सात बार के सत्तर गुने तक क्षमा करो और प्रभु का प्रेम

29 मई, 2018

4. सात बार के सत्तर गुने तक क्षमा करो

मत्ती 18:21-22 तब पतरस ने पास आकर उस से कहा, "हे प्रभु, यदि मेरा भाई अपराध करता रहे, तो मैं कितनी बार उसे क्षमा करूँ? क्या सात बार तक?" यीशु ने उससे कहा, "मैं तुझ से यह नहीं कहता कि सात बार तक वरन् सात बार के सत्तर गुने तक।"

5. प्रभु का प्रेम

मत्ती 22:37-39 उसने उससे कहा, "तू परमेश्वर अपने प्रभु से अपने सारे मन और अपने सारे प्राण और अपनी सारी बुद्धि के साथ प्रेम रख। बड़ी और मुख्य आज्ञा तो यही है। और उसी के समान यह दूसरी भी है कि तू अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम रख।"

इन दोनों अंशों में से एक क्षमा के बारे में बात करता है और दूसरा प्रेम के बारे में। ये दोनों विषय वास्तव में उस कार्य पर प्रकाश डालते हैं, जिसे प्रभु यीशु अनुग्रह के युग में करना चाहता था।

जब परमेश्वर देह बन गया, तो वह अपने साथ अपने कार्य का एक चरण, जो कि एक विशिष्ट कार्य था, और उस स्वभाव को लेकर आया, जिसे वह इस युग में व्यक्त करना चाहता था। उस अवधि में जो कुछ भी मनुष्य के पुत्र ने किया, वह सब उस कार्य के चारों ओर घूमता था, जिसे परमेश्वर इस युग में करना चाहता था। वह न तो उससे कुछ ज़्यादा करता, न कम। हर एक बात जो उसने कही और हर एक प्रकार का कार्य जो उसने किया, वह सब इस युग से संबंधित था। चाहे उसने इसे मानवीय तरीके से मानवीय भाषा में व्यक्त किया या दिव्य भाषा के माध्यम से, और चाहे उसने ऐसा किसी भी तरह से या किसी भी परिप्रेक्ष्य से किया हो, उसका उद्देश्य लोगों को यह समझने में मदद करना था कि वह क्या करना चाहता है, उसकी क्या इच्छा है और लोगों से उसकी क्या अपेक्षाएँ हैं। वह अपनी इच्छा समझने और जानने, और मानवजाति को बचाने के अपने कार्य को समझने में लोगों की सहायता करने के लिए विभिन्न साधनों और परिप्रेक्ष्यों का उपयोग कर सकता था। इसलिए अनुग्रह के युग में हम प्रभु यीशु को यह व्यक्त करने के लिए कि वह मानवजाति को क्या बताना चाहता है, अधिकांश समय मानवीय भाषा का उपयोग करते हुए देखते हैं। इससे भी अधिक्, हम उसे एक साधारण मार्गदर्शक के परिप्रेक्ष्य से लोगों के साथ बात करते हुए, उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति करते हुए और उनके अनुरोध के अनुसार उनकी सहायता करते हुए देखते हैं। कार्य करने का यह तरीका व्यवस्था के युग में नहीं देखा गया था, जो अनुग्रह के युग से पहले आया था। वह मानवजाति के साथ अधिक अंतरंग और उनके प्रति अधिक करुणामय, और साथ ही रूप और तरीके दोनों में व्यावहारिक परिणाम प्राप्त करने में अधिक सक्षम हो गया था। सात बार के सत्तर गुने तक लोगों को क्षमा करने का रूपक इस बिंदु को वास्तव में स्पष्ट करता है। इस रूपक में प्रयुक्त संख्या द्वारा प्राप्त उद्देश्य लोगों को यह समझाना है कि प्रभु यीशु ने जब ऐसा कहा था, उस समय उसका क्या इरादा था। उसका इरादा था कि लोगों को दूसरों को क्षमा कर देना चाहिए—एक या दो बार नहीं, यहाँ तक कि सात बार भी नहीं, बल्कि सात बार के सत्तर गुने तक। "सात बार के सत्तर गुने तक" के विचार के