सात बार के सत्तर गुने तक क्षमा करो और प्रभु का प्रेम

29 मई, 2018

4. सात बार के सत्तर गुने तक क्षमा करो

मत्ती 18:21-22 तब पतरस ने पास आकर उस से कहा, "हे प्रभु, यदि मेरा भाई अपराध करता रहे, तो मैं कितनी बार उसे क्षमा करूँ? क्या सात बार तक?" यीशु ने उससे कहा, "मैं तुझ से यह नहीं कहता कि सात बार तक वरन् सात बार के सत्तर गुने तक।"

5. प्रभु का प्रेम

मत्ती 22:37-39 उसने उससे कहा, "तू परमेश्वर अपने प्रभु से अपने सारे मन और अपने सारे प्राण और अपनी सारी बुद्धि के साथ प्रेम रख। बड़ी और मुख्य आज्ञा तो यही है। और उसी के समान यह दूसरी भी है कि तू अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम रख।"

इन दोनों अंशों में, एक क्षमा के बारे में बात करता है और दूसरा प्रेम के बारे में बात करता है। ये दोनों विषय वास्तव में प्रभु यीशु के कार्यों की विशिष्टता से दर्शाते हैं जिन्हें यीशु अनुग्रह के युग में कार्यान्वित करना चाहता था।

जब परमेश्वर देह बन गया, तो वह उसके साथ अपने कार्य का एक चरण ले कर आया—वह उसके साथ विशिष्ट कार्य और उस स्वभाव को लेकर आया जिसे वह इस युग में व्यक्त करना चाहता था। उस अवधि में, वह सब कुछ जो मनुष्य के पुत्र ने किया वह उस कार्य के चारों ओर घूमता था जिसे परमेश्वर इस युग में करना चाहता था। वह न इससे कुछ ज़्यादा करेगा न कम। हर एक बात जो उसने कही और हर एक प्रकार का कार्य जो उसने किया वह सब इस युग से सम्बंधित था। इस बात की परवाह किए बिना कि उसने इसे मानवीय तरीके से मानवीय भाषा में व्यक्त किया या दिव्य भाषा के माध्यम से—भले ही कोई सा भी तरीका, या किसी भी परिप्रेक्ष्य से क्यों न रहा हो—उसका उद्देश्य था कि जो वह करना चाहता था, जो उसकी इच्छा थी, और लोगों से जो उसकी अपेक्षाएँ थीं उन्हें समझने में लोगों की सहायता करे। वह परमेश्वर की इच्छा को समझने और जानने में, मनुष्यजाति को बचाने के उसके कार्य को समझने में लोगों की सहायता करने के लिए विभिन्न परिप्रेक्ष्यों से विभिन्न उपायों का उपयोग कर सकता था। इसलिए अनुग्रह के युग में हम देखते हैं कि प्रभु यीशु जो कुछ मनुष्यजाति को बताना चाहता था उसे व्यक्त करने के लिए अधिकांश समय मानवीय भाषा का उपयोग करता है। उससे भी बढ़कर, हम उसे एक साधारण मार्गदर्शक के परिप्रेक्ष्य से देखते हैं जो लोगों के साथ बात कर रहा होता है, उनकी आवश्यकताओं की आपूर्ति कर रहा होता है, और जिसके लिए उन्होंने विनती की है उसमें उनकी सहायता कर रहा होता है। कार्य करने का यह तरीका व्यवस्था के युग में देखने में नहीं आता था जो अनुग्रह के युग के पहले आया था। वह मनुष्यजाति के साथ और ज़्यादा अंतरंग तथा उनके प्रति और अधिक करुणामय, और साथ ही रूप और तरीके दोनों में व्यावहारिक परिणामों को प्राप्त करने में और अधिक समर्थ हो गया था। सात बार के सत्तर गुने तक लोगों