1. आप कहते हैं कि परमेश्वर, अंतिम दिनों के दौरान, परमेश्वर के घर से शुरू होने वाला न्याय का कार्य करता है, प्रत्येक को उनके प्रकार के अनुसार वर्गीकृत करता है, तथा अच्छे को पुरस्कृत और बुरे को दंडित करता है। तो वास्तव में परमेश्वर किस तरह के लोगों को बचाता है, और किस तरह के लोगों को हटाता है?
संदर्भ के लिए बाइबल के पद :
“जो मुझ से, ‘हे प्रभु! हे प्रभु!’ कहता है, उनमें से हर एक स्वर्ग के राज्य में प्रवेश नहीं करेगा, बल्कि वह करेगा जो मेरे स्वर्गिक पिता की इच्छा के अनुसार चलता है। उस दिन बहुत से लोग मुझ से कहेंगे, ‘हे प्रभु, हे प्रभु, क्या हम ने तेरे नाम से भविष्यद्वाणी नहीं की, और तेरे नाम से दुष्टात्माओं को नहीं निकाला, और तेरे नाम से बहुत से आश्चर्यकर्म नहीं किए?’ तब मैं उनसे खुलकर कह दूँगा, ‘मैं ने तुम को कभी नहीं जाना। हे कुकर्म करनेवालो, मेरे पास से चले जाओ’” (मत्ती 7:21-23)।
“मैं तुम से सच कहता हूँ कि जब तक तुम न फिरो और बालकों के समान न बनो, तुम स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने नहीं पाओगे” (मत्ती 18:3)।
“जो जय पाए वही इन वस्तुओं का वारिस होगा, और मैं उसका परमेश्वर होऊँगा और वह मेरा पुत्र होगा। परन्तु डरपोकों, और अविश्वासियों, और घिनौनों, और हत्यारों और व्यभिचारियों, और टोन्हों, और मूर्तिपूजकों, और सब झूठों का भाग उस झील में मिलेगा जो आग और गन्धक से जलती रहती है : यह दूसरी मृत्यु है” (प्रकाशितवाक्य 21:7-8)।
“धन्य वे हैं, जो अपने वस्त्र धो लेते हैं, क्योंकि उन्हें जीवन के वृक्ष के पास आने का अधिकार मिलेगा, और वे फाटकों से होकर नगर में प्रवेश करेंगे। पर कुत्ते, और टोन्हें, और व्यभिचारी, और हत्यारे और मूर्तिपूजक, और हर एक झूठ का चाहनेवाला और गढ़नेवाला बाहर रहेगा” (प्रकाशितवाक्य 22:14-15)।
परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :
आजकल वे जो अनुसरण करते हैं और वे जो अनुसरण नहीं करते, दो प्रकार के लोग हैं, जिनकी मंजिलें अलग हैं। वे जो सत्य को जानने का अनुसरण करते हैं और सत्य का अभ्यास करते हैं, वे लोग हैं जिनका परमेश्वर उद्धार करेगा। जो सच्चे मार्ग को नहीं जानते, वे राक्षस और शत्रु हैं; वे प्रधान स्वर्गदूत के वंशज हैं और विनाश के पात्र होंगे। यहाँ तक कि एक अज्ञात परमेश्वर के धर्मपरायण विश्वासीजन—क्या वे भी राक्षस नहीं हैं? जिन लोगों के पास अच्छी अंतरात्मा है परंतु वे सच्चे मार्ग को स्वीकार नहीं करते हैं, वे राक्षस हैं; उनका सार भी परमेश्वर का प्रतिरोध करने का सार है। सच्चे मार्ग को स्वीकार न करने वाले वे लोग होते हैं जो परमेश्वर का प्रतिरोध करते हैं और भले ही ऐसे लोग बहुत कष्ट झेलें, तब भी वे नष्ट किए जाएँगे। वे सभी जो संसार को त्यागना नहीं चाहते, जो अपने माता-पिता से अलग होना नहीं सह सकते और जो स्वयं को देह के सुखों से दूर रखना सहन नहीं कर सकते, परमेश्वर के प्रति विद्रोही हैं और वे सब विनाश के पात्र बनेंगे। जो कोई भी देहधारी परमेश्वर में विश्वास नहीं करता है वह राक्षस है और यही नहीं, उसे नष्ट कर दिया जाएगा। वे सब जो विश्वास तो करते हैं लेकिन सत्य का अभ्यास नहीं करते, वे जो परमेश्वर के देहधारण में विश्वास नहीं करते और वे जो परमेश्वर के अस्तित्व पर लेशमात्र भी विश्वास नहीं रखते, वे सब विनाश के लक्ष्य होंगे। वे सभी जो बने रह सकते हैं, वे लोग हैं जो शोधन की पीड़ा से गुजरे हैं और अडिग रहे हैं; ये वे लोग हैं जो वास्तव में परीक्षणों से गुजरे हैं। जो कोई परमेश्वर को नहीं मानता शत्रु है; यानी जो कोई भी देहधारी परमेश्वर को नहीं मानता है—चाहे वह इस धारा के भीतर हो या बाहर—मसीह-विरोधी है! भला शैतान कौन हैं, राक्षस कौन हैं और परमेश्वर के शत्रु कौन हैं? क्या ये वे प्रतिरोधी लोग नहीं हैं जो परमेश्वर में विश्वास नहीं करते हैं? क्या ये वे लोग नहीं हैं जो परमेश्वर के खिलाफ विद्रोही हैं? क्या ये वे नहीं हैं जो आस्था होने का दावा तो करते हैं, परंतु जिनके पास सत्य नहीं है? क्या ये वे लोग नहीं हैं जो सिर्फ आशीष पाने की फिराक में रहते हैं जबकि परमेश्वर की गवाही देने में असमर्थ हैं? तुम अभी भी इन राक्षसों के साथ घुलते-मिलते हो और उनसे अंतरात्मा और प्रेम से पेश आते हो, लेकिन क्या यह शैतान के प्रति दया दिखाने के बराबर नहीं है? क्या तुम राक्षसों की जमात में नहीं हो? यदि लोग इस बिंदु तक आ गए हैं और अच्छाई-बुराई में भेद नहीं कर पाते और परमेश्वर के हृदय को खोजने की इच्छा किए बिना या परमेश्वर के हृदय को अपना हृदय मानने में असमर्थ रहते हुए आँख मूँदकर प्रेम और दया दर्शाते रहते हैं तो उनका परिणाम और भी अधिक खराब होगा। जो भी व्यक्ति देहधारी परमेश्वर पर विश्वास नहीं करता, वह परमेश्वर का शत्रु है। यदि तुम परमेश्वर के शत्रुओं के प्रति अंतरात्मा और प्रेम से व्यवहार कर सकते हो, तो क्या तुममें न्याय की भावना की कमी नहीं है? यदि तुम उनके साथ अनुरूपता में हो जिनसे मैं घृणा करता हूँ और जिनका मैं विरोध करता हूँ, तुम तब भी उनके प्रति प्रेमपूर्ण व्यवहार करते हो और निजी भावनाएँ दिखाते हो, तो क्या तुम विद्रोही नहीं हो? क्या तुम जानबूझकर परमेश्वर का प्रतिरोध नहीं कर रहे हो? क्या ऐसे व्यक्ति में असल में सत्य होता है? यदि लोग परमेश्वर के शत्रुओं के प्रति अंतरात्मा रखते हैं, राक्षसों के प्रति प्रेम रखते हैं और शैतान के लिए दया रखते हैं तो क्या वे जानबूझकर परमेश्वर के कार्य में गड़बड़ी पैदा नहीं कर रहे हैं? वे लोग जो केवल यीशु पर विश्वास करते हैं और अंत के दिनों के देहधारी परमेश्वर को नहीं मानते, और जो मौखिक रूप से देहधारी परमेश्वर में विश्वास करने का दावा करते हैं, परंतु बुरे कार्य करते हैं, वे सब मसीह-विरोधी हैं, उनकी तो बात ही क्या जो परमेश्वर में विश्वास नहीं करते हैं। ये सब लोग विनाश के पात्र होंगे। मनुष्य जिस मानक से दूसरे मनुष्यों को आंकते हैं वह उनके व्यवहार पर आधारित होता है; जिनका व्यवहार अच्छा है वे धार्मिक हैं और जिनका व्यवहार घृणित है वे बुरे हैं। परमेश्वर जिस मानक से मनुष्यों का न्याय करता है उसका आधार यह है कि क्या उनका सार परमेश्वर के प्रति समर्पण करता है कि नहीं; जो परमेश्वर के प्रति समर्पण करता है वह धार्मिक है और जो नहीं करता है वह शत्रु है और बुरा व्यक्ति है, फिर चाहे इस व्यक्ति का व्यवहार अच्छा हो या खराब और चाहे इस व्यक्ति की वाणी सही हो या गलत। कुछ लोग अच्छे कर्मों का उपयोग भविष्य में अच्छी मंज़िल प्राप्त करने के लिए करना चाहते हैं और कुछ लोग अच्छी वाणी का उपयोग एक अच्छी मंजिल हासिल करने में करना चाहते हैं। हर कोई यह गलत विश्वास करता है कि परमेश्वर