12. बीमारी की यातना के अनुभव ने मुझे समर्पण करना सिखाया

वांग चिन, चीन

जून 2021 में एक दिन, मुझे चक्कर आने लगे और बेचैनी महसूस हुई, इसलिए मैंने अपना ब्लड प्रेशर चेक किया। सिस्टोलिक रीडिंग 200 से ऊपर थी और डायस्टोलिक रीडिंग 120 थी। बाद में, मैंने दवाई ली और यह कम हो गया, लेकिन मेरा सिस्टोलिक प्रेशर अभी भी कभी-कभी 160 तक पहुँच जाता था, जिससे मुझे सिरदर्द होता और चक्कर आते थे। मुझे चिंता होने लगी। मेरा ब्लड प्रेशर इतना ज्यादा था और मुझे हर दिन कंप्यूटर पर काम करना पड़ता था, मैंने सोचा, “अगर ऐसा ही चलता रहा और मेरी हालत बिगड़ गई, मैं अपना कर्तव्य और नहीं निभा सका तो क्या होगा? क्या तब भी मुझे बचाया जा सकेगा?” इसलिए, मैं खुद पर बहुत ज्यादा जोर नहीं डालना चाहता था। उस समय, मैं एक कलीसिया अगुआ था और मुझे हर दिन काम का फॉलो-अप लेना पड़ता था। इसके अलावा, जिन दो भाई-बहनों के साथ मैं सहयोग कर रहा था, उन्होंने अभी प्रशिक्षण लेना शुरू ही किया था, इसलिए मुझे ज्यादा बोझ उठाना पड़ रहा था। मुझे थोड़ी नाराजगी महसूस होने लगी, चिंता थी कि इस सारे तनाव से मेरा ब्लड प्रेशर और बढ़ जाएगा। मैं अपनी बीमारी को लेकर लगातार चिंतित रहता था, इसलिए मैंने अपने कर्तव्य में अपना दिल नहीं लगाया। मैं बस विभिन्न सिद्धांतों को सरसरी तौर पर पढ़ लेता था, केवल कुछ शाब्दिक अर्थ ही समझ पाता था, लेकिन मैं वास्तव में उन्हें अपने कर्तव्य में लागू नहीं कर पाता था। जब मैंने देखा कि हमारे काम के अच्छे नतीजे नहीं मिल रहे हैं तो मैंने हमारे मुद्दों को हल करने के तरीके खोजने के लिए कोई वास्तविक प्रयास नहीं किया, क्योंकि मुझे लगातार डर था कि इसमें बहुत ज्यादा ऊर्जा लगाने से मेरा ब्लड प्रेशर बढ़ जाएगा।

फरवरी 2023 में, बार-बार सिरदर्द होने और चक्कर आने के कारण, मेरे मेजबान परिवार के भाई ने मुझसे अस्पताल में जांच कराने का आग्रह किया। उसके बाद, डॉक्टर ने मुझे बताया कि मुझे सेरेब्रल इन्फार्क्शन हुआ है और मुझे तत्काल इलाज की जरूरत है। उसने चेतावनी दी कि अगर यह बिगड़ गया तो इससे लकवा मार सकता है या जान को खतरा भी हो सकता है। मुझे चिंता थी कि अगर यह वास्तव में गंभीर हो गया तो मैं अपना कर्तव्य नहीं निभा पाऊँगा, तब क्या मेरे उद्धार पाने की सारी उम्मीद खत्म नहीं हो जाएगी? मैं तुरंत इलाज करवाना चाहता था, लेकिन तभी मुझे एक पत्र मिला कि एक कलीसिया अगुआ को गिरफ्तार कर लिया गया है और वह यहूदा बन गया है और मुझे तुरंत जगह बदलनी होगी। उसके बाद, मैंने वापस अस्पताल जाने की हिम्मत नहीं की। बाद में, मैंने पाठ-आधारित कर्तव्य करना शुरू कर दिया। एक सुबह, मैंने बिस्तर से उठने की कोशिश की और मुझे चक्कर और मतली का इतना तेज दौरा पड़ा कि मैं खड़ा भी नहीं हो सका। मुझे वापस लेटना पड़ा। मैंने मन ही मन सोचा, “मुझे पहले से ही हाई ब्लड प्रेशर और सेरेब्रल इन्फार्क्शन है। क्या ऐसा हो सकता है कि सेरेब्रल इन्फार्क्शन बिगड़ गया हो और कोई रक्त नली ब्लॉक हो गई हो?” मैं इलाज के लिए घर जाना चाहता था, लेकिन पुलिस अभी भी मेरे पीछे थी। मैं वापस नहीं जा सकता था। इसलिए मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की और बीमारी का अनुभव कैसे करें, इस पर उसकी संगति के वचन पढ़े। अगले दिन, चक्कर में थोड़ा आराम था। दो महीने बाद, मेरी सेहत में काफी हद तक सुधार हो गया था, लेकिन मैं अभी भी चिंता और घबराहट में जी रहा था। मुझे डर था कि अतिरिक्त दिमागी मेहनत मुझे थका देगी और मेरी हालत और खराब कर देगी, इसलिए मैं अपने कर्तव्य में ज्यादा कीमत चुकाने को तैयार नहीं था। मैं बस हाथ में जो काम थे, उन्हें निपटाने के लिए खानापूरी करता था। लेखों की स्क्रीनिंग करते समय मैं ध्यान नहीं देता था, जिसके कारण मेरे द्वारा चुने गए लेख खराब गुणवत्ता के होते थे। अप्रैल 2024 में, भाई झेंग मेरे साथ सहयोग करने के लिए मेरी टीम में शामिल हो गया और मुझे अपना बोझ थोड़ा हल्का महसूस हुआ। उसे वहाँ अपने कर्तव्य पर पूरी तरह केंद्रित देखकर, मैं ईर्ष्या से भर गया। “काश मैं भी उसकी तरह स्वस्थ होता!” मैंने सोचा। “पिछले कुछ वर्षों में मेरी सेहत बहुत खराब हो गई है। यह सिर्फ हाई ब्लड प्रेशर और सेरेब्रल इन्फार्क्शन ही नहीं है; मुझे टिनिटस भी है। अपना कर्तव्य करते समय मुझे अक्सर चक्कर आते हैं और दिमाग धुंधला-सा लगता है। मेरा दाहिना हाथ भी थोड़ा सुन्न रहता है—शायद यह खराब रक्त संचार के कारण है। मैं अब साठ से ऊपर का हूँ और मेरी प्रतिरक्षा प्रणाली भी कमजोर है। ऐसी सेहत के साथ, अगर किसी दिन मुझे लकवा मार गया और मैं अपना कर्तव्य निभाने में अक्षम हो गया तो क्या मैं बेकार नहीं हो जाऊँगा और उद्धार पाने और स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने का मौका नहीं खो दूँगा? क्या इन सभी वर्षों में मैंने जो कीमत चुकाई है और जो कष्ट सहे हैं, वे व्यर्थ नहीं चले जाएँगे?” इसके बारे में सोचकर, मैं कुछ हद तक हताश हो गया। भाई झेंग ने मेरे साथ संगति की कि जब हम बीमारी का सामना करते हैं तो हमें परमेश्वर का इरादा खोजना चाहिए। मुझे थोड़ा बुरा लगा, यह सोचकर कि वह निश्चय ही समझ नहीं सकता कि मैं किस दौर से गुजर रहा हूँ। लेकिन फिर मैंने विचार किया कि मैं अपनी सेहत के कारण बरसों से लगातार दुख और चिंता में जी रहा हूँ, परमेश्वर का इरादा खोजने में अपना दिल कभी नहीं लगाता। मुझे पता था कि मेरी दशा ठीक नहीं है, इसलिए मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की, “हे परमेश्वर, मैं जानता हूँ कि मुझ पर यह बीमारी आए, इसमें तुम्हारा इरादा है। कृपया सत्य समझने और अपना सबक सीखने में मेरा मार्गदर्शन करो।”

बाद में, मैंने परमेश्वर के कुछ वचन पढ़े और उसके इरादे को थोड़ा बेहतर समझना शुरू किया। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “जब परमेश्वर यह व्यवस्था करता है कि तुम्हें बीमारी हो, चाहे वह छोटी हो या बड़ी, ऐसा करने के पीछे उसका उद्देश्य तुम्हें बीमार होने के पूरे विवरण, बीमारी से तुम्हें होने वाली हानि, बीमारी के कारण तुम्हें होने वाली विभिन्न असुविधाओं और मुश्किलों और बीमारी से होने वाले तमाम विभिन्न एहसासों का अनुभव करने देना नहीं है—उसका प्रयोजन यह नहीं है कि तुम बीमार होने की प्रक्रिया में बीमारी का अनुभव करो। इसके बजाय उसका प्रयोजन यह है कि बीमारी से तुम सबक सीखो, सीखो कि परमेश्वर के इरादों को कैसे पकड़ें, अपने द्वारा प्रकट भ्रष्ट स्वभावों और बीमार होने पर परमेश्वर के प्रति अपने गलत रवैयों को जानो और यह सीखो कि परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्थाओं के प्रति कैसे समर्पण करें ताकि तुम परमेश्वर के प्रति सच्चा समर्पण प्राप्त कर सको और अपनी गवाही में अडिग रह सको—यह बिल्कुल अहम है। परमेश्वर बीमारी के जरिए तुम्हें बचाना और स्वच्छ करना चाहता है। वह तुम्हारी किस चीज को स्वच्छ करना चाहता है? वह परमेश्वर पर थोपी गई तुम्हारी तमाम असंयमित आकांक्षाओं और माँगों और यहाँ तक कि हर कीमत पर जीवित रहने और खुद को जिंदा रखने की तुम्हारे अलग-अलग हिसाबों, फैसलों और योजनाओं को स्वच्छ करना चाहता है। परमेश्वर तुम्हें योजनाएँ बनाने की अनुमति नहीं देता, वह तुम्हें राय नहीं बनाने देता और उससे कोई असंयमित आकांक्षा रखने नहीं देता; उसकी बस इतनी अपेक्षा होती है कि तुम उसके प्रति समर्पित रहो, और समर्पण करने के अपने अभ्यास और अनुभव में, तुम बीमारी के प्रति अपने रवैये को जान जाओ और उसके द्वारा तुम्हें दी गई इन शारीरिक स्थितियों के प्रति अपने रवैये को और साथ ही अपनी निजी कामनाओं को जान लो। जब तुम इन चीजों को जान लेते हो, तब तुम समझ सकते हो कि तुम्हारे लिए यह कितना फायदेमंद है कि परमेश्वर ने तुम्हारे लिए बीमारी की परिस्थितियों का इंतजाम किया है, या उसने तुम्हें ये शारीरिक स्थितियाँ दी हैं; और तुम समझ सकते हो कि तुम्हारा स्वभाव बदलने, तुम्हारे उद्धार हासिल करने, और तुम्हारे जीवन