को क्षमा करने के बारे में उपमा वास्तव में इस बिन्दु को स्पष्ट करती है। इस उपमा में संख्या द्वारा प्राप्त उद्देश्य लोगों को यह समझने देना है कि प्रभु यीशु ने जब ऐसा कहा तब उसके क्‍या इरादे थे, । उसका इरादा था कि लोगों को दूसरों को क्षमा कर देना चाहिए—एक या दो बार नहीं, यहाँ तक कि सात बार भी नहीं, बल्कि सात बार के सत्तर गुने तक। "सात बार के सत्तर गुने तक" यह किस प्रकार का मत है? यह लोगों से क्षमा को उनका स्वयं का उत्तरदायित्व बनवाने के लिए है, ऐसा कुछ है जिसे उन्हें अवश्य सीखना चाहिए, और एक ऐसा मार्ग है जिस पर उन्हें अवश्य चलना चाहिए। भले ही यह मात्र एक उपमा थी, किन्तु इसने एक निर्णायक बिन्दु की भूमिका निभायी थी। इसने उस बात की गहराई से सराहना करने में जो परमेश्वर कहना चाहता था और अभ्यास के उचित तरीकों और अभ्यास में सिद्धांतों और मानकों की खोज करने में लोगों की सहायता की। इस उपमा ने स्पष्ट रूप से समझने में लोगों की सहायता की और उन्हें परिशुद्ध धारणा दी—कि उन्हें क्षमा सीखनी चाहिए—और बिना किसी शर्त के कितनी भी बार क्षमा करना चाहिए, लेकिन दूसरों के प्रति सहिष्‍णुता का रवैया और समझ के साथ। जब प्रभु यीशु ने ऐसा कहा, तब उसके हृदय में क्या था? क्या वह वास्तव में सात बार के सत्तर गुने तक के बारे में सोच रहा था? वह नहीं सोच रहा था। क्या उन समयों की कोई संख्या है कि कितनी बार परमेश्वर मनुष्य को क्षमा करेगा। ऐसे बहुत से लोग हैं जो उल्लेख किए गए "समयों की संख्या" में रूचि रखते हैं, जो वास्तव में इस संख्या के उद्गम और अर्थ के बारे में समझना चाहते हैं। वे समझना चाहते हैं कि यह संख्या प्रभु यीशु के मुँह से क्यों निकली थी; वे मानते हैं कि इस संख्या का कोई अधिक गहरा निहितार्थ है। वास्तव में, यह सिर्फ मानवता में परमेश्वर की अभिव्यक्ति थी। किसी भी अभिप्राय या अर्थ को मनुष्यजाति के प्रति प्रभु यीशु की आकांक्षाओं के साथ-साथ अवश्य लिया जाना चाहिए। जब परमेश्वर देह नहीं बना था, तब जो कुछ वह कहता था लोग उसे काफी हद तक नहीं समझते थे क्योंकि वह पूर्ण दिव्यता से आया था। जो वह कहता था उसका परिप्रेक्ष्य और संदर्भ मनुष्यजाति के लिए अदृश्य और अगम्य था; वह आध्यात्मिक क्षेत्र से प्रकट होता था जिसे लोग देख नहीं सकते थे। जो लोग देह में जीवन बिताते थे, वे आध्यात्मिक क्षेत्र से होकर नहीं गुज़र सकते थे। परन्तु परमेश्वर के देह बनने के बाद, उसने मानवीय परिप्रेक्ष्य से मनुष्‍य जाति से बात की, और वह आध्यात्मिक क्षेत्र के दायरे से बाहर आया और उससे आगे बढ़ गया। मनुष्यजाति को उस अंश तक जिस तक वे समर्थ हैं परमेश्वर को समझने और जानने देने, और उनकी क्षमता के दायरे के भीतर उसके इरादे और उसके अपेक्षित मानकों को बूझने देने के लिए, उन चीज़ों के द्वारा जिनकी कल्पना मनुष्य कर सकते थे और उन चीज़ों के द्वारा