लोगों के परिणाम उनके व्यवहार या वाणी के आधार पर निर्धारित करता है; इसलिए बहुत-से लोग अपने लिए क्षणिक अनुग्रह हथियाने के लिए इसका फायदा उठाना चाहते हैं। जो लोग आने वाले विश्राम के समय में जीवित बचेंगे उन सभी ने पीड़ा के दिन को सहन किया हुआ होगा और परमेश्वर की गवाही दी हुई होगी; ये सब वे लोग होंगे जिन्होंने अपने कर्तव्य अच्छे ढंग से निभा लिए होंगे और जिन्होंने सोच-समझकर परमेश्वर के प्रति समर्पण किया हुआ होगा। जो केवल सत्य का अभ्यास करने से बचने के इरादे से सिर्फ सेवा करने के अवसर का लाभ उठाना चाहते हैं वे नहीं रहेंगे। प्रत्येक व्यक्ति के परिणाम की व्यवस्था के लिए परमेश्वर के पास उचित मानक हैं; वह केवल यूँ ही किसी के शब्दों या आचरण के अनुसार ये निर्णय नहीं लेता, न ही वह एक अवधि के दौरान किसी के व्यवहार के अनुसार निर्णय लेता है। अतीत में किसी व्यक्ति द्वारा परमेश्वर के लिए की गई किसी सेवा की वजह से वह किसी के बुरे कर्मों के प्रति नर्मी कतई नहीं बरतेगा, न ही वह परमेश्वर के लिए स्वयं को खपाने की थोड़ी-सी अवधि के कारण किसी को मृत्यु से बचाएगा। कोई भी अपनी बुराई के प्रतिफल से नहीं बच सकता है, न ही कोई अपने बुरे कर्मों को छिपा सकता है और फलस्वरूप विनाश की पीड़ा से बच सकता है। यदि लोग वास्तव में अपने कर्तव्य अच्छे ढंग से निभा सकते हैं, तो इसका अर्थ है कि वे अनंतकाल तक परमेश्वर के प्रति वफादार हैं और प्रतिफल की खोज नहीं करते हैं, फिर चाहे वे आशीष प्राप्त करें या दुख सहें। यदि लोग आशीष दिखाई देने पर परमेश्वर के लिए वफादार रहते हैं और आशीष न दिखाई देने पर अपनी वफादारी खो देते हैं और अगर ये लोग—जिन्होंने कभी परमेश्वर के लिए वफादारी से श्रम किया था—अंत में परमेश्वर की गवाही देने या अपने जिम्मे आए कर्तव्य अच्छे से निभाने में असमर्थ हैं तो ऐसे लोग अभी भी विनाश के पात्र होंगे। संक्षेप में, बुरे लोग हमेशा तक जीवित नहीं रह सकते, न ही वे विश्राम में प्रवेश कर सकते हैं; केवल धार्मिक लोग विश्राम के स्वामी होंगे।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर और मनुष्य साथ-साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे
जीवित वे होते हैं जो परमेश्वर द्वारा बचाए जाते हैं; उनका परमेश्वर द्वारा न्याय किया गया है और उनकी परमेश्वर द्वारा ताड़ना की गई है, वे परमेश्वर के लिए खुद को समर्पित करने के इच्छुक होते हैं और खुशी से अपने प्राण न्योछावर करते हैं और वे सहर्ष अपना संपूर्ण जीवन परमेश्वर के लिए खपाते हैं। जब जीवित लोग परमेश्वर की गवाही देते हैं, केवल तभी शैतान को लज्जित किया जा सकता है; केवल जीवित ही परमेश्वर के सुसमाचार कार्य को फैला सकते हैं, केवल जीवित ही परमेश्वर के इरादों के अनुरूप होते हैं और केवल जीवित ही वास्तविक लोग होते हैं। मूलतः परमेश्वर द्वारा बनाया गया मनुष्य जीवित था, परंतु शैतान की भ्रष्टता के कारण मनुष्य मृत्यु में जीता है, शैतान के प्रभाव में जीता है और लिहाजा, इस तरीके से लोग आत्माविहीन मृत हो चुके हैं, वे ऐसे शत्रु बन गए हैं जो परमेश्वर का विरोध करते हैं, वे शैतान के औजार बन गए हैं और वे शैतान के कैदी बन गए हैं। परमेश्वर ने जिन जीवित लोगों की रचना की थी वे मृत बन गए हैं और इसलिए परमेश्वर ने अपनी गवाही खो दी है और उसने उस मानवजाति को भी खो दिया है जिसे उसने रचा है और जो एकमात्र ऐसी चीज है जिसमें उसकी साँस है। अगर परमेश्वर को अपनी गवाही वापस लेनी है और उन लोगों को वापस लेना है जिसे उसने अपने हाथों से बनाया, लेकिन जो शैतान द्वारा कैद कर लिए गए हैं, तो उसे उन्हें पुनर्जीवित करना होगा जिससे वे जीवित प्राणी बन जाएँ, उसे उन सबको वापस लाना होगा ताकि वे उसकी रोशनी में जी सकें। मृत वे लोग हैं जिनमें आत्मा नहीं होती, जो चरम सीमा तक सुन्न हैं, जो परमेश्वर का विरोध करते हैं, और इससे भी बढ़कर जो परमेश्वर को नहीं जानते हैं। इन लोगों का परमेश्वर के प्रति समर्पण करने का जरा-सा भी इरादा नहीं होता है; वे बस उसके विरुद्ध विद्रोह करते हैं और उसका विरोध करते हैं और इनमें थोड़ी-सी भी निष्ठा नहीं होती है। जीवित वे हैं जिनकी आत्मा पुनर्जीवित हो चुकी है, जो परमेश्वर के प्रति समर्पण करना जानते हैं, जो परमेश्वर के प्रति निष्ठावान होते हैं और जिनमें सत्य और गवाही होती है—सिर्फ यही लोग परमेश्वर को अपने घर में पसंद हैं। परमेश्वर उन्हें बचाता है जो जीवित हो सकते हैं, जो परमेश्वर का उद्धार देख सकते हैं, जो परमेश्वर के प्रति निष्ठावान हो सकते हैं, जो परमेश्वर को खोजने के इच्छुक हैं, जो परमेश्वर के देहधारण में विश्वास करते हैं और उसके प्रकटन में विश्वास करते हैं। कुछ लोग जीवित हो सकते हैं और कुछ नहीं; यह इस बात पर निर्भर करता है कि उनकी प्रकृति को बचाया जा सकता है या नहीं। बहुत से लोगों ने परमेश्वर के अनेक वचन सुने हैं परंतु वे उसके इरादों को नहीं समझते हैं और वे अब भी खुद को अभ्यास में लाने में असमर्थ होते हैं। ऐसे लोग किसी भी सत्य को जीने में अक्षम होते हैं और जानबूझकर परमेश्वर के कार्य में बाधा डालते हैं। वे परमेश्वर के लिए कोई भी कार्य करने में अक्षम हैं और वे उसके लिए खुद को खपा नहीं सकते हैं—इसके उलट, वे कलीसिया के पैसे गुप्त रूप से खर्च करते हैं और परमेश्वर के घर में मुफ्तखोरी करते हैं। ये मरे हुए लोग हैं जो बचाए नहीं जा सकते हैं। परमेश्वर उन सारे लोगों को बचाता है जो उसके कार्य के मध्य में हैं, लेकिन लोगों का एक हिस्सा ऐसा भी है जो उसके उद्धार को ग्रहण नहीं कर सकता है; कुछ ही लोग उसके उद्धार को ग्रहण कर सकते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि ज्यादातर लोग बहुत गहराई तक भ्रष्ट कर दिए गए हैं और मृत हो चुके हैं और वे उद्धार से परे हैं; वे पूर्णतः शैतान द्वारा शोषित हो चुके हैं और वे अपनी प्रकृति में बहुत ही दुर्भावनापूर्ण हैं। लोगों का वह छोटा-सा समूह भी परमेश्वर के प्रति पूरी तरह समर्पण करने में असमर्थ है। ये वो लोग नहीं हैं जो आरंभ से ही परमेश्वर के प्रति पूर्णतः निष्ठावान रहे हैं, या जिनमें आरंभ से ही परमेश्वर के प्रति अत्यंत प्रेम रहा है; बल्कि ये लोग परमेश्वर के प्रति उसके विजय के कार्य के कारण समर्पणशील हैं, ये लोग परमेश्वर को उसके सर्वोच्च प्रेम के कारण देखते हैं, वे परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव के कारण स्वभावगत बदलाव हासिल करते हैं, और वे परमेश्वर को उसके कार्यों के कारण जानते हैं, उसका वह कार्य जो व्यावहारिक भी है और सामान्य भी।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, क्या तुम ऐसे व्यक्ति हो जो जीवित हो उठा है?
