2. हमने हमेशा यह माना है कि प्रभु यीशु में हमारे विश्वास के माध्यम से हमारे पापों के लिए क्षमा पाना, उद्धार की कृपा को प्राप्त करना है, फिर भी आप कहते हैं कि “बचाए जाने” का अर्थ सच्चा उद्धार नहीं है। तो फिर बचाए जाने का क्या अर्थ है, और पूरी तरह से बचाए जाने का क्या मतलब है? बचाए जाने और पूरी तरह से बचाए जाने के बीच सारभूत अंतर क्या है?

संदर्भ के लिए बाइबल के पद :

“जो विश्‍वास करे और बपतिस्मा ले उसी का उद्धार होगा, परन्तु जो विश्‍वास न करेगा वह दोषी ठहराया जाएगा” (मरकुस 16:16)

“क्योंकि यह वाचा का मेरा वह लहू है, जो बहुतों के लिये पापों की क्षमा के निमित्त बहाया जाता है” (मत्ती 26:28)

“जो मुझ से, ‘हे प्रभु! हे प्रभु!’ कहता है, उनमें से हर एक स्वर्ग के राज्य में प्रवेश नहीं करेगा, बल्कि वह करेगा जो मेरे स्वर्गिक पिता की इच्छा के अनुसार चलता है” (मत्ती 7:21)

“ये वे हैं जो स्त्रियों के साथ अशुद्ध नहीं हुए, पर कुँवारे हैं; ये वे ही हैं कि जहाँ कहीं मेम्ना जाता है, वे उसके पीछे हो लेते हैं; ये तो परमेश्वर के निमित्त पहले फल होने के लिये मनुष्यों में से मोल लिए गए हैं। उनके मुँह से कभी झूठ न निकला था, वे निर्दोष हैं” (प्रकाशितवाक्य 14:4-5)

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

उस समय यीशु का कार्य समस्त मानवजाति को छुटकारा दिलाना था। उन सभी के पापों को क्षमा कर दिया गया था जो उसमें विश्वास करते थे; अगर तुम्हें उस पर विश्वास था, वह तुम्हें छुटकारा दिलाता था; यदि तुम उस पर विश्वास करते थे, तो तुम पाप के नहीं रह जाते थे, तुम अपने पापों से मुक्त हो जाते थे। यही बचाए जाने और विश्वास द्वारा उचित ठहराए जाने का अर्थ है। फिर भी विश्वासियों के अंदर परमेश्वर के प्रति विद्रोह और विरोध के भाव थे, जिन्हें अभी भी धीरे-धीरे हटाया जाना था। उद्धार का अर्थ यह नहीं था कि मनुष्य पूरी तरह से यीशु द्वारा प्राप्त कर लिया गया है, बल्कि यह था कि मनुष्य अब पाप का नहीं रह गया था, उसे उसके पापों से मुक्त कर दिया गया था। अगर तुम उसमें विश्वास करते थे, तो तुम पाप के नहीं रह जाते थे।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के कार्य का दर्शन (2)

जैसे ही परमेश्वर के कार्य का दूसरा चरण पूरा हुआ—सलीब पर चढ़ाए जाने के बाद—मनुष्य को पाप से वापस पाने (अर्थात् मनुष्य को शैतान के हाथों से छुड़ाने) का परमेश्वर का कार्य संपन्न हो गया। और इसलिए, उस क्षण के बाद से, मानवजाति को केवल प्रभु यीशु को अपने उद्धारकर्ता के रूप में स्वीकार करना था, और उसके पाप क्षमा कर दिए जाते। बस नाम के लिए कहें तो, मनुष्य के पाप अब उसके द्वारा उद्धार प्राप्त करने और परमेश्वर के सामने आने में बाधक नहीं रहे थे और न ही शैतान द्वारा मनुष्य को दोषी ठहराने का कारण रह गए थे। ऐसा इसलिए है, क्योंकि स्वयं परमेश्वर ने व्यावहारिक कार्य किया था, उसने पापी देह की छवि बनकर उसका अनुभव किया था, और परमेश्वर स्वयं ही पापबलि था। इस प्रकार, मनुष्य सलीब से उतर गया, परमेश्वर के देह—इस पापी देह की छवि के जरिये छुड़ा और बचा लिया गया।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परिशिष्ट 3 : मनुष्य को केवल परमेश्वर के प्रबंधन के बीच ही बचाया जा सकता है

