1. आज, धार्मिक दुनिया के कई लोगों को लगता है कि पादरी के प्रचारों में कोई प्रकाश नहीं होता है। वे विश्वासियों के विश्वास को कम होते हुए देखते हैं, लोग केवल भौतिक सुखों की चर्चा करते हैं और संसार के प्रचलनों का पीछा करते हैं, और कुछ लोग कलीसियाओं में व्यापार भी करते हैं। उन्हें चिंता है कि उनकी कलीसिया एक झूठी कलीसिया है, और जब प्रभु लौटेगा, तो वह उन्हें त्याग देगा। लेकिन ऐसे लोग भी हैं जो मानते हैं कि उनकी कलीसिया संभवत: झूठी कलीसिया नहीं हो सकती क्योंकि वे बाइबल पर प्रतियोगिताओं, पवित्र भोज और विभिन्न त्योहारों के उत्सव जैसी जीवंत घटनाओं को आयोजित करते हैं। तो हमें झूठी कलीसियाओं की पहचान कैसे करनी चाहिए?
संदर्भ के लिए बाइबल के पद :
“यीशु ने परमेश्वर के मन्दिर में जाकर उन सब को, जो मन्दिर में लेन-देन कर रहे थे, निकाल दिया, और सर्राफों के पीढ़े और कबूतर बेचनेवालों की चौकियाँ उलट दीं; और उनसे कहा, ‘लिखा है, “मेरा घर प्रार्थना का घर कहलाएगा”; परन्तु तुम उसे डाकुओं की खोह बनाते हो’” (मत्ती 21:12-13)।
“लौदीकिया की कलीसिया के दूत को यह लिख : ‘जो आमीन और विश्वासयोग्य और सच्चा गवाह है, और परमेश्वर की सृष्टि का मूल कारण है, वह यह कहता है कि मैं तेरे कामों को जानता हूँ कि तू न तो ठंडा है और न गर्म : भला होता कि तू ठंडा या गर्म होता। इसलिये कि तू गुनगुना है, और न ठंडा है और न गर्म, मैं तुझे अपने मुँह में से उगलने पर हूँ। तू कहता है कि मैं धनी हूँ और धनवान हो गया हूँ और मुझे किसी वस्तु की घटी नहीं; और यह नहीं जानता कि तू अभागा और तुच्छ और कंगाल और अंधा और नंगा है’” (प्रकाशितवाक्य 3:14-17)।
“उसने ऊँचे शब्द से पुकारकर कहा, गिर गया, बड़ा बेबीलोन गिर गया है! वह दुष्टात्माओं का निवास, और हर एक अशुद्ध आत्मा का अड्डा, और हर एक अशुद्ध और घृणित पक्षी का अड्डा हो गया। क्योंकि उसके व्यभिचार की भयानक मदिरा के कारण सब जातियाँ गिर गई हैं, और पृथ्वी के राजाओं ने उसके साथ व्यभिचार किया है, और पृथ्वी के व्यापारी उसके सुख-विलास की बहुतायत के कारण धनवान हुए हैं” (प्रकाशितवाक्य 18:2-3)।
परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :
एक सामान्य आध्यात्मिक जीवन प्रार्थना करने, भजन गाने, कलीसियाई जीवन में भाग लेने और परमेश्वर के वचनों को खाने-पीने जैसे अभ्यासों तक सीमित नहीं है। बल्कि, इसमें एक ताजा और जीवंत आध्यात्मिक जीवन जीना शामिल है। जो बात मायने रखती है वो यह नहीं है कि तुम अभ्यास कैसे करते हो, बल्कि यह है कि तुम्हारे अभ्यास का परिणाम क्या होता है। अधिकांश लोगों का मानना है कि एक सामान्य आध्यात्मिक जीवन में आवश्यक रूप से प्रार्थना करना, भजन गाना, परमेश्वर के वचनों को खाना-पीना या उसके वचनों पर मनन-चिंतन करना शामिल है, भले ही ऐसे अभ्यासों का वास्तव में कोई प्रभाव हो या न हो, चाहे वे सच्ची समझ तक ले जाएँ या न ले जाएँ। ये लोग सतही प्रक्रियाओं के परिणामों के बारे में सोचे बिना उन पर ध्यान केंद्रित करते हैं; वे ऐसे लोग हैं जो धार्मिक अनुष्ठानों में जीते हैं, वे ऐसे लोग नहीं हैं जो