प्रभु यीशु की फरीसियों को डाँट

29 मई, 2018

10. फरीसियों द्वारा यीशु की आलोचना

मरकुस 3:21-22 जब उसके कुटुम्बियों ने यह सुना, तो वे उसे पकड़ने के लिए निकले; क्योंकि वे कहते थे कि उसका चित ठिकाने नहीं है। शास्त्री भी जो यरूशलेम से आए थे, यह कहते थे, "उसमें शैतान है," और "वह दुष्टात्माओं के सरदार की सहायता से दुष्टात्माओं को निकालता है।"

11. प्रभु यीशु की फरीसियों को डाँट

मत्ती 12:31-32 इसलिये मैं तुम से कहता हूँ कि मनुष्य का सब प्रकार का पाप और निन्दा क्षमा की जाएगी, परन्तु पवित्र आत्मा की निन्दा क्षमा न की जाएगी। जो कोई मनुष्य के पुत्र के विरोध में कोई बात कहेगा, उसका यह अपराध क्षमा किया जाएगा, परन्तु जो कोई पवित्र आत्मा के विरोध में कुछ कहेगा, उसका अपराध न तो इस लोक में और न परलोक में क्षमा किया जाएगा।

मत्ती 23:13-15 हे कपटी शास्त्रियो और फरीसियो, तुम पर हाय! तुम मनुष्यों के लिए स्वर्ग के राज्य का द्वार बन्द करते हो, न तो स्वयं ही उसमें प्रवेश करते हो और न उस में प्रवेश करनेवालों को प्रवेश करने देते हो। हे कपटी शास्त्रियो और फरीसियो, तुम पर हाय! तुम विधवाओं के घरों को खा जाते हो, और दिखाने के लिए बड़ी देर तक प्रार्थना करते रहते हो: इसलिये तुम्हें अधिक दण्ड मिलेगा। हे कपटी शास्त्रियो और फरीसियो, तुम पर हाय! तुम एक जन को अपने मत में लाने के लिये सारे जल और थल में फिरते हो, और जब वह मत में आ जाता है तो उसे अपने से दूना नारकीय बना देते हो।

उपर्युक्त दो अंशों की विषयवस्तु अलग-अलग है। आओ, पहले हम पहले वाले अंश पर नज़र डालें : फरीसियों द्वारा यीशु की आलोचना।

बाइबल में फरीसियों द्वारा स्वयं यीशु और उसके द्वारा की गई चीज़ों का मूल्यांकन इस प्रकार था : "वे कहते थे, कि उसका चित्त ठिकाने नहीं है। ... उसमें शैतान है, और वह दुष्टात्माओं के सरदार की सहायता से दुष्टात्माओं को निकालता है" (मरकुस 3:21-22)। शास्त्रियों और फरीसियों द्वारा यीशु की आलोचना उनके द्वारा दूसरे लोगों के शब्दों को दोहराना भर नहीं था, न ही वह कोई निराधार अनुमान था—वह तो उनके द्वारा प्रभु यीशु के बारे में उसके कार्यों को देख-सुनकर निकाला गया निष्कर्ष था। यद्यपि उनका निष्कर्ष प्रकट रूप में न्याय के नाम पर निकाला गया था और लोगों को ऐसा दिखता था, मानो वह तथ्यों पर आधारित हो, किंतु जिस हेकड़ी के साथ उन्होंने प्रभु यीशु की आलोचना की थी, उस पर काबू रखना स्वयं उनके लिए भी कठिन था। प्रभु यीशु के प्रति उनकी घृणा की उन्मत्त ऊर्जा ने उनकी अपनी खतरनाक महत्वाकांक्षाओं और उनके दुष्ट शैतानी चेहरे, और साथ ही परमेश्वर का विरोध करने वाली उनकी द्वेषपूर्ण प्रकृति को भी उजागर कर दिया था। उनके द्वारा प्रभु यीशु की आलोचना करते हुए कही गई ये बातें उनकी जंगली महत्वाकांक्षाओं, ईर्ष्या, और परमेश्वर तथा सत्य के प्रति उनकी शत्रुता की कुरूप और द्वेषपूर्ण प्रकृति से प्रेरित थीं। उन्होंने प्रभु यीशु के कार्यों के स्रोत की खोज नहीं की, न ही उन्होंने उसके द्वारा कही या की गई चीज़ों के सार की खोज की। बल्कि उन्होंने उसके कार्य पर आँख मूँदकर, सनकभरे आवेश में और सोचे-समझे द्वेष के साथ आक्रमण किया और उसे बदनाम किया। वे यहाँ तक चले गए कि उसके आत्मा, अर्थात् पवित्र आत्मा, जो कि परमेश्वर का आत्मा है, को भी जानबूझकर बदनाम कर दिया। "उसका चित ठिकाने नहीं है," "शैतान" और "दुष्टात्माओं का सरदार" कहने से उनका यही आशय था। अर्थात्, उन्होंने कहा कि परमेश्वर का आत्मा शैतान और दुष्टात्माओं का सरदार है। उन्होंने देह का वस्त्र पहने परमेश्वर के देहधारी आत्मा के कार्य को पागलपन कहा। उन्होंने न केवल शैतान और दुष्टात्माओं का सरदार कहकर परमेश्वर के आत्मा की ईशनिंदा की, बल्कि परमेश्वर के कार्य की भी निंदा की और प्रभु यीशु मसीह पर दोष लगाया और उसकी ईशनिंदा की। उनके द्वारा परमेश्वर के प्रतिरोध और ईशनिंदा का सार पूरी तरह से शैतान और दुष्टात्माओं द्वारा किए गए परमेश्वर के प्रतिरोध और ईशनिंदा के समान था। वे केवल भ्रष्ट मनुष्यों का प्रतिनिधित्व ही नहीं करते थे, बल्कि इससे भी बढ़कर, वे शैतान के मूर्त रूप थे। वे मानवजाति के बीच शैतान के लिए एक माध्यम थे, और वे शैतान के सह-अपराधी और अनुचर थे। उनकी ईशनिंदा और उनके द्वारा प्रभु यीशु मसीह की अवमानना का सार हैसियत के लिए परमेश्वर के साथ उनका संघर्ष, परमेश्वर के साथ उनकी प्रतिस्पर्धा और उनके द्वारा परमेश्वर की कभी न खत्म होने वाली परीक्षा था। उनके द्वारा परमेश्वर के प्रतिरोध और उसके प्रति उनके शत्रुतापूर्ण रवैये के सार ने, और साथ ही उनके वचनों और उनके विचारों ने सीधे-सीधे परमेश्वर के आत्मा की ईशनिंदा की और उसे क्रोधित किया। इसलिए, जो कुछ उन्होंने कहा और किया था, उसके आधार पर परमेश्वर ने एक उचित न्याय का निर्धारण किया, और परमेश्वर ने उनके कर्मों को पवित्र आत्मा के विरुद्ध पाप ठहराया। यह पाप इस लोक और परलोक, दोनों में अक्षम्य है, जैसा कि पवित्रशास्त्र के निम्नलिखित अंश से प्रमाणित होता है : "मनुष्य द्वारा की गई पवित्र आत्मा की निंदा क्षमा न की जाएगी" और "जो कोई पवित्र आत्मा के विरोध में कुछ कहेगा, उसका अपराध न तो इस लोक में और न परलोक में क्षमा किया जाएगा।" आज, आओ हम परमेश्वर के इन वचनों के सच्चे अर्थ के बारे में बात करें : "उसका अपराध न तो इस लोक में और न परलोक में क्षमा किया जाएगा।" अर्थात्, आओ इस पर से रहस्य हटाएँ कि परमेश्वर किस प्रकार इन वचनों को पूरा करता है : "उसका अपराध न तो इस लोक में और न परलोक में क्षमा किया जाएगा।"

