहीं बनाया जा सकता है, ये वे लोग हैं जो परमेश्वर के कार्य की स्पष्ट समझ के बिना हैं, जो परमेश्वर के वचनों को खाते और पीते नहीं हैं, जो उसके वचनों पर कोई ध्यान नहीं देते, और जिनके हृदय में परमेश्वर के लिए कोई प्रेम नहीं है। जो देहधारी परमेश्वर पर संदेह करते हैं, उसके बारे में हमेशा अनिश्चित रहते हैं, उसके वचनों को कभी भी गंभीरता से नहीं लेते हैं, और हमेशा उसे धोखा देते हैं, वे ऐसे लोग हैं जो परमेश्वर का विरोध करते हैं और शैतान के संबंधी हैं; ऐसे लोगों को परिपूर्ण बनाने का कोई तरीका नहीं है।

यदि तू पूर्ण बनाया जाना चाहता है, तो पहले तुझ पर परमेश्वर द्वारा कृपा की जानी चाहिए, क्योंकि वह उन्हें पूर्ण बनाता है, जिन पर वह कृपा करता है, जो उसके हृदय के अनुसार होते हैं। यदि तू परमेश्वर के हृदय के अनुसार होना चाहता है, तो तेरे पास ऐसा हृदय अवश्य होना चाहिए जो उसके कार्यों का पालन करता हो, तुझे सत्य का अनुसरण करने का प्रयास अवश्य करना चाहिए, और तुझे सभी बातों में परमेश्वर की छानबीन को अवश्य स्वीकार करना चाहिए। क्या तू जो कुछ भी करता है, वो परमेश्वर की छानबीन से गुजरता है? क्या तेरा इरादा सही है? यदि तेरा इरादा सही है, तो परमेश्वर तेरी प्रशंसा करेगा; यदि तेरा इरादा ग़लत है, तो यह दिखाता है, कि जिसे तेरा दिल प्यार करता है वह परमेश्वर नहीं है, बल्कि यह देह और शैतान है। इसलिए तुझे सभी बातों में परमेश्वर की छानबीन को स्वीकार करने के लिए प्रार्थना को माध्यम के रूप में इस्तेमाल करना चाहिए। जब तू प्रार्थना करता है, तब भले ही मैं व्यक्तिगत रूप से तेरे सामने खड़ा नहीं होता हूँ, लेकिन पवित्र आत्मा तेरे साथ होता है, और यह स्वयं मुझसे और पवित्र आत्मा से तू प्रार्थना कर रहा होता है। तू इस देह पर क्यों भरोसा करता है? तू इसलिए भरोसा करता है क्योंकि उसमें परमेश्वर का आत्मा है। यदि वह व्यक्ति परमेश्वर के आत्मा के बिना होता तो क्या तू उस पर भरोसा करता? जब तू इस व्यक्ति पर भरोसा करता है, तो तू परमेश्वर के आत्मा पर भरोसा करता है। जब तू इस व्यक्ति से डरता है, तो तू परमेश्वर के आत्मा से डरता है। परमेश्वर के आत्मा पर भरोसा इस व्यक्ति पर भरोसा करना है, और इस व्यक्ति पर भरोसा करना, परमेश्वर के आत्मा पर भरोसा करना भी है। जब तू प्रार्थना करता है, तो तू महसूस करता है कि परमेश्वर का आत्मा तेरे साथ है, और परमेश्वर तेरे सामने है; इसलिए तू उसके आत्मा से प्रार्थना करता है। आज, अधिकांश लोग अपने कृत्यों को परमेश्वर के सम्मुख लाने से बहुत डरते हैं; जबकि तू परमेश्वर की देह को धोखा दे सकता है, परन्तु उसके आत्मा को धोखा नहीं दे सकता है। कोई भी बात, जो परमेश्वर की छानबीन का सामना नहीं कर सकती, वह सत्य के अनुरूप नहीं है, और उसे अलग कर देना चाहिए; ऐसा न करना परमेश्वर के