16. अब मैं डरकर पीछे नहीं हटती
2 सितंबर 2022 को मैं किसी काम से एक अगुआ के घर गई, पर घर में कोई नहीं था। उसके घर के सामने रहने वाली बहन शाओ हॉन्ग ने संयोग से मुझे देख लिया। उसने मुझे अपने घर बुलाया और घबराकर बोली, “कुछ हो गया है! झोऊ लिंग को पुलिस ले गई है। दो दिन हो चुके हैं और उसके बारे में कोई खबर नहीं है। अगुआ सबको बताने गई है—शायद जल्दी लौट आए।” यह खबर सुनकर मैं घबरा गई और डर भी गई। झोऊ लिंग अगुआ रह चुकी थी और मैं नहीं जानती थी कि पुलिस उसे किस तरह की यातनाएँ देगी। क्या वह यातनाओं से टूट जाएगी और यहूदा बन जाएगी? मैं भी अभी-अभी उसके घर गई थी। अगर पुलिस निगरानी कर रही होगी तो शायद मुझे देखा होगा। मैं मूल रूप से यहाँ आई ही इसलिए कि मैं छिपती फिर रही हूँ। पुलिस बरसों से लगातार मेरे पीछे पड़ी है। अगर मैं पकड़ ली गई तो वे मुझे और भी कड़ी यातना देंगे। शायद मैं पीट-पीटकर मार ही डाली जाऊँ। मैं बहुत डरी हुई थी और काम करके उस इलाके से फौरन निकलना चाहती थी। अगुआ जल्द ही शाओ हॉन्ग के घर पहुँची और हमारी चर्चा खत्म होते ही अपने घर लौट गई। दो-तीन मिनट ही गुजरे थे, शाओ हॉन्ग घबराकर उलटे पाँव लौटी और बोली, “अगुआ घर लौटी ही थी, तभी सात-आठ पुलिस वाले उसे लेने आए और चले गए। झोऊ लिंग भी उनकी कार में थी। उसने ही बताया होगा कि अगुआ कहाँ रहती है। चाहे कुछ भी हो पर बाहर मत जाना।” डर के मारे कलेजा मुँह को आ गया। शाओ हॉन्ग और अगुआ एक-दूसरे के ठीक आमने-सामने रहती थीं। पुलिस बस कुछ ही कदम दूर होगी। अगर उसने मुझे पकड़ लिया, तो मुझे पक्का यकीन है कि मैं सही-सलामत नहीं बच पाऊँगी। मैं घर में छिप गई और खिड़की से झाँकने का साहस नहीं किया, लगातार दिल में परमेश्वर को पुकारती रही, और दुआ करती रही कि पुलिस जल्दी चली जाए। पुलिस की कार करीब एक घंटे बाद गई और तब जाकर मेरा दिल शांत हुआ। लेकिन कुछ ही दिन पहले झोऊ लिंग मेरे घर आई थी—क्या वह मेरे साथ भी गद्दारी कर सकती थी? मेरा घर अब सुरक्षित नहीं रहा। जाऊँ तो कहाँ? मुझे याद आया मेरे घर में एक नोटबुक पर भाई-बहनों के फोन नंबर लिखे थे जिसे जल्द से जल्द हटाना जरूरी था। मेरे घर के करीब ही तीन और मेजबानों के घर थे। अगर उन्हें तुरंत खबरदार न किया गया, तो नोटबुक के पुलिस के हाथ लगते ही कई और भाई-बहन फँस जाएँगे। लेकिन अगर मैं तुरंत वापस लौटी तो मैं सीधे उसके जाल में फँस रही होऊँगी। मैं बरसों से अपना कर्तव्य निभाते हुए शहर से बाहर थी और पुलिस के लिए गिरफ्तारी का एक बड़ा लक्ष्य थी। अगर पकड़ी गई तो मुझे और भी यातना झेलनी होगी। मैंने सोचा, “ऐसा नहीं हो सकता, बेहतर होगा मैं भाग जाऊँ और तुरंत कोई सुरक्षित जगह खोज लूँ!” लेकिन इन विचारों के साथ मुझे दिल में कोई शांति नहीं मिली, तो मैं परमेश्वर को लगातार पुकारती रही। उसके बाद मैंने परमेश्वर के वचनों का एक अंश याद किया : “तुम्हें इस या उस चीज से नहीं डरना चाहिए; चाहे तुम्हें कितनी भी मुसीबतों या खतरों का सामना करना पड़े, तुम्हें किसी भी अड़चन से बाधित हुए बिना मेरे सम्मुख अडिग रहने में सक्षम होना चाहिए ताकि मेरी इच्छा बेरोक-टोक कार्यान्वित हो सके। यह तुम्हारा कर्तव्य है; अन्यथा मैं अपना कोप तुम पर उतारूँगा और अपने हाथ से मैं...। फिर तुम अंतहीन मानसिक पीड़ा सहोगे। तुम्हें सब कुछ सहना होगा; मेरे लिए