2. विभिन्न धार्मिक संप्रदाय अब धार्मिक अनुष्ठान का कर्तव्यनिष्ठा से पालन करते हुए दिखाई देते हैं, लेकिन पादरी केवल बाइबल और धर्मशास्त्रीय सिद्धांतों के शब्दों और वाक्यांशों का प्रचार करने पर ध्यान केंद्रित करते हैं, और पवित्र आत्मा के ज्ञान और रोशनी का पूरी तरह से अभाव होता है। विश्वासियों का जीवन पूरी तरह से प्रावधान-रहित है। उन्होंने कई वर्षों से प्रभु पर विश्वास किया है लेकिन वे सत्य से अनभिज्ञ हैं और प्रभु के वचनों को अभ्यास में लाने में असमर्थ हैं। प्रभु में उनकी आस्था एक धार्मिक मान्यता के अलावा कुछ नहीं है। मुझे समझ नहीं आता कि आज कलीसियाएँ धर्म में क्यों उतर आईं हैं।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

परमेश्वर के कार्य के प्रत्येक चरण में मनुष्य से तद्नुरूपी अपेक्षाएँ भी होती हैं। जो लोग पवित्र आत्मा की धारा के भीतर हैं, वे सभी पवित्र आत्मा की उपस्थिति और अनुशासन के अधीन हैं, और जो पवित्र आत्मा की धारा में नहीं हैं, वे शैतान के शासन में हैं और पवित्र आत्मा के किसी भी कार्य से रहित हैं। जो लोग पवित्र आत्मा की धारा में हैं, वे वो लोग हैं जो परमेश्वर के नए कार्य को स्वीकार करते हैं और वे वो लोग हैं जो परमेश्वर के नए कार्य के साथ सहयोग करते हैं। यदि इस धारा में रहने वाले लोग सहयोग करने में अक्षम रहते हैं और इस दौरान परमेश्वर द्वारा अपेक्षित सत्य का अभ्यास करने में असमर्थ रहते हैं, तो उन्हें अनुशासित किया जाएगा और सबसे खराब बात यह होगी कि उन्हें पवित्र आत्मा द्वारा त्याग दिया जाएगा। चूँकि उन्होंने पवित्र आत्मा के नए कार्य को स्वीकार किया है, वे पवित्र आत्मा की धारा में जीते हैं, पवित्र आत्मा की देखभाल और सुरक्षा प्राप्त करते हैं। जो लोग सत्य को अभ्यास में लाने के इच्छुक हैं, उन्हें पवित्र आत्मा द्वारा प्रबुद्ध किया जाता है, और जो लोग सत्य को अभ्यास में लाने के अनिच्छुक हैं, उन्हें पवित्र आत्मा द्वारा अनुशासित किया जाता है, यहाँ तक कि उन्हें दंड भी दिया जा सकता है। चाहे वे किसी भी प्रकार के व्यक्ति हों, यदि वे पवित्र आत्मा की धारा के भीतर हैं, तो परमेश्वर अपने नाम की खातिर उन सभी लोगों की जिम्मेदारी लेगा, जो उसके नए कार्य को स्वीकार करते हैं। जो लोग उसके नाम को महिमामंडित करते हैं और उसके वचनों को अभ्यास में लाने के इच्छुक हैं, वे उसके आशीष प्राप्त करेंगे; जो लोग उससे विद्रोह करते हैं और उसके वचनों को अभ्यास में नहीं लाते, वे उसका दंड प्राप्त करेंगे। जो लोग पवित्र आत्मा की धारा में हैं, वे वो लोग हैं जो नए कार्य को स्वीकार करते हैं और चूँकि उन्होंने नए कार्य को स्वीकार कर लिया है, इसलिए उन्हें उसी के अनुसार परमेश्वर के साथ सहयोग करना चाहिए, और उन विद्रोहियों के समान कार्य नहीं करना चाहिए, जो अपना कर्तव्य नहीं निभाते। यह मनुष्य से परमेश्वर की एकमात्र अपेक्षा है। जो लोग नए कार्य को स्वीकार नहीं करते, उनके मामले में ऐसा नहीं है : वे पवित्र आत्मा की धारा से बाहर हैं, और पवित्र आत्मा का अनुशासन और फटकार उन पर बिल्कुल भी