अंत के दिनों का कार्य वचन बोलना है। वचनों के माध्यम से मनुष्य में बड़े परिवर्तन किए जा सकते हैं। इन वचनों को स्वीकार करने से इन लोगों में अब जो परिवर्तन हुए हैं, वे उन परिवर्तनों से बहुत अधिक बड़े हैं, जो संकेत और चमत्कार स्वीकार करने से अनुग्रह के युग में लोगों में हुए थे। क्योंकि अनुग्रह के युग में हाथ रखकर और प्रार्थना करके दुष्टात्माओं को मनुष्य से निकाला जाता था, परंतु मनुष्य के भीतर भ्रष्ट स्वभाव तब भी बने रहते थे। मनुष्य को उसकी बीमारी से चंगा कर दिया जाता था और उसके पाप क्षमा कर दिए जाते थे, किंतु जहाँ तक यह प्रश्न है कि मनुष्य अपने भीतर के शैतानी भ्रष्ट स्वभावों को कैसे छोड़ सकता है, तो उस पर अभी यह कार्य किया जाना बाकी था। मनुष्य को सिर्फ उसकी आस्था के कारण छुटकारा दिया गया था और उसके पाप क्षमा किए गए थे, किंतु मनुष्य की पापी प्रकृति नहीं मिटाई गई थी और वह अब भी उसके भीतर बनी हुई थी। मनुष्य के पाप परमेश्वर के देहधारण के माध्यम से क्षमा कर दिए गए थे, परंतु इसका अर्थ यह नहीं था कि मनुष्य के भीतर अब पाप नहीं रहा था। मनुष्य के पाप पाप-बलि के माध्यम से क्षमा किए जा सकते थे, लेकिन जहाँ तक यह बात है कि मनुष्य को अब पाप न करने वाला कैसे बनाया जा सकता है, उसके भ्रष्ट स्वभावों और पापी प्रकृति को पूरी तरह से कैसे त्यागा जा सकता है और उसके जीवन स्वभाव को कुछ हद तक कैसे बदला जा सकता है, उसके पास इस समस्या को हल करने का कोई तरीका नहीं है। मनुष्य के पाप क्षमा कर दिए गए हैं और यह परमेश्वर के सलीब पर चढ़ने के कार्य के कारण है, लेकिन मनुष्य अभी भी अपने पुराने शैतानी भ्रष्ट स्वभावों में ही जी रहा है। ऐसे में मनुष्य को उसके शैतानी भ्रष्ट स्वभावों से पूरी तरह से बचाया जाना चाहिए, उसकी पापी प्रकृति पूरी तरह से त्याग दी जानी चाहिए, ताकि वह फिर कभी विकसित न हो, और उसके स्वभाव में रूपांतरण होना चाहिए। इसके लिए आवश्यक है कि मनुष्य जीवन में संवृद्धि के मार्ग को समझे, जीवन का मार्ग समझे और अपने स्वभाव को बदलने का तरीका समझे। साथ ही, इसके लिए मनुष्य को इस मार्ग के अनुसार अभ्यास करने की आवश्यकता है, ताकि धीरे-धीरे उसका स्वभाव बदल सके और वह रोशनी की चमक में जी सके, ताकि वह जो कुछ भी करे वह परमेश्वर के इरादों के अनुसार हो, ताकि वह अपने शैतानी भ्रष्ट स्वभावों को छोड़ सके और शैतान के अंधकार के प्रभाव से आजाद हो सके और परिणामस्वरूप पाप से पूरी तरह उबर सके। केवल तभी मनुष्य ने पूर्ण उद्धारकारी अनुग्रह प्राप्त किया होगा। जिस समय यीशु अपना कार्य कर रहा था, तब भी उसके बारे में मनुष्य का ज्ञान कल्पित और अस्पष्ट था। मनुष्य ने हमेशा उसे दाऊद का वंशज माना और कहा कि वह एक महान नबी है, उदार प्रभु है जिसने मनुष्य को उसके पापों से