तुम्हें हर चीज छोड़ने और अपनी पूरी ताकत से मेरा अनुसरण करने को तैयार रहना होगा और कोई भी कीमत चुकाने के लिए तैयार रहना होगा। अब वह समय है जब मैं तुम्हें परखूँगा : क्या तुम अपनी वफादारी मुझे अर्पित करोगे? क्या तुम मार्ग के अंत तक वफादारी से मेरा अनुसरण कर सकते हो? डरो मत; तुम्हारे सहारे के रूप में मेरे रहते कौन कभी इस मार्ग को अवरुद्ध कर सकता है? यह याद रखो! याद रखो! हर चीज में मेरे अच्छे इरादे निहित हैं और हर चीज मेरी जाँच-पड़ताल के अधीन है। क्या तुम्हारे हर शब्द और कर्म में मेरे वचन का पालन होता है? जब तुम्हारी अग्नि परीक्षाएँ होंगी, तो क्या तुम घुटने टेकोगे और पुकारोगे? या तुम दुबक जाओगे और आगे बढ़ने में असमर्थ रहोगे?” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, आरंभ में मसीह के कथन, अध्याय 10)। परमेश्वर के वचनों से मुझे एहसास हुआ कि मेरा आध्यात्मिक कद छोटा था और मुझमें सच्ची आस्था नहीं थी। अपने आसपास के लोगों को एक के बाद एक गिरफ्तार होते देखकर मैं भयभीत थी और छिपने के लिए सुरक्षित जगह खोजना चाहती थी। अपनी सुरक्षा की खातिर मैं कलीसिया के हितों की अनदेखी कर रही थी—मैं कितनी स्वार्थी थी! अब अगुआ की गिरफ्तारी के कारण बहुत सारे भाई-बहनों को सूचित करना और परमेश्वर के वचनों की बहुत सारी प्रतियों को हटाना जरूरी था। अगर यह काम जल्द से जल्द नहीं किया गया, तो इससे कई भाई और बहन गिरफ्तार किए जा सकते हैं। कलीसिया की उपयाजक के तौर पर मेरा कर्तव्य और दायित्व था कि भाई-बहनों के साथ ही परमेश्वर के वचनों की किताबों की भी हिफाजत करूँ। अगर मैंने कायर होना और तुच्छ अस्तित्व को घसीटना चुना क्योंकि मैं डरी हुई और बुजदिल थी, तो यह निहायत गैर-जिम्मेदाराना बात होगी। इस अहम घड़ी में परमेश्वर पड़ताल कर रहा था कि मैं उसके इरादे पर ध्यान देकर कलीसिया के हितों की सुरक्षा कर भी रही हूँ या नहीं। मुझे परमेश्वर का सहारा लेना चाहिए और फौरन बाद का कार्य सँभालना चाहिए। जहाँ तक मेरी गिरफ्तारी होने या न होने की बात है, इसका फैसला सिर्फ परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्था पर है। मैं खुद को परमेश्वर के हाथों में सौंपने के लिए तैयार थी। यह एहसास होने के बाद मैं अब उतनी घबराई या डरी हुई नहीं रही। अपने घर के पास पहुँचकर मैंने दरवाजे पर पुलिस की कार खड़ी देखी। मेरा दिल जोरों से धड़कने लगा। मैंने सोचा, “लगता है कि यहूदा ने मुझसे गद्दारी की है। मुझे नहीं पता कि पास के तीन मेजबान घर भी खंगाले जा चुके हैं या नहीं। मुझे बड़े अगुआ को फौरन कलीसिया की स्थिति के बारे में सूचित करना है, ताकि वे एहतियात बरत सकें और समय रहते जरूरी इंतजाम करके कलीसिया कार्य का और ज्यादा नुकसान होने से रोक सकें।”
मुझे पता था कि बहन सू हुआ बड़े अगुआ से संपर्क कर सकती थी, इसलिए मैं उसे खोजने निकली। वहाँ पहुँचते ही उसके गैर-विश्वासी पति ने घबराकर कहा, “अभी-अभी पुलिस आई थी। सू हुआ बाहर है, इसलिए वे उसे पकड़ नहीं पाए। वे और गिरफ्तारियाँ करने के लिए अभी-अभी तुम्हारे घर गए हैं।” मैं फौरन निकल गई, एक ही जगह रुकने की हिम्मत तक नहीं कर पाई। वापस लौटते हुए मैं सोच रही थी कि बड़ा लाल अजगर कितना बुरा है। परमेश्वर पर विश्वास करने वालों की धरपकड़ के लिए वह कैसी हैरतअंगेज कोशिशें करता है। एक के