परमेश्वर द्वारा विभिन्न युगों के दौरान उपयोग में लाये गए लोगों के सत्य से मेल खाने वाले शब्दों, और परमेश्वर के वचनों में क्या अंतर है?

18 मार्च, 2018

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

सत्य जीवन की सर्वाधिक वास्तविक सूक्ति है, और मानवजाति के बीच इस तरह की सूक्तियों में सर्वोच्च है। क्योंकि यही वह अपेक्षा है जो परमेश्वर मनुष्य से करता है, और परमेश्वर के द्वारा व्यक्तिगत रूप से किया गया कार्य है, इसलिए इसे “जीवन की सूक्ति” कहा जाता है। यह कोई ऐसी सूक्ति नहीं है जिसे किसी चीज में से संक्षिप्त किया गया है, न ही यह किसी महान व्यक्ति के द्वारा कहा गया प्रसिद्ध उद्धरण है; इसके बजाय, यह स्वर्ग और पृथ्वी, तथा सभी चीजों के स्वामी का मानवजाति के लिए कथन है, न कि मनुष्य द्वारा सारांश किए गए कुछ वचन, बल्कि परमेश्वर का अंतर्निहित जीवन है। इसलिए इसे समस्त जीवन की सूक्तियों का उच्चतम कहा जाता है।

— “वचन देह में प्रकट होता है” में ‘जो परमेश्वर को और उसके कार्य को जानते हैं केवल वे ही परमेश्वर को सन्तुष्ट कर सकते हैं’ से उद्धृत

परमेश्वर जो कुछ भी सीधे व्यक्त करता है, वह सत्य है, जबकि पवित्र आत्मा का समस्त प्रबोधन केवल सत्य के अनुरूप है। इसका कारण यह है कि पवित्र आत्मा लोगों को उनके व्यक्तिगत आध्यात्मिक कद के अनुसार प्रबुद्ध करता है, और वह सीधे उन्हें सत्य व्यक्त नहीं कर सकता। यह कुछ ऐसा है, जिसे तुम्हें समझना चाहिए। अगर लोग कुछ अंतर्दृष्टि प्राप्त करते हैं और सत्य के वचनों के अपने अनुभवों के आधार पर कुछ समझ प्राप्त करते हैं, तो क्या इसे सत्य के रूप में गिना जा सकता है? ज्यादा से ज्यादा हम यह कह सकते हैं कि उन्हें सत्य की कुछ समझ है। पवित्र आत्मा के प्रबोधन के सभी शब्द परमेश्वर के वचन का प्रतिनिधित्व नहीं करते हैं, सत्य का प्रतिनिधित्व नहीं करते हैं, और वे सत्य से संबंधित नहीं हैं। केवल यह कहा जा सकता है कि उन लोगों को सत्य की कुछ समझ है, और पवित्र आत्मा का कुछ प्रबोधन है। … हर कोई सत्य का अनुभव कर सकता है, परन्तु उनके अनुभव की स्थितियां अलग-अलग होंगी, और प्रत्येक व्यक्ति को उस सत्य से क्या प्राप्त होगा, यह अलग-अलग है। लेकिन हर किसी की समझ को जोड़ देने के बाद भी तुम पूरी तरह से इस एक सत्य को समझा नहीं सकते हो; सत्य इतना गहरा है! मैं क्यों यह कहता हूं कि तुम्हारे द्वारा प्राप्त की गई सभी चीजें और तुम्हारी सारी समझ, सत्य का विकल्प नहीं हो सकती हैं? यदि तुम दूसरों के साथ अपनी समझदारी को साझा करते हो, तो वे इस पर दो या तीन दिनों के लिए विचार कर सकते हैं और फिर वे इसका अनुभव करना बंद कर देंगे लेकिन कोई व्यक्ति पूरे जीवन भर में भी सत्य का पूरा अनुभव नहीं कर सकता है, यहां तक कि सभी लोगों को मिलकर भी पूरी तरह से इसका अनुभव नहीं मिल सकता है। इस प्रकार यह देखा जा सकता है कि सत्य बहुत अथाह है! शब्दों का इस्तेमाल कर सत्य को स्पष्ट रूप से प्रकट करने का कोई तरीका नहीं, मानव भाषा में व्यक्त सत्य मनुष्य की कहावत मात्र है; मानवता कभी इसे पूरी तरह से अनुभव नहीं करेगी, और मानवता को सत्य पर निर्भर रह कर जीना चाहिए। सत्य का केवल एक अंश हजारों सालों तक पूरी मानवजाति को जीने दे सकता है।