छुटकारा दिलाया। कुछ लोग अपनी आस्था के बल पर उसके वस्त्र के किनारे को छूकर ही चंगे हो गए; अंधे देख सके, यहाँ तक कि मृतक जीवित किए जा सके। किंतु मनुष्य अपने भीतर गहराई से जड़ जमाए हुए शैतानी भ्रष्ट स्वभावों का पता लगाने में असमर्थ रहा, न ही वह यह जानता था कि उन्हें कैसे त्यागा जाए। मनुष्य ने बहुत अनुग्रह प्राप्त किया, जैसे देह की शांति और खुशी, एक व्यक्ति की आस्था से पूरे परिवार को आशीष मिलना, बीमारी से चंगाई, इत्यादि। शेष मनुष्य के अच्छे कर्म और उसका धर्मात्मा जैसा रूप था; यदि कोई इनके आधार पर जी सकता था तो उसे एक मानक स्तर का विश्वासी माना जाता था। केवल इसी तरह के विश्वासी मृत्यु के बाद स्वर्ग में प्रवेश कर सकते थे, जिसका अर्थ था कि उन्हें छुटकारा दिला दिया गया था। परंतु अपने जीवन-काल में इन लोगों ने जीवन के मार्ग को बिल्कुल नहीं समझा था। उन्होंने सिर्फ इतना किया कि अपना स्वभाव बदलने के किसी मार्ग को अपनाए बिना बस एक निरंतर चक्र में पाप किए और उन्हें स्वीकार कर लिया : अनुग्रह के युग में मनुष्य की स्थिति ऐसी थी। क्या मनुष्य ने पूर्ण उद्धार पा लिया है? नहीं! इसलिए, उस चरण का कार्य पूरा हो जाने के बाद भी न्याय और ताड़ना का कार्य बाकी रह गया था। यह चरण वचन के माध्यम से मनुष्य को शुद्ध करने और इस प्रकार उसे अनुसरण हेतु एक मार्ग प्रदान करने के लिए है। यह चरण फलदायक या अर्थपूर्ण न होता, यदि यह दुष्टात्माओं को निकालने के साथ जारी रहता, क्योंकि यह मनुष्य की पापी प्रकृति को उतार फेंकने में असफल रहता और मनुष्य अपने पापों की क्षमा पर ही रुक जाता। पापबलि के माध्यम से मनुष्य के पाप क्षमा किए गए हैं, क्योंकि सलीब पर चढ़ने का कार्य पहले ही समाप्त हो चुका है और परमेश्वर ने शैतान को जीत लिया है। किंतु मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव अभी भी उसके भीतर रहते हैं, मनुष्य अभी भी पाप कर सकता है और परमेश्वर का प्रतिरोध कर सकता है और परमेश्वर ने मानवजाति को प्राप्त नहीं किया है। इसीलिए कार्य के इस चरण में परमेश्वर वचन का उपयोग करके मनुष्य के भ्रष्ट स्वभावों को उजागर करता है और उसे उचित मार्ग के अनुसार अभ्यास करने के लिए प्रेरित करता है। इस चरण का कार्य पिछले चरण से अधिक अर्थपूर्ण और साथ ही अधिक फलदायक भी है, क्योंकि अब वचन ही है जो सीधे तौर पर मनुष्य के जीवन का पोषण करता है और मनुष्य के स्वभाव को पूरी तरह से नया होने में सक्षम बनाता है; कार्य का यह चरण कहीं अधिक संपूर्ण है। इसलिए, अंत के दिनों में देहधारण ने परमेश्वर के देहधारण के महत्व को पूर्ण किया है और मनुष्य के उद्धार के लिए परमेश्वर की प्रबंधन योजना का पूर्णतः समापन किया है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, देहधारण का रहस्य (4)