प्रवेश में ये कितनी मददगार हैं। इसीलिए जब बीमारी आती है तो तुम्हें हमेशा यह नहीं सोचना चाहिए कि उससे कैसे मुक्ति पाएँ या बच निकलें या उसे ठुकरा दें(वचन, खंड 6, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण कैसे करें (3))। परमेश्वर के वचनों से, मैंने देखा कि उसके नेक इरादों के साथ हम पर बीमारियाँ हमें बदलने और शुद्ध करने आती हैं। जो लोग सत्य का अनुसरण करते हैं, वे बीमारी के माध्यम से सबक सीख सकते हैं और परमेश्वर के प्रति सच्चा समर्पण प्राप्त कर सकते हैं। लेकिन जब मुझ पर बीमारी आई तो मैंने परमेश्वर का इरादा नहीं खोजा या आत्म-चिंतन करके खुद को नहीं जाना। मैं बस हमेशा अपनी बीमारी के बीच जीता रहा, यह चिंता करते हुए कि अगर मुझे लकवा मार गया और मैं अपना कर्तव्य नहीं कर पाया, या मर ही गया तो मेरे उद्धार पाने और स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने की उम्मीद पूरी तरह से टूट जाएगी। क्योंकि मुझे चिंता थी कि मेरी हालत खराब हो जाएगी, मैंने अपने कर्तव्य में कोई बोझ नहीं उठाया, इस डर से कि मेरा शरीर थक जाएगा। जब मेरे भाई-बहनों ने बीमारी से सबक सीखने के बारे में मेरे साथ संगति की, तब भी मैंने इसे स्वीकार नहीं किया। मैंने सोचा, “तुम्हारे लिए कहना आसान है; तुम बीमारी और दर्द में नहीं हो।” मैं हमेशा दूसरों की अच्छी सेहत से ईर्ष्या करता था और शिकायत करता था कि परमेश्वर ने मुझे स्वस्थ शरीर नहीं दिया। मैं जरा भी सत्य नहीं खोज रहा था या सबक सीखने की कोशिश नहीं कर रहा था। मैं कभी सत्य पाने, शुद्ध किए जाने या बदलने की उम्मीद कैसे कर सकता था?

बाद में, मैंने अपनी समस्याओं के बारे में सत्य खोजना शुरू किया। मैंने परमेश्वर के वचन पढ़े : “किसी व्यक्ति की पतित देह को कोई भी बीमारी हो, यह किस हद तक पीड़ा सहती है या क्या यह बीमारी ठीक हो सकती है—इनमें से कुछ भी उसके ऊपर निर्भर नहीं करता है, यह सब परमेश्वर के हाथ में है। जब तुम पर बीमारी आती है, तो चाहे तुम परमेश्वर के आयोजनों के प्रति समर्पण कर सकते हो या नहीं, चाहे तुम इस तथ्य को स्वीकार करने को इच्छुक हो या नहीं, बीमारी तो अभी भी तुम्हारे शरीर में ही होती है; तुम इससे छुटकारा नहीं पा सकते हो। तो, चाहे तुम अपनी बीमारी का सामना सकारात्मक रूप से करो या नकारात्मक रूप से, दिन तो वैसे ही बीतते हैं, और तुम इस तथ्य को नहीं बदल सकते कि यह बीमारी तुम्हारे शरीर में है। लेकिन तुम यह चुन सकते हो कि इसके प्रति कौन-सा रवैया अपनाना है(वचन, खंड 6, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण कैसे करें (4))। “जब सामान्य लोग बीमार पड़ते हैं, तो वे सब पीड़ा सहते हैं और संतप्त महसूस करते हैं, और उनकी सहन करने की कोई सीमा होती है। लेकिन यदि लोग अपनी बीमारी से छुटकारा पाने और इससे बच निकलने के लिए हमेशा अपनी ही ताकत पर निर्भर रहना चाहते हैं तो अंतिम नतीजा क्या होगा? वे न केवल अपनी पीड़ा को कम करने में असमर्थ होंगे, बल्कि वे और भी अधिक पीड़ा सहेंगे और संतप्त महसूस करेंगे। इसीलिए तुम बीमारी से जितनी अधिक पीड़ा सहते हो, तुम्हें उतना ही अधिक सत्य खोजना चाहिए और यह खोजना चाहिए कि परमेश्वर के इरादों के अनुसार कैसे अभ्यास करें। तुम बीमारी से जितनी अधिक पीड़ा सहते हो, तुम्हें उतना ही अधिक परमेश्वर के सामने आना चाहिए और अपनी ही भ्रष्टता और परमेश्वर से की जाने वाली अपनी अविवेकपूर्ण माँगों को जानना चाहिए। तुम बीमारी से जितनी अधिक पीड़ा सहते हो, तुम सच्चे समर्पण के लिए उतने ही अधिक परखे जाते हो। इसलिए, यदि तुम बीमारी सहते हुए भी परमेश्वर के आयोजनों के प्रति समर्पण करने में सक्षम हो और तुम परमेश्वर से शिकायत करने से बच सकते हो और मृत्यु के बिंदु तक बीमार होने पर भी उससे की जाने वाली अपनी अविवेकपूर्ण माँगों को छोड़ सकते हो, तो यह दर्शाता है कि तुम ईमानदारी से सत्य का अनुसरण करने वाले और परमेश्वर के प्रति समर्पण करने वाले व्यक्ति हो, कि तुम्हारे