7. कुछ लोग सोचते हैं कि परमेश्वर में विश्वास करने का अर्थ है रविवार को कलीसिया में भाग लेने के लिए प्रतिबद्ध होना, दान करना और धर्मार्थी होना, और नियमित रूप से चर्च की गतिविधियों में भाग लेना। उनका मानना है कि इन चीज़ों को करने से उन्हें बचाया जा सकता है। क्या ऐसे विचार परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप हैं?

संदर्भ के लिए बाइबल के पद :

“जो मुझ से, ‘हे प्रभु! हे प्रभु!’ कहता है, उनमें से हर एक स्वर्ग के राज्य में प्रवेश न करेगा, परन्तु वही जो मेरे स्वर्गीय पिता की इच्छा पर चलता है। उस दिन बहुत से लोग मुझ से कहेंगे, ‘हे प्रभु, हे प्रभु, क्या हम ने तेरे नाम से भविष्यद्वाणी नहीं की, और तेरे नाम से दुष्‍टात्माओं को नहीं निकाला, और तेरे नाम से बहुत से आश्‍चर्यकर्म नहीं किए?’ तब मैं उनसे खुलकर कह दूँगा, ‘मैं ने तुम को कभी नहीं जाना। हे कुकर्म करनेवालो, मेरे पास से चले जाओ’” (मत्ती 7:21-23)

“स्वर्ग के राज्य में बलपूर्वक प्रवेश होता रहा है, और बलवान उसे छीन लेते हैं” (मत्ती 11:12)

“मैं तुम से सच कहता हूँ कि जब तक तुम न फिरो और बालकों के समान न बनो, तुम स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने नहीं पाओगे” (मत्ती 18:3)

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

यद्यपि बहुत सारे लोग परमेश्वर में विश्वास करते हैं, लेकिन कुछ ही लोग समझते हैं कि परमेश्वर में विश्वास का अर्थ क्या है और परमेश्वर के इरादों के अनुरूप चलने के लिए उन्हें वास्तव में कैसे कार्य करना चाहिए। ऐसा इसलिए है कि लोग यूँ तो “परमेश्वर” शब्द को और “परमेश्वर का कार्य” जैसे वाक्यांशों को जानते हैं, लेकिन वे परमेश्वर को नहीं जानते और उससे भी कम वे उसके कार्य को जानते हैं। तो कोई आश्चर्य नहीं कि वे सभी, जो परमेश्वर को नहीं जानते, उसमें अपने विश्वास को लेकर विवेकरहित होते हैं। लोग परमेश्वर में विश्वास को गंभीरता से नहीं लेते और यह सर्वथा इसलिए है क्योंकि परमेश्वर में विश्वास करना उनके लिए बहुत अनजाना, बहुत अजीब है। इस प्रकार वे परमेश्वर की अपेक्षाओं पर बहुत कम खरे उतरते हैं। दूसरे शब्दों में, यदि लोग परमेश्वर को नहीं जानते हैं और उसके कार्य को नहीं जानते हैं तो वे परमेश्वर के इस्तेमाल के योग्य नहीं हैं और वे उसके इरादे तो और भी कम पूरे कर पाते हैं। “परमेश्वर में विश्वास” का अर्थ यह मानना है कि परमेश्वर है; यह परमेश्वर में विश्वास करने के संबंध में सरलतम अवधारणा है। इस अवधारणा को जरा-सा आगे ले जाएँ तो यह मानना कि परमेश्वर है, परमेश्वर में सचमुच विश्वास करने जैसा नहीं है; बल्कि यह मजबूत धार्मिक संकेतार्थों युक्त एक प्रकार की साधारण आस्था है। परमेश्वर में सच्चे विश्वास का अर्थ यह है : इस विश्वास के आधार पर कि सभी वस्तुओं पर परमेश्वर की संप्रभुता है, व्यक्ति परमेश्वर के वचनों और कार्य का अनुभव करता है और इस प्रकार से अपने भ्रष्ट स्वभाव त्याग देता है, परमेश्वर के इरादे पूरे करता है और परमेश्वर को जान पाता है। केवल इस प्रकार की यात्रा को ही “परमेश्वर में विश्वास” कहा जा सकता है। फिर भी लोग परमेश्वर में विश्वास को अक्सर बहुत सरल और हल्के मामले के रूप में लेते हैं। जब लोग परमेश्वर में इस तरह विश्वास करते हैं तो यह अपना अर्थ खो देता है और भले ही वे बिल्कुल अंत तक विश्वास करते रहें, वे कभी परमेश्वर का अनुमोदन प्राप्त नहीं करेंगे, क्योंकि वे गलत मार्ग पर चलते हैं। वे लोग जो आज तक शब्दों और खोखले धर्म-सिद्धांत के अनुसार परमेश्वर में विश्वास करते हैं, वे अभी भी यह नहीं जानते कि परमेश्वर में विश्वास के सार का उनमें अभाव है और वे परमेश्वर का अनुमोदन प्राप्त नहीं कर सकते हैं। फिर भी वे परमेश्वर से शांति और पर्याप्त अनुग्रह के आशीष के लिए प्रार्थना करते हैं। आओ अपने हृदय शांत करें और गहन विचार करें : क्या ऐसा हो सकता है कि परमेश्वर में विश्वास करना पृथ्वी पर सबसे आसान बात हो? क्या परमेश्वर में विश्वास करने का अर्थ परमेश्वर से अधिक अनुग्रह पाने से बढ़कर कुछ नहीं हो सकता है? क्या परमेश्वर को जाने बिना उसमें विश्वास करने वाले या उसमें विश्वास करने के बावजूद उसका विरोध करने वाले लोग सचमुच उसके इरादे पूरे कर पाते हैं?