बाद एक भाई-बहन गिरफ्तार किए जा रहे थे और किसी भी पल मेरे पकड़े जाने का खतरा था। अगर मैं यातना नहीं सह सकी और यहूदा बन गई तो क्या मेरे लिए आस्था का रास्ता बंद नहीं हो जाएगा? इस बारे में जितना ज्यादा सोचा, उतनी ही कमजोर और भयभीत हो गई, और मुझे लगा जैसे चीन में विश्वासी होना बड़ा मुश्किल और बहुत खतरनाक है। तो मैंने दिल ही दिल में परमेश्वर को बार-बार याद किया, “हे परमेश्वर! मैं क्या करूँ?” उसके बाद मैंने परमेश्वर के वचनों के इस अंश के बारे में सोचा : “आस्था एक ही लट्ठे से बने पुल की तरह है : जो लोग जीवन से चिपके रहते हैं और मृत्यु से डरते हैं उन्हें इसे पार करने में परेशानी होगी, परन्तु जो अपनी जान देने को तैयार रहते हैं वे सधे हुए कदमों से और बेफिक्र होकर इसे पार कर सकते हैं। अगर लोग कायर और भययुक्त विचार पालते हैं तो ऐसा इसलिए है कि शैतान उन्हें मूर्ख बना चुका है; उसे डर है कि हम परमेश्वर में प्रवेश करने के लिए आस्था का पुल पार कर लेंगे। शैतान अपने विचार हमें भेजने के लिए हर संभव प्रयास कर रहा है। हमें हर पल परमेश्वर से प्रार्थना करनी चाहिए कि वह हमें रोशन और प्रबुद्ध करे, हर पल परमेश्वर पर निर्भर रहना चाहिए ताकि वह हमारे भीतर से शैतान के जहर को शुद्ध कर दे, हर पल अपनी आत्मा के भीतर परमेश्वर के निकट आने का अभ्यास करना चाहिए; हमें अपने संपूर्ण अस्तित्व पर परमेश्वर को प्रभुत्व रखने और उसमें पूरी तरह से बसने देना चाहिए” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, आरंभ में मसीह के कथन, अध्याय 6)। परमेश्वर के वचनों ने मुझे आस्था और शक्ति दी। मैंने देखा कि मैं कायरता और भय में जी रही थी, गिरफ्तारी और पीट-पीटकर मारे जाने से भयभीत थी। मैं शैतानी चालों का शिकार बन रही थी। शैतान मेरी कमजोरी का इस्तेमाल मुझे बाधित करने के लिए कर रहा था, मुझसे परमेश्वर में आस्था छुड़वाने के लिए कर रहा था ताकि मैं अपना कर्तव्य निभाने का साहस न करूँ और इस तरह धीरे-धीरे उससे दूर हो जाऊँ और उसे धोखा दे दूँ। मुझे शैतानी चालों की असलियत देखनी थी। मैं इस तरह की स्थितियों का जितना अधिक सामना करूँ, उतना ही अधिक मुझे परमेश्वर के करीब जाना चाहिए, उस पर निर्भर रहना चाहिए और उसके वचनों के सहारे जीना चाहिए। अगर गिरफ्तार हो भी गई, तो मैं कभी शिकायत नहीं करूँगी और समर्पण करूँगी। अपनी गवाही में अडिग रहूँगी और परमेश्वर को संतुष्ट करूँगी।
मैं बड़े अगुआ से संपर्क नहीं कर पाई और मैंने निर्णय किया कि मैं पहले गिरफ्तारी के बाद की स्थिति सँभालूँगी। मुझे पहले एक तरीका खोजना था कि मैं फोन नंबर वाली नोटबुक पा सकूँ जो मैं घर छोड़ आई थी; वरना अगर यह पुलिस को मिल गई तो कई भाई-बहन पकड़े जाएँगे। लेकिन पुलिस शायद मेरे घर की निगरानी कर रही हो—क्या मैं उसके जाल में नहीं फँस रही होऊँगी? इस उलझन में घिरते ही मैंने परमेश्वर के वचनों को याद किया : “तुम लोगों में से प्रत्येक अपने को मेरे साथ बहुत संगत समझता है, परंतु यदि ऐसा होता, तो फिर यह अकाट्य प्रमाण किस पर लागू होगा? तुम लोगों को लगता है कि तुम्हारे अंदर मेरे प्रति उच्चतम सच्चाई और निष्ठा है। तुम लोग सोचते हो कि तुम बहुत ही रहमदिल, बहुत ही करुणामय हो और तुमने मेरे प्रति बहुत समर्पण किया है। तुम लोग सोचते हो कि तुम लोगों ने मेरे लिए पर्याप्त