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परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

एक सामान्य आध्यात्मिक जीवन, प्रार्थना, गीत, कलीसिया का जीवन, परमेश्वर के वचनों का खान-पान और दूसरे ऐसे ही अभ्यासों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका मतलब है, एक निर्मल और जीवंत आध्यात्मिक जीवन जीना। यह तरीके के बारे में नहीं, बल्कि नतीजे से सम्बन्धित है। ज्यादातर लोग सोचते हैं कि एक सामान्य आध्यात्मिक जीवन पाने के लिए उन्हें प्रार्थना, गाना, परमेश्वर के वचनों को खाना-पीना, या परमेश्वर के वचनों को समझने की कोशिश करनी चाहिए। कोई परिणाम मिले या ना मिले, या चाहे सही समझ हो या ना हो, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता, ये लोग बस बाहर की गतिविधियों से होकर गुज़रने पर ध्यान लगाते हैं, और नतीजे पर उनका ध्यान नहीं होता-वे धर्म के अनुष्ठानों में रहने वाले लोग हैं, कलीसिया के भीतर रहने वाले लोग नहीं, और उनका राज्य की प्रजा होने का संयोग तो और भी कम है। इस तरह के व्यक्ति की प्रार्थनाएं, गीत गाना, और परमेश्वर के वचनों का खान-पान, सब नियमों के अनुसार होता है, वे उन्हें करने के लिए मजबूर हैं, और वे सब प्रचलन का निर्वहन करने के लिए किये जाते हैं; स्वेच्छा से या दिल से नहीं किये जाते हैं। इससे कोई फर्क नही पड़ता कि ये लोग कितनी प्रार्थना करते हैं या कितने गीत गाते हैं, इसका कोई भी नतीजा नहीं निकलेगा, क्योंकि वे केवल धार्मिक नियमों और प्रथाओं का अभ्यास कर रहे हैं, और वे परमेश्वर के वचन का अभ्यास नहीं कर रहे। केवल तरीके पर ध्यान लगाने से और परमेश्वर के वचनों को पालन करने वाला नियम मान लेने से, इस तरह का व्यक्ति परमेश्‍वर के वचन का अभ्यास नहीं कर रहा, बल्कि शरीर को संतुष्ट कर रहा है, और दूसरों को दिखाने के लिए कर रहा है। इस तरह की धार्मिक प्रथा और नियम मानवों की ओर से आये हैं, परमेश्वर की ओर से नहीं। परमेश्वर नियम के अनुसार नहीं रहता, किसी भी कानून का पालन नहीं करता; वह हर दिन नई चीजें करता है और वह व्यावहारिक काम करता है। थ्री-सेल्फ कलीसिया के लोगों की तरह नहीं, जो सुबह की दैनिक निगरानी, शाम की प्रार्थना, भोजन से पहले धन्यवाद देने में, सब कुछ में धन्यवाद व्यक्त करने में और अन्य ऐसी प्रथाओं तक सीमित हैं। चाहे लोग कितना कुछ भी क्यों ना करें, या कितनी ही देर तक अभ्यास क्यों न करते रहें, उन्हें पवित्र आत्मा का काम नहीं प्राप्त होगा। यदि लोग अभ्यास में दिल लगाये हुए, नियमों के अंतर्गत रहते हैं, तो पवित्र आत्मा किसी भी तरह काम नहीं कर सकता, क्योंकि लोगों का दिल नियमों में लगा हुआ है, मानवीय धारणाओं में लगा हुआ है; इसलिए परमेश्वर के पास काम करने का कोई रास्ता नहीं है; लोग बस हमेशा कानून के नियंत्रण में जीते रहेंगे, और इस प्रकार का व्यक्ति कभी भी परमेश्वर की प्रशंसा प्राप्त कर पाने में सफल नहीं होगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "एक सामान्य आध्यात्मिक जीवन के सम्बन्ध में" से उद्धृत