लागू नहीं होते। पूरे दिन ये लोग देह में जीते हैं, अपने मस्तिष्क के भीतर जीते हैं। वे जो कुछ भी करते हैं, वह सब उनके अपने मानसिक विश्लेषण और अनुसंधान से उत्पन्न हुए धर्म-सिद्धांतों के अनुसार होता है; यह वह नहीं है जो पवित्र आत्मा के नए कार्य द्वारा अपेक्षित है और यह परमेश्वर के साथ सहयोग तो बिल्कुल भी नहीं है। जो लोग परमेश्वर के नए कार्य को स्वीकार नहीं करते, वे परमेश्वर की उपस्थिति से वंचित रहते हैं, और इससे भी बढ़कर, वे परमेश्वर के आशीषों और सुरक्षा से रहित होते हैं। उनकी अधिकांश कथनी और करनी पवित्र आत्मा के पुराने कार्य की अपेक्षाओं को थामे रहते हैं; वे धर्म-सिद्धांत हैं, सत्य नहीं। ऐसे धर्म-सिद्धांत और विनियम यह साबित करने के लिए पर्याप्त हैं कि इन लोगों का एक-साथ इकट्ठा होना धर्म के अलावा कुछ नहीं है; वे चुने हुए लोग या परमेश्वर के कार्य के लक्ष्य नहीं हैं। उनका एक साथ इकट्ठा होना केवल एक धार्मिक खिचड़ी कहलाया जा सकता है; उसे कलीसिया नहीं कहा जा सकता। यह एक अपरिवर्तनीय तथ्य है। उनके पास पवित्र आत्मा का नया कार्य नहीं है; जो कुछ वे करते हैं वह धर्म का द्योतक होता है, वे जिसे जीते हैं वह धर्म से भरा हुआ होता है; उनमें पवित्र आत्मा की उपस्थिति और कार्य नहीं होता, और वे पवित्र आत्मा का अनुशासन या प्रबुद्धता प्राप्त करने के लायक तो बिल्कुल भी नहीं हैं। ये समस्त लोग निर्जीव लाशें और कीड़े हैं, जो आध्यात्मिकता से रहित हैं। उन्हें मनुष्य की विद्रोहशीलता और विरोध का कोई ज्ञान नहीं है, मनुष्य के समस्त कुकर्मों का कोई ज्ञान नहीं है, और वे परमेश्वर के समस्त कार्य और परमेश्वर के वर्तमान इरादों को तो बिल्कुल भी नहीं जानते। वे सभी अज्ञानी, अधम लोग हैं, और वे कूडा-करकट हैं जो विश्वासी कहलाने के योग्य नहीं हैं! वे जो कुछ भी करते हैं, उसकी परमेश्वर के प्रबंधन के लिए कोई प्रासंगिकता नहीं है और वह परमेश्वर की योजनाओं को तो बिल्कुल भी नहीं बिगाड़ सकता। उनकी कथनी और करनी अत्यंत घृणास्पद और अत्यंत दयनीय होती हैं, ये उल्लेख करने के लायक भी नहीं हैं। जो लोग पवित्र आत्मा की धारा में नहीं हैं, उनके द्वारा किए गए किसी भी कार्य का पवित्र आत्मा के नए कार्य के साथ कोई लेना-देना नहीं है। इस वजह से, चाहे वे कुछ भी क्यों न करें, उनमें पवित्र आत्मा का अनुशासन नहीं होता है, पवित्र आत्मा की—प्रबुद्धता तो बिल्कुल नहीं होती है। कारण, वे सभी ऐसे लोग हैं, जिन्हें सत्य से कोई प्रेम नहीं है, और जिन्हें पवित्र आत्मा ने तिरस्कृत कर दिया है। उन्हें कुकर्मी कहा जाता है, क्योंकि वे अपनी मर्जी से काम करते हैं, अपनी देह पर काम करते हैं और ऐसा करते हुए परमेश्वर के नाम का झंडा लहराते हैं; क्योंकि वे जानबूझकर परमेश्वर के प्रति शत्रुता रखते हैं और परमेश्वर के कार्य के विपरीत काम करते हैं। परमेश्वर के साथ सहयोग करने में मनुष्य की असफलता अपने आप में चरम रूप से विद्रोही है, इसलिए क्या वे लोग, जो जानबूझकर परमेश्वर के प्रतिकूल चलते हैं, विशेष रूप से अपना उचित प्रतिफल प्राप्त नहीं करेंगे?