जिन्हें उन्होंने अपने जीवन में देखा और सामना किया था, और ऐसी पद्धतियों के उपयोग के द्वारा जिन्हें मनुष्य स्वीकार कर सकते थे, एक ऐसी भाषा में जिसे वे समझ सकते थे, और ऐसे ज्ञान के द्वारा जिसे वे समझ सकते थे, वह अपने दिव्य स्वभाव, इच्छा, और रवैये को व्यक्त कर सकता था। यह मानवता मे परमेश्वर के कार्य की पद्धति और सिद्धांत थे। यद्यपि देह में होकर कार्य करने से परमेश्वर के तरीकों और सिद्धांतों को मुख्यतः उसकी मानवता के द्वारा या माध्यम से प्राप्त किया गया था, फिर भी इसने सचमुच में ऐसे परिणामों को प्राप्त किया जिन्हें सीधे दिव्यता में होकर कार्य करने से प्राप्त नहीं किया जा सकता था। मानवता में परमेश्वर का कार्य ज़्यादा ठोस, प्रामाणिक, और लक्षित था, और पद्धतियाँ कहीं ज़्यादा लचीली थीं, तथा आकार में यह व्यवस्था के युग से बढ़कर था।

नीचे, आओ हम प्रभु से प्रेम करने और अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम करने के बारे में बात करें। क्या यह कुछ ऐसा है जो सीधे तौर पर दिव्यता में प्रकट होता है? स्पष्ट रूप से नहीं! ये सब वे चीज़े थीं जिन्हें मनुष्य के पुत्र ने मानवता में कहा था; केवल लोग ही कुछ ऐसा कहेंगे "अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम कर। दूसरों से प्रेम करना अपने स्वयं के जीवन को दुलारने के समान है," और केवल लोग ही इस तरह से बात करेंगे। परमेश्वर ने कभी भी इस तरह बात नहीं की है। कम से कम, परमेश्वर के पास अपनी दिव्यता में इस प्रकार की भाषा नहीं होती है क्योंकि उसे मनुष्यजाति के प्रति अपने प्रेम को नियंत्रित करने के लिए इस प्रकार के सिद्धांत की आवश्यकता नहीं होती है कि "अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम कर," क्योंकि मनुष्यजाति के लिए परमेश्वर का प्रेम उसके स्वभाव का प्राकृतिक प्रकाशन है। क्या तुम लोगों ने कभी सुना है कि परमेश्वर ने ऐसा कुछ कहा कि "मैं मनुष्य से ऐसा प्रेम करता हूँ जैसा मैं अपने आप से प्रेम करता हूँ"? क्योंकि प्रेम परमेश्वर के सार में, और उसके स्वरूप में है। मनुष्यजाति के लिए परमेश्वर का प्रेम और वह जिस तरह से लोगों के साथ व्यवहार करता है और उसका रवैया उसके स्वभाव की प्राकृतिक अभिव्यक्ति और प्रकाशन है। उसे जानबूझकर किसी निश्चित तरीके से ऐसा करने की आवश्यकता नहीं है, या अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम करना प्राप्त करने के लिए जानबूझकर किसी निश्चित तरीके या एक नैतिक संहिता का अनुसरण करने की कोई आवश्यकता नहीं है—उसके पास पहले से ही इस प्रकार का सार है। तुम इसमें क्या देखते हैं? जब परमेश्वर ने मानवता में होकर काम किया, तो उसकी बहुत सी पद्धतियाँ, उसके बहुत से वचन, और उसके बहुत से सत्य सब कुछ मानवीय तरीके से व्यक्त हुए थे। परन्तु साथ ही परमेश्वर का स्वभाव, और परमेश्वर का स्वरूप, और