यदि लोग सत्य को वो धर्मसिद्धान्त मानते हैं जिसका उन्हें अपनी आस्था में पालन करना ही है, तो क्या वे धार्मिक अनुष्ठान में पड़ने के ख़तरे में हैं? और इस तरह के धार्मिक अनुष्ठान के अनुपालन और ईसाई धर्म के विश्वास के बीच क्या अंतर है? पुरानी और नई शिक्षाओं के बीच अंतर हो सकते हैं, और जो कहा जाता है वह अधिक गहन और अधिक प्रगतिशील हो सकता है, लेकिन यदि शिक्षाएँ एक तरह के सिद्धांत से ज्यादा कुछ नहीं हों और यदि वे लोगों के लिए सिद्धान्त, अनुष्ठान का एक रूप बन जाती हों—और इस तरह की और चीज़ें बन जाती हों, वे इससे सत्य प्राप्त नहीं कर सकते हों या सत्य की वास्तविकता में प्रवेश नहीं कर सकते हों, तो क्या उनका विश्वास केवल ईसाई धर्म के समान नहीं है? सार रूप में, क्या यह ईसाई धर्म नहीं है? इसलिए तुम लोगों के व्यवहार में और अपने कर्तव्य को करने में, तुम किन चीज़ों में ईसाई धर्म में विश्वासियों के समान या उसी तरह के विचार रखते हो? सतही अच्छे व्यवहार की खोज, फिर आध्यात्मिकता के आभास का उपयोग करके अपने लिए एक ढोंग बनाने की पूरी कोशिश करना; एक आध्यात्मिक व्यक्ति का रूप अपनाना; तू जो कहता है, करता है और प्रकट करता है उसमें आध्यात्मिकता का आभास देना; कुछ चीज़ें करना जो लोगों की अवधारणाओं और कल्पनाओं में प्रशंसनीय हैं—यह सब झूठी आध्यात्मिकता की खोज है, और यह पाखंड है। तू उच्च बातें करने वाले वचनों और सिद्धांत पर खड़ा है, लोगों को अच्छे कर्मों को करने, अच्छे लोग बनने, और सत्य की खोज करने पर ध्यान केंद्रित करने के लिए कहता है, लेकिन तेरे अपने व्यवहार और अपने कर्तव्य के प्रदर्शन में, तूने कभी भी सत्य की तलाश नहीं की, तूने कभी भी सत्य के सिद्धांतों के अनुसार कार्य नहीं किया, तू कभी भी यह नहीं समझ पाया है कि सत्य में किस बारे में बोला गया है, परमेश्वर की इच्छा क्या है, मनुष्य से उसे किन मानकों की अपेक्षा है—तूने इनमें से किसी को भी कभी भी गंभीरता से नहीं लिया है। जब तू कुछ समस्याओं का सामना करता है, तो तू पूरी तरह से अपनी मर्जी के अनुसार कार्य करता है और परमेश्वर को एक तरफ़ रख देता है। क्या ये बाहरी क्रियाएँ और आंतरिक स्थितियाँ, परमेश्वर का भय मानना और बुराई से दूर रहना हैं? यदि लोगों की आस्था और उनके सत्य के अनुसरण के बीच कोई संबंध नहीं है, तो फिर चाहे वे कितने भी वर्षों तक परमेश्वर में विश्वास क्यों न करें, वे वास्तव में परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने में असमर्थ होंगे। और इसलिए उस प्रकार के लोग किस प्रकार के मार्ग पर चल सकते हैं? वे अपने आप को किस चीज़ से सज्जित करने में अपने दिनों को बिताते हैं? क्या ये चीज़ें वचन और सिद्धांत नहीं हैं? क्या वे अपने आप को फरीसियों की तरह और अधिक बनाने, ऐसे लोगों की तरह अधिक बनाने के लिए जो कथित रूप से परमेश्वर की सेवा करते हैं, अपने आप को वचनों और सिद्धांतों से सज्जित, सुशोभित करते हुए, अपने दिनों को नही बिताते हैं? ये सभी क्रियाएँ क्या हैं? वे बस बँधे-बँधाये ढर्रे पर चल रहे हैं; वे विश्वास के ध्वज को लहरा रहे हैं और धार्मिक संस्कारों को निभा रहे हैं, आशीष पाने के अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए परमेश्वर को धोखा देने की कोशिश कर रहे हैं। वे परमेश्वर की आराधना बिल्कुल नहीं करते हैं। अंत में, क्या ऐसे लोगों के समूह का अंत ठीक कलीसिया के भीतर के उन लोगों की तरह नहीं होगा जो कथित रूप से परमेश्वर की सेवा करते हैं, और जो कथित रूप से परमेश्वर को मानते और उसका अनुसरण करते हैं?

