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परमेश्वर मानवजाति के लिए माँस, जल संसाधन और औषधीय पौधे तैयार करता है

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अनाज, फल और सब्जियाँ, सभी प्रकार के कड़े छिलके वाले फल सभी शाकाहारी भोजन हैं। यद्यपि वे शाकाहारी भोजन हैं, फिर भी उनके पास मानव शरीर की आवश्यकताओं को सन्तुष्ट करने के लिए पर्याप्त पोषक तत्व हैं। फिर भी, परमेश्वर ने नहीं कहाः "मनुष्य कोइन चीज़ों को देना पर्याप्त है। मानवजाति बस इन चीज़ों को ही खा सकता है।" परमेश्वर वहाँ नहीं रूका और उसके बजाए उसने ऐसी चीज़ों को तैयार किया जो मानवजाति को और भी अधिक स्वादिष्ट लगते थे। ये चीज़ें कौन सी हैं? ये विभिन्न किस्मों के माँस और मछलियाँ हैं जिन्हें तुम लोग अपने भोजन की मेज पर देखना चाहते हो और प्रतिदिन खाना चाहते हो। साथ ही अनेक किस्मों के माँस और मछलियाँ हैं। सारी मछलियाँ जल में रहती हैं, उनके माँस का स्वाद उनसे भिन्न है जिन्हें भूमि पर पाला जाता है और वे मानवजाति को अलग अलग पोषक तत्व प्रदान कर सकती हैं। मछलियों के गुण मानव शरीर की ठण्डक एवं गर्मी के साथ भी व्यवस्थित हो सकते हैं, अतः वे मानवजाति के लिए बहुत ही हितकारी हैं। परन्तु जो स्वादिष्ट लगता है उसे बहुतायत से प्राप्त नहीं किया जा सकता है। अभी भी वही कहावत हैः परमेश्वर मानवजाति को सही समय पर सही मात्रा देता है, ताकि लोग सामान्य और उचित रीति से इन चीज़ों का मौसम एवं समय के अनुरूप आनन्द उठा सकें। मुर्गी पालन में क्या शामिल है? मुर्गी, बटेर, कबूतर इत्यादि। बहुत से लोग बत्तक और कलहंस भी खाते हैं। यद्यपि परमेश्वर ने तैयारियाँ की हैं, अपने चुने हुए लोगों के लिए, फिर भी परमेश्वर के पास मांगें हैं और उसने अनुग्रह के युग में एक निश्चित दायरा निर्धारित किया है। अब यह दायरा व्यक्तिगत स्वाद और व्यक्तिगत समझ पर आधारित है। ये विभिन्न किस्मों के मांस मानवजाति को अलग अलग पोषक तत्व प्रदान करते हैं, जो प्रोटीन एवं आइरन की दुबारा पूर्ति करते हैं, लहू को समृद्ध करते हैं, मांस पेशियों एवं हड्डियों को बलवंत करते हैं और अधिक ऊर्जा प्रदान करते हैं। इसके बावजूद कि उन्हें पकाने एवं खाने के लिए लोग कौन कौन से तरीकों का उपयोग करते हैं, संक्षेप में, एक ओर ये चीज़ें स्वाद एवं भूख को बढ़ाने के लिए लोगों की सहायता कर सकते हैं, और दूसरी ओर उनके पेट को सन्तुष्ट कर सकते हैं। सबसे महत्वपूर्ण चीज़ तो यह है कि वे मानव शरीर के लिए दैनिक पोषक तत्वों की उनकी जरूरत को प्रदान कर सकते हैं। ये वे विचार हैं जो परमेश्वर के पास थे जब उसने मानवजाति के लिए भोजन बनाया था। मांस के साथ ही साथ शाकाहारी भोजन भी है—क्या यह समृद्ध एव भरपूर नहीं है? (हाँ।) परन्तु लोगों को समझना चाहिए कि परमेश्वर के मूल इरादे क्या थे जब उसने मानवजाति के लिए सभी भोजन वस्तुओं को बनाया था। क्या यह मानवजाति को अनुमति देने के लिए था कि वह लालच से इन भौतिक भोजन वस्तुओं का आनन्द उठाए? क्या होता यदि लोग अपनी भौतिक इच्छा को सन्तुष्ट करने में लिप्त हो जाते? क्या वे बहुत अधिक मोटे