भीतर किस प्रकार का विचार निहित है? वह विचार यह है कि लोग क्षमा को अपना खुद का उत्तरदायित्व बना लें, ऐसी चीज़ जो उन्हें अवश्य सीखनी चाहिए, और ऐसा मार्ग जिस पर उन्हें अवश्य चलना चाहिए। हालाँकि यह मात्र एक रूपक था, किंतु इसने एक महत्त्वपूर्ण बिंदु को उजागर करने का काम किया। इसने उसका आशय गहराई से समझने और अभ्यास के उचित तरीके, सिद्धांत और मानक खोजने में लोगों की सहायता की। इस रूपक ने लोगों को यह स्पष्ट रूप से समझने में सहायता की और उन्हें एक सही धारणा दी—कि उन्हें क्षमा सीखनी चाहिए और बिना किसी शर्त के कितनी भी बार क्षमा करना चाहिए, किंतु दूसरों के प्रति सहनशीलता और समझदारी के रवैये के साथ। जब प्रभु यीशु ने यह कहा, तब उसके हृदय में क्या था? क्या वह वास्तव में "सात बार के सत्तर गुने" की संख्या के बारे में सोच रहा था? नहीं, वह उसके बारे में नहीं सोच रहा था। क्या परमेश्वर दवारा मनुष्य को क्षमा किए जाने की कोई संख्या है? ऐसे बहुत-से लोग हैं, जो यहाँ उल्लिखित "बारियों की संख्या" में बहुत रुचि रखते हैं, जो वास्तव में इस संख्या का उद्गम और अर्थ समझना चाहते हैं। वे समझना चाहते हैं कि यह संख्या प्रभु यीशु के मुँह से क्यों निकली थी; वे मानते हैं कि इस संख्या का कोई अधिक गहरा निहितार्थ है। किंतु वास्तव में यह सिर्फ मनुष्य की बोली की एक संख्या थी, जिसका परमेश्वर ने उपयोग किया था। किसी भी अभिप्राय या अर्थ को मानवजाति से प्रभु यीशु की अपेक्षाओं के साथ लिया जाना चाहिए। जब परमेश्वर देह नहीं बना था, तब लोग उसके कथन को अधिक नहीं समझते थे, क्योंकि उसके वचन पूर्ण दिव्यता से आते थे। उसके कथन का परिप्रेक्ष्य और संदर्भ मानवजाति के लिए अदृश्य और अगम्य था; वह आध्यात्मिक क्षेत्र से व्यक्त होता था, जिसे लोग देख नहीं सकते थे। वे लोग जो देह में जीते थे, वे आध्यात्मिक क्षेत्र से होकर नहीं गुज़र सकते थे। परंतु देह बनने के बाद परमेश्वर ने मानवजाति से मानवीय परिप्रेक्ष्य से बात की, और वह आध्यात्मिक क्षेत्र के दायरे से बाहर आया और उसे पार कर गया। वह अपना स्वभाव, अपनी इच्छा और अपना रवैया उन चीज़ों के माध्यम से, जिनकी मनुष्य कल्पना कर सकते थे, जिन्हें उन्होंने अपने जीवन में देखा था और जो उनके सामने आई थीं, और ऐसी पद्धतियों के उपयोग द्वारा जिन्हें मनुष्य स्वीकार कर सकते थे, और ऐसी भाषा में जिसे वे समझ सकते थे, और ऐसे ज्ञान के द्वारा व्यक्त कर सका, जिसे वे ग्रहण कर सकते थे, ताकि मानवजाति अपनी क्षमता के दायरे के भीतर और अपनी योग्यता की सीमा तक परमेश्वर को समझ और जान सके, और उसके इरादे और अपेक्षित मानक समझ सके। यह मानवता में परमेश्वर के कार्य की पद्धति और सिद्धांत था। यद्यपि देह में कार्य करने के परमेश्वर के तरीके और सिद्धांत मुख्यतः मानवता के द्वारा या उसके माध्यम से प्राप्त किए गए थे, फिर भी इसने सचमुच ऐसे परिणाम प्राप्त किए, जिन्हें सीधे दिव्यता में कार्य करने से प्राप्त नहीं किया जा सकता था। मानवता में परमेश्वर का कार्य ज़्यादा ठोस, प्रामाणिक और लक्ष्यित था, उसकी पद्धतियाँ कहीं ज़्यादा लचीली थीं, तथा आकार में वह व्यवस्था के युग से आगे निकल गया।