पास गवाही है, और परमेश्वर के प्रति तुम्हारी वफादारी और समर्पण वास्तविक हैं, कि वे नारे या धर्म-सिद्धांत नहीं हैं, और इसके बजाय परीक्षा में खरे उतरते हैं। बीमार होने पर लोगों को यही अभ्यास करना चाहिए। जब तुम बीमार पड़ते हो, तो एक पहलू से यह तुम्हारी सभी अविवेकपूर्ण माँगों और परमेश्वर के प्रति अवास्तविक कल्पनाओं और धारणाओं का खुलासा करने के लिए होता है, और दूसरे पहलू से यह परमेश्वर में तुम्हारी आस्था और उसके प्रति समर्पण की परीक्षा लेने के लिए भी होता है। अगर तुम इन पहलुओं की परीक्षा उत्तीर्ण कर लेते हो, तो तुम्हारे पास परमेश्वर में तुम्हारी आस्था और उसके प्रति तुम्हारी वफादारी और समर्पण की सच्ची गवाही और असली प्रमाण है। यह वह चीज है जो परमेश्वर चाहता है, और यह वह चीज है जो एक सृजित प्राणी के पास होनी चाहिए और जिसे उसको जीना चाहिए। क्या ये सारी चीजें सकारात्मक नहीं हैं?(वचन, खंड 6, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण कैसे करें (4))। परमेश्वर के वचनों ने बताया कि बीमारी का सामना करते समय सही नजरिया और अभ्यास का मार्ग ऐसा होना चाहिए : परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्थाओं पर सच्चे दिल से विश्वास करना और समर्पित होना और खुद बीमारी से छुटकारा पाने की कोशिश न करना—इससे केवल और अधिक पीड़ा होगी। मुझे खुद परमेश्वर के वचनों का कुछ व्यावहारिक अनुभव था। जब मेरा ब्लड प्रेशर 200 mmHg से ऊपर चला गया तो मैं बहुत डर गया था। मैंने सोचा कि अगर मैंने अपना ख्याल रखने पर ध्यान नहीं दिया या अगर मैं गलती से गिर गया तो मुझे लकवा मार जाएगा या मैं मर भी सकता हूँ। मुझे डर था कि अगर मैंने अपने कर्तव्य में बहुत ज्यादा दिमागी काम किया तो इससे मेरी हालत खराब हो जाएगी और गंभीर नतीजे होंगे, इसलिए मैं लगातार दुख और चिंता की नकारात्मक भावनाओं के बीच जी रहा था। इससे मेरे शरीर और दिमाग पर बहुत दबाव पड़ा और पीड़ा हुई और मेरा कर्तव्य प्रभावित हुआ। क्या यह सब इसलिए नहीं था क्योंकि मुझे परमेश्वर की संप्रभुता का कोई ज्ञान नहीं था? सच तो यह है, चाहे मेरी हालत गंभीर हो या मामूली, या मैं कब मर सकता हूँ—इसमें से कुछ भी चिंता करने या दुखी होने से नहीं बदला जा सकता। यह सब परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्थाओं के अंतर्गत आता है। उदाहरण के लिए, मुझे हाई ब्लड प्रेशर होने के बाद, एक हफ्ता ऐसा था जब मैं अपनी बाइक से दो बार गिर गया और मैं बहुत बुरी तरह गिरा था। उस समय, मैंने सोचा, “बस अब हो गया, शायद मुझे लकवा मार ही जाएगा।” लेकिन पता चला कि मुझे केवल कुछ मामूली खरोंचें आई थीं; यह उतना गंभीर नहीं था जितना मैंने कल्पना की थी। क्या वह परमेश्वर की सुरक्षा नहीं थी? मुझे अपना गलत नजरिया बदलना था और अपनी बीमारी का सही ढंग से सामना करना था। मुझे जरूरत पड़ने पर इलाज करवाना चाहिए, लेकिन जहाँ तक इस बात का सवाल है कि मैं ठीक हो जाऊँगा या नहीं या मैं जिऊँगा या मरूँगा, मैं परमेश्वर से माँगें नहीं कर सकता और मुझे निश्चित रूप से उसे गलत नहीं समझना चाहिए या उसके बारे में शिकायत नहीं करनी चाहिए। मुझे परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करना होगा और बीमारी के बीच, सत्य को और अधिक खोजना होगा और आत्म-चिंतन करके खुद को जानना होगा। वास्तविक लाभ पाने का यही एकमात्र तरीका है।