ताजे नहीं हो जाते? क्या अति पोषण मानव शरीर के लिए सब प्रकार की बीमारियाँ लेकर नहीं आता? परमेश्वर के द्वारा बनाए कुदरत के नियमों को धोखा देना निश्चित तौर पर अच्छा नहीं है, इसीलिए परमेश्वर सही समय पर सही मात्रा को बाँटता है और उसने लोगों को विभिन्न समयाविधि एवं मौसम के अनुरूप अलग अलग भोजन का आनन्द उठाने की अनुमति दी है। यह सबसे अच्छा तरीका है। उदाहरण के लिए, बहुत ही गर्म ग्रीष्म ऋतु में रहने के बाद, लोग अपने शरीर में थोड़ी बहुत गर्मी, रोग सम्बन्धी सूखापन या नमी जमाकर लेते हैं। जब शरद ऋतु आती है, बहुत सारे फल पक जाते हैं, और जब लोग कुछ फलों को खाते हैं तो उनका सूखापन चला जाएगा। उसी समय, पशु एवं भेड़ें हृष्ट पुष्ठ हो जाएँगे, अतः लोगों को पोषण के लिए कुछ मांस खाना चाहिए। विभिन्न किस्मों के मांस खाने के बाद, लोगों के शरीर में शीत ऋतु की ठण्ड का सामना करने हेतु सहायता के लिए ऊर्जा और गर्मी होगी, और उसके परिणामस्वरूपः वे शीत ऋतु की ठण्ड से शांतिपूर्वक गुज़रने के योग्य होंगे। मानवजाति के लिए कौन से समय में कौन सी चीज़ को तैयार करना है, और कौन से समय में कौन सी चीज़ों को उगने, फलवंत होने और पकने की अनुमति देना है—इन सबको परमेश्वर के द्वारा नियन्त्रित किया गया है और इन सबका प्रबन्ध बहुत पहले ही परमेश्वर के द्वारा किया गया था, और वह भी बहुत नाप नाप कर। यह मात्र ऐसा है कि मानवजाति परमेश्वर की इच्छा को नहीं समझता है। यह उस शीर्षक "परमेश्वर किस प्रकार मनुष्य के दैनिक जीवन के लिए आवश्यक भोजन तैयार करता है" के विषय में है।

हर प्रकार के भोजन के अलावा, परमेश्वर मानवजाति को जल के स्रोतों की आपूर्ति भी करता है। लोगों को भोजन के बाद कुछ मात्रा में जल पीना पड़ता है। क्या मात्र फल खाना काफी है? लोग यदि केवल फल ही खाते हैं तो वे खड़े होने के योग्य नहीं होंगे, और इसके अतिरिक्त, कुछ मौसम में कोई फल नहीं होते हैं। अतः मानवजाति की पानी की समस्या का समाधान कैसे किया जा सकता है? परमेश्वर के द्वारा भूमि के ऊपर और भूमि के नीचे जल के अनेक स्रोतों को तैयार करने के बाद, जिसमें झीलें, नदियाँ और सोते भी शामिल हैं। जल के इन स्रोतों से ऐसी स्थितियों में पीया जा सकता है जहाँ कोई अपमिश्रण, या मानव प्रक्रिया सै फैली गन्दगी या क्षति नहीं है। मानवजाति की शारीरिक देहों के जीवन के लिए भोजन के स्रोतों के सम्बन्ध में, परमेश्वर ने बिल्कुल सही, बिल्कुल सटीक और बिल्कुल उपयुक्त तैयारियाँ की हैं, ताकि लोगों के जीवन समृद्ध और भरपूर हो जाएँ और उन्हें किसी बात की घटी न हो। यह कुछ ऐसा है जिसे लोग महसूस कर सकते हैं और देख सकते हैं। इसके अतिरिक्त, सभी चीज़ों में, चाहे वह पशु एवं पौधे हों, या सब प्रकार की घास हो, परमेश्वर ने कुछ पौधों को भी बनाया था जो मानव शरीर की क्षति या बीमारी का समाधान करने के लिए जरूरी हैं। उदाहरण के लिए, यदि तुम जल जाते हो तो तुम क्या करते हो? क्या तुम इसे पानी से धो सकते हो? क्या तुम बस कहीं से कपड़े का एक टुकड़ा पा सकते हो और इसे लपेट सकते हो? हो सकता है कि यह मवाद से भर गया हो या उस तरह से संक्रमित