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परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर I

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परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर I

आज हम एक महत्वपूर्ण विषय पर बातचीत कर रहे हैं। यह ऐसा विषय है जिस पर परमेश्वर के कार्य की शुरुआत से लेकर अब तक चर्चा की गई है, और यह प्रत्येक व्यक्ति के लिए अत्यधिक महत्व रखता है। दूसरे शब्दों में, यह ऐसा विषय है, जिसके सम्पर्क में प्रत्येक व्यक्ति परमेश्वर में अपने विश्वास की प्रक्रिया के दौरान आएगा और ऐसा विषय है जिस पर चर्चा की जानी चाहिए। यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण, एवं अनिवार्य विषय है जिसे मानवजाति खुद से अलग नहीं कर सकती है। इसके महत्व के बारे में कहें, तो परमेश्वर में प्रत्येक विश्वासी के लिए सबसे अधिक महत्वपूर्ण बात क्या है? कुछ लोग सोचते हैं कि परमेश्वर की इच्छा को समझना सबसे महत्वपूर्ण बात है; कुछ लोग विश्वास करते हैं कि सबसे महत्वपूर्ण यह है कि परमेश्वर के और अधिक वचनों को खाया एवं पिया जाए; कुछ महसूस करते हैं कि सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि स्वयं को जाना जाए; अन्य लोग ऐसी राय के हैं कि सबसे महत्वपूर्ण बात यह जानना है कि किस प्रकार परमेश्वर के माध्यम से उद्धार की खोज की जाए, कि किस प्रकार परमेश्वर का अनुसरण किया जाए, और किस प्रकार परमेश्वर की इच्छा को पूरा किया जाए। हम आज के लिए इन सभी विषयों को एक तरफ रखेंगे। तो हम क्या बातचीत कर रहे हैं? हम परमेश्वर के बारे में एक विषय पर बातचीत कर रहे हैं। क्या यह प्रत्येक व्यक्ति के लिए सबसे अधिक महत्वपूर्ण विषय है? परमेश्वर के बारे में किसी विषय की विषयवस्तु क्या है? हाँ वास्तव में, इस विषय को परमेश्वर के स्वभाव, परमेश्वर के सार एवं परमेश्वर के कार्य से अलग नहीं किया जा सकता है। अतः आज, आइए हम "परमेश्वर के कार्य, परमेश्वर के स्वभाव एवं स्वयं परमेश्वर" के बारे में चर्चा करें।

उस समय से जब मनुष्य ने परमेश्वर में विश्वास करना शुरू किया था, वे परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव एवं स्वयं परमेश्वर, जैसे विषयों के सम्पर्क में रहे हैं। जब परमेश्वर के कार्य की बात आती है, तो कुछ लोग कहेंगे: "परमेश्वर का कार्य हम पर किया जाता है; हम इसे हर दिन अनुभव करते हैं, अतः हम इससे अनजान नहीं हैं।" परमेश्वर के स्वभाव के बारे में कहें तो, कुछ लोग कहेंगे: "परमेश्वर का स्वभाव ऐसा विषय है जिसे हम अध्ययन करते हैं, खोजते हैं और जिस पर हम पूरे जीवन भर ध्यान केन्द्रित करते हैं, अतः हमें इससे सुपरिचित होना चाहिए।" जहाँ तक स्वयं परमेश्वर की बात है, कुछ लोग कहेंगे: "स्वयं परमेश्वर वह है जिसका हम अनुसरण करते हैं, जिसमें हमारा विश्वास है, और वह है जिसकी हम निरन्तर खोज करते हैं, अतः हम उसके बारे में अज्ञात भी नहीं हैं।" परमेश्वर ने सृष्टि के समय से अपने कार्य को कभी नहीं रोका है, जिसके दौरान उसने निरन्तर अपने स्वभाव को अभिव्यक्त किया है और अपने वचन को अभिव्यक्त करने के लिए विभिन्न तरीकों का उपयोग किया है। और उसके साथ ही, उसने अपने आपको एवं अपने सार को मानवजाति पर अभिव्यक्त करने से, और मनुष्य पर अपनी इच्छा को और जो कुछ वह मनुष्य से अपेक्षा करता है उसको अभिव्यक्त करने से नहीं रुका है। अतः एक शाब्दिक दृष्टिकोण से, ये विषय किसी के लिए भी अनजाने नहीं होने चाहिए। फिर भी उन लोगों के लिए जो आज परमेश्वर का अनुसरण करते हैं, परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव एवं स्वयं परमेश्वर वे सभी वास्तव में उनके लिए बिलकुल अनजान हैं। स्थिति ऐसी क्यों है? जैसे-जैसे मनुष्य परमेश्वर के कार्य का अनुभव करते हैं, वे परमेश्वर के साथ सम्पर्क में भी आ रहे हैं, जो उनको महसूस कराते हैं मानो वे परमेश्वर के स्वभाव को समझते हैं या यह कैसा है इसके बारे में थोड़ा कुछ जानते हैं। तदनुसार, मनुष्य नहीं सोचते कि वे परमेश्वर के कार्य या परमेश्वर के स्वभाव के प्रति एक अजनबी हैं। इसके बजाय, मनुष्य सोचते हैं कि वे परमेश्वर के साथ बहुत सुपरिचित हैं और परमेश्वर के बारे में काफी कुछ समझते हैं। लेकिन वर्तमान परिस्थिति के आधार पर, परमेश्वर के बारे में बहुत से लोगों की समझ उनके द्वारा पुस्तकों में पढ़ी गई बातों तक, उनके व्यक्तिगत अनुभवों के दायरे तक सीमित होती है, उनकी कल्पनाओं के द्वारा नियंत्रित होती है, और सबसे अधिक, उन तथ्यों तक सीमित होती है जिन्हें वे अपनी आँखों से देख सकते हैं। यह सब कुछ स्वयं सच्चे परमेश्वर से बहुत दूर है। तो यह "दूर" कितना दूर है? कदाचित् मनुष्य खुद निश्चित नहीं है, या कदाचित् मनुष्य को थोड़ा सा एहसास है, हल्का सा आभास है—लेकिन जब स्वयं परमेश्वर की बात आती है, तो उसके बारे में मनुष्य की समझ स्वयं सच्चे परमेश्वर के सार से बहुत परे है। इसीलिए हमें इस जानकारी का क्रमानुसार एवं विशेष रूप से संवाद करने के लिए "परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर" जैसे विषय का आवश्यक रूप से उपयोग करना पड़ता है।

वास्तव में, परमेश्वर का स्वभाव सब के लिए खुला हुआ है और यह छिपा हुआ नहीं है, क्योंकि परमेश्वर ने जान-बूझकर कभी भी किसी व्यक्ति को दूर नहीं किया है और उसने कभी भी जान-बूझकर स्वयं को छिपाने का प्रयास नहीं किया है जिससे लोग उसे जानने या समझने के योग्य नहीं हो पाएँगे। परमेश्वर का स्वभाव हमेशा से ही खुला हुआ है और हमेशा से ही खुले तौर पर प्रत्येक व्यक्ति का सामना करता आया है। परमेश्वर के प्रबंधन के दौरान, परमेश्वर अपना कार्य करता है, प्रत्येक का सामना करता है; और उसका कार्य हर एक व्यक्ति पर किया जाता है। जब वह यह कार्य करता है, तो वह लगातार अपने स्वभाव को प्रकट करता है, और वह हर एक व्यक्ति की अगुवाई एवं आपूर्ति करने के लिए लगातार अपने सार का और जो स्वरूप का उपयोग करता है। चाहे परिस्थितियाँ अच्छी हों या बुरी, हर युग में और हर चरण पर, परमेश्वर का स्वभाव प्रत्येक व्यक्ति के लिए हमेशा खुला होता है, और उसका स्वरूप एवं अस्तित्व प्रत्येक व्यक्ति के लिए हमेशा खुले होते हैं, उसी रीति से उसका जीवन लगातार एवं बिना रुके मानवजाति के लिए आपूर्ति कर रहा है और मानवजाति को सहारा दे रहा है। इन सब के बावजूद, परमेश्वर का स्वभाव कुछ लोगों के लिए छुपा रहता है। ऐसा क्यों हैं? ऐसा इसलिए है क्योंकि भले ही ये लोग परमेश्वर के कार्य के अंतर्गत रहते हैं और परमेश्वर का अनुसरण करते हैं, फिर भी उन्होंने कभी भी परमेश्वर को समझने का प्रयास या परमेश्वर को जानने की इच्छा नहीं की है, परमेश्वर के निकट आने की तो बात ही छोड़ दीजिए। इन लोगों के लिए, परमेश्वर के स्वभाव को समझने का अर्थ है कि उनका अंत आ रहा है; इसका अर्थ है कि परमेश्वर के स्वभाव के द्वारा उनका न्याय किया जाने वाला है और उन्हें दोषी ठहराया जानेवाला है। इसलिए, इन लोगों ने कभी भी परमेश्वर या उसके स्वभाव को समझने की इच्छा नहीं की है, और उन्होंने परमेश्वर की इच्छा की गहरी समझ या ज्ञान की लालसा नहीं की है। वे सचेत सहयोग के माध्यम से परमेश्वर की इच्छा को समझने का इरादा नहीं करते हैं—वे तो बस सदा मौज-मस्ती करते हैं और उन कार्यों को करते हुए कभी नहीं थकते हैं जिन्हें वे करना चाहते हैं; वे ऐसे परमेश्वर में विश्वास करते हैं जिसमें वे विश्वास करना चाहते हैं; वे ऐसे परमेश्वर में विश्वास करते हैं जो केवल उनकी कल्पनाओं में ही मौजूद है, ऐसा परमेश्वर जो केवल उनकी अवधारणाओं में ही मौजूद है; और ऐसे परमेश्वर में विश्वास करते हैं जिसे उनके दैनिक जीवन में उनसे अलग नहीं किया जा सकता है। जब स्वयं सच्चे परमेश्वर की बात आती है, तो वे पूर्णतः उपेक्षापूर्ण हो जाते हैं, उसे समझने के लिए, एवं उस पर ध्यान देने के लिए उनमें कोई इच्छा नहीं होती है, और उनके पास उसके करीब आने का इरादा तो बिलकुल भी नहीं होता है। वे स्वयं को छिपाने के लिए, एवं स्वयं को विशेष रीति से प्रस्तुत करने के लिए उन वचनों का उपयोग कर रहे हैं जिन्हें परमेश्वर अभिव्यक्त करता है। उनके लिए, यह उनको पहले से ही सफल विश्वासी एवं ऐसा बना देता है जिनके हृदय के भीतर परमेश्वर के प्रति विश्वास है। उनके हृदय में, उनकी कल्पनाओं, उनकी अवधारणाओं, और यहाँ तक कि परमेश्वर के बारे में उनकी व्यक्तिगत परिभाषाओं के द्वारा उन्हें मार्गदर्शन दिया जाता है। दूसरी ओर, स्वयं सच्चे परमेश्वर का उनके साथ कोई वास्ता नहीं है। क्योंकि जब वे एक बार स्वयं सच्चे परमेश्वर को समझ जाते हैं, परमेश्वर के सच्चे स्वभाव को समझ जाते हैं, और जो वह है उसे समझ जाते हैं, तो इसका अर्थ है कि उनके कार्य, उनके विश्वास, और उनके अनुसरण को दोषी ठहराया जाएगा। इसीलिए वे परमेश्वर के सार को समझने के लिए तैयार नहीं हैं, और इसीलिए वे परमेश्वर को अच्छे से समझने, परमेश्वर की इच्छा को अच्छे से जानने, और परमेश्वर के स्वभाव को अच्छे से समझने के लिए सक्रिय रूप से खोजने या प्रार्थना करने की इच्छा नहीं रखते और उसके खिलाफ हैं। इसके बजाय वे चाहेंगे कि परमेश्वर कुछ ऐसा हो जिसे बनाया गया हो, जो खोखला एवं मायावी हो। इसके बजाय वे चाहेंगे कि परमेश्वर कोई ऐसा हो जो बिलकुल उनकी कल्पना जैसा हो, कोई ऐसा जो उनके आदेश को मानने के लिए हमेशा तैयार रहे, आपूर्ति करने में सदा भरपूर और हमेशा उपलब्ध रहे। जब वे परमेश्वर के अनुग्रह का आनन्द लेना चाहते हैं, तो वे परमेश्वर से माँगते हैं कि वह वो अनुग्रह बन जाए। जब उन्हें परमेश्वर की आशीष की आवश्यकता होती है, तो वे परमेश्वर से माँगते हैं कि वह वो आशीष बन जाए। जब वे कठिनाई का सामना करते हैं, तो वे परमेश्वर से माँगते हैं कि वह उन्हें मजबूत बनाए, और उनका सुरक्षा-जाल बन जाए। परमेश्वर के विषय में इन लोगों का ज्ञान अनुग्रह एवं आशीष की परिधि के भीतर ही अटका रहता है। परमेश्वर के कार्य, परमेश्वर के स्वभाव, और परमेश्वर के विषय में उनकी समझ भी उनकी कल्पनाओं और मात्र पत्रों एवं सिद्धान्तों तक ही सीमित होती है। लेकिन कुछ ऐसे लोग हैं जो परमेश्वर के स्वभाव को समझने के लिए उत्सुक हैं, जो असल में परमेश्वर को देखना चाहते हैं, और सचमुच में परमेश्वर के स्वभाव और स्वरूप को समझना चाहते हैं। ये लोग सच्चाई की वास्तविकता एवं परमेश्वर के उद्धार की निरन्तर खोज में रहते हैं, और परमेश्वर के विजय, उद्धार एवं सिद्धता को प्राप्त करने का प्रयास करते हैं। ये लोग परमेश्वर के वचन को पढ़ने के लिए अपने हृदय का उपयोग करते हैं, प्रत्येक परिस्थिति एवं प्रत्येक व्यक्ति, घटना या ऐसी चीज़ की तारीफ करने के लिए अपने हृदय का उपयोग करते हैं, जिसकी व्यवस्था परमेश्वर ने उनके लिए की है। और प्रार्थना करते हैं और ईमानदारी से तलाश करते हैं। जिसे वे सब से अधिक चाहते हैं वह यह है कि वे परमेश्वर की इच्छा को जानें और परमेश्वर के सच्चे स्वभाव एवं सार को समझें। ऐसा इसलिए है ताकि वे आगे से परमेश्वर को ठेस नहीं पहुँचाएं, और अपने अनुभवों के माध्यम से, वे परमेश्वर की सुंदरता और उसके सच्चे पहलू को देखने के योग्य हों। यह इसलिए भी है जिससे एक असल सच्चा परमेश्वर उनके हृदय के भीतर बसेगा, और जिससे उनके हृदय में परमेश्वर के लिए एक स्थान होगा, कुछ इस तरह कि वे आगे से कल्पनाओं, अवधारणाओं या छलावे के मध्य जीवन नहीं बिता रहे होंगे। इन लोगों के पास परमेश्वर के स्वभाव एवं उसके सार को समझने कीएक प्रबल इच्छा होने का कारण यह है कि परमेश्वर का स्वभाव एवं सार ऐसी चीज़ें हैं जिनकी आवश्यकता मानवजाति को उनके अनुभवों में किसी भी क्षण पड़ सकती है, ऐसी चीज़ें जो उनके पूरे जीवनकाल के दौरान जीवन की आपूर्ति करती हैं। जब एक बार वे परमेश्वर के स्वभाव को समझ जाते हैं, तो वे और भी अच्छे से परमेश्वर का आदर करने, परमेश्वर के कार्य के साथ और भी अच्छे से सहयोग करने, और परमेश्वर की इच्छा के प्रति और अधिक विचारशील बनने और अपनी बेहतरीन योग्यता के साथ अपने कर्तव्य को निभाने में सक्षम होंगे। जब परमेश्वर के स्वभाव के प्रति उनकी मनोवृत्ति के सम्बन्ध में दो प्रकार के लोग होते हैं। प्रथम प्रकार के लोग परमेश्वर के स्वभाव को समझना नहीं चाहते हैं। यद्यपि वे कहते हैं कि वे परमेश्वर के स्वभाव को समझना चाहते हैं, स्वयं परमेश्वर को जानना चाहते हैं, और जो वह है उसे देखना चाहते हैं, और परमेश्वर की इच्छा का सचमुच सम्मान करना चाहते हैं, फिर भी अपने हृदय की गहराई में वे चाहते हैं कि परमेश्वर अस्तित्व में न रहे। ऐसा इसलिए है क्योंकि इस प्रकार के लोग निरन्तर परमेश्वर की आज्ञा का उल्लंघन और उसका विरोध करते हैं; वे अपने स्वयं के हृदयों में पद के लिए परमेश्वर से लड़ते हैं और परमेश्वर के अस्तित्व पर अक्सर सन्देह और यहाँ तक कि उससे इंकार भी करते हैं। वे परमेश्वर के स्वभाव को, या स्वयं वास्तविक परमेश्वर को अपने हृदयों पर काबिज़ होने नहीं देना चाहते हैं। वे सिर्फ अपनी इच्छाओं, कल्पनाओं एवं महत्वाकांक्षाओं को संतुष्ट करना चाहते हैं। अतः हो सकता है ये लोग परमेश्वर में विश्वास करते हैं, परमेश्वर का अनुसरण करते हैं, और उसके लिए अपने परिवारों एवं नौकरियों को भी त्याग सकते हैं, लेकिन वे अपने बुरे मार्गों का अंत नहीं करते हैं। यहाँ तक कि कुछ लोग भेंटों की भी चोरी करते हैं या उसे उड़ा देते हैं, या एकांत में परमेश्वर को कोसते हैं, जबकि अन्य लोग बार बार स्वयं के विषय में गवाही देने, स्वयं की ख्याति को बढ़ाने, और लोगों एवं हैसियत के लिए परमेश्वर के साथ प्रतिस्पर्धा करने के लिए अपने पदों का उपयोग कर सकते हैं। वे लोगों से अपनी आराधना करवाने के लिए विभिन्न तरीकों एवं साधनों का उपयोग करते हैं, और लोगों को जीतने एवं उनको नियन्त्रित करने की लगातार कोशिश करते हैं। यहाँ तक कि कुछ लोग जानबूझकर लोगों को यह सोचने के लिए गुमराह करते हैं कि वे परमेश्वर हैं और इस प्रकार उनके साथ परमेश्वर के जैसा व्यवहार किया जा सकता है। वे लोगों को कभी नहीं बताएँगे कि उन्हें भ्रष्ट कर दिया गया है, कि वे भी भ्रष्ट एवं अहंकारी हैं, और उनकी आराधना नहीं करनी है, और इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि वे कितना अच्छा करते हैं, यह सब परमेश्वर के ऊंचा उठाने के कारण है और वह है जो उन्हें वैसे भी करना ही चाहिए। वे ऐसी बातों को क्यों नहीं कहते हैं? क्योंकि वे लोगों के हृदयों में अपने स्थान खोने से बहुत अधिक डरते हैं। इसीलिए ऐसे लोग परमेश्वर को कभी ऊँचा नहीं उठाते हैं और परमेश्वर के लिए कभी गवाही नहीं देते हैं, चूँकि उन्होंने परमेश्वर को समझने की कभी कोशिश नहीं की है। क्या वे परमेश्वर को समझे बिना ही उसे जान सकते हैं? असंभव! इस प्रकार, जबकि "परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव एवं स्वयं परमेश्वर", इस विषय के वचन साधारण हो सकते हैं, प्रत्येक के लिए उनका अर्थ अलग होता है। ऐसे व्यक्ति के लिए जो अक्सर परमेश्वर की आज्ञा का उल्लंघन करता है, परमेश्वर का प्रतिरोध करता है, और परमेश्वर के प्रति अत्यंत उग्र है, इसका अर्थ दंडाज्ञा है; जबकि ऐसे व्यक्ति के लिए जो सत्य की वास्तविकता को खोजता है और जो अक्सर परमेश्वर की इच्छा को खोजने के लिए परमेश्वर के सम्मुख आता है, तो वह निःसन्देह बहुत ही स्वाभाविक है। अतः तुम लोगों के बीच में, जब कोई परमेश्वर के स्वभाव एवं परमेश्वर के कार्य के विषय में बातचीत को सुनता है, तो उन्हें सिरदर्द होने लगता है, उनके हृदय प्रतिरोध से भर जाते हैं, और वे अत्यधिक बेचैन हो जाते हैं। लेकिन तुम लोगों में से कुछ ऐसे भी होंगे जो सोचते हैं: यह विषय बिल्कुल वैसा है जैसी मुझे आवश्यकता है, क्योंकि यह विषय मेरे लिए बहुत लाभदायक है। यह एक ऐसा हिस्सा है जो मेरे जीवन के अनुभव से अनुपस्थित नहीं हो सकता है; यह मूल बिंदु का मूल बिंदु है, परमेश्वर में विश्वास का आधार है, और यह कुछ ऐसा है जिसे त्यागना मानवजाति सहन नहीं कर सकती है। तुम लोगों के लिए, हो सकता है कि यह विषय निकट एवं दूर, अनजान फिर भी सुपरिचित, दोनों ही लगे। किन्तु चाहे जो भी हो, यह एक ऐसा विषय है जिसे यहाँ पर बैठे हुए हर एक को सुनना होगा, जानना होगा, और समझना होगा। चाहे तुम इसके साथ कैसा भी व्यवहार करो, चाहे तुम इसे कैसे भी देखो या ग्रहण करो, इस विषय के महत्व को अनदेखा नहीं किया जा सकता है।

मानवजाति की सृष्टि करने के समय से ही परमेश्वर अपना कार्य करता रहा है। शुरूआत में, कार्य बहुत साधारण था, लेकिन फिर भी, इसमें फिर भी परमेश्वर के सार एवं स्वभाव की अभिव्यक्ति शामिल थी। जबकि अब परमेश्वर के कार्य को, उसका अनुसरण करने वाले प्रत्येक व्यक्ति के भीतर परमेश्वर के बड़ी मात्रा में ठोस कार्य करने के द्वारा, और आदि से लेकर अब तक अर्थपूर्ण मात्रा में उसके वचनों की अभिव्यक्ति द्वारा ऊँचा किया गया है, फिर भी परमेश्वर का व्यक्तित्व मानवजाति छिपा हुआहै। हालाँकि वह दो बार देहधारण कर चुका है, फिर भी बाइबल के लेखों के समय से लेकर हाल के दिनों तक, किसने कभी परमेश्वर के वास्तविक व्यक्तित्व को देखा है? तुम लोगों की समझ के आधार पर, क्या कभी किसी ने परमेश्वर के वास्तविक व्यक्तित्व को देखा है? नहीं। किसी ने भी परमेश्वर के वास्तविक व्यक्तित्व को नहीं देखा है, अर्थात् किसी ने भी परमेश्वर के असल रूप को कभी नहीं देखा है। यह कुछ ऐसा है जिसके साथ हर कोई सहमत है। कहने का तात्पर्य है, परमेश्वर का वास्तविक व्यक्तित्व, या परमेश्वर का आत्मा सारी मानवता से छिपा हुआ है, जिसमें आदम और हव्वा भी शामिल हैं, जिन्हें उसने बनाया था, और जिसमें धर्मी अय्यूब शामिल है, जिसे उसने स्वीकार किया था। यहाँ तक कि उन्होंने भी परमेश्वर के वास्तविक व्यक्तित्व को नहीं देखा था। लेकिन क्यों परमेश्वर जान-बूझकर अपने वास्तविक व्यक्तित्व को ढंकता है? कुछ लोग कहते हैं: "परमेश्वर लोगों को भयभीत करने से डरता है।" दूसरे कहते हैं: "परमेश्वर अपने वास्तविक व्यक्तित्व को छुपाता है क्योंकि मनुष्य बहुत छोटा है और परमेश्वर बहुत बड़ा है; मनुष्यों को उसे देखने की अनुमति नहीं दी गई है, अन्यथा वे मर जाएँगे।" कुछ ऐसे भी हैं जो कहते हैं: "परमेश्वर हर दिन अपने कार्य का प्रबंधन करने में व्यस्त रहता है, शायद उसके पास प्रकट होने के लिए समय नहीं है कि लोगों को उसे देखने की अनुमति मिले।" इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता है कि तुम लोग क्या विश्वास करते हो, यहाँ मेरे पास एक निष्कर्ष है। वह निष्कर्ष क्या है? वह निष्कर्ष यह है कि परमेश्वर चाहता भी नहीं है कि लोग उसके वास्तविक व्यक्तित्व को देखें। मानवता से छिपा रहना कुछ ऐसा है जिसे परमेश्वर जान-बूझकर करता है। दूसरे शब्दों में, लोगों के लिए परमेश्वर का उद्देश्य यह है कि वे उसके वास्तविक व्यक्तित्व को न देखें। अब तक यह सब को स्पष्ट हो जाना चाहिए। यदि परमेश्वर ने अपने व्यक्तित्व को कभी किसी को नहीं दिखाया है, तो क्या तुम लोग सोचते हो कि परमेश्वर का व्यक्तित्व अस्तित्व में है? (वह अस्तित्व में है।) निश्चय ही वह अस्तित्व में है। परमेश्वर के व्यक्तित्व का अस्तित्व निर्विवादित है। किन्तु जहाँ तक इसकी बात है कि परमेश्वर का व्यक्तित्व कितना बड़ा है या वह कैसा दिखता है, क्या ये वे प्रश्न हैं जिनकी मानवजाति को छानबीन करनी चाहिए? नहीं। उत्तर नकारात्मक है। यदि परमेश्वर का व्यक्तित्व ऐसा विषय नहीं है जिसकी छानबीन की जाना चाहिए, तो फिर वह कौन सा प्रश्न है जिस पर हमें विचार करना चाहिए? (परमेश्वर का स्वभाव।) (परमेश्वर का कार्य।) इससे पहले कि हम आधिकारिक विषय पर बातचीत करना शुरू करें, आइए हम उसी विषय पर वापस लौटें जिस पर हम उस समय चर्चा कर रहे थे: क्यों परमेश्वर ने मानवजाति को कभी अपना व्यक्तित्व नहीं दिखाया है? परमेश्वर क्यों जान-बूझकर अपने व्यक्तित्व को मानवजाति से छिपाता है? सिर्फ एक ही कारण है, और वह है: यद्यपि सृजा गया मनुष्य परमेश्वर के हज़ारों वर्षों के कार्य से होकर गुज़रा है, फिर भी ऐसा कोई व्यक्ति नहीं है जो परमेश्वर के कार्य, परमेश्वर के स्वभाव एवं परमेश्वर के सार को जानता है। परमेश्वर की नज़रों में ऐसे लोग उसके विरुद्ध हैं, और परमेश्वर अपने आप को ऐसे लोगों को नहीं दिखाएगा जो उसके प्रति अत्यंत उग्र हैं। यही एकमात्र कारण है कि परमेश्वर ने अपने व्यक्तित्व को कभी मानवजाति को नहीं दिखाया है और क्यों वह जान-बूझकर अपने व्यक्तित्व को उनसे बचा कर रखता है। क्या अब तुम लोग परमेश्वर के स्वभाव को जानने के महत्व के बारे में स्पष्ट हो?

