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340 उद्धार-कार्य के अधिक उपयुक्त है देहधारी परमेश्वर

जो अंत के दिनों में न्याय करे सबका

वो है देहधारी परमेश्वर आज का।

क्योंकि शैतान की रूह नहीं,

हाड़-माँस का भ्रष्ट मानव है,

होता सीधे न्याय जिसका,

न्याय का कार्य इंसानों के बीच होता है,

ये काम आत्मिक जगत में नहीं होता।

अगर ये कार्य परमेश्वर का आत्मा करता,

तो न्याय इतना सम्पूर्ण नहीं होता।

क्योंकि देख नहीं पाता इंसान आत्मा को रूबरू,

इंसान के लिये इसे स्वीकारना मुश्किल होता।

तो असर इसका इतना तेज़ नहीं होता,

परमेश्वर के अपमान न किये जा सकने योग्य

स्वभाव को साफ़-साफ़ देख पाना

इंसान के लिये ज़्यादा मुश्किल होता,

इंसान के लिये ज़्यादा मुश्किल होता।

इंसानी देह की भ्रष्टता का

न्याय-कार्य करने के लिये,

नहीं कोई देहधारी परमेश्वर से,

नहीं कोई देहधारी परमेश्वर से,

ज़्यादा उपयुक्त, ज़्यादा काबिल,

ज़्यादा उपयुक्त, ज़्यादा काबिल।

जब न्याय करे इंसान का,

देह में परमेश्वर,

हो सकती है हार तभी शैतान की।

है उसकी मानवता सामान्य मगर,

कर सकता है वो न्याय इंसान की अधार्मिकता का।

ज़ाहिर है इससे वो पवित्र है, अलग है।

कर सकता है सिर्फ़ परमेश्वर न्याय इंसान का,

क्योंकि परमेश्वर में सत्य है, धार्मिकता है।

नहीं ये गुण जिनमें,

काबिल नहीं वो दूसरों का न्याय करने के।

इंसान की धारणाओं और विरोध का न्याय करते वक्त,

कर देता है उजागर वो नाफ़रमानी उसकी।

देह में उसके कार्य का असर

कहीं ज़्यादा साफ़ है आत्मा के कार्य से।

देख सकते हैं हम देहधारी परमेश्वर को,

जीत सकता है परमेश्वर इंसान को।

इंसान विरोध करता है, फिर कहा मानता है,

पहले सताता, फिर स्वीकारता है,

पहले धारणा रखता है,

फिर ज्ञान की ओर बढ़ता है,

पहले नकारता, फिर प्यार करता है।

ये सारे असर हैं देह में परमेश्वर के कार्य के।

उसके न्याय की स्वीकृति के

द्वारा इंसान को बचाया जाता है,

उसके वचनों से इंसान उसे धीरे-धीरे जानता है,

उसके विरोध के दौरान ही इंसान को जीता जाता है।

उसकी ताड़ना की स्वीकृति के दौरान,

इंसान परमेश्वर से जीवन-पोषण पाता है।

नहीं करता परमेश्वर ये सारे काम आत्मा के तौर पर,

ये सारे काम परमेश्वर देह में ही करता है।

इंसानों के न्याय का कार्य परमेश्वर का आत्मा नहीं,

देहधारी परमेश्वर करता है,

देहधारी परमेश्वर करता है।

"वचन देह में प्रकट होता है" से

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