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अंतिम दिनों में परमेश्वर के न्याय के कार्य को धार्मिक दुनिया द्वारा अस्वीकार कर दिए जाने का प्रभाव और परिणाम क्या है?

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5. अंतिम दिनों में परमेश्वर के न्याय के कार्य को धार्मिक दुनिया द्वारा अस्वीकार कर दिए जाने का प्रभाव और परिणाम

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

अंत के दिनों का मसीह जीवन लेकर आता है, और सत्य का स्थायी एवं अनन्त मार्ग प्रदान करता है। इसी सत्य के मार्ग के द्वारा मनुष्य जीवन को प्राप्त करेगा, और एक मात्र इसी मार्ग से मनुष्य परमेश्वर को जानेगा और परमेश्वर का अनुमोदन प्राप्त करेगा। यदि तुम अंत के दिनों के मसीह के द्वारा प्रदान किए गए जीवन के मार्ग को नहीं खोजते हो, तो तुम कभी भी यीशु के अनुमोदन को प्राप्त नहीं कर पाओगे और कभी भी स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने के योग्य नहीं बन पाओगे क्योंकि तुम इतिहास के कठपुतली और कैदी दोनों हो। जो लोग नियमों, लिखे गये पत्रों के नियंत्रण में हैं और इतिहास की ज़ंजीरों में जकड़े हुए हैं वे कभी भी जीवन को प्राप्त नहीं कर सकते हैं, और कभी भी सतत जीवन के मार्ग को प्राप्त करने के योग्य नहीं बन सकते हैं। क्योंकि सिंहासन से प्रवाहित होने वाले जीवन जल की अपेक्षा, उनके पास मैला पानी है जिससे वे हज़ारों सालों से चिपके हुए हैं। जिनके पास जीवन का जल नहीं है वे हमेशा के लिए एक लाश, शैतान के खेलने की वस्तु और नरक की संतान बने रहेंगे। फिर वे परमेश्वर को कैसे देख सकते हैं? यदि तुम केवल अतीत को पकड़े रहने की कोशिश करोगे, केवल ठहरी हुई चीज़ों को पकड़ने की कोशिश में लगे रहोगे, और यथास्थिति को बदलने और इतिहास को तिलांजलि देने की कोशिश नहीं करोगे, तो क्या तुम हमेशा परमेश्वर के विरोध में नहीं रहोगे? परमेश्वर के कार्य के चरण बहुत ही विशाल और सामर्थी हैं, जैसे कि हिलोरे मारती हुई लहरें और गरजता हुआ तूफान—फिर भी तुम बैठकर निष्क्रियता से विनाश का इंतजार करते हो, अपनी ही मूर्खता से चिपके रहते हो और कुछ भी नहीं करते। इस प्रकार से, तुम्हें मेमने का अनुसरण करने वाले के रूप में कैसे देखा जा सकता है? और तुम जिस परमेश्वर पर निर्भर रहते हो उसे उस परमेश्वर के रूप में न्यायोचित कैसे ठहरा सकते हो जो हमेशा नया है और कभी पुराना नहीं होता? तुम्हारी पीली पड़ चुकी किताब के वचन तुम्हें नए युग में कैसे ले जा सकते हैं? वे कैसे तुम्हें परमेश्वर के चरणबद्ध तरीके से चलने वाले कार्यों तक लेकर जायेंगे? वे तुम्हें कैसे स्वर्ग लेकर जायेंगे? तुम्हारे हाथों में जो पत्र हैं वे तुम्हें केवल अस्थायी सांत्वना ही दे सकते हैं, वह सत्य नहीं दे सकते जो जीवन देने में सक्षम है। जो शास्त्र तुम पढ़ते हो वे तुम्हारी जिव्हा को सम्पन्न बना सकते हैं लेकिन ये वे विवेकपूर्ण वचन नहीं हैं जो तुम्हें मानव जीवन का बोध करने में मदद कर सकते हैं, ये वह मार्ग तो बिल्कुल ही नहीं हैं जो तुम्हें पूर्णता की ओर ले जायें। क्या यह भिन्नता तुम्हें विचार-मंथन का कारण नहीं देती? क्या यह तुम्हें अपने भीतर समाहित रहस्यों को समझने के लिए अनुमति नहीं देता है? क्या तुम अपने आप को परमेश्वर से मिलने के लिए स्वर्ग में ले जाने के योग्य हो? परमेश्वर के आये बिना, क्या तुम अपने आप को परमेश्वर के साथ पारिवारिक आनन्द मनाने के लिए स्वर्ग में ले जा सकते हो? क्या तुम अभी भी स्वप्न देख रहे हो? मैं तुम्हें सुझाव देता हूँ, कि तुम स्वप्न देखना बंद कर दो, और उसकी ओर देखो जो अभी कार्य कर रहा है, उसकी ओर जो अंत के दिनों में मनुष्यों को बचाने के लिए कार्य कर रहा है। यदि तुम ऐसा नहीं करते हो, तो तुम कभी भी सत्य को नहीं प्राप्त कर सकते, और कभी भी जीवन प्राप्त नहीं कर सकते हो।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "केवल अंतिम दिनों का मसीह ही मनुष्य को अनन्त जीवन का मार्ग दे सकता है" से उद्धृत