सत्य ही स्वयं परमेश्वर का जीवन है, उनके स्वयं के स्वभाव का प्रतिनिधित्व करता हुआ, उनके स्वयं के सार का और उनमें निहित सब कुछ का प्रतिनिधित्व करता है। यदि तुम कहते हो कि कुछ अनुभवों का तुम्हारे अनुसार यह मतलब है कि तुम्हारे पास सत्य है, तो क्या तुम परमेश्वर के स्वभाव का प्रतिनिधित्व कर सकते हो? तुम्हारे पास कुछ अनुभव हो सकता है, सत्य का कोई एक निश्चित पहलू या उसके किसी एक पक्ष से सम्बंधित प्रकाश हो सकता है, लेकिन तुम दूसरों को हमेशा के लिए इसकी आपूर्ति नहीं कर सकते, इसलिए यह प्रकाश, जो तुमने प्राप्त किया है, सत्य नहीं है, यह केवल एक सीमा है जिस तक लोग पहुँच सकते हैं। यही सामान्य उचित अनुभव और उचित समझ, कुछ वास्तविक अनुभव और सत्य का ज्ञान, किसी व्यक्ति के पास होना चाहिए। अनुभव के आधार पर यह रोशनी, यह प्रबोधन और समझ सत्य का कोई विकल्प नहीं हो सकते; भले ही सभी लोगों ने इस सत्य का अनुभव किया हो, और यदि वे अपने समस्त अनुभव और ज्ञान को एक साथ जोड़ देते हैं, तो भी वे उस एक सत्य के बराबर नहीं हो सकते। जैसा कि पहले कहा जा चुका है, “मैंने मानव संसार के लिए एक सूक्ति अभिव्यक्त की है: मनुष्यों में ऐसा कोई नहीं जो मुझे प्यार करता हो।” यह सत्य का एक बयान है, यह जीवन का सही सार है, यह सबसे गहन बात है, यह परमेश्वर की अपनी अभिव्यक्ति है। तुम इसे अनुभव कर सकते हो। यदि तुम इसे तीन सालों तक अनुभव करते हैं तो तुमको इसकी एक उथली समझ होगी, अगर तुम इसे सात या आठ साल तक अनुभव करते हो तो तुमको उससे अधिक समझ मिलेगी, लेकिन तुम्हारी समझ कभी भी सत्य के उस बयान का विकल्प न हो पाएगी! अगर किसी अन्य व्यक्ति को इसका दो साल का अनुभव होता है, तो उसे थोड़ी-सी समझ मिलेगी; यदि वह दस सालों तक अनुभव करता है, तो उसे उच्चतर समझ होगी और यदि वह इसे एक जीवनकाल के लिए अनुभव करता है तो उसे थोड़ी अधिक समझ प्राप्त होगी, लेकिन यदि तुम दोनों जुट कर अपनी दोनों की समझ को मिला देते हो, तो भी सत्य के उस कथन के लिए एक विकल्प नहीं बना पाओगे। चाहे तुम दोनों कितनी भी समझ, कितने ही अनुभव, कितनी भी अंतर्दृष्टि, कितना भी प्रकाश, या कितने ही उदाहरणों को एक साथ जोड़ते हो, ये सब उस कथन का स्थान नहीं ले सकते। इससे मेरा क्या आशय है? सिर्फ यह कि मनुष्य का जीवन हमेशा मनुष्य का जीवन होगा, और चाहे तुम्हारी समझ सत्य के अनुसार, परमेश्वर के इरादों के अनुसार, उनकी आवश्यकताओं के अनुसार कितनी भी हो, यह कभी भी सत्य का एक विकल्प होने के लिए सक्षम नहीं होगी। यह कहना कि लोगों के पास सत्य है, इसका अर्थ है कि उनके पास कुछ वास्तविकता है, कि उन्हें सत्य की कुछ समझ है, कि परमेश्वर के वचनों में उनका कुछ वास्तविक प्रवेश है, कि उनके पास परमेश्वर के वचनों का कुछ वास्तविक अनुभव है, और परमेश्वर पर अपने विश्वास में वे सही मार्ग पर हैं। परमेश्वर का केवल एक बयान पर्याप्त है किसी व्यक्ति के जीवन भर के अनुभव के लिए, कई जीवनकाल या कई हजार वर्षों तक का अनुभव करने के बाद भी लोग पूरी तरह और अच्छी तरह से एक सत्य का अनुभव कर ही नहीं सकते। …