विरूद्ध पाप करना है। इसलिए, तुझे हर समय, जब तू प्रार्थना करता है, जब तू अपने भाई-बहनों के साथ बातचीत और संगति करता है, और जब तू अपना कर्तव्य करता है और अपने काम में लगा रहता है, तो तुझे अपना हृदय परमेश्वर के सम्मुख अवश्य रखना चाहिए। जब तू अपना कार्य पूरा करता है, तो परमेश्वर तेरे साथ होता है, और जब तक तेरा इरादा सही है और परमेश्वर के घर के कार्य के लिए है, तब तक जो कुछ भी तू करेगा, परमेश्वर उसे स्वीकार करेगा; इसलिए तुझे अपने कार्य को पूरा करने के लिए अपने आपको ईमानदारी से समर्पित कर देना चाहिए। जब तू प्रार्थना करता है, यदि तेरे हृदय में परमेश्वर के लिए प्रेम है, और यदि तू परमेश्वर की देखभाल, संरक्षण और छानबीन की तलाश करता है, यदि ये चीज़ें तेरे इरादे हैं, तो तेरी प्रार्थनाएँ प्रभावशाली होंगी। उदाहरण के लिए, जब तू सभाओं में प्रार्थना करता है, यदि तू अपना हृदय खोल कर परमेश्वर से प्रार्थना करता है, और बिना झूठ बोले परमेश्वर से बोल देता है कि तेरे हृदय में क्या है, तब तेरी प्रार्थनाएँ निश्चित रूप से प्रभावशाली होंगी। यदि तू ईमानदारी से अपने दिल में परमेश्वर से प्रेम करता है, तो परमेश्वर से एक प्रतिज्ञा कर : "परमेश्वर, जो कि स्वर्ग में और पृथ्वी पर और सब वस्तुओं में है, मैं तुझसे प्रतिज्ञा करता हूँ : तेरा आत्मा, जो कुछ मैं करता हूँ, उसे जाँचे और मेरी सुरक्षा करे और हर समय मेरी देखभाल करे, इसे संभव बनाए कि मेरे सभी कृत्य तेरी उपस्थिति में खड़े रह सकें। यदि कभी भी मेरा हृदय तुझसे प्यार करना बंद कर दे, या यह कभी भी तुझसे विश्वासघात करे, तो तू मुझे कठोरता से ताड़ना और श्राप दे। मुझे ना तो इस जगत में और न आगे क्षमा कर!" क्या तू ऐसी शपथ खाने की हिम्मत करता है? यदि तू नहीं करता है, तो यह दर्शाता है कि तू कायर है, और तू अभी भी खुद से ही प्यार करता है। क्या तुम लोगों के पास यह संकल्प है? यदि वास्तव में यही तेरा संकल्प है, तो तुझे प्रतिज्ञा लेनी चाहिए। यदि तेरे पास ऐसी प्रतिज्ञा लेने का संकल्प है, तो परमेश्वर तेरे संकल्प को पूरा करेगा। जब तू परमेश्वर से प्रतिज्ञा करता है, तो वह सुनता है। परमेश्वर तेरी प्रार्थना और तेरे अभ्यास से निर्धारित करता है कि तू पापी है या धार्मिक। यह अब तुम लोगों को पूर्ण बनाने की प्रक्रिया है, और यदि पूर्ण बनाए जाने पर वास्तव में तुझे विश्वास है, तो तू जो कुछ भी करता है, वह सब परमेश्वर के सम्मुख लाएगा और उसकी छानबीन को स्वीकार करेगा; और यदि तू कुछ ऐसा करता है जो उग्र रूप से विद्रोहशील है या यदि तू परमेश्वर के साथ विश्वासघात करता है, तो परमेश्वर तेरी प्रतिज्ञा को साकार करेगा, और तब इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि तेरे साथ क्या होता है, चाहे वह विनाश हो या ताड़ना, यह तेरे स्वयं का कार्य