जो मसीह के द्वारा कहे गए सत्य पर भरोसा किए बिना जीवन प्राप्त करने की अभिलाषा करते हैं, वे पृथ्वी पर सबसे हास्यास्पद मनुष्य हैं और जो मसीह के द्वारा लाए गए जीवन के मार्ग को स्वीकार नहीं करते हैं वे कल्पना में ही खोए हुए हैं। इसलिए मैं यह कहता हूँ कि लोग जो अंत के दिनों में मसीह को स्वीकार नहीं करते हैं वे हमेशा के लिए परमेश्वर के द्वारा तुच्छ समझे जाएंगे। अंत के दिनों में मसीह मनुष्यों के लिए परमेश्वर के राज्य में प्रवेश करने का माध्यम है, जिसकी अवहेलना कोई भी नहीं कर सकता। मसीह के माध्यम बिना कोई भी परमेश्वर के द्वारा पूर्णता को प्राप्त नहीं कर सकता। परमेश्वर में तुम्हारा विश्वास है, और इसलिए तुम उसके वचनों को स्वीकार करो और उसके मार्ग का पालन करो। बिना सत्य को प्राप्त किए या बिना जीवन के प्रावधान को स्वीकार किए तुमको सिर्फ़ अनुग्रह प्राप्त करने के बारे में सोचना नहीं है। मसीह अंत के दिनों में आता है ताकि वे सभी जो सच्चाई से उस पर विश्वास करते हैं उन्हें जीवन प्रदान किया जाए। उसका कार्य पुराने युग को समाप्त करने और नए युग में प्रवेश करने के लिए है और यही वह मार्ग है जिसे नए युग में प्रवेश करने वालों को अपनाना चाहिए। यदि तुम उसे पहचानने में असमर्थ हो, और उसकी भर्त्सना करते हो, निंदा करते हो और यहां तक कि उसे पीड़ा पहुंचाते हो, तो तुम अनन्त समय तक जलाए जाते रहने के लिए निर्धारित कर दिये गए हो और तुम कभी भी परमेश्वर के राज्य में प्रवेश नहीं कर पाओगे। इसी कारण से मसीह ही स्वयं पवित्र आत्मा और परमेश्वर की अभिव्यक्ति है, जिसे परमेश्वर ने पृथ्वी पर अपना कार्य सौंपा है। इसलिए मैं कहता हूँ कि अंत के दिनों में जो मसीह के द्वारा कार्य किया गया है उसे तुम स्वीकार नहीं करते हो तो तुम पवित्र आत्मा की निंदा करते हो। और उसका प्रतिकार पवित्र आत्मा की निंदा करने वालों को सहना होगा वह सभी के लिए स्वत:-स्पष्ट है। मैं यह भी कहता हूँ कि यदि तुम अंत के दिनों में मसीह का विरोध करोगे और उसे नकारोगे, तो ऐसा कोई भी नहीं है जो तुम्हारे लिए इसका नतीजा भुगत ले। इसके अलावा, आज के बाद से फिर कभी तुम्हें परमेश्वर का अनुमोदन प्राप्त करने का अवसर नहीं मिलेगा; यदि तुम अपने उद्धार की कोशिश भी करते हो, तो तुम कभी भी परमेश्वर का चेहरा नहीं देख पाओगे। क्योंकि तुम जिसका विरोध करते हो वह मनुष्य नहीं है, जिसको नकार रहे हो वह नन्हा-सा प्राणी नहीं है, बल्कि मसीह है। क्या तुम परिणामों के बारे में जानते हो? तुमने कोई छोटी-मोटी गलती नहीं की है, बल्कि एक बहुत ही जघन्य अपराध किया है। इसलिए मैं प्रत्येक को सलाह देता हूं कि सत्य के सामने अपने ज़हरीले दांत मत दिखाओ, या लापरवाही से आलोचना मत करो, क्योंकि केवल सत्य ही तुमको जीवन दिला सकता है और सत्य के अलावा कुछ भी तुमको नया जन्म देने के लिए या परमेश्वर का चेहरा देखने के लिए अनुमति नहीं दे सकता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "केवल अंतिम दिनों का मसीह ही मनुष्य को अनन्त जीवन का मार्ग दे सकता है" से उद्धृत