आगे, आओ प्रभु से प्रेम करने और अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम करने के बारे में बात करें। क्या यह सीधे दिव्यता में व्यक्त की गई चीज़ है? नहीं, स्पष्ट रूप से नहीं! ये सब वे चीज़ें थीं, जिन्हें मनुष्य के पुत्र ने मानवता में कहा था; केवल मनुष्य ही ऐसी बात कहेंगे, "अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम कर। दूसरों से उसी तरह प्रेम कर, जिस तरह तू अपने जीवन को सँजोता है।" बोलने का यह तरीका केवल मनुष्य का है। परमेश्वर ने कभी इस तरह बात नहीं की। कम से कम, परमेश्वर के पास अपनी दिव्यता में इस प्रकार की भाषा नहीं है, क्योंकि उसे मनुष्य के प्रति अपने प्रेम को विनियमित करने के लिए इस प्रकार के सिद्धांत की आवश्यकता नहीं होती, "अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम कर," क्योंकि मनुष्य के लिए परमेश्वर का प्रेम उसके स्वभाव का स्वाभाविक प्रकाशन है। तुम लोगों ने कभी परमेश्वर को ऐसा कुछ कहते हुए सुना है : "मैं मनुष्य से उसी तरह प्रेम करता हूँ, जिस तरह मैं अपने आप से प्रेम करता हूँ"? तुमने नहीं सुना होगा, क्योंकि प्रेम परमेश्वर के सार और स्वरूप में है। मनुष्य के लिए परमेश्वर का प्रेम, उसका रवैया और लोगों के साथ उसके व्यवहार का तरीका उसके स्वभाव की स्वाभाविक अभिव्यक्ति और प्रकाशन हैं। उसे जानबूझकर किसी निश्चित तरीके से ऐसा करने की आवश्यकता नहीं है, या अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम करने के लिए जानबूझकर किसी निश्चित पद्धति या किसी नैतिक संहिता का अनुसरण करने की आवश्यकता नहीं है—उसके पास पहले से ही इस प्रकार का सार है। तुम इसमें क्या देखते हो? जब परमेश्वर ने मानवता में काम किया, तो उसकी बहुत-सी पद्धतियाँ, वचन और सत्य मानवीय तरीके से व्यक्त हुए थे। परंतु साथ ही परमेश्वर का स्वभाव, स्वरूप और उसकी इच्छा भी लोगों के जानने और समझने के लिए व्यक्त हुए थे। जो कुछ उन्होंने जाना और समझा, वह वास्तव में उसका सार और उसका स्वरूप था, जो स्वयं परमेश्वर की अंतर्निहित पहचान और हैसियत दर्शाते हैं। अर्थात्, देह में मनुष्य के पुत्र ने स्वयं परमेश्वर के अंतर्निहित स्वभाव और सार को अधिकतम संभव सीमा तक और यथासंभव सटीक तरीके से व्यक्त किया। न केवल मनुष्य के पुत्र की मानवता स्वर्गिक परमेश्वर के साथ मनुष्य के संवाद और अंतःक्रिया में कोई व्यवधान या बाधा नहीं थी, बल्कि वास्तव में वह मानवजाति के लिए सृष्टि के प्रभु से जुड़ने का एकमात्र माध्यम और एकमात्र सेतु थी। अब, इस बिंदु पर, क्या तुम लोग यह महसूस नहीं करते कि अनुग्रह के युग में प्रभु यीशु