परमेश्वर के प्रबंधन के अस्तित्व के समय से ही, वह अपने कार्य को सम्पन्न करने के लिए हमेशा ही पूरी तरह से समर्पित रहा है। उनसे अपने व्यक्तित्व को छिपाने के बावजूद, वह हमेशा मनुष्य के अगल बगल ही रहा है, उन पर कार्य करता रहा है, अपने स्वभाव को प्रकट करता रहा है, अपने सार से समूची मानवजाति की अगुवाई करता रहा है, और अपनी सामर्थ, अपनी बुद्धि, और अपने अधिकार के माध्यम से हर एक व्यक्ति पर अपना कार्य करता रहा है, इस प्रकार वह व्यवस्था के युग, अनुग्रह के युग, और अब राज्य के युग को अस्तित्व में लाया है। यद्यपि परमेश्वर मनुष्य से अपने व्यक्तित्व को छुपाता है, फिर भी उसके स्वभाव, उसके स्वरूप, और मानवजाति के प्रति उसकी इच्छा को खुले तौर से मनुष्य पर देखने एवं अनुभव करने के लिए प्रकट किया गया है। दूसरे शब्दों में, यद्यपि मानव परमेश्वर को देख या स्पर्श नहीं कर सकता है, फिर भी परमेश्वर का स्वभाव एवं परमेश्वर का सार जिसके सम्पर्क में मानवता रही है वे पूरी तरह से स्वयं परमेश्वर की अभिव्यक्तियाँ हैं। क्या यह सत्य नहीं है? इसके बावजूद कि परमेश्वर किस तरीके से एवं किस कोण से अपना कार्य करता है, वह हमेशा लोगों से अपनी सच्ची पहचान के अनुसार बर्ताव करता है, ऐसा कार्य करता है जो उसे करना चाहिए और वैसी बातें कहता है जो उसे कहने चाहिए। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि परमेश्वर किस स्थान से बोलता है—वह तीसरे आसमान में खड़ा हो सकता है, या देह में खड़ा हो सकता है, या यहाँ तक कि एक साधारण व्यक्ति के रूप में भी—वह बिना किसी छल या छिपाव के हमेशा अपने सारे हृदय और अपने सारे मन के साथ मनुष्य से बोलता है। जब वह अपने कार्य को क्रियान्वित करता है, परमेश्वर अपने वचन एवं अपने स्वभाव को अभिव्यक्त करता है, और बिना किसी प्रकार के सन्देह के जो वह है उसे प्रकट करता है। वह अपने जीवन और अपने स्वरूप के साथ मानवजाति की अगुवाई करता है। इसी तरह से मनुष्य ने व्यवस्था के युग—मानवता के बचपने के युग—के दौरान अदृश्य एवं अस्पृश्य परमेश्वर के मार्गदर्शन के अधीन जीवन बिताया था।

व्यवस्था के युग के बाद पहली बार परमेश्वर ने देहधारण किया था, ऐसा देहधारण जो साढ़े तैंतीस वर्षों तक बना रहा। एक मनुष्य के लिए, क्या साढ़े तैंतीस साल का समय एक लम्बा समय है? (ज़्यादा लम्बा नहीं है।) जबकि किसी मानव प्राणी की जीवन अवधि सामान्यत: तीस या ऐसे कुछ सालों से कहीं ज़्यादा लम्बी होती है, यह मनुष्य के लिए एक बहुत ही लम्बा समय नहीं है। किन्तु देहधारी परमेश्वर के लिए, ये साढ़े तैंतीस साल बहुत ही लम्बा है। वह एक व्यक्ति बन गया—एक साधारण व्यक्ति जिसने परमेश्वर के कार्य और आदेश को अपने ऊपर उठाया था। इसका अर्थ था कि उसे ऐसा कार्य करना था जिसे एक सामान्य व्यक्ति संभाल नहीं सकता है, जबकि उसने पीड़ा को भी सहन किया जिसका सामना सामान्य लोग नहीं कर सकते हैं। अनुग्रह के युग के दौरान प्रभु यीशु के द्वारा सहन की गई पीड़ा की मात्रा, उसके कार्य की शुरूआत से लेकर उस समय तक जब उसे क्रूस पर कीलों से जड़ दिया गया था, शायद यह कुछ ऐसा नहीं है जिसे आज के लोग किसी व्यक्ति में देख सकते थे, किन्तु क्या तुम लोग कम से कम बाइबल की कहानियों के जरिए इसकी थोड़ी सराहना कर सकते हो? इसकी परवाह किए बगैर कि इन लिखित तथ्यों में कितने विवरण हैं, कुल मिलाकर, इस समयावधि के दौरान परमेश्वर का कार्य कष्ट एवं पीड़ा से भरा हुआ था। एक भ्रष्ट मनुष्य के लिए, साढ़े तैंतीस साल का समय एक लम्बा समय नहीं है; थोड़ी सी पीड़ा कोई बड़ी बात नहीं है। लेकिन पवित्र, निष्कलंक परमेश्वर के लिए, जिसे सारी मानवजाति के पापों को सहना है, और जिसे पापियों के साथ खाना, सोना और रहना है, यह पीड़ा बहुत ही बड़ी है। वह सृष्टिकर्ता, सभी चीज़ों का स्वामी और सब कुछ का शासक है, फिर भी जब वह संसार में आया तो उसे भ्रष्ट मनुष्यों के अत्याचार एवं क्रूरता को सहना पड़ा था। अपने कार्य को पूर्ण करने और मानवता को दुर्गति से छुड़ाने के लिए, उसे मनुष्य के द्वारा दोषी ठहराया जाना था, और उसे सारी मानवजाति के पापों को उठाना था। पीड़ा की मात्रा जिससे होकर वह गुज़रा था उसकी गहराई को संभवतः साधारण लोगों के द्वारा नापा एवं सराहा नहीं जा सकता है। यह पीड़ा क्या दर्शाती है? यह मनुष्य जाति के लिए परमेश्वर के अत्यधिक प्रेम को दर्शाती है। यह उस अपमान का प्रतीक है जिसे उसने सहा था और उस कीमत का प्रतीक है जिसे उसने मनुष्य के उद्धार के लिए, उनके पापों से उन्हें छुड़ाने के लिए, और अपने कार्य के इस चरण को पूर्ण करने के लिए चुकाया था। इसका अर्थ यह भी है कि मनुष्य परमेश्वर के द्वारा क्रूस से छुड़ाया जाएगा। यह एक ऐसी कीमत है जिसे लहू से, एवं जीवन से चुकाया गया है, यह एक ऐसी कीमत है जिसे देना सृजे गए प्राणी के बस में नहीं है। चूँकि उसके पास परमेश्वर का सार है और वह परमेश्वर के स्वरूप से सुसज्जित है इसलिए वह इस प्रकार की पीड़ा और इस प्रकार के कार्य को सहन कर सकता है। यह कुछ ऐसा है जिसे कोई भी सृजा गया प्राणी उसके स्थान पर नहीं कर सकता है। यह अनुग्रह के युग के दौरान परमेश्वर का कार्य है और उसके स्वभाव का एक प्रकाशन है। क्या यह जो परमेश्वर है उसके विषय में कोई चीज़ प्रकट करता है? क्या यह इस योग्य है कि मानवजाति इसे जाने?

उस युग में, यद्यपि मनुष्य ने परमेश्वर के व्यक्तित्व को नहीं देखा था, फिर भी उन्होंने परमेश्वर के पाप के बलिदान को प्राप्त किया और उन्हें परमेश्वर के द्वारा क्रूस से छुड़ाया गया। हो सकता है कि मानवजाति उस कार्य से अपरिचित नहीं थी जिसे अनुग्रह के युग के दौरान परमेश्वर ने किया था, लेकिन क्या कोई उस स्वभाव एवं इच्छा से परिचित था जिसे परमेश्वर के द्वारा इस समयावधि के दौरान अभिव्यक्त किया गया था? विभिन्न युगों के दौरान विभिन्न माध्यमों के जरिए मनुष्य महज परमेश्वर के कार्य की विषय-वस्तु को ही जानता है, या परमेश्वर से सम्बन्धित उन कहानियों को जानता है जो उसी समय घटित हुई थीं जब परमेश्वर अपने कार्य को क्रियान्वित कर रहा था। ये विवरण एवं कहानियाँ ज़्यादा से ज़्यादा परमेश्वर के विषय में कुछ सूचनाएं या प्राचीन कथाएँ हैं, और इनका परमेश्वर के स्वभाव एवं सार के साथ कोई वास्ता नहीं है। अतः इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि लोग परमेश्वर के बारे में कितनी कहानियाँ जानते हैं, इसका यह मतलब नहीं है कि उनके पास परमेश्वर के स्वभाव या उसके सार की एक गहरी समझ एवं ज्ञान है। यद्यपि ऐसे लोग जो अनुग्रह के युग से थे उन्होंने देहधारी परमेश्वर के साथ बहुत ही करीबी एवं घनिष्ठ सम्पर्क का अनुभव किया था, फिर भी व्यवस्था के युग के समान ही, परमेश्वर के स्वभाव एवं परमेश्वर के सार के विषय में उनका ज्ञान वस्तुतः अस्तित्वहीन था।

राज्य के युग में, परमेश्वर ने फिर से देहधारण किया, उसी प्रकार से जैसे उसने पहली बार किया था। कार्य की इस समयावधि के दौरान, परमेश्वर अब भी अपने कार्य को स्पष्टता से अभिव्यक्त करता है, उस कार्य को करता है जिसे उसे करना चाहिए, जो वह है उसे प्रकट करता है। ठीक उसी समय, वह मनुष्य की अनाज्ञाकारिता एवं अज्ञानता को निरन्तर सहता एवं बर्दाश्त करता है। क्या इस समयावधि के दौरान भी परमेश्वर ने निरन्तर अपने स्वभाव को प्रकट नहीं किया है और अपनी इच्छा को अभिव्यक्त नहीं किया है? इसलिए, मनुष्य की सृष्टि से लेकर अब तक, परमेश्वर का स्वभाव, उसका स्वरूप, और उसकी इच्छा, वे हमेशा से ही प्रत्येक व्यक्ति के लिए खुले हुए हैं। परमेश्वर ने कभी भी जानबूझकर अपने सार, अपने स्वभाव, या अपनी इच्छा को नहीं छुपाया है। बात बस इतनी है कि मानवजाति इसकी परवाह नहीं करती कि परमेश्वर क्या कर रहा है, उसकी इच्छा क्या है—इसी लिए परमेश्वर के बारे में मनुष्य की समझ इतनी दयनीय है। दूसरे शब्दों में, जब परमेश्वर अपने व्यक्तित्व को छिपाता है, तो वह हर एक क्षण मानवजाति के साथ खड़ा भी हो रहा है, और सभी समयों पर खुले तौर पर अपनी इच्छा, स्वभाव एवं सार को भी प्रकट कर रहा है। एक अर्थ में, परमेश्वर का व्यक्तित्व भी सभी लोगों के लिए खुला हुआ है, लेकिन मनुष्य के अंधेपन एवं अनाज्ञाकारिता के कारण, वे हमेशा परमेश्वर के प्रकटन को देखने में असमर्थ होते हैं। अतः यदि स्थिति ऐसी है, तो क्या प्रत्येक व्यक्ति के लिए परमेश्वर के स्वभाव और स्वयं परमेश्वर को समझना आसान नहीं होना चाहिए? उत्तर देने के लिए यह एक बहुत ही कठिन प्रश्न है, है ना? तुम लोग कह सकते हो कि यह आसान है, लेकिन जबकि कुछ लोग परमेश्वर को जानने का प्रयास करते हैं, वे वास्तव में उसे नहीं जान सकते हैं या उसके विषय में एक स्पष्ट समझ प्राप्त नहीं कर सकते हैं—यह हमेशा ही धुंधला एवं अस्पष्ट होता है। किन्तु यदि तुम लोग कहो कि यह आसान नहीं है, तो वह भी सही नहीं है। इतने लम्बे समय तक परमेश्वर के कार्य का विषय होने के बाद, प्रत्येक के पास अपने अनुभवों के माध्यम से परमेश्वर के साथ वास्तविक व्यवहार होना चाहिए। उन्हें कम से कम अपने हृदयों में कुछ हद तक परमेश्वर का एहसास करना चाहिए था या उन्हें पहले आत्मिक स्तर पर परमेश्वर के साथ टकराना चाहिए था, और इस प्रकार उनके पास कम से कम परमेश्वर के स्वभाव के विषय में थोड़ी बहुत भावनात्मक जागरूकता होनी चाहिए थी या उन्हें उसकी कुछ समझ प्राप्त करनी चाहिए थी। जब मनुष्य ने परमेश्वर का अनुसरण करना शुरू किया था उस समय से लेकर अब तक, मानवजाति ने बहुत कुछ प्राप्त किया है, लेकिन विभिन्न कारणों की वजह से—मानवजाति की कम क्षमता, अज्ञानता, विद्रोहीपन एवं विभिन्न इरादे—मानवजाति ने इसमें से बहुत कुछ को खो भी दिया है। क्या परमेश्वर ने मानवजाति को पहले से ही काफी कुछ नहीं दिया है? यद्यपि परमेश्वर अपने व्यक्तित्व को मनुष्यों से छुपाता है, फिर भी अपने स्वरूप से, और यहाँ तक कि अपने जीवन से भी उनकी आपूर्ति करता है; परमेश्वर के विषय में मानवता का ज्ञान केवल उतना ही नहीं होना चाहिए जितना अब है। इसीलिए मैं सोचता हूँ कि परमेश्वर के कार्य, परमेश्वर के स्वभाव, एवं स्वयं परमेश्वर के विषय में तुम लोगों के साथ आगे संगति करना आवश्यक है। इसका उद्देश्य यह है ताकि हज़ारों सालों की देखभाल एवं विचार जो परमेश्वर ने मनुष्य पर उंडेली है वह व्यर्थ न हो जाए, और ताकि मानवजाति अपने प्रति परमेश्वर की इच्छा को सचमुच में समझ सके और उसकी सराहना कर सके। यह इसलिए है ताकि लोग परमेश्वर के विषय में अपने ज्ञान में एक नए कदम की ओर आगे बढ़ सकें। साथ ही यह परमेश्वर को लोगों के हृदयों में अपने असली स्थान पर वापस लौटाएगा, अर्थात्, उसके साथ इंसाफ करने के लिए है।

परमेश्वर के स्वभाव एवं स्वयं परमेश्वर को समझने के लिए तुम्हें बहुत थोड़े से आरम्भ करना होगा। लेकिन किसके थोड़े से तुम क्या आरम्भ करोगे? सबसे पहले, मैंने बाइबल के कुछ अध्यायों को पढ़कर जानकारी एकत्र की है। नीचे दी गई जानकारी में बाइबल के वचन सम्मिलित हैं, उनमें से सब परमेश्वर के कार्य, परमेश्वर के स्वभाव एवं स्वयं परमेश्वर के विषय से सम्बन्धित हैं। मैंने विशेष रूप से इन अंशों को सन्दर्भ के रूप में खोजा है ताकि परमेश्वर के कार्य, परमेश्वर के स्वभाव, एवं स्वयं परमेश्वर को समझने में तुम लोगों की सहायता करूं। यहाँ मैं यह देखने के लिए उन्हें तुम लोगों के साथ बाटूंगा कि परमेश्वर ने अपने अतीत के कार्य के जरिए किस प्रकार के स्वभाव एवं सार को प्रकट किया है किन्तु लोग उसके बारे में नहीं जानते हैं। हो सकता है कि ये अध्याय पुराने हों, लेकिन वह विषय जिसके बारे में हम बातचीत कर रहें है वह कुछ नया है जो लोगों के पास नहीं है और जिसके बारे में उन्होंने कभी नहीं सुना है। हो सकता है कि तुम लोगों में से कुछ को यह अकल्पनीय लगे—क्या यह आदम और हव्वा की चर्चा करना और नूह के पास वापस जाना उन्हीं चरणों को फिर से दोहराना नहीं है? इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता है कि तुम लोग क्या सोचते हो, ये अध्याय इस विषय पर बातचीत करने के लिए अत्यंत लाभकारी है और आज की संगति के लिए ये शिक्षा देने के पाठों या प्रत्यक्ष सामग्रियों के रूप में कार्य कर सकते हैं। जिस समय तक मैं इस संगति को समाप्त करूंगा तुम लोग इन भागों को चुनने के पीछे के मेरे उद्देश्य को समझ जाओगे। ऐसे लोग जिन्होंने पहले से बाइबल पढ़ी है शायद उन्होंने इन कुछ वचनों को देखा हो, लेकिन शायद उन्होंने इन्हें सचमुच में समझा नहीं है। आओ एक एक करके अधिक विस्तार से उनसे होकर जाने से पहले हम इन पर एक सरसरी निगाह डालें।

आदम और हव्वा मानवजाति के पूर्वज हैं। यदि हमें बाइबल से पात्रों का उल्लेख करना है, तब हमें उन दोनों से शुरू करना होगा। इसके आगे है नूह, मानवजाति का दूसरा पूर्वज। क्या तुम लोग इसे समझ रहे हो? तीसरा पात्र कौन है? (इब्राहीम।) क्या तुम सब लोग इब्राहीम की कहानी के बारे में जानते हो? हो सकता है कि तुम लोगों में से कुछ जानते हों, लेकिन दूसरों के लिए शायद यह ज़्यादा स्पष्ट न हो। चौथा पात्र कौन है? सदोम के विनाश की कहानी में किसका उल्लेख किया गया है? (लूत।) लेकिन यहाँ लूत का सन्दर्भ नहीं दिया गया है। यह किसकी ओर संकेत करता है? (इब्राहीम।) जो कुछ यहोवा परमेश्वर ने कहा था वह इब्राहीम की कहानी में उल्लिखित मुख्य बात है। क्या तुम लोग सब इसे समझते हो? पांचवां पात्र कौन है? (अय्यूब।) क्या परमेश्वर ने अपने कार्य के इस चरण के दौरान अय्यूब की कहानी के बारे बहुत कुछ उल्लेख नहीं किया है? तो क्या तुम लोग इस कहानी के बारे में बहुत अधिक परवाह करते हो? यदि तुम लोग वास्तव में बहुत अधिक परवाह करते हो, तो क्या तुम लोगों ने सावधानी से बाइबल में अय्यूब की कहानी को पढ़ा है? क्या तुम लोगों को पता है कि अय्यूब ने कौन सी बातें कहीं, उसने कौन सी चीज़ें कीं? वे लोग जिन्होंने इसे सबसे अधिक पढ़ा है, तुम लोगों ने इसे कितनी बार पढ़ा है? क्या तुम लोग इसे अक्सर पढ़ते हो? हौंग कौंग की बहनों, कृपया हमें बताओ। (पहले जब हम अनुग्रह के युग में थे तब मैंने इसे एक-दो बार पढ़ा था।) तुम लोगों ने तब से इसे दोबारा नहीं पढ़ा है? यदि ऐसा है, तो यह बड़ी शर्म की बात है। मैं तुम लोगों को बता दूँ: परमेश्वर के कार्य के इस चरण के दौरान उसने कई बार अय्यूब का उल्लेख किया, जो उसके इरादों का एक प्रतिबिम्ब है। यह बात कि उसने कई बार अय्यूब का उल्लेख किया लेकिन तुम लोगों के ध्यान को जागृत नहीं किया यह इस तथ्य का एक प्रमाण है: तुम लोगों की ऐसे लोग बनने में कोई रूचि नहीं है जो अच्छे हैं और जो परमेश्वर का भय मानते और बुराई से दूर रहते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि तुम लोग बस इस बात से संतुष्ट हो कि तुम्हारे पास परमेश्वर के द्वारा उद्धरण दिए गए अय्यूब की कहानी के विषय में एक अनुमानित विचार है। तुम लोग स्वयं कहानी को मात्र समझने से ही संतुष्ट हो, लेकिन तुम लोग उन विवरणों की परवाह नहीं करते हो या समझने की कोशिश नहीं करते हो कि अय्यूब कौन है और परमेश्वर का विविध अवसरों पर अय्यूब की ओर संकेत करने के पीछे का उद्देश्य क्या है। यदि तुम लोगों को एक ऐसे व्यक्ति में रूचि भी नहीं है जिसकी परमेश्वर ने प्रशंसा की है, तो तुम लोग वास्तव में किस बात पर ध्यान दे रहे हो? यदि तुम लोग परवाह नहीं करते हो और एक ऐसे महत्वपूर्ण व्यक्ति को समझने की कोशिश नहीं करते हो जिसका परमेश्वर ने उल्लेख किया है, तो यह परमेश्वर के वचन के प्रति तुम लोगों की मनोवृत्ति के विषय में क्या कहता है? क्या यह एक दुखद बात नहीं है? क्या इससे यह साबित नहीं होता है कि तुम लोगों में से अधिकतर लोग व्यावहारिक चीज़ों में शामिल नहीं हैं और तुम सभी सत्य की निरन्तर खोज में नहीं हो? यदि तुम सत्य को खोजते हो, तो तुम उन लोगों पर जिन्हें परमेश्वर स्वीकार करता है और उन पात्रों की कहानियों पर आवश्यक ध्यान दोगे जिनके बारे में परमेश्वर बोलता है। इसकी परवाह किए बगैर कि तुम इसकी सराहना कर सकते हो या इसे महसूस कर सकते हो, तुम जल्दी से जाओगे और इसे पढ़ोगे, इसे समझने की कोशिश करोगे, इसके उदाहरण का अनुसरण करने के तरीकों को ढूँढोगे, और वह करोगे जिसे तुम अपनी सर्वोच्च योग्यता के साथ कर सकते हो। यह किसी ऐसे व्यक्ति का व्यवहार है जो सत्य की लालसा करता है। लेकिन सच्चाई यह है कि तुम लोगों में से अधिकांश लोग जो यहाँ बैठे हैं उन्होंने अय्यूब की कहानी को कभी नहीं पढ़ा है। यह सचमुच में कुछ कहता है।