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का अभ्यास

“पर मैं तुम से कहता हूँ कि यहाँ वह है जो मन्दिर से भी बड़ा है। यदि तुम इसका अर्थ जानते, ‘मैं दया से प्रसन्न होता हूँ, बलिदान से नहीं,’ तो तुम निर्दोष को दोषी न ठहराते। मनुष्य का पुत्र तो सब्त के दिन का भी प्रभु है” (मत्ती 12:6-8)। यहाँ “मंदिर” किसे संदर्भित करता है? आसान शब्दों में कहें तो, यह एक भव्य, ऊँची इमारत को संदर्भित करता है, और व्यवस्था के युग में मंदिर याजकों के लिए परमेश्वर की आराधना करने का स्थान था। जब प्रभु यीशु ने कहा, “कि यहाँ वह है जो मन्दिर से भी बड़ा है,” तो “वह” किसे संदर्भित करता है? स्पष्ट रूप से “वह” देह में मौजूद प्रभु यीशु है, क्योंकि केवल वही मंदिर से बड़ा था। इन वचनों ने लोगों को क्या बताया? उन्होंने लोगों को मंदिर से बाहर आने के लिए कहा—परमेश्वर पहले ही मंदिर को छोड़ चुका है और अब उसमें कार्य नहीं कर रहा, इसलिए लोगों को मंदिर के बाहर परमेश्वर के पदचिह्न ढूँढ़ने चाहिए और उसके नए कार्य में उसके कदमों का अनुसरण करना चाहिए। जब प्रभु यीशु ने यह कहा, तो उसके वचनों के पीछे एक आधार था और वह यह कि व्यवस्था के अधीन लोग मंदिर को स्वयं परमेश्वर से भी बड़ा समझने लगे थे। अर्थात्, लोग परमेश्वर की आराधना करने के बजाय मंदिर की आराधना करते थे, इसलिए प्रभु यीशु ने उन्हें चेतावनी दी कि वे मूर्तियों की आराधना न करें, बल्कि उनके बजाय परमेश्वर की आराधना करें, क्योंकि वह सर्वोच्च है। इसलिए उसने कहा : “मैं दया से प्रसन्न होता हूँ, बलिदान से नहीं।” यह स्पष्ट है कि प्रभु यीशु की नजरों में, व्यवस्था के अधीन अधिकतर लोग अब यहोवा की आराधना नहीं करते थे, बल्कि बेमन से केवल बलिदान करते थे, और प्रभु यीशु ने तय किया कि यह मूर्ति-पूजा है। इन मूर्ति-पूजकों ने मंदिर को परमेश्वर से बड़ी और ऊँची चीज समझ लिया था। उनके हृदय में केवल मंदिर था, परमेश्वर नहीं, और यदि उन्हें मंदिर छोड़ना पड़ता, तो उनका निवास-स्थान भी छूट जाता। मंदिर के अतिरिक्त उनके पास आराधना के लिए कोई जगह नहीं थी, और वे अपने बलिदान नहीं कर सकते थे। उनका तथाकथित “निवास-स्थान” वह था, जहाँ वे यहोवा परमेश्वर की आराधना करने का झूठा दिखावा करते थे, ताकि वे मंदिर में रह सकें और अपने खुद के क्रियाकलाप कर सकें। उनका तथाकथित “बलिदान” मंदिर में सेवा करने की आड़ में अपने खुद के व्यक्तिगत शर्मनाक व्यवहार कार्यान्वित करना भर था। यही कारण था कि उस समय लोग मंदिर को परमेश्वर से भी बड़ा समझते थे। प्रभु यीशु ने ये वचन लोगों को चेतावनी देने के लिए बोले थे, क्योंकि वे मंदिर का उपयोग एक आड़ के रूप में, और बलिदानों का उपयोग लोगों और परमेश्वर को धोखा देने के एक आवरण के रूप में करते थे। यदि तुम इन वचनों को वर्तमान में लागू करो, तो ये अभी भी उतने ही वैध और प्रासंगिक हैं। यद्यपि आज लोगों ने व्यवस्था के युग के लोगों की तुलना में परमेश्वर के एक भिन्न कार्य का अनुभव किया है, किंतु उनका प्रकृति सार एक-समान हैं।