है। तूने प्रतिज्ञा ली थी, इसलिए तुझे ही इसका पालन करना चाहिए। यदि तूने कोई प्रतिज्ञा की, लेकिन उसका पालन नहीं किया, तो तुझे विनाश भुगतना होगा। चूँकि प्रतिज्ञा तेरी थी, परमेश्वर तेरी प्रतिज्ञा को साकार करेगा। कुछ लोग प्रार्थना के बाद डरते हैं, और विलाप करते हैं, "सब ख़त्म हो गया! व्यभिचार का मेरा मौका चला गया; दुष्ट चीजें करने का मेरा मौका चला गया; सांसारिक लालचों में लिप्त होने का मेरा मौका चला गया!" ऐसे लोग अभी भी सांसारिकता और पाप को ही प्यार करते हैं, और उन्हें निश्चित ही विनाश को भुगतना पड़ेगा।

परमेश्वर में विश्वासी होने का अर्थ है कि तेरे सारे कृत्य उसके सम्मुख लाये जाने चाहिए और उन्हें उसकी छानबीन के अधीन किया जाना चाहिए। यदि तू जो कुछ भी करता है उसे परमेश्वर के आत्मा के सम्मुख ला सकते हैं लेकिन परमेश्वर की देह के सम्मुख नहीं ला सकते, तो यह दर्शाता है कि तूने अपने आपको उसके आत्मा की छानबीन के अधीन नहीं किया है। परमेश्वर का आत्मा कौन है? कौन है वो व्यक्ति जिसकी परमेश्वर द्वारा गवाही दी जाती है? क्या वे एक समान नहीं है? अधिकांश उसे दो अलग अस्तित्व के रूप में देखते हैं, ऐसा विश्वास करते हैं कि परमेश्वर का आत्मा तो परमेश्वर का आत्मा है, और परमेश्वर जिसकी गवाही देता है वह व्यक्ति मात्र एक मानव है। लेकिन क्या तू गलत नहीं है? किसकी ओर से यह व्यक्ति काम करता है? जो लोग देहधारी परमेश्वर को नहीं जानते, उनके पास आध्यात्मिक समझ नहीं होती है। परमेश्वर का आत्मा और उसका देहधारी देह एक ही हैं, क्योंकि परमेश्वर का आत्मा देह रूप में प्रकट हुआ है। यदि यह व्यक्ति तेरे प्रति निर्दयी है, तो क्या परमेश्वर का आत्मा दयालु होगा? क्या तू भ्रमित नही है? आज, जो कोई भी परमेश्वर की छानबीन को स्वीकार नहीं कर सकता है, वह परमेश्वर की स्वीकृति नहीं पा सकता है, और जो देहधारी परमेश्वर को न जानता हो, उसे पूर्ण नहीं बनाया जा सकता। अपने सभी कामों को देख और समझ कि जो कुछ तू करता है वह परमेश्वर के सम्मुख लाया जा सकता है कि नहीं। यदि तू जो कुछ भी करता है, उसे तू परमेश्वर के सम्मुख नहीं ला सकता, तो यह दर्शाता है कि तू एक दुष्ट कर्म करने वाला है। क्या दुष्कर्मी को पूर्ण बनाया जा सकता है? तू जो कुछ भी करता है, हर कार्य, हर इरादा, और हर प्रतिक्रिया, अवश्य ही परमेश्वर के सम्मुख लाई जानी चाहिए। यहाँ तक कि, तेरे रोजाना का आध्यात्मिक जीवन भी—तेरी प्रार्थनाएँ, परमेश्वर के साथ तेरा सामीप्य, परमेश्वर के वचनों को खाने और पीने का तेरा ढंग, भाई-बहनों के साथ तेरी सहभागिता, और कलीसिया के भीतर तेरा जीवन—और साझेदारी में तेरी सेवा परमेश्वर के सम्मुख उसके द्वारा छानबीन के लिए लाई जा सकती है। यह ऐसा अभ्यास है, जो तुझे जीवन में विकास हासिल करने में मदद करेगा। परमेश्वर की