बाद में, मैंने इस मूल कारण पर विचार करना जारी रखा कि मैं नकारात्मक भावनाओं में क्यों जी रहा था। मैंने परमेश्वर के वचन पढ़े : “सभी लोग आशीषें, पुरस्कार और मुकुट पाने के लिए परमेश्वर में विश्वास करते हैं। क्या हर व्यक्ति के दिल में यह इरादा नहीं होता? वास्तव में, हर व्यक्ति के दिल में यही होता है। यह एक तथ्य है। यद्यपि लोग अक्सर इसके बारे में बात नहीं करते और यहाँ तक कि आशीषें प्राप्त करने के अपने इरादे और इच्छा को छिपाते भी हैं, यह इच्छा, यह इरादा और उद्देश्य जो लोगों के दिलों में गहराई तक निहित है, कभी भी डगमगाया नहीं है। चाहे लोग कितना भी आध्यात्मिक सिद्धांत समझें, उनके पास कोई भी अनुभवजन्य ज्ञान हो, वे कोई भी कर्तव्य कर सकते हों, वे कितना भी कष्ट सहें या वे कितनी भी कीमत चुकाएँ, वे कभी भी आशीषें प्राप्त करने के उस इरादे को नहीं छोड़ते जो उनके दिलों में गहराई से छिपा हुआ है, वे हमेशा चुपचाप इसकी सेवा में मेहनत और भाग-दौड़ करते रहते हैं। क्या यही वह चीज नहीं है जो लोगों के दिलों में सबसे गहराई में दबी हुई है? आशीषें प्राप्त करने के इस इरादे के बिना, तुम लोगों को कैसा महसूस होगा? तुम किस रवैये से अपना कर्तव्य निभाओगे और परमेश्वर का अनुसरण करोगे? यदि आशीषें प्राप्त करने का यह इरादा जो उनके दिलों में छिपा है, पूरी तरह से समाप्त कर दिया जाए तो लोगों का क्या होगा? यह संभव है कि बहुत से लोग नकारात्मक हो जाएँगे, कुछ लोग अपने कर्तव्यों में उत्साहहीन हो जाएँगे और परमेश्वर में अपने विश्वास में रुचि खो देंगे। वे ऐसे लगने लगेंगे जैसे उन्होंने अपनी आत्मा खो दी हो और ऐसा प्रतीत होगा जैसे उनके दिल छीन लिए गए हों। इसीलिए मैं कहता हूँ कि आशीषें प्राप्त करने का इरादा कुछ ऐसा है जो लोगों के दिलों में गहराई से छिपा हुआ है(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, जीवन संवृद्धि के छह संकेतक)। “अपना कर्तव्य निभाने का फैसला लेने से पहले, अपने दिलों की गहराई में, मसीह-विरोधी अपनी संभावनाओं की उम्मीदों, आशीष पाने, अच्छी मंजिल पाने और यहाँ तक कि मुकुट पाने की उम्मीदों से भरे होते हैं और उन्हें इन चीजों को पाने का पूरा विश्वास होता है। वे ऐसे इरादों और आकांक्षाओं के साथ अपना कर्तव्य निभाने के लिए परमेश्वर के घर आते हैं। तो, क्या उनके कर्तव्य निर्वहन में वह ईमानदारी, सच्ची आस्था और निष्ठा है जिसकी परमेश्वर अपेक्षा करता है? इस मुकाम पर, अभी कोई भी उनकी सच्ची निष्ठा, आस्था या ईमानदारी को नहीं देख सकता, क्योंकि हर कोई अपना कर्तव्य करने से पहले पूरी तरह से लेन-देन की मानसिकता रखता है; हर कोई अपना कर्तव्य निभाने का फैसला अपने हितों से प्रेरित होकर और अपनी अतिशय महत्वाकांक्षाओं और इच्छाओं की पूर्ति की पूर्व-शर्त पर करता है। अपना कर्तव्य निभाने के पीछे मसीह-विरोधियों का इरादा क्या है? यह सौदा और लेन-देन करने का इरादा है। यह कहा जा सकता है कि यही वे शर्तें हैं जो वे कर्तव्य करने के लिए निर्धारित करते हैं : ‘अगर मैं अपना कर्तव्य करता हूँ, तो मुझे आशीष मिलने चाहिए और एक अच्छी मंजिल मिलनी चाहिए। मुझे वे सभी आशीष और लाभ मिलने चाहिए जो परमेश्वर ने कहा है कि वे मानवजाति के लिए बनाए गए हैं। अगर मैं उन्हें नहीं पा सकता तो मैं यह कर्तव्य नहीं करूँगा।’ वे ऐसे इरादों, महत्वाकांक्षाओं और इच्छाओं के साथ अपना कर्तव्य निभाने के लिए परमेश्वर के घर आते हैं। ऐसा लगता है कि उनमें थोड़ी ईमानदारी है और बेशक जो नए विश्वासी हैं और अभी अपना कर्तव्य निभाना शुरू कर रहे हैं, उनके लिए इसे उत्साह भी कहा जा सकता है। मगर इसमें कोई सच्ची आस्था या निष्ठा नहीं है; केवल उस स्तर का उत्साह है। इसे ईमानदारी नहीं कहा जा सकता। अपना कर्तव्य निभाने के प्रति मसीह-विरोधियों के इस रवैये को देखें तो यह पूरी तरह से लेन-देन वाला है और आशीष पाने, स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने, मुकुट पाने और इनाम पाने जैसे लाभों की उनकी इच्छाओं से भरा हुआ है(वचन, खंड 4, मसीह-विरोधियों को उजागर करना, मद नौ (भाग सात))। परमेश्वर के वचनों से, मैंने देखा कि मसीह-विरोधी केवल आशीष पाने की खातिर अपना कर्तव्य निभाने के लिए कलीसिया में आते हैं। आशीष पाने के लिए, एक मसीह-विरोधी सब कुछ त्याग सकता है, खुद को खपा सकता है और कीमत चुका सकता है, लेकिन जिस पल उसे लगता है कि उसे आशीष नहीं मिल सकते, वह परमेश्वर से तत्परता से विश्वासघात कर सकता है। खुद पर विचार करते हुए, मुझे एहसास हुआ कि परमेश्वर में विश्वास करने में मेरे अपने