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, प्रस्तावना

कुछ लोग परमेश्वर में विश्वास करने के मामले को बहुत ही सरल तरीके से देखते हैं। वे सोचते हैं, “परमेश्वर में विश्वास करने का अर्थ है सभाओं में भाग लेना, प्रार्थना करना, उपदेश सुनना, संगति करना, भजन गाना और परमेश्वर की स्तुति करना और कुछ कर्तव्य निभा देना। क्या परमेश्वर पर विश्वास करना यही सब नहीं है?” चाहे तुम कितने ही वर्षों से परमेश्वर में विश्वास कर रहे हो, फिर भी तुम लोग अभी तक परमेश्वर में आस्था की सार्थकता को पूरी तरह नहीं समझ पाए हो। दरअसल, परमेश्वर में आस्था का अर्थ इतना गहन है कि अगर किसी व्यक्ति के अनुभव बहुत उथले हों तो वह इसे समझ ही नहीं पाएगा। जब वह बिल्कुल अंत तक अनुभव करता है तो शैतान का स्वभाव और उसके भीतर के शैतानी जहर अवश्य ही शुद्ध कर दिए और पूरी तरह बदल दिए जाने चाहिए। लोगों को स्वयं को कई सत्‍यों से सुसज्जित करना होगा, उन मानकों को पूरा करना होगा जिनकी अपेक्षा परमेश्वर मनुष्य से करता है, और वास्तव में परमेश्वर के प्रति समर्पण कर उसकी आराधना करने में सक्षम होना होगा। केवल तभी वास्तव में उनका उद्धार होता है। यदि तुम अब भी वैसे ही हो जैसे पहले किसी धर्म का हिस्सा होने के समय थे, बस कुछ शब्द और धर्म-सिद्धांत सुनाना और कुछ नारे लगाना, कुछ अच्छे व्यवहार और कार्य करना और कुछ पापपूर्ण चीजों से बचना—कम-से-कम स्पष्ट चीजें—यह इस बात की निशानी नहीं है कि तुमने परमेश्वर में अपने विश्वास में सही राह में प्रवेश कर लिया है। क्या विनियमों का पालन करने का मतलब यह है कि तुम सही रास्ते पर हो? क्या इसका मतलब यह है कि तुमने सही चुनाव किया है? यदि तुम्‍हारी प्रकृति के भीतर की चीजें नहीं बदलती हैं तो भी तुम अभी भी परमेश्वर का प्रतिरोध कर सकते हो और अंत में उसे नाराज कर सकते हो। यही सबसे बड़ी समस्या है। यदि तुम परमेश्वर में अपने विश्वास में इस समस्या का समाधान नहीं करते, तो क्या यह कहा जा सकता है कि तुमने वास्तव में उद्धार प्राप्त कर लिया है? इससे मेरा अभिप्राय वास्तव में क्‍या है? मैं चाहता हूँ कि तुम लोग अपने दिलों में यह समझ लो कि परमेश्वर में आस्‍था को उसके वचनों से अलग नहीं किया जा सकता, न ही इसे स्वयं परमेश्वर या सत्य से अलग किया जा सकता है। तुम्‍हें सही रास्ता चुनना होता है और सत्य और परमेश्वर के वचन के बारे में प्रयास करना होता है। तुम बस केवल आंशिक या सतही समझ प्राप्त करके नहीं रह सकते। स्वयं को मूर्ख बनाने से तुम्‍हारा ही नुकसान होगा। अपनी आस्था को अपनी कल्पनाओं पर आधारित करना अच्छा नहीं है। यदि तुम अंत तक विश्वास करते हो, और तुम्‍हारे दिल में परमेश्वर नहीं है, अगर तुम उसके वचनों को बस जल्दी-जल्‍दी पलटते हो, और बाद में उन्हें याद नहीं रख पाते, और अगर तुम्‍हारे दिल में परमेश्वर के लिए जगह नहीं है, तो समझो तुम खत्‍म हो चुके हो।