— "मसीह की बातचीतों के अभिलेख" में "यदि तू हर समय परमेश्वर के सामने रह सकता है केवल तभी तू उद्धार के पथ पर चल सकता है" से उद्धृत

कुछ लोगों में अपनी ओर ध्यान खींचने की विशेष प्रवृत्ति होती है। अपने भाई-बहनों की उपस्थिति में, वे कहते हैं कि वह परमेश्वर के प्रति कृतज्ञ है, परंतु उनकी पीठ पीछे, वे सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं और पूरी तरह से कुछ और ही करते हैं। क्या वे धार्मिक फरीसियों जैसे नहीं हैं? एक ऐसा व्यक्ति जो सच में परमेश्वर से प्यार करता है और जिसमें सत्य है वह परमेश्वर के प्रति निष्ठावान है, परंतु वह बाहर से ऐसा प्रकट नहीं करता है। परिस्थिति उत्पन्न होने पर वह सत्य का अभ्यास करने को तैयार रहता है और अपने विवेक के विरुद्ध जाकर नहीं बोलता है या कार्य नहीं करता है। चाहे परिस्थिति कुछ भी हो, जब मामले उठते हैं तो वह बुद्धि का प्रदर्शन करता है और अपने कर्मों में उच्च सिद्धांत वाला होता है। इस तरह का व्यक्ति ही वह व्यक्ति है जो सच में सेवा करता है। कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो परमेश्वर के प्रति अपनी कृतज्ञता के लिए दिखावटी प्रेम करते हैं। वे कई दिनों तक चिंता में अपनी भौंहें चढ़ा कर अपने दिन बिताते हैं, एक बनावटी अच्छा व्यक्ति होने का नाटक करते हैं, और एक दयनीय मुखाकृति का दिखावा करते हैं। कितना तिरस्करणीय है! यदि तुम उनसे पूछते कि "तुम परमेश्वर के प्रति किस प्रकार से आभारी हो? कृपया मुझे बताओ!" तो वे निरुत्तर हो जाते। यदि तुम परमेश्वर के प्रति निष्ठावान हो, तो इस बारे में सार्वजनिक रूप से चर्चा मत करो, बल्कि परमेश्वर के प्रति अपना प्रेम दर्शाने के लिए अपने वास्तविक अभ्यास का उपयोग करो, और एक सच्चे हृदय से उससे प्रार्थना करो। जो परमेश्वर के साथ व्यवहार करने के लिए केवल वचनों का उपयोग करते हैं वे सभी पाखंडी हैं। कुछ लोग प्रत्येक प्रार्थना के साथ परमेश्वर के प्रति आभार के बारे में बोलते हैं, और जब कभी भी वे प्रार्थना करते हैं, तो पवित्र आत्मा के द्रवित हुए बिना ही रोना आरंभ कर देते हैं। इस तरह के मनुष्य धार्मिक रिवाजों और अवधारणाओं से सम्पन्न होते हैं; वे सदैव यह विश्वास करते हुए ऐसे रीति-रिवाजों और अवधारणाओं के साथ जीते हैं कि ऐसी क्रियाएँ परमेश्वर को प्रसन्न करती हैं, और यह कि सतही धार्मिकता या दुःखभरे आँसुओं का परमेश्वर समर्थन करता है। ऐसे बेतुके लोगों से कौन सी भलाई आ सकती है? अपनी विनम्रता का प्रदर्शन करने के लिए, कुछ लोग दूसरों की उपस्थिति में अनुग्रह का दिखावा करते हैं। कुछ लोग दूसरों के सामने जानबूझकर किसी नितान्त शक्तिहीन मेमने की तरह चापलूस होते हैं। क्या यह राज्य के लोगों का चाल-चलन है? राज्य के व्यक्ति को जीवंत