इरादे और लक्ष्य बिल्कुल वही थे : आशीष पाना और स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करना। विश्वास के इन सभी वर्षों के दौरान, मैं सीसीपी के उत्पीड़न या दुनिया के उपहास और बदनामी से बाधित नहीं हुआ और मैं परमेश्वर का अनुसरण करने और अपना कर्तव्य निभाने में डटा रहा। मैंने यह सब यह सोचकर किया कि मेरे द्वारा चुकाई गई कीमत और मेरे खपने से मुझे परमेश्वर का अनुग्रह और आशीष मिलेंगे और स्वर्ग के राज्य में मेरा प्रवेश सुरक्षित हो जाएगा। जब मुझे हाई ब्लड प्रेशर और सेरेब्रल इन्फार्क्शन हो गया, मुझे चिंता हुई कि अगर मेरा ब्लड प्रेशर बढ़ा तो मरने की नौबत न भी आए, मुझे लकवा तो मार ही जाएगा और अगर मैं अपना कर्तव्य नहीं कर पाया तो मैं स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने का आशीष खो दूँगा। इसीलिए मैं हमेशा हताश अवस्था में रहता था। जब मैंने देखा कि मेरे कर्तव्य के अच्छे नतीजे नहीं मिल रहे तो मैं इसके बारे में चिंतित नहीं था; बल्कि, मुझे चिंता थी कि मानसिक रूप से ज्यादा जोर देने से मेरी हालत बिगड़ जाएगी और मैं आशीष पाने का मौका खो दूँगा। मैंने देखा कि मैंने जो कुछ भी सोचा और किया, वह मेरे अपने शारीरिक लाभ के लिए था। मेरा विश्वास, त्याग करना और खपाना सब कुछ आशीष पाने की खातिर था। मैं अस्तित्व के उस शैतानी नियम के अनुसार जी रहा था, “हर व्यक्ति अपनी सोचे बाकियों को शैतान ले जाए।” आशीष पाने के लिए, मैं किसी और चीज की परवाह किए बिना त्याग कर सकता और खुद को खपा सकता था, लेकिन अगर इसमें मेरे लिए कोई आशीष नहीं थे, तो मैं बस नकारात्मक हो जाता और सुस्त पड़ जाता। क्या मैं मसीह-विरोधी का स्वभाव प्रकट नहीं कर रहा था? अंत के दिनों में, परमेश्वर मानवता को बचाने का कार्य करने के लिए सत्य व्यक्त करता है। परमेश्वर का इरादा यह नहीं है कि मैं उसका अनुसरण करूँ और केवल आशीष पाने के लिए अपना कर्तव्य निभाऊँ। वह आशा करता है कि अपना कर्तव्य निभाने की प्रक्रिया में, मैं अपने भ्रष्ट स्वभावों को हल करने के लिए सत्य का अनुसरण करूँगा, आस्था पर अपने गलत विचारों को बदलूँगा, उन चीजों को त्याग दूँगा जो शैतान की हैं और ऐसा व्यक्ति बनूँगा जो परमेश्वर के इरादों के अनुरूप हो। केवल तभी मैं परमेश्वर की स्वीकृति प्राप्त कर सकता हूँ। इसके विपरीत, मैं हमेशा से एक स्वार्थी, खुदगर्ज शैतानी स्वभाव में जीता रहा था, केवल आशीषों का अनुसरण करता रहा था। क्या मैं बस पौलुस के रास्ते पर नहीं चल रहा था? पौलुस परमेश्वर में विश्वास करता था लेकिन सत्य और जीवन का अनुसरण नहीं करता था। उसने परमेश्वर के लिए अपने सभी कार्यों और परिश्रम को एक मुकुट और आशीष पाने के लिए सौदेबाजी का जरिया माना, परमेश्वर के साथ सौदा करने की कोशिश की। बरसों के विश्वास के बाद, उसका शैतानी भ्रष्ट स्वभाव रत्ती भर भी नहीं बदला था। उसने बेशर्मी से परमेश्वर के खिलाफ शोर मचाया, एक मुकुट की माँग की और ऐसा करके, उसने परमेश्वर के स्वभाव को नाराज किया और उसे दंडित किया गया। अगर मैं परमेश्वर में विश्वास करता हूँ लेकिन सत्य और जीवन का अनुसरण नहीं करता और हमेशा आशीषों का अनुसरण और परमेश्वर के साथ सौदेबाजी करने की कोशिश करता हूँ तो पश्चाताप न करने पर मुझे भी दंडित किया जाएगा। इस रास्ते पर चलते रहने के नतीजों का एहसास होने पर मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की, “हे परमेश्वर, मैं जानता हूँ कि इस बीमारी के पीछे तुम्हारे नेक इरादे हैं। यह मुझे प्रकट करने और बचाने के लिए है। यह मुझ पर तुम्हारे प्रेम का आना है जिससे मैं स्पष्ट रूप से देख पा रहा हूँ कि इस पूरे समय, मैं केवल आशीषों का अनुसरण करता और गलत रास्ते पर चलता रहा हूँ। हे परमेश्वर, मैं पश्चाताप करने को तैयार हूँ। अब से, मैं सत्य का अनुसरण करने पर ध्यान लगाऊँगा।” प्रार्थना करने के बाद, मेरे दिल को बहुत अधिक शांति और सुकून महसूस हुआ।