छानबीन को स्वीकार करने की प्रक्रिया शुद्धिकरण की प्रक्रिया है। जितना तू परमेश्वर की छानबीन को स्वीकार करता है, उतना ही तू शुद्ध होता जाता है और उतना ही तू परमेश्वर की इच्छा के अनुसार होता है, जिससे तू व्यभिचार की ओर आकर्षित नहीं होगा और तेरा हृदय उसकी उपस्थिति में रहेगा; जितना तू उसकी छानबीन को ग्रहण करता है, शैतान उतना ही लज्जित होता है और उतना अधिक तू देहसुख को त्यागने में सक्षम होता है। इसलिए, परमेश्वर की छानबीन को ग्रहण करना अभ्यास का वो मार्ग है जिसका सभी को अनुसरण करना चाहिए। चाहे तू जो भी करे, यहाँ तक कि अपने भाई-बहनों के साथ सहभागिता करते हुए भी, यदि तू अपने कर्मों को परमेश्वर के सम्मुख ला सकता है और उसकी छानबीन को चाहता है और तेरा इरादा स्वयं परमेश्वर की आज्ञाकारिता का है, इस तरह जिसका तू अभ्यास करता है वह और भी सही हो जाएगा। केवल जब तू जो कुछ भी करता है, वो सब कुछ परमेश्वर के सम्मुख लाता है और परमेश्वर की छानबीन को स्वीकार करता है, तो वास्तव में तू ऐसा कोई हो सकता है जो परमेश्वर की उपस्थिति में रहता है।

जिनके पास परमेश्वर की समझ नहीं होती वे कभी भी पूरी तरह परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारी नहीं हो सकते। ऐसे लोग अनाज्ञाकारिता के पुत्र हैं। वे बहुत महत्वाकांक्षी हैं, और उनमें बहुत अधिक विद्रोह है, इसलिए वे खुद को परमेश्वर से दूर कर लेते हैं और उसकी छानबीन को स्वीकार करने के लिए इच्छुक नहीं हैं। ऐसे लोग आसानी से पूर्ण नहीं बनाए जा सकते हैं। कुछ लोग परमेश्वर के वचनों को खाने और पीने के अपने ढंग के मामले में, और उनके प्रति अपनी स्वीकृति में चयनशील होते हैं। वे परमेश्वर के वचन के उन भागों को ग्रहण करते हैं जो उनकी धारणा के अनुसार होते हैं जबकि उन्हें अस्वीकार कर देते हैं जो उनकी धारणा के अनुसार नहीं हैं। क्या यह परमेश्वर के खिलाफ सबसे स्पष्ट विद्रोह और प्रतिरोध नहीं है? यदि कोई परमेश्वर के बारे में थोड़ी-सी भी समझ हासिल किए बगैर वर्षों से उस पर विश्वास कर रहा हो, तो वह एक अविश्वासी है। जो लोग परमेश्वर की छानबीन को ग्रहण करने के इच्छुक हैं वे परमेश्वर की समझ पाने की कोशिश करते हैं, वे उसके वचनों को ग्रहण करना चाहते हैं। ये वे हैं, जो परमेश्वर का उत्तराधिकार और आशीषें प्राप्त करेंगे, और वे सबसे धन्य हैं। परमेश्वर उन्हें श्राप देता है जिनके दिलों में उसके लिए कोई स्थान नहीं है। वह ऐसे लोगों को ताड़ना देता है और उन्हें त्याग देता है। यदि तू परमेश्वर से प्यार नहीं करता, तो वो तुझे त्याग देगा और यदि मैं जो कहता हूँ तू उसे नहीं सुनता है, तो मैं वादा करता हूँ कि परमेश्वर का आत्मा तुझे त्याग देगा। यदि तुझे भरोसा नहीं है, तो कोशिश करके देख ले! आज, मैं तुझे अभ्यास के लिए एक रास्ता स्पष्ट रूप से बताता