मनुष्य की देह शैतान की है, यह विद्रोही स्वभावों से परिपूर्ण है, यह दुखद रूप से गंदी है, और यह कुछ ऐसी है जो अस्वच्छ है। लोग देह के आनंद के लिए बहुत अधिक ललचाते हैं और देह को बहुत सारी अभिव्यक्तियाँ देते हैं; यही कारण है कि परमेश्वर मनुष्य की देह से इस हद तक नफरत करता है। जब लोग शैतान की गंदी, भ्रष्ट चीजों को निकाल फेंकते हैं, तब वे परमेश्वर से उद्धार प्राप्त करते हैं। परंतु यदि वे गंदगी और भ्रष्टता का अब भी त्याग नहीं करते हैं, तो वे अभी भी शैतान की सत्ता के अधीन रह रहे हैं। लोगों का साजिश और लड़ाई करना, कपट, और कुटिलता सब शैतान की चीजें हैं। परमेश्वर द्वारा तुम्हारा उद्धार तुम्हें शैतान की इन चीजों से छुड़ाने के लिए है। परमेश्वर का कार्य ग़लत नहीं हो सकता है; यह सब लोगों को अंधकार से बचाने के लिए किया जाता है। जब तुम परमेश्वर में अपने विश्वास में एक बिंदु तक पहुँच गए हो जहाँ तुम देह की भ्रष्टता से अपने को छुड़ा सकते हो, और इस भ्रष्टता से अब और बाधित नहीं हो, तो क्या तुम बचाए नहीं जा चुके होगे? जब तुम शैतान की सत्ता के अधीन रहते हो तब तुम परमेश्वर को अभिव्यक्त करने में असमर्थ होते हो, तुम कोई गंदी चीज होते हो, और परमेश्वर की विरासत प्राप्त नहीं कर सकते हो। एक बार जब तुम्हें स्वच्छ कर दिया और पूर्ण बना दिया गया, तो तुम पावनीकृत किए जाओगे, तुम सामान्य व्यक्ति हो जाओगे, और तुम परमेश्वर द्वारा धन्य किए जाओगे और परमेश्वर को खुश करने वाले बन जाओगे।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, अभ्यास (2)