आओ हम उस विषय पर वापस जाएँ जिस पर मैं अभी अभी बात कर रहा था। पवित्र शास्त्रों का यह भाग जो पुराना नियम व्यवस्था के युग से सम्बन्धित है वह मुख्य रूप से पात्रों की कहानियाँ है जिन्हें मैंने अंशों के रूप में लिया था। ये वे कहानियाँ हैं जिनसे ऐसे बहुत सारे लोग परिचित हैं जिन्होंने बाइबल को पढ़ा है। ये पात्र बहुत ही प्रतिनिधिक हैं। ऐसे लोग जिन्होंने उनकी कहानियाँ पढ़ीं हैं वे यह महसूस करने के योग्य होंगे कि वह कार्य जिसे परमेश्वर ने उन पर किया है और वे वचन जिन्हें परमेश्वर ने उनसे कहा है वे आज के लोगों के लिए स्पर्शगम्य एवं सुगम हैं। जब तुम बाइबल से इन कहानियों और लेखों को पढ़ते हो, तो तुम यह बेहतर ढंग से समझने के योग्य होगे कि किस प्रकार परमेश्वर ने अपना कार्य किया और उस समय लोगों के साथ कैसा व्यवहार किया। लेकिन आज इन अध्यायों को खोजने का मेरा उद्देश्य यह नहीं है कि तुम इन कहानियों और उनके पात्रों को समझने की कोशिश कर सको। इसके बजाए उद्देश्य यह है कि तुम इन पात्रों की कहानियों के द्वारा परमेश्वर के कार्यों और उसके स्वभाव को देख सको, इस प्रकार परमेश्वर को जानना एवं समझना, उसके वास्तविक पहलू को देखना, अपनी कल्पनाओं को विराम देना, उसके विषय में अपनी अवधारणाओं को रोकना, और अस्पष्टता के मध्य तुम्हारे विश्वास को समाप्त करना आसान बन जाये। बिना किसी आधार के परमेश्वर के स्वभाव का अर्थ निकालना और स्वयं परमेश्वर को जानने की कोशिश करना और समझना अक्सर तुम्हें असहाय, एवं दुर्बल महसूस करा सकता है, और तुम इस बारे में अनिश्चित होते हो कि कहाँ से शुरूआत करनी है। इसीलिए मैंने एक ऐसे तरीके एवं दृष्टिकोण का उपयोग करने के विषय में सोचा जिससेकि तुम्हें बेहतर ढंग से परमेश्वर को समझने, और अधिक प्रमाणिक रूप से परमेश्वर की इच्छा की सराहना करने और परमेश्वर के स्वभाव एवं स्वयं परमेश्वर को जानने में सहायता करूँ, और सचमुच में तुम्हें परमेश्वर के अस्तित्व को महसूस करने और मानवजाति के प्रति उसकी इच्छा की सराहना करने में सहायता करूँ। क्या यह तुम लोगों के लाभ के लिए नहीं है? तुम लोग अपने हृदयों के भीतर क्या महसूस करते हो जब तुम सब इन कहानियों और पवित्र वचनों को दोबारा देखते हो? क्या तुम लोग सोचते हो कि पवित्र शास्त्र के अंश जिन्हें मैंने चुना है वे ज़रूरत से ज़्यादा हैं? जो कुछ मैंने तुम लोगों को अभी अभी बताया था मुझे उस पर दोबारा ज़ोर देना होगा: इन पात्रों की कहानियों को तुम लोगों से पढ़वाने का लक्ष्य है कि यह समझने में तुम लोगों की सहायता की जाए कि कैसे परमेश्वर लोगों पर अपना कार्य करता है और मानवजाति के प्रति उसकी मनोवृत्ति कैसी है। तुम लोग इसे किस माध्यम से समझ सकते हो? उस कार्य के जरिए जिसे परमेश्वर ने अतीत में किया है और उस कार्य के समेत जिसे परमेश्वर अपने विषय में विभिन्न चीज़ों को समझने में तुम लोगों की सहायता करने के लिए इस समय कर रहा है। ये विभिन्न चीज़ें वास्तविक हैं, और इन्हें उन लोगों के द्वारा जाना और सराहा जाना चाहिए जो परमेश्वर को जानने की इच्छा करते हैं।

अब हम आदम और हव्वा की कहानी से शुरू करेंगे। पहले, आओ हम पवित्र शास्त्र के अंशों को पढ़ें।

क. आदम और हव्वा

1. आदम के लिए परमेश्वर की आज्ञा

(उत्पत्ति 2:15-17) तब यहोवा परमेश्वर ने आदम को लेकर अदन की वाटिका में रख दिया, कि वह उसमें काम करे और उसकी रक्षा करे। और यहोवा परमेश्वर ने आदम को यह आज्ञा दी, "तू वाटिका के सब वृक्षों का फल बिना खटके खा सकता है: पर भले या बुरे के ज्ञान का जो वृक्ष है, उसका फल तू कभी न खाना: क्योंकि जिस दिन तू उसका फल खाएगा उसी दिन अवश्य मर जाएगा।"

क्या तुम लोगों को इन वचनों से कुछ समझ आया? पवित्र शास्त्र का यह भाग तुम लोगों को कैसा महसूस कराता है? पवित्र शास्त्र से "आदम के लिए परमेश्वर की आज्ञा" के उद्धरण को क्यों लिया गया? क्या अब तुम लोगों में से प्रत्येक के पास अपने-अपने मन में परमेश्वर और आदम की एक तस्वीर है? तुम लोग कल्पना करने की कोशिश कर सकते हो: यदि तुम लोग उस दृश्य में होते, तो तुम लोगों के हृदय में परमेश्वर किस के समान होता? यह तस्वीर तुम लोगों को कौन सी भावनाओं का एहसास कराती है? यह एक द्रवित करनेवाली और दिल को छू लेनेवाली तस्वीर है। यद्यपि इसमें केवल परमेश्वर एवं मनुष्य ही हैं, फिर भी उनके बीच की घनिष्ठता ईर्ष्या के अत्यंत योग्य है: परमेश्वर का प्रचुर प्रेम मनुष्य को अकारण ही प्रदान किया गया है, यह मनुष्य को घेरे रहता है; मनुष्य भोला भाला एवं निर्दोष, भारमुक्त एवं लापरवाह है, वह आनन्दपूर्वक परमेश्वर की दृष्टि के अधीन जीवन बिताता है; परमेश्वर मनुष्य के लिए चिंता करता है, जबकि मनुष्य परमेश्वर की सुरक्षा एवं आशीष के अधीन जीवन बिताता है; हर एक चीज़ जिसे मनुष्य करता एवं कहता है वह परमेश्वर से घनिष्ठता से जुड़ा हुआ होता है और उससे अविभाज्य है।

तुम लोग कह सकते हो कि यह पहली आज्ञा है जिसे परमेश्वर ने मनुष्य को दिया था जब उसने उसे बनाया था। यह आज्ञा क्या लिए हुए है? यह परमेश्वर की इच्छा को लिए हुए है, परन्तु साथ ही यह मानवजाति के लिए उसकी चिंताओं को भी लिए हुए है। यह परमेश्वर की पहली आज्ञा है, और साथ ही यह पहली बार भी है जब परमेश्वर मनुष्य के विषय में चिंता करता है। कहने का तात्पर्य है, जब से परमेश्वर ने मनुष्य को बनाया उस घड़ी से उसके पास उसके प्रति एक ज़िम्मेदारी है। उसकी ज़िम्मेदारी क्या है? उसे मनुष्य की सुरक्षा करनी है, और मनुष्य की देखभाल करनी है। वह आशा करता है कि मनुष्य भरोसा कर सकता है और उसके वचनों का पालन कर सकता है। यह मनुष्य से परमेश्वर की पहली अपेक्षा भी है। इसी अपेक्षा के साथ परमेश्वर निम्नलिखित वचन कहता है: "तू वाटिका के सब वृक्षों का फल बिना खटके खा सकता है: पर भले या बुरे के ज्ञान का जो वृक्ष है, उसका फल तू कभी न खाना: क्योंकि जिस दिन तू उसका फल खाएगा उसी दिन अवश्य मर जाएगा।" ये साधारण वचन परमेश्वर की इच्छा को दर्शाते हैं। वे यह भी प्रकट करते हैं कि परमेश्वर के हृदय ने पहले से ही मनुष्य के लिए चिंता प्रकट करना शुरू कर दिया है। सब चीज़ों के मध्य, केवल आदम को ही परमेश्वर के स्वरुप में बनाया गया था; आदम ही एकमात्र जीवित प्राणी था जिसके पास परमेश्वर के जीवन की श्वास है; वह परमेश्वर के साथ चल सकता था, परमेश्वर के साथ बात कर सकता था। इसीलिए परमेश्वर ने उसे ऐसी आज्ञा दी थी। परमेश्वर ने इस आज्ञा में बिलकुल साफ कर दिया था कि मनुष्य क्या कर सकता है, साथ ही साथ वह क्या नहीं कर सकता है।

इन कुछ साधारण वचनों में, हम परमेश्वर के हृदय को देखते हैं। लेकिन हम किस प्रकार का हृदय देखते हैं? क्या परमेश्वर के हृदय में प्रेम है? क्या इसमें कोई चिंता है? इन वचनों में परमेश्वर के प्रेम एवं चिंता को न केवल लोगों के द्वारा सराहा जा सकता है, लेकिन इसे भली भांति एवं सचमुच में महसूस भी किया जा सकता है। क्या यह ऐसा ही नहीं है? अब जब मैंने इन बातों को कह दिया है, क्या तुम लोग अब भी सोचते हो कि ये बस कुछ साधारण वचन हैं? इतने साधारण नहीं हैं, है ना? क्या तुम लोग इसे पहले से देख सकते थे? यदि परमेश्वर ने व्यक्तिगत रूप से तुम्हें इन थोड़े से वचनों को कहा होता, तो तुम भीतर से कैसा महसूस करते? यदि तुम एक दयालु व्यक्ति नहीं हो, यदि तुम्हारा हृदय बर्फ के समान ठण्डा है, तो तुम कुछ भी महसूस नहीं करोगे, तुम परमेश्वर के प्रेम की सराहना नहीं करोगे, और तुम परमेश्वर के हृदय को समझने की कोशिश नहीं करोगे। लेकिन यदि तुम ऐसे व्यक्ति हो जिसके पास विवेक है, एवं मानवता है, तो तुम कुछ अलग महसूस करोगे। तुम स्नेह को महसूस करोगे, तुम महसूस करोगे कि तुम्हारी परवाह की जाती है और तुम्हें प्रेम किया जाता है, और तुम खुशी महसूस करोगे। क्या यह सही नहीं है? जब तुम इन चीज़ों को महसूस करते हो, तो तुम परमेश्वर के प्रति किस प्रकार कार्य करोगे? क्या तुम परमेश्वर से जुड़ा हुआ महसूस करोगे? क्या तुम अपने हृदय की गहराई से परमेश्वर से प्रेम और उसका सम्मान करोगे? क्या तुम्हारा हृदय परमेश्वर के और करीब जाएगा? तुम इससे देख सकते हो कि मनुष्य के लिए परमेश्वर का प्रेम कितना महत्वपूर्ण है। लेकिन जो और भी अधिक महत्वपूर्ण है वह परमेश्वर के प्रेम के विषय में मनुष्य की सराहना एवं समझ है। वास्तव में, क्या परमेश्वर ने अपने कार्य के इस चरण के दौरान ऐसी बहुत सी चीज़ों को नहीं कहा था? लेकिन क्या आज के लोग परमेश्वर के हृदय की सराहना करते हैं? क्या तुम लोग परमेश्वर की इच्छा का आभास कर सकते हो जिसके बारे में मैंने बस अभी-अभी कहा था? तुम लोग परमेश्वर की इच्छा को तब भी परख नहीं सकते हो जब यह इतना ठोस, स्पर्शगम्य, एवं यथार्थवादी है। इसीलिए मैं कहता हूँ कि तुम लोगों के पास परमेश्वर के विषय में वास्तविक ज्ञान एवं समझ नहीं है। क्या यह सत्य नहीं है? हम इस भाग में बस इतनी ही चर्चा करेंगे।

2. परमेश्वर हव्वा को बनाता है

(उत्पत्ति 2:18-20) फिर यहोवा परमेश्वर ने कहा, "आदम का अकेला रहना अच्छा नहीं है; मैं उसके लिए एक ऐसा सहायक बनाऊँगा जो उस से मेल खाए।" और यहोवा परमेश्वर भूमि में से सब जाति के बनैले पशुओं, और आकाश के सब भाँति के पक्षियों को रचकर आदम के पास ले आया कि देखे, कि वह उनका क्या क्या नाम रखता है; और जिस जिस जीवित प्राणी का जो जो नाम आदम ने रखा वही उसका नाम हो गया। अतः आदम ने सब जाति के घरेलू पशुओं, और आकाश के पक्षियों, और सब जाति के बनैले पशुओं के नाम रखे; परन्तु आदम के लिए कोई ऐसा सहायक न मिला जो उस से मेल खा सके।

(उत्पत्ति 2:22-23) और यहोवा परमेश्वर ने उस पसली को जो उसने आदम में से निकाली थी, स्त्री बना दिया; और उसको आदम के पास ले आया। तब आदम ने कहा, "अब यह मेरी हड्डियों में की हड्डी और मेरे मांस में का मांस है, इसलिए इसका नाम नारी होगा, क्योंकि यह नर में से निकाली गई है।"

पवित्र शास्त्र के इस भाग में यहाँ कुछ मुख्य वाक्यांश है: कृपया उन्हें रेखांकित करें: "और जिस जिस जीवित प्राणी का जो जो नाम आदम ने रखा वही उसका नाम हो गया।" अतः किसने सभी जीवित प्राणियों को उनका नाम दिया था? यह आदम था, परमेश्वर नहीं। यह वाक्यांश मानवजाति को एक तथ्य बताता है: परमेश्वर ने मनुष्य को बुद्धि दी जब उसने उसकी सृष्टि की थी। कहने का तात्पर्य है, मनुष्य की बुद्धि परमेश्वर से आई थी। यह एक निश्चितता है। लेकिन क्यों? परमेश्वर ने आदम को बनाया उसके बाद, क्या आदम विद्यालय गया था? क्या वह जानता था कि कैसे पढ़ते हैं? परमेश्वर ने विभिन्न जीवित प्राणियों को बनाया उसके बाद, क्या आदम ने इन सभी पशुओं को पहचाना था? क्या परमेश्वर ने उसे बताया कि उनके नाम क्या थे? हाँ वास्तव में, परमेश्वर ने उसे यह भी नहीं सिखाया था कि इन प्राणियों के नाम कैसे रखने हैं। यही सच्चाई है! तो उसने कैसे जाना कि इन जीवित प्राणियों को उनके नाम कैसे देने थे और उन्हें किस प्रकार के नाम देने थे? यह उस प्रश्न से जुड़ा हुआ है कि परमेश्वर ने आदम में क्या जोड़ा जब उसने उसकी सृष्टि की थी। तथ्य यह साबित करते हैं कि जब परमेश्वर ने मनुष्य की सृष्टि की तो उसने अपनी बुद्धि को उसमें जोड़ दिया था। यह एक मुख्य बिन्दु है। क्या तुम सब लोगों ने ध्यानपूर्वक सुना? एक अन्य मुख्य बिन्दु है जो तुम लोगों को स्पष्ट होना चाहिए: आदम ने इन जीवित प्राणियों को उनका नाम दिया उसके बाद, ये नाम परमेश्वर के शब्दकोश में निर्धारित हो गए थे। मैं ऐसा क्यों कहता हूँ? यह परमेश्वर के स्वभाव को भी शामिल करता है, और मुझे इसे समझाना ही होगा।

परमेश्वर ने मनुष्य की सृष्टि की, उसमें जीवन का श्वास फूंका, और उसे अपनी कुछ बुद्धि, अपनी योग्यताएँ, और अपना स्वरूप भी दिया। परमेश्वर ने मनुष्य को ये सब चीज़ें दीं उसके बाद, मनुष्य आत्मनिर्भरता से कुछ चीज़ों को करने और अपने आप सोचने के योग्य हो गया। यदि मनुष्य जो सोचता है और जो करता है वह परमेश्वर की नज़रों में अच्छा है, तो परमेश्वर इसे स्वीकार करता है और हस्तक्षेप नहीं करता है। यदि जो कुछ मनुष्य करता है वह सही है, तो परमेश्वर उसे भलाई के लिए ऐसे ही होने देगा। अतः वह वाक्यांश "और जिस जिस जीवित प्राणी का जो जो नाम आदम ने रखा वही उसका नाम हो गया" क्या दर्शाताहै? यह दर्शाता है कि परमेश्वर ने विभिन्न जीवित प्राणियों के नामों में कोई भी सुधार नहीं किया था। आदम उनका जो भी नाम रखता, परमेश्वर कहता "हाँ" और उस नाम को वैसे ही दर्ज करता है। क्या परमेश्वर ने कोई राय व्यक्त की? नहीं, यह बिलकुल निश्चित है। तो तुम लोग यहाँ क्या देखते हो? परमेश्वर ने मनुष्य को बुद्धि दी और मनुष्य ने कार्यों को अंजाम देने के लिए अपनी परमेश्वर-प्रदत्त बुद्धि का उपयोग किया। यदि जो कुछ मनुष्य करता है वह परमेश्वर की नज़रों में सकारात्मक है, तो इसे बिना किसी मूल्यांकन या आलोचना के परमेश्वर के द्वारा पुष्ट, मान्य, एवं स्वीकार किया जाता है। यह कुछ ऐसा है जिसे कोई व्यक्ति या दुष्ट आत्मा, या शैतान नहीं कर सकता है। क्या तुम लोग यहाँ परमेश्वर के स्वभाव के एक प्रकाशन को देखते हो? क्या एक मानव, एक भ्रष्ट किया गया मानव, या शैतान दूसरों को स्वीकार करेंगे कि उनकी नाक के नीचे कार्यों को अंजाम देने के लिए उनका प्रतिनिधित्व करें? बिलकुल भी नहीं! क्या वे पदवी के लिए उस अन्य व्यक्ति या अन्य शक्ति से लड़ाई करेंगे जो उनसे अलग है? हाँ बिल्कुल वे करेंगे! उस घड़ी, यदि वह एक भ्रष्ट किया गया व्यक्ति या शैतान होता जो आदम के साथ था, तो जो कुछ आदम कर रहा था उन्होंने निश्चित रूप से उसे ठुकरा दिया होता। यह साबित करने के लिए कि उनके पास स्वतन्त्र रूप से सोचने की योग्यता है और उनके पास अपनी अनोखी अन्तःदृष्टियाँ हैं, वे हर उस चीज़ को बिल्कुल नकार देते जो आदम ने किया था: क्या तुम इसे यह कहकर बुलाना चाहते हो? ठीक है, मैं इसे यह कहकर नहीं बुलानेवाला, मैं इसे वह कहकर बुलानेवाला हूँ; तुमने इसे सीता कहा था लेकिन मैं इसे गीता कहकर बुलानेवाला हूँ। मुझे अपनी प्रतिभा का दिखावा करना है। यह किस प्रकार का स्वभाव है? क्या यह अनियन्त्रित रूप से अहंकारी होना नहीं है? लेकिन क्या परमेश्वर के पास ऐसा स्वभाव है? जो कार्य आदम ने किया था क्या उसके प्रति परमेश्वर की कुछ असामान्य आपत्तियाँ थीं? स्पष्ट रूप से उत्तर है नहीं! उस स्वभाव के विषय में जिसे परमेश्वर प्रकाशित करता है, उसमें जरा भी वाद-विवाद, अहंकार, या आत्म-दंभ नहीं है। यहाँ यह बहुतायत से स्पष्ट है। यह तो बस एक छोटी सी बात है, लेकिन यदि तुम परमेश्वर के सार को नहीं समझते हो, यदि तुम्हारा हृदय यह पता लगाने की कोशिश नहीं करता है कि परमेश्वर कैसे कार्य करता है और उसकी मनोवृत्ति क्या है, तो तुम परमेश्वर के स्वभाव को नहीं जानोगे या परमेश्वर के स्वभाव की अभिव्यक्तियों एवं प्रकाशन को नहीं देखोगे। क्या यह ऐसा नहीं है? क्या तुम उससे सहमत हो जिसे मैंने अभी अभी तुम्हें समझाया? आदम के कार्यों के प्रत्युत्तर में, परमेश्वर ने जोर से घोषणा नहीं की, "तुमने अच्छा किया। तुमने सही किया मैं सहमत हूँ"। फिर भी, जो कुछ आदम ने किया परमेश्वर ने अपने हृदय में उसकी स्वीकृति दी, उसकी सराहना, एवं तारीफ की थी। सृष्टि के समय से यह पहला कार्य था जिसे मनुष्य ने परमेश्वर के निर्देशन पर उसके लिए किया था। यह कुछ ऐसा था जिसे मनुष्य ने परमेश्वर के स्थान पर और परमेश्वर की ओर से किया था। परमेश्वर की नज़रों में, यह उस बुद्धिमत्ता से उदय हुआ था जिसे परमेश्वर ने मनुष्य को प्रदान किया था। परमेश्वर ने इसे एक अच्छी चीज़, एवं एक सकारात्मक चीज़ के रूप में देखा था। जो कुछ आदम ने उस समय किया था वह मनुष्य पर परमेश्वर की बुद्धिमत्ता का पहला प्रकटीकरण था। परमेश्वर के दृष्टिकोण से यह एक उत्तम प्रकटीकरण था। जो कुछ मैं यहाँ तुम लोगों को बताना चाहता हूँ वह यह है कि उसकी बुद्धिमत्ता और स्वरूप के एक अंश को मनुष्य से जोड़ने में परमेश्वर का यह लक्ष्य था कि मानवजाति ऐसा जीवित प्राणी बन सके जो उसको प्रदर्शित करे। एक ऐसे जीवित प्राणी के लिए उसकी ओर से कार्यों को करना बिलकुल वैसा था जिसे देखने हेतु परमेश्वर लालसा कर रहा था।

3. परमेश्वर ने आदम और हव्वा के लिए चमड़े के अँगरखे बनाये

(उत्पत्ति 3:20-21) आदम ने अपनी पत्नी का नाम हव्वा रखा; क्योंकि जितने मनुष्य जीवित हैं उन सब की आदिमाता वही हुई। और यहोवा परमेश्वर ने आदम और उसकी पत्नी के लिए चमड़े के अँगरखे बनाकर उनको पहिना दिए।