—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, सही मार्ग चुनना परमेश्वर में विश्‍वास का सबसे महत्‍वपूर्ण भाग है

लोगों की आस्था का सर्वोच्च महत्व क्या है? सरल शब्दों में कहें तो यह बचा लिए जाने के लिए है। और उद्धार का महत्व क्या है? मैं चाहता हूँ कि तुम सब लोग इस बारे में सोचकर मुझे बताओ कि वास्तव में बचा लिए जाने का अर्थ क्या है? (इसका यह अर्थ है हम शैतान के बुरे प्रभाव से मुक्त हो सकते हैं, पूरी तरह परमेश्वर की ओर मुड़ सकते हैं, और अंततः जीवित रह सकते हैं।) (शैतान की सत्ता के अधीन जीने वाले लोग मृत्यु के पात्र हैं, लेकिन जो लोग परमेश्वर के कार्य का अनुभव करने से बचाए जाते हैं वे नहीं मरेंगे।) तुम सब लोग इसे समझते हो और सिद्धांत के स्तर पर इसे समझा सकते हो, लेकिन तुम यह कतई नहीं जानते कि वास्तव में बचा लिए जाने का अर्थ क्या है। क्या बचा लिए जाने का अर्थ अपना भ्रष्ट स्वभाव त्यागना है? क्या बचाए जाने का अर्थ झूठ न बोलना, ईमानदार व्यक्ति होना और परमेश्वर से विद्रोह न करना है? बचा लिए जाने के बाद लोग किस प्रकार के होते हैं? साधारण शब्दों में, बचा लिए जाने का अर्थ यह है कि तुम जीते रह सकते हो, तुम्हें दुबारा जीवन दे दिया गया है। कभी तुम पाप में जी रहे थे, और मरना तय था—परमेश्वर की नजरों में तुम मृत इंसान थे। यह कहने का क्या आधार है? उद्धार पाने से पहले लोग किसकी सत्ता के अधीन रहते हैं? (शैतान की सत्ता के अधीन।) और शैतान की सत्ता के अधीन जीने के लिए लोग किस चीज पर निर्भर रहते हैं? वे जीने के लिए अपनी शैतानी प्रकृति और भ्रष्ट स्वभावों पर निर्भर रहते हैं। यदि ऐसा है तो उनका सारा अस्तित्व—उनकी देह, और उनकी आत्मा और विचार जैसे सारे अन्य पहलू—जीवित हैं या मृत? परमेश्वर के नजरिए से वे मृत हैं, वे चलती-फिरती लाशें हैं। ऊपरी तौर पर, तुम साँस लेते और सोच-विचार करते प्रतीत होते हो, लेकिन तुम निरंतर जिस हरेक चीज के बारे में सोच रहे हो वह बुरी है, परमेश्वर की अवज्ञा और उससे विद्रोह करती है, और तुम्हारे सारे विचार उन चीजों के बारे में हैं जिन्हें परमेश्वर सख्त नापसंद करता है, जिनसे घृणा करता है और जिनकी निंदा करता है। परमेश्वर की नजरों में ये सारी चीजें न सिर्फ देह की हैं, बल्कि ये पूरी तरह से शैतान की और दानवों की हैं। तो परमेश्वर की नजरों में भ्रष्ट इंसान क्या मनुष्य है भी? नहीं, ऐसे लोग जानवर, दानव और शैतान हैं; वे जीवित शैतान हैं! सभी लोग शैतान की प्रकृति और उसके स्वभाव को जीते हैं, और परमेश्वर की नजरों में वे मनुष्य की देह में जीवित और लिपटे हुए शैतान हैं, मनुष्य की खाल में दानव हैं। परमेश्वर ऐसे लोगों को चलती-फिरती लाशें, मुर्दे निरूपित करता है। परमेश्वर अब उद्धार का कार्य कर रहा है, जिसका अर्थ है कि वह शैतान के भ्रष्ट स्वभाव और उसके भ्रष्ट सार के अनुसार जीने वाली चलती-फिरती लाशों—मृत लोगों—को उठा लेगा और उन्हें जीवित लोगों में बदल देगा। बचा