हूँ, लेकिन तू इसे अभ्यास में लाता है या नहीं यह तेरे ऊपर है। यदि तू इसमें विश्वास नहीं करता है, यदि तू इसे अभ्यास में नहीं लाता है, तो तू स्वयं देखेगा कि पवित्र आत्मा तुझमें कार्य करता है या नहीं! यदि तू परमेश्वर के बारे में समझ पाने की कोशिश नहीं करता है, तो पवित्र आत्मा तुझमें कार्य नहीं करेगा। परमेश्वर उसमें कार्य करता है जो परमेश्वर के वचनों को संजोते और उसका अनुसरण करते हैं। जितना तू परमेश्वर के वचनों को संजोयेगा, उतना ही उसका आत्मा तुझमें कार्य करेगा। कोई व्यक्ति परमेश्वर के वचन को जितना ज्यादा संजोता है, उसका परमेश्वर के द्वारा पूर्ण बनाए जाने का मौका उतना ही ज्यादा होता है। परमेश्वर उसे पूर्ण बनाता है, जो वास्तव में उससे प्यार करता है। वह उसको पूर्ण बनाता है, जिसका हृदय उसके सम्मुख शांत रहता है। परमेश्वर के सभी कार्य को संजोना, उसकी प्रबुद्धता को संजोना, परमेश्वर की उपस्थिति को संजोना, परमेश्वर की देखभाल और सुरक्षा को संजोना, इस बात को संजोना कि कैसे परमेश्वर के वचन तेरे जीवन की वास्तविकता बन जाते हैं और तेरे जीवन की आपूर्ति करते हैं—यह सब परमेश्वर के दिल के सबसे अनुरूप है। यदि तू परमेश्वर के कार्य को संजोता है, अर्थात यदि उसने तुझ पर जो सारे कार्य किए हैं, तू उसे संजोता है, तो वह तुझे आशीष देगा और जो कुछ तेरा है उसे बहुगुणित करेगा। यदि तू परमेश्वर के वचनों को नहीं संजोता है, तो परमेश्वर तुझ पर कार्य नहीं करेगा, बल्कि वह केवल तेरे विश्वास के लिए ज़रा-सा अनुग्रह देगा, या तुझे कुछ धन की आशीष या तेरे परिवार के लिए थोड़ी सुरक्षा देगा। परमेश्वर के वचनों को अपनी वास्तविकता बनाने, उसे संतुष्ट करने और उसके दिल के अनुसार होने के लिए तुझे कडा प्रयास करना चाहिए; तुझे केवल परमेश्वर के अनुग्रह का आनंद लेने का ही प्रयास नहीं करना चाहिए। विश्वासियों के लिए परमेश्वर के कार्य को प्राप्त करने, पूर्णता पाने, और परमेश्वर की इच्छा पर चलनेवालों में से एक बनने की अपेक्षा कुछ भी अधिक महत्वपूर्ण नहीं है। यह वो लक्ष्य है जिसे पूरा करने का तुझे प्रयास करना चाहिए।

अनुग्रह के युग में जिसका मनुष्य ने अनुसरण किया, वह अब अप्रचलित हो गया है क्योंकि वर्तमान में अनुसरण का एक उच्चतर मानक है, जिसका अनुसरण किया जाता है वह अधिक उत्कृष्ट भी है और अधिक व्यावहारिक भी, जिसका अनुसरण किया जाता है वो मनुष्य की भीतरी आवश्यकता को बेहतर ढंग से संतुष्ट कर सकता है। पिछले युगों में, परमेश्वर लोगों पर उस तरह कार्य नहीं करता था जैसे आज करता है, वह लोगों से उतनी बातें नहीं करता था जितनी आज करता है, न ही उसे उनसे उतनी अपेक्षा थी जितनी की आज के लोगों से है। आज जो परमेश्वर इन बातों को तुम लोगों को बताता है, वह दिखाता है कि परमेश्वर का अंतिम इरादा तुम लोगों पर, यानि इस