आओ हम इस तीसरे अंश पर एक नज़र डालें, जो बताता है कि उस नाम के पीछे एक अर्थ है जिसे आदम ने हव्वा को दिया था, ठीक है? यह दर्शाता है कि सृजे जाने के बाद, आदम के पास अपने स्वयं के विचार थे और वह बहुत सी चीज़ों को समझता था। लेकिन फिलहाल हम, जो कुछ वह समझता था या कितना कुछ वह समझता था, उसका अध्ययन या उसकी खोज करने नहीं जा रहे हैं क्योंकि यह वह मुख्य बिन्दु नहीं है जिस पर मैं तीसरे अंश में चर्चा करना चाहता हूँ। अतः तीसरे अंश का मुख्य बिन्दु क्या है। आइए हम इस पंक्ति पर एक नज़र डालें, "और यहोवा परमेश्वर ने आदम और उसकी पत्नी के लिए चमड़े के अँगरखे बनाकर उनको पहिना दिए।" यदि आज हम पवित्र शास्त्र की इस पंक्ति के बारे में संगति नहीं करें, तो हो सकता है कि तुम लोग इन वचनों के पीछे निहित अर्थों का कभी एहसास न कर पाओ। सबसे पहले, मैं कुछ सुराग देता हूँ। अपनी कल्पना को विस्तृत करो और अदन के बाग की तस्वीर देखो, जिसमें आदम और हव्वा रहते हैं। परमेश्वर उनसे मिलने जाता है, लेकिन वे छिप जाते हैं क्योंकि वे नग्न हैं। परमेश्वर उन्हें देख नहीं पाता है, और जब वह उन्हें पुकारता है उसके बाद, वे कहते हैं, "हममें तुझे देखने की हिम्मत नहीं है क्योंकि हमारे शरीर नग्न हैं।" वे परमेश्वर को देखने की हिम्मत नहीं करते हैं क्योंकि वे नग्न हैं। तो यहोवा परमेश्वर उनके लिए क्या करता है? मूल पाठ कहता है: "और यहोवा परमेश्वर ने आदम और उसकी पत्नी के लिए चमड़े के अँगरखे बनाकर उनको पहिना दिए।" अब क्या तुम लोग जानते हो कि परमेश्वर ने उनके वस्त्रों को बनाने के लिए क्या उपयोग किया था? परमेश्वर ने उनके वस्त्रों को बनाने के लिए जानवर के चमड़े का उपयोग किया था। कहने का तात्पर्य है, जो वस्त्र परमेश्वर ने मनुष्य के लिए बनाया वह एक रोएँदार कोट था। यह वस्त्र का पहला टुकड़ा था जिसे परमेश्वर ने मनुष्य के लिए बनाया था। एक रोएँदार कोट आज की जीवनशैली के अनुसार ऊँचे बाज़ार का मद है, ऐसी चीज़ जिसे पहनने के लिए हर कोई खरीद नहीं सकता है। यदि तुमसे कोई पूछे: मानवजाति के पूर्वजों के द्वारा पहना गया वस्त्र का पहला टुकड़ा क्या था? तुम उत्तर दे सकते हो: यह एक रोएँदार कोट था। यह रोएँदार कोट किसने बनाया था? तुम आगे प्रत्युत्तर दे सकते हो: परमेश्वर ने इसे बनाया था! यही मुख्य बिन्दु है: इस वस्त्र को परमेश्वर के द्वारा बनाया गया था। क्या यह ऐसी चीज़ नहीं है जो ध्यान देने के योग्य है? अब जबकि मैंने अभी-अभी इसका वर्णन किया है, क्या तुम्हारे मनों में एक छवि उभर कर आई है? इसकी कम से कम एक अनुमानित रुपरेखा होनी चाहिए। आज तुम लोगों को बताने का मुद्दा यह नहीं है कि तुम लोग जानो कि मनुष्य के वस्त्र का पहला टुकड़ा क्या था। तो फिर मुद्दा क्या है? मुद्दा रोएँदार कोट नहीं है, परन्तु यह है कि परमेश्वर के द्वारा प्रकट किए गए स्वभाव एवं स्वरूप को कैसे जाने जब वह यह कार्य कर रहा था।

"और यहोवा परमेश्वर ने आदम और उसकी पत्नी के लिए चमड़े के अँगरखे बनाकर उनको पहिना दिए," इसकी छवि में परमेश्वर किस प्रकार की भूमिका निभाता है जब वह आदम और हव्वा के साथ है? मात्र दो मानव प्राणियों के साथ एक संसार में परमेश्वर किस प्रकार की भूमिका में प्रकट होता है? परमेश्वर की भूमिका में? हौंग कौंग के भाइयों एवं बहनों, कृपया उत्तर दीजिए। (एक अभिवावक की भूमिका में।) दक्षिण कोरिया के भाइयों एवं बहनों, तुम लोग क्या सोचते हो कि परमेश्वर किस भूमिका में प्रकट होता है? (परिवार के मुखिया की।) ताइवान के भाइयों एवं बहनों, तुम लोग क्या सोचते हो? (आदम और हव्वा के परिवार में किसी व्यक्ति की भूमिका, परिवार के एक सदस्य की भूमिका।) तुम लोगों में से कुछ सोचते हैं कि परमेश्वर आदम और हव्वा के परिवार के एक सदस्य के रूप में प्रकट होता है, जबकि कुछ कहते हैं कि परमेश्वर परिवार के एक मुखिया के रूप में प्रकट होता है वहीं दूसरे कहते हैं वो अभिभावक के रूप में है। इनमें से सब बिलकुल उपयुक्त हैं। लेकिन वह क्या है जिस ओर मैं इशारा कर रहा हूँ? परमेश्वर ने इन दो लोगों की सृष्टि की और उनके साथ अपने सहयोगियों के समान व्यवहार किया। उनके एकमात्र परिवार के समान, परमेश्वर ने उनके रहन-सहन का ख्याल रखा और उनकी मूलभूत आवश्यकताओं का भी ध्यान रखा। यहाँ, परमेश्वर आदम और हव्वा के माता-पिता के रूप में प्रकट होता है। जब परमेश्वर यह करता है, मनुष्य नहीं देखता कि परमेश्वर कितना ऊंचा है; वह परमेश्वर की सबसे ऊँची सर्वोच्चता, उसकी रहस्यमयता को नहीं देखता है, और ख़ासकर उसके क्रोध या प्रताप को नहीं देखता है। जो कुछ वह देखता है वह परमेश्वर की नम्रता, उसका स्नेह, मनुष्य के लिए उसकी चिंता और उसके प्रति उसकी ज़िम्मेदारी एवं देखभाल है। वह मनोवृत्ति एवं तरीका जिसके अनुसार परमेश्वर आदम और हव्वा के साथ व्यवहार करता है वह इसके समान है कि किस प्रकार मानवीय माता-पिता अपने बच्चों के लिए चिंता करते हैं। यह इसके समान भी है कि किस प्रकार मानवीय माता-पिता अपने पुत्र एवं पुत्रियों से प्रेम करते हैं, उन पर ध्यान देते हैं, और उनकी देखरेख करते हैं—वास्तविक, दृश्यमान, और स्पर्शगम्य। अपने आपको एक ऊँचे एवं सामर्थी पद पर रखने के बजाए, परमेश्वर ने व्यक्तिगत रूप से मनुष्य के लिए पहरावा बनाने के लिए चमड़ों का उपयोग किया। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि उनकी लज्जा को छुपाने के लिए या उन्हें ठण्ड से बचाने के लिए इस रोएँदार कोट का उपयोग किया गया था। संक्षेप में, यह पहरावा जो मनुष्य के शरीर को ढंका करता था उसे परमेश्वर के द्वारा उसके अपने हाथों से बनाया गया था। इसे लोगों की सोच के अनुसार सरलता से विचार के माध्यम से या चमत्कारी तरीके से बनाने के बजाय, परमेश्वर ने वैधानिक तौर पर कुछ ऐसा किया जिसके विषय में मनुष्य सोचता है कि परमेश्वर नहीं कर सकता था और उसे नहीं करना चाहिए। यह एक साधारण कार्य हो सकता है कि कुछ लोग यहाँ तक सोचें कि यह जिक्र करने के लायक भी नहीं है, परन्तु यह उन सब को अनुमति भी देता है जो परमेश्वर का अनुसरण करते हैं परन्तु उसके विषय में पहले अस्पष्ट विचारों से भरे हुए थे कि वे उसकी विशुद्धता एवं मनोहरता में अन्तःदृष्टि प्राप्त करें, और उसके विश्वासयोग्य एवं दीन स्वभाव को देखें। यह अत्यधिक अभिमानी लोगों को, जो सोचते हैं कि वे ऊँचे एवं शक्तिशाली हैं, परमेश्वर की विशुद्धता एवं विनम्रता के सामने लज्जा से अपने अहंकारी सिरों को झुकाने के लिए मजबूर करता है। यहाँ, परमेश्वर की विशुद्धता एवं विनम्रता लोगों को यह देखने के लिए और अधिक योग्य बनाती है कि परमेश्वर कितना प्यारा है। इसके विपरीत, "असीम" परमेश्वर, "प्यारा" परमेश्वर और "सर्वशक्तिमान" परमेश्वर लोगों के हृदय में कितना छोटा, एवं नीरस है, और एक प्रहार को भी सहने में असमर्थ है। जब तुम इस वचन को देखते हो और इस कहानी को सुनते हो, तो क्या तुम परमेश्वर को नीचा समझते हो क्योंकि उसने एक ऐसा कार्य किया था? शायद कुछ लोग ऐसा सोचें, लेकिन दूसरों के लिए यह पूर्णत: विपरीत होगा। वे सोचेंगे कि परमेश्वर विशुद्ध एवं प्यारा है, यह बिलकुल परमेश्वर की विशुद्धता एवं विनम्रता है जो उन्हें द्रवित करती है। जितना अधिक वे परमेश्वर के वास्तविक पहलू को देखते हैं, उतना ही अधिक वे परमेश्वर के प्रेम के सच्चे अस्तित्व की, अपने हृदय में परमेश्वर के महत्व की, और वह किस प्रकार हर घड़ी उनके बगल में खड़ा होता है, उसकी सराहना कर सकते हैं।

इस बिन्दु पर, हमें हमारी बातचीत को वर्तमान से जोड़ना चाहिए। यदि परमेश्वर मनुष्यों के लिए ये विभिन्न छोटी छोटी चीज़ें कर सकता था जिन्हें उसने बिलकुल शुरुआत में सृजा था, यहाँ तक कि ऐसी चीज़ें भी जिनके विषय में लोग कभी सोचने या अपेक्षा करने की हिम्मत भी नहीं करेंगे, तो क्या परमेश्वर आज के लोगों के लिए ऐसी चीज़ें करेगा? कुछ लोग कहते हैं, "हाँ!" ऐसा क्यों है? क्योंकि परमेश्वर का सार जाली नहीं है, उसकी मनोहरता जाली नहीं है। क्योंकि परमेश्वर का सार सचमुच में अस्तित्व में है और यह ऐसी चीज़ नहीं है जिसमें दूसरों के द्वारा कुछ जोड़ा गया है, और निश्चित रूप से ऐसी चीज़ नहीं है जो समय, स्थान एवं युगों में परिवर्तन के साथ बदलता जाता है। परमेश्वर की विशुद्धता एवं मनोहरता को कुछ ऐसा करने के द्वारा सामने लाया जा सकता है जिसे लोग सोचते हैं कि साधारण एवं मामूली है, ऐसी चीज़ जो इतनी छोटी है कि लोग सोचते भी नहीं हैं कि वह कभी करेगा। परमेश्वर ढोंगी नहीं है। उसके स्वभाव एवं सार में कोई अतिशयोक्ति, छद्मवेश, गर्व, या अहंकार नहीं है। वह कभी डींगें नहीं मारता है, बल्कि इसके बजाए प्रेम करता है, चिंता करता है, ध्यान देता है, और मानवोंकी अगुवाई करता है जिन्हें उसने विश्वासयोग्यता एवं ईमानदारी से बनाया है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि लोग इसमें से कितनी चीज़ों की सराहना, एवं एहसास कर सकते हैं, या देख सकते हैं, क्योंकि परमेश्वर निश्चय ही इन चीज़ों को कर रहा है। क्या यह जानना कि परमेश्वर के पास ऐसा सार है उसके लिए लोगों के प्रेम को प्रभावित करेगा? क्या यह परमेश्वर के विषय में उनके भय को प्रभावित करेगा? मैं आशा करता हूँ कि जब तुम परमेश्वर के वास्तविक पहलु को समझ जाते हो तो तुम उसके और भी करीब हो जाओगे और तुम मानवजाति के प्रति उसके प्रेम एवं देखभाल की सचमुच में और भी अधिक सराहना करने के योग्य होगे, जबकि ठीक उसी समय तुम अपना हृदय भी परमेश्वर को देते हो और आगे से तुम्हें उसके प्रति कोई सन्देह या शंका नहीं होगी। परमेश्वर मनुष्य के लिए सबकुछ चुपचाप कर रहा है, वह यह सब अपनी ईमानदारी, विश्वासयोग्यता एवं प्रेम के जरिए खामोशी से कर रहा है। लेकिन वह जो भी करता है उसे लेकर उसे कभी कोई शंका या खेद नहीं होता है, न ही उसे कभी आवश्यकता होती है कि कोई उसे किसी रीति से बदले में कुछ दे या न ही उसके पास कभी मानवजाति से कोई चीज़ प्राप्त करने के इरादे हैं। वह सब कुछ जो उसने हमेशा किया है उसका एकमात्र उद्देश्य यह है कि वह मानवजाति के सच्चे विश्वास एवं प्रेम को प्राप्त कर सके। हम यहाँ पहले विषय को बन्द कर देते हैं।

क्या इन चर्चाओं ने तुम लोगों की सहायता की है? यह कितनी सहायक थी? (परमेश्वर के प्रेम की और अधिक समझ एवं ज्ञान।) (वार्तालाप का यह तरीका भविष्य में हमारी सहायता कर सकता है कि परमेश्वर के वचन की बेहतर ढंग से सराहना करें, कि उन भावनाओं को समझें जो उसके पास थीं और उन चीज़ों के पीछे के अर्थों को समझें जिन्हें उसने कहा था जब उसने उन्हें बोला था, और जो कुछ उसने उस समय महसूस किया था उसका एहसास करें।) क्या तुम लोगों में से कोई इन वचनों को पढ़ने के बाद परमेश्वर के वास्तविक अस्तित्व का और भी अधिक आभास करता है? क्या तुम लोग एहसास करते हो कि परमेश्वर का अस्तित्व अब और खोखला या अस्पष्ट नहीं है? जब एक बार तुम लोगों के पास यह एहसास होता है, क्या तुम लोग आभास करते हो कि परमेश्वर बिलकुल तुम लोगों के बगल में है? कदाचित् यह संवेदना ठीक इस समय स्पष्ट नहीं हो सकती है या हो सकता है कि तुम लोग इसे अब तक महसूस करने के योग्य नहीं हो। लेकिन एक दिन, जब तुम लोगों के पास अपने हृदय में परमेश्वर के स्वभाव एवं सार के विषय में सचमुच में एक गहरी सराहना एवं वास्तविक ज्ञान होगा, तो तुम आभास करोगे कि परमेश्वर बिलकुल तुम्हारे बगल में है—बात बस इतनी है कि तुमने अपने हृदय में असल में परमेश्वर को कभी ग्रहण नहीं किया था। यह वास्तविक है।

इस वार्तालाप के तरीके के बारे में तुम लोग क्या सोचते हो? क्या तुम लोग इसे समझ पाए? क्या तुम लोग सोचते हो कि परमेश्वर के कार्य और परमेश्वर के स्वभाव के विषय में इस प्रकार की संगति बहुत बोझिल है? तुम लोगों ने कैसा महसूस किया? (बहुत अच्छा, उत्साहित।) किस चीज़ ने तुम लोगों को अच्छा महसूस कराया? तुम लोग क्यों उत्साहित थे? (यह अदन के बाग में वापस लौटने, वापस परमेश्वर के पास लौटने के समान है।) "परमेश्वर का स्वभाव" वास्तव में प्रत्येक के लिए बिलकुल अपरिचित विषय है, क्योंकि जो कुछ तुम सामान्यतः सोचते हो, जो कुछ तुम पुस्तकों में पढ़ते या संगतियों में सुनते हो, यह तुम्हें हमेशा एक नेत्रहीन मनुष्य के समान महसूस कराता है जो एक हाथी को स्पर्श कर रहा है—तुम बस अपने हाथों से आस पास की चीज़ों को महसूस करते हो, लेकिन तुम असल में अपनी आँखों से कुछ भी नहीं देखते हो। "हाथ का स्पर्श" तुम्हें परमेश्वर के ज्ञान की एक आधारभूत रूपरेखा दे ही नहीं सकता है, एक स्पष्ट धारणा की तो बात ही छोड़ दो। यह तुम्हारे लिए और अधिक कल्पना लेकर आता है, ताकि तुम सही रीति से परिभाषा न दे सको कि परमेश्वर का स्वभाव एवं सार क्या है। इसके बजाए, अनिश्चितता के ये कारक जो तुम्हारी कल्पना से उठते हैं वे तुम्हारे हृदय को शंकाओं से भरते हुए प्रतीत होते हैं। जब तुम किसी चीज़ के विषय में निश्चित नहीं हो सकते हो और फिर भी तुम इसे समझने की कोशिश करते हो, तो तुम्हारे हृदय में हमेशा विरोधाभास एवं संघर्ष होते हैं, और कई बार यह एक अशांति का रूप भी ले सकता है, और तुम भ्रमित महसूस करते हो। क्या यह एक अत्यंत दुखदायी बात नहीं है जब तुम परमेश्वर को खोजना चाहते हो, परमेश्वर को जानना चाहते हो, और उसे साफ साफ देखना चाहते हो, लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि तुम्हें हमेशा उत्तर नहीं मिलते हैं? हाँ वास्तव में, इन शब्दों का निशाना केवल उन लोगों की ओर है जो परमेश्वर के आदर को खोजने और परमेश्वर को संतुष्ट करने की इच्छा करते हैं। क्योंकि ऐसे लोग जो ऐसी चीज़ों पर कोई ध्यान देते ही नहीं हैं, इससे असल में कोई फर्क नहीं पड़ता है क्योंकि वे आशा करते हैं कि यह अच्छा है कि परमेश्वर की यथार्थता एवं अस्तित्व एक दंतकथा या कल्पना है, जिससे जो कुछ भी वे चाहते हैं उसे कर सकें, जिससे वे सबसे महान एवं अत्यंत महत्वपूर्ण हो सकें, जिससे वे परिणामों की परवाह किए बगैर बुरे काम कर सकें, जिससे उन्हें सज़ा का सामना करना या किसी ज़िम्मेदारी को उठाना न पड़े, जिससे यहाँ तक कि वे चीज़ें भी उन पर लागू नहीं होंगी जिन्हें परमेश्वर कुकर्मियों के विषय में कहता है। ये लोग परमेश्वर के स्वभाव को समझने के लिए तैयार नहीं हैं, वे परमेश्वर और उसके बारे में सब कुछ जानने की कोशिश करते करते उकता गए हैं और थक चुके हैं। वे ज़्यादा पसंद करेंगे कि परमेश्वर अस्तित्व में न हो। ये लोग परमेश्वर का विरोध करते हैं और वे ऐसे लोग हैं जिन्हें हटा दिया जाएगा।

इसके आगे, हम नूह की कहानी और यह किस प्रकार परमेश्वर के कार्य, परमेश्वर के स्वभाव और स्वयं परमेश्वर के विषय से सम्बन्धित है, इस पर चर्चा करेंगे।

पवित्र शास्त्रों के इस भाग में तुम लोग परमेश्वर को नूह के साथ क्या करते हुए देखते हो? कदाचित् यहाँ बैठा हुआ प्रत्येक जन पवित्र शास्त्र को पढ़ने से इसके बारे में कुछ न कुछ जानता है: परमेश्वर ने नूह से एक जहाज़ बनवाया, फिर परमेश्वर ने संसार का नाश करने के लिए जलप्रलय का उपयोग किया। परमेश्वर ने नूह के अपने परिवार के आठ लोगों को बचाने के लिए, जीवित रहने हेतु अनुमति देने के लिए, और मानवजाति की अगली पीढ़ी के पूर्वज बनने के लिए उसे एक जहाज बनाने दिया। आओ अब हम पवित्रशास्त्र को पढ़ें।

ख. नूह

1. परमेश्वर संसार को जलप्रलय से नाश करने का इरादा करता है, नूह को एक जहाज बनाने का निर्देश देता है

(उत्पत्ति 6:9-14) नूह की वंशावली यह है। नूह धर्मी पुरुष और अपने समय के लोगों में खरा था; और नूह परमेश्वर ही के साथ साथ चलता रहा। और नूह से, शेम और हाम और येपेत नामक तीन पुत्र उत्पन्न हुए। उस समय पृथ्वी परमेश्वर की दृष्टि में बिगड़ गई थी, और उपद्रव से भर गई थी। और परमेश्वर ने पृथ्वी पर जो दृष्टि की तो क्या देखा कि वह बिगड़ी हुई है; क्योंकि सब प्राणियों ने पृथ्वी पर अपना अपना चाल-चलन बिगाड़ लिया था। तब परमेश्वर ने नूह से कहा, "सब प्राणियों के अन्त करने का प्रश्न मेरे सामने आ गया है; क्योंकि उनके कारण पृथ्वी उपद्रव से भर गई है, इसलिये मैं उनको पृथ्वी समेत नष्ट कर डालूँगा। इसलिये तू गोपेर वृक्ष की लकड़ी का एक जहाज़ बना ले, उसमें कोठरियाँ बनाना, और भीतर बाहर उस पर राल लगाना।

(उत्पत्ति 6:18-22) परन्तु तेरे संग मैं वाचा बाँधता हूँ; इसलिये तू अपने पुत्रों, स्त्री और बहुओं समेत जहाज़ में प्रवेश करना। और सब जीवित प्राणियों में से तू एक एक जाति के दो दो, अर्थात् एक नर और एक मादा जहाज़ में ले जाकर, अपने साथ जीवित रखना। एक एक जाति के पक्षी, और एक एक जाति के पशु, और एक एक जाति के भूमि पर रेंगनेवाले, सब में से दो दो तेरे पास आएँगे, कि तू उनको जीवित रखे। और भाँति भाँति का भोज्य पदार्थ जो खाया जाता है, उनको तू लेकर अपने पास इकट्ठा कर रखना; जो तेरे और उनके भोजन के लिये होगा। परमेश्वर की इस आज्ञा के अनुसार नूह ने किया।

इन अंशों को पढ़ने के बाद क्या अब तुम लोगों के पास नूह के बारे में एक सामान्य समझ है कि वह कैसा है? नूह किस प्रकार का व्यक्ति था? मूल पाठ है: "नूह धर्मी पुरुष और अपने समय के लोगों में खरा था।" वर्तमान लोगों की समझ के अनुसार, उस समय अतीत में, एक धर्मी व्यक्ति किस प्रकार का व्यक्ति था? एक धर्मी पुरुष को सिद्ध या खरा होना चाहिए। क्या तुम लोग जानते हो कि यह सिद्ध व्यक्तिमनुष्य की दृष्टि में सिद्ध है या परमेश्वर की दृष्टि में सिद्ध है? बिना किसी शंका के, यह सिद्ध व्यक्ति परमेश्वर की दृष्टि में सिद्ध है और मनुष्य की दृष्टि में नहीं। यह तो निश्चित है! ऐसा इसलिए है क्योंकि मनुष्य अंधा है और देख नहीं सकता है, और सिर्फ परमेश्वर ही पूरी पृथ्वी पर और हर एक व्यक्ति को देखता है, सिर्फ परमेश्वर ही जानता है कि नूह एक सिद्ध व्यक्तिहै। इसलिए, संसार को जलप्रलय से नष्ट करने की परमेश्वर की योजना उस क्षण शुरू हो गई थी जब उसने नूह को बुलाया था।