लोगों की आस्था का सर्वोच्च महत्व क्या है? सरल शब्दों में कहें तो यह बचा लिए जाने के लिए है। उद्धार वास्तव में क्या है? और उद्धार का महत्व क्या है? मैं चाहता हूँ कि तुम सब लोग इस बारे में सोचो। (इसका यह अर्थ है कि हम शैतान के अंधकारमय प्रभाव से मुक्त हो सकते हैं, पूरी तरह परमेश्वर की ओर मुड़ सकते हैं, और अंततः जीवित रह सकते हैं।) (लोग शैतान की शक्ति के अधीन जीते हैं और इसलिए मौत के लायक हैं, लेकिन परमेश्वर के कार्य के अनुभव के माध्यम से उन्हें बचाया जा सकता है और इस प्रकार वे मौत से बच सकते हैं।) तुम सब लोग इसे समझते हो और सिद्धांत के स्तर पर इसे समझा सकते हो, लेकिन तुम यह कतई नहीं जानते कि वास्तव में बचा लिए जाने का अर्थ क्या है। क्या बचा लिए जाने का अर्थ अपने भ्रष्ट स्वभावों को त्याग देना है? क्या बचाए जाने का अर्थ झूठ न बोलना, ईमानदार व्यक्ति होना और परमेश्वर से विद्रोह न करना है? बचा लिए जाने के बाद लोग किस प्रकार के होते हैं? साधारण शब्दों में, बचा लिए जाने का अर्थ यह है कि तुम जीते रह सकते हो, तुम्हें दुबारा जीवन दे दिया गया है। कभी तुम पाप में जी रहे थे, और मरना तय था—परमेश्वर की नजरों में तुम मृत इंसान थे। यह कहने का क्या आधार है? उद्धार पाने से पहले लोग किसकी सत्ता के अधीन रहते हैं? (शैतान की सत्ता के अधीन।) और शैतान की सत्ता के अधीन लोग किस चीज के अनुसार जीते हैं? वे शैतान की प्रकृति और इसके भ्रष्ट स्वभावों के अनुसार जीते हैं। यदि ऐसा है तो उनका सारा अस्तित्व—उनकी देह, और उनकी आत्मा और विचार जैसे सारे अन्य पहलू—जीवित हैं या मृत? परमेश्वर के नजरिए से वे मृत हैं, वे चलती-फिरती लाशें हैं। ऊपरी तौर पर, तुम साँस लेते और सोच-विचार करते प्रतीत होते हो, लेकिन तुम निरंतर जिस हरेक चीज के बारे में सोच रहे हो वह बुरी है, परमेश्वर की अवज्ञा और उससे विद्रोह करती है, और तुम्हारे सारे विचार उन चीजों के बारे में हैं जिन्हें परमेश्वर सख्त नापसंद करता है, जिनसे घृणा करता है और जिनकी निंदा करता है। परमेश्वर की नजरों में ये सारी चीजें न सिर्फ देह की हैं, बल्कि ये पूरी तरह से शैतान की और दानवों की हैं। तो परमेश्वर की नजरों में भ्रष्ट इंसान क्या मनुष्य है भी? नहीं, ऐसे लोग जंगली जानवर और दानव हैं; वे जीवित शैतान हैं! सभी लोग शैतान की प्रकृति और उसके स्वभाव को जीते हैं, और परमेश्वर की नजरों में वे मनुष्य की देह में जीवित और लिपटे हुए शैतान हैं, मनुष्य की खाल में दानव हैं। परमेश्वर ऐसे लोगों को चलती-फिरती लाशों, मुर्दों के रूप में निरूपित करता है। परमेश्वर अब जो उद्धार का कार्य कर रहा है, वह शैतान के भ्रष्ट स्वभावों और उसके भ्रष्ट सार के अनुसार जीने वाली चलती-फिरती लाशों—मृत लोगों—को उठा लेने और उन्हें जीवित लोगों में बदल देने के लिए है। बचा लिए जाने का यही अर्थ है। कोई