कई लोगों को परमेश्वर के दूसरे देहधारण के बारे में बुरी अनुभूति है, क्योंकि मनुष्य को यह बात स्वीकार करने में कठिनाई होती है कि न्याय का कार्य करने के लिए परमेश्वर देह बन जाएगा। तथापि, मैं तुम्हें अवश्य बता दूँ कि प्रायः परमेश्वर का कार्य मनुष्य की अपेक्षाओं से बहुत अधिक होता है और मनुष्य के मन इसे स्वीकार करने में कठिनाई महसूस करते हैं। क्योंकि मनुष्य पृथ्वी पर मात्र कीड़े-मकौड़े हैं, जबकि परमेश्वर सर्वोच्च है जो सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में समाया हुआ है; मनुष्य का मन गंदे पानी से भरे हुए एक गड्डे के सदृश है जो केवल कीड़े-मकोड़ों को ही उत्पन्न करता है, जबकि परमेश्वर के विचारों द्वारा निर्देशित कार्य का प्रत्येक चरण परमेश्वर की बुद्धि का ही आसवन है। मनुष्य निरंतर परमेश्वर के साथ झगड़ा करता रहता है, जिसके लिए मैं कहता हूँ कि यह स्वतः-प्रमाणित है कि कौन अंत में नुकसान सहेगा। मैं तुम सभी लोगों को प्रोत्साहित करता हूँ कि तुम लोग अपने आप को स्वर्ण की अपेक्षा अधिक महत्वपूर्ण मत समझो। यदि अन्य लोग परमेश्वर के न्याय को स्वीकार कर सकते हैं, तो तुम क्यों नहीं स्वीकार कर सकते हो? तुम दूसरों की अपेक्षा कितने ऊँचे खड़े हो? यदि दूसरे लोग सत्य के आगे अपने सिर झुका सकते हैं, तो तुम भी ऐसा क्यों नहीं कर सकते हो? परमेश्वर के कार्य का संवेग अविरल है। वह तुम्हारे द्वारा दिए गये "सहयोग" के वास्ते न्याय के कार्य को फिर से नहीं दोहराएगा, और तुम इतने अच्छे अवसर को चूकने पर असीम पछतावे से भर जाओगे। यदि तुम्हें मेरे वचनों पर विश्वास नहीं है, तो बस आकाश में उस महान श्वेत सिंहासन द्वारा तुम पर "न्याय पारित करने" की प्रतीक्षा करो! तुम्हें अवश्य पता होना चाहिए कि सभी इस्राएलियों ने यीशु को ठुकराया और अस्वीकार किया था, मगर यीशु द्वारा मानवजाति के छुटकारे का तथ्य अभी भी ब्रह्माण्ड के सिरे तक फैल रहा है। क्या यह एक वास्तविकता नहीं है जिसे परमेश्वर ने बहुत पहले बनाया? यदि तुम अभी भी यीशु के द्वारा स्वर्ग में उठाए जाने का इंतज़ार कर रहे हो, तो मैं कहता हूँ कि तुम एक ज़िद्दी अवांछित व्यक्ति हो।[क] यीशु तुम जैसे किसी भी झूठे व्यक्ति विश्वासी को स्वीकृत नहीं करेगा जो सत्य के प्रति निष्ठाहीन है और केवल आशीषों की ही माँग करता है। इसके विपरीत, वह तुम्हें दस हज़ार वर्षों तक जलने देने के लिए आग की झील में फेंकने में कोई दया नहीं दिखाएगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "मसीह न्याय का कार्य सत्य के साथ करता है" से उद्धृत