उस युग में, परमेश्वर ने एक बहुत ही महत्वपूर्ण कार्य करने के लिए नूह को बुलाने का इरादा किया। उसे यह क्यों करना पड़ा? क्योंकि उस घड़ी परमेश्वर के हृदय में एक योजना थी। उसकी योजना जलप्रलय से संसार का नाश करने की थी। संसार का नाश क्यों करना है? यहाँ कहा गया है: "उस समय पृथ्वी परमेश्वर की दृष्टि में बिगड़ गई थी, और उपद्रव से भर गई थी।" तुम लोग इस वाक्यांश से क्या देखते हो "पृथ्वी उपद्रव से भर गई थी"? यह पृथ्वी पर एक घटना है जब संसार और इसके लोग चरमावस्था तक बिगड़ गए हैं, और यही: "पृथ्वी उपद्रव से भर गई थी", है। आज की भाषा में, "उपद्रव से भर गई थी" मतलब सबकुछ गड़बड़ है। मनुष्य के लिए, इसका मतलब है कि जीवन के सभी दौर में कोई क्रम नहीं है, और परिस्थितियाँ बहुत ही अस्तव्यस्त हैं और उन्हें सम्भालना कठिन है। परमेश्वर की नज़रों में, इसका मतलब है कि संसार के लोग बहुत ही भ्रष्ट हैं। किस हद तक भ्रष्ट हैं? उस हद तक भ्रष्ट हैं कि परमेश्वर उन्हें देखना अब और बर्दाश्त नहीं कर सकता है और वह इस विषय में और अधिक धीरज नहीं धर सकता है। उस हद तक भ्रष्ट कि परमेश्वर उसे नष्ट करने का निर्णय लेता है। जब परमेश्वर ने संसार को नष्ट करने की ठान ली, तो उसने जहाज़ बनाने के लिए किसी को ढूढ़ने की योजना बनाई। फिर परमेश्वर ने इस कार्य को करने के लिए नूह को चुना, अर्थात नूह को जहाज़ बनाने दिया। नूह को क्यों चुना? परमेश्वर की नज़रों में, नूह एक धर्मी पुरुष है, और चाहे परमेश्वर उसे कुछ भी करने का निर्देश दे वह उसी के अनुसार कार्य करेगा। इसका मतलब है कि जो कुछ भी परमेश्वर उसे करने के लिए कहेगा वह उसे करेगा। परमेश्वर अपने साथ कार्य करने के लिए, जो कुछ उसने सौंपा है उसे पूर्ण करने के लिए, और पृथ्वी पर अपने कार्य को पूर्ण करने के लिए ऐसे ही व्यक्ति को ढूँढना चाहता था। उस समय अतीत में, क्या नूह के अलावा कोई और व्यक्ति था जो ऐसे कार्य को पूर्ण कर सकता था? निश्चित रूप से नहीं! नूह ही एकमात्र उम्मीदवार था, ऐसा एकमात्र व्यक्ति जो उसे पूर्ण कर सकता था जिसे परमेश्वर ने सौंपा था, और इस प्रकार परमेश्वर ने उसे चुना। लेकिन क्या उस समय लोगों को बचाने के लिए परमेश्वर का दायरा एवं मापदंड वैसे ही थे जैसे अब हैं? उत्तर यह है कि इसमें बिलकुल एक अन्तर है! मैं क्यों पूछता हूँ? उस समय के दौरान परमेश्वर की नज़रों में केवल नूह ही एक धर्मी पुरुष था, एक अर्थ में उसकी पत्नी और उसके बेटे और बहूएँ सभी धर्मी लोग नहीं थे, लेकिन परमेश्वर ने नूह के कारण इन लोगों को अब भी बचाकर रखा था। परमेश्वर ने उनसे उस तरह से अपेक्षा नहीं की थी जैसे वह आज के लोगों से अपेक्षा करता है, और इसके बजाए उसने नूह के परिवार के आठ सदस्यों को सुरक्षित रखा। उन्होंने नूह की धार्मिकता के कारण परमेश्वर की आशीष को प्राप्त किया। यदि नूह नहीं होता, तो उनमें से कोई भी उस कार्य को पूर्ण नहीं कर सकता था जो परमेश्वर ने सौंपा था। इसलिए, नूह ही ऐसा एकमात्र व्यक्ति था जिसे कि उस समय संसार के विनाश में जीवित बचना था, अन्य लोग बस अतिरिक्त सहायक लाभार्थी थे। यह दर्शाता है कि, परमेश्वर ने अपने प्रबंधकीय कार्य को आधिकारिक रूप से प्रारम्भ किया उसके पहले के युग में, ऐसे सिद्धान्त एवं मापदंड जिसके तहत वह लोगों से व्यवहार करता और उनसे अपेक्षा करता था वे अपेक्षाकृत शिथिल थे। आज के लोगों के लिए, ऐसा प्रतीत होता है कि जिस तरह से परमेश्वर ने नूह के परिवार के आठ सदस्यों से व्यवहार किया उसमें निष्पक्षता का अभाव है। किन्तु कार्य के उस परिमाण की तुलना में जिसे वह अब लोगों पर करता है और उसके वचन की मात्रा की तुलना में जिसे वह देता है, वह व्यवहार जो परमेश्वर ने नूह के परिवार के आठ लोगों से किया वह महज उस समय उसके कार्य की पृष्ठभूमि के मद्देनज़र एक कार्य सिद्धान्त था। तुलनात्मक रूप से, क्या नूह के परिवार के आठ लोगों ने परमेश्वर से कहीं ज़्यादा प्राप्त किया था या आज के लोग ज़्यादा प्राप्त करते हैं?

नूह का बुलाया जाना एक साधारण तथ्य है, परन्तु वह मुख्य बिन्दु जिसके विषय में हम बात कर रहे हैं—इस अभिलेख में परमेश्वर का स्वभाव, परमेश्वर की इच्छा एवं उसका सार—वह साधारण नहीं है। परमेश्वर के इन विभिन्न पहलुओं को समझने के लिए, हमें पहले समझना होगा कि परमेश्वर किस प्रकार के व्यक्ति को बुलाने की इच्छा करता है, और इसके माध्यम से, हमें उसके स्वभाव, इच्छा एवं सार को समझना होगा। यह अत्यंत महत्वपूर्ण है। अतः परमेश्वर की नज़रों में, यह किस प्रकार का व्यक्ति है जिसे वह बुलाता है? यह ऐसा व्यक्ति होगा जो उसके वचनों को सुन सके, जो उसके निर्देशों का अनुसरण कर सके। साथ ही, यह ऐसा व्यक्ति भी होगा जिसके पास ज़िम्मेदारी की भावना हो, कोई ऐसा व्यक्ति जो परमेश्वर के वचन को ऐसी ज़िम्मेदारी एवं कर्तव्य मानकरक्रियान्वित करेगा जिसे निभाने के लिए वो बाध्य है। तब क्या इस व्यक्ति को ऐसा व्यक्ति होने की आवश्यकता है जो परमेश्वर को जानता है? नहीं। उस समय अतीत में, नूह ने परमेश्वर की शिक्षाओं के बारे में बहुत कुछ नहीं सुना था या परमेश्वर के किसी कार्य का अनुभव नहीं किया था। इसलिए, परमेश्वर के बारे में नूह का ज्ञान बहुत ही कम था। हालाँकि यहाँ लिखा है कि नूह परमेश्वर के साथ साथ चलता रहा, फिर भी क्या उसने कभी परमेश्वर के व्यक्तित्व को देखा था? उत्तर है पक्के तौर पर नहीं! क्योंकि उन दिनों में, सिर्फ परमेश्वर के संदेशवाहक ही लोगों के पास आते थे। जबकि वे चीज़ों को कहने एवं करने के द्वारा परमेश्वर का प्रतिनिधित्व कर सकते थे, वे महज परमेश्वर की इच्छा एवं इरादों को सूचित कर रहे थे। परमेश्वर का व्यक्तित्व मनुष्य पर आमने-सामने प्रकट नहीं हुआ था। पवित्र शास्त्र के इस भाग में, हम सब मूल रूप से देखते हैं कि इस व्यक्ति नूह को क्या करना था और उसके लिए परमेश्वर के निर्देश क्या थे। अतः वह सार क्या था जिसे यहाँ परमेश्वर के द्वारा व्यक्त किया गया था? सब कुछ जो परमेश्वर करता है उसकी योजना सटीकता के साथ बनाई जाती है। जब वह किसी चीज़ या परिस्थिति को घटित होते देखता है, तो उसकी दृष्टि में इसे नापने के लिए एक मापदंड होगा, और यह मापदंड निर्धारित करेगा कि इसके साथ निपटने के लिए वह किसी योजना की शुरुआत करता है या नहीं या उसे इस चीज़ एवं परिस्थिति के साथ किस प्रकार निपटना है। वह उदासीन नहीं है या उसके पास सभी चीज़ों के प्रति कोई भावनाएँ नहीं हैं। यह असल में पूर्णत: विपरीत है। यहाँ एक वचन है जिसे परमेश्वर ने नूह से कहा था: "सब प्राणियों के अन्त करने का प्रश्न मेरे सामने आ गया है; क्योंकि उनके कारण पृथ्वी उपद्रव से भर गई है, इसलिये मैं उनको पृथ्वी समेत नाश कर डालूँगा।" इस समय परमेश्वर के वचनों में, क्या उसने कहा था कि वह सिर्फ मनुष्यों का विनाश कर रहा था? नहीं! परमेश्वर ने कहा कि वह हाड़-मांस के सब जीवित प्राणियों का विनाश करने जा रहा था। परमेश्वर ने विनाश क्यों चाहा? यहाँ परमेश्वर के स्वभाव का एक और प्रकाशन है: परमेश्वर की दृष्टि में, मनुष्य की भ्रष्टता के प्रति, सभी प्राणियों की अशुद्धता, उपद्रव एवं अनाज्ञाकारिता के प्रति उसके धीरज की एक सीमा होती है। उसकी सीमा क्या है? यह ऐसी है जैसा परमेश्वर ने कहा था: "और परमेश्वर ने पृथ्वी पर जो दृष्टि की तो क्या देखा कि वह बिगड़ी हुई है; क्योंकि सब प्राणियों ने पृथ्वी पर अपना अपना चाल-चलन बिगाड़ लिया था।" इस वाक्यांश "क्योंकि सब प्राणियों ने पृथ्वी पर अपना-अपना चाल चलन बिगाड़ लिया था" का क्या अर्थ है? इसका अर्थ है कोई भी जीवित प्राणी, परमेश्वर का अनुसरण करने वालों समेत, ऐसे लोग जो परमेश्वर का नाम पुकारते थे, ऐसे लोग जो किसी समय परमेश्वर को होमबलि चढ़ाते थे, ऐसे लोग जो मौखिक रूप से परमेश्वर को स्वीकार करते थे और यहाँ तक कि परमेश्वर की स्तुति भी करते थे—जब एक बार उनका व्यवहार भ्रष्टता से भर गया और परमेश्वर की दृष्टि तक पहुँच गया, तो उसे उन्हें नाश करना होगा। यह परमेश्वर की सीमा थी। अतः परमेश्वर किस हद तक मनुष्य एवं सभी प्राणियों की भ्रष्टता के प्रति सहनशील बना रहा? उस हद तक जब सभी लोग, चाहे परमेश्वर के अनुयायी हों या अविश्वासी, सही मार्ग पर नहीं चल रहे थे। उस हद तक कि मनुष्य केवल नैतिक रूप से भ्रष्ट और बुराई से भरा हुआ नहीं था, बल्कि जहाँ कोई व्यक्ति नहीं था जो परमेश्वर के अस्तित्व में विश्वास करता था, किसी ऐसे व्यक्ति की तो बात ही छोड़ दीजिए जो विश्वास करता था कि परमेश्वर के द्वारा इस संसार पर शासन किया जाता है और यह कि परमेश्वर लोगों को ज्योति में और सही मार्ग पर ला सकता है। उस हद तक जहाँ मनुष्य ने परमेश्वर के अस्तित्व को तुच्छ जाना और परमेश्वर को अस्तित्व में रहने की अनुमति नहीं दी। जब एक बार मनुष्य की भ्रष्टता इस बिन्दु पर पहुँच गई, तो परमेश्वर के पास और अधिक धीरज नहीं होगा। इसके बजाए उसका स्थान कौन लेगा? परमेश्वर के क्रोध और परमेश्वर के दण्ड का आगमन। क्या यह परमेश्वर के स्वभाव का एक आंशिक प्रकाशन नहीं था? इस वर्तमान युग में, क्या परमेश्वर की दृष्टि में अभी भी कोई धर्मी मनुष्य है? क्या परमेश्वर की दृष्टि में अभी भी कोई सिद्ध मनुष्य है? क्या यह युग ऐसा युग है जिसके अंतर्गत परमेश्वर की दृष्टि में पृथ्वी पर सभी प्राणियों का व्यवहार भ्रष्ट हो गया है? आज के दिन और युग में, ऐसे लोगों को छोड़ कर जिन्हें परमेश्वर पूर्ण करना चाहता है, ऐसे लोग जो परमेश्वर का अनुसरण और उसके उद्धार को स्वीकार कर सकते हैं, क्या हाड़-मांस के सभी लोग परमेश्वर के धीरज की सीमा को चुनौती नहीं दे रहे हैं? क्या सभी चीज़ें जो तुम लोगों के आस-पास घटित होती हैं, जिन्हें तुम लोग अपनी आँखों से देखते हो और अपने कानों से सुनते हो, और इस संसार में व्यक्तिगत रूप से अनुभव करते हो उपद्रव से भरी हुई नहीं हैं? परमेश्वर की दृष्टि में, क्या एक ऐसे संसार, एवं ऐसे युग को समाप्त नहीं कर देना चाहिए? यद्यपि इस वर्तमान युग की पृष्ठभूमि नूह के समय की पृष्ठभूमि से पूर्णतः अलग है, फिर भी वे भावनाएँ एवं क्रोध जो मनुष्य की भ्रष्टता के प्रति परमेश्वर में है वे वैसी ही बनी रहती हैं जैसी वे पिछले समय में थीं। परमेश्वर अपने कार्य के कारण सहनशील होने में समर्थ है, किन्तु सब प्रकार की परिस्थितियों एवं हालातों के अनुसार, परमेश्वर की दृष्टि में इस संसार को बहुत पहले ही नष्ट कर दिया जाना चाहिए था। जैसा पिछले समय में था जब जलप्रलय के द्वारा संसार का विनाश किया गया था उसके लिहाज से परिस्थिति बिल्कुल अलग है। किन्तु अन्तर क्या है? साथ ही यह ऐसी चीज़ है जो परमेश्वर के हृदय को अत्यंत दुःखी करती है, और कदाचित् कुछ ऐसा है जिसकी तुम लोगों में से कोई भी सराहना नहीं कर सकता है।

जब वह जलप्रलय के द्वारा संसार का नाश कर रहा था, तब परमेश्वर नूह को जहाज़ बनाने, और कुछ तैयारी के काम के लिए बुला सकता था। परमेश्वर एक पुरुष—नूह—को बुला सकता था कि वह उसके लिए कार्यों की इन श्रृंखलाओं को अंजाम दे। किन्तु इस वर्तमान युग में, परमेश्वर के पास कोई नहीं है जिसे वो बुलाए। ऐसा क्यों है? हर एक व्यक्ति जो यहाँ बैठा है वह शायद उस कारण को बहुत अच्छी तरह समझता और जानता है। क्या तुम लोगों के लिए आवश्यक है कि मैं इसे बोलकर बताऊँ? ज़ोर से कहने से हो सकता है कि तुम लोगों का सम्मान खो जाये या सब परेशान हो जाएँ। कुछ लोग कह सकते हैं: "हालाँकि परमेश्वर की दृष्टि में हम धर्मी लोग नहीं हैं और हम सिद्ध लोग नहीं हैं, फिर भी यदि परमेश्वर हमें कोई चीज़ करने के लिए निर्देश देता है, तो हम अभी भी इसे करने में समर्थ होंगे। इससे पहले, जब उसने कहा कि एक विनाशकारी तबाही आ रही थी, तो हमने भोजन एवं ऐसी चीज़ों को तैयार करना शुरू कर दिया था जिनकी आवश्यकता किसी आपदा में होगी। क्या यह सब परमेश्वर की माँगों के अनुसार नहीं किया गया था? क्या हम सचमुच में परमेश्वर के कार्य के साथ सहयोग नहीं कर रहे थे? जो चीज़ें हमने कीं क्या उनकी तुलना जो कुछ नूह ने किया उससे नहीं की जा सकती है? हमने जो किया क्या वो सच्ची आज्ञाकारिता नहीं है? क्या हम परमेश्वर के निर्देशों का अनुसरण नहीं कर रहे थे? क्या हमने जो परमेश्वर ने कहा वो इसलिए नहीं किया क्योंकि हमें परमेश्वर के वचनों में विश्वास है? तो परमेश्वर अब भी दुःखी क्यों है? परमेश्वर क्यों कहता है कि उसके पास बुलाने के लिए कोई भी नहीं है?" क्या तुम लोगों के कार्यों और नूह के कार्यों के बीच कोई अन्तर है? अन्तर क्या है? (आपदा के लिए आज भोजन तैयार करना हमारा अपना इरादा था।) (हमारे कार्य "धर्मिता" तक नहीं पहुँच सकते हैं, जबकि नूह परमेश्वर की दृष्टि में एक धर्मी पुरुष था।) जो कुछ तुम लोगों ने कहा वह बहुत गलत नहीं है। जो नूह ने किया वह भौतिक रूप से उससे अलग है जो लोग अब कर रहे हैं। जब नूह ने वैसा किया जैसा परमेश्वर ने निर्देश दिया था तो वह नहीं जानता था कि परमेश्वर के इरादे क्या थे। उसे नहीं पता था कि परमेश्वर क्या पूरा करना चाहता था। परमेश्वर ने नूह को सिर्फ एक आज्ञा दी थी, उसे कुछ करने के लिए निर्देश दिया था, किन्तु अधिक विवरण नहीं दिया, पर वह आगे बढ़ा और उसने इसे किया। उसने अकेले में परमेश्वर के इरादों को जानने की कोशिश नहीं की, न ही उसने परमेश्वर का विरोध किया या न ही उसके पास दो मन था। उसने मात्र इसे एक शुद्ध एवं सरल हृदय के साथ तदनुसार किया। जो कुछ करने के लिए परमेश्वर ने उसे अनुमति दी उसने उसे किया, और कार्यों को करने के लिए परमेश्वर के वचन को मानने एवं सुनने में उसका दृढ़ विश्वास था। जो कुछ परमेश्वर ने उसे सौंपा था उसके साथ उसने इसी प्रकार स्पष्टवादिता एवं सरलता से व्यवहार किया था। उसका सार—उसके कार्यों का सार आज्ञाकारिता थी, आलोचना नहीं था, प्रतिरोध नहीं था, और इसके अतिरिक्त, अपनी व्यक्तिगत रुचियों और अपने लाभ एवं हानि के विषय में सोचना नहीं था। और, जब परमेश्वर ने कहा कि वह जलप्रलय से संसार का नाश करेगा, तो उसने नहीं पूछा कब या इसकी तह तक पहुँचने की कोशिश नहीं की, और उसने निश्चित तौर पर परमेश्वर से नहीं पूछा कि वह किस प्रकार संसार को नष्ट करने जा रहा था। उसने केवल वही किया जैसा परमेश्वर ने निर्देश दिया था। चाहे जैसे भी परमेश्वर इसे बनाना चाहता था या जिस भी चीज़ से बनाना चाहता था, उसने बिलकुल वैसा ही किया जैसा परमेश्वर ने उसे कहा था और उसके तुरन्त बाद कार्य का प्रारम्भ भी किया था। उसने इसे परमेश्वर को संतुष्ट करने की एक मनोवृत्ति के साथ किया था। क्या वह स्वयं की आपदा से बचने में सहायता करने के लिए इसे कर रहा था? नहीं। क्या उसने परमेश्वर से पूछा कि संसार को नष्ट होने में कितना समय बाकी है? उसने नहीं पूछा। क्या उसने परमेश्वर से पूछा या क्या वह जानता था कि जहाज़ बनाने के लिए कितना समय लगेगा? वह यह भी नहीं जानता था। उसने केवल आज्ञा को माना, ध्यान से सुना, और इसके अनुसार किया। इस समय के लोग वैसे नहीं हैं: जैसे ही परमेश्वर के वचन से हल्की सी जानकारी निकलती है, जैसे ही लोग परेशानी या समस्या के किसी चिन्ह का आभास करते हैं, वे तुरन्त, किसी भी चीज़ और कीमत की परवाह किए बगैर, आपदा के बाद क्या खाएँगे, क्या पियेंगे एवं क्या उपयोग करेंगे, इसकी तैयारी करने के लिए कार्य करने को कूद पड़ते हैं, यहाँ तक कि जब विपत्ति आती है तो वे बच निकलने के अपने मार्गों की योजना बना लेते हैं। इससे भी अधिक दिलचस्प तो यह है कि, इस मुख्य क्षण में, मानवीय दिमाग बहुत ही "उपयोगी" होते हैं। उन परिस्थितियों के अंतर्गत जहाँ परमेश्वर ने कोई निर्देश नहीं दिया है, मनुष्य बिलकुल उपयुक्त ढंग से सब कुछ की योजना बना लेता है। तुम लोग इसका वर्णन करने के लिए "सिद्ध" शब्द का उपयोग कर सकते हो। जहाँ तक इसकी बात है कि परमेश्वर क्या कहता है, परमेश्वर के इरादे क्या हैं, या परमेश्वर क्या चाहता है, कोई भी परवाह नहीं करता है और कोई भी इसकी सराहना करने की कोशिश नहीं करता है। क्या यह आज के लोगों और नूह के बीच में सबसे बड़ा अन्तर नहीं है?

