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सूचीपत्र

सत्य को समझने और सिद्धांत को समझने में क्या अंतर है?

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

परमेश्वर के वचन में वास्तविक अर्थ की वास्तविक समझ आना कोई सरल बात नहीं है। इस तरह मत सोच: मैं परमेश्वर के वचनों के शाब्दिक अर्थ की व्याख्या कर सकता हूँ, और हर कोई इसे अच्छा कहता है और मुझे शाबाशी देता है, तो यह परमेश्वर के वचन को समझने के रूप में गिना जाता है। यह परमेश्वर के वचन को समझने के समान नहीं है। यदि तूने परमेश्वर के वचन के भीतर से कुछ प्रकाश प्राप्त किया है और तूने परमेश्वर के वचन के वास्तविक महत्व को महसूस किया है, यदि तू परमेश्वर के वचन के महत्व को और वे अंततः जो प्राप्त करेंगे, उसको व्यक्त कर सकता है, एक बार यह सब स्पष्ट हो जाने पर यह परमेश्वर के वचन को कुछ स्तर तक समझने के रूप में गिना जाता है। तो, परमेश्वर के वचन को समझना इतना आसान नहीं है। सिर्फ इसलिए कि तू परमेश्वर के वचन के पत्र की एक लच्छेदार व्याख्या दे सकता है, इसका यह अर्थ नहीं है कि तू इसे समझता है। भले ही तू परमेश्वर के वचन के पत्र की कितनी ही व्याख्या क्यों न कर सकता हो, यह अभी भी मनुष्य की कल्पना और उसके सोचने का तरीका है—यह बेकार है।

— "मसीह की बातचीतों के अभिलेख" में "मनुष्य का स्वभाव कैसे जानें" से उद्धृत

आपको लगता है कि सत्य के ज्ञान में निपुणता प्राप्त करना विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, और उसी तरह परमेश्वर के वचनों के कई अंशों को कंठस्थ करना भी महत्वपूर्ण है। लेकिन लोग परमेश्वर के वचन को कैसे समझते हैं, यह बिल्कुल भी महत्वपूर्ण नहीं है। आप सबको लगता है कि लोगों के लिए ये बहुत आवश्यक है कि वे परमेश्वर के कई वचनों को कंठस्थ करें, कई सिद्धांतों को बोलने में सक्षम हों और परमेश्वर के वचनों के भीतर कई सूत्रों को खोजने में सफल हों। इसलिए, आप हमेशा इन चीजों को व्यवस्थित करना चाहते हैं ताकि हर कोई एक से भजन पत्र से गा रहा हो और एक सी बात कह रहा हो, हर कोई वही सिद्धांत बोलता हो, ताकि हर किसी के पास एक सा ज्ञान हो और हर कोई एक से नियम रखता हो—यही आप लोगों का उद्देश्य है। आप लोग ऐसा करते हैं मानो कि लोगों को बेहतर समझाते हैं, जबकि इसके विपरीत आपको कोई अंदाज़ा नहीं है कि ऐसा करके आप लोगों को उन नियमों के बीच ला रहे हैं जो परमेश्वर के वचनों के सत्य के बाहर हैं। लोगों को सत्य की वास्तविक समझ प्राप्त करवाने के लिए, आपको वास्तविकता के साथ जुड़ना चाहिए, कार्य के साथ जुड़ना चाहिए, और परमेश्वर के वचनों के सत्य के अनुसार व्यावहारिक समस्याओं को हल करना चाहिए। केवल इसी तरह से लोग सत्य को समझ सकते सकते हैं और वास्तविकता में प्रवेश कर सकते हैं। केवल इस तरह का परिणाम हासिल करना ही लोगों को परमेश्वर के सामने लाना है। अगर आप सिर्फ आध्यात्मिक सिद्धांतों, मतों और नियमों के बारे में बात करते हैं, यदि आपके प्रयास केवल लिखित शब्दों पर केन्द्रित होते हैं, तो आप लोगों को सत्य की समझ तक नहीं पहुँचा पाएँगे, आप लोगों से वही बातें कहने और नियमों का पालन करने के लिए निर्देशित करेंगे। आप विशेष रूप से लोगों को अपने आपको बेहतर समझने में सक्षम नहीं बना पाएंगे, आप उन्हें पश्चाताप और परिवर्तन की ओर नहीं ले जा पाएंगे।