लिए जाने का यही अर्थ है। कोई भी व्यक्ति बचा लिए जाने के खातिर परमेश्वर पर विश्वास करता है—बचा लिए जाने का अर्थ क्या है? जब कोई व्यक्ति परमेश्वर का उद्धार पाता है तो वह मृत से जीवित हो जाता है। जहाँ एक समय वह शैतान का था, उसका मरना तय था, वहीं अब वह जीवन पाकर परमेश्वर का हो जाता है। अगर लोग परमेश्वर में विश्वास और उसका अनुसरण करते हुए परमेश्वर के प्रति समर्पण कर सकें, उसे जान सकें और आराधना में उसके सामने झुक सकें, अगर उनके दिल में परमेश्वर के प्रति कोई प्रतिरोध और विद्रोह न रहे, और वे उसका विरोध और उस पर आक्षेप न करें, और उसके प्रति सच्चे मन से समर्पण कर सकें तो फिर परमेश्वर की नजरों में वे सच्चे जीवित लोग हैं। क्या जो व्यक्ति परमेश्वर को सिर्फ मौखिक रूप से स्वीकार करता हो वह जीवित व्यक्ति है? (नहीं।) तो फिर जीवित व्यक्ति कैसा होता है? जीवित लोगों की वास्तविकताएँ क्या हैं? जीवित व्यक्तियों के पास क्या होना जरूरी है? तुम लोग मुझे अपनी राय बताओ। (जो लोग सत्य स्वीकार सकते हैं, वे जीवित व्यक्ति हैं। जब लोगों के वैचारिक दृष्टिकोण और चीजों से संबंधित विचार बदलकर परमेश्वर के वचनों के अनुरूप हो जाते हैं तो वे जीवित लोग होते हैं।) (जीवित लोग वे हैं जो सत्य समझते हैं और इसका अभ्यास कर सकते हैं।) (जो व्यक्ति परमेश्वर का भय मानता है और अय्यूब की तरह बुराई से दूर रहता है, वह जीवित व्यक्ति है।) (जो लोग परमेश्वर को जानते हैं, परमेश्वर के वचनों के अनुसार जी सकते हैं, और सत्य वास्तविकता को जी सकते हैं—वे जीवित लोग हैं।) तुम सब लोगों ने एक प्रकार की अभिव्यक्ति की बात की है। किसी व्यक्ति के अंततः बचा लिए जाने और जीवित मनुष्य बनने के लिए, उसे कम-से-कम परमेश्वर के वचनों को ध्यान से सुनने में सक्षम होना चाहिए, जमीर और विवेक युक्त वचन बोलने में सक्षम होना चाहिए, और उसे अवश्य ही विचारवान और विवेकशील होना चाहिए, सत्य समझने और इसका अभ्यास करने योग्य होना चाहिए, परमेश्वर के प्रति समर्पण और उसकी आराधना करने योग्य होना चाहिए। यही सच्चा जीवित व्यक्ति होता है। जीवित व्यक्ति अक्सर क्या सोचते और करते हैं? वे थोड़ा-बहुत वही कर सकते हैं जो सामान्य लोगों को करना चाहिए। मुख्य रूप से वे अपने कर्तव्य अच्छी तरह निभाते हैं, और वे जो कुछ सोचते और प्रकट करते हैं और नियमित रूप से जो कुछ कहते और करते हैं, उसमें परमेश्वर का भय मानते हैं और बुराई से दूर रहते हैं। वे अक्सर जो कुछ सोचते और करते हैं, उसकी यही प्रकृति है। इसे थोड़ा और सटीक रूप से कहें तो वे जो कुछ भी कहते और करते हैं, वह कम-से-कम मोटे तौर पर सत्य के अनुरूप होता है। परमेश्वर इसकी निंदा नहीं करता, न इससे तिरस्कार करता है, बल्कि वह इसे मानता और स्वीकृति देता है। जीवित लोग यही करते हैं, और यही उन्हें करना भी चाहिए।

—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, केवल सच्चे समर्पण के साथ ही व्यक्ति असली भरोसा रख सकता है