परमेश्वर द्वारा मानवजाति का उद्धार उन लोगों का उद्धार है, जो सत्य से प्रेम करते हैं, उनके उस हिस्से का उद्धार है, जिसमें इच्छा-शक्ति और संकल्प हैं, और उनके उस हिस्से का उद्धार है जो उनके दिल में सत्य और न्याय के लिए लालायित है। किसी व्यक्ति का संकल्प उसके दिल का वह हिस्सा है, जो न्याय, अच्छाई और सत्य के लिए तरसता है और जमीर से युक्त होता है। परमेश्वर इस हिस्से को बचाता है और इसके माध्यम से, वह उनके भ्रष्ट स्वभावों को बदलता है, ताकि वे सत्य को समझ सकें और हासिल कर सकें, ताकि उनकी भ्रष्टता शुद्ध हो सके, और उनका जीवन स्वभाव रूपांतरित किया जा सके। यदि तुम्हारे भीतर ये चीजें नहीं हैं, तो तुम सुधार से परे हो। यदि तुम्हारे भीतर सत्य के लिए कोई प्रेम या न्याय और प्रकाश के लिए कोई आकांक्षा नहीं है; यदि, जब भी तुम बुरी चीजों का सामना करते हो, तब तुम्हारे पास न तो उनसे मुक्त होने की इच्छा-शक्ति होती है और न ही कष्ट सहने का संकल्प; यदि, इसके अलावा, तुम्हारा जमीर सुन्न है, सत्य को प्राप्त करने की तुम्हारी क्षमता भी सुन्न है, और तुम सत्य या होने वाली घटनाओं को महसूस करने में सक्षम नहीं हो; और यदि तुम सभी मामलों में विवेकहीन हो और तुम पर जो भी घटित होता है, उसके सामने तुम समाधान के लिए सत्य नहीं खोज पाते हो और लगातार नकारात्मक बने रहते हो, तो तुम्हें बचाए जाने का कोई रास्ता नहीं है। ऐसे व्यक्ति में कोई भी ऐसा गुण नहीं होता जो उसे योग्य ठहराए, न ही कोई ऐसा आधार होता जिस पर परमेश्वर कार्य कर सके। उनका जमीर सुन्न होता है, उनका मन अंधकारमय होता है, और वे सत्य से प्रेम नहीं करते, न ही अपने दिल की गहराई में वे न्याय के लिए तरसते हैं। परमेश्वर चाहे कितने ही स्पष्ट तरीके से या बोधगम्य रूप से सत्य समझाए, वे जरा-सी भी प्रतिक्रिया नहीं देते, मानो उनका हृदय पहले से ही मृत हो। क्या उनके लिए खेल खत्म नहीं हो गया है? यह वैसा ही है जैसे जब किसी व्यक्ति की आखिरी साँसें चल रही हों और उसे मुँह से मुँह में साँस देकर बचाया जा सकता हो, लेकिन अगर वह पहले से ही मर चुका हो और उसकी आत्मा उसे छोड़कर जा चुकी हो, तो वह तरीका आजमाने का कोई फायदा नहीं होगा। यदि समस्याओं और कठिनाइयों का सामना करने पर कोई व्यक्ति पीछे हट जाता है और उनसे बचता है, वह सत्य बिल्कुल नहीं खोजता है और अपने काम में नकारात्मक और सुस्त होने का चुनाव करता है, फिर उसकी असलियत बेनकाब कर दी जाती है। ऐसे लोगों के पास कोई अनुभवजन्य गवाही नहीं होती। वे मुफ्तखोर और कचरे होते हैं, परमेश्वर के घर में बेकार होते हैं और वे पूरी तरह बर्बाद हो चुके होते हैं।
—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, भाग तीन
परमेश्वर उन लोगों को बचाता है जिन्हें शैतान ने भ्रष्ट कर दिया है और जिनके स्वभाव भ्रष्ट हैं, उन लोगों को नहीं जो पूर्ण हैं, जिनमें किसी तरह की कोई भी कमियाँ नहीं हैं या जो शून्य में रहते हैं। कुछ लोग थोड़ी-सी भ्रष्टता दिखाने पर सोचते हैं, “मैंने फिर से परमेश्वर का विरोध किया। इतने वर्षों से परमेश्वर में विश्वास रखने के बाद भी मैं नहीं बदला। जाहिर है कि परमेश्वर अब मुझे नहीं चाहता!” फिर वे निराशा में डूब जाते हैं और सत्य की दिशा में प्रयास करने के इच्छुक नहीं होते। इस रवैये के बारे में तुम क्या सोचते हो? उन्होंने परमेश्वर के इरादों को खोजे बिना खुद ही सत्य को त्याग दिया है और फिर भी मानते हैं कि परमेश्वर अब उन्हें नहीं चाहता। क्या यह परमेश्वर के बारे में गलतफहमी नहीं है? ऐसी नकारात्मकता से शैतान आसानी से फायदा उठा सकता है। शैतान ऐसे लोगों का उपहास करते हुए कहता है, “बेवकूफ कहीं का! परमेश्वर तुझे बचा रहा है, मगर तू अभी भी इस तरह पीड़ा झेल रहा है! तो हार मान ले न! यदि तू हार मान लेगा, तो परमेश्वर तुझे हटा देगा, जो उसका तुझे मेरे हवाले कर देने जैसा ही है। मैं तुझे तड़पा कर मार डालूँगा!” यदि शैतान कामयाब हुआ, तो परिणाम अकल्पनीय होंगे। नतीजतन, व्यक्ति को चाहे जितनी भी कठिनाइयों या नकारात्मकता का सामना करना पड़े, उसे हार नहीं माननी चाहिए। उसे समाधान के लिए सत्य खोजना चाहिए, और निष्क्रिय होकर प्रतीक्षा तो बिल्कुल नहीं करनी चाहिए। जिस अवधि के दौरान किसी व्यक्ति को बचाया जा रहा होता है—अर्थात् जिस अवधि में उसका जीवन संवृद्धि कर रहा होता है—वह जीवन में अपरिपक्वता की दशाओं और अभिव्यक्तियों को प्रदर्शित करेगा। किसी समय वह कमजोर या नकारात्मक हो सकता है, कुछ गलत कह सकता है, लड़खड़ा सकता है, विफलताओं और रुकावटों का सामना कर सकता है या यहाँ तक कि कभी-कभी मार्ग से भटक सकता है और गलत मार्ग अपना सकता है। परमेश्वर की दृष्टि में ये सब सामान्य बातें हैं। वह इन्हें उनके खिलाफ नहीं रखता। कुछ लोग सोचते हैं कि उनकी भ्रष्टता बहुत गहरी है और वे परमेश्वर को कभी नहीं संतुष्ट कर सकेंगे, इसलिए वे संताप महसूस करते हैं और खुद से घृणा करते हैं। परमेश्वर ठीक ऐसे ही लोगों को बचाता है जिनके हृदय में इस तरह का पश्चात्ताप है। दूसरी ओर, जो लोग मानते हैं कि उन्हें परमेश्वर के उद्धार की आवश्यकता नहीं है, जो सोचते हैं कि वे अच्छे लोग हैं और उनके साथ कुछ भी गलत नहीं है, आम तौर पर परमेश्वर उन्हें नहीं बचाता है। मैं यहाँ तुम लोगों को क्या बता रहा हूँ? जो कोई भी समझता है, वह बोल दे। (हमें अपनी भ्रष्टता के खुलासों को उचित रूप से सँभालना होगा और सत्य का अभ्यास करने पर ध्यान केंद्रित करना होगा, और तब हमें परमेश्वर का उद्धार प्राप्त होगा। अगर हम लगातार परमेश्वर को गलत समझते रहे और धारणाएँ रखते रहे, तो हम आसानी से नकारात्मक हो जाएँगे और निराशा में डूब जाएँगे। तुम्हें आस्था रखनी चाहिए और कहना चाहिए, “भले ही मैं अभी कमजोर हूँ, मैंने ठोकर खाई है और नाकामयाब हुआ हूँ, मैं आगे बढ़ूँगा और एक दिन सत्य को समझूँगा और परमेश्वर को संतुष्ट करके उद्धार प्राप्त करूँगा।” तुम्हारे पास यह संकल्प होना चाहिए। चाहे तुम्हें कैसी भी रुकावटों, कठिनाइयों, नाकामियों का सामना करना पड़े या तुम कितनी भी ठोकरें खाओ, तुम्हें निराश नहीं होना चाहिए। तुम्हें यह पता होना चाहिए कि परमेश्वर किस प्रकार के लोगों को बचाता है। इसके अलावा, यदि तुम्हें लगता है कि तुम अभी भी परमेश्वर द्वारा बचाए जाने के योग्य नहीं हो या ऐसे मौके आते हैं जहाँ तुम उन दशाओं में होते हो जिनसे परमेश्वर बेइंतहा नफरत करता है या नाखुश होता है या ऐसा दौर रहा हो, जब तुमने बहुत खराब व्यवहार किया हो और परमेश्वर ने तुम्हें ठुकरा दिया हो, यह मायने नहीं रखता। अब तुम जानते हो और अभी भी देर नहीं हुई है। यदि तुम पश्चात्ताप करोगे तो परमेश्वर तुम्हें मौका देगा।