… यदि तुम्हारे पास सत्य के एक पहलू का कुछ अनुभव है, तो क्या यह सत्य का प्रतिनिधित्व कर सकता है? यह बिल्कुल नहीं कर सकता। क्या तुम पूरा सत्य बता सकते हो? क्या तू सत्य से परमेश्वर के स्वभाव और सार की खोज कर सकता है? प्रत्येक व्यक्ति का सत्य का अनुभव इसका सिर्फ एक पहलू, एक दायरा है; इसे अपने खुद के सीमित दायरे में अनुभव करने से, तू समूचे सत्य को छू नहीं सकता। क्या लोग सत्य के मूल अर्थ को जी सकते हैं? तेरा छोटा-सा अनुभव उसके किस अनुपात में होता है? एक समुद्र तट पर रेत का एक दाना, महासागर में पानी की एक बूंद। इसलिए, भले ही तुझे लगता है कि अपने अनुभव से तूने जो समझ और अनुभूति प्राप्त की है, वह अनमोल है, उसे सत्य के रूप में नहीं गिना जा सकता। सत्य का स्रोत, और सत्य का अर्थ, एक बहुत व्यापक क्षेत्र को शामिल करता है! कुछ भी इसके विपरीत नहीं हो सकता है। … हालांकि, लोगों के पास जो चीज़ें हैं, लोगों ने जो प्रकाश प्राप्त किया है, केवल एक निश्चित दायरे में खुद के लिए या कुछ अन्य लोगों के लिए उपयुक्त हैं, लेकिन एक अलग दायरे के भीतर वे उपयुक्त नहीं हैं। किसी व्यक्ति का अनुभव बहुत सीमित होता है चाहे वह कितना भी गहरा हो, और उनका अनुभव सत्य के दायरे तक कभी नहीं पहुंचेगा। किसी व्यक्ति के प्रकाश की, किसी व्यक्ति के समझ की तुलना कभी भी सत्य से नहीं की जा सकती।

— “मसीह की बातचीत के अभिलेख” में ‘क्या आप जानते हैं कि वास्तव में सत्य क्या है?’ से उद्धृत