—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III

अगर परमेश्वर में विश्वास रखने वाला कोई व्यक्ति सत्य का ऐसे पालन करता है मानो वह विनियमों का संकलन हो, तो क्या उसका विश्वास धार्मिक अनुष्ठान में संलग्न होने की ओर नहीं बढ़ेगा? (जरूर बढ़ेगा।) धार्मिक अनुष्ठानों का पालन ईसाई धर्म से बिल्कुल अलग नहीं है—ऐसा करने वाले लोग थोड़े ज्यादा उन्नत हैं और शिक्षण और सिद्धांत के मामले में तरक्की कर चुके हैं, और अपनी आस्था में थोड़े ज्यादा ऊँचे और उन्नत हैं। बस इतना ही है। परमेश्वर में विश्वास, अगर धार्मिक विश्वास, धर्मशास्त्र के अध्ययन, और विनियमों और अनुष्ठानों के संकलन में तब्दील हो जाता है, तो क्या यह ईसाई धर्म में तब्दील नहीं हो गया है? नई और पुरानी शिक्षाओं में अंतर है, लेकिन अगर तुम सत्य को सिर्फ धर्म-सिद्धांत समझते हो, और परमेश्वर के कार्य का अनुभव करने का तरीका जानना तो दूर, यह भी नहीं जानते कि सत्य का अभ्यास कैसे करें—और चाहे तुम कितने भी वर्ष परमेश्वर में विश्वास रखो, कितने भी कष्ट सहो, तुम्हारा व्यवहार कितना भी अच्छा हो, फिर भी सत्य की तुम्हारी समझ सच्ची नहीं है, तुमने सत्य हासिल नहीं किया है, या सत्य वास्तविकता में प्रवेश नहीं किया है—तो क्या विश्वास का तुम्हारा तरीका ईसाई धर्म वाला नहीं है? क्या यह ईसाई धर्म का सार नहीं है? (हाँ।) तो अपने क्रियाकलापों या अपने कर्तव्य निर्वहन में तुम्हारी ऐसी क्या दृष्टियाँ या दशाएँ हैं जो ईसाइयत के लोगों के समान या बिल्कुल वही होती हैं? (हम विनियमों का पालन कर खुद को शब्दों और धर्म-सिद्धांतों से लैस करते हैं।) विनियमों का पालन, शब्दों और धर्म-सिद्धांतों का प्रचार, सत्य को शब्द और धर्म-सिद्धांत मान लेना—और क्या? (हम काम करने पर ध्यान देते हैं, जीवन प्रवेश पर नहीं।) तुम सिर्फ मेहनत करने पर ध्यान देते हो, जीवन प्राप्त करने या सत्य वास्तविकता में प्रवेश करने पर नहीं—और क्या? (हम आध्यात्मिकता और अच्छे व्यवहार के प्रकटन पर ध्यान देते हैं।) अब तुम लोगों ने थोड़ा बता दिया है, इसलिए मैं उसे संक्षेप में पेश करूँगा : अच्छे व्यवहार के प्रकटन का अनुसरण करना, और खुद को आध्यात्मिकता की चादर में लपेटने की जबरदस्त कोशिश करना, और लोगों द्वारा अपनी धारणाओं और कल्पनाओं में सही माने जाने वाले और उनके द्वारा समर्थन किए जाने वाले काम करना—यह झूठी आध्यात्मिकता का अनुसरण है। ऐसा व्यक्ति पाखंडी है, जो बड़े जोर-शोर से शब्दों और धर्म-सिद्धांतों का प्रचार करता है, जो दूसरों को अच्छी चीजें करने और अच्छा इंसान बनने का निर्देश देता है, और जो आध्यात्मिक व्यक्ति होने का दिखावा करता है। फिर भी अपने आचरण में और मामलों से निपटने में और अपने कर्तव्य निर्वहन में, वह कभी भी सत्य नहीं खोजता, बल्कि शैतानी स्वभाव के साथ जीता है। उसके साथ कुछ भी घटित हो जाए, वह अपनी ही इच्छा से चलता है, परमेश्वर को किनारे कर देता है। वह कभी भी सत्य सिद्धांतों के अनुसार काम नहीं करता; वह सिर्फ विनियमों का पालन करता है। वह सत्य को बिल्कुल नहीं समझता, न ही वह परमेश्वर के इरादों या मनुष्य से परमेश्वर के अपेक्षित मानकों को समझता है, या यह समझता है कि मनुष्य को बचाकर परमेश्वर क्या हासिल करेगा। वह कभी भी सत्य के इन विवरणों पर गंभीरता से गौर नहीं करता न ही इनके बारे में पूछता है। मनुष्य की ये तमाम बातें और व्यवहार जिस चीज का खुलासा करते हैं, वह पाखंड है। ऐसे लोगों के दिलों की सच्ची दशाओं और उनके बाहरी व्यवहार को देखकर, सुनिश्चित हुआ जा सकता है कि उनमें सत्य वास्तविकता बिल्कुल भी नहीं है, वे दरअसल पाखंडी फरीसी हैं, छद्म-विश्वासी हैं। अगर कोई व्यक्ति परमेश्वर में विश्वास तो रखता है मगर सत्य का अनुसरण नहीं करता, तो क्या उसका विश्वास सच्चा है? (नहीं।) क्या कोई व्यक्ति जो अनेक वर्षों से परमेश्वर में विश्वास रखता है, मगर सत्य को बिल्कुल स्वीकार न करे, तो क्या वह परमेश्वर का भय मान सकता है, और बुराई से दूर रह सकता है? (नहीं।) वह यह प्राप्त नहीं कर सकता। तो फिर ऐसे लोगों के व्यवहार की प्रकृति क्या है? वे किस प्रकार के मार्ग पर चल सकते हैं? (फरीसियों का मार्ग।) वे अपने आप को किस चीज से सज्जित करने में अपने दिन बिताते हैं? क्या ये शब्द और धर्म-सिद्धांत नहीं हैं? वे खुद को फरीसियों जैसा और अधिक बनाने, और अधिक आध्यात्मिक बनाने और परमेश्वर की सेवा करने वाले लोगों जैसा और अधिक बनाने के लिए खुद को शब्दों और धर्म-सिद्धांतों से लैस और सुसज्जित करने में अपने दिन बिताते हैं—भला इन सब कर्मों की प्रकृति क्या है? क्या यह परमेश्वर की आराधना करना है? क्या यह उसमें सच्ची आस्था है? (नहीं, यह नहीं है।) तो, वे क्या कर रहे हैं? वे परमेश्वर को धोखा दे रहे हैं; वे बस एक प्रक्रिया के चरण पूरे कर रहे हैं। वे आस्था का ध्वज लहरा रहे हैं और धार्मिक अनुष्ठान कर रहे हैं, आशीषित होने का अपना लक्ष्य प्राप्त करने के लिए परमेश्वर को धोखा देने का प्रयास कर रहे हैं। ये लोग परमेश्वर की आराधना बिल्कुल नहीं करते हैं। अंत में, ऐसे लोगों के समूह का अंत ठीक प्रार्थनालयों के भीतर के उन लोगों की तरह होगा जो कथित रूप से परमेश्वर की सेवा करते हैं, उसमें विश्वास रखते हैं और उसका अनुसरण करते हैं।