—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, परमेश्वर पर विश्वास करने में सबसे महत्वपूर्ण उसके वचनों का अभ्यास और अनुभव करना है
बहुत-से लोग ईमानदारी से बोलने और कार्य करने के बजाय नरक में डाले जाना पसंद करेंगे। इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि जो बेईमान हैं उनसे निपटने के लिए मेरे पास अन्य तरीके भी तैयार हैं। बेशक मैं अच्छी तरह से जानता हूँ कि तुम लोगों के लिए ईमानदार लोग होना कितना मुश्किल है। चूँकि तुम सभी बहुत “चतुर” हो, अपनी घटिया मानसिकता के आधार पर, उच्च नैतिक चरित्र वाले लोगों के हृदय का मूल्यांकन करने में बहुत अच्छे हो, इससे मेरा कार्य और आसान हो जाता है। और चूँकि तुममें से हरेक अपने भेदों को अपने सीने में भींचकर रखता है, तो ठीक है, मैं तुम लोगों को एक-एक करके आपदा में डाल दूँगा जिससे कि अग्नि तुम्हें “सबक सिखाए,” ताकि उसके बाद तुम मेरे वचनों पर अडिग विश्वास रखने लगो। अंततः, मैं तुम लोगों के मुँह से ये शब्द निकलवा लूँगा—“परमेश्वर एक विश्वासयोग्य परमेश्वर है,” तब तुम लोग अपनी छाती पीटोगे और विलाप करोगे, “इंसान का हृदय कितना कपटी है!” उस समय तुम्हारी मनोस्थिति क्या होगी? निश्चित रूप से तुम घमंड में उतना नहीं बहोगे जितना तुम अभी बहते हो! और तुम लोग अब की तुलना में इतने “गहन और गूढ़” तो और भी कम होगे। कुछ लोग परमेश्वर की उपस्थिति में नियम-निष्ठ और उचित शैली में व्यवहार करते हैं, वे विशेष रूप से “शिष्ट व्यवहार” करते हैं, फिर भी आत्मा की उपस्थिति में वे अपने दाँत और पंजे दिखाने लगते हैं। क्या तुम लोग ऐसे इंसानों को ईमानदार लोगों की श्रेणी में गिनोगे? यदि तुम पाखंडी और ऐसे व्यक्ति हो जो “व्यक्तिगत संबंधों” में कुशल है तो मैं कहता हूँ कि तुम निश्चित रूप से ऐसे व्यक्ति हो जो परमेश्वर से खिलवाड़ करने का प्रयास करता है। यदि तुम्हारी बातें बहानों और बेकार तर्कों से भरी हैं, तो मैं कहता हूँ कि तुम ऐसे व्यक्ति हो जो सत्य का अभ्यास करने में अनिच्छुक है। यदि तुम्हारे पास ऐसे बहुत-से निजी मामले हैं जिनके बारे में बात करना मुश्किल है, और यदि तुम प्रकाश के मार्ग की खोज करने के लिए दूसरों के सामने अपने रहस्य यानी अपनी कठिनाइयाँ उजागर करना नहीं चाहते हो, तो मैं कहता हूँ कि तुम्हें उद्धार प्राप्त करने में बड़ी मुश्किल आएगी और तुम्हें अंधकार से बाहर निकलने में कठिनाई होगी। यदि तुम सत्य का मार्ग खोजने में आनंदित होते हो तो तुम सदैव प्रकाश में रहने वाले व्यक्ति हो। यदि तुम परमेश्वर के घर में सेवाकर्मी बने रहकर बहुत प्रसन्न हो, गुमनाम बनकर कर्मठतापूर्वक और कर्तव्यनिष्ठता से काम करते हो, हमेशा देते हो, और कभी लेते नहीं, तो मैं कहता हूँ कि तुम एक वफादार संत हो, क्योंकि तुम्हें किसी पारिश्रमिक की अपेक्षा नहीं है, तुम बस एक ईमानदार इंसान हो। यदि तुम स्पष्टवादी बनने को तैयार हो, अपना सर्वस्व खपाने को तैयार हो, यदि तुम परमेश्वर के लिए अपना जीवन दे सकते हो और दृढ़ता से अपनी गवाही दे सकते हो, यदि तुम इस स्तर तक ईमानदार हो जहाँ तुम्हें केवल परमेश्वर को संतुष्ट करना आता है, और अपने बारे में विचार नहीं करते हो या अपने लिए कुछ नहीं लेते हो, तो मैं कहता हूँ कि तुम जैसे लोग वे हैं जो प्रकाश में पोषित किए जाते हैं और वे सदा राज्य में रहेंगे। तुम्हें पता होना चाहिए कि क्या तुम्हारे भीतर सच्ची आस्था और सच्ची वफादारी है, क्या परमेश्वर के लिए कष्ट उठाने का तुम्हारा कोई इतिहास है और क्या तुम्हारे पास परमेश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण है। यदि तुममें ये चीजें नहीं हैं, तो तुम्हारे भीतर विद्रोहीपन, कपट, लालच और शिकायत अभी शेष हैं। चूँकि तुम्हारा हृदय ईमानदार नहीं है, इसलिए तुम्हें कभी भी परमेश्वर द्वारा सराहा नहीं गया है और तुम कभी भी प्रकाश में नहीं रहे हो। अंत में किसी व्यक्ति का भाग्य कैसा होगा, यह इस बात पर निर्भर करता है कि क्या उसके अंदर एक ईमानदार और रक्तिम हृदय है और क्या उसकी आत्मा शुद्ध है। यदि तुम ऐसे इंसान हो जो बहुत बेईमान है, जिसका हृदय अत्यन्त दुर्भावना से भरा है, जिसकी आत्मा अशुद्ध है, तो तुम अंत में निश्चित रूप से ऐसी जगह जाओगे जहाँ इंसान को दंड दिया जाता है, जैसा कि तुम्हारे भाग्य के अभिलेख में लिखा है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, तीन चेतावनियाँ