नूह की कहानी के इस अभिलेख में, क्या तुम लोग परमेश्वर के स्वभाव के एक भाग को देखते हो? मनुष्य की भ्रष्टता, अशुद्धता एवं उपद्रव के प्रति परमेश्वर के धीरज की एक सीमा है। जब वह उस सीमा तक पहुँच जाता है, तो वह और अधिक धीरज नहीं धरता है और इसके बजाए वह अपने नए प्रबंधन और नई योजना को शुरू करेगा, जो उसे करना है उसे प्रारम्भ करेगा, और अपने कार्यों और अपने स्वभाव के दूसरे पहलु को प्रकट करेगा। उसका यह कार्य यह दर्शाने के लिए नहीं है कि मनुष्य के द्वारा कभी उसका उल्लंघन नहीं किया जाना चाहिए या यह कि वह अधिकार एवं क्रोध से भरा हुआ है, और यह इस बात को दर्शाने के लिए नहीं है कि वह मानवता का नाश कर सकता है। बात यह है कि उसका स्वभाव एवं उसका पवित्र सार इस प्रकार की मानवता को परमेश्वर के सामने जीवन बिताने हेतु, और उसकी प्रभुता के अधीन जीवन जीने हेतु न और अनुमति नहीं दे सकता है, न और अधिक धीरज रख सकता है। कहने का तात्पर्य है, जब सारी मानवजाति उसके विरुद्ध है, जब सारी पृथ्वी में ऐसा कोई नहीं है जिसे वह बचा सकता है, तो ऐसी मानवता के लिए उसके पास और अधिक धीरज नहीं होगा, और वह बिना किसी सन्देह के अपनी योजना को सम्पन्न करेगा—इस प्रकार की मानवता को नाश करने के लिए। परमेश्वर के द्वारा किए गए ऐसे कार्य को उसके स्वभाव के द्वारा निर्धारित किया जाता है। यह एक आवश्यक परिणाम है, और ऐसा परिणाम है जिसे परमेश्वर की प्रभुता के अधीन प्रत्येक सृजे गए प्राणी को सहना होगा। क्या यह नहीं दर्शाता है कि इस वर्तमान युग में, परमेश्वर अपनी योजना को पूर्ण करने और उन लोगों को बचाने के लिए जिन्हें वह बचाना चाहता है और इन्तज़ार नहीं कर सकता है? इन परिस्थितियों के अंतर्गत, परमेश्वर किस बात की सबसे अधिक परवाह करता है? इसकी नहीं कि किस प्रकार ऐसे लोग जो उसका अनुसरण बिलकुल भी नहीं करते हैं या ऐसे लोग जो हर तरह से उसका विरोध करते हैं वे उससे कैसा व्यवहार करते हैं या उसका कैसे प्रतिरोध करते हैं, या मानवजाति किस प्रकार उस पर कलंक लगा रही है। वह केवल इसके विषय में परवाह करता है कि वे लोग जो उसका अनुसरण करते हैं, उसकी प्रबंधन योजना में उसके उद्धार के विषय, उन्हें उसके द्वारा पूर्ण बनाया गया है या नहीं, उन्होंने उसकी संतुष्टि को हासिल किया है या नहीं। जहाँ तक उन लोगों की बात है जो उसका अनुसरण करने वालों के अतिरिक्त हैं, वह मात्र कभी कभार ही अपने क्रोध को व्यक्त करने के लिए थोड़ा सा दण्ड देता है। उदाहरण के लिए: सुनामी, भूकम्प, ज्वालामुखी का विस्फोट, एवं इत्यादि। ठीक उसी समय, वह उनको भी प्रभावशाली ढंग से बचाता है, उनकी देखरेख करता है जो उसका अनुसरण करते हैं और जिन्हें उसके द्वारा बचाया जानेवाला है। परमेश्वर का स्वभाव यह है: एक ओर, वह उन लोगों को अधिकतम धीरज एवं सहनशीलता प्रदान कर सकता है जिन्हें वह पूर्ण बनाने का इरादा करता है, और जब तक वह संभवतः कर सकता है वह उनके लिए इंतज़ार करता है; दूसरी ओर, परमेश्वर शैतान-प्रकार के लोगों से अत्यंत नफ़रत एवं घृणा करता है जो उसका अनुसरण नहीं करते हैं और उसका विरोध करते हैं। यद्यपि वह इस बात की परवाह नहीं करता है कि ये शैतान-प्रकार लोग उसका अनुसरण करते या उसकी आराधना करते हैं या नहीं, वह तब भी उनसे घृणा करता है जबकि उसके हृदय में उनके लिए धीरज होता है, और चूँकि वह इन शैतान-प्रकार के लोगों के अन्त को निर्धारित करता है, इसलिए वह अपने प्रबंधकीय योजना के चरणों के आगमन का भी इन्तज़ार कर रहा होता है।

आओ हम अगले अंश को देखें।

2. जलप्रलय के बाद नूह के लिए परमेश्वर की आशीष

(उत्पत्ति 9:1-6) फिर परमेश्वर ने नूह और उसके पुत्रों को आशीष दी और उनसे कहा, कि फूलो-फलो, और बढ़ो, और पृथ्वी में भर जाओ। तुम्हारा डर और भय पृथ्वी के सब पशुओं, और आकाश के सब पक्षियों, और भूमि पर के सब रेंगनेवाले जन्तुओं, और समुद्र की सब मछलियों पर बना रहेगा: ये सब तुम्हारे वश में कर दिए जाते हैं। सब चलनेवाले जन्तु तुम्हारा आहार होंगे; जैसे तुम को हरे हरे छोटे पेड़ दिये थे, वैसा ही अब सब कुछ देता हूँ। पर मांस को प्राण समेत अर्थात् लहू समेत तुम न खाना। और निश्चय मैं तुम्हारे लहू अर्थात् प्राण का बदला लूँगा: सब पशुओं और मनुष्यों, दोनों से मैं उसे लूँगा; मनुष्य के प्राण का बदला मैं एक एक के भाई बन्धु से लूँगा। जो कोई मनुष्य का लहू बहाएगा उसका लहू मनुष्य ही से बहाया जाएगा, क्योंकि परमेश्वर ने मनुष्य को अपने ही स्वरुप के अनुसार बनाया है।

तुम लोग इस अंश से क्या देखते हो? मैंने इन वचनों को क्यों चुना? मैंने जहाज़ पर नूह और उसके परिवार के जीवन से एक उद्धरण क्यों नहीं लिया? क्योंकि उस जानकारी का उस विषय से ज़्यादा सम्बन्ध नहीं है जिस पर आज हम बातचीत कर रहे हैं। जिस पर हम ध्यान दे रहे हैं वह है परमेश्वर का स्वभाव। यदि तुम लोग उन विवरणों के विषय में जानना चाहते हो, तो तुम लोग बाइबल उठाकर स्वयं पढ़ सकते हो। यहाँ हम इसके विषय में बात नहीं करेंगे। वह मुख्य बात जिसके बारे में हम आज बात कर रहे हैं वह इस विषय में है कि परमेश्वर के कार्यों को कैसे जानें।

नूह के परमेश्वर के निर्देशों को स्वीकार करने, जहाज़ बनाने और परमेश्वर द्वारा संसार का नाश करने के लिए जलप्रलय का उपयोग किये जाने के दौरान जीवित रहने के पश्चात, आठ लोगों का उसका पूरा परिवार जीवित बच गया। नूह के परिवार के आठ लोगों को छोड़कर, सारी मानवजाति का नाश कर दिया गया था, और पृथ्वी पर सभी जीवित प्राणियों का नाश कर दिया गया था। नूह को, परमेश्वर ने आशीषें दीं, और उससे और उसके बेटों से कुछ बातें कहीं। ये बातें वे थीं जिन्हें परमेश्वर उसे प्रदान कर रहा था और उसके लिए परमेश्वर की आशीष भी थी। यह वह आशीष एवं प्रतिज्ञा है जिसे परमेश्वर किसी ऐसे व्यक्ति को देता है जो उसे ध्यान से सुन सकता है और उसके निर्देशों को स्वीकार कर सकता था, और साथ ही ऐसा तरीका भी है जिससे परमेश्वर लोगों को प्रतिफल देता है। कहने का तात्पर्य है, इसके बावजूद कि नूह परमेश्वर की दृष्टि में एक सिद्ध पुरुष था या एक धर्मी पुरुष था, और इसके बावजूद कि वह परमेश्वर के बारे में कितना कुछ जानता था, संक्षेप में, नूह और उसके तीन पुत्र सभी ने परमेश्वर के वचनों को सुना था, परमेश्वर के कार्य के साथ सहयोग किया था, और वही किया था जिसे उनसे परमेश्वर के निर्देशों के अनुसार करने की अपेक्षा की गई थी। परिणामस्वरूप, जलप्रलय के द्वारा संसार के विनाश के बाद उन्होंने मनुष्यों एवं विभिन्न प्रकार के जीवित प्राणियों को पुनः प्राप्त करने में परमेश्वर की सहायता की थी, और परमेश्वर की प्रबंधकीय योजना के अगले चरण में बड़ा योगदान दिया था। वह सब कुछ जो उसने किया था उसके कारण, परमेश्वर ने उसे आशीष दी। शायद आज के लोगों के लिए, जो कुछ नूह ने किया था वह उल्लेख करने के भी लायक नहीं है। कुछ लोग सोच सकते हैं: नूह ने कुछ भी नहीं किया था; परमेश्वर ने उसे बचाने के लिए अपना मन बना लिया था, अतः उसे निश्चित रूप से बचाया जाना था। उसके जीवित बचने का श्रेय उसे नहीं जाता है। यह वह है जिसे परमेश्वर घटित करना चाहता था, क्योंकि मनुष्य निष्क्रिय है। लेकिन यह वह नहीं है जो परमेश्वर सोच रहा था। परमेश्वर को, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि कोई व्यक्ति महान है या मामूली, जब तक वे उसे ध्यान से सुन सकते हैं, उसके निर्देशों और जो कुछ वह सौंपता है उसका पालन कर सकते हैं, और उसके कार्य, उसकी इच्छा एवं उसकी योजना के साथ सहयोग कर सकते हैं, ताकि उसकी इच्छा एवं उसकी योजना को निर्विघ्नता से पूरा किया जा सके, तो ऐसा आचरण उसके द्वारा उत्सव मनाए जाने के योग्य है और उसकी आशीष को प्राप्त करने के योग्य है। परमेश्वर ऐसे लोगों को मूल्यवान जानकर सहेजकर रखता है, और वह उनके कार्यों एवं अपने लिए उनके प्रेम एवं उनके स्नेह को ह्रदय में संजोता है। यह परमेश्वर की मनोवृत्ति है। तो परमेश्वर ने नूह को आशीष क्यों दी? क्योंकि परमेश्वर इसी तरह से ऐसे कार्यों एवं मनुष्य की आज्ञाकारिता से व्यवहार करता है।

नूह के विषय में परमेश्वर की आशीष के लिहाज से, कुछ लोग कहेंगे: "यदि मनुष्य परमेश्वर को ध्यान से सुनता है और परमेश्वर को संतुष्ट करता है, तो परमेश्वर को मनुष्य को आशीष देना चाहिए। क्या यह स्पष्ट नहीं है?" क्या हम ऐसा कह सकते हैं? कुछ लोग कहते हैं: "नहीं।" हम ऐसा क्यों नहीं कह सकते हैं? कुछ लोग कहते हैं: "मनुष्य परमेश्वर की आशीष का आनन्द उठाने के लायक नहीं है।" यह पूर्णतः सही नहीं है। क्योंकि जब कोई व्यक्ति जो कुछ परमेश्वर सौंपता है उसे स्वीकार करता है, तो परमेश्वर के पास न्याय करने के लिए एक मापदंड होता है कि उस व्यक्ति के कार्य अच्छे हैं या बुरे और उस व्यक्ति ने आज्ञा का पालन किया है या नहीं, और उस व्यक्ति ने परमेश्वर की इच्छा को संतुष्ट किया है या नहीं और जो कुछ वे करते हैं वो उपयुक्त है या नहीं। परमेश्वर जिसकी परवाह करता है वह किसी व्यक्ति का हृदय है, न कि सतह पर किए गए उनके कार्य। स्थिति ऐसी नहीं है कि परमेश्वर को किसी व्यक्ति को तब तक आशीष देना चाहिए जब तक वे इसे करते हैं, इसके बावजूद कि वे इसे कैसे करते हैं। यह परमेश्वर के बारे में लोगों की ग़लतफ़हमी है। परमेश्वर सिर्फ चीज़ों के अंत के परिणाम को ही नहीं देखता, बल्कि इस पर अधिक जोर देता है कि किसी व्यक्ति का हृदय कैसा है और चीज़ों के विकास के दौरान किसी व्यक्ति की मनोवृत्ति कैसी है, और यह देखता है कि उनके हृदय में आज्ञाकारिता, विचार, एवं परमेश्वर को संतुष्ट करने की इच्छा है या नहीं। उस समय नूह परमेश्वर के विषय में कितना जानता था? क्या यह उतना था जितने ये सिद्धान्त हैं जिन्हें अब तुम लोग जानते हो? परमेश्वर की अवधारणाएँ एवं उसका ज्ञान जैसे सत्य के पहलुओं के सम्बन्ध में, क्या उसने उतनी सिंचाई एवं चरवाही पाई थी जितनी तुम लोगों ने पाई है? नहीं, उसने नहीं पाई! लेकिन एक तथ्य है जिसे नकारा नहीं जा सकता है: चेतना में, मस्तिष्कों में, और यहाँ तक कि आज के लोगों के हृदयों की गहराई में भी, परमेश्वर के विषय में उनकी अवधारणाएँ और मनोवृत्ति धुंधली एवं अस्पष्ट है। तुम लोग यहाँ तक कह सकते हो कि लोगों का एक हिस्सा परमेश्वर के अस्तित्व के प्रति एक नकारात्मक मनोवृत्ति को थामे हुए है। लेकिन नूह के हृदय एवं चेतना में, परमेश्वर का अस्तित्व पूर्ण एवं बिना किसी सन्देह के था, और इस प्रकार परमेश्वर के प्रति उसकी आज्ञाकारिता शुद्ध थी और परीक्षा का सामना कर सकती थी। परमेश्वर के प्रति उसका हृदय शुद्ध एवं खुला हुआ था। उसे परमेश्वर के हर एक वचन का अनुसरण करने हेतु अपने आपको आश्वस्त करने के लिए सिद्धान्तों के बहुत अधिक ज्ञान की आवश्यकता नहीं थी, न ही उसे परमेश्वर के अस्तित्व को साबित करने के लिए बहुत सारे तथ्यों की आवश्यकता थी, ताकि जो कुछ परमेश्वर ने सौंपा था वह उसे स्वीकार कर सके और जो कुछ भी करने के लिए परमेश्वर ने उसे अनुमति दी थी वह उसे करने के योग्य हो सके। यह नूह और आज के लोगों के बीच आवश्यक अन्तर है, और साथ ही यह बिलकुल सही परिभाषा भी है कि परमेश्वर की दृष्टि में एक सिद्ध व्यक्ति कैसा होता है। जिन्हें परमेश्वर चाहता है वे नूह के समान लोग हैं। वह उस प्रकार का व्यक्ति है जिसकी प्रशंसा परमेश्वर करता है, और बिलकुल उसी प्रकार का व्यक्ति है जिसे परमेश्वर आशीष देता है। क्या तुम लोगों ने इससे कोई प्रबोधनप्राप्त किया है? लोग मनुष्यों को बाहर से देखते हैं, जबकि जो कुछ परमेश्वर देखता है वह लोगों के हृदय एवं उनके सार हैं। परमेश्वर किसी को भी अपने प्रति अधूरा-मन या सन्देह रखने की अनुमति नहीं देता है, न ही वह लोगों को किसी रीति से उस पर सन्देह करने या उसकी परीक्षा लेने की इजाज़त देता है। इस प्रकार, हालाँकि आज लोग परमेश्वर के वचन के आमने-सामने हैं, या तुम लोग यह भी कह सकते हो कि परमेश्वर के आमने-सामने हैं, फिर भी किसी चीज़ के कारण जो उनके हृदयों की गहराई में है, उनके भ्रष्ट मूल-तत्व के अस्तित्व, और उसके प्रति उनकी प्रतिकूल मनोवृत्ति के कारण, परमेश्वर में उनके सच्चे विश्वास से उन्हें अवरोधित किया गया है, और उसके प्रति उनकी आज्ञाकारिता में उन्हें बाधित किया गया है। इस कारण, यह उनके लिए बहुत कठिन है कि वे उसी आशीष को हासिल करें जिसे परमेश्वर ने नूह को प्रदान किया था।

3. परमेश्वर मनुष्य के साथ अपनी वाचा के लिए इंद्रधनुष को चिन्ह के रूप में ठहराता है

(उत्पत्ति 9:11-13) और मैं तुम्हारे साथ अपनी यह वाचा बाँधता हूँ कि सब प्राणी फिर जल-प्रलय से नष्ट न होंगे: और पृथ्वी का नाश करने के लिये फिर जल-प्रलय न होगा। फिर परमेश्वर ने कहा, जो वाचा मैं तुम्हारे साथ, और जितने जीवित प्राणी तुम्हारे संग हैं उन सब के साथ भी युग-युग की पीढ़ियों के लिए बाँधता हूँ, उसका यह चिन्ह है: मैंने बादल में अपना धनुष रखा है वह मेरे और पृथ्वी के बीच में वाचा का चिह्न होगा।

इसके आगे, आइए हम पवित्र शास्त्र के इस भाग पर एक नज़र डालें कि किस प्रकार परमेश्वर ने मनुष्य के साथ अपनी वाचा के लिए इंद्रधनुष को एक चिन्ह के रूप में ठहराया।

अधिकांश लोग जानते हैं कि इंद्रधनुष क्या है और उन्होंने इंद्रधनुष से जुड़ी कुछ कहानियों को सुना है। जहाँ तक बाइबल में इंद्रधनुष के बारे में उस कहानी की बात है, कुछ लोग इसका विश्वास करते हैं, कुछ दंतकथा के रूप में इससे व्यवहार करते हैं, जबकि अन्य लोग इस पर बिलकुल भी विश्वास नहीं करते हैं। चाहे कुछ भी हो, सब कुछ जो इंद्रधनुष के सम्बन्ध में घटित हुआ था वह सब ऐसी चीजें हैं जिन्हें परमेश्वर ने किसी समय किया था, और ऐसी चीज़ें हैं जो मनुष्य के लिए परमेश्वर के प्रबंधन की प्रक्रिया के दौरान घटित हुई थीं। इन चीज़ों को बाइबल में हू-बहू लिखा गया है। ये लेख हमें यह नहीं बताते हैं कि उस समय परमेश्वर किस मनोदशा में था या इन वचनों के पीछे उसके क्या इरादे थे जिन्हें परमेश्वर ने कहा था। इसके अतिरिक्त, कोई भी समझ नहीं सकता है कि परमेश्वर कैसा महसूस कर रहा था जब उसने उन्हें कहा था। फिर भी, इस समूचे हालात के लिहाज से परमेश्वर के मन की दशा को पाठ की पंक्तियों के बीच प्रकट किया गया है। यह ऐसा है मानो उस समय के उसके विचार परमेश्वर के वचन के प्रत्येक शब्द एवं वाक्यांश के ज़रिये पन्नों से निकल पड़ते हैं।

परमेश्वर के विचार वो विषय है जिसके बारे में लोगों को चिन्ताशील होना चाहिए और जिन्हें जानने के लिए उन्हें सबसे अधिक कोशिश करनी चाहिए। ऐसा इसलिए है क्योंकि परमेश्वर के विचार परमेश्वर के विषय में मनुष्य की समझ से नज़दीकी से जुड़े हुए हैं, और मनुष्य के द्वारा जीवन में प्रवेश करने के लिए परमेश्वर के विषय में मनुष्य की समझ एक अनिवार्य कड़ी है। अतः परमेश्वर उस समय क्या सोच रहा था जब ये परिस्थितियाँ घटित हुई थीं?

मूल रूप से, परमेश्वर ने ऐसी मानवता की सृष्टि की थी जो उसकी दृष्टि में बहुत ही अच्छी और उसके बहुत ही निकट थी, किन्तु उसके विरुद्ध विद्रोह करने के पश्चात् जलप्रलय के द्वारा उनका विनाश कर दिया गया था। क्या इसने परमेश्वर को कष्ट पहुँचाया कि एक ऐसी मानवता तुरन्त ही इस तरह विलुप्त हो गई थी? निश्चय ही इसने कष्ट पहुँचाया था! तो उसकी इस दर्द की अभिव्यक्ति क्या थी? बाइबल में इसे कैसे लिखा गया था? इसे बाइबल में इस रूप से लिखा गया: "और मैं तुम्हारे साथ अपनी यह वाचा बाँधता हूँ कि सब प्राणी फिर जल-प्रलय से नष्ट न होंगे: और पृथ्वी के नाश करने के लिये फिर जल-प्रलय न होगा।" यह साधारण वाक्य परमेश्वर के विचारों को प्रकट करता है। संसार के इस विनाश ने उसे बहुत अधिक दुःख पहुँचाया। मनुष्य के शब्दों में, वह बहुत ही दुःखी था। हम कल्पना कर सकते हैं: जलप्रलय के द्वारा नाश किए जाने के बाद पृथ्वी जो किसी समय जीवन से भरी हुई थी वह कैसी दिखाई देती थी? वह पृथ्वी जो किसी समय मानवों से भरी हुई थी अब कैसी दिखती थी? कोई मानवीय निवास नहीं, कोई जीवित प्राणी नहीं, हर जगह पानी ही पानी और जल की सतह पर सब कुछ अस्तव्यस्त था। जब परमेश्वर ने संसार को बनाया तो क्या उसका मूल इरादा ऐसा कोई दृश्य था? बिलकुल भी नहीं! परमेश्वर का मूल इरादा था कि समूची धरती पर जीवन को देखे, कि उन मानवों को जिन्हें उसने बनाया था, उन्हें अपनी आराधना करते हुए देखे, सिर्फ नूह के लिए ही नहीं कि वह उसकी आराधना करनेवाला एकमात्र व्यक्ति हो या ऐसा एकमात्र व्यक्ति जो उसकी बुलाहट का उत्तर दे सके ताकि जो कुछ उसे सौंपा गया था उसे पूर्ण करे। जब मानवता विलुप्त हो गई, तो परमेश्वर ने वह नहीं देखा जिसका उसने मूल रूप से इरादा किया था बल्कि पूर्णतः विपरीत देखा। उसका हृदय तकलीफ में कैसे नहीं हो सकता था? अतः जब वह अपने स्वभाव को प्रकट कर रहा था और अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त कर रहा था, तब परमेश्वर ने एक निर्णय लिया। उसने किस प्रकार का निर्णय लिया? मनुष्य के साथ एक वाचा के रूप में बादल में एक धनुष बनाने का (टिप्पणी: वह इंद्रधनुष जो हम देखते हैं), ऐसी प्रतिज्ञा कि परमेश्वर मानवजाति का जलप्रलय से दोबारा नाश नहीं करेगा। साथ ही, यह लोगों को यह बताने के लिए भी था कि परमेश्वर ने संसार का किसी समय जलप्रलय से नाश किया था, ताकि मानवजाति हमेशा याद रखे कि परमेश्वर ने ऐसा कार्य क्यों किया था।

क्या इस समय संसार का विनाश कुछ ऐसा था जो परमेश्वर चाहता था? यह निश्चित रूप वह नहीं था जो परमेश्वर चाहता था। संसार के विनाश के बाद हम शायद पृथ्वी के दयनीय दृश्य के एक छोटे से भाग की कल्पना कर सकते हैं, परन्तु हम कल्पना कर ही नहीं सकते हैं कि उस समय परमेश्वर की निगाहों में वह तस्वीर कैसी थी। हम कह सकते हैं कि, चाहे यह आज के लोग हों या उस समय के, कोई भी यह सोच या सराह नहीं सकता कि, परमेश्वर ने उस समय क्या महसूस किया जब उसने वो दृश्य, संसार की वो तस्वीर देखी जो जलप्रलय के द्वारा विनाश के बाद की थी। मनुष्य की अनाज्ञाकारिता की वजह से परमेश्वर इसे करने के लिए मजबूर था, परन्तु जलप्रलय के द्वारा संसार के विनाश से परमेश्वर के हृदय के द्वारा सहा गया वह दर्द एक वास्तविकता है जिसे कोई नाप या सराह नहीं सकता है। इसीलिए परमेश्वर ने मानवजाति के साथ एक वाचा बाँधी, जो लोगों को यह बताने के लिए थी कि वे स्मरण रखें कि परमेश्वर ने किसी समय ऐसा कुछ किया था, और उन्हें यह वचन देने के लिए था कि परमेश्वर कभी इस संसार का इस तरह से दोबारा नाश नहीं करेगा। इस वाचा में हम परमेश्वर के हृदय को देखते हैं—हम देखते हैं कि परमेश्वर का हृदय पीड़ा में था जब उसने मानवता का नाश किया। मनुष्य की भाषा में, जब परमेश्वर ने मानवजाति का नाश किया और मानवजाति को विलुप्त होते हुए देखा, तो उसका हृदय रो रहा था और उससे लहू बह रहा था। क्या उसके वर्णन का यह सबसे उत्तम तरीका नहीं है? मानवीय भावनाओं को दर्शाने के लिए इन शब्दों को मनुष्य के द्वारा उपयोग किया जाता है, परन्तु चूँकि मनुष्य की भाषा में बहुत कमी है, तो परमेश्वर के एहसासों एवं भावनाओं का वर्णन करने के लिए उनका उपयोग करना मुझे बुरा नहीं लगता है, और न ही यह बहुत ज़्यादा है। कम से कम यह तुम लोगों को उस समय परमेश्वर की मनोदशा क्या थी उसके विषय में एक बहुत ही स्पष्ट, एवं बहुत ही उपयुक्त समझ प्रदान करता है। जब तुम लोग इंद्रधनुष को दोबारा देखोगे तो अब तुम लोग क्या सोचोगे? कम से कम तुम लोग स्मरण करोगे कि किस प्रकार एक समय परमेश्वर जल-प्रलय के द्वारा संसार के विनाश पर दुःखी था। तुम लोग स्मरण करोगे कि, परमेश्वर ने इस संसार से नफ़रत की और इस मानवता को तुच्छ जाना था, फिर भी जब उसने उन मनुष्यों का विनाश किया जिन्हें उसने अपने हाथों से बनाया था, तो उसका हृदय दुख रहा था, उसका हृदय उन्हें छोड़ने के लिए संघर्ष कर रहा था, उसका हृदय नहीं चाह रहा था, उसके हृदय को इसे सहना कठिन महसूस हो रहा था। उसका सुकून सिर्फ नूह के परिवार के आठ लोगों में ही था। यह नूह का सहयोग था जिसने सभी चीज़ों की सृष्टि करने के उसके अत्यधिक सावधानी से किए गए प्रयासों को सार्थक बनाया था। एक समय जब परमेश्वर कष्ट सह रहा था, तब यह एकमात्र चीज़ थी जो उसकी पीड़ा की क्षतिपूर्ति कर सकती थी। उस बिन्दु से, परमेश्वर ने मानवता की अपनी सारी अपेक्षाओं को नूह के परिवार के ऊपर डाल दिया था, यह आशा करते हुए कि वे उसकी आशीषों के अधीन जीवन बिताएँगे और उसके श्राप के अधीन नहीं, यह आशा करते हुए कि वे परमेश्वर को फिर कभी संसार का जलप्रलय से नाश करते हुए नहीं देखेंगे, और साथ ही यह भी आशा करते हुए कि उनका विनाश नहीं किया जाएगा।