उसकी इच्छा, लोगों के जानने और समझने के लिए व्यक्त हुए थे। जो कुछ उन्होंने जाना और समझा था वह वास्तव में उसका सार और उसका स्वरूप था, जो स्वयं परमेश्वर की अंतर्निहित पहचान और हैसियत को दर्शाते थे। अर्थात्, देह में मनुष्य के पुत्र ने स्वयं परमेश्वर के अंतर्निहित स्वभाव और सार को अधिकतम संभव सीमा तक और यथासंभव परिशुद्ध तरीके से व्यक्त किया था। न केवल मनुष्य के पुत्र की मानवता स्वर्गिक परमेश्वर के साथ मनुष्य के संवाद और अंतः-क्रिया में कोई व्यवधान या कोई बाधा नहीं थी, बल्कि वह मनुष्यजाति के लिए सृष्टि के प्रभु से जुड़ने का एकमात्र माध्यम और एकमात्र सेतु थी। इस बिन्दु पर, क्या तुम लोग यह महसूस नहीं करते हो कि अनुग्रह के युग में प्रभु यीशु के द्वारा किए गए कार्य की प्रकृति और पद्धतियों और कार्य के वर्तमान चरण के बीच बहुत सी समानताएँ हैं? कार्य का यह वर्तमान चरण परमेश्वर के स्वभाव को व्यक्त करने के लिए ढेर सारी मानवीय भाषाओं का भी उपयोग करता है, और यह परमेश्वर की स्वयं की इच्छा को व्यक्त करने के लिए मनुष्यजाति के दैनिक जीवन और मानवीय ज्ञान में से ढेर सारी भाषाओं और पद्धतियों का प्रयोग करता है। एक बार जब परमेश्वर देह बन जाता है, तो फिर चाहे वह मानवीय परिप्रेक्ष्य या दिव्य परिप्रेक्ष्य से ही क्यों न बात करे, प्रकटीकरण की उसकी ढेर सारी भाषा और पद्धतियाँ सभी मानवीय भाषा और पद्धतियों के माध्यम से होती हैं। अर्थात्, जब परमेश्वर देह बन गया, तो यह तुम्हारे लिए उसकी सर्वशक्तिमत्ता और उसकी बुद्धि को देखने और परमेश्वर के प्रत्येक सच्चे पहलू को जानने का बेहतरीन अवसर था। जब परमेश्वर देह बन गया, उसके बड़े होने के दौरान, उसने मनुष्यजाति के ज्ञान, व्यावहारिक ज्ञान, भाषा, और मानवता में अभिव्यक्ति की पद्धतियों को समझा, सीखा, और ग्रहण किया। देहधारी परमेश्वर इन चीज़ों को धारण करता था जो उन मनुष्यों से आयी थीं जिन्हें उसने सृजित किया था। वे उसके स्वभाव और उसकी दिव्यता को व्यक्त करने के लिए देहधारी परमेश्वर के साधन बन गए, और जब वह मानवीय परिप्रेक्ष्य से और मानवीय भाषा का उपयोग करते हुए मनुष्यजाति के बीच कार्य कर रहा था, तब उन्होंने उसे उसके कार्य को अधिक उचित, अधिक प्रामाणिक, और अधिक सटीक बनाने दिया। इसने लोगों के लिए इसे और अधिक सुगम और आसानी से समझने योग्य बनाया, इस प्रकार ऐसे परिणामों को प्राप्त किया जिन्हें परमेश्वर चाहता था। क्या इस तरह देह में कार्य करना परमेश्वर के लिए अधिक व्यावहारिक नहीं है? क्या यह परमेश्वर की बुद्धि नहीं है? जब परमेश्वर देहधारी हुआ, और जब परमेश्वर का देह उस कार्य को सँभालने में समर्थ हुआ जिसे वह करना चाहता था, ऐसा तब है कि वह व्यावहारिक रूप से अपने स्वभाव और अपने कार्य को व्यक्त करता, और यही वह समय भी था जब वह मनुष्य के पुत्र के रूप में आधिकारिक रूप से अपनी