द्वारा किए गए कार्य की प्रकृति और पद्धतियों और कार्य के वर्तमान चरण में अनेक समानताएँ हैं? कार्य का यह वर्तमान चरण भी परमेश्वर के स्वभाव को व्यक्त करने के लिए ढेर सारी मानवीय भाषा का उपयोग करता है, और यह स्वयं परमेश्वर की इच्छा व्यक्त करने के लिए मनुष्य के दैनिक जीवन और उसके ज्ञान में से ढेर सारी भाषा और पद्धतियों का प्रयोग करता है। जब परमेश्वर देह बन जाता है, तो फिर चाहे वह मानवीय परिप्रेक्ष्य से बात करे या दिव्य परिप्रेक्ष्य से, अभिव्यक्ति की उसकी ढेर सारी भाषा और पद्धतियाँ मनुष्य की भाषा और पद्धतियों के माध्यम से आती हैं। अर्थात्, जब परमेश्वर देह बनता है, तो यह तुम्हारे लिए परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता और बुद्धि को देखने और परमेश्वर के प्रत्येक सच्चे पहलू को जानने का बेहतरीन अवसर होता है। जब परमेश्वर देह बना, तो मानवता में बड़े होते हुए उसने मानवजाति के ज्ञान, सामान्य ज्ञान, भाषा और अभिव्यक्ति की पद्धतियों को समझा, सीखा और ग्रहण किया। देहधारी परमेश्वर में ये चीज़ें उन मनुष्यों से आई थीं, जिन्हें उसने सृजित किया था। वे देहधारी परमेश्वर के लिए अपने स्वभाव और दिव्यता को व्यक्त करने के साधन बन गए, जिससे वह मानवीय परिप्रेक्ष्य से और मानवीय भाषा के उपयोग द्वारा मानवजाति के बीच कार्य करते हुए अपने कार्य को अधिक प्रासंगिक, अधिक प्रामाणिक और अधिक सटीक बना पाया। इससे उसका कार्य लोगों के लिए अधिक सुगम और आसानी से समझने योग्य बन गया, और इस प्रकार उसने वे परिणाम प्राप्त किए, जो परमेश्वर चाहता था। क्या इस तरह देह में कार्य करना परमेश्वर के लिए अधिक व्यावहारिक नहीं है? क्या यह परमेश्वर की बुद्धि नहीं है? जब परमेश्वर देहधारी हुआ, और जब परमेश्वर का देह उस कार्य को सँभालने में सक्षम हुआ जिसे वह करना चाहता था, तो ऐसा तब हुआ जब वह व्यावहारिक रूप से अपने स्वभाव और अपने कार्य को व्यक्त कर सकता था, और यही वह समय भी था जब वह मनुष्य के पुत्र के रूप में आधिकारिक रूप से अपनी सेवकाई की शुरुआत कर सकता था। इसका मतलब था कि परमेश्वर और मनुष्यों के बीच अब कोई "पीढ़ी का अंतर" नहीं रहा था, कि परमेश्वर शीघ्र ही संदेशवाहकों के माध्यम से संवाद करने का अपना कार्य रोक देगा, और स्वयं परमेश्वर देह में वे सभी वचन और कार्य व्यक्तिगत रूप से व्यक्त कर सकेगा, जिन्हें वह व्यक्त करना चाहता है। इसका अर्थ यह भी था कि जिन लोगों को परमेश्वर बचाता है, वे उसके अधिक करीब थे, और उसके प्रबंधन-कार्य ने एक नए क्षेत्र में प्रवेश कर लिया था, और संपूर्ण मानवजाति का सामना एक नए युग से होने वाला था।

