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परमेश्वर के दोनों देहधारणों की ज़रूरत है मानवजाति को

I

अंत के दिनों का कार्य न परिणामों को प्राप्त कर सकेगा,

न ही कर सकेगा पापियों का सम्पूर्ण उद्धार,

जब तक देहधारण के द्वारा न किया गया हो।

यदि परमेश्वर देहधारी बन दुनिया में न आए,

तो वो रहेगा बन कर पवित्रात्मा जिसे कोई छू न सके,

कोई देख न सके।

देह से बने मानव से परमेश्वर के आत्मा का कोई मेल नहीं,

हैं दुनिया अलग और स्वभाव अलग,

मानव और परमेश्वर के।

दोनों के बीच एक रिश्ता गढ़ने का नहीं है कोई रास्ता।

न ही बन सकता है मानव कभी आत्मा।

इसलिए परमेश्वर के आत्मा को अपने असली कार्य को करने के लिए

एक प्राणी बनना चाहिए।

आवश्यकता है तभी देह बनता है परमेश्वर, परमेश्वर।

यदि परमेश्वर का आत्मा कर पाता अपना कार्य प्रत्यक्ष रूप से,

प्रत्यक्ष रूप से,

तो वो कभी अनादर न सहता

जो वो सहता है देहधारी हो कर, हो कर।

II

परमेश्वर न केवल सबसे ऊँचे स्थान पर चढ़ सकता है,

बल्कि करने के लिए वो अपना कार्य,

खुद को विनम्र कर मानव बन सकता है।

मानव न तो सबसे ऊँचे स्थान पर चढ़ सकता है,

न वो सबसे नीचे स्थान में उतर सकता है।

मानव नहीं बन सकता एक आत्मा।

इसलिए परमेश्वर को अपना कार्य करने के लिए देहधारी बनना चाहिए।

अपने पहले देहधारण में,

केवल देहधारी परमेश्वर ही

सूली पर चढ़ कर मानव को पापों से मुक्त कर सकता था।

पर संभव न था परमेश्वर के आत्मा का

मानव के लिए पाप बलि स्वरूप सूली पर चढ़ जाना।

परमेश्वर बन सकता था देहधारी

ताकि चढ़ पाता बलि पर वो मानव के पापों के लिए।

पर पतित था मानव और स्वर्ग पर नहीं चढ़ सकता था,

वो जाकर नहीं ले सकता था पापबलि, पापबलि।

इसलिए परमेश्वर को पड़ा स्वर्ग से धरती आना-जाना।

और यीशु को पड़ा आना और मानव के बीच

रह कर वो कार्य पड़ा करना जो मानव न कर सकता था।

आवश्यकता है तभी देह बनता है परमेश्वर, परमेश्वर।

यदि परमेश्वर का आत्मा कर पाता अपना कार्य प्रत्यक्ष रूप से,

प्रत्यक्ष रूप से,

तो वो कभी अनादर न सहता

जो वो सहता है देहधारी हो कर, हो कर, हो कर।

"वचन देह में प्रकट होता है" से

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