कलीसिया के भीतर रहते हैं, वे राज्य के लोग तो बिलकुल नहीं हैं। उनकी प्रार्थनाएँ, भजन-गायन और परमेश्वर के वचनों को खाना-पीना—ये सब विनियमों का अनुपालन करने का मात्र एक रूप हैं, जो मजबूरीवश और केवल चलन के साथ बने रहने के लिए किए जाते हैं। ये अपनी इच्छा से या हृदय से नहीं किए जाते हैं। ये लोग कितनी भी प्रार्थना करें या गाएँ, उनके प्रयास निष्फल होंगे, क्योंकि वे जिनका अभ्यास करते हैं, वे केवल धर्म के विनियम और अनुष्ठान हैं; वे वास्तव में परमेश्वर के वचनों का अभ्यास नहीं कर रहे हैं। वे केवल बाहरी तौर-तरीकों पर ही ध्यान केंद्रित करते रहते हैं और परमेश्वर के वचनों के साथ उन विनियमों जैसा व्यवहार करते हैं जिनका पालन किया ही जाना चाहिए। ऐसे लोग परमेश्वर के वचनों को अभ्यास में नहीं ला रहे हैं; वे सिर्फ देह को तृप्त कर रहे हैं और दूसरे लोगों को दिखाने के लिए प्रदर्शन कर रहे हैं। धर्म के ये विनियम और अनुष्ठान सभी मूल रूप से मानवीय हैं; वे परमेश्वर से नहीं आते हैं। परमेश्वर विनियमों का पालन नहीं करता है, न ही वह किसी व्यवस्था का पालन करता है। बल्कि वह हर दिन नई चीज़ें करता है, व्यावहारिक कार्य करता है। थ्री-सेल्फ कलीसिया के लोग, जो हर दिन सुबह की प्रार्थना में शामिल होने, शाम की प्रार्थना और भोजन से पहले आभार की प्रार्थना अर्पित करने, सभी चीज़ों में धन्यवाद देने जैसे अभ्यासों तक सीमित रहते हैं—वे इस तरह जितना भी कार्य करें और चाहे जितने लंबे समय तक अभ्यास करें, उनके पास पवित्र आत्मा का कार्य नहीं होगा। जब लोग विनियमों के बीच रहते हैं और अपना ध्यान केवल अभ्यास के तरीकों पर ही केंद्रित रखते हैं, तो पवित्र आत्मा कार्य नहीं कर सकता, क्योंकि उनके हृदयों पर विनियमों और मानवीय धारणाओं का कब्जा होता है। इस प्रकार, परमेश्वर हस्तक्षेप करने और उन पर काम करने में असमर्थ है, और वे केवल व्यवस्थाओं के बंधनों में जीते रह सकते हैं। ऐसे लोग परमेश्वर का अनुमोदन प्राप्त करने में सदा के लिए असमर्थ होते हैं।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, एक सामान्य आध्यात्मिक जीवन के विषय में
परमेश्वर के कार्य के प्रत्येक चरण में मनुष्य से तद्नुरूपी अपेक्षाएँ भी होती हैं। जो लोग पवित्र आत्मा की धारा के भीतर हैं, वे सभी पवित्र आत्मा की उपस्थिति और अनुशासन के अधीन हैं, और जो पवित्र आत्मा की धारा में नहीं हैं, वे शैतान के शासन में हैं और पवित्र आत्मा के किसी भी कार्य से रहित हैं। जो लोग पवित्र आत्मा की धारा में हैं, वे वो लोग हैं जो परमेश्वर के नए कार्य को स्वीकार करते हैं और वे वो लोग हैं जो परमेश्वर के नए कार्य के साथ सहयोग करते हैं। यदि इस धारा में रहने वाले लोग सहयोग करने में अक्षम रहते हैं और इस दौरान परमेश्वर द्वारा अपेक्षित सत्य का अभ्यास करने में असमर्थ रहते हैं, तो उन्हें अनुशासित किया जाएगा और सबसे खराब बात यह होगी कि उन्हें पवित्र आत्मा द्वारा त्याग दिया जाएगा। चूँकि उन्होंने पवित्र आत्मा के नए कार्य को स्वीकार किया है, वे पवित्र आत्मा की धारा में जीते हैं, पवित्र आत्मा की देखभाल और