मनुष्य के अभ्यास करने के तरीके और सत्य का उसका ज्ञान ये सभी एक विशेष दायरे में लागू होते हैं। तुम नहीं कह सकते हो कि जिस मार्ग पर मनुष्य चलता है वह पूरी तरह से पवित्र आत्मा की इच्छा है, क्योंकि मनुष्य को केवल पवित्र आत्मा के द्वारा ही प्रबुद्ध किया जा सकता है और उसे पवित्र आत्मा से पूरी तरह से भरा नहीं जा सकता है। जिन चीज़ों को मनुष्य अनुभव कर सकता है वे सभी सामान्य मानवता के दायरे के भीतर हैं और वे सामान्य मानवीय मन में विचारों की सीमाओं से आगे नहीं बढ़ सकती हैं। व्यावहारिक अभिव्यक्ति वाले सभी लोग इस सीमा के अंतर्गत अनुभव करते हैं। जब वे सत्य का अनुभव करते हैं, तो यह हमेशा पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता के अधीन सामान्य मानवीय जीवन का एक अनुभव होता है, उस तरह से अनुभव करना नहीं है जो सामान्य मानवीय जीवन से भटक जाता है। वे अपने मानवीय जीवन को जीने की बुनियाद पर पवित्र आत्मा के द्वारा प्रबुद्ध किए गए सत्य का अनुभव करते हैं। इसके अतिरिक्त, यह सत्य अलग-अलग व्यक्तियों पर अलग-अलग होता है, और इसकी गहराई उस व्यक्ति की अवस्था से सम्बन्धित होती है। कोई केवल इतना ही कह सकता है कि जिस मार्ग पर वे चलते हैं वह ऐसे मनुष्य का सामान्य जीवन है जो सत्य की खोज कर रहा है, और यह कि यह किसी ऐसे सामान्य व्यक्ति के द्वारा चला गया मार्ग है जिसके पास पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता है। तुम नहीं कह सकते हो कि जिस मार्ग पर वे चलते हैं वह ऐसा मार्ग है जिसे पवित्र आत्मा द्वारा लिया गया है। सामान्य मानवीय अनुभव में, क्योंकि जो लोग अनुसरण करते हैं वे एक समान नहीं होते हैं, इसलिए पवित्र आत्मा का कार्य भी एक समान नहीं होता है। इसके अतिरिक्त, क्योंकि जिन परिवेशों का वे अनुभव करते हैं और उनके अनुभव की सीमाएँ एक समान नहीं होती हैं, इसलिए उनके मन और विचारों के मिश्रण की वजह से, उनका अनुभव विभिन्न अंशों तक मिश्रित हो जाता है। प्रत्येक व्यक्ति अपनी व्यक्तिगत विभिन्न परिस्थितियों के अनुसार ही किसी सच्चाई को समझता है। सत्य के वास्तविक अर्थ की उनकी समझ पूर्ण नहीं होती है और यह इसका केवल एक या कुछ ही पहलू होते हैं। जिस दायरे के द्वारा मनुष्य के द्वारा सत्य का अनुभव किया जाता है वह हमेशा ही व्यक्तित्वों की विभिन्न परिस्थितियों पर आधारित होता है और इसलिए यह एक समान नहीं होता है। इस तरह, एक ही सत्य के बारे में विभिन्न लोगों के द्वारा व्यक्त किया गया ज्ञान एक समान नहीं होता है। कहने का तात्पर्य है कि, मनुष्य के अनुभव में हमेशा सीमाएँ होती हैं और यह पवित्र आत्मा की इच्छा को पूरी तरह से नहीं दर्शा सकता है, और मनुष्य के कार्य का परमेश्वर के कार्य के समान अर्थ नहीं लगाया जा सकता है, भले ही जो कुछ मनुष्य के द्वारा व्यक्त किया जाता है वह बहुत नज़दीक से परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप हो, भले ही मनुष्य का अनुभव पवित्र आत्मा के द्वारा किए जाने वाले सिद्ध करने के कार्य के बेहद करीब हो। मनुष्य केवल परमेश्वर का सेवक हो सकता है, केवल उस कार्य को कर सकता है जो परमेश्वर उसे सौंपता है। मनुष्य केवल पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता के अधीन ही ज्ञान को और अपने व्यक्तिगत अनुभवों से अर्जित सच्चाईयों को व्यक्त कर सकता है। मनुष्य अयोग्य है और उसके पास पवित्र आत्मा का अभिव्यक्ति-मार्ग बनने की स्थितियाँ नहीं हैं। वह यह कहने का हक़दार नहीं है कि मनुष्य का कार्य परमेश्वर का कार्य है।

— “वचन देह में प्रकट होता है” में ‘परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का कार्य’ से उद्धृत