—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, परमेश्वर का भय मानकर ही इंसान उद्धार के मार्ग पर चल सकता है

व्यवस्था के युग के वे यहूदी फरीसी, प्रधान याजक, और धर्मशास्त्री, नाममात्र के लिए परमेश्वर में विश्वास रखते थे, लेकिन उन्होंने उसके मार्ग को पीठ दिखाई, और यहाँ तक कि देहधारी परमेश्वर को सूली पर चढ़ा दिया। तो क्या उनके विश्वास को परमेश्वर की स्वीकृति मिल सकती थी? (नहीं।) परमेश्वर ने उन्हें पहले ही एक धार्मिक समूह के रूप में निरूपित कर दिया था। जहाँ तक यीशु में विश्वास करने वालों की बात है, परमेश्वर उसी तरह उन्हें ऐसे लोगों के रूप में स्वीकार नहीं करता जो उसमें विश्वास करते हैं और उसका अनुसरण करते हैं। वे भी स्वर्ग में रहने वाले परमेश्वर में, एक अज्ञात परमेश्वर में विश्वास करते हैं और वे एक धार्मिक समूह के बराबर भी हैं; परमेश्वर उन्हें अपनी कलीसिया के सदस्यों के रूप में स्वीकार नहीं करता। परमेश्वर धार्मिक जगत की इस तरह निंदा क्यों करेगा? ऐसा इसलिए है क्योंकि धार्मिक समूहों के सभी सदस्यों, विशेष रूप से विभिन्न संप्रदायों के उच्च-स्तरीय अगुआओं के पास परमेश्वर का भय मानने वाला दिल नहीं है, वे परमेश्वर की इच्छा के अनुसार नहीं चलते हैं और वे सभी छद्म-विश्वासी हैं। वे परमेश्वर के देहधारण में विश्वास नहीं करते, सत्य को स्वीकार करना तो दूर की बात है। वे अंत के दिनों में परमेश्वर के कार्य को कभी नहीं खोजते न ही वे परमेश्वर द्वारा व्यक्त किए गए सत्यों की जाँच करते हैं या उन्हें स्वीकार करते हैं और वे अंत के दिनों में परमेश्वर के देहधारण के कार्य की सीधे निंदा और ईशनिंदा तक कर सकते हैं। इसमें व्यक्ति स्पष्ट तौर पर देख सकता है कि वे शायद परमेश्वर में नाममात्र के लिए विश्वास रखते हों, मगर परमेश्वर उन्हें अपने विश्वासियों के रूप में स्वीकार नहीं करता है; वह कहता है कि वे कुकर्मी हैं, कि वे जो भी करते हैं उसका उसके उद्धार के कार्य से जरा भी संबंध नहीं है, वे गैर-विश्वासी हैं जो उसके वचनों से बाहर हैं। यदि परमेश्वर में अपने विश्वास में तुम लोग केवल अच्छे बाहरी व्यवहार रखने का अनुसरण करते हो और तुम लोग किसी भी मामले में कभी सत्य नहीं खोजते बल्कि लोगों की बात मानते हो और उनकी सुनते हो तो क्या वह दिन नहीं आ जाएगा जब तुम लोग भी गिरकर धर्म के अनुयायी बन जाओगे? धर्म के भीतर से परमेश्वर में विश्वास उद्धार प्राप्त नहीं कर सकता—असल में ऐसा क्यों है? यदि तुम लोग इसकी असलियत नहीं देख सकते तो यह दर्शाता है कि तुम लोग सत्य या परमेश्वर के इरादों को बिल्कुल नहीं समझते। परमेश्वर में विश्वास करने वालों के साथ जो सबसे दुखद बात हो सकती है वह है उनका एक धार्मिक समूह में गिर जाना और परमेश्वर द्वारा हटा दिया जाना। मनुष्य के लिए यह अकल्पनीय है, और जो लोग सत्य नहीं समझते, वे इस मामले को कभी स्पष्ट रूप से नहीं देख सकते। मुझे बताओ, जब एक कलीसिया परमेश्वर की दृष्टि में धीरे-धीरे धर्म में