से अधिक किया है। लेकिन क्या तुम लोगों ने कभी इसे अपने कामों से मिलाकर देखा है? ... तुम लोग अपने बच्चों या अपने पति की खातिर या अपनी आत्म-रक्षा की खातिर मुझे बाहर निकाल देते हो। तुम जिसकी परवाह करते हो, वह मैं नहीं हूँ—वह तुम लोगों का परिवार, तुम लोगों के बच्चे, तुम लोगों का रुतबा, तुम लोगों का भविष्य और तुम लोगों का सुख है। कब तुम लोगों ने बोलते या कार्य करते समय कभी मेरे बारे में सोचा है? कड़ाके की ठंड के दिनों में तुम लोगों के विचार अपने बच्चों, अपने पति, अपनी पत्नी या अपने माता-पिता की तरफ मुड़ जाते हैं। झुलसाने वाली गर्मी के दिनों में भी तुम सबके विचारों में मेरे लिए कोई स्थान नहीं होता। जब तुम अपना कर्तव्य करते हो, तब तुम अपने हितों, अपनी व्यक्तिगत सुरक्षा, अपने परिवार के सदस्यों के बारे में ही सोच रहे होते हो। तुमने कभी ऐसा क्या किया है जो मेरे लिए हो? तुमने कब कभी भी मेरे बारे में सोचा है? तुमने कब मेरी खातिर और मेरे कार्य की खातिर कुछ भी किया है? मेरे प्रति तुम्हारी अनुरूपता का प्रमाण कहाँ है? मेरे प्रति तुम्हारी वफादारी की वास्तविकता कहाँ है? मेरे प्रति तुम्हारे समर्पण की वास्तविकता कहाँ है? कब तुम्हारे इरादे मेरा आशीष पाने की खातिर नहीं रहे हैं? तुम सभी लोग मुझे मूर्ख बनाने की कोशिश कर रहे हो। तुम सब मुझे धोखा दे रहे हो। तुम लोग सत्य के साथ खिलवाड़ कर रहे हो, तुम सत्य के अस्तित्व को छिपा रहे हो और सत्य के सार से विश्वासघात कर रहे हो। यह देखते हुए कि तुम लोग इस तरह मेरे विरुद्ध जाते हो, भविष्य में क्या चीज तुम लोगों की प्रतीक्षा कर रही है?” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, तुम्हें मसीह के प्रति अनुरूपता का मार्ग खोजना चाहिए)। हर सवाल मेरे दिल को परमेश्वर के आरोप जैसा चुभा। अतीत में मुझे लगता था कि मैं अपने कर्तव्य के लिए घर-बार और नौकरी छोड़ पाई थी, इसलिए मैं परमेश्वर के प्रति निष्ठावान हूँ। लेकिन जब मैंने बड़े लाल अजगर की गिरफ्तारियों का असल में सामना किया तो मैंने देखा कि मेरा आध्यात्मिक कद कितना छोटा है। पहले मैं सिर्फ खोखले नारे और धर्म-सिद्धांत बघारती थी। एक वास्तविक संकट ने मेरा असली आध्यात्मिक कद बेनकाब कर दिया। मैं बस अपने हितों को बचाने की सोच पाती थी। मैं कलीसिया कार्य का बचाव कतई नहीं कर रही थी। परमेश्वर के इरादों का ख्याल नहीं कर रही थी। कलीसिया के हितों की बात उठने पर, जो लोग असल में परमेश्वर के इरादों पर विचार करते हैं वे परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए सब कुछ, यहाँ तक कि अपनी जान भी दे सकते हैं। मैंने इस बारे में सोचा कि किस तरह परमेश्वर के वचनों की पुस्तकें बाँटने के लिए भाई-बहन अपना जीवन जोखिम में डालते थे और उनमें से कितने ही सारे पुस्तकों को इधर-उधर ले जाने के दौरान बड़े लाल अजगर द्वारा गिरफ्तार कर लिए गए थे। कुछ तो पीट-पीटकर मार डाले गए थे। उन्होंने केवल अपना कर्तव्य निभाने और परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए अपनी जिंदगी या मौत की परवाह नहीं की, ताकि भाई-बहन परमेश्वर के वचन पढ़ सकें। लेकिन मैंने कलीसिया के हितों का जरा भी ख्याल नहीं किया। खतरे का सामना होने पर मैंने केवल अपनी सुरक्षा के बारे में सोचा। मैं गिरफ्तार होने और यातनाएँ दे-देकर मार