बाद में, मैंने अपने एक और गलत विचार पर चिंतन किया : यह विचार कि अगर मेरी बीमारी गंभीर हो गई और मैं अपना कर्तव्य नहीं कर पाया तो मैं बचाया नहीं जा सकता। इसे हल करने के लिए मैंने सत्य खोजना जारी रखा। मैंने परमेश्वर के वचन पढ़े : “उद्धार पाने का मुख्य रूप से मतलब है पाप से और शैतान के प्रभाव से मुक्त होना और वास्तव में परमेश्वर की ओर मुड़ना और परमेश्वर के प्रति समर्पण करना। पाप से और शैतान के प्रभाव से मुक्त होने के लिए लोगों के पास क्या होना चाहिए? सत्य। सत्य प्राप्त करने के लिए, लोगों को परमेश्वर के कई वचनों से खुद को लैस करना चाहिए, उन्हें परमेश्वर के वचनों का अनुभव करने और उन्हें अभ्यास में लाने में सक्षम होना चाहिए, ताकि वे सत्य को समझ सकें और वास्तविकता में प्रवेश कर सकें—केवल तभी वे बचाए जाएँगे। कोई व्यक्ति बचाया जा सकता है या नहीं, इसका इस बात से कोई लेना-देना नहीं है कि उसने कितने समय तक परमेश्वर में विश्वास किया है, उसका ज्ञान कितना उन्नत है, क्या उसके पास गुण और खूबियाँ हैं या वह कितना कष्ट सहता है। एकमात्र चीज जिसका उद्धार पाने से सीधा संबंध है, वह यह है कि व्यक्ति सत्य प्राप्त करता है या नहीं(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, परमेश्वर के वचनों को सँजोना परमेश्वर में विश्वास की नींव है)। परमेश्वर ने बचाए जाने के मानक को बिल्कुल स्पष्ट कर दिया है। वह मुख्य रूप से यह देखता है कि क्या लोग उसके वचनों की वास्तविकता को जी सकते हैं; क्या, सभी चीजों में, वे शैतानी फलसफों के अनुसार जीना बंद कर देते हैं और इसके बजाय उसके वचनों और सत्य सिद्धांतों के अनुसार लोगों और चीजों को देखते व आचरण और कार्य करते हैं; क्या उनमें उसके प्रति भय, समर्पण, वफादारी और प्रेम है; और क्या वे एक सच्चे मनुष्य के समान जीते हैं। केवल वे लोग ही उद्धार पाएंगे जिनके पास ये सत्य वास्तविकताएं हैं। लेकिन जहाँ तक मेरी बात है, विश्वास के मेरे सभी वर्षों के बाद, मैंने अपने किसी भी भ्रष्ट स्वभाव जैसे घमंड, दंभ, स्वार्थ या नीचता को नहीं त्यागा था। हालाँकि मैं अपने कर्तव्य में थोड़ा कष्ट सहने और थोड़ी कीमत चुकाने में सक्षम था, लेकिन वास्तव में मैं आशीष पाने की अपनी इच्छा के साथ परमेश्वर से सौदेबाजी करने की कोशिश कर रहा था। मेरा पूरा अस्तित्व अभी भी शैतान के काले प्रभाव में जी रहा था, बचाए जाने के करीब भी नहीं था। अगर मैं इन भ्रष्ट स्वभावों का समाधान नहीं करता, अगर आशीषों की वह इच्छा अभी भी मेरे दिल में है तो भले ही मैं कोई कर्तव्य निभा रहा हूँ, फिर भी अंत में मुझे नहीं बचाया जाएगा। मुझे सत्य का अनुसरण करने पर ध्यान केंद्रित करना होगा। बचाए जाने का मौका पाने का यही एकमात्र तरीका है।

साथ ही, मेरी लगातार चिंता कि अगर मैं गंभीर रूप से बीमार हो गया और मर गया तो मुझे नहीं बचाया जा सकता—यह भी सत्य को न समझने से उपजा था। इसलिए मैंने पढ़ने के लिए परमेश्वर के प्रासंगिक वचनों को खोजा। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “अगर जब तुमसे तुम्हारा जीवन छीना जा रहा हो, तुम शांतचित्त हो, इच्छुक हो और बिना किसी शिकायत के समर्पण करते हो, तुम्हें लगता है कि तुमने अंत तक अपनी जिम्मेदारियाँ, दायित्व और अपना कर्तव्य पूरा किया है और तुम्हारा दिल आनंदित और शांत है—अगर तुम्हारी मृत्यु इस तरह होती है—तो परमेश्वर की निगाह में तुम मरे ही नहीं हो। बल्कि, तुम दूसरे लोक में और दूसरे रूप में रह रहे हो। केवल यही हुआ है कि तुम्हारा जीने का तरीका बदल गया है—तुम वास्तव में मरे नहीं हो। मनुष्यों की नजर में, ‘यह व्यक्ति इतनी कम उम्र में चल बसा, कितने दुख की बात है!’ मगर परमेश्वर की नजर में तुम न तो मरे हो, न ही कष्ट भोगने गए हो; बल्कि तुम आशीष का आनंद लेने गए हो और परमेश्वर के करीब आए हो। ऐसा इसलिए है क्योंकि एक सृजित प्राणी के रूप में तुम पहले ही परमेश्वर की नजरों में अपना कर्तव्य निभाने में मानक स्तर तक पहुँच चुके हो, अब तुम्हारा कर्तव्य पूरा हो गया है और परमेश्वर को अब सृजित प्राणियों के बीच इस कर्तव्य को निभाने के लिए तुम्हारी आवश्यकता नहीं है। परमेश्वर के लिए, तुम्हारे ‘जाने’ को ‘जाना’ नहीं कहा जाता, बल्कि इसे ‘ले जाया जाना,’ ‘वापस ले जाया जाना,’ या ‘आगे बढ़ाया जाना’ कहा जाता है और यह एक अच्छी बात है(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, सुसमाचार का प्रचार करना वह कर्तव्य है जिसे निभाना सभी विश्वासियों का दायित्व है)। परमेश्वर के वचनों से, मैंने समझा कि कुछ लोग, जब तक वे जीवित हैं, वे अपने कर्तव्य पर डटे रहने में सक्षम होते हैं, चाहे वे किसी भी चीज का सामना करें—चाहे वह उत्पीड़न हो, क्लेश हो, बीमारी की यातना हो, या आर्थिक तंगी हो—परमेश्वर के बारे में शिकायत या उससे विश्वासघात नहीं करते। ऐसे लोगों ने एक सच्ची गवाही दी है। भले ही उनकी देह मर जाती है, लेकिन वास्तव में उन्हें परमेश्वर द्वारा दूसरे स्थान में रहने के लिए ले जाया जाता है। मैं हमेशा चिंतित रहता था कि मरने का मतलब है बचाए जाने का मेरा मौका खो देना, लेकिन वास्तविकता यह है कि मृत्यु के बाद किसी व्यक्ति का परिणाम परमेश्वर और सत्य के प्रति उसके उस रवैये से निर्धारित होता है जब वह जीवित था। मैंने अय्यूब के बारे में सोचा। वह मानता था कि परमेश्वर स्वर्ग और पृथ्वी और सभी चीजों का संप्रभु है। अपने पूरे जीवन, उसने परमेश्वर का अनुसरण किया और परमेश्वर का भय मानकर बुराई से दूर रहने के मार्ग पर चला। जब उसने मृत्यु का सामना किया तो उसे कोई चिंता या डर नहीं था, क्योंकि वह मानता था कि परमेश्वर किसी व्यक्ति के जीवन और मृत्यु पर संप्रभु है और उसकी व्यवस्था करता है। इसलिए, वह शांति से इसका सामना कर सका। अय्यूब एक ऐसा व्यक्ति था जो परमेश्वर का भय मानता था और बुराई से दूर रहता था। शैतान के प्रलोभनों के दौरान वह अपनी गवाही में दृढ़ रहा, भले ही वह मर गया, उसे परमेश्वर द्वारा बचाया गया। क्योंकि मैं सत्य को नहीं समझता था और जीवन, मृत्यु और उद्धार के मामलों को नहीं समझ पाता था, मैं हमेशा चिंतित रहता था कि मरने का मतलब है कि मुझे नहीं बचाया जा सकता। मैं कितना मूर्ख था! वास्तविकता में, भले ही मैं जीवित हूँ, अगर मैं सत्य का अनुसरण नहीं कर रहा हूँ, परमेश्वर का भय मानकर बुराई से दूर रहने के मार्ग पर नहीं चल रहा हूँ और परमेश्वर में अपनी आस्था में मैं केवल एक मुकुट और आशीष पाने के लिए त्याग करता हूँ और खुद को खपाता हूँ तो परमेश्वर की नजर में, मेरे जीवित रहने या मरने में कोई अंतर नहीं है। इसका उद्धार से कोई लेना-देना नहीं है। ऐसा इसलिए है क्योंकि ऐसा खपना देह के लाभ के लिए है; यह स्वार्थी है और एक सृजित प्राणी के कर्तव्य और जिम्मेदारी को पूरा नहीं कर रहा है। अब, परमेश्वर अभी भी मुझे जीने का मौका दे रहा है। मैं अब जीवन, मृत्यु या आशीषों के बारे में चिंताओं में नहीं डूबा रह सकता। जब तक मैं जीवित हूँ, मुझे परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए ईमानदारी से सत्य का अनुसरण करना चाहिए और एक सृजित प्राणी के रूप में अपना कर्तव्य अच्छी तरह से निभाना चाहिए। यही वह चीज है जिससे मुझे सरोकार रखना चाहिए और जिस पर सबसे अधिक ध्यान देना चाहिए। केवल सत्य प्राप्त करने और सत्य वास्तविकता को जीने से ही मेरे दिल को खुशी और शांति मिलेगी; केवल तभी मैं मौत से नहीं डरूँगा।

आजकल, जब मैं लंबे समय तक अपना कर्तव्य करता हूँ तो मुझे अभी भी सिरदर्द होता और चक्कर आते हैं, लेकिन मैं अब बीमारी के बीच उतना नहीं जीता। अगर मेरे सिर में दर्द होता है, तो मैं थोड़ा आराम कर लेता हूँ। अपने दैनिक जीवन में, मैं अधिक व्यायाम करने की भी कोशिश करता हूँ और अब इस बारे में चिंतित या परेशान नहीं हूँ कि मेरे शरीर का क्या होगा और मैं जिऊँगा या मरूँगा। मैं जितने भी दिन जिऊँगा, मैं अपनी पूरी क्षमता से अपना कर्तव्य निभाऊँगा। परमेश्वर का धन्यवाद!

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