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34 भ्रष्ट मानवता को आवश्यकता है देहधारी परमेश्वर द्वारा उद्धार की

I

दूषित मानवता को चाहिये देहधारी परमेश्वर का कार्य।

दूषित मानवता को चाहिये देहधारी परमेश्वर का कार्य।

देह बना परमेश्वर क्योंकि, शैतान की रूह नहीं है लक्ष्य उसका,

ना अन्य कोई चीज़ है, बस मानव है लक्ष्य उसके काम का।

मानव की देह को, दूषित किया शैतान ने,

इसी वजह से लक्ष्य बना मानव, परमेश्वर के काम का।

मानव ही है मुक्ति-स्थल परमेश्वर का।

मानव ही है मुक्ति-स्थल परमेश्वर का।

मानव नश्वर जीव है, बस देह है।

परमेश्वर ही उसकी रक्षा कर सकता है।

अपने कामों की ख़ातिर, उत्तम परिणामों की ख़ातिर,

परमेश्वर को, मानव बनकर आना होगा,

मानव चूंकि देह है, पापों पर वश नहीं है उसका।

उसकी ख़ातिर परमेश्वर को, देह धारण करना होगा,

मानव छूट नहीं सकता ख़ुद, देह की इन ज़ंजीरों से।

उसकी ख़ातिर परमेश्वर को, देह धारण करना होगा।

उसकी ख़ातिर परमेश्वर को, देह धारण करना होगा।

II

मानव-देह को कर दिया है दूषित शैतान ने,

बहुत अहित हुआ है देह का, और बना अज्ञानी है।

मानव देह में परमेश्वर आता है,

क्योंकि उसके उद्धार का लक्ष्य है मानव,

और मानव-तन के प्रयोग से, शैतान, डालता है परमेश्वर के कामों में व्यवधान।

मानव-विजय के द्वारा परमेश्वर शैतान से संग्राम करता है,

संग्राम करता है, संग्राम करता है,

साथ ही वो मानव को बचाता भी है।

अपना काम पूरा करने को, परमेश्वर को,

मानव देह में आना होगा, आना होगा।

कायम रहकर मानव देह में शैतान ने,

मानव देह को दूषित कर डाला परमेश्वर को उसे पराजित करना होगा।

शैतान से संग्राम करने और मानव की रक्षा करने,

परमेश्वर को इस धरती पर, मानव बनकर आना होगा।

यही एक है असली काम। यही एक है असली काम।

III

परमेश्वर मानव बनकर, जब करता है काम

तो सच में वो शैतान से करता है संग्राम।

वो देह में रहकर आत्मिक-जगत का काम करता है,

और आत्मिक-जगत में अपने सारे काम को धरती पर साकार करता है।

परमेश्वर जिस मानव को विजय करता है, वो परमेश्वर की नहीं मानता,

जबकि इंसानों में होता है शैतान का रूप पराजित,

और अंत में जिसे बचाया जाता है, वो मानव है, वो मानव है।

बड़ा ज़रूरी था परमेश्वर इंसान बने,

शैतान से संग्राम करने,

जीव का चोला पहने और जीव के चोले में, विद्रोही मानव को जीते।

बड़ा ज़रूरी था परमेश्वर इंसान बने, और जीव का चोला पहने,

बचाने उस मानव को, जिसका चोला वैसा ही है,

जिसका अहित किया है शैतान ने।

मानव परमेश्वर का बैरी है, परमेश्वर को उसे जीतना होगा।

मानव लक्ष्य है परमेश्वर के उद्धार का;

परमेश्वर को देह लेकर, मानव बनकर आना होगा।

IV

इसी तरह परमेश्वर का काम आसां होगा।

परमेश्वर शैतान को हरा सकता है,

परमेश्वर मानव को जीत सकता है,

परमेश्वर मानव को बचा सकता है।

परमेश्वर मानव को बचा सकता है।

परमेश्वर मानव को बचा सकता है।

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