दिए जाने से डरती थी। अमूमन अपने हित में मैं किसी भी हद तक जा सकती थी, लेकिन अब कलीसिया के हितों की खातिर मैं छोटा-सा त्याग भी नहीं कर पाई। उन भाई-बहनों की तुलना में मैं निपट स्वार्थी थी। मुझे परमेश्वर के इरादों का बिल्कुल कोई ख्याल नहीं था। अब जब एक कलीसिया अगुआ गिरफ्तार की जा चुकी है, तो कलीसिया के कार्य की रक्षा करने के लिए उठ खड़े होने के बजाय खुद को छिपा रही एक कलीसियाई कार्यकर्ता के रूप में, मैं सुरक्षित थी लेकिन मैं अपने कर्तव्य और गवाही को खो बैठी। तब मेरे जीने का क्या अर्थ था? क्या मैं चलती-फिरती लाश भर नहीं थी? यह सोचकर मैंने प्रार्थना की, “हे परमेश्वर, मैं आज पकड़ी जाऊंगी या नहीं, यह पूरी तरह तुम्हारे हाथ में है। मुझे आस्था और बुद्धि दो ताकि मैं तुम्हारा आसरा ले सकूँ और अपना कर्तव्य निभा सकूँ।”
रात के लगभग 2 बजे मैं पास में ही रहने वाली एक बहन के घर गई। पता चला कि पुलिस मेरे करीब के कई अन्य मेजबान घरों में गई थी। कुछ भाई-बहन भागकर गिरफ्तारी से बच गए। उन्होंने बताया कि पुलिस का दुबारा आना तय है और मुझे तुरंत चले जाने को कहा। मैंने ज्यादा देर तक एक ही जगह रुकने का साहस नहीं किया। मैंने देखा कि घर के प्रवेश द्वार पर कोई ताक में नहीं बैठा था, इसलिए मैं तेजी से घर गई और मैंने फोन नंबरों वाली नोटबुक उठा ली। इससे मैंने चैन की साँस ली। फिर मैं भाई याँग गुआँग के पास गई। मुझे देखते ही उसने डरकर कहा, “कल मुझे और मेरी पत्नी को गिरफ्तार किया गया था। फिर रात उन्होंने हमें छोड़ दिया। आसपास रहने वाले कई और भाई-बहन भी पकड़े गए हैं।” और इसलिए, मैं वहाँ से तुरंत भागी। लौटते हुए मैं सोच रही थी कि परिवेश बिगड़ रहा था, पूरे इलाके में भाई-बहनों की गिरफ्तारियाँ हो रही हैं। यहूदा ने मेरे साथ भी गद्दारी की थी। पुलिस के पास निश्चित रूप से मेरा हुलिया होगा और इतनी निगरानी के चलते मैं किसी भी पल पकड़ी जा सकती हूँ। मैं उनकी यातनाएँ न सह पाई तो क्या होगा? इस ख्याल ने मुझे आतंकित कर दिया। मुझे लगा छिप जाने से मैं थोड़ी-सी सुरक्षित रहूँगी, लेकिन गिरफ्तारी के बाद की स्थिति सँभालने का काम पूरा नहीं हुआ था। अगर अभी जाकर छिप गई तो क्या मैं भगोड़ी नहीं बन जाऊँगी? मैं इतने सारे साल से विश्वासी थी और मैंने परमेश्वर के वचनों के सिंचन का इतना अधिक आनंद लिया था। अगर संकट की इस घड़ी में भाग खड़ी हुई, अपना कर्तव्य और जिम्मेदारी नहीं निभाई, तो मुझमें न तो अंतरात्मा होगी, न ही मानवता। क्या मैं विश्वासी मानी भी जाऊँगी? मैं यहूदा से जरा-सी भी भिन्न नहीं हूँगी जिसने परमेश्वर से विश्वासघात किया था। यह सोचकर मैंने मन में पक्का कर लिया कि मैं बचकर भाग जाने और तुच्छ अस्तित्व घसीटने के बजाय गिरफ्तार होना और बड़े लाल अजगर के हाथों मरना पसंद करूँगी। मुझे अपनी गवाही में अडिग रहना था, परमेश्वर को संतुष्ट करना था और अपना कर्तव्य अच्छी तरह से निभाने के लिए भरसक प्रयास करना था। उस शाम मैंने परमेश्वर के ये वचन पढ़े : “मेरी योजना में शैतान शुरू से लेकर अब तक प्रत्येक कदम के पीछे लगा रहा है और मेरी बुद्धि की विषमता के रूप में वह हमेशा मेरी मूल योजना में गड़बड़ी पैदा करने के तरीके और साधन खोजने की कोशिश करता रहा है। फिर भी क्या मैं उसकी कपटपूर्ण साजिशों के आगे झुक सकता हूँ? क्या स्वर्ग और पृथ्वी