सेवकाई की शुरूआत कर सकता था। इसका मतलब था कि परमेश्वर और मनुष्यों के बीच अब और कोई “पीढ़ी का अंतराल” नहीं था, और यह कि परमेश्वर जल्द ही सन्देशवाहकों के माध्यम से संवाद करने के अपने कार्य को रोक देगा, और स्वयं परमेश्वर व्यक्तिगत रूप से सभी वचनों को प्रकट करेगा और देह में होकर काम करेगा जिसे वह करना चाहता था। इसका अर्थ यह भी था कि जिन लोगों को परमेश्वर बचाता है वे उसके अधिक करीब थे, और यह कि उसके प्रबन्धन के कार्य ने एक नए क्षेत्र में प्रवेश कर लिया था, और यह कि संपूर्ण मनुष्यजाति का सामना एक नए युग से होने ही वाला था।

जिसने बाइबल पढ़ा है वह हर कोई जानता है कि जब यीशु का जन्म हुआ था तो बहुत सी चीज़े घटित हुई थीं। उनमें से सबसे बड़ी थी शैतानों के राजा के द्वारा शिकार किया जाना, यहाँ तक कि उस स्थिति तक कि उस क्षेत्र के दो वर्ष या उस से नीचे के सभी बच्चों का भी वध किया जा रहा था। यह स्पष्ट है कि मनुष्यों के बीच देह होकर परमेश्वर ने बड़ा जोखिम अपनाया था; और मनुष्यजाति को बचाने के अपने प्रबन्धन को पूरा करने के लिए उसने जो बड़ी कीमत चुकाई वह भी स्पष्ट है। वे बड़ी आशाएँ जो परमेश्वर को अपने कार्य के ऊपर थी जिसे उसने देह में होकर मनुष्यजाति के बीच किया था वे भी स्पष्ट हैं। जब परमेश्वर का देह मनुष्यजाति के बीच अपने कार्य को सँभालने में समर्थ था, तो वह कैसा महसूस कर रहा था? लोगों को उसे थोड़ा बहुत समझना चाहिए, ठीक है न? कम से कम परमेश्वर प्रसन्न था क्योंकि वह मनुष्यजाति के बीच अपने नए कार्य का विकास करना आरम्भ कर सकता था। जब प्रभु यीशु का बपतिस्मा हुआ था और उसने आधिकारिक रूप से अपनी सेवकाई को पूरा करने के अपने कार्य को आरम्भ किया था, तो परमेश्वर का हृदय आनन्द से अभिभूत हो गया था क्योंकि इतने वर्षों की प्रतीक्षा और तैयारी के बाद, वह अंततः एक औसत इन्सान की देह को पहन सका था और लहू और माँस के एक मनुष्य के रूप में अपने नए कार्य को आरम्भ कर सका था जिसे लोग देख और छू सकते थे। वह अंततः मनुष्य की पहचान के माध्यम से लोगों के साथ आमने-सामने और खुलकर बात कर सकता था। परमेश्वर मानवीय भाषा में, मानवीय तरीके से, मनुष्यजाति के साथ रूबरू हो सकता था; वह मनुष्यजाति का भरण-पोषण कर सकता था, उन्हें प्रबुद्ध कर सकता था, और मानवीय भाषा का उपयोग कर उनकी सहायता कर सकता था; वह उनके साथ एक ही मेज़ पर बैठ कर भोजन कर सकता था और उसी जगह पर उनके साथ रह सकता था। वह मनुष्यों को भी देख सकता था, चीज़ों को देख सकता था, और चीज़ को उसी तरह से देख सकता था जैसे मनुष्य देखते हैं और वो भी स्वयं अपनी आँखों से। परमेश्वर के लिए, यह पहले से ही देह में उसके कार्य की उसकी पहली विजय थी। ऐसा भी कहा जा सकता है कि यह एक महान कार्य की पूर्णता थी—यह निस्संदेह वह था जिसके बारे में परमेश्वर सबसे अधिक प्रसन्न था। तब से शुरू