समूह पर ध्यान केन्द्रित करना है। यदि तू वास्तव में परमेश्वर के द्वारा पूर्ण बनाया जाना चाहता है, तो सबसे महत्वपूर्ण लक्ष्य के रूप में इसका अनुसरण कर। कोई फर्क नहीं पड़ता कि क्या तू भाग-दौड़ करता है, खुद को खपाता है, किसी काम में आता है, या तूने परमेश्वर द्वारा आदेश पाया है या नहीं, पूर्ण बनाया जाना और परमेश्वर की इच्छा को संतुष्ट करना, इन लक्ष्यों को पाना ही हमेशा उद्देश्य होता है। यदि कोई कहता है, कि वह परमेश्वर द्वारा पूर्णता या जीवन में प्रवेश का अनुसरण नहीं करता है, बल्कि केवल शारीरिक शांति और आनंद का पीछा करता है, तो वह सभी लोगों से अधिक अंधा है। जो लोग जीवन की वास्तविकता का अनुसरण नहीं करते बल्कि केवल आने वाली दुनिया में अनन्त जीवन और इस दुनिया में सुरक्षा के लिए प्रयास करते हैं, वे सभी लोगों से अधिक अंधे हैं। इसलिए सब कुछ जो तू करता है, वह परमेश्वर के द्वारा पूर्ण बनाए जाने और उसके द्वारा प्राप्त किए जाने के उद्देश्य से किया जाना चाहिए।

परमेश्वर लोगों पर जो कार्य करता है, वह उनकी विभिन्न प्रकार की आवश्यकताओं के आधार पर उनकी आपूर्ति करने के लिए है। जितनी बड़ी एक आदमी की जिन्दगी होती है, उसकी आवश्यकताएं उतनी ही ज्यादा होती हैं, और उतना ही ज्यादा वह अनुसरण करता है। यदि इस चरण में तेरे पास कोई लक्ष्य नहीं हैं, यह साबित करता है कि पवित्र आत्मा ने तुझे छोड़ दिया है। सभी जो जीवन की तलाश करते हैं, वे कभी भी पवित्र आत्मा के द्वारा नहीं त्यागे जाएंगे; ऐसे लोग हमेशा तलाश करते हैं, उनके दिल में हमेशा लालसा होती है। इस प्रकार के लोग चीज़ों की वर्तमान स्थिति से कभी भी संतुष्ट नहीं होते। पवित्र आत्मा के कार्यों के प्रत्येक चरण का उदेश्य तुम में एक प्रभाव प्राप्त करना है, लेकिन यदि तुम आत्मसंतुष्टि विकसित कर लेते हो, यदि तुम्हारी कोई आवश्यकता नहीं रह जाती है, यदि तुम पवित्र आत्मा के कार्य को स्वीकार नहीं करते हो, तो वह तुम्हें छोड़ देगा। लोगों को हर दिन परमेश्वर की छानबीन की आवश्यकता होती है; उन्हें परमेश्वर से हर दिन भरपूर मात्रा में प्रावधान की आवश्यकता होती है। क्या लोग प्रतिदिन परमेश्वर के वचनों को खाए और पीए बिना रह सकते हैं? यदि कोई ऐसा हमेशा महसूस करता है कि वह परमेश्वर के वचनों को जितना भी खा-पी ले, यह कम ही रहेगा, यदि वह इसे हमेशा खोजता है, और हमेशा इसके लिए भूखा और प्यासा होता है, तो पवित्र आत्मा हमेशा उसमें कार्य करेगा। जितना ज्यादा कोई लालसा करता है, उतना ही ज्यादा व्यवहारिक चीजें सहभागिता से मिल सकती हैं। जितनी गहनता से कोई सत्य को खोजता है, उतनी ही तेजी से उसका जीवन बढ़ता है, जिससे वो अनुभव से भरपूर हो जाता है और परमेश्वर के भवन का समृद्ध बाशिंदा हो जाता है।

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