तब्दील हो चुकी होती है और अपनी स्थापना के बाद बहुत सारे वर्षों से गुजरकर एक संप्रदाय बन चुकी होती है तो क्या इसके लोग परमेश्वर के उद्धार के पात्र हैं? क्या वे उसके घर के सदस्य हैं? (नहीं।) वे सदस्य नहीं हैं। ये लोग, जो सच्चे परमेश्वर में केवल नाममात्र के लिए विश्वास रखते हैं, फिर भी वह उन्हें धर्म को मानने वाले लोग मानता है; ये किस मार्ग पर चलते हैं? जिस मार्ग पर वे चलते हैं उस पर वे परमेश्वर में विश्वास की पताका लिए होते हैं, फिर भी वे कभी उसके मार्ग का अनुसरण नहीं करते; यह ऐसा मार्ग है जिस पर वे उसमें विश्वास तो रखते हैं फिर भी उसकी आराधना कभी नहीं करते, यहाँ तक कि वे उसे त्याग देते हैं; यह ऐसा मार्ग है जिस पर वे परमेश्वर में विश्वास रखने का दावा करते हैं, फिर भी उसका प्रतिरोध करते हैं। ऊपर से तो, वे परमेश्वर के नाम में, सच्चे परमेश्वर में विश्वास रखते हैं, लेकिन वास्तविकता ये है कि वे शैतान और दानवों की आराधना करते हैं, वे मानवीय उद्यम में संलिप्त रहते हैं और स्वतंत्र मानवीय राज्यों की स्थापना करते हैं। यही वो मार्ग है जिस पर वे चलते हैं। परमेश्वर में अपने विश्वास में वे जिस मार्ग पर चलते हैं उसे देखने से यह स्पष्ट है कि वे छद्म-विश्वासियों का जत्था हैं, मसीह-विरोधियों का गिरोह हैं, उन शैतानों और दानवों का समूह हैं जो विशिष्ट रूप से परमेश्वर का प्रतिरोध करता और उसके कार्य को बाधित करता है। धार्मिक जगत का यही सार है। क्या ऐसे लोगों के समूह का मनुष्य के उद्धार के लिए परमेश्वर की प्रबंधन योजना से कोई सरोकार है? (नहीं।) परमेश्वर के विश्वासी, वे चाहे जितने भी हों, अगर उनके विश्वास को परमेश्वर द्वारा एक धार्मिक समूह के विश्वास के रूप में निरूपित किया जाता है तो ये लोग परमेश्वर के कार्य और उद्धार के पात्र नहीं हैं। परमेश्वर ने इसे पहले ही निर्धारित कर दिया है और इन लोगों को बचाया नहीं जा सकता। मैं ऐसा क्यों कहता हूँ? परमेश्वर के कार्य या मार्गदर्शन के बिना एक समूह जो बिल्कुल भी न उसके सामने समर्पण करता है और न उसकी आराधना करता है, शायद वह नाममात्र के लिए उसमें विश्वास रखता हो, लेकिन वह धर्म के पादरियों और एल्डरों का ही अनुसरण और पालन करता है, और धर्म के पादरी और एल्डर अपने सार से ही शैतान के और पाखंडी होते हैं। इसलिए, वे लोग जिनका अनुसरण और पालन करते हैं वे शैतान और दानव हैं। वे परमेश्वर में विश्वास करने का दावा करते हैं, लेकिन दरअसल, मनुष्य उनके साथ हेर-फेर करता है, वे इंसानी आयोजनों और वर्चस्व के अधीन होते हैं। तो, मूल रूप से वे जिनका अनुसरण और पालन करते हैं वे शैतान और दानव हैं, परमेश्वर का प्रतिरोध करने वाली दुराचारी शक्तियाँ हैं, और परमेश्वर के शत्रु हैं। क्या परमेश्वर ऐसे लोगों के गिरोह को बचाएगा? (नहीं।) क्यों नहीं? देखो, क्या ऐसे लोग पश्चात्ताप करने में सक्षम होते हैं? वे पश्चात्ताप नहीं करेंगे। वे परमेश्वर में आस्था की पताका के नीचे इंसानी कामकाज और उद्यमों