मनुष्य की संगति परमेश्वर के वचन से भिन्न होती है। जो कुछ मनुष्य संगति करते हैं वह उनके व्यक्तिगत देखने और अनुभव को सूचित करती है, और परमेश्वर के कार्य के आधार पर जो कुछ उन्होंने देखा और अनुभव किया है उन्हें व्यक्त करती है। उनकी ज़िम्मेदारी, परमेश्वर के कार्य करने या बोलने के पश्चात्, यह पता लगाना है कि उन्हें किसका अभ्यास करना चाहिए, या किसमें प्रवेश करना चाहिए, और तब इसे अनुयायियों को सौंपना है। इसलिए, मनुष्य का कार्य उसके प्रवेश और अभ्यास का प्रतिनिधित्व करता है। निस्संदेह, ऐसा कार्य मानवीय सबकों और अनुभव या कुछ मानवीय विचारों के साथ मिश्रित होता है। चाहे पवित्र आत्मा किसी भी तरह से कार्य क्यों न करे, चाहे वह मनुष्यों में कार्य करे या देहधारी परमेश्वर में, ये हमेशा कार्यकर्ता ही होते हैं जो व्यक्त करते हैं कि वे क्या हैं। यद्यपि यह पवित्र आत्मा ही होता है जो कार्य करता है, फिर भी मनुष्य अंतर्निहित रूप से जैसा होता है कार्य उस पर आधारित होता है, क्योंकि पवित्र आत्मा बिना आधार के कार्य नहीं करता है। दूसरे शब्दों में, कार्य को शून्य में से नहीं किया जाता है, बल्कि यह हमेशा वास्तविक परिस्थितियों और वास्तविक स्थितियों के अनुसार होता है। केवल इसी तरह से ही मनुष्य के स्वभाव को रूपान्तरित किया जा सकता है, कि उसकी पुरानी अवधारणाओं और पुराने विचारों को बदला जा सकता है। जो कुछ मनुष्य देखता, अनुभव करता, और कल्पना कर सकता है वह उसे अभिव्यक्त करता है। भले ही ये सिद्धान्त या अवधारणाएँ हों, इन सभी तक मनुष्य की सोच पहुँच सकती है। भले ही मनुष्य के कार्य का आकार कुछ भी हो, यह मनुष्य के अनुभव के दायरे, जो मनुष्य देखता है, या जिसकी मनुष्य कल्पना या जिसका विचार कर सकता है, उनसे बढ़कर नहीं हो सकता है। जो कुछ परमेश्वर प्रकट करता है परमेश्वर स्वयं वही है, और यह मनुष्य की पहुँच से परे, अर्थात्, मनुष्य की सोच से परे है। वह सम्पूर्ण मानवजाति की अगुवाई करने के अपने कार्य को व्यक्त करता है, और यह मानव अनुभव के विवरणों के प्रासंगिक नहीं है, बल्कि इसके बजाए यह उसके अपने प्रबंधन से सम्बन्धित है। मनुष्य अपने अनुभव को व्यक्त करता है, जबकि परमेश्वर अपने अस्तित्व को व्यक्त करता है—यह अस्तित्व उसका अंतर्निहित स्वभाव है और यह मनुष्य की पहुँच से परे है। मनुष्य का अनुभव उसका देखना और परमेश्वर की अपने अस्तित्व की अभिव्यक्ति के आधार पर प्राप्त किया गया उसका ज्ञान है। ऐसा देखना और ज्ञान मनुष्य का अस्तित्व कहलाता है। ये मनुष्य के अंतर्निहित स्वभाव और उसकी वास्तविक क्षमता के आधार पर व्यक्त होते हैं; इसलिए इन्हें मनुष्य का अस्तित्व भी कहा जाता है। जो कुछ मनुष्य देखता और अनुभव करता है वह उसकी संगति कर पाता है। जो कुछ उसने अनुभव नहीं किया है या देखा नहीं है या जिस तक उसका मन नहीं पहुँच सकता है, अर्थात्, ऐसी चीज़ें जो उसके भीतर नहीं हैं, वह उसकी संगति करने में असमर्थ है। यदि जो कुछ मनुष्य व्यक्त करता है वह उसका अनुभव नहीं है, तो यह उसकी कल्पना या सिद्धान्त है। एक शब्द में, उसके वचनों में कोई वास्तविकता नहीं होती है। यदि तुमने समाज की चीज़ों से कभी संपर्क नहीं किया है, तो तुम समाज के जटिल सम्बन्धों की स्पष्टता से संगति करने में समर्थ नहीं होगे। यदि तुम्हारा कोई परिवार नहीं है परन्तु अन्य लोग परिवारिक मुद्दों के बारे में बात कर रहे हैं, तो जो कुछ वे कह रहे हैं तुम उनकी अधिकांश बातों को नहीं समझ सकते हो। इसलिए, जो कुछ मनुष्य संगति करता है और जिस कार्य को वह करता है वह उसके भीतरी अस्तित्व का प्रतिनिधित्व करता है।