एक सामान्य आध्यात्मिक जीवन प्रार्थना करने, भजन गाने, कलीसियाई जीवन में भाग लेने और परमेश्वर के वचनों को खाने-पीने जैसे अभ्यासों तक सीमित नहीं है। बल्कि, इसमें एक ताजा और जीवंत आध्यात्मिक जीवन जीना शामिल है। जो बात मायने रखती है वो यह नहीं है कि तुम अभ्यास कैसे करते हो, बल्कि यह है कि तुम्हारे अभ्यास का परिणाम क्या होता है। अधिकांश लोगों का मानना है कि एक सामान्य आध्यात्मिक जीवन में आवश्यक रूप से प्रार्थना करना, भजन गाना, परमेश्वर के वचनों को खाना-पीना या उसके वचनों पर मनन-चिंतन करना शामिल है, भले ही ऐसे अभ्यासों का वास्तव में कोई प्रभाव हो या न हो, चाहे वे सच्ची समझ तक ले जाएँ या न ले जाएँ। ये लोग सतही प्रक्रियाओं के परिणामों के बारे में सोचे बिना उन पर ध्यान केंद्रित करते हैं; वे ऐसे लोग हैं जो धार्मिक अनुष्ठानों में जीते हैं, वे ऐसे लोग नहीं हैं जो कलीसिया के भीतर रहते हैं, वे राज्य के लोग तो बिलकुल नहीं हैं। उनकी प्रार्थनाएँ, भजन-गायन और परमेश्वर के वचनों को खाना-पीना, ये सब विनियमों का अनुपालन करने का एक रूप हैं, जो चलन में बने रहने के लिए मजबूरी में किए जाने वाले काम हैं। ये अपनी इच्छा से या हृदय से नहीं किए जाते हैं। ये लोग कितनी भी प्रार्थना करें या गाएँ, उनके प्रयास निष्फल होंगे, क्योंकि वे जिनका अभ्यास करते हैं, वे केवल धर्म के विनियम और अनुष्ठान हैं; वे वास्तव में परमेश्वर के वचनों का अभ्यास नहीं कर रहे हैं। वे अभ्यास किस तरह करते हैं, इस बात का बतंगड़ बनाने में ही उनका ध्यान लगा होता है और वे परमेश्वर के वचनों के साथ उन विनियमों जैसा व्यवहार करते हैं जिनका पालन किया ही जाना चाहिए। ऐसे लोग परमेश्वर के वचनों को अभ्यास में नहीं ला रहे हैं; वे सिर्फ देह को तृप्त कर रहे हैं और दूसरे लोगों को दिखाने के लिए प्रदर्शन कर रहे हैं। धर्म के ये विनियम और अनुष्ठान सभी मूल रूप से मानवीय हैं; वे परमेश्वर से नहीं आते हैं। परमेश्वर विनियमों का पालन नहीं करता है, न ही वह किसी व्यवस्था के अधीन है। बल्कि, वह हर दिन नई चीज़ें करता है, व्यावहारिक कार्य करता है। थ्री-सेल्फ कलीसिया के लोग, हर दिन सुबह की प्रार्थना सभा में शामिल होने, शाम की प्रार्थना और भोजन से पहले आभार की प्रार्थना अर्पित करने, सभी चीज़ों में धन्यवाद देने जैसे अभ्यासों तक सीमित रहते हैं—वे इस तरह जितना भी कार्य करें और चाहे जितने लंबे समय तक ऐसा करें, उनके पास पवित्र आत्मा का कार्य नहीं होगा। जब लोग विनियमों के बीच रहते हैं और अपने हृदय अभ्यास के तरीकों में ही उलझाए रखते हैं, तो पवित्र आत्मा काम नहीं कर सकता, क्योंकि उनके हृदयों पर विनियमों और मानवीय धारणाओं का कब्जा है। इस प्रकार, परमेश्वर हस्तक्षेप करने और उन पर काम करने में असमर्थ है, और वे केवल व्यवस्थाओं के नियंत्रण में जीते रह सकते हैं। ऐसे लोग परमेश्वर की प्रशंसा प्राप्त करने में सदा के लिए असमर्थ होते हैं।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, एक सामान्य आध्यात्मिक जीवन के विषय में