जो लोग भाई-बहनों के बीच हमेशा नकारात्मकता फैलाते रहते हैं वे शैतान के सेवक हैं और वे कलीसिया में बाधा डालने वाले लोग हैं। ऐसे लोगों को अवश्य ही एक दिन निष्कासित कर देना और हटा देना चाहिए। परमेश्वर में विश्वास रखते हुए अगर लोगों के पास परमेश्वर का भय मानने वाले दिल न हों, परमेश्वर के प्रति समर्पणशील दिल न हों, तो ऐसे लोग न सिर्फ परमेश्वर के लिए कोई कार्य कर पाने में असमर्थ होंगे, बल्कि इसके उलट वे परमेश्वर के कार्य में बाधा डालने वाले और उसका प्रतिरोध करने वाले लोग बन जाएँगे। परमेश्वर में विश्वास करना किन्तु उसके प्रति समर्पण न करना या उसका भय न मानना और इसके बजाय उसका प्रतिरोध करना, किसी भी विश्वासी के लिए सबसे बड़ा कलंक है। यदि विश्वासी अपनी बोली और आचरण में ठीक उसी तरह लापरवाह और असंयमित हों जैसे अविश्वासी होते हैं, तो वे अविश्वासियों से भी अधिक दुष्ट होते हैं; ये ठेठ दुष्ट राक्षस हैं। जो लोग कलीसिया के भीतर विषैली, दुर्भावनापूर्ण बातें प्रकट करते हैं, जो भाई-बहनों के बीच निराधार अफवाहें फैलाते हैं, कलह के बीज बोते हैं और गुटबाजी करते हैं, ऐसे सभी लोगों को कलीसिया से निष्कासित कर दिया जाना चाहिए था। अब चूँकि यह परमेश्वर के कार्य का एक भिन्न युग है, इसलिए ऐसे लोग प्रतिबंधित हैं, क्योंकि उन्हें निश्चित रूप से निकाला जाना है। शैतान द्वारा जिन लोगों को भ्रष्ट किया जा चुका है उन सबमें भ्रष्ट स्वभाव होते हैं। लेकिन कुछ में बस भ्रष्ट स्वभाव होते हैं, जबकि अन्य लोग भिन्न होते हैं : न केवल उनमें शैतानी भ्रष्ट स्वभाव होते हैं, बल्कि उनकी प्रकृति भी बेहद दुर्भावनापूर्ण होती है। इन लोगों की कथनी-करनी केवल शैतानी भ्रष्ट स्वभाव प्रकट करने तक ही सीमित नहीं होती है; ये लोग असली दानव और शैतान होते हैं। वे बस परमेश्वर के कार्य में गड़बड़ी और विघ्न पैदा करते हैं, इससे भाई-बहनों के जीवन प्रवेश में विघ्न पड़ता है और कलीसिया के सामान्य जीवन को क्षति पहुँचती है। भेड़ की खाल में छिपे इन भेड़ियों का देर-सवेर सफाया किया जाना चाहिए; शैतान के इन सेवकों के प्रति एक सख्त रवैया, तिरस्कार का रवैया अपनाया जाना चाहिए। केवल ऐसा करना ही परमेश्वर के पक्ष में खड़ा होना है और जो ऐसा करने में विफल हैं वे शैतान के साथ कीचड़ में लोट रहे हैं।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, जो सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं उनके लिए एक चेतावनी
हर कलीसिया में ऐसे लोग होते हैं जो कलीसिया के लिए विघ्न पैदा करते हैं या परमेश्वर के कार्य में गड़बड़ी करते हैं। ये सब शैतान हैं जो छद्म वेश में परमेश्वर के घर में घुस आए हैं। ऐसे लोग अभिनय में विशेष रूप से निपुण होते हैं : मेरे समक्ष विनीत भाव से आकर, नमन करते हुए, नत-मस्तक होते हैं, खुजली वाले कुत्ते की छवि जीते हैं, अपने मकसद को पूरा करने के लिए अपना “सर्वस्व” न्योछावर करते हैं, लेकिन भाई-बहनों के सामने उनका बदसूरत चेहरा प्रकट हो जाता है। जब वे सत्य का अभ्यास करने वाले लोगों को देखते हैं, तो उन पर आक्रमण कर देते हैं और उन्हें दरकिनार कर देते हैं; और जब वे ऐसे लोगों को देखते हैं जो उनसे अधिक शक्तिशाली हैं, तो वे उनकी चाटुकारिता और खुशामद करने लगते हैं। कलीसिया के भीतर वे आततायियों की तरह व्यवहार करते हैं। कह सकते हैं कि ऐसे “स्थानीय गुण्डे” और ऐसे “पालतू कुत्ते” ज्यादातर कलीसियाओं में मौजूद हैं। ऐसे लोग गुप्त रूप से मिलकर काम करते हैं, आँखे झपकाकर, गुप्त संकेतों और इशारों से आपस में बात करते हैं, और इनमें से कोई भी सत्य का अभ्यास नहीं करता। जो सबसे ज्यादा जहरीला होता है, वही “प्रधान राक्षस” होता है, और जो सबसे अधिक प्रतिष्ठित होता है, वह इनकी अगुवाई करता है और इनका परचम बुलंद रखता है। ऐसे लोग कलीसिया में उपद्रव मचाते हैं, नकारात्मकता फैलाते हुए मौत का तांडव करते हैं, मनमर्जी करते हैं, जो चाहे कहते हैं; किसी में इन्हें रोकने की हिम्मत नहीं होती है। ये शैतानी स्वभावों से भरे होते हैं। एक बार जब ये लोग व्यवधान पैदा करते हैं, कलीसिया में मुर्दनी छा जाती है। कलीसिया के भीतर के जो लोग सत्य का अभ्यास करते हैं उन्हें खारिज कर दिया जाता है, वे वह सब करने में असमर्थ होते हैं जिन्हें करने में सक्षम हैं, जबकि जो कलीसिया में बाधा डालते हैं और मौत फैलाते हैं वे अंदर तांडव करते फिरते हैं—और इतना ही नहीं, अधिकतर लोग उनका अनुसरण करते हैं। वास्तव में ऐसी कलीसियाओं पर शैतान शासन करता है और दानव इनका राजा होता है। यदि ऐसी कलीसियाओं में लोग आवाज नहीं उठाएँगे और उन प्रधान राक्षसों को खारिज नहीं करेंगे, तो देर-सवेर वे भी बर्बाद हो जाएँगे। अब से ऐसी कलीसियाओं के खिलाफ कदम उठाए जाने चाहिए। जो लोग थोड़ा-सा भी सत्य का अभ्यास करने में सक्षम हैं, यदि वे खोज नहीं करते हैं, तो उस कलीसिया को समाप्त कर दिया जाएगा। यदि कलीसिया में ऐसा कोई भी नहीं है जो सत्य का अभ्यास करने का इच्छुक हो, और परमेश्वर की गवाही में अडिग रह सकता हो, तो उस कलीसिया को पूरी तरह से अलग-थलग कर दिया जाना चाहिए और अन्य कलीसियाओं के साथ उसके संबंध समाप्त कर दिये जाने चाहिए। इसे “मृत्यु दफ़्न करना” कहते हैं; इसी का अर्थ है शैतान को अस्वीकार करना। यदि किसी कलीसिया में कई स्थानीय गुंडे हैं, और कुछ “छोटी-मोटी मक्खियों” द्वारा उनका अनुसरण किया जाता है जिनमें भेद पहचानने की क्षमता का पूर्णतः अभाव है, और यदि ऐसी कलीसियाओं में लोग सत्य जान लेने के बाद भी इन गुंडों की जकड़न और चालाकी को नकार नहीं पाते हैं, तो उन सभी भ्रमित लोगों को अंत में हटा दिया जाएगा। भले ही इन छोटी-छोटी मक्खियों ने कोई बड़ा बुरा काम न किया हो, लेकिन ये और भी धूर्त, और भी ज़्यादा मक्कार होती हैं, इस तरह के सभी लोगों को निकाल दिया जाएगा। एक भी नहीं बचेगा! जो शैतान के हैं, उन्हें शैतान के पास भेज दिया जाएगा, जबकि जो परमेश्वर द्वारा चुने गए हैं, वे निश्चित रूप से सत्य की खोज करेंगे; यह उनकी प्रकृति के अनुसार तय होता है। उन सभी को नष्ट हो जाने दो जो शैतान का अनुसरण करते हैं! इन लोगों के प्रति कोई दया-भाव नहीं दिखाया जाएगा। जो सत्य की खोज करते हैं उनका भरण-पोषण होने दो और वे अपने हृदय के तृप्त होने तक परमेश्वर के वचनों में आनंद प्राप्त करें। परमेश्वर धार्मिक है; वह किसी के प्रति पक्षपात नहीं दिखाएगा। यदि तू दानव है, तो तू सत्य का अभ्यास नहीं कर सकता; यदि तू सत्य की खोज करने वाला व्यक्ति है, तो यह निश्चित है कि तू शैतान का बंदी नहीं बनेगा—इसमें कोई संदेह नहीं है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, जो सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं उनके लिए एक चेतावनी