में कुछ भी ऐसा है जो मेरी सेवा करने वाले के रूप में कार्य न करता हो? क्या शैतान की कपटपूर्ण साजिशें संभवतः कोई अपवाद हो सकती हैं? ठीक यही वह जगह है जहाँ मेरी बुद्धि आकर मिलती है; ठीक यही वह है जो मेरे कर्मों के बारे में अद्भुत है और यही मेरी पूरी प्रबंधन योजना के परिचालन का सिद्धांत है। राज्य के निर्माण के युग के दौरान भी मैं शैतान की कपटपूर्ण साजिशों से बचता नहीं हूँ, बल्कि वही कार्य करता रहता हूँ जो मुझे करना ही चाहिए। ब्रह्मांड और सभी चीजों के बीच मैंने अपनी विषमता के रूप में शैतान के कर्मों को चुना है। क्या यह मेरी बुद्धि की अभिव्यक्ति नहीं है? क्या यह ठीक वही नहीं है जो मेरे कार्यों के बारे में अद्भुत है?” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन, अध्याय 8)। परमेश्वर के वचनों में मुझे उसकी सर्वशक्तिमत्ता और बुद्धि के दर्शन हुए। बड़ा लाल अजगर परमेश्वर का दुश्मन है। यह बुरी तरह ईसाइयों को गिरफ्तार करता है, उनका उत्पीड़न करता है और परमेश्वर के कार्य को बाधित करता है और व्यर्थ ही मानवजाति को बचाने के परमेश्वर के कार्य को नष्ट करने की आशा करता है। लेकिन बड़े लाल अजगर द्वारा की जा रहीं गिरफ्तारियों और उत्पीड़न से हम उसके उस बुरे सार का भेद पहचान लेते हैं जो मनुष्य को नुकसान पहुँचाता है और परमेश्वर के विरुद्ध है, और फिर इससे दिल से नफरत करते हैं और संबंध तोड़ लेते हैं। इसके द्वारा की जा रहीं गिरफ्तारियों और उत्पीड़न से झूठे विश्वासियों के बीच सच्चे विश्वासियों का खुलासा हो जाता है, भेड़ और बकरियों में और गेहूँ और मोठ खरपतवार में अंतर पता हो जाता है। क्लेश की घड़ी में कुछ लोग ऐसे होते हैं जो डर और कायरता के कारण अपना कर्तव्य नहीं निभाते हैं या आस्था छोड़ देते हैं, कुछ लोग ऐसे होते हैं जो गिरफ्तारी होने और यातना न सह पाने पर परमेश्वर के साथ विश्वासघात करते हैं और यहूदा बन जाते हैं। यही लोग मोठ खरपतवार के रूप में प्रकट किए जाते हैं, जो हवा द्वारा उड़ा दिए जाएँगे। क्या इससे परमेश्वर की बुद्धिमत्ता और धार्मिकता प्रकट नहीं हो जाती? इससे मुझे प्रभु यीशु की कही बात याद आ गई : “क्योंकि जो कोई अपना प्राण बचाना चाहे, वह उसे खोएगा; और जो कोई मेरे लिए अपना प्राण खोएगा, वह उसे पाएगा” (मत्ती 16:25)। मैंने अलग-अलग युगों के उन संतों के बारे में सोचा जो परमेश्वर का सुसमाचार प्रसार करने में शहीद हो गए। कुछ लोगों को सूली पर उल्टा लटका दिया गया; कुछ के सिर कलम कर टुकड़े-टुकड़े कर दिए गए। वे मारे जरूर गए, मगर उनकी मृत्यु सार्थक थी। जबकि जो परमेश्वर को धोखा देकर यहूदा बन गए, वे अब भी जिंदा नजर तो आते हैं, पर उनके दिलों के अंदर वेदना भरी है। वे जिंदा लाशों की तरह हैं, अथाह कष्टों में हैं। मरने के बाद उनकी आत्माएँ तब भी नरक में जाकर दंड भुगतेंगी। मैं इस मामले को स्पष्ट रूप से नहीं समझती थी और यहाँ तक कि अपने कर्तव्य से मुँह चुराना और छिपना चाहती थी। अगर मैंने कर्तव्य में लापरवाही बरतकर कलीसिया कार्य का नुकसान किया तो यह अपराध होगा—एक अमिट दाग। अगर मैं कर्तव्य के लिए अपना बलिदान दे सकूँ और निष्ठावान हो सकूँ, तो गिरफ्तार होकर पीट-पीटकर मारे जाने के बावजूद मैं परमेश्वर के लिए गवाही दे पाऊँगी और शैतान को लज्जित करूँगी। मेरी मृत्यु मूल्यवान और सार्थक होगी!