हो गया हो। उदाहरण के लिए, तुम क्या करते हो, यदि तुम आग की लपट या गर्म पानी के द्वारा अचानक झुलस जाते हो? क्या तुम उसे पानी के द्वारा बहा सकते हो? उदाहरण के लिए, यदि तुम्हें बुखार हो जाता है, सर्दी हो जाती है, किसी शारीरिक श्रम से चोट लग जाती है, ग़लत चीज़ें खाने के द्वारा पेट की बीमारी हो जाती है, या जीवन शैली या भावनात्मक मामलों के कारण कुछ बीमारियाँ पनपने लग जाती हैं, जैसे वाहक नलियों से सम्बन्धित बीमारियाँ, मनोवैज्ञानिक दशाएँ या अन्दरूनी अंगों की बीमारियाँ—उन सब का इलाज करने के लिए उनके अनुरूप कुछ पौधे होते हैं। ये वे पौधे हैं जो रूकावट को दूर करलहू के बहतरीन बहाव के लिए, दर्द में राहत के लिए, लहू के बहाव को रोकने के लिए, शरीर के किसी अंग को चेतना शून्य करने के लिए, सामान्य त्वचा पुनः प्राप्त करने में लोगों की सहायता के लिए, शरीर में लहू के रूकावट को दूर करने के लिए और शरीर के विष को निकालने के लिए रक्त के प्रवाह को बढ़ाते हैं। संक्षेप में, इन सभी को दैनिक जीवन में इस्तेमाल किया जा सकता है। वे लोगों के लिए उपयोगी हैं और उन्हें मानव शरीर हेतु आवश्यकता के समय के लिए परमेश्वर के द्वारा बनाया गया है। इनमें से कुछ को परमेश्वर के द्वारा अनुमति दी गई है कि उन्हें मनुष्य के द्वारा अनजाने में खोज लिया जाए, जबकि अन्य को किसी विशेष प्राकृतिक घटना से या परमेश्वर के द्वारा तैयार किए गए कुछ लोगों के द्वारा खोजा गया था। अपने खोज का अनुसरण करते हुए, मनुष्य उन्हें आनेवाली पीढ़ियों को सौंपता जाएगा, और बहुत से लोग उनके बारे में जान पाएँगे। इस तरह, परमेश्वर के द्वारा इन पौधों की सृष्टि का मूल्य और अर्थ है। संक्षेप में, ये सभी चीज़ें परमेश्वर की ओर से हैं और उन्हें उस समय तैयार किया गया और रोपा गया था जब उसने मानवजाति के लिए एक सजीव वातावरण बनाया था। ये सभी चीज़ें बहुत ही जरूरी हैं। क्या यह नहीं दिखाता है कि जब परमेश्वर ने आकाश एवं पृथ्वी और सभी चीज़ों को बनाया था, उसके विचार मानवजाति की अपेक्षा बेहतर थे। जब तुम वह सब कुछ देखते हो जिन्हें परमेश्वर ने बनाया है, तो क्या तुम परमेश्वर के कार्य के व्यावहारिक पक्ष को महसूस कर सकते हो? परमेश्वर ने गुप्त में कार्य किया था। जब मनुष्य इस पृथ्वी पर आया ही नहीं था, अर्थात् इस मानवजाति के सम्पर्क में आने से पहले ही, परमेश्वर ने इन सब को बना लिया था। जो कुछ भी उसने किया था वह मानवजाति के लिए था, उनके जीवित रहने के लिए और मानवजाति के अस्तित्व के विचार के लिए था, ताकि मानवजाति इस समृद्ध और भरपूर भौतिक संसार में रह सके जिसे परमेश्वर ने उनके लिए बनाया था, और जिससे वे प्रसन्नता से जी सकें, उन्हें भोजन एवं वस्त्रों की चिन्ता न करना पड़े, और उन्हें किसी बात की कोई घटी न हो। मानवजाति ऐसे वातावरण में निरन्तर सन्तान उत्पन्न करता है और जीवित रहता है, किन्तु बहुत से लोग इसे समझ नहीं सकते हैं कि परमेश्वर ने मानवजाति के लिए सभी चीज़ों को बनाया था। उसके बजाए, शैतान ने ऐसा दिखाया कि यह प्रकृति के द्वारा सृजा गया है।

"वचन देह में प्रकट होता है से आगे जारी" से