हमने जो कुछ भी बात की है, वह परमेश्वर के स्वभाव से, और लोगों, घटनाओं और चीज़ों के प्रति उसके रवैये से संबंधित है। स्वाभाविक रूप से, ऊपर दिए गए दो अंश भी इसके अपवाद नहीं हैं। क्या तुम लोगों ने पवित्रशास्त्र के इन दो अंशों में किसी चीज़ पर ध्यान दिया? कुछ लोग कहते हैं कि वे इनमें परमेश्वर का क्रोध देखते हैं। कुछ लोग कहते हैं कि वे इनमें परमेश्वर के स्वभाव के उस पक्ष को देखते हैं, जो मानवजाति से अपमान सहन नहीं कर सकता, और यदि लोग ऐसा कुछ करते हैं जिससे परमेश्वर की ईशनिंदा होती है, तो वे उसकी क्षमा प्राप्त नहीं करेंगे। इस तथ्य के बावजूद कि लोग इन दो अंशों में परमेश्वर का क्रोध और मानवजाति द्वारा किए जाने वाले अपमान के प्रति उसकी असहनशीलता देखते और महसूस करते हैं, वे वास्तव में उसके रवैये को नहीं समझते। इन दो अंशों में परमेश्वर की निंदा करने वाले और उसे क्रोध दिलाने वाले लोगों के प्रति उसके सच्चे रवैये और दृष्टिकोण के छिपे संदर्भ निहित हैं। उसका रवैया और दृष्टिकोण इस अंश के सच्चे अर्थ को प्रदर्शित करते हैं : "जो कोई पवित्र आत्मा के विरोध में कुछ कहेगा, उसका अपराध न तो इस लोक में और न परलोक में क्षमा किया जाएगा।" जब लोग परमेश्वर की ईशनिंदा करते हैं और जब वे उसे क्रोधित करते हैं, तो वह एक निर्णय जारी करता है, और यह निर्णय उसके द्वारा जारी किया गया एक परिणाम होता है। यह बाइबल में इस प्रकार से वर्णित है : "इसलिये मैं तुम से कहता हूँ कि मनुष्य का सब प्रकार का पाप और निन्दा क्षमा की जाएगी, परन्तु पवित्र आत्मा की निन्दा क्षमा न की जाएगी" (मत्ती 12:31), और "हे कपटी शास्त्रियो और फरीसियो, तुम पर हाय!" (मत्ती 23:13)। किंतु, क्या बाइबल में यह दर्ज है कि उन शास्त्रियों और फरीसियों का, और साथ ही उन लोगों का क्या परिणाम था, जिन्होंने प्रभु यीशु द्वारा ये चीज़ें कहे जाने के बाद कहा था कि वह पागल है? क्या यह दर्ज है कि उन्होंने किसी प्रकार का दंड सहा था? नहीं—यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है। यहाँ " नहीं" कने का यह अर्थ नहीं है कि उसमें ऐसा कुछ भी दर्ज नहीं है, बल्कि वास्तव में वह कोई ऐसा परिणाम नहीं था, जिसे मनुष्य की आँखों से देखा जा सकता हो। "यह दर्ज नहीं था" कहना कुछ चीज़ों को सँभालने के संबंध में परमेश्वर के रवैये और सिद्धांत को स्पष्ट करता है। जो लोग परमेश्वर की निंदा करते हैं या उसका प्रतिरोध करते हैं, यहाँ तक कि जो उसकी बदनामी करते हैं—वे लोग, जो जानबूझकर उस पर हमला करते हैं, उसे बदनाम करते हैं और उसे कोसते हैं—परमेश्वर उनकी ओर आँख या कान बंद नहीं कर लेता, बल्कि उनके प्रति उसका एक स्पष्ट रवैया होता है। वह इन लोगों से घृणा करता है और अपने हृदय में उनकी निंदा करता है। यहाँ तक कि वह यह भी खुलकर घोषित कर देता है कि उनका परिणाम क्या होगा, ताकि लोग जान जाएँ कि जो लोग उसकी निंदा करते हैं, उनके प्रति उसका एक स्पष्ट रवैया है, और ताकि वे जान जाएँ कि वह उनका परिणाम कैसे निर्धारित करेगा। हालाँकि, परमेश्वर के इन बातों को कहने के बाद, अभी भी लोग शायद ही उस सच्चाई को देख सकते हैं कि परमेश्वर किस प्रकार ऐसे लोगों को सँभालेगा, और वे परमेश्वर द्वारा उनके लिए जारी किए जाने वाले परिणाम और निर्णय के पीछे के सिद्धांतों को नहीं समझ सकते। अर्थात्, मानवजाति परमेश्वर द्वारा उन्हें सँभालने के विशेष रवैये और पद्धतियों को नहीं देख सकती। इसका संबंध चीज़ों को करने के परमेश्वर के