से जुड़ जाते हैं, जोकि मनुष्य के उद्धार हेतु परमेश्वर की प्रबंधन योजना के विपरीत है, और उनका अंतिम परिणाम यह होगा कि वे परमेश्वर द्वारा ठुकरा दिए जाते हैं। परमेश्वर द्वारा इन लोगों को बचाना असंभव है, और वे पश्चात्ताप करने में सक्षम नहीं हैं; वे शैतान के कब्जे में आ गए हैं और परमेश्वर इन लोगों को उसे ही सौंप देता है। परमेश्वर में किसी की आस्था को परमेश्वर की स्वीकृति मिल सकेगी या नहीं, क्या यह उसकी परमेश्वर में आस्था की अवधि पर निर्भर करता है? क्या यह किसी के द्वारा किए जाने वाले अनुष्ठानों या माने जाने वाले विनियमों के प्रकार पर निर्भर करता है? क्या परमेश्वर इंसानी प्रथाओं को देखता है? क्या वह उनकी संख्या देखता है? (नहीं।) तो फिर वह किस बात पर गौर करता है? जब परमेश्वर लोगों के एक समूह को चुनता है, तो वह किस आधार पर यह मापता है कि उन्हें बचाया जा सकता है कि नहीं और वह उन्हें बचाएगा कि नहीं? यह इस पर आधारित है कि वे सत्य को स्वीकार कर सकते हैं कि नहीं; यह उस मार्ग पर आधारित है जिस पर वे चलते हैं। हालाँकि परमेश्वर ने अनुग्रह के युग में मनुष्य को उतने सत्य नहीं बताए होंगे, जितने वह आज बताता है, और हालाँकि वे इतने विनिर्दिष्ट नहीं थे, फिर भी वह उस समय भी मनुष्य को पूर्ण करने में सक्षम था, और ऐसे लोग भी थे जो बचाए जा सके। तो आज के युग के लोग, जिन्होंने इतने सत्य सुने हैं और जो परमेश्वर के इरादे समझते हैं, अगर उसके मार्ग का अनुसरण नहीं कर सकते, या उद्धार के मार्ग पर नहीं चल सकते, तो अंत में उनका परिणाम क्या होगा? उनका अंतिम परिणाम वैसा ही होगा जैसा ईसाई धर्म और यहूदी धर्म के विश्वासियों का हुआ—उन्हीं की तरह उन्हें भी बचाया नहीं जा सकेगा। यह परमेश्वर का धार्मिक स्वभाव है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि तुमने कितने धर्मोपदेश सुने हैं या तुमने कितने सत्य समझे हैं; यदि तुम अभी भी लोगों द्वारा गुमराह किए जाने में—लोगों और शैतान का अनुसरण करने में—सक्षम हो और तुम अंत में परमेश्वर के मार्ग पर चलने में सक्षम नहीं हो, न ही उसका भय मानने और बुराई से दूर रहने में सक्षम हो तो ऐसे व्यक्ति को परमेश्वर द्वारा ठुकरा दिया जाता है। संभव है धर्म के लोग बाइबल के विशाल ज्ञान का प्रचार करने में सक्षम हों, और वे कुछ आध्यात्मिक धर्म-सिद्धांत समझते हों, लेकिन वे परमेश्वर के कार्य के प्रति समर्पण नहीं कर पाते, उसके वचनों का अभ्यास और अनुभव नहीं कर पाते, या सच्चे दिल से उसकी आराधना नहीं कर पाते, न ही वे उसका भय मान पाते हैं और न बुराई से दूर रह पाते हैं। वे सब पाखंडी हैं, वे ऐसे लोग नहीं हैं जो सच्चे दिल से परमेश्वर के प्रति समर्पण करते हैं। परमेश्वर की दृष्टि में, ऐसे लोगों को एक धार्मिक समूह, इंसानी गिरोह और शैतान के बसेरे के रूप में परिभाषित किया जाता है। सामूहिक रूप में, वे शैतान के गिरोह हैं, मसीह-विरोधियों का राज्य हैं, और परमेश्वर उन्हें पूरी तरह ठुकरा देता है।