परमेश्वर अधिक लोगों को सज़ा नहीं देना चाहता है, बल्कि इसके बजाय आशा करता है कि वह अधिक लोगों को बचाये, और अधिक लोग उसके साथ कदम से कदम मिलाएँ और स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करें। लेकिन अगर लोग अपनी ग़लतियों को पहचान नहीं सकें, विनम्र हृदय से सत्य को स्वीकार नहीं कर सकें, बल्कि इसके बजाय मीन-मेख निकालें, गलतियाँ निकालने का प्रयास करें और समझने का बहाना बनाएँ जबकि जानते न हों, तो ये ऐसे लोग होंगे जो अंत में तबाह हो जाएँगे। परमेश्वर का कार्य किसी का इंतज़ार नहीं करता है। उसके द्वारा उद्धार कोई तुच्छ वस्तु नहीं है, जो बेतरतीब ढंग से किसी पर भी फेंक दी जाये। बल्कि यह उद्देश्य के साथ और पसंद के अनुसार लक्षित होता है, अगर तुम इसे सँजोना नहीं जानते हो, तो तुम्हार लिए केवल परमेश्वर का धार्मिक न्याय और दण्ड प्रतीक्षा कर रहा होगा। परमेश्वर सभी के साथ धार्मिकता का व्यवहार करता है; तुम्हारी उम्र चाहे जो हो, तुम कितने भी वरिष्ठ क्यों न हो, या तुमने चाहे कितने ही दुःख क्यों न उठाए हों, इन सब के बावज़ूद परमेश्वर का धार्मिक स्वभाव कभी नहीं बदलता है। परमेश्वर न तो किसी के साथ ज़्यादा सम्मान से पेश आता है, न किसी के साथ पक्षपात करता है। लोगों के प्रति उसका रवैया इस बात पर निर्भर करता है कि वे हर चीज़ का त्याग करके, सत्य को और उसके नये कार्य को स्वीकार करते हैं या नहीं। अगर तुम परमेश्वर के नये कार्य को और उसके द्वारा व्यक्त किए जाने वाले सत्य को स्वीकार कर सकते हो, तो तुम उसके उद्धार को पाने में समर्थ होगे। अगर तुम्हें अपने अनुभवी होने का घमण्ड है, और तुम अपनी वरिष्ठता की अकड़ दिखाते हुए परमेश्वर के सामने शर्तें रखते हैं, तो तुम्हें परमेश्वर द्वारा उद्धार से वंचित कर दिया जायेगा। ठीक यहूदियों की तरह, जो ईसा मसीह को स्वीकार नहीं कर सके किन्तु किसी मसीहा के आने का इंतज़ार करते रहे, अंत में उन पर जो पड़ा वह परमेश्वर का शाप और क्रोध था; यह एक ऐसा तथ्य है जिसे हर कोई देख सकता है। ...