भी व्यक्ति बचा लिए जाने के खातिर परमेश्वर पर विश्वास करता है—बचा लिए जाने का अर्थ क्या है? जब कोई व्यक्ति परमेश्वर का उद्धार पाता है तो वह मृत से जीवित हो जाता है। जहाँ एक समय वह शैतान का था, उसका मरना तय था, वहीं अब वह जीवन पाकर परमेश्वर का हो जाता है। अगर लोग परमेश्वर में विश्वास और उसका अनुसरण करते हुए परमेश्वर के प्रति समर्पण कर सकें, उसे जान सकें और आराधना में उसके सामने झुक सकें, अगर उनके दिल में परमेश्वर के प्रति कोई प्रतिरोध और विद्रोह न रहे, और वे उसका और विरोध न करें और उस पर हमले न करें, और उसके प्रति सच्चे मन से समर्पण कर सकें तो फिर परमेश्वर की नजरों में वे सच्चे जीवित लोग हैं। क्या जो व्यक्ति परमेश्वर को सिर्फ मौखिक रूप से स्वीकार करता हो वह जीवित व्यक्ति है? (नहीं।) तो फिर जीवित व्यक्ति कैसा होता है? जीवित लोगों की वास्तविक अभिव्यक्तियाँ क्या हैं? जीवित व्यक्तियों के पास क्या होना जरूरी है? तुम लोग मुझे अपनी राय बताओ। (जो लोग सत्य स्वीकार कर सकते हैं, वे जीवित लोग हैं। जब लोगों के विचार और दृष्टिकोण और चीजों से संबंधित उनके दृष्टिकोण बदलकर परमेश्वर के वचनों के अनुरूप हो जाते हैं, तो वे जीवित लोग होते हैं।) (जीवित लोग वे हैं जो सत्य समझते हैं और इसका अभ्यास कर सकते हैं।) (जो व्यक्ति परमेश्वर का भय मानता है और अय्यूब की तरह बुराई से दूर रहता है, वह जीवित व्यक्ति है।) (जो लोग परमेश्वर को जानते हैं, परमेश्वर के वचनों के अनुसार जी सकते हैं, और सत्य वास्तविकता को जी सकते हैं—वे जीवित लोग हैं।) तुम लोगों में से हर किसी ने एक प्रकार की अभिव्यक्ति की बात की है। किसी व्यक्ति के अंततः बचा लिए जाने और जीवित मनुष्य बनने के लिए, उसे कम-से-कम परमेश्वर के वचनों को ध्यान से सुनने में सक्षम होना चाहिए, जमीर और विवेक युक्त वचन बोलने में सक्षम होना चाहिए, और उसे अवश्य ही विचारवान और विवेकशील होना चाहिए, सत्य समझने और इसका अभ्यास करने योग्य होना चाहिए, परमेश्वर के प्रति समर्पण और उसकी आराधना करने योग्य होना चाहिए। यही सच्चा जीवित व्यक्ति होता है। जीवित व्यक्ति अक्सर क्या सोचते और करते हैं? वे थोड़ा-बहुत वही कर सकते हैं जो सामान्य लोगों को करना चाहिए। मुख्य रूप से, वे अपने कर्तव्य अच्छी तरह करते हैं, और वे अपने मन में जो कुछ सोचते और प्रकट करते हैं और नियमित रूप से जो कुछ कहते और करते हैं, उसमें परमेश्वर का भय मानते हैं और बुराई से दूर रहते हैं। वे अक्सर जो कुछ सोचते और करते हैं, उसकी यही प्रकृति है। इसे थोड़ा और सटीक रूप से कहें तो वे जो कुछ भी कहते और करते हैं, वह कम-से-कम मोटे तौर पर सत्य के अनुरूप होता है। परमेश्वर इसकी निंदा नहीं करता, न इसका तिरस्कार करता है, बल्कि वह इसे मानता और स्वीकृति देता है। जीवित लोग यही करते हैं, और यही उन्हें करना भी चाहिए।