जिस किसी ने भी बाइबल पढ़ी है, वह जानता है कि जब प्रभु यीशु का जन्म हुआ था, तो बहुत-सी चीज़ें घटित हुई थीं। उन घटनाओं में से सबसे बड़ी थी शैतानों के राजा द्वारा उसका शिकार किया जाना, जो इतनी चरम घटना थी कि उस क्षेत्र के दो वर्ष या उससे कम उम्र के सभी बच्चों की हत्या कर दी गई थी। यह स्पष्ट है कि मनुष्यों के बीच देह धारण कर परमेश्वर ने बड़ा जोखिम उठाया था; और मानवजाति को बचाने के अपने प्रबंधन को पूरा करने के लिए उसने जो बड़ी कीमत चुकाई, वह भी स्पष्ट है। परमेश्वर द्वारा देह में मानवजाति के बीच किए गए अपने कार्य से रखी गई बड़ी आशाएँ भी स्पष्ट हैं। जब परमेश्वर का देह मानवजाति के बीच अपना कार्य करने में सक्षम हुआ, तो उसे कैसा लगा? लोगों को इसे थोड़ा-बहुत समझने में सक्षम होना चाहिए, है न? कम से कम, परमेश्वर प्रसन्न था, क्योंकि वह मानवजाति के बीच अपना नया कार्य आरंभ कर सकता था। जब प्रभु यीशु का बपतिस्मा हुआ और उसने आधिकारिक रूप से अपनी सेवकाई पूरी करने का अपना कार्य आरंभ किया, तो परमेश्वर का हृदय आनंद से अभिभूत हो गया, क्योंकि इतने वर्षों की प्रतीक्षा और तैयारी के बाद वह अंततः एक सामान्य मनुष्य की देह धारण कर सका था और मांस और रक्त से बने मनुष्य के रूप में, जिसे लोग देख और छू सकते थे, अपना नया कार्य आरंभ कर सका था। अंततः वह मनुष्य की पहचान के माध्यम से लोगों के साथ आमने-सामने और खुलकर बात कर सकता था। अंततः परमेश्वर मानवीय भाषा में, मानवीय तरीके से, मानवजाति के साथ रूबरू हो सकता था; वह मानवजाति का भरण-पोषण कर सकता था, उन्हें प्रबुद्ध कर सकता था, और मानवीय भाषा का उपयोग कर उनकी सहायता कर सकता था; वह उनके साथ एक ही मेज़ पर बैठकर भोजन कर सकता था और उसी जगह पर उनके साथ रह सकता था। वह मनुष्यों को देख भी सकता था, चीज़ों को देख सकता था, और हर चीज़ को उसी तरह से देख सकता था जैसे मनुष्य देखते हैं, और वह भी अपनी आँखों से। परमेश्वर के लिए, यह पहले से ही देह में अपने कार्य की उसकी पहली विजय थी। यह भी कहा जा सकता है कि यह एक महान कार्य की पूर्णता थी—निस्संदेह परमेश्वर इससे सबसे अधिक प्रसन्न था। तबसे परमेश्वर ने मानवजाति के बीच अपने कार्य में पहली बार एक प्रकार का सुकून महसूस किया। घटित होने वाली ये सभी घटनाएँ बहुत व्यावहारिक और स्वाभाविक थीं, और जो सुकून परमेश्वर ने महसूस किया, वह भी बहुत ही वास्तविक था। मानवजाति के लिए, हर बार जब भी परमेश्वर के कार्य का एक नया चरण पूरा होता है, और हर बार जब परमेश्वर संतुष्ट महसूस करता है, तो ऐसा तब होता है, जब मनुष्य परमेश्वर और उद्धार के निकट आ सकता है। परमेश्वर के लिए यह उसके नए कार्य की शुरुआत भी है, अपनी प्रबंधन-योजना में आगे बढ़ना भी है, और इसके अतिरिक्त, ये वे अवसर भी होते हैं, जब उसके इरादे पूर्णता की ओर अग्रसर होते हैं। मानवजाति के लिए, ऐसे अवसर का आगमन सौभाग्यशाली और बहुत अच्छा है; उन सबके लिए जो परमेश्वर के उद्धार की प्रतीक्षा करते हैं, यह सबसे महत्वपूर्ण और आनंदमय समाचार है। जब परमेश्वर कार्य का एक नया चरण कार्यान्वित करता है, तब वह एक नई शुरुआत करता है, और जब इस नए कार्य और नई शुरुआत का सूत्रपात और प्रस्तुति मानवजाति के बीच की जाती है, तो ऐसा तब होता है जब इस कार्य के चरण का परिणाम पहले से ही निर्धारित और पूरा कर लिया जाता है, और उसका अंतिम परिणाम और फल परमेश्वर द्वारा पहले ही देख लिया गया होता है। साथ ही, ऐसा तब होता है, जब ये परिणाम परमेश्वर को संतुष्टि महसूस कराते हैं, और निस्संदेह ऐसा तब होता है, जब उसका हृदय प्रसन्न होता है। परमेश्वर आश्वस्त महसूस करता है, क्योंकि अपनी नज़रों में उसने पहले ही उन लोगों को देख और निर्धारित कर लिया है जिनकी उसे तलाश है, और वह पहले ही इस समूह को प्राप्त कर चुका है, ऐसा समूह जो उसके कार्य