हो कर यह पहली बार था कि परमेश्वर ने मनुष्यजाति के बीच अपने कार्य में एक प्रकार का सुकून महसूस किया। ये सभी घटनाएँ बहुत व्यावहारिक और बहुत स्वाभाविक थी, और जो सुकून परमेश्वर ने महसूस किया था वह बहुत ही प्रामाणिक था। मनुष्यजाति के लिए, हर बार जब भी परमेश्वर के कार्य का एक नया चरण पूरा होता है, और हर बार जब परमेश्वर संतुष्टि महसूस करता है, ऐसा तब होता है जब मनुष्यजाति परमेश्वर के करीब आ सकती है, और जब लोग उद्धार के निकट आ सकते हैं। परमेश्वर के लिए, यह उसके नए कार्य की शुरूआत भी है, जब उसकी प्रबन्धन योजना एक कदम आगे प्रगति करती है, और इसके अतिरिक्त, जब उसकी इच्छा पूर्ण निष्पादन तक पहुँचती है। मनुष्यजाति के लिए, इस प्रकार के अवसर का आगमन सौभाग्यशाली, और बहुत अच्छा है; उन सबके लिए जो परमेश्वर से उद्धार की प्रतीक्षा करते हैं, यह एक महत्वपूर्ण और आनंदमय समाचार है। जब परमेश्वर कार्य के एक नए चरण को कार्यान्वित करता है, तब वह एक नई शुरूआत करता है, और जब मनुष्यजाति के बीच इस नए कार्य और नई शुरूआत को आरम्भ और प्रस्तुत किया जाता है, तो ऐसा तब होता है जब इस कार्य के चरण के परिणाम को पहले से ही निर्धारित कर दिया जाता है, और इसे पूर्ण कर लिया जाता है, और परमेश्वर पहले से ही उसके प्रभावों और परिणाम को देख लेता है। ऐसा भी तब होता है जब ये प्रभाव परमेश्वर को सन्तुष्टि महसूस कराते हैं, और उसका हृदय, वास्तव में, प्रसन्न होता है। क्योंकि, परमेश्वर की नज़रों में, उसने पहले से ही उन लोगों को देख और निर्धारित कर दिया है जिन्हें वह ढूँढ़ रहा है, और पहले से ही इस समूह को प्राप्त कर लिया है, एक ऐसा समूह जो उसके कार्य को सफल करने में और उसे सन्तुष्टि प्रदान करने में समर्थ है, परमेश्वर आश्वस्त महसूस करता है, वह अपनी चिन्ताओं को एक ओर रख देता है, और वह प्रसन्नता महसूस करता है। दूसरे शब्दों में, जब परमेश्वर का देह मनुष्यों के बीच एक नया कार्य आरम्भ करने में समर्थ है, और वह उस कार्य को करना आरम्भ कर देता है जिसे उसे बिना किसी अड़चन के अवश्य करना चाहिए, और जब उसे महसूस होता है कि सब कुछ पूर्ण किया जा चुका है, तो उसने अन्त को पहले से ही देख लिया होता है। और इस अन्त के कारण वह सन्तुष्ट है, प्रसन्न हृदय वाला है। परमेश्वर की प्रसन्नता किस प्रकार व्यक्त होती है? क्या तुम लोग कल्पना कर सकते हो कि क्या उत्तर हो सकता है? क्या परमेश्वर रोए? क्या परमेश्वर रो सकता है? क्या परमेश्वर अपने हाथों से ताली बजा सकता है? क्या परमेश्वर नृत्य कर सकता है? क्या परमेश्वर गाना गा सकता है? वह गीत कौन सा होगा? निस्संदेह परमेश्वर एक सुन्दर और द्रवित कर देने वाला गीत गा सकता है, ऐसा गीत जो उसके हृदय के आनन्द और प्रसन्नता को व्यक्त कर सकता है। वह उसे मनुष्यजाति के लिए गा सकता है, उसे अपने आप के लिए गा सकता है, और सभी