और स्वतंत्र, भोला-भाला और स्पष्ट, ईमानदार और प्यारा होना चाहिए; एक ऐसा व्यक्ति होना चाहिए जो स्वतंत्रता की स्थिति में हो। उसमें चरित्र और प्रतिष्ठा हो, और जहाँ कहीं जाए वह गवाही दे सकता हो; वह परमेश्वर और मनुष्य दोनों का प्यारा हो। वे जो विश्वास में नौसिखिये होते हैं उनके पास बहुत से बाहरी अभ्यास होते हैं; उन्हें सबसे पहले निपटान और काट-छांट की एक अवधि से अवश्य गुज़रना चाहिए। जिनके हृदय में परमेश्वर का विश्वास है वे बाहरी रूप से दूसरों को अलग नहीं दिखते हैं, किन्तु उनकी क्रियाएँ और कर्म दूसरों के लिए प्रशंसनीय हैं। केवल ऐसे ही व्यक्ति परमेश्वर के वचनों पर जीवन बिताने वाले समझे जा सकते हैं। यदि तुम इस व्यक्ति को प्रतिदिन सुसमाचार का उपदेश देते हो, और उसे उद्धार में ला रहे हो, तब भी अंत में, तुम नियमों और सिद्धांतों में जी रहे हो, तब तुम परमेश्वर के लिए महिमा नहीं ला सकते हो। इस प्रकार के चाल-चलन के लोग धार्मिक लोग हैं, और पाखंडी भी हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर पर विश्वास करना वास्तविकता पर केंद्रित होना चाहिए, न कि धार्मिक रीति-रिवाजों पर" से उद्धृत

मनुष्य के प्रवेश करने के समय के दौरान जीवन सदा उबाऊ होता है, आत्मिक जीवन के नीरस तत्वों से परिपूर्ण होता है, जैसे कि प्रार्थना करना, परमेश्वर के वचनों को खाना और पीना, या सभाओं को आयोजित करना, इसलिए लोग हमेशा यह अनुभव करते हैं कि परमेश्वर पर विश्वास करना कोई आनन्द प्रदान नहीं करता। ऐसी आत्मिक क्रियाएँ हमेशा मनुष्यजाति के उस मूल स्वभाव के आधार पर की जाती हैं, जो शैतान द्वारा भ्रष्ट किया जा चुका है। यद्यपि कभी-कभी लोगों को पवित्र आत्मा द्वारा प्रबोधन प्राप्त हो सकता है, परंतु फिर भी उनके वास्तविक विचार, स्वभाव, जीवन-शैली और आदतें अभी भी उनके भीतर जड़ पकड़े हुए हैं, इसलिए उनका स्वभाव अपरिवर्तित रहता है। परमेश्वर अंधविश्वास की उन गतिविधियों से सबसे ज्यादा घृणा करता है जिनमें लोग लिप्त रहते हैं, परंतु अभी भी बहुत से लोग यह सोचकर कि अंधविश्वास की ये गतिविधियाँ परमेश्वर द्वारा दी गई हैं, इन्हें त्यागने में असमर्थ हैं, और आज तक उन्होंने इन्हें पूरी तरह से नहीं त्यागा है। ऐसी वस्तुएं जैसे कि जवान लोगों द्वारा विवाह के भोज और दुल्हन के साज-सामान का प्रबंध; नकद उपहार, प्रीतिभोज, और इन्हीं के समान अन्य तरीके जिनमें आनन्द के अवसरों को मनाया जाता है; वे प्राचीन तरीके जो हमें पूर्वजों से मिले हैं; और अंधविश्वास की वे सारी गतिविधियाँ जो मृतकों तथा उनके अंतिम संस्कार के लिए की जाती हैं: ये परमेश्वर के लिए और भी घृणास्पद हैं। यहाँ तक कि आराधना का दिन (सब्त समेत, जैसा कि धार्मिक जगत द्वारा मनाया जाता है) भी उसके लिए घृणास्पद