क्योंकि यदि तुम परमेश्वर पर विश्वास करते हो, तो तुम्हें उसके वचन को खाना-पीना चाहिए, उसका अनुभव करना चाहिए और उसे जीना चाहिए। केवल यही परमेश्वर पर विश्वास करना है! यदि तुम कहते हो कि तुम परमेश्वर पर विश्वास करते हो, परंतु उसके किसी वचन पर अमल नहीं कर सकते या वास्तविकता उत्पन्न नहीं कर सकते तो यह नहीं माना जा सकता कि तुम परमेश्वर में विश्वास करते हो। ऐसा करना “पेट भरने की खोज” में रहने जैसा है। बिना किसी वास्तविकता के केवल छोटी-छोटी बातों की गवाही, अनुपयोगी और सतही मामलों पर बातें करना, परमेश्वर पर विश्वास करना नहीं है, और तुमने बस परमेश्वर पर विश्वास करने के सही तरीके को नहीं समझा है। तुम्हें परमेश्वर के वचनों को क्यों अधिक से अधिक खाना-पीना चाहिए? यदि तुम परमेश्वर के वचनों को खाते-पीते नहीं और केवल स्वर्ग की ऊँचाई चढ़ना चाहते हो तो क्या यह विश्वास माना जाएगा? परमेश्वर में विश्वास रखने वाले का पहला कदम क्या होता है? परमेश्वर किस मार्ग से मनुष्य को पूर्ण बनाता है? क्या परमेश्वर के वचन को बिना खाए-पिए तुम पूर्ण बनाए जा सकते हो? क्या परमेश्वर के वचन को बिना अपनी वास्तविकता बनाए, तुम परमेश्वर के राज्य के व्यक्ति माने जा सकते हो? परमेश्वर में विश्वास रखना वास्तव में क्या है? परमेश्वर में विश्वास रखने वालों का कम-से-कम बाहरी तौर पर आचरण अच्छा होना चाहिए; और सबसे महत्वपूर्ण बात है परमेश्वर के वचन के अधीन रहना। किसी भी परिस्थिति में तुम उसके वचन से विमुख नहीं होगे। परमेश्वर को जानना और उसके इरादों को पूरा करना, सब उसके वचन के द्वारा हासिल किया जाता है। सभी देश, संप्रदाय, धर्म और प्रदेश भी भविष्य में वचन के द्वारा जीते जाएँगे। परमेश्वर सीधे बात करेगा, सभी लोग अपने हाथों में परमेश्वर का वचन थामकर रखेंगे; इसके द्वारा लोग पूर्ण बनाए जाएँगे। परमेश्वर का वचन सब तरफ फैलता जाएगा : इंसान परमेश्वर के वचन बोलेगा, परमेश्वर के वचन के अनुसार आचरण करेगा, और अपने हृदय में परमेश्वर का वचन रखेगा, भीतर और बाहर पूरी तरह परमेश्वर के वचन में डूबा रहेगा। इस प्रकार मानवजाति को पूर्ण बनाया जाएगा। परमेश्वर के इरादों को पूरा करने वाले और उसकी गवाही देने में सक्षम लोग वे हैं जिन्होंने परमेश्वर के वचन को वास्तविकता के रूप में अपनाया है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, राज्य का युग वचन का युग है