सिद्धांतों से है। कुछ लोगों के दुष्ट व्यवहार से निपटने के लिए परमेश्वर तथ्यों के घटित होने का उपयोग करता है। अर्थात्, वह उनके पाप की घोषणा नहीं करता और उनके परिणाम निर्धारित नहीं करता, बल्कि उनका दंड और उचित प्रतिफल प्रदान करने के लिए वह सीधे तथ्यों के घटित होने का उपयोग करता है। जब ये तथ्य घटित होते हैं, तो लोगों की देह कष्ट भुगतती है; अर्थात् दंड ऐसा होता है, जिसे मनुष्य की आँखें देख सकती हैं। कुछ लोगों के दुष्ट व्यवहार से निपटते हुए परमेश्वर बस वचनों से शाप देता है और उसका क्रोध भी उनके ऊपर पड़ता है, किंतु उन्हें मिलने वाला दंड ऐसा हो सकता है, जिसे लोग देख नहीं सकते। फिर भी, इस प्रकार का परिणाम उन परिणामों से कहीं ज़्यादा गंभीर हो सकता है, जिन्हें लोग देख सकते हैं, जैसे कि दंडित किया जाना या मार दिया जाना। ऐसा इसलिए है, क्योंकि जिन परिस्थितियों में परमेश्वर ने इस प्रकार के व्यक्तियों को न बचाने या उन पर अब और दया अथवा सहनशीलता न दिखाने और उन्हें अब और अवसर न देने का निश्चय किया है, उनमें उनके प्रति उसका रवैया उन्हें अलग कर देने का होता है। "अलग कर देने" का यहाँ क्या अर्थ है? इन शब्दों का मूल अर्थ है "किसी चीज़ को एक तरफ रखना, उस पर अब और ध्यान न देना।" किंतु यहाँ, जब परमेश्वर "किसी को अलग कर देता है", तो इसके अर्थ की दो भिन्न-भिन्न व्याख्याएँ होती हैं : पहली व्याख्या है कि उसने उस व्यक्ति का जीवन और उसकी हर चीज़ शैतान को दे दी है, ताकि वह उसके साथ निपटे, और परमेश्वर अब उस व्यक्ति के लिए उत्तरदायी नहीं होगा और अब वह उसका प्रबंधन नहीं करेगा। चाहे वह व्यक्ति पागल या मूर्ख हो जाए, और चाहे जीवित रहे या मर जाए, या भले ही वह अपना दंड भोगने के लिए नरक में उतर जाए, इनमें से किसी का भी परमेश्वर से कोई लेना-देना नहीं होगा। इसका मतलब होगा कि इस तरह के प्राणी का सृष्टिकर्ता के साथ कोई संबंध नहीं होगा। दूसरी व्याख्या है कि परमेश्वर ने यह निर्धारित किया है कि वह स्वयं इस व्यक्ति के साथ, अपने ही हाथों से, कुछ करना चाहता है। संभव है, वह इस व्यक्ति की सेवा का उपयोग करे, या वह उसका एक विषमता के रूप में उपयोग करे। संभव है, इस प्रकार के व्यक्ति से निपटने के लिए उसके पास कोई विशेष तरीका हो, उसके साथ व्यवहार करने का कोई विशेष तरीका हो, उदाहरण के लिए, पौलुस के समान। यह परमेश्वर के हृदय का सिद्धांत और उसका रवैया है, जिससे उसने इस प्रकार के व्यक्ति से निपटना तय किया है। इसलिए जब लोग परमेश्वर का प्रतिरोध करते हैं, उसे बदनाम करते हैं और उसकी ईशनिंदा करते हैं, यदि वे उसके स्वभाव को भड़काते हैं, अथवा यदि वे परमेश्वर को उसकी सहनशीलता की सीमा से परे धकेल देते हैं, तो परिणाम अकल्पनीय होते हैं। सबसे गंभीर परिणाम यह होता है कि परमेश्वर हमेशा के लिए उनकी ज़िंदगी और उनकी हर चीज़ शैतान को सौंप देता है। उन्हें अनंत काल तक क्षमा नहीं किया जाएगा। इसका अर्थ है कि वह व्यक्ति शैतान के मुँह का निवाला, उसके हाथ का खिलौना बन गया है, और तब से परमेश्वर का उसके साथ कुछ लेना-देना नहीं है। क्या तुम लोग कल्पना कर सकते हो कि जब शैतान ने अय्यूब को प्रलोभन दिया था, तो यह किस प्रकार की दुर्गति थी? उस स्थिति में भी, जबकि शैतान को अय्यूब के जीवन को नुकसान पहुँचाने की अनुमति नहीं थी, अय्यूब ने बड़ी कठिन पीड़ा सही थी। और क्या उस विनाश की कल्पना करना और भी अधिक कठिन नहीं है, जिसे शैतान उस व्यक्ति पर ढाएगा, जिसे पूरी तरह से शैतान