सुरक्षा प्राप्त करते हैं। जो लोग सत्य को अभ्यास में लाने के इच्छुक हैं, उन्हें पवित्र आत्मा द्वारा प्रबुद्ध किया जाता है, और जो लोग सत्य को अभ्यास में लाने के अनिच्छुक हैं, उन्हें पवित्र आत्मा द्वारा अनुशासित किया जाता है, यहाँ तक कि उन्हें दंड भी दिया जा सकता है। चाहे वे किसी भी प्रकार के व्यक्ति हों, यदि वे पवित्र आत्मा की धारा के भीतर हैं, तो परमेश्वर अपने नाम की खातिर उन सभी लोगों की जिम्मेदारी लेगा, जो उसके नए कार्य को स्वीकार करते हैं। जो लोग उसके नाम को महिमामंडित करते हैं और उसके वचनों को अभ्यास में लाने के इच्छुक हैं, वे उसके आशीष प्राप्त करेंगे; जो लोग उससे विद्रोह करते हैं और उसके वचनों को अभ्यास में नहीं लाते, वे उसका दंड प्राप्त करेंगे। जो लोग पवित्र आत्मा की धारा में हैं, वे वो लोग हैं जो नए कार्य को स्वीकार करते हैं और चूँकि उन्होंने नए कार्य को स्वीकार कर लिया है, इसलिए उन्हें उसी के अनुसार परमेश्वर के साथ सहयोग करना चाहिए, और उन विद्रोहियों के समान कार्य नहीं करना चाहिए, जो अपना कर्तव्य नहीं निभाते। यह मनुष्य से परमेश्वर की एकमात्र अपेक्षा है। जो लोग नए कार्य को स्वीकार नहीं करते, उनके मामले में ऐसा नहीं है : वे पवित्र आत्मा की धारा से बाहर हैं, और पवित्र आत्मा का अनुशासन और फटकार उन पर बिल्कुल भी लागू नहीं होते। पूरे दिन ये लोग देह में जीते हैं, अपने मस्तिष्क के भीतर जीते हैं। वे जो कुछ भी करते हैं, वह सब उनके अपने मानसिक विश्लेषण और अनुसंधान से उत्पन्न हुए धर्म-सिद्धांतों के अनुसार होता है; यह वह नहीं है जो पवित्र आत्मा के नए कार्य द्वारा अपेक्षित है और यह परमेश्वर के साथ सहयोग तो बिल्कुल भी नहीं है। जो लोग परमेश्वर के नए कार्य को स्वीकार नहीं करते, वे परमेश्वर की उपस्थिति से वंचित रहते हैं, और इससे भी बढ़कर, वे परमेश्वर के आशीषों और सुरक्षा से रहित होते हैं। उनकी अधिकांश कथनी और करनी पवित्र आत्मा के पुराने कार्य की अपेक्षाओं को थामे रहते हैं; वे धर्म-सिद्धांत हैं, सत्य नहीं। ऐसे धर्म-सिद्धांत और विनियम यह साबित करने के लिए पर्याप्त हैं कि इन लोगों का एक-साथ इकट्ठा होना धर्म के अलावा कुछ नहीं है; वे चुने हुए लोग या परमेश्वर के कार्य के लक्ष्य नहीं हैं। उनका एक साथ इकट्ठा होना केवल एक धार्मिक खिचड़ी कहलाया जा सकता है; उसे कलीसिया नहीं कहा जा सकता। यह एक अपरिवर्तनीय तथ्य है। उनके पास पवित्र आत्मा का नया कार्य नहीं है; जो कुछ वे करते हैं वह धर्म का द्योतक होता है, वे जिसे जीते हैं वह धर्म से भरा हुआ होता है; उनमें पवित्र आत्मा की उपस्थिति और कार्य नहीं होता, और वे पवित्र आत्मा का अनुशासन या प्रबुद्धता प्राप्त करने के लायक तो बिल्कुल भी नहीं हैं। ये समस्त लोग निर्जीव लाशें और कीड़े हैं, जो आध्यात्मिकता से रहित हैं। उन्हें मनुष्य की विद्रोहशीलता और विरोध का कोई ज्ञान नहीं है, मनुष्य के समस्त कुकर्मों का कोई ज्ञान नहीं है, और वे परमेश्वर के समस्त कार्य और परमेश्वर के वर्तमान इरादों को तो बिल्कुल भी नहीं जानते। वे सभी अज्ञानी, अधम लोग हैं, और वे कूडा-करकट