आज परमेश्वर में वास्तविक विश्वास क्या है? यह परमेश्वर के वचन को अपनी जीवन वास्तविकता के रूप में स्वीकार करना, और परमेश्वर का सच्चा प्यार प्राप्त करने के लिए परमेश्वर के वचन से परमेश्वर को जानना है। स्पष्ट कहूँ तो : परमेश्वर में विश्वास इसलिए है, ताकि तुम परमेश्वर के प्रति समर्पण कर सको, उससे प्रेम कर सको, और वह कर्तव्य पूरा कर सको, जिसे एक सृजित प्राणी द्वारा पूरा किया जाना चाहिए। यही परमेश्वर पर विश्वास करने का लक्ष्य है। तुम्हें परमेश्वर की मनोहरता का और इस बात का ज्ञान प्राप्त करना चाहिए कि परमेश्वर आदर के कितने योग्य है, कैसे अपने सृजित प्राणियों में परमेश्वर उद्धार का कार्य करता है और उन्हें पूर्ण बनाता है—ये परमेश्वर पर तुम्हारे विश्वास की एकदम अनिवार्य चीज़ें हैं। परमेश्वर पर विश्वास मुख्यतः देह-उन्मुख जीवन से परमेश्वर से प्रेम करने वाले जीवन में बदलना है; भ्रष्टता के भीतर जीने से परमेश्वर के वचनों के जीवन के भीतर जीना है; यह शैतान की सत्ता से बाहर आना और परमेश्वर की देखभाल और सुरक्षा में जीना है; यह देह के प्रति समर्पण को नहीं, बल्कि परमेश्वर के प्रति समर्पण को प्राप्त करने में समर्थ होना है; यह परमेश्वर को तुम्हारा संपूर्ण हृदय प्राप्त करने और तुम्हें पूर्ण बनाने देना है, और तुम्हें भ्रष्ट शैतानी स्वभाव से मुक्त करने देना है। परमेश्वर में विश्वास मुख्यतः इसलिए है, ताकि परमेश्वर का महान सामर्थ्य और महिमा तुममें प्रकट हो सके, ताकि तुम परमेश्वर की इच्छा के अनुसार चल सको, और परमेश्वर की योजना संपन्न कर सको, और शैतान के सामने परमेश्वर की गवाही दे सको। परमेश्वर पर विश्वास संकेत और चमत्कार देखने की इच्छा के इर्द-गिर्द नहीं घूमना चाहिए, न ही यह तुम्हारी व्यक्तिगत देह के वास्ते होना चाहिए। यह परमेश्वर को जानने की कोशिश के लिए, और परमेश्वर के प्रति समर्पण करने, और पतरस के समान मृत्यु तक परमेश्वर के प्रति समर्पण करने में सक्षम होने के लिए, होना चाहिए। यही परमेश्वर में विश्वास करने के मुख्य उद्देश्य हैं। व्यक्ति परमेश्वर के वचन को परमेश्वर को जानने और उसे संतुष्ट करने के उद्देश्य से खाता और पीता है। परमेश्वर के वचन को खाना और पीना तुम्हें परमेश्वर का और अधिक ज्ञान देता है, जिसके बाद ही तुम उसके प्रति समर्पण कर सकते हो। केवल परमेश्वर के ज्ञान के साथ ही तुम उससे प्रेम कर सकते हो, और यह वह लक्ष्य है, जिसे मनुष्य को परमेश्वर के प्रति अपने विश्वास में रखना चाहिए। यदि परमेश्वर पर अपने विश्वास में तुम सदैव संकेत और चमत्कार देखने का प्रयास कर रहे हो, तो परमेश्वर पर तुम्हारे विश्वास का यह दृष्टिकोण गलत है। परमेश्वर पर विश्वास मुख्य रूप से परमेश्वर के वचन को जीवन वास्तविकता के रूप में स्वीकार करना है। परमेश्वर का उद्देश्य उसके मुख से निकले वचनों को अभ्यास में लाने और उन्हें अपने भीतर पूरा करने से हासिल किया जाता है। परमेश्वर पर विश्वास करने में मनुष्य को परमेश्वर द्वारा पूर्ण किए जाने, परमेश्वर के प्रति समर्पण करने में समर्थ होने, और परमेश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण के लिए प्रयास करना चाहिए। यदि तुम बिना शिकायत किए परमेश्वर के प्रति समर्पण कर सकते हो, परमेश्वर के इरादों के प्रति विचारशील हो सकते हो, पतरस का आध्यात्मिक कद प्राप्त कर सकते हो, और परमेश्वर द्वारा कही गई पतरस की शैली ग्रहण कर सकते हो, तो यह तब होगा जब तुम परमेश्वर पर विश्वास में सफलता प्राप्त कर चुके होगे, और यह इस बात का द्योतक होगा कि तुम परमेश्वर द्वारा प्राप्त कर लिए गए हो।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के वचन के द्वारा सब-कुछ प्राप्त हो जाता है

तुम्हें जानना ही चाहिए कि मैं किस प्रकार के लोगों को चाहता हूँ; वे जो अशुद्ध हैं उन्हें राज्य में प्रवेश करने की अनुमति नहीं है, वे जो अशुद्ध हैं उन्हें पवित्र भूमि को मैला करने की अनुमति नहीं है। तुमने भले ही बहुत कार्य किया हो, और कई सालों तक कार्य किया हो, किंतु अंत में यदि तुम अब भी बुरी तरह मैले हो, तो यह स्वर्ग की व्यवस्था के लिए असहनीय होगा कि तुम मेरे राज्य में प्रवेश करना चाहते हो! संसार की स्थापना से लेकर आज तक, मैंने अपने राज्य में उन्हें कभी आसान प्रवेश नहीं दिया जो मेरी चापलूसी करते हैं। यह स्वर्गिक नियम है, और कोई इसे तोड़ नहीं सकता है! तुम्हें जीवन की खोज करनी ही चाहिए। आज, जिन्हें पूर्ण बनाया जाएगा वे उसी प्रकार के हैं जैसा पतरस था : ये वे लोग हैं जो स्वयं अपने स्वभाव में बदलाव लाने का प्रयास करते हैं, और जो परमेश्वर के लिए गवाही देने, और सृजित प्राणी के रूप में अपना कर्तव्य अच्छे से निभाने के लिए तैयार रहते हैं। केवल ऐसे लोगों को ही पूर्ण बनाया जाएगा। यदि तुम केवल पुरस्कारों की प्रत्याशा करते हो, और स्वयं अपने जीवन स्वभाव को बदलने की कोशिश नहीं करते, तो तुम्हारे सारे प्रयास व्यर्थ होंगे—यह अटल सत्य है!