चीज़ों के लिए गा सकता है। परमेश्वर की प्रसन्नता किसी भी तरीके से व्यक्त हो सकती है—यह सब कुछ सामान्य है क्योंकि परमेश्वर के पास आनन्द और दुःख है, और उसकी विभिन्न भावनाओं को विभिन्न तरीकों से व्यक्त किया जा सकता है। यह उसका अधिकार है, और कुछ भी अधिक सामान्य और उचित नहीं हो सकता है। लोगों को इस बारे में कुछ अन्य नहीं सोचना चाहिए। परमेश्वर से यह कहते हुए कि उसे यह नहीं करना चाहिए या वह नहीं करना चाहिए, उसे इस तरह से कार्य नहीं करना चाहिए या उस तरह से कार्य नहीं करना चाहिए, उसकी खुशी या उसकी किसी भी अन्य भावना वो सीमित करने के लिए कहते हुए, तुम लोगों को परमेश्वर पर "वशीकरण मंत्र"[क] उपयोग करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। लोगों के हृदयों में परमेश्वर प्रसन्न नहीं हो सकता है, वह आँसू नहीं बहा सकता है, वह विलाप नहीं कर सकता है—वह किसी मनोभाव को व्यक्त नहीं कर सकता है। जिन बातों के माध्यम से हमने इन दोनों बार संवाद किया है, उससे मैं यह विश्वास करता हूँ कि तुम लोग परमेश्वर को अब और इस तरह से नहीं देखोगे, बल्कि परमेश्वर को कुछ स्वतन्त्रता और राहत लेने दोगे। यह एक बहुत अच्छी बात है। भविष्य में यदि तुम लोग सचमुच में परमेश्वर की उदासी को महसूस कर पाओ जब तुम उसकी उदासी के बारे में सुनो, और तुम लोग सचमुच में उसकी प्रसन्नता को महसूस कर पाओ जब तुम लोग उसकी प्रसन्नता के बारे में सुनो—तो कम से कम, तुम लोग स्पष्ट रूप से यह जानने और समझने में समर्थ हो कि क्या चीज़ परमेश्वर को प्रसन्न करती है और क्या चीज़ उसे उदास करती है—जब तुम उदास महसूस कर पाते हो क्योंकि परमेश्वर उदास है, और तुम प्रसन्न महसूस कर पाते हो क्योंकि परमेश्वर प्रसन्न है, तो उसने तुम्हारे हृदय को पूरी तरह से प्राप्त कर लिया होगा और उसके साथ अब और कोई बाधा नहीं होगी। तुम मानवीय कल्पनाओं, धारणाओं, और ज्ञान से परमेश्वर को अब और विवश करने की कोशिश नहीं करोगे। उस समय, परमेश्वर तुम्हारे हृदय में जीवित और जीवंत होगा। वह तुम्हारे जीवन का परमेश्वर होगा और तुम्हारी हर चीज़ का स्वामी होगा। क्या तुम्हारी इस प्रकार की आकांक्षा है। क्या तुम लोगों को विश्वास है कि तुम लोग इसे प्राप्त कर सकते हो?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III" से उद्धृत

फुटनोट:

क. "वशीकरण मंत्र" एक मंत्र है, जिसे भिक्षु तांग सानज़ैंग ने चीनी उपन्यास 'जर्नी टु द वेस्ट' (पश्चिम की यात्रा) में इस्तेमाल किया है। वह इस मंत्र का उपयोग सन वूकोंग (वानर राजा) को नियंत्रित करने के लिए उसके सिर के चारों ओर एक धातु का छल्ला कसकर करता है, जिससे उसे तेज सिरदर्द हो जाता है और वह काबू में आ जाता है। यह व्यक्ति को बाँधने वाली किसी चीज़ का वर्णन करने के लिए एक रूपक बन गया है।

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