— "मसीह की बातचीतों के अभिलेख" में

"सत्य के बिना परमेश्वर को अपमानित करना आसान है" से उद्धृत

यदि तुम सभी ने बहुतायत से परमेश्वर के वचन पढ़े हैं किन्तु सिर्फ पाठ का अर्थ समझते हो और तुम लोगों के पास अपने-अपने व्यावहारिक अनुभवों के जरिए परमेश्वर का अपने व्यावहारिक अनुभव से प्राप्त प्राथमिक ज्ञान नहीं है, तो तुम परमेश्वर के वचन को नहीं जान पाओगे। जहाँ तक यह बात तुम से सम्बंधित है, परमेश्वर के वचन तुम्हारे लिए जीवन नहीं है, किन्तु बस निर्जीव शब्‍द हैं। और यदि तुम केवल निर्जीव शब्‍दों को थामे रहोगे, तो तुम परमेश्वर के वचन का सार समझ नहीं सकते हो, न ही तुम उसकी इच्छा को समझोगे। जब तुम अपने वास्तविक अनुभवों में उसके वचन का अनुभव करते हो केवल तभी परमेश्वर के वचन का आध्यात्मिक अर्थ स्वयं को तुम्हारे लिए खोल देगा, और यह केवल अनुभव में होता है कि तुम बहुत सारे सत्य के आध्यात्मिक अर्थ को समझ सकते हो। और केवल अनुभव के जरिए तुम परमेश्वर के वचन के भेदों का खुलासा कर सकते हो। यदि तुम इसे अभ्यास में न लाओ, तो भले ही परमेश्वर के वचन कितने भी स्पष्ट हों, एकमात्र चीज़ जो तुम समझते हो वह है खोखले शब्‍द एवं सिद्धांत, जो तुम्हारे लिए धार्मिक नियम बन चुके हैं। क्या फरीसियों ने भी ऐसा ही नहीं किया था? यदि तुम लोग परमेश्वर के वचन का अभ्यास और उसका अनुभव करते हो, तो यह तुम लोगों के लिए व्यावहारिक बन जाता है; यदि तुम इसका अभ्यास करने की कोशिश नहीं करते हो, तो परमेश्वर का वचन तुम्हारे लिए तीसरे स्वर्ग की किवदंती से बस कुछ ही अधिक होता है। ...

... जब तुम सत्य का अभ्यास करते हो तभी परमेश्वर का वचन सही ढंग से समझ आता है, और तुम्‍हें यह समझना होगा कि "केवल सत्य का अभ्यास करने के द्वारा ही इसे समझा जा सकता है।" आज, परमेश्वर के वचन को पढ़ने के बाद, तू बस यह कह सकता है कि तू परमेश्वर के वचन को जानता है, किन्तु तू यह नहीं कह सकता है कि तू इसे समझता है। कुछ लोग कहते हैं कि सत्य के अभ्यास का एकमात्र तरीका है कि पहले उसे समझा जाए, किन्तु यह केवल अर्ध-सत्य है और पूरी तरह सटीक नहीं है। इससे पहले कि तुझे सत्य का ज्ञान हो, तूने उस सत्य का अनुभव नहीं किया है। यह महसूस करना कि उपदेश में जो तू सुनता है उसे तू समझता है, वो वास्तविक समझ नहीं है बल्कि यह केवल सत्य के शाब्दिक अक्षर पाना है और यह उसमें निहित सत्य को समझने के समान नहीं है। सिर्फ इसलिए क्योंकि तुम्हारे पास सत्य का उथला ज्ञान है। इसका मतलब यह नहीं है कि तू वास्तव में इसे समझता है या पहचानता है; सत्य का सच्चा अर्थ उसका अनुभव करने से आता है। इसीलिए मैं कहता हूँ कि जब तू सत्य का अभ्यास करता है केवल तभी तू उसे समझ सकता है, और जब तू सत्य का अभ्यास करता है केवल तभी तू उसके छिपे हुए भागों को समझ सकता है। गहराई से उसका अनुभव करना ही सत्य के अतिरिक्त अर्थों को समझने, और उसके सार को समझने का एकमात्र तरीका है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "सत्य को समझ लेने के बाद