को सौंपा जा चुका है, जो पूरी तरह से शैतान के चंगुल में है, जिसने परमेश्वर की देखरेख और करुणा पूरी तरह से गँवा दी है, जो अब सृष्टिकर्ता के शासन के अधीन नहीं है, जिससे परमेश्वर की आराधना करने का अधिकार और परमेश्वर के शासन के अधीन एक प्राणी होने का अधिकार छीना जा चुका है और जिसका सृष्टि के प्रभु के साथ पूरे तरह से संबंध-विच्छेद कर दिया गया है? शैतान द्वारा अय्यूब की प्रताड़ना ऐसी ही थी, जिसे मनुष्य की आँखों से देखा जा सकता था, परंतु यदि परमेश्वर किसी व्यक्ति का जीवन शैतान को सौंप देता है, तो इसके परिणाम मनुष्य की कल्पना से परे होते हैं। उदाहरण के लिए, कुछ लोगों का गाय या गधे के रूप में पुनर्जन्म हो सकता है, जबकि कुछ लोगों पर अशुद्ध, दुष्ट आत्माओं द्वारा कब्जा किया जा सकता है, इत्यादि। ऐसे परिणाम होते हैं उन लोगों में से कुछ के, जिन्हें परमेश्वर द्वारा शैतान को सौंप दिया जाता है। बाहर से ऐसा दिखाई देता है, जैसे कि प्रभु यीशु का उपहास करने वाले, उसे बदनाम करने वाले, उसकी भर्त्सना करने वाले और उसकी ईशनिंदा करने वाले लोगों ने कोई परिणाम नहीं भुगता। किंतु सच्चाई यह है कि परमेश्वर का हर एक चीज़ से निपटने का एक दृष्टिकोण है। हो सकता है कि वह लोगों को यह बताने के लिए स्पष्ट भाषा का उपयोग न करे कि जिस प्रकार वह हर तरह के लोगों से निपटता है, उसका क्या परिणाम होता है। कभी-कभी वह सीधे बात नहीं करता, बल्कि सीधे कार्रवाई करता है। वह परिणाम के बारे में बात नहीं करता, इसका मतलब यह नहीं है कि कोई परिणाम ही नहीं है—वस्तुत:, ऐसे मामले में संभव है कि परिणाम बहुत ज़्यादा गंभीर हो। बाहर से ऐसा लग सकता है, मानो कुछ लोग ऐसे हैं, जिनसे परमेश्वर अपने रवैये के बारे में बात नहीं करता, लेकिन वास्तव में परमेश्वर ने लंबे समय तक उन पर कोई ध्यान देना नहीं चाहा है। वह उन्हें अब और देखना नहीं चाहता। उनके द्वारा की गई चीज़ों और उनके व्यवहार की वजह से, उनकी प्रकृति और उनके सार की वजह से परमेश्वर केवल उन्हें अपनी नज़रों से गायब देखना चाहता है, उन्हें सीधे शैतान को सौंप देना चाहता है, उनकी आत्मा, प्राण और शरीर शैतान को दे देना चाहता है, शैतान को उनके साथ जो चाहे वह करने देना चाहता है। यह स्पष्ट है कि परमेश्वर किस हद तक उनसे नफ़रत करता है, वह किस हद तक उनसे उकता गया है। यदि कोई व्यक्ति परमेश्वर को इस हद तक क्रोधित कर देता है कि परमेश्वर उन्हें दोबारा देखना तक नहीं चाहता और उन्हें पूर्णत: छोड़ देना चाहता है, इस हद तक क्रोधित कर देता है कि परमेश्वर स्वयं उससे निपटना भी नहीं चाहता—यदि वह उस स्थिति तक पहुँच जाता है कि परमेश्वर उसे उसके साथ जो चाहे वह करने और उसे मनचाहे तरीके से नियंत्रित करने, उसका मनचाहे तरीके से उपभोग करने और उसके साथ मनचाहा व्यवहार करने के लिए शैतान को सौंप देगा—तो ऐसा व्यक्ति पूरी तरह से समाप्त है। मनुष्य होने का उसका अधिकार स्थायी रूप से रद्द कर दिया गया है, और परमेश्वर की सृष्टि का एक प्राणी होने का उसका अधिकार समाप्त हो गया है। क्या यह सबसे गंभीर किस्म का दंड नहीं है?

उपर्युक्त सब इन वचनों की पूर्ण व्याख्या है : "उसका अपराध न तो इस लोक में और न परलोक में क्षमा किया जाएगा," और यह पवित्रशास्त्र के इन अंशों पर एक सरल टीका भी है। मेरा मानना है कि अब तुम सबको इसकी समझ है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III' से उद्धृत

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