—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, परमेश्वर का भय मानकर ही इंसान उद्धार के मार्ग पर चल सकता है

पिछला: 1. आज, धार्मिक दुनिया के कई लोगों को लगता है कि पादरी के प्रचारों में कोई प्रकाश नहीं होता है। वे विश्वासियों के विश्वास को कम होते हुए देखते हैं, लोग केवल भौतिक सुखों की चर्चा करते हैं और संसार के प्रचलनों का पीछा करते हैं, और कुछ लोग कलीसियाओं में व्यापार भी करते हैं। उन्हें चिंता है कि उनकी कलीसिया एक झूठी कलीसिया है, और जब प्रभु लौटेगा, तो वह उन्हें त्याग देगा। लेकिन ऐसे लोग भी हैं जो मानते हैं कि उनकी कलीसिया संभवत: झूठी कलीसिया नहीं हो सकती क्योंकि वे बाइबल पर प्रतियोगिताओं, पवित्र भोज और विभिन्न त्योहारों के उत्सव जैसी जीवंत घटनाओं को आयोजित करते हैं। तो हमें झूठी कलीसियाओं की पहचान कैसे करनी चाहिए?

अगला: 1. प्रभु की वापसी के विषय में बाइबल में दी गई भविष्यवाणियाँ अब काफी हद तक पूरी हो चुकी हैं, और प्रभु यहाँ पहले से ही आ चुका हो सकता है। हम देखते हैं कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया सार्वजनिक रूप से ऑनलाइन गवाही दे रही है कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर प्रभु यीशु की वापसी है, और सभी धर्मों और संप्रदायों के कई लोग जो वास्तव में प्रभु में विश्वास करते हैं और जो परमेश्वर के प्रकटन के लिए तरसते हैं, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के पास लौट आए हैं। हम जानना चाहेंगे कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर, परमेश्वर का प्रकटन है या नहीं।

परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?

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5. पुराने और नए दोनों नियमों के युगों में, परमेश्वर ने इस्राएल में काम किया। प्रभु यीशु ने भविष्यवाणी की कि वह अंतिम दिनों के दौरान लौटेगा, इसलिए जब भी वह लौटता है, तो उसे इस्राएल में आना चाहिए। फिर भी आप गवाही देते हैं कि प्रभु यीशु पहले ही लौट चुका है, कि वह देह में प्रकट हुआ है और चीन में अपना कार्य कर रहा है। चीन एक नास्तिक राजनीतिक दल द्वारा शासित राष्ट्र है। किसी भी (अन्य) देश में परमेश्वर के प्रति इससे अधिक विरोध और ईसाइयों का इससे अधिक उत्पीड़न नहीं है। परमेश्वर की वापसी चीन में कैसे हो सकती है?

संदर्भ के लिए बाइबल के पद :“क्योंकि उदयाचल से लेकर अस्ताचल तक जाति-जाति में मेरा नाम महान् है..., सेनाओं के यहोवा का यही वचन है” (मलाकी...

प्रश्न: प्रभु यीशु कहते हैं: "मेरी भेड़ें मेरा शब्द सुनती हैं" (यूहन्ना 10:27)। तब समझ आया कि प्रभु अपनी भेड़ों को बुलाने के लिए वचन बोलने को लौटते हैं। प्रभु के आगमन की प्रतीक्षा से जुड़ी सबसे महत्वपूर्ण बात है, प्रभु की वाणी सुनने की कोशिश करना। लेकिन अब, सबसे बड़ी मुश्किल ये है कि हमें नहीं पता कि प्रभु की वाणी कैसे सुनें। हम परमेश्वर की वाणी और मनुष्य की आवाज़ के बीच भी अंतर नहीं कर पाते हैं। कृपया हमें बताइये कि हम प्रभु की वाणी की पक्की पहचान कैसे करें।

उत्तर: हम परमेश्वर की वाणी कैसे सुनते हैं? हममें कितने भी गुण हों, हमें कितना भी अनुभव हो, उससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता। प्रभु यीशु में विश्वास...

प्रश्न 1: सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "केवल अंत के दिनों का मसीह ही मनुष्य को अनंत जीवन का मार्ग दे सकता है," तो मुझे वह याद आया जो प्रभु यीशु ने एक बार कहा था, "परन्तु जो कोई उस जल में से पीएगा जो मैं उसे दूँगा, वह फिर अनन्तकाल तक प्यासा न होगा; वरन् जो जल मैं उसे दूँगा, वह उसमें एक सोता बन जाएगा जो अनन्त जीवन के लिये उमड़ता रहेगा" (यूहन्ना 4:14)। हम पहले से ही जानते हैं कि प्रभु यीशु जीवन के सजीव जल का स्रोत हैं, और अनन्‍त जीवन का मार्ग हैं। क्या ऐसा हो सकता है कि सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर और प्रभु यीशु समान स्रोत हों? क्या उनके कार्य और वचन दोनों पवित्र आत्मा के कार्य और वचन हैं? क्या उनका कार्य एक ही परमेश्‍वर करते हैं?

उत्तर: दोनों बार जब परमेश्‍वर ने देह धारण की तो अपने कार्य में, उन्होंने यह गवाही दी कि वे सत्‍य, मार्ग, जीवन और अनन्‍त जीवन के मार्ग हैं।...

परमेश्वर का प्रकटन और कार्य परमेश्वर को जानने के बारे में अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन मसीह-विरोधियों को उजागर करना अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ सत्य के अनुसरण के बारे में सत्य के अनुसरण के बारे में न्याय परमेश्वर के घर से शुरू होता है अंत के दिनों के मसीह, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अत्यावश्यक वचन परमेश्वर के दैनिक वचन सत्य वास्तविकताएं जिनमें परमेश्वर के विश्वासियों को जरूर प्रवेश करना चाहिए मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ राज्य का सुसमाचार फ़ैलाने के लिए दिशानिर्देश परमेश्वर की भेड़ें परमेश्वर की आवाज को सुनती हैं परमेश्वर की आवाज़ सुनो परमेश्वर के प्रकटन को देखो राज्य के सुसमाचार पर अत्यावश्यक प्रश्न और उत्तर मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 1) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 2) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 3) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 4) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 5) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 6) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 7) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 8) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 9) मैं वापस सर्वशक्तिमान परमेश्वर के पास कैसे गया

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