उसके बाद मैंने परमेश्वर के और वचन पढ़े : “शैतान चाहे कितना ही ‘अत्यधिक शक्तिशाली’ क्यों न हो, चाहे वह कितना ही ढीठ और महत्वाकांक्षी क्यों न हो, चाहे उसमें नुकसान पहुँचाने की कितनी ही बड़ी क्षमता क्यों न हो, मनुष्य को भ्रष्ट करने और लुभाने की उसकी क्षमताएँ कितनी ही व्यापक क्यों न हों, मनुष्य को डराने-धमकाने की उसकी चालें और साजिशें कितनी ही चतुर क्यों न हों, या उसके अस्तित्व के रूप कितने ही विविध क्यों न हों, वह कभी एक भी सजीव वस्तु बनाने, सभी चीजों के अस्तित्व के लिए नियम या कानून बनाने, या किसी भी वस्तु पर, चाहे वह सजीव हो या निर्जीव, शासन करने या संप्रभुता रखने में सक्षम नहीं हुआ है। ब्रह्मांड और आकाशमंडल में, एक भी ऐसा व्यक्ति या ऐसी वस्तु नहीं है जो उसके द्वारा अस्तित्व में लाई गई हो या जो उसके कारण अस्तित्व में हो; एक भी ऐसा व्यक्ति या ऐसी वस्तु नहीं है जो उसकी संप्रभुता में हो या उसके द्वारा शासित हो। इसके विपरीत उसे न केवल परमेश्वर के प्रभुत्व के अधीन रहना पड़ता है, बल्कि उसे परमेश्वर की सभी आज्ञाओं और आदेशों का पालन भी करना पड़ता है। परमेश्वर की अनुमति के बिना, शैतान जमीन पर पानी की एक बूँद या रेत के एक कण को भी आसानी से छू नहीं सकता; परमेश्वर की अनुमति के बिना, शैतान जमीन पर चींटियों का भी कुछ नहीं बिगाड़ सकता, मानवजाति की तो बात ही छोड़ दो, जिसे परमेश्वर ने बनाया था। परमेश्वर की नजरों में, शैतान पहाड़ पर उगे सोसन के फूलों, हवा में उड़ते पक्षियों, समुद्र की मछलियों और धरती पर रेंगती इल्लियों से भी तुच्छ है। सभी चीजों के बीच उसकी भूमिका सभी चीजों की सेवा करना, मानवजाति की सेवा करना और परमेश्वर के कार्य और उसकी प्रबंधन योजना की सेवा करना है। चाहे उसकी प्रकृति कितनी भी दुर्भावनापूर्ण हो और उसका सार कितना भी दुष्ट क्यों न हो, वह केवल आज्ञाकारिता के साथ अपनी भूमिका निभा सकता है : परमेश्वर के लिए सेवा करना—एक विषमता के रूप में अच्छी तरह से सेवा करना। शैतान का सार और मूल पद ऐसा ही है। जीवन, सामर्थ्य या अधिकार से उसके सार का कोई लेना-देना नहीं है; वह परमेश्वर के हाथों में महज एक खिलौना है, बस एक मशीन है जिसका उपयोग परमेश्वर सेवा के लिए करता है!” (वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I)। परमेश्वर के वचनों से मैं उसकी सामर्थ्य और अधिकार के दर्शन कर सकी। चाहे सजीव या निर्जीव, हर चीज परमेश्वर के हाथ में है। शैतान भी परमेश्वर के कार्य में सेवा करता है—यह विषमता के रूप में सेवा करता है। बड़ा लाल अजगर चाहे कितना भी षड्यंत्रकारी हो, चाहे कितने ही लोगों और चीजों की ताकत का इस्तेमाल करता हो, फिर भी वह परमेश्वर की अनुमति के बिना हमारा बाल भी बाँका नहीं कर सकता। मैंने अय्यूब के अनुभव के बारे में सोचा : शैतान ने उस पर हमला किया और उसे चोट पहुँचाई, उसे परमेश्वर का इनकार करने और ठुकरा देने के लिए उकसाने की कोशिश की। परमेश्वर ने शैतान को अय्यूब से बुरी तरह पेश तो आने दिया मगर उसके जीवन को खतरे में डालने की इजाजत नहीं दी और शैतान ने परमेश्वर के आदेश के विरुद्ध जाने की हिम्मत नहीं की। जब मैं गिरफ्तारी के बाद की स्थिति सँभालने का काम कर रही थी तो एक के बाद एक खतरनाक स्थितियों से साफ-साफ बचकर निकलती रही। यह पूरी तरह परमेश्वर की देखभाल और सुरक्षा के कारण हुआ। इन सभी अनुभवों ने मुझे परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता और संप्रभुता दिखाई है। अगर परमेश्वर ने बड़े लाल अजगर को मुझे न पकड़ने दिया तो यह मुझे नहीं पकड़ सकता है। अगर परमेश्वर ने मेरी गिरफ्तारी होने दी तो मैं चाहकर भी इससे बच नहीं पाऊँगी। इसे समझने से मुझे आस्था मिली। मैंने महसूस किया कि मैं अपना जीवन परमेश्वर के हाथों में सौंपने और उसके आयोजनों और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करने के लिए तैयार हूँ।