हैं जो विश्वासी कहलाने के योग्य नहीं हैं! वे जो कुछ भी करते हैं, उसकी परमेश्वर के प्रबंधन के लिए कोई प्रासंगिकता नहीं है और वह परमेश्वर की योजनाओं को तो बिल्कुल भी नहीं बिगाड़ सकता। उनकी कथनी और करनी अत्यंत घृणास्पद और अत्यंत दयनीय होती हैं, ये उल्लेख करने के लायक भी नहीं हैं। जो लोग पवित्र आत्मा की धारा में नहीं हैं, उनके द्वारा किए गए किसी भी कार्य का पवित्र आत्मा के नए कार्य के साथ कोई लेना-देना नहीं है। इस वजह से, चाहे वे कुछ भी क्यों न करें, उनमें पवित्र आत्मा का अनुशासन नहीं होता है, पवित्र आत्मा की—प्रबुद्धता तो बिल्कुल नहीं होती है। कारण, वे सभी ऐसे लोग हैं, जिन्हें सत्य से कोई प्रेम नहीं है, और जिन्हें पवित्र आत्मा ने तिरस्कृत कर दिया है। उन्हें कुकर्मी कहा जाता है, क्योंकि वे अपनी मर्जी से काम करते हैं, अपनी देह पर काम करते हैं और ऐसा करते हुए परमेश्वर के नाम का झंडा लहराते हैं; क्योंकि वे जानबूझकर परमेश्वर के प्रति शत्रुता रखते हैं और परमेश्वर के कार्य के विपरीत काम करते हैं। परमेश्वर के साथ सहयोग करने में मनुष्य की असफलता अपने आप में चरम रूप से विद्रोही है, इसलिए क्या वे लोग, जो जानबूझकर परमेश्वर के प्रतिकूल चलते हैं, विशेष रूप से अपना उचित प्रतिफल प्राप्त नहीं करेंगे?
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का अभ्यास
जो सेवा पवित्र आत्मा के वर्तमान वचनों से बाहर हो वह देह और धारणाओं की सेवा है और इसका परमेश्वर के इरादों के अनुरूप होना असंभव है। यदि लोग धार्मिक धारणाओं के बीच जीते हैं तो वे ऐसा कुछ भी करने में असमर्थ होते हैं जो परमेश्वर के इरादों के अनुरूप हो और भले ही वे परमेश्वर की सेवा करें, वे अपनी कल्पनाओं और धारणाओं के घेरे में ही सेवा करते हैं और परमेश्वर के इरादों के अनुसार सेवा करने में पूरी तरह असमर्थ होते हैं। जो लोग पवित्र आत्मा के कार्य का अनुसरण करने में असमर्थ हैं, वो परमेश्वर के इरादों को नहीं समझते और जो परमेश्वर के इरादों को नहीं समझते, वो परमेश्वर की सेवा नहीं कर सकते। परमेश्वर ऐसी सेवा चाहता है जो उसके इरादों के अनुरूप हो; वह ऐसी सेवा नहीं चाहता, जो धारणाओं और देह की हो। यदि लोग पवित्र आत्मा के कार्य के चरणों का पालन करने में असमर्थ हैं, तो वो धारणाओं के बीच रहते हैं। ऐसे लोगों की सेवा गड़बड़ी और विघ्न पैदा करती है और ऐसी सेवा परमेश्वर के विरुद्ध चलती है। इस प्रकार, जो लोग परमेश्वर के पदचिह्नों पर चलने में असमर्थ हैं, वे परमेश्वर की सेवा करने में असमर्थ हैं; जो लोग परमेश्वर के पदचिह्नों पर चलने में असमर्थ हैं, वे निश्चित रूप से परमेश्वर का विरोध करते हैं और वे निश्चित रूप से परमेश्वर के अनुरूप होने में अक्षम हैं। “पवित्र आत्मा के कार्य का अनुसरण” करने का मतलब है परमेश्वर के वर्तमान इरादों को समझना और परमेश्वर की वर्तमान अपेक्षाओं के अनुसार कार्य करने में सक्षम होना, आज के परमेश्वर का अनुसरण करना और उसके प्रति समर्पण करना और परमेश्वर के नवीनतम वचनों के अनुरूप प्रवेश करना। केवल यही ऐसा है जो पवित्र आत्मा के कार्य का