यहाँ से हमको परमेश्वर के स्वभाव के किस भाग को समझना चाहिए? परमेश्वर ने मनुष्य को तुच्छ जाना था क्योंकि मनुष्य उसके प्रति शत्रुतापूर्ण था, लेकिन उसके हृदय में, मानवता के लिए उसकी देखभाल, चिंता एवं दया अपरिवर्तनीय बनी रही। यहाँ तक कि जब उसने मानवजाति का नाश किया, उसका हृदय अपरिवर्तनीय बना रहा। जब मानवता परमेश्वर के प्रति एक हद तक भ्रष्टता एवं अनाज्ञाकारिता से भर गई थी, परमेश्वर को अपने स्वभाव एवं अपने सार के कारण, और अपने सिद्धान्तों के अनुसार इस मानवता का विनाश करना पड़ा था। लेकिन परमेश्वर के सार के कारण, उसने तब भी मानवजाति पर दया की, और यहाँ तक कि वह मानवजाति को छुड़ाने के लिए विभिन्न तरीकों का उपयोग करना चाहता था ताकि वे निरन्तर जीवित रह सकें। इसके बदले में, मनुष्य ने परमेश्वर का विरोध किया, निरन्तर परमेश्वर की अनाज्ञाकारिता करता रहा, और परमेश्वर के उद्धार को स्वीकार करने से इंकार किया, अर्थात्, उसके अच्छे इरादों को स्वीकार करने से इंकार किया। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि परमेश्वर ने उन्हें कैसे पुकारा, उन्हें कैसे स्मरण दिलाया, कैसे उनकी आपूर्ति की, कैसे उनकी सहायता की, या कैसे उनको सहन किया, क्योंकि मनुष्य ने न तो इसे समझा न सराहा, न ही उन्होंने कुछ ध्यान दिया। अपनी पीड़ा में, परमेश्वर अब भी मनुष्य को अपनी सर्वाधिक सहनशीलता देना नहीं भूला था, वह मनुष्य के वापस मुड़ने का इन्तज़ार कर रहा था। अपनी सीमा पर पहुँचने के पश्चात्, उसने वह किया जो उसे बिना किसी हिचकिचाहट के करना था। दूसरे शब्दों में, उस घड़ी से वहाँ एक विशेष समय अवधि एवं प्रक्रिया थी जब से परमेश्वर ने मानवजाति का विनाश करने की योजना बनायी तब से उसके मानवजाति के विनाश के अपने कार्य की आधिकारिक शुरुआत करने तक। यह प्रक्रिया मनुष्य को पीछे मुड़ने के योग्य बनाने के उद्देश्य के लिए अस्तित्व में थी, और यह वह आखिरी मौका था जो परमेश्वर ने मनुष्य को दिया था। अतः परमेश्वर ने मानवजाति का विनाश करने से पहले इस अवधि में क्या किया था? परमेश्वर ने प्रचुर मात्रा में स्मरण दिलाने एवं उत्साहवर्धन करने का कार्य किया था। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि परमेश्वर का हृदय कितनी पीड़ा एवं दुःख में था, उसने मानवता पर अपनी देखभाल, चिंता और अत्यंत दया का अभ्यास करना जारी रखा। हम इससे क्या देखते हैं? बेशक, हम देखते हैं कि मानवजाति के लिए परमेश्वर का प्रेम वास्तविक है और कोई ऐसी चीज़ नहीं जिसके प्रति वह दिखावा कर रहा है। यह वास्तविक, स्पर्श्गम्य एवं प्रशंसनीय है, जाली, मिलावटी, झूठा या कपटपूर्ण नहीं है। परमेश्वर कभी किसी छल का उपयोग नहीं करता है या झूठी तस्वीरें नहीं बनाता है कि लोगों को यह दिखाए कि वह कितना प्रेमयोग्य है। वह लोगों को अपनी मनोहरता दिखाने के लिए, या अपनी मनोहरता एवं पवित्रता के दिखावे के लिए झूठी गवाही का उपयोग नहीं करता है। क्या परमेश्वर के स्वभाव के ये पहलू मनुष्य के प्रेम के लायक नहीं हैं? क्या वे आराधना के योग्य नहीं हैं? क्या वे संजोकर रखने के योग्य नहीं हैं? इस बिन्दु पर, मैं तुम लोगों से पूछना चाहता हूँ: इन शब्दों को सुनने के बाद, क्या तुम लोग सोचते हो कि परमेश्वर की महानता कागज के टुकड़ों पर लिखे गए मात्र शब्द हैं? क्या परमेश्वर की मनोहरता केवल खोखले शब्द ही हैं? नहीं! बिलकुल भी नही! परमेश्वर की सर्वोच्चता, महानता, पवित्रता, सहनशीलता, प्रेम, इत्यादि—परमेश्वर के स्वभाव एवं सार के इन सब विभिन्न पहलुओं को हर उस समय लागू किया जाता है जब वह अपना कार्य करता है, मनुष्य के प्रति उसकी इच्छा में मूर्त रूप दिया जाता है, और प्रत्येक व्यक्ति पर पूरा एवं प्रतिबिम्बित किया जाता है। इसकी परवाह किए बगैर कि तुमने इसे पहले महसूस किया है या नहीं, परमेश्वर हर संभव तरीके से प्रत्येक व्यक्ति की देखभाल कर रहा है, प्रत्येक व्यक्ति के हृदय को स्नेह देने, और प्रत्येक व्यक्ति के आत्मा को जगाने के लिए अपने निष्कपट हृदय, बुद्धि एवं विभिन्न तरीकों का उपयोग कर रहा है। यह एक निर्विवादित तथ्य है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि यहाँ कितने लोग बैठे हैं, क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति के पास परमेश्वर की सहनशीलता, धीरज एवं मनोहरता के विषय में अलग अलग अनुभव और उसके प्रति अलग अलग भावनाएँ हैं। परमेश्वर के ये अनुभव और उसकी ये भावनाएँ या स्वीकृतियाँ, संक्षेप में, ये सभी सकरात्मक चीज़ें परमेश्वर की ओर से हैं। अतः परमेश्वर के विषय में प्रत्येक व्यक्ति के अनुभव एवं ज्ञान को मिलाने के द्वारा और इन्हें आज बाइबल के इन अंशों के हमारे पठन से जोड़ने के द्वारा, क्या अब तुम लोगों के पास परमेश्वर की और अधिक वास्तविक एवं उचित समझ है?

इस कहानी को पढ़ने और इस घटना के जरिए प्रकट किये गये परमेश्वर के स्वभाव के कुछ भाग को समझने के पश्चात्, तुम लोगों के पास परमेश्वर के विषय में कौन सी किस्म की बिल्कुल नई सराहना है? क्या इसने तुम लोगों को परमेश्वर एवं उसके हृदय की एक गहरी समझ प्रदान की है? क्या अब तुम लोग अलग महसूस करते हो जब तुम लोग दोबारा नूह की कहानी को देखते हो? तुम लोगों के विचारों के अनुसार, क्या बाइबल के इन वचनों के बारे में बातचीत करना अनावश्यक होता? अब जब हमने उन पर बातचीत कर ली है, क्या तुम लोग सोचते हो कि यह अनावश्यक था? यह आवश्यक था, सही है? हालाँकि जो हम पढ़ते हैं वह एक कहानी है, फिर भी यह उस कार्य का सच्चा लेख है जिसे परमेश्वर ने किसी समय किया था। मेरा लक्ष्य यह नहीं था कि तुम लोग इन कहानियों या इस पात्र के विवरणों को समझो, न ही यह इसलिए था कि तुम लोग जाकर इस पात्र का अध्ययन कर सको, और निश्चित रूप से इसलिए नहीं है कि तुम लोग वापस जाओ और फिर से बाइबल का अध्ययन करो। क्या तुम लोग समझ गए? अतः क्या इन कहानियों ने परमेश्वर के विषय में तुम लोगों के ज्ञान में सहायता की है? इस कहानी ने परमेश्वर के विषय में तुम लोगों की समझ में क्या जोड़ दिया है? हौंग कौंग की कलीसियाओं के भाईयों एवं बहनों, हमें बताओ। (हमने देखा था कि परमेश्वर का प्रेम कुछ ऐसा है जिसे हममें से कोई भ्रष्ट मानव धारण नहीं करता है।) कोरिया की कलीसियाओं के भाईयों एवं बहनों, आप बताइए। (मनुष्य के लिए परमेश्वर का प्रेम वास्तविक है। मनुष्य के लिए परमेश्वर का प्रेम उसके स्वभाव को लिए हुए है और उसकी महानता, पवित्रता, सर्वोच्चता एवं उसकी सहनशीलता को लिए हुए है। इस तरह की एक कहानी के माध्यम से हम बेहतर ढंग से सराहना कर सकते हैं कि ये सब परमेश्वर के स्वभाव के भाग हैं, और यह इस योग्य है कि हम इसकी गहरी समझ प्राप्त करने की कोशिश करें।) (बातचीत के माध्यम से उस समय, एक ओर, मैं परमेश्वर के धर्मी एवं पवित्र स्वभाव को देख सकता हूँ, और साथ ही मैं उस चिंता को भी देख सकता हूँ जो मानवजाति के लिए परमेश्वर कोहै, मानवजाति के प्रति परमेश्वर की दया को देख सकता हूँ, और यह कि हर चीज़ जो परमेश्वर करता है और उसका हर चिन्तन एवं विचार, सब मानवता के लिए उसके प्रेम एवं चिन्ता को प्रकट करता है।) (अतीत में मेरी समझ यह थी कि परमेश्वर ने संसार का विनाश करने के लिए जलप्रलय का उपयोग किया था क्योंकि मानवजाति किसी एक हद तक दुष्ट हो गई थी, और यह ऐसा था मानो परमेश्वर ने इस मानवता का विनाश किया क्योंकि उसने उनसे घृणा की थी। केवल जब परमेश्वर ने आज नूह की कहानी के बारे में बात की और कहा कि परमेश्वर के हृदय से लहू बह रहा था, उसके बाद ही मैंने एहसास किया कि परमेश्वर असल में इस मानवता को छोड़ने में अनिच्छुक था। केवल इसलिए क्योंकि मानवजाति बहुत ही अनाज्ञाकारी थी, परमेश्वर के पास उनका नाश करने के सिवाए और कोई विकल्प नहीं था। असल में, परमेश्वर का हृदय इस समय बहुत दुःखी था। इससे मैं परमेश्वर के स्वभाव में मानवजाति के लिए उसकी देखभाल एवं चिन्ता को देख सकती हूँ। यह कुछ ऐसा है जो मैं पहले नहीं जानती थी। मैं ऐसा सोचती थी कि मानवजाति बहुत ही दुष्ट थी, अतः परमेश्वर ने उनका विनाश कर दिया। मेरी समझ इतनी अधिक सतही थी।) बहुत अच्छा! अब तुम लोग बता सकते हो। (सुनने के बाद मैं बहुत प्रभावित हुआ था। मैंने अतीत में बाइबल पढ़ी है, किन्तु मैंने आज के समान कभी अनुभव नहीं किया जहाँ परमेश्वर ने सीधे तौर पर इन चीज़ों का विश्लेषण किया है जिससे हम उसे जान सकें। बाइबल को देखने के लिए परमेश्वर हमें इस तरह से अपने साथ ले चलता है जो मुझे यह जानने की अनुमति देता है कि मनुष्य की भ्रष्टता से पहले परमेश्वर का सार मानवजाति के लिए प्रेम एवं परवाह था। मनुष्य के भ्रष्ट होने के समय से लेकर आज के अंतिम दिनों तक, भले ही परमेश्वर एक धर्मी स्वभाव को लिए हुए है, फिर भी उसका प्रेम एवं परवाह अपरिवर्तनीय बना रहता है। यह दिखाता है कि परमेश्वर के प्रेम का सार, सृष्टि से लेकर अब तक, इसकी परवाह किए बगैर कि मनुष्य भ्रष्ट है या नहीं, कभी बदलता नहीं।) (आज मैंने देखा कि उसके कार्य के समय या स्थान में हुए परिवर्तन की वजह से परमेश्वर का सार नहीं बदलेगा। मैंने यह भी देखा कि, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है यदि परमेश्वर संसार को बना रहा है या मनुष्य के भ्रष्ट होने के पश्चात् इसका नाश कर रहा है, जो कुछ भी वह करता है उसका अर्थ होता है और इसमें उसका स्वभाव शामिल होता है। इसलिए मैंने देखा कि परमेश्वर का प्रेम असीमित एवं अथाह है, और साथ ही मैंने, जैसा अन्य भाईयों एवं बहनों ने जिक्र किया था, मानवजाति के प्रति परमेश्वर की परवाह एवं दया को भी देखा था जब परमेश्वर ने संसार का विनाश किया था।) (ये ऐसी चीज़ें थीं जिन्हें मैं वास्तव में पहले से नहीं जानती थी। आज सुनने के बाद, मैं महसूस करती हूँ कि परमेश्वर सचमुच में विश्वसनीय है, सचमुच में भरोसे के लायक है, विश्वास करने के योग्य है, और यह कि वह वास्तव में अस्तित्व में है। मैं ईमानदारी से अपने हृदय में सराहना कर सकती हूँ कि परमेश्वर का स्वभाव और प्रेम वास्तव में इतना ठोस है। आज सुनने के बाद मुझमें यह भावना है।) बहुत बढ़िया! ऐसा लगता है कि जो कुछ तुम लोगों ने सुना है उसे तुम लोगों ने उसे गम्भीरता से लिया है।

क्या तुम लोगों ने बाइबल के सभी वचनों से एक विशेष तथ्य पर ध्यान दिया है, बाइबल की सभी कहानियों समेत जिस पर हमने आज बातचीत की थी? क्या परमेश्वर ने अपने स्वयं के विचारों को व्यक्त करने के लिए या मानवता के लिए अपने प्रेम एवं देखरेख का वर्णन करने के लिए कभी अपनी स्वयं की भाषा का उपयोग किया है? क्या उसका कोई लेख है जहाँ वह यह बताने के लिए साधारण भाषा का उपयोग करता है कि वह मानवजाति के लिए कितना चिन्तित है या उससे कितना प्रेम करता है? नहीं! क्या यह सही नहीं है? तुम लोगों में से बहुत से लोग हैं जिन्होंने बाइबल या बाइबल के अलावा किताबें पढीं हैं। क्या तुम लोगों में से किसी ने ऐसे वचन देखें हैं? उत्तर निश्चित रूप से ना है! अर्थात्, परमेश्वर के वचनों या उसके कार्य के अभिलेख समेत, बाइबल के लेखों में, परमेश्वर ने मानवजाति के लिए अपनी भावनाओं का वर्णन करने के लिए या अपने प्रेम एवं परवाह को व्यक्त करने के लिए किसी युग में या किसी समयावधि में अपने स्वयं के तरीकों का उपयोग कभी नहीं किया है, न ही कभी परमेश्वर ने अपने एहसासों एवं भावनाओं को सूचित करने के लिए भाषण या किसी प्रकार के कार्यों का उपयोग किया—क्या यह एक तथ्य नहीं है? मैं ऐसा क्यों कहता हूँ? मुझे इसका जिक्र क्यों करना पड़ा? ऐसा इसलिए है क्योंकि यह परमेश्वर की मनोहरता एवं उसके स्वभाव को भी शामिल करता है।

परमेश्वर ने मानवजाति की सृष्टि की; इसकी परवाह किये बगैर कि उन्हें भ्रष्ट किया गया है या नहीं या वे उसका अनुसरण करते है या नहीं करते, परमेश्वर मनुष्य से अपने प्रियजनों के समान व्यवहार करता है—या जैसा मानव कहेंगे, ऐसे लोग जो उसके लिए अतिप्रिय हैं -और उसके खिलौने नहीं हैं। हालाँकि परमेश्वर कहता है कि वह सृष्टिकर्ता है और मनुष्य उसकी सृष्टि है, जो सुनने में ऐसा लग सकता है कि यहाँ पद में थोड़ा अन्तर है, फिर भी वास्तविकता यह है कि जो कुछ भी परमेश्वर ने मानवजाति के लिए किया है वह इस प्रकार के रिश्ते से कहीं बढ़कर है। परमेश्वर मानवजाति से प्रेम करता है, मानवजाति की देखभाल करता है, मानवजाति के लिए चिन्ता दिखाता है, इसके साथ ही साथ लगातार और बिना रुके मानवजाति की आपूर्ति करता है। वह कभी अपने हृदय में यह महसूस नहीं करता है कि यह एक अतिरिक्त कार्य है या कुछ ऐसा है जो ढेर सारे श्रेय के लायक है। न ही वह यह महसूस करता है कि मानवता को बचाना, उनकी आपूर्ति करना, और उन्हें सबकुछ देना, मानवजाति के लिए एक बहुत बड़ा योगदान देना है। अपने स्वयं के तरीके से और अपने स्वयं के सार और जो वह है उसके माध्यम से, वह बस खामोशी से एवं चुपचाप मानवजाति के लिए प्रदान करता है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि मानवजाति उससे कितने प्रयोजन एवं कितनी सहायता प्राप्त करती है, क्योंकि परमेश्वर इसके बारे में कभी नहीं सोचता है या न ही श्रेय लेने की कोशिश करता है। यह परमेश्वर के सार के द्वारा निर्धारित होता है, और साथ ही यह परमेश्वर के स्वभाव की बिलकुल सही अभिव्यक्ति भी है। इसीलिए, चाहे यह बाइबल हो या कोई अन्य पुस्तक, हम परमेश्वर को कभी अपने विचारों को व्यक्त करते हुए नहीं पाते हैं, और हम कभी परमेश्वर को मनुष्यों को यह वर्णन करते या घोषणा करते हुए नहीं पाते हैं कि वह इन कार्यों को क्यों करता है, या वह मानवजाति की इतनी देखरेख क्यों करता है, जिससे वह मानवजाति को अपने प्रति आभारी बनाए या उससे अपनी स्तुति कराए। यहाँ तक कि जब उसे कष्ट भी होता है, जब उसका हृदय अत्यंत पीड़ा में होता है, वह मानवजाति के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी या मानवजाति के लिए अपनी चिन्ता को कभी नहीं भूलता है, वह पूरे समय इस कष्ट एवं दर्द को चुपचाप अकेला सहता रहता है। इसके विपरीत, परमेश्वर निरन्तर मानवजाति को प्रदान करता है जैसा वह हमेशा से करता आया है। हालाँकि मानवजाति अक्सर परमेश्वर की स्तुति करती है या उसकी गवाही देती है, फिर भी इसमें से किसी भी व्यवहार की माँग परमेश्वर के द्वारा नहीं की जाती है। ऐसा इसलिए है क्योंकि परमेश्वर, किसी भी अच्छे कार्य के लिए जिसे वह मानवजाति के लिए करता है, कभी ऐसा इरादा नहीं करता है कि उसे धन्यवाद से बदल दिया जाए या उसका मूल्यवापस किया जाए। दूसरी ओर, ऐसे लोग जो परमेश्वर का भय मानते और बुराई से दूर रहते हैं, ऐसे लोग जो सचमुच में परमेश्वर का अनुसरण करते हैं, उसको ध्यान से सुनते हैं और उसके प्रति वफादार हैं, और ऐसे लोग जो उसकी आज्ञा का पालन करते हैं—ये ऐसे लोग हैं जो प्रायः परमेश्वर की आशीषों को प्राप्त करते हैं, और परमेश्वर बिना किसी हिचकिचाहट के ऐसी आशिषों को प्रदान करेगा। इसके अतिरिक्त, ऐसी आशीषें जिन्हें लोग परमेश्वर से प्राप्त करते हैं वे अक्सर उनकी कल्पना से परे होती हैं, और साथ ही किसी भी ऐसी चीज़ से परे होती हैं जिसे मानव उससे बदल सकते हैं जो उन्होंने किया है या उस कीमत से बदल सकते हैं जिसे उन्होंने चुकाया है। जब मानवजाति परमेश्वर की आशीषों का आनन्द ले रही है, तब क्या कोई परवाह करता है कि परमेश्वर क्या कर रहा है? क्या कोई किसी प्रकार की चिन्ता को दर्शाता है कि परमेश्वर कैसा महसूस कर रहा है? क्या कोई परमेश्वर की पीड़ा की सराहना करने की कोशिश करता है? इन प्रश्नों का बिलकुल सही उत्तर है: नहीं! क्या नूह समेत, कोई मनुष्य, उस दर्द की सराहना कर सकता है जिसे परमेश्वर उस समय महसूस कर रहा था? क्या कोई समझ सकता है कि क्यों परमेश्वर एक ऐसी वाचा ठहराएगा? वे नहीं समझ सकते हैं! मानवजाति परमेश्वर की पीड़ा की सराहना नहीं करती है इसलिए नहीं कि वो परमेश्वर की पीड़ा को नहीं समझती है, और परमेश्वर एवं मनुष्य के बीच अन्तर या उनकी हैसियत के बीच अन्तर के कारण नहीं; इसके बजाए, यह इसलिए है क्योंकि मानवजाति परमेश्वर की किसी भावना की परवाह भी नहीं करती है। मानवजाति सोचती है कि परमेश्वर तो आत्मनिर्भर है—परमेश्वर को इसकी कोई आवश्यकता नहीं है कि लोग उसकी देखरेख करें, उसे समझें या उसके प्रति विचारशीलता दिखाएं। परमेश्वर तो परमेश्वर है, अतः उसे कोई दर्द नहीं है, उसकी कोई भावनाएँ नहीं हैं; वह दुःखी नहीं होगा, वह शोक महसूस नहीं करता है, यहाँ तक कि वह रोता भी नहीं है। परमेश्वर तो परमेश्वर है, इसलिए उसे किसी भावनात्मक अभिव्यक्ति की आवश्यकता नहीं है और उसे किसी भावनात्मक सुकून की आवश्यकता नहीं है। यदि उसे कुछ निश्चित परिस्थितियों के अंतर्गत इनकी आवश्यकता होती है, तो वह स्वयं ही इसे सुलझा लेगा और उसे मानवजाति से किसी सहायता की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। इसके विपरीत, यह तो कमज़ोर, एवं अपरिपक्व मनुष्य हैं जिन्हें परमेश्वर की सांत्वना, प्रयोजन एवं प्रोत्साहन की आवश्यकता होती है, और यहाँ तक कि उन्हें उनकी भावनाओं को किसी भी समय एवं किसी भी स्थान पर सांत्वना देने के लिए भी परमेश्वर की आवश्यकता होती है। ऐसा विचार मानवजाति के हृदय के भीतर गहराई में छुपा होता है: मनुष्य कमज़ोर प्राणी है; उन्हें परमेश्वर की आवश्यकता होती है कि वह हर तरीके से उनकी देखरेख करे, वे सब प्रकार की देखभाल के हकदार हैं जिन्हें वे परमेश्वर से प्राप्त करते हैं, और उन्हें परमेश्वर से किसी भी ऐसी चीज़ की माँग करनी चाहिए जिसे वे महसूस करते हैं कि वह उनकी होनी चाहिए। परमेश्वर बलवान है; उसके पास सबकुछ है, और उसे मानवजाति का अभिभावक और आशीषें प्रदान करने वाला अवश्य होना चाहिए। जबकि वह पहले से ही परमेश्वर है, वह सर्वशक्तिमान है और उसे मानवजाति से कभी किसी भी चीज़ की आवश्यकता नहीं होती है।