—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, केवल सच्चे समर्पण के साथ ही व्यक्ति असली भरोसा रख सकता है

यदि लोग जीवित प्राणी बनना, परमेश्वर की गवाही देना और परमेश्वर द्वारा योग्य समझा जाना चाहते हैं तो उन्हें परमेश्वर का उद्धार स्वीकार करना चाहिए; उन्हें सहर्ष उसके न्याय व ताड़ना के प्रति समर्पण करना चाहिए और परमेश्वर द्वारा काट-छाँट को सहर्ष स्वीकार करना चाहिए। तभी वे परमेश्वर द्वारा अपेक्षित तमाम सत्यों को अभ्यास में ला सकेंगे, तभी वे परमेश्वर का उद्धारकारी अनुग्रह प्राप्त करेंगे और सचमुच जीवित प्राणी बनेंगे। जीवित वे होते हैं जो परमेश्वर द्वारा बचाए जाते हैं; उनका परमेश्वर द्वारा न्याय किया गया है और उनकी परमेश्वर द्वारा ताड़ना की गई है, वे परमेश्वर के लिए खुद को समर्पित करने के इच्छुक होते हैं और खुशी से अपने प्राण न्योछावर करते हैं और वे सहर्ष अपना संपूर्ण जीवन परमेश्वर के लिए खपाते हैं। जब जीवित लोग परमेश्वर की गवाही देते हैं, केवल तभी शैतान को लज्जित किया जा सकता है; केवल जीवित ही परमेश्वर के सुसमाचार कार्य को फैला सकते हैं, केवल जीवित ही परमेश्वर के इरादों के अनुरूप होते हैं और केवल जीवित ही वास्तविक लोग होते हैं। मूलतः परमेश्वर द्वारा बनाया गया मनुष्य जीवित था, परंतु शैतान की भ्रष्टता के कारण मनुष्य मृत्यु में जीता है, शैतान के प्रभाव में जीता है और लिहाजा, इस तरीके से लोग आत्माविहीन मृत हो चुके हैं, वे ऐसे शत्रु बन गए हैं जो परमेश्वर का विरोध करते हैं, वे शैतान के औजार बन गए हैं और वे शैतान के कैदी बन गए हैं। परमेश्वर ने जिन जीवित लोगों की रचना की थी वे मृत बन गए हैं और इसलिए परमेश्वर ने अपनी गवाही खो दी है और उसने उस मानवजाति को भी खो दिया है जिसे उसने रचा है और जो एकमात्र ऐसी चीज है जिसमें उसकी साँस है। अगर परमेश्वर को अपनी गवाही वापस लेनी है और उन लोगों को वापस लेना है जिसे उसने अपने हाथों से बनाया, लेकिन जो शैतान द्वारा कैद कर लिए गए हैं, तो उसे उन्हें पुनर्जीवित करना होगा जिससे वे जीवित प्राणी बन जाएँ, उसे उन सबको वापस लाना होगा ताकि वे उसकी रोशनी में जी सकें। मृत वे लोग हैं जिनमें आत्मा नहीं होती, जो चरम सीमा तक सुन्न हैं, जो परमेश्वर का विरोध करते हैं, और इससे भी बढ़कर जो परमेश्वर को नहीं जानते हैं। इन लोगों का परमेश्वर के प्रति समर्पण करने का जरा-सा भी इरादा नहीं होता है; वे बस उसके विरुद्ध विद्रोह करते हैं और उसका विरोध करते हैं और इनमें थोड़ी-सी भी निष्ठा नहीं होती है। जीवित वे हैं जिनकी आत्मा पुनर्जीवित हो चुकी है, जो परमेश्वर के प्रति समर्पण करना जानते हैं, जो परमेश्वर के प्रति निष्ठावान होते हैं और जिनमें सत्य और गवाही होती है—सिर्फ यही लोग परमेश्वर को अपने घर में पसंद हैं।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, क्या तुम ऐसे व्यक्ति हो जो जीवित हो उठा है?