जो लोग सचमुच में परमेश्वर में विश्वास करते हैं, ये वे लोग हैं जो परमेश्वर के वचनों को अभ्यास में लाने को तैयार रहते हैं, और सत्य को अभ्यास में लाने को तैयार हैं। जो लोग सचमुच परमेश्वर के लिए अपनी गवाही में अडिग रह सकते हैं, वे लोग भी हैं जो उसके वचनों को अभ्यास में लाने को तैयार हैं और जो सचमुच सत्य के पक्ष में खड़े हो सकते हैं। जो लोग कुटिल और अधर्मी अभ्यासों में लिप्त होते हैं, उन सभी में सत्य का अभाव होता है, वे सभी परमेश्वर का अनादर करते हैं। जो लोग कलीसिया में कलह में संलग्न रहते हैं, वे शैतान के सेवक हैं, और शैतान के मूर्तरूप हैं। इस प्रकार का व्यक्ति बहुत दुर्भावनापूर्ण होता है। जिन लोगों में भेद पहचानने की क्षमता नहीं होती है और जो सत्य के पक्ष में खड़े होने में असमर्थ होते हैं वे सभी वे लोग हैं जो दुष्ट इरादों को आश्रय देते हैं और सत्य को मलिन करते हैं। वे शैतान के अधिक ठेठ प्रतिनिधि हैं; वे छुटकारे से परे हैं और स्वाभाविक रूप से हटा दिए जाएँगे। परमेश्वर का घर उन लोगों को बने रहने की अनुमति नहीं देता है जो सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं, और न ही यह उन लोगों को बने रहने की अनुमति देता है जो जानबूझकर कलीसियाओं को ध्वस्त करते हैं। हालाँकि, अभी निष्कासन के कार्य को करने का समय नहीं है; ऐसे लोगों को सिर्फ प्रकट किया जाएगा और अंत में निकाल दिया जाएगा। इन लोगों पर व्यर्थ का कार्य और नहीं किया जाना है; जो शैतान हैं, वे सत्य के पक्ष में खड़े नहीं रह सकते, जबकि जो सत्य की खोज करते हैं, वे सत्य के पक्ष में खड़े रह सकते हैं। जो लोग सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं, वे सत्य के वचन को सुनने के अयोग्य हैं और सत्य के लिए गवाही देने के अयोग्य हैं। सत्य बस उनके कानों के लिए नहीं है; बल्कि, यह उन पर निर्देशित है जो इसका अभ्यास करते हैं। इससे पहले कि हर व्यक्ति के परिणाम का खुलासा किया जाए, जो लोग कलीसिया में बाधा डालते हैं और कार्य में गड़बड़ी करते हैं, अभी के लिए उन्हें सबसे पहले किनारे कर दिया जाएगा और अकेला छोड़ दिया जाएगा। एक बार जब कार्य पूरा हो जाएगा, तो इन लोगों को एक-एक करके बेनकाब किया जाएगा और फिर हटा दिया जाएगा। फिलहाल, जबकि सत्य प्रदान किया जा रहा है, तो उनकी उपेक्षा की जाएगी। जब मानवजाति के सामने पूर्ण सत्य प्रकट कर दिया जाएगा, तो लोगों को हटाना शुरू कर दिया जाएगा; यही वह समय होगा जब सभी लोगों को उनकी किस्म के अनुसार छाँटा जाएगा। जिन लोगों में भेद पहचानने की क्षमता नहीं है, वे अपनी तुच्छ चालाकी के कारण बुरे लोगों के हाथों विनाश को प्राप्त होंगे, और ऐसे लोग दुष्ट लोगों के द्वारा पथभ्रष्ट कर दिये जाएँगे तथा लौटकर आने में असमर्थ होंगे। इन लोगों के साथ इसी प्रकार पेश आना चाहिए, क्योंकि इन्हें सत्य से प्रेम नहीं है, क्योंकि ये सत्य के पक्ष में खड़े होने में अक्षम हैं, क्योंकि ये बुरे लोगों का अनुसरण करते हैं, ये बुरे लोगों के पक्ष में खड़े होते हैं, परमेश्वर का प्रतिरोध करने के लिए बुरे लोगों के साथ साँठ-गाँठ करते हैं। वे बहुत अच्छी तरह से जानते हैं कि वे बुरे लोग बुराई प्रकट करते हैं, फिर भी वे अड़ियल बन जाते हैं और उनका अनुसरण करने के लिए सत्य से मुँह मोड़ लेते हैं। क्या ये लोग जो सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं लेकिन विनाशकारी और घृणास्पद कार्यों को करते हैं, बुराई नहीं कर रहे हैं? यद्यपि उनमें से कुछ ऐसे हैं जो “सम्राटों” की तरह पेश आते हैं और कुछ ऐसे हैं जो उनका अनुसरण करते हैं, किन्तु क्या परमेश्वर का प्रतिरोध करने की उनकी प्रकृति एक-सी नहीं है? उनके पास इस बात का दावा करने का क्या बहाना हो सकता है कि परमेश्वर उन्हें नहीं बचाता है? उनके पास इस बात का दावा करने का क्या बहाना हो सकता है कि परमेश्वर धार्मिक नहीं है? क्या यह उनकी अपनी दुष्टता नहीं है जो उनका विनाश कर रही है? क्या यह उनकी खुद की विद्रोहशीलता नहीं है जो उन्हें नरक में धकेल रही है? जो लोग सत्य का अभ्यास करते हैं, अंत में, उन्हें सत्य की वजह से बचा लिया जाएगा और पूर्ण बना दिया जाएगा। जो सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं, अंत में, वे सत्य की वजह से विनाश को आमंत्रण देंगे। ये वे परिणाम हैं जो उन लोगों की प्रतीक्षा में हैं जो सत्य का अभ्यास करते हैं और जो नहीं करते हैं।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, जो सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं उनके लिए एक चेतावनी
जिनके दिलों में परमेश्वर है, उनका चाहे किसी भी प्रकार से परीक्षण क्यों न किया जाए, उनकी निष्ठा अपरिवर्तित रहती है; किंतु जिनके दिलों में परमेश्वर नहीं है, वे अपनी देह के लिए परमेश्वर का कार्य लाभदायक न रहने पर परमेश्वर के बारे में अपना दृष्टिकोण बदल लेते हैं, यहाँ तक कि परमेश्वर को छोड़कर चले जाते हैं। वे ऐसे लोग हैं जो अंत में दृढ़ नहीं रहेंगे, जो केवल परमेश्वर की आशीषों की तलाश करते हैं और परमेश्वर के लिए खुद को खपाने और उसके प्रति समर्पण करने की कोई इच्छा नहीं रखते। ऐसे सभी नीच लोगों को तब “बाहर निकाल दिया जाएगा” जब परमेश्वर का काम समाप्त हो जाएगा और उन पर बिल्कुल भी कोई दया नहीं दिखाई जाएगी। जिन लोगों में मानवता नहीं है, उनमें परमेश्वर के लिए बिल्कुल भी सच्चा प्रेम नहीं होता। जब परिवेश आरामदायक होता है या उनके पास कुछ प्राप्त करने का अवसर होता है, तो वे परमेश्वर के प्रति पूरी तरह से आज्ञाकारी होते हैं, लेकिन एक बार जब उनकी इच्छाएँ बाधित होती हैं या अंततः वे धराशायी हो जाती हैं, तो वे तुरंत विद्रोह में उठ खड़े होते हैं। यहाँ तक कि सिर्फ एक रात के अंतराल में, वे एक मुस्कुराते हुए, “दयालु” व्यक्ति से एक जंगली दिखने वाले जल्लाद में बदल जाते हैं, बिना किसी तुक या कारण के अप्रत्याशित रूप से अपने कल के उपकारी के साथ अपने घातक दुश्मन की तरह पेश आते हैं। यदि इन दुष्ट राक्षसों को जो बिना पलक झपकाए मारते हैं, बहिष्कृत नहीं किया जाता, तो क्या वे एक गंभीर अंतर्निहित खतरा नहीं बन जाएँगे? ऐसा नहीं है कि एक बार जब विजय का काम समाप्त हो जाता है, तो मनुष्य को बचाने का काम पूरी तरह से पूरा हो जाता है। यद्यपि विजय का काम समाप्त हो गया है, मनुष्य को शुद्ध करने का काम पूरा नहीं हुआ है; एक बार जब मनुष्य पूरी तरह से शुद्ध हो जाता है, एक बार जब परमेश्वर के प्रति सच्चे मन से समर्पण करने वाले पूर्ण किए जाते हैं और एक बार जब उन छद्मवेशियों को हटा दिया जाता है जिनके दिलों में परमेश्वर नहीं है, केवल तभी काम समाप्त होगा। जो लोग परमेश्वर के कार्य के अंतिम चरण में उसे संतुष्ट करने में असमर्थ हैं, उन्हें पूरी तरह हटा दिया जाएगा और जिन्हें हटा दिया जाता है, वे राक्षसों की किस्म के हैं। जो लोग परमेश्वर को संतुष्ट करने में अक्षम हैं, वे परमेश्वर के प्रति विद्रोही हैं। भले ही वे लोग आज परमेश्वर का अनुसरण करते हों, फिर भी इससे यह साबित नहीं होता कि ये वो लोग हैं, जो अंततः बने रहेंगे। “जो लोग अंत तक परमेश्वर का अनुसरण करेंगे, वे उद्धार प्राप्त करेंगे,” इन वचनों में “अनुसरण” का अर्थ क्लेश के बीच डटे रहना है। आज बहुत-से लोग मानते हैं कि परमेश्वर का अनुसरण करना बहुत आसान है, किंतु जब परमेश्वर का कार्य समाप्त होने वाला होगा, तब तुम “अनुसरण करने” का असली अर्थ जानोगे। सिर्फ इस बात से कि जीत लिए जाने के पश्चात् तुम आज भी परमेश्वर का अनुसरण करने में समर्थ हो, यह प्रमाणित नहीं होता कि तुम उन लोगों में से एक हो, जिन्हें पूर्ण बनाया जाएगा। जो लोग परीक्षणों को सहने में असमर्थ हैं, जो क्लेशों के बीच विजयी होने में अक्षम हैं, वे अंततः डटे रहने में अक्षम होंगे, और वे बिल्कुल अंत तक अनुसरण करने में असमर्थ होंगे। जो लोग सच्चे मन से परमेश्वर का अनुसरण करते हैं, वे अपने कार्य की परीक्षा लिया जाना सह पाते हैं, जबकि जो लोग सच्चे मन से परमेश्वर का अनुसरण नहीं करते, वे परमेश्वर के किसी भी परीक्षण को सहने में अक्षम हैं। देर-सवेर उन्हें बाहर निकाल दिया जाएगा, जबकि विजेता राज्य में बने रहेंगे। मनुष्य सच्चे मन से परमेश्वर को खोजता है या नहीं, इसका निर्धारण उसके कार्य का परीक्षण करने के द्वारा ही किया जाता है, अर्थात्, परमेश्वर के परीक्षणों द्वारा, और इसका स्वयं मनुष्य द्वारा किए गए निर्धारण से कोई लेना-देना नहीं है। परमेश्वर किसी मनुष्य को हल्के में अस्वीकार नहीं करता; वह जो कुछ भी करता है, वह मनुष्य को पूर्ण रूप से कायल कर सकता है। वह ऐसा कुछ नहीं करता, जो मनुष्य के लिए अदृश्य हो, या कोई ऐसा कार्य जो मनुष्य को कायल न कर सके। मनुष्य का विश्वास सच्चा है कि नहीं, यह तथ्यों द्वारा साबित होता है और मनुष्य द्वारा निर्धारित नहीं किया जा सकता है। इसमें कोई संदेह नहीं कि “गेहूँ को जंगली दाने नहीं बनाया जा सकता, और जंगली दानों को गेहूँ नहीं बनाया जा सकता।” जो सच्चे मन से परमेश्वर से प्रेम करते हैं, वे सभी अंततः राज्य में बने रहेंगे और परमेश्वर ऐसे किसी व्यक्ति के साथ अन्याय नहीं करेगा जो सच्चे मन से उससे प्रेम करता है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का अभ्यास
अब तुम लोगों का प्रयास प्रभावी रहा है या नहीं, यह इस बात से मापा जाता है कि इस समय तुम लोगों के अंदर क्या है। तुम लोगों के परिणाम का निर्धारण करने के लिए भी इसका उपयोग किया जाता है; कहने का अर्थ है कि तुम लोगों ने जो भी त्याग किए हैं और जो कुछ काम किए हैं, उनके आधार पर तुम लोगों के परिणाम का खुलासा किया जाता है। तुम लोगों के अनुसरण से, तुम लोगों की आस्था से और तुम लोगों ने जो कुछ किया है उनसे, तुम लोगों के परिणाम का खुलासा किया जा सकता है। तुम लोगों में, बहुत-से ऐसे हैं जो पहले ही उद्धार से परे हो चुके हैं, क्योंकि आज का दिन लोगों के परिणाम को उजागर करने का दिन है, और मैं अपने काम में भ्रमित नहीं रहूँगा; मैं अगले युग में उन लोगों को नहीं ले जाऊँगा जो पूरी तरह से उद्धार से परे हैं। एक समय आएगा, जब मेरा कार्य पूरा हो जाएगा। मैं उन दुर्गंधयुक्त, बेजान लाशों पर कार्य नहीं करूँगा जिन्हें बिल्कुल भी बचाया नहीं जा सकता; अब इंसान के उद्धार के अंतिम दिन हैं, और मैं निरर्थक कार्य नहीं करूँगा। स्वर्ग और धरती के बारे में शिकायत मत करो—दुनिया का अंत आ रहा है, यह अपरिहार्य है। चीजें इस मुकाम तक आ गयी हैं, और उन्हें रोकने के लिए तुम इंसान के तौर पर कुछ नहीं कर सकते; तुम अपनी इच्छानुसार चीजों को बदल नहीं सकते। कल, तुमने सत्य का अनुसरण करने के लिए कीमत अदा नहीं की थी और तुम समर्पित नहीं थे; आज, समय आ चुका है, तुम उद्धार से परे हो; और कल तुम्हें निकाल दिया जाएगा, और तुम्हारे उद्धार की कोई गुंजाइश नहीं होगी। भले ही मैं दयालु और कोमल हृदय वाला हूँ और मैं तुम्हें बचाने के लिए सब कुछ कर रहा हूँ, अगर तुम अपने स्तर पर प्रयास नहीं करते या अपने लिए विचार नहीं करते, तो इसका मुझसे क्या लेना-देना? जो लोग केवल अपने देह-सुख की सोचते हैं और सुख-साधनों का आनंद लेते हैं; जो विश्वास रखते हुए प्रतीत होते हैं लेकिन सचमुच विश्वास नहीं रखते; जो दानवी चिकित्सा प्रथाओं और जादू-टोने में लिप्त रहते हैं; जो व्यभिचारी और पतित हैं; जो यहोवा के चढ़ावे और उसकी संपत्ति को चुराते हैं; जिन्हें रिश्वत पसंद है; जो व्यर्थ में स्वर्गारोहित होने के सपने देखते हैं; जो अहंकारी