है; और मनुष्यों के बीच के सामाजिक सम्बन्ध और सांसारिक बातचीत, परमेश्वर द्वारा तुच्छ समझे जाते और अस्वीकार किए जाते हैं। यहाँ तक की वसंत का त्यौहार और क्रिसमस, जिनके बारे में सब जानते हैं, परमेश्वर की आज्ञास्वरूप नहीं हैं, तो इन त्यौहारों की छुट्टियों के लिए खिलौने और सजावट (गीत, नव वर्ष का केक, पटाखे, रौशनी की मालाएँ, क्रिसमस के उपहार, क्रिसमस के उत्सव, और परमप्रसाद) की तो बात ही छोड़ो—क्या वे मनुष्यों के मनों की मूर्तियाँ नहीं हैं? सब्त के दिन रोटी का तोड़ना, दाखरस, और उत्तम वस्त्र और भी अधिक प्रभावी मूर्तियाँ हैं। चीन के सारे लोकप्रिय पारम्परिक त्यौहार, जैसे ड्रैगन हैड्स-रेजिंग दिवस, ड्रैगन बोट महोत्सव, मध्य-शरद ऋतु महोत्सव, लाबा महोत्सव, और नव वर्ष उत्सव, और धार्मिक जगत के त्यौहार जैसे ईस्टर, बपतिस्मा दिवस, और क्रिसमस, आज इन सभी अनुचित त्यौहारों को प्राचीन काल से बहुत से लोगों द्वारा मनाया गया और हमें प्रदान कर दिया गया, जिस मनुष्यजाति की परमेश्वर ने सृष्टि की उसके साथ यह पूर्णतः असंगत है। यह मनुष्यजाति की समृद्ध कल्पना और प्रवीण धारणा ही है जिसने उन्हें तब से लेकर आज तक आगे बढ़ाया है। ऐसा प्रतीत होता है कि उनमें कोई दोष नहीं है, परंतु यह मनुष्यजाति के साथ शैतान द्वारा खेली गयी चालें हैं। जिस स्थान पर शैतानों की जितनी ज्यादा भीड़ होती है, उतना ही पुराने ढंग का और पिछड़ा हुआ वह स्थान होता है, उतनी ही गहराई से सामंती प्रथा दृढ़ होती है। यह वस्तुएं लोगों को इतनी कस कर बाँध देती हैं कि हिलने-डुलने के लिए कुछ भी स्थान नहीं रह जाता है। धार्मिक जगत के बहुत सारे त्यौहार मौलिकता का प्रदर्शन करते और परमेश्वर के कार्य के लिए एक सेतु का निर्माण करते प्रतीत होते हैं; किन्तु वास्तव में वे शैतान के अदृश्य बंधन हैं, जिनसे शैतान लोगों को बाँध देता है ताकि वे परमेश्वर को न जान पाएं—वे सब शैतान की धूर्त रणनीतियाँ हैं। वास्तव में, जब परमेश्वर के कार्य का एक चरण समाप्त हो जाता है, तो वह पहले ही बिना कोई चिह्न छोड़े, उस समय के साधन और शैली को नष्ट कर चुका होता है। परंतु, "सच्चे विश्वासी" अनुभूति की जा सकने वाली वस्तुओं की आराधना करना जारी रखते हैं; इस दौरान वे आगे का अध्ययन न करते हुए, उन वस्तुओं को बिल्कुल भुला देते हैं जो परमेश्वर के पास हैं, ऐसा लगता है कि उनके मन में परमेश्वर के प्रति अगाध प्रेम है जबकि वास्तव में वे उसे बहुत पहले ही घर के बाहर धकेल चुके हैं और शैतान को आराधना-स्थल पर स्थापित कर चुके हैं। यीशु, क्रूस, मरियम, यीशु का बपतिस्मा, अंतिम भोज के चित्रों को लोग स्वर्ग के प्रभु के रूप में आदर देते हैं, इस पूरे समय वे बार-बार "पिता परमेश्वर" पुकारते हैं। क्या यह सब मज़ाक नहीं है? ...