... फ़रीसियों के ज्ञान और दिखावटी व्यवहार ने ईसा मसीह के साथ उनके रिश्तों की रक्षा नहीं की। इसके विपरीत, इससे उन्हें नुकसान ही हुआ, और यह उनका ज्ञान और धारणाएँ और साथ-साथ उनके हृदय में परमेश्वर की छवि था जिसने उन्हें प्रभु यीशु की निंदा करने के लिये उकसाया। यह उनकी कल्पनाएँ और मन ही था जिसने उन्हें भटकाया, उनसे वह सब करवाया जो वे प्रमाण पाने के लिए और प्रभु यीशु की निंदा करने हेतु आधार पाने के लिए कर सकते थे, उनकी आध्यात्मिक आँखों पर पर्दा डाल दिया, जिसके कारण वे लोग उस मसीहा को नहीं पहचान पाये जो पहले ही आ चुका था। यह उनका कुरूप चेहरा है—वर्तमान में परमेश्वर के वास्तविक कार्य की निंदा करने के लिये परमेश्वर के मौलिक कार्य को कायम रखने का बहाना बनाना। बेशक, यह ऐसी ग़लती है जो किसी भी युग में किए जाने की संभावना है—जिस सत्य के बारे में उन्होंने कभी नहीं सुना, उसे मापने और उसकी निंदा करने के लिये पुराने सिद्धांतों और नियमों का बहाना बनाना, यह सोचना कि वे सत्य के मार्ग का अनुसरण कर रहे हैं और परमेश्वर के सामने अपनी शुद्धता को बनाये हुए हैं, कि वे परमेश्वर के वफ़ादार बने हुए हैं। लेकिन तथ्य क्या हैं? परमेश्वर निरंतर अपना नया कार्य कर रहा है, अपना प्रबंधन कार्य जारी रखे हुए है, सदा नया रहता है, कभी पुराना नहीं पड़ता है। और लोगों का क्या है? वे अप्रचलित चीज़ों को कस कर जकड़े रहते हैं जिन्हें वे परमेश्वर की अभिव्यक्तियों की समग्रता मानते हैं, अपनी पीठ थपथपाते रहते हैं, अहंकार से फूल कर कुप्पा रहते हैं, इस प्रवृत्ति के साथ इंतज़ार करते हैं कि परमेश्वर उन्हें पुरस्कार देगा जो यह मानती है कि परमेश्वर उन्हें कभी नहीं नकारेगा, कभी उनसे दुर्व्यवहार नहीं करेगा। और परिणाम क्या होता है? परमेश्वर का कार्य अबाधित रूप से चलता रहता है, नये युग के अधिकाधिक लोग परमेश्वर का अनुसरण करते हैं, उसके नये कार्य को स्वीकार करते हैं, जबकि परमेश्वर के हाथों पुरस्कार पाने के इंतज़ार में बैठे लोग परमेश्वर के नये कार्य द्वारा हटा दिये जाते हैं, बल्कि और भी ज़्यादा लोग परमेश्वर के दण्ड के भागी बन जाते हैं। जिस पल उनका दण्ड शुरू होता है, परमेश्वर में विश्वास रखने वाला उनका जीवन पूरा हो जाता है, उनके अंत और उनकी मंज़िल का ख़ात्मा हो जाता है। यह कुछ ऐसा है जिसे कोई नहीं देखना चाहता है, लेकिन यह अनजाने में ही हमारी आँखों के सामने ऐसा होता है। तो, क्या यह परमेश्वर के निर्दयी होने की वजह से है, या क्या लोगों की खोज में दोष है? क्या यह सही नहीं होगा कि मनुष्यजाति स्वयं अपने आप की पूरी तरह से जाँचे-परख करे?

— सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर के विरोध हेतु दण्‍ड के विशिष्ट उदाहरण के अंतभाषण से उद्धृत

फुटनोट:

क. ए पीस ऑफ़ डेडवुड: एक चीनी मुहावरा, जिसका अर्थ है—"सहायता से परे"।

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