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, सफलता या विफलता उस पथ पर निर्भर होती है जिस पर मनुष्य चलता है

पिछला: 6. मेरा मानना है कि एक परमेश्वर है, लेकिन मैं अभी भी युवा हूँ, मुझे अपने परिवार और अपने करियर के लिए कड़ी मेहनत करनी है, और अभी भी बहुत कुछ है जो मैं करना चाहता हूँ। यदि मैं बूढ़े होने की और परमेश्वर पर विश्वास करने का समय निकाल पाने की प्रतीक्षा करूँ, तो क्या मुझे फिर भी बचाया जाएगा?

अगला: 1. आप कहते हैं कि परमेश्वर, अंतिम दिनों के दौरान, परमेश्वर के घर से शुरू होने वाला न्याय का कार्य करता है, प्रत्येक को उनके प्रकार के अनुसार वर्गीकृत करता है, तथा अच्छे को पुरस्कृत और बुरे को दंडित करता है। तो वास्तव में परमेश्वर किस तरह के लोगों को बचाता है, और किस तरह के लोगों को हटाता है?

परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?

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5. पुराने और नए दोनों नियमों के युगों में, परमेश्वर ने इस्राएल में काम किया। प्रभु यीशु ने भविष्यवाणी की कि वह अंतिम दिनों के दौरान लौटेगा, इसलिए जब भी वह लौटता है, तो उसे इस्राएल में आना चाहिए। फिर भी आप गवाही देते हैं कि प्रभु यीशु पहले ही लौट चुका है, कि वह देह में प्रकट हुआ है और चीन में अपना कार्य कर रहा है। चीन एक नास्तिक राजनीतिक दल द्वारा शासित राष्ट्र है। किसी भी (अन्य) देश में परमेश्वर के प्रति इससे अधिक विरोध और ईसाइयों का इससे अधिक उत्पीड़न नहीं है। परमेश्वर की वापसी चीन में कैसे हो सकती है?

संदर्भ के लिए बाइबल के पद :“क्योंकि उदयाचल से लेकर अस्ताचल तक जाति-जाति में मेरा नाम महान् है..., सेनाओं के यहोवा का यही वचन है” (मलाकी...

प्रश्न: प्रभु यीशु कहते हैं: "मेरी भेड़ें मेरा शब्द सुनती हैं" (यूहन्ना 10:27)। तब समझ आया कि प्रभु अपनी भेड़ों को बुलाने के लिए वचन बोलने को लौटते हैं। प्रभु के आगमन की प्रतीक्षा से जुड़ी सबसे महत्वपूर्ण बात है, प्रभु की वाणी सुनने की कोशिश करना। लेकिन अब, सबसे बड़ी मुश्किल ये है कि हमें नहीं पता कि प्रभु की वाणी कैसे सुनें। हम परमेश्वर की वाणी और मनुष्य की आवाज़ के बीच भी अंतर नहीं कर पाते हैं। कृपया हमें बताइये कि हम प्रभु की वाणी की पक्की पहचान कैसे करें।

उत्तर: हम परमेश्वर की वाणी कैसे सुनते हैं? हममें कितने भी गुण हों, हमें कितना भी अनुभव हो, उससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता। प्रभु यीशु में विश्वास...

परमेश्वर का प्रकटन और कार्य परमेश्वर को जानने के बारे में अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन मसीह-विरोधियों को उजागर करना अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ सत्य के अनुसरण के बारे में सत्य के अनुसरण के बारे में न्याय परमेश्वर के घर से शुरू होता है अंत के दिनों के मसीह, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अत्यावश्यक वचन परमेश्वर के दैनिक वचन सत्य वास्तविकताएं जिनमें परमेश्वर के विश्वासियों को जरूर प्रवेश करना चाहिए मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ राज्य का सुसमाचार फ़ैलाने के लिए दिशानिर्देश परमेश्वर की भेड़ें परमेश्वर की आवाज को सुनती हैं परमेश्वर की आवाज़ सुनो परमेश्वर के प्रकटन को देखो राज्य के सुसमाचार पर अत्यावश्यक प्रश्न और उत्तर मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 1) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 2) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 3) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 4) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 5) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 6) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 7) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 8) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 9) मैं वापस सर्वशक्तिमान परमेश्वर के पास कैसे गया

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