उसका अभ्यास करो" से उद्धृत

वह ज्ञान जिसकी तुम चर्चा कर रहे हो वह सत्य के अनुरूप है या नहीं यह मुख्य रूप से इस बात पर निर्भर करता है कि आपके पास व्यावहारिक अनुभव है या नहीं। जहाँ तुम्हारे अनुभवों में सच्चाई है, वहाँ तुम्हारा ज्ञान व्यावहारिक और मूल्यवान होगा। अपने अनुभव के माध्यम से, तुम विवेक और अंतर्दृष्टि भी प्राप्त कर सकते हो, अपने ज्ञान को और गहरा कर सकते हो, और अपना आचरण करने में अपनी बुद्धि और सामान्यबोध को बढ़ा सकते हो। ऐसे लोगों के द्वारा बोला गया ज्ञान जो सत्य को धारण नहीं करते हैं मात्र सिद्धान्त है, भले ही कितना ही ऊँचा क्यों न हो। जब देह के मामलों की बात आती है तो हो सकता है कि इस प्रकार का व्यक्ति बहुत बुद्धिमान हो परन्तु जब आध्यात्मिक मामलों की बात आती है तो वह विभेद नहीं कर सकता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि ऐसे लोगों का आध्यात्मिक मामलों में बिलकुल भी अनुभव नहीं होता है। ये ऐसे लोग हैं जो आध्यात्मिक मामलों में प्रबुद्ध नहीं हैं और वे आत्मा को नहीं समझते हैं। चाहे तुम ज्ञान के किसी भी पहलू के बारे में बात करो, अगर यह तुम्हारा अस्तित्व है, तो यह तुम्हारा व्यक्तिगत अनुभव है, और तुम्हारा वास्तविक ज्ञान है। जो लोग केवल सिद्धान्त की ही बात करते हैं, अर्थात्, जो लोग सत्य या वास्तविकता को धारण नहीं करते हैं, तो वे जिस बारे में बात करते हैं उसे भी उनका अस्तित्व कहा जा सकता है, क्योंकि उनका सिद्धान्त केवल गहरे चिंतन से आया है और यह गहराई से मनन करने वाले उनके मन का परिणाम है, परन्तु यह केवल सिद्धान्त ही है, यह कल्पना से अधिक कुछ नहीं है!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का कार्य" से उद्धृत

संदर्भ के लिए धर्मोपदेश और संगति के उद्धरण:

जो कुछ भी तुम्हारे अपने अनुभव से नहीं है, चाहे तुमने इसे पुस्तकों से या अन्य लोगों के अनुभव से ही क्यों न सीखा हो, तुम्हारे लिए केवल एक सिद्धांत बन कर रह जाता है। जब तुम इसे अनुभव कर लोगे, और अपने अनुभव से किसी परिणाम पर पहुँच जाओगे, तभी तुम्हें सच्ची समझ प्राप्त होगी। जब तुम इसका संवाद करते हो, तो यह वास्तविकता होती है; केवल तभी यह सचमुच एक वास्तविकता बनती है। देखो कि अविश्वासी लोग कुछ सिद्धांतों की खोज कैसे करते हैं: वे केवल जो लिखा है, उसी में से शोध करते हैं, वे सिद्धांतों पर खोज करते हैं और उनका मूल्यांकन करते हैं और फिर अपने निष्कर्ष पर पहुँचते हैं। परमेश्वर के वचनों का एक अंश पढ़ने के बाद, कुछ लोग सिद्धांत के परिप्रेक्ष्य में अपनी शोध शुरू कर देते हैं, विशेषरूप से यदि वे धर्मशास्त्री, पादरी, या विद्वान हैं। वे सत्य को अनुभव से नहीं खोजते हैं, वे परमेश्वर की एक सही समझ की तलाश नहीं करते हैं। वे सभी विभिन्न सिद्धांतों की जाँच करते हैं और अंत में कुछ निष्कर्ष पर पहुँच जाते हैं। तुम्हें क्या लगता है, जिन निष्कर्षों पर वे पहुँचते हैं, वे वास्तविक होते हैं या सैद्धांतिक? वे सभी सिद्धांत हैं। इसका कारण यह है कि वे अपने स्वयं के अनुभव के आधार पर नहीं बल्कि विशेष शाब्दिक अनुसंधान के आधार पर इन निष्कर्षों पर पहुँचे थे। उन्होंने जो कुछ भी पढ़ा था, उसी के आधार पर उन्होंने खोज-बीन की, विचार-विमर्श किया और चीजों का मूल्यांकन किया था। शाब्दिक अनुसंधान से, बाइबल में अभिलिखित चीज़ों की शोध से निकले निष्कर्षों ने, एक तरह के सिद्धांत का निर्माण किया, जिसे धर्मशास्त्रीय सिद्धांत कहा जाता है। इसमें अनुभव से मिली कोई समझ नहीं है, और पवित्र आत्मा की कोई प्रबुद्धता नहीं है। पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता से मिली गहरी समझ शब्दों की बाहरी परत के परे जाती है; यह किसी भी सतही भाषा के द्वारा व्यक्त नहीं की जा सकती है। जब तुम अनुभव में प्रवेश करने के बाद सत्य की तलाश करोगे, तो पवित्र आत्मा तुम्हें प्रबुद्ध करेगा। जिन चीज़ों को पवित्र आत्मा तुम्हारे लिए प्रबुद्ध और रोशन करता है वे ही चीजें सबसे वास्तविक हैं और ऐसी चीज़ें हैं जो तुम्हारे लिए सबसे सच्ची हैं, ये ऐसी चीज़ें हैं जिन्हें तुम बाइबल से प्राप्त नहीं कर सकते हो, चाहे तुम कितने भी परिश्रम के साथ इसका अध्ययन क्यों न करो। तो आज परमेश्वर हमें परमेश्वर के वचन का अनुभव करने देता है। यदि, परमेश्वर के वचन के हमारे अनुभव में, पवित्र आत्मा हमें प्रबुद्ध करता है, तो हम परमेश्वर के वचनों की वास्तविक समझ प्राप्त कर सकते हैं। चाहे तुम परमेश्वर के वचनों के शाब्दिक अर्थ का कैसे भी अध्ययन क्यों न करो, इस वास्तविक समझ को नहीं पाया जा सकता है; यह कुछ ऐसी चीज़ है जिस तक मानवीय सोच द्वारा नहीं पहुँचा जा सकता है। चाहे तुम कितनी भी कोशिश क्यों न करो, सत्य की कल्पना नहीं की जा सकती है। इसलिए, पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन और रोशनी से प्राप्त सत्य को पुस्तकों की शोध से नहीं समझा जा सकता है; और यही परमेश्वर के बारे में असली समझ है।