कुछ दिनों बाद अगुआओं का एक पत्र मिला जिसमें लिखा था कि हमारे इलाके में पुलिस के धर-पकड़ अभियान के दौरान किताबें सुरक्षित रखने के काम आने वाले दो घरों पर छापा पड़ा था। सिर्फ एक घर बचा था और वहाँ रखी किताबों को तुरंत हटाना जरूरी था। किताबों के रखवालों को जानने वाले बाकी सभी लोग पकड़े जा चुके थे, सिर्फ मैं बची थी और उस इलाके और कलीसिया के सदस्यों से ज्यादा वाकिफ थी, इसलिए किताबें हटाने में वे मुझसे मदद चाहते थे। मैं बखूबी जानती थी कि इन हालात में मेरा वहाँ जाना ही सबसे अच्छा है, और यह ऐसी जिम्मेदारी है जिसे टाला नहीं जा सकता। लेकिन अब परिवेश बहुत ही प्रतिकूल था और बड़ा लाल अजगर अब भी लोगों का पीछा कर रहा था। मेरा इस वक्त वहाँ जाना क्या ओखली में सिर डालने जैसा नहीं रहेगा? मैं कुछ डर-सी गई। लेकिन मुझे ख्याल आया कि कैसे स्थिति परमेश्वर के हाथ में थी, और अगर परमेश्वर न होने दे तो बड़ा लाल अजगर मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकता है। इसलिए मैंने वहाँ जाने और किताबें हटाने का जोखिम उठाने का फैसला किया। मैंने प्रार्थना की, “हे परमेश्वर! मुझे यह कर्तव्य सौंपा गया है और मैं अपनी जिम्मेदारी निभाने के लिए तैयार हूँ। आगे चाहे जो हो, मैं तुम्हारे आयोजनों और व्यवस्थाओं के आगे समर्पण करने को तैयार हूँ। भले ही मैं गिरफ्तार कर ली जाऊँ, सताई जाऊँ, फिर भी मैं कभी दोबारा भगौड़ी नहीं बनूँगी। मैं तुम्हें अपनी वफादारी अर्पित करूँगी और शैतान को लज्जित करने के लिए अपनी गवाही में अडिग रहूँगी।” लिहाजा मैंने आसपास पूछकर किताबें रखने वाला घर खोजा। वहाँ मिले भाई ने कहा कि सात-आठ पुलिस अफसर पहले ही उसके घर आकर एक को गिरफ्तार कर चुके हैं। वे बिना कुछ कहे उसकी पत्नी को गिरफ्तार कर ले गये और उन्होंने उन पर 2,000 युआन जुर्माना थोपा है, लेकिन उन्हें वहाँ रखी किताबें नहीं मिलीं—इन्हें जल्द से जल्द हटाना जरूरी था। हमने किताबों के पैकेट तेजी से कार में रखे। चलती कार में मेरा दिल एक पल के लिए भी परमेश्वर से नहीं हटा। अंत में हमने किताबें एक सुरक्षित जगह रखवा दीं और कोई परेशानी नहीं हुई। मैंने बार-बार परमेश्वर को धन्यवाद दिया!
इस पूरे अनुभव के बारे में दुबारा सोचती हूँ तो मैंने परमेश्वर की बुद्धिमत्ता और सर्वशक्तिमत्ता देखी, यह भी देखा कि मेरी आस्था कितनी छिछली थी। बड़े लाल अजगर ने गिरफ्तारियाँ न की होतीं तो मैं अपना आध्यात्मिक कद साफ-साफ न देख पाती, खासकर अपने स्वार्थ, घिनौनेपन और मृत्यु के भय को स्वीकार नहीं कर पाती, न ही मुझे परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता और संप्रभुता की समझ मिल पाती। मुझे यह अनुभव भी हुआ है कि परमेश्वर हमारे साथ है, और अगर हम परमेश्वर का आसरा लेते रहे, वह हमारा मार्गदर्शन करेगा और हमारे लिए रास्ता खोलता रहेगा। यह एक ऐसी समझ है जो मुझे शांतिमय माहौल में नहीं मिल सकती थी।