को सफल करने और उसे संतुष्टि प्रदान करने में सक्षम है। इस प्रकार, वह अपनी चिंताएँ एक ओर रख देता है और प्रसन्नता महसूस करता है। दूसरे शब्दों में, जब परमेश्वर का देह मनुष्यों के बीच एक नया कार्य आरंभ करने में समर्थ होता है, और वह उस कार्य को बिना किसी बाधा के करना आरंभ कर देता है जो उसे करना चाहिए, और जब उसे महसूस होता है कि सब-कुछ पूरा किया जा चुका है, तो अंत उसकी नज़र में पहले से ही होता है। इस कारण से वह संतुष्ट होता है और उसका हृदय प्रसन्न होता है। परमेश्वर की प्रसन्नता किस प्रकार व्यक्त होती है? क्या तुम लोग सोच सकते हो कि इसका क्या उत्तर हो सकता है? क्या परमेश्वर रो सकता है? क्या परमेश्वर ताली बजा सकता है? क्या परमेश्वर नृत्य कर सकता है? क्या परमेश्वर गाना गा सकता है? यदि हाँ, तो वह कौन-सा गीत गाएगा? निस्संदेह परमेश्वर एक सुंदर और द्रवित कर देने वाला गीत गा सकता है, ऐसा गीत जो उसके हृदय के आनंद और प्रसन्नता को व्यक्त कर सकता हो। वह उसे मनुष्य के लिए गा सकता है, अपने लिए गा सकता है, और सभी चीज़ों के लिए गा सकता है। परमेश्वर की प्रसन्नता किसी भी तरीके से व्यक्त हो सकती है—यह सब सामान्य है, क्योंकि परमेश्वर के पास आनंद और दुःख हैं, और उसकी विभिन्न भावनाएँ विभिन्न तरीकों से व्यक्त हो सकती हैं। यह उसका अधिकार है, और इससे अधिक कुछ भी सामान्य और उचित नहीं हो सकता। लोगों को इस बारे में कुछ और नहीं सोचना चाहिए। तुम लोगों को परमेश्वर से यह कहते हुए कि उसे यह नहीं करना चाहिए या वह नहीं करना चाहिए, उसे इस तरह से कार्य नहीं करना चाहिए या उस तरह से कार्य नहीं करना चाहिए, परमेश्वर पर "वशीकरण मंत्र"[क] का उपयोग करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए, और इस प्रकार उसकी खुशी या कोई भी अन्य भावना सीमित नहीं करनी चाहिए। लोगों के विचार में परमेश्वर प्रसन्न नहीं हो सकता, आँसू नहीं बहा सकता, रो नहीं सकता—वह कोई मनोभाव व्यक्त नहीं कर सकता। इन दो संगतियों के दौरान हमने जो बातचीत की है, उससे मैं यह विश्वास करता हूँ कि तुम लोग परमेश्वर को अब इस तरह से नहीं देखोगे, बल्कि परमेश्वर को कुछ स्वतंत्रता और राहत लेने दोगे। यह एक बहुत अच्छी बात है। भविष्य में यदि तुम लोग परमेश्वर की उदासी के बारे में सुनकर सचमुच उसकी उदासी महसूस कर पाओ, और उसकी प्रसन्नता के बारे में सुनकर तुम लोग सचमुच उसकी प्रसन्नता महसूस कर पाओ, तो कम से कम तुम लोग स्पष्ट रूप से यह जानने और समझने में समर्थ होगे कि परमेश्वर को क्या चीज़ प्रसन्न करती है और क्या चीज़ उदास करती है। जब तुम परमेश्वर के उदास होने पर उदास महसूस कर पाओ और उसके प्रसन्न होने पर प्रसन्न महसूस कर पाओ, तो उसने तुम्हारे हृदय को पूरी तरह से प्राप्त कर लिया होगा और अब उसके और तुम्हारे बीच में कोई बाधा नहीं होगी। तुम परमेश्वर को अब मानवीय कल्पनाओं, धारणाओं और ज्ञान से विवश करने की कोशिश नहीं करोगे। उस समय परमेश्वर तुम्हारे हृदय में जीवित और जीवंत होगा। वह तुम्हारे जीवन का परमेश्वर होगा और तुम्हारी हर चीज़ का स्वामी होगा। क्या तुम लोगों की इस प्रकार की आकांक्षा है? क्या तुम आश्वस्त हो कि तुम इसे हासिल कर सकते हो?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III' से उद्धृत

फुटनोट :

क. "वशीकरण मंत्र" एक मंत्र है, जिसे भिक्षु तांग सानज़ैंग ने चीनी उपन्यास 'जर्नी टु द वेस्ट' (पश्चिम की यात्रा) में इस्तेमाल किया है। वह इस मंत्र का उपयोग सन वूकोंग (वानर राजा) को नियंत्रित करने के लिए उसके सिर के चारों ओर एक धातु का छल्ला कसकर करता है, जिससे उसे तेज सिरदर्द हो जाता है और वह काबू में आ जाता है। यह व्यक्ति को बाँधने वाली किसी चीज़ का वर्णन करने के लिए एक रूपक बन गया है।

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