अनुसरण करता है और पवित्र आत्मा के प्रवाह में है। ऐसे लोग न केवल परमेश्वर की स्वीकृति प्राप्त करने और परमेश्वर को देखने में सक्षम हैं बल्कि परमेश्वर के नवीनतम कार्य से उसके स्वभाव को भी जान सकते हैं और परमेश्वर के नवीनतम कार्य से मनुष्य की धारणाओं और उसके विद्रोहीपन को, मनुष्य की प्रकृति और सार को जान सकते हैं; इसके अलावा, वो अपनी सेवा के दौरान धीरे-धीरे अपने स्वभाव में परिवर्तन हासिल करने में सक्षम होते हैं। केवल ऐसे लोग ही हैं, जो परमेश्वर को प्राप्त करने में सक्षम हैं और जो सचमुच में सच्चा मार्ग पा चुके हैं। जिन लोगों को पवित्र आत्मा के कार्य द्वारा हटा दिया गया है वे ऐसे लोग हैं जो परमेश्वर के नवीनतम कार्य का अनुसरण करने में अक्षम हैं और जो परमेश्वर के नवीनतम कार्य के विरुद्ध हो जाते हैं। ऐसे लोग खुलेआम परमेश्वर का विरोध इसलिए करते हैं क्योंकि परमेश्वर ने नया कार्य किया है और क्योंकि परमेश्वर की छवि उनकी धारणाओं के अनुरूप नहीं है—जिसके परिणामस्वरूप वो परमेश्वर का खुलेआम विरोध करते हैं और परमेश्वर पर निर्णय देते हैं, जिसके नतीजे में परमेश्वर उन्हें ठुकरा देता है। परमेश्वर के नवीनतम कार्य का ज्ञान रखना कोई आसान बात नहीं है, लेकिन अगर लोग उद्देश्यपूर्ण ढंग से परमेश्वर के कार्य के प्रति समर्पण कर सकते हैं और परमेश्वर के कार्य को खोज सकते हैं तो उन्हें परमेश्वर को देखने का मौका मिलेगा, और उन्हें पवित्र आत्मा का नवीनतम मार्गदर्शन प्राप्त करने का मौका मिलेगा। जो जानबूझकर परमेश्वर के कार्य का विरोध करते हैं, वे पवित्र आत्मा का प्रबोधन या परमेश्वर का मार्गदर्शन प्राप्त नहीं कर सकते हैं; इस प्रकार, लोग परमेश्वर का नवीनतम कार्य प्राप्त कर सकते हैं या नहीं, यह परमेश्वर के अनुग्रह पर निर्भर करता है, साथ ही यह उनके अनुसरण और उनके इरादों पर निर्भर करता है।
जो पवित्र आत्मा के वर्तमान वचनों के प्रति समर्पण कर पाते हैं वे सब धन्य हैं। इस बात से कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि लोग कैसे हुआ करते थे या उनमें पवित्र आत्मा कैसे कार्य किया करता था—जिन्होंने परमेश्वर का नवीनतम कार्य प्राप्त किया है, वे सब सर्वाधिक धन्य हैं और जो आज नवीनतम कार्य का अनुसरण नहीं कर पाते हैं, वे सब हटा दिए जाएँगे। परमेश्वर उन्हें चाहता है जो नई रोशनी स्वीकार करने में सक्षम हैं और वह उन्हें चाहता है जो उसके नवीनतम कार्य को स्वीकार करते और जानते हैं। ऐसा क्यों कहा गया है कि तुम लोगों को पवित्र कुँवारी होना चाहिए? एक पवित्र कुँवारी पवित्र आत्मा के कार्य को खोजने में और नई चीज़ों को समझने में सक्षम होती है, और इसके अलावा, पुरानी धारणाओं को भुलाकर परमेश्वर के आज के कार्य के प्रति समर्पण करने में सक्षम होती है। इस समूह के लोग, जो आज के नवीनतम कार्य को स्वीकार करते हैं, परमेश्वर द्वारा युगों पहले ही पूर्वनिर्धारित किए जा चुके थे और वे सबसे अधिक धन्य लोग हैं। तुम लोग सीधे परमेश्वर की आवाज सुनते हो और परमेश्वर का प्रकटन देखते हो और इस तरह समस्त स्वर्ग और पृथ्वी पर और सारे युगों और पीढ़ियों