चूँकि मनुष्य परमेश्वर के किसी भी प्रकाशन पर ध्यान नहीं देता है, इसलिए उसने कभी परमेश्वर के शोक, पीड़ा, या आनन्द को महसूस नहीं किया है। परन्तु इसके विपरीत, परमेश्वर मनुष्य की सभी अभिव्यक्तियों को अपनी हथेली के समान जानता है। परमेश्वर सभी समयों एवं सभी स्थानों में प्रत्येक व्यक्ति की आवश्यकताओं की आपूर्ति करता है, प्रत्येक मनुष्य के बदलते विचारों का अवलोकन करता है और इस प्रकार उनको सांत्वना एवं प्रोत्साहन देता है, और उन्हें मार्गदर्शन देता है और प्रकाशित करता है। उन सभी चीजों के सम्बन्ध में जिन्हें परमेश्वर ने मानवजाति पर किया है और पूरी कीमत जो उसने उनके कारण चुकाई है, क्या लोग बाइबल में से या किसी ऐसी चीज़ से एक अंश ढूँढ़ सकते हैं जिसे अब तक परमेश्वर ने कहा है जो साफ साफ कहता हो कि परमेश्वर मनुष्य से किसी चीज़ की माँग करेगा? नहीं! इसके विपरीत, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि किस प्रकार लोग परमेश्वर की सोच को अनदेखा करते हैं, क्योंकि वह फिर भी लगातार मानवजाति की अगुवाई करता है, लगातार मानवजाति की आपूर्ति करता है और उनकी सहायता करता है, कि वे परमेश्वर के मार्गों पर चल सकें ताकि वे उस खूबसूरत मंज़िल को प्राप्त कर सकें जो उसने उनके लिए तैयार की है। जब परमेश्वर की बात आती है, तो जो वह है, उसके अनुग्रह, उसकी दया और उसके सभी प्रतिफलों को बिना किसी हिचकिचाहट के उन लोगों को प्रदान किया जाएगा जो उससे प्रेम एवं उसका अनुसरण करते हैं। किन्तु वह उस पीड़ा को जो उसने सहा है या अपनी मनोदशा को कभी किसी व्यक्ति पर प्रकट नहीं करता है, और वह किसी के विषय में कभी शिकायत नहीं करता कि वह उसके प्रति ध्यान नहीं देता है या उसकी इच्छा नहीं जानता है। वह खामोशी से यह सब सह लेता है, उस दिन का इंतज़ार करता है जब मानवजाति समझने के योग्य हो जाएगी।

मैं यहाँ ये बातें क्यों कहता हूँ? तुम लोग उन बातों से क्या देखते हो जिन्हें मैंने कहा है? परमेश्वर के सार एवं स्वभाव में कुछ ऐसा है जिसे बड़ी आसानी से अनदेखा किया जा सकता है, ऐसी चीज़ जो केवल परमेश्वर के द्वारा ही धारण की जाती है और किसी व्यक्ति के द्वारा नहीं, उन लोगों समेत जिनके विषय में अन्य लोग सोचते हैं कि वे महान लोग, एवं अच्छे लोग हैं, या उनकी कल्पना का परमेश्वर है। यह चीज़ क्या है? यह परमेश्वर की निःस्वार्थता है। निःस्वार्थता के बारे में बोलते समय, शायद तुम सोचते हो कि तुम भी बहुत निःस्वार्थ हो, क्योंकि जब तुम्हारे बच्चों की बात आती है, तो तुम उनके साथ कभी मोलभाव नहीं करते हो और तुम उनके प्रति उदार होते हो, या तुम सोचते हो कि तुम तब भी बहुत निःस्वार्थ हो जब तुम्हारे माता पिता की बात आती है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि तुम क्या सोचते हो, कम से कम तुम्हारे पास "निःस्वार्थ" शब्द की एक अवधारणा तो है और तुम इसे एक सकारात्मक शब्द के रूप में सोचते हो, और ऐसा निःस्वार्थ व्यक्ति होना बहुत ही श्रेष्ठ है। जब तुम निःस्वार्थ होते हो, तो तुम सोचते हो कि तुम महान हो। परन्तु ऐसा कोई नहीं है जो सभी चीज़ों के मध्य, सभी लोगों, घटनाओं, एवं वस्तुओं के मध्य, और परमेश्वर के कार्य के जरिए परमेश्वर की निःस्वार्थता को देख सके। ऐसी स्थिति क्यों है? क्योंकि मनुष्य बहुत स्वार्थी है! मैं ऐसा क्यों कहता हूँ? मानवजाति एक भौतिक संसार में रहती है। शायद तुम परमेश्वर का अनुसरण करते हो, किन्तु तुम कभी देखते नहीं या तारीफ नहीं करते हो कि किस प्रकार परमेश्वर तुम्हारी आपूर्ति करता है, तुम्हें प्रेम करता है, और तुम्हारे लिए चिन्ता दिखाता है। अतः तुम क्या देखते हो? तुम अपने खून के रिश्तेदारों को देखते हो जो तुम्हें प्रेम करते हैं या तुम्हें बहुत स्नेह करते हैं। तुम उन चीज़ों को देखते हो जो तुम्हारी देह के लिए लाभकारी हैं, तुम उन लोगों एवं चीज़ों के विषय में परवाह करते हो जिनसे तुम प्रेम करते हो। यह मनुष्य की तथाकथित निःस्वार्थता है। फिर भी ऐसे "निःस्वार्थ" लोग कभी भी उस परमेश्वर के विषय में परवाह नहीं करते हैं जो उन्हें जीवन देता है। परमेश्वर के विपरीत, मनुष्य की निःस्वार्थता मतलबी एवं निन्दनीय हो जाती है। वह निःस्वार्थता जिसमें मनुष्य विश्वास करता है वह खोखली एवं अवास्तविक, मिलावटी, परमेश्वर से असंगत, एवं परमेश्वर से असम्बद्ध है। मनुष्य की निःस्वार्थता सिर्फ उसके के लिए है, जबकि परमेश्वर की निःस्वार्थता उसके सार का एक सच्चा प्रकाशन है। यह बिलकुल परमेश्वर की निःस्वार्थता की वजह से है कि मनुष्य उससे आपूर्ति की एक सतत धारा प्राप्त करता है। तुम लोग शायद इस विषय से, जिसके बारे में आज मैं बात कर रहा हूँ, अत्यंत गहराई से प्रभावित न हो और मात्र सहमति में सिर हिला रहे हो, परन्तु जब तुम अपने हृदय में परमेश्वर के हृदय की सराहना करने की कोशिश करते हो, तो तुम अनजाने में ही जान जाओगे: सभी लोगों, मुद्दों एवं चीज़ों के मध्य जिन्हें तुम इस संसार में महसूस कर सकते हो, केवल परमेश्वर की निःस्वार्थता ही वास्तविक एवं ठोस है, क्योंकि सिर्फ परमेश्वर का प्रेम ही तुम्हारे लिए बिना किसी शर्त के है और बेदाग है। परमेश्वर के अतिरिक्त, किसी भी व्यक्ति की तथाकथित निःस्वार्थता पूरी तरह से झूठी, ऊपरी एवं कपटपूर्ण है; इसकाएक उद्देश्य, एवं इसके निश्चित इरादे हैं, यह एक समझौते को लिए हुए है, और परीक्षा लिए जाने पर स्थिर नहीं रह सकता है। तुम लोग यह भी कह सकते हो कि यह गन्दा, एवं घिनौना है। क्या तुम लोग सहमत हो?

मैं जानता हूँ कि तुम लोग इन विषयों से बिलकुल अपरिचित हो और उसे पूरी तरह से महसूस करने के लिए तुम लोगों को थोड़े बहुत समय की आवश्यकता है इससे पहले कि तुम लोग सचमुच में समझ सको। तुम लोग इन मुद्दों एवं विषयों से जितना अधिक अपरिचित होते हो, उतना ही अधिक यह साबित करता है कि तुम लोगों के हृदय में ये विषय अनुपस्थित हैं। यदि मैंने इन विषयों का कभी जिक्र नहीं किया होता, तो क्या तुम लोगों के मध्य कोई उनके बारे में थोड़ा बहुत जान पाता? मैं मानता हूँ कि तुम लोग कभी उन्हें नहीं जान पाते। यह तो निश्चित है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि तुम लोग कितना कुछ समझ या बूझ सकते हो, संक्षेप में, ये विषय जिनके बारे में मैं बोलता हूँ वे ऐसे विषय हैं जिनकी लोगों में सबसे अधिक कमी है और ऐसा विषय है जिनके बारे में उन्हें सबसे अधिक जानना चाहिए। ये विषय प्रत्येक के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं—वे बहुमूल्य हैं और वे जीवन हैं, और वे ऐसी चीज़ें हैं जिन्हें आगे के मार्ग के लिए तुम लोगों को अवश्य धारण करना चाहिए। मार्गदर्शन के रूप में इन वचनों के बिना, परमेश्वर के स्वभाव एवं सार के बारे में तुम्हारी समझ के बिना, जब परमेश्वर की बात आती है तो तुम हमेशा एक प्रश्न चिन्ह लेकर चलोगे। तुम परमेश्वर में किस प्रकार उचित रीति से विश्वास कर सकते हो यदि तुम उसे समझते ही नहीं हो? तुम परमेश्वर की भावनाओं, उसकी इच्छा, उसकी मनोदशा, जो वह सोच रहा है, जो उसे उदास करता है, जो उसे खुश करता है उनके बारे में कुछ भी नहीं जानते हो, तो तुम परमेश्वर के हृदय के प्रति विचारशील कैसे हो सकते हो?

जब कभी परमेश्वर परेशान होता है, वह ऐसी मानवजाति का सामना करता है जो उसकी तरफ बिलकुल भी कोई ध्यान नहीं देती है, ऐसी मानवजाति जो उसका अनुसरण करती और उससे प्रेम करने का दावा तो करती है लेकिन पूर्णतः उसकी भावनाओं की उपेक्षा करती है। कैसे उसके हृदय को चोट नहीं पहुँच सकती है? परमेश्वर के प्रबंधकीय कार्य में, वह ईमानदारी से अपने कार्य को क्रियान्वित करता रहता है और प्रत्येक व्यक्ति से बात करता है, और बिना किसी शंका या छुपाव के उनका सामना करता है, किन्तु इसके विपरीत, हर व्यक्ति जो उसका अनुसरण करता है वह उसके प्रति अवरुद्ध होता है, और कोई भी सक्रीय रूप से उसके करीब आने, उसके हृदय को समझने, या उसकी भावनाओं पर ध्यान देने के लिए तैयार नहीं है। यहाँ तक कि वे जो परमेश्वर के विश्वसनीय बनना चाहते हैं वे भी उसके निकट आना, उसके हृदय के प्रति संवेदनशील होना, या उसे समझने की कोशिश करना नहीं चाहते हैं। जब परमेश्वर आनन्दित एवं प्रसन्न होता है, तो उसकी प्रसन्नता को बांटने के लिए कोई भी नहीं होता है। जब लोगों के द्वारा परमेश्वर को ग़लत समझा जाता है, तो उसके ज़ख़्मी हृदय को सांत्वना देने के लिए कोई भी नहीं होता है। जब उसका हृदय दुख रहा होता है, तो एक भी व्यक्ति नहीं होता है जो उसे सुनने के लिए तैयार हो कि वह उन पर भरोसा करके गुप्त बातों को बताए। परमेश्वर के प्रबंधकीय कार्य के इन हज़ारों सालों के दौरान, ऐसा कोई नहीं है जो परमेश्वर की भावनाओं को समझता हो, न ही कोई ऐसा है जो उन्हें बूझता या सराहता हो, किसी ऐसे व्यक्ति की तो बात ही छोड़ दीजिए जो परमेश्वर के आनन्द एवं दुखों में भागी होने के लिए उसके बगल में खड़ा हो सकता है। परमेश्वर अकेला है। वह अकेला है! परमेश्वर अकेला है सिर्फ इसलिए नहीं क्योंकि भ्रष्ट मानवजाति उसका विरोध करती है, परन्तु इससे भी अधिक क्योंकि ऐसे लोग जो आत्मिक होने के लिए उसका अनुकरण करते हैं, ऐसे लोग जो परमेश्वर को जानने और उसे समझने का प्रयास करते हैं, और यहाँ तक कि ऐसे लोग भी जो उसके लिए अपने पूरे जीवन को समर्पित करने के लिए तैयार हैं, वे भी उसके विचारों को नहीं जानते हैं और उसके स्वभाव एवं उसकी भावनाओं को नहीं समझते हैं।

नूह की कहानी के अंत में, हम देखते हैं कि उस समय परमेश्वर ने अपनी भावनाओं को व्यक्त करने के लिए एक असामान्य तरीके का उपयोग किया था। यह तरीका बहुत ही ख़ास है, और वह मनुष्य के साथ एक वाचा बांधने के लिए है। यह ऐसा तरीका है जो संसार का विनाश करने के लिए परमेश्वर द्वारा जल-प्रलय के उपयोग के अंत की घोषणा करता है। बाहर से, ऐसा प्रतीत होता है कि एक वाचा बांधना बहुत ही साधारण सी बात है। यह नियमों का उल्लंघन करनेवाले कार्यों से दोनों दलों को बांधने के लिए शब्दों के उपयोग से बढ़कर और कुछ नहीं हैं, ताकि दोनों पक्षों के हितों की रक्षा के उद्देश्य को प्राप्त करने में सहायता मिले। आकार में, यह बहुत ही साधारण सा कार्य है, किन्तु इस कार्य के पीछे की उन प्रेरणाओं से और परमेश्वर द्वारा इस कार्य को करने के अर्थ से, यह परमेश्वर के स्वभाव एवं मनोदशा का एक सच्चा प्रकाशन है। यदि तुम बस इन वचनों को एक तरफ रखते और उन्हें अनदेखा करते, यदि मैं तुम लोगों को चीज़ों की सच्चाई कभी न बताऊँ, तो मानवजाति परमेश्वर की सोच को वास्तव में कभी नहीं जानेगी। कदाचित् तुम्हारी कल्पना में परमेश्वर मुस्कुरा रहा है जब वह यह वाचा बाँध रहा है, या कदाचित् उसके हाव-भाव गंभीर है, परन्तु इसकी परवाह किए बगैर कि लोगों की कल्पनाओं में परमेश्वर के पास कौन सा सबसे सामान्य किस्म का हाव-भाव है, कोई भी परमेश्वर के हृदय या उसकी पीड़ा को देख नहीं सकता है, उसके अकेलेपन की तो बात ही छोड़ दीजिए। कोई भी परमेश्वर से अपने ऊपर भरोसा नहीं करवा सकता है या परमेश्वर के विश्वास के लायक नहीं हो सकता है, या ऐसा व्यक्ति नहीं हो सकता है जिस पर वह अपने विचारों को व्यक्त कर सके या उसे अपनी पीड़ा बता सके। इसीलिए परमेश्वर के पास ऐसा कार्य करने के सिवाए कोई और विकल्प नहीं था। सतह पर, परमेश्वर ने पूर्व मानवता को विदाई देने के लिए एक आसान कार्य किया, भूतकाल को व्यवस्थित किया और जलप्रलय के द्वारा संसार के अपने विनाश का सिद्ध निष्कर्ष निकाला। फिर भी, परमेश्वर ने इस क्षण से उस पीड़ा को अपने हृदय की गहराई में दफन कर दिया था। एक समय जब परमेश्वर के पास कोई नहीं था, जिस पर भरोसा करके वह गोपनीय बातों को बताए, तो उसने मानवजाति के साथ एक वाचा बांधी, यह बताते हुए कि वह दोबारा संसार का जलप्रलय के द्वारा नाश नहीं करेगा। जब इंद्रधनुष प्रकट होता है तो यह लोगों को स्मरण दिलाने के लिए है कि किसी समय एक ऐसी घटना घटी थी, यह उन्हें चेतावनी देने के लिए है कि बुरे काम न करें। यहाँ तक कि ऐसी दुखदायी दशा में भी, परमेश्वर मानवजाति के विषय में नहीं भूला और तब भी उसने उनके लिए अत्यधिक चिन्ता दिखाई। क्या यह परमेश्वर का प्रेम एवं निःस्वार्थता नहीं है? किन्तु लोग क्या सोचते हैं जब वे कष्ट सह रहे होते हैं? क्या यह वह समय नहीं है जब उन्हें परमेश्वर की सबसे अधिक ज़रूरत है? ऐसे समयों पर, लोग हमेशा परमेश्वर को घसीटते हैं ताकि परमेश्वर उन्हें सांत्वना दे। चाहे कोई भी समय हो, परमेश्वर लोगों को कभी निराश होने नहीं देगा, और वह हमेशा लोगों को अनुमति देगा कि वे अपनी दुर्दशाओं से बाहर निकलें और प्रकाश में जीवन बिताएँ। हालाँकि परमेश्वर इस प्रकार से ही मानवजाति की आपूर्ति करता है, फिर भी मनुष्य के हृदय में परमेश्वर एक आश्वासन की गोली, और सांत्वना के स्फूर्तिदायक द्रव्य के अलावा और कुछ नहीं होता है। जब परमेश्वर दुख उठा रहा है, जब उसका हृदय ज़ख्मी है, तब उसका साथ देने या उसे सांत्वना देने के लिए किसी सृजे गए प्राणी या किसी व्यक्ति का होना निःसन्देह परमेश्वर के लिए बस एक फिज़ूल की इच्छा है। मनुष्य कभी परमेश्वर की भावनाओं पर ध्यान नहीं देता है, अतः परमेश्वर कभी नहीं माँगता या अपेक्षा नहीं करता है कि कोई हो जो उसे सांत्वना दे। अपनी मनोदशा को व्यक्त करने के लिए वह महज अपने स्वयं के तरीकों का उपयोग करता है। लोग नहीं सोचते हैं कि कुछ दुख-दर्द से होकर गुज़रना परमेश्वर के लिए कोई बहुत बड़ी बात है, लेकिन जब तुम सचमुच में परमेश्वर को समझने की कोशिश करते हो, जब वह सब कुछ जो परमेश्वर करता है उसमें तुम सचमुच उसके सच्चे इरादों की सराहना कर सकते हो, केवल तभी तुम परमेश्वर की महानता एवं उसकी निःस्वार्थता को महसूस कर सकते हो। यद्यपि परमेश्वर ने इंद्रधनुष का उपयोग करते हुए मानवजाति के साथ एक वाचा बाँधी फिर भी उसने किसी को कभी नहीं बताया कि क्यों उसने ऐसा किया था, क्यों उसने इस वाचा को ठहराया था, मतलब उसने कभी किसी को अपने वास्तविक विचारों को नहीं बताया था। ऐसा इसलिए है क्योंकि ऐसा कोई नहीं है जो उस प्रेम की गहराई को बूझ सकता है जो मानवजाति के लिए परमेश्वर के पास है जिसे उसने अपने हाथों से बनाया था, और साथ ही ऐसा कोई भी नहीं है जो इसकी सराहना कर सके कि मानवता का विनाश करते हुए उसके हृदय ने वास्तव में कितनी पीड़ा सहन की थी। इसलिए, भले ही वह लोगों को बताता है कि वह कैसा महसूस करता है, फिर भी वे इस भरोसे की ज़िम्मेदारी नहीं ले सकते है। पीड़ा में होने के बावजूद, वह अभी भी अपने कार्य के अगले चरण के साथ आगे बढ़ता जाता है। परमेश्वर हमेशा मानवजाति को अपना सर्वोतम पहलू एवं बेहतरीन चीजें देता है जबकि स्वयं ही सारे दुखों को खामोशी से सहता रहता है। परमेश्वर कभी भी इन दुखों को खुले तौर पर प्रकट नहीं करता है। इसके बदले में, वह उन्हें सहता है और खामोशी से इन्तज़ार करता है। परमेश्वर की सहनशीलता रुखी, सुन्न, या असहाय नहीं है, न ही यह कमज़ोरी का एक चिन्ह है। बात यह है कि परमेश्वर का प्रेम एवं सार हमेशा से ही निःस्वार्थ रहा है। यह उसके सार एवं स्वभाव का एक प्राकृतिक प्रकाशन है, और एक सच्चे सृष्टिकर्ता के रूप में परमेश्वर की पहचान का एक असली जीता-जागता नमूना है।

यह कहने के बाद, जो मेरा मतलब है शायद कुछ लोग उसका ग़लत अर्थ निकाल सकते हैं। क्या इतने विस्तार से, एवं इतने संवेदनवादके साथ, परमेश्वर की भावनाओं का वर्णन करने का इरादा यह था कि लोग परमेश्वर पर तरस खा सकें? क्या ऐसा कोई इरादा था? (नहीं!) मैं इन बातों को कह रहा हूँ उसका एकमात्र उद्देश्य है कि तुम लोग परमेश्वर को बेहतर ढंग से जान सको, उसके हर हिस्से को समझो, उसकी भावनाओं को समझो, इसकी सराहना करो कि परमेश्वर के सार एवं स्वभाव को, ठोस रूप से एवं थोड़ा-थोड़ा करके, उसके कार्य के जरिए व्यक्त किया गया है, न कि मनुष्य के खोखले शब्दों, उनकी पत्रियों एवं सिद्धान्तों, या उनकी कल्पनाओं के माध्यम से दर्शाया गया है। कहने का तात्पर्य है, परमेश्वर एवं परमेश्वर का सार वास्तव में अस्तित्व हैं—वे तस्वीरें नहीं हैं, काल्पनिक नहीं हैं, मनुष्य के द्वारा निर्मित नहीं हैं, और निश्चित रूप से उनके द्वारा गढ़ी हुई नहीं हैं। क्या अब तुम लोग इसे पहचान गए हो? यदि तुम लोग इसे पहचान गए हो, तो आज मेरे वचनों ने अपने लक्ष्य को पा लिया है।

हमने आज तीन विषयों पर बातचीत की। मैं विश्वास करता हूँ कि इन तीन विषयों के बारे में इस संगति से हर किसी ने बहुत कुछ प्राप्त किया है। मैं निश्चित रूप से कह सकता हूँ कि, इन तीन विषयों के माध्यम से, परमेश्वर के विचार जिनका मैंने वर्णन किया था या परमेश्वर का स्वभाव एवं सार जिनका मैंने उल्लेख किया था उन्होंने परमेश्वर के बारे में लोगों के विचारों एवं समझ को उलट दिया है, यहाँ तक कि परमेश्वर के प्रति प्रत्येक के विश्वास को उलट पलट दिया है, और इसके अतिरिक्त, उस परमेश्वर की छवि को उलट पलट दिया है जिसकी प्रशंसा प्रत्येक के द्वारा उनके हृदय में की जाती थी। चाहे कुछ भी हो, मैं आशा करता हूँ कि जो कुछ तुम लोगों ने बाइबल के इन दो भागों में परमेश्वर के स्वभाव के बारे में सीखा है वह तुम लोगों के लिए लाभदायक है, और मैं आशा करता हूँ कि तुम लोगों वापस जाने के बाद तुम लोग इस पर और अधिक विचार करने की कोशिश करोगे। आज की सभा यहीं समाप्त होती है। अलविदा!

4 नवंबर, 2013

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