— जीवन में प्रवेश पर धर्मोपदेश और संगति

सिद्धांत के वचनों और सत्य के बीच वास्तव में क्या अंतर है? सत्य परमेश्वर के वचन की सारभूत बातें हैं; यह परमेश्वर की इच्छा को दर्शाता है। सिद्धांतों के वचन सतही चीज़ों की श्रेणी से संबंधित होते हैं, वे मानवीय अवधारणाओं और कल्पनाओं को दर्शाते हैं। वे सत्य के अनुरूप नहीं होते हैं। सत्य की सारभूत बातें असाधारण रूप से व्यावहारिक होती हैं; वे बातें सिद्धांत पर आधारित और विशेष रूप से विश्वसनीय होती हैं। जब कोई व्यक्ति किसी सारभूत चीज़ को समझ लेता है, तो उसका हृदय उज्ज्वल हो जाता है और मुक्ति को पाता है—वह नियमों की बाध्यताओं के अधीन नहीं रह जाता है। दूसरी ओर, सिद्धांत के वचन रिक्त और अवास्तविक होते हैं। वे नियमों और परम्पराओं के अलावा कुछ भी नहीं होते हैं, और लोगों को लाचार होने और मुक्त महसूस न करने की ओर विशेष रूप से प्रवृत्त करते हैं। इसके अलावा, कोई व्यक्ति चाहे सिद्धांत के कितने ही वचनों को क्यों न जानता हो, वे उसके जीवन-स्वभाव में कोई परिवर्तन नहीं ला सकते हैं। लोगों को इनका थोड़ा सा ही बुनियादी लाभ होता है। इसलिए, सिद्धांत के वचनों की तुलना सत्य से की ही नहीं जा सकती है। सत्य किसी व्यक्ति का जीवन बन सकता है। जब एक बार कोई व्यक्ति इसे स्वीकार कर लेता है, तो यह स्वभाव में बदलाव लाएगा। बहुत से सिद्धांतों की समझ किसी व्यक्ति में केवल अहंकार, आत्म-महत्व, घमंड ला सकती है, उसमें समझ का अभाव ला सकती है। जब सत्य ही किसी व्यक्ति का जीवन हो जाता है केवल तभी उसका अभ्यास वास्तविक बनता है। चाहे कोई व्यक्ति सिद्धांत के कितने भी वचनों को क्यों न समझता हो, वह वास्तविकता को धारण नहीं करेगा। जब वह किसी समस्या का सामना करेगा तो वह नहीं जानेगा कि किसका अभ्यास किया जाए। वे सभी लोग, जो परमेश्वर द्वारा सिद्ध बनाए गए हैं ऐसे लोग हैं जिनके पास सत्य है, जबकि वे सभी लोग जो परमेश्वर द्वारा सिद्धता से नहीं गुज़रे हैं, वे सिद्धांत के वचनों के लोग हैं। जिन लोगों के पास सत्य है, वे परमेश्वर के उपयोग के लिए उपयुक्त हैं। उनके काम परिणाम लाते हैं, और वे अन्य लोगों को परमेश्वर की उपस्थिति में लाने में वास्तव में सक्षम होते हैं। जो लोग सिद्धांत के वचनों पर ध्यान देते हैं, वे अपने काम से सच्चे परिणाम प्राप्त नहीं करते हैं। वे लोगों को प्रामाणिक अनुभव और समझ का जीवनाधार प्रदान नहीं कर सकते हैं, और वे समस्याओं का समाधान करने के लिए सत्य का उपयोग तो बिल्कुल भी नहीं कर सकते हैं। इसलिए वे दूसरों को परमेश्वर की उपस्थिति में लाने में असमर्थ होते हैं। वह व्यक्ति जिसके पास सत्य है, वह सत्य की खोज करने वाले लोगों से संकोच नहीं करता है, और लोगों की उनके विश्वास में आने वाली सभी व्यावहारिक समस्याओं को हल करने में समर्थ होता है। जो लोग सिद्धांत के वचनों पर ज़ोर देते हैं, वे सत्य की खोज करने वाले लोगों से डरते हैं, क्योंकि उनके अपने भीतर वास्तविक चीज़ का अभाव होता है जो सिद्धांत वे बालते हैं वे वास्तविक समस्याओं को हल नहीं कर सकते हैं। इस प्रकार, वे लोगों से सवाल पूछने के लिए कहने की हिम्मत नहीं करते हैं, और निश्चित रूप से व्यावहारिक कठिनाइयों को हल करने में और भी कम सक्षम होते हैं। जिनके पास सत्य है, वे लोग वास्तविकता का सामना करने की हिम्मत रखते हैं; जो लोग सिद्धांत के वचनों पर ध्यान केन्द्रित करते हैं, वे वास्तविकता का सामना करने की हिम्मत नहीं करते हैं, बल्कि वे इससे बचते हैं। सत्य और सिद्धांतों के बीच प्रभेद करने के लिए ऐसे ही सिद्धांत हैं।

— ऊपर से संगति से उद्धृत

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