में, कोई भी तुम लोगों, लोगों के इस समूह से अधिक धन्य नहीं रहा है। यह सब परमेश्वर के कार्य के कारण है, परमेश्वर के पूर्व-निर्धारण और चयन के कारण और परमेश्वर के अनुग्रह के कारण है; अगर परमेश्वर ने बात न की होती और अपने वचन नहीं कहे होते, तो क्या तुम लोगों की स्थितियाँ वैसी होतीं जैसी आज हैं? इस प्रकार, सारी महिमा और प्रशंसा परमेश्वर की हो क्योंकि यह सब परमेश्वर का उत्कर्ष है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के सबसे नए कार्य को जानो और उसके पदचिह्नों का अनुसरण करो
मनुष्य के प्रवेश करने के समय के दौरान जीवन सदा उबाऊ होता है, आध्यात्मिक जीवन के नीरस तत्त्वों से भरा, जैसे प्रार्थना करना, परमेश्वर के वचनों को खाना-पीना, या सभाओं में शामिल होना, इसलिए लोगों को हमेशा लगता है कि परमेश्वर पर विश्वास करने में कोई विशेष आनंद नहीं आता। ऐसी आध्यात्मिक क्रियाएँ हमेशा मनुष्यजाति के मूल शैतानी भ्रष्ट स्वभाव के आधार पर की जाती हैं। यद्यपि कभी-कभी लोगों को पवित्र आत्मा का प्रबोधन प्राप्त हो सकता है, परंतु उनकी मूल सोच, स्वभाव, जीवन-शैली और आदतें अभी भी उनके भीतर जड़ पकड़े हुए हैं, और इसलिए उनकी अंतर्निहित प्रकृति अपरिवर्तित ही बनी रहती है। जिन अंधविश्वासी गतिविधियों में लोग संलग्न रहते हैं, परमेश्वर उनसे सबसे ज्यादा घृणा करता है, परंतु बहुत-से लोग अभी भी यह सोचकर उन्हें त्यागने में असमर्थ हैं कि अंधविश्वास की इन गतिविधियों को परमेश्वर द्वारा नियत किया गया है और आज भी उन्हें पूरी तरह से त्यागा जाना बाकी है। ऐसी चीज़ें, जैसे युवा लोगों द्वारा विवाह-भोज और दुल्हन के साज-सामान का प्रबंध; नकद उपहार, प्रीतिभोज और आनंद के अवसर मनाने के ऐसे ही अन्य तरीके; पूर्वजों से चले आ रहे पारंपरिक आनुष्ठानिक सूत्र; मृतकों और उनके अंतिम संस्कार के लिए की जाने वाली वे सारी निरर्थक अंधविश्वासी गतिविधियाँ, ये सब परमेश्वर के लिए और भी अधिक घृणास्पद हैं। यहाँ तक कि आराधना का दिन (धार्मिक जगत द्वारा मनाए जाने वाले सब्त समेत) भी उसके लिए घृणास्पद है; और लोगों के बीच के सामाजिक संबंधों और सांसारिक मेलजोल का परमेश्वर और भी अधिक तिरस्कार करता है। यहाँ तक कि वसंतोत्सव और क्रिसमस, जिन्हें हर कोई जानता है, भी परमेश्वर द्वारा नियत नहीं किए गए हैं, फिर इन त्योहारों के अवसर पर प्रयोग होने वाली वस्तुओं और सजावटों जैसे वसंतोत्सव की शुभकामना-पट्टियाँ, पटाखे, लालटेनें, पवित्र समागम, क्रिसमस के उपहार और क्रिसमस के उत्सव की तो बात ही छोड़ दो। क्या ये सब लोगों के मन की मूर्तियाँ नहीं हैं? सब्त के दिन रोटी और शराब साझा करना और बढ़िया लिनन निश्चित रूप से और भी अधिक प्रभावी मूर्तियाँ हैं। चीन में लोकप्रिय सभी पारंपरिक पर्व-दिवस, जैसे ड्रैगन के सिर उठाने का दिन, ड्रैगन नौका महोत्सव, मध्य-शरद महोत्सव, लाबा महोत्सव और नव वर्ष उत्सव, और धार्मिक जगत के त्योहार जैसे ईस्टर, बपतिस्मा दिवस और क्रिसमस, ये सभी अनुचित त्योहार प्राचीन काल से बहुत लोगों द्वारा गढ़े गए हैं और आगे सौंपे जाते रहे हैं। यह मनुष्यजाति की समृद्ध