पिछला: 1. तुम कहते हो कि लोगों को केवल तभी शुद्ध किया और पूरी तरह से बचाया जा सकता है जब वे अंत दिनों का परमेश्वर का न्याय का कार्य स्वीकार करते हैं। हम ऐसा नहीं मानते। बाइबल कहती है : “क्योंकि धार्मिकता के लिये मन से विश्‍वास किया जाता है, और उद्धार के लिये मुँह से अंगीकार किया जाता है” (रोमियों 10:10)। “अतः अब जो मसीह यीशु में हैं, उन पर दण्ड की आज्ञा नहीं” (रोमियों 8:1)। प्रभु यीशु में विश्वास करके हम पहले ही अपने पापों से मुक्त किए जा चुके हैं और अपनी आस्था से न्यायोचित ठहराए गए हैं। एक ही बार में और हमेशा के लिए हमारा उद्धार किया गया है, और जब प्रभु लौटता है, तो हमें सीधे स्वर्ग में ले जाया जाएगा। फिर आप यह क्यों कहते हैं कि पूरी तरह से बचाए जाने के लिए हमें अंत के दिनों में परमेश्वर का न्याय का कार्य स्वीकार करना होगा?

अगला: 1. बाइबल कहती है : “तब हम जो जीवित और बचे रहेंगे उनके साथ बादलों पर उठा लिये जाएँगे कि हवा में प्रभु से मिलें; और इस रीति से हम सदा प्रभु के साथ रहेंगे” (1 थिस्सलुनीकियों 4:17)। हम मानते हैं कि एक बार जब परमेश्वर आ जाता है, तो बादलों में उससे मिलने हेतु, हमारा सीधे आकाश में स्वर्गारोहण हो जाएगा। आप गवाही देते हैं कि प्रभु वापस लौट आया है, तो हमारा स्वर्गारोहण क्यों नहीं हुआ है?

परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?

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5. पुराने और नए दोनों नियमों के युगों में, परमेश्वर ने इस्राएल में काम किया। प्रभु यीशु ने भविष्यवाणी की कि वह अंतिम दिनों के दौरान लौटेगा, इसलिए जब भी वह लौटता है, तो उसे इस्राएल में आना चाहिए। फिर भी आप गवाही देते हैं कि प्रभु यीशु पहले ही लौट चुका है, कि वह देह में प्रकट हुआ है और चीन में अपना कार्य कर रहा है। चीन एक नास्तिक राजनीतिक दल द्वारा शासित राष्ट्र है। किसी भी (अन्य) देश में परमेश्वर के प्रति इससे अधिक विरोध और ईसाइयों का इससे अधिक उत्पीड़न नहीं है। परमेश्वर की वापसी चीन में कैसे हो सकती है?

संदर्भ के लिए बाइबल के पद :“क्योंकि उदयाचल से लेकर अस्ताचल तक जाति-जाति में मेरा नाम महान् है..., सेनाओं के यहोवा का यही वचन है” (मलाकी...

प्रश्न 1: सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "केवल अंत के दिनों का मसीह ही मनुष्य को अनंत जीवन का मार्ग दे सकता है," तो मुझे वह याद आया जो प्रभु यीशु ने एक बार कहा था, "परन्तु जो कोई उस जल में से पीएगा जो मैं उसे दूँगा, वह फिर अनन्तकाल तक प्यासा न होगा; वरन् जो जल मैं उसे दूँगा, वह उसमें एक सोता बन जाएगा जो अनन्त जीवन के लिये उमड़ता रहेगा" (यूहन्ना 4:14)। हम पहले से ही जानते हैं कि प्रभु यीशु जीवन के सजीव जल का स्रोत हैं, और अनन्‍त जीवन का मार्ग हैं। क्या ऐसा हो सकता है कि सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर और प्रभु यीशु समान स्रोत हों? क्या उनके कार्य और वचन दोनों पवित्र आत्मा के कार्य और वचन हैं? क्या उनका कार्य एक ही परमेश्‍वर करते हैं?

उत्तर: दोनों बार जब परमेश्‍वर ने देह धारण की तो अपने कार्य में, उन्होंने यह गवाही दी कि वे सत्‍य, मार्ग, जीवन और अनन्‍त जीवन के मार्ग हैं।...

परमेश्वर का प्रकटन और कार्य परमेश्वर को जानने के बारे में अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन मसीह-विरोधियों को उजागर करना अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ सत्य के अनुसरण के बारे में सत्य के अनुसरण के बारे में न्याय परमेश्वर के घर से शुरू होता है अंत के दिनों के मसीह, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अत्यावश्यक वचन परमेश्वर के दैनिक वचन सत्य वास्तविकताएं जिनमें परमेश्वर के विश्वासियों को जरूर प्रवेश करना चाहिए मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ राज्य का सुसमाचार फ़ैलाने के लिए दिशानिर्देश परमेश्वर की भेड़ें परमेश्वर की आवाज को सुनती हैं परमेश्वर की आवाज़ सुनो परमेश्वर के प्रकटन को देखो राज्य के सुसमाचार पर अत्यावश्यक प्रश्न और उत्तर मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 1) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 2) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 3) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 4) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 5) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 6) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 7) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 8) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 9) मैं वापस सर्वशक्तिमान परमेश्वर के पास कैसे गया

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