— “वचन देह में प्रकट होता है” में ‘परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का कार्य’ से उद्धृत

नए नियम के पौलुस के धर्मपत्र वे धर्मपत्र हैं जिन्हें पौलुस ने कलीसियाओं के लिए लिखा था, और वे पवित्र आत्मा की अभिप्रेरणाएं नहीं हैं, न ही वे सीधे तौर पर पवित्र आत्मा के कथन हैं। वे महज प्रोत्साहन, दिलासा और उत्साह के वचन हैं जिन्हें उसने अपने कार्य की श्रृंखला के दौरान कलीसियाओं के लिए लिखा था। इस प्रकार वे उस समय पौलुस के अधिकतर कार्य के लिखित दस्तावेज़ हैं। वे प्रभु में जो सभी भाई-बहन हैं उनके लिए लिखे गए थे, ताकि उस समय कलीसियाओं के भाई-बहन उसकी सलाह मानें और प्रभु यीशु द्वारा बताए गए पश्चाताप के मार्ग पर बनें रहें। किसी भी सूरत में पौलुस ने यह नहीं कहा कि वे उस समय की या भविष्य की कलीसियाओं के लिए थे, और सभी को उसके द्वारा लिखी चीज़ों को खाना और पीना होगा, न ही उसने कहा कि उसके सभी वचन परमेश्वर की ओर से आए थे। उस समय की कलीसियाओं की परिस्थितियों के अनुसार, उसने साधारण तौर पर भाइयों एवं बहनों से संवाद किया था, और उनको प्रोत्साहित किया था, उनके विश्वास को प्रेरित किया था; उसने बस सामान्य तौर पर प्रचार किया या उन्हें स्मरण दिलाया था और उन्हें प्रोत्साहित किया था। उसके वचन उसके स्वयं के बोझ पर आधारित थे, और उसने इन वचनों के जरिए लोगों को संभाला था। उसने उस समय की कलीसियाओं के लिए प्रेरित का कार्य किया था, वह एक कर्मचारी था जिसे प्रभु यीशु के द्वारा इस्तेमाल किया गया, और इस प्रकार उसे कलीसियाओं की ज़िम्मेदारी अवश्य लेनी चाहिए, और कलीसियाओं के कार्य को अवश्य करना चाहिए, उसे भाइयों एवं बहनों की परिस्थितियों के बारे में जानना था—और इसी कारण, उसने प्रभु में सभी भाइयों एवं बहनों के लिए धर्मपत्रों को लिखा था। जो कुछ भी उसने कहा था वह हितकारी था और लोगों के लिए लाभदायक एवं सही था, किन्तु यह पवित्र आत्मा के कथनों को नहीं दर्शाता था, और यह परमेश्वर का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता था। यह एक विचित्र समझ थी, और एक भयंकर ईश्वरीय निन्दा थी, क्योंकि लोग मनुष्य के अनुभवों के लिखित दस्तावेज़ को और मनुष्य की पत्रियों को पवित्र आत्मा के द्वारा कलीसियाओं को बोले गए वचनों के रूप में ले रहे थे! जब उन धर्मपत्रों की बात आती है जिन्हें पौलुस ने कलीसियाओं के लिए लिखा था। यह विशेष रूप से तब सच होता है, क्योंकि उसके धर्मपत्र उस समय प्रत्येक कलीसिया की परिस्थितियों और उनकी स्थिति के आधार पर भाइयों एवं बहनों के लिए लिखे गये थे, और वे भाइयों एवं बहनों को प्रभु में प्रोत्साहित करने के लिए थे, ताकि वे प्रभु यीशु के अनुग्रह को प्राप्त कर सकें। उस समय उसके धर्मपत्र भाइयों एवं बहनों को जागृत करने के लिए थे। ऐसा कहा जा सकता है कि यह उसका स्वयं का बोझ था, और साथ ही यह वह बोझ था जिसे पवित्र आत्मा के द्वारा उसे दिया गया था; कुल मिलाकर, वह एक प्रेरित था जिसने उस समय की कलीसियाओं की अगुवाई की थी, जिसने कलीसियाओं के लिए धर्मपत्रों को लिखा था और उन्हें प्रोत्साहन दिया था—यह उसकी जिम्मेदारी थी। उसकी पहचान मात्र कलीसिया के लिए काम करने वाले की थी, वह मात्र एक प्रेरित था जिसे परमेश्वर के द्वारा भेजा गया था; वह एक नबी नहीं था, और न ही एक पूर्वकथन कहने वाला था। उसके लिए, स्वयं उसका कार्य और भाइयों एवं बहनों का जीवन सब से अधिक महत्वपूर्ण था। इस प्रकार, वह पवित्र आत्मा के स्थान पर बोल नहीं सकता था। उसके वचन पवित्र आत्मा के वचन नहीं थे, और उन्हें परमेश्वर के वचन तो बिलकुल भी नहीं कहा जा सकता था, क्योंकि पौलुस परमेश्वर के एक जीवधारी से बढ़कर और कुछ नहीं था, और वह निश्चित तौर पर परमेश्वर का देहधारण नहीं था। उसकी पहचान यीशु के समान नहीं थी। यीशु के वचन पवित्र आत्मा के वचन थे, वे परमेश्वर के वचन थे, क्योंकि उसकी पहचान मसीह—परमेश्वर के पुत्र की थी। पौलुस उसके बराबर कैसे हो सकता है? यदि लोग धर्मपत्रों या पौलुस के वचनों को पवित्र आत्मा के कथनों के रूप में देखते हैं, और परमेश्वर के रूप में उसकी आराधना करते हैं, तो सिर्फ यह कहा जा सकता है कि वे बहुत ही अधिक अविवेकी हैं। और अधिक कड़े शब्दों में कहा जाए, तो यह ईश निन्दा नहीं है तो और क्या है? एक मनुष्य परमेश्वर के बदले में कैसे बात कर सकता है? और लोग उसके धर्मपत्रों के लिखित दस्तावेज़ों और उसकी कही बातों के सामने कैसे झुक सकते हैं जैसे मानो वह कोई “पवित्र पुस्तक” या “स्वर्गीय पुस्तक” हो। क्या परमेश्वर के वचनों को एक मनुष्य के द्वारा सामान्य ढंग से बोला जा सकता है? एक मनुष्य परमेश्वर के बदले में कैसे बोल सकता है? और इस प्रकार, तुम क्या कहते हो—क्या वे धर्मपत्र जिन्हें उसने कलीसियाओं के लिए लिखा था उसके स्वयं के विचारों से दूषित नहीं हो गये होंगे? उन्हें मानवीय विचारों के द्वारा दूषित क्यों नहीं किया जा सकता है? उसने अपने व्यक्तिगत अनुभवों और अपने स्वयं के जीवन की व्यापकता के आधार पर कलीसियाओं के लिए इन धर्मपत्रों को लिखा था। उदाहरण के लिए, पौलुस ने गलातियों की कलीसिया को एक धर्मपत्र लिखा था जिस में एक निश्चित विचार था, और पतरस ने दूसरा धर्मपत्र लिखा, जिसमें एक अन्य दृष्टिकोण था। उन में से कौन पवित्र आत्मा के द्वारा आया था? कोई भी निश्चित तौर पर नहीं कह सकता है। इस प्रकार, सिर्फ इतना कहा जा सकता है कि उन दोनों के पास कलीसियाओं के लिए भार था, फिर भी उनके धर्मपत्र उनकी स्थिति को दर्शाते हैं, वे भाइयों एवं बहनों के लिए उनके नियोजन एवं सहयोग, और कलीसियाओं के प्रति उनके भार को दर्शाती हैं, और वे सिर्फ मानवीय कार्य को दर्शाती हैं; वे पूरी तरह पवित्र आत्मा की ओर से नहीं हैं। यदि तुम कहते हो कि उसके धर्मपत्र पवित्र आत्मा के वचन हैं, तो तुम बेतुके हो, और तुम ईश निन्दा कर रहे हो! पौलुस के धर्मपत्र और नए नियम के अन्य धर्मपत्र हाल ही के अधिकतर आत्मिक हस्तियों के संस्मरणों के समरूप हैं। वे वाचमैन नी की पुस्तकों या लॉरेन्स इत्यादि के अनुभवों के समतुल्य हैं। सीधी-सी बात है कि हाल ही के आत्मिक हस्तियों की पुस्तकों को नए नियम में संकलित नहीं किया गया है, फिर भी इन लोगों का सार-तत्व एक समान हैः वे ऐसे लोग थे जिन्हें एक निश्चित अवधि के दौरान पवित्र आत्मा के द्वारा इस्तेमाल किया गया था, और वे सीधे तौर पर परमेश्वर का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकते हैं।

— “वचन देह में प्रकट होता है” में ‘बाइबल के विषय में (3)’ से उद्धृत

परमेश्वर के वचन को मनुष्य का वचन नहीं समझा सकता, और मनुष्य के वचन को परमेश्वर का वचन तो बिलकुल भी नहीं समझा सकता। परमेश्वर द्वारा इस्तेमाल किया गया व्यक्ति देहधारी परमेश्वर नहीं है, और देहधारी परमेश्वर, परमेश्वर द्वारा इस्तेमाल किया गया मनुष्य नहीं है। इसमें एक अनिवार्य अंतर है। शायद इन वचनों को पढ़ने के बाद तुम इन्हें परमेश्वर के वचन न मानकर केवल मनुष्य द्वारा प्राप्त प्रबोधन मानो। उस हालत में, तुम अज्ञानता के कारण अंधे हो। परमेश्वर के वचन मनुष्य द्वारा प्राप्त प्रबोधन के समान कैसे हो सकते हैं? देहधारी परमेश्वर के वचन एक नया युग आरंभ करते हैं, समस्त मानवजाति का मार्गदर्शन करते हैं, रहस्य प्रकट करते हैं, और मनुष्य को वह दिशा दिखाते हैं, जो उसे नए युग में ग्रहण करनी है। मनुष्य द्वारा प्राप्त की गई प्रबुद्धता अभ्यास या ज्ञान के लिए सरल निर्देश मात्र हैं। वह एक नए युग में समस्त मानवजाति को मार्गदर्शन नहीं दे सकती या स्वयं परमेश्वर के रहस्य प्रकट नहीं कर सकती। अंतत: परमेश्वर, परमेश्वर है और मनुष्य, मनुष्य। परमेश्वर में परमेश्वर का सार है और मनुष्य में मनुष्य का सार। यदि मनुष्य परमेश्वर द्वारा कहे गए वचनों को पवित्र आत्मा द्वारा प्रदत्त साधारण प्रबुद्धता मानता है, और प्रेरितों और नबियों के वचनों को परमेश्वर के व्यक्तिगत रूप से कहे गए वचन मानता है, तो यह मनुष्य की गलती होगी। चाहे जो हो, तुम्हें कभी सही और गलत को मिलाना नहीं चाहिए, और ऊँचे को नीचा नहीं समझना चाहिए, या गहरे को उथला समझने की गलती नहीं करनी चाहिए; चाहे जो हो, तुम्हें कभी भी जानबूझकर उसका खंडन नहीं करना चाहिए, जिसे तुम जानते हो कि सत्य है। हर उस व्यक्ति को, जो यह विश्वास करता है कि परमेश्वर है, समस्याओं की सही दृष्टिकोण से जाँच करनी चाहिए, और परमेश्वर द्वारा सृजित प्राणी के परिप्रेक्ष्य से परमेश्वर के नए कार्य और वचनों को स्वीकार करना चाहिए; अन्यथा परमेश्वर द्वारा तुम्हें मिटा दिया जाएगा।

— “वचन देह में प्रकट होता है” की ‘प्रस्तावना’ से उद्धृत

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