कल्पना और प्रवीण धारणा ही है, जिसने उन्हें तब से लेकर आज तक आगे बढ़ाया है। ये निर्दोष प्रतीत होते हैं, परंतु वास्तव में ये शैतान द्वारा मनुष्यजाति के साथ खेली जाने वाली चालें हैं। जो स्थान शैतानों से जितना अधिक भरा होता है और जितना अधिक पुराना तथा पिछड़ा होता है, वहाँ सामंती रीति-रिवाज उतनी ही गहराई से जड़ें जमाए रहते हैं। ये चीज़ें लोगों को कसकर बाँध देती हैं और उनके हिलने-डुलने की भी गुंजाइश नहीं छोड़तीं। धार्मिक जगत के कई त्योहार बड़ी मौलिकता प्रदर्शित करते और परमेश्वर के कार्य के लिए एक सेतु का निर्माण करते प्रतीत होते हैं; किंतु वास्तव में वे शैतान के अदृश्य बंधन हैं, जिनसे वह लोगों को बाँध देता है और परमेश्वर को जानने से रोक देता है—वे सब शैतान के षड्यंत्र हैं। वास्तव में, जब परमेश्वर के कार्य का एक चरण समाप्त हो जाता है, तो वह उस समय के साधन और शैली नष्ट कर चुका होता है और उनका कोई निशान नहीं छोड़ता। परंतु “सच्चे विश्वासी” उन मूर्त भौतिक वस्तुओं की आराधना करना जारी रखते हैं; इस बीच वे परमेश्वर के पास जो है, उसे अपने मन के एक कोने में डाल देते हैं और उसका अध्ययन नहीं करते, वे अपने आपको परमेश्वर के प्रेम से भरा हुआ समझते हैं, जबकि वास्तव में वे बहुत पहले ही परमेश्वर को घर के बाहर धकेल चुके होते हैं और आराधना के लिए शैतान को मेज पर बिठा चुके होते हैं। यीशु के चित्र, क्रूस, मरियम, यीशु का बपतिस्मा और अंतिम भोज—लोग इन सबकी “स्वर्ग के प्रभु” के रूप में आराधना करते हैं, जबकि पूरे समय बार-बार “प्रभु, स्वर्गिक पिता” पुकारते रहते हैं। क्या यह सब मज़ाक नहीं है? आज तक मनुष्यजाति को सौंपी गई ऐसी कई बातों और प्रथाओं से परमेश्वर को घृणा है; वे गंभीरता से परमेश्वर के लिए आगे के मार्ग में बाधा डालती हैं और इससे भी बढ़कर वे मानवजाति के प्रवेश में भारी नुकसान पहुँचाती हैं। ...
मनुष्य के स्वभाव को बदलने का सबसे अच्छा तरीका लोगों के अंतर्मन के उन हिस्सों को ठीक करना है, जिन्हें गहराई से विषैला कर दिया गया है, ताकि लोग अपनी सोच और नैतिकता को बदलने की शुरुआत कर सकें। सबसे पहले, लोगों को स्पष्ट रूप से यह देखने की ज़रूरत है कि परमेश्वर के लिए धार्मिक संस्कार, धार्मिक गतिविधियाँ, वर्ष और महीने, और त्योहार घृणास्पद हैं। उन्हें सामंती विचारधारा के इन बंधनों से मुक्त होना चाहिए और अंधविश्वास की गहरी जमी बैठी प्रवृत्ति के हर निशान को जड़ से उखाड़ देना चाहिए। ये सब मनुष्यजाति के प्रवेश में सम्मिलित हैं। तुम लोगों को यह समझना चाहिए कि क्यों परमेश्वर मनुष्यजाति को रिवाजों से बाहर ले जाता है और फिर क्यों वह मनुष्यजाति को विनियमों से दूर ले जाता है। यही वह द्वार है, जिससे तुम लोग प्रवेश करोगे, और यद्यपि इन चीज़ों का तुम्हारे आध्यात्मिक अनुभव के साथ कोई संबंध नहीं है, फिर भी ये तुम लोगों का प्रवेश और परमेश्वर को जानने का मार्ग अवरुद्ध करने वाली सबसे बड़ी अड़चनें हैं। वे मिलकर एक ऐसा जाल बनाती हैं, जो लोगों को फँसा लेता है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, कार्य और प्रवेश (3)