मनुष्य के स्वभाव में परिवर्तन करने के लिए सबसे अच्छा तरीका लोगों के अंतर्मन के उन भागों को बदलना है जिन्हें गहन रूप से विषैला कर दिया गया है, ताकि लोग अपनी विचारधारा और नैतिकता को बदल सकें। सबसे पहले तो लोगों को स्पष्ट रूप से देखने की ज़रूरत है कि परमेश्वर के लिए धार्मिक संस्कार, धार्मिक गतिविधियाँ, वर्ष और महीने, और त्यौहार घृणास्पद हैं। उन्हें सामंती विचारधारा के बंधनों से मुक्त होना चाहिए और अंधविश्वास की गहरी प्रवृति के हर प्रभाव को जड़ से उखाड़ देना चाहिए। यह सब मनुष्यजाति के प्रवेश में सम्मिलित हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "कार्य और प्रवेश (3)" से उद्धृत

संदर्भ के लिए धर्मोपदेश और संगति के उद्धरण:

एक उचित आध्यात्मिक जीवन में उचित रूप से प्रार्थना करना, परमेश्वर के वचनों को खाना और पीना, सत्य पर संगति करना, अपने कर्तव्य को करना, और स्तुति के गीत गाना शामिल हैं। ये अभ्यास लोगों के सत्य में प्रवेश करने और स्वभावात्मक बदलाव के लिए बहुत फायदेमंद है। धार्मिक अनुष्ठान, हालाँकि, बिना रुचि के किये जाने होते हैं, उनका अर्थ वह नहीं होता है जैसा कि कोई कहता है, और तुच्छ, लापरवाह, और पाखंडी होना हैं। ये सभी सतही तरीके हैं जो परमेश्वर को ठगते हैं। धार्मिक अनुष्ठानों का वास्तविकता से पृथक्करण होता है, और इसमें थोड़ी-सी भी वास्तविकता नहीं होती है—यह दिखावे मात्र के लिए मुँह में शब्दों को बोलना है, और सर्वथा प्रभावहीन है। एक उचित आध्यात्मिक जीवन पूरी तरह से वास्तविकता पर आधारित होता है; यह वास्तविकता के साथ संयोजन से आता है, और इससे भी अधिक यह ऐसी ईमानदारी है जो हृदय से आती है, और अपने आप में, यह प्रभावशाली है और परमेश्वर द्वारा स्वीकार की जाती है। उदाहरण के लिए, उचित प्रार्थना को लें: यह व्यक्ति की वास्तविक समस्याओं से निकलती है और जीवन में उनकी आवश्यकताओं से निकलती है। यह उनकी अंतरात्मा की तात्कालिक आवश्यकताओं का प्रतिनिधित्व करती है, और इसलिए पवित्र आत्मा का कार्य प्राप्त करती है। प्रार्थना, हालाँकि, धार्मिक अनुष्ठानों के संदर्भ में, इस नियम का उल्लंघन करती है। कोई व्यक्ति किसी भी समय या किसी भी जगह पर अर्थहीन रूप से यूँ ही प्रार्थना की कुछ पंक्तियाँ बोल सकता है, जबकि वह अपने हृदय में ऊब और पेरणा का अभाव महसूस करता हो। ऐसे में वह पवित्र आत्मा के कार्य को कैसे प्राप्त कर सकता है? जाहिर है, वह प्रार्थना करना नहीं चाहता है फिर भी वह खुद को प्रार्थना करने के लिए बाध्य करता है—यह कुछ ऐसा है जो नियम के विपरीत है। सामान्य परिस्थितियों में, कोई व्यक्ति संभवतः निरंतर प्रार्थना नहीं करते रह सकता है; प्रार्थना नहीं करते समय कोई परमेश्वर के वचनों को खा और पी सकता है, और सत्य पर संगति कर सकता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि आध्यात्मिक जीवन कुछ ऐसा होता है जिसे विनियमित नहीं किया जा सकता है बल्कि केवल व्यक्ति की अपनी स्थिति और वास्तविक ज़रूरतों के अनुसार निर्धारित होता है। अच्छे परिणामों को प्राप्त करने का केवल यही एकमात्र रास्ता है। एक असली आध्यात्मिक जीवन उचित होता है, और यह तब होता है जब चीज़ें प्राकृतिक रूप से घटित होती हैं। इसमें नियमों का पालन करना और अनुष्ठानों का आयोजन करना बिल्कुल शामिल नहीं होता है। सभी धार्मिक अनुष्ठान नियम-क़ायदे और मानव-निर्मित ढकोसले हैं; और इनमें ईमानदारी से खोज करना शामिल नहीं होता है। यही कारण है कि परमेश्वर उन्हें पाखंडी कहता है। एक उचित आध्यात्मिक जीवन परमेश्वर के कार्य से गुज़रने से घटित होता है, और इसमें पवित्र आत्मा के कार्य और मनुष्य द्वारा शुरू की गई कार्रवाई का मिश्रण होता है। यद्यपि इस तरह के आध्यात्मिक जीवन में नियम-क़ायदे या अनुष्ठान नहीं होते हैं, फिर भी यह वास्तव में ठोस लाभकारी परिणाम लाता है। जब तुम धार्मिक अनुष्ठानों से सामान्य आध्यात्मिक जीवन में चले जाते हो, केवल तभी तुम परमेश्वर में विश्वास करने के सही मार्ग में प्रवेश कर लेते हो।

— ऊपर से संगति से उद्धृत

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