और दंभी हैं, जो केवल व्यक्तिगत प्रसिद्धि और लाभ के लिए होड़ करते हैं; जो अवमाननापूर्ण शब्दों को फैलाते हैं; जो स्वयं परमेश्वर की निंदा करते हैं; जो स्वयं परमेश्वर की आलोचना और बुराई करने के अलावा कुछ नहीं करते; जो अपना अलग गुट बनाते हैं और परमेश्वर के खिलाफ विद्रोह करते हैं; जो परमेश्वर का उत्कर्ष करने से कहीं अधिक खुद का उत्कर्ष करते हैं; वे छिछोरे नौजवान, अधेड़ उम्र के लोग और बुज़ुर्ग स्त्री-पुरुष जो व्यभिचार में फँसे हुए हैं; जो स्त्री-पुरुष व्यक्तिगत प्रसिद्धि और लाभ का आनंद लेते हैं और लोगों के बीच निजी रुतबा तलाशते हैं; जिन लोगों को कोई मलाल नहीं है और जो पाप में फँसे हुए हैं—क्या वे तमाम लोग उद्धार से परे नहीं हैं? व्यभिचार, पाप, दानवी चिकित्सा प्रथाएँ, जादू-टोना, ईशनिंदा वाले शब्द और अवमाननापूर्ण शब्द, सब तुम लोगों में निरंकुशता से फैल रहे हैं; सत्य और जीवन के वचन तुम लोगों के बीच कुचले जाते हैं और तुम लोगों के मध्य पवित्र शब्द मलिन किए जाते हैं। तुम मलिनता और विद्रोहशीलता से भरे हुए अन्य-जाति राष्ट्र के लोगों! तुम लोगों का परिणाम क्या होगा? जिन्हें देह-सुख से प्यार है, जो देह का जादू-टोना करते हैं, और जो व्यभिचार के पाप में फँसे हुए हैं, वे जीते रहने का दुस्साहस कैसे कर सकते हैं! क्या तुम नहीं जानते कि तुम जैसे लोग कीड़े-मकौड़े हैं जो उद्धार से परे हैं? किसी भी चीज की माँग करने का हक तुम्हें किसने दिया? आज तक, उन लोगों में जरा-सा भी परिवर्तन नहीं आया है जिन्हें सत्य से प्रेम नहीं है, जो केवल देह से प्यार करते हैं—ऐसे लोगों को कैसे बचाया जा सकता है? जो जीवन के मार्ग से प्रेम नहीं करते, जो परमेश्वर का उत्कर्ष नहीं करते और उसकी गवाही नहीं देते, जो अपने रुतबे के लिए षडयंत्र रचते हैं, जो स्वयं का उत्कर्ष करते हैं—क्या वे आज भी वैसे ही नहीं हैं? उन्हें बचाने का क्या मूल्य है? तुम्हें बचाया जा सकता है या नहीं, यह इस बात पर निर्भर नहीं है कि तुम कितने वरिष्ठ हो या तुम कितने साल से काम कर रहे हो, और इस बात पर तो बिल्कुल भी निर्भर नहीं है कि तुमने कितनी योग्यताएँ हासिल कर ली हैं। बल्कि इस बात पर निर्भर है कि क्या तुम्हारा अनुसरण फलीभूत हुआ है। तुम्हें यह जानना चाहिए कि जिन्हें बचाया जाता है वे ऐसे “वृक्ष” होते हैं जिन पर फल लगते हैं, ऐसे वृक्ष नहीं जो हरी-भरी पत्तियों और फूलों से तो लदे होते हैं, लेकिन जिन पर फल नहीं आते। अगर तुम बरसों तक भी गलियों की खाक छानते रहे हो, तो उससे क्या फर्क पड़ता है? तुम्हारी गवाही कहाँ है? तुम्हारे पास खुद से प्रेम करने वाले और अपनी वासनायुक्त कामनाओं से भरे दिल की तुलना में परमेश्वर का भय मानने वाला दिल बहुत कम है—क्या इस तरह का व्यक्ति पतित नहीं है? वे उद्धार के लिए नमूना और मॉडल कैसे हो सकते हैं? तुम्हारी प्रकृति सुधर नहीं सकती, तुम बहुत अधिक विद्रोहशीलता के अधीन हो, तुम छुटकारा पाने से परे हो! क्या ऐसे लोगों को हटा नहीं दिया जाएगा? क्या मेरे कार्य के समाप्त हो जाने का समय तुम्हारा अंत आने का समय नहीं है? मैंने तुम लोगों के बीच बहुत सारा कार्य किया है और बहुत सारे वचन बोले हैं—इनमें से कितने सच में तुम लोगों के कानों में गए हैं? इनमें से कितनों के प्रति तुम लोगों ने कभी समर्पण किया है? जब मेरा कार्य समाप्त होगा, तो यह वो समय होगा जब तुम मेरा विरोध करना बंद कर दोगे, तुम मेरे खिलाफ खड़ा होना बंद कर दोगे। जब मैं काम करता हूँ, तो तुम लोग लगातार मेरे खिलाफ काम करते रहते हो; तुम लोग कभी मेरे वचनों का अनुपालन नहीं करते। मैं अपना कार्य करता हूँ, और तुम अपना “काम” करते हो, और अपना छोटा-सा राज्य बनाते हो। तुम लोग लोमड़ियों और कुत्तों के झुंड हो, तुम लोग मेरे खिलाफ काम करने के अलावा कुछ नहीं करते हो! तुम लोग लगातार उन्हें अपने आगोश में लाने का प्रयास कर रहे हो जो तुम लोगों के प्रति अपना अविभक्त प्रेम समर्पित करते हैं—तुम लोगों के भय मानने वाले दिल कहाँ हैं? तुम्हारा हर काम कपट से भरा होता है! तुम्हारे अंदर न समर्पण है, न भय है, तुम्हारा हर काम कपटपूर्ण और ईश-निंदा करने वाला होता है! क्या ऐसे लोगों को बचाया जा सकता है? जो पुरुष यौन-संबंधों में अनैतिक और लंपट होते हैं, वे हमेशा कामोत्तेजक वेश्याओं को आकर्षित करके उनके साथ मौज-मस्ती करना चाहते हैं। मैं ऐसे काम-वासना में लिप्त अनैतिक राक्षसों को कतई नहीं बचाऊँगा। मैं तुम घिनौने राक्षसों से पूरी तरह घृणा करता हूँ, तुम्हारा व्यभिचार और तुम्हारी कामुक अदाएँ तुम लोगों को नरक में धकेल देंगे। तुम लोगों को अपने बारे में क्या कहना है? घिनौने राक्षसो और दुष्ट आत्माओ, तुम लोग बेहद घृणित हो! तुम बेहद घृणित हो! ऐसे कूड़े-करकट को कैसे बचाया जा सकता है? क्या ऐसे लोगों को जो पाप में फँसे हुए हैं, उन्हें अब भी बचाया जा सकता है? आज, तुम लोगों के दिल इस सत्य, इस मार्ग और इस जीवन की ओर आकर्षित नहीं होते हैं। बल्कि, वे पाप, और पैसे, रुतबे, प्रसिद्धि, लाभ, देह के सुखों, और पुरुषों के सौंदर्य और महिलाओं की कामुक अदाओं की ओर आकर्षित होते हैं। यह तुम लोगों को मेरे राज्य में प्रवेश करने के योग्य कैसे बनाता है? तुम लोगों की छवियाँ परमेश्वर की छवि से भी बड़ी हैं, तुम लोगों का रुतबा परमेश्वर के रुतबे से भी ऊँचा है, लोगों के बीच तुम लोगों की प्रतिष्ठा की तो बात ही छोड़ दो—तुम लोग वास्तव में ऐसी मूर्तियाँ बन गए हो जिनकी लोग आराधना करते हैं। क्या तुममें से हर एक प्रधान दूत नहीं बन गया है? जब लोगों के परिणामों का खुलासा किया जाता है, जो वह समय भी है जब उद्धार का कार्य समाप्ति के करीब होने लगेगा, तो तुम लोगों में से बहुत-से ऐसी लाश